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वेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बस्बईै-४०० । =
संस्करण : सितंबर २०१९, सम्वत् २०७६
मूल्य :
पत्राकार :१५०० रुपये मात्र।
साजिल्दः १७०० रुपये मात्र।
© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
मुद्रक एवं प्रकाशक
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष : श्री वेकटेधर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४
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© सर्वाधिकार : प्रकाशकं द्वारा सुरक्षित
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अध्यक्षः श्रीवेकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
मुंबई = ४०० ००.
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भूमिका
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अनादि कालसे ईदवरोक्त ऋक् यजु साम अथव यह् चार वेद त्रिकालमें रहनेवा मुक्तिक साधन संसारम वतंमान हँ, इन्हींकं अनुकूल इनका गूढ़ आशय प्रगट करनेके
लियि छः शास्त्र ओौर अठारह पुराण व्यासादि ऋषियोने निर्माण किये हँ, वेदम तीनही वणेका अधिकार है स्त्री शूद्रका नहीं इस कारण परमकारुणिक भगवान् वेदव्या
सजीने चारों वणं ओर स्त्रीमात्र तथा अन्य जातिके परमपदप्राप्तिके हेतु प्राचीन गाथाओकं सहित वेदोका आश्रय केकर पुराण निर्माण क्ये हः वे पुराण अठारह
है यथा-श्रीमद्भधागवत १२ स्कंध अ० ७ “ ब्राह्यं पादंवष्णवं च दौवं रगं सगारुड । नारदीयं भागवतमाग्नेयं स्कांदसंहितम् ।। २३ ।। भविष्यं ब्रह्मवैवर्तं माकंण्डेयं
सवामनम्। वाराहं मात्स्यं कौमेञ्च ब्रह्यांडाख्यमिति त्रिषट्।।२४।।" ब्रह्मपुराण, पद्यपु° विष्णुपु° शिवपु° लिगपु° गरूडपु° नारदपु° भागवतपु° अग्नि ° स्कदपु०
मविष्यपु० ब्रह्मवैवतंषु० माकंण्डेयपु० वामनपु° वाराहपु° मत्स्यपु० कूमेषु ° ब्रह्माण्डपु° ओर “चतुविरतिसाह्रं दौवमत्र निरूपितम् । (त्रह्यवेवते) ब्राह्यं पाद्यं वैष्ण-
वञ्च दोवं भागवतं तथा” (विष्णुपुराण ) इत्यादि पुराणकं प्रमाणे क्या प्रमाण है इसपर कहते हे कि, इनके श्रवण करनेकी विधि वेदादि शास्त्रम बहुत प्रकार
से छिखी है अथव वेदका १५ प्र ०२ अ० १ मं० ४ मेँ पुराणका नाम आया है यथा तमितिहासद्च पुराणञ्च गाथार्च नाराशंसीर्चनुग्यङत्, ओर अस्य महतो भूतस्य
विहवसितमे तचयद्ग्बेदो यजुवेदः सामवेदो अथर्वागिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः इलोकः सूत्राण्यनुव्याख्यानानीति शा ० ४ प्र० त्रा ° ४ इसमे पुराणका नाम
पायाजाता है, तथा चतुथैमितिहास पुराणं पंचमं वेदानां वेदमिति. छां ° प्र° ७ इससे पुराणका पठना विदित होता है, तथा यजुवेदीय शतपथ ब्राह्मणमें नवमेऽहनि
किचित् पुराणमाचक्षीत । अर्थात्-नवमें दिन कु पुराणका पारायण अर्वमेध यज्ञम करना चाहिये तथा मनु अध्याय तीन इलोकं २३२ मे-
स्वाध्यायं श्रावयेत्पित्रये धर्मशास्त्राणि चेव हि । आल्यानानीतिहासाक्च पुराणान्यखिलानिं च ॥।
श्राद्धकालमें वेद मानवादि धमेशास्तर सौपणं मेत्रावरुणादिक आख्यान महाभारतादि इतिहास, ब्राह्यादिपुराण, श्रीसूक्त शेव आदि असिर सुनाना चाहिये, भाग
वतके बारहवें स्कधकं छठे अध्यायमं (ब्रह्मणेतत्समाख्यातम् ) सब पुराणोकं पूरवेकर्ता ब्रह्माजीको कहा है । महाभारतके स्वर्गारोहणपवैके छठे अध्यायमें (अष्टादशपुरा
णानां श्रवणादयत्फकं भवेत्) अठारह पुराणोके सुननेका फल विधान किया है । गरुडपुराण २२७ अध्यायमे (अष्टादश पुराणानि येवे्यो हरिरेव हि) इस दशवे
इलोकसे सब पुराणोको हरिविद्या कहकर पारायण श्रवणसे स्वर्गादिकी प्राप्ति कही है, अग्निषुराणके २७१ अध्यायमें अठारहों पुराणोको विष्णु विद्यारूप वणेन किया
है, इत्यादि अनेक प्रकारसे पुराणोका उल्लेख किया है (यदि विशेष देखना हो तो हमारे बनाये दयानन्दतिभिरभास्करके पुराण प्रकरणको वा अष्टादश पुराणदपणको
च
4 ॥
शिण्षु ठ देखो) इन अठारह पुराणोमे व्यासजीने प्रसंगसे २४ अवतार ओर सत् रज तम रूप तीन गुण तथा तीन देवताजोका विशेषरूपसे वर्णेन किया है, ओर ज्ञान दृढ़ होनेकं
निमित्त बडे २ आरुकारिकं विषय भी वर्णन किये ह, प्रत्येक पुराणको सर्शरेष्ठ इस कारण कहा है कि, उपासक जिस देवताकी उपासना करे, उसेही सर्व शरेष्ठ जान ओर
॥ १॥ £ विश्वास रक्खे, इन्दरियादिकोके समान अपने २ विषयमे सब प्रमाणं ह । ऊपरकं छिखे वाक्योसे अटारहों पुराणकं श्रवणकी विधि एक सी पाई जाती है, किसीमें
& कोई मेद नहीं है, इस कारण पुराणोको छोटा बडा कहना उचित नहीं है, कारण कि सम्पूणं पुराणोमे तीनों देवताजकी तथा शक्तिकी महिमा बराबर कथन की है
इस कारण सबही एक रूप हँ ओौर तीनों देवताओमें भी कुर भेदं नहीं है, कारण कि-तस्य प्रोक्ता अग्न्यास्तन्वो ब्रह्मा विष्णू रद्र स ब्रह्मा स शिवः इत्यादि श्रुति
तीनों देवताओंका अभेद प्रतिपादन करती हँ ओर अग्नि पुराणकं १२ अध्यायमें उदाहरण स्थलमें कहा है (आवयोर्नास्ति मेदो वे भेदी नरकमाप्नुयात्) जो पुरुष
हमारे तुम्हारे बीचमें भेद जानता है वह नरकको प्राप्त होता है, इससे विदित होता है किं वही सवं रूप है, क भेद नहीं है अब इसमें जो प्रश्न होता है कि कोई २
पुराणोकी राजसी तामसी आदि संज्ञा बाघ कर तामस पुराणोकं सुननेका निषेध करते हँ इसका उत्तर तो ऊपर ही लिखे वचनोसे हो सकता है कि, वेदादि शास्त्रोमें बरा
बर सब पुराणोका श्रवण करना लिखा है फिर (तथैव तामसा देवि निरयग्राप्तिहेतवः ॥ तामसी पुराण सुननेसे नरक होता है) यह वाक्य किंस प्रकार माना जा सकता
¢ है कारण कि, जो ब्रह्मासे निर्गत उपदेश ओर परमात्मक गुण कथन करनेवाला पुरातन वृत्त है तो वह् सर्वथा सुख ओर स्वगेदायक होगा ओर (मात्स्यं कौर्म तथा
लैङ्गं शवं स्कान्दं तथेव च । आग्नेयं च षडेतानि तामसानि प्रचक्षते) इस उोकसे मत्स्य, कूर्म, लिग, शिव, स्कंद ओर अग्नि इन छः पुराणोको तामसी कटा है इस
इलोक ओर ऊपरके इलोकका परस्पर सम्बन्ध है, प्रथम तो इसमें पुराणानि नपुंसक छिगका विशेषण (तामसा निरयप्रदाः) पुंखिग दिया है, इसीसे बनानेवालेकी
विद्या ज्ञककती है कि, लिगकाभी ध्यान नहीं किया ओर अपना स्वार्थं सिद्ध करनेको शलोक निर्माण कर किख दिया परन्तु बुद्धिमानोंकं सामने बनावट कहांतक
चरु सकती है, बनावटी बातमें अवश्य ज्ञोर पडता है, क्योकि जिन २ पुराणोमें महादेवजीका महत्त्व पाया उन २ को तामसी कहकर नरकं प्राप्तिका कारण |
यदि इनके सुननेसं नरक प्राप्ति है तो बनानेवाकेकी क्या गति होगी, ओर पुराणवि्याका एक अंश नरक प्राप्तिका हेतु ठहर जायगा, इससे यह रलोक व्यासादि
भा. दी.
भूमिका महषिर्योके निर्मित विदित नहीं होते, यह हठ दुराग्रहसे निर्माण किये गये ह केवल संज्ञामात्रका जहां लक्षण है वहां यह् आशय है कि, इस पुराणमें इस गुणका
£ % यह एसे शलोक सम्प्रदायवार्लोनिं दूसरों कौ निन्दाके लिय जहां तहां मिाये हे हमने अष्टादश पुराणदपणमें इसका निर्णय किया है, इस सभय भो सम्प्रदायके आग्रहौ पुरुष मनुके ग्रन्थक शिला सुत्रको
६ निन्दा करते ह, ग्रन्य॒ बना रहै हं जंस। समातं घमं एक ग्रन्थ वृन्दावनके एकु गोसाईजौने निकाल कर अपने हठका परिचय दिया है हमने इसौ अनुमानको पुराणदपं णमे लिला धा जितत पर राघवेन्रको
सम्पादकने उछल कूद कौ पर अन्तमं अस्त होगये सांचकतो आंच कहां है ।
अधिकार करके वर्णन किया है, बडाई छटाई नहीं नरकादिकी प्राप्ति द्रोह करनेवाकेका कायै है, ओर यदि शिवमहिमाकं प्रतिपादनसेही तामसी ओर नरक प्राप्ति
होती है तो वेदादि सब शास्त्र ओर सब पुराणौमे शिवको प्रधान कहकर उल्लेख किया है, उनकी क्या गति होगी, जसा कि आगे दिखाते हं--
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः हांकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च । यजुवद ० १६ । सन्त्र ४१
४ सुख भोग मोक्ष रूप सुख देनेवारे भक्तोको भोग मोक्ष सुखकं दाता कल्याण रूपकल्याणकारी शिवकं निमित्त नमस्कार है; इत्यादि यजुवद में १६ वां अध्याय
सदरकी महिमा कहता हुआ सु्राच्यायके नामसे विख्यात है तथा श्वेतारवतरोपनिषदमे अ० ३ मं० २ “एको हि श्रो न द्वितीयाय तस्थुः" ओर “श्ञात्वा रिवंशान्ति-
¢ मत्यन्तमेति" अर्थात अन्तकालमें एक शद्रही अवदोष रहते है िवके ज्ञानसेही मुक्ति होती है तथा बौधायन सूत्रम (अथातो महादेवस्याहरहः परिचर्याविधि व्याख्या-
स्यामः स्नात्वा शचौ दे गोमयेनोपकप्य प्रतिकृति कत्वाऽक्षतपुष्पैर्यथालाभमचैयेत् । सह पुष्पोदकेन महादेवमावाहयेत् । ओम् भूमहादेवमावाहयामि । महत्स्व-
| स्त्ययमनमित्माचक्षत इत्याह भगवान् बौधायनः) स्नान करने उपरान्त पवित्र स्थानमें गोबरसे भूमिक लीप मृत्तिका आदिका कग निर्माण कर पुष्पमिध्रित
> ||| जल हाथमे ले महादेवजीका आवाहन करे, ओर अक्षत पुष्प आदिसे पूजा करे, बौधायन मुनिन इसके +महास्वस्तिवाचन कहा है, तथा ऋग्वेदमें नील सुक्त॒ ओर
यजुर्वेदे (त्यम्बकं यजामहे सुगंधि पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योरमक्षीय मामृतात्) यह मन्त्र है अथ (सुगंधिम्) श्रेष्ठ गन्ध विशिष्ट द्रव्यसे भूषित
# पुष्टिवर्धनम्) भोग मोक्षरूप पृष्टिकी वृद्धि करनेवाङे (त्यम्बकम्) तीनों लोकके पिता वा तीन कालमें वेदरूप शब्द वाके, तीन अक्षर अकार उकार मकारसं सिद्ध
होनेवाऊे वा पृथ्वी अन्तरिक्च स्वगं रूप नेत्रवारे शिवको (यजामहे) पूजन करते हैँ वे हमको (मृत्योर्मुक्षीय) मृत्युसे छटा कर जो जन्म मरणका क्लेश देती है
उससे पृथक् कर (उर्वारुकमिव बन्धनात्) जैसे पका ककंन्धु फल शाखासे स्खलित होता है, इस प्रकारसे म्ले मृत्युस छटाकर (अमृतात्) मुक्रितसे मत छूटाओ
अर्थात् मृन्ने मुक्तिका भागी करो, फिर श्वेतादवतर उपनिषदके तीसरे अध्यायमे-
& यो देवानां प्रभवद्चोद्भूवक्च विद्रवाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगभं जनयामास पूवं स नो बुद्धया शुभया संयुनवतु ॥। अ० सं० ४.
देवताओंकी उत्पत्ति पालन प्रलय करनेवाठे-संसारके अधिपति रद्र महिने प्रथम ब्रह्माको उत्पन्न किया है, वह हमारी नुद्धि श्रेष्ठ कायेमें लगावे, इस मंत्नसे शिव
क्रो सब संसारका कारण कह कर--
विहवस्येकं परिचेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽसृता भव॑न्ति ।
सब संसारके नियन्ता महादेवको जानकर मुक्त होते हं ओर--
तमेव विदित्वातिमूत्थुमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।। यजु
22222
उसी महादेवके ज्ञानसे मुक्ति होती है, इससे अन्य मुक्तिका उपाय नहीं है । फिर (सर्वव्यापी भगवान् तस्मात् सरवेगतः शिवः) श्वेता ० अ० ३ मंत्र ११ भगवान्
शिव सर्वव्यापी सर्वगत ह--
शिण्ण
॥ २॥ य एतद्विदुरमतास्ते भवन्त्यथेतरे .दुःखमेवापयन्ति ।। इवेता ०
जो पुरुष महादेवकी उपासना करते हवे मुक्त होते हँ ओौर अन्य पुरुष जन्म मृत्युरूप दुःख भोगते हँ, फिर चौथे अघ्यायके २१ मे मंत्रमे--
रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ।। इवेता०
हे रुद्र जो तुम्हारा दक्षिण मुख है उससे नित्य हमारी रक्षा करो तथा वाल्मीकीय रामायणके छंकाकांडके १२५ सर्गम (हमारा भाषानुवाद देलो )
किया था ओर वे हमारे ऊपर प्रसन्न हृए थं ।
तथा महाभारत बनपवे अ० ३९ इलो० ६५.
शरण्यं शरणं गत्वा भगवन्तं पिनाकिनम् । मृन्मयं स्थंडिलं कृत्वा माल्येनापुजयःदूवम् ॥
अजुन शरणागत रक्षक महादेवजीकी शरणको प्राप्त हो, महादेवजीकी मृन्मय मूति बनाकर गंधमालादिसे पूजन करता हुआ तथा वन प० ८३ अघ्यायमें मृगधूम
तीथंप्रसंगमें अगस्त्यजीने कहा है. इटोक० १००।१० १
मृगधूमं ततो गच्छत्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राभिषेकं कुर्वीत गंगायां नृपसत्तम ।! अर्चयित्वा महादेवमइवमेधफलं लभेत् ॥। १०१ ॥
मुगधूमतीथंमे जाकर गंगास्नान कर महादेवजीके पूजन करनेसे अर्वमेध यज्ञका फर मिक्ता है, फिर वहीं पंचवटी ती्थयात्रामे--
यत्र योगेश्वरः स्थाणुः स्वयमेव वृषध्वजः । अचंयित्वा देवेशं गमनादेव सिद्धयति । १६५ ॥
वहु योगेरवर वृषभध्वज स्वयं स्थित ह, उनकी अचनासे वा जानेसेही सिद्धि हो जाती है फिर उसी प्रसंगमे--
तत्रव च महाराज विदवेहवरमुमापतिम् । अभिगम्य महादेवं मुच्यते सवंकिल्बिषेः ।। १७३ ॥।
हे महाराज ‡? उसी स्थानम विश्वेरवर उमापतिका अचैन करनेसे सब पाप नष्ट होजाते हँ फिर ८४ अध्यायमे--
भा. दी.
भूमिका.
& अत्र पुर्वं महादेवः प्रसादमकरोद्धिभुः ।
रामचनदरने अयोध्या को रंकासे चरते समय पुष्पक विमानमें बैठे जानकीजीसे कहा था यहां सागर तटपर रावणके मारनेसे पहले हमने महादेवजीका पूजन
। ततो वाराणसीं गत्वा अचंयित्वा वृषध्वजम् । कपिलाह्नदे नरः स्नात्वा राजसुयफलं लभेत् । ७८ ॥\
किर काशीमें जाकर उमापतिका पूजन कर कपिलाह्ञदम स्नान करनेसे राजसूययज्ञका फल प्राप्त होता है । द्रोण प०--
जन्मकमंतपोयोगास्तयोस्तव च.पुष्कलम् । ताभ्यां लिगेचतो देवस्त्वयाऽ्चायां युगेयुगे ।। ९२ ।॥
ठ सर्वरूपं भवं ज्ञात्वा लिगे योचंयति प्रमुम् । आत्मयोगाहच तस्मिन्वे शास्त्रयोगाइच शाहवतः ।। ९३ ।। ४
सर्वभूतभवं ज्ञात्वा लिगम्चंति यः प्रभोः । तस्मिन्नभ्यधिकां प्रीति करोति वृषभध्वजः ।। ९६ ॥।
दरोणाचायं कं मरने पर अङ्वत्थामाके जब अस्त्र कृष्णार्जुनपर निष्फल हए तब अहवत्थामाने उनको धिक्कार दिया तब व्यासजीने आकर कहा किं जन्म कमं तप
योग तुम्हारा कष्णार्जुनके तुल्यही है, परन्तु उन दोनोने शिवक्ग.ओौर तेने शिवमूतिका पूजन किया है । ९२ । जो शिवको सर्वैरूप जानकर किगाचंन करता है
उसमे आत्मयोग ओौर सम्पूणं शास्त्रयोग भ्राप्त हो जाते है ।। ९३ ।। जो शिवको सवं भूतमय जान पूजते है, शिवजी उनके ऊपरं महाभ्रीति करते हें ।। ९६ ॥ फिर
इसी पवक २०३ मध्यायमे
ऋषयहचैव देवादच गन्धर्वाप्सरसस्तथा । लिगमस्या्चयति स्म तच्चाप्यु्वं समास्थितम् ॥\ २५ ॥
व्यासजीने अर्जुनसे कहा ऋषि देवता गन्धवं अप्सरा इनकी उऊष्वंस्थिति किगकी अर्चा कर हुई हँ ।। २५ ॥
| यस्य ब्रह्मा च विष्णुदच त्वं चापि सह देवते: । अ्च॑येथाः सवा लिद्ध तस्माच्छे.ष्ठतमो हि सः ।। १४॥। ¢
महाभारत अनुशा० अ० १४ में उपमन्यने श्रीकृष्णसे कहा है, जिनके छिगको ब्रह्मा विष्णु ओौर देवतों सहित सदा तुम प्ूजते हो इस कारण वह सवं श्रेष्ठ है
इस प्रकार महाभारतम अनेक स्थलोमें महादेवकं पुजनसे मुक्तिकी प्राप्ति छिखी है । अब कुछ पुराणोके श्लोकोँका उल्छेख करते हं ब्रह्यवेवतं पुराणके छृष्णजन्मखण्ड
अध्यायः ३७ में श्रीकृष्णने राधिकासे कहा है ।
मम भक्ति च दास्यं च मुक्ति च सर्वसम्पदाम् । सवंसिद्धि दातुमीक्लो न दाता शंकरात्यरः ।।
मेरी भक्ति दास्यता भुक्ति मुक्ति देनेवारे महादेवकं सिवाय कोई दाता नहीं है, विष्णु पुराणकेपंचमं अंशके ३३ अध्यायमे लिखा है--
| मत्तोऽविभिन्नमात्मानं व्रष्टुमहेसि शंकर ।। ४७ ॥
। योहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम् । अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नर्दाशनः ।। ४८ ।।
कृष्णचन्द्रने दिवजीसे कहा हे शंकर ! आपने बाणासुरका अभयदान दिया सो मेनेही दिया है कारण कि हम तुम एक हं, ज मेँ हूं सो तुम हो, देवता असुर मनु-
ष्योके सहित यह सब जगत् हमारा तुम्हारा रूप है भिन्नदर्शीं पुरूष अविद्यासे मोहित हो रदे हँ इस कारण भेद मानते हं भागवत दशमस्कध अध्याय १२ कोक ४०
क्षेमी स्यात्किमु विश्वेशे कृतपापो जगद्गुरौ ।
श्रीविष्णुने कहा आप जगत्कं गुरूमे जो दुर्यान करता है उसका कल्याण कंसे हो सक्ता है.। तथा दशामस्कधके ६८ अध्यायमं कहा है--
आराध्य देवदेवेशं शंकरं लोकञ्ांकरम् । तपसा तोषयित्वा तं कंलासगिरिवासिनम् ।1
शिण्
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¢ रुक्मिण्यां तनयं लेभे दग्धकामं पुनहंरिः ॥। २ ॥
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॥ ३ ॥
लोकेश लोकपावन शंकरका आराधन कर ओर उन कंलासवासी रिवको तपसे संतुष्ट कर रशिवजीसे दग्ध हुए कामको पृत्ररूपसे प्राप्त किया,पद्मपुराणका सत्ताई
सवां अध्याय सृष्टिखंड का महादेवजीके पूजा विधानसे पूणं है शातात॒प.मुनिने प्रायरिचत्त प्रकरणके घमं शास्व्रमें कहा है--
मद्यं पीत्वा गरुदारांइच गत्वा स्तेयं कृत्वा ब्रह्महत्यां च कृत्वा । भस्मच्छन्नो भस्मदाय्यां शयानो रुद्राध्यायी मुच्यते सवपापः ।।
मद्यपान, गरुदारगमन, चोरी, ब्रह्महत्या करके, भस्मके ऊपर शयन करनेसे तथा रद्राध्यायका पाठ करनेसे सब पापोसे छूट जाता है-याज्ञवल्क्य कहते हँ
(ब्राह्मणः स्वणहारी तु रुद्रजापी जले स्थितः) सोनेकी चोरी कर ब्राह्मण रद्रका जप करनेसे शुद्ध होता है, अत्रि कहते हैँ (एकादश गुणान्वापि सुद्रानावत्यं शुद्धयति)
न
ग्यारह बार रिवस्मरण कर रुद्रका पाठ करनेसे शुद्ध होता है । अग्निपुराण ५४ अघ्याय-- `
पुज्यो हरस्तु सर्वत्र लिगे पुर्णाचेनं भवेत् ।
सवत्र छिगमे शिवपूजन करनेसे पू्णचिन होता है । स्कदपुराणमं लिखा है--
४ . एक एव शिवः साक्षात्सुष्टिस्थित्यन्तसिद्धये । ब्रह्मविष्णुशिवास्याभिः कलनाभिविजुम्भते ।।
~
~
अर्थात् एक साक्षात् शिवही सृष्टि उत्पत्ति पालन ल्य करनेको ब्रह्मा विष्णु श्द्र रूप होते हं । केवल्योपनिषदि-
उमासहायं परमेइवरं विभुं त्रिलोचन नीलकण्ठ प्रशान्तम् । ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनि समस्तसाक्नि तमसः परस्तात् ।!
पावती सहाय परमेरवर सवेव्यापक त्रिलोचन शान्त नीरकण्ठका ध्यानकर समस्तकं साक्षी अंधकारसे परे रिवको प्राप्त होता है, इसी प्रकार गोपालतापनी ।
पनी आदि उपनिषदोमें किखा है, अब विचार करना चाहिये कि शिवमहिमा विधायक शास्त्रे कूगति होती है ओर इसीसे वे तामसी हँ तो ऊपर किख प्रमाणोसे
सात्विकी पुराणभी तामसी हुए ओर वेदस्मृति आदि सूत्रभी तामसी ओर कुगतिदायक होनेसे मुक्तिका साधन कौन ग्रन्थ माना जायगा इस कारण अष्टाद
भारी
भूमिका.
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श
न्यूनाधिक कोई नहीं है, सबही ब्रह्मे प्रतिपादन करनेवारे ओौर मुक्तिविधायक हे, जो भेद मानते हैँ, वे इस तात्प्यके ज्ञानसे शून्य हँ, व्यासजीने सम्पूणं
पुरा्णोको पृथक् २ देवताओंके निमित्त इस कारण कहा है कि, उपासक उस २ देवताकी उपासना विश्वास युक्त _ होकर करे तो संसारसे पार हो जागे. जब सब
पुराणोमें तीनों देवता्ओकी उपासना बराबर देखी जाती है तो उनकं विपरीत जो वाक्य सुने जाते हं वह् अवर्यही दुराशाग्रस्त अल्पज्ञ स्वाथं परायणोकं बनाये हुए
हजिनके कारण महा सम्म्रदाय भेद उपस्थित हुमा है, महाभारतसे पहले इस प्कारकी अनेक = नहीं थे जिस देवताकी इच्छा हो वहं उसकी उपासना करते
ओौर पूरणं ज्ञानी होनेसे किसीसे कोई द्वेष नहीं करते थे गौर तभी तक यह् भारतवषं उन्नतिके शिखरपर आरूढ था जो विद्या बुद्धि कला कौर यहां थी उसकी
रिक्षाके निमित्त अन्य देशोके निवासी यहां आते थे, ब्राह्यणोंके तेजसे क्षत्रबर अदवत्थपत्र के समान कम्पित होता था, एकभी धर्मम त्रुटि होनेसे सारे संसारम
हलचङ मच जाती थी, बडे २ शास्त्राथके ग्रन्थ जिनका आज दिन.आशय समक्लना कठिन है निर्माण किये जाते थे. वेद शास्त्रादि म्रन्थ ओर सत्य वचनादिमें सब आरूढ
ये. इस समयके समान छिन्न विद्या न होकर पूणं विद्वान् सर्वज्ञ होते थे; शास्त्रका ममं हस्तामलक रहता था इस कारण किसी कौ हठ दुराग्रहकी बात चर नहीं सकती
थी, परन्तु जगत्का अर्थं ही यह है किं एक स्वरूपमें स्थित नहीं रहता, जो ऊपर जाता है उसे समयपर नीचे आना पडता है, द्वापर बीतकर कलियुगका प्रारंभ हु,
महाभारतमें मनुष्योहीकी नहीं किन्तु शास्त्रादिकीभी एक भ्रकारकी प्रल्यसी हो गई. सहस्रो ग्रन्थ गौर वेदोकी शाखा लोप होगई, भारतवषे धन जन विद्यासे शन्यप्राय
होगया, जैसे सूर्यास्तमे खद्योतका प्रकाश होता है, इसी प्रकार पूणं विद्रानोके न होनेसे पंडितमानियोकी भौ बनपडी, अपने २ सहयोगियोको साथ करके अपना
एक नवीन मार्गं स्थापित करने रुगे, ओौर विविध प्रकारकी नास्तिकता अधिकंतर फलने लगी, अधिकारकं अनुसार जहांतकं जिसकी बनपडी वहांतक उसने संस्कृत
शद्ध देववाणीको त्याग नवीन अक्षर ओर नवीन भाषाके बोलनेकी परिपाटी निकारी,इस एकही भारतवषमे संस्कृतका अपभ््र श होकर अनेक प्रकारकी भाषा ओर भिन्न
२ मत भ्रचक्ित होगये, जिसके कारण देश भरम विद्रोह मच गया केवर मतभेदही नहीं हुआ किन्तु भारतवषेके प्रेमका सूत्र जिससे कि सारा भारतवषं एकरूप हो
रहा था सर्वैथा छिन्न भिन्न हो गया, इसी अवसरमें नास्तिक शिरोमणि चार्वाक् बौद्धादिकका मत यहां तक प्रवर हुआ कि चीनसे छेकर कन्याकूमारी तक सर्वत्र
०
बौद्धही ष्टि गोचर होते थे इनकी बाहरी चटक “ अहिसा परमो धर्मः ” ने मनुष्योको एेसा मोहित किया कि उनको विद्याहीन होनेसे इस वार्ताकाभी कुछ ज्ञान
नहीं था कि हमारे यहांभी अहिंसा धमं माना है सनातन धमं केवल कारीसेही पुण्यक्षत्रोमे दृष्टि गोचर होता था, इस॒प्रकार महा अधरममके प्रवृत्त होनेमे शिव
परभात्माकी इच्छासेही स्वामी श्रीशंकराचायंका जन्म, हुआ, इन्होने अल्प समयमें ही वेद वेदांतकं पारगामी होकर बडे २ शास्वराथं करकं सर्वथा बौद्धोको परास्त ।
करके भारत वर्षसे बाहर कर सब सीमाओंपर संन्यासियोके मठ स्थापन कर शुद्ध सनातन धमेका पुनरुढार किया, अल्प अवस्थामेः इस प्रकारका काये करना
उन्दीका काम था ओौरका नहीं, उनके इस कायैसे भारतवषंके बुद्धिमान पुरुष सदा कृतन्न रंगे जब कायं करने उपराम्त वह कैरासको पधारे तब बौद्धोके
22222
क
ष्ट किये हुए इस देशे ध्म विषयक बडा गोरमाल उपस्थित हुआ कारण कि सवं साधारणकी बुद्धिम तो वेदान्तका आय आ नहीं सकता था, इस कारण धर्मस
संशयको प्राप्त होनैवाे पुरुषोका फिर विवाद उपस्थित हज ओर अपने सिद्धान्तको प्रत्येक भिन्न २ प्रकारसे मानकर विवाद करने लगे, काल रमसे नीचे छिखे महात्मा
ओका प्रादुर्भाव हुआ, उन्होने प्राणियोको छिन्न भिन्न देख अपने स्वीकार करये मतानुकूल पुरुषोका संकलन करकं पृथक् पृथक् सम्प्रदायोकी स्थितिकी ओर तिलक
आदिका विधान अधिक तर इस कारण किया कि जिसमे किसीको पूछ ताछ विरोष करनी न पडे, तुम कौन सम्प्रदायके हो, उनमें श्रीसम्प्रदायके प्रचारक श्रीस्वामी
रामानज, रिवसम्परदायके प्रचारक श्रीविष्णुस्वामी, ब्रह्मसम्प्रदायके प्रचारक मध्वाचा्येजी, सनकादि सम्प्रदायके प्रचारक श्रीनिम्बार्कावार्यजी, राघवानन्द रामा
|
६
नन्द व्याससहित हरिवंश आदिने जो सम्प्रदायोका प्रचार किया है सो इन्हीका अवान्तर भेद है, इनकं तिरक अकर्ग २ ओर मुद्राभी श्रीसम्प्रदायकं विना सबने प्राय
॥ ¢ ॥
शीतलही धारण की जाती है, परन्तु श्रीनिवासाचायंङृत दिव्यसूरिचरितके चतुथंसगेमें गुरूपरपरा देखनेसे विदितं होता है.क्रि, श्रीसम्प्रदायके प्रथम आचार्यं श्रीगट-
कोपाचायं हुए हँ. यथा हि--
अस्ति पुवं पयोराशेः कापि परिचमरोधसि । मण्डले पण्डुभूपस्य नगरी कुरुकाह्वया ।।
तत्रासीत्पादजातेषु करिच्धागवताग्रणीः । श्नीमत्पल्लीहि श्रेः सीमातीतगुणोल्बणः ।।
। तस्य धमंपरो नाम तनयः समजायत । चक्रपाणिस्ततोजातङ्चक्र पाणिपरायणः ।।
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अजायतततस्तस्माद्रत्नरायेतिसंज्ञितः । सुमति सुषुवे सोऽपि पुत्रं पाटललोचनम् ।
ततो जातः सुतस्तस्माच्छठकोप इतीरितः । तमाहुः कारिजं सन्तः शठकोपं षरांकु्म् ।।
बकुलाभरणाख्यञ्च तमेव कारिनन्दनम् ।
इत्यादि इलोकोसे पर्चिम सागरकं तटपर पाण्डुमूपके राज्यम कुरूका नगरीमें पल्लीनामक शूद्रके वंशम कारीके पुत्र महात्मा शठकोपजीका जन्म हुआ था, यह् बकुल ठ
वस्त्र धारण किये रहते थे,इनसे ही प्रथम श्रीसम्प्रदायका प्रादुरभावि हुआ है वास्तवमें यह पूर्वेन महात्मा रागद्वेषादि शून्य थे ओर परमात्माके भजनमें मग्न रहते थे,जब
तक इन सम्प्रदायोमे रागदवेषयुक्त पुरुषोका प्रवेश नहीं हुमा था तब तक किसीमे विवाद उपस्थित नहीं हुआ था परन्तु कु दिनोके उपरान्त दवेषक्रोधयुक्त पुरूषोने सम्प्र-
दायोमे प्रवेशकर अपनेको दूसरेसे अच्छा मानकर ओर दूसरेको नीच जानकर द्रोहका अंकुर बोया अर्थात् कु दिनोके उपरान्त एेसे इलोक श्रवण गोचर होने लगे । &
शिवाचनाद् ब्राह्मणस्तु शूद्रेण समताभियात् । तिर्यकयुण्ड्धरं विध्रं चाण्डालमिव संत्यजेत् ॥। &
वेष्णवः पुरषो यस्तु शिवन्रह्मादिदेवताः। भ्रणमेदचंयेद्ापि विष्ठाथा जायते कृमिः ॥ ८
>
भागीं
भूमिका
।
अर्थात् शिवक पूजन करनेसे ब्राह्मण शूद्रके समान हो जाता है, त्रिपुण्डुघारी ब्राह्मणको चाण्डालके समान त्याग दे, जो वैष्णव शिवादिदेवतोको प्रणाम करेवा
पूजन करे वह विष्टाका कीडा होता है; --ओौर ,
विष्णुदनमात्रेण शिवद्रोहः प्रजायते । शिवद्रोहाच् सन्देहो नरकं थाति दारुणम् ।।
तस्माच्च विष्णुनामापि व वक्तव्यं कदाचन ।। १ ।।
यस्तु सन्तप्तृशंखादिलिद्धाङ्कतितनुनरः । स सवेयातनाभोगी चाण्डालः कोटिजन्मसु ।। २ ।
अर्थात्--जो पुरुष तप्तशंखादिसे चिह्भित होता है वह मनुष्य सम्पूणं नरककी यातनाको भोगकर कोटिजन्म तक चाण्डा होता है, विष्णुके दशेनमात्रसे शिवद्रोह्
होता है शिव द्रोहसे अवश्यही दारुण नरकको जाता है इस कारण कभी व्रष्णुका नाम नहीं लेना चाहिये इत्यादि इलोक पद्मादि पुराणोकं नामसे सुने जाते हे,
अब इस पर बुद्धिमान् विचार कर सकते हँ कि, यह इलोक ईषपरवश हो अज्ञानियोने कल्पना किये हं जो द्रोहकं मूल हे फिर यह द्रोह परस्पर एसा बढा कि,
हौव वैष्णवोके बडे २ युद्ध हो गये हँ, ओर यह् अज्ञानियोका युद्ध क्रमसे हमारे धर्मग्रन्थ पुराणोमे भी प्रवेश कर गया, पूवं कालमें छापा नहीं था इस कारण
ध पुस्तके हाथकी छिखी मिरुती थीं इससे कटींही कोई पुस्तक मिलती थी, जो जिसके पास हई दूसरेसे द्रोहके कारण एक दो शलोक अपनी प्रशंसाके बनाकर
2१|| दूसरेकी निन्दाके बनाकर लिख दिये ओर प्रमाण देदिया इसलिये यदि पुराणादि में एसे शलोकं आवें तो बुद्धिमान् उनको मिथ्या कल्पित जानते ह, कारण कि,
| एसे कुवाच्य द्रोहकंही कारण निकलते हे, कहीं २ बडे ग्न्थोमेभी कोई २ शिवन्यूनता प्रसंग बडी बुद्धिमानीसे मिलाया गया है जिसको स्ंसाधारण समञ्ञ नहीं
सकते परन्तु बडे सूक्ष्म विचारस् वह समन्मे आजाता है कि, यहं प्रक्षिप्तही है हम इस वार्ताको बडे खोज ओर सिद्धान्तकं साथ कहते हँ किं वेदान्त शास्वरके कर्ता
् ईदवरावतार ्यासजी जो तीनो देवताओोको एकरूप जानत थे उनका किसी देवताकी निन्दा करना किसी प्रकार संभव नहीं दहो सकता, इसल्यि एसे श्लोकोंका
= प्रमाण किस प्रकार हौ सकता है जब कि, उनके प्रत्यक्ष द्वेषकी धारा प्रवाहित हो रही है व्यासजीने, पुराणोमे जिस देवताकी महिमा वर्णन की है उसको प्रधान
ट निर्देश क्रिया है ओौर सव ब्रह्मरूप है इस कारण सब ब्रह्मपरत्वका निर्देश किया है इस प्रकार भक्तोकी जिस देवतामें श्रद्धा हो उसी देवताकी महिमाका पुराण
पढना सुनना उनके विश्वासको दृढ कर परम श्रेयका देनेवाला है, दूसरे पुराणोकी निन्दा करना या दूसरे देवताओंकी निन्दा करना कोड ध्म नहीं किन्तु अधो-
गतिका कारण है, यह विचार कर सम्पूणं ॒पुराणोको एकदृष्टिसे देखना चाहिये तीनों देवता रक्तिसहित एकही तीन रूपसे कहे जाते है, इनमें कोई भेद नहीं है
तीनों वेदोका एक एक देवता प्रधान ह ौर युगो भी यथाक्रमसे प्रधानता होती है ओौर सृष्टिका कायनिर्वाह् होता है, जिस प्रकार कि कालका आदि नहीं है इससे
यह बात स्पष्ट प्रतीत होती है कि, अनन्त बार प्रलय ओौर अनन्त बार सृष्टि हो चुकी है, जिस कल्पसे जिस देवतासे सृष्टि प्रादुर्भूत होती है वह देवता
¬ न
उसीके अनुसार उस युगमे प्रधान गिना जाता है, अनन्त बार यह सृष्ट ब्रह्मा विष्णु महेशसे प्रगट हुई है कालवेत्ता पुरुष इस ममको अच्छी प्रकार जानते है, इस थोडेसेही
०49 99292499,
९ ध
= = 3, पुराणों न प्रर न नहीं = वए त इन्द्रियोव =-=: ओ जैसे आं ५
शिण्पुण | लेखसे विद्वान् जान सकते हँ करि, पुराणोमें किसी प्रकार देष नहीं है न परस्पर विरोध है ओर अपने २ विषय्म सभी न्दरियोको समान प्रमाण है जसे अखका
।& | काम कोई इन्द्रिय नहीं कर सकती इस कारण अन्य इन्द्रियोकी अपेक्षा नेत्रोकी जो महिमा कही जाय सो थोडी है; च इस प्रकार कर्णंन्द्रियका काम अन्य इन्द्रिय नहीं
॥ ५॥ दे सकती, इससे नेत्रादिकी अपेक्षा जो उसकी महिमा कही जाय सो थोडी है, इसी प्रकार सव देवता ह, सव इसी प्रकारं प्रधानतासे देवर्तौका उद्देश क्रिया
है सो बुद्धिमान समक्न सकते है, यद्यपि जो पुराण देखनेमे आये है उनम इस प्रकार किसीकी निंदा नहीं की गई है, ओर यदि कहीं यह् बात पाई जाय तो वह् प्रक्षिप्त
है मिथ्या कल्पित जानना हम जिस पुराणकं ऊपर यह किख रहे हँ उस महाशिवपुराणमें कोई शलोक इस प्रकारके कुवाक्योका नहीं आया दै, ओौर हमनें इसका बहुत
विचारके साथ अवलोकन कर टीका किया है तो इसकं देखनेसे शिव विष्णु एकही रूप विदित होते हे, जहां तहां एकी रूप प्रतिपादन किया है, इस प्रकार इसको
्र्षिप्त इलोकोंसे रहित व्यासप्रोक्त पवित्र आख्यानोको देखकर चारपदार्थोका साधक विचार सर्व॑साधारणको इसका मरमं अवगत होना उचित समज्ञा गया । इस
बातको सब विद्वान् मान चके हैँ किं, भारतवर्षके छिये यवनोका समय महाकठिन जाया था उस राज्यम सहस्रो अमूल्य ग्रन्थ नष्ट शष्ट हौ गये सैकडों दुःख उठाकर
् ्राह्मणोने किसी प्रकार अपने ग्रन्थोकी रक्षा की, परन्तु वे खण्ड सण्ड हो गये किसी एककं पास पूण अन्य नहीं रहा, महीनों तक संस्कृतके म्रन्थोसे यवनसम्राटोकं
===
त स्नान करनेको पानी गरम होता रहा । परन्तु समय सदा एकसा नहीं रहता, बहुत अनीति ईरवको नहीं भाती, कालक्रमसे भारतवषेके पुनरुद्धार करनेकं व्यिं || न |
¢ ईर्वरेच्छासे भारतवर्षं इग्लेण्डेरवरी भारतवषेकी महारानी क्वीन विक्टोरिया कंसरहिन्दके हस्तगत हुवा जिसके राज्यम प्राचीन नवीन अनेक प्रकारकी कला कौल
¢ के प्रचारका परणं अवकाश मिला, ओौर उनके सूप्रनन्धसे प्राचीन ग्रन्थक छापनेका प्रबन्ध हुआ; जहां तहांसे द्रव्यव्यय करके पुराने ग्रन्थ छपे जाने लगे,
् तरकारसे पर्विमी विद्याकं साथ साथ संस्कृतके ग्रन्थ यन्तौ हारा निकलने लगे, न्याय परायण माननीय गवन मेण्टने अपने व्ययसे ्रन्थोको छापकर प्रकारित
करिया ओर सव॑साधारणमें रचि बढनेसे प्रथम कलकत्ता ओर बम्बर्ईमे यन्त्राय खोले गये, छापेके ग्रन्थ स्वत्पमूल्यमे प्राप्त ओर शुद्ध होने लगे, इस कारण् उनकी ट
निकासी होने रुगी, शास्त्र पुराणोकी दूढभाल होने लगी, ओौर प्रत्येक स्थानसे ग्न्थोकी प्रति मंगाकर उनसवबको मिलाकर ग्रन्थ छापे जानेर्गे, कोई २ पुराण
भा. री. तौ पूरे मिक गये जर कोई बडे परिश्रमसे पणं हृए, उनमेसे शिवपुराणकी भिन्न २ संहिता भिन्न २ स्थानम पाई गई उन सबको एकत्र कर संस्कृत टीका सहित
भूमिका | ¢ बम्बर्ईमे महाशिवपुराण प्रकारित किया गया, परन्तु उसमे टीकाकारके मतसे त्रुटि जानी गई पर बडी खोज करनेसे उस समय छः संहिता वाला रिवपुराण प्राप्त ५
१ ¢ हआ; इस अवसरमे जगद्विख्यात शश्रवेकटेर्वर” य॑त्राल्याध्यक्ष वंस्यवंशावतंस श्रेष्ठी श्रीयुतखेमराज श्रीकृष्णदासजीने जिन्होंने सवथा प्राचीन ओर नवीन ग्रन्थं संस्कृत
तथा माषाटीकासहित मूद्रित कराकर जगत्का बड़ा उपकार साधन किया है, ओर अष्टादश पुराणके प्रकारशकरनेका दृढ विचार है १७ पुराण प्रकाशित हो चूके हेः
ठ स्कंद दीघ प्रकाशित होगा, सम्पूणं हरभक्तोंकं अथं शिवपुराणके भाषाटीकासहित छापनेकी अभिलाषासे मृञ्ञे इसके भाषाटीका करनेकी प्रेरणा की ओर यह भी ।
@ 1 == (4
><
च
स्थिर किया गया कि, जहां कहीं इसमे न्यूनता रह गई है यथाशक्ति दूसरे स्थानोमेसे संहिता मंगाकर ओर छापी हई प्रतिसे मिजाकर ग्रन्थ पूरा किया जाय उक्त
सेठजीने भी इसके पूणं करनेका बहुत कुछ यत्न कर हस्तक्खित ओर यंत्रित प्रति मेरे पास प्रेषण की उस समय मैने उनकी आज्ञाको शिर धर कलकत्ता आदि
की छपी पुस्तकोको मंगाया जौर मिलान किया तो कहीं रकुछ न्यूनाधिक पाया गया तब इसकी पूर्णता करनेके लिय हस्त लिपियोकी खोज की गई । इस ॑
पांच भ्रतियोकं अवलम्बसे जहां तहां पाठभेदनिदरनसहित तथा पूवम जो कहीं र रह गया था उसकी पूतिके सहित इसको सव गसुन्दर करके सर्वागसून्दर नामक
भाषाटीका युक्त किया शिवपुराणके देखनेसे विदित होता है कि, पूवैकालमे यह पुराण लक्षश्लोकात्मक द्वादशसंहिताओंमे विभक्त था, यह् वार्ता वायुसंहितामे स्पष्ट
लिखी है, विद्ेइवर संहिता, सद्रसंहिता, विनायकसंहिता, उमासंहिता, मातुसंहिता, एकादशर्द्रसं हिता, कोटिरुद्रसंहिता, सहस्रकोटिरुद्रसंहिता, वायवीयसं हिता, घमे-
संहिता, कंलाससं हिता, शतसद्रसंहिता,इनसंहिताओंको संक्षेप कर व्यासजीने सात संहिताओमे विभक्त किया, यथा विद्येरवरसंहिता, सद्रसंति, शतरुद्रसंहिता, कोटि-
सदरसंहिता, उमासंहिता,कंलाससंहिता,ओौर वायवीयसं हिता, यद्यपि व्यासप्रोक्त शिवपुराण सातसंहित युक्त २४००० चौबीसं सहस्र थ 1,परन्तु हमको पहले जो शिव-
पुराण प्राप्त हए तथा छपे हुए मिले उन सबमं वि्ेइवर, कं लास,वायवीय,सनत्कुमार, धमं ओर ज्ञानसं हिता यही छ :संहिता थी, उस समय संवत् १९५२ में हमने उन्ही
@संहिताओका भाषानुवाद करके सवंसाधारणके सन्मुख उपस्थित.किया परन्तु हमारे मनमें यह लारुसा बनी रही कि, व्यासप्रोक्तं असली रिवपुराण सातसंहिताओमें
होना चाहिये, कालक्रमसे बडी खोज करनेपर वह सात संहिता यू क्त शिवपुराण प्राप्त हो गया, ओर पुराणौ लीसे बहुत रोचक ओर ऋमबद् कथायं इससे प्रतीत इई, तब
पहले वेंकटेश्वर यंत्राल्यमे इसका मूल प्रकारित हआ, ओर शिवभक्तोको यथाथं शिवतत्वका रहस्य प्राप्त होजाय इसलिये इसकी भाषाटीका करकं इसका प्रकाडा
करना परम उपयोगी विचारागया ओर आज यह शिवपुराणकी भाषाटीका पाठकोंके सामने उपस्थित हैरमृक्े आशा है कि, आप इसे देलकर बहुत प्रसन्न होगे ।
पुराणोमे किसी रस्थलमे एसे इतिहा विदित होते हे जो सथा लोक विरुढसे प्रतीत होते है, उनको इस भ्रकारसे नहीं समञ्चना चाहिये, वह केवर अलंकार ह,
जैसे कि ब्रह्मा ओर् सरस्वतीका सम्बाद है वेद ब्राह्मणोमे उसको अलकारपरत्व वणेन किया है. यथा हिएे०पं.३कां० ३३-३४
भ्रजापतिर्वे स्वां दृहितरममभ्यध्यायदिवमित्यन्य आहृरषसमित्यन्ये । तामृश्यो भृत्वा रोहितं भूतामभ्यैत् तस्य थद्रेतसः भ्रथममुददीष्यव-
सावादित्योभवदिति ॥। प्रजापति सुपर्णो गरुत्मानेष सविता श ० कां० १० अ० ब्रा० ७कं० ४ तत्र पिता दुहितुगेभं दधाति ष्न्यः पृथिव्याः ।
| । ० अ० ४सं० २९)
ऋग्वेदमें भी यह् कथा आई है । इन प्रमाणोसे विदित है कि, प्रजापतिरूप सूर्यकी उषा ओौर प्रकाश दो कन्या उससे उत्पन्न होनेकं कारण कहाती है, उषाकाङ
पिले पहर पूवदिशाकी लालीका नाम ह बह सूर्यकी किरणोसे उतपन्न होनेसे उसकी कन्या है उसके सन्मुख प्रथम सूर्यकी किरण पडते वौयं स्थापन होकर पुतररूपी
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दिन उत्न्न होता है यही बात शतपथ ओर निरक्तमे है एसेही गौतम अहल्या ओर इन््रकी कथा है । श०कां ० ३ त्रा० की १८ मे देखो-इसी एक _आच्यानसे सम
लीजिये कि, लोकमे ओर अलकारमें कितना अन्तर है. अरुंकार शास्त्रकं पूणं आस्यानोंको पुराणाचा्योनि वेदकी रक्षाके विये ज्यों का त्यो रहने दिया है. क्योकि
“परोक्ष्रिय इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः” देवता परो वाद प्रिय है प्रत्यक्षसे द्वेष करते ह इस कारण बहुतसे प्रसंग परोक्ष वादके जहां तहां छिखे जाते टेः
बहुतसे प्रसंग अध्यात्म पर हं जिनका सम्बन्ध वेदान्तसे है, भागवतमें जैसे पुरंजनका उपाख्यान हरिवंामे पुष्कर प्रादुर्भाव; दिवपुराणमें जसे शिवका नग्नावस्थान
युक्त तपोवनमे ऋषिर्योके निकट जाना, बहृतसी गाथा प्रहेिकाके समान है प्रगटमे कुछ ओौर प्रकार ओर वास्तवमे कख ओर प्रकार टै, सव कोई इस वातको
नहीं जान सकते कोई शुद्ध मनवाले महात्माही इन प्रसंगोको यथां जानते हे पुराण सवथा ब्रह्यके प्रतिपादन करनेवाले है उनमे कोई विरुढ वात नहीं है । वहुतसे
कृतर सही बात गढते है कि, जिसे लोगोको वरममे अरुचि हो रिव छिगका अथेह अरलील करते है, उनको यह् विचार नहीं कि गक अथ उस आदिमे
प्रगट होनेवाली अण्डाकार ज्योतिसे है जिसने सब संसारको प्रगट किया है यही आकृति संसारका उपादान कारण है, वह् ज्योतिलिग कहाता है, 'यथा हितद--
ण्डमभवद्धैमं सहल्नांगुसमप्रभम् । मनु ०* द्वादशा ज्योतिकिगका तात्य यही है कि रिवके उपासकोंको परमभक्तिसे द्रादरा स्थानोमे ज्योतिःस्वरूपका दहन होता
था, यदि अर्लीरु अथं मानो तो “मनसो लिङ्गम्, आत्मनो क्िगम्, अंगारलिगो अग्निः” यहां भी अश्लील मानना होगा पर यह् नहीं हो सकता यह् मनकी
पहचान है, यह आत्माकी पहचान है, अंगार अग्निका चिन्ह् है यही अथं मानना होगा, यह् संक्षेपसे लिख दिया है सज्जन इसका विस्तार करेगे । इसी प्रकार
शिवका दारुवनमे गमन करना है, वह शिवतत्व सवत्र एकरससे प्रविष्ट होरहा है, वह॒ आत्मस्वरूप है, वह सदाही दिगम्बर है उसे नंगा सावरण् सव एकसा है ।
स्वगत है पतिब्रताओंकी दृष्टि कंसी होती है यह दिखानेको दारुवनमे गमन किया ओर अरुन्धतीका यश बढाया कि, उसने पृत्ररूपसे रिवजीको ग्रहण किया ओौर
कोई विकार न हुआ इसी प्रकार वह् सवगत निविकार है, दूसरे पक्षमे प्रकृतिके पुरुष वरी हो तो उसका तिरस्कार कर सकता है यही बात शंकरने ऋषिपत्नियोपर
दिखाई कि, उस तत्त्वको विना जाने अपनेमे विना देखे इधर उधर धावमान होती है, ओर तिरस्कार पाती है अपने अधिकारके अनुसार स्वपुरुषकी ओर धावमान्
होना चाहिये ऋषियोने उस ततत्वको विना जाने शाप दिया करि, आपका यह छिग पतित हो जाय अर्थात् उपादान कारणकी सामथ्यं लोपं हो जाय तव आपने
उन्हुं उसमे स्थित ज्योतिका दन कराया, ओर वह महान् बढ गई तात्पयं यह कि यह ज्योति अविनाशी हँ सवत्र व्याप्त हौरही है यह कभी पतित वा नष्ट नहीं हौ
सकती ओर यही ज्योति शवितरूप पावती धारण कर सकर्त है दूसरेका इसमे अधिकार नहीं है, जैसे महान् विदत् रोहेकी शलाकामे प्रवेश कर जाती है, यह
रहस्यकी गाथा है इसी प्रकार ओर भी जान लेना-वेद विद्या सवं साघारणको सुलभ नहीं होती इसी कारण वेदव्यासजीने उन पवित्र धर्मोकी शिक्षा लोकवृत्त
इतिहासोके सहित पुराणोमे कही है जिसके जाननेसे मनुष्य श्रेय प्राप्त कर सक्ता है कालत्रमसे पुराणोका श्रवण पठन पाटन अन्य वकि सिवाय
| ¢ ब्राह्यणोमेभी बहुत न्यू नहोगया है, कारण इसकासंस्कृतविद्याकी न्यूनता है, ओर साधारण परिश्रमसेसंस्कृत प्रथोका ममे समक्लना बडा कठिन है विदेशीय |
ल्य तो इस विषयमे कुःख कह नहीं सकते. भारतवर्षाय महाराजाभी सरव॑गृणञगरी नागरीको अपने राजकाजमे अधिकार नहीं देते, इस विषयमे हम कोटिशः धन्य-
। वाद महाराजाधिराज क्षत्रकुलकमल दिवाकर श्री १०८ महाराजरीर्वांधिपतिमहाशयको देते ह कि जिन्होंने राजसिहासनारूढ होकर अपने राज्यम नागरी अक्षरो
ठ राजकाज करनेको आज्ञा देदी थी, यदि सम्पूणं महाराजा इस ओर दत्तचित्त हों तो थोडेही दिनोमें नागरीका भंडार पूणं होजाय ओर ग्रन्थकारोका उत्साह
बदे, अवभी अनेक महान्भाव नागरी ओर अपन प्राचीन शास्त्रोको बडे प्रेमसे अवलोकन करते ह; इसका प्रमाण यही है कि सैकडों ग्रन्थ प्रतिवषं नवीन छपते
त ओर यन्त्रालयसे बाहर होजाते हे, ओर यथाशक्ति पुरातन ग्रन्थ देखनेका सभी महात्माओंको पूरा उत्साह रहता है, खोजकरके उनके प्रकाश करनेकी अभिलाषा
४ करते है, परन्तु हमारा धमं पवित्रसस्कृतमे विद्यमान है, ओर उसकं विना जाने धम॑से च्युति होती जाती है, ओर नवीन पाखंड भरे अनेक पंथ प्रचक्िति होते जाते
है; ओर नास्तिक जन सनातनघर्मावलम्बियोको धमेसे ग्रष्ट करकं अधोगतिको प्राप्त करनेमे तत्पर देखे जाते हे, वेद शास्त्रके नामसे मिथ्या इलोकादि छिखकर
ट लोगोको वंचित करते हे, श्रद्धा भक्ति संयम नियम तीथ श्राद्ध अवतार आदि की निन्दाकर गोलमाल करते ह, जिससे, अल्पन्ञ अल्पश्रुतं विद्यारहित जन
उनके मागमे प्रवृत्त होकर उभय लोकसे ष्ट होते ह, तथा इतर जन कथा श्रवण करनेका भी सर्वथा अवकाश नहीं पाते । एक ओर तो भगवत्पूजन अवतार
श्राद्ध व्रत जप पूजा पाठपर् दयानन्दी समाजने कुठाराघात करना आरम्भ किया है, दूसरी ओर इन्हींमेकं विषयी पुरुषोने विधवा विवाह वेद शास्त्र विरुद खडा
करके वणेसंकरताका बीज बोना प्रारम्भ किया है, धन्य कलि तुम्हारे राजमे अभी क्या २ देखना पडेगा, धर्म॑ वीर उत्साही पुरुषोने इनकं निराकरणके लिये
उपाय आरंभ किये, सच्चे महोपदेशकोने धमक व्याख्यान सुनाकर अधर्मीजनोकी कलई खोल कर शास्त्रार्थं करक जहां तहां विधर्म पुरुषोकं दांत खट किये, पर उनमें
भी स्वार्थी घूस पडे. धमेसभा्ओकं मूलमे दीमक लगने लगी महामण्डलने नयाही रूप धारण किया, कहमा कुछ करना कुछ बाते बडी रम्ब चौडी पर भीतर
अपना कुछ ओरही ध्यान है, घम चाहे हो या न, हो पर हम तो बडे बन जाय दूसरोकी आशामे ही टाकते जांय, विराट कार्थोभेसे एक भी न करे पर विराटकां
£ || नाम १०० बार आजाय पुस्तकप्रचार विभागेसे वद शस्त्रकं मर्मका कह्नवाला एक ग्रन्थभी उपयोगी न निकले पर स्वप्रशंसाके ढेर वणैन किये जांय, सनातन
¢ धमे अब तू कहां जायगा कहीं उपदेशक मंडलं अपनी खिचडी पकाता है, व॑तनिक उपदशक जब तनस्वाहृसे अधिके कमाकर मंड्ोको दे तो वे उन्हं नौकर रक्सं
नहीं तौ घर बैठो यही धमेका विस्तार ओर प्रचार है, एक एक धमं सभापर कितने मंगता आकर चिपटतें ह कि उसमें कुछ तथा नहीं रहने पाती अब भूखेही
मंगता नहीं है अब तो सभी मौगते हे, उत्सवकं लिये चन्दा हुआ, पाठालाको लाओ, यतीम खानेको लाओ, गोशालाको लाओ, मकान बनानेको छाज, उपदेशक
मंडलको लामो, महामंडलको लाओ, महामंडलकं पत्रको जाओ साधारण तथा विोषमेम्नरीको लायो, वैतनिककं आने जानेका खर्च लाओ, महामंडलका वार्षिक
छागो, अवेतनिकंकी भेट पूजा छागो, बस; लागो लाओमें विचारी धमं _ सभा निष्पत्र वृक्षके समान ट्ठ रह जाती है यदि नहीं देते हे तो अलग फण्ड
९ सुरते है, उसमें घमेकी हानि होती है. तात्पयं बह है कि धमं प्रचार कौ रीति बिलकरुक उल्टी हौगई है । धर्मं आपकं संस्कृत भरन्थोमे विद्यमान है उनका पठन
`
पाठनं सर्वथा उठता जाता है. लोग विधमियोके ग्रन्थ पठनेसे विमुख होते जाते हं, इस ओर महानुभावोका ध्यान नहीं कि प्राचीन वेद शास्त्रादि धर्मग्रन्थोकिां अनु-
वाद करके स्वं साधारणके समञ्लने योग्य संस्कृतसे भाषामें अनुवाद कर सवं साधारणकं दुष्ट गोचर करनाही पाखण्डको दूरकर सकता है, इसमें थोडसे हो व्ययसे
॥ ७ भक्तजन अपने धरम कमको यथा योग्य जान सकते हँ, इसी विचारसे हमने वाल्मीकिरामायणादिका अनुवाद ओर दयानन्दतिमिर भास्कर आदिका निर्माण कर
लोकोपकारकं निमित्त प्रकाश किया है. जिनसे बहुत कुछ उपकार सवं साधारणको प्राप्त हुआ है यजुवेदका भाषामें भाष्यभी इसी निमित्त किया दै! यह् दिव
पुराण शेवोका सवंस्व विधि प्रकारक गाथा धमं अथं काम मोक्ष विधायक आख्यान कमं ज्ञान उपासना योग त्रत तीर्थं भूगौल खगोल दिवकं निर्गुण सगण रूपका
वर्णन सती चरित्र गिरिजा चरित्र स्कंद कथा त्रिपुरासुरवध किगमाहात्म्य रिवक्षेत्रकथा रुद्राक्ष भस्म माहात्म्य काशी कंलास माहात्म्य शिवभक्तिकी महिमा पाशु
पत योग आदि अनेक विषयोसे विभूषित है चारो वणं, चारों आश्रमं इससे ध्मका पुणं उपदेश प्राप्त कर सकते ह, -इसके पाठ करनेसे चित्त शुद्ध होता है, ओरं
सनातन गूढ इतिहासोंका ममं अवगत होता है. आदिसे अन्ततक इसका पाठ करनेसे विज्ञानात्माका प्रकाश होता है, बहुत कहनेसे क्या है ? इसको अवलोकन कर
पाठक महाशय इसका गौरव जान सकते हं । इन धम प्रन्थोके अवलोकन करनेसे सन्त महात्मा तो आनन्दको प्राप्त होगे । परन्तु पर दूषण भूषण धारी असहन
शीर कुतर्की तथा अभिमानी पुरूषोको हास्य रसके- सिवाय ओर जो काभ होगा, इसको वेही अनुभव कर सकते हे, कारण कि, जे पर दोष रर्खाहि सह् साखी, पर
हित धृत जिनकं मन माखी । पर अकाज लगि तनु परि हरहीं, जिमि हिम उपल कृषीदल गरहीं ।'` गोस्वामी तुलसीदासजीकी इन दो चौपादयोसे उनकी (प्रकृति
ही वैसी जानकर उनसे विना प्रयोजन दहिनेसे बाये हो जानेके कारण पुष्पाञ्जलि प्रदान करनी उचित समञ्ली गई । इस प्रकार इस ग्रन्थकी पूति कर सद्गुण सम्पन्न
निज धमं सावधान गुणवान वेशय वंश दिवाकर स्वगुण आगर गो ब्राह्मण भक्ति निरत गुणग्राहूक वेंकटेडवर यन्त्राधिपति परमोदार सेठजी श्रीखेमराज श्वकृष्णदासजी
महाशयको प्रकाश करनेको समपंण करते हं । जिन्होने सब प्रकारसे हमको सन्तुष्ट किया है ओर बहुत कालसे अलौकिक प्रीति परमसनद्धावयुक्त हमसे रखते हे
परब्रह्म परमात्मासे प्राथना है कि उक्त सेठजीकं यहां अनेक मंगर ओर पुत्र सम्पत्निकी सदेव वृद्धि होती रहे यही हमारी परम अभिलाषा है । पाठक महाशयोसे
निवेदन है कि आपके विनोद ओर भक्ति प्राप्तिकं निमित्त इसकं अनुवादमें कोई प्रसंग छोडा नहीं गया, इसपर जह कहीं भूल चूक होगई हो आप अनुग्रह कर
उसे क्षमा करके हंसकं समान गुणग्राही होगे ओर जो सूचित करेगे वह उचित होनेपर दूसरीवार सुधार दिया जायगा । इस महापुखाणके मुद्रित करनेका सब
प्रकारका रजिस्टरी अधिकार श्रवेकटेशवर यन्त्राल्यके अधिपति खेमराज श्रीकृष्णदासजीको दिया गया है, वेही इसके छापनेकं अधिकारी हँ
भा. री.
भूमिका. दोहा-सकर पुराणनको कल्यो, शिवपुराणमें सार । पदिये सुनिये प्रेमसे, मिहि पदारथ चार ॥
पौष कृ० 4 ) सजननोका अलुगृरीत-
सवत् १९६५ 1 § पं०-ज्वाखप्रसाद मिश्च,
| दीनदारषुरा-खरादावाद,
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प 4949 + 6 = जञ #
९
अथ शिवमहापएशणमाषारीकाविषयावुक्रमणिका
अ०
५ भ्रथमा विदेश्वरसंदिता,. ॥
१ सूतजोसे मुनिर्योका प्रन
२ शिवपुराणका माहात्म्य पापहारीपन तथा संहिताभेदव्णेन
३ षदटूकुख्वाले मुनि्योके प्रति साध्य साधन साधक वणन
४ सनत्कुमारका व्यासजीसे रिवचरित्रसे चतुवंगं प्राप्ति वर्णन
५ शिवके छग बेर पूजनसे मुक्ति कथन
६ विष्णु तथा ब्रह्माकं विवादमें देवताओंका कैलास गमन
७ ब्रह्मा विष्णुकं मध्यमे ज्योतिखिगका प्रादुर्भाव
८ ब्रह्माकं वधमें प्रवृत्त हुए भैरवकी विष्णुद्वारा प्रार्थना ५
९ शिवका विष्णु ब्रह्माजीकं भ्रति रिवरात्निब्रतका महाफल कहना ....
१० विष्णु ब्रह्माके प्रति पंचकृत्य ओर ओंकारका उपदेश करके
शिवजीका अन्तद्धनि होना ॥
११ शिवकिगका स्थापन पूजन ओर दान प्रकार वर्णन
१२ शिवक्षेत्रका वर्णन
१३ सदाचारका वर्णन
१४ अग्नियज्ञादि वर्णन
` पृष्ठांकाः
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अण पुष्ठाकाः
१५ देवयज्ञादिम्रे देशका पात्र निरूपण म॑, ३
१।१६ पाथिवपूजा प्रकार भिन्न रेदेवतागोके पूजनसे भिन्न २ फलप्राप्ति २३६
४१७ प्रणव पचाक्षरमन्त्र महात्म्य वणन ४३
७|१८ बंध मोक्ष स्वरूप शिवकिग माहात्म्य वर्णन ५०
९१९ पाथिव शिवलिग पूजा तथा भस्म माहात्म्य ५८
१०|२० वैदिक पाथिव पूजा भ्रकार ६०
११/२१ कामनाके अनुसार शिवक्तिग संख्या निरूपण ६३
१३/२२ शिवनेवेद्य भक्षणकानिर्णंय, निल्वमाहात्म्य ६६
१५।२३ रिवनाम माहात्म्य निरूपण ६८
१६।२४ भस्म माहात्म्य वर्णन ७०
२५ रुद्राक्षमहिमा वर्णन ॐ ७५
१८ इति प्रथमा विेऽवरसंहिता ।
< द्वितीया श्द्रसंहिता-भथम सष्टिखण्ड.
२४| १ निर्गुण शिवका श्रपंच निमाणं विषयकं सूतजीसे रौनकका श्ररने २
२६| २ नारदजीका तपद्वारा कामविजय ओर विष्णुस निज प्रशंसा करना ३
३१. ३ नारदका गमन विष्णुजीका मायाकी प्रेरणा कन्याको देख नारदजीका
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अ० पुष्टाक्रा अ० पृष्ठाका
मोहित होना. नारदका नानरका मुख होना. विष्णजीका कन्याको १४ विशेष पृष्पोंसे शिवपूजनका फल वर्णन, चंपा केतकी छोडकर सब
ग्रहण करना नारदका शिवगणोको शाप देना ६ फूलोसे पुजन ९
४ नारदका वैकुण्ठगमन, विष्णुजीको शाप देना, पीछे माया दूर होनेसे १५ सृष्टिरक्षाकं निमित्त विष्णु ब्रह्माका वाराह हंसरूप धारण, ब्रह्माण्ड
परताना ९ निर्माण प्रकार
१३।१६ सूक्ष्मभूतोसे स्थूल जगत्की उत्पत्ति देव निर्माण प्रकार, शिव सती
५ नारदका काशी आदि क्षेत्रोमे पयंटन, शिवगणोको शापोद्धार कथन १३
६ नारदका लोकोपकारकं लिये अनेक प्ररनोत्तर श्रवण, महाप्रलय वर्णन विवादं ८
शिवका निर्गुणत्व कथन विष्णुजीकी उत्पत्ति २५ तत्त्वोकी उत्पत्ति . १ शिवका कंलास गमन ५ ४ चरित्र व भ
७ नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति ब्रह्माजीका प्रादुभवि ज्योति- १८ क यमदूतोका आगमन, हिवदूतोका संवाद, हिव
^ 1 6 तो कार न १८१९ पद्मकल्पमें पुलस्त्य पूत्र वैश्रवणका अलकापति होना, मेघवाहन कल्पमें
श्रवण होना ओंकारसे ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति, शब्दत्रह्यस्वरूप वर्णन यज्ञदत्तका अक्कापति होना, भवानीके वचनसे एकाक्षत्वकी प्राप्ति
विष्ण विधाताका गवं परिहार ९ २२ २० कुबेरकं तपसं कलास गमन, कूबर ओर शिवकी मित्रता ....
९ शिवका ब्रह्मा विष्णुको उपदेश देना, तथा दोनोको वर देना .... २४ पस
१० हरिहरमं भेद जाननेवारको नरक प्राप्ति, निर्गुणे तथा लिगस्वरूप कथन २८ शद्रसंदिता-रदतीय सतीखण्ड
११ शिव पूजाविधि निरूपण ओर उसका फल “ ३०| १ ब्रह्याका सुताददनसे मोह होना, सतीजन्म, रुद्रका विवाह सतीका
१२ लिगाचंन जाननेकी इच्छसे ब्रह्मयाजीका देवताओंसहित क्षीरसा- शरीर त्याग ज्वालामुखी आदिकी उत्पत्ति
गरमें जाना, यथाधिकार सबको लिगदानः, कर्म यज्ञस्वरूप तथा २ निर्गुण शिवके दो रूप वर्णन, प्रजापतियोका आविर्भाव कामकी उत्पत्ति
दो प्रकारके ल्ग पूजन ३४| २ ब्रह्माजीकं द्वारा नामकरण तथा कामका प्रहार देखकर उसको हाप
१३ विस्तारसे किगपूजा विधान, स्नानादि पूजाविधि स्तोत्र पाठ विघान॒ ३८ देना
७ संध्याका मेधातिथिके यज्ञम गमन,शरीर, त्याग अरुन्धतीरूपसे जन्म
८ कामका शिवके मोहके निमित्त गमन
९ मागंणोकं साथ रिवको मोहित करनेकी चेष्टा करना, तथा श्रम
व्यथं होना
१० कामका स्वधाम गमन, सती जन्मका उपाय
११ विष्णुकी प्राथंनासे शिवकशक्तिका दक्षके यहां जन्म होनेकी इच्छा
करना
१२ दक्षका तप, शक्रतिका ददोन देकर कन्यारूपसे प्रगट होनेका वर देना
१३ दक्षके पुत्रको नारदका ज्ञान देकर तपसे निवृत्त करना
१४ दक्षका साठ कन्या उत्पन्न करना, उनके विवाह
५ सतीका बारह वषेतक दिवाचंन त्रत केना, विधि
शिवलोक गमन
६ ब्रह्मा विष्णुजीका रिवजीसे सृष्टिक निमित्त विवाहका आग्रह् करना
१७ सतीके समीप दिवजीका गमन
१८ विष्णु आदि देवताओके सहित रिवका विवाहाथं दक्षगृहमें आगमन
१९ सती दहोनसे ब्रह्माका मोह् 8
विष्णका
अ० पृष्ठांकाः | अ०
४ दक्षकी कन्या रतिके साथ कामका विवाह आनन्दादि वणेन ७३।२० सती शिवविवाहमें ब्रह्माजीकी विरूपता, पश्चात् वरप्राप्ति
५ शिवका तपसे सन्तुष्ट होकर संच्याको वर देना ७५२१ सती रिवका कलास गमन
६ संध्याका शिवकी स्तुति करना, शिवकं प्रसादसे वर प्राप्ति ७८|२२ हिमाल्यपर सती शिवका विवाह
८१।२३ शिवका सतीके प्रति मोक्षदास्त्र कथन
८३।२४
सतीको मोह होना
शिव सतीकं वियोगका कारण वर्णन
सीताका रूप धर सतीका रामचन्द्रकी परीक्षाकं निमित्त गमन
रिव ओर दक्षका विरोध
९२२७ दक्षयज्ञ वणेन, शिवका भाग न देखकर दधीचिका यज्ञस्थल त्याग
९४ करना
९६।२८ सतीका पिताकं यज्ञम जानेके निमित्त शिवसे आग्रह करना
९८|२९ दक्षदारा सतीका तिरस्कार सतीका दक्षसे शिवमाहात्म्य कहना
३० सतीका यज्ञमे शरीर त्याग भृगका शिवगणोको तिरस्कार करना
१०१।३१ देववाणीका दकी भत्सना करना
१०५३२ शिवजीका सती देह त्याग प्रक्रार सुनकर जटासे वीरमभद्रादिका
१०८ प्रगट करना
१११२३ वीरमभद्रका सेनासहित दक्षकं यज्ञमे गमन
११३।३४ दक्षकं यज्ञम उत्पात दन, दक्षका विष्णुसे प्रार्थना करना „...
८५।२५
८८२६
पृष्ठकः
वनमें विचरते हृए शंकरको रामचन्द्रके प्रति प्रणाम करता देख
११
१२०
१२२
१२६
१२९
१३२
१३६
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१३९
१४२
१४४
१४७
१४९
१५१
१५४
१५६
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अ० पृष्ठांकाः | अ० वष्याका
॥ ९ | | ३५ विस्णुका दक्षसे शिवसामथ्यं वणेन करना, इनसे विरोधमें कल्याण ४ मेनाकी प्रार्थनासं देवीका उसके घर जन्म ग्रहणका वर देना... १९० ट
नहीं है १ ५ मेनाका रुद्रका तप करना तथा सौ पुत्र प्राप्तिरूप“वर पाना १९२ ्
£ ३६ लोकपालोके साथ वीरभद्रका संग्राम, उनकी पराजय ... १६०६ पावंतीका मेनाके घर जन्म ग्रहण करना १९५ 2
© ३७ विष्णु आदि देवताओंकं साथ वीरभद्रका दारुण संग्राम दक्षयज्ञ- ७ हिमाल्यका महामहोत्सव करना, नामकरण संस्कार बालक्रीडा १९८ ¢
ह|| निष्वंस वीरभद्र ढारा दकषका शिरच्छेद वर्णन १६३८ हिमार्यके घर नारदजीका आगमन पार्व॑तीको वर प्राप्ति कथन १९९ || $
३८ मृत्युंजयका प्रभाव, दधीच ओर क्ुवथु विवाद वर्णेन ~ १६७९ पावंतीको शिवाराधनका उपदेश,दिवका हिमालय गमन पार्वतीकी सेवा २०२ ट् |
३९ क्षुवथुकी सहायतामे विष्णुका ब्राह्मणरूपसे दधीचकं निमित्त गमन १७०|१० भौमोत्पत्ति, उसको शिवकी कृपासे ग्रहत्व प्राप्ति वर्णन... २०४॥|£
४० सब देवताओंका दक्षके जीवनके निमित्त कंलासगमन न १७३।११ हिमारयका शिवजीसे सम्भाषण ल £
४१ विष्णुका शिवजीकी स्तुति करना १७५१२ शिवजीका हिमाल्यसे कन्याके साथ आनेका निषेध करना २०८
४२ शिवजीका प्रसन्न होकर यज्ञ साधन प्रकार कथन -... १७८१३ सांख्य वेदान्तमें शिव ओर पावतीका कथोपकथन, कामदहन वर्णन २१०
४३ दक्षकं शरीरपर बकरेका शिर लगाना, यज्ञका पूणं होना सतीखण्ड- १४ तारकासुरकी उत्पत्तिमें वच््रांगका जन्म ब्रह्यासे उसको वर प्राप्ति २१३
श्रवण फल प्राप्ति वणेन । .... १८१|१५ उसको उत्पत्तिमें अरिष्ट वर्णेन ब्रह्माजीसे वर प्राप्ति २१६
सतीखण्डको समाप्ति १६ तारकासुरसे भय पाये हुए देवताओंका ब्रह्माजीसे दुःख कथन,
5 च ब्रह्माका उन्हं समञ्ञाना तः
रद्रसंदितान्तगत-तृतीय पावेतीखण्ड १७ इनद्रका कामदेवको बुलाकर शिव पार्व॑तीके विवाहकं निमित्त कामको
१ सतीका हिमाल्यकं यहां जन्म, तह प्रथम नारदकं उपदेशसे तप रिवके समीप मेजना
०. २२१
करना मेनाका हिमाख्यसे विवाह ` “ १८४१८ कामद्वारा शिवका पावेतीपर मोह् प्रका होना न" चर
२ मैनाको सनकादिसे शाप प्राप्त होना, तथा शापोद्धार कथन १८५ |१९ रिवजीका कामदेवको भस्म करना देवताओंकी प्रार्थनासे जीवनो-
३ हिमार्यकं घरमे विष्णु आदिका गमन, हिमाल्यकी बडाई करना १८८ पाय कहना
(०००4
0० 4 =
२२९६
अ० ऽ । पृष्ठांकाः | अ० पष्ठांकाः
२० शिवकी नेत्राग्निको ब्रह्माजीका सागरको वडवारूपसे सौपना ... २२८|३७।३८ शिवके समीप लग्न भेजना, पव॑तोका आगमन विवाह सामग्री
२१ लिवका अन्तरद्धानि होना, फावंतीका दुःखी होना, नारदजीका पंचाक्षर वणेन ... २७६।२७
मन्त्रोपदेश करना ~ २३०३९ विरवकर्मकिा मंडप ओर स्थान निर्माण २८०
२२ पावतीका शिवके निमित्त तप करना ““ २३२|४० नारदका सवत्र निमंत्रण देने जाना, शिवजीका बरात लेकर आना २८३
२३ देवताओंका तपसे व्याकुल हो ब्रह्मलोके जाना .“ २३६४१ विवाहमण्डपको देखकर देवताओंका मोहित हो जाना ४ (246
२४ ब्रह्मा विष्णुजीकं आग्रहसे शिवका पार्वती विवाह स्वीकार करना २३८४२ शिवके आगमनका उत्सव वर्णन स
२५ सप्तषियोका पार्वतीकी परीक्षाके निमित्त जाना .“““ २४२४३ शिवकं दशेनको आई हुई मेनाको मोहनेके किये शिवका विकटरूप
२६ शिवका जटिलरूप धारण करके पार्वतीकं समीप जाना ....“ २४६ दिखाना व
२७ जटिलरूपसे शिवजीकी निन्दा करना पावंतीका भेत्संना करना २४९४४ मोहित हुई मेनाका भ्रम निवारण करना २९४
२८ पावैतीको निजरूप दिखाकर शंकरका उन्हें स्वीकार करना .... २५१४५ शिवकी दिव्यरूपसे स्थिति वर्णन "+ ^. 3
२९ पावेतीका ग्रहपूजन पूवक विवाह विधिके लिये प्रार्थना करना २५४४६ मेनाका स्त्रियो सहित शिवजीकी आरती करना ० २९२
३० शिवजीका अन्तद्धनि होना, पार्व॑तीका स्वगृह गमन .... = २५६।४७ देवताओंकं सहित शिवजीका मंडपमे आना ३०४
३१ पार्वतीको प्रेमसे देनेमें हिमाक्यकी मोक्ष होगी इस विषयमे देवता- ४८ कन्यादान तथा विवाह विधि वर्णन ३०७
ओका विघ्न करना २५९४९ होमादि संस्कार वर्णन ३१०
३२ मेनाकी शिवको कन्यादाने अनिच्छा, संप्तपियोका आगमन २६२५० विवाह महोत्सवसें स्वरियोका विनोद वणन ३९३
३२३ अरुन्धती सहित सप्तषियोका मेनाको समञ्ञाना =... २६५५१ कामको जीवदानकं निमित्त रतीकी प्रार्थना करना, कामजीवन
३४ वशिष्ठका आरण्य इतिहास कथन . २६९ ध्रकार कथन ^. ` १
३५ पद्मपिप्पलाद चरित्र वणेन २७१५२ ज्योनार वर्णनं .. ३१७
३६ हिमायको विवाह विषयमे सम्मत करकं ऋषियोका स्वस्थान गमन २७४।५३ विवाह महोत्सव वणेन १९९
= व
ू अ० पृष्ठांकाः
॥१०॥ ह ५४ मेनाका पावतीको रिक्षा देना पतित्रतघमं वणन + ` २३२६
५५ विवाह कृत्य पूणं करकं शिवका कलास गमन ... ३२६
& पावंतीखण्डकी समाप्ति
ह रुद्रसंदितान्तगेत- चतथ कुमारखण्ड
© १ सिवजीका दिव्यसहस्र वषंतकं पावंतीसे विहार वणन .... ३२९
© २. कातिकेयका सरकंडकं वनमे जन्म ३३२
३ ऊत्तिकाओंका दुग्धदान सुरटोकमे जाकर कुमारका अनेकं लीला
© करना - ~“ ३३६
` ४ स्कदका शिवजीकं समीप आना ३३८
५ ब्रह्मादि देवताओंका कुमारको आयुध दानपूवंक अभिषेक करना ३४२
६ कुमारका खोये हृए यज्ञीक अजक ब्राह्मणको देना स 3४५
७ तारकासुरकं साथ देवताओका युद्ध वणेन ३४७
८।९ तारक असुरके साथ विष्ण् ओर वीरभद्रका युद्ध ३५०।३५१
१० कुमारका तारकको वध करना ५५
भारी ११ कमारका बाण ओौर प्रलम्बको मारना, प्रतिज्ञेरवर, कपालेवर
अनु ठ कुमारेवर लिग स्थापन ..- ३५८
# त १२ तारकवधसे प्रसन्न होकर देवताओंका रिवपावैती ओर कुमारकी
ट स्तुति करना ३५९
||. १ ३ पाव॑तीका स्नान करते समय गणेश निर्माणकर उनको द्वारे बैठना... ३६२
अ
(91
१५
१६
१७
१८
१९
२०
पुर मांगना ~
२ तारककं भयसे व्याढुल हए देवताओंका शिवकी स्तुति करना..... ३८९
३ देवताओंका उसको शिव भक्तिमे अविश्वास कराना .... ३९३
४ त्रिपुरको मोहनेकं लिये विष्णुका जिननाम पुरषको उत्पन्न करना ३ |
५ जिन घमं कथनके प्रसंगसे देवताओंके ग्राम्यधमं नियम कथन ३९९
६ शिवधमं त्यागनेसे तारकवध होगा देवताओंकी इस विषयमे शिवस्तुति ४०२
७।८ शिवकी आज्ञासे विइवकमकिा सवं वेदमय रथ निम णि ४०५।४०७
९ हिवकी युद्ध यात्रा च ....` ४०९
पुष्टाकं
शिवका प्रवेश निवारण करनेपर दिवक्रा गणको युद्धके लिये भेजना ३६४
शिवगणोका गणेशकं साथ युद्ध ३६८
देवताओंकं य॒द्धके पीछे रिवजीका त्रिशलसे गणेरका छिर छेदन
करना ३७१
पावंतीका महाक्रोध, गणेशजीका फिर जीवित होना यढ निवृत्ति... ३७३
गणेरजीकी कायापर हस्तीका शिर योजित करना .... ३७६
गणेशको प्रथम पूज्य पद देना .... ३८०
गणेश विवाह वणेन, कूुमारका रूठकर क्रौचपवंतपर जाना .... ३८३
कुमारखण्डकी समाप्ति
र्द्रसहितान्तगेत दश्वम-युद्धखण्ड
त्रिपुरकं पत्र तारका विद्यन्माटीका तपकर ब्रह्यासे वर पाना तीन
अ० पृष्ठकः | अ० पृष्ठांङ्ः
१० त्रिपुरदाह वणेन । ४११ २५ उसका रिवकी स्त॒ति करना 4 = ४
११ त्रिपुरदाह शिवकी उग्र मति देखकर देवताओं को भय, शिवस्तुति ४१४२६ विष्णुका वृन्दाकी भस्म रारिमे स्थिति करना पावेतीका बीज
१२ मयका शिवकी शरणमे आना, उसको वितलरीक दान, जैनाचा्य॑को देना उनसे धात्री मारुती ओर तुलसीकी उत्पत्ति -होना, विष्णुका ।
कलमे तुम्हारा धमं प्रचलित होगा यह कहकर विसजंन करना... ४१६ मोह निवारण ५ ध
१३ तपस्वीरूपसे शिवका इन्द्रको भस्म करके वृहस्पतिकी प्रार्थंनासे २७ दम्भासुरका पुत्रकं लिये तप करना, शंखचू डक उत \६
जीवाना ४१८ व द तप तु 0४ उसका विवाह ५
जटन्ध भ, ५५५५
1 7 ॐ जलन्भरकी उतपि, उसका ३० उसके वधकं निमित्त देवताओंका शिवजीसे प्राथना करना .... ४६३
वृंदासे व्याह् ४२०
1 ३१ शिवका देवताओंको उपदेश देना 6 ४६५
१५ राहृका शिर छिन्न देखकर जलन्धरका इन्द्रसे युद्ध, इन्द्रकी पराजय ४२३ १२ शिका इंखचूडके पास पुष्प दूतक देवतात राज्य देनेको
१६ देवताओंका स्वगंसे भागना, विष्णका जलन्धरसे यद्ध 2 शू तोल ध „
१७ जलन्ध रकं वरदान मांगनेसे विष्णुका लक्ष्मीसहित उसके घरमे निवास ४२८ ३३ शिवगणोका सेनासहित युदक निमित्त गमन र
१८ देवताओंसे प्रेरित हो नारदजीका जलन्धरसे पावंतीके खूपकी ३४ शंखचूडका भार्या तुलसीकौ पुत्रक परति समर्पण कर युदधको जाना ४७२
81 का ४३१| ३५ परस्पर दृतप्रेषण प ४७३
१९ जलन्धरका शिवकं समीप पावती मुञ्ञे दो यह् कहकर दूत भेजना ४३४| ३६ देवता दानवोका रोमहषण यद्ध ७६
२०।२१ शिवकं गणोसे जलन्धरकी सेनाका युद्ध ४३६।४४०| ३७ शंखचूडका कातिकेयादि वीरोसे युद्ध ४७७
२२ जलन्धरका रिवरूप धारणकर, पाव तीके समीप जाना पाव॑तीका ३८ काली ओर शंखच्चूडका अस्त्रयुद्ध ४७९
यहं जानकर विष्णुको उसकी स्त्रीक छलनेमे नियुक्त करना ४४२्| ३९ शिव ओर शंखचूडका भयंकर युद्ध व 0
२३ विष्णुका वृन्दाको छलना, वृन्दाका विष्णुको शाप देना ४४५ ४० नारायणका ब्राह्मणरूमसे शंखचूडका कवच ग्रहृण करना,
२४ शिवकं ढारा जलन्धर वध .... क: .. ४४८] शंखनच्डका वधं ५ 4
| | पृष्टाकाः | अ० पृष्टाकाः
शि ०० ट ४१ तुलसीका विष्णुजीको शिलारूप होनेका शाप देना, स्वयं गंडकी ५६ शिवका वाणासुरकी गाणपत्य प्रदान न
॥११॥ ८ हना .... ४८६ ५७ शिवजीका महिषासुरके पत्र गजासुरकी मारना
४ ४२ अन्धकका पाव तीक प्स्वेदसे जन्म, हिरण्याक्षका उसे रिवसे पाना ५८ व्याघ्रं श्वररूपसे दुन्दुभि ओर निर्हाददैत्यका वध
त विष्णुद्धारा हिरण्याक्षका वध १ (व ५९ गौरीद्रारा विदलोत्पल दैत्यका वधं |
४३ हिरण्यक्यपुको नृसिंहरूपसे संहार ४९२ 0 +.
४ ४४ अन्धकको पितृराज्य प्राप्ति, शिवके प्रति पाव तीकं निमित्त दूत भेजना ४९५ ठतीया शतर्द्रस्षदिता `
| ् ४५।४६ अन्धकासुरका शिवजीसे घौर युद्ध, वीरभद्रादिका पराजय ५००।५०३| १ शौनकका सूतजीसे सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर भेद
४७ अन्धककी प्राथ नासे शुक्रका संजीवनी विद्यासे दैत्योको जिवाना ५०७ जाननेका प्ररन ५
| ४८ शिवजीका शु्राचा्य॑को निगल्जाना, फिर वीयं द्वारा निकालना. ५१०| २ शव॑ भव सद्रादि भेदसे हिवजीकी आठ म॒तिका वर्णन
४९ अन्धकका शिवकं शुल्पर तीन सहस्र वष॑तक तप करना, उसे ३ अद्धंनारीर्वरका प्रादुरभावि दक्षगृहमे भवानीका अवतार
ट शिवका गाणपत्यदान - “ ५१३| ४ पहले द्वापरमें श्वेतमुनिरूपसे शिवका अवतार दूसरे स नोमे दरापरतक
#॥ ५० शिवसे शुक्रको संजीवनी विद्याकी प्राप्ति .... ५१५ शिवावतार वणेन. तथा उनकं शिष्योके नामादि
५१ ऊषाचरित्र वणन रिव शिवा विहारवणैन ~“ ५१८] ५ दशमेसे २८ हापरतक शिवावतार वणेन, उनके शिष्योके नामादि
ट ५२ चित्रलेखाका अनिरुदधको उषाके अन्तःपुरमें लाना ५२१ ६ पत्रकी कामनासे शिलादमुनिकी तपस्या, नन्दीजन्म उनका तप
भा. री. ||@|| ५३ बाणासुर ओर अनिरुद्धका संग्राम वर्णन, नागपाशमे बांधना, ७ महेश्वरका नन्दिको गाणपत्य दान; नन्दीर्वर विवाह
कालीका छडाना ५२५ ८ ब्रह्याकं गवंनारके लिये कालभै रवावतार वणन
ह ५४।५५ श्रीकृष्णका बाणासुरसे युढ, रिवजीका बाणासुरकी सहायता ९ भेरवको ब्रह्महत्याकी प्राप्ति ब्रह्माकं पांचवे शिरका उनके पीचछे
करना, कृष्णका बाणासुरकी भुजा छेदन करना, उषा अनिरुढ लगना. कारीमे कपालमोचन होना; कपालमोचनती्थंका श्रेष्ठत्व
४ विवाद दारका गमन ... “ „.५२७।५३४ १० न् सिहजीके प्रति महादे वजीकं सान्त्ववेचन बोलना
0)
अ पृष्ठाकाः
१ महादेवकी आज्ञासे वीरभद्रका मानकर नृसिंहका गवं दूर करनेको
रना
१२ दिवजीका शरभावतार लेकर न सिहुजीका गवंखवं करना, कृत्तिवास
नाम कथन भ
१३ विडवानर मुनिका पुत्रकी कामनासे स्तरीसहित तप करना
१४ ग्रहपति अवतारके समयमे विष्णु आदि देवताओंका आगम ; ....
१५ अकालमृत्यु दूर करनेके निमित्त ग्रहपतिका तप करना
१६ शम्भका समुद्र मंथनके समयमे यज्ञेरवरावतार वणन
१७ शिवजीकं महाकालतारादि अवतारोका वर्णन
१८ एकाद स्द्रावतार वणन „^.
९ अत्रिका पृत्रकी कामनासे तप करना तीनों देवताओंका वर देनेको
उनके समीप आना उनकं अंशसे चन््रदत्तात्रेय मौर दुर्वासाकी उत्पत्ति
२० मोहनीरूप देखकर शिवका धेयच्यृत होना, हनुमानजीका जन्म
सुग्रीवकं समीपगमन
१ पावंतीका भैरवको मनुष्य होनेका शाप देना 8
२२ समृद्रसे उत्पन्न हई दिव्यनारियोंसे विष्णुका पातालमे विहार
२३ वृषभरूपसे रिवका विष्णुसे समर, रिवाज्ञासे विष्ण॒का स्वलोक
गमन
२४ दघीच मुनिकी स्त्रीमे हिवका पिप्पलादरूपसे जन्म
२५ पिप्पलादका विवाह पिप्पाद स्मरणसे रानि पीडा निवारण
^
२७
३१
३३
२३७
३९
४३
४५
॥
४८
६३।
२७ भद्राय्, राजाको भक्ति परीक्षाकं निमित्त द्विजेशावतार वणंन....
आहुकभिल्लकी भक्तिसे संतुष्ट होकर रिवका यतिरूपसे परीक्षा
लेना ओर उसको नलरूपसे प्रगट होनेका वर देना
नभग चरित्र वणेन प्रसंगमे कृष्णदरन रिवावतार वर्णन
३० अवज्ञा करनेसे इन्द्रके मारनेकी इच्छा करते इए शिवको देखकर
गुरुकी प्राना इनको जीवसंज्ञाकी प्राप्ति
३१ विदभं राजकी पराजयसे उनकी रानीके वनमें उत्पन्न हुए पुत्रकी
रक्षाकं निमित्त भिक्षुवर्यावतार वणन र्पः
३२ दरधकं निमित्त तप करते हुए उपभन्युकी इन््ररूपसे परीक्षा, पीछे
अनेक वर देने ॥ ९
३३ तप करती हुई पावतीके भावकी परीक्षाके निमित्त शिवका ब्रह्मचारी
अवतार
०००९ ०९०९ ७७४
३४ पावैतीके धर नतं करूपसे शिवका कौतुकके निभित्त अवतार ....
२५ पावतीको शवके निमित्त न रेनेकी इच्छा करते हुए हिमालयकं
यहा शिवजीका द्धजरूपसे आगमन ०५
३६ पत्रक निमित्त तप करते हुए द्रोणाचार्यके यहा अर्वत्थामा नामावतार
पृष्ठाकाः
महानन्दा वेश्याकी भक्तिसे प्रसन्न हो शिवका वेदयानाथावतार वणन ६
| | अ० पुष्ठांकाः | अऽ पृष्ठाका
३७ हतवनमे पांडवोके स्थित होनेपर व्यासजीका अर्जन को चन्द्रकी- ७ बालविधवा ऋषि कन्याको तप करती देख मृढदैत्यका उसपर
॥१ | & हतः पर भजता क , ९८ आक्रमण, शिवका प्रगट होकर दैत्यका वध करना, वैशाख शक्ल -
© ३८ इन्द्रका परीक्षापूरवंक् अजुंनकोडिवकं आराघनामे नियुक्त करना १० व 1 न १६
2४|| २३९ अर्जुनके वधके निमित्त दर्योधिनका मूकनाम दानवको शुकररूपसे +“ र क 7 १८
तै भेजना. शिवाजीका भीलरूपसे आगमन मौर अर्जुन शिवका एक ९ एक 1 ल्वपत्र फकनं अर् उसकं शिवजीपर गिर
& साथही वाराहपर बाणप्रहार (ह परमपद प्रा =
© ४० शूकरकं मरनेपर मेनेमारा मेने मारा इस प्रकार अर्जुनशिवका विवाद १०८| १० गोकणं क्षेत्रे स्नान करनेसे मित्र 1 १ दधार परमपद प्राप्ति २२
४१ अजुन ओर शिवका युद्ध, अर्जुनका वर लेकर द्वैतवनमे आना, कृष्ण ११ चन्द्रभाल पशुपति आदि उत्तरकं शिविगोका वर्णन = 1 र
दशन होना ध .... ११०| १२ ऋषियोके शापसे भूमिमे गिरते ज्योतिकिगको पावैतीका धारण
2 ४२ शिवजीकं दादश ज्योतिलिगावतार वर्णन ४४ करना हाटकंश किगनामसे वहां शंकरका विख्यात होना ८ |
& इति शतस्द्रसंहिता १३ अन्धकेश्वर माहात्म्य वणन प्रसंगमे बट्कोत्पत्ति ^
¢ चल कोरिरुढरसंहिता १४ रोहिणीमे अधिक प्रेम करनेसे दक्षका चन्द्रमाको शाप देना क्षयी-
द्वादश ज्योतििग त 1 रोगकी निवृत्तिकं निमित्त चन्द्रमाका सोमेश्वर लिगस्थापन करना ३२
ञ् *१०४ मल्लिकाजं ~ = ह
© ॥ ५४ २| १५ मल्ककार्जुन ज्योतिछिगका वर्णन ५
ती २ कारीमे स्थित शिविगोंका माहात्म्य ४| १६ महाकाल ज्योतिखिगिका विवरण २७
0: 3 दाविति तर्न 6 ६/ १७ चन्द्रसेनराजश्रीकर गोपवालकको सुखदायक महाकाल माहात्म्य
अनु ४ अनसूयाके तपसं प्रसन्न हो गंगाका उसके आश्रममे निवास ७ वनन =
| || ५ नन्दिकेश्वर माहात्म्य वणंनमे एक ब्राह्यणका इतिहास वर्णन... ११| १८ चौथे ज्योतिखिग ओंकारेश्वरका वर्णन न
५ £ गृहेशकं पुत्रको मारकर काले वर्णं हुई गायको नन्दिकेश्वरकं समीप १९ पांचवे ज्योतिकलिगि केदारेश्वरका वर्णन = ४६
नमदामे स्नान करनेसे इदे वर्णकी प्राप्ति “~ १३। २० छठे ज्योतिकिग भीमेश्वरका माहात्म्य वणन = ४७
|
|
|
अ०
पुष्ठाकाः
१ कामरूपेरवरपर अनुग्रहकर शिवका भीमासुरको मारकर भीमेश्वर होना ५०
२२ सातवे कारीमें स्थित विदवेशवर लिंगका माहात्म्य
२३ श्रीकादीमाहात्म्य वर्णन । च
२४ ज्यम्बकेइवर आठवें ज्योतिलिगके माहात्म्य वणेनमें गौतमजीका
प्रभाव वर्णेन 0 ड
२५ गौतमको गोहत्याका मिथ्या कलंक लगना, पाथिवेइवर पुजनसे
पापकी निवृत्ति ५ 4
२६ शिवका गौतमपर अनुग्रह, गंगा ओर त्यबकेश्वरका वहां निवास करना ,.
२७ कल्पभेदसे गौतमके शाप देनेकी कथा
२८ नौवें ज्योतिङिग वैयनायेश्वरका माहात्म्य वणन 4
२९ दशमे ज्योतिलिग नागेश्वरका माहात्म्य वणंन दारुकावने
राक्षसोका उपद्रव करना .....
३० शिवभक्त सुप्रिय वै्यके वध करनेको उद्यत हए राक्षसको शिवका
पागपतास्त्रसे वध करना, वीरसेन राजाका दारकावनमे आना
३१ ग्यारह्वें ज्योतिलिग रामेश्वरका वणन
३२ बारहरवे ज्योतिङिग घुर्मेवरका माहात्म्य वणन
३३ शिवजीका घुदमाके धुत्रोंको जिवाना घुरमेश्वं नामकी प्रसिद्धि
३४ विष्णुका शिवजीसे सुदं नचक्र पाना
३५ शिवसहस्रनाम वणेन ध.
५३
५५
५९
६४
~ ६५
६७
६९
७३
७६
७८
८१
८४।
८७
८१
शिवसहस्रनामस्तोत्र फल वणेन
देवषिका दौवतत्त्व वर्णन करना
शिवरात्रि ब्रत॒ माहात्म्य
शिवरात्रि त्रतोद्यापन वणेन .... र
व्याधकथा प्रसंगमे रिवरात्रित्रत माहात्म्य वर्णन
मुक्तिनिरूपण
शिवकं सगुण निगुण भेदका वणन
ज्ञानका निरूपण शिवविज्ञानका फल वर्णन ।
इति कोटिरुद्रसंहिता
पश्चमी उमालंहिती,
पुत्रके निमित्त तप करनेको शये कृष्णका कौलासंने उपमन्युसे भिखना
उपमन्युका कृष्णसे शिवभक्ति निरूपण करना स
शिवजीका धीकृष्णको अभीष्ट वर देना, रामचन्द्रके वरदानकी कथा
लिवमायाका प्रभाव वर्णन
सनत्कुमारका व्यासजीसे महापातक वणैन करना
पापोके भेद वणैन =
यमलोकका मागे, यमदूतोका स्वरूप वणन
नरकं भेद निरूपणं
९ नरक यातना वर्णन
३६
३७
३८
३९
४9
४१
४२
४२
¢$ @ < ~€ ० «४ „९. >
शि 8 । 6
॥१२॥
१० नरकोकं विशेष दुःखोका वणंन....
११ दानके प्रभावसे नरक दुःखोसे मृक्ति
१२ तर्पण माहात्म्य, तपस्याका फल निरूपण
१३ पराण माहात्म्य वर्णन
| दान माहात्म्य दानभेद वणंन ....
१५ ब्रह्माण्ड वणंनमें पातालभेद निरूपण
१६ किस कंसे किस नरकमे वास होता है, तथा प्रायदिचत्त वणन
| ७ जम्बृद्धीप निरूपण
१८ भारतवषं तथा प्लक्षादि छः दरीपोका वणन
१९ सूर्यादि प्रहोकी स्थिति जनलोकादिका वर्णन `
२१ कर्मानुसार वर्णोका जन्म, संग्रामके फलका वणेन
२२ देहोत्पत्तिका वर्णन
२३ देहकी अशुद्धता बाल्यादि अवस्थाके दुःख वर्ण॑न
२४. नारदसे पचच्डा अप्सराका स्वरी स्वभाव वरणेन
२५ मृत्युकाल ज्ञान वर्णन
२६ योगियोका कालनिवारणका सामथ्यं कथन
२७ काल्वंचनाकं उपरान्त रिवलोककी प्राप्ति
२८ छायापुरषका दहन
पृष्ठाकाः
२० तपसे ही शिवलोककी प्राप्ति, तथा मनुष्यजन्मकी शरष्ठताका वणेन...
२
३०
३२
३५
३९
३९
४१
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४५
४९
५१
५४
५६
५९
६२
६८
७१
७३
अऽ
२९
३०
३१
३२
३३
३४
३५
३६
२७
३८
२९
४9
४१
४२
४३
0.1
४५
आदिसगं वणेन
स्वाय॑भुवादिसगं वर्णन
नारदकं निमित्त दक्षका शाप ....
कृरयपकी स्त्रियोकी सन्तान
मारुतोत्पत्ति वणेन
चौदह मन्वन्तरोंकी कथा
सूयेकं तेजको न सहकर संज्ञाका बडवारूपसे वनमें
पुष्टकाः
जाना सूर्यका
अर्वरूपसे उसकं समीप गमन, अदिवनी कुमारकी उत्पत्ति =...
मनुके नव पुत्रोका वंश वणन...
इक्ष्वाकुवंश वणेन >
सत्यत्रत त्रिशंकू सगरादिका जन्म
सगरकी दो भायिंका त॑प उनके वंरका विस्तार वर्णन
पितृश्राद्ध प्रभाव वणन
सात व्याधोकी गति वर्णन
सात व्याधोका मोक्ष होना ....
व्यास पूजन प्रकार वणेन
सत्यवतीमं व्यासकी उत्पत्ति कारीमे व्यासेइवर कग स्थापन
देवीचरित्र वणैनमे सुरथ राजा समाधि वैर्यचरित्र \
विष्णुका मधुकैटभको मारना ....
देवी प्रादुभवि,
७५
अ०
| देवीका महिषासुरको मारना
४७ देवीका चण्ड मुण्ड शुम्भ निरुम्भ धृम्रलोचन रक्तबाजको मारना
४८ समरमे सरस्वतीका शुम्म निुम्भको सेना सहित मारना
४९ उमा प्रादु्मीव वणेन ४
५० दज महाविद्याओंकी उत्पत्ति दुगे नाम असुरकं मारनेसे देवीका
दुर्गा नाम प्रसिद्ध होना
५१ भगवतीके ज्ञानक्रिया ओर भक्तियोगका वणेन प्रतिमा स्थापन ब्रत
निरूपणमे नवरात्र व्रतकी श्रेष्ठता वणेन
इति उमासंहिता
छठी केलाससंहिता ।
१ काशीक्ेत्रमे मुनियोका व्यासकं प्रति ओंकार विषयक प्रन
२ शिवजीका पावेतीको मंत्रदीक्षा देकर अनेक रहस्योंका वर्णन करना
३ ओंकारस्वरूप तथा विरजा होमविधिकथन
४ दीक्षितका परजास्थानमं आगमन, आर्भिक आचार वणेन
५ पूजास्थानमें मंडल रचना प्रकार
। ६ आसन प्राणायाम विधान वणैन
७ ध्यान आवाहन अघं आचमनादि विधानपूवैक रिवपूजा वणेन
८ प॑चावरण पूजा वणेन
७०००५
च----- ~~~
पृष्टाकाः
१२२
१२५
१२८
१३१
१३३
१३९६
=© 49 __०< €)
११
१३
१६
२०५
अ०
९ शिवके आठ नामोका अथै. किगपुजाविधि, देवीका संतोष वर्णन
सूतका तीथंयात्रा गमन
१० ` ऋषियोको सूतजीकं दशेनकी उत्कटा, सम्बत्सरांतमें सूतका
पुनरागमन ६.
११ मुनियोका वामदेव प्रोक्त ओंकाराथं विषयक प्रशन, स्कन्दस्तोत्र
१२ नान्दीश्नाद्ध ब्रह्मयज्ञादि विधि वर्णन, प्रणवार्थं कथन, प्रणवकी
शिवतत्परता
प्रणव जपकं अधिकारमं विरजा होम, सन्यास विधान वणेन
ओंकारका षट् प्रकार कथन पूर्वक स्वरूप वर्णन
उपासनाके निमित्त रिवसे सृष्टि वणन, सृष्टिका उपक्रमं उपसं हार
१३
१४
१५
वणेन
ओंकारको ही समस्त सुष्टिका कारण कथन
शिवशक्तिके वणैनसें शिवकं अद्वैत ज्ञानके उपदेशक निमित्त स्कदद्रारा
स॒ष्टि तत्त्व कथन
यतियोको गुरुत्व कारण वणन, शिष्यकरणविधि वणन
महावाक्योका अथ योगपद वणैन
यतियोका क्षौर, यतिक स्नानादि आचार वर्णन
यत्तियोका दाहनिषेध, खननविधि, दशाहांतकममं वणन
१६
१७
१८
0
२०५
भ
पृष्ठ्खाः
तयतियोका एकादशाह कृत्य कथन
रहवं दिन गुरु आराधन विधि कथन
इति कंलाससंहिता
सप्तमी बायुसंदिता पूर्वभाग ।
१ वेदादि चौदह विद्या पुराणाविभेवि वणेन इ
२ पर तत्त्व क्या है षट्कुल्वाले मुनियोका ब्रह्मासे प्रन
३ उत्तरमं शिव ही सबसे परे है, ब्रह्माजीका यह् उत्तर देना, नैमिषवन
वणेन
४ यज्ञसमाप्तिमं वायुका आगमन ऋ षियोके प्रइनसे शिक्का एेरवयं कथन
५ पशु पशुपति शब्दपर ऋषियोका विवाद -
६ इस राब्दारथ॑मे शिवकाही अथं वणेन, ब्रह्मादिकी आयुका मान
| शिवसे भिन्न कार नहीं है स्वरूप शक्ति आदिका वणन
८ क्रीडाकं निमित्त शिवजीका सब जगत् निर्माण करना
९ वायुसे शिवको क्रीडा विषयक अनेक प्रन सष्टिविषयकं प्रन
| ° समस्त ब्रह्माण्डकी स्थितिका स्वरूप वणेन
११ मन्वन्तर कल्प प्रतिकल्पादिभेदसे प्रतिसगंकी उत्पत्ति...
१२ ब्रह्माजीसे मोहमदादिसगं, तथा भूत पिशाच असुर राक्षसोंकी उत्पत्ति
१३ कल्पभेदसे ब्रह्मा विष्णु रूद्रादिका परस्पर एक दूसरेसे प्रादुर्भाव ....
॥४
(म
पृष्ठांकाः | अ०
१४ प्रतिकल्पमे ब्रह्माजीसे संद्रकी उत्पत्ति
६६| १५ अद्धेनारीइवर रूपसे प्रगट हुए शिवसे ब्रह्माकी मैथुनी सूष्टिका प्रचार
१६ मेथुन सृष्टि प्रसंगमे सक्तिनिर्माण कथन =
१७ ब्रह्माजीकं देहसे रातरूपाकी सृष्टि दक्षादिकी उत्पत्ति वणन
१८ दक्षके घर रिवाका सतीरूपसे प्रगट होना दक्षका शिवसे देष,
२ सतीका देहत्याग 4 ग
4| १९ दधीचसे दक्षको शापकी प्राप्ति, वीरभद्रकी उत्पत्ति
२० गणो सहित वीरभद्रका दक्षयज्ञ विष्वंस करना
“| २१ वहांसे विष्ण् आदिका गमन, अग्नि आदिका पलायन
ध २२ दक्षके पक्षपाती देवताओसे वीरभद्रका महासंग्राम देवताओंका
९१ विरूपहोना
९५२३ शिवकी स्तुति करने पर देवताओंका यथावत् होना, यज्ञसंधान होना
९ २४ मंदराचलमें शिवजीका तप करना, शुभ निरंभ दैत्योकी उत्पत्ति
उनकं वधकं निमित्त प्रवृत्त हुए शिवा शिवकी विचित्र टीला ....
२२| २५ शिवके काली कहनेपर रिवाका गौरी होनेके छ्य मंदरपव॑तपर
भि तपके तिमित्त गमन, व्याध्रका आना, ब्रह्माका गौरी हो' एेसा वर
२६ देना. व्याध्रको शिवभक्त करनेका वर मांगना ॥
२८| २६ पावंतीका शिवकं समीप आना कौशिकी देवीको संग ऊ
३२ ब्रह्याजीका स्वलोक गमन
अ० पृष्टां्काः | अ० पृष्ठांकाः
२७ मंदरपर शिवाकं जानेका उत्सव शिवका मिलन सिहपर शिवकी कृपा ६ ४ श्रीकृष्णके प्रति जगत्को गौरीशंकरसे अधिष्ठित वणेन करना .... १०
२८ संसारका अग्नीषोमात्मक वणेन, भस्म महिमा वणेन .. ६८ ५ इस जगतकं जीव पु ओर जगत्पति शिव पति ह इसका विस्तार
२९ वाणी ओर अथैके समान विर्व ओर रिवका सम्बन्ध,ष डध्वस्वरूप वणेन श ~“ १०४
कथन न ... ६९|| ६ जीवोको माया अहंकारादि बंधन हँ शिवको नहीं हे .... १०६
३० शिवतत्त्व ज्ञान विषयक ऋ षियोका प्रन ... ७१|| ७ जैसे अग्निसे स्पुलिग निकलते हं इस प्रकार शिवसे अनन्त शक्तियो
३१ उत्तरे वायुका विशु शिवतत्त्व कहना ~ ७५ प्रगटहोतीहै ~ पः ~. १०८
३२ मोक्षसाधने शिवज्ञानही साधन है अन्य नहीं यह् कथन .... ७९ ८ शिव तत्त्वका ज्ञान वेदान्त ज्ञानके ही अधीन है, प्रसंगसे व्यासावतार
३३ पाशुपत व्रत कथन, भस्म महिमा वणेन ~ ८२ क्नु त ~“ ११०
३४ उपमन्युका शैवागमतत््वज्ञान पूवं जन्म वृत्त कथन, विभूतिलाभ .... ९ युगयुगमें शिवकं योगावतारकाव्णन ~ ११२
३५ शिवका इन्दररूपसे उपमन्युके समीप परीक्षार्थं आगमन ओर वरदान १० गौरीके प्रति शिवका भक्तिस्वरूप फ साधन वणन न ९६.
देकर स्वलोक गमन 2 ... ९०|| ११ ब्राह्मण तथा इतर वर्णोका अधिकार कथन .... ११७
ूरवंखण्डकी पूति । १२ (नमः शिवाय इस पंचाक्षर मन्त्रका माहात्भ्य वणन + 1२२8
१३ किमे भी इस मन्त्रके जपसे शिवलोककी प्राप्ति होती है ~ 2२8
वायुसंहिता उत्तरभाग । १४ पंचाक्षर मंत्रका जप विधान कथन ९
१ पृत्रकी कामनासे तपके निमित्त गये कृष्णको उपमन्युका साम्बशिवके १५ शिव दीक्षा विधान गृ माहात्म्य वणेन „+ ¦ १९९
संतोषके निमित्त व्रत उपदेश करना कृष्णकी साम्बपत्रकी प्राप्ति... ९४ १६ रिवदीक्षा, शिष्य संस्कार वर्णन .. १३३
२ ऋषियोके अनुरोधसे वायुका पाशुपत ज्ञानकी सवशरटप्ता कहना ... ९५| १७ गृटको शिष्यकी योग्यता तथा षडध्वका विचार करना चाहिये
३ यह सब जगत् शिवमय है सवके उपकार करनेसे शिव॒सन्तुष्ट षडघ्व लक्षण तथा दीक्षा प्रकार वणेन ... १३७
होते हे इस प्रकार कृष्णके प्रति उपमन्युका उपदेश ~“ ९८ १८ षडघ्व शुद्धि दीक्षा विधान वणैन ... १३९॥
| 9 पृष्ठकः | भ० पृष्ठाकाः
॥१५॥ | १९ साधक संस्कार ष माहात्म्य वणेन, जप तथा फलादि वणंन .... १४२्| ३२ शिवशास्त्रमे कथित इस लोककी बरदायक पूजा पदति ... १८२
॥ २० आचा्य॑का हिष्यको अभिषेक करनेका प्रकार १४४] ३३ परलोक फलदायक सिद्धि कथन ५
1 ¢ २१ नित्य नैमित्तिक कमं कथन, सूंपूजा पचयज्ञ प्रकार कथन .... १४५३४ लिगनेरकी प्रतिष्ठसे सिद्धि, प्रतिष्टाविधि वणेन 1 ह र
२२ व्यासा वणन, मातृका न्यास षडगन्यास प्रकार .... १४७ ३५ विधि विष्णुकी मोहनिवृत्ति, लिगघरूजा प्रवृत्ति “` बी 7
र व ५ ्रत्येकका स्वरूप ॥ ~. १५१ ३७।३८ योगमागे वणेन क -" १९८।२०२ || #
२५ (न ( ५. ९९ . ३९ शिव ध्यान योगका वणन उसके भेद स्वरूपादि + "2 £
२६ शिव ( दूजास्“महापाप् ए -... १५८| ४० नैमिषारण्यसे ऋषियोकी यात्रा काशीमें आकाशम तेज देखकर
२७ अग्निकायं मे कंडादिका कथन म द्रव्य संख्यादि कथन ^ बरह्याजीकं समीप ऋषिथोका गमन, ब्रह्माजीका उसे दौ वतेज कथ ट
3 न £
ठ २८ व स्थिति व नैमित्तिक विधि कथन ~ करना ५ ` ह
२९ वि कं अनुसार उभयकाक साधक काम्यकम॑की प्राप्ति... १६६| ४१ ऋषियों के प्रति ोवज्ञान देकर स्कन्दसरोवरसे विधिका रिवलोक ट
३० शेवावरण पूजा तथा उसका फल का शिवलोक
८ 1 १६८] गमन शिवपुराण माहात्म्य निरूपण त ©
२१ पु ह कथन .... १७३ इति वायुसहिता
भा. गी. | इति श्रीभाषाटीकासहित शिवषहाष्राणालुक्रमणिका समापा
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दोहा-गौरि मिरा गणपति गिरिश, गरु गंगहि शिरनाय ॥ शिवमाहात्म्यं भाषा तिठक, जनहित छिखत बनाय ॥ १ ॥
|
ह| शौनकजी बोडे हे सजी ! महापंडित सव सिदधान्तके जाननेकाे महाभभो ज्ञे आप विशेषकरके एराणोंकी कथाका सार सुना ॥ १॥ सथन भक्तिते |
टै || विवेक किंसमकार बृदधिकौ भप्त होता है सत्नन अपने विकार किंस प्रकार शोधन करते ह सो आप कहिये॥२॥ इस घोर कियुमें जीव असुरताको 2
है | हुए है उनके शोधनका प्रकार क्या है, सो भाप कहिये॥२॥ जो स्तु परम ओर उत्तम कल्याण दायके जो पावनोंकीभी पावन तथा उत्तम साधन ट
ह| श्रीगणेशायनमः ॥ श्रीशौनकडवाच ॥ ददेसूतमहागाज्ञसर्वसिद्धान्तवित्मभो ॥ आस्याहिमेकथासारंपुराणानांविरे ||
| षतः॥ १ ॥ सपुत्रायाश्चसद्धक्तेविवेकोवर्दतेकथम् ॥ स्वविकारनिरासश्चसननेःक्रियतेकथम् ॥२॥ जीवाश्वासुरतांपाप्ताःा ||?
|| यो घोरेकलाविह ॥ तस्यसंशोधनेकिदिविद्यतेपरमाऽयनम् ॥ ३ ॥ यदस्तिवस्तुपरमंभरेयसभरियउत्तमम् ॥ पावनंपा ||
$.
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५
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ट| वनानांचसाधनंतद्रदाशरना ॥ ४ ॥ येनतत्साधनेनाञ्ुद्यध्यत्यात्माविशेषतः ॥ शिवप्राप्निवेत्तातसदानिम्परुचेतसः॥ 4 ॥
मूत उवाच ॥ धन्यस्त्वेखनिशादूल श्रवणप्रीतिलारसः ॥ अतोविवचारय्यसुधियावव्मिशाघ्चं महोत्तमम् ॥ ६ ॥ सर्ववसिद्धान्त
६ निष्पननभक्तयादिकविवद्धनम् ॥ शिवतोषकरंदिव्यश्रणुवत्स रसायनम् ॥७॥ कालम्यार्महाजासविष्वंसकरयुत्तमम्॥ शेवंुराणे
परमंरिवेनोक्तपुराघुने ॥ ८ ॥ सनत्छुमारस्यसनेरूपदेशात्परादगत् ॥ व्यासेनोक्ततुसंक्षेषात्कखिजानांहितायच ॥ ९ ॥
होय वह आप् हमसे किये ॥४॥ जिस साधने शीघ्री आत्मा शुद्ध होजाता है. हे ताव! शदा निभैलचित्तवारोंको शिवकी भाषि होतीहै॥५॥सूतजी ४
ठ
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बोरे; हे सनिभेष्ो! तुम धन्य हो जो कथा श्रवण करने तुम्हारी भीतिहै इस कारण गर बद्धे विचारकर इसउत्तम शाको कहता ह ॥६॥ सव सिदत
क्त मक्तिआदिका बढानेवाा शिवका संतोष करनेवाला परमदिव्य रसायन हप ॥७॥ काठहपी महासप॑का विष्वंसकलेवाङा प्रभोत्तम शिषषराण है
हे सने ! यह शिवजीका कहा है ॥८॥ ओर सन्कुमारस॒निके उपदेशसे कखिुगी प्राणिथोंके भिमित् व्या्तजीने इसको शंकते कहा है ॥९॥
शिण्ड || हे उने! इस शिव्राणते अधिक कथियुगी मदप्योके मनका शुद्ध करनेवाला दूरा ऽराण नहींहै॥ १ ०॥ जिसन जना परम बहे बद ण्य किंयेईउसकं |
॥ १ | ||| श् शिवषराणके सुननेमं महाभीतिहोतीै॥११॥ यह शिवटराण परम उत्तम शासै पृथ्वीम यह शिवरूपजानना आदरसे इतका सदासेवन करना चाहिये ट |
|| ॥१२॥ इसके पठने सुननेसेमलप्यको भष भक्तिमान् होकर शीघही शिव साधनरूप परमपदकी भाति होती है ॥१३॥ इस् कारण सब भरकारमे मयु- £
त ष्योंको इस्तका पढना उचित है ओौर इसके प्रेमे पठनेसेभी सव कामनाओंकी पापि होती है ॥ १४ ॥ शिवषुराण सुननेसे मलुष्य पाप्रहित हो ‡
| || एतस्मादपरफिचित्पुराणाच्छैवतोषुन॥न विद्यतेमनःदुदधथैकलिजानाविशेषतः॥१०॥ जन्मान्तरभवेतुण्यंमहततस्यसुयीमतः ॥ || |
|| तस्यप्रीतिभे्॑त्तजरमदहाभाग्यवतोभुने॥११॥ एतच्छिवपुराणदिपरमेशाघ्चघुत्तमम् ॥ शिव्पं क्षितौज्ञेयंसेवनी्यचसर्व्वथा ॥१२॥ ठै
&|| पठनाच्छरषणादस्यभक्तिमात्नरसत्तमः ॥ सद्यःशिवपदप्राप्तिलमतेसरव्वसाधनात् ॥१३॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेनकांक्षितंपठनेनृभिः॥ |£ |
&|| तथस्यश्रवणप्रम्णासर्वकामफलप्दम्॥१७॥ पुराणश्रवणाच्छम्भोनिष्पापोजायतेनरः॥ भुक्त्वाभोगान्सुविषएुलाञ्छिवरोकमव |||
|| प्वयात् ॥१८५॥ राजसूयेनयत्ुण्यमगिष्टोमशतेनच ॥ ततपुण्यंरभतेशम्भोःकथाश्रवणमाजतः ॥१९॥ येशण्वन्तिसुनेरोवपुराण || | |
|| शाघ्नष॒त्तमम् ॥ तेमवष्यानमन्तभ्यारदराएवनमंशय ॥१७॥ ण्वर्तात्फुराण हितथाकीतेयतां चतत् ॥ पादाम्बुजरजास्येवतीथां टै
0 निथ्चनयोषिदुः ॥ १८ ॥ गन्तनिःश्रयसंस्थानयेभिवाञ्छतिदेहिनः ॥ शेवम्पुराणममलरुभक्त्याश्रृण्वन्तुते सदा ॥ १९ ॥ ४।
माह ^ ||| जाता है ओर अनेक भोगकर अन्तम शिवलोकको जाता है ॥ १५॥ जो ण्य राजसूय यज्ञ सा अश्िष्टोमसे होता है, वह फ शिवकी कथा ||
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भरवणमातरसे होता है ॥१६॥ हे सने ! जो उत्तम शिवएराण हुने है वे मलुष्य नहीं किन्तु रशदरह्प है इसमं सन्देह नहीं ॥१७॥ इसके श्रवण ट
ओर कीर्तन करनेवाछोके चरणोकी रज तीर्थरूप हे रेता छनियोनि कहा हे ॥१८॥ जो प्राणी कल्याण स्थानम जानकी इच्छा करते हँ वे भक्तिसे |
नित्यपरति शवक निमे एराणको श्रवण करं ॥ १९ ॥
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यदि सब कारु सुननेको असमथ हो तो नियमित होकर दो घडी सुना करे॥२०॥ ओौर यदि प्रतिदिन सुननेको असम्थंहो तो प्रित ६ |
शिवषराण सुने ॥२१॥ एकंस॒हूतं उसका आधा वा उससे भी आधा वा क्षणमात्रकोभी जो शिवषराण सुनते है उनकी दुर्गति नहीं होती ॥२२॥
हे खनीश्वर ! जो इस एराणको सुनते है बह करमरूपी महावनको भस्मकर संसारम तर जाते ॥२३॥ हे सने! जो पण्य संपूण उन यज्ञो होता
हे बह फर शिवधराणकै भ्रवणसे अवध्य पराप्त होता है ॥ २४ ॥ विशेषकर कषियुगमे शिवष्राणके सिवाय दतरा धर्मं मल्योको खक्तिस्राधन
करनेवाठा नहीं है ॥ २५॥ शिवषुराण श्रवण वा उनका नाम संकीतन कल्प ॒वृक्षके समान मलु्योको फठका देनेवाला है इसमे सन्देह नही
सदाश्रोतंययशकृतोभवेत्समुनिसत्तम॥ नियतात्माभरतिदिनश्णयादवमृदूतंकम्॥२०॥ यदिप्रतिदिनंश्रोतमशक्तोमानवोभवेत् ॥
एण्यमासादिषुभृनश्रणयाच्छिवपुराणकरम्॥२१॥ मुहूतं वातदर्देवातद्दधवक्षणचवा॥ येशरृण्वन्तिपुराणेतत्नतेषां दग ति्वेत्॥ २२॥
तत्पुराणचश्चणवनःपुरुषोधोषुनीश्वर। सनिस्त्रति ससारद््ध्वाकर्ममदाटवीम्॥२३॥ तत्पुण्येस्दानेषुसर्वयज्ेषुवाघुने॥ शम्भोः
पुराणश्रवणात्तत्फलंनिशचलमवेत् ॥ २४ ॥ विशेषतःकलौ शेवपुराणश्रषणाहते॥ परोधर्मोनपंसांदिभुवितसाधनञ्न्सुने॥ २५ ॥
प्राणश्रवणशम्भोनामतेकीरतन॑तथा॥कलपदुमफलसम्यङ्मठष्याणां नसं शयः॥ २६ प
हितस्यविदधेशम्धुःपराणाख्यसुधारसम्॥२७॥एकोऽजरामरःस्दवेपिकत्रेवायतं मान् शम्भोःकथाूतंङयौतछुरुमेवाजरासरम्
॥२८ ॥सदासेव्यासदासेम्यासदासेम्याविशेषतः ॥एतच्छिवपुराणस्यकथापरमपावनी॥२९ ॥एतच्छिवषुराणस्यकथाश्रवणमात्रतः॥
कितरषीमिफरेतस्यशिवश्चित्तेसमाश्रयेत्२ ° चतुविंशतिसादसोयन्थो्यसपसंहितः ॥भवितिजिकसुसंपूणैःश्णुयात्तं परादरात्॥३१॥
॥२६॥ कटिपुगमे जिन दुमेषी परुषोने अपना धमं त्याग दिया है उनको भी यह सुधाहपौ शिब्राण हितकारक है ॥२७॥ जो परुष इस अमृतका
पान करता है वह अजर अम्र हो जाता है । शम्भुकी कथा हपी अमृतसे कको अजर अभर कर देता है ॥२८॥ विशेषकर इसको सदा सेषे इस
शिवराणकौ परमपावनी कथा है ॥२९॥ इस शिवष्राणके कथाश्रवण माजसेही जो फ होता है वह मै कया वणन करू शिवम अपना भन
सम्पण कर द ॥ ३० ॥ यह प्रथ चोवीससहस् श्टोको सातसंहितायुक्त है, भक्ति ज्ञान पैराग्यके सहित इसको प्रम आदरे सुने ॥ ३१ ॥
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शि. | परहिढी वियेश्वरसंहिता, दूषरी रुदरसंहिता, तीसरी शतरुद्रिय, चौथी कोरिरुद्रसंहिता ॥ ३२ ॥ पां चवी उमासंहिता, छदी कैठाससंहिता ओर
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॥ २॥||| || हातवीं बायसंहिता, . इस भकार यह सात संहिता है, यह सातं संहिताओकि अन्तगैत है ॥ ३३ ॥ इन सात संहिताओंके सहित. दिव्य शिव ं
& || पराण वर्णन किया है यह बहतुल्य सर्वोपरि गति देनेवाला कहा गया हं ॥ ३४ ॥ इस प्राणकी सात संहिताओंको ५ । पूणे पठता ||
¢ है वह जीवन्धुक्त कहा जाता हे ॥ ३५ ॥ हे खने ! यह भाणी अज्ञाने तभीतक संसारम भ्रमता हे जवतक शिवधराण चर नहीं होता ह ||;
छ विधेश्वरसंहिताययाद्वितीयारढसंहिता ॥ततीयाशतर्दराख्याकोटिशदरा चतुथिका ॥ २ २॥षञचम्युमासंदितोक्ताषष्टीकैलाससंदिता॥ 7
( सप्तमीवायवीयाख्यासपतवैसंहिताइह ॥२३॥ ससप्तसंहितंदिष्यपुराणशिवसंज्ञकम् ॥ व्रीवतिं ब्रह्मतुल्यसर्वोपरिगतिप्रदम्॥२९॥ ट
ट एतच्छिवूषराणंहिसप्तसंहितमादरात् ॥ परिपर्णपठे्यस्तुसजीवन्सुक्तउच्यते ॥ ३९ (0 ॥ /
६ यावत्कर्णगतनास्तिपुराणशेवसुत्तमम् ॥२९॥ किशतेवहमिश्शानेःपुराणेश्भमावहः ॥ शेवम्पुराणमेकंहिक्तिदानेनगजंति॥२७। ४
९ एतच्छिवपुराणस्यकथाभवतियद्े ॥ तीर्थधरतंदितदेदवसतां पापनाशनम् ॥२<८॥ अनवमेथसदस्लाणि वाजपेयशतानिच ॥ कलं ||.
6 शिवपुराणस्यनार्हन्तिखलषोडशीम् ॥ ३९ ॥ तावत्सप्रोच्यतेषापीपापञन्युनिसत्तम ॥ यावच्छिवघुराणदिनश्रणोतिञ्चभक्तितः ||
॥ ९० ॥ गंगाद्याःपुण्यनदययशसप्तपु्यो गयातथा ॥ एतच्छिवपुराणस्यसमतांयान्तिन कंचित् ॥ ४१ ॥
३६ ॥ दस्र शाब ओर विविधः विंषयके प्राणे कया है एक शिवष्राण सुक्तिदानसे सर्वोपारे गजता हे ॥ ३७ ॥ जिस घरमे इस शिव
पुराणकी कथा होती हे बह षर तीरथूप है वहां रहनेसे पापनाश होता हे ॥३८॥ सहच अश्वमेध सौ वाजपेय शिवषएराणकी सोलहवीं कलाके समान
नहीं है ॥ ३९ ॥ हे सुनिशरष्ठ ! तमीतक पापी पापकारी कहा जाता है जबतक वह भक्तिसे शिवएराण नहीं हुनता ॥ ४० ॥ सहच गगादि
र| सात नदी ओर स्षातरी तथा गया इस शिवषएुराणकी समताको पराप्त नहीं होती ॥ ४१ ॥
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£ जो परमगति ङी इच्छा करे वह भक्तिसे नित्यही शिबषुराणफा एक या अं श्ोक पडे ॥ ४२ ॥ इस शिवपराणको जो भक्तिसे | ४
ओर नित्य सुनता है बह पुण्यात्मा है इसमे सन्देह नहीं ॥४३॥ जो बुद्धिमान अन्तकालरम भक्तिसे इसको पदता है शिवजी पसन्नहो उसे अपना
पद भ्रदान करते है ॥ ४४ ॥ जो आद्रे नित्य इस शिवराणका पूजन करते ह वह यहां सब कामनाओंको भोगकर अन्तम शिषएरको ठ
जते है अथौत् शिदपदकी भाति होती है ॥ ४५॥ आरस्यरहित हो इस शिवएराणको नित्य पठनेसे पद्रवश्चादिका नित्य सत्कार करनेसे
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नित्यशिवपुराणस्यश्कोकंश्ोकाद्धेमेवच ॥ स्वसुखेनपठेद्रक्त्यायदीच्छेत्परमां गतिम् ॥४२॥ एतच्छिवपुराणयोवाचयेदर्थतोऽ
निशम् ॥ षडेदराप्रीतितोनित्यंसपुण्यात्मानसंशयः॥४३॥अन्तकाठेदियश्चनं श्रणयाद्वक्तितस्सुधीः॥ सुप्रसत्नोमहेशानस्तस्मेयच्छ
तिस्वम्पदम् ॥४४॥ एतच्छिवपुराणयःप्ूजये्नित्यमादरात्॥ स थुक्त्वेहाखिलान्कामानन्तेशिवपदं रमेत् ॥ ७९५॥ एतच्छिवपुरा
णस्यङव्व॑त्नित्यमतन्द्रितः॥ पटवश्नादिनासम्यकसत्कारंससुखीसदा ॥ ४६ ॥ शेवं पुराणममकंरौवसर्वस्वमादरात्॥ सेवनीयप्रय
त्नेनपररेदसुखेप्सुना ॥७७॥ चतु्वर्गपरदंशवंषुराणममरुपरम् ॥ शरोतव्यंस्वदापीत्यापटितव्य॑विशेषतः॥७८॥ वेदेतिहासशा
रषु प्रभेयस्करंमहत् ॥ रवम्पराणंविज्ञयसर्व्वथादिषुसश्चभिः ॥४९ ॥ शवंपुराणमिदमात्मविदांवरिषसेव्यसदापरमवस्तसतां
समच्य॑म्॥ तापत्रयामिशमनसुखदंसदेव प्राणपभियविधिहरीशमुखामराणाम् ॥ ५० ॥
सदा सख मिरता है ॥ ४६ ॥ यह शिषश्राण परमनिमर है यह स्स्व है आदरे शतको पठे जिते दोनों रोके सुखकी इच्छा हो ॥४७॥
यह निमे शिवषएराण चतुदगंका देनेवाखा हे इसफो सदा प्रीति पढना ओर सुनना चाहिे ॥ ४८ ॥ वेद इतिहास ओर शाम यहं परम-
भरेयका करनेवाला हे स॒रुओंको सदा शिदषराणको जानना चाहिये ॥ ४९ ॥ यह शिवषराण आत्ज्ञानियोके निमित्त अस्यन्त भेष्ठ ह यह
परमस्तु सदा सेनी चाहिये पह सतुरुषोको पूजनीय हे तीनों तापनाशक सदा एुखदायक मला हरि देवतादिकोंको प्राणोके समानभिय है॥५०॥
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न भ्र्न ह्य शिवषराणको सदा भणाम करता हं शिवजी इसे भसन हौ अपने चरणोंकी प्रीति दं ॥ ५१ ॥ इति श्रीस्कान्दे महापराणे शिव-
हे महाभाग सूतजी ! परमाथ के जाननेवाछे ! आप धन्य हो यहं
फराणमाहातम्ये तन्महिमवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ शौनक बोरे") ह 1 |
7 छृपाकर आपने अद्भुत कथा सुनाई ॥ १ ॥ पापनाशिनी मनकी शुद्ध करनेवाली वथा शिवके संतोष करनेवारी परमकथा हमको सुनाई ॥२॥
¢ इस कथाके समान पृथ्वीम कुछ नहीं है आपकी कपासे यह हमने निश्चयं जान छिया ३ ॥ ३ ॥ हे सूत ! कलि इस कथा से कौन कौन शुद्ध |
|| वन्देशिवप्रणंहिसन्बदाहंमसन्नधीः॥ शिवश्रसन्नतांयायाद्यातस्वपदयोरतिम्५१३ि श्ीस्कान्देमदापुराणेशिवपुराणमादातमय
र| तन्मदिमवर्णननामपरथमोऽष्यायः॥ १। ।शौनकउवाच॥ सूतसूतमहाभागधन्यस्त्वंपरमार्थवित्॥ अदधतेथकथादिव्याश्राविताङ्षया
् हि नः ॥१॥ अधौघविष्वसकरीमनःदयुद्धिविधायिनी ॥ शिवसन्तोषजननी कथेयं नः शुताद्भता ॥२॥ एतत्कथासमाने नयुवि कि
र चित्परात्परम्॥ नि्थयेनेतिविज्ञातमस्मामिःकूषयातव ॥३॥ केकेविष्ुष्यन्त्यनयाकथयापापिनःकृरौ ॥ वदतान्दरूपयासूतङृताय
थुवनंक₹॥ 9 ॥ सूतउवाच॥ येमानवाःपापकृतोडुराचाररताःखलाः ॥ कामादिनिरतानित्यंतेऽपिञ्चुध्यन्त्यनेन वे ॥ ५ ॥ ज्ञान
यज्ञःपरोयंवैथुक्तिसुक्तिपरदस्सद्।॥शोधनस्सवपापानांशिवसन्तोषकारकः॥&। ।तृष्णाङलास्सत्यदीनाःपितरमात्विदूषकाः॥दाम्मि
कादिसकायेचतेऽपिङ्चध्यन्त्यनेनै॥७॥ स्ववणोश्रमधरमेभ्योवजितामत्सरान्विताः॥ ज्ञानयज्ञेनतेऽनेनसम्पुनन्तिकखावपि ॥८॥
४ होंगे यह आप् कृपाकर कहो संसारको ङताथं करो ॥ ४ ॥ शतजी बोरे-, जो मलुष्य पापी दुराचारी खल कामादिमं निरत हवै भी इससे ¢
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शुद्ध हो जांयेगे ॥ ५॥ यह प्रमभुक्ति क्तिका देनेवाला ज्ञानयज्ञ है सव पापोंका शोधकं ओौर शिवका सतोष करनेवाला हे ॥ ६ ॥ तृष्णा
आकु सत्य से हीन पिता माताके विदूषक दाम्भिक तथा हिक इससे शुद हौ जाते है ॥ ७ ॥ जो अपने वणं आश्रमकै धर्मे रहित
मत्सरी हँ वे किमि भी इस् ज्ञानयज्ञ से तर जयेगे ॥ < ॥
जो छल्छंदौ हूर निर्दयी है वे भी कणिमि इस त्ञानयङसे तर जायेगे॥९॥ जो नाहणों के पनस शष्ट हए व्यभिचारी है वे मी कठिमिं इसज्ञानयज्ञे
तर जयिगे ॥१०॥ जो सदापापी शद दुराशावाठे ६ वेभी कलियुगे इस ज्ञानयज्ञसे तर जायेगे॥११॥ मीन दुबदि शान्त देवताओके दव्य खानेवाले
ककिगुगम इस ज्ञानयज्ञसे तर जायेगे॥१२॥ इस राणका ण्य महापातक नाश करनेवाला है भुक्ति सक्तिः ओर शिव संतोषका हेतु ह ॥१३॥
इसमे एक प्रातन इतिहास कहते है जिसके सुननेसे पाप हानि ओर बडा फर होता है ॥१४॥ किरातनगरमे एक ज्ञानदु्बल बाह्मण रहता था
छलच्छदयकरायेचयेचक्ूरास्सुनिर्दयाः॥ज्ञानयत्तेन तेऽनेनसम्पुनन्तिकरवेपि ॥९॥ ब्रह्मस्वपुश्टास्सततंग्यभिचाररताश्च ये॥ज्ञानय
ज्ञेनतेऽनेनसम्पुनन्तिकलावपि॥१०॥ सदापापरतायेचये शटातिदुराशयाः॥ ज्ञानयज्ञेन तेऽनेनसस्पुनन्तिकलावपि॥११॥मखिना
दुधियःशान्तादेवतादरव्यभोजिनः॥ ज्ञानयज्ञेनतेऽनेनसम्पुनन्तिकलावपि ॥१२।पुराणस्यास्य पुण्यंसन्महापातकनाशनसूभुक्तिख
क्तिप्रद॑चैव शिवसन्तोषहेतुकम् ॥१३। अत्रेवोदादरन्तीममितिहासंपुरातनम् ॥ यस्यश्रवणमत्रेणपापहानिभैवत्यलम्॥। १४॥
आसीत्किरातनगरेग्राह्मणोज्ञानदुबलः॥दरिदरोरसकिक्रेतादेवधर्पराङ्खुखः॥ १५ सन्ध्याक्षानपरियिष्ोवेश्यृत्तिपरायणः। देवराज
इतिख्यातोविश्वस्तजनवश्चकः॥ १६॥सविप्रानक्षत्रियान्वैश्याज्चवांश्वापितथापरान् ॥ हत्वानानाभिषेणेबतत्तदनमपाहरत्॥ १७॥
अधर्माद्रहुवित्तानिषश्वात्तेनाजंतानिवे ॥ नध्मांयधनन्तस्यस्वर्पश्चापीदपापिनः॥१८॥ एकदैकतडागेखस्नातयातोमरीसुरः ॥
वेश्यांशोभावर्तीनामदष्ातत्रातिविहकः॥ १९॥स्ववशधनिनंविपरज्ञात्वाह एाथसुन्दरी॥वातांखपेनतचित्तंपीतिमत्समजायत।।२०॥
बह दरिद्री रसका बेचनेवाका देवधमेसे परास था ॥१५॥ सन्ध्या स्नानस ष्ट वैश्यदृ्तिमे परायण देवराजनाभ विश्वासी जनोका ठगनेवाला
धा ॥१६॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र तथा अन्यजातिको भारकर अनेक भरप॑चसे उनका धन ऊ केता ॥१७॥ ओर जितने अधस बहते धन
कटे किये है, जिस पापीका धन कभी कुछमी धर्मम नहीं लगा है ॥१८॥ एक् समय वह बाह्मण तडागभं ज्ञान करनेको गया वहां एक भावतीनाभ
पैश्याको देखकर वह विद्र हौ गया ॥१९॥ दह भुन्दरी उस धनी बाह्मणको अपने वशय देखकर भसन्न इड ओर पाती रापसे उक्का चि्भी भीतिभान्
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हो गया ॥२०॥ उस्ने उसे सरी ओर उस्तने उरे पति समज्ञा इस भकार वह कामके वशीमूत होकर बहुत कारत्क विहार करे हए ॥२१॥ आसन शयन्
प्रान भोजन क्रीडामे चवीभरुषोनि परस्पर समय विताया॥२२॥ मातापिता तथा पत्नीकषे वारंवार निवारित होकर भी उस्न पापात्मानं उन वृचन न मारन
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५ ॥२३॥ एक दिन शषा रात्रिम माता पिता ओर अपनी बहुको उसने सोतेमे मारडाला ओर उनका धन हरिया ॥२४॥ अपना ओर पिताका
ट| जो थन था कामासक्तचि् होकर ह सव उसने वेश्याको दे दिया॥२५॥वह पापौ अमकष्य वस्तुक भक्षण करता हभ मदिरा पीनौ इच्छा किंथ बह
६ चिथकर्वसताम्भेनेपरतिकर्तीचसातथा ॥ एवंकामवशौभूत्वाबहुकारटविजहतः॥२१। आसने शयनेपाने भोजनक्रीडनेतथा ॥ दम्पतीव
&| सदाद्रौतुवधृतातेषरस्परम्॥२२॥माजापिजा तथापतन्यावारितोऽपि पुनःएुनः ॥ नामन्यत वचस्तेषां पापवृत्तिपरायणः॥२३ एकदे
व्यविशद्रा्ौमातरंपितरवधूम् ॥ परसप्तानन्यवधीडष्टोधनन्तेषान्तथादरत् ॥२४
येदत्तवान्सर््वकामीतद्रतमानसः॥२५सोऽभक्ष्यभक्षकःपापी मदिरापानरालसः।एकपा्ेसदाभौक्षीत्सवेश्योब्र्मणाघमः)। २६॥
| कदाचिैवयोगेनभतिष्ठानयुपागतः॥ शिवाल्येददर्शासौतत्रसाधजनात्रूतम् ॥२७॥ स्थत्वातजचविभरोऽसौज्वरेणातिपरपीडितः॥
|| शश्रावसततंशेवींकथांविप्रषुखोद्गताम्॥ र८देवराजश्वमासान्तेज्वरेणा पीडितोषृत। व पिनोतोयमपरम्वलात्।२९॥
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|| तावच्छिवगणाःशभालचिश्लाशचितपाणयः॥ मस्मभासितस्वा्गाद्रा्षा्ितविभदहाः२० शिवलोकात्समागत्यङद्धायम परीयुः
ताडयित्वातुतददतास्तजयित्वा पुनःपुनः ३१ देवराजं समामोच्यविमानेपरमादधते॥ उपवेश्ययदादूताःकैखासंगन्तुसखत्सकाः॥ ३२॥
माहा ° | उसके साथ सदा एकपात्रे भोजन करता था॥२६॥ एकसमय देवयो गसे प्रतिष्ठानएरमे आया वहां साधुजनोति युक्तं एक शिवाख्यको
॥२७॥ वहां यह बाह्मण ज्वरसे पीडित हो स्थित हुभ वहां इसने ब्रा्ण खसे शिवसम्बन्धिनी कथा भवणकी ॥ २८॥ ज्वरसे पीडितहो वह देवराज
यमदूत पाश बंधनराप्र कराकर बलस यमष्रको ॐेगया॥२९॥ इसी समय तरिश हाथमे किये रिवके गण सर्वाङ्गम भस्म ठगाये शरीरमं राक्ष
पहरे ॥ २० ॥ शिब शोके आकर कोधे यमरीके भति गये उनके दूतोको ताडनकर वारंवार तजन कर ॥ ३१ ॥ उस सकरम डाय
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॥ आत्मनीनधनयज्पित्रादीनांतथाघनम्वेश्या |
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प्रमउत्म राजरभिहात्न मेँ बेकर वे दूत कैलाश्षपर ठेजानेकी इच्छा करने रे॥३२॥ उस समय यमरीमे महाकोठाहङ हभ पर्मराज उत
सुनकर अपने मंदिर से बाहर आपे ॥ २३ ॥ उन्होने साक्षात् रढरके स्मान वहां दूर दरतोको देखकर विधानपूक धर्मराजे उनका पूजन
किया ॥ ३४ ॥ ओर ज्ञानचक्षुसे यमराजने उनका सबदृनांत जान छिपा ओर भयके कारण महात्मा शिवके दूतो कुछ न कहा ॥ ३५ ॥
ओर वे पूजित होकर केटासको गये ओर पावतीकै. सहित शिवफो उते पापहानिकी इच्छासे दिया ॥ २६ ॥ परमपावनी शिवषराणकी कथाधन्य
तदायमपुरीमध्येमहाकोलादलोऽभवत् ॥ धर्मराजस्तुतंश्त्वास्वाख्याद्वदिरागमत्॥२३। ।दष्ट्ाथचतुरोदृतान्साक्षादुद्रातिवापरान्
पूजयामासधमेज्ञोधर्मराजोयथाविधि।॥ ३७ ज्ञानेनचक्षुषासर्ववृत्तान्तंज्ञातवान्यमः॥ नभयात्पृष्टवान्किचिच्छम्भोदृतान्महात्मनः।
॥३५]। पूजिताःप्राथितास्तेवेकेलासमगमस्तदा ॥ ददुश्शिवायसाम्बायतन्दयावारिराशये॥ २६॥ धन्याशिवुराणस्यकथापरम
पावनी॥यस्याःश्रवणमतरेणपापीयानपिषक्तिभाक्॥ ३७॥ सदाशिवमहास्थानंपरंधामपरम्पदम्॥ यदाहुवदविद्रांसःस्वैरोकोपरि
स्थितम्॥२८। ब्राह्मणा क्षत्रियवश्याः शूद्राअन्येपिप्राणिनः ॥ हिसिताधनलोभेनबहवोयेनपापिना ॥३९॥ मातपितरवधूहन्तावे
श्यागामीचमद्यपः।देवराजोद्विजस्तगत्वाभुक्तोऽभवतक्षणात् ० ।इतिश्रीस्कान्देयहाषएुराणेशिवपुराणमाहालभ्य देवराजसुक्तिवर्णनं
नामद्वितीयोऽध्यायः॥२॥ रौनकउवाच॥सूतसूत महाभागसर्वज्ञोऽसिमहामते॥। त्वत््रसादात्छृतार्थोहिकृता्थौहस्पुनःपुनः॥१॥
भी है जिसके श्रवणमासे पापात्माओंकी भी सक्ति होती है ॥३७॥ सदाशिबही महास्थानजौर परमधाम कहे हँ वेदजाननेवारे पंडितोने कहा
हे शिवटोक सब ठोकों ते ऊपर है ॥३८॥ बाह्ण क्षत्रिय वैश्य शद तथा अन्य दूसरे पाणी धनके लभतते मारने वाे ॥३९॥ तथा माता पिता
भायौके मारनेवाला देवराज ब्राहण क्षणे उस स्थानम जाकर युक्त हो गया ॥४०॥ इति भीस्कोंदे महाषराणे शिवएराणभाहात्म्पे देवराजमुक्ति
©
वणन नाम् द्वितीयोऽध्यायः २॥ शौनक बौ, हे महाभाग सत ! आप सर्वज्ञ ओर भहाुदधिमानहो आपके प्रसादे भ बारंबार रतार्थं हं ॥१॥ ||
भाहा०
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इस इतिहास्को सुनकर मेरा मन बहुत प्रसन्न होता है अन प्मबढानेवारी शिवजीकी अन्य कथा कहिये ॥ २॥ अभृतपान करनेवाछो को | |
लोकम ओर खक्ति क्या है शिवकथामृतपान भत्यक्षही क्तिका देनेवाला है ॥ २ ॥ शिवकी कथा धन्य भौर तुमभी धन्यहो जिसके श्रवण
करतेही भाणी शिबलोकको जाता है ॥ ४ ॥ सतजी बोरे;-हे शौनक ! रं तुम्हारे आगे परम द्य कथा वणेन करता हू-हे वेदवित्तम ।
नकट एक देशम बाष्कल नाम भ्राम था जिस वेदधरमेके छोढनेवाटे पापिष्ठी निवास
जिस्कारण किं तुम शिवभक्तो अग्रणी हो ॥५॥ सञदरके न
इतिहासमिमंश्चत्वामनोमेऽतीवमोदते॥। अन्यामपिकथांशम्भोर्वदपरेमविवद्धिनीम्॥ २ नामृतम्पिबतांरेकेषुक्ति.कापिस् भाञ्यते)।
शम्भोःकथाञ्चधापानंप्रत्यक्षघ्॒क्तिदायकम्॥३॥ धन्याधन्याकथाशंभोस्त्वंषन्योधन्यएवच।।यदाकणेनमत्रेणशिविलोकंरजेन्नरः ॥
॥९॥ सूतउवाच॥ शरृणुशौनकवक्ष्यामित्वदभरगुह्यमप्युत ॥ यतस्त्वशिवमक्तानामग्रणीवेदवित्तमः॥५॥ सञुद्रनिकटदेशेग्रामोबाष्क्
लसज्ञकः॥वसन्तियजपापिष्ठवेदधर्मोज्डिताजनाः॥& ॥ दादुर्विषयात्मानोनिरदैवाजिहवृत्तयः॥ कृषीवलाः शद्चधराः प्रम्ची
गिनःखलः॥७॥ज्ञानवेराग्यसद्ध्मनजानन्तिपरंहिते ॥ इकथाश्रवणादरेषु निरतापञजुडुदधयः॥८॥ अन्येवर्णाधङ्कधियस्स्वधम
विश्चखाःखलाः ॥ कुकर्मनिरतानित्यसदाविषयिणश्चते॥ ९॥च्ियःस्वीशङ्कटिलास्स्वैरिण्यः पापलारसाः ॥ इधियोग्यभिचारि
ण्यस्सदवृत्ताचारवजिताः॥१०॥ एवंङजनसंवासेभ्ामेबाष्कलसंज्ञिते॥ तवैको बिन्दुगोनासविप्र आसीन्महाधमः॥११॥ सदुरात्मा
महाषापीसदारोऽपिकुमारमगः ॥ वेश्यापतिबभूवाथकामाङुलितिमानसः ॥ १२ ॥ ।
करते थे ॥६॥ दुषटदुविषयी कटिलढतति निरदव जिहृतति खेतीकरनेवाठे शहबरुवारे परदीभोगी खठ ॥७॥ ज्ञान वैराग्य रुपी अपने धर्मक हैतुको
् जाननेवाडे वे पशबुदि कुकथा वण करने ही प्रीति करते थे कारण कि प्शुबुद्धि थे ॥<॥ दूसरे वर्णमी कुबुद्धि अपने धर्मेसे विख थे ३
लल सदा कुकर्मकरनेवारे विषयी थे ॥ ९ ॥ सव स्षी कुरिर ओर पापलारसावारी स्वैरिणी थीं व्यभिचारिणी सव वत ओर आचारे हीन
थीं ॥ ३० ॥ इस धकार कुजनसि पूणं उस बाष्करु भ्राम एक विंद्गनाम महाअधीं ब्राह्मण था ॥ ११ ॥ वह महाप्राप दरात्मा सीतहित
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था फिर कामत उ्याकुल चित्त हो वह वेश्यापति हुआ ॥१२॥ अपनी सहधिणी चैचुला पत्नीको छोडकर काभवाणसे पीडित हो |
रमने रगा ॥१३॥ इस भकार उस कुकर्भीको बहुत समय बीत गया वह चैचुखा कामाकान्त होकर भी अपने धर्मके भय ओर कठेशसे ॥१४॥ महा ट
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| तरुणाईको भर्त होकर महा विषम कामकी पीडाते अपना धमं छोडती हु ॥१५॥ जारे संगति कर रानि अपने धरमंसे विराभको भाप हुई पतिकी ||4
¢ दृष्टि बचाकर श्रषटसत्व ओर कुमागगाभिनी हो रहने लगी ॥ १६ ॥ किसी समय वह दुराचारिणी अपनी परत्नीको रात्रिक समय जारके सहित ठ
स्वपल्नींच॑चुलांनामहित्वानित्यसुध्मिणीम्॥ रेमेसवेश्ययादुष्टःस्मरबाणम्रपीडितः ॥ १३ ॥ एवंकारोग्यतीयायमहांस्तस्यङ्खक ५
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माद्विररामह ॥ १५ ॥ जारेणसंगताराज्ौरेमेषापेनगप्ततः ॥ पतिदिवथयित्वाभर्टसत्त्वाङमार्गगा ॥ १६ ॥ कदाचित्ताडरा ||
चारांस्वपत्नीचचुाने ॥ जारेणसंगतारा्ौददजंस्मरविह्वलाम्॥१७॥ दृ्टातादिनींपत्नीडकर्मासक्तमानसाम्॥जारेणसेगतां |
राजोक्रोधाइद्वाववेगतः॥१८॥तमागतगृेदु्टमाज्ञायबिन्दुगंखलः ॥ पलायितोदुतंजारोवेगतश्छद्यवान्सवे ॥१९॥ अथसबषिदुगः |©
४ मिणः ॥ सास्वधभभयात्वरेशात्स्मरार्तापिचचचुलखा ॥ १४ ॥ अथतस्याद्गनासापिप्ररूढनवयौवना ॥ अविषह्यस्मरवेशा स्वध
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ह को रात्रिक समय अपने षरे जया देख चखीकै संकेतसे दुह जार परायन कर गया, कारण कि छली था ॥ १९ ॥ तव वबिन्दुगने अपनी इध ||
ट| रिज प्नीक बरहण करके पूरसि पारंवार ताडन किया ॥ २० ॥ वह च॑चुखा अपने भर्तासि ताडिव होकर कोधसे निमय हो अपने पति &
२९॥ वली ॥२१॥ चचा कहने ट्गी-;भाप तो ्रतिदिनवेश्याके साथ रमण करते हो ओर तुम्हारी सवा यै भरतिदिन करती ह शे छोडतेहो ॥२२॥ ||
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निर्भया प्रादस्वपतिबिन्दुगंखलम् ॥ २१॥ ॥ चंचुरोवाच ॥ भवान्प्रतिदिनंकाधरमतेवेश्ययाङधीः ॥ मंविहाय स्वपत्नीच
पर्नीग्दीत्वासुदुराशयः॥ शु्टिबन्धेनसतज्य॑पुनःपुनरताडयत् ॥ २० ॥ सानारीताडिताभीचञ्खुरास्वैरिणीखखा ॥ पिता |?
युवतीं पतिसेविनीम् ॥ २२ ॥ ४
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देखता हुआ ॥१७॥ उस कुमागेम रत दुष्ठिनी अपनी भारक रात्रिम जारकै संय रमण करता देश्च कोषे दौडा ॥१८॥ उह विन्दुग नाक्चण
थर
जो रूपवती खा कामसे व्याकर चित्त है पतिके विहारके विना उनकी क्या गति होगी यह आप (0 से किये ॥ २३ ॥ भ भहाहूपवती
नवयौवना ओर बिहनलहं तुम्हारे संग हुए विना कामका दुःख किसपकार सहन कर॒ सकतीहूं ॥ २४ ॥ सतजी बोले -रता कहनेपर
|| बह मूषी नाह्षणीमे नीच अपने धर्मसे हीन पापी नीचमति कहने रगा ॥ २५॥ बिन्दुग नोखा-+कामसे व्याकु चित्त हे कान्ते म तेरे हितकी
् वातं कहवाहूं त उसको भय त्याग कर सुन ॥२६॥ तू निभेय चित्त हौकर जारके साथ रमण कर परन्तु उसे भन्न करके धनभी तौ ठे ॥२७॥
ठ इूपवत्यायुवत्या्चकामाङ्कणितचेतसः॥ विनापतिविहारस्यात्कागतिमभवान्वदेत्॥२३॥अहंमहाङपवतीनवयौवनविहला॥ कथ
| सहेकामदुःखंतवसङ्गविनातंपीः ॥२७॥ सूतउवाच॥ इतयक्तस्सतया मूर्खो मूढधीब्रह्मणोऽघमः वो 1
¢ विषखः खलः॥२५॥बिन्दुगउवाच ॥ सत्यमेतत्त्वयोक्तंहिकामव्याकुरचेतसा॥हितंवक्ष्यामितस्मात्तेशरणुकान्तेभयन्त्यज ५२६
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जारैकंहरनित्यंत्वचेतसानिभयेने ॥ धनमाकर्षतेभ्योिदत्त्वातेभ्यःपरारतिम् ॥ २७॥ तद्नेदेहिसर्वमेवेश्यासंसक्तचेतसः ॥
महत्स्वार्थभवेन्तूनतवापिचममापिच ॥ २८ ॥ सूतउवाच॥ इतिभंतैवचः थ॒त्वाचञ्ुखातद्वघूसा ॥ तथेतिमतैवचनेप्रतिजग्राह
दष्टीः ॥२९॥ कृत्वैवंसमयतौवेदम्पतीदुष्टमानसौ ॥ ककर्मनिरतौजातौ निर्भयेनकुचेतसा ॥३०॥ एवंतयोस्तुदम्पत्यो$ैराचार-
रृत्तयोः॥महान्काोग्यतीयायनिष्फलोगूढचेतसौः॥ ३१ अथविप्रस्सःकुमतिषिन्दुगोबृषलीपतिः ॥ काटेननिधनंपरप्तोजगाम-
नरकंखलः॥२२॥भु्तानरकदुःखानिबहहानिसमूढधीः ॥ विन्ध्येऽभवत्िशाचोदिगिरौपापीभयङ्करः ॥ ३३ ॥
ओर वह धन सबं सुन देश्यागामीके निमित्त प्रदान कर इसे मेरा तेरा दोनौँका स्वाथं होगा ॥ २८ ॥ सूतजी बोे;-यह वचन ट
चचुलाने कहा बहुत अच्छा ओर फिर महाप्रसन्न होकर ॥ २९ ॥ दोनों दुष्ट मन परस्पर परतिज्ञा कर निर्भय चित्ते महाकुकमीं होगये र
| ॥ ३० ॥ इत भकार दुराचारमे वृत्त हृए उन दोनों ली इ्षोको बहुत काल बीत गया ओौर वै मूढचित्त निष्फृठ रहे (| |
‰||॥ ३१ ॥ एक समय वह सूस वृषरीपति समय अलुसार शतयो भा होगया ओर नरकको गया ॥ ३२ ॥ बह सूलं बहुत ॥>५
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2 नरकका दुःख भोगकर विंध्यपवंतमे बह महापापी पिशाच बडा भयंकर हुआ ॥३३॥ जिस समय दुराचारी विंदुग मरगया वह मूख चचरी
बहुतकाठ एकि सहित घरमे रही ॥ ३४॥ ओर बरावर जारोके साथ रमण करती रही जब उस्ञ कामस भसन्न होनेवालीका कुछ यौवन बीत गया ॥३५॥
एकं समय देवयोगसे प्ण्यपवेके प्राप्त होनें वेधुजनोके सहित बह नारी गोकणक्ष्रको भाप हुईं ॥३६॥ भरसंगसे बह किसी एक तीके जलम £
ज्ञान कर बेधुजनोके साथ इष्र श्रमण करने रुगी ॥ २७ ॥ वहां किंी देवाय जाकर पंडितके उससे शिवष्राणकी कथा घुनी ॥ ३८ ॥
मृतेभरतरितस्मिन्वैदुराचारेऽथविन्दुगे ॥ उवासस्वगृहेपुरेशिरकारंविसूढधीः ॥३४॥ एव॑विहरतीजारेस्सानारीचन्त्ुलाह्वया ॥
आसीत्कामरताप्रीताकिञ्चिदुत्कान्तयौवना ॥३५॥ एकदादेवयोगेनसम्प्रात्तेपुण्यपर्वणि ॥ सानारी बन्धुभिस्सा्द गोकणी क्षेमा
ययौ ॥ ३६॥ प्रसद्गातसातदागत्वाकस्मिशिततीरथपाथसि सस्नौ सामान्यतो यत्रतत्रबधामबन्धुभिः ॥ ३७ ॥देवाखयेऽथ कस्मि
विदेवज्ञयुलतःशुभाम् ॥ शुश्रावसत्कथांशम्भोःपण्यांपौराणिकीचसा ॥२८॥ योषितताजारसक्तानांनरकेयमकिङ्राः ॥ संतपतको
हपरिषं क्िषन्तिस्मरमन्दिरे ॥ ३ ९॥ इतिपौराणिकेनोकतांत्वावेराग्यवा्देनीम् ॥ कथाभासीदधयोद्िभचकभ्पेत् साचै॥॥७०॥
कथासमाप्तौसानारीनिगेतेषुजनेषुच ॥ भीतारहसितंग्ाहरवंसंवाचकंद्विजम ॥ 9१ ॥ चंचुलोवाच ॥ बहन्स्व॑शृण्वसद्त्तमजान
न्त्यास्वधमेकम् ॥ अत्वामायुद्धरस्वामिन्कृषांकत्वाऽतुलामपि ॥ ४२॥ चरितसूर्बणंपपंमयासूढधिया भमो ॥ नीतंपौश्ल्यत
स्सर्वयौवनं मदनान्धया ॥४३ ॥
कि जो ची जारके संग रमणं करती है उस्षको यमकिंकर नरक ठेजाकर तप्त रोहका श्ल उसके फामस्थानये पवेश करते ै॥२९॥ इसथकार विराग
बर्भिनी राण कथा श्रवण करके महाभयसे उदिध हो बह वही भयते कभ्पित दं ॥४०॥ जव कथा पू हई ओर सव भलप्य चरे गयेतव वही नारी डर
कर उस कथार्वा चनेवारे बाहणसे एकान्तम पूढने उगी ॥४१।चेचुखा बोरी, हे नहु भाप यह जानिये किं भ॑ असद््तवारीहं भर वृत्तांतो घुन
बी कृपाकर सज्ञे उद्धार कीजिये ॥४२॥ भेर महापृणित चरित्र है ख सूढाने अज्नानते सव अपना यौवनं उ्यभिवारे गमादियां उभय मदान्ध
| हो गहं थी॥४३। आपके वैराग्यरस भरे बह कचन भ्रवणकरर्मे महाभयभीत द ह ओर भेरा हदय वियोगसे कम्पित ३।४४॥कामृसे मोहित चिन मूढ
बुदधिवाटी सुक्चको धिक्कार है जो मँ निंदित कुषर्ममे स्वधर्मसे विख होकर भराप्त हदं हू ॥४५॥ जो थोडे भुखके निमित्त अपने का्यके विनाश
करनेवाठे महाकष्ट देनेवाठे घोर कर्थम भदत्त ईं ॥४६॥ हा मँ कौ नसी घोर कष्टदायिनी दुगंतिको भाप हगी कुमा मन रगानेवाली मेरी रक्षा बहो
कौन करेगा ४७॥मरणको ्राप्हो इन यमदटू्तोको किस भकार देंगी जिस समय बह कठिन पाशोसे सचे ांेगे तव किसप्रकार युञ्चे विश्राम मिरेगा॥४<॥
धत्वेदवचनंतेयतेराग्यश्सनम्भितम् ॥जातामहाभयासादंसकम्पात्तवियोगिका॥४९॥धिद्मां सूटधियपापांकाममोदहितचेत्षम्॥
निन्यादुर्विषयासक्तांविशखीरिस्वधमेतः॥०५यदरपस्यसुखस्याथैस्वकायंस्यविनाशिनः॥महापापंकृतंघोरमजानन्त्यातिकष्चदम्
॥४६॥ यास्यामिदुगतिकांकांघोरांहाकष्टदायिनीम् ॥ कोज्ञोयास्यति्मांतजकुमागेरतमानसाम् ॥ ७ ॥ मरणे यमदूरतौस्तान्कं
न्द्रशष्येभयकरान् ॥कथपाशेषलात्कण्ठेबध्यमानाधृतिलमे ॥ ४८ ॥ कर्थसदिष्येनरकेखण्डशोदेदकृन्तनम् ॥ यातनांतजरमहतीं
दुःखदांचविशेषतः ॥ ४९॥ दिवाचेष्टामिन्द्रियाणांकथपराप्स्यामिशोचती ॥ रा्रौकथलमिष्येहनिद्रांदुःखपरिष्डुता ॥ ५० ॥
हाहतास्मिचदग्धास्मिविदीर्णहयास्मिच ॥ सर्वथाहंविनष्ास्मिपापिनीसर्वथाप्यहस् ॥ ९१ ॥ हाविषेमां महापापे दच््वादुश्शेषु
पीदठात्॥अपैतियतस्वधमद्विसर्वसोख्यकरादहो ॥५२॥ श्ुरप्रोतस्यशेलामात्पततस्तुङ्गतोदिज ॥ यद्दुःखंदेहिनोधोरंतस्मात्को
रिशुणंमम ॥ ५३ ॥ अश्वमेधशतंकृत्वागंगांस्नात्वाशतंसमाः ॥ नञ्जुदधिजांयतेप्रायोमत्पापस्यगरीयसः ॥ ५९ ॥ |
नरके जब देहके खण्ड सड होंगे वह सुजञसे कैसे सहाजायगा वहां तो बडी दुस्सह यातना होती है ॥४९॥ उनददरियोकी चेटा सोचती हुईं कैसे देगी
दुःखते युक्त हो भरात्रं कैम निद्राको भाप हूंगी॥५०॥ हा विदीणे हृदया हत ओर दग्ध होगदैहूं सव भकार मँ नषटहूईं कारण कि महापा पिनीहू॥ ५१॥ ्
| हा विधाता ! ह्मे स्च महापापे दूलद्धिदेकर क्याकिया! जो सबघुलोको देनेवारे अपने धर्मस रहिते करदेती है ॥५२॥ हे महातमन् शकते पोहनेपे पर्वते
॥ गिरने जो दुःखहोता ह सज्ञे उसे करोड खना है ॥५३॥ सौ अश्वमेध करके तथा सौ वर्गंगाज्ञान करकेभी मेरे बडे पापकी शुद्धि नहीं ्ोमी॥५४॥
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ओर मातापिता हो स्ने दीनका उद्धार करो मे तुम्हारी शरणहू॥ ५६ ॥ सतजी बोठे-+ जब इस प्रकार निवेदक प्राप हो वह चरणोमं गिरी | ट
कृपाकर उसे उठायब्राह्मणने कहा ॥५७॥ दति शरीस्कान्देमहाएराणेशिवषराणमाहात्म्येचचुावैराग्यवणनंनामतृतीयोऽध्यायः॥ ३॥ बाह्मणबोला- भाग्य ठ
| ज्ञानको भाप्त हुईं तेरे ऊपर शिवका अयुग्रह है जो तू इस शिवषराणकी वैराग्यवत् कथाको सुन ज्ञानको भाप हुं ॥ १ ॥ हे
किंकरोमिकगच्छामिकंवाशरणमाश्रये ॥ कष्चायतेमांरोकैसिमिन्पतन्तीनरकार्णवे ॥५९॥ त्वमेवमेगुरुवहास्त्वमातात्वंपितासिच॥
उद्धरोद्धरमादीनांत्तमेवशरणंगताम्॥५६॥ सूतउवाच॥इतिसंजातरनिरवेदापतिताश्चरणद्रये॥ उत्थाप्यङृपयाधीमान्वभाषिन्ाह्मणस्स
दि॥५७॥ इतिश्रीस्कान्देमहापुराणशिवपुराणमादात्म्येचचुराैराग्यवर्णनंनामतरतीयोध्यायः ॥३॥ बाह्मणउवाच॥ दिष्टयाकाछे
भरबुदधासिशिवायुग्रहतोवराम् ॥ शिवपुराणस्य श्रत्वावेराग्यवत्कथाम् ॥१॥ माभेषीरद्विजपलिनित्वंशिवस्यशरणंब्रज॥ शिवालथह
। कया करू कहां जाऊ किसकी शरणं टं नरक सागरम पडी हृद ञ्चे इसलोकमं कौन रक्षा करनेको समथ है ॥ ५५ ॥ हे बहन्! तुमही भेरे गरं
|
॥
तस्सर्वपा्पसद्योविनश्यति ॥२॥ व्ष्यामितेपरवस्त॒शिवकीर्तिसमन्वितम् ॥ भविष्यतिगतिर्थेनसर्वदातेखसावहा ॥३॥ सत्कथा
भरवणदिव जातातिमतिरीदशी ॥ पञ्चात्तापान्विताशद्धविराग्यविषयेष्च ॥ ४ ॥ पश्ात्तापः पापकृतां पाषानांनिष्छृतिःपरां ॥ 6
सवषां वणितंसद्भिस्सवंपापविशोधनम्॥५॥पात्तापेनेवशुद्धिःप्रायधित्तकरोतिसः॥यथोपदिष्टंसद्धििंसवंपापविशोधनम्॥६॥ $
दविजपत्नी ! मत उर ओर शिवकी शरणको पराप्हो शिवके अलुथह से शीघही सवके पाप नाश हो जाते ह ॥२॥ भ रिवकीर्ि सुकते परम ||
वस्तुका तेरे भति वणेन करताहूँ जिससे सवं प्रकार तेरी घुखदायकं गति होगी ॥३॥ उनकी सत्कथा भवणके तेरी रेस्ी भति इदं जो तू पथा
तापसे युक्तहो शुद्ध हदं ओर विषयो तुजे वैराग्य हुआ ॥ ४ ॥ जो पश्चाताप करता है यही परापोंकी प्रम निष्डति है विह्वानोनि ५
सब प्रकारके पापोकी शुद्धि कही है ॥५॥ जिसकी पथा्तापसे शुद्धि न हो वह भायधित्त करे, सतपरुषोने यथेष्ट सव पापोक। शोधन कहा है ॥६॥
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शि०ु । रूष अनेक प्रकारके भ्रायधित्त विधिपूर्वकं करके निर्भय नहीं होता किन्तु पश्वात्ताप करनेवाछा अवश्य सुगतिको प्राप्त होता हे ॥ ७ ॥ परन्तु ||
॥ ८ जैसी चित्तशुद्धि शिवध्राण श्रवणे होती है रेसी ओर उपायोते नहीं होती ॥ < ॥ जे गोधा हुजा देण निर्मेक हो जाता हे सीं भकार |> ,
¢ शिव्राणकी कथा सुननेवालेको अवश्य शुद्धि होती हे इसमे संदेह नहीं ॥ ९ ॥ विशुद्ध चित्तवाले मयुष्यके हदय पावती सहित शिव स्थित
© इते है तब वह विशुद्धात्मा शिव पार्वतीकै विशुद्ध छोकको जाता हे ॥ १० ॥ इस कारण स्षब वर्णोको यह कथा श्रवण करनी चाहिये इसी
कारण महादेवे इसको निर्माण किया है किं यह सब वेका साधक हे ॥ ११ ॥ इस कथाे गिरिजापतिका ध्यान सिद्ध होता है ध्याने
प्रायधित्तमधीङ्कतयविधिवत्निर्भयः पुमान् ॥ नयातिस्युगर्तिप्रायः पथ्यात्तापीनसंशयः॥७॥ एतच्छिवपुराणस्यकथाश्रवणतोयथा) ॥
| जायतेचित्तदुदधिर्दिनतथान्यैरूपायतः ॥ < ॥ शोध्यमानंदुषेणंहियथामवतिनिमखम् ॥ तथेतत्कथयाचेतोवि्ुद्धियात्यसंशयम्
९ ॥९॥ वि्ुदधेचेतसिशिवोगरणांतिषठतिसाम्बिकः ॥ ततोयातिविञचदात्मासाम्बशंभौः परंपदम् १०॥अतःसरवस्यवरस्येतत्कभा-
$| साधनं मतम्॥ एतद्थमहादेवोनिर्ममेत्वाग्रहादिमाम्॥११॥कथयासिष्यतिष्यानसनयागिरिजापते । ष्यानाज्ज्ञानंपरंतस्मात्कै
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वल्यं मवतिधुवम्॥१२॥असिद्धशंकरध्यानः कथामेवश्चणोतियः।सप्राप्यान्यभवेध्यानंशंभोयोतिषरांगतिम्॥ १३॥ एतत्कथाश्र
वणतः कृत्वाध्यानघुमापतेः॥ तेपश्चात्तापिनः पाषा बहवः सिद्धिमागताः॥१७।।सवेषाश्रेयसांबीजसत्कथाश्रवणंनृणाम्।। यथावत्मै
समाराध्यं मवबन्धगदापहम् ॥१५॥ कथाश्रवणतः शम्भोर्मननाच्चततोडदा ॥ निदिध्यासनतश्वेवचित्तशुद्धिभेवत्यलम् ॥१8॥ |£
माहा° ¢ ज्ञान ओर उत्से कैवल्य होता है ॥ १२ ॥ जि्षको शंकरका ध्यान असिद्ध ह यदि वह कथाको श्रवण करे तो उसको शिवका ध्यान परापत ||
अ= ४ |© || होकर प्रगति होती हे ॥ १३ ॥ इस कथाको भवणकर उभापतिका ध्यान कृरकै पृश्वाक्ताप करनेवाठेभी अनेक पापी सिद्ध हौ गये
|| ई ॥ १४ ॥ जो मनुष्य इत सत्कथाको सुनते ह वे सव ंगङ्को धराप्त होते है, यथायोग्य शिवका आराधन करनेते संसार रोग दू
>| जाता है ॥ १५ ॥ शिवकी कथा ्वणकर हदयमे मनन करनेसे तथा निदिष्यासनसे पुण चित्तशुद्धि हो जाती हे ॥ १६ ॥
इससे शिवके ऽतर अवश्य क्ति होती है इसके अलुबहते दिव्य भक्ति होती हे इयं सन्देह नहीं ॥ १७ ॥ इसके विना भायाम रगा हुआ ||
पशुवत् जानना बह कभी संसारवेधनसे यक्त नही होता ॥ १८ ॥ द्विजपत्नी ! इस कारण तू विषयसे नको पृथ कर प्रम॒पाविनी ||
शिदजीकी कथा सुन ॥ १९ ॥ परमात्मा शिवकी कथा सुनने तेरा चित्त शुद्ध होगा उससे शक्ति हो जायगी ॥ २० ॥ निं चिक्तते ठ
शिवके चरण कमल ध्यान करते ए एकही जन्ममं तेरी छक्ति हो जायगी यह भँ सत्य सत्य कहता ह ॥ २१ ॥ सतजी बोरे; इस भकार
शिवपादान्जंचेतसानिमंलेनवे ॥ एकेनजन्मनाघुक्तिस्सत्य॑सत्यं वदाम्यहम् ॥२१॥ शूतउवाच ॥ इत्युक्तासद्धिजवरोवरःशेवःकृषा
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द्ैधीः ॥ तुष्णीबभूवश्चुद्धात्माशिवध्यानपरायणः ॥२२॥ अथबिदुगपत्नीसाच॑चुखाह्वापसन्नधीः॥ इत्युक्तातेनतिप्रेणसमासीद्रा
६
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¢ संसारबन्धनात्रैवधुक्तोभवतिसथधुवम् ॥ १८ ॥ अतोटिद्विजपत्नित्वंविषयेभ्योनिवृत्तधीः ॥ शृणशंमोःकथांचैतांभक्तयापरम
ट
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्पलोचना ॥२३॥ पपातारद्विजेन्द्रस्यपादयोस्तस्यद्षटधीः ॥ चचुलासाञ्जलिःसाचछृतार्थास्मीत्यभाषत ॥२७॥ अथसोत्था
पावनीम् ॥१९॥ शृण्वन्त्यास्सत्कथामेतांशंकरस्यपरात्मनः ॥ शुद्धिमेष्य तिचेतस्ते ततोष्ठक्तिमवाप्स्यसि ॥ २० ॥ ध्यायतः त
अतोभक्तिर्महेशस्यपु्ाभ्यांभवतिधुवम् ॥ तदयुग्रहतोदिग्याततोशुक्तिनसंशयः ॥१७॥ तद्विहीनःपडुज्ञेयोमायाबन्धनसक्तधीः॥ ४
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यसातंकासा्लिगंदरदाक्षरम् ॥ तञुवाचमहाशवंद्िजवेराग्ययुकसुधीः ॥ २५ ॥ चंचुलोवाच ॥ बह्ञज्छेववरस्वामिन्धन्यस्त्वं ६
परमार्थदक् ॥ परोपकारनिरतोवणैनीयःसुसाधुषु ॥ २६ ॥
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् कहकर वह शुद्धात्मा ब्राह्मण छपासे उसको कहकर शिवध्यानमे प्रायण हुआ ॥ २२ ॥ तवं विन्दुपत्नी चचुखा भरसनन होकर उसके वचन
६ सुन नेत्रम जल भरेती हृदे ॥ २३ ॥ ओर रसन हौ ब्राह्मणके चरणों गिरपदी ओर हाथ जोडकर संचुखाने कहा भ रता होग
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॥ २४ ॥ ओर परमरशातिे उठकर प्रसन्न हो गद्रद अक्षरोते वेराग्ययुक्तं उक्ष षहाशेवसे कहने ठगी ॥ २५ ॥ चेचुरा बोरी, हे बहन् ! ||
शिवभक्तोमे श्े्ठ स्वामिन तुमधन्य ओर परमा्थके देखनेवाटे हो आप परोपकारे निरत होकर साधुओंभ वणैनीय हो ॥ २६ ॥ ||
शि° | हे भगवन भे नरकके सागरे गिरतीहं आप खस्चको उद्धार कीजिये जिस एराण अथते संयुक्त रवी कथाको सुनकर सन भकार विषयेति म॑
॥ ९ ॥ |> || विरक्तं इहं पराणभवणमे खञ्च इस समय बढी श्रद्धा है ॥ २७ ॥ २८ ॥ सतजी बोठे-; इस प्रकार हाथ जोडकर उसके प्रति कथनकर् तथा
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उसके अयुयहको प्रपिकर शिवपराण सुननेकी इच्छासे उनके समीप स्थित हुईं ॥ २९ ॥ वह शेवश्रष्ठ नाह्लण उस स्थम शिव्एराणकी पवित्र >
कृथा उस्न श्ीको सुनाने कगे ॥ ३० ॥ इस भकार उस महाक्षे्रमे उस बाह्मण भ्रष्टके सखसे उसने महा उत्तम शिवघएराणकी कथा श्रवण की ॥ ३१ ॥ #
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उद्रोदधरमांसाधोपतन्तीनरकार्णवे ॥ अत्वायांस॒कथांशेवींषुराणार्थविजैमिताम् ॥२७॥ विरक्तधीरदंनाताविषयेभ्यसर्वंतः ॥
सुश्रद्धामहतीध्चेतत्पुराणश्रवणेऽधुना ॥ २८ ॥ सूतउवाच ॥ इत्युक्त्वासाजलिःसावेसंपाप्यतदूनुरहम्॥ तत्पुराणं्रोतुकामाति
त्तत्सेवनेरता॥ २९ ॥ अथशेववरोविपस्तस्मित्रेवस्थरेसुधीः ॥ सत्कथांश्रावयामासतत्ुराणस्यतांल्ियम् ॥३०॥ इत्थतस्मि
न्महाक्षषरेतस्मादेव द्विजोत्तमात् ॥ कथांशिवघुराणस्यसाञ्चुश्रावमहोत्तमाम्॥३१॥ भक्तिज्ञानविरागाणांवद्धिनींसुक्तिदायिनीम् ॥
बभ्रवसुकृता्थासाश्त्वातांसत्कथां पराम् ॥३२॥ सद्भरोस्तस्यकृपयाङ्ुद्धवित्ताचसाहुतम्॥ शिवादु्रदतःशम्भोरूपध्यानमवापह
॥ ३३ ॥ इत्थं सद्ररूमाभित्यसा प्राप्तशिवसन्मति।दध्योखुहुमंहुः शम्भोधिदानन्दमयवपुः॥२९॥ स्नात्वातीर्थजलेनित्य जटाव
त्कल्धारिणी ॥ भस्मोद्धूलितिसवाद्ीशदराक्षकृतभूषणा ॥३५॥ शिवनामजषाऽऽसक्तावाग्यताभितभोजना ॥ गुङ्पदिष्मा्गेण
साशिवंसमतोषयत् ॥३६॥ एवंतस्याश्ंचुलायाः इुर्वत्याध्यानघुत्तमम्॥ बहुकालोव्यतीयायशं भोस्ततैवशौनक ॥ ३७ ॥
| भक्ति ज्ञान वैराग्यकी बठानिवाटी सक्तिकी देनेवाीथी वह उस कथाको सुनकर ताथ होगदै ॥ ३२॥ वह सदूगुरुकी कपास शीघरही शुध
चित्त होकर शिवके अयुभरहसे उनका ध्यान प्राप्त करती ॥३३॥ इभकार सद्युरुके आशयत शिवकी सन्मति प्रापु शिक चिदानंद शरीरका
| ध्यान करने ठगी ॥३४॥ तीथं जठ नित्य ज्ञान कर जटा वल्क धारण करनेवाली सन अंग्मे भस्म ठगाये रदराश्च पहरे ॥३५॥ शिव
र| नामकी जपनेवाङी मौन मित भोजन करनेवाटी गारुके उपदेश किये मासे उसने शिवको सतुष किया ॥ ३६॥ इशभकार उच्म ध्यान करते हए उस
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चचुकाको बहुत समय बीतगया ॥ २७ ॥ उसको इस भ्रकार शिव भक्ति बहुतकार बीत गया तब उस्ने अनायास अपनी देह त्यागन करदी त
॥ ३८ ॥ तब शिवजीने उसके निमित्त विमान भेजा जो दिठय उनके गणो युक्त अनेक भरकारकी शोभासे संयुक्त था ॥ ३९ ॥ शिक्के अनु- ¢
चरने उस्तको चाकर शिवरोकको भराप्त किया उसके सब पाप दूर हो गये ॥ ४० ॥ यह दिव्य रूपधारे दिव्य अवयवे युक्त चन्द्राथ शेखर ठ
गौरी दिव्य भूषण धारण किये होगई ॥ ४३ ॥ हादेवके समीपम स्थित देखने ठगी महादेव त्रिलोचन सनातन देवको बहा विष्ण आदिक है
1 नानार धा ५३९॥ विमानंहुतमायातेगरेषितनिषुरारिणा॥ दिव्य॑स्व |¢
गणसंयुक्तंनानाशोभासमन्वितम् ॥३९॥ अथतत्रसमारूटामहेशाचचरेव॑रेः ॥ नीताशिवषुरींसयोध्वस्तसवंमलखाचसा ॥ ४० ॥
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दिम्यदूपधरादिव्यादिम्यावयवशाछिनी ॥ चन्द्राद्शेखरागौरीविरुसदिव्यथूषणा॥ ९ १॥गत्वातञ्रमदहादेवंसाददशभिरोचनम् ॥
विष्णुबरह्मपिमिर्दवेःसेम्यमानंसनातनम् ॥४२॥गणेशभेद्धिनन्दीशवीरमद्े्रादिभिः॥उपास्यमानंसद्धकतयाकोटिसय्यंसमपभम् |©
॥ 9३ ॥ नीलग्रीवं पञ्चवक्वंत्यम्बकं चन्द्रशेखरम् ॥ वामाङ्घेबिभरतंगौरीविद्यत्पुजसमप्रभाय् ॥४७७॥ कर्पूरगोरंगौरीशस्वालंकार
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पुनःपुनः ॥ ६ ॥ साजटिस्साथदाप्रेभ्णासन्तुष्ठाचविनीतका ॥ आनन्दाश्चजलेर्युक्तारोषद्षेसमन्वितां ॥ ०७ ॥
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ह|| सहित सेवित देखा ॥ ४२ ॥ गणेश शङ्गी नन्दीश्वर आदि उनकी उपासना करते है कोरि शुर्यके समान उनकी कान्ति है भक्तिपुवैक उनकी
उपासना कीजाती है ॥ ४३ ॥ नीलग्रीव पंचुख यम्बक चन्द्रशेखर जिनके वाय ओर बिजरीके समान भभायुक्त गौरी शोभित है ॥ ४४ ॥
कपूर समान गोरे गौरीश सम्पूणं अलंकारधारी श्वेत भस्म देहे गाथे ्वतव्ञ पहा उञज्वर पहर ॥ ४५ ॥ रसे शिवको देख चचरा ठ
|| बहुत सन्न हुरं ओर सम्भरमको प्राप्त हो वारंवार प्रणाम करने लगी ॥ ४६॥ अंजलि बांध बडे गरेभकते उसने शिवको सतु फिंया मेमसे उसके
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धारिणम् ॥ सितभस्मलसदेदसितवश्मदोज्ज्वलम् ॥७५॥ दषववशंकरंनारीसाञुमोदातिचुखा ॥ ससंभमान्महापीतापणनाम ||
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शि° | नेतोमे आनंदके आंख आगे ओर र्ये सडे होगये ॥४७॥ तब करुणाकर शिव ओर पावतीने उस्षकी ओर देखा ओौर कृपादृष्टि उसे अपने समीप
॥१०॥ ||‰ बेटाया ॥४८॥ पाकतीने उस दिव्य रूपिणीको अपनी सखी बनाया यह च॑चुखा ्विदुगभरिया नित्य दिष्य सुखको प्राप्त होकर रहने ठगी ॥४९ ॥
|| उत ज्योतिहप निरंतर छोकमे महान आनंद पूरक अचर निवास्कर अनाहत सुख भोगने ठगी ॥५०॥ इति श्रीस्कान्दे महाप्राण शिवछराणमाहात्म्य
त चैचुलामाहातम्ये चंचुखासद्रतिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ शौनक बोठे-, हे महाभाग सूतजी ! तुम धन्य ओर शिवे मन ठगानेवाछे हो
ठ अथसावेकृरुणयापार्वैत्याशंकरेणच ॥ समानीतोपकण्ठंदिखुद्टया चविरोकिता ॥४८॥ पावत्यासाज्ृताप्रीत्यास्वसखीदिव्यङ््
ठ पिणी ॥ दिव्यसौख्यान्वितातजचंचलाविन्दुग्रिया ॥४९॥ तस््िोकेषरानंदघनजञ्योतिषिशाश्वते ॥ लन्ध्वानिवासमचलेभे
ठ सुखमनाइतम् ॥५०॥ इतिश्रीस्कान्देमहापुराणे शिवपुराणमाहात्म्येचंचलासद्रतिवर्णनंनामचतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ शौनकडवाच ॥
सूत्चतमहाभागधन्यस्त्वंशिवसक्तथीः ॥ आवितेयकथास्माकमद्धताभक्तिवद्धिनी ॥ १ ॥ तञ गत्वाकिचकारच॑चकाप्रात्तसदर
तिः ॥ तत््व॑वद्विशेषेणतत्पतेश्वमहामते ॥ २ ॥ सूतउवाच ॥ साकदाविदुमदिवीञुपगम्यग्रणम्यच ॥ सुतुष्ठावकरौबदध्वापरम
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नन्दसंप्ठता॥२॥ चंबुलोवाच ॥ गिरिजेस्कन्दमातस्त्वंसेवितासर्वदानरेः ॥ सर्वसौख्यपरदेशम्धुप्रिये्रह्मस्वरूपिणि ॥४॥ विष्णु
ह्ादिमिस्सेव्यासयुणानियुंणापिच॥ त्वमा्ापरकृतिस्सष्ष्मासचिदानन्ददूपिणी॥५॥ सृष्िस्थितिर्यकरीरियणाधिसुराख्या ॥
ब्ह्मविष्णुमदेशानासुप्रतिष्ठाकंरापरा ॥ ६ ॥
यह अदत भक्ति बदानेवारी कथा आपने हमको सुनाई १।१ह चचरा सद्रतिको राप होकर वह, कया करने ठगी वह आप् विशेषकर हमसे |
कीजिये ॥२॥ घतजी बोले-) एक समय वह उमादेवीके निकट जाय परणामकर परमानंदको प्राप्त हो हाथ जोड भ्रसन्न करने गी ॥३॥ चचुखा बोटी-,ह
गिरिजा! तुम स्कंभमाता सव॑दा मलु्योसे सेवित हो.देशम्भुभिये ! आप सवदा सुसदेनेवा खी बह्स्वहपहो॥४॥ बहा विष्ण आदिते सेवनीय सुणनि्यणदप्
रुम आया पक्ति सुक्ष्म सचचिदानंदरपिणीहो ॥५॥ सृष्टिस्थिति र्य करनेदारी त्रियणात्रिसुराठया बह्ाविण्ण महेशोंकी दुभविष्टा करनेवाटी हो॥&॥
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| बोखे-+जब सृद्रतिको प्राप होनेवाटी चंचुखाने उसकी स्तुति करी ओर आखर प्रेमपुणे नेत हो बिरामको भ्ाप्त हु ॥७॥ तब करुणाको .
भ्राप्र हो शकर भरिया पावती भक्तवत्सठा उस चचुखासे कहने ठगी-हे चंदे ! इस स्तुतिते भँ बहुत भसन हूं हं ओर कया मांगती है वर ©
मांग तेरे निमित्त कुछभी अदेय नहीं है ॥ < ॥ ° ॥ सूतजी बोरे-, गिरिजा दारा यह कही जाकर वह उसे प्रणाम कर हाथ जोड शिर ९
क्चुकाकर् पुने ठगी ॥ १० ॥ चेचुा बोरी-;हे भगवती ! इशसमय मेरा स्वामी कहां है म उसकी गति नहीं जानती. है गिरिजे ट
सूतउवाच।इतिस्तुत्वामदेशीतांच॑चलाग्राप्तसद्रतिः ॥ विररामनतस्कंन्धाप्रेमपूर्णा्चलोचना ॥७॥ ततस्सकरूणाविष्टापार्व्वतीशंकर ठ
प्रिया ॥ तामुवाचमहाप्रीत्याच॑चुखां भक्तवत्सला ॥ ८ ॥ पार्वत्युवाच ॥ च॑चुटेसखिसुप्रीतानया स्तुत्यास्मिसुन्दरि ॥ फियाचसे ¢
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वरग्रूहिनादर्यवि्यतेतव॥९॥सूतउवाच॥ इत्युक्तासा गिरिजया चचलासुप्रणभ्यताम्॥ पर्यप्रच्छतसुप्रीत्यासाञजलिनतमस्तका॥१ ०॥
चचुलोवाच ॥ ममभरताधुनाक्षास्तेनेवजानामितद्रतिम्॥ तेनयुक्तायथादंवेभवामि गिरिजेऽने॥ १ १॥ तथेवङ्करूकस्याणिङपयादीन
वत्सरे ॥ महादेविमहेशानिभतमेवृषीपतिः ॥ मत्तःपूर्वमृतःपापीनजानेकांगतिगतः॥१२॥ सूतउवाच ॥ इत्याकण्यवचस्तस्या ६
अंचलायादिपारवेती ॥ प्रत्युवाचसुसंप्रीत्यागिरिजानयवत्सला ॥ १३॥ गिरिजोवाच ॥ सुतेभतांबिन्दगाह्रोमदापापीडराशः ॥ ४
वेश्याभोगीमहामूटोमृत्वासनरकंगतः ॥ १९ ॥ भुक्त्वानरकदुःखानिषिविधान्यमिताःसमाः ॥ पापरशेषेणपापात्माविन्ध्येजातः
पिशाचक्ः ॥ १५ ॥ इदानींसापिशाचोस्ति नानङ्केशसमन्वितः ॥ ततरैववातयुग्दुटस्सर्वकष्टवदस्सदा ॥ १६ ॥
जिततपरकार भे उत्से युक्त, हे दीनवत्से है काल्याणि रेस कपा मेरे ऊपर करो ॥ ११ ॥ हे पहादेवि है महेशानि ! भेरा भती वृषङीपति
भ्रा बह पापी छते पूवं मृतक हो न जाने किम गतिको गया ॥ १२॥ सतजी बोरे-; पार्वती इस भकार चंचुखाके वचन सुनकर प्रमभसच्न
हो कहने ठगी ॥ १३ ॥ पावती बोरी-, हे एत्री ! तेरा स्वामी विदु पहापापी दुराशय वेश्याभोगी गहाभूढ भृतकं होकर नरकको गया
॥१8॥ भौर बहुत वर्तक नरकके दुःख भोगकर पापरोषसे बह पापात्मा विंष्याचरभे पिशाच हभ ॥१५। इन समय वहं यनेक डेशोे युक्त
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शिण्य | ं पिशाच है वहां बह पवन भोजनकर सब कष्ट उढाता ३।१६॥स्० बो ° गौ रीके यह वचन सुन वह शुभवता चचुखा पतिके महादुःखसे बडी दुःखी हूदं॥ १७॥
॥११ | उसमे चित्त ठगाकर महेश्वरीको प्रणामकर दुःखी हदयसे वह शची फिर पूछने ठगी ॥१८॥ चचा बोटी-;हे महादेवि ! महेश्वरि ! भरे ऊपर छपा
ठ करो दुष्टकम फले कष्ट पाते हए भरे पतिका उद्धार करो ॥ १९ ॥ किस उपायपे मेरा भती पापात्मा बुद्धिमान् हो स॒द्रतिको प्राप्त होजाय. हे
¢ देवि ! सो कहो भँ तुमको प्रणाम करती हूं ॥२०॥ स्तजी बोढे-; उसकै यह वचन सुन भक्तवत्सला पार्वती रस्न्नात्मा हो अपनी सखी चचखसे
|| घूतञ्वाच ॥ इतिगौर्यावचःअत्वार्च॑चुलासाञ्चभवता ॥ पतिदुःखेनमहतादुःखितासीत्तदाकिलं ॥ १७ ॥ समाधाय ततञचित्तं
¢| उपरणम्य महेश्वरीम् ॥ पुनःप्रच्छसानारीडद्येनविदूयता ॥ १८ ॥ चचुखोवाच ॥ ॥ महेश्वरि महादेव कृपां कुरुममोपरि ॥
| सञुद्धरपतिमे्दुष्टकर्मकरंखलम् ॥ १९ ॥ केनोपायेनमेभर्तापापात्मासङ्डुद्धिमान् ॥ सरति प्राप्लुयादेवितद्वदाञ्चनमोस्तुते ॥
| || ॥ २० ॥ सूतउवाच ॥ इत्याकण्य॑वचस्तस्याःपर्वतीभक्तवत्सला ॥ म्रत्युवाचग्रसत्रात्माचचुलास्वसखींचताम् ॥ २१ ॥ पारवत्यु
|| वाच ॥ श्ृणुयाद्यदितेभतापुण्यांशिवकर्थांपराम् ॥ निस्तीय॑दु्गतिसर्वसिदर्तिपराप्ुयादिति ॥२२॥ इतिगो्यावचःशुत्वामृताक्षर
ट मथादरात् ॥ कृतांजखिनंतस्कन्धाप्रणनासपुनःपुनः ॥ २३ ॥ तत्कथाश्रवणं भरस्सर्वपापविश्चुदधये ॥ सद्रतिप्रा्तयेचैवपार्थया
ह|| मासतांतदा ॥२४॥ सूतउवाच ॥ तयाघहुशहना्यापराथ्य॑मानाशिवपरिया ॥गौरीकृषान्वितासीत्सामहेशीभक्तवत्सला ॥२५॥
| अथतबुमाहूयशिवसत्कीतिंगायकम् ॥ प्रीत्यागंधवैराजहिगिरिकन्येदमबरवीत् ॥ २६ ॥
माह ¢ कहने ठगी ॥ २१ ॥ पावती बोी; यदि तेरा स्वामी पवित्र शिवकथाको घुने तव॒दुर्गतिसे तरकर भ्रेष्टगतिको भाप हो ॥ २२ ॥
अ° ५ || पावतीकै यह अमृतरूपी अक्षरोको सुनकर आद्रे हाथ जोड बारम्बार प्रणाम करती हई वह मर्ताकी पापतिशेद्धिके निमित
तै कथा सुननेकी इच्छा करती हुई, कथाकी संगतिकै निमित्त फिर भरार्थना करने लगी ॥ २३ ॥ २४ ॥ सूतजी बोरे-जव उत्त नारीने
>४॥ बारम्बार शिवग्रियाकी भ्राथना कौ तब वह भक्तवत्सका महेश्वरी रुपायुक्त होकर् ॥ २५॥ शिवकी सत्कीर्तिं गानेवाछे दम्बर गन्धर्वको जटाकर
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ट गन्धूवैराजसे यह वचन कहने र्गी ॥ २६ ॥ पार्वती बोली; हे तुम्ब ! शिवकी भ्रीति ओर मेरे चन करनेवाले इसके साथ तुम ्
विन्ध्याचठ पर्वतको जाओ ॥ २७ ॥ वहां एक भयंकर महा घोर पिशाच रहता है उसकी कथा भ्रसन्न होकर सुनो मेँ तुमसे कहती हू ॥२८ टै
४ पिशाच होनेसे पहे वह वबिन्दुग नामका बाह्मण था वृह दष्ट मेरी सखी इस नारीका पति वेश्यगामी था सान संष्याकी क्रियासे हीन अपविन्न ठ
रोधसे मूखंबुद्धिवाछा दुरभक्षी सज्जनद्वेषी दुष्परिभरह करनेवाला ॥२९॥३०॥ िस॒कशच्धारी वाम हाथमे भोजन करनेवाखा दीनोँको पीडादेने-
ए वाला पीडक कूर पराये घरमे अभि र्गानेवाखा ॥ ३१ ॥ चाण्डा प्रीति करनेवाछा वैश्याभोगी महाखर अपनी पत्नीका त्याग करनेवाला ¢
ए गिरिजोवाच॥ हेतबुरो शिवप्रीतमममानसकारक॥सहानयाविन्ध्यशेटंम्रेतेगच्छसत्वरम्॥२७॥ आस्तेतरमहाघोरःपिशाचोतिभ
ट| करः ॥तदृत्तशृणसुीत्यादितस्सर्वव्रवीमिते॥२८॥ पुराभवेपिशाचस्सबिन्दुगाहोभवद्िजः॥ अस्याना्याःपतिदष्टोमत्सख्याघ्र
षलीपतिः ॥२९॥ स्नानसध्याक्रियादीनोऽशौचःकोधविमूटघीः॥ दुरक्षीसननद्रेषीदुष्परिथरहकारकः॥३०॥ हिसकःशक्चधारी च
सम्यदस्तेनभोजनी॥ दीनानां पीडकःकूरः परवेश्मप्रदीपकः॥३१॥ चाण्डालाभिरतोनित्यंवेश्यामोगीमदाखलः॥ स्वपत्नीत्यागङ्ग |
४ त्पापीदुष्ठसंगरतस्तदा ॥३२॥ तेनवेश्याकुसगेनसुकृतंनाशितंमहत्॥ वित्तरोभेन महिषी निभेयाजारिणीकृता॥ ३३॥आरत्योस्स
दुराचारीकाटेननिधनंगतः॥ययोयमपुरंघोरंभोगस्थानंदिपापिनाम् ॥३४॥ तनथुक्त्वासहुष्टात्मानरकानिबहूनि च ॥इदानींसपि |£
| शाचोऽस्तिनरविध्येद्रौपापयुक्लः॥२५॥तस्याग्ेपरमांपुण्यांसर्वपापविनाशिनीम्॥ दिव्यांशिवघुराणस्यकथाङ्थयत्नतः॥३६॥
ह| पापी सदा दुष्ट सगे प्रीति करनेवाटा था ॥ ३२ ॥ देश्याकी संगति उसने अपने सव सुरूतोंका नाश करदिया ओौर धनके छोभते अपन
|| महिषीको निभेय जारिणी करदिया ॥ ३३ ॥ मृत्यु पूरयन्त यह दुराचारी रहा समयपर भरगया ओर यमलोक पापियोके धोर स्थानक
भाप हज ॥३४॥ वहां वह दुष्टात्मा अनेक नरक भोगकर इस स्फ्य विन्ध्याचठ पर्वतम बह पिशाच हुआ है ॥ ३५ ॥ उसके आगे प्रमि
सब पापकी नाशनेवाटी शिवधराणकी दिव्य कथा सुनाओ ॥ ३६ ॥
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_ शिवषराणकी कथा श्रवण करतेही सब पापरहित हो ्रेतताको त्यागन करेगा ।॥ ३७ ॥वह दुगेतिसे रहित हो पिशाचपनको त्याग करेगा मेरी
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॥१२॥ | आज्ञाते विमानप्र बैगाया उसे शिवके समीप लेनाओ ॥ ३८ ॥ सतजी बोरे जव भवानीने इस भकार् तुम्बर गन्धर्व कहा, त वह अत्यन्त ||
|| पतह अपने भाग्यको वणेन करने खगा ॥ ३९ ॥ उसकी मायके सहित वह विमानमं बेटकर वह विन्ध्याचङ पर्त गया ॥ ४० ॥ वहां || > |
|| उत महाकाय महाहदवारे पिशाचकौ देखा जो विकटाकार कृभी हसता कभी कृदता कभी यथेच्छ बोरुताथा ॥ ४१ ॥ उस् मकर पिशा- || 9 |
|| इतगिवषुराणस्थकथाश्रवणतःपरात् ॥ सरवपापवि्द्ात्माहास्यतिभेततां चसः ॥२७॥ युक्तचदुगेतेस्तवेविदुग्वपिशाचकम् +.
|| निजमवरणयत् ॥३९॥ आरह्मसनिमानंससत्यातत्मिययासह ॥ ययौनिष्याचेसौरंयनास्तेनारदभियः॥०॥ तायश्यत्विशाच (४
तंमहाकायंमहाहवम्॥प्रहसन्तंश्दन्तं चवल्गंतंविकटाकृतिम्॥ ४ १॥ बलानग्राहतंपाशेः पिशाच॑चातिभीकरम्॥ तुम्बरश्शिनसत्की ॥५।
£| तिंगायकश्महाबरी ॥४२॥ अथोशिवपुराणस्यवाचनार्थसतुम्बुरः ॥ निधित्यरचनां चकरेमहोत्सवसमन्विताम्॥३॥पिशाचं ॥६
ट तारितंदेन्याःशासनाच्बुर््गतः ॥ विध्यंशिवएराणंस्या्रभ्रावयि्ुषरम् ॥ ४४ ॥ इतिकोखाहलोजातस्स्वरोकेषुवैमहान् ॥ ठ
|| त्व तच्छरवणार्थायययुेवषयोढतम् ॥ ४९ ॥ समाजस्तनपरमोदुतःथासीच्छभावहः॥ तेषांशिवुराणस्यागतानाश्रोतुमादराच् ||
||| ॥ ४६ ॥ पिशाचमथतंपाशेबैदध्वासमुपवेश्यच ॥ तंबुर्वछकीरस्तोजगौगौरीपतेःकथाम् ॥ ७७ ॥ ठ
शहा चको बलपूरक पाशोते शहणकिया फिर महावरी तुम्बरुने शिवकीतिका गाना भारभ किया ॥४२॥ किर तुम्बरुने शिवषराण बांचनेके निमित्त ||
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हठ सबलो होगया तब उसके ुननेके निभित् देवता ओर ऋषि आये॥४५॥बहां बडा अदत ओर गेष्ठ समाज हुआ वे सवकोई आदरे शिवराण
महोत्सव युक्त रचना की॥।४३।देवोकी आज्ञासे उत पिशाचके तारनेको तुम्बरु गया वह विन्ध्याचलमे शिवषएराणकी कथा बां चगे॥४४॥यह कोठा |
सुननेको आये ॥४६॥ पिशाचभी उन पाशोसे बेधाहुआ वहां स्थित हुआ तुम्बरुने वीणा हाथमे ठेकर गौरीपतिकी क्था गानी भारभ छी ॥४५७॥
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(५२९ ०36८ च> ३9 26-06-25 २
| संहितासे केकर सातवीं संहितातक माहात्म्य सहित सब शिवएराणका वणेन किया ॥७८॥ आदरपूंकं शिषएराणकी संहिता सुनकर वै
सब शरोता कताथ होगये ॥४९॥ शिवपएराणकी कथा सुनकर सब पापरहित होनेसे उसने पिशाच शरीर त्यागन कर दिया ॥ ५० ॥ तत्काट
बह गौर वण श्वेत वद्लधारी होगया सम्पुणे अलंकारो दीप्र शरीर चचिनेत्र चन्द्रशेखर ॥५५१॥ दिव्य शरीर होकर उस अपनी कांताकै सहित
स्वयं पादंतीपतिके यण गाने लगा ॥५२॥ उसकी वधुको देखकर वह सव देव देवषिं चित्तये विस्मितहो परमानंद को प्राप हुए ॥*५३॥ शिवके
आरभ्यसंदितामावांसप्तमीसदितावधि।।स्पष्ठशिवएुराणदिसमाहात्म्यंसमावदत् ॥४८॥ अत्वाशिवपुराणतंसप्तसंहितमाद्रात् ॥
बधूवुःसुकरृतार्थास्तेसवेश्रोतारणएवहि ॥४९॥ सपिशावचोमहापुण्यश्त्वाशिवषएराणकम्॥ विधूयकलुषेसर्वजहौपेशाचकंवपुः॥५०॥
` दिव्यशूपोबभूवाञ्चगौरवणःसितां शकः ॥ सवालंकारदीघ्रा्गश्िनेजश्न्द्रशेखरः ॥५१॥ दिव्यदिग्यवपुरभूत्वातयासनिजकांतया ॥
जगौस्वयमपिश्रीमां रितंपावतीपतेः ॥५२॥ तद्रधूमितिसंदष्टासवदेवषयश्चते ॥ बभूवुषिस्मिताधित्तेपरमानन्दसंयुताः ॥५३॥
सुक्ृताथमहेशस्यश्चत्वाचरितमद्धतम् ॥ स्वंस्वंधामययुःप्रीत्याशंसन्तःशाङ्गरंयशः ॥ ५४ ॥ िंडगःसोपिदिव्यात्मासुविमान
स्थितस्सुखी ॥ स्वकान्तापाश्वगःश्रीमान्छुहचुभेतीवखस्थितः ॥५९॥ अथगायन्मदैशस्यसुगुणान्समनोदराय् ॥ सतंबरूजगामा
जुसकांतश्शाङ्करंपदम् ॥ ५६ ॥ सुसत्कृतोमहेशेनपा्त्याचसर्बिदुगः ॥ स्वगणधक्ृतःप्ीत्यासाऽभवद्विरिजासखी ॥ ५७॥
तर्स््मिरोकेषरानन्देघनज्योतिषिशाश्वते ॥ रब्ष्वानिवासमचलप्रभातेषरयंसुखस् ॥ «८ ॥
अदरुत चरित्र देखकर सव कताथ होगये ओर करके ग॒णायुवाद गाते सव अपने २ स्थानको गये ॥५४॥ वह विंहुम दिव्यात्मा हो विमानप्र
हख पूवक स्थित हुआ वह लक्ष्मीवान् अपनी कांताके सहित शोभित हो आकाशम स्थित हआ ॥५५॥ किर शहेशके मनोहर शण गाता हुमा
ुम्ब्कै साथ बीसरहित शकरके स्थानको गया॥५६।उसन विंदुगका पावती ओर शिवने भरी पकार सत्कार किया ओर शिवजीने धीतिसे उत अपना
गण ओर पावतीने उते अपनी ससी बनाई ॥५७॥ उस महाचू शाश्वत परानंदं रोके अचर निवारको भाप हो. प्रभसुसी हुआ ॥ ५८ ॥
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शि०्यु० यह आपतते पापह्यरी इतिहास वर्णन किया यह शिवाशिवका परानंद् भक्तिका ढानेवाा है ॥ ५९॥ जो इसे घुनेवा भक्तिमूषेक कीतन कर
॥१२३॥|| || वह अनेकं भोग भोगकर अन्तर्मे उक्तिको प्राप्त होता है ॥ ६० ॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराणे रिवश्राणमाहारम्ये विदुगसदरतिव्णनो नाम
छ पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ शौनक बो हे व्यासशिष्य मष्टाभाग खत । आपको नमस्कार है तुम धन्य ओर शेव श्रेष्ठ हो तुम्हारे श॒ वणन
2 योग्य है ॥ १ ॥ श्रीशिवषराणके भवणकी विधि किये जिससे भोता्ओंको उत्तम॒ फलकी प्राप्ति हो ॥ २, ॥ सूतजी बोटे मं फट्के
इत्येतत्कथितपुण्यमितिहासमधापदम्॥शिवाशिवपरानंदैनिमेर भक्तिवर्धेनमू ॥५९॥ यहद॑श्णयाद्भकत्याकीतेयेदरासमादितः ॥
¢ सथुक्छाविपखान्भोगानेतेषुक्तिमवाप्ठयात् ॥ ६० ॥ इतिश्रीस्कदिमहापुराणशिवएराणमाहात्म्येविदुगसद्रतिवर्णनोनामपचमो
ऽध्यायः ॥ & ॥ शौनकडउवाच सूतस्तमहाप्रज्ञव्यासशिष्यनम्)स्तुस्े ॥ धन्यस्त्वंशेववर्योसिवर्णनीयमदहद्णः ॥१॥
8 श्रीमच्छ्विषुराणस्यश्रवणस्यविधिषद ॥ येनसर्वलमेच्दोतासम्पूणफल्घुत्तमम् ॥ २॥ सूतउवाच॥ अथतेसंग्रवक्ष्यामिसपूर्णफ
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लहेतवे ॥ विधिशिवएुराणस्यश्रवणेशौनकमने ॥ ३ ॥ दैवज्ञंचसमाहूयसंतोष्य चजनान्वितः॥ बुहतैशोधयेच्छुदधनिरवि्रेन समा टू
प्ये ॥४।वातीपरेष्याप्रयतलेनदेशेदेशेचसाश्चुभा ॥ भविष्यतिकथाशेवीआग॑तव्यंञ्यभाथिमिः ॥ 4 ॥ दूरेदरिकथाकेचिद्दूरेशं ॥६
६ कुरकीतंनाः॥ लियशचदरादयोयेचबोधस्तेषां भवेद्यतः ॥ ६ ॥ देशेदेशेशांभवायेकीतनश्रवणोत्ुकाः ॥ तेषामानयन॑कार्यतत्प्रकारा ट
माहा” &||| ्माद्रात ॥ ७॥ भविष्यतिसमाजोऽ्साधूनांपरमोत्सवः ॥ पारायणेषुराणस्यशेवस्यपरमाद्धतः ॥ ८ ॥ ४
क || निमित्त आपको शिवशराणकी विधि कहता हू, हे शौनक ! तुम घनौ ॥ ३ ॥ ज्योतिषीको बुछाकर कुडम्ब दित संतुष्ट कर व
|| समाभिके निमित्त सहतं शोषे ॥ ४ ॥ फिर देशदेशमे वातां भिजबादे कि अथक स्थान पर कथा होगी इस शिवकथा सुननेके निमित्त
सबको आना चाहिये ॥ ५॥ जो शिव कथा से दूर ओर शंकर कीतनके दृर हों ल्ली शुद्र तथा बैधुजन है जिससे उनको बोध होजाय
॥ & ॥ देशदेशमे शिवभक्त जो कीतैन श्रवणे उत्कंटित ह उनको आदरपूवंकं बुडाना चाहिये ॥ ७ ॥ यहां साधुओंका परम
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मंगलदायक समाज होगा परम अद्भुत शिवपएराणका पारायण होगा ॥८॥ श्रीमच्छिवपराणके रसपानकके लिये अदस मरक 1 को$ ४
रिये ॥५॥ जो अवकाश न हो तो भ्रमते एकंही दिन आओ सर्वथा वहां आना चाहिये वह कषणमात्रकीमी स्थिति दुम है ॥१०॥ इत भकार
विनयसहित उनको बुडाना चाहिये उन आये हुओंका आदर करना चाहिये॥११॥ शिवाय तीथं बनवाकर शिवषराणकी कथा करानेका उततम १
है ॥१२॥ ृध्वीको लीपना चाहिषे धाठओति मण्डित करना चाहिये विचित् रचना ओर महोत्सव करना चाहिये ॥१३॥ रकी चीज वस एकान्तम
श्रीमच्छिविषुराणाह्वरसपानायचाद्रात्॥आयांत्वरंभवन्तश्चकृषयप्रेमतत्पराः॥९॥ नावकाशोयदिपरम्णागन्तव्यंदिनमेककम्॥ सव
थागमनंका्यदुलेभाचक्षणस्थितिः ॥१०॥ तेषामाहानमेवंदिकार्यसविनयंसुदा ॥ आगतानां चतेषांहिसवंथाकाथ्यं आद्रः ॥ 9१ ॥
शिवार्येचती्ैवावनेनापिगृहेऽथा॥ कार्यशिवपुराणस्यश्रवणस्थकयु्तमम् ॥१२॥कार्यसंशोधनंभूमेलपनंधाठमण्डनम् ॥ वि
चितरारचनादिष्यामहोत्सवपुरस्सरम् ॥9२॥ शोपत्करण्दधृत्यनिखिलंतदयोग्यकम्॥ एकान्तेहकोणेचादश्येयत्नाभितेशयत्
॥ 9४ ॥ करतन्योमण्डपोऽत्युखै"कदलीस्तेभमण्डितः ॥ फरपुष्पादिभिस्सम्यगिवष्वग्वेतानराजितः ॥१५॥ चतुरिश्ुष्वजारोष
स्सपताकमशोभनः ॥ सुभक्तिस्स्थाकार्यासवानन्दविधायिनी ॥ 9६ ॥ सङ्करप्यमासनंदिव्यंशंकरस्यपरात्मनः ॥ वश्वापि
तथादिन्यमासरनखुलसाधनम् ॥ 9७. ॥ शोतृ्णाकर्पनीयानिमुस्थरानियथाईतः ॥ अन्येषाचस्थलन्येवसाधारणतयासुने
॥ १८ ॥ विवादियादशंचित्ततादशकायैमेवदि ॥ अन्याचिन्ताविनिवाय्यांसर्वाशोनकलौकिकी ॥ १९ ॥
निवेशित कदे जिते अयोग्यता ठक्षित नहो ॥१४॥केोंका बदा ऊंचा मण्डप बनावे फर ष्पादिक सहित अच्छी भकारे पजन करे॥ १५॥
चारे ओर ध्वजा पताका आरोपण करे ओर सब आनेदकी देनेवाटी सुभक्ति व प्रकारे करे॥१६॥ संकल्पकर प्रभात्मा शंकरको दिव्य आसन
दे ओर वक्ताकै ठियेभी दिष्य आसन दै ॥१७॥ भ्रोताओके निमित्त यथा योग्य सुन्दर स्थर कल्पना करना चाहिये ओर दूसरे भी स्थान
साधारणताते बना ॥ १८ ॥ विवाहे जैसा चिच होता है वही उत्ाह कथा करना चाहिये है शौनक व टोकिकी चिन्वाको छोडकर ॥ सथान |
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उत्तरकी ओरको खख वक्ता करे पूर्वकी ओरको शख श्रोता करे पोथी मारकर बैठे कथाके सन्मुख चरण न हो किसी प्रकार विरोध न हो
॥ २० ॥ अथवा पूज्य पुजकके मध्यमे पवंदिक् होनी चाहिये अथवा कथा कहनेवाठेके सन्सस श्रोताओंके खख होने चाहिये ॥२१॥ ओर सदा
लह रक्ते जिस समय पौराणिक बाह्णण व्यास्ासनप्र स्थितहो तव प्रसंगे ( अध्याय ) समाप्त हुए विना किस्चीको प्रणाम न करे ॥ २२. ॥
(| बाठक वृद्ध दरि दुक ऽराणज्ञाता वक्ता पण्यकी इच्छा करनेवालोको सदा पूजनीय ओर वन्दनीयंहै ॥ २३ ॥ पराणन्नाता किंस प्रकार
नीचलुद्धि न करे कारण उसके सखते निकटी वाणी शरीरधारियोको कामयेनुवत् है ॥२४॥ जन्ते गुणसे यरु बहत ह परन्तु उन सवके मध्यम
उदद्सखोभवेदरक्ता्रोताप्रागबदनस्तथा॥बयुत्करमःपादयो्ञेयोविरोधोनास्तिकश्चन॥२०॥ अथवापूर्वदिग््ञेयापूज्यपूजकमभ्यतः ॥
अथवासंशचखेवक्तुः्ोवृणामाननंस्वेतम् ॥२१॥ व्यासासनसमारूढोयदापौराणिकोद्धिजः ॥ असमाप्तौपरसंगस्यनमस्डयानकस्य
चित्॥ २२ ॥ बालोुवाथवद्धोवादर्वापिदुबलः ॥ पुराण्ञस्सदावंयःपूज्यशचसकृतारथभि, ॥२३॥ नीचड्ुिनरवीत पुरा
णज्ञेकदाचन ॥ यस्यवक्रोद्रतावाणीकामधेदश्शरीरिणाम्॥२७॥ शुङ्वत्सन्तिबहवोजन्मतोयुणतशव॥ परोगुरःपुराणज्ञस्तषां मध्ये
विशेषतः ॥२५॥ भवकोरिसदसेषुभूत्वाभूत्वावसीदताम् ॥ योददातिपराशक्तिकोन्यस्तस्मात्परोङः ॥२९॥ पुराणज्ञः चिरदकषः
शान्तोविजितमत्सरः ॥साधुःकारण्यवान्वाग्मीवदेत्पुण्यकथाभिमाम् ॥ २७ ॥ असूयोदयमारभ्यसाद्धश्चिपहरान्तकम् ॥ कथा
शिवपुशाणस्यवाच्यासम्यकसुधीमता ॥२८॥ येधूर्ता चदु्र॑तायेचान्येविजिगीषवः। तेषांङिखवृत्तीनामगेनेववदेत्कथाम् ॥२९॥
पराणका जाननेवाछा विशेष शुरु है ॥ २५ ॥ कारण कि संसारम अनेक योनि पाकर कष्टपानेवाछोंको जो सक्ति देता है उससे परे यरु
कौन है ॥ २६ ॥ एराणज्ञाता पवित्र चतुर शान्त मदहीन साधु दयावान वाग्मी इस एण्य कथा को बौठता है ॥ २७ ॥ स्योंदयसे पहले
आरम्भकर साढे तीन पहरतक शिब एराणकी कथा बुद्धिमानको बांचनी चाहिये ॥ २८ ॥ जो पूतं दुत्त जो जीतनेकी इच्छा करनेवाठे हँ
उनके आगे कभी कथा न कहे ॥ २९ ॥
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जहां दुजनोकी स्थितिहो वा जहां चोरोकी स्थितिहो धूर्तके षर वा देशम इस कथाको न के ॥ ३० ॥ मध्याहमे दो षठीको कथा विराम
कृरे यल मूत्रके उत्सजन् करनेको, ओर कथाके कीतेन करनेवठे ॥ ३१ ॥ तथा वक्तको कथा आरभसे एकदिन पठे हजामत बनवानी
चाहिये सव कम यतनपू्वैक रेक्षपपे करना चाहिये ॥ ३२ ॥ वक्ताके निकट सहाय करनेको अन्य पुरुषको स्थित करना चाहिये बह भी
पंडित संदेह छेदन करनेवाखा तथा ठोककै समञ्चानेमं चतुर हो ॥ ३३ ॥ कथाकै विध्न ॒दूर करनेको गणेशका पूजन करे कथाधीश ओर
शिवको भक्तिसे ओर विशेषकर पस्तकको पूजनकर ॥ ३ स ॥ आदरे शिवषएुराणकी कथा बुद्धिमान् सुने भरोता विधिपूषैकं शुद्ध होकर
नदुरजनसमाकौणेनतुदस्णुसमावृते ॥ देशेनधूतंसदनेवदेत्पुण्यकृथामिमाम्॥ २० ॥ कथाविराम"क्तैवयोमध्याहेरिभुदूर्तकम् ॥
मलभूत्रोत्सुजना्थतत्कथाकीतनात्ररः॥ २ १॥वक्राक्षोरंहिसंकायदिनादवगवताप्तये ॥ का्यसंक्षेपतोनित्यकर्म॑सर्वैपरयत्नतः ॥३२॥
वक्तुः पाश्वे सहायार्थमन्यः स्थाप्यस्तथाविधः॥ पण्डितः संशयच्छेततालोकबोधनतत्परः ॥३२॥ कथाविष्नविनाशा्थैगणनाथं
रपूजयेत् ॥ कथाधीशंशिवेमक्त्यापुस्तकंचविशेषतः ॥३७॥ कथांशिवृपुराणस्यशणयादाद्रात्स॒धीः ॥ शरोतासुषिधिनाञञद्धः
शुद्धचित्तः प्रसत्रधीः ३५॥ अनेककमंविधान्तः कामादिषड्विकारवान्॥ च्चणःपाखण्डवादीचवक्ताश्रोतानपुण्यभाक् ॥३६॥ रो
कृचिन्तांधनागारपुत्रचिताय्युदस्यच् ॥ कथाचित्तःश्ुदमतिस्सरभेत्फखुत्तमम् ॥ ३७ ॥ अद्धाभक्तिसमायुक्तानान्यकायंषुला
लसाः ॥ वाग्यताःश्ुचयोऽग्यप्राःश्रोतार'पण्यभागिनः ॥३८॥ अभक्तायेकथां पुर्यांशण्वंतीमांनराधमाः ॥ तेषांभवणजंनास्ति
फलंदुःखंभवेभवे॥ २९ ॥ असम्पूज्यपुराण्येयथाशक्तयात्शुपायनेः ॥ शृण्वन्तीमांकर्थासूटाःरयुद॑रिद्रानपावनाः ॥ ७० ॥
भन्न चित्त रहे ॥ ३५ ॥ अनेकं कमस विभान्त हए कामादिषद् विकारोको करनेवाठे चोर पासण्डवादी वक्ता ओर श्रोता शण्यभागी नहीं
होते ॥ २६ ॥ छोक चिता घन अगारकी चिन्ता त्रचिन्ता छोडकर केवल जो कथाम भन लगाता है वही उत्तम फरुको धात होता ह
॥३७॥जो भरद्धाभक्तियुक्त है जिनकै दूषरे काये छार्ता नहीं है वाणी रोकै हुए उ्यथता रहित सुननेबाडे एण्यभागी होते ६ ।॥३८॥ जो नरा
धम अभक्तं इस पवित्र कथाको सुनते है उनको घुननेका फक नहीं होता केवर सारम दुःख भिरुता है ॥ ३९ ॥ जो यथाशक्ति भैर देकर
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एराणका पूजन नही करते वे मूसे कथाको सुनकरभी दररी हते ह पवित्र नहीं होते॥४०॥ जो मनुष्य कथा कहतेमे उठकर अन्य स्थानकं ||
चे जाते है मोगान्तरमे उनकी दारादि सम्पदा नष्ट होती है ॥४१॥ जो पगढी बां पकर कथाको सुनते हैउनके प्र पापी ओर कुखदषक हते |
क्षण करते है नरकर्मे यमकंकर उनको उनकी विष्ठा खवाते ई ॥ ४३ ॥ ओर जो
ह ॥४२ जो मलुष्य इस कथाको भरवण करते बाम्बू भ
भोगकर फिर काक होतेह ॥ ४४॥ जो वीरादि आस्ननप्र स्थित हो इस कथाको
ऊचे आसनपर बैठकर कथाको भवण करते है वे सब नरक
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¢ कथार्याकथ्यमानायांगच्छन्त्यन्यत्रयेनराः ॥ भोगान्तरे्रणश्यन्तितेषांदारादिसम्प्दः ॥४१॥ सोष्णीवमस्तकायेचशरण्वन्तीमां
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कर्थानराः॥तरपुजाश्चपरनायन्तेपापिनःकुरुदूषकाः ॥४२॥ताम्बूंभक्षयन्तोयेश्ण्न्तीमांकथांनराः॥ स्वविष्ठांखादयन्त्येतान्नरकेय
मकिकराः ॥४३॥ येचतुद्गासनाहूढाःशृण्वन्तीमांक्थानराः ॥ धुक्त्वातेनरकान्सर्वास्ततः काक भवन्तिड ॥७७॥ येवीराद्यासना
ङ्ढाशृण्वन्तीमांकथांभाम् ॥ भुक्त्वातेनरकान्सर्वान्विषतक्षाभवन्तिवे ॥ ७५ ॥ -असम्प्रणम्यवक्तारंकथां श्रृण्वन्तियेनराः ॥ `
तिनरकान्सवन्मिवंत्यडेनपादपाः ॥ ७६ ॥ अनातुराश्शयानायेशरण्व॑तीमां कथांनराः ॥ थुक्त्वातेनरकान्सर्वानभवन्त्यज
गरादयः॥४७॥ वकतुस्समासनाशूढाये शृण्वंतिकथामिमाम् ॥ श्॒तर्पसमंपापंभाप्यतेनारकेस्सदा ॥७८॥ येनिन्द्न्तिचवक्तार
कथाचेमांसुपावनीम् ॥ भवन्तिञ्चनकाथुक्त्वादुख॑जन्मशतंहिते॥ ४९ ॥ कथार्यावतमानायांदवादयेवदंतिदि॥ थुक्त्वातेनरका
न्धोरान्भवंतिगद॑मास्ततः ॥५०॥ कदाचित्रापिश्ण्वन्तिकथामेतां पावनीम् ॥ भुक्त्वातेनरकान्धोरां भ्वतिवनसूकराः ॥५१॥
श्रवण करते ह ३ सब नरक भोगकर किर विषदृक्ष होते है ॥ ४५॥ वक्ताको षणा किये विना जो मनुष्य कथाको सुनते हँ बे सव नरक भोगकर
अजुन वृक्ष होते ह ॥४६॥ जो रोगके विना ठेकर सुनते हँ बे सव नरक भोगकर अजगरादि होते ३॥४७॥ जो वकताकै बरावर ऊचे आसनप्र
स्थिव हो इतस कथाको सुनतेहै उनको नरकं सदा गुरकी सेजप्र चढनेका पराप होता है ॥४८॥ जो वक्ता ओर इस पवित्र कथाकी निदा करते हँ
दुःख भोगकर सौ जन्भतक कते होते ६।४९॥ जो कथा होनेप्र दुवंचन बोठते है वे घोर नरक भोगकर फिर गधेहोते है॥५०॥ जो कभीभी इस्त ॥>
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पवित्र कथाकै नहीं सुनते है वे घोर नरक भोगकर वनसूकर होते है ॥ ५१ ॥ कथा होती हई जो दुष्ट विप्र करते है वोह करोड वर्ष नरक
भोगकर भ्रामसूकर होते हँ ॥५२॥ इससे विचारपूवक शुद्धात्मा होकर श्रोता वक्ता भक्तिसे कथा भरवणके निमित्त भीति बुद्धिपूर्वकं उयत हो
॥५३॥ कथा विन नाशक निभित्त पटे गणेशजीको पूजे, संक्षेपे नित्य कमे कर भायधित्त करे ॥ ५४ ॥ नवग्रह ओर सव॑तोभद्रके देवताओंको
पूजनकर शिवपुजाकी विधिसे स्तक की पूजा करे ॥ ५५ ॥ पुजनके अन्तम भक्तिते दोनों हाथ बांधकर साक्षात् शिवस्वषटप पस्तककी
कथार्याकीत्य॑मानारयाविध्नंङुर्वतियेखलाः ॥ कोरयन्देनरकान्धुक्त्वामवेतिभ्रामसूकराः॥९२॥ एवंविचार्यशुद्धात्माश्रोतावक्त॒ख
भक्तिमान् ॥ कथाश्रवणहैतोर्दिभवेत्परीत्योद्यतःसुधीः ॥ ५३ ॥ कथाविघ्रविनाशाभगणेशंपूजयेत्पुरा॥ नित्यसंपायसंक्षेषात्पाय
चित्तं समाचरेत्॥ ५8 ॥ नवय खसम्पूज्यसर्वतोभद्रदेवतम् ॥ शिवपूजोक्तविधिनापुस्तकंतत्समर्चयेत् ॥ ८५ ॥ परूजनातिमहा
भक्त्याकरोबद्धाविनीतकः ॥ साक्षाच्छिवस्वरूपस्यपुस्तकस्यस्तुति चरेत् ॥५९॥ शओरमच्छिवपुराणारुयःपत्यक्षस्त्वंमरेश्वरः ॥
शरवणार्थस्वीकृतोऽसिसन्तु्ोभववेमयि॥ ५७ ॥ मनोरथोमदीयोयकतंब्यस्सफलस्त्वया ॥ निविन्नेसुसंपणैकथाभवणमस्तुमे
॥ ५८ ॥ भवाब्धिम््रदीनमांसघुद्धरभवार्णवात् ॥ कर्मगादग्रदीताङ्गदासोहंतवशंकर ॥ ५९ ॥ एवंशिवएुराणंहिसाक्षाच्छिवस्व
हपकम् ॥ स्तुत्वादीनवचःपरोच्यवक्तुःपूजां समारभेत् ॥ ६० ॥ शिवपूजोक्तविधिनावक्तारंचसमच॑येत् ॥ सपुष्पवक्चभषाभिधूष
दीपादिनाचयेत्॥ 8१ ॥
सतुति करे ॥ ५६ ॥ यह श्रीमान् शिवषएुराण पत्यक्ष शिवहटप है, भवणके निभित्त सत्कार करनेसे भैर ऊपर सन्तुष्ट हो ॥ ५७ ॥ आप् यह
८ || मेरा मनोरथ सफठ कीजिये विघनरहित भेरी कथा पूणं होजाय ॥ ५८ ॥ संततारसरागरभे पडे हुए अको संपतारसे उद्धार करो, हे शकर !
८ || करमहपी ग्राह गृहीतशरीर भँ आपका दास॒ हं ॥ ५९ ॥ इत प्रकार शिवष्राण साक्षात् शिवं स्वप है स्तुति कर नताके वचनो व्यासकी
पूजा करे ॥ ६० ॥ शिवपूजाकी विषिते वक्ताकी पूजा करे पुष्प मूषण व्च धूप दीपे पूजे ॥ ६१ ॥
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उसके आओे शुद्ध चित्ते नियम करे समामिपर्थन्त शक्तिके अयषार निय्मोको धारण करे ॥६२॥ व्यासरूपी हे ज्ञानदाता हे सब् शा्विशारद् |
इसत कथाको कहकर आप भेरा अज्ञान दूर करो ॥ ६३ ॥ भक्तिपूर्वक पांच नाहर्णोका वरण करना चाहिये ओर् वे भक्तिसे शिवृक पंचाक्षर
तरका जप करे ॥६४॥ हे सने यह तुमसे भक्तिूर्वक कथाश्रवणकी विधि कही है यह भक्तं भरोताओंके निमित्त है अन् क्या सुननेकी इच्छा
है ॥ ६५ ॥ इति श्रीस्कान्दे महाऽराणे शिवषराणमाहातम्े श्रवणविधिवणनो नाम् षष्ठोध्यायः ॥ & ॥ शोनकजी बो हे खत 1 चत महाभाग
तुम शैव भ्ेष्ठ शिवके भक्तहो यह तुमने अदधत शुम कथा हमको सुनाई ॥ १ ॥ हे छने शिवणराणके चत करनेवारोके सव रोककैहितक निमित्त
तद्ेशुद्धचित्तेनकरतव्योनियमस्तदा॥आसमाप्तियथाशक्तयाधारणीय॒स्खयत्नतः॥ ६ २॥व्यासर्पप्रबोघाग्यशिवशा्चुविशारद्॥
एतत्कथाप्रकाशेनमदङ्ञानंविनाशय ॥ &३ ॥ व्रणपचविप्राणांकायवेकस्यमक्तितः ॥ 'शिव्षचाणमन्बस्यजपःकाय्यश्वतैस्सदा
॥ ६8 ॥ इत्युक्तस्तयुनेभक्तयाकथाञ्जवणसद्विधिः ॥ ओरतृ्णाचेवभक्तानाकिमन्यच्छोत॒मिच्छसि ॥ ६५ ॥ इतिश्रीस्कान्देमहा
पुराणेशिवुराणमाहात्म्येश्रवणविधिवर्णनोनामषष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ शौनकउवाच ।॥ सूतसूतमहा्रा्ञधन्यस्त्वशेवपुङ्गव ॥
भ्रावितेयकथास्माकमद्धुतेयंज्चभावहा ॥ १ ॥ -पंसांशिवएुराणस्यश्रवणत्रतिनाुने ॥ सव॑रोकरिताथायदययानियमवद् ॥२॥
सृत्रउवाच ॥ नियमश्णुसद्रत्तयापुंसतिषांचशोनक ॥ नियमात्सत्कर्थात्वानिर्विष्नफल्युत्तमस् ॥ ३ ॥ पैसादीक्षाविदीनानां
नाधिकारःकृथाशवे ॥ ओ्रोतकामेरतोवकतु्दक्षा ्राद्याचतेधुने॥९॥ ब्रहमचस्यैमधस्सुप्तिःपतावर्स्यांचभोजनम् ॥ कथासमाप्तौषु
क्तिचकुर्या्ित्यंकथाव्रती ॥ ५॥ आसमाप्तपुराणंहिसद्ुषोष्यसुशक्तिमान् ॥ शृणुया द्रक्तितःशुद्धःपुराणंशेवशुत्तमम् ॥ ६ ॥
क्पाकरके नियम कहो ॥ २ ॥ सूतजी बोरे हे शोनक ! भक्तिसे उनके नियम श्रवण करो नियमसे सत्कथाको भवण करे जिस्षसे निर्विघ्रतासे
उत्तम फठ मिटे॥३॥ दीक्षाहीन पुरुषों का कथाके वणम अधिकार नहीं ह इस भकार हुननेवालोंकोवक्तामे दीक्षा छेनी उचितहै ॥४॥ बह्चयं
पृथ्वी सोना पत्तलमे भोजन करना कथा सभाप्त हौनेपर भोजन करना ॥ ५ ॥ पराणके समाप्त होनेतक बुद्धिमान् शक्तिके सर्हित बती होकर
भक्तिसे ्द्धाके सहित शिवएराण सुने ॥ & ॥
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|| धृतपान दुग्धपान करके कथा सुने वा फलाहार वा एक समय भोजन कर कथा सुने॥७॥इस् कथाका सुननेवाडा एकवार हविष्यान्न भोजन करे ह
2४|| जिस प्रकार सख॑साधय होसकेउसी भकार भ्रवणकायं करे॥ <॥ अच्छी भ्रकार कथाम मन ठगे इस कारण भोजन अवश्य थोड़ा बहुत करे उपवास न करे इससे
ह कृथामे विघ्र होता ६।९॥ गरिष्ठ दवद अन्न दग्ध निष्पाव( चौरा वा राजरिंवीके बीज) मसरिका भावदुष्ट बारी इनको कथावती न खाय ॥१०॥ गन
कर्टिंद चिचैडा मूटी पेढा नालिका शाक मूढ यह नित्य कथावती न खाय॥११॥पखांडइ (प्याज) ल्हसषन हींग गाजर मादक व्य तथा
चृतपानेषयःपानकृत्वावाश्रणुयात्मुखम् ॥ फलाहारेणवाश्राग्यमेकुक्तनवादहितत्॥७॥ एकवारं हविष्यात्नथुज्यादेतत्कथात्रती ॥
सुखसाध्यंयथास्यात्तच्छवणंकार्यमेवच॥८॥ भोजनंसकरंमन्येकथासुश्रवणप्रदम्॥ नोपवासोवरशरत्स्यात्कथाश्रवणविष्नङृत्॥९॥
गरिषठद्विदङ्द्ग्धनिष्पावांश्चमसूरिकाम् ॥ भावढुष्टपयैषितंजग््व नित्यंकथातती ॥१०॥ वातकंचकरङदिचपिचण्डूरुकंतथा॥
कूषमाण्डनाकिकिरंचमलंज्वाकथानरती १ १पलाण्डंलशुनेदिगंजनंमाद्कहितत्॥ वस्तून्यामिषसंज्ञानिवजंये्ःकथातती ॥ १२॥
कामादिषड़़्िकारंचद्विजानाचविनिन्दनम्॥ पतिव्रतासुानिन्दावजंयेयःकथावती १ ररजस्वरानपश्येखपतिताघनवदेत्कथास्॥ दविज
द्विषोवेदवज्यात्रवदेद्यःकथाव्रती॥ १७।सत्यशौचद्यां मोनमजेवंविन्य॑तथा॥ओदार्यमनसञेवज्ख्यातित्यंकथाती॥ १८ निष्काम
शसकामश्चनियमाच्छरणुयात्कथाम्।सकामःकाममाप्नोतिनिष्कामोमोक्षमाप्तयात् १कदरिदश्क्षयीरोगीपाषीनिर्भागवएव च| अन
पत्योपिपुरषश्शणयातसत्कथामिमाम्१७काकवन्ध्यादयस्सप्रविधाअपिखलच्ियः।सषद्रमाचयानारीताभ्यां ाग्याकथापरी १८
स्क वस्पुसदा वजत करे ॥१२॥कामादि ठः विकार बाहमणोकी निदा पतिता सखरपोकी निंदा कथावती सदा लागे ॥१३॥ रजस्वलाको न
दख पतितोपि कथा न कहे बाहणदवषी वेदम वजनीय परषेति कथा न कटे॥१४। त्य शौच दया मौन आजव विनय भने उदारता कथा नने
वाटा नित्य करे ॥१५॥ निष्काम वा सकाम् को हो नियमे कथा घुने सकाम ऽरुषकामनाको ओर निष्काम गोक्षको पराप्त होताहै ॥१६॥ | र |
ददी क्षयी रोगी पापी नि्मग्य सन्तान रहितभौ अपने दुःख दूर होनेकै निभिचइसकथाको हुने ॥१७॥ काक्ष्यादि जो सात प्रकारकी नीह ॥१॥
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| करक फिर वक्ताकी पूजा करे ॥२६॥ पुस्तकके आच्छादन करनेको नवीन व्लदे ओर बन्धनके निमित्त सुन्दर रेशमीन तागा दे॥२७॥
तथा जिन ियोंका गर्भस्चाब होता है उनको निरंतर कथा सुननी चाहिये ॥ १८ ॥ इस भकार बरी ओर र््षोको यत्नसे कथा सुननी चाहिये
इतत शिव एराणकी कथाको विधानत सुने, हे खन ! ॥ १९ ॥ इक्र शिवषराणके पारायणदिन अति उत्तम ह कोटि यज्ञोके समान ह ॥ २०॥
इनमे जो थोदी वस्तुभी दान कीजाय तो इन भ्रष्ठ दिनों दानका अक्षय फठ होता है ॥ २१ ॥ इस् प्रकार वतविधिकर दूस परम् कथाको
बुनकर प्रानन्दको भप्त हो उयापन करे ॥ २२ ॥ इतके उद्ापनकी विधि चौद्शकेदिन , धनी परुषोँको फठ्की इच्छसे करनी चाहिये
॥ २३ ॥ अकिंचन भक्तोंरो उयापनकी आवश्यकता नहीं है वह॒ सुनतेही पवित्र होते है कारण कि निष्काम ह ॥ २४ ॥ दस. प्रकार
सर्वेषांश्रवणकार्थच्लीभिःपुमिश्वयत्नतः ॥ एतच्छिवपुराणस्यविधिनाचकथांसुने ॥१९॥ एत्च्छिवपुराणस्यपारायणदिनानिवं॥
अत्युत्तमानिबोध्यानिकोरियज्ञसमानिच ॥२०।एतेषुविधिनादन्तयदल्पमपिवस्तुदहि ॥ दिवसेषुषरिष्ठषुतदक्ष्यफटंलभेत्।॥२१।
एवंकृत्वानतविधिशत्वेमांपरमांकथाम्॥ परानन्दयुतः ्रीमादयापनमथाचरेत्॥२२॥ एतदुद्यापन विधिश्तुदश्यास्समोमतः। कार्यं ||
स्तद्रद्नाव्येथतदक्तफलकांक्षिभिः॥२२।अरकिंचनेषुभक्तषुप्रायोनोापनय्रहः॥ भ्रवणेनेवपूतास्तेनिष्कामाश्शास्भवामताः॥२९॥ ||
एवंशिपुराणस्यपारायणमखोत्से ॥ समपिश्रोतभिभक्त्याप्रजाकायाप्रयत्नतः॥२५॥ शिवपरूजनवतसम्यकृपुस्तकस्यपरोने॥ ट
पूजाकार्यासुविधिनावक्तुश्चतदनन्तरम् रदुस्तकाच्छादना्थहिनवीनंचासनंश्ुभम्॥ सम चयेदटंदिव्यंबृन्धनार्थचसूचकम्॥२७॥
पुराणाथं प्रयच्छन्ति ये सू्रैवसनंनवम् ॥ भोगिनोज्ञानसम्पत्नास्तेभवंतिभवेभवे॥२८ वक्रदद्यान्महार्हाणिवस्तूनिविविधानिच॥
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शिवएराणकै पारायण महोत्सव समाप होनेपर विधानमे पुजा करनी चाहिये ॥ २५ ॥ हे मुने | शिवपुजनकै समान एस्तकके आगे विधिपु्वक
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वद्लभूषणपाजाणिदिव्धबहुविशेषतः॥२९॥ आसना्थप्रयच्छंतिपुराणस्यचयेनराः॥ कम्बलाजिनवासांसिम च॑फलकमेवच।॥३०॥ १
जो नवीन सत्र ओर वह्न प्राणके निमित्त देते हँ ३ भोगी ओर ज्ञानसम्प् युगायुग होते है ॥ २८ ॥ वक्ताको बडे बडे मोरकी अनेक वसतु
दान करे वच्च भूषण पात्र ओर दिव्य पदाथे दे ॥२९॥ जो भलुष्य ष्राणके आसनके निमित्त रेशमी वञ्च ऊनी च्च चौकी तस्ता देते है ॥३०॥ >
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¢ स्वगलोकको प्राप्त हो अनेक भोग भोगकर बरहमलोकको प्राप्त हो कल्पांते शिवरोकको जाते है ॥ ३१ ॥ इसप्रकार विधिसे एरतपुजन क करके वक्ताके महो
त्सवके सहित॥ ३२॥जो उनकै निकट सहायको पंडित स्थित है उसकी पूजा वक्तासे कुछही न्यून धनसे करे॥ ३३॥ आये हए ब्राह्मण आदिको भी अन्न
ओर धनसे सत्कार करना चादिये॥३४॥।जो भोता विरक्त हो तो दुसरे दिन विशेष करके शिवगीताका पाठ करे, मि.तका उपदेश शिवने रामचन्द्रको
| किया है।३५॥ ओर जो गृहस्थ भोता हो तो शुद्ध हविसे उस्न क्भशां तिके निमित्तहवन करे॥ ३६॥ अथवा रुद्रसंहिताकेभत्येक श्टोकसे होम |
%|| स्वगोकंषमासायघुक्तवाभोगान्यथेप्सितान्॥ स्थित्वानरह्मपदेकस्प॑यान्तिशेवम्पद्न्ततः॥२१॥ एवकृत्वाविधानिनपुस्तकस्यप्र
पूजनम्॥ वक्तुश्वथुविशाईमहोर्सवपुरस्सरम्॥ २२॥सहायाथस्थापितस्य॒पण्डितस्यप्रपूजनम्॥ कर्यात्तदन सा रणकिचिदू नधना
दिभिः॥३३॥समागतेभ्योविघरेभ्योदयादन्नधनादिकम् ॥महोत्सवःप्रकतव्योगीते वदन्तः ॥३४॥ विरक्तश्वभवेच्छरोतापरेहनि
विशेषतः॥गीतावाच्याशिवनोक्तारामचन्द्राययासुने ॥२५॥ गृहस्थ्चेद्धवेच्छरोताकरतम्यस्तेनधीमता॥ होमःशुदधेनहविषाकमणस्त
स्यशान्तये॥ ३६ ।शद्रसंदितयाहोमःप्रतिश्लोकेनवाशरने। ।गायच्यास्तन्मयत्वाचचपुराणस्यास्य तत्वतः।॥३७॥ अथवास॒लमंत्रणपंच
वणेनशेवतः॥ होमाशक्तोबुधोहोम्यहविरद याधिजायतत ॥३८॥ दोषयोःप्रशमाथचन्यूनताधिकताख्ययोः ॥ पठेचश्णयाद्कत्या
शिवनामसहसखरकम्॥३९॥तेनस्यात्सफटं सतं सफटना संशयः॥यतोनास्त्यधिकंत्वस्मातरैरोषयेवस्तुर्किचन॥७०॥ एकादशसि
तान्विप्रानभोजयेन्मधुपायसः ॥ दद्यात्तेभ्योपक्षिणां च वतपूणैत्वसिद्धये ॥७१॥ शक्तौपल्नयमितस्वणैनश्ंदरं सने॥सिहविधाय
पुराणस्यततास्यज्ुभाक्षरम् ॥ ४२ ॥
वा तन्मय गायत्री वा उस षुराणकै तत्स हवन करे ॥७॥ अथवा मूरष॑त्र वा पंच दणात्यकं शिवभेचते इन करे यदि हवनभे अशक्त हो तो
हौमकी हवि बाह्मणको दे ॥२३८॥ न्यूनाधिक दोर्षोकी शांतिके निषित्त भक्तिसे शिवस नाभका पाठ करे॥३९॥ उससे सब भवण सफ़र हो
¢| जायगा इसमे संदेह नहीं कारण किं त्रिछोकीमं इससे अधिक को वस्तु नहीं है ॥ ४० ॥ भु सीर आदिक ग्यारह बाहणोको जिम ओर
८॥ बहपूणेत् सिदधिकै स्मि उन्हं दक्षिणा दे ॥४१॥ हे छने शक्तिके अलुसतार तीन पर सुवणैका एक सिंह बनाकर उसपर इस षराणके ॥ ४२॥
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लेख ङिखाकर विधिपूर्वकश्थापनकर पूजन करे, आवाहनादिकेडपचार ओर दक्षिणसहित॥४२॥ व भूषण गन्धादि पूजाकर यतात्मा आचारथेको
यह भूतिं शिवके सन्तोषके निमित्त ३।४४॥ हे शौनक उस दानके भभावसे इस पराणकौ सफठता होती है ओर शिवके अहे भवबन्धन्स
क्त होजाता है॥४५।इस प्रकार विधानत श्रीशिवषराण पूणं फक देनेवाला होता है तथा भुक्ति खक्ति फल देता है॥४६॥ यहतुमसे सब वणैन
किया अब कया सुननेकी इच्छा है १ शिवराणका माहात्म्य सब कामनाका देनेवाला हि ॥४७॥ यह भी शिवषएराण सब एराणोँका तिरुकद्प है यह
लेखितंलिखितंवापिसंस्थाप्यविधिनापुमान्॥ सम्पूज्यवाहनायेश्युपचारेस्सदक्षिणाम्।४३। वल्नुभूषणर्गघ यिःपूजिताययतात्मने।
आचार्ग्यायसुधीर्द्ाच्छिवसन्तोषहेतवे%शतेनदानप्रभावेणपुराणस्यास्यशौनक।सं ब्राप्यालअदशे वषुक्तःस्याद्भवबन्धनाते।९५॥
एवंङृतेविधानेचश्रीमच्छिवपुराणकम्॥ संपूणफलदंस्यद्वेथुक्तिशुक्तिप्रदायकम् ॥४६॥ इतितेकथितस्वैकिभूयःश्रोतुमिच्छसि ॥
श्रीमच्छिवपुराणस्यमाहात्म्यसर्वकामदम्४७श्रीमच्छिव पुराणंतुपुराणतिलकंस्मृतम्।महच्छिवभमियंरभ्यं भवरोगनिवारणम्७८॥
येजन्मभाजःखटुजीवरोकेयेवेसदाध्यायं तिविश्वनाथस्।वाणीयणान्स्तौतिकथांशृणोतिश्रोद्रयंतेभवशुत्तरन्ति॥४९॥ सकलयुण
विभेदोनित्यमस्पष्टषूपंजगतिचबहिरन्त्भासमानंमरिम्ना॥ मनसि चबहिरन्तवाङ्मनोष्रृ्तिहूपंपरमशिवमनंतानंदसान्दर परपदे ०॥
इतिश्चीस्कान्देमहापुराणसनत्छुमारसंदहितायांश्रीशिवपुराणश्रवणत्रतिनांविधिनिषेधपुस्तकवक्त्रपूजनवर्णननामसप्तमोऽध्यायः७।
| प्रिय भवरोगनिवारक ॥४८॥ जो विश्वनाथका सदा ध्यान करते है वे जीवलोकमें ुखभागी होते है, बाणी युणोकी स्तुति करती दो
कानों इस कथाको भरवण कर प्राणी भवस्षागरसञे तरजाति है ॥ ४९ ॥ सम्पुणे णो बिभेदे नित्य स्पष्टहप जगतकै बाहर भीतर
भकाशमान भनक भीतर वाणी भनो वृत्तिहप प्रमशिव अनन्तानन्दसे पूर्णकी शरणमे प्राघ्र होता हू ॥ ५० ॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे सनक्कुमारसदहितायां प०ज्वालाप्रसादमिश्रह्ृतमाषारीकायां श्रीशिवपुराणश्रवणत्रतिनां विधिनिषेधपुस्तक
वक्तृपूजनवणनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ छभमस्त ॥ सम्वत् ३९९३ अधिक ज्येष्ठ १२; शके ॥ १८१८ ॥
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¢ अथ शिवमह।एरणे भाषारीकासमेते प्रथमा वियेश्वरसंहिता प्रा ध
वि ाायणाणानाणलणयण
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प्रथमा-विद्येश्बरसंहिता.
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श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ श्रीसरस्वत्यै नमः ॥ ॥ श्रीगौरीशंकराण्यां नमः ॥ ॥ अथ श्रीशिवमहा एराणे-वियेश्वरसहिता भाषाटीका प्रारभ्यते । ्
दोहा-गौरीशकर् पदकमलः. प्रमसहित दियलाय । श्री. मच्छयुपुराणकीः (4८. रच सभाय ॥ १ ॥ ८ ||
श्रुति सम्वेद्य अनादि शिव, साम्ब सचिदानंद । नि्ंण ब्रह्म विलक्षइक, ध्यायामि सखकंद ॥ २॥ ट्
ट जेहिकी माया पाय जग; भव पालन ठय होय । स्वभ स्वयम्थुजजासु बल, पावत गौरव दोय ॥ ३ ॥ ©
ट तिनको माधव रविगणाधीश शिवायुत ध्याय । जो निज जनके अघ सकल, छिनमे देत बदाय ॥ ९ ॥ >
ट मात पिता गुर भारती, वेदव्यास सनीश । प्रमसदित कर जोरकर, सबहिं नवाऊं शीश ॥ «4 ॥ ५
टं सपघ्रसहिता सहित श्री, शिवपुराण सुखदान । भुक्तिमुक्तिदायक सुगम, भक्तन जीवन प्रान ॥ ६ ॥ ५
ठ काशीपाकुक शिव सुमरि, गिरिजा गणपति ध्याय । शुम विद्येश्वरसंहिता, रीका लिखित बनाय ॥ ७ ॥ ठ
&|| श्रीभगवान् वेदव्याप्तजी शिवजीके बह्त्वभा तिके निमित्तउपायभूत वियायुक्त' वियेश्वर संहिता वणन करनेके निमित्त मङ्गल विधान करते रै जो सिके आदि ट
है| श्रीगणेशाय नमः ॥ । अथप्रथमाविधेश्वरसंहिताप्रारभ्यते ॥ आयन्तमंगलमजातसमानमावमायैतमीशमजसमरमात्मदेवम् ॥ ४
|| प॑चाननंप्रबलपंचविनोदशीलंसंमावयेमनसिशकरमम्बिकेशम्॥ १॥ व्यास उवाच ॥ धर्मक्ेमराकषबेगगाकालिन्दिसंगमे ॥ प्रयागे ५
परमेपुण्येबरह्मलोकस्यवर्मनि ॥१॥ सनयःशंसितात्मानस्सत्यत्रतपरायणाः ॥ मरौनसोमहाभागामहास्रेवितेनिरे ॥ २ ॥
ओर अन्तमे मङ्गलरूप है जिनके समान किपीमे भी समान भाव नही है अथात् भक्तजनोंके कल्याण करे ससे अधिक रै, आयन्तमे भी कारणालसरासे
४ जिसमे विश्वस्थित है, जो जरा मरण रहित रै, स्वपरकाशस्वरूप पश्चमख॒ख वल पश्चमहापातककै दूर करनेवाछे अथवा भन भक्तोकी स॒क्तिकै प्रतिबन्धकं ४
¢ पचि शब्दादि विषयोके हरनवाठे तथा भक्तोके कल्याण करनेवाठे अम्बिकापति शंकरको ग हदये ध्यान करता हूं ॥१॥ व्याजी नोरे उस परमके ||
४ महाकषेनमे जह गङ्गा ओर काठिन्दीका सङ्गम हज है; उस ब्रहलोकके मागैभूत प्रम एण्य भयाग देशम ॥१॥ सत्यवतमे प्रायण ज्ञानी बहे वती बडे टै
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॥२॥
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पराक्रमी महाभाग्यवान् ऋषि दीर्घ यज्ञ करने लगे ॥२॥ व्यासके शिष्य महा खनि उस यज्ञको श्रवण करके बह पुराणजाननेवा रोमशे सूतजी उस् स्थानम
आकर प्रात हृए ॥३॥ खतजीको आया देख खनि बडे परतन हुए ओर भरसन्न चिननपे उनकी विधिपूक पूजा करने ठगे॥४॥ तव विनय सयुक्त हो
वहं य॒निजन हाथ जोढकर कहने लगे ओर भरसन्न हए उन महात्माकी विधिपूवक पूजा करने लगे ॥५॥ हे सवज रोमहषण आप् भाग्यकै गौरवसे उ्यास्
जीते समय्णं षराणवियाको अर्थ सहित जान चकै हो ॥६॥ इस कारण आश्चयेमूत कथाओके आप पाच है जसे अष रत्नोका स्थान सागर है ॥७॥
तवसत्तसमाकर्ण्यन्यासशिष्योमहामनिः ॥ आजगामशुनीन्दरष्टेसूतः पोराणिकोत्तमः॥३॥ तंदष्टासूतमायातंदर्षितामुनयस्तद्। ॥
चेतसाघुप्रसत्रेनपूजा चकरर्यथाविधि ॥ ॥ ततोविनयसंयुक्ताप्रोचुःस्सांजल्यते ॥ सुप्रसत्रामदात्मानः स्तुतिकृत्वायथाविपि
॥4॥ रोमहर्षणसर्वज्ञभवान्वैभाग्यगौरवात्॥ पुराणविद्यामखिर्छग्यासात्पत्यथमीयिवान् ॥६॥ तस्मादाश्र्य्यभूतानांकथानांत्व
हिभाजनम् ॥ रत्नानाुरसाराणांरत्नाकरइवाणैवः ॥७॥ यच भूतं च मभ्यं च यचान्यद्रस्तुवर्तते ॥ नत्वयाऽविदितंकिचिच्चिलो-
केषु विद्यते ॥८॥ त्वंमदिष्टवशादस्यदर्शनार्थमिहागतः ॥ कुर्वन्किमपि नः श्रेयोनवृथागंतुमहंसि॥९॥ तत्त्व अतस्मनः सवपूवे-
मेव्चभाङ्चभम् ॥ नतप्तिमधिगच्छामः अवणेच्छशुहुहुः ॥ १० ॥ इदानीमेकमेवास्तिश्रोतग्येूतसन्मते ॥ तद्रहस्यमपिब्ू-
हिय दितेऽवुप्रहोभवेत् ॥ 9१ ॥ प्रापतैकल्युगेघोरे नराः पुण्यवि्वजिताः ॥ दुराचाररताःसवसत्यवातपराङ्मुखाः ॥ १२ ॥
परापवादनिरताः परद्रव्यामिखाषििणः ॥ परल्लीसक्तमनसः परहिंसापरायणाः ॥ १३ ॥
जो कुछ भूत भविष्य वतमान वस्तु है वह बिलोकीमे आपको कुछ भी अविदित नहीं ॥८॥ आप हमारे भाग्यते ही इस स्थानम भाप दए है, हमारे |
भी मङ्गढ किये विना आप् वृथा जानेको योग्य नहीं है ॥९॥ हमने पूर्मं भी आपसे अनेक शुभाशुभ वाता श्रवण की है, सो हम तृषिको नहीं प्राप्त होते ईँ
ब[रव।र सुननेकी इच्छा होती है॥१०॥ हे महाबुद्धिमान् ! इस समय जो रहस्य बात सुननेकै योग्य रही है वह कपाकर आप हमसे कहिये ॥११॥ इस
धोर कलियुगकै प्राप्र होनेमे एण्यहीन मनुष्य भ्रा ९ हँ सब हुराचारमे प्रीति करते ओर पण्यते तथा सत्य वातस हीन है ॥१२॥ पराई बुराई करनेमे
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निरत प्राये दरभ्यकी अभिलाषाकरनेवाटे पराई श्ियोमे मन ठगानेवाठे पराई त्ता करनेमे तत्पर ॥ १३ ॥ देहमे आत्माकी दृष्टि करनेवाटे मूख नास्तिक
| माता पिताका द्वेष करनेवाटे श्रीकोही माननेवाठे कामके किंकर रै ॥ ३ ४॥ बाह्मण लोभम प्रस्तहै वेदोके बे चके जीनेवा ठे धनकै वास्ते विया पटने- ,
ब्ाठे विके मदते मोहित ॥१५॥ अपनीजातिके कर्मके व्याग दए बहुधा द्रो को ठगनेवाठे त्रिकाठन्ध्यासे हीन बहकै बोधते वजित ॥१६॥ दयारहित ||
अपने आपको पेडित माननेवारे अपने आचार ओर वतक रोप करनेवाठे कृषीके उयममे रत क्रूर स्वभाव मलीन मनवाठे है ॥१८॥ इसी प्रकार 8
देदात्मदष्ठयामूढानास्तिकाः पञुबुद्धयः॥मतपितरकृतद्रेषाः खीदेवाःकामर्किंकराः॥१९॥ विप्राोभग्रहम्रस्तावेद विक्रयजीविनः॥ ४
धनाजनार्थमयस्तविद्यामदविमोहिताः ॥१५॥ त्यक्तस्वजातिकर्माणः प्रायशः परंचकाः ॥ अिकालसंध्ययारीनाब्रह्ममोधविव- |
जिताः ॥१६॥ अद्याः पंडितमन्यास्स्वाचारतरतरोपकाः ॥ कृष्युद्यमरताःकूरस्वभावामछिनाशयाः ॥१७॥ क्षत्रियाश्चतथासते ||@
स्वघर्मत्यागशीलिनः। अरत्संगाः पापरताग्यभिचारपरायणाः॥१८॥ अश्चुराअरणप्रीताःपलायनपरायणाः॥ कुचौवत्तयःशयुदाः ।
कामकिंकरचेतसः ॥ १९ ॥ शब्चाघ्लवि्ययादीनाघेनुविप्रावनोञ्ज्षिताः ॥ शरण्यावनहीनाशथकामिन्युतिभरगास्सदा ॥ २० ॥
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प्रजापाल नसद्धमविहीनाभोगतत्पराः ॥ प्रजासंहारकादृष्टाजीवर्दिसाकराभुदा ॥ २१ ॥ वेश्या 'संस्कारदीनास्तेस्वधम॑त्याग-
शीखिनः ॥ कुपथाः स्वाजेनरतास्तुलाकरम॑ककवृत्तयः ॥ २२ ॥
सब क्षत्रिय अपने धमेको त्यागनेवाटे कुेगतमं रत पापी व्यभिचारे परायण॥१८॥ कायर शद्रे पीति करनेवाडे परायनभे तप्पर कृल्िते चोरोकी
वृत्ति कलनेषाठे श्र कामक किंकर॥१९॥ शच्च अव्रको वियासेहीन धेल ओर ्राहणोको न पारनेवाटे शरणागतोंकी रक्षा नहीं करनेवारे ओर धनसे हीन
काभिनीकै रीककेहरिण ॥ २०॥ प्रजापालनकै सद्धभे हीन भोगोमे तत्पर परजाकै न्ट करनेवारे दुष्टजीव हिंसा करनेमे भरसन्न होनेवारे ॥ २१ ॥
इसी प्रकार सस्कारहीन वैश्य होकर अपने ध्मेको त्यागे हुए कुषार्मते द्रव्य छेनेभे तत्पर तराज्का कर्म ओर कुत्सित आजीविका करनेवाे॥२२॥
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गुरुदेव बाह्मणादिकी भक्तिते हीन कुवुद्धि बाह्मणोको न जिमानेवाठे प्रायःकपण मूषी वांधनेवाठे ॥ २३ ॥ जारभाक्से च्यम रमण करनेवाटे
मठीनमन छोभ मोहसे वित पूर्तादिमे धर्मको त्यागनेवाठे ॥ २४ ॥ दसी प्रकारे जो श्र है वह ब्राह्मणोंकेते आचार करते है उज्ज्वल
आकतिवाठे मूढ अपने पर्मको त्यागनेवाठे ॥ २५ ॥ तप कएने ओर बाह्मण तेज हरनेवाठे वाल्ककी अल्पमृत्युम मारणादि मन्त्रके उज्वल
कृरनेमे परायण ॥ २६ ॥ शाटिग्रामादिके पूजन करै होम केवाठे प्रतिकूक विचारवाटे, कृटिट, बाह्ञणोसि द्वेष करनेवाटे ॥ २७ ॥
गुरुदेवद्विजातीनां भक्तिहीनाःकुब्॒द्धयः॥ अभोजितद्विजाः प्रायः कृ पणाबद्धञ्टयः ॥२३। ।कामिनीजारमवेषुसुरतामरिनाशयाः॥
लोभमोहविचेतस्का प्रती दिसवृषोज्िताः॥२४॥ तद्रच्छदर ्येकेचिद्राह्मणाचारतत्पराः॥ उञज्वखाङृतयो मूढा ःस्वघमैस्यागशी
छिनः ॥२५॥ कर्तारस्तपसभियोद्विजतेजोपहारकाः ॥ शि श्वटपमृत्युकारा्मंबोच्चारपरायणाः ॥ २६ ॥ शालिभ्रामशिखदीनां
पूजका हेमतत्पराः॥परतिङूलविचारा्ङटिलाद्विजदूषकाः॥२७॥ धनवतः कुकम्माणोविद्यावन्तोविवादिनः॥ आख्यायोपासना
धम॑वक्तरोधमलोपकाः ॥२८॥ सुभूषाकृतयोदं भाः खदातारोमहामदाः ॥ विप्रादीन्सेवकान्मत्वामन्यमानानिजे मुम् ॥ २९॥
स्वध्मरहितामूढाःसंकराःूरञुद्यः॥महाभिमानिनोनित्यं चतुवरणविरोपकाः।३०।सुकुलीनाधिजान्मत्वाचतुर््णैविवतेनाः। सर्व-
व्ण्र्टकरामूढास्स्कर्मकारिणः॥३१॥ दियश्चपायशोभष्टामज्ञानकारिकाः॥शदयुरदरोदकारिण्योनिभैयामलिनाशनाः॥३२॥
( कुकर्मी विद्यावान् विषादी कथा ओर धमे उपाप्तनाके कंहनेवाके प्मेका छोप करनेवाटे ॥ २८ ॥ राजोकेती
बनानि्ाठे पालण्डी दाताक समान रहनेवाठे महामदसे युक्त ्ाहमणोंका सेवन ओर अपनेको प्रमु माननेवाे ॥ २९ ॥ अपने धृर्भैसे रहित
मू वणैसंकर कूरबुदधि नित्य महा अभिमान कएनेवाठे चारों वणक लोप करनेवाठे ॥ ३० ॥ अपनेको कुटीन मानकर चारों वणोकि वृत्तिवाटे
सुब वर्णोको भ्रष्ट करएनेवाटे मट् सत्कभके कएनेवाले है ॥ ३१ ॥ विशेषकर श्विये अपने स्वामीकी आज्ञा नहीं मानती सास धशुरते दोह
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|| करनेवारी, निय मरीन भोजन करनेवाटी ॥३२॥ कुहावभावमें निरत, कुत्सित स्वभाववाटी, कामस विहा, नित्य राजाके सेगमे रत ्
| स्वामीसे विल ॥३३॥ कन्या माता पिताकी भक्ितसे हीन दुराशयसे युक्त नित्य अवियाके पाठ करनेवाटी रोगे प्रथित देहवाटी॥ ३४ ॥ हे ४
घूतजी ! इन नबुद्धि, अपने धमक त्यागनेवारोकी इस छोक ओौर परलोकमं केसे गति होगी ! ॥३५॥ इस्त चिताते हमारा भन सदा व्याकु
रहताहै पराये उपकारके समान ओर कोई धमं नहींहै ॥३६॥ जित छोटे उपायसे इनका पाप शीघ्र शान्त हो वह तुम रपाकर कहो. तुम सब
सिदधान्तोके जाननेवारे हो ॥३७॥ व्यास्नजी बोटे ज्ञानात्मावाठे उन स॒नि्योके यह वचन सुन सूतजी मनसे शिवजीको स्मरण कर सनियोे
कुहावभावनिरताःकुशीलास्स्मरविहलाः॥जारसंगरतानित्यस्वस्वाभिविश्चखास्तथा। ३३।तनयामात्पि्रो्भक्तिरीनाईइराशयाः॥
अविद्यापाठकानित्यरोग्रसितदेदकाः॥३७।एतेषानष्टबुद्धीनांस्वधरमत्यागशीखिनाम्॥परलोकेपीदरोकेकथसुतगति्भेत्॥२५॥ |$
इतिचिताकुटचित्तजायतेसततंहिनः॥ परोपकारसदशोनास्तिधर्मोपरखटु ॥ ३६ ॥ ठघूपायेनयेनेषां भवेत्सदयोघनाशनम्॥ स्वं |©
सिद्धान्तविच्वंदिकृपयातद्वदाधुना ॥ ३७ ॥ ॥ भ्यासउवाच ॥ इत्याकर्ण्यवचस्तेषांुनीनांभावितात्मनाम्॥ मनसाशंकरंस्भरत्वा ठ
सूतः प्रोवाचतान्धुनीय् ॥३८॥ इतिश्रीशेवेमहापुराणेवियेश्वरसंहिताययानिप्रशवर्णनोनामप्रथमोऽध्यायः ॥१॥ सूतउषाच ॥
साधुपृष्टसाधवोवन्नेलोक्यहितकारकम् ॥ शुरस्मृत्वाभवत्स्नेदाद््षये तच्छ्णुतादरात् ॥१॥ वेदांतसारसर्स्वंपुराणंशेवसुत्तमम्॥ ||
स॒वांघौवोद्धारकरंपर्रपरमाथैदम्।२॥कलिकरमषविध्वंसियस्मिज्छिवयशपरम्। विनम्भतेसदापिपाशचतुर्षमफलप्रदम् ॥ ३ ॥ ||
बोटे ॥३<॥ इति श्रीशिवमहापुराणे बियेश्वरसंहिताभाषारीका सनिप्रश्वर्णनोनाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ तजी बोरे हे पहात्माओ ! आपने
अच्छा पृछा है इततमे जगत्का मङ्गठ होगा भँ ग॒ह्को स्मरणकर तुम्हारे नेहसे कहता हं आदरसे ुनो॥१॥ जो वेदान्तसारका सर्वस्व शिवराण है
¶ह सव पापक समूहका उद्धार करनेवाठा दूसरे ठोकोंमे परमाथेका देनेवाला है ॥ २॥ जिम शिवका यश है वह किक पापोका न्ट करने
वाटा है । हे बाह्मणो ! यह राण सदा चारो वर्गका फठ देनेवाढा स्थित है ॥ ३ ॥
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| हे बाणो ! उक्ष एराणके अध्ययनमात्रसे भन्तमे भाणी सबसे उत्तम॒सद्रतिको भरा होतेह ॥ ४॥ तबहीतक बह्हत्यादि पाप वियमान रहते ह
8 | जवतक जगम आश्वर्यरूप शिवषराणका उदय नहीं होता ॥५॥ तभीतक कङ्कं महाउत्पात निभेय चरते है अहो जबतक जगतमे शिवष्राणका ट
|| उदय नहीं होवाहै ॥६॥ तभीतक सव शाज्ञप्रस्पर विवाद करते जबतक जगत शिवष्राणका उदय नहीं होताहै ॥७॥ तभीतक शिवका स्वरूप ||;
ट| महान परुषोकोभी दरवो दीखताहै जबतक जगत शिवराणका उदय नहीं होताहै ॥८॥ तभीतक यमराजके कूर योध] निभेय विचरते जवतक र
£| तस्याध्ययनमव्रेणपुराणस्यद्विजोत्तमाः॥सर्वोत्तमस्यशेवस्यतेयास्यतिसुसद्रतिम्।।४।॥ तावद्विजु भतेपा्बरह्महत्यापुरस्सरम्॥याव #
६ च्छिविपुराणंहिनोदेष्यतिजगत्यहो॥५॥ तावत्कलिमहोत्पाताःसंचरिष्यतिनिर्भयाः॥ यावच्छिवपुराणंदिनोदेष्यतिजगत्यदो।।&॥ |
ह| तावत्सर्वाणिशाद्लाणिविवदृतिषरस्परम््॥ यावच्छिवपुराणं हिनोदेष्यतिजगत्यहो॥७॥तावत्स्वह्पंदुर्बोधंशिवस्यमदतामपि॥याव |$ |
|| च्छिविपुराणदिनोदेष्यतिजगत्यहो ॥८॥ तावद्यमभटाः कूराःसंचरिष्यतिनिभंयाः ॥ यावच्छिवपुराणंहिनोदेष्यतिजगत्यहो॥९॥ ८
है| तावत्स्राणानिप्रगर्जतिमहीतङे ॥ यावच्छिव राणेदिनोदेष्यतिजगत्यहो॥। १ ०॥तावत्सर्वाणिती्थानिविवदंति महीतले ॥ याव ||
च्छिविपुराणहिनोदेष्यतिजगत्यहो ॥११॥ तावत्सर्वाणिसंजाणिविवदंतिअदीतले॥ यावच्छिवपुराणंहिनोदेष्यतिमदीतङे ॥१२॥ ए
¢ ` तावत्सवांणिक्षेजाणिविवदंतिमहीतटे॥यावच्छिवपुराणंहिनोदेष्यतिमहीतले॥ १३॥ तावत्सर्वाणिषीटनिविवदंतिमहीतले।॥याव ट
६ च्छिविषुराणदिनोदेष्यतिमरीतङे ॥१४॥ तावत्सर्वांणिदानानिविवदतिमदीतङे ॥ यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यतिमरदीतले ॥१५॥ ॥&.
(0 सं०१ ४ आथ्वयेरूप शिवषएराणका उद्य् नहीं होता ॥ ९ ॥ तभीतक दूसरे पुराण पृथ्वीम गजते है जबतकृ आश्वर्यरूप शिवएराणका उदय नहीं होता। 1१ ०॥ तभीतकं ट 1
अ० २ ||| सव व पृथ्वीम विवाद क्रते ह जबतक शि्वराणका उदय नहीं होता है॥११। ।तभीतकं सव मन्त पृथ्वीम विवाद करते है, जवतक शिवषुराणका उद्य ह
|| होता॥१ २।तभीतक् सब षत पृथ्वीम विदाद् करते है,जबतक शिवशराणक पृथवीमे उदय नहीं होता॥ १ ३॥तभीतक सव पठ पृथ्वीम विवाद करतेहै ||
# || जबत्कं शिबऽराणका उदय नहीं होता ॥१४॥ तभीतक सव दान पृथ्वीम विवाद करते हँ जवतक आश्व्थरूप शिवराणका उदय नहीं होता ॥१५॥ ||
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| | यह देवता पृथ्वीम विवाद करते हँ जबतकं शिवराणका उदय नहीं होता ॥१६॥ तभीतक सव सिद्धान्त ृथ्वीमं विवाद करते है जबतक ४
ठ शिवराणका पृथ्वीम उदय नहीं होता॥ १७॥ हे बाह्मणो ! इस शिवराणकै भरवण कीरतनसे जो फर होता है वह मेँ सम्पुणं वणेन नहीं कर सकता
४ ॥१८॥ह पापरहित तो भी म उसका कु माहात्म्य कहताहूं चित्ते सावधान होकर सुनो जो ख्चपे ऽयासजीने कहा है ॥१९॥ इस शिवराणका एक ||
ग्टोकं अथवा आधा श्टोक जो भक्तिसे सुनते है वह उसी समय सब पापे छट जति है ॥२०॥ जो इस शिवष्राणको प्रतिदिन आस्य रहित होकर ९
ट तावस्घवचतेदेवाविवदंतिमरीतछे ॥ यावच्छिवपुराण दि नोदेष्यतिमदीतले ॥ १६ ॥ तावत्सर्वे चसिद्धान्ताविवदंतिमदीतङे ॥ र
4 यावच्छिवषुराणदिनोदेष्यतिमदीतले ॥ १७ ॥ अस्यशेवशराणस्यकीतेनश्रवणादिजाः ॥ फलवक्तुनशक्रोमिकात्सन्यैननि |£
सत्तमाः ॥१८॥ तथापितस्यमाहात्म्यवक्षयेर्किचित्तवोनघाः ॥ चित्तमाधायश्ृणतव्यासेनोक्तंपुरामम॥१९॥ एतच्छिवपुराणंरिश्टो ` ठ
|| कश्लोका्धमेवच ॥ यः पठेद्धक्तिसयुक्तस्सपापान्पुच्यतेक्षणात् ॥२०॥ एतच्छिवपुराणरियःप्रत्यहमतंदितः ॥ यथाशक्तिपठद £
|| क्त्यासजीवन्धुक्तउच्यते ॥ २१ ॥ एतच्छविपुराणदियोभक्त्याचयते सदा॥ दिनेदिनेऽश्वमेधस्यफटंपराभोत्यसंशयम् ॥ २२॥
| एतच्छ्विपुराणयस्साधारणपदेच्छया ॥ अन्यतःशृणयात्सोऽपिमत्तोषुच्येतपातकात् ॥ २३ ॥ एतच्छिवपुराणंयोनमस्छर्यादि ¢
ट| दूरतः ॥ सवैदेवा च॑नफरंसभ्राप्नोतिनसंशयः ॥ २४॥ एतच्छिवपुराणेवेरिखित्वापुस्तकंस्वयम् ॥ योदद्याच्छिवभक्तेभ्यस्तस्य ॥
६ पुण्यफठंशरणु ॥ २५ ॥ अधीतेषुचशाद्ेषुयेदेषुग्याृतेषुच ॥ यत्फलदुरुभलोकेतत्फरंतस्यसेभवेत् ॥ २६ ॥
यथाशक्ति भक्तिसे पढते ह बह जीवन्मुक्त होते ह ॥२१॥ दस शिवष्राणकी जो सदा भक्तिसे पुजा करते है वे दिन दिन अश्वमेधके फर्को धप होगे ४ |
४ इसमे सन्देह नहीं ॥२२॥ यह जो शिवए्राण है इसके साधारण पद अक्षर जो कि दृरेषे श्रवण करता है बह पत्त मी पातके छट जाता है ॥२३॥ जो
ह|| सस शिवषराणके निकट हो नमस्कार करते है वह सब देवताओंके अर्चनको प्राप्त होते है, इमे संदेह नही ॥२४॥ यह शिवषराण छिलकर जो ||£
‰॥ शिवमक्तोके निमित्त देता है उसके ण्यका फर सुनो ॥२५॥ शाजञोकेअध्ययन करने आप् वेदोके उपाख्यान केप्र जो फर रोकमे दुम है उसका ||
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शि० | फठ उसको होता है ॥२६॥ इस्त शिवएराणको चतर्दशीके दिन बत कहकर जो सभामे व्याख्यान करते है बह उत्तम है ॥२७॥ जो गायत्रीके प्रत्येक |
॥ ५ | ह|| अक्षरके भररणका फठ है वह इते मिकता है उससे यां सव ोगोको भोग अन्तमं शक्त हौजाता है ॥२८॥ जो चौदशके दिन वती टकर || ||
¢ रात्रिम जागरण करते है जो इते पते ओर छुनते हँ म उनके इण्यका फल कहता हूं ॥२९॥ कुरुक्ष्ादि अनेक पण्यस्थान सयंगरहणमे अपने ||+
|| उल्य धन ॥२०॥ कथा कहनेवाठे बाहर्णोको देने जो फल होता है वह फठ उसे अवश्य प्राप्त होता है जो कथा सुनते है मे सन्देह नही ट
| एतच्छिवपुराणदिचतदंश्यामुपोषितः ॥ शिवभक्तसभायांयोव्याकरोतिसरत्तमः ॥२७॥ प्रतयक्षरंतुगायथीपुर्थाफलंलमेत्॥ ध
ठ इटथुकत्वाखिलान्कामानंतेनिर्वाणतां जेत्॥२८॥ उपोषितश्चतुदैश्यांरा्ौजागरणान्वितः॥ यःपठेच्छणयाद्रापित्स्यपुण्यंवदाम्य र
| हम्॥ २९॥ककषेबादिनिखिलघण्यतीथष्वनेकशः॥ आत्मतुटयधनसूर््यमदणेसरवतोते॥ ३ ०॥विपरेभ्योभ्यासखुस्येभ्योदच्वायत्फ
| रमश्चते ॥ तत्फकसंभवेत्तस्यसत्यसत्येन संशयः ॥२१॥ एतच्छिवपुराणं हिगायतेयोयदनिंशम् ॥ आज्ञातस्यप्रतीक्षरन्वेवाडन्द्र ||
पुरो गमाः॥ ३२ ॥ एतच्छिवपुराणयःपठञ्चण्वरिहिनित्यशः ॥. यद्यत्करोतिसत्कमैतत्कोदिशणितंभवेत् ॥ ३३ ॥ समाहितः ट
पठेद्यस्त॒तनशरीरुदरसंहिताम् ॥ सब्रहमघ्नोऽपिप्रतात्भा्रिभिरेवादनेभवेत् ॥ ३९ ॥ तांश्दरसंहितांयस्तुभेरवप्रतिमांतिके ॥ त्रिःपठे ५
स्मत्यहमौनीसकामानसिखोेत् ॥ २५॥ तांशुढसंहितांयस्तुसपटेदरटविर्वयोः॥ पदक्षिणांभकवीणो ्र्महत्यानिवर्तते॥ ३६ ॥
कैलाससंहितातत्रततोऽपिपरमास्छृता ॥ ब्रहमस्वहूपिणीसाक्षात्मणवाथेभकाशिका ॥ ३७ ॥ |
॥३१॥ इत एराणको जो दिन ओर रात पठते है उनकी आज्ञाकी ईदादिदेवता प्रतीक्षा करते है॥३२॥ जो इस शिवधुराणको नित्य पदे सुनते है वे
जो सत्कमं करते है उक्तका कोटिगुणा फल होता है ॥३३॥ इसकी शुसंहिताको जो सावधान होकर पता है बह तीन दिनमे बहहत्याते छूट जाता §
॥३४॥ इसकी रुबरसंहिताको जो भेरवजीकी प्रतिमाके निकट प्रतिदिन तीननार `मौन होकर पठता है वह मनोरथोको भाप होजाता ३ ॥३५॥
अथवा रुद्रसंहिताको जो वट ओर बिल्वकी परदक्षिणाकरके पदता है उसकी नहत्या निदृ् होती है ॥ ३६ ॥ इससे परे केठाससंहिताका
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ओर भी अधिक माहात्म्ये जो साक्षात् बहस्वरपिणीओकारके अथकी भकाश करनेवाटी है ॥२७॥ हे बाहमणो ! केठाससंहिताका सम्पूणं | ।
शिवजी,आधा व्यास्जी ओर उसे आधा भ जानतार्हू। ३८॥सब तो कह नहीं सकता उस्भेते कुछ कहताहँ जिनके जानने तत्का चित्तशुद्धि होती $
| ३९।ह खनियो । रुदर हिता ठोकमे जिस् पापको नाश नहीं करती बह तो दूटनेसे भी नही मिक्ता ॥४०॥ शिवने जो उपनिषदहपी ससुत ट
मथकर निकाटी वह कुमारको अर्पण कौ जिका ज्ञानाृत पान करने पराणी अमर होजाता है॥ ४ १॥ हमहत्यादि पापोंकी निष्कति करनेको उयत ||५
होकर इस संहिताको एक महीना पृठृकर प्राणी पापोति खुकत होजाता है॥४२॥ ुष्पतिगरह) दुर्भोजन, दुवंचन दिस उत्पन्न हुआ पाप इत संहिताके ट
कैलाससंहितायास्तुमाहात्म्यवत्तिशंकरः॥कृत्स्न॑तदर्दम्यासश्चतदर्धवेदयदंद्विजाः ३८ तघर्किचित्परवक्ष्यामिङस्स्नवक्तनशक्यते॥ 4
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यज्ज्ञात्वाततक्षणाटोकचित्तशृदधिमवाप्यात्॥३९॥ननाशयतियत्पापेसरौद्रीसंहिताद्विजाः ॥ तत्तपर्याम्यहंलोकेमागंमाणोपि
सवेदा ॥ ४० ॥ शिवेनोपनिषत्सिधुमन्थनोत्पादितांद्॥कुमारायापिंतां तविसधांपीत्वाऽमरोभवेत्॥४ १॥ बह्महत्यादिपापानां ं
निष्कृतिकरतषुयत्ः ॥ मासमा्रसंहितां तां पठित्वा्चच्यतेततः॥४२॥दुष्परतिगरददुर्मोज्यदुराखापादिसं भवम् ॥ पा्पसङ्त्कीर्तनेन |
संहितासाषिनाशयेत् ॥४३॥ शिवालयेबिल्ववने संहितां तांपठेत्चयः ॥ सतत्फलमवाप्नोतियद्वाचोऽपिनगोचरे॥४४॥ सहितातां |£
पटन्भवृत्यायःशरद्धेभोजयेद्िजान् ॥ तस्ययेपितरःसयां तिशंभो"परपदम् ॥ ४५ ॥ चतुदैश्यानिराहासेयःपठेत्सहितांचताम् ॥ |£
बिल्वमूलेशिवःसाकषत्सदेवेवमपूज्यते॥४६॥ अन्यापिसंहितातवस्वकामफलग्रदा॥ उभेविशिषटेविजञेयेखीलाविज्ञानपूरिते॥४७॥ ||ह
पाठ करने न्ट होजाता है ॥४२॥ शिवाठय, वा बेर्पत्रके वनमे इस संहिताको जो भक्तिसे पदता है वह रेते फल्को धाप् है जो कहा नहीं जाता ह
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॥४४॥ भक्तिते उस सहिताको पदता हुआ श्राद्धमे बह्णोको जिमाव तो उत्क सव पितर शिवके टोकको चछे जाते है ॥४५॥ जो चतुद
शीकै दिन निराहार होकर इस संहिताको पेता है ओर जो विंत्वमूखमे पदता है बह साक्षात शिवहप होकर ¶जित होता है ओर देवता उक्षकी
। पूजा करते ६।४६॥ ओर दरी संहिता मी सब फामना ओर एठकी देनेहारी है दोनों भष्ठ है जिसे शिवजीकी मष्ट टीराका वर्णन ३।४७॥
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यह शिवषराण वेदसषम्मत कहा गयाहै यह ब्रहसभित राण पहटे शिवजीने बनाया था॥४< ॥ विवेश्वरसंहिता.रुदसंहिता.विनायकतहिता,उमा्स हिता,
मातृ्तंहिता,एकादशरुद्रसहिता, कैलाससंहिता, शतरुढरसंहिता॥ ४ ९। |कोरिसब्रसंहिता,सहस्षको टिरुद्रसंहिता,वायवीयसहिताधमैसंहिता इतनीसंहितादस
फराणमे ३।५०॥ यह बारह संहिता महा्ण्यरूप है हे बाह्मणो ! सुनो हम उनकी सेख्या कहते है ॥५१॥ वियेश्वरसेहिता १०००० इतनीही विनाय
कृसहिताहै,उमासहिता<० ° ° यातृसंहिता८० ० ०।॥५२॥ एकादशरुद्रंहिता १ २० ° ° कैलासंहिता६०० ° शतरुदसंहिता ३० ० ०।५३॥कोरिबर
तदिदशेवमास्यातंपुराण्वेदसंमितम् ॥ निमितंतच्छिनेवभथमंब्ह्मसेमितम्॥४८॥ विदेशंच तथरो्रवेनायकमथौमिकम् ॥ मान्
देकादशकंकैलासेशतरुदरकम्॥४९॥ कोटिर्ढसहसादकोिद्दैतथेवच॥वायवीयधमंसं्ञएराणमितिभेद्तः॥५.०॥ संहिताद्वादश
मितामहापुण्यतरामता ॥ तासासंख्यां्वेविप्राःशणतादरतोखिलम् ॥५१ ॥विेशंदशसादस्षरद्रवेनायकंतथा ॥ ओमंमातएुरा
णाख्वंत्यकाष्टसहस्रकम् ॥ ५२ ॥ अयोदशसदसंदिश्देकादशकंद्रिजाः ॥ षटसहसंचकैलासंशतर्र॑तद्दैकम्॥५२॥ कोटिरु्र
तरि्णितमेकादशसदखरकम् ॥ सहस्रकोटिश्द्राख्यशरुदितेथसंख्यया ॥५६॥ वायवीयंखान्धिशतंधर्मरविसदसकम् ॥ तदेवलक्ष
संस्याकंरौवसंख्याविभेदतः ॥५५॥ ग्यासेनतततसंक्षिपिचतुरविंशत्सदखकम् ॥ शेव॑त्रचतुथवेपुराणं सप्तसंहितम् ॥५६॥ शिवेसंकं
सिपतपर्वपुराणंमन्थसंख्यया ॥ शतकोटिपमाणंदिषुरासशसुविस्पृतम्॥५७॥ व्यस्तेटादशधाचेवपुराणेद्रपरादिषु ॥ चतुरुक्षण
सं्षिपतकरतेदरेपायनादिभिः ॥५८॥ पोक्तशिवपुराणंहिचतरविंशत्सदस्षकम् ॥ श्ोकानांसंख्ययासप्तसंदहितं ब्रह्मसंमितम् ॥५९॥
संहिता९० ० °सृहस्चकोरिरदरसंहिता ११० ० °वायवीयसंहिता १० ० ° ° धमेसंहिता १२० ० ° बारहसहस इस संख्यासे यह शिवपएराण एकलक्षश्ठोक था
ठव व्यासजीने सक्षेपकर इसे चौवीससहल किया .यह सातसंहितायुक्त उयासजीने चौथाशिवराण बनाया इसपे पूवं तीन दृपतरे ऽराण है।५४।५५।५६॥
ओर सृष्ठिके पारम्भमे यह एराण शकने सौकोरि श्टोकोमे कहा था परन्तु वह विस्मृत होगया ॥ ५७ ॥ फिर उया्नादिने दवाप्रकी आदिमे उनके
अढारह भेदकरके चारश्च श्टोकोमि संक्षि किये ॥५८॥ उसमे शिवऽराणमे चौवीस सह श्टोक है ओर बह्म्मित इसमे सात संहिता ६॥५९॥
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उनका करम यह है-वियेश्वर प्रहरी, रुद दूसरी, शतरुद्र तीसरी, कोरिरुदर चौथी संहिता ह ॥ ६० ॥ पांचवी उमा, छठी कैठास, ओर टै
सातवीं वायवीय संहिता इस भकार सात संहिता है ॥ ६१ ॥ यह दिव्य शिवश्ाण सात संहितायक्त सर्वोपरि विराजित ह, सवते सुन्दर गति ठ
देता है ओर ब्रहमतुल्य हे ॥ ६२ ॥ इस शिवपराणकी सातसंहिता जो पूरी आदरसे पठता हं वह जीवन्युक्तं होता हं ॥ ६३ ॥ श्रुति स्मृति
पुराण इतिहास अनेक शाद इस शिवणराणकी अल्प कलाको भी पराप्त नहीं होते ॥ ६४ ॥ यह निमे पुराण शिवजीने कहा है ओर टू
शिवधर्मे चतुर व्यासषजीने इसे संह किया हे, सम्पूणं जीवोंके उपकारके निमित्त संक्षेप किया है. यह तीनों ताप्का दूर करनेवाखा ओर ट
विेश्वराख्यातायारोद्रज्ञेयाद्वितीयिका ॥ ठतीयाशतरूदास्याकोटिरुद्राचतु्थिका ॥ ६० ॥ पंचमीचैवमौमाख्यापष्ीकेरास ||
संज्ञिका ॥ सप्तमीवायवीयाख्यासप्तेवंसंदितामताः॥६१।ससप्तसंहितंदिव्यपुराणशिवसंज्ञकम्॥वरीवर्तिबह्मतल्यंसवोपारेगति ॥६।
प्रदम् ॥&२॥एतच्छिवपुशणं दिसत्तसदितमादशत्॥परिपूर्णपटेयस्तुसजीवन्युक्तउच्यते॥ 8६ २॥ श्वतिस्सतिषुरणेतिहासागमशता |
निच ॥ एतच्छिविपुशणस्यनार्ईत्यर्पाकलामपि ॥ ६७ ॥ रवषुराणममरुशिवकीतितंतव्यासेनशैवभवणेननसंगृहीतस् ॥ संक्े |
पतःसकलजीवयुणोपकारेतापत्रयत्रमतरुशिवदंसतांहि ॥ ६५ ॥ विकैतवोधमैहदप्गीतोवेदांतविज्ञानमयःशरधानः ॥ अमत्सरं |
तदधैवेयवस्तुसत्कछप्तमतरैवभिवगेयु्तम् ॥ ५६ शव॑एुराणतिलकंखटसत्पुशणंवेदां तवेदविरुसत्परवस्तुगीतस् ॥ यौवैपटेख ट
शृणुयात्परमादरेण शंधुप्रियःसदिभेत्परमां ॥६७॥ इतिश्रीशिवभहापुराणेविदयेश्वरसहितायाद्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ ठ
सत्रषोको मङ्गल देनेवाा हे ॥६५॥ इरे छल रहित धका कीतेन् किया दै, यह वैदान्तके विज्ञानते युक्तं ओर भधान है, यह भत्सरहीन @
विद्वानोंकी जानने योग्य वस्तु है ओर सतरुषोके रुत्यसे युक्त ॒त्रिवका देनेवाा है ॥ ६९६ ॥ यह शिवएराण सल्छरागोका तिख्करूप है
इसमे वेदान्त ओर वेदम होनेवाी सदसतुका वणन किया हे जो इसको आदरसे पठता नता है बह शिषका भिय हो प्रमगतिको धाक होता
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हे ॥ ६७ ॥ इति श्रीशिवमहापराणे वियेश्वरसहिता भाषाीकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
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| सूतजीके वचन सुन बे परमचऋषि बोठे आप हमको वेदान्तस्षारका सवस्वरूप राण घुनाश्ये ॥ १ ॥ यह भ्ठ खुनि्ोके वचन सुन बतजी ||
॥ ७ ॥ ||| महाभसन हो शिवजीका स्मरण करते हुए कहने कगे ॥ २ ॥ सतजी बोठे हं सम्पूणं कषियो । सुनो भ अनामय शिवजीको भरणाम कर
वदोका सार राणो भ्ठ शिवऽराण कहता हं ॥ ३ ॥ जिसमे भरति भक्ति ज्ञान ओर वैराग्य वणेन किया है ॥ ४ ॥ ओर विशेष करकै
वदान्तसे जानने योग्य सदवस्तव्णन की है ॥५॥ सतजी बोठे हे छषियो । बेदका साररप एराण सुनो-पूं समयमे महान इस कल्पक वारंवार
बरीतनेपर ॥ ६ ॥ इत शवताराह कल्पक होने ओर शष्ट उत होने ओर तरिवेणीके निकट षट कुटमं उत्पन्न हूए छनिक परस्पर वाती
उ्यासउवाच ॥ इत्याकरण्यवचः सोतपोञुस्तेपरमर्षयः ॥ वेदां तसारसर्वस्वंपुराणश्रावयाद्भतम् ॥ 9 ॥ इतिश्त्वासुनीनांसवचनं
सुप्रहर्षितः ॥ संस्मशज्छंकरंसूतःप्रोवा चञुनिसत्तमान् ॥२॥ सूतउवाच॥शृण्वतुऋषयः सवेस्मृत्वाशिवमनामयम् ॥ पुराणप्रवणं
शेवंषुराणेवेदसारजम् ॥३॥ यतगीतंचिकंप्ीत्याभक्तिज्ञाननिरागकम्॥४॥ वेदांतवेंसद्वस्त॒विशेषेणप्रव्णितम्॥५॥सूतउवाच ॥
ण्व षयःसरवेपुराणेद्षारजम् ॥ एशकालेनमहताकल्पेऽतीतिएुनःपुनः ॥६॥ अस्मिन्तुपम्थितेकलपपरवृत सृष्टिकर्मणि ॥
सुनीनाद लीनानां ्वतामितरेतरम् ॥७॥ इदंपरमिदनेतिविवादः॒महानभूत्। तेऽभिजग्ब्विधातारह्याणंष्टुमम्ययम् ॥८॥
वाग्मिविनयगभीभिःसवेपरांजल्योऽत्ुवन्॥ त्वं हिसर्वनगद्धातासर्वकारणकारणम्॥९। कःपुमान्सर्वतत््वेभ्यः पुराणः परतः प्रः॥ ब्रह्म
वाच॥यतोवाचोनिवततेअप्राप्यमनसासई ॥१ ०॥यस्मात्सर्वमिदेबरह्मविष्णुश्दपूर्वकम्॥ सहयूतेद्वियेः सवै प्रथमंसं प्रसूयते॥११॥
कृरनेसे ॥ ७ ॥ यही प्र ह यही ब्रह है रेता नहीं इस भकार महाविवाद होनेढगा तव वै स्रव अविनाशी ब्रहञाके निकट यह प्रन पूछनेको
गये ॥ ८ ॥ विनययुक्त वाणीस वे सव हाथ जोडकर बोठे तुमही सब जगत्कै विधाता सव कारणक कारण हो ॥९॥ वह कौनहैजो |
है ओर भरति तथा महवते उतपन्न हए त्वोत परे है जि्को मन वाणी नहीं पहुंच सकतीं. बह्ाजी बोरे जिसको भाप न होकर् मन सहित
बाणी निवृत होजाती है ॥ १० ॥ जिससे यह मब बहा विष्ण रद इन्दर भूतेन्दियोके सहित प्रथम उत्पन्न होते हँ ॥ ११ ॥
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४ || भी देवेश्वर परमभकनिे उनके द्शेनकी इच्छा करते है ॥१३॥ बहुत कहनेसे क्या है शिवे भक्ति करनेसे यह भराणी सक्त होजाता है भरसरादसे
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देवताकी भक्ति ओर भक्तिसे भरसादकी भरामि होती है. जसे अंकुरसे बीज ओर बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है ॥१४॥ हे ब्राह्मणो ! इस कारण
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६ तुम शिवजीकै प्रसन्न करनेको पृथ्वीम जाकर सहस्वषके दीघं सत्रका अनुष्ठान करो ॥ १५ ॥ इसही यत्तम परभु शिवजीकी प्रसन्नतासे वेदोक्त ९
वियाका सार साध्यका साधक विदित होजायगा ॥ १६ ॥ सुनि बोटे परम साध्य क्या है ओर उसका साधन क्या है ओर उसका साधन ठ
एषदेवोमहादेवःसर्वज्ञोजगदीश्वरः ॥ अयंतुपरयाभक्तयादश्यतेनाऽन्यथाक्षचित्॥ १२ ॥ रद्रोहरि्दर्चैवतथान्येचसुरेश्वराः॥
वही देव महादेव सवेज्ञ ओर जगत्कै दैश्वर ई. यह शंकर परमभक्ति दीखते है अन्यथा इनका दशेन नही होता ॥ १२ ॥ शद हरि हर ओौर ट
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ट भक्तयापरमयातस्यनित्यदर्शनकांक्षिणः ॥ १३ ॥ बहुना्रकिमुक्तन शिवेभक्तयाविरच्यते ॥ प्रसादादेवताभक्तिःपरसादोभक्तिसं ॥4
ह| भवः ॥ यथेहांकुरतोबीजंबीजतोवायथां करः ॥ १४ ॥ तस्मादीशभरसादाथैयुथंगत्वाुवंदविजाः ॥ दीषेस्रेसमाङृष्वंयू यवर्ष॑सह ट
ह| खकम् ॥ १५ ॥ अशुष्यैवाध्वरेशस्यशिवस्येवरसादतः ॥ वेदोक्तवियासारतज्ञायतेसाध्यसाधनम्॥१६॥सुनयञलुः ॥ अथि |©
ट| परमसाध्यकिवातत्साधनंपरम् ॥ साधकःकीदशस्ततदिदग्रूहितत््वतः ॥ १७ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ साध्यंशिवषदपाप्तिःसाधनंतस्य ॥ट
| सेवनम् ॥ साधकस्तत्प्सादायोऽनित्यादिफलनिःस्पृहः॥ १८ ॥ कर्म॑कृत्वातुवेदोक्ततदर्षितमहाफलम् ॥ परमेशपदषाप्तिःसालो ट
ह| क्यादिक्रमात्ततः ॥ १९ ॥ तत्तद्क्तयवुसारेणसर्वेषा परमंफलम्॥ तत्साधनंबहुविधसाक्षादीशेनगोधितम् ॥ २० ॥ ट
किंस प्रकारका होना चाहिये सो आप हमते तत्प वणेन कीजिये ॥१७॥ ब्हाजी बोरे साध्य शिवपदकी भराति ओौर उनकी सेवा करना ||
४ साधन है, ओर नित्य नैमित्तिक आदि कर्मक फट स्वगादिकी स्पृहा न करनेवाखा उनके पर्ादसे साधन होता है ॥१८॥ वेदोक्त कथ करङ ||#
{ उसका फठ जो प्रमपदकी प्रापतिके निमित्त शिवको सम्पण किया जाता है उसके कमते सायुज्यादि सकत भाप होती ३ ॥१९॥ उस उस ||>
ट भकरितके अनुसार सबको वह परमफठ प्राप होता है, बहुत भरकारते उसके साधन साक्षात शिवजीने कथन किये है ॥ २० ॥
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शि०य उसका सक्ेप करके सारमात्र यै तुमसे वणन करता हँ कानत उनकै यण सुनने, वाणीते कीर्तन करने ॥२१॥ ओौर मनसे उनका भनन करना यही
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महासाधन कहठाता है, महेश्वरका भवण कीर्तन ओर मनन करना चाहिये॥२२॥ आत्मा वा अरे द्षटन्यःशौतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः”
¢ इति। यह श्रुति इसमे णाम है इससे प्रे ओर साधन नहीं इस कारण सन भकार एक शिवप्रायणताके साध्यको भाप हौ॥२३॥ ओर वेदम जो
आत्माको ते ओर हने एषा पथम देखकर पे भवण करनेको कहा तो बिना रथम देसे कषे षन १ उत पर कहवे हं किःडोककी भवतत नेत्ति
ट| स्वकर उस पार्थम होती है परन्तु वह सर्वर अभतयक्ष है इस कारण भवणते ही भयम आरम्म करे ॥ २४॥ ओर बुद्धिमान को उचित है कि,
द| संक्षिप्यतत्रवः सारंसाधनंप्रवीम्यहम् ॥ शरोत्ेणश्रवणंतस्यवचसा कीर्तनं तथा ॥२१॥ मनसामननंतस्यमहासाधनघुच्यते ॥ श्रौत
| व्यकीतितम्यश्चमन्तम्यश्चमदे:परः ॥ २२॥ इतिश्वतिप्रमाणनःसाधनेनाऽघुनाप्रम् ॥ साध्य॑त्रनतसर्वाथसाधनेकपरायणाः
|| ॥ २३॥ प्रत्यक्षचक्ुषादक्षातरोकःभवरतते॥अपरत्यक्ष दि सरवजज्ञात्वाभरोेणचेष्टते॥२४॥ तस्माच्छूवणमेवादौत्वागुयुखाद्
४ बुधः ॥ ततःसंसाधयेदन्यत्करीतन मननं सुधीः ॥२५॥ कमान्मननपर्यतेखाधनेऽस्मिन्सुसाधिते॥ शिवयोगोभवेत्तनसालोक्यादि
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कमाच्छनैः ॥ २६ ८९ सर्वागन्याधयःपशवात्सवूनिदश्चरीयते ॥ अभ्यासात्छ्केशमेतदवेपशचादात्ंगलम् ॥ २७ ॥ इतिश्रीरि
वमहापुराणेविधेश्वरसंहितायांसाध्यसाधनसखण्डतृतीयोऽयायः ॥ २ ॥ घुनयञ्खुः ॥ मननकीदशं्रह्मन्दरवणंचापि कीदशम् ॥
कीर्तन वा कथं तस्यकीतंयेतद्यथायथम् ॥ १ ॥
प्रथम गुरुखखसे उसका श्रवण करफे पीठे कीतेन ओर भननको साधन करे॥ २५॥कमसे जब मननका साधन होगा तब शिवयोगकी राति होनेसे
मते शिवकी साटोक्यादिखधिति भ्रात होगी ॥ २६ ॥ प्रथम सम्पूणं अंगकी प्याधि ओर पात् सर्वानन्दभी ब्रहम ठय होजाता है ट
अश्या नहीं तबतक सपनम कष्ट है पीछे सव भकार आदि अन्तम् मंगर होता है ॥२७॥ इति शिवमहाऽराणे वियेश्वरसंहिता भावादीकायां
तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥ मनि बोडे हे बह्याजी ! मनन् ओर भवण किम भकारे होता है ओर कीतेन कित भरकार् किया जाता है सो आप यथार्थं कीतन ||
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6 | ॥ १ ॥ बरह्ाजी बोठे पूजा जप ईश्वरके श॒णहपृ विरात ओर नामे तथा युक्ति जो मनका शुद्ध करना है वही भनन ईश्वरकी ४
| छृपादृष्टिसे प्राप्त होता ३, यही सब भेष्ठ साधनो मुख्य ै॥२॥ गान करके वैदिक शब्द करके ओर भाषामं शंमुके प्रताप णप ओर नार्मोका ४
विखास ओर मनोहर रसीली वाणीसे जो इनकी स्तुति करी जाती है इसका नाम कीर्तन है, यह मध्यसाधन है ॥ ३ ॥ जिस किसी कारणे त
४ शिबमाहातस्य सूचक शब्द समूह जहां कहीं श्रवणेन्दियगोचर होता है, ओर जो सीकरीडाके समान शिवचरित्र भवणमेही नित्य इद् रमण करता है
& || उसको प॑ंडितनि भवण कहा है, यह जगत्मसिद है॥४।सत्सेगतिसे प्रथम तो श्रवण फिर पशुपतिके युणोका हदतर कीतंन होवा है, पीछे, सर्वोत्तम ट
|| ब्रह्मोवाच॥पूजाजपेशथणशूपविखासनाभ्नां युक्तिभ्रियेण मनसा परिशोधनंयत्॥तत्स॑ततं मननमीश्वरदष्िभ्यंसवेषुसाधनवरेष्व ठ
६|| वपिघ्ख्यसख्यम्॥२॥गीतात्मनाशुतिपदेनचभाषयावाशभुप्रतापणङ्पत्रिकासनाम्नाम्॥ वाचास्फुरंतुरसवत्स्तवन॑यदस्यतत्की त |©
©|. नंभवतिसाधनम्रमध्यम् ॥३॥ येनापिकेनक्रणेनचशब्दपुजयजक्निच्छिवपरंश्रव्णेद्रियेण ॥ श्रीकेलिवहटतरंपणिधीयतेयत्तदरे |©
|| इघाः वणम जगत््सिदधूम्॥8॥ सत्सगमेनभवति्रवरणप्रस्तात्संकीतनंपञ्यपतेरथतददंस्यात् ॥ सवोततसंभवतितन्मननेतदंते |©
४ सर्वदिसंभवतिशंकर दष्टिपति॥५॥ सूत उवाच॥ अस्मिन्साधनमाहात्म्येपुरावृ्तसुनीश्वराः॥ युष्मदेथेपव्ष्याभि शृणुध्वमवधानतः ||
॥६॥ पुराममयुरूग्यांसःपराशरघुनेःसुतः ॥ तपश्वचारसंभरांतःसरस्वत्यास्तरेश्चुभे ॥७॥ गच्छन्यादछयतवविमानेनाकैरोचिषा॥ |
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सनत्ङमारोभगवान्ददशेममदेशिकम् ॥ ८ ॥ ध्यानारूढः परुद्धोऽसोददर्शतमजात्मजम् ॥ पणिपत्याहसभातःपरंकौतूदङ्सुनिः
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इतिहास कहते ह हेऋषियोम साव ||
धानहोकर सुनो ६॥ भथम पराशर सनिकै एत्र हमारे युर उयासजी संभ्रान्त हो सरत्वतीकै न्द्र किनारे प्र तप करने लगे ॥७॥ वहां अपनी ति
| रके समान कान्तिमान् विमानपर मेढे भगवान् सनत्कुमारजीको हमारे यने देला\!<॥ हमारे यरुजीने ध्यानसे जागकर इन बहाजीके उको भेजा अौर
|| भ्रणामकर परमको तूहे खनिने पूछा ॥९। ध्यं परदानकर देवताओं योग्य आसन दिथा ओर पसन्नहो सनत्कुभारजीने मभीरवाणीस कंहा॥१०॥
॥९॥ दच्त्वार्व्यमस्मेप्रददौदेवयोग्यच विष्टिरम् ॥ प्रसन्नःवाहतंप्रहुयुमैभीरथागिरा ॥१०॥
मनन होता है परन्तु यह सथ कुछ शिवजीकी कपादृषिसेही होता है॥५।सूतजी बोले एन साधनोंमे हम एकं एराना
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तुम्हारे सहायक है फिर तुम किनके निमित्त तप करतेहौ ॥ ११ ॥ जब कुमारने देता कहा तब सनि अपने आशयको भ्रगट करने ठगे, ध्म,
अर्थ, काम, मोक्ष, इनका वेदमार्गे आदर ह ॥१२॥ ओर आपकी कपास मने ठोकमे अनेकभकारसे इनकी स्थापना की है इस भकार यै सबका
यु भी हं परन्तु ॥१३॥ प्ररमअदैत खकितका ज्ञान सुज्ञ उदय नहीं होता, म उसका कारण नही जानता इस कारण सक्ति निभिच्च तप करता
हं ॥१४॥ इस भकार जब व्यास्षजीने भगवानु सनत्कुभारसे कहा तव हे खनियो ! उन समने छक्का कारण वर्णन किया किं ॥
¢ सनत्कुमारउवाच ॥ सत्य॑वस्तुषुनेदध्याःसाक्षात्करणगोचरः ॥ सशिवोथासहायोत्रतपश्वरसिफंकृते ॥११॥ एवयुक्तःमारेणपो
| वाचस्वाशयंसुनिः॥धर्ार्थकाममोक्षाश्वेदमागकृतादराः॥१२॥ बहुधास्थापितारोकेमयात्वत्कृषयातथा ॥ एवंभूतस्यमेयप्यवेशुङ्भू
तस्यसर्वेतः ॥१३॥ श॒क्तिसाधनकंज्ञानंनोदेतिपरमाद्धतम् ॥ तपश्वरामिशक्तयर्थनजानेत्रकारणम् ॥१४॥ इत्थंङुमारोभगवान्व्या
सेनखनिनाथितः॥ समथ प्राहवि्रेदानिश्वयुक्तिकारणम्॥ १५॥ श्रवणंकीतेनंशंभोमैननंचमहत्तरम् ॥ घ्रयंसाधनशरक्तंचविद्यतेवेद्
संमतम् ॥१६॥ पुराहमथसंभांतोद्यन्यसाधनसंभ्रमः ॥ अचरेमेद्रेशेलेतषशरणमाचरम् ॥१७॥ शिवाज्ञयाततः प्राप्तोभगवात्न
| दिकेश्वरः ॥ समेदयाहुभगवान्स्व॑साक्षीगणेश्वरः ॥१८॥ उवाचमद्यंसस्नेद॑युक्तिसाधनघुत्तमय् ॥ अरवणकीर्तनंशं भोमननेवेदस
|| मतम् ॥ १९ ॥ मिकंचसाधनुक्तौशिवेनममभाषितय् ॥ श्रवणादितरिकंब्न्डुरव्वेतिशुहु्हुः ॥ २० ॥
||| १५ ॥ शिबजीका अवण कौतन मनन यह ३ महान् साधक शक्तिके वेदसम्पत ह ॥ १६ ॥ प्रथम सुञञे भी अन्य साधनम
प्रम हृ था तब मँ भन्दराचर पर्वतपर तप करने ठ्गा ॥ १७ ॥ तब शिवजीकी आज्ञास भगवाच् नन्दिकैभ्वरजी वहां आये
इह सवके साक्षी गणेष्रनी महादयाु ।। १८ ॥ अत्ते सनेहपष॑क किते साधन कहने रुगे. शिवजीका भण कौन ओौर मनन ही
वेदसम्मत है ॥ १९ ।॥ यही तीन स॒क्तिके साधन शिवजीने ुञचसे कहे ६ इसकारण हे बहमन ! यही तीनो साधन वारंवार करो ॥ २० ॥
शि° | सनत्कुमारजीने कोठे हे घने । कया तुम सत्य वस्तु शिवतत्वका ध्यान करते हो तो जो ध्यान करनेवाकं कणैगोचर (त्यक्ष) होते ई वह शिव
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प्रकार विधिसे सनत्कुमारजी कह कर विमानमं स्थित हृए परमस्थानको चके गये॥२१॥ हे ऋषियो ! सकेपसे हमने यह तुम्हारे भ्रति पहला |
वृत्तान्त वर्णन किया. ऋषि बोे हे सूतजी ! आपने स॒क्तिके श्रवणादि तीन उपाय हमसे कहे ॥ २२ ॥ जो इन तीनोंके करनेमं असमथ हो |
बह किस प्रकार पापसे टूट सकता है किंस कर्मसे विना यत्नके छक्ति होजाती है॥२३ ॥ इति श्रीशिवमहाणराणे वियेश्वरसंहिताभाषारीकारयां
चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ सूतजी कहते है जो श्रवणादि तीनों कार्योमिं अशक्त हो वह॒ शिवजीकै ठिगबेरकी ही पूजा करे जो कोह शंकरकी
मूतं बना स्थापनकर पूजन करे वह भी संसारके पार होजाता है ॥ १ ॥ वंचनारहित शिषजीकै ऊपर शित अयुशतार द्रव्य चावे ओौर वै
एवमुक्छा ततोव्यासंसावगोविधिनंदनः ॥ जगामस्वविमानिनपदं परमशोभनम् ॥ २१ ॥ एवसक्तंसमासेनपूरववृत्तांतशत्तमम् ॥ ऋष
यॐचुः ॥ श्रवणादित्रयंसूतयुक्तयोपायस्त्वयेरितः ॥ २२ ॥ श्रवणादिप्िकेऽशक्तःर्किकृत्वाघ्रच्यतेजनः ॥ अयत्नेनेवसक्तिःस्या
त्कमेणाकेनेतुना ॥२३॥ इतिश्रीशिवमहापुराणेप्रथमायां वियेश्वरसहितायां साध्यसाधनखण्डेचतुर्थोऽध्यायः।॥ ४॥ सूतउवाच ॥
श्रवणादि्रिकेऽशक्तोखिगवेरंचशां करम् ॥ संस्थाप्यनित्यमभ्यच्यंतरेतसंसारसागरम् ॥१॥ अपिद्रव्यंवहेदेवयथाबलमवंचयन्॥
अर्षयेद्धिगबेरा्थमर्चयेदपिसंततम्॥२॥मंडपंगोपुरतीर्थमरकषेत्रतथोत्सवम् ॥ वच्वगंधंचमाल्यचधूपंदीपंचमभविंततः।॥ ३॥ विविधातन
चनेवे्यमपरपव्यंजनेयंतम्॥छध्वजचम्यजनंचामरंचापिसांगकम् ॥४॥ राजोपचारवत्सर्वधारयेदधिगबेरयोः ॥ प्रदक्षिणांनसस्का
रंयथाशक्तिजपंतथा ॥ ५ ॥ आवाहनादिसगतिनित्यंक्यात्सुभक्तितः ॥ ईत्थमभ्य्च्ययन्देवंङ्िगिमेरेचशां करे ॥ & ॥
सव वस्तु वेरटिगके ऊप्र चढाकर निरंतर पूजा करे ॥ २ ॥ मण्डप निमौण गोर तीर्थं म क्रम गमन उत्सव वच्च गंध माला धूप दीपे
भित पूर्वक प्रसन्न करे ॥ ३ ॥ माठपुए सहित शिवजीको अनेक प्रकारके अन्ने चटावे छव ॒ध्वाजा व्यजन चमर आदिमे सांग पूजा करे
॥ ४ ॥ सब उपचार बेरङिगके राजाके समान करे प्रदक्षिणा नमस्कार यथाशक्ति जप ॥ ५ ॥ आवाहनादि विसर्जनतकं नित्य भक्तिपूर्वकं
|| करे. इस प्रकार छिगबेरमे देवदेव शंकरका पूजन करे ॥ ६ ॥
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५ . श्रवणादि छोडकर जो भक्तिपूर्वक इस भकार शिवजीका पूजन करता है बह सिदध होजाता है. ठिगबेरकी अचैनासेही पटले महाजन सकत
॥१०॥ || || होगे है ॥ ७ ॥ खनि बोले बेरमानरमे तो सर्वत्र देवतागण् भजित होते है परंतु िगनेरमें स शिवजी कैसे पूजित होति ई ॥ <॥ चतली
ट बोरे अहो खनीश्वरो ! यह तुम्हारा प्रश्न महापवित्र है ओर अद्भुत है इसकै वक्ता महादेवही है द्रा कोई नहीं ॥ ९ ॥ मँ शिवजीका
{| कयन कहता हं जो कमसे यरुखखसे सुना है. शिवही एक बह्मरूप होनेसे निष्कल कहलाते है ॥ १० ॥ रूपी होनेसे बह सगण होजाता ह
ट| इस कारण वह सयण निरीण कहाते है, निष्क होनेसे वह निराकार है छिगमे उनकी भाति है ॥ ११ ॥ ओर सणण होनेसे साकार बेरहप
¢ सिद्धिमेतिशिवप्रीत्यादित्वापिश्रवणादिकम्॥र्गवेरार्चनामाजान्षुक्ताःपर्वेमहाजनाः॥७॥ शुनयञचुः॥बेरमाभेतुसर्वज पूज्येतेदेव
तागणाः॥ रिगिवेरेनचसर्वत्रकथंसंूज्यतेशिवः ॥८॥ सुतउवाच॥ अहोघुनीश्वराःुण्यपरश्नमेतन्भहाद्ुतम् ॥ अवक्तामहादेवो
ट नान्योऽस्तिपुरूषःकचित् ॥९॥ शिवेनोक्तं प्रवक््यामिकमाद्ग॒श्युखाच्छरतस् ॥ शिवैकोबरह्ह्पत्वात्निष्कलःपरिकीतिंतः ॥१०॥
|| हपित्वात्सकरस्तद्वत्तस्मात्सकलनिष्कलः॥निष्करत्वात्निराकारंखिगंतस्यसमागतम् ॥११॥ सकरत्वात्तथाबेरसाकारंतस्यसेग
&|| तम्॥सकलाकलहपत्वाद्रद्शब्दाभिधःप्रः॥१ २॥अपिरखिगेचबेरेचनित्यमभ्यच्यतेजनेः ॥ अब्रह्मत्वात्तदन्येषानिष्कलत्वंनहिक्घ
| चित्॥१२।तस्मत्तनिष्कलेिगोनाराषयतेषुरेश्वराः॥अब्र्नत्वाचजीवत्वाततथान्येदेवतागणाः। 9 ४।तूष्णीसकलमाचत्वादच्यतेबेर
मा्रके॥जीवत्वंशंकरान्येषां ब्रहमत्वंशंकरस्यच॥ १५॥ वेदातसारसंसिधग्रणवाथेप्रकाशनात्॥ एवमेव पुरापृष्टो मंदरेनं दिकेश्वरः॥ १६॥
|| ई यह सण नियणरूप होनेसे शब्द ब्रह नासे सबसे परे है ॥ १२ ॥ रिग ओर वैरम भ्राणी इनकी सदा ¶जा करते ह ओर |
द| क्क ओर देवता बहन नहीं इससे बे निष्कल नही हो सक्ते ॥१३॥ इस कारण वे दूसरे देवता निथणरिगमे आराधना नहीं किये जाते, कारण
४ कि बहन नहीं जीव है इसी भकार ओर देवता ॥१४॥ मौनरूप कामा होनेते बेरे अचैन करते शंकरफे सिवाय ओरोमे जीवत्व है ओर
% || शेकरमे बहात्व है ॥१५॥ ॐकारके निमित्त नहहपते शकरत्व पकाश करनेते उपनिषद् सिद्ध है, यही वार्ता मन्दरपवतपर नंदिकेश्वरको॥१६॥
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। | पतर बुद्धिमान सनत्कुमारसनिने पुंी थी. सनत्कुमार बोढे शिवजीते अन्य देवता अपने सव भकर्तोके सव ॒प्रकारसे अधीन होजाते
> ह ॥ १७ ॥ केवर बेरमात्रे पुजा अनेक प्रकार घुनी ओर देखा है परन्तु शिवजीकी पूजां बैररटिग देखा गया हे॥ १८ ॥ दस
६
कारण आप छुगमताते यञ्च कल्याण तच श्रवण ॒कराइये नन्दिकैश्वर बोरे आपका यह भश्च बहासवरपविषयक ह ओर कहनेमं अशक्य
है ॥१९ ॥ परन्तु आप पापरहित ओर भक्तियुक्तं हो इस कारण जसा शिवजी सुना है वह मँ कहता हं शिब. बहूप ओर कटारहित
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|| होने निर्ण कहते ई ॥ २० ॥ पूजा करम सव वेदसम्मत छगला है ओर वही निश ह, काग होन सकठ ( सण ) कहाता
४ सनत्छमारघुनिना्रहमु्रेणधीमता॥ सनत्छमारडवाच ॥ शिवान्यदेववश्यानांसषामपिसर्वतः ॥१७॥ बेरमा्धेचपूजार्थश्चतेदष्
चधुरिशः ॥ शिवमातस्यपूजायांशिगंबरंचदश्यते ॥ १८ ॥ अतस्तदन्रूहिकल्थाणतच्त्वंमेसाधुबोधनम् ॥ नंदिकेश्वरउवाच ॥
ए अवुत्तरमिमंप्रभरदस्यंब्रह्लक्षणस् ॥ १९॥ कथयामिशिवेनोक्तभक्तियुक्तस्यतेऽनघ ॥ शिवस्यब्रह्महूपत्वातिष्करत्वा्चनिष्क
ह| लम् ॥ २०॥ रिगंतस्यैवपूनायांसर्ववेदेषुसंमतम् ॥ तस्यैवसकरत्वाच्चतथासकलनिष्कलम् ॥ २१ ॥ स॒करुचतथाबेरपूनायां
लोकसंमतम् ॥ शिवान्येषां चजीवत्वात्सकरत्वा्चसवैतः॥ २२॥ बेरमाघरंचप्जा्यासमतवेदनि्णये ॥ स्वाविभौवेचदेवानां सकर
|| शूपमेवहि ॥ २३ ॥ शिवस्यर्गिषेरंचदर्शनेदश्यतेखलु ॥ सनत्मारउवाच ॥ उक्तत्वयामहाभागर्गबेरपरचारणम् ॥ २४ ॥
|| शिवस्यचतदन्येषांविभज्यपरमा्थतः ॥ तस्मात्तदेवपरमेखिगबेरादिसंभवम् ॥ २५ ॥ |
है ॥ २१ ॥ सगुण पूजामे टोकसम्मत बेरमे पूजन करना ओर शिकते अन्थ दैवता जीवरूष होनेसे सव धकार कठायुक्तही ॥ २२ ॥ वेदे
निय करके पूजनम बेरमात्रका परिणाम कहा है कारण कि, देवताके आविभाष होनेते उसका सकटहप दीखता ३॥२३॥ शिका छग देर
४ शिवशाज्ञमे दीखता तो है परन्तु बह निथैण होनेसे प्रमाणरहित भी है,सनक्कुमार बोठे हे षहाभाग! आपने रिग बेरका अर्चनं कहा॥ २४॥ शिवका
तथा दूसरे देवताओंका भी विभागपूषैक प्रमाथसे वणनकिया इस कारण उस परमात्मक छिगका बेरादिभ जिसभकार दुभा हुआ है ॥२५॥
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हे योगीन्द्र ! मै उत॒ खिगाविभवका लक्षण सुना चाहता हं ॥ नन्दिकेश्वर बोरे हे वत्स ! सुनो मेँ तुम्हारी प्रीतिसे कहता हूं ॥ २९ ॥
ूर्वकाख्मे जो पहला कल्प था जो लोकम विख्यात है उस समय महात्मा बल्ला ओर विष्णका परस्पर युद्ध हआ था ॥ २७॥ उनके मान्
दूर करनेको उनके बीच उन निष्कठ प्रमात्माने स्तम्भरूप अपना स्वरूप दिखाया ॥ २८ ॥ तव जगत्के हितकी इच्छसे निग शिवने
उक्ष तेजोमयस्तंभसे अपने छिगाकारका स्वरूप दिखाया ॥ २९ ॥ उसीदिनसे लोकम वह॒ निष्कङ शिवजीका ठग विख्यात हुआ, ओर
श्रोतमिच्छामियोगीदरखिगाविर्भावलक्षणम् ॥ नंदिकेश्वर्डवाच ॥ शृणवत्समवत्पीत्यावक्ष्यामिषरमार्थतः ॥२६॥ पुराकस्पेमदा
| काटे प्रपत्रेलोकविथते॥ आयुध्येतांमहात्मानौ ब्रहमविष्पपरस्परम् ॥२७॥ तयो मानंनिराकर्तुतन्मध्येपरमेश्वरः ॥ निष्कलस्तंभ
हूपेणस्वरूपंसमदशंयत् ॥२८॥ ततःस्वख्िगचिदह्वत्वात्स्तं मतोनिष्कलशिवः ॥ स्वल्गिदशयामासजगतां हितकाम्यया ॥२९॥
तदाप्रभतिरोकेषुनिष्कलंङिगमेश्वरम्॥सकलंचतथावेरंशिवस्येवप्रकलिपतम् ॥३०॥ शिवान्येषःतुदेवानाबेरमा्चप्रकटिपतम् ॥
तततद्वरतदेवानातततदरोगमदश्भम्॥ शिवस्यङिगवेरत्वभोगमक्षमरदंश॒भम् ॥२१॥ इतिश्रीशिवमदहापुराणेषिश्वरसंहितार्यापच
मोऽध्यायः ॥ ५॥ नंदिकेश्वरउवाच ॥ पुराकदाचिदो गींदविष्णुविंषधरासनः ॥ सुष्वापपरयाभूत्यास्वानगेरपिसंवृतः ॥१॥ यट
च्छयागतस्तजन्रहमात्रहमविदांवरः ॥ अप्च्छत्पुंडरीकाक्षशयनंसर्वन्दरम् ॥ २॥
सणरूपमे वैरूप की कल्पना की गह ॥ ३० ॥ देवताओंकी वह बेर पूजा इच्छालु्षार भोगोको देनेहारी है परन्तु शिवका टिगबेर
भोग ओर मोक्ष दोना देनेहारा है ॥ ३१ ॥ इति श्रीशिवमहाष्राणे वियेशवरसंहिताभाषायां पंचमोध्यायः ॥ ५ ॥ नन्दिकेश्वर बोटे
हे योरगीद् ! आगे एक समय विष्ण भगवानू शेषशय्याप्र अपने गरुढादि पादो संयुक्त लक्ष्मीसहित शयन करते थे ॥ १ ॥ उस स्मय
नहन्ञानिरयोमिं भ्ठ ब्रह्माजी अपनी इच्छासेही वहो आये सब भकार सुन्दर सेजपर शयन करते हुए कमललोचन विष्णनीते पूढने ठगे ॥ २ ॥
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तुम कौन हो जो भे देखकर अभिमानी परूषक समान शयन करते हो. हे वत्स ! उढो देखो भे तुम्हारा स्वामी आया हूं ॥ ३॥ आये हुए
गुरुको देखकर जो अभिमान करता उस द्रोही मूढका प्रायधित्त होना उचित है ॥ ४ ॥ यह सुनकर विष्णजीकै अंतरमं तो कोध ,
परंतु बाहर शांत रहे, ओर बोरे हे वत्स ! तुम्हारा मगठ हो बेढो इस आसनप्र विराजो ॥ ५ ॥ इस समय तुम्हारा नेत्र कुट्ठि ओर खख
वक क्यों होरहा है ! बह्माजी बो हे वत्स दिष्ण ! तुमको समयके परभावसे अभिमान है ॥ ६ ॥ हे एच ! म तुम्हारा रक्षक ओर जगत्का
पितामह हं विष्णजी बोरे यह तो सव जगत् स॒मं स्थित है तुम चोरके समान किर प्रकार अपना कहते हो ॥७॥ तुम भेरी नाभिकमले उत्पन्न
कस्त्वपुरूषवच्छेेष्ठामामपिदप्तवत्।उत्तिष्ठवत्समां पश्यतवनाथमिहागतम् ॥३॥ आगतेशुरूमाराध्यदष्टायोदप्तवचरेत्॥दोदिण
स्तस्यमूटस्यप्रायश्चित्तविधीयते ॥ ४ ॥ इतिश्ुत्वावचःकृद्धोबदहिःशांतवदाचरत्॥ स्वस्तितेस्वागतंवत्सतिष्ठपीठमितोविश ॥५॥
किञुतव्याग्रवद्वक्रविभातिविषमेक्षणम् ॥ ब्रह्मोवाच ॥ वत्सविष्णोमहामानमागतंकाल्वेगतः ॥६॥ पितामहश्चजगतःपाताचतव
वत्सक विष्णुरूवाच ॥ मत्स्थजगदिर्दैवत्समनुषेत्वंिचोरवत्॥७। मत्नामिकमलानातः पुरस्त्वं भाषसेवृथा ॥ नेदिकेश्वरउवाच्॥
एवंदिवदतोस्तज््ग्धयोरजयोस्तदा ॥८॥ अहमेवबरोनत्वमहंपरथुरहपरथुः॥परस्परंह॑तुकामौचक्रतःसमरोदयमस् ॥९॥ युथुधातेऽम
रोवीोरसपक्षीदवाहनौ ॥ वैरंच्यवेष्णवाषमिथोयुयुधिरेतदा॥ १ ०।॥तावद्विमानगतयःसवविदेवजातयः॥ दिदक्षवःसमाजग्धुःस
मरतंमहाद्धतम् ॥११॥ क्षिपतःपुष्पवर्षाणिषश्येतःस्वैरमबरे ॥ सुपर्णवाइनस्तञ छ्धोवेबह्मवक्षसि ॥ १२॥
हुए हो हसते मेरे एत्र हो सक्ञे एत्र कहना वथा है. नंदिकेश्वर बे इस भकार बरहा विष्ण दोनोँ ही रजोथणसे खग्ध होकेर विवाद करने कगे
॥ < ॥ मेब्ष्ठहू मँ स्वामी हूं एसा कहकर एक दृसरेको मारनेकी इच्छापे युद्ध करनेमे उत्घुक हुए ॥ ९ ॥ ओर हंस ओर गरुडं बाहनपर
स्थित हो यह दोनों देव युद्ध करने छगे तब बह्मा ओर विष्णके वाहन गण भी युद करने रुगे ॥ १० ॥ तव सम्पूणं देवता विमानोभं बैठकर
उस महाअद्धुत युद्ध देखनेको चे आये॥११॥ ओर आकाशभे उनके ऊपर शूक वषौने खगे । तवं विष्णजीने कोधकर बह्माजीकी छातीभे॥१२॥
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। || अनेक भकारके बाण ओर अक भारे ओर बरहाजीने मी महा करोप कर विष्यनीके हदये दुःहह ॥ १३ ॥ अभिक समान बाण ओर् अनेकः
१२|| रब भारे उत युधे यह बडे आश्वयका व्यापार होने का ॥ १४ ॥ ओर उनका युद्ध देखकर देवता अत्यैत व्याकुल हौ कहने रगे तव
ठ विष्णजीने श्वास ठेते हृष युद्धे कुछ भान्तहो कोधकर ॥ १५ ॥ बुद्धिमानीसे ब्रहमाजीकै ऊपर माहेश्वर अचका प्रयोग किया तव ब्रह्माजीने
¢ महाकोधकर विश्वको कंपित करते हए ॥१६॥ घोर पाशुपता विष्यजीकी छाती पर चलाया तब आकाशम दशसहक्च सयक समान तेज उदा
॥ १७ ॥ जिसके सहल्ञ खख जो अति उर, तीक्ष्ण था उस समय महाभयंकर तीक्ष्ण पवन चरने र्गी, बल्ला ओर विष्णजीके जब दोनों
सुमोचबाणानसहान्लाश्विविधान्बहून्॥ शुमोचाऽथविधिःकुद्धोविष्णोर्रसिदुःसहान् ॥१३॥ बाणाननरसकाशान्चं बहुश
|| तदाशवयंमितिस्पष्टतयोःसमरगोचरम्॥१७॥समीक्ष्यदैवतगणाःशशसुरशमाङ्गलः ॥ततोविष्णुःसुसंङदःश्वसन्ग्यस
|| नकशितः॥१९॥ माहेश्वराक्च॑मतिमान्सदधेबरह्मणोपरि ॥ ततो बह्मा शशंकद्धकंपयन्विश्वमेवहि ॥ १६॥ अ्चषाज्चुयतधोरंसंदधे
विष्णुवक्षसि॥ततस्तुदुत्थितंग्योभ्नितपनायुतसत्निभम्॥ १७ सहसघुखमत्युभचंडवातभयैकरम्॥अद्खद्रयमिदेतघ्ब्ह्मविष्ण्वोभयं
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| करम्॥१८॥ इत्थं बभृव समरोब्रहमविष्णवोपरस्परम्॥ ततो देवगणाः सवे विषण्णाः भृशमाङ्लाः ॥उदुः परस्परं तातराजक्षोभेयथा
|| द्विजाः ॥१९।ृष्िःस्थितिश्वसंहारस्तिरोभावोप्यलुब्ह ॥ यस्मात्मव्ततेतस्मैब्रह्णेचब्रिशूखिने॥२०॥ अशक्यमन्येयदलमहवि
६ नातणक्षयोप्य्रयच्छयाकचित्॥२१॥ इतिदेवाभयक्ृत्वाविचिन्वंतः शिवक्षयम् जग्ुःकैलासशिखरंयवास्तेचरशेखरः॥२२ ॥
१||&|| भयंकर अञ्च उदय हए तब घोर उपद्रव हए जव इस भकार ब्रह्मा ओौर विष्णजीका परस्पर युद्ध हुआ तब ॥१८॥ स्रव देवता अल्यन्त उयाकुछ
अ० ६ 2१|| ओर उदि होगये॥१९॥ हे तात ! जेस राजविग्रहमे नाण क्षुभित होते है इत धकार वे घ्याकुठ होकर बोटे सृष्िकी स्थिति संहार तिरोभाव
| ओर अनुग्रह ॥ २० ॥ जिनसे होता है उन बरहा त्रिशूरुधारीके अनुश्रह बिना अपनी इच्छसे कोड तृणके भी नाश करनेको मर्थ नही है || ||
२॥ ॥ २१ ॥ इस प्रकार भयभीत हो सब देवता शिवजीके स्थानकी खोज करते कैठासके शिखरपर शिवजीके निकट गये ॥ २२ ॥ 0
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। देवता प्रसन्न हो उस्र परमेश्वरपद प्रणवाकारको देख प्रणाम कर स्थित हए ओर उस स्थानम प्रवेश कर ॥ २३ ॥ उस् सभामण्डलमं
मणिक विस्तरपर पार्दतीसहित विराजमान देवभष्ठको देखा \॥ २४ ॥ वामके ऊपर दक्षिण पद रक्से शिवके निमित्त अपना करकमछ अर्पण
किये अपने गणो सब प्रकार वेषि सम्पूणं लक्षणसे रक्षित ॥ २५ ॥ महाभक्ति युक्त सीजन जो विशेष उपचार जानती थीं वे पंखाकर
रहीं थीं, वैद स्तृति करते थे ओर अयुग्रहकी दृ्टिसे सबको देखते थे ॥ २६ ॥ हे कुमार ! दूरसेही शिवका दशन कर सन्तोषका जट
दृैवममरादष्ठाःपद॑तत्पारमेश्वरम् ॥ प्रणेषुःप्रणवाकारप्वि्टास्त्रसद्मनि ॥ २३॥ तेपितत्रसभामध्येमंडपेमणिविष्टरे ॥ विराज
मानघुमया दृशैव पुंगवम् ॥२४॥ सव्योत्तरेतरपदंतदादितकरां बुजम् ॥ स्वगणेःस्वतोजष्टसर्वलक्षणलक्षितम् ॥२५॥ बीज्यमा
नंविशेषज्ञेशीजनैस्तीबभावनै ॥ शस्यमानंसदविदेरलगृहतमीश्वरम् ॥२६॥ दृषटैवमीशममराःसंतोषसिलेक्षणाः ॥ दंडवद्दूर
तोबत्सनमश्चककमैहागणाः ॥२७॥ तानवेक्ष्यपतिदैवान्समीपेचाहयद्रणेः ॥ अधसंह्यादयन्देवान्देवोदेवशिखामणिः ॥ अवोचदं
्म॑मीरवचनंमधुमंगलम् ॥ २८ ॥ इतिश्रीशिवमहापुराणेविचेश्वरसंहितायां षष्ठोऽध्यायः ॥ & ॥ इईशवरउवाच ॥ वत्सकाः
स्वस्तिवःकच्चिद्रतैतेममशासनात् ॥ जगचदेवतावशःस्वस्वकरमणिर्किनवा ॥ १ ॥ भरागेवविदितेयुद्धनसविष्ण्वोमयासः ॥
भवतामभितापेनपौनक्क्तयनभाषितम् ॥ २ ॥ |
नेतो भरे वे देवताओकि महासमूह दृरसे नमस्कार करने लगे ॥ २७ ॥ उन देवताओंको देखकर गणो द्वारा उन्हे बुखाय देवदेव महादेव
उन देवताओंको प्रसन्न करते हए मधुर ओर मंगख युक्तं वचन गंभीर वाणीते बोडे ॥२<॥ इति भीशिवयहाषराणे वियेश्वरसेहिता भाषारीकायां
वष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ दश्वर बोठे हे एत्रो ! हमारी आज्ञामे वनेहारे तुरहारा पङ्गर है जगत् ओर सब देवता अपने अपने कम्भ करनेभे भृत
है या नहीं ॥ १ ॥ पहकेही मैने ब्रह्मा भौर विष्णके युदधको जान शिया है तुमने अपने दुःखके साध इनरुक्ततासे पकाश किया है ॥ २ ॥
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है कुमार ¡ इस भकार मधुरवाणीे पार्वतीपति शंकरने उन सव देवताओंको सनतषट किया ॥३॥ तम शिवने अपने सौ गर्णोको उस्र समरस्थानमं
॥१३॥ जनेकी आज्ञा दी जहां जल्ला ओर विष्ण थे ॥ ४॥ तव शौकरके पयानसमयमं अनेक प्रकारके बाजे बजने ठे अनेकं प्रकारक वाहरनोपर
चढ विष भूषण पहरे गणेश्वर चटनेको उदयत हूए ॥ + ॥ भणवके समान आकारसे सवत व्याप्त पचमेडलसे मंडित मद्ररथमे अम्बिकापति
¢ गिरीश चहे ओर एत्र तथा गण भी संग हुए उस समय इन्द्रादि देवता उनकै पौषे चलन् कगे ॥ & ॥ सुन्द्र ध्वजाव्यजन् चमर् णष्प वषा
5 संगीत शत्य बाजे सम्मानित हो शिवजी पार्वती सहित बहा विष्णके निकट समरभूमिमे सेनासहित गये ॥७॥ जाकर मेघोके मध्यमे छिपकर
त इतिसस्मितयामाध्व्याकमारपरिभाषया॥ समतोषयरदेवायाःसपतिस्तत्पुर्म्॥ ३॥अथगुद्धांगणंगंतुहरिधारोरधीश्वरः॥ आज्ञा
$ यदरणेशानां शतंततरैवसंसदि॥ ® ॥ततोवादयंबहुविधंपरयाणायपरेशितुः ॥गणेश्वराश्चसंनद्धानानावाहनभूषणाः ॥2॥ व्रणवाकारमायं
$ तंपंचमेडलमरडितम् ॥ आश्रोदर्थमद्रमंबिकापतिरीश्वरः ॥ ससूनगणभिद्रायाः सवप्यबुययुः सुराः ॥६॥चिध्वजग्यजनचामर
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पुष्प वषंगतिनृत्यनिवहैरेपिवायवगेः संमानितः पञुपतिःपरयाचदेग्यासाकंतयोःसमरभरूमिमगात्ससेन्यः॥७॥ समीक्ष्यतुतयो
यदनिग्ाऽभंसमास्थितः॥समाप्तवायनिरघोषःशातोरुगणनिःस्वनः ॥८॥ अथन्रू्मच्छुतौवीरौदतकामौपरस्परम्॥ मादेश्वरेणचाऽ |¦
वेणतथापाञ्चपतेनच॥९॥अघ्नज्वलेरथोदग्धंब्र्मविष्ण्वोजगच्रयस्॥ इञओोपित॑निरीक्ष्याथद्यकालप्रलयभृशम्॥ १ ०॥महानलस्तंम ठ
विभीषणाङृति्षभूवतन्मध्यतलेसनिष्कलः॥११।तेअघ्नेचापिसज्वाटेखोकसंहरणक्षमे॥ निपतेतुःक्षणेनेवद्याविभरूतेमहानरे॥१२॥ ट
वित ०१ | निरन्तर होनेवाटा युद्ध देखा, उस समय बाजोकी ध्वनि नहीं होती थी ओर बदा गणोँका भी शब्द शान्त होगया था ॥ < ॥ उस टं
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समय बरह्मा ओर विष्ण परस्पर एक दुसरेको मारनेकी इच्छसे मादैश्वर ओर पाशुपता्गते ॥ ९ ॥ तथा अच्कौ ज्वाासे मानों त्रिरोकी र
भस्म करने छगे तब शिवजीने वह अकार प्रलय देखकर ॥ १० ॥ महाअधिके स्तम्भके समान महाभयंकर अतिक समान उन दोनोंके @
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बीच वह निरीण ब्रह स्थित हुए ॥११॥ वह ठोक क्षय करनेमं समथं अल उस महाअभरिके भगद होतेही क्षणमत्र निपतित हो गये ॥१३॥ ॥
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यह अश्च शांत होनेका अद्धुत चित्र देख यह अद्भूत आकार क्या है रेषा ब्रह्मा ओर विष्ण परस्पर कहने ठगे ॥ १३ ॥ यह इंद्रिय अगोचर
स्तम्भ अश्रिरूपसा कथा उढा है हम दोनोंको इसका ऊपर ओर नीचेका भाग देखना चाहिये किं यह कहास हआ है ॥ १४ ॥ इस प्रकार
कह वह दोनों वीर मानी परस्पर मिखकर उसकी परीक्षा करनेको बहत शीघतासे गये ॥ १५ ॥ हम दोनोके भिटनेते यह कायं नहीं होगा
रेसा कहकर विष्णु शूकर शरीर धारण कर उसके मू भाग देखनेको नीचे चरे गये ॥ १६ ॥ ओर ब्रह्माजी हंसका रूप धार उसके ऊपरका
दृष्टा तदद्धतं चि्रमघ्लशांतिकरं श्ुभम्॥किमेतदद्धताकारमित्युचुश्चपरस्परम्॥ १३॥ अतीद्रियमिद॑स्तंभमथिष्पंकिञचत्थितम् ॥
अस्योध्वमपिचाधश्चभआवयोरछश््यमेव दि॥१४॥इतिभ्यवसितौवीरोमिलितौवीरमानिनौ ॥तत्परौतत्परीक्षा्थप्रतस्थातेऽथसत्नरम्
॥१५॥ आवयोमिश्रयोस्त्कार्यमेकंनसंभवेत् ॥ इत्युक्रासूकरतविष्णुस्तस्यादिमीयिवान् ॥१६॥ तथाबरह्माहसतलस्तदंतंवी
क्षितंययौ ॥ भिक्वापाताखनिलयंगत्वादूरतरंहरिः ॥१७॥ नाऽपश्यत्तस्यसंस्थानंस्तंभस्यानल्वचंसः॥ शरांतःससूकरदरीःप्रापपूरव
रणांगणम् ॥१८॥ अथगच्छंस्तुव्योम्नाचविधिस्तातपितातव ॥ ददर्शकेतकीपुष्पंकिचिद्विच्यतमद्धतस् ॥१९॥ अतिसौरभ्यम
म्लानबहुवषैच्युतं तथा ॥ अन्वीक्ष्य च तयोः कृत्यं भगवान्परमेश्वरः ॥ २० ॥
भाग देखनेको गये हरि पाता स्थानको भेदकर दरतक चरे गये ॥ १७ ॥ परन्तु उस्र अशिकै सान भज्वङ्िति स्त॑स्भका पार नहीं पाया
ओर शांत होकर हरि उस युद्ध स्थानम चरे आये ॥ १८ ॥ ओर बह्याजी आकाशमागभ चे गये उन्होके पहा केतकीका किंचित् च्युत
होना अद्भुत पुष्प देखा ॥ १९. ॥ यद्यपि वो बहुत वर्षामि टटा था परन्तु उस्म बडी गन्धं थी ओर षलीन न था बहला ओौर पष्क इत्यक
देखकर भगवान् परमेश्वरने ॥ २० ॥
१ यह ब्रह्म ओर विष्णुजोका युद्ध एक अलंकार है कि सत् रज प्रबल होकर जव अपनेसे भिन्न बरश्चको नहँ जानते तव उनके संधरष॑णरूप युद्धसे शिवतत्त्व प्रगट होता है, जिससे वह अपनी पूर्वं
अवस्थाको प्राप्त हते हं ।
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परिहास किया ओर कंपित होने उनका शिर चायमान हभ उक्तीसे षह एष्पगिरा तब उप्त कै तकीके गिरे हुए उ्तमफूकको ग्रहण करनेकी इच्छात कहा
॥२१॥हेष्पोकेराजा उष्पपति!तू क्यों गिरताहै तुचे किसने धारण कियाहै तव एष्यने कहा इस सवके प्रथम भ्ादुभूत हुए प्रमारहित स्तंभकै मध्यस्थानते
गिराहू(आदिमस्यके स्थान अहमस्यमी पाठ है जिसके अधमे इस स्तंभके होते है) ओर स॒ङ्ञे बहुत समय बीतगया॥२२॥परन्तु आजतक मुञ्चे इसका
अन्त नहीं मिला गिराही चला जाता हूं इससे तुम इसके अन्त देखनेकी आशा छोड दो. ब्रह्माजी बोठे इसका अन्त देखनेको भ हंसहप धारण करक
आयाहूं॥ २२३॥ अब हे सखा ! म्ह हमारा मनोरथ पुरा करना चाहिये भेरे संग चलकर विष्णकै निकट तुमको यह कहना चाहिये॥ २४॥ कि बह्ाजीने इस
परिदासंतुकृतवान्कंपनाच्लितिंशिरः ॥ तस्मात्ताववग्रहातुच्युतं केतकडत्तमम् ॥२१॥ कित्वंपतसिपुष्पेशपुष्पराट्केनवाधृतम्॥
आदिमस्याप्रमेयस्यस्तंभमध्याच्च्युतशिरम्॥२२॥न संपश्यामितस्मात््वजद्याशामंतदहने॥ अस्यांतस्यचसेवाधदंसमूतिरिदाग
तः ॥ ॥२३॥ इतःपरंसखेमेऽदयत्वयाकरतैग्यमीप्सितम् ॥ मयासहत्वयावाच्यमेतद्विष्णोधसच्निधौ ॥ २७ ॥ स्तंभांतोवीक्षितोधा
ाततरसाक्ष्यहमच्युत।इत्युक्ताकेतकंतनप्रणनाम पूनः नः॥ असत्यमपिशस्तंस्यादापदीत्यवशासनम्॥२५॥ समीक्ष्यतजाऽच्यु तमा
यूतश्रम॑भृनषटदर्षत॒ननतंडषांत् ॥ उवाचचेनंपरमार्थमच्युतंषंटात्तवादःसविधिस्ततोऽच्युतम् ॥ २६ ॥ स्तंभाग्मेतत्सणुदीक्षितंहरे
ततैवसाक्षीनदकेतकंत्विदम् ॥ ता सादति ॥ २७॥ हरिश्चतत्सत्यमितीववितय श्चकार
तस्मेविधयेनमःस्वयम् ॥ षोडशेक्षचारेश्वपूजयामासतंविधिम् ॥ २८ ॥
स्तंभका अन्त देखछिया इमं म साक्षी देषा कह नहाजीने वारंवार कैतकीके षष्पको भणाम किया ओर कहा यह आज्ञाहै कि आपदामे जुड़ बोठनेमे दोष
नहीं होता॥ २५॥ जाकर बरहाजीने जब विभ्जीको थकिंत देखा कि,उनमे भतननता नहीहै तब हरित हो तरत के रगे ओर षंवकेश्मान,वाद करते हृए
असषसय भाषण किंया॥२७॥हरिने उनका कहा सव्य मानकर स्वयं बहाजीको रणाम किया ओर षोडश उपचारते बह्माजीका पूजन किया ॥२<॥
अच्युते ब्र्ाजी बोढे॥२६॥हे विष्ण!हमने स्तंभकाअन्त देख छिया उस्म यह केतकीका शूक साक्षी है भौर बह्याके के अनुतार केतकीके ष्पनेभी
| | बह्याका कपट देख उसके परहार करनेको उसी अभ्निूप स्तंभे बह दैश्वर साकार होकर परादुभूत हूए स्वामीको दैखतेही कंपते हुए हाथो विष्णने ||
९ उनके चरण पकड षयि ॥२९॥ ओर बोडे आयन्तहीन शरीरवाछे तुमको अज्ञानुद्धिसे कामना पूर्वक द्ूढकरभी नहीं पराप्त होते है हे करुणाकर | ठै
£ इससे तुम हमारे ऊपर भरसन्नहो ओर हमारे कश्मर (पाप)नष्ट करो ओर क्षमा करो आपकी करा हमने जानी॥ ३ ०॥ ईशर बोठे हे वत्स! विष्ण ! ©
£ तुम्हारे ऊपर प्रसननहं कारण किं तुम॒ईैशत्वकी इच्छा करकैभी सत्यवक्ता हो इसी कारणसे संसारमे डशत्वको पराप्हो साम्यता ओर खसे ठ
क)
मल्कारको भी भराप्र होगे॥३१। ओर आजसे तुम्हारी पथङ्मरतिंकी क्षें प्रतिष्ठा ओर उत्सव पजन होगा ॥३२॥ ईस प्रकार सत्य कहनेसे शिव
[ऋ
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| विधि्रहूतशठ्मधिखिगतःसईश्वरस्तत्रबभूवसाकृतिः ॥ ससुत्थितःस्वामिविरोकनात्पुनः प्रकंपपाणिः परिगद्यतत्पदम् ॥ २९ ॥ ‰
||| आ्यतरीनवपुषित्वयिमोहद्ुद्धयाभूयाद्िमशंइहनावतिकामनोत्थः ॥ सत्वंप्रसीदकरूणाकरकश्मलनौमृषक्षमस्वविदहितंभवतेवके |¢
4 ल्या॥३०॥ईश्वरउवाच॥वत्सप्रसघ्नोऽस्मिहरेयतस्त्वमीशत्वमिच्छक्नपिसत्यवाक्यम् ॥ ब्रयास्ततस्तेभविताजनेषुसाम्यमयासत्क |५
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तिरप्यरुप्थाः ॥३१॥ इतःपरतेपथगात्मनश्वकषे््रतिष्ठोत्सवपूजनेच ॥ २२ ॥ इतिदेवःपुराप्रीतःसत्येनदरयेषरम्॥ ददौस्वसाम्यम १
त्यथैदेवसंघेचपश्यति ॥३२॥ इतिश्रीशिवमदापुराणेविदेश्वरसंरितायांसप्तमोऽध्यायः॥७॥ नंदिकेश्वरउवाच॥ससजांथमहादेवः ई
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पुश्ष॑कंचिदद्धतम् ॥ भेरवाख्यंधुवोमेध्याद्रह्मदपनजिघांसया ॥ १ ॥ सवेतदातत्रपतिप्रणम्यशिवमंगणे॥ किकार्थकसाण्यजशीभ्र ॥६
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माज्ञापयप्रभो ॥ २॥ वत्सयोऽयविधिःसाक्षानगतामादयदैवतम् ॥ नूनमच॑यखडगेनतिग्भेनजवसापरम् ॥ ३ ॥ >
विष्णुपर बहत प्रसन्न इए ओर देवसमूहके देखते २ उन्होने अपनी समानता दिष्णुजीको दी ॥३३ ॥ इति भीशिवषहाषरागे वियेश्वरसंहिता ||
भाषादीकायां सपतमोऽध्यायः॥७॥ नंदिकैश्वर नोटे, तब महादेवजीने ब्रह्माजीका मद् दूर करनेकै निभित्त अपनी भकुटीकै मध्ये एकं अदत पुरुष ||
भेरवजीकी रचना की ॥१॥ उतन्न होतेही सषमरांगणमे उस प्रुषने शिवजीको प्रणाम किया, ओर कहा भगवन् ! भे श्या कं शीघ आज्ञा दीजिये | ६
॥२॥ शिव जीने कहा हे वत्स ! यह जो जगतके आदि देवता बया है इनकी तीक्ष्ण धारवाछे वेगवान् खडगसे अचौ करो अथौत् प्रहार करो॥ ३॥
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शि | | सो घुनतेही भेरवने एक हाथते केश पकड वह ब्रह्माजीका पं च॑वां असत्य भाषी शिर काटकर हाथते स्फुरायमान होते हृए् खदगसे उनके आर
॥१५॥ || | भी शिरकाटनेकी इच्छा की ॥४॥ तब तुम्हारे पिता बरह्ाजी गहने माठा ओर उत्तरीय वज्ञ त्याग केशखोे हए हवा चलनेते कैठे ओर वेक
६ || समान कम्पित हो भेरवजीके चरणकमठ्मे गिरपडे ॥ ५ ॥ बह्माजीकी यह दशा देखते ही विष्णजीने हमारे स्वामीके चरणकमर्छोमं अश्रुमोचन
ट| करते २ हाथ जोढकर कडा जेते बाङक पितासे कहते है ॥ ६ ॥ विष् बोठे हे मगवनू ! पथम् आपने कपा करके इनको पच शिर दिये ये
ट| अव एक जाता रहा इस कारण क्षमा करे अन ब्रह्ाजीपर भरसन्नता करो ॥ ७ ॥ जव विष्णजीने इस भकार कहा तब शिवजी देवते सेवित
ट| स्वेगदीत्वेककरेणकेशंतत्पृचमदतमसत्यभाषणम् ॥ छित्वा शिरांस्यस्यनिदतमुद्यतःपकंषयन्खद्गमतिरफुरेकरेः ॥ ७ ॥ पितात
| वोत्सषटविभरषणाबरसयत्तरीयामल्केशसंहतिः ॥ प्रवातरंभेवर्तेवचंचलःपपातवभेरवपादपंकजे॥५॥ तावद्विधितातदिदश्षुरच्युतः
६&| पालरस्मत्पतिपाद्प्वम् ॥ निषिच्यवाष्पेरद्त्कृतजणि्यथारशिशुःस्ं पितरकलाक्षरम् ॥ ६ ॥ अच्यृतञवाच्॥ त्वयाभरयलन
| नराहिद्तयदस्यपचाननमीशनिह्ग्॥ स्मात्समसवा चम्समहाड़र भ्सादं विधये बघ्॥७।इत्ययितोऽचछतेनेशस्ु्ट सर
९|| गर्णागणे ॥ कामात ॥८॥ अथाहदेवःकितविधिविगतकंधरम् ॥ बद्मसत्वमहणाकाक्षीशढमीशत्वमा
त स्थितः ॥ ९ ॥ नतिस्तषत्छतिरङ्िथूय(तत्यनोतघवादिकम् ॥ बरन्नोष्[च ॥ स्वामिन्पसीदाद्यमहाविशूतेमन्येवश्वरदमेशिरसः
ठ भमोक्षम् ॥ १० ॥ नमस्तुभ्यभगपतेर्वधवेविश्वयोनये ॥ सहिष्णवेसदोषार्णाशं भवेशेरधन्वने ॥ ११ ॥
विंरसं०१ ९ हूए गणोके मध्यमे स्थित हए ओर बहमाजीके दण्ड देनेसे भेैरवजीको निदत्त किया ॥ < ॥ तव एक कन्धरा रहितबह्ाजीते शिवजी बोरे
अ० ८ | कि, दमने कप क्रिष। ओर अपनी पूजा ओर दैश्वर होनेकी इच्छे छल किया ॥ ९ ॥ इतत कारण ठोकमे तुम्हारा सत्कार न होगा
त || महारा स्यान ओर उत्सवादिक न होगा. बह्माजी बोडे हे स्वामी ! हे महाकवि भूतियुक्त परतन हो ओर है वरदेनेहारे ! भेरा शिर मोक्ष
९ हो यही बर दीजिये ॥ १० ॥ हे भगवन् ! जगदन्ु संसारके कारण सष दोषो सहनेहारे शम्यु शेरुषारी अपक्नो नमस्कार है ॥११॥
९ रजोगुण जितना तमेका संक था वदी पञ्जमशिर है जो शिवजीने हर चया ।
गन ्यव्यइ य य
। शिवजी बौठे अराजके
<. भयसे यह सब जगत्
करो हे एत्र | ॥ १२ ॥ प गतु स्थिरन रहेगा दस कारणत दके
$ ९ तुम जो ६
8 | हेग ॥ १२॥ सग भौ 1 7 1 ह उनको दंड दौ ओर छोककौ ५
केतकीपुष्पसे र दक्षिणा सहित मी यज्ञ तुम्हारे विना ९ 9. ओर यज्ञोके य तुमही होंगे उसमे ति
ठ व कहा ॥१४॥ अरे असत्यभाषी केतक दुष्ट ! तू यहि ण॑ न होगा किंतु निष्फल होजायगा यह स तुम्हारा सत्कार ||@
| पा कहतेही शिवके निकटवत्तीं देव द तत हासे इूर हो आजसे भेरा प्रेष कहकर देवने असत्य भाषी
$| ईश्व रतदलग जाती केतकको वह ते नही ओर भेरी ¢
| ईशरउवाच ॥ अरमय न दूर करने लगीं तब ॥ १ पूजामे तु न होगा ॥१५॥
र कभेपरम् ॥ वै ल त्सर्वनशिष्यति ॥ ततस्त्वंजदिदं डर्दवहोकषुरं ६ ॥ केतक बोढा हे नाथ ठ
४ वेतानिकेषुगदयेषुयज्ञेचभवान्युः शिशो थ ! नमस्कार है भजसे
निवारयामासुस्ततपाश्वादन्यतस्त पिपरमतेपुष्पेमाभत्पूजास्वितःपरम् ॥१८॥ इत ; कित्वकेत्ककूटसा
# यतातातक्षम्यतांममकिर्बिषम् ॥ १७॥ दा ॥9६॥ केतकडवाच् ॥ नमस्तेनाथगेजन्म १८॥ इत्युक्तेतञदेवेनकेतकदेव ए
॥ १८ ॥ ५ ॥ म ॥ सफलंक्रि ||९
सफटंततः ॥ त्वंवेवितानग्याजेनममोप्ि ॥ नमेत्वद्धारणयोग्य॑सत्यवागह ‡ ५ यिदृषमेमिथ्यादोषः तोभवे ठ
पकी रेभविष्यसि वागहभीश्वरः ॥ षरि कुतोभवेत् ||९
्ान होत 1 तिव 1 १९॥ अदीयास्त्वाधरिष्यंतिजन्मते
¶ र अज्ञा १ ॥ कुछ तौ सफर रिषे
|| समामे मगवानूकौ 4 पाप नष्ट होजाते है किर आपके दशन करे भर अब भेरा प्प् दूर कीजिये ॥ १७ ॥ ६
। इ भकार भान करी तव शिवजीने भेरा भिथ्याभाष्ण दोष क्यों आपके तो स्मरणी |©
‰॥ विष्ण आदि हमारे भक्त देवत शवजीने कहा हमारी वाणी पण दाष क्य न नष्ट होगा ॥ 9 त
६ 1 तञ्ञे पारण करेगे इसते तेरा णी अत्य नहीं होती हष तेरा < ॥ जब केतकने
| जन्म क्षफक होगा ओर मंडप ~ भारण नहीं करेगे ॥ १ € ९
इप् रचनाक निभिक्तसे भरे ऊपर ९ ॥ परतु |©
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ऊ . इस प्रकार भगवान् केतक बहा ओर विष्णपर अनुग्रह करके.सब देषतोंसे पूजितहो सभाम विराजे ॥२१॥ इति भीशिवमहाषएराणे वियेशवससहिता >|
॥१६॥ ||| माषादीकायामष््मोऽध्यायः ॥ < ॥ इस समयमे त्रस ओौर विष्ण शिवाजीको भणाम कर हाथ जोड मीनो मसे शिवजीके दक्षिण ओर ४
८ || वामभागे स्थित हुए ॥ १ ॥ उन दोननोने कुटबसहित देवको न्दर आस्नपर बेढाय पवित्र॒ ओर एरूषोके योग्य पदार्थे उन पूज्यकौ पूजा |||
ट| की ॥२॥ ओौर परुषकं संकल्पते उत्पन्न हई वस्तु कोई दीष कोई अल्पकाटमे जानी जाती है) बह भी देनेयोग्य. सव वस्तु हार, नूष॒र, केयूर, ९
ट| किरीर, मणिकुडल ॥ ३ ॥ यक्ष सूत्र उत्तरीयव्ष, माढा, रेशमीवल्च, पष्पमाठा, अगूढी, चदन; एूढ) तांबृ, कपूर अगर, टेषन ॥ ४ ॥ $
ट| इत्यग्रद्यभगवान्केतकषिधिमाधवौ ॥ विरराजसभामध्येसरवदेवेरमिष्टतः ॥ २१॥ इतिश्रीशिवमदाषुराणेविेश्वरसंहिताया \
| | मष्टमोऽध्यायः ॥८॥ नंदिकेश्वरउवाच ॥ ततांतरेतौचनाधप्रणम्यविपिमाधवौ ॥ बद्धांजलिपुरौतूष्णींतस्थतुदैक्षवामगौ ॥१॥ |
५ तव्रसंस्थाप्यतौदेवसकुटबंवरासने ॥ पूजयामासतुःपूज्यपुण्येःपुश्षवस्तुभिः ॥ २॥ पौर॑भाकृतंवस्त॒ज्ेयदीव।रप्काटिकम् ॥ |
४ हारवरुपुरकेयूरकिरीरमणिङ्कडलेः ५ ३॥ यज्ञघरजोत्तरीयसवक्षौममास्यांय॒लीयकेः ॥ पष्पताबूलकभूरचदनारुलेपनैः ॥ ९॥ ||
2|| धूपदीपसितच्छनव्यजनध्वजचामरेः ॥ अन्ये्दिन्योपदरिश्ववादूमनोतीतवैमवेः॥९॥ पतियोग्धेःपश्वलभ्येस्तौसमचेयतांपतिम्॥ ||
&| यदयच्छ्तमंवस्तुपतियोग्यदहितदध्वजे ॥8॥ तदवस्त्वखिकमीशोपिपारंपर्यचिकीरषया ॥सभ्यानांप्रददौटष्टपृथक्तजयथाक्रमम् |
|| ॥ ७॥ कौलाइलोमहानासीत्ततदरस्तश्हताम् ॥ ततेवनबह्मविष्युभ्यां चाचितःशंकृरः पुरा ॥ ८ ॥ ट
बि ००|| पूप, दीप, शत्र, व्यजन, ध्वजा, चमर, ओर भी दिव्यउपहार वाणी नके प्रे देश्यं ॥५॥ स्वामीकी जाके योग्य ओर जीवो | >
मर ९ || वस्तुओ उन दोनोने शंकरी पूजा की. हे भ्रष्ठ सनत्कुमार ! जो जो जगतूम शरेष्ठ वस्तु है वह इह सतर शकरके योग्य है ॥ ६ ॥ इससे
[न
परंपरासे चे आये क्रमक करनेकौ इच्छते उन सवके त्वामीनेभी भसन्नतापूरवक सवके निमित्त पृथक् पृथक् वस्तु भदान करी ॥७॥ तव वहां
उन वस्तु प्रहण् करने बालेका बडा भारी कोराहर हआ, प्रथम बहा ओर विष्णु प्जितहो शंकर ॥ < ॥
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| बदनेहारे शिवजीने नम्रहृए उन बता ओर विष्णतेप्रसननहो कहा द्र बोट हे वत्स! आज हम तुम्हारे पूजन ओर उवत्सवसे इस महादि नमे भसन्न हूए
॥९॥ यह दिन महापवित्रहोगः,यह हमारी प्यारी शिवरात्रि तिथि होगी॥१०॥दस समय जो हमारी ठग वा बेरबेरकी पूजा करेगाग्वह परुष जगतस्थिति
ओर सदिं करम कर सकेगा॥११। जो जो जितेन्ियं होकर निराहार एक रात दिन यथान्याय यथाशक्ति प्पंचरहित पूजन करेगा १ २॥ जो मेरापूजन
निरन्तर एकवर्षं करनेका फठ मिरुता है वह एक शिवरातरिके दिनमेरा अचन करने मिकता है॥ १ ३। जैसे चद्रमाको देखकर सागर बदता है इसी भकार यह
प्सत्रःपरादतौनभ्रौसस्मितमक्तिवधनः॥ ईश्वरउवाच ॥ तुष्टोऽहमद्यवांवत्सौप्ूजयाऽस्मिन्महादिने ॥ ९ ॥ दिनमेतत्ततःपुण्यंभ
विष्यतिमहत्तरम् ॥ शिवरात्रिरितिख्यातातिथिरेषाममप्रिया ॥ १० ॥ एतत्कारेतुयःकुर्यात्पूजांमद्धिगबेरयोः ॥ इर्याच्जगतः
कृत्य॑स्थितिसगादिकंषुमान् ॥ ११ ॥ शिवरात्रावहोरा्रनिराहारो जितेंद्रियः । अर्चयेद्रायथान्यायंयथाबलमवंचकः ॥ १२ ॥
यत्फरममपूजार्यावषमेकंनिरतरम् ॥ तत्फरुलमतेषद्यःशिवरा्ौमदचनात् ॥ १३ ॥ मद्धम॑वृद्धिकारोऽयचंदकाहवाबुधेः ॥
ग्रतिषठादयत्सवोयत्रमामकोमगलायनः ॥ १९ ॥ यत्पुनःस्तमूपेणस्वाविरासमहंपुरा॥ सकारोमाग॑शीर्ेतुस्यादादछक्षमभकौ
॥ १५ ॥ आद्रीयांमागेशीषैतुयःपश्येन्माभ्ुमासखम्॥ मद्वेरमपिवाटिगंसयुहादपिमेप्रियः ॥ १६ ॥ अङुदशनमा्रेणफलरुतस्मि
न्दिनेश्मे ॥ अभ्यचैचेदधिकनंफटवाचामगोचरम् ॥ १७ ॥ रणरंगतरेऽपुष्मिन्यदरंखिगवष्मेणा ॥ जुभितोखिगवत्तस्मा्िग
स्थानमिद॑भवेत् ॥ १८ ॥ अनायतमिदस्तंममणुमत्रंभविष्यति ॥ दशनाथदिजगतांपूजनार्थदिपु्को ॥ १९ ॥
¢ || मेरी वृद्धिका समय है जह जहां मे मंगलदायक प्रतिष्ठादि उत्सव होताहै॥१४॥ ओर जो मे पूवम स्तंमूपसे आविरभूत हआ वह सरमय मार्गशीर्षे
आद्र नकषतर युक्त है सो जानना ॥१ ५ मागशीर्षे जो आद्रा नक्षत्रकै समय पार्वतीसहित मेरा दशन करताहै अथवा बेरलिगका दशन करता है बह
छे कातिंकेयसेभी अधिक प्यारा है॥ १६॥उतत शर्ट दिनम दशन ही महाफठ होता है ओर जो उस दिन पूजन करते है वह फर वाणीके कथन नहीं
किया जासकता॥१७॥ इस रण भूमिम जो मँ टिग देहे प्ादुभूत हुआह इते यह रिगस्थान कहावेगा ॥१८॥हे एत्रो ! जो यह आदि अन्त रहित
(> 44 44 44 4 4८ 4160 4 +
3८4 ~+
शि०्ख | म्भ है सो जगतक दशेन ओर पूजनके निमित्त अमात्र बहुतठीटा)हौजायगा ॥१९॥ यह ङग भुक्ति जोर यकतिका साधक होगा, इतके दशन
॥१७॥ ||| सेन ओर ध्यानसेही भाणियोके जन्म भरण छूट जार्यैगे॥२०॥जो अभ्रिपवेतके समान भादुभूत हुआ है सो यह अरुणाचङ नामस जगते विख्यात
& | होगा ॥२१॥ यहां बडा भरी तीथं होगा यहां भाणियोके निवास करने या तलु त्यागनेसे ख॒क्ति हो जायगी ॥२२॥ रथयात्रा उत्सव कल्याण ओर
जनोके निवास योग्य यहं स्थान होगा. यहां किया हुआ जप तप हवन करोड़ यणा होजायगा ॥२३॥ हमारे सव क्षे्ोसे यह शरेष्ठ होगा, यहां
मेरास्मरण करतेही पराणी अक्त हो जँयगे ॥२४॥ इत कारण यह क्षेत्र महान् ओर अत्यन्त शोभित होगा सब भकारकै कल्याणदायक ओर सब
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. मोगावहमिदलिगयक्तिखक्त्येकसाधनम् ॥ दरशंनस्पर्शनध्यानाजंतनांजन्भमोचनम् ॥२०॥ अनलाचलसकाशंयदिदैङिगघुस्थि
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तम् ॥ अक्णाचलमित्येवतदिद॑ख्यातिमेष्यति ॥२१॥ अजतीर्थचबहुधाभविष्यतिमहत्तरम्॥ शुकितिरप्यत्रजतूनःवासेनमरणेनच
॥२२॥रथोत्सवादिकल्याणजनावासतुस्वतः॥अघदत्तहतंजप्तंसर्वकोटिगणं भवेत्॥२२॥मल्कषेवादपिसर्वस्मालकष्रमेतन्महत्तरम्॥
अनरसंस्मृतिमवरेणघुभ्तिभरवतिदेदिनाम्॥२७॥तस्मान्महत्तरमिदक्षवत्यंतशोभनम्॥ सवंकल्थाणसंपर्णसर्वधुकितिकरंजभ्॥ २९॥
अ्चैयित्वाऽमामेवर्गिखिगिनमीश्वरम्॥ सालोक्यंचैवसामीप्यंसाङ्प्यसार्धिरेवच ॥२६॥ सागुज्यमितिपंचैतेक्रियादीनांफठं
|| मतम् ॥ सवेपिगूयसकरंप्राप्स्यथाञ्चमनोरथम्॥२७। नंदिकेश्वरउवाच ॥ इत्यनुष्द्यभगवान्विनीतौविधिमाधवौ॥ यतूर्वपहतं
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£| युद्ेतयो.सेन्य॑परस्परम् ॥२८॥ तत्थापयदत्यथस्वशक्त्याऽम्ृतधारया ॥ तयोमाटयैचवेरंचन्यपनेतुशुवाचतौ ॥ २९॥
विग्तं०१ ¢ भकार स॒क्तिदायक होगा ॥२५॥ जो यहां गमे सुज्ञ डिगेश्वरकी पूजा करेगे उन्हं साटोक्य सामीप्य साहप्य साट ॥ २६ ॥ सायुज्य यह
अ०९ पांचँ सक्ति क्रियाके फलको प्राप्त होजोयगी ओर यहां पूजन करनेते तुषभी सब षनोर्थोको भराप्त होंगे ॥२७॥ नंदिकेश्वर बोरे इस धकार
|| मगवानने उन ननन हृए बरहा ओर विष्णप्र अनुशरह करके उनके युद्धम जो परत्पर उनकी सेना मारी गरईथी॥२८॥ उत्त सबको अपनी शक्ति
‰॥ जिवाकर उठाया जिस शक्तिम अगृतकी धारा रहती है ओर उन दोनोकी अज्ञानता ओौर वैरको दूर करनेके अर्थं दोनो का ॥ २९ ॥
| सकल ओर निष्कठ भेदे दोस्वहूप है परन्तु ओर इश्वर नहीं इस कारण उनके दौ रूप नहीं हो सकते ॥२०॥ प्ह॑डा स्तम्भङ्प ओर
पीछे मूर्तिमान् रूप धारण किया इसमे ब्हहप निष्फठ है ओर ईंशरूप सगुण है ॥ ३१ ॥ मेरे यह दोनों रूप सिद है दूर किसके नहीं
हो सकते. इस कारण तुम दोनोँको अथवा दृसररोको ईश्वरत्वकी प्राति नहीं हो सकती ॥ ३ २॥ तुमने जो अज्ञानसे अपनेको ईश माना यह बडा
अदरुत हभ उसके दूर करनेकोही मै रणत्थानम आया ॥ ३३ ॥ अब तुम अप्रना अभिमान व्यागकर सुज्ञ दंश्वरभे अपनी द्धि गाओ भेर
्रसादसे ोकमे सब अर्थं प्रकाश करते है ॥ ३४ ॥ मुञ्च ग॒रुके वचनही तुमको वारंवार प्रमाण है, तुम्हारी भ्रीतिेही यह गूढ बह्व भँ तुमसे
सकलनिष्कटचेतिस्वद्पद्वयमस्तिमे ॥ नान्यस्यकस्यचित्तस्मादन्यःसर्वोप्यनीश्वरः ॥३०॥ पुरस्तात्स्तंमरूपेणपशाद्रूपेणचा
मको ॥ बह्त्वनिष्करपरोक्तमीशत्वंसकटेतथा ॥३१॥ दयंममेवससिद्धनमदन्यस्यकस्यचित् ॥ तस्मादीशत्वमन्येषांयुवयोर
पिनक्रचित् ॥२३२॥ तदज्ञानेनवांवृत्तमीशमानंमहाद्धतम्॥तत्निराकरतुमतैवसुत्थितोऽ्रणक्षितौ ॥३३॥ त्यजतंमानमात्मीयंमयीशे
कुरूतमतिम् ॥ मत्परसादेनलोकेषुसर्वोप्य्थः प्रकाशते ॥३९॥ शुरूकिि्व्यजकंतन्नप्रमाणंवाएुनःपुनः॥ ब्रह्मतत्त्वमिदगुढं भवत्प्रीत्या
भणाम्यहम् ॥ ३५ ॥ अहमेवपरब्रहममत्स्वरूपंकलाकलम् ॥ ब्र्त्वादीश्वरभादकृत्थमेतुमहादिकम् ॥३६॥ बुहृतत्वादकंहणत्वाज्च
ब्ह्मादब्रह्मकेशवौ ॥ समत्वाग्यापकत्वाज्चतथेवात्मादम्भेको ॥३७॥ अनात्मानःपरेस्जीवाएवनसंशयः ॥ अबुथहायसर्गोतिंजग
त्कृत्यं चपंकजम् ॥ ३८ ॥ ईशत्वादेवमेनित्यनमदन्यस्यकस्यतित् ॥ आदौव्रह्त्वबुदय्थनिष्कररिगसुस्थितम् ॥ ३९ ॥
कहता हूं ॥ ३५ ॥ मेही प्र ब्म ह ओर मेराही कठ अकल्प है बह होनेसे षै ईश्वर हं अलुशहादिकही भेरा छ्य है ॥ ३६ ॥ सर्वव्यापी
होनेसे ओर जगतुकै वद्धक होनेते भँ बह्मा ह, हे बहकेशव ! समत्व ओर व्यापक होने भँ आत्मा हं ॥ ३७ ॥ ओौर सम्पूणं जीव आत्मा
नहीं है समे सन्देह नहीं, अलुग्रहसेही यह सेके अन्ततक जौ जगतुका कत ओर पंचक है ॥ ३< ॥ मँ इस सवका ईश हं यह भेरा है भेर
सिवाय किंसी दरूसरेका नहीं है. प्रथम तो ब्रहतज्ञानके निमित्त निष्कटनहयका भादुमौवे हुआ है ॥ ३९ ॥
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। इसीसे मँ अज्ञातस्वहप हूं पीठे ठुम्हे भग दशन दैनेके निमित सक्षात् दैशवर तत्षणही मेँ सयणदूप हुआ हू ॥ ४० ॥ मेरे इंशवह्पको
त्रो ! तुम निल इनकी अर्थना करना ॥ ४२ ॥ यह सदा मेरी आत्मरूप है ओौर मेरी निकटताका कारण है छिग ओर रिगीकै अभेदे
यह महत्व नित्य पूजनीय है ॥ ४३ ॥ जहां कहीं किसतीने भेरे इस रगकी प्रतिष्ठा की है हे एच ! वहां भँ अप्रतिष्ठित भी स्थित हूं ॥५५॥
एक छिगके स्थापने मेरे समान रपकी भराति यह फृठ होता है, ओर दूसरे ठिगके स्थापन करनेमे मेरी एकताकी प्रापि होती है ॥ ४५ ॥
तस्मादज्ञातमीशत्वव्यक्तयोतयितहिवाम्॥सकटोदमतोजातःसाक्षादीशस्तुतत््षणात् ९ ° सकटत्वमतोज्ञेयमीशत्वं मयिसत्वरम् ॥
यदिदंनिष्कलंस्तंभंममव्रह्मत्वबोधकम्॥ ॥४१॥ र्िगिलक्षणयुक्तत्वान्ममक्गि भवेदिदम् ॥ तदिदनित्यमभ्यर्च्ययुवाभ्यामचपु्
कौ ॥२॥ मदात्मकमिदंनित्यममसा्निध्यकारणम् ॥ महत्पूज्यमिदनित्यमभेदाषिगसिमिनोः ॥ ४३॥यच्प्रतिष्ठितयेनमदीयं
| छिगमीदशम् ॥ तजभ्रतिष्ठितःसोदमप्रतिष्ठोपिवत्सकौ ॥ 2४ ॥ मत्साम्यमेकङिगस्यस्थापनेफलमीरितम् ॥ द्वितीयेस्थापितेरि
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शि०षु° १ || |
४ | पकठत्व जानो ओौर यह निष्कुल स्तंभ बह्मका बोधक है ॥ ४१ ॥ रिगलक्षण होनेसे यह मेरा ठछिगस्वहूप निर्यण होगा इस कारण है
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ह|| मरहाएरणेषिचेश्वरसंहितार्यानवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ ब्रह्मविष्यूरचतुः ॥ सर्गादिरप॑चक्ृत्यस्यलक्षण्रूहिनौप्रभो ॥ शिवउवाच॥
|| मल्कृत्यगोधनंगृद्कृपयापरव्रवीमिवामू १सृषटिःस्थितिशसंहारस्तिरोभावोऽप्युग्रहः॥ प॑चैवमेजगत्छृत्यनित्यसिद्धमजाच्युतौ २॥
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विसं ०१|| वह ठग प्रधान है ओर बेरङ्िग गौण है डिगके अभावे बेर हित भी वह स्थान क्षेत नहीं ह्येता है ॥ ४६ ॥ इति श्रीशिषमहाषराणे
अ० १०
विदयेशवरसेहिता भाषारीकायां नवमोऽध्यायः ॥ ° ॥ बहा ओर विष्ण बे हे भमो ! आप् हमे सर्गादि पंचकत्यका लक्नण कहिये शिवजी
बोढे हमारा कल ओर ज्ञान दुरुभ है बै रूपाते तमको कहता हूं ॥ १ ॥ हे कहा, विष्ण स्ट स्थिति संहार तिरोभाव अलुप्रह यह पांच |
| हमारे जगतकै रव्य नित्यसिद्ध ह ॥ २ ॥ | >
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|| गेमदैक्यंफलमेवहि ॥४९५॥ ङगंपाधान्यतःस्थाप्यतथाबेरंतुगौणकम् ॥खिगाभवेनतस्कषेज॑सबेरसपिसर्वतः ॥६॥ इति श्रीशिव
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| आरंभका नाम सगे, उसकी वृद्धिका नाम स्थिति है, उसके नष्ट करनेका नाम मंहार उद्धारका नाम उत्कम है ॥ ३ ॥ उस्न संसारे र
मोक्ष करनेका अनुग्रह है सभ यही भेरे पाच छ्य ह ओर पृथ्वी आदि इतर मेरे कयको गोष्रक बिंबके समान भौन होकर धारण करते ई ठ
॥ ४ ॥ यह सगौदि चार रत्य तो सृष्टिके कम्मंमं प्रवेश करते हैँ ओर पांच य॒क्रितका कारण सदा सुज्ञमेही स्थित रहता है ॥५॥ सो यह त
पंचमूरतोम मेरे जनोंदवारा दीखता है. पृथ्वीम सृष्टि जरम स्थिति अभ्रम संहार ॥ ६ ॥ पवनमे तिरोभाव आकाशम अनुप्रह है सब कुछ पृथ्वी 8
उत्पन्न करती है जसे सकी बृद्धि होती है ॥ ७ ॥ तेजसे सन नष्ट होते वायुमे सब ठय होते ओर आकाशद्वारा सबपर अलु्ह होता है एसा ट
सगः ससारसेरंभस्तत्परतिष्ठास्थितिमता ॥ संहारोम्दन॑तस्यतिरोभावस्तदुत्करमः॥॥तन्मोक्षोऽनुयदस्तन्मेकृत्यमेवंहिषंचकम् ॥ ट
कृत्यमेतद्रहत्यन्यस्तूष्णीगोपुरषिववत्॥॥सरगादियचचतुष्कृत्यंसंसारपरिंभणम् ॥ पचमंसक्तिदेतु्नित्यं मयि च सुस्थिरम् ||
॥ ५ ॥ तदिरदेपंचभूतेषुदृश्यतेमामकेजनेः ॥घष्िभमौस्थितिस्तोयेसहारः पावकेतथा ॥६॥तिरोभावोऽनिरेतद्रदलथदहहाम्बरे ॥ |£
सृज्यतेधरयासवेमद्धिः॥ सर्वरं ॥७॥ अदयतेतेजसासर्ववायुना चापनीयते ॥ व्योम्नालुगृद्तेसवज्ञेयमेवदिसुरिभिः ॥ <॥ ट
पचक्ृत्यमिदवोदुमपास्तिसुखपंचकम् ॥ चतुदिक्षुचतुरवक्रतन्मध्येषचमेशुखम् ॥९॥ युवाभ्यांतपसारुन्धेतत्कृत्यद्वयंसुतौ ॥ |£
सश्िस्थित्यमि्धभाग्यमत्तःप्ीतादतिप्रियम्॥ १०॥ तथार्दरमदेशाभ्यासन्यत्कृत्यद्वयेषरम् ॥ अनुबहाख्यंकेनापिलन्धुनेवहि
शक्यते ॥ ११ ॥ ततसवेपौर्विकंकर्मयुवाभ्यांकालविस्मरतम् ॥ नतद्ुद्रमदेशाभ्यांविस्सृतंक्मतादशम् ॥ १२ ॥
भाचीन कवि्योको जानना चाहिये ॥ < ॥ इसी पांच रुत्यके धारण करनेको भेरे पांच शल है चार दिशाओं चार मध्ये ओर पाचों
छल है ॥ ९ ॥ हे पत्रो ! यह कत्य आपने तपते पराप्त किया है जोकिं इृष्टिकी उत्पत्ति ओर ॒पारन कहाता है सो मैने भर्ष्न होकर तमहं
दिया है ॥१०॥ इसी ्रकारसे दूसरे दो कत्य इद्र ओर महेशको प्रदान किये है परन्तु अलुधह कत्य कोर भी पानक समं नही है ॥११॥ ६
सो पूवक कम्मं तुमने समयसे बिभार दिये शद ओर महेशने उनको नहीं युखाया है ॥ १२ ॥ ६
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शि०्पु
हपतेश कत्य आसन वाहन ओर आयुधादिमे हमारी साम्यता थी ॥ १३ ॥ हे सौम्य ! मेरे ज्ञानके विख होनेसे तुम्हं अज्ञानता आग मेरा
॥१९।
| ञान होने दा नही' होता ज्ञान ओर हप महेशक पल्य होजाता है ॥ १४ ॥ इ कारण उप ज्ञानक िद्क निमित्त छकार नामक
ट| मज जप् करो यह अभिमानका दूर करनेवाला है ॥ १५ ॥ सोई निज मेत् उपदेश करते है यह ॐकार मेरे खले उत्यन्न होनेसे भरी
¢
¢
लपका बोधक ह ओर महामंगल करनेषाा ह॥१६॥यह वाचकहै ओर वाच्यं. यह भे मेरा आत्मा है उसके स्मरणसे मेरास्मरण होता है
॥ १७ ॥ उत्तरकी ओरके खसे अकार" पथिभके मुखे उकारः दक्षिणके अुखसे मकार, पूर्वक खसे विन्द् ॥ १८ ॥ मध्यकै सुखसे नाद
ह्येवेशेचङकत्येचवाहनेचासनेतथा ॥ आयुधादौचमत्साम्यमस्माभिस्तत्कृतेकुतम्॥ १३ ॥ मद्धयानविरदद्रत्सौमोटयवामेवमा
गतम्मज्ज्ञनिसतिनैवंस्यान्मानंरूपेमरेशवत्॥ १४ ॥ तस्मान्मज्ज्ञानसिद्धयथमंजमोकारनासकम्॥ इतःपरंप्रजपतं मामकंमानभे
जनम् ॥ ॥ १९५ ॥ उपादिशं निजं मंजमोकारधुरुमगर् ॥ ओंकारो मन्धुखाजज्ञे परथमं मत्प्रबोधकः ॥ १६ ॥ वाचकोऽयमहं
वाच्यो॑नोऽयंहिमदात्मकः ॥ तदुवुस्मरणंनित्य॑ममातुस्मरणंभवेत् ॥ १७॥ अकाररत्तरात्पूवमुकारः पश्चिमाननात् ॥ मका
रोदक्षिण्चखाद्िदुःपरादञ॒खतस्तथा ॥ १८॥ नादोमध्यञ्चादेरवपंचधाऽसौविजंभितः ॥ एकीधूतःपुनस्तद्रदोमित्येकाक्षरोभवत्
॥ १९ ॥ नामह्पात्मकंसर्वविदभूतकुरद्रयम् ॥ व्याप्तमेतेनमम्रेणशिवशक्तयोश्वबोधकः ॥ २० ॥ अस्मात्पचाक्षरंजज्ञेबोधकंसक
लस्यतत् ॥ आकारादिकरमेणेवनकारादियथाक्रमस् ॥ २१ ॥
|| उत्पन्न हज, इस भकार पांच प्रकारसे बह निगंत हंभा वह सब एक होकर “ॐ एता एकाक्षर होजाता है ॥ १९ ॥ यह सब नाम
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अ० १.९ वेदमूत दोनों कुड अथात् ज्ञीऽरूष भेदते भौतिक शरीर वगं दोका भेदवाडा है वह इसी मेतरते व्याप्त है ओर शिवशक्तिका बोधक है
॥ २० ॥ इसी ॐकारे सब जगतका बोधक प्रवण उत्पन्न हुभा है अकारादिक्रमते अर्थाव् अकारसे नकार उकारसे मकार मकारे शि"
चिन्दुसे 'वा' नादसे "य भ्रगर हुआ है ॥ २१ ॥
| | इसी पंचाक्षरे पांच भेदते भोतृका अकारे कारपयन्त हुदै उत्ते शिरोमन ओर चार सोते त्रिपदा गायत्री हदं ॥ २२ ॥ उत्से
४ पव वेद उतपन्न हूए उसमे करोड मंत्र उत्यन्न हुए, उस मंत्रे उसके कथनालुसार सिद्धि होती है परन्तु पंचाक्षरमंत्रसे सब सिद्धि होती ह
\ ॥ २३ ॥ इस शरेष्ठ मूखमंत्ते सब सिद भोग ओर मोक्षकी सिद्धि होती है, कटासहित सब राजर्मतर साक्षात् भोग ॒देनेवाटे ह ॥ २४ ॥
नेदिकेश्वर बोढे तब उन दोननोकि गुरु शिव जीने उन दोनोकि शिरषर वच्च रख ओर अपना करकमर धारणकर पार्वेतीसहित उत्तरकी ओरको
४ छख कल्पना कर उन दोनोंको मैत्र दिया ॥ २५ ॥ येत्र तंत्र ओर युक्तिमूषैक तीनवार उस् म॑त्रको उदारण कराकर मत्र भदान किया तब
४ अस्मोत्पंचाक्षराजातामात॒काः पंचभेदतः ॥ तस्माच्छिर्चतुवंकरातरिपाद्रायतरिरेव दि॥२२॥बेदःसव॑स्ततोजजञेततोवेमेजकोटयः ॥
|| तततन्म्ेणतत्सिदधिःसवसिद्धिरितो भवेत् ॥ २३॥ अनेनमजकंदेनभोगोमोक्षश्चसिद्धयति ॥ सकलारमनराजानःसाकषद्धोगभदाः
लभाः ॥२९ ॥ नदिकेश्वरडवाचपुनस्तयोस्तजतिरःपटंयःप्रकरप्यमेजंचसमादिशत्परम् ॥ निधायतच्छीष्णिकरांडुजंशनैरुदङ््
शुख॑संस्थितयोःसदांबिकः ॥ २५ ॥ बिश्चायाग्रहीन्मंनरयंजतवोक्तिप्वंकम् ॥ शिष्यौचतौदक्षिणायथामात्भानेचसमरपयत्॥२६॥
परबद्धदस्तौकिलतोतदंतिकेतमेवदेवनगतु्जगद्वरम् ॥ २७॥ ब्रह्माच्युताबूचतुः ॥ नमोनिष्करहूपायनमोनिष्करूतेजते ॥ नमः
सकलनाथायनमस्तेसकटात्मने ॥ २८ ॥ नमः ॥ प्रणववाच्यायनमःप्रणव््िगिने ॥ नमःसृटयादिकनैचनमःप॑ंचसुखायते
ह|| ॥ २९ ॥ पचत्र्स्वरूपायपेचकृत्यायतेनमः ॥ आत्मनत्रह्मणेतुभ्यमनतयुणशक्तये ॥ ३० ॥
उन दोनोने दक्षिणाम उनको अपनी आत्मा निवेदन करदी ॥ २६ ॥ ओर हाथ जोडकर उन दोनोने देवदेव जगते शरुते यह वचन के
॥ २७ ॥ ब्रह्मा ओर अच्युत बोट निष्कठरप ओर ॒निष्कठ तेजस्वी सवके स्वाभी सम्पूके आत्मके निभित्त नमत्क।र ३ ॥ २८ ॥
। ॐकार वाच्य तथा ॐकार है छिग जिसका तिके निषि नमस्कार है; तथां शष्ठिकि कतौ पचसलवारे आपको नमस्कार है ॥ २९ ॥
पेच ब्रह्मस्वरूप पंचकत्य आत्मा स्वरूप ह अनन्त गण शकिवमानूके निभि्त नमस्कार है ॥ ३० ॥
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शि०्ड° कठ अकल्प शम्भु यस्क निमित्त नमस्कार है, इस प्रकार स्तुति कर बहा विष्णने शिवको नमस्कार किया॥३१। ईश्वर बोटे हे ऽत्र! तुमको सब
॥२० | | तत कहा ओर दिखायाभी इस दिठ्य पवित्र मंत्रको जपो यहं साक्षात् मेरा स्वरूप है॥ ३ २॥ इससे ज्ञान सुस्थिर होता तथा सर्वत्र भ्रष्ट पाग्य होता है.
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अ० ११
आयुक्त चौदशमे जप करनेते अक्षय ्ण्य होता है॥ ३३ आगमे सरयहो तो एक मंत्र जपने कोटि यणा फठ होता ह मृगशीर्षका अन्तिम ओौर पनर्वसु
करा आदिका भाग ॥ ३४ ॥ यह पृजा होम तर्पण करनेभे आदिहीके समान सदा फठदायक् है, भातःकाखमे दरशन ओर परभातकी सन्धि दर्शनका
महाफठ है ॥।३५॥ ओर अदैरा्िग्यापिनी चतुर्दशी छेनी कोई परदोषन्यापिनीभी कहते हँ यहभी श्र है. कोई परपिथिमे युक्त ठेते ह।।२६। भग
सकलाकलूपायशंभवेगुरवेनमः ॥ इतिस्तुत्वाग॒रुपयेर््रह्माविष्ण-अनेमतुः ॥ ३१ ॥ ईश्वरउवाच ॥ वत्सकौ स्ैत्व॑च कथितद
शितंचवाम्॥ जपतंप्रणेमंञ्देवीदिष्टमदात्मकम् ॥ ३२ ॥ ज्ञानंचसस्थिरंभाग्यस्वभवतिशाशवतम् ॥आद्वयांचचतुदश्या तना
प्यतवक्षयभवेत् ॥ ३३॥ सूयैगत्यामहादरायामेकंकोदिशणं भवेत् ॥ मृगशीषौतिमोभागःपुनवंस्वादिमस्तथा ॥ ३९ ॥ आद्र
मःसदज्ञेयःपूजाहोमादितर्पणे ॥ दशनतुभभतेचप्रातःसंगवकार्योः॥ ३५॥ चतुर्दशीतथाराञ्यानिशीथन्यापिनीमवेत् ॥ भरो
षव्यापिनीचेवपरयुक्ताप्रशस्यते ॥ ३६ ॥ दिगबेरचमेतरस्थयजतांछिगसुत्तमम् ॥ तस्मािगंपरपूज्यबरादपिसुसु्षुभिः॥ २७ ॥
रिगमोकापमतरणवेरपंचाक्षरेणत् ॥ स्वयमेवदिदव्येःपतिषटाप्यप्रेरपि ॥२८॥ परूजयेदुपचरिश्वमत्पदंखलभभवेत् ॥ इतिशास्यत
दाशिष्योततैवांऽतितःशिवः ॥ ३९ ॥ इतिश्रीशिवमहापुराणेविचेश्वरसंदहितायांदशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ऋषयञचुः॥ कथं
सिगंप्रतिष्ठाप्यकथवातस्यलक्षणम् ॥ कथंवातत्समभ्य्च्य देशेकारेचकेनहि ॥ १ ॥
तुल्य सुन्दर टिगवेरका यजन करना चाहिये इस्कारण युक्तिकी इच्छा करनेवाटेको बेरसेभी परङिगका पूजन करना चाहिये॥ ३७॥छिगको |
मंत्रसे बेरको पचाक्षर मेरे पूजे स्वयं छिगको शरेष्ठ दरव्यसे पूजे ओर दृसतरे छिगकी प्रतिष्ठा करके॥ ३ ८॥उपचारादिद्वारा पूजन करे तो मेरा पद् प्ुकभ
होजाता है. इस प्रकार शिप्योको उपदेश दे शिवजी वहाही अन्तधौन हौगये ॥ ३९ ॥ इति भरीशि° ष° विये ° पंडितज्वालाप्रसाद मिश्रकत
5)॥ भाषायां साध्यसाधनखण्डे पचकत्यादिवणेनं नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥ ऋषि बौठे छिगकी भतिष्ठा किंस भकार करनी चाहिये, उस्तका कया
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२८
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| 8, किस देशका किस भकार उसकी अना करनी चाहिये १ ॥१॥ खतजी बोे भे तुम्हारे निमित कहताहं सावधान होकर सुनो सुन्द्र
। समय पुण्य तीथं अथवा तट ॥ २ ॥ जहां नित्य पूजाका संभव हो रेते स्थानम नित्य अचन करे, पृथ्वीसम्बन्धी इठ्य, जठमय अथवा किसी
|| पातत जेसी इच्छाहो ठिग निमीण करे ॥३॥ शेवशाखोम जो उसका विधान छिखा है उसके अनुसार करके ठिग पूजाका फठ रहण करे. कारण
¢| कि, सव ठथ्षण सामान्य होने पूजा कखकी देनेहारौ ॥४॥ सूति हो तो छोरी अनाम राक भवर हौ तो सर निमन कर रण भोर
|| सिंहासन सहित शिवका स्थापन करे ॥५॥ चरका मेर अथवा त्रिकोण बनाकर सट्वाग ( दंड आरोपितरिरकपालात्क ध्वज ) कै समान
|| सूत्वा ॥ यष्मद्ैव्यामिडुदधतामवधानतः ॥ अजलेुभेकुण्येतीयतटतथा ॥ २ ॥ यथेष्टलिगिमारोप्ययनस्या
1) पाथिवेनतथाप्येनतेजसेनयथार्चि ॥ ३ ॥ कल्पलक्षणसंयुक्तंखिगपूजाफललभेत्॥ सवलक्षणसंयुक्तसद्यःपूजा
| फलभदम् ॥ ९ ॥ चरेविशिष्यतेषु््मस्थावरभूलमेवदि ॥ सलक्षणंसपीठंचस्थापयेच्छिवनिमिंतम् ॥ ९५॥ संडलंचतुरसवा्निको
। णमथवातथा ॥ खट् वांगवन्मध्यसुक्ष्मंसिगषीठेमहाफलम् ॥ € ॥ प्रथमेमृच्छिलादिभ्योलिगंलोहादिभिःकृतम् ॥ येनलिगते
नपीरस्थावरेदिविशिष्यते ॥ ७ ॥ खिगंपीठंचरेत्वेकंलिगंबाणकृतंविना ॥ सिगप्रमाणकतैणाद्रादशांयल्छ्तमम् ॥ ८ ॥ न्यूनं
|| चेत्फलमत्पंस्यादधिकंनेवदृष्यते ॥ कतैरेकांलन्यूनंचरेपिचतथेवदि ॥ ९ ॥ आदौविमानंशिल्पेनकायैदेवगणेयुंतस् ॥ तत्रग
भगृेरम्येददेदर्षणसेनिभे ॥ १० ॥ भूषिते ॥ नवरत्नेशदिश्ारेचष्रधानकैः ॥ नीकंरक्तं चवेदूर्यश्या्मारकततथा ॥ १३ ॥
मध्यम सक्षमङिग क चौकी (जिततपर स्थापना होती है) महाफठ देनेहारो ै॥६॥भथमरिग भिड्ी शिखा ओर लोहादिषातुओि करे जिस वर्तुका
|| ठिगहो उसका पीट बनावे कैव स्थावरं विरोषता है ॥७॥ कैवरु वाणरटिगको छोडकर छिंगपौठ एकहीमे निर्माण करे छिगका भमाण बारह
ह|| अंखल्का करे ॥<८॥ न्यून होनेसे फकभी थोडा होगा, अधिक हनेमे कोद दोष नही अथवा ग्यारह अगुडभौ दादशकैही समान है ॥९॥ भथम
| शिल्पमियासे देवताओंके गणोसहित विमान करावे उसके भीतरकै धुंद स्थानो जो इठ ओर दपणकै समान प्रकाशितहो ॥१०॥ उन्ह नवरत्नोते
न
न 444
31
4
324 2.
् भूषित करे पूर्व ओर पश्चिमी ओर उत्तका खरप गृहद्वार बनावे, नीढरतन वैटरम्थमणि श्याममरकतमणि ॥११॥ मोती भगा परवा गोभेदहीरा यह ||!
1 ष | नौ रत्न है; िगके स्थापनके मध्यदेशमे र मरल वस्तु स्थापन कर दे॥१२॥फिर सथोजातादि मंत छिगको पूजन कर ओर् पूवदिदिशाभकि ¢
| मध्यमे अर्चन कर अभि अनेक भकार आहति देकर ओर परिवार सहित मेरा॥१ ३॥पृजनकर णह ओर आचा्यकाभी पूजनकर अध् ओर कामे >
ह बन्धुजनोंका सत्कार कर अधियोके निमित्त घर बगीचा ओर गोदानादि देना चाहिये॥ १४॥फिर यत्नपुवक स्थावर जगमादि सब जीवको सैतुष्टकर #
ट हुव्णं ओर नर्न पूरित उस गर्त ॥१५॥ सयोजातादि पांच म््॑ोको उचारण कर ओौर प्रमसुभगदेवका ध्यानकर ॐकारकै नादे शोधितकर £
क्तापरवारगोमेदव्राणिनवरत्नकमूमध्येखिगंमहदरग्यंनिक्षिपत्सहवेदिके ॥ १२ ॥ संपूज्यर्गंसयायैःपचस्थानेयथाकमम् ॥ ||
| अप्नौचहत्वाबहुधादविषासकलटंचमाम् ॥ १३ ॥ अभ्यच्यगुरूमाचार्यम्थैः ॥ कामेश्बाधवम् ॥ दयादेश्व्यमथिभ्योजडमप्य टू
ट| जडतथा ॥ १४ ॥ स्थावरजगमेजी्सर्वसंतोष्ययतनतः ॥ सुव्णप्रितेश्वभेनवरतनैशपूरिते ॥ १५ ॥ सयादिबह्नचोचार्य्या |
॥९| तादेवंपरं्चुभम् ॥ उवीर्यचमहामं्रमोकारंनादघोषितम् ॥ १६ ॥ टिगंतञपरतिष्ठाप्यलिगंपीठेनयोजयेत् ॥ खिगंसपीठनिक्षिप्य ||&
¢ नित्यलेपेनबंधयेत् ॥ १७ ॥ एवंबेरंचसस्थाप्यंततरैवपरमंशचुभम् ॥ पंचाक्षरेणबेरंतुउत्सवार्थवदिस्तथा॥ १८ ॥ बेरेयुरुभ्योगरही ४
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यात्साधुभिःपूजितंतुव। ॥ एवंलिगेचबरेचपूजशिवपद्धरद्। ॥ १९ ॥ पुनश्वद्विविधश्रोक्तस्थावरंजगयेतथास्थावरंलिगमित्या
इस्तरूयल्मादिकंतथा ॥ २० ॥ जंगङ्गिमित्याहुःक्रिमिकीटादिकंतथा ॥ स्थावरस्थचज्चुश्चषाजगमस्यचतपंणम् ॥ २१ ॥
वि ०० १४|| महामर्ोका उच्चारण कर ॥१६॥ उसभ छिग स्थापनकर किर ठंग ओर पीठको जोडकर ओर उस्र ठिग ओर परीटको दृढ जोडनेवाठे द्रव्यसे
अ० ११|| जोडदे ॥१७॥ इसी विधित बेरणिगकीमी वहां स्थापना करे. पंचाक्षरथंसे वैरको उत्सवादिके निभित्त बाहर रक्खे ॥१८॥ बैरङिगको महात्मा
ह|| अथवा साधुते रहण करना चाहिये अथवा शुङ्ते रहण करे इस भकार ङिग ओर बैरे षहादेदकी पजा शिवके पदकी देनेहारी है ॥१९॥ फिरभी
|| स्थावर जंगमके भेदे यह दो प्रकारके है, तर शल्मादिके रंगको स्थावर कदते ह ॥२०॥ छमि कीटादि जंगम ग है, स्थावरकी शुश्रूषा अर्थाच ||¢
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जलादितेचन आर उनका तर्पण अथोत् जर अन्नादिसे सतषट करना है ॥ २१ ॥ उस उत सुसके अन॒रागसे शिव पूजा पंडितोनि कही है, ||!
पीट भ्रकतिमय है ओर शिबरिग ज्ञानस्वहप है ॥ २२ ॥ जिस प्रकार शिवजी पारवतीदेवीको अंक लेकर स्थित रहते है इसी भकारसे रिग
इस॒पीठको धारे स्थित रहता है ॥ २३ ॥ इस प्रकार रिगको स्थापनकर उपचारे पूजा करे यथाशक्ति नित्य पूजा ओर ध्वजादिका
४ उत्सव करे ॥ २९ ॥ इस भकार शिवपदकै देनेवारे टिगकी नित्य पूजा करे अथवा चरर्िगकी षोडश उपचारसे पूजा करे ॥ २५ ॥ यथा
|| पोग्य पूजे तो शिवजी पदकौ भामि होती है, आवाहन आस्न ध पाय ॥ २६ ॥ अंग॒ आचमन तैरायंगपुवकं आचमन वञ्च गेष पष्प
¢| ततततसुलानुरागेणशिवपूजांविदुयाः ॥ पीठमंबामयसर्वशिवर्गंचचिन्मयम् ॥२२॥ यथादेवीचमामंकेधत्वातिष्ठतिशंकरः ॥
|| तथाणिगमिदधीेत्वातिषठतिसततम् ॥२२॥ एस्था्यमहागषजयेदुपचारकेः॥ नित्यधूनायथाशनित्वजापिकरणंतथा ॥
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॥ २९ ॥ इतिकषस्थापयेखिगंसाक्षाच्छिवुपदप्रदम् ॥ अथवाचरखिगंतुषोडशेरूपचारकेः ॥२५॥ पूनयेचयथान्यायकरमाच्छिव
पदप्रदम्॥आवाहनेचासनेचञअर्व्यपायं तथेवच॥२६॥ तदंग चमनंचेवस्नानमभभ्यगपरवक्। वद्घगधंतथापुष््पभूषंदीषनिवेदनम्॥
॥ २७ ॥ नीराजनेचताबरूटनमस्कारोविसर्जनम् ॥ अथवाऽ्यादिकंकृत्वानैवेदयतंयथाविधि ॥२८॥अथामिवेकेनैवेयंनमस्कारंच
तर्षणम् ॥ यथाशक्तिसदाढ़यात्कमाच्छिवपदप्दम्॥२९॥अथवामापेरिगप्यदैवेस्वयधुवि ॥ स्थापितेऽपूरवकेरिगेसोपचारं
यथातथा ॥ ३० ॥ पूजोपकरणे दत्ते यत्किचित्फमश्वते ॥ भरदक्षिणान॒मस्कारैः कमाच्छिवपद्परदय् ॥ ३१ ॥
धूप दीप निवेदन करना ॥ २७ ॥ नीराजन ताम्बूल नमस्कार विजन अथवा नेवेयके अन्ततकं यथात् अध्यौदि करके ॥ २८ ॥ अभिक
नैवेय नमस्कार तर्पण यथाशक्ति सदा करे तो कमे शिवपदकी भाति होती है ॥ २९ ॥ अथवा भवुष्यकै स्थापित किये अथवा त
| स्थापित क्वि अथवा स्वयं भरादुधृत हर अथवा नये स्थापन किये ठिगमं सथा तथा उपचार ॥ ९० ॥ ओौर पूजासाममौ निवेदन करने जो
>| कुछ फलकी भराति होती है यहां दक्षिणा नमस्कारसेही मसे शिवपदकी भाषि होती है ॥ ३१ ॥
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शि° | | नियमतते शिवदशन करनेसेभी शिवटोककी भाप होती ह, पिसी मिद्रीम गोबर मिलाकर वा कनेरकै एूल अथवा अनेक प्रकारके फट ॥३२॥
॥ | ट| यड नवनीत भस्म अन्न अथवा जसी रुचि हो उसी प्रकार छिगको यत्नपूरवंक निमिंत करके उर्तीके अुसार यजन करे ॥ ३३ ॥ दसी प्रकार | )
विं०सं०१
अ० ११
ट कोई अंय्मेही शिवजीकी पूजा करते है रिग पूजा चाहे जहां करे इसका निभेष नहीं है ॥ ३४ ॥ श्रमके अनुसार शिव स्त्री फल देते
त है अथवा डिगदान ओौर ठिंगका मूल्य ॥ ३५ ॥ अथवा भद्धापूवेक शिक भक्तको ५८ महाफठकी प्राति होती है शिवका पदही मि
त जाता है, अथवा नित्य प्रति दशसहस्र ॐकारका जप करे ॥ ३६ ॥ अथवा दोनों सं्याओं सहश्च २ वार जप करनेसेभी , शिवपद्की प्रापि
¢ िगंदशेनमा्ैवानियमेनशिवग्रदम् ॥ सृत्पिष्टगोशङ्कत्पुष्पेः करवीरेणवाफलः ॥ ^ ॥ गुडेननवनीतेनमस्मनान्ने्यथार्चि ॥
सिगंयत्नेनकृत्वातियजेत्तदन॒सारतः॥३३॥अगष्ठादावपितथापूजामिच्छतिकेचन॥ छिगकमेणिसर्व्निषेधोस्तिन किंचित् । २९॥
| सर्वफल्दाताहिमयासालयणंशिवः॥अथवा्गिदानवाङ्गमौरयमथापिवा॥३५॥ भरद्धयाशिवभक्तायद्तशिवपद्दम्॥ अथवा
¢| प्रणरवनित्यंजपेदशसहसख्रकम् ॥ ३६ ॥ संध्ययो्सदसंवाज्ञेयशिवपदपरदम् ॥ जपकारेमकारांतंमनःञुद्धिकरंभजत् ॥ ३७ ॥
£| समाधौमानसंपरोक्तसुपासार्वकालिकम् ॥ समानप्रणवंचेमे बिंदुनादयुतं विडः ॥ ३८ ॥ अथपंचाक्षरंनित्यजपेदथुतमादरात् ॥
&|| संध्ययोसदसरवाज्ञेयंशिवपदप्रदम्॥ ३९॥प्रणवेनादिसंयुक्तं बाह्मणानां विशिष्यते॥ दीक्षायुक्तंग॒योर्बादयं मंंद्यथफलाप्तये ॥९०॥
होती है जपकालमं मकारान्तही ( ओभ ) भनशुद्धि करनेवाढा होता है ॥ ३७ ॥ समाधि मानसिक जप कहा है उपांशु अथात् दृसरेको ६
न सुन पडे एसा जप सर्वटोकमें कहा हे ओर विंदुनाद युक्त पण३ सर्वकार्ये एकही हे ॥ ३८ ॥ अथवा प्रेमसे नित्य दशसहक्च पंचाक्षर जपे
ह अथवा दोनों सन्ध्याओमें शहञ्ञ २ बार जपनेसे शिवषदकी भाषि होती है ॥ ३९ ॥ बाह्यणोको पंचाक्षरके जपम ॐ गाना उचित हे ओर ्
ह|| रुल्कौ प्रापतिके निमित्त गारसे दीक्षापुवैकं मंत ग्रहण् करना चाहिये ॥ ४० ॥
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~ ६----=-----> दम
प्व
= 04 उ+
| मंत्दीक्षा मातृका न्याप्न करना ओर स्त्य बोठनेसे पवित्र आत्मा ज्ञानी र्होना चाहिये ॥ ४१ ॥ बाहरणोको नमः पहठे ओौर ||
दूसरे वर्णौको नमः पीठे विधिपुवक ठगाना चाहिये च्वियोंको अन्तम नमः ठगाना चाहिये ॥ ४२ ॥ कोई कहते है; ब्राह्मणोंकी च्लीकोभी
नमः पहठेही मेत्रमे उचारण करना चाहिये, ( ॐनमः शिवाय ) यह पैचाक्षरका पांचकरोड जप करके सदाशिवके समान होजाता है ॥४३॥ ट
एक दो तीन चार करोड जप करके ब्रह्न विष्ण रद्र महेशके पदको प्राप्त होता है, अथवा मंत्राक्षरोेसे एक २ अक्षरका एक २ छाखं जप &
कंरे ॥४४॥ अथवा जितने मंत्रके अक्षरहों उतनाही ठक्षनप करनेसे शिवपदकी प्राप्ति होती है, अथवा सहस दिनम दशलक्ष जपकरे ॥ ४५॥
कुभस्नानंमंजदीक्षांमातकान्यासमेवच ॥ ब्राह्मणःसत्यपूतात्मा ग्॒ज्ञानीविशिष्यते ॥ ४१ ॥ द्विजानां चनमःपूर्वमन्येषां चनमो
न्तकम् ॥ स्रीणां चकचिदिच्छतिनमोतंचय॒थाविधि ॥ ४२ ॥ विप्रघ्लीणांनमःपूर्वमिदमि च्छंतिकेचन ॥ पंचकोरिजषंङृत्वासदा भ
शिवसमोभवेत् ॥ ४३ ॥ एकद्वि्रिचतुःकोटवान्रह्नादीनांपदबजेत् ॥ जपेदक्षरलक्ष॑वाअक्षराणां प्रथक्पृथक् ॥ ०० ॥ अथवाक्ष |4
रलक्षवाज्ञेयशिवपद्परदम् ॥ सदसंतसदस्ताणांसहसरेणदिनेनदि ॥ ५ ॥ जपेन्म॑वादिष्टसिद्धिनित्यंब्ाह्मणभोजनात् ॥ अष्टोत्त ट
रसदसवैगायशीप्रातरेवहि ॥॥७६॥ व्राह्णस्त॒जयेतनित्यंकमाच्छिवपदपरदान् ॥ वेदर्मास्तुसुक्तानिजपेतियममास्थितः ॥४७॥ |
एकंदशाणमंग्रचश॒तोनंचतदूर्वकम् ॥ अयुतंचसहस्ंचशतमेकंषिनाभवेत् ॥ ४८ ॥ वेदृपारायणंचैवजञेयशिवपदमदम् ॥ अन्या ॥६
न्बहुतरान्म बाजपेदक्षरलक्षतः ॥ ४९॥ ट
नित्य बा्षणभोजन करावे, म॑त्रजपे, इष्टकी सिद्धि होगी ओर १००८ एकतहन्न ओौर आठ गायत्री भातःकाटही नित्य जपे ॥ ४ 0
प्रकार बराह्ण जप करनेसे कमते शिवपदको भराप्त होजाता है, वेदक भैत्र ओर सक्तं नियमे जपे ॥ ४७ ॥ एक दशार्णं अथात् दश अक्षर ४
मन्त्र सौसे अभिक सहस्रादि जपे ससे कमती न करे, दशसहल अथवा सहल एकक विना करे ॥ ४८ ॥ वेद पारायणसेभी शिषपदकी १
1
प्रापि होती है ओर भी बहुत मंत्र है उनके जितने अक्षरहोँ उतनेही खख जपे ॥ ४९ ॥
न
शिश्पु एकाक्षरमंत्रको एक करोड जपे इसके उपरांत भक्ितपूवेक सहस ॐकारका जप करे ॥५ ०॥ इसभकार यथाशक्ति करते कमते शिव पदको भा
॥२३॥ ¢ होजाताहै, नित्य भरति जीवनप्यैत एक मंत्रका जप ॥५१॥ (ॐ) रेस्ा सहस्लवार करता रहं तो शिवकी आज्ञासे सपूण अभिष्टकी प्राति होजाती है.
¢ इष्य बाग तथा संमाजन॥५२॥ शिवकरे निमित्त करनेसे कल्याण ओर शिवपदकी भाप्ति होती है, नित्य भकितपूर्वक शिवतम निवास करे॥५३॥
यह जड अजड सबकोहो क्ति देते है इस कारण ुद्धिमानूको उचित है कि? शिवक्षेत्रे मरणप्यैत वास करे॥*५४॥जहां मलु्योनि ठग स्थापित
¢ किया ह वहां स्तौ हाथतक धण्यजनक स्थान है ओर एण्य कषत्रम जहां कंषियोनि स्थापित किया है वहं सहस्र अरत्नि(हाथभर)तक स्थान पवित्र
ठ एकाकषरास्तथामंजाजपेदक्षरकोटितः ॥ ततःपरंजपेचैवसहसंभकतिपूरवकम् ॥ ५० ॥ एवंङया्थाशक्तिकमाच्छिवपदंरभेत् ॥
ठ नित्यंरचिकरतवेकमंजमामरणातिकम् ॥५१॥ जपेत्सहस्रमोमितिसर्वाभीटरिवाज्ञया॥ पुष्पारामादिकंवापितथासंमाज॑नादिकम्
|| ॥ «२ ॥ शिवायशिवकायांथज्ृत्वाशिवपद॑कभेत् ॥ शिवकषत्ेतथावासंनित्यंकुय्चभक्तितः॥ 4२ ॥ जडानामजडान चसन
षभुक्तिभुक्तिदम् ॥ तस्माद्रासंशिवक्षतरेङयादामरणंबुधः ॥ ५४ ॥ सिगोद्धस्तशतंपुण्यंक्ष्ेमानुषकेविदुः ॥ सरस्रारल्िमा
ए
ट
६
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्रतपुण्यकषतेतथारषके ॥ ५५ ॥ देवरगितथाज्ञेयसदसरारत्निमानतः ॥ धलुष्माणसादसंुणयक्षस्व्यथुवि ॥ 4६ ॥ प्यत्र
स्थितावापीकूपाद्यपुष्कराणिच ॥ शिवगंगेतिविज्ञेयशिवस्यवचनयथा ॥ ५७ ॥ तस्नात्वातथादत््वाजपित्वादिशिवं्रनेत् ॥
शिवकषवर॑समाभ्रित्यवसेदामरणंतथा ॥५८॥ दाहंदशाहमास्यैवासपिंडीकरणंतुवा॥आष्दिकंवाशिवकषकषतरेपिडमथापिवा ॥५९॥
होता है ॥५५॥ दैवताओेक स्थापित छिगको चारो ओर सहल्न अरलि स्थान पवि होता है ओर तवरयभूठिग अथौत् जह टिग स्वयं प्रादुभूत
हुआ है वहां सहसत धलुषतक स्थान पवित्र होजाता है'चार हाथका एक धलुष होता है ॥५६॥ पण्यकषत्रके कुए बावढी एष्कर (सरोवर) वे सब ||(
शिदगंगासवहप ई, यह शिदजीका वचन है।५७।बहा ज्ञान दान ओर जप करने शिवरोककी भाष्ति होती ह, शिव्ष्रको भाषहो मरणपरवन् ||
इहां निवास करना उचित ६।५८॥ दाह दशाह मासिकक सपिंडीकरण भाद सत्सरिककर्म कषे्रपिंड जो कुछ रिवषे्रये किया जाता है॥५९॥
वि०सं०१
अ० ११
| सब पाप दूर होकर शीघ्र वह शिबपदको भ्रा होता है. अथवा जो कोई सात रात वा पंच राततक निवास करे ॥६०॥ तीन रात वा एक
रात निवास करे तो भी ऋमसे शिवपदकी प्रापि होती हे बोह्लणादि अपने २ वणेके अलुहप उसके फठकी अधिकता सुन्दर आचरणसे पराप्त करते ¢
है ॥६१॥ ओर भकितिपूंक करनेसे मनुष्यको महाफढ भिर जाता है जिससे उनका वणोदधार होता हे जो कुछ कामना करे शीघही उ्षका एल र
रपत हाता है ॥ ६२ ॥ सब प्रकार कामनारहित हो पूजन करनेसे साक्षात शिवफल्की भाषि होती है भातःकार मध्याह्न ओर सन्ध्या समय ठ
प्रतिदिन जो शिवाराधन प्रत्येक समयमे करे ॥ ६३ ॥ प्रातःकालका जप ॒नित्यविधि सपादन करना हे मध्याहका कामनाका ओर सध्याका ६
सर्वपापविनिर्थुक्तःसद्यःशिवपदं टभेत्॥अथवासप्तराचवावसेद्रापैचराजकम् ॥& ०॥ त्रिराचमेकरात्रवाकमाच्छिवपदंभेत्॥ स्ववणां ए
नुगुणंरोकेस्वाचारात्पाप्लतेनरः ॥ ६१ ॥ वर्णोदधारेणभक्तयाचतत्फरातिश्यंनरः ॥ सर्व॑कृतंकामनयासद्यःफलमवाप्लुयात् ¢
॥ &२ ॥ सर्वकृतमकामेनसाक्षाच्छिवपद्प्रदम् ॥ प्रात्मैध्याहसायाह्मदश्चिष्वेकतः कमात् ॥६३॥ प्रातविंधिकरं ज्ञेयमध्याह ट
कामिकंतथा ॥ सायाद्वशांतिकं्ञेयराचावपितथेवहि ॥ ९० ॥ कारोनिशीथोवैभोक्तोमध्ययामद्वयनिशि ॥ शिवपूजाविशेषेण ||2
तत्कालेऽभीषटसिद्धिदा ॥ ॥ ६५ ॥ एवज्ञात्वानरःङुर्वन्यथोक्तफलभाग्भवेत्॥ कलौयुगेविशेषेणफरुसिद्धिस्तुक्मणा ॥ ६६ ॥ ||
ट
ठ
४
उक्तेनकेनचिद्रापिअधिकारविभेदतः ॥ सदवृत्तिःपापभीर्शत्त्तत्फलमवाप्ठयात् ॥ ६७ ॥ षयञचुः ॥ अथक्षे्राणिपुण्या
निसमासात्कथयस्वनः ॥ सर्वाःस्ियश्चपुरूषायान्याश्चित्यपद॑लभेत् ॥ ६८ ॥
शातिदायकं ओौर रात्रिका भी इसी प्रकारका है ॥६४॥ दो पहर रात बीतनेषर आधीरात होती है उस षय शिवजीका पूजन विशेष फलका
देनेवाखा है, सब सिद्धि होती है ॥ ६५ ॥ इस प्रकार जानकर करनेसे षरुष्व यथोक्तफृरुभागी होता है, विशेषं कर कणियुगभें फ सिदि
करसे होती है ॥६६॥ वणेन किये हुए किंस अधिकारके भेदते भ्रष्ठ आचरणी भौर पापे इरे तो उपरोक्त सम्पूणं फर प्राप्त करता है ॥६७॥
कषि बोठे सतजी ! संकषपसे आप हमसे पवित कषे्रोका वणन कीजिये. सव स्वी परुष जिनका आभय कर शिवकै पदको प्राप्त होते है ॥६<॥
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हे सुत ¡ तुम योगी ष्ठ हो ओर शिक्के क्षे्ोके जाननेवारे हो. खतजी बोठे आप भरद्धासे सन क्षत ओर उनके माहातम्यप्रतिपादक
्दविभागको श्रवण कीजिये ॥ ६९ ॥ इति श्रीशिवमहाराणे वियेश्वरतंहिताभाषायामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ खतजी बोरे हे ऋषियो ।
एकत केनेषारे शिवके कषेजोको श्रवण करो, हे महापंडित ! ोकरक्षाके निमित्त उनके माहात्म्यकोमी कते ह ॥ १ ॥ यह पृथ्वी पचास
करोड योजन शेर वन काननसहित शिवजीकी आज्ञासे छोकोको धारण करती है ॥ २ ॥ तहां तहाके शिवक्षेत्र ओर वहाके निवासियोकिं
सूतयोगिवरश्रष्ठशिवक्षेजागमास्तथा ॥ सूतउवाच ॥ शृण॒तश्रद्धयासवैकषे्ाणिचतदागमान् ॥ ६९ ॥ इतिशिवमहाएुराणेविगेश्व
रसंहितायामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ सूतवाच ॥ श्ृणष्वभृषयःप्राज्ञाः शिवक्षेविषुक्तिदम् ॥ तदागमास्ततोवक्षयेटाकरक्षार्थमे
वहि ॥ ॥ १॥ पंचाशत्कोटिविस्तीर्णासशेलवनकानना ॥ शिवाज्ञयादिप्रथिवीलोकंधृत्वाचतिष्ठति ॥ २ ॥ तचतत्रशिवक्षे्रत्
त्रनिवासिनाम् ॥ मोक्षार्थकृपयदेवके्कल्पितवान्भथुः ॥ ३ ॥ परिग्रहादृषीणां चदेवानां परिग्रहात् ॥ स्वथभूतान्यथान्यानि
लोकरक्षा्थमेवरि ॥ ७ ॥ तीथेकिेसदाका्ैस्नानदानजपादिकम् ॥ अन्यथारोगदारि्मूकंत्वाचाप्वुयात्नरः ॥ < ॥ अथास्मि
नभारतेवषेप्राप्नोतिमरणंनरः ॥ स्वयंभूस्थानवासेनपनर्माविष्यमाप्ठयात ॥ ६ ॥ क्षपापस्यकरणदटंभवतिभूसराः ॥ पुण्यक्षत्र
निवासेहिषापमण्वपिनाचरेत्॥ ७॥
न+ > 4 >+ > 44
मोक्षके निमित्त छपा करके परमन क्े्रोंकी कल्पना की है ॥ ३ ॥ ऋषि ओर देवताओंके परिघे टोकरक्षाकै निमित्त जो स्वरयभूत । |
| हए है ॥ ४ ॥ उन तीर्थं ओर कमे ज्ञान जपादिक सदा करना चाहिये न करने मदुष्य रोगी दरिद्री होता ह ओौर उसे जडताकी ६
¦ | पि होती 8 ॥ ५॥ जो मलुष्य इस भारतवर्षे रणको भातत होता है वह त्व्भूके स्थानमे निवास करके फिर मदप्यलोकम आता है
॥ ६ ॥ हे बाह्मणो ! जो क्षि्रमे पाप करता है वह इट होजाता है इस कारण पवित्र कषेत्रम निवासत करकेअणमात्रभी पाप न करे ॥ ७॥
|
निस किसी उपायसे मनुष्य प््यकषेने वते सिन्ध ओर गंगाके किनारे अनेक तीथ॥८॥ओौर पवित्र नदी सरस्वती साठ सुखवाटी कहटाती है उत्तकै
निकट वास करने मनुष्योको शिवपदकी भरामि होती है ॥९॥ हिमार्यते निकटी हुई पवित्र गंगा सौ सुलखोषाटी है उत्क किनारिभी काशी आदि
ट| अनिक कषे है ॥ १० ॥ मकरके सु्यं ओर मकरक बृहस्पति होनेमे दशमुखवाठा शोणमद्रमी महापवित्र ओर अभीष्टका देनेवाला है ॥ ११ ॥ वहां
ए ज्ञान ओर उपवास करनेसे वरिनामकके पदकी प्राति होती है ओर नैदा नदी महापवित्र ओर चौबीस खखवाटी है ॥१२॥ उसभ स्नान ओर उपवास
ह|| येनकेनाप्युपायेनपुण्यक्तरिवसेतनरः ॥ सिथोःशतनदीतीरेसतिकषत्राण्यनेकशः ॥ ८ ॥ सरस्वतीनदीपुण्याप्रोक्ताषष्टियुखातथा ॥
६ तत्तत्तीरवसेत्पराज्ञःकमाद्रद्मपद॑लमेत् ॥ ९ ॥ दिमवद्िरिजागंगापुण्याशतम्ुखानदी ॥ तत्तीरेचैवकाश्यादि पुण्यक्षे्ाण्यनेकशः
॥ १० ॥ तचरतीरपरशस्तदिमगेरगवृहस्पतौ ॥ शोणभद्रोदशगुखःपुण्योभीष्टफलप्रदः ॥ ११ ॥ ततरस्नानोपवदवेनपासेनायकंल
ह|| भत् ॥ चतुर्विशसखापुण्यानमैदाचमदहानदी ॥ १२ ॥ तस्यांस्नानेनवासेनपदवेष्णवमाप्वुयात् ॥ तमसाद्वादशशुखारेवादशश
£| खानदी ॥ १३॥ गोदावरीमहापुण्याब्रह्गोवधनाशिनी ॥ एकविंशञुखाप्रोक्तारुद्ररोकपदायिनी ॥ १४ ॥ कृष्णवेणापुण्यनदी
|| सर्वपापक्षयावदा ॥ साश्ादशसुखाप्रोक्ताविष्णलोकप्रदायिनी ॥१५॥ तैगभद्रादशदुखात्रक्नलोकपरदाथिनी ॥ खुवणघुखरीपुण्या
£ प्रोक्तानवश्रुखातथा ॥ १६ ॥ तचेवसुप्रजायतेब्रह्मखोकच्युतास्तथा ॥ सरस्वतीचपंपाचकन्याश्वेतनदीज्चुभा ॥ १७ ॥ एतासां
|| तीरवासेनरददलोकमवाप्ठयात्॥ सद्याद्रिजामहापुण्याकविरीतिमहानदौ ॥ १८ ॥
¢ करनेसे वैष्णव पदकी प्राभि होजाती ह, तमसा द्ादशमुखी ओर रेवा दशखखली नदौ है ॥१३॥ गोदावरी महापवित्र त्र ओर गोवधहत्या दूर
¢ करनेवाटी है, यह इङ्ठीस स॒खवाटी ओौर रदरलोकको देनेवाी है ॥१४॥ कष्णा वेणी पवि नदी सव पापौको दर करनेवारी है बह अदारहखुखी
£ है ओर विष्णठोककी देनेवारी है ॥ १५॥ तुंगभद्रा दशल ब्रहरोककी देनेवाटो है सुवणखलरी महापवित्र नवस॒सी कही है ॥ १६ ॥
बरहमरोकते च्युत होकर प्राणी इसी स्थानम जन्म ठेते है. सरस्वती कम्या पपा श्ेतनदी ॥ १७ ॥ इनके तीर निवास करनेसे इन्द्ररोककी
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भाप होती है. सल्यप्वतते उत्पन्न हई महापवित्र कावेरी महानदी ॥ १८.॥ यह सपविशयली महानदी सूम अभीष्ट देनवारी ह, उत ५
किनारे महापवित्र स्वर्गदाता बह्म विष्ण प्दके देनेवाठे है ॥ १९ ॥ शेवस्थान शिवोक ओर सम्पूणं इष्टकी भाषि करनेवाले ह
त भे मे | स चित है ॥ २० ॥ सिन्धृनदी सिंह ओर वृथिकके पस्य स्नान ट
नेमिषारण्यमें बदिकाथममे मेषके ब्रहस्पति ओर मेषके स्मे स्नान करना उचित धु न) ठ
करसे ओर वहां तप पुजन करनेसे बह्लोककी भराति होती है ॥ २१ ॥ कैदारका जट्पान ओौर स्नान ज्ञानक देनेवाला 4 दा ्
सिंहके स्यं ओर सिंहके बृहस्पति भे वहां स्नान करनेसे ॥ २२ ॥ शिवटोककी प्रापि होती है. यह स्वयं शिवजीनं कही €. कन्यां युर |
स॒प्तविंश्चखप्रीक्तासर्वाभिीषं प्रदायिनी ॥ तत्तीराःस्वगेदाश्चवब्रह्विष्णुपदप्रदाः ॥. १९ ॥ शिवरोकप्रदाशेवास्तथ{ऽभाफटव ॥-
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दाः॥ नैमिषेबदरेस्नायान्मेषगेचगुरौरवौ ॥ २० ॥ बरह्मरोकप्रदंविदयात्ततःप्ूजादिकंतथा ॥ सिधुनयांतथास्नानसिंहेककटगेखोौ
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॥२५॥
॥ २१ ॥ केदारोदकपानंचस्नानंचज्ञानदंषिदुः ॥ गोदावर्यासिहमासेस्नायात्सिबदस्पतौ ॥ २२ ॥ शिवलोकप्रदमितिशिवेनो
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कततथपुरा ॥ यशरुनाशोणयोःस्नायाद््॒रौकन्यागतेरवौ ॥ २३ ॥ धर्मरोकेद॑ंतिलोकेमहाभोगप्रदं विदुः ॥ कावेर्याचतथास्ना ५
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मासितथास्नायानाहर्यामृगगेयुरौ॥२७॥ शिवकोकपरदमितिब्रह्मणोवचनयथा।बह्नविष्ण्वोःपदेथुक्तातदेज्ञानमाप्डयात्॥२८॥ |©
ओर स्यं होनसे यथना ओर शोणमद्रम ज्ञान करे तो ॥ २३ ॥ धमंरोक गणेशोकमे महाभोगकी भाति होती है ठठके यरु सय्यमे जो |©
क्रीम ज्ञान करता है ॥ २४ ॥ वह विष्ण दचनके माहात्म्ये सम्ूणं मनोरथोको पा होता है. वृशिकके गर् ओर स्यम ॥ २५॥ |£
नर्मदा नदीम ज्ञान करनेसे विष्णलोककी प्रापि होती है. धनके युर ओौर सय हो तो हुवणेयुखरीमे स्नान करनेसे ॥ २६ ॥ शिवटोककी
भाति होती है, रसा बह्ाजीका वचन है. भकरकै स्यं ओर गुरु होनेसे माधमे गंगाजीर्े स्नान करे तो ॥ २७ ॥ शिवोककी भाति होती है |
यात्तलगेतुरवौगुरौ ॥ २९ ॥ विष्णोरवैचनामहातम्यात्सवांभीषधदंविदुः॥ वृिकेमासिसंप्राप्ततथाकैगुश्वृिके ॥ २५ ॥ नमेदा
यनिदास्नानाद्विष्णलोकमवाप्ठयात् ॥ सुवण॑शुखरीस्नानं चापगेचशरोरबौ ॥२६॥ शिवरोकप्रदसितिब्राह्मणोवचनयथा ॥ सुग
|
विनसं०१
अ० १२
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। ब्रह्माजीका वचन है. फिर वह ब्रह्मा तथा विष्के पदका उपभोगकर तिसचके उपरत ज्ञानको भरा होता है ॥२८॥ माघके महीने गंगामे ||
स्नान करनेते कुंभके सर्यमं भद्ध पिंडदान अथवा तिरोदक देने ॥२९॥ अपने दोनों वंश ओर पितरोंके असंश्यकुलका उद्धार करता है. ©
मीनके गरु ओर स्यं होनेमे ॥ ३० ॥ उन उन तीरथमिं उन २ महीनोभें स्नान करनेसे इंदपदकी भराति होती है, गंगा वा कावेरीकै निकट ©
बुद्धिमान निवास करे ॥३१॥ तो तत्काठका किया पाप अवश्य नष्ट हो जाता है, रु्रोक देनेवाछे भी अनेक कषेतर हँ ॥३२॥ ताभ्रपणीं ओर ठ
वेगवती बहमलोकका फठ देनेवाटी है इनके किनारे स्वगेदायक बहुतसे क्षेत्र है ॥३३॥ ओौर इनके बीचमे षण्यदायक अनेक केत वहा वहां निवास ्
गंगा्ांमाधमासेतुतथाद्मगतेरवौ ॥ श्रादधेवापिडदानंवातिलोदकमथापिवा ॥ २९ ॥ वंशद्वयपितृणांचङ़लकोदयुद्धरविदुः ॥ ||
कृष्णवेण्यांपरशंसतिमीत्तगेचगुरौरवौ ॥ ३० ॥ तत्तत्तीयैचतन्मासिस्नानमिद्रषदपरदम् ॥ गंगांासद्यजांवापिसमाभ्चित्यवसेद्ब ठ
¢ धः ॥ ३१॥ तत्कालक्रतपापस्यक्षयोभवतिनिशितम् ॥ श्दररोकप्रदान्येवसंति क्षेत्राण्यनेकशः ॥ ३२ ॥ ताभ्रपणीवगवतीबरह् ठ
लोकफलरदे ॥ तयोस्तीरेहिसत्थेवकष्ाणिस्वगैदानि च॥ ३३ ॥ संतिक्षयाणितन्मध्येपुण्यदानिचभररिशः ॥ तजतजवसन्पराज्ञा ¢
¢ स्तादशं चफरुलभेत् ॥ ३४ ॥ सदाचारेणसदट्त्यासदाभावनयापिच ॥ वसेदयाटुःप्राज्ञोवेनान्यथानत्फरुलभेत् ॥ ३९ ॥ पुण्य
ष्ेकृतंपुण्यबहुधाऋद्धिमृच्छति ॥ पुण्यक्रकृतेषापंमहदण्वपिजायते ॥३६॥ तत्कारुंजीवनार्थशचेत्पुण्येनक्षयमेष्यति ॥ पुण्य ५
४ मश्वरयदुप्राहुःकायिकंवाचिकंतथा ॥३७॥ भानसंचतथापपताहशंनाशयेदृद्विजाः ॥ मानसंवच्ररेष॑तुकेट्पकल्षावुगंतथा ॥३८॥
कर बुद्धिमान् उनके अनुसार फठ पाता ३।३४॥सदाचार सद्वत ओर गरेष्ठमावनाते बुद्धिषान् दथायुक्तं रहे अन्यथा एरक भरप्ति नहीं होती ट
| ॥ ३५ ॥ प्यकषत्रम किये अनेक प्रकारकी दधि प्रदान करते हँ इसप्रकार पएण्यकष्मं किया अणमा् भी पाप महान होजाता ह ॥ ३६ ॥ ४
|| उसके भायश्वितकै निमित्त उतनेही काठतक ण्य करे तो क्षय हो जाता है कारण किं, एण्यही रेश्वयंका देनेवाखा है तथा कायिक वाचिक
>| ॥ ३७ ॥ ओर मानसिक ये पाप उसके नाश हो जाते है. मानसिक पाप वजरेपके समान है ओर कल्पकल्पान्तके कये पाप ॥ ३८ ॥ ॥2
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॥ २६॥
बह केवट ध्यान म। ्रसेहीनष्ट होते है दूसरे प्रकारसे नही, वाचिक पाप जपप्मृह करने ओरकायिक पाप कायाशोषणे नष्ट हा जाते ई ॥३ ५॥ ||}
धनका पाप दान करनेसे नश होता है अन्यथा सौ करोड वष भी नष्ट नहीं होता कहीं बह हए पापते ण्य नष हो जाता हं ॥ ४० ॥ बीजअंश् |||
बृदधि्जश ओर भोगअंश यह एण्य पापे होता है, बीजांशसे ज्ञानकी नष्टता ओर पुवोक्त परकारसे श्रद्ध होती है ॥४१॥ भोगसेही नाश ० र
ओर कोरिषीषि पण्य करनेसेभी नष्ट नही होता, बीजां कुर नष्ट होजानेसे शेष भोग करनेसे मिट जाता है ॥ ४२ ॥ देवताओं की पूजा ॐर 9
बाहरणोको दान ओर अभिक तप करने समय पाकर मलभ्य भोगम सह्य हो जाताहै कहीं (भो गनाशो) रेस पाठहै कि भोग नष्ट होजाते है इस
ध्यानादेवहितत्रशय्ान्यथानाशमृच्छति ॥ वाचिकंजपजालेनकायिकंकायशोषण्ात् ॥ ३९ ॥ दानाद्धनक्ृतंनश्येन्नाऽन्यथाक
ल्पकोरिमिः॥ कचित्पपिनपण्यचद्द्धिपूवणनश्यति ॥ ७० ॥ बीजांशबेव्रद्धच्शोमोगांशःपृण्यपापयोः ॥ ज्ञाननाश्योरिबीजां ||
शो ब्रद्धिरुक्तप्रकारतः ॥ ४१ ॥ भोगांशोभोगनाश्यस्त॒नान्यथापुण्यकोरिभिः ॥ बीजग्ररोहेनषेतुशेषोभोगायकल्पते ॥ ४२ ॥ ॥£
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देवानापूनयाचेवन्र्मणानां चदानतः॥तपोधिक्या्चकाठेनभोगःसद्लोमवेन्तेणामतस्मात्पापमकृत्वैववस्तम्यं सुखमिच्छता ॥४२॥
इतिश्रीशिवमहापुराणेविि“वरसंहितायादरादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ ऋषयउचुः ॥ सदाचारश्रावयाश्चयेनरोकासयेदब्धः ॥ धर्मा
धर्ममयानब्रूदिस्वगनारकदांस्तथा ॥१॥ सूतउवाच ॥ सदाचारयुतोविदरान्तरह्मणोनामनामत वेदाचारयुतोविपरद्तैरेकैकवान्द्िजः
॥ २ ॥ अल्पाचारोलपवेदश्वकषत्रियोराजसेवकः॥ किंचिदाजारवान्वैश्यःकरषिवाणिज्यङ्त्तथा ॥ ३॥
| हुखकी इच्छा करनेवारलोको कषेमे पाप्रहितनिवात्त करना चाहिये॥४२।इति श्रीशिवमहाषरा० वि° स °माण्टी° द्रादृशोध्यायः॥१२॥
ऋषि बोढे हे सतज! अन् आप् हमको सदाचार भ्रवण कराइये जिसे यह प्राणी ठोकोको जय करता है बह
हे कौनसे स्वगं ओर कौनसे नरक देनेवाछे है॥ १। स॒तजीबोे सदाचारयुक्त विद्वान बाह्मण वेदाचारयुक्त होनेसे
ता है॥२॥अल्पाचार थोडा वेद पदा हु राजसेवक नाह्णक्षत्रिय बाह्मण दै ओर क्क आचारवाठा सती वाणिज्य
वि०सतं०१
अ० १३
धम्मं ओरअधरम्म॑कौनसे आचरणोतिहोता
आगे कहे हुए एक एक गुणो द्विजकहा
य करनेवाठा वैश्यताह्लण कहाता है॥ ३॥ |
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ओर जो स्वयं हल जोति वह शद्रनाह्ण है निन्दा करनेवाला पराया द्रोह करनेवाला चंडाखबाह्लण है ॥ ४ ॥ अब राजा क्षत्ियोंका विवेक कहते
|| एथवीकी पाठना करनेवाडा राजा ओर दूसरे क्षत्रिय कहलाते है, धान्यादि बेंचनेवाटे वैश्य ओर भणिक्तादि बचनेवाे बणिक् कहठाते है ॥ ५॥
बाह्मण क्ष्रं वेश्योकी सेवा करनेवाडा शूदर है. खेती करनेवाला वृष ओर दृपरे श्र दस्यु कहाते है ॥६॥ सव वर्णोको उचित है किं, उषःकालभे
उदक पूवको खलकर देवताओंका ध्यानकर धमं अथं उनके डश पराति ओर उपयो विचारे ॥७॥ करमसे पुर्वादिदिशाओंकी ओर स॒लकर उनेका
फल कहते है. आयु, द्वेष, मरण, पाप, शुभाशुभकर्म, व्याधि, षष्टि, शक्ति यह पूरवीदि आढ दिशाओंकी ओर खखकर उठनेसे होती है॥८॥ निशाका
शद्रब्ाह्मणहतयुक्तःस्वयमेवदिकर्षकः ॥ असूयाटुःपरदरोहीचंडालद्विजउच्यते ॥ ® ॥ प्रथिवीपाककोराजाइतरेकषभ्नियामताः ॥
धान्यादिक्रियवान्वेश्यहतरोवणिगुच्यते ॥५॥ बरहमक्षत्रियवेश्यानांशूषुःशद्रउच्यते ॥ कर्षकोवृषलोज्ञेयहतरेचैवदस्यवः ॥ & ॥
सर्वोह्यषःप्राचीयखश्चिन्तयेदेवपूरवकान् ॥ धर्मानर्थाश्चतत्ट्ेशानायचव्ययमेवच ॥ ७॥ आयुद्रेषश्चमरणंपापंभाग्यतथेवच ॥
ट ग्याधिःपुष्ठिस्तथाशक्तिः्रातश्त्थानदिक्फलम् ॥ ८ ॥ निशांत्यायामोषाज्ञेयायामा्ैसपिश्च्यते ॥ तत्कालेतुससुत्थायविण्मू
विस्रजेदद्विजः ॥९॥ गृहाद् दूरततोगत्वाबाह्यतःपवरतस्तथा ॥ उदङ्खुखःसमाविश्यप्रतिवेपेऽन्यदिङ्घुखः॥ १०॥जलाथित्राह्नणा
दीनदिवानानाभिमुख्यतः ॥ किगंपिधायवामेनशुलमन्येनपाणिना ॥ ११ ॥ मर्घुत्छज्यचोत्थायनपश्येशचैवतन्मरम् ॥
उदुतेनजलेनेवशौचैङर्यानलाद्रहिः ॥ १२ ॥ अथवादेवपिवरर्षतीथांवतरणविना ॥ सप्तवाप॑चवागीन्ताय॒दंसशोधयेन्मदा॥१३॥
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|| अन्त उपःकाठ हे उसमे आभे पहरकी सेधि कहठाती है उपती समय उठकर बाह्ण शौचादि क्म करे ॥ ९ ॥ धरते दूर जाकर ओर शिरसे कपडा
ठपेटकर उ्तरको खलकर वेढे ओर दिशाओंको न देखे ॥ १० ॥ जठ अधि व्राह्मण ओर देवताओं घन्सुलको न पैठ बाये हाथते छिग भौर
४ दहने हाथमे खख दककर ॥ ११ ॥ मढ त्यागन करे ओर मठ त्यागन करनेके उपरान्त फिर उष भरको न देसै,, फिर जरे पृथङ् स्थानमे
>| पात्रके जले शौच करे ॥१२॥अथबा देवता पितर कषिके तीथोके सिवाय ओर जरुस्थान अल्प सरोषर(उहर) कै जरसे सातवार पांचवार वा
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शि° द तीनवार प्रहे मिद्ीसे खदाको पवित्र करे ॥१३ ॥ खिगकी शुद्धता कर्कोटकको फरमान मिट ओर यदाकै निमित्त आधी जटी मृत्तिका ठे
॥२७॥ || इततके उपरान्त उढकर हाथ पैर धोवै, ओर आठ कुषे करे ॥१४॥ किस ृकषके पत्र अथवा काषटसे जरके बाहर बेढकर तजनी अंयटीको त्यागकर
ट
दन्तधावन करना चाहिये ॥१५॥ फिर जठ्देवताओंको नमस्कार कर मंत्रपवक ज्ञान करे, जो कंठपरयन्त अथवा कमरप्यन्त जख ञान क्रनेकी ||
शक्ति न हो तो ॥१६॥ जापर्यन्त जख स्थित हो सच ज्ञान करे ओर विदवानरूको उचित है कि, उस तीथके जले देवादिकोंका तपण कर ||
॥१७॥ फिर धाती छेकर प॑चकच्छ(अर्थात आगे दो बाय दक्षिणम दो ओर एक पीठे धारण करे)उत्तरीय इप्रा वन्न ही स्व कम्मं धारण ||
स्िगिककोटमातरतुयुदेभसरतिरिष्यते ॥ ततउत्थायपद्धस्तशौचगण्डूषमष्ठकम् ॥ १९ ॥ येनकेनचपवेणकाष्ेनचजलाद्रहिः ॥ ४
कार्यसंतज्जैनीत्यज्यदंतथावनमीरितम् ॥ १५॥ जलदेवान्नमस्कृत्यमप्रेणन्ञानमाचरेत् ॥ अशक्त कंटदव्नैवाकयिदन्नमथापिवा ||
॥ १६ ॥ आजावजलमाविश्यरमअस्नानंसमाचरेत् ॥ देवादीस्तर्षयेद्वद्ास्त्तीथजरेनच ॥ १७ ॥ धौतवल्चसमादाय्पचक 4
च्छेनधारयेत् ॥ उत्तरीय चफिचैवधायैसवेषुकर्मसु ॥ १८ ॥ नदयादितीर्थस्नानेतस्नानवल्लनशोधयेत् ॥ वापीद्पगहादोतुस्नाना ए
ध्व॑नयेदुधः ॥ ॥१९॥ शिलादार्वादिकेवापिजलेवापिस्थरेपिवा ॥ संशोध्यपीडयेदर्ञपितृणातक्तयद्विजाः ॥ २० ॥ जाबा ट
लकोक्सतेणमस्मनाचतिषुडकम् ॥ अन्यथाचेलेपातइतस्ततररकभृच्छति ॥ २१ ॥ आपोदिेतिशिरसिपरोकयेत्पापशांतये ॥ |
यस्येतिभरपदेतसंधिप्रोक्षणश्ुच्यते ॥ २२ ॥
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करना चाहिये ॥१८॥ नदीभआदि तीरथमे ज्ञान करके बह्ञशुद्धि न करे ओर वापी दष तडागादिमं लान कर वच्च शद करे ॥१९॥ शिला काठ
अ० १३
जल वा स्थरे धोती भगोेको पित्र करके दल निचोडकर पितरोंङी तृप्ति के ॥ २० ॥ ओर जावाठकोपनिषदरे कहा है ( अभिरिति
भस्म ० भेत्से त्मका शिष्ण्ड् लगावै ) इस दिधिको विना किये जो दृथाही भस्मको जलम डता है बह नरके जाता है ॥ २१ ॥ ||& ||
(आपोदडिति)दस भंजसे पापशान्तके निभित्त शिरपर जल छिडके इसी भेत्रे एक रचरणसे चरणादि नौ स्थानोमे कमते भोक्षण कर गतल्ञान करे ||
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(यस्येति) यही उसका मन्त्र है यही सन्धिभरोक्षण कहा है ॥२२॥ पाव शिर हदय शिर हदय चरण हदय चरण शिर इस कमसे भक्षण कर मन्त ज्ञान
&|| करे ॥ २३ ॥ शरीरके रोगभरस्त होनेमे तथा राजाराष्टके भय तथा मार्गे गमनय तथा अपवित्र वस्तुके स्पशमे मन्त्र स्नानही करे ॥ २९४
(सर्यश्वमामन्युशरेति ) प्रातःकाल इस स्यं अलुवाकमे ओर सध्याको ( अश्िश्वमामन्धुश्वेति ) इस अभिके अहवाकसे मध्ये जर पानकर किर
पूर्ववत् माजन करे ॥२५॥ गायत्री मेतरके जप करने उपरांत फिर तीन बार ऊप्रको जल फंके मध्याहसंध्याकी विधि कहते है ओर मंज सहित
मध्यमे सूर्यको अर्यं दे ॥२६॥ इस प्रकार कर चुकने पर जव संध्या हो तब पथिकी ओरको शख करक बैठे भरातः ओर मध्याह्कै जल्को
पादेन दिचैवमूरधिनिडत्पादणएवच॥ ह त्पादमूध्निसंप्रोक््यमेस्नानंविदु वधा ः॥२ देहषत्स्पशेच दौः स्वास्थ्येराजरा्रभयेऽपिच ॥
अत्यागतिकालेचमेतरस्नानंसमाचरेत्ः॥२४॥ प्रातःसूर्याववाकेनसायमभ्यवाकत :॥ अषःपीत्वातथामध्येषुनःपोक्षणमाचरेत्
॥२५॥ गायजञ्याजपमे्तिविद्र्ष्वप्रागिविनिष्षिपेत् ॥ मंेणसहवैकंवमध्येऽर्व्यतुरवेरद्विजा ॥२६॥ अथजातेचसायहे्चाविषश्चिम
दिङ्ख॒खः॥उदधत्यद्यात्पातस्तुमध्याह्नयकिभिस्तथा ॥२७॥ अंशुलीनांचरभरेणटवंपश्येदिवाकरस् ॥ आत्मथदक्षिणंृत्वा्चुद्धा
|| चमनमाचरेत्॥ २८॥सा्य॑घहूतीदवाक्तुकृतासध्याव्रथाभवेत्॥अकारात्काटइत्युक्तोदिनेऽतीतेयथाक्रमम्॥ २९॥ दिवाऽतीतेचगा
यत्रींशतंनित्येक्रमानपेत् ॥ आदशाहात्पराऽतीते ॥ गायीक्षमभ्यसेत् ॥३०॥ मासातीतेतुनित्येहिएुनश्चोपनय चरेत्॥ईशोगोौ
रीयहोविष्णुरह्मचेद्रश्वेयमः ॥ ३१ ॥ एवंरूपा शवेदेवांस्तर्येदर्थसिद्धये ॥ ब्रहमा्षणंततःकृत्वाश्ुद्धाचमनमाचरेत् ॥ ३२ ॥
देवतीर्थसे अंगछियोे जर देना उचित हे ॥ २७ ॥ पीछे अंगख्योके छिद्रसे दिवाकरको अस्त होता देखे ओर अपनी षदक्षिणा करके लं
आचमन करे ॥ २८ ॥ जो सन्ध्याके स॒हूतंसे पहर सन्ध्या करे तो उसकी सन्ध्या वृथा हो जाती है, इस सन्ध्याको असमय न करके समयमे
कृरे ओर दिनि भ्यतीत होनेप्र यदि सन्ध्या न करे तो उसका यह प्ायधित्त है कि ॥ २९ ॥ नित्य जपे सौ गायत्री अधिकं जपे ओर जो
दश दिनि बीत जोय तो लाख गायत्री जपे ॥ ३० ॥ महीना बीत जाय तो फिर उपनयन करे ईश गोरी स्कंद विष्ण ब्रह्मा इन्दर यम ॥३१॥
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इन सब देवताओंको एकरूप जानकर अर्थसिद्धिके निभित्त तृप्त करे फिर ब्रह्म्पण करके शुद्ध आचमन करे ॥ ३२ ॥ तीर्थके दक्षिणस्थान
4 अथवा ममे मंत्राठयमें देवाख्यमे अपने षरमं नियतस्थानमे ॥ ३३ ॥ सब देवताओंको नमस्कारकर स्थिर बुद्धि ओर स्थिर आननम प्रथम
ओकार ओर फिर गायत्रीका अण्यास्च करे ॥ ३४ ॥ जीव ओौर बह्मकी एकता देगकर ऊॐकारका जपकरे, त्रिोकीके सृष्टिक तल्ला ओर
स्थितिकर्ता नारायण ॥ ३५ ॥ ओर रसंहारकर्ता भगवान् रुकी हम उपासना करते है. ज्ञानेन्द्रिय कर्मेन्द्रिय मनकी वृत्ति ओर बुद्धिको
॥३६॥ वह परमात्मा भोग ओर मोक्ष देनेवाठे धर्मम सदा गावे, इसभकार अथविधिते ध्यान करता हुआ निश्वय ब्रहमको भाप होता ६।३७॥
तीदक्षिणतःशस्तेमठे्मजाख्येद्चषः ॥ तजरदेवाख्येवापिगृहेवानियतस्थले ॥३३॥ सर्वान्देवाघ्नमस्कृत्यस्थिरबुद्धिः स्थिरासनः ॥
प्रणवेपूरव॑मभ्यस्यगायश्रीमभ्यसेत्ततः। ३४जीवन्रह्ैक्यषिषयद्ुदध्वा्रणवमभ्यसेत्। मैलोक्यसृष्िकर्तारंस्थितिकतीरमच्युतम्। ।३५॥
संहतीरतथारस्वप्रकाशशुपास्महे ॥ ज्ञानकयेद्वियाणांचमनोदृत्तीधंयस्तथा ॥३६॥ भोगमोक्षपरदेधमेज्ञानेचमरेरयेत्सदा ॥ इत्थ
मथधियाध्यायन्त्रहमपराप्नोतिनिश्वयः ॥३७॥ केवलंवाजपेमित्यब्राह्मण्यस्य चूर्तये ॥ सहसमभ्यसेत्नि्यंपातर्बह्मणपुंगवः॥३८॥
अन्येष्ांचयथाशकतिमध्याहरूचशतंजयेत्॥सायंद्विदशकंजञेयंशिखाष्टकसमन्वितम्॥३९॥ मूलाधारंसमारभ्यद्वादर्शातस्थितांस्त
था॥ विचश्रह्मविष्ण्वीशनीवात्मपरमेश्वरान् ॥४०॥ ब्रह्मुदधयातदेक्ये च सोदंभावनयानपेत् ॥ तनेवबरह्मरभादौकायाट्ाघ्च
चभावयेत् ॥ 9१ ॥ महत्त्वं समारभ्यशशरीरंतसहख्कम् ॥ एकेकस्मानपादेकमतिकम्यशनेःशनेः ॥ ४२ ॥
अथक्ञानके विना भी बह्णलपूतिके निमित्त भी नित्य उढकर भेष्ठ बाहण इतका सहक्षवार जपकरे ॥ ३८ ॥ ओर दृते क्षत्रिय वैश्य मध्या
म सरोवार जप करे, ओर सन्ध्याम एकह ओर आढ अथवा वीततवार जपकरे ॥ ३९ ॥ मूलाधार चकते भारभ करके वहरन्धपरथन्त स्थित
चक्रमे विथेश बहला विष्ण दश जीवात्मा परमेश्वरोको ॥ ४० ॥ बहाडुदधिते एकही जानकर सोहंभावनापे जप करे उन्ही पियेशादिको ब
| कायासे बाहर ध्यान करे ॥ ४१ ॥ महत्व ( भति ) से आरम्भ करके भारण्ध मोगवशते हए सहनो शरीरो ग
शि ०
॥२८॥
(7
^ 30.46 3249-4 > ॐ)
य +
9 0 04०
५
| जप्से एक एकं शरीरको अतिक्रमण कर शनेः शनेः ॥४२॥ जीवको पर बहम कगावे, यह जपतरव है यह जप दो सहस्च संख्यातक ्
उससे आढ अधिक करना चाहिये ॥४३॥ मंतरोकि जपम भथम क्रम यही है सह्जपते बहमपद ओर सौसे इन्द्रपदकी भाति होती है ॥ ४४ ॥
ओर इसे न्यूनादि करनेते ब्राहमणकै कुमे जन्म होता है, सथ्यके सम्छल स्थित हो नित्यपरति देशनाही करे ॥४५॥ बारह छाख जप करनेसे
पूणं ब्राह्मण होता है, जिसने छा गायत्री न पटी हो उसे वेद कार्यम न रगा ॥ ४६ ॥ सत्तर वर्षतकं नियमे रहै, पीठे संन्यासी होजाय,.
सेन्यासीको उचित है किं, प्रातःकाट बारह सहस्र ॐकारका जप करे ॥ ४७ ॥ इतत प्रकार नियमे भरतिदिन जपता रहै जब कमक महीना
परस्मिन्योजयेनीर्वेजपतत्वयुदाहतम्॥शतद्विदशकदेहशिखाष्टकसमन्वितिम्॥४३॥ म ्ाणांजपएवं हिज पमादिकरमाद्विदुः। सहस्र ||९
बरहमदंवियाच्छतमेदरभदविदुः ॥ ४४॥ इतरत्वात्मरक्षारथत्रहमयोनिषूजायते॥ दिवाकरमुपस्थायनित्यमित्थ॑समाचरेत्॥४५॥लक्ष ||
द्वादशयुक्तस्तुप्णव्राह्मणईरितः॥ गायन्यालक्षदीनंतुवेद्काययनयोजयत् ॥४६॥ आसप्ततेस्तुनियमं पश्चात्प्ाजनंचरेत् ॥ पातदद्ा |©
देशसारसंभवाजीभरणवजपेत्॥ ४७ दिनेदिनेत्वतिकतिनित्यमर्वकमानपेत् ॥ मा्ादौकमशोऽतीतेसा्धरक्षजपेनहि ॥ ४८॥ ||?
अतखध्वमतिक्रतिपुनःपरेषसमाचरेत् ॥ एवंकृत्वादोषशातिरन्यथारौरवत्रेत् ॥९॥ धर्मार्थयोस्ततोयत्क्यात्कामीनचेतरः ॥ >)
ब्रा्मणोसुक्तिकामःस्याद्रहज्ञानंसदाभ्यसेत् ॥ ५०॥ धर्मादर्थोऽ्थतोभोगोभोगद्वैराग्यसभवः ॥ धर्माजितार्थभोगेनवैराग्यश्ुष
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जायते ॥ ५१ ॥ विपरीतार्थभोगेनरागएवप्रजायते ॥ धर्मशचद्विविधःभ्रोकतो दरम्यदेहद्रयेनच ॥ ५५२ ॥
बीत जाय तब उसका ेढलक्ष जप हो जाता है ॥ ४८ ॥ इससे दोषशांति होजाती है जप इसत अधिक होजाय तव सन्यास भं्रका अ्रहण ||
|| करे, इस भकार करनेसे दोषकी शाति होती हे, अन्यथा रौरव जाता हे ॥ ४९ ॥ ओर सन्यासीसे इतर वणं धर्मं अर्थं आदिम यल कर
ओर यदि ब्राह्मणको सक्तिहीकी इच्छा हो तो सदा वहक्ञानका अश्या करे ॥ ५० ॥ जहां धर्मे अथ उपार्जन किया जाता ह वहं कामनाके
निमित्त नहीं होता ¢ वैराग्यही उत्पन्न करता हे, उञ धर्मे अथ अर्थते भोग ओर भोगे वैराग्यका सम्भव अर्थात् धर्मत उतपन्न इए ||
>॥ भोगते वैराग्य होता है ॥ ५१ ॥ ओर विपरीत अर्के भोगे रागही होजाता है. धरं दो पकारका है एक देहे दूसरा धने ॥ ५२ ॥
शि०० ¢ वयसे यज्ञादिहूप१ धभ होता है ओर शरीरसे तीरल्ञानादिषप धमं होता ह, धने धन ओर तपसे दिव्यहपता भाप होती हे॥ ५३ |
॥२९॥ || निष्काभकमेसे शुदि शुदधिसे ज्ञान प्त होता है इसमे सन्देह नही, सतयुग आदिम तपही साध्य था कटियुग द्रव्यधमं हे ॥ ५४ ॥ 1 ¢
¢ ध्यानेही ज्ञानकी सिद्धि होती थी तरेतामे तपे द्वापरमे यज्ञ करने ज्ञान होता था ओर कलियुग परतिमा पूजसही ज्ञान होता है ॥ १५ =
¢ कोई ण्य पाप करता हे उसको वैाही फठ मिरता है द्रढय ओर देहके भेदे पण्य पकी यूनता वृद ओर क्षयादिता होती हे ॥ ५६ ॥ ४
¢ विधिबिना जो कुत्सित हिंसा कीजाती ह वही महा अधर्म है ओर विधियुक्तं कायं सुख धं है. अधर्मते दुःख धर्ममे धुल मिठता ३।५७॥ |
| दरव्यमिज्यादिर्षस्यात्तथेज्लानादिदेहिकम्॥धनेनधनमाप्नोतितपसादिव्यरपताय् ॥५३॥निष्कामःशुद्धिमाप्नोतिशचुद्धयाज्ञां
नसेशयः॥कृतादौदितपःछाष्यदव्यधर्मःकलोगुगे॥५४॥ कृतेध्यानाज्ज्ञानसिद्विघ्ेतायांतप्षातथा ॥द्ाप्रेयजनाज्जञानंप्रतिमापए ||
| जया कलौ॥५५॥याशपण्यपाप॑वाताहशंगलमेवहि ॥ द्येहंगभरन्ूनदधियादिकम्॥९३।अधगो्दिपिकाहपोधमंस्ठ |
४ सुखकूप्कः ॥ अधर्माडःखमाप्नोतिधमदविसुखमेधते ॥५७॥ वियादुधैत्तितोडुःलंखसंविात्युृत्तितःधर्माजंनमतःङयद्भिगमोक्ष ||
प्रसिद्धये ॥ 4८ ॥ सङटबस्यविषस्यचतुजेनयुतस्यच ॥ शतवधत्यक्ृततितुद्यात्तद्रबमलोकदम् ॥ ५९ ॥ चा्रायणसइसतुत्र |
वलोकपरदविदुः ॥ सदसस्यङटुबस्यप्रतिष्ठाकष्रियश्वरत् ॥ ६० ॥ ईदकोकषद॑बिदयादयुतंबर्नरोकदम् ॥ यां देवतांपुरस्छृत्य |£
, , (| दानमाचरतेनरः ॥ ६१ ॥ तततछ्ोकमवाप्नोतिहइतिवेदविदोविहुः ॥ अथदीनःसदाङयांत्तपसामाभैनंतथा ॥ ६२ ॥ ४
वि०सं०१ || दति दुः एद्रततिते खल भाप होता है इस कारण भोग ओर मोक्षकी िदधिके निभि धर्सेही अर्थेन करना चाहिये ॥५८॥ कुलपरिवारयुक्त
अ° १३ ||| ब्रह सौ पषतक शरेष्ठ आचार युक्त रहे इतनी दृति (जीषिका) उसो देवे तो उत्को बहलोककी भाति होती ३।५९॥ सह चान्द्रायण वत करे
भी बहरोककी भानि होती है, जो क्षत्रिया स्हन्ञ कुटबकी आजीनिका करता है ॥६०॥ उते इन्द्रोक ओर दशसहश्चकी आजीविका करे तो ६
बहलोक भाष होता है. मुष्य जिस २ देवताके उददेशसे दान करता है ॥६१॥ उस्ती उसी छोकको वह जाता है रेस वेदे जाननेवारे कहते है, जो |>}
धनहीन उन्हं सदा तदहपी धन एकन करना चाहिये ॥ ६२ ॥ जो धं तीथं ओर तपते भिठ्ता है, उषसे भी अक्षय सुख मिरुता ह
ओर धनको भी न्यायपूर्वकं सावधानी संग्रह करना चाहिये ॥६३॥ यज्ञ प्रतिग्रह ( दानठेना ) यजन, शुद्धिसे ओर दीनतारहित शरहित
वृत्तिपवेक बाह्मण धनर्ग्रह करे ॥ ६४ ॥ क्षत्रिय बाहुबलम वैश्य कषिवाणिज्यसे धनरंग्रह करे न्यायसे उपाजन किये दानमे सिद्धिकी
भराति होती है ॥६५॥ ज्ञान सिद्धिसे मोक्ष होता है ओर सव किसीको गुरुकी कपे मोक्ष होकर मोक्षसे स्वहूपकी सिद्धि होकर परानन्दकी
प्राप्ति होती है ॥ ६६ ॥ हे बाह्मणो ! यह सव कछ सत्संगते ही प्राप्त होता हे गृहस्थीको धनधान्य आदि अनक पदाथं दान करने चाहिये
तीरथा्तपसापराप्यंसुखमक्षय्यमश्वते ॥ अथाजेनमथोवकष्यन्यायतःसुसमादितः ॥ ६२ ॥ कतात्पतिहचचैवयाजनाञ्चविश
दितः ॥ अदेन्यादनतिङ्केशाद्राह्मणोधनमजयेत् ॥ ६४ ॥ क्षत्रियोबाहूवीयणकृषिगोरक्षणाद्विशः ॥ न्यायारजतस्यवित्तस्यदा
नात्सिद्धिसमश्नुते ॥ ६५ ॥ ज्ञानसिद्धयामोक्षसिद्धिःसवेषायवलमरहात् ॥ मोक्षात्स्वह्पसिद्धिःस्यात्परानन्द॑ंससश्लुते ॥ ६६ ॥
सत्संगात्सरवमेतद्वेनराणांजायतेद्रिजाः ॥ धनधान्यादिकंसर्वदेयवेगृहमेधिना ॥ ६७ ॥ यत्कालेवस्तुजातंफरुवाधान्यमेवच ॥
ततततसरवत्ा्णेभ्योदेयवेदितमिच्छता ॥ ६८ ॥ जलचैवसदादेयम््ाधिशातये ॥ कषनेधान्य॑तथाऽऽपातनमकषमेवचतरविधम्
॥ &९ ॥ यावत्कारंयदत्नवेभुक्रा्रवणमेधते ॥ तावत्कृतस्यपुण्यस्यत्वर्धदातुरनसंशयः)। ७० ॥ हीतादिगृहीतस्यदानादेतप्
सातथा ॥ पापसंशोधनंक्र्यादन्यथारौरवंत्रजेत् ॥ ७१ ॥
॥ ६७ ॥ जिप्रकाठ जो वस्तु फट धान्य होते हों वह सव हितकी इच्छा बाहणोको देना वाहिये ॥ ६८ ॥ जठ ओर अन्न भूख प्यासकी
शान्तिके निमित सदा देना चाहिये, कषे्र धान्य कचा अन्न तथा ओर भी अन्न रेह चोष्यादि चार भकारके भोजन ॥६९॥ जिसका अन्न
भोजन करके बह प्राणी जो कुछ आत्मविचार श्रवणादि करता है उक्कै व्यक आधा ङ दाताको होता है, इषे सन्देह नहीं ॥ ७० ॥
दान ब्रह करनेबालेको उचित है कि, रहण कथे हृएके दानत अथवा तपते उसका पाए भाजेन करे, नही तो रौरवे जाता है ॥ ७१ ॥
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अपने धके तीन भाग करे एक ध्म दूरा द्धि तीरा भोग निमित नित्य नेमिकं काम्य कमं भौ पर्परवक कर ॥ ७२ ॥ साधकका
उचित है कि वृद्धिके अंशव्याजते धनकी वृद्धि करे ओर किततीको पीडा न दे ओर निषिद्ध व्यापारे न बहे ओर भगे अशमे स्वल
मोग भोगे ॥७३॥ षिते उतपन्न हूए धनके दशमे अंशको पापशुद्धिके निमित्त दान कर, शषद्व्यसे धम्मि करे, नहीं तौ रोखको जाता ह
॥७१॥ ओर जो पापे वद्धि करेगा तो वेतीका क्षय होगा, छठा अंश वाणिज्य व्यापारकी वृद्धिं बुद्धिमानूको ठगाना चाहिये॥७५॥ चतुर्थाशं
शद्ध भतिगह बाहमणादि को देना चाहिये, ओर अकस्मात् कीत धन मिलजाय तो उसमे आधा दान करदे।॥७६॥ ओर अगत्मतिग्रह किया हौ
आत्मविततमिषाङ्याद्मवृद्धयात्मभोगतः॥ नित्यंनेमित्िकंकाम्यकमीकुयांचधैतः ॥७२॥ वित्तस्यवधनंडयदद्शेनहिसा
धकः ॥ दितेनमितमेध्येनभोगंमोगांशतश्रेत् ॥७३॥ कृष्याजतेदशांशंदिदेपापस्यशुदधये ॥ शेषेणकर्यादमादिंअन्यथारीयं
नेत् ॥ ७8 ॥ अथवापापुद्धिःस्यातषयंवासत्यमेष्यति ॥ वृदधिवाणिज्यकेदैयष्पडशोदिविच्षणेः ॥७५॥ जुद्मतिग्र
यश्तुर्थाशोद्रिजोत्तमेः ॥ अकस्मादुत्थितेऽथेहिदेयमर्द्विजोत्तमेः ॥७६॥ असत्पतिग्रहसर्वददनिंसागरेक्षिपेत्॥ आहूयदानंकते
वयुमात्मभोगसमृद्धये ॥७७॥ पृषठस्वसदादेयमात्मशकत्यवसारतः ॥ जन्मत्रणीहिस्याददतेषृष्स्तुनि ॥ ७८ ॥ परेषा
चतथादोषनप्रशपेद्विसक्षणः ॥ विशेषेणतथात्रहन्छुतंदृष्टचनोवदेत् ॥७९॥ नवदेत्स्वजंतृनांहदिरोषकरजुधः।॥ सध्ययोरभिका्थ
चक्कयदिश्वर्यसिद्धये ॥ ८० ॥ अशक्तस्सवेककालेवासूर्या्ीचयथाविधि ॥ तंडरंधान्यमाज्यवाफटकंदहविस्तथा ॥ ८१ ॥
£ तो वह सब ददान समुद्रम डाढदे, अपनी भोगसभूृद्धिकै निमित्त बाकर दान करना चाहिये ॥७७॥ ओर याचना करनेवाटेको अपनी शक्तिके अनुप्तार
पदा दान करना चाहिये,कहकर जो फिर नहीं दे तोवो जन्मान्तर करणी होता हे ॥७८॥ बुदधिमानुको उचित हं कि दृरोका दोष कथन न करे)
विेष.करके दु ओर देखे दोषको भी न कहे ॥७९॥ ठेस वत कभी न कहे जो सतव पाणियोके हृदयमे क्रोध उत्पन्न करे) ओर रेश्वयं सिद्धिकै ६
| || निमित्त दोनों संध्याओमं अशरिहोत्र करे ॥८०॥ ओर जो दो समय न करसके तो यथाविधि एकही समयं सयं अश्रिकी उपासना तर्पण करे, चाव
थ 4 > 34 > 4 4 3-42-4 424 2 -अ
।
` धचविशेषयजनादिकम् ॥ प्रथमाश्रमिणमेवेयावदौपासनं द्विजाः॥३॥ आत्मन्यारोपिताशनीनांषनिनां यतिनांदरिजाः ॥६ितं च
धान्य धृत कंद हवि ॥८१॥ आदि विधिपूवक स्थाटीपाकं करक जो हव्य न होतो प्रधान होममात्रही करे ॥८२॥ नित्य स्थापित अग्निक पंडित
अजल्ञ कहते हे अथवा कवठ जपमात्र भौर सयका वंदनही करे ॥८३॥ इसभकार आत्माकी भापिकी इच्छावारे,विधिपुवंक सदा करे,सदा बहयज्ञमे
रीति करनेवारे, ओर देवताओंकी पूजा करनेवाटे॥८४॥ नित्य अभि ओर युर्पूजा परेमसे करनेवाठे तथा बाणो तृप्र करनेवारे सब स्वर्भमे जाति
६८५ इति श्रीशिवमहापुराणे विेश्वससंहिताभाषारीकायां जयोदशोऽध्यायः ॥१३॥ ऋषि बोरे अभियत्देवयज्ञ बसयज्ञगस्पूजा,नहतृपि यह
करमते आप हमसे कहिये ॥१॥ सतजी बोठे जो रव्य अग्निम बहन किया जाता हे उसे दरभ्ययज्ञ कहते है, बहचे आभमगे थित एरुषोंको समिषा ै
स्थालीपाकंतथाक्या्यथान्यार्ययथाविपि॥प्रधानहोममातरवाहम्याभावेसमाचरेत्॥८२॥ नित्यसंघानमित्युक्तंतमजसंषि ददधाः॥ ||
अथवाजपमावासूरयवेदनमेवच ॥ ८३ ॥ एवमात्माथिनःकुयरथार्थीचयथाविधि ॥ बह्मयज्ञरता नित्यदेवपूजारतास्तथा
॥ ८8 ॥ अग्निपूजापरनित्ययरुपूजारतस्तथा॥ ब्राह्मणानातृ्तिकराः सवेस्वगैस्यभागिनः ॥८५॥ इति शरीशिवमहाएुराणेषिये
वरसहितायाजियोदशोऽष्यायः ॥ १२॥ ऋषयउ्चुः ॥ अभियज्ञदेवयङञबरमयङ्नतथेवच ॥ युर्पूनामहपिकमेणतरहिनःपभो
॥१॥ सूतउवाच ॥ अग्रौजहोतियदव्यमधचियज्ञः स उच्यते ॥ बह्मचर्ाश्रमस्थानां समिदाधानमेव हि ॥ २॥ समिदय्नौवता
ट
भितमेध्यात्रं स्वकाठे भोजनं इतिः॥४॥ओौपासनाधिसंधानं समारभ्य सुरक्षितम्॥कुंडेवाप्यथभांडवातदजसे समीरितम् ॥५॥
आहरणप्क अग्निहोत्र करना चाहिये ॥२॥ हे बाणो ! जहां समिधा अमे हवन की जाती ह वही बचा है, यह बहाव बतादिमे होते है
ओर यह विशेष यजन जबतक विवाह न हो क्ाचारियोको कर्तव्य है॥३॥ विवाह होनेपर दो सष करे भौर जिन्होने आत्मामे अभि आरोपण की र
है, दते नवासी यतिक हे बाहमणो ! पित्र थोडा अन्न भोजन करनाही अथिहोघ् है ॥४॥ (यन्धसं तदाहवनीयम् । इत्यादिश्रुतेः) उपासना
अश्निसंधान इनकी ए समर् कारे करनी चाहिये. कुंडं भथवा तनम (भैँगीरी)सदा उतत अधिको रखना चाहिये॥ ५॥
शिं ९पु9 र
वाराजाओरदैवके मयवशते समिधामे धारण करना,अभित्याग भयतेही उसका समा, १
॥३१॥ ठी है॥७] दिनम दर्के अभिर भवेश करते यह अगियन्ञकहाहे दादि
आला पतिकी कएेवारो ह ओर भातःकालम सैभाहति आगुकी बदानेवाठ। ह॥५ ४
पणं देवताओं उदेशपे जो अभम हन करता है।८॥ दशं पमस स्थाटीपाकादि रारकै यज्ञ देवयज्ञ ओर गभौधानादि उपासना लोकाभि
रिष्ठा है ॥९॥ ओर देवताओंकी भ्ीतिके निमित्त ब्रा्णोको हन्न सदा करना चाहिये, उपमं वेदपाढ होता हं, इसीसे वह बहमयज्न कहाता ह
समारोपणकहाहे ॥६॥ बाहोकी ंधयाकारमदी हई मतिभगिकौ |
र
अशिमात्मन्यरण्यां बाराजदेववशादधुवम्॥ अभरित्यागभयादुक्तसमारोपितशुच्यतेद॥ सपत्करीतथाज्ञेयासायमगन्याहृतिद्विजाः॥ ||
आगुष्करीतिविज्ञेयाप्रातः सु्थाडुतिस्तथा ॥७॥ अग्नियज्ञोद्यंमोक्तोदिवासूरयनिवेशनात्॥दादीन्सकलान्देवाबुदिश्या्रौजदौ ||
तियत्॥ ८ ॥ देवयततहितंविवास्स्थालीपाकादिकान्करत्न् ॥ चौरादिकंतथाहञ्यलौकिकाभ प्रतिष्ठितम् ॥ ९ ॥ बरहमव्द्रिनः ||
कु्यदानातृप्तेसङृत्॥ ्रहमयज्ञहतिप्रोकतोवेदस्याऽध्ययनं भवेत्॥१०॥ नित्यान॑तरमासायततस्तुनविधीयते ॥ अनग्नौदेवयजनं ¢
शृणुतश्रद्धयादरात् ॥ ११ ॥ आदिसृष्टौमहादेवसवज्ञःकरणाकरः ॥ सर्वलोकोपकाराथवारान्कलिपितवान्प्रभुः॥ १२ ॥ संसार ¢
वैद्यसर्वज्ञःस्वमेषजमेषजय्॥आदावारोग्यदैवारस्ववारंकृतवान्धधुः॥ १२ ॥ सुषत्कारंस्वमाथायावरंचकृतवांस्ततः ॥ जननेदुग ९
तिकरतिकमारस्यततःपरम् ॥१४॥ आस्यदुरितक्रत्थेवारंकस्पितवान्धधुः ॥रक्षकस्यतथाविष्णोर्छोकानां हितकाम्यया ॥ १५॥ ¢
॥१०॥ नित्यकरमके अनन्तर सायका पर्यन्त ओर संध्याके उपरान्त रात्रि उसका विधान नहीं हे, जिस प्रकार अश्चि बिना देवयजन होता ४
है, बह आदरे नो ॥ ११ ॥ दृष्टी आदिमे करुणाकर महादेवजीने सब लोकोके निमित वारोकी कल्पना की है ॥१२॥ सस्ारके वैय ||
वजत आओषधियोके ओपधीस्वहप पहिटे आरोग्यदायक् वारको भ्रभुने अपना किथा ( आदित्यवार ) ॥१३॥ इसके उपरान्त सम्पत्ति करने र
विण०सं०१
वाडा अपनी मायाका वार किया इसके पीछे पत्रादिजन्पर्े कष्ट युक्त स्कंदका वार किया ॥१४॥ आछस्यादिके नाशका करनेवाढा वार कल्पना ६
अ० १४
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ट ज्ज
किया, फिर ठोकक हितकी इच्छात रक्षा करेवा विष्यका वार बनाया ॥१५॥ पष्टिओौर रक्षके निमित्त भ्ुने ारकी कल्पना की इसके उपरत
आयुष करनेवाटे वारकी आयुदृधिकी इच्छावाठोके निभित्त कल्पनाकी ॥ १ ६॥ पीठे त्रिलोकीकी सृष्टि करनेवाठे प्रेष्ठ बहाका जगतकी आयक
निमित्त प्रमुने वार बनाया॥ १७॥प्रथम् त्रिटोककी बृद्धिके निभि परभने एण्य ओर पापके उत्पन्न करनेवाठे ईद ओर यमकेवारकी कल्पना की॥१८॥
इस प्रकार यह सुस दुःलके स्चक आदित्यादिार भोग देनेवाठे ओर ोकोंकी मृतय हरनेवाठे कल्पित किये आदित्यवारके शिव चंवारके, दुग, भग
ठवारके स्कंदः ुधके विष्णु हस्पतिके यम शुक्रे बहा, शनिके इन्द स्वामी ह ॥१९॥ नक्षते चकर मतिष्ठितकर इन वारक दैशोकी कल्पना कर
पष्टयथचेवरकषर्थवारंकलिपतवान्प्रयुः॥ आयुष्करंततोवारमायुषांकतरेवदि॥१६॥रोक्यसृषिकसी्दिनह्मणःपरमेष्ठिनः ॥ जगदा
यष्यसिदधयर्थवारकरिपतवान्यथुः ॥ १७॥ आरदौत्रलोक्यवद्धययैपण्यपापपरकहिपते॥ तयो केस्ततोवारमि दस्यचयमस्यच्॥
॥१८॥ भोगमरदमृतयुहरलोकानाचप्रकर्पितम् ॥ आदित्यादीन्स्वस्वरूपान्सुखदुःखस्यसूचकान् ॥१९॥ वरिशान्कल्पयित्वादौ
ज्योतिशकरेपतिषठितान् ॥ स्वस्वरेततिषातपूनास्वस्वफर्रदा॥२०॥ आरोग्यसंपदंशवम्याधीनां शां तिरेवच॥ पषिरायुस्तथाभो
गोमृतेर्ानिर्यथाक्रमम् ॥२१॥ वारकमफलंप्राहदैवप्ीतिपुरःसरम्॥अन्येषामपिदेवाना पूजायाःफलदःशिवः ॥२२॥ देवानांभीतये
पूजापंचधेवप्रक्पिता॥ तत्तनमजजपोदोमोदानंचैवतपस्तथा॥२२॥ स्थडिलेप्रतिमायांचद्यधौबाह्नणविथरे ॥ समाराधनमित्थेव
षोडशैरुपचारकैः ॥२४॥उत्तरोत्तरेशिष्टयातपूवांभावे तथोत्तरम् ॥ नेत्रयोः शिरसोरोगे तथा क्स्य शाते ॥ २५ ॥
अपने २ वारं उन उन देवता्ओकी पूना करे तो उसके अचुत्तारफठकी पाप्ति होती हे ॥२०॥ आसेग्य, सम्पत्ति, वयापियोकी शान्ति एषटिआयु, भोग
तुक हानि, ये यथाकरमते मतष्यको भरा होते है। २१॥उन २ देवताओकवारउन य दैवताओकी भीति करनेवारे है भौर देवताओं जाके तः
देनेवाठे शिवही ह ॥२२॥ तेवता्ओंकौ प्रीतिकेनिगित पांच प्रकारक पूजा कही है, उनका भंव जप होम दान तप् ॥२३॥ स्थर स्थापित परतिमा
अभि ओर ब्राहणके शरीरमे षोडश उपचार सहित पूजन करना चाहिये॥२४॥ इन तीनोमैऽनसेत्तर पूजन शे नेबरोग शिरिरोग ओर ष्रोगकौ
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शान्तिके निमित्त जो ॥२५॥ आदित्यकी पूजा करके बाहमणोको
जब प्रारभ्ध प्रबल हो जायगा तो ज्वरादिक रोग शांत हो जोयगे,जप
धकर रविवारे दिन पापशांतिकरनेके निमित्त पूजा करे, ओर देवताके
फ देनेवाला ै॥२८॥ सोमवारके दिन िद्वानको रक्ष्मी आदिकी पूजा करनी
मेगख्के दिन रोगशान्तिके निमित्त काठीआदिका भजन पूजन करे, उदं मूग एक
दिन विष्णको दही अन्ने पूजन करे तो सवेदा एत्र मित्र क
निमित्त य॒सूवारके दिन उपवीत "वज्ञ दूष ओर षीस यजन करे॥३२॥ भोगकी इच्छा हो तो शुक्रवारके दिनतता
ब्रह्मणो तृप्ति करनेके लिये षष्रस भोजन करावे ॥३३॥ द्वियोकी तृपिके दिये वञ्च दिकं भदान करे, अपयृत्यु दूर करनेके दिये शनिवारके दिन
हदरादिकोंका यजन करना चाहिये॥ ३४॥ तिठ्होम दान ओर तिरुमिभित अन्नका भोजन करावे, इस भकार देवताओंका यजन करने आरोग्यादिकी
आदित्थपूनयितवातग्रह्मणान्भोजयत्ततः॥ दिनंमासतथावर्षवष्रयमथवा पिव ॥९६॥ ्रारब्धंमवलंचेसयात्रशयद्रोगजरादिकम्॥
जपाद्यमिष्टदेवस्यवारादीर्नाफरेषिदुः ॥२७॥ पापशातिर्वरोषेणद्यदिवारेनिवेदयेत्॥ आदित्यस्येवदेवानात्राह्मणानां विशिष्टदम्
॥२८॥सोमवारेचलक्ष्म्यादीन्संपदर्थयजद् बुधः॥ आज्यत्रेनतथाविप्रान्सषत्नीकांश्चभोजयेत्॥२९॥काल्यादीन्भौमवारेत॒यजेदरौ
गप्रशातये ॥ माषशद्राटकात्ननब्रह्मणाश्चेवभोजयेत्॥३०॥ सौम्यवारेतथाविष्णंदध्यत्रनयनेदबुधः ॥ पु्मिजरकलादिपुष्िरभव
तिस्वदा॥ ३१ ॥ आयुष्कामोगुरोवौरेदेवानांपष्टिसिद्धये ॥ उपवीतिनवघ्ेणक्षीराज्येनयजेदबुधः ॥ ३२॥ भोगाधभृगवारेतु
यजेदेवान्समादितः॥षडसोपेतमन्नचदचयाद्रामणत्तये ॥३३॥ श्चीणाचतप्तयेतद्रद्थवल्चादिकंश्यभम् ॥ अपमूल्युदरेमदेश्दाग्रीश
यजेद्बुधः ॥ ३ ॥ तिकहोमेनदानेनतिलघ्नेनच भोजयेत् ॥ इत्थ यजेचविद्ुधानारग्यादिफलंलभेत् ॥ ३५ ॥
भोजन करावे इस भकार दिन महीने वरं ओर तीन वर्तक कृएता रहे ॥२६॥
होभ दानादि इषटदेवताका करनेते उनके वार अरशतारवे फट देते ई॥२५॥ विश
भरीतिकारक द्रव्य निवेदन करे आदित्यवारही देवता ओ. ब्रामणोकी विशेष
चाहिये, इस दिन घृत अन्नादित ब्ीसहित बराहमणोंको जिमावे॥२९॥
आढक(चारसेर)ेकर बाह्णोंको भोजन करावे॥ ३ ०॥ बुधवार
ठत्रादिकी ऽष्होती ३।३१॥ आयुकी इच्छा करनेवाढा देवताओंकी पष्टिकी भिदधीकै
वधान हो देवताओंका यजन करे, ओर
= ८९ + +> 4 > + > 0 = 40 => 4 > -ध- > 4 ०-40-49 ~ -ध > -
~> >>> 4 0 4949९ > 4 ०2 > ९ + > 95 >
भाति होती हे ॥ ३५ ॥ देवताओंको नित्य यजन तथा विशेष यजनमैभी स्नान दान जप होम ओर बाहमणोके तर्पणमे ॥१६॥ तिथिनक्षजके
पोगर उन उन देवताओं पूजन करनेते सब वारो प्रथम दिनम सव॑ज्ञ जगदीश्वर ही ॥३७॥ उन उन देवताओंके हपसे सबको आरोग्यादि ||
दान करते है, देश कार ओर पात्रके अनुसार ॥३८॥ दरव्यकी भद्ाके अनुसार तथा ोकाद्षार तारतम्यके करमसे शिवजी सबको फरुषदान त
करते है ॥ ३९ ॥ मेगलकार्यके आरम्भे ओर अन्त तथा जन्मनक्षत्र गृहस्थीको आरोग्यादि परा्तिके निमित्त आदित्यादि शहोंका यजन
करना चाहिये ॥ ४० ॥ इ कारणते देवयजन मधुणं इच्छितफलका देनेवाला है, मूक बाहमणोको ओर इतर श्रादिकोंको तंबोक्तं पूजन ठ
देवानांनित्ययजनेविशेषयजनेपिच ॥ स्नानेदानेजपेहेमेबराह्मणानाचत्पणे ॥३६॥ तिथिनक्षमयोगेचतततदेवपरपूजने ॥ आदिवारं र
दिवरेषुसरवज्ञोजगदीश्वरः ॥ ३७ ॥ तत्तदरूपेणसवेषामारोग्यादिफलप्रदः ॥ देशकालदुसारेणतथापााब्सारतः ॥३८॥ दव्यश् ट
दवालुसरेणतथालोकाठसारतः ॥ तारतम्यक्रमादेवस्त्वारोग्यादीन्धयच्छति ॥३९॥ शुभादाव््ुभातिचजन्मक्षुेशी ॥ आरो |
ग्यादिसमृद्धयरथमादित्यादीनयरहान्यजेत् ॥४०॥ तस्मद्रदवयजनंसरवाभीटपलमरदम् ॥ समथवत्रा्मणानामन्येषाचिवतांषिकम् ||‰
॥४१॥यथाशत्तयालस्ूपेणकतं्यसर्वदानरेः ॥ सपतस्वपिचवारषुनःुभफलेप्छभिः ॥ ४२ ॥ दर्दिस्तपसादिवान्यजेदाढयोधने ॥
नदि॥ पन्ेवविधधरमरते्रदयासद् ॥ ४२ ॥ एनश्च मोगान्विविधान्ुक्ाभूमोभनायते ॥ छायांजलाशयं बहति धमं ||#
संचयम् ॥ ४४ ॥ सर्वचवित्तवान्कुर्यात्सदाभोगप्रसिद्धये ॥ काला्चपण्यपाकेनक्ञानसिद्धिःपरजाथते ॥ ४५॥
करावे ॥ ४१ ॥ मलु्योको यथाशक्ति सतँ वारो शुभ फलकी इच्छे सदा पूजन करना चाहिये ॥ ४२ ॥ दरिदोको तपते देवताओोका
यजन करना चाहिये, धनीको धनते पूजन करना चाहिये इसभकार जो धाते धमै करता है ॥४३॥ वह स्वर्ग अनेकं भोग भोगकर पृथ्वी |¢
उतन्न होता है कषातेपण, सरोकरनिमाण, पाठशाला बनाना, पमोधक् इततकादिका संहं ॥ ४४ ॥ यह पीक भोगिदिक निभि |
षदा करना चाहिये. इस प्रकार जव पुण्यक प्रपाक होजायगा तव मयपर ज्ञानकी सिद्धि होजायमी ॥ ५ ॥ |
शि०पु° जो बाह्ण इस अध्यायको पढते वा सुनते ह सनाते है अथवा पै देवयज्ञका फ पात है॥ ४६॥ इति भीशिवमहााे वियेरतहित। ¢
॥२३॥| भाषादीकायां चतुदशोऽ्यायः ॥ १४ ॥ ऋषि बोरे हे सतजी ! आप पूजाकै योग्य दश ओर काठका पणन किये कारण कि, आप प्व |||
¢ ङछ जानते है सतजी बोठे देवयजनादि करम शुध घर कहे मातरफठको देता है ॥ १ ॥ उत्त दशयुण गो ओक स्थानम, उत दशुग जल्प ||!
स्थानमे, उससे दशयुण बे तुरी आर पीपठके बृकषके नषे ॥ २ ॥ उ्ते दशयण देवाय उरते दशयुण तीके किनारे, उत्से दशयण ‰
ए नदी, ओर उसे दशयण फठ ती नदीके किनारे ॥ २ ॥ उससे दशगुण फ सप्गेगा नदीके किनारे ओर गगा गोदरी कादरी ात्रप्णीं |
ए यहृमशृणुतेऽध्यायेपठतेवानरोद्िजाः # श्रवणस्योपकर्ताचदेवयज्ञफलंमेत् ॥ ४६ ॥ इतिश्रीशिवमहापुराणेविचेश्वरसंहितायां ¢
|| चतुर्दशोऽध्यायः ॥१९॥ ऋषयउचुः॥ देशादीन्करमशोश्रदिश्ुतसवार्थवित्तम ॥ सूतउवाच ॥ शुदधशहंसमफलंदेवयज्ञादिकमैषु #
&| ॥१॥ ततोदशगणंगोधवनलतीरंततोदश ॥ ततोदशणंबिल्वत॒रस्यशवतथमूलकम् ॥२॥ ततोदेवारुयविदयाततीर्थतीरं ततोदश ॥ ||
ठ ततो दशयणं नयास्तीर्थनयास्ततो दश॥३॥ सप्तगंगानदीतीरंतस्यादशगणभवेत् ॥ गंगागोदावरीचैवकावेरीतात्रपणिका ॥ ४ ॥ ट
\ पिधुश्वसरथूरेवासपतगंगाःप्रकीतिताः ॥ ततोऽन्धितीरंदशचपव॑तामरेततोदश ॥५॥ सर्वस्मादधिकंज्ञेययवारोचतेमनः ॥ कते ¢
फल्ञेयं यज्ञदानादिकं तथा ॥ ६ ॥ अताधुगेत्रिषादंबद्रापरेऽधसदास्मृतम् ॥ कलौपादंतुविज्ञेय तत्पादोनततोदधके ॥ ७॥ ¢
4. शुदधात्मनःश्ुद्दिनेपुण्यसमफरंविदुः ॥ तस्मादशयुण॑ेयैरविसंकमणेडुधाः ॥ ८ ॥ ¢
वि०सं०१||५||॥४॥ सिन्धु सरणु यह नदी संगा कहलाती है उसे दशय ए सागर ओर उक्ते दशगुण फठ पर्ता पूजन करेे होता है ॥ ५॥ |¢
अ० १ | ओर जहां मन रमे दहां सबसे अधिक पूजनका फ होता है. यह्दानादिका सतयुग परणं फ होता है ॥ ६ ॥ तरेतायुगे तिहा दवापरे ||
|| आषा, कषियुगे चौथाई, ओर अधिक आधा कलियुग वीतनेपर इससेभी न्यून फर होगा ॥ ७ ॥ शुद्धात्मा हो परित्रदिनमे एण्यसमान ||?
९॥ ठ देनेवारा है इससे दशय॒ण फर संकांतिके दिन ॥ < ॥ >
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तला ओर भेषकी सकरँतिमं उत्ते दशयण, अयनं उत्से दशय॒ण, चन््रमहणये उससे दशयणं ॥ ९ ॥ उससे दशशण फल र्यकेषहणभे होता
है, यह उत्तम ओर पृणकार है, जगवहप षयं अन्धकारहप होजानेते तथा विषयका योग होने यह समय रोगदायक है ॥१०॥ इत कारण
इस विषशांतिके निमित ज्ञान ओर दान करना चाहिये, मिषशान्ति करनेवाला होनेतेही यह समय शण्य देनेवाला कहा है ॥११॥ जन्मनक्षज
ओर बतके अन्तरे दानका फठ स्गरहणकी तुल्यही है, ओर सलुरुषोंकी संगतिका फक करोड सये समान है ॥ १२ ॥ तपोनिषज्नानमे
निष्ठावाले योगी ओर यती यह पूजाके पार ह इनका सत्कार करनेशे पापक्षय होता है ॥ १३ ॥ अथवा जिसने चोषीस ठास गायत्रीका जप्
विषुवेतदशयुणमयनेतदशस्मृतम् ॥ तदशमृगसंकंतौतचचरमहणदश ॥ ९ ॥ ततशसरयहणपूणकारोत्तेविदुः॥ जगदूपस्यसु्ं
स्थविषयोगाञजरोगदम् ॥ १० ॥ अतस्तद्विषशात्यर्थस्नानदानजपां रेत् ॥ विषशात्यर्थकालत्वात्सकालःपण्यद्ःस्मृतः |
जन्मक्षचव्रततिचसूर्यरागोषमविदुः ॥ मदर्तांसगकारश्रकोरयकैयहणविदुः ॥ १२ ॥ तपोनिष्ठा ज्ञाननिष्ठयोगिनोयतयस्तथा॥
पूजायाः पानमेतेदिपापसंक्षयकारणम्॥१२॥ चतुिंशतिलक्षवागायन्यानपसेयुतः॥ बाह्मणस्तुभवेत्पान संपणैफरुभोगदस्॥ १४॥
य ॥ | 11 ॥१५॥ गायक्ायतेपाता्गायवीत्यच्यतेदिस ॥
यथाऽ ऽस्मिन्परस्याथनयर १६॥ अर्थं मषयच्छति स्वयं्ुदोहि र
ातुमहंति॥ १७ ॥ योोकेषरस्यारथ ॥ पतात्मानरान्स
किया हे वह बाह्मण पृणं फलका देनेवाटा है, बह यथाथ पात्र है ॥ १४ ॥ पतने रक्षा करोेवारेका नाम शाच्चमं
पा कहा ह
ह इसी पकारे जो स्वयं पक्र |
धनहीन इसठोकमे कितीको पन नं दकता ॥ १६ ॥ ओर जो इस रोक अथैवान दै वह धन देशा ह
हे वही इस लोकम दूसरोकी रक्षा कर सक्ता है ॥ १७ ॥
१२
ह
ठ
ठ
| जपते शु हुआही बाह्मण शद है,इस कारण दान जप होम ओर पूजा सब कामम॥१८॥दान ओर रक्षा करम एक व्राह्मणही पातर है ओग
अन्नदानका नारी नर कोई भी हो जो भूखा हो वही पा।१९॥है जिस समय श्र ब्राह्मणको बावे, ओर ्रावधान होकर उर दान दं उद्चका शब्द्
ओर अर्थं सत् वस्तुका बोधक ओर इष्ट देनवारा है॥२०॥इच्छावाछेको उसको देना सम्पूणं फठका देनेवाला है ओर जो मांगनेके परे दिया जाता
ह वह आभे फलका देनेवाटा हे॥२१॥ओर जो सेवकको दिया जाता है उसका चौथाई फठ होता द. ह बाणौ ! जो जातिमात्र बाह्ण दीन हीय
तो ॥ २२॥ उसको दान देने ूर्ोकमे दशवष फर होता है, तप शाश्च वामे हीन बाहण जाति व्राह्मण ह यथा ( पातञ्रभाष्ये तपः श्रतं च
गाय्ीजपञचदधोदिद्यद्वराह्नणउच्यते ॥ तस्मादानेजपेहोमेप्ूनायां स्कमेणि ॥ १८ ॥ दानेकतुतथातरा्ुपा्रतुत्राह्णोरहति ॥
अद्नसयक्षधितंप्रनारीनरमयात्सकम् ॥ १९ ॥ ब्राहमणं ्रेष्ठमाहूययत्काेषुसमाहितम् ॥ तदथशब्दमर्थवासद्रोधकमभीष्टदम्
॥ २० ॥ इच्छावतःग्रदानचसंपूरणफलदंबिदः ॥ यत्प्रशनानंतरंदत्ततदर्धफल्दंविदुः ॥ २१ ॥ यत्सेवकायदन्स्यात्तत्पादफलदं
विदुः ॥ जातिमा्रस्यविप्रस्यदीनघतरदिजषभाः ॥ २२ ॥ दत्तमर्थदिभोगायभरककिदशवार्षिंकेम् ॥ वेदयुकतस्यविप्रस्यस्वगंिद
शवापिकम् ॥ २३ ॥ गायत्रीजपयुक्तस्यसत्येहिदशवापिंकम् ॥ विष्णुभक्तस्यविभस्यदत्ेव$टदंविडः॥ २४ ॥ शिवभक्तस्य
पि्रस्यदत्तकैलासदंबिदुः ॥ तत्तष्ठोकोपभोगा्थसवेषांदानमिष्यते ॥ २५ ॥ दरशांगम्नैविपरस्यभादुवारेददत्ररः ॥ परजन्मनि
चारोग्यदशवर्षसमश्लुते॥ २६ ॥ बहुमानमथाहानमभ्यैगंपादसेवनम् ॥ वासोगंधाघचनेचपृतापएूषरसोत्तरम् ॥ २७॥
योनिधेलेतदराहणणलक्षणम्॥ तपःश्रुताभ्यां योहौनो जाति बाह्मण एव सः)बेदयुक्त ब्ाहणो दान देनरगे दशवष स्वगे फठ होता है।२३॥जो गायत्रीकै
जपते युक्त ३ै,उे स्लोक्े दशवषं फठ होता है, ओर पिष्यभक्त बाह्णको दान देने ै$ढकी भापि होती हे॥२४॥शिवभक्तको दान कएने कैठासतकी
रानि होती है, सब भरकारकै दान जिस उदेशसे दिये जाय उसी भकार उन छोकोँको फ मिंकता ह ॥२५॥ जो रविवारकै दिन ब्राह्मणको ट
|| दशांगयुक्तं दान करता हे वह दूसरे जन्मे आरोग्यताको दशवषं तक प्राप्त होता ह ॥ २६ ॥ दशांग कहते है बहुत सन्ान करना, बुलाना,
शिश्पु
॥३४॥
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विशसं
अ० १५
(3 > ९ + = 6 > -4 = -4 = -4) ~ क ~ ब ~ 4 > ९ -
वथ यव्य
=
ए 42 444२ 442 4९4 949 पन 9९ -40 3
ऽवटना करना, चरण सेवन, वद्न, गंधादिसे अर्चन, घृत, मार्षुए, रस ॥ २७ ॥ पटर व्यंजन, ताम्बू दक्षिणा नमस्कार कृ दूर संग
जाना, यह दशांग अन्नदान है ॥ २८ ॥ जो रविवारके दिन दश बारणोको दशांग अन्नदान करता है इह ोवष॑तकं आरोग्यता $ ह
॥ २९ ॥ सोमवार आदि वारो उनके गुणके अनुसार फल है, अन्नदानसे दूरे जन्म भूटोककी पापि होती हे ॥ ३० ॥ सातो वारोमे
दश बाह्णोंको दशांग अन्न देकर सर वषं आरोग्यादिकी प्रापि होती है ॥ ३१ ॥ इस प्रकार सौ ब्रर्णोको सयवारकं दिन अन्नदान करने
सहस वषं शिवछोकरमे आरोग्य रहता है ॥२२॥ सहस्र बराहमणोंको देनेसे दश सहस्व्ष पुखभोग करता है इती प्रकार सोमवारादि वाोकामी
षदसन्यजनंचेवताबूलंदक्षिणोत्तरम् ॥ नमश्ावुगमशेवस्वप्रदानंदशांगकम्॥२८॥ दशांगमततविप्रभयोदशभ्योवेददचचरः ॥ अर्कवारे
तथाऽऽरोग्यंशतवषसमश्वते ॥ २९ ॥ सोमवारादिवारेषुतत्तदरारगुणंफलम् ॥ अत्रदानस्यविज्ञेय॑भकिपरजन्मनि ॥ ३० ॥
सप्स्तपिचवारषुदशभ्यश्चदृशांगकम्॥ अत्दत्तवाशतंवषमारोग्यादिकमश्तते॥२१॥ एवंशतेभ्योविषरेभ्योभादवरेदद्घ्नरः॥ सहस
वर्पमासोग्यंशवलोकेसमश्वते ॥ ३२ ॥ सहसेभ्यस्तथाद्तवाऽयुतवर्पसमश्वते ॥ एवंसोमादिवरिषुविजञय॑टिविपञश्चिता ॥ ३३॥
भाववारेसदस्राणां गायजीपूतचेतसाम् ॥ अप्नेद्वासत्यलोके्यारोग्यादिसमश्लुते ॥ ३९ ॥ अयुतानतिथादसाविष्णुरोकेस
मश्नुते ॥ अघ्रदत्तात॒लक्षाणारूढलोकेसमश्चते॥ ३५ ॥ बालानाबरह्मबुद्धय्रिदेयंविधाभिमिभर॥ यनां विष्णुबुद्धयाहिषुत्का
माधिभमिनरः॥२६॥ वृद्धानांसद्रइयादिदेयंज्ञनाभिभिनरः ॥ बाल्वीभारतीबुदयाइुद्धिकायैमरोत्तमौः ॥ ३७ ॥ र्यीष्यायुव
खीुभोगकामेनरोत्तमैः ॥ वृद्धासु पाव॑तीबुद्रयादेयमात्मा्भिभिजनैः ॥ ३८ ॥
फृठ जानना ॥ ३३ । रविवारके दिन गायत्री पित्र चित्त सह बरहमणोको ॥ सक भ्ोगयादङ श होती है ॥
दश सहकचको देकर विष्णठोक ओर लक्षो अन्नदान करने रुदटोककी भरामि होती ४ ॥ ३५ ॥ वारक मिवाधिषोक ३४॥
अजञदान कना, युक विषदिे इनकी इच्छाव मलयो दान करना चाहिये ॥ ३६ ॥ ज्ञानक सयवा ८
रदबुद्धिसे दान करना चाहिये, ओर वारक च्रियोको सरस्वतीकी बद्धे वुखिकी इच्छावारे भलुष्योंको ¶ने करना चाहे 1 1
4 > ८
शि०इ० ||| एर्यकी इच्छावारे मल्ोको यु बीम रकष्मीकी बुधे पूजा करनी चाहिये ओर आतमाकी इच्छा कवाटे इवा | न
।३५। || || पाती बुवते दान करना चाहिये ॥ २८ ॥ उन्छरिरतति कणचुनना मौर यदकषिणते वचा हुभ दाश द्र्य द है, ओ कह ११ ट
वैश्यका शूरता ओर वाणिज्यका उत्पन्न किया ठय उत्तम ह, ओर शद्रका सेवासे अजेन किया द्रव्य उत्तम है ॥ ४१ ॥ चिरयोको छागी ॥
ओर उनके पिताका दिया हभ दव्य धर्मवाढा है ओर वेत्रादि मासोभ गौको आदिले बारह वस्तुका यथाक्रम दान दे ॥ ४२ ॥ यह सतव ¢
शिलवृत्योन्छवृयाचगदक्षिणयाजितम् ॥ शुदर्यमितिपराइस्ततवरणफलविडुः॥२९॥ श्मतियहादततेमभ्य्मदम्युच्यते ॥ ||
कृषिवाणिज्यकोपेतमधमेदरभ्यशुच्यते ॥ ४० ॥ क्षत्रियाणां विशाचेवशौ्यवाणिज्यकानिंतम् ॥ उत्तमद्रव्यमित्याइुः शूद्राणां ||4
भृतकाजितम् ॥४१॥ स्रीणां धर्माथिनांद्येपतेकंभतैकेतथा ॥ गवादीनां ्रादशीनांचेत्ादिषुयथाक्रमम् ॥ २ ॥ सभूयवापुण्य ट
कालेदद्यादिष्ठसभृदधये ॥ गोभूतिरूदिरण्याज्यवासोधान्यगडानिच ॥४३॥ रौप्यंलवणक्ष्मांडकन्याद्रादशकंतथा ॥ गोदाना
दत्तगव्येनगोमयेनोपकारिणा ॥ ४९ ॥ धनधान्याद्याश्चितानांदुरितानांनिवारणम् ॥ जलस्नेहाद्याश्रितानांदरितानांतगोजलेः ६
॥४५॥ कायिकादि्रयाणांतुकषीरदध्याज्यकैस्तथा ॥ तथातेषांचपुष्टिश्वविज्ञेयाहिषिपशचिता ॥ ४६ ॥ भूदानंतुप्रतिषठर्थमिहचा
ऽसुत्रचद्विजाः ॥ तिल्दानबलाथिसदामृत्थुजयंविडः ॥ ४७ ॥ {
पण्यकाठमे इष्ट॒ सिद्धिकै निमित्त दान करे, गौ पृथ्वी ति सुवणं घृत वद्घ धान्य गुड ॥ ४३॥ चौदी ठ्वण पेढा ओर कन्या यह बारह ४
वस्तु है गोदाने गव्यसे ओर उपकारी गोबरसे ॥ ४४॥ ओर धन धान्ये आभिततोके कटका निवारण करना जर स्नेहे |>
तथा गोमते आश्रिते निवारण होते ह ॥ ४५॥ इती भकार क्षीर दधि ओर प्रतते कायिक वाचिकं पानक्िकं तीन ||
कारके पाप दूर होते है, इस भकार गोदानसे तथा गव्यसे षट होती है; सो विदवार्नोको जाननी उचित ह ॥ ४६॥ हे बाह्णो ! भूदान ॥
|
६
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विश०सं०१
फृठका देनेवाला है ॥ ३९ ॥ ब्राहणोसे दान छया द्रव्य मध्यम है, कपि वाणिज्यसे भप्त धन अधम द्रव्य कहकाता है ॥ ४० ॥ क्षत्रिय ¢
अ० १५
होती हे, घृत प्ट ओर वह्लदानपै आयुष्यकी वृद्धि होती हे ॥ ४८ ॥ धान्यदानसे रेशव्थकी वृद्धि ग॒डदानसे मधुर आहारकी परापत होती ¢
है ॥ ४९ ॥ सव रेश्वयं ओ पटिका देनेवाला पे है, हे ब्राह्मणो ! यह ॒दोनोंटोकमे सब भोगोकी प्रापिकरनेवाठा हे ॥ ५० ॥ कन्यादाने ४
जन्मपर्न्त भोगकी प्रापि होती है, पनस आम कैथ वृकषोके फर ॥५१॥ कदटी (कैला) ओषधी फल जो छता युल्मसे उतपन्न हूए है उदं भग ४
दिरण्यजाटरोग्नस्तुवद्धिदंवीयंदंतथा ॥ आन्यं पुष्टिकरं वियाद्रश्चमायुष्करंविढुः ॥ ४८ ॥ घान्यमत्नसमृद्धयर्थमधुराहारदगुडम्॥ ¢
रोप्यरेतोभिवृद्धयर्थषडसाथतुलावणम्॥४९॥ सर्वसवसमृद्धयरथकूष्मांडपष्िं विदुः ॥ प्रा्तिद॑सर्वभोगानामिदहचाऽघुजच द्विजाः ¢
॥५०॥ यावजीवनघुक्तदिकन्यादानंत॒भोगदम् ॥ पनसाभ्रकपित्थानांवक्षाणां फमेवच ॥ ५१ ॥ कदल्या्यौषधीनांचफलगुलमो |$
द्रवतथा ॥ माषादीनां चुद्रानांफलंशाकादिकंतथा ॥ ५२ ॥ मरीचिसर्षपायानांशाकोपकरणतथा ॥ यहतौयत्फरुसिदधंतदेयंहि ९
विपश्चिता ॥ ५३ ॥ श्रोजादीद्रियतप्िश्वसदादेयाविपश्िता ॥ शब्दादिदशभोगाथदिगादीनांचतुष्ठिदा ॥५६॥ बेदशाघ्च॑समां ९
दायबुदृध्वायुर्षुखात्स्वयम् ॥ कमर्णांफलमस्तीतिबुद्धिरास्तिक्यषच्यते ॥५५॥ तधुराजभयादबुद्धिश्चद्धासा चकनीयसी ॥ सर्वा ६
भवेदरिद्स्तुवाचावाकर्मणायजेत्॥५६॥ वाचिकंयजनविदान्संस्तो्जपादिकम्॥ तीथेयाजाव्रताधरिकायिकं यजनं विदुः॥५७॥
फटी शाकादि ॥ ५२ ॥ भिरच सरस तथा ओर शाककी क्षामप्री जिस हु जो फए्हो वही पही शुद्धिभानूको देना चाहिये ॥५६३॥ ओर |
ुद्धिमानूको उचित है कि भरोत्ादि दद्विय तृ्िकारक मोगी भदान कर) शब्द स्यशौदिक दशविधि दस्तु देनेसे दशोदिशाओंकी तृटि होती ३।५४॥ ट
वैवशाद्चको ठेकर ओर स्वयं यके ससे एुन उन्हं जानकर ( र्था फठ है) इ कारी बद्धा नाग आस्तिक्य है ॥ ५५॥ भौर बन्ु |
तथा राजमयतते भास्तिकयबुद्ध होनी यह कनिष्ठ शरद्धा ह, सव भकार ्यका अभाव होतो वीणा अथवा कर्मतेही यजन करे ॥५६॥ मंन ओर स्तोता ्
नै
करनेसे दोनोंठोकमे भरतिष्ठा होती है, तिर्दानसे बढ ओर भृत्येका जय होता हे ॥४७॥ हिरण्यदानसे जठराग्निकी परबरुता ओर वीयकी वृ
पिक यजन रै ॥ ५७॥ जिर प्रकारे होके उसी परकारते देता अर्पण बुद्धे ||
दिजपका नाम वाचिक यजन है, तीर्थयात्रा बत इत्यादि का ¢ 8 §
ओर दान ये दोनों सदा करने चाहिये अपने वणे ओर श॒णसे शोभित गृह दान
कमं करे, तो महाभोगकी पापि होती है ॥ ५८ ॥ तपशर्या क 4
करना चाहिये ॥ ५९ ॥ देवताओंकी तिके निमित्त दान करनेसे सव भोगकी भराति होती ह, इस कमस इस ठोक परटोकके जन्मत सद्ा >
शि°पु° प
४ भोगकी भराति होती है ओर दवरार्षणलुद्धिसे करनेते युक्ति होजाती है ॥ ६० ॥ जो मनुष्य इस अध्यायको पठते ओर सदा सुनते है इनको |
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॥२६॥
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ूर्मबुदधि ` ओर ज्ञानकी सिद्धि होती है ॥ ६१ ॥ इति श्रीशिवमहाप्राणे विधेश्वरसंहितभाषादीकायां पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ ऋषि बोटे ह
$| येनकेनाप्युपायेनद्यरप॑वायदिवाबह ॥ देवतार्पणद्ुद्धणचक्ृतंभोगायकटपते ॥५८॥ तपर्याचदानंचकतंग्यथुभय॑सद् ॥ प्रति
श्रयंप्रदातव्यस्वव्णयुणशोभितम् ॥९९॥ देवानातृत्तेऽत्यर्थसर्वभोगप्रदं धेः ॥ इदाऽपुबरो्तमजन्मसदाभोगंलमेदञुषः ॥ ईश्वरा
पैणबुदधगटिकृत्वामोक्षफलं लभेत् ॥ ६० ॥ यष््मपठतेऽध्यायंयःश्ृणोतिसदानरः ॥ तस्यवेधमेदुद्धि्ञानसि दधिः प्रजायते
# ॥६१॥ इति श्रीशिवमहापुराणेषियेश्वरसहितायांपश्चदशोध्यायः ॥१५॥ ऋषयञ्खुः ॥ पाथिवप्रतिमापूजाविषारनब्रूहिसत्तम ॥
£ येनपूजाविधानेनसर्बाभीष्टमवाप्यते ॥१॥ सूतउवाच ॥ सुसाधुपृषटयुष्पामिःसदासर्वाथदायकम्॥ सादुःखस्यशमनंशृणुतप्रतरवी
|| मिवः॥२॥ अपमृल्यदरंकालमृत्योश्वापिषिनाशनम् ॥ सदयःकररपुत्रादिधनान्यपरदंद्विजाः ॥३॥ अग्नादिमोन्यंव्चादिसर्मुत्प
|| दयतेयतः ॥ततोमृदादिप्रतिमाप्ूजाभीष्टमदाथुषि ॥ ४॥
वि°सं०१||¢ || तजी ! आप हमसे पाथिवपूजाका विधान किये, जित पूजा विधाने सम्पृणं इष्सिदधि होती हे, ॥ 3 ॥ तजी बोढे आपने बहत रेष्ठ बात
अ० १६||? पृी यह सदा सरव अर्थोकी पिद्धि कणेवाटी है; इसके कहतेही शीघ्र दुःकी शान्ति होजाती है, म कहता हं आप सुनिये ॥ २ ॥ अपमृलयु
2 | ( अकाठमृत्यु ) का भी हरनेवाला सदा धन धान्य चरो एका देनेवाखा विधान हे हे बाह्मणो ! ॥ ३ ॥ जिससे अन्नादि भोजन वशर सब
>| कुछ उत्पन्न होते रै, इसी कारण वह मृत्तिकाआदिकी प्रतिमा पृथ्वीम मुष्योको अभीष्टकी देनेवाटी है ॥ ४.॥ ह
4 > 1 24 24 > 1 44 =-= 2 -4
शमे द्खी परूष दोनोंका अधिकार हे नदी तडाग कूप अथवा जके नीचेकी मृत्तिका छादे ॥५॥ पीठे हुगंधित दष्यके चणम शोधित करके ?
उत मृत्तिकाको अच्छे मंडपमं मरदिंत करे । उसके प्श्वातु दृष डाठकर हाथसे प्रतिमा बनावे ॥ ६ ॥ अंग परत्यंग षब बनाकर आयुधोंहित ¢
कल्पना कर पस्मासनमे बेठाय आद्रे पूजा करे ॥ ७ ॥ गणेश आदित्य विष्ण पावती शिव ओर शिबिगकी सूतिकी सदा बाह्मण पूजा करे
॥ < ॥ फठसिद्धिके निमित्त पोडशोपचारमे पूजा करे प्यते भरोक्षणकर मंत्रपुवंक अभिषेक करे, ॥९॥ शाखि अन्न नेवेय संग्रह कर एकं कुडव
अथात् पावभर ठे धरम स्थापित ठिंगकी पावभर नेवेयसे ओर मलुष्योके स्थामित छिगकी एकं प्रस्थ ( एकतर ) नैषेयते पूजा करे ॥ १०॥
परुषाणां चनारीणामधिकारोजनिधितम् ॥ नयांतडागेकरपेवाजलतभृदमाहरेत् ॥ ५ ॥ सशोध्यगंधद्णेनपेषयित्वासुमंडपे ॥
हस्तेनग्रतिमांङ़यातशीरेणचसुरसस्कृताम्॥ & ॥ अंगप्रत्यगकोपेतामापुधश्चसमन्विताम् ॥ पद्मासनस्थितां ङृत्वापएूजयेदादरेणहि
॥७॥ विष्नेशादित्यविष्णूनामेबायाश्चशिवस्यच॥शिवस्यशिवखिगंचसर्वदापूजयेद्िज॥ ८॥ षोडशे रुपररश्ङर्यात्तत्फरसिद्धये ॥
पष्पणपोक्षणंकुयादभिषेकंसमेजकम्॥ ९ ॥ शात्यत्रनेवनेव्यसर्वङुडवमानतः गृहेतुङडवज्ञेयमारपेषस्थमिष्यते ॥१०॥ देवेष
स्थतर्ययोग्यस्व्यभोःमस्थपंचकम्॥ एवंपू्णफटंवियादधिकवेद्थवयम्॥।११॥ सदस्ूजयासत्य॑सत्यरोकंरभेदद्विजः ॥ दवादशां
गुलमायामंद्वियणंचततोऽपिकम् ॥१२॥ प्रमाणमशुरुस्येकंतदरषव्पचकचयम् ॥ अयोदाङ्क्ृतंपारेशिवमित्युच्यतेडधेः ॥१३॥
तदष्टभाग.प्रस्थःस्यात्तचतुःकुडवंमतम्॥ दशपस्थंशतप्रस्थसदस्पस्थमेवच ॥ १४ ॥
देवताके स्थापित करिये डिगप्र तीन प्रस्थ ओर प्रादु्ूत हए छिगप्र पांच पर्थ चावे इस्त धकार छःसात पर्थ ( तेर ) नैवैष चढनेते एष
कठ होता है ॥ ११ ॥ ओर सहल स्थ नेमेयते पूजा करने ब्ाहणको शत्यलोककी भाति होती ३, बारह अंयुरु चौडा, चौपी् अंय॒र
लम्बा ॥ १२ ॥ ओर एक अंगु अधिकं इस भकार पीस अंयुर म्ना पदह अगर ऊचा ठोहे वा काठके पाका नामं शिवं है ॥१३॥
प उत्तके आढवं भागका नाम प्रस्थ चौथे भागका नाम कुडव है दश भरल्थ रत्नस्य सहलपरस्थं ॥ १४ ॥
१३
गय 444 94 > 9 94
८
शि०ु० जठ तैर गधे यथोक्त परमाण दवारा मदुष्यक स्थापन किये टिगकी पूजा दशमरस्थ नैवेयादिंे, ऋपिके स्थापित किकी सो, ओर् स्व्यं उतत ||
॥३७॥ || || हएकी सह्तमर्थ नेवेयादिे करे यह महापूजा कहठाती है ॥ १५ ॥ अभिषेक कएने आत्मशुद्धि गन्ध चढानेसे प्यप्रापि नैवेयपे आयु ओर ॥
¢ तृषि ओर धूपमे एण्यकी परि होती है ॥ १६ ॥ दीपकते ज्ञान, ताम्बूढते भोगकी प्रापि होती हं, इस कारण स्नानादि छः वस्तु यलपूक |||
|| कल्पना करे ॥१७॥ नमसकार ओर जप यह दोनों सम्पूणं अभीष्ट सिदध करनेवाठे ई भोग ओर मोक्षकी इच्छावाठेको पूजाके अन्तम सदा ्
ठ करन चाये ॥१८॥ मानसिकपुजनमेभी वह सब उपचार करने चाहिये देवताओंकीमी इसी प्रकार पूजा करनेसे उन उनके टोकोकौ भानि ||
४ जलतेलादिगंधानांयथायोग्धेचमानत्ः ॥ मालषाष॑स्वयंभूनांमहापूजेतिकथ्यते ॥ १५ ॥ अभिषेकादात्मशुद्धिरगधात्ुण्यमवा ||
¢ प्यते ॥ आयुस्तपिश्चनवेयदधूपाद्र्थमवाप्यते ॥ १६ ॥ दीपाज्ज्ञानमवाप्नोतितवरूलाद्ोगमाप्ठयात् ॥ तस्मात्स्नानादिकंष ४
| नमस्कारोजपश्चवसर्वाभीषटपदादुभौ ॥ पूजान्तेचसदकार्योभोगमोक्षाधिभिर्नरः ॥ १८॥
४ सपूज्यमनसाूर्वकयातत्तत्सदानरः ॥ देवानां पूजयाचैवतत्तछोकमवाप्ठुयात् ॥ १९॥ तद््वातरकोकेचयथेष्टमोग्यमाप्यते ॥ ||«
| तद्विशेषान्प्रवक्ष्यामिश्रणतश्रद्याद्विजाः ॥ २० ॥ विष्नेशपूजयासम्यग्भूरकिऽभीषमाप्ठुयात् ॥ श्ुक्रषारेचतुर्थ्याचसितश्रा ॥4
¢ वणभाद्रफे ॥ २१ ॥ भिवेगृक्षधवमांमेषिष्नेशंविधिवचनेत्॥ शतंपूजासहसवाततसंख्याकदिनैमैजेत् ॥ २२ ॥ देवाभिश्रंद्यानि ४
|| स्यपुत्रचेष्दनृणाम्॥ सर्वपापग्रशमनंततहरितनाशनम् ॥ २३ ॥ ¢
वि०स॑०५||९|| होती है ॥ १२. ॥ ओर उनके वीच्के ठोकोमेमी यथे भोगकी प्रापि होती ह, हे ब्रह्मणो ! आपृ बनिये भँ इमे विशेष कहता ह ।२०॥ |
अ० १६ गणेशजीकी सम्यक् भकार पूजा कृरनेमे भृोकमे इषटक पातन हौती है, शुकरवारकै दिन माद्रमास वा श्राव्णमाप्तकी शुङ़ चतुरथीके दिन ॥२१॥ ||6!
| शतमिषा नश्च ओर धनके यम गणेशजीकी विधिपूर्वकं पूजा कर, शतवार पूजा करनैसे तथा सहल्वर पूजन कएनेते उभी संस्यायुक्त दिनतक |
९८|| मोगकी भराति होती ह ॥२२॥ देवता अभ्िकौ श्रद्धा पूजा करे तो मदष्योंको एत्र ओर मनोरथकी भरामि होती है, सव पाप ओर दुःखोका |>
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नाश हो जाता है ॥२३॥ शिवादिके वारक) पुजा करनेते आत्मशुद्धि होती है, तिथि ओौर नक्षत्र योगोंका आधार, भरेष्ठ दिन सव कामनाका
देनेवाला है ॥२४॥ इस प्रकार ब्रहमका साधर्म्ये यदध क्षयदोषरहित दिन रहण करना चाहिये, वह पुणंफल देनेवाढा है ओर बाह्मणादिकमोे वार
ओर तिथि उदयमे ग्रहण करा है ॥२५॥ उस तिथिके आदिमं पूजा मलु्योको पूणं भोगकी देनेवाटी है, ओर जो मध्याहक अनन्तरभी तिथि
हो तो रात्रीयक्त उप्त तिथिका पूव॑भाग प्रतिकर्म ठेना चाहिये ॥ २६ ॥ ओर प्रदिन युक्तं तिथिका दिवस देवता ओंके कार्म प्र्ठ है “पूर्वहि
वै देवानामपराह पितृणामिति श्रतेः ” देवकायंपुवं्िथिमं ओर मध्याह व्यापिनी तिथिमे पितृकायं करे यह भाव है, यदि उदयतियि मध्याह
व्[रपूजांशिवादीनामात्मुद्धिप्रदांबिदुः ॥ तीथिनक्ष्रयोगानामाधारंसार्वकामिकम् ॥२॥ तथावृद्धक्षयाभावात्पूर्णतरह्यात्कमे
विढुःउदयादुदयवागेव्रहमप्रभृतिकमणाम्॥ २५ तिथ्यादोदेवपूजाद्धपू्णभोगप्रदानतृणाम् ॥ पूर्वभागः पितृणां तुनिशियुक्तः प्रशस्यते
॥२९।।परभागस्तुदेवानांदिवायुक्तःप्रशस्यते॥ उदयव्यापिनीाद्यामध्याह्वयदिसातिथिः ॥ २७॥ देवकायं तथाथाद्यास्थितिक्षा
दिकाञ्चुभाः ॥ सम्यग्विचार्यवारादीन्कुयात्पूजाजपादिकम्॥ २८ ॥ पूजार्यतेश्यनेनेतिवेदेष्वर्थस्ययोजना ॥ पएर्णभोगफरुसिद्धि
अजायतेतेनकमेणा ॥ २९ ॥ मनोभावास्तथाज्ञानमिष्टभोगार्थयोजनात् ॥ प्ूजाशब्दार्थएवहिविश्चुतोरोकवेदयोः ॥ ३० ॥
नित्यनैमित्तिकंकाटात्सदःकाम्येस्वनुष्ठिते ॥ नित्यमासं चपक्षचवर्पचेवयथाक्रमम् ॥ ३१ ॥
ह|| व्यापिनी हो तो उपे ्रहण करना चाहिये ॥ २७॥ वह शुभनक्षव युक्त तिथि देवाकायमे हण करना चाहिये, वारको सभ्यक् विचारकर पूजा
ओर जप करे, जो उदयतिथि मध्याह्न व्यापिनी न हो वह खण्ड तिथि है वतक निमित्त ठीक नहीं ॥२८॥ इत प्रकार पूजा करने बेदाथका
४ पृणेफल होता है, ओर इस प्रकारक कर्मसे भोगसिदधि ओर पूणं फठ भिर्ता है ॥ २९ ॥ मनते इच्छित अर्थं आर ज्ञान जिसके द्वारा भाप
; होकर इ््भोग मिठते है, उपतकोही पूजा कहते है यहं पूजाका अथं कोक ओर वैद विदित है ॥ ३० ॥ नित्यनैमित्तिक पजादिक कालान्तर
फठ देते है, ओर काम्यफल शीघ्रफठ देते है, नित्य मास पक्ष वर्षम कमादुसार ॥ ३५ ॥
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पूजासे उसी कर्मे फलकी प्राति ओर इच्छानुसार पापक्षय होता है कष्णपक्षकी चौथको महागणपतिकी पूजा कटनी चाहिये ॥ ३१
यह पुजा पक्षके पापक्षय करनेषाटी, ओर पक्षके भोग ओर फठ देनेवाटी हे, चेतरम चतुथीके दिन ¶जा करे तो एकमासका फट मिता ह ॥३३॥
ओर भादौं मासम िंहक सर्म पूजा करे तो वष दिनका पाप दर होकर भोगकी भराति होती है, शरावणमे आदितयवार ओर हस्तनक्षत्र ४
सप्मीके दिन ॥ ३४ ॥ ओर माष शुह्णा सप्तमीके दिन आदित्यका यजन करे, ज्येष्ठ ओर भाद बुधवार श्रवण नक्षत्युक्त द्वादशी ॥३५॥
विष्ण भगवानूका यजन सेपुणं सम्पत्तिका करनेवाछा है रावणम विष्ण भगवानूका पूजन इष्टफढ ओर आरोग्यका देनेवाढा है ॥ ३६ ॥ गौ
तत्ततकर्मफलग्रा्तिस्ताटक्पःपक्षयःकमात् ॥ महागणपतेःपूजाचतु्याकरष्णपक्षके ॥३२॥ पक्षपापक्षयकरीपक्षभोगफलपदा ॥
चैत्रचतुरथ्याप्रजाचकृतामासफरप्रदा॥३३॥ वर्षभोगपदाज्ञेयाङृतावेसिदभाद्रके ॥ श्रावण्यादित्यवारेचसप्तम्यांदस्तभेदिने॥ ३४॥
माघशुञेचसप्तम्यामादित्ययजनंचरेत् ॥ ज्येष्ठभादकसौम्येषद्रादश्यांश्रवणक्षके ॥ ३५ ॥ द्ादश्यांविष्णुयजनमिष्संपत्करंविदुः
शिणश्पु० ठ
ह
¢
ट
ह
¢ श्रावणेविष्णुयजनमिष्ठारोग्यप्रदंभवेत् ॥३६॥ गवादीन्द्रादशानर्थान्सांगान्दत्वातुयत्फलम्॥ तत्फकंसमवाप्नोतिद्रादश्यां विष्व
¢
॥३८॥
तर्पणात् ॥ २७॥ दादश्याद्रादशान्विपरान्विषणोदरदशनामतः ॥ षोडशेङ्पचारे्यजेत्त्ीतिमापनुयाद् ॥ ३८ ॥ एवंच
वानातततदयादशनामकैः ॥ द्रादशब्रह्मयजनंततततपरीतिकरंभवेत् ॥३९॥ ककैटेसोमवरेचनवर््यामूगशीर्षके ॥ अंबांयजेदूतिकामः
सवंभोगफलप्रदाम् ॥ ९० ॥ आश्वयुकडु्धनवमीसवां भीषटफलप्रदा ॥ आदिवारेचतुदेश्यांङष्णपक्षेविशेषतः ॥ ४१ ॥
भ
विश्सु°
अ० १६
आदि बारह अरथोको सांग देनेका जो फट द्वादशीकै दिन विष्णका पूजन करनेसे भराप्त होजाता है ॥३७॥ जो द्ादशीके दिन बारह बाह्रोको
विष्णके बारह नामे शोडश उपचारोते पुजन कर भोजन कराता है बह भगवानूकी शक्छिको पाप होता है ॥३८॥इसी भकार द्वादश नामे
तममूण देवताओके निमित्त बारह बाह्मण भोजन करनेसे उन २ देवताओंकी भसमता होती है ॥३९॥ ककके सूर्यम मृगशिर नक्षत्र यक्त नोमीके दिन
|| प्यक इच्छसे पावंतीका ¶जन करनेसे सव भोग ओर फठकी भानि होती है ॥ ४० ॥ आश्िनशुद्धा नवमीमे देवीकी पूजा सम्पुणे इष ६
फृठकी देनेवाढा है, अथवा आदित्यवारको रुष्णपक्षकी चुतुदंशीमं ॥ ४१ ॥ 4
| आदीनक्षत्रम तथा महाआाद्रौये शिवपूजा विशेष कलदायक है । ओर भाषङष्णदतुर्दशीको शिदयूजा सव षनोरथोके फलकी दनेदाटी है ¦
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॥ ४२॥ आयु करनेवाली मृत्यु हरनेवाली मलुष्योको सब सिद्धि देनेवाली हे जयेष्मारमे भी स्सयक्त आद्रि चतुदशीके दिन शिवपूजा करे
॥ ४३ ॥ अथवा मागशीर्षे आद्रा नक्षत्रपे पोडश उपचारसे उन उन सूर्तियोमं जो शिवका पूजन करते है उनके चरणोको रसे ॥ ४ ॥
शिवजीका यजन भोग भोर मोक्षा देने वाला है, ओर वारादिके देवताओंका कािकमे यजन करसे बडा फल होता हे ॥ ४५ ॥ कातिक
९
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मातम दि्वानोंको उचित ह फं सब देवताओंका यजन करं, दान तप जप होम ॥ ४६ ॥ षौडश उपचार ओर प्रतिमाके मंसि पुजन कर
| आद्रायांचमहार्द्रायांशिवपूजाविशिष्यते ॥ माषङृष्णचतुदश्यांसर्वाभीष्टफलग्रदा ॥ ४२ ॥ आयुष्करीसृत्युदरासर्वसिद्धिकरी
तृणाम् ॥ ज्यष्ठमासेमहाद्याचदैशीदिनेपिच ॥ ४२ ॥ मागशीषदरिकाथांवाषोडरौरूपचारकैः ॥ तत्तनपातिशिवपूज्यतस्यतै
पाददशनम्॥ ४४ ॥ रिवस्ययजनजेयभोगोकषपरद॑नृणाम् ॥ वारादिदेवयजनंकातिंकेहि विशिष्यते ॥ ४५ ॥ का्िकेमासि
¢ सप्रातिसवान्देवान्यजेदृबधः ॥ दानेनतपसाहोमेजेषेननियमेनच ॥४६॥ पोडशेर्पचारेशवषतिमाविपरमंजकैः ॥ ज ह्मणानां भोजने
¢ ननिष्कामातिकरोभवेत् ॥ ०७॥ कातिंकेदेवयजनंसर्वभोगपदंमवेत् ॥ व्याधीरनाहरणंचेवभवेदूतगरहक्षयः ॥ ५८ ॥ कार्तिका
दित्यवारेषुनृणामादित्यपूजनात् ॥ तेरकापसदाना्तभवेत्छष्ठादिसंक्षयः ॥४९॥ हरीतकीमरीचीनावक्च्षीरादिदानतः ॥ बहप
४ तिष्ठयाचेवक्षयरोगक्षयोभवेत् ॥ ५० ॥
¢ निष्काम् कामक्रोधादिरहित बर्मणोको भोजन करावे तो सब दुःख दूर हो जाते है ॥ ४७ ॥ कातकं स पूजन सम्पूणं भोगोंका देनेवारा
६ || है, व्याभियोका नाश भौर भूत हका क्षय पूजने होता है ॥ ४८ ॥ कारिकां आदित्यवारके दिन जो भवुष्य आदित्यका पजन करते
||ह ति जौर कपास आदिका दान कृते है, उनका कठोग नाश हो जाता है ॥ ४९ ॥ हरीतकौ ( हरै ) भिर वलन ओर दूषक दानरे
२५॥ ओर बरहप्रतष्ठसे कषयरोगका मी नाश होजाता है ॥ ५० ॥
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शि° | | दप ओर सरसोके दाने अपस्मार से क्षय होजाता ह जो ऊक्तिका नक्षत्र युक्त सोमवार के दिन शिवका पूजन करते है ॥ ५१ ॥ नकं
॥३१९॥|| महादास्थि भी नष्ट होते है ओर सब सम्पत्ति भिरती है गृह कषत्रादिका दान ओर गृहकी सामी आदि दान करनेसे सव सम्पत्ति होती टै
ठ ॥ ५२ ॥ करिका नक्षत्रयुक्त मंगलवारके दिन स्क॑दका पूजन करनेते ओर दीप धटादिके दानपते मल््योको सव भकारकी सिद्धि हती ह,
¢ ओर वाकूसिद्धि शीघ होती है ॥ ५३ ॥ रुतिका नक्षवयुक्तं बुधवारके दिन विष्णका पूजन करसे ओर दही चाव दान करनेसे
सतानकी भाष्ति होती है ॥ ५४ ॥ जो रत्तिकायुक्त यरूवारक दिन धने ब्ह्माजीका पूजन करते ह ओर शहद् सुवणं घृतक दान करते है, उनको
४ दीपसर्षपदानाज्चअपस्मारक्षयोभवेत् ॥ कत्तिकासोमवारेषुशिवस्ययजनंनृणाम् ॥ ५१ ॥ महादारि्यशमनंसर्वसंपत्करंभवेत् ॥
गरदक्षत्रादिदानाच्चग्दोपकरणादिना ॥ ५२ ॥ कत्तिकाभौमवारेषुस्कंदस्ययजनान्तृणाम् ॥ दीपघंटादिदानाद्वैवाकिपद्धिरचिरा
ट दवेत्॥ ॥ ५२ ॥ कृत्तिकासौम्यवारेषुपरिष्णोवैयजनंनृणाम् ॥ दध्योद्नस्यदानंचसत्संतानकरभवेत् ॥ ५४ ॥ कृतिकागुरवा
ट| सेषु्रह्मणोयजनाद्नैः ॥ मधुस्वर्णाज्यदानेनभोगवृद्धिभंेन्वृणाम् ॥ ५५ ॥ कृत्तिकाश्चकवारेषुगजकोमेडंयाजनात् ॥ गंधपुष्पा
| त्रदानेनभोग्यत्द्धिभैवेन्तृणाम् ॥५६ ॥ वैध्यासुपुरर॑रुभतेस्वर्णरोप्यादिदानतः॥ कृत्तिकाशनिवारेषुदिकंपालानां चवेदनम् ॥५७॥
‰|| दिम्गजानांचनागानां सेतुपानां पूजनम् ॥ अयंबकस्यच्ढस्यविष्णोःपापदहरस्यच ॥ ५८ ॥ ज्ञानदंब्रज्मणश्चव धन्वैतर्थश्विनो
. ४ स्तथा ॥ सोगापमृ्युहरणं तत्कारम्याधिशांतिदम् ॥ ५९ ॥
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४
वि°सं०१ ||} | मोगसिद्धि होती है ॥ ५५ ॥ रुत्तिका शुक्ररवारकै दिन गणेशजीका यजन करने ओर गन्ध दुष्प अन्नदानसे भदुरष्योको भोगकी वृद्धि
अ० १६ ||| होती ह ॥ ५६ ॥ सुवणं ओर चंदीके दान करने वध्याके भी एव होता है, छ्तिका नक्षज युक्त शनिवारकै दिन दिक्पारटोका वंदन
पूजन करना चाहिये ॥ ५७ ॥ दिग्गज नाग॒ ओर मयादं पारुकोका पूजन करना चाषे; भ्यम्बकर्व्र॒ ओर पापहारी विष्णका
॥ ५८ ॥ ज्ञान देनेवाठे बक्षाका धन्वेतरि अश्विनीकुमारका पजन रोग ओर अपशृ्युका हरनेवाखा है; ओर व्याधिको तत्का शा
रन ०4004 =
| करता है ॥ ५२ ॥ सुवणं लोहा तेर उदके दानसे सोढ भिरच पीपर गं ओर जर्दानसे ॥ ६० ॥ दुग्धादि धान्यादिको सोह पठात्मक्
६ | प्रुथ धनके स्यम दान करने ओर उषःकाठमं पूजन करनेते ॥६१॥ शिवादि किं्ली देवताका पूजन करे तो करमसे सिदध पराप्त होजाती
& है शाखि अन्न ओर नैवेय यह हविके अष्ट पदाथ है ॥ ६२ ॥ ओर अनेक भरकारका नैवेय धलुके समं दनेसे महाफ होता हे मागेशीरषमं
|| नदान करनेसे सव मनोरथ पूणं होते ई ॥ ९३ ॥ पापक्षय इषिदि आरोग्य धम्मं सम्यकू पकार वेदाथका ज्ञान सत् अलष्टान ॥ & १, ॥
# दोनों छोकमें अनेक प्रकारके योग्य ओर अन्तमं शाश्वत योग वेदात ज्ञानकी सिद्धि भागेशीषमं अन्नदानसे होती हं ॥६५॥ मागेशीरषं महीनेमे
¢| रवणायसतैलानांमाषादीनां चदानतः ॥ भिकटफलगेधानांजलादीनांचदानत्ः ॥ ६० ॥ द्रवार्णाकठिनारनाचप्स्थेनपरमानतः॥
| स्वगपाप्तिधरमसिहयषःकाठेचपूजनम् ॥ ६१ ॥ शिवादीनांचसरवेभांकमादेसवैसिद्धये ॥ शास्यत्तस्यदविष्यश्यनैवे्ंशस्तश्
ए =यते॥६२॥विविधात्नस्यनेवेद्यंधनुर्मासिविशिष्यते ॥ मार्गशीषैऽत्रदस्येवस्वमिष्टफलंभवेत् ॥.६३ ॥ पापक्षयंचेषठसिद्धिचारोग्यं ,
| धर्ममेवच ॥ सम्बम्ेदपरिजञानसदवषठानमेवच ॥ ६४॥ इहाु्मद(मोगानंतेयोगंचशाश्वतम् ॥ वेदातज्ञानसिद्धिचमागशीषा
ट तरदोरभेत् ॥ &« ॥ मार्गशीषट्यषः कलदिनत्रयमथापिवा ॥ यजेदेवान्भोगकामोनाधल्वुमांसिकोभवेत् ॥ && ॥यावत्सषगवं
&| काठं॒धलर्मासोविधीयते ॥ धलमसिनिराहारोमासमातरजितेदरियः ॥ ६७॥ आमध्याह्नजपेद्धिभोगाययीविदमातरम्॥पंचाक्षरादि
कान्मंतान्पश्वादासतिकंजयेत् ॥६८॥ ज्ञान॑रब्ध्वाचदेहतिविप्रोषुक्तिमवाप्वुयात्॥ अन्येषानरनारीणांिःस्ञानेनजपेन च ॥६९॥
५ तीन दिन उषःकाटमेही मोगकी इच्छावाढा देवतार्ओंका पूजन करे परंतु धनकी सक्रांति न बीतने दे ॥ ६६ ॥ जवतक दृस्री संकराति न
|| आवे तवतक धु मास रहता है, धी संकांति महीनेम निराहार जितेदिय होकर ॥६७॥ एक भाप्षपर्यैत भध्याहतक गायत्रीका जप करता
|| है ब्राह्मणको यही गायत्री जपनी चाहिये, यह वेदोफी माता है, पीठे निद्रा अनेतकं प॑चाक्षरादि मका जप करता रहे ॥ ६ < ॥ एषा
‰॥ करते ब्राहमण ज्ञानको प्राप्त हो देहान्तमे सक्त होजायगा, ओर नर तथा नारिथोंको तीनकार ज्ञान ओर जप करने ॥ ६५ ॥
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तदा पंचाक्षर मंत्रकाही जप करना चाहिये, इससे विशुदध्ञान भरा होजाता है, अपने इषटम्ोका जप करे तो महापातक क्षय होजाते ई
| | 8 मर 1. ६९
॥४०॥|||॥ ७० ॥ षनके खय होने विशेष कर उस्मां महानेवेय पूजन करे, पान्य तंड्र एकमा, भिरच काटी एक मस्थ ~ । ओर आग् ||
ठ कहे हृए सब शणनमे बारह गुणा करने चाहिये, शहद ओर षी पावभर भग द्रोण ( १६ सेर ) भ्र ओर बारह व्यंजन ॥ ७२ ॥ पृते
ठ उतारे एए भोदक शाढी आदि बारह अन्न दही ओर दृध बारह सेर ॥ ७२ ॥ तथा नारियठ फर्क गणना करके बारह कक (सुपारी) ४
सदापंचाक्षरस्थेवविश्दधज्ञानमाप्यते॥ इष्टमन्बान्सदाज्वामहापापक्षयलभेत् ॥ ७० ॥ धलुमौसेविशेषेणमहानैवेयमाचरेत् ॥ १ ।
¢ शालितंइलभारेणमरीचरस्थकेनच ॥ ७१ ॥ गणनाद्यादशंसर्वमध्वाज्यङुडवेनहि॥। दोणयुकतेनघुदवेनद्वादशब्यंजनेनच ॥ ७२ ॥ ||५
घृतपकैरपूषेमोदकेःशालिकादिभिः ॥द्ादशेधदधिक्षीरेदांदशप्रस्थकेनच॥७३॥ नारिकेरुफलादीनांतथागणनयासदह ॥ द्वादश ¢
¢ कसुकवक्तपर्भिशत्पजकेरयुतम् ॥७४॥ कपूरखुरद्रणेनपचसोगधिकैय॑तय् ॥ ताबू्यक्तंत॒यदासदानैवे्यरक्षणम् ॥७९॥ महानेव |
ट| अमेतददवताषणपूर्वकम् ॥ वणालुकरमप्वेणतद्वक्तेम्यःपरदापयेत्॥७६॥एवचौदननेवेबाद्मोराष्पतिभेवेत्॥ महानैवेयदानेननरः |©
ट| सखर्गमवाप्व॒यात्॥७७॥महानेवेयदनिनसदसेणद्िज्षभाः ॥ सत्यलोकेचतदछोकेरणमायुराप्ठयात् ॥ ७८ ॥ सदस्राणांचधिश ¢
| त्यामहानैवेयदानतः ॥ तदृध्वरोकमाप्यैवनपुनजन्मभागभवेत्॥ ७९ ॥ ५
„ |£ ||से युक्त ३६ ठततीस ताम्बूखके पत्र ॥ ७४ ॥ कपुर ओर शुरनाभवृक्षका चरणं ओर इायची कंको ठर्ंगषष्य जायफल यह पोच सुगेधि ओ
विं ०¶ || || त्र यह महा नैवेयका ठक्षण है ॥७५॥ यह महानैदेय देवताको अर्पण करके दर्भके अलुपतार करमते उन देवताोंके क्ोको इतका राद
अ०° १६ ||! ||बौरना चाहिये ॥७६॥ इ प्रकार भात ओर नेवेथके दानत पृथ्वीके राज्यकी धारि होती है, महानैवेयके दानते मनुष्व स्वरगोकको जावा ३ &
ह ||॥७७॥ हे बाहणो ! सहल महानेवेयके दानसे सत्यरोक निवास ओर षूं आयुकी भाप होती है ॥७८॥ जो तीससह् महानैवेयदान करते बह &
ऊष्वटोकको भाप होकर फिर संसारम जन्म नहीं ठेते ॥ ७९ ॥ छतत सहस्च महानेवेयको जन्मनैवेय कहते है, उतने नैवेयका दान | ट
कृहलाता है ॥ <° ॥ महापूण शिवका नेवेय जन्मनैवेय कहाता है, जन्मनेरेयके दानसे ऽनजेन्म नहीं होता ॥ ८१ ॥ कातिकमाके पवित्र ट
दिनम जन्मनवेयका विधान् करे उस दिन सेकरंति व्यतीपात जन्मनक्षत्र अथवा पूणेमा्ती हो ॥ ८२॥ अथवा वर्ष जन्मदिनम जन्भनैवेष कर ट
अथवा दूसरे महीनोमिं अपने जन्मनक्ष् ओर पृणेयोगदिनमे ॥ ८३ ॥ अथवा एण्य योगोके सेयोगमे अथवा शनिके योग होने उतनेही सहस्र ट
नैवेय दे जन्मनेवेयके दानते जन्मा्पणके फठ्की भाति होती है ॥ ८४ ॥ जन्मार्पणसे प्रसन्न हो शिवजी अपनी सायुज्य॒क्ति भदान करते ह ©
सहस्राणां चपृट््िशनन्मनव्मीरितम्॥ ताक्तरवेयदानेतुमहापूरणतडुच्यते॥८०॥महापूर्णस्यनेयंजन्मनेवेयमिष्यते॥ जन्मनैव ` ट
द्यदानेनपुनजेन्मनविद्यते॥८१॥ उतजैमासिदिनेपण्येजन्मनेवे्माचरेत्॥ संकांतिपातजन्मक्षपौ्णमास्यादिसंशुते॥८२॥ अब्दल ठ
न्मदिनेकुर्यानन्मनेवेचसत्तमम् ॥ मासांतरेषुजन्मक्षपूणयोगदिनेपिच॥८२॥ मेकनेचशनेर्वापितावतसाहमाचरेत् ॥ जन्मनैते टू
यदानेनजन्मा्पणफललभेत्॥।८७॥ जन्मार्पणाच्छिवः परीतःस्वसाशुज्यददातिदि॥हदंतन्जन्मनवेधंशिवस्यैवपरदापयेत् ॥ ८५ ॥ ट
योनिरिगस्वह्पेणशिबोजन्मानिङ्पकः॥ तस्माज न्मनिवर्यर्थजन्मपरूजाशिवस्यहि ॥८६॥ प
(द बिदुनादात्मकंसर्वजगत्स्थावरजं
गमम्॥ विङःशक्तिःशिवोनादःशिवरक्तयात्मकंनगत् ॥ ८७ ॥ नादाधारमिददिदुविदराधारमिदैजगत् ॥ जगदाधार्भरतौहिषि
दुनादौव्यवस्थितौ ॥ ८८ ॥ विदुनादयु्तसवैसकलीकरणंमवेत्॥ सकलीकरणानन्यजगत्पाप्नोत्यसशयः ॥ ८९ ॥
पह जन्पनेवेय शिव्रकोही देना उचित है ॥ ८५ ॥ योनि ओर गक स्वपे शिवही जन्पके देनेवाछे हँ इ कारण जन्पनिष्त्तिके निभितत
जन्मनषेयते शिवकीटी पूजा करे ॥ ८६ ॥ सव स्थावर जेगमासक संसार बिंदु ओर नादहप् ३, विदु शक्ति, शिव नाद रप् है इष्त भकार
|| |वह जगत् शिव ओर शक्तिभासक है ॥८७॥ नादे आधार विदु ओर विंदुके आधार जगत् ओर जगदे आ
धार विदु ओौर नाद स्थित
# (है ॥ ८८ ॥ ओर बिन्दु नाते यक्त होकर यह सरव कठति मिता है, मिनेतेही निन्दे इत जगतूकी उसि होती ह ॥ ८९ ॥
न=
शि° | बह बिंदुनादात्मकं रिगही जगत्का कारण है, बिद् देवी शिव नाद है इती भकार टिंगरूप शिव है ॥९०॥ इसी कारण जन्म निनृर्तिकं अर्थ
॥४१॥ ||| शिवर्टिगकी पूजा करनी चाहिये, बिंदुरूप देवी माता ओर टिंगरूप शिवही पिता है ॥ ९१ ॥ माता पिताक पूजन करनेसे परमानन्द्की भाषि
¢ होती है, परमानन्दकी भाभिके निभित्त शिवरिगा पूजन करना चाहिये ॥९२॥ वही देवी जगत्की माता ओर शिव जगतकै पिता ई, जौ इन
|| मावा पिताक पूजन करते है, उनके ऊपर पार्वतीपरमेश्वर बडी कपा करते हँ ॥९२॥ हे खनिग्रे्टो ! छपा करतेही पूजन करनेवाटेको रेश्वयं पदान्
ठ करते है इत कारण रेश्वयं ओर ज्ञानके निभित्त उनका पूजन करे ॥ ९४ ॥ हे सनिशरषठ । पिता माता स्वरूप शिव ठिंगकी नित्य पूजा करे, भगं
¢ बिदुनादात्मकंखिगंजगत्कारणमुच्यते॥ बिदुदेवींशिवोनादःशिवरिगंतुकथ्यते ॥९०॥ तस्माजन्मनिदृत््य्थशिवर्िगगरपूजयेत् ॥
मातादेवीषिदुरूपानादरूपः शिवःपिता॥९१॥ पूजिताभ्यां पितभ्यांतुपरमानंदएवहि ॥ परमानंदलाभाथशिवखिगंभरपूजयेत्। ॥९२॥
| सादैवीजगतांमातासशिवोजगतःपिता ॥ पिषोःशयुश्रूषकेनित्य॑कृपापिक्यदिवधते ५॥९३॥ कृप्या तगेतेश्वर्यपूजकस्यददातिरि ॥
ह|| तस्मादंतरीतानंदलाभार्थघनिषगवाः॥९४॥ पित्रमातृस्वख्पेणशिवखिगंपरपूजयेत्॥ मर्गः पुरूषड्पोदिभर्गापरकृतिङ्च्यते ॥ ९५ ॥
द| अव्यक्तातरधिषठानंग्ःपुरुषउच्यते ॥ स॒ब्यक्तातरधिष्ठानेगभः भतिर्यते ॥९६॥ पुरुषात्वादिगरभोदिगर्मवाचनकोयतः ॥
¢ पुरुषात्पकृतोयुक्तप्रथमंजन्मकथ्यते ॥९७॥ प्रकृतेव्यक्ततांयातंद्वितीयजन्मकथ्यते॥ जन्मजतुशरत्युजन्मपुरूषात्परतिपद्यते॥९८॥
¦ अन्यतोभाव्यतेऽवश्यमाययाजन्मकथ्यते ॥ जीयतेजन्मकालादत्तस्मानीवइतिस्परतः ॥ ९९ ॥
वि° ०१|| परुषरूप ओर भगा ्रकति कहराती है ॥९५॥ उनके अन्तर रहनेषाठे क्ष्य उपादन गर्भको परुष कहते है ओर यक्तं महत्तसवादिके अन्तर रहने
, अ० १६ ||| वाटे गभको भरकति कहते ह ॥ ९६ ॥ आदि गर्भं पुरुषही प्रकतिरूप गं सम्बध गरभवाङा होता है, इससे बह उत्पन्न करनेषाठा है परुषे
|| भकुतिमे प्रथम जन्म होता है ॥ ९७ ॥ प्रकतिसे पग रूप होनेते दृक्षरा जन्म होता है यह जीव रुषसेही मृत्यु ओर जन्मको भ्रा होता
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ह ॥९८॥ प्रगट किया जाता है उतपन्न किया जाता है ओर मायासे जन्म भाष करिया जाता है, जो जन्म ओर काठादिते जीर्ण हो उसे जीष |
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ह कहते ॥९९॥ जन्म होतिही पाशे बध जाताहै, इससे जीव कहलाता है, जन्म ओर पाशसे निवृत्त होनेके निमित्त शिवरिगकी पुजा करे॥१००
( भ वृद्धिको ( गच्छति ) भप्त होताहै, जिसमे इस कारण उसे प्रूति कहते है, प्रकत शब्द मात्रादिकोते दंद्रिय भोग कारणस ॥ १०१ ॥
ट जो यह ( भग ) प्रकृतिका है, इसीकते मोग कहाता है, यही भग शम्दका शब्दाथे है खरूय भगप भ्रकतीते है, ओर भगवान् गिव कहटाते है
ट ॥ १०२ ॥ भोगदाता भगवानही है, ओर भोग देनेवाढा दूरा को नहिं है, भगवान् भगके स्वामी ह भे कहलाते है ॥ १०३ ॥ भगसहित
ह ङग ओर रिगसहित भग यही दोनों भोगके निमित्त ओर नित्य भोगके निमित्त है ॥ १०४ ॥ छिगरप भगवान् शिवका पजन करे उसटो
ह|| जन्यतेतन्यतेपाशेजीशब्दार्थएवरि ॥ जन्मपाशनिवृत्यथजन्मङ्गंप्रपूजयेत् ॥ १०० ॥ मं वृद्धि गच्छतीत्यर्थाद्गः्रकृति
| शुच्यते॥ परकृतेःशब्दमा्ायेःप्राृतेद्वियभोजनात् ॥ १०१ ॥ भगस्येदभोगमितिशब्दार्थोुख्यतःशतः ॥ सुख्योभगस्तुषक
| तिर्भगवाच्छिवडच्यते ॥१०२॥ भगवान्भोगदाताहिनाऽन्योभोगपरदायकः ॥ भगस्वामीचभगवान्भर्गहत्युच्यतेडुधेः ॥१०३॥
ह| भगेनसदितंटिगंभगंर्गिनसयुतम्॥ इहाशजचभोगार्थनित्यभोगार्थमेव च॥१०४॥ भगवेतंमहादेषं शिविगंप्रपूजयेत् ॥ लोकम
है| सवितासूयंस्तचिहव्रसवाद्रवेत् ॥ १०५ ॥ लिगेषस्ूतिकतरिंङिगिनंपुरूषोयजेत् ॥ खिगार्थगमकंचिहवंहिगमित्यभिधीयते
| ॥ १०६ ॥ लिगमर्थदिपुरुषृरिवेगमयतीत्यदः ॥ शिवशक्त्योश्चविहस्यमेलनंखिगश्ुच्यते ॥ १०७॥ स्वचिहवपूजनात्परीतथि
ह|| हका्य न वीयते॥ चिहकार्यतुजन्मादिजन्माशविनिवर्तते ॥ १०८ ॥
ह|| कमे उतपन्न करनेवाठेका चिद होनेसे ओर रोक उत्पन्न करनेसे स॒र्यका नामभी भग है ॥ १०५ ॥ ङिगहपमे जगतुके उत्पन्न करनेवाछे
|| शिवजीका यजन करे दिग अथंम जानेवाखा चिह्न ठिग कहलाता है ॥ १०६ ॥ ओौर दिग
चिदहधके मेखनका नाम टिगहै ॥ १०७ ॥ शिवजी अपने चिहनके पूजन करमेते पसनन होजाते
ट काये जन्मादि है इस चिहयके पुजन करनेते जन्मादि निवृत्त होजाता है ॥ १०८ ॥
अथेमे पुरूष शभे जानेवाखा है शिवशक्तिके
हँ इससे चिकाय नहीं भात होता किन्तु चिह्न
` छ
शि ७यु
॥8 २॥
कत्य उर्षोकोभी बाह ओर आभ्यन्तर ङिगको षोडश उपचार से पूजन करना चाहिये ॥ १०९ ॥ इस प्रकार आदित्यवारकै दिन पजा
|| कृरनेसे फिर जन्म नहीं होता, आदित्यवारकै दिन महा्िगका ऊकारपूर्वक पूजन करे ॥ ११० ॥ आदित्यवारके दिन प॑चगव्यते शिवजीक
|| स्नान करावे गोबर गोमूव क्षीर दही धरत यह पच वसतु पचगव्य कहठाती है ॥ १११ ॥ क्षीरादि एथक् स्नान करावे शहद गननेका रस
ओर गौके दूते अन्ननवेय बनाकर ओंकारपवक चावे ॥ ११२ ॥ प्रणवकी ध्वनि ठग है, विदुटिग यत्र है नादटिग स्वयंभू है उत्तमं मकार
¢ भतिष्ठित है ॥ ११३ ॥ उकार चरर्िग है, अकार यर शरीर है, इस भकार षट् टिगकी पूजा करनेसे निःसन्देह यह प्राणी जीवन्छ॒क्तं हौजाता
| भकृतेःपरषेशापिबाह्यभयंतरसंमवेः॥ पोडशेरूपचारेश्कषिवरिगमूजयेत् ॥ १०९ ॥ एवमादित्यवािदपूजाजन्मनिवतिंका॥
४ आदिवारेमहाङिगंरणवेनेवपूजयेत् ॥ ११० ॥ आदिवारेपंचगभ्येरमिषेको विना
¢ ॥ १११ ॥ ्षीरात्रचप्रथक्च्चेवमधुनाचेश्चुसारकैः। गन्यक्षीरत्नेवयधणवेनैवकारयेत् ॥ ११२ ॥ प्रणरवध्वनिरिगंतुनादलिगंस्व
¢ यथुषः ॥ बिदरखिगंतुयंजंस्यान्मकारतुप्रतिषठितम् ॥११३॥ उकारंबरगंस्यादकारंय्विग्रहम् ॥ षड्खिगंप्ूजयानित्यजीवन्घु
्तोनसंशयः ॥ ११४॥ शिवस्यभक्तयापूजादिजन्मुक्तिकरीवृणाम् ॥ रुदक्षधारणात्पादमधवैधूतिधारणात् ॥११५॥ निषादं
मंजजाप्याचपूजयापू्णभक्तिमार् ॥ शिवलिगंचभक्तंचपूज्ययोक्षलभेन्नरः ॥ ११६ ॥ य इषं परठतेऽध्यायंश्रुणुयाद्रासमाहितः ॥
तस्यैवशिवभक्तिश्ववर्धतेसुहदा द्विजाः ॥ ११७ ॥ इतिश्रीशिवमहाएुराणे वियेश्वरसंहितायां षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
००१९ ह ॥ ११४॥ भक्तिूवक शिवकी पूजा करनेसे मलुष्य जन्मभरणसे क्त होजाता है, रदाक्ष धारण करनेसे सौथाई, विभूति धारण करनेसे जआधी
अ= १६॥६|॥ ११५ ॥ मंत्र जपनेते पौन, ओर पूजाति परणं मक्तिमागु होता है, शिविग ओौर उनके भक्तको पूजकर मलुष्य सक्त होजाता हे इसमे सन्देह
४ नहीं ॥ ११६ ॥ जो इस अध्यायको पढते वा सावधान होकर सुनतेहँ हे बाह्षणो ! उसकी शिवम हदभक्ति होती ह ॥ ११७ ॥ इति श्रीशिव
५ परहाएराणे दिदेश्वरसहिताभाषारीकायां षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ । ।
९4 + > ज ज > 4 9-46९-03
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् बोरे हे अने 1 भणवका माहात्म्य ओर षदूठिगका माहात्म्य ओर शिवभक्तकी पूजाका विधान करभे आप हमसे कहिये ॥ १ ॥ सतजी
¢ बोरे आप् महात्मा तपस्वियोनि अच्छा श्न किया है इसका उत्तर एक महादेवजी जानते हँ दूरा नहीं ॥२॥तोभी मै शिबजीकी रुपात |
|| हू रिष हमारी ओर वमहारी सन भकार सेर्षा करं ॥ ३ ॥ भणवका अथ कहते, ह (भर) परकतिसे उतपन्न हए संसार स्ागरको (नवम्) नौकारूप ४
४ है इसी कारण पंडित इसको प्रणव कहते द ॥ ४ ॥ अथवा (पर) प्रपच (न) नहीं है (व) तुममं अर्थात् आत्मामं कुछ प्रपंच नहीं हे, यह प्रणवका
४ अभे है, अथवा भरृषटताे जपने वाठेको मोक्ष देता है, इस कारण इते प्रणव कहते ह ॥ ५ ॥ अपने जप करनेवाठे योगियोको ओर् अपने भत
|| जपयजः ॥ प्रणवस्यचमाहात्म्य॑षदूर्छिगस्यमहासुने ॥ शिवभक्तस्यपूजां चक्रमशोग्रूहिनः प्रभो ॥१॥ सूतउवाच॥तपोधने्भवद्धि
श्सम्यकम्रश्नरत्वथकृतः॥।अस्योत्तरंमहादेवोजानातिस्मनचापरः॥२॥अथापिवक्येतमदंशिवस्यङ्ृपयेवहि।॥ शिवोऽस्माकंचयष्मा
|| करकषग्रहाठधरिशः ॥३॥ प्रोरिभरकृतिजातस्यसंसारस्य महोदधेः ॥ नरवना्वातरमितिभणरवविदर्बधाः॥8॥ भःभपंचोननास्तिवो
युष्माकप्रणवंविदुः ॥ प्रकषेणनयेद्यस्मान्मोक्षवःप्रणवंविडः॥९ ॥ स्वजापकानांयोगिनास्वभेनप्रजकस्यच ॥ स्क्कषयंकृत्वा
४ दिव्यज्ञानतुनूतनम् ॥ & ॥ तमेवमायारदितेनूतनेषरिवचक्षते ॥ प्रकर्षेणमहात्मानेनवशञुद्धस्वरूपकम् ॥ ७ ॥ तरूतनंवैकरोतीति
प्रणव॑तविदुबधाः ॥ प्णवंदविविधपोक्तसुश्मस्थूलविभेदतः॥ ८ ॥ सृक्ष्मेकाक्षरविदयात्स्थूरंपचाकषरंविडुः ॥ स्ममव्यक्तपंचार्णं
५ सुव्यक्तार्णतथेतरत् ॥ ९ ॥ जीवन्युक्तस्यसृक्ष्मंहिसवंसारंदितस्यहि ॥ मेचेणार्थाबुसंधानंस्वदेडपिख्यःकदधि ॥ 5० ॥
पूजन करनेवारोको शब कर्म क्षय करके दिव्यज्ञान देने प्रणव कहढाता है ॥ ६ ॥ भायारहित होनेसे षणव फ़ नूतन कहते ई भकर्षतासे
|| महातमा ओर नया शुद्ध स्वहप कर देता है ॥ ७ ॥ ओर तूतनकर देनेेही पंडित इको भणव कहते है स्थूरु सक्षम भेदे वण दो भकारका
ह|| है ॥ < ॥ एकाक्षर यक्ष ओर पंचाक्षर स्थढ हे खक्ष्मरप अश्यक्तं अर्थात् भगट पेचाक्षराखा है ओर स्थर परगट पचार युक्त है ॥ ९ ॥
त
१
ह
जीवन्य॒क्तके निमि्सबका सार सक्षमरूप है यही उकाहित करनेवाखाहे चकै अदंषान ओर अपने देहा तमे दहह रपकरना सषटम उपास्तनाहे ॥१०॥
१५ ¦
| ट इस्त भका उपासना-करेसे देहान्तमे शिवरूप हो जाता है इसमे सन्देह नहीं ओर त मन्त्रका जपनेवाा योगको भ्रा होता है ॥ ११॥
॥४३॥ || छत्ीस करोड मन्व जपनेवाछा योगी हौ जाता है इसमे सन्देह नही, सक्षम भी हस्व दीक भेदसे दौ भकार हं ॥१२॥ अकार् उकार् मकार
त विदुनाद सहित (अर्धचन्द्र विदुस वणं ओर मत्रारहित) ओर शब्दकारकठासे युक्त ॥ १३ ॥ (उम्) इन तीन अक्षर मात दी प्रणव
कहठाताहै यह योगियोके हृदयम निवास करता है ओर आउ मू इन तीन् अक्षरमात्रका हस्वप्रणव कहाता हे ॥१४॥शिव ओर शक्तिकी एकता
ट| नेते मकार विता त्मक अर्थात् तीनों तस्व स्वप है, सव पाप दूर होनेकी इच्छा करनेवाोको हस्व भणवका जप करना चाहिये ॥१५॥
ह|| स्वदेहेगितिषूणशिवंमाप्नोतिनिश्वयः॥केवंमंचजापीतुयोगंभराप्नोतिनिश्वयः॥9 9षटविशत्कोटिजापीतुनिशर्ययोगमाप्ठुयात्॥
| सृष्ंचदिविधञेयदस्वदी्विभेदतः॥१२॥अकारश्वउकारश्वमकार्ततःपरम् ॥ विुनावयुतंतद्िशब्दकारकलान्वितम् ॥१२॥
\ दीधप्रणवमेवहियोगिनामेवडद्रतम्॥ मकारंतंत्रितच््वदिष्स्वपणवउच्यते॥१७॥ शिवःशक्तिस्तयोरैकंयं मकारंतुत्रिकात्मकम्॥ हस्व
| मेवंहिनाप्यस्यास्सर्वपापक्षयेषिणाम्॥१५॥भूवायकनकारणोचयोःशम्दायाश्चतथादश॥ आशान्वयेदश एन ृतताइतिकथ्यते।। १९॥
|| हवस्वमेवप्वत्तानानिषत्तानातुदीरधकम्॥ भ्याहत्यादौचमं चादौकामशन्दकलादुतम्॥ १७ ॥ बेदादौचव्रयोज्यस्याद्र॑दनेसंध्ययोरपि ॥
||| नवकोर्जिपाजघ्वासंशदःपरुषोमवेत्॥ १८पुननवकोटयातुष्रथिवीजयमाप्ठयातूपुनश्ननवकोटचयातुयपाजयमवाप्ठयात्१९॥
पृथ्वी वायु तेन जठ आकाश ओर शब्दादि ओर दशदिशाकै सम्बन्ध हौनेसे दश उरूष वृत्तिमार्गमे धृत है ठेसा कहा जाता हे शब्द स्पशीदि
वि ०६०१ || || विषयगुक्त पणी संहारय पडते ह इते भिन्न निनृत्त हीत है ॥ १६ ॥ जिनकी संसारे भ्दृत्ति हे उनको हस्व ओंकारका जप करना चाहिये
अ० १७|| || ि्रत्िकी इच्छावारोंको दीषेका जप करना चाहिये जो यथेच्छशब्दकलायुक्त प्रथम वणेनकर चुके है ॥१७॥ वेदकी मादिमे परमथ |
| भ्रयोग करना चाहिये दोनों संध्यादंदनमेही ॐकारका प्रयोग करना, नौकरोड जप करने परुष शुद्ध
ि हो जाता है ॥ १८ ॥ नवकरोड
$| का जय करनेसे पृथ्वीका जय होत है फिर नौकरोद जपसे जर्का ॥ १९ ॥
क क
(~ ज्ज
पीछे नौकरोढते तेजका फिर नौकरोडते वायुका फिर नौकरोड जपते आकाशका जय होता है ॥ २० ॥ फिर क्रमसे नौ नौ करोड /
| फिर नौकरोड जपे अहंकारका जय होता है ॥ २१ ॥ नित्य सहस यंत्र जपने पुरूष नित्य शुद्ध रहता है, इपके उपरान्त हे ऊ
ब्रह्मणो ! फिर आत्न्ञानकी सिद्धिसे निमित्त जप होता ह ॥ २२ ॥ इस भकार एकौ आढ करोड जप कलेत्े ॐकारसे प्रबुद्ध हो शुद्ध ठ
योगको भप्त होता है ॥ २३ ॥ शुद्ध योगसे जीवन्छ॒क्तं होजाता हे, इस संदेह नहीं पणवहूप शिवको सदा जपे सदा ध्यान करे ॥ २४ ॥ त
समाभिमे स्थित हो महायोगी शिवरूपही हो जाता ह इसमे सन्देहं नही, ऋषि छन्द ओर देवतादिका देहम रथम न्थास्न करके जप करना ¢
पुनश्चनवकोटय्यातुतेजसांजयमाप्वयात्॥ पुनश्वनवकोलातुवायोजयमवाप्लुयात् ॥ आकाशजयमाप्नोतिनवकोटिजपेन वै॥२०॥
गंधादीरनाक्रमेणेवनवकोटिजपेनवे ॥ अकारस्य चपुननवकोिजपेनवे॥२१॥ सहस्रम॑जजततेननित्यञ्चद्धो भवेत्ुमान्॥ ततःपरंस्व ट
सिद्धयथजपोभवतिदिद्विजाः॥२२॥ एवमषटोत्तरशतकोरिजपेनवेएनः ॥ प्रणवेन पबुद्वस्तुश्ुढयोगमवाप्डयात् ॥२ ३॥ योगेन ए
युक्तोजीवन्षुक्तोनसंशयः।॥ सदाजपन्सदाध्यायच्छिवं प्रणवरूपिणम्॥२४॥समाधिस्थोमहायोगीशिवएवनसंशयः॥ऋषिच्छदोदे ४
¢
्
वतादिन्यस्यदेहेुनजपेत्॥२५॥ प्रणव मातरकायुक्तदेदेत्यस्य ऋषिभवेत्॥ दशमातृषडध्वादि सर्वन्यासफठंलभेत्। २६॥ गरघत्तानां
चमिश्राणांस्थूलप्रणवमिष्यते। क्रियातपोजगेयुक्ताश्िविधाःशिवयोगिनः॥२७॥ धनादिविभवेभवकराधगेमादिभिः ॥ क्रियया ॥£
पूजयायुक्तःकरियायोगीतिकथ्यते॥२८॥ पूजायुक्तशमितथुग्बाद्यद्वियजयान्वितः॥ परद्ोहादिरहितस्तपोयोगी तिकथ्यते।।२९॥
प्रारम्भ करे ॥ २५ ॥ अड मात्रायक्त भरणवको दहमं न्या करके कषि होता हे अश आदि दशमात्रा ओर छः अध्वभागं आदि करनेते
सम्पूणं न्यास्का फल होता हे ॥ २६ ॥ सप्ताम भदत्त अथवा भवृति निग्न दो्नोफो स्थ भरणवका जप करना चाहिये क्रिया तप आओौर
जपते शिवकर योगी तीन प्रकारके है ॥ २७ ॥ धनादि देयं ओर करादि अंगोति सेवा नभस्कारादि करियापूर्वक पूजा करनेवारे क्रिया योगी
कहाते हँ ॥ २८ ॥ पूजायुक्त भोजन कएनेवाठे बहचन्दरिय जीतनेवछे पर प्रोह आदिसे रहित तप योगी कहटाते है ॥ २९ ॥
` च
नि ओर इन सव बातो युक्त सदाशुद्ध सब कामनारहित सदा जपमे तत्पर शांत चित्त जपयोगी कहलाता है ॥३०॥ षोडश उपचारसे शिवयो गियोकी
¢ जो पूजा करे वह मलष्य कमस सालोक्यादि खक्तिको पराप्त होता है ॥२१॥ हे बाह्मणो ! अब जप योग्य कहते हँ आप सुन; त क ४
ट जपका विधान है, जिस जपे इसके पाप द्र होजाते है ॥ ३२ ॥ “नमःशिवाय इस भकार यह चतुध्यन्तपदयुकत ॒प॑चतच्वात्मक त्र ५
|| सयू भणवहपही शिवका पचाश्षररूप है ॥ ३२ ॥ पंचाकषरके जपतेही मदभ्यको सथ भकार) सिद्धि भाप होती हे ओकार आदि ठगाकर
¢| सदा पंचाक्षर म॑ जप करे ॥९४॥ यके आदेशको परा हो घु्दर वज्ञ पहर परष्वयं बेकर श्क्षकी चतुर्दशी डष्णपकषकी चतुरदशीपयत |
¢| पतव्ःसदाड.स्वकामादिवभितः ॥ सदाजपपरातोनयोगीतितंिडुः ॥ ३० ॥। उपचारःोडशभिषूनयाशिवयोगि |
¢| नाम्।सालोकयादिकमेणेवडदोयुिरभेत्रः॥३३॥ जपयोगमथोयेगदत,यतद्िजा'॥ तप*कठज पोतो यजमन्परिमाजत
॥३२॥शिवनामनम र्व तच्यिंचतत्तकम्॥ स्थूलमणवरूपं हिशिवरपचाक्षद्िजाः ॥३२॥ पचकषरजपनेवसर्वसि दि लभेन्नरः
¢ परणवेनाविसंयुक्तंसदापंचाकषरंजपेत् ॥३8॥ ग॒ङूपदशंसंगम्यसुखवासेभतरे ॥ पूवपक्षसमारभ्यज्कष्णभूतावधिद्विजाः ॥ ३५॥
ध माचंभाद्विशिष्ठतसर्वकालोत्तमोत्तमम्॥ एकवारंमिताशीतुवाग्यतोनियतेदियः॥ ३६॥ स्वस्यराजपितृणां चुश्रषणचनित्यशः ॥
अ,९.५|[| ॥३८॥ वामो््थितशत्तयाचविराजतंमहागणेः ॥ शगंकधरदेववरदाभयपाणिकम् ॥ ३९ ॥
् जप करे ॥ ३५ ॥ हे बरह्मणो ! माव ओर भादंका महीना सबसे भ्ठ है एक वार भोजन करे वाणीकौ रोके जितेन्दिय रहे ॥ ३६ ॥ ¢ ६
अपने पान कलवा आर पितरोकी नित्य दुश्रूषा कनी चहिये सहल जप करने शि होती है अन्यथा ऋणी रहता है ॥ २७ ॥
ह|| पाचलाख पचाक्षर मन्त्र शिवका स्मरण करता हुआ जपे पञ्नास्ननपर स्थित कल्याणके देनेवाठे गेगा ओर चन्द्रकटासे युक्त ॥ ३८ ॥ वाम ६
>॥ ऊरुक ऊपर स्थित शक्ति ओर ग्णोसे विराजित सृगटंक धारण किये देव वरदायक तथा भभयदान देनेवाटे हाथ युक्त ॥ ३९ ॥ ५
सदा अलुग्रह करने वाठे सदाशिवको स्मरण करता हुआ पहरे षनसे शिवका पूजन कर हदयं अथवा सूर्यमडरमे पूजन कर ॥ ४० ॥ पूवको
मुखकर शुद्ध कर्म॑की इच्छासे पंचाक्षरी वियाका जप करे, प्रातःकार कष्णचतुदशीके दिन नित्य कर्थ समाप्त करके ॥ ४१ ॥ मनोरम |
| नियमसे शुद्धमन करके पंचाक्षर मंतरका बारह सहस्च जप करे ॥ ४२ ॥ ओर पतनीसहित शेवबाह्लणोका वरण करे ओौर अपने भरष्ठयारु
शिब पावती स्वहपका वरण करे ॥ ४२ ॥ ईशान, एष, अधोर वाम, सयोजातरूप पांच शिवभक्त बाहमणोंकी पूजाकर ॥ ४४ ॥ ओर उन
सदानुग्रहकत्तारंसदाशिवमनस्मरन् ॥ सप्रज्यमनसापूरवडदिवासूर्यमडले ॥ ४° ॥ जेत्व॑चाक्षरीवियां पराडखखःशुद्करमकत्॥
प्रातःकृष्णचतुद॑श्यांनित्यकमसमाप्यच ॥ ४१ ॥ मनोरमेश्चचोदेशेनियतःशुमानसः ॥ पेचाक्षरस्यमंजस्यसहसंद्ादशंजपेत्
॥ ७२ ॥ व्रथेच्चसपत्मीकाञ्छैवान्वेबाह्मणोत्तमान्॥एकंशु्वरंशिष्ठवरयेत्साममूर्तिकम्॥४३॥ ईशान॑चाथपुूषमघोरंवाममेव च॥
सद्योजातं चपचेवशिवभक्तान्द्रिजोत्तमान् ॥ ७४ ॥ प्ूजाद्रभ्याणिसंपायशिवपूजां समारभेत् ॥ शिवपूजां चतिधिवत्छृत्वाहोभंस
मारभेत् ॥४५॥ सुखतिचस्वसूत्रेणकृत्याहोमसमारभेत् ॥ दशेकंवाशतेकंवासदसरकमथापिवा ॥ ७६ ॥ कापिरेनपृतेनैवजडया
त्स्वयमेवदि॥ कारयेच्छिवभक्तेवौप्यष्टोत्तरशतेबुधः ॥४७॥ होमान्तेदक्षिणादेयायसोर्गोमिथुनतथा ॥ ईशानादिस्वहूपास्तान्थं
साबेविभाव्य च ॥ ४८ ॥ ते्षापत्सिक्ततोयेनस्वशिरःल्ानमाचरेत् ॥ षट्तरिशत्कोटितीयैषुसब्यःश्ञानफरंलभेत् ॥ ४९॥
सत्कार कर शिवजीकी पूजाका प्रारंभ करे विधिपूषेक शिवजीकी पूजाकर हवन करे ॥ ४५॥ अधिगुलव्ैत अपने सत्क असुस्षार हवन
करे दश सौ अथवा सहल्ञ ॥ ४६ ॥ आहूति कपिला गक धृतकी स्वयं अभिमे भदान करे अथवा शिबभक्तोतते १०८ आहूति दिवावे ॥ ४७॥
होमके अन्ते पूवोक्त शुको दक्षिणा दे; अथवा एक गौ एक बेर दे ओर बह पूर्वोक्त ईशानादि स्वूपके बाह्मण है उनको तथा सांबरारुको
तञानादिते सत्कार करे ॥४८॥ उनके अभिरेकते बचे जठसे आप्र ज्ञान करे, तो छती करोड तीर्थो लान कएनेका फ भिरता है ॥४९॥ |
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व 2 222
ऋ
उन्हीको भक्तिूवक दशांग अन्न दे परमेश्वरकी शक्तिकी बुद्धिस यरूपत्नीका पूजन करे, इंशानादि बाह्मणोको शिवभावनास पूजन करे ॥ 4० ॥
शक्ति अनुकार परमाननसे उनका पजनकर रुद्राक्ष वच्ञ वटकं पए आदसे युक्तं ॥५१॥ बछिदान करके बहुत भोजनका भोग रगावे फिर देवेश
की पार्थना करके जपको समाप्त करे ॥ ५२ ॥ इस्त प्रकार ष्रश्वरण करके मपय भेत्रसिद्ध होता है, किर पांच खास जप करनेते सम्पूणं पाप ट
क्षय होजाते है ॥ ५३ ॥ अतर लोके भारम्भ कर सत्यलोक पर्यन्त पांच राखके जपसे रमसे उस उस रोकके रेश्वय्यको प्राप्त होता है ॥ ५४॥
ओर जो मध्यमे ही मृतक होजाय तो ण्य भोगके अन्तमं पृथ्वी जन्म हो जाता है, ओर जापक होता है फिर पांच ठाखका जप करनेसे १
द्शागमन्नतेषविददयद्विभक्तिपूषैकष् ॥ पराबुदधयाय॒रोःपत्नीमीशानादिक्रमेण तु॥५०॥परमात्रेनसंपूज्ययथा विभवविस्तरम्॥ शद्रा
्षवश्चपू्वं चवंटकापूपकेथुतम् ॥५१॥ बखिदानेततःकृत्वाभूरिभोजनयाचरेत् ॥ ततःसग्राथ्यंदेवेशं जपंतावत्सछमापयेत् ॥ ५२ ॥
पुरथरणमेवतुकृत्वामन्वीभवेन्नरः ॥ पुनशधपंचलक्षेणस्वंपापक्षयोभवेत् ॥ ५३ ॥ अतरादिखमारभ्यसत्यलोकावधिक्रमात् ॥
पंचलक्षजपात्तत्तष्टोकेश्व्यमवाप्वुयात् ॥५8॥ मध्येभृतश्चद्धोगतिभूमौतजापकोभवेत्॥ पुनश्वपंचरक्षेणब्रह्मसामीप्यमाप्लुयात्
॥ ९५ ॥ पुनश्वपंचलक्षण साहप्येश्वयमाप्नुयात्॥ आहत्यशतरक्षेणसाक्षाद्रद्मसमोभवेत्।५६॥कार्यब्रह्मणणएवंहिसायुज्यंपरतिष
यवै ॥ यथेमोगमाप्नोतितद्रहमपर्यावधि ॥ «७ ॥ पुनःकत्पांतरवततेब्ह्मए्रःसजायते ॥ पुनश्वतपसादीप्तःकमान्धुक्तोभवि
ष्यति ॥ ९८॥ पृथ््यादिकार्यभतेभ्योलोकावेनिभिता कमात् ॥ षातालादिचसत्यातंबरह्मलोकाश्चतु्दश ॥ ९९ ॥
|| बहकी समीपता प्राप्त होती हे ॥ ५५ ॥ किर पां चराखके जपसे सारप्यके रेश्वयकी प्राप्तिं होती है एक करोड मंत्र जपनेसे साक्षात् बहमतुल्य ||
होजाता है ॥ ५६ ॥ इस प्रकार हिरण्यगभके सायुञ्यको भाप होके बह्लाकी भरकयतक यथेष्ट भोगको भ्ाप्त करता है ॥ ५७ ॥ एनः कल्पान्तर ४
होनेमं बह्ाका एत्र होताहै, फिर महातपसे दीप्तिमान् हो ऋषमे शक्त हो जायगा ॥ ५८ ॥ पृथ्वी आदि कायं प॑ंचभूतोि यह टोक क्रमसे
नि्भित् हए ई पाताले छेकर सत्यरोकतक सब चौदह रोक है ॥ ५९ ॥
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॥४.९॥
| आग वैकुलोकतक चौदह ोक विष्के है, क्षमाटोक जहा दुदर वैकु्ठभ कायं विष्ण है ॥ ६० ॥ वहां यह महाभोगी
षा क स्थित है, इते ऊपर शुचिोक पर्वत अहारईस रोक ह ॥ ६१ ॥ शुचिोकमे कैलाशके ऊपर भाणियोक इरनेवाे रद स्थित ई |}
उससे आगे अहिंस्रा ठोकतक ५६ छप्पन ठोकं स्थित है ॥ ६२ ॥ अहिंसा ोकमे स्थित हो ज्ञानकैठासएरमे कारयश्वर सवका तिरोभावकरकै ठ
४ स्थित है ॥ ६३ ॥ अरहिंसारोकसे ऊपर काठचकर इसकै उपरान्त काठातीत है, वहां काठचकरेश्वर नामसे शिव स्थित रहते है ॥ ६४ ॥ ओर
| सतवाह्व॑मतवतिष्णलोकाशदंश ॥ कषमालोकेका्वि्ववरपतते ॥ ९० ॥ का्लम्वामहाभोगिरङत्वाऽपि
£| तिष्ठति ॥ तदूर्वगााशच्य॑तारोका्टाविशतिःस्थिताः ॥ &9॥ _शचौकोकेत॒कैलासेरदरिभरतहर्स्थितः ॥ षड्तराश्पचा १
|| शब्हिसातस्तदृर्वगाः ॥ ६२ ॥ अर्दिसारोकमास्थायज्ञानकेलासकेषुरे ॥ कार्यश्वरस्तिरोभावंसवौन्ृत्वाधितिष्ठति ॥ ६३ ॥ ¢
तद॑तेकाचकरंदिकालातीतस्ततःपरम् ॥ शिविनाधिष्ठितस्त्कारशवकरश्राह्यः ॥.९० ॥ मादिष॑धमेमास्थायसर्वान्कालेन
यजति ॥ असत्यश्चाञ्चचिग्यैवदिसाचेवाथनिधेणा ॥ ६५ ॥ असत्यादिचतुष्पादःसर्वाशःकासरूपधुक् ॥ नास्तिकयलक्ष्मीदः ए
संगेविदबाह्यध्वनिःसदा ॥ &६ ॥ कोधसंगःकृष्णवर्णोमहामदिषवेषवान् ॥ तावान्महैश्वरःप्ोक्तस्तिरोधास्तावदेवहि ॥ &७ ॥
तिकथ्यते॥ मालक्ष्मीज्ञानभोगोवेयातिमायेतिकथ्यते ॥ ६९॥ ट
धर्मेम स्थित हो सबको काठसे संयुक्त करते ह असत्य अशुचि दंस निर्ण ॥ ६५ ॥ यह असत्यादि चतुष्पाद कामहूपधारी शिवका अंश है ||
नास्तिकयमयी ठक्ष्मी दुःसंग ओर वेदबाह्य शब्द ॥६६॥ करोधका सेग छष्णवणं यह महामहिषके रपवाछे है इनके अधिपति महेश्वर ह इन्हीकी ४
पासे इनका विरोषान होता है ॥ ६७ ॥ इसके आभे कमभोग, उत्से आगे ज्ञानभोग, उषके आभे कर्भमाया, उससे आगे ज्ञानभाया ॥६८॥
मायाशब्दका भ कहते है (मा) रक्ष ज्ञान मोगको (या) प्राप होती है अर्थात् जो कम्पैभोगअलुस्तार लक्ष्मीको भाप्तकराके मोहित करतीहै, इसीते |>
ऋ
| | उसे माया कहते है अथवा (मा) लक्ष्मी (या) ज्ञान भोग, करनेके निमित्त प्राणि्यौको प्राप्त होती है इसन कारण उसे माया कहते ह
॥४६॥ ||) ॥ ६९ ॥ उत्क आगे नित्व भोग, उसके पहरे नश्वर, उससे पहटेतिरोधान, उसके आगे तिरोधान नहीं है ॥ ७० ॥ उत्क पहृटे पाशवन्ध,
ठ उत्क आगे फिर बन्धन नहीं हे ॥ उसके प्रहे २ ही काम्यकर्मके अवुस्ञार भाणी लौरते है ॥ ७१॥ उसके आगे निष्काम कमका भौग
ठ हे, उस्कै पहरे बिन्दुपूजा करनेवाठोके ोक है ॥ ७२ ॥ उस्षके उप्र निष्काम टिगपूजाकरनेवाठे भाप होते रहै, उसके पह २ शिक
¢ अन्य देवताओंके पूजन करनेवाठे रहते है ॥ ७३ ॥ जो केवट एक शिवपुजारमेही निरत है, बे उप्षके ऊपर ठोक्मे जाते दै, उसे प्हे
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तदूर्ष्वनित्यभोगोहितदवाङ्नश्वरंविदुः॥ तदर्वाकचतिरोधानेतदूर््वनतिरोधनम् ॥ ७० ॥ तदर्वाक्पाशबंधोहितदुर््वनदिवेधनम्॥
तदरवाकपरिवर्ततेकाम्यकर्माविसारिणः ॥७१॥ निष्कामकर्ममोगस्तुतदूर्ष्वपरिकीतिंतः ॥ तदर्वाक्परिवर्ततविदप्ूजाषरायणाः ॥
| ¢ ॥७२॥तदूर््वडि्जत्येवनिष्कामालिगपरूनकाः॥ तदर्वाकपरिवर्ततंशिवान्यघ्ुरपूजकाः ॥७३॥ ज्विकनिरतायेचतदृर््वसंपर्यातिते
तदर्वाग्जीवकोरिःस्याततदर्वपरकोटिकाः ॥ ७8 ॥ सांसारिकास्तदवाक्चुक्ताःखटतदूर्ष्वगाः ॥ तदर्वाक्परिवततेग्राकृतद्रव्य
पूजकाः॥७९॥ तदृष्वहधिबजंत्येतेपौश्षद्रग्यपूजकाः ॥ तदर्वाक्छक्तिख्गंतुशिवलिगंतदूष्वेकम् ॥ ७६ ॥ तदर्वागावृतं लिगंतदूर्ध्व
हिनिराइृति ॥ तदवकल्पितखिगं तदर््ववैनकलिपतम् ॥ ७७ ॥ तदर्वाम्बाह्मलिगंस्यादेतरंगंतदूध्वकम् ॥ तदवाक्छक्तिकोका
दिंशतंवेद्वादशाधिकम् ॥ ७८ ॥तदवांग्बिदुरूपंहिनादरूपंतदुत्तरय् ॥ तदवांक््मरोकस्तुतद्ध्वज्ञानलोककः ॥ ७९ ॥
जीवकोटी ओर उसके आगे दश्वरकोटी हे ॥ ७४ ॥ उ्षकै पे सांसारिके ओर ऽप्तके पीछे सक्तं स्थित है उसके पहर भाक्त
्रव्योके पूजकं ॥ ७५ ॥ उसके आगे पौरुष द्वयक पूजक जाते ह उसके पहडे शक्तिरिग उक्तके परे शिवटिग ॥ ७६ ॥
उक्षकै पहटे सगठिग उसके आगे नियैण उसके आगे कल्पितिटिग उसके आगे अकल्पित छग ॥ ७७ ॥ उसके आगे
आधिभोतिक बाञ्रिग उसके आगे आष्यास्मिक अन्तरंगङिग उसके आगे ११२ एकस बारह शक्ति टोक ॥ ७८ ॥ उत्क आगे बिन्दु
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| उसके आगे नादहप उसके आगे कर्मठोक उसके आगे ज्ञानछोकं ॥७९॥ उक्तके आगे नमस्कारलोक मद ओर अहंकारका नाशकं है मके ||
आगे जन उसके आगे तिरोधान जहासि फिर आगमन नहीं होता है ॥८०॥ ज्ञानशब्दका अथं यही हे कि तिरोधान (अहंकार) का निवारण ठ
करना, उसके आगे आधिभौतिक पूजावाठे रहते ह ॥८१॥ आध्यात्मिक पूजावारे इससे ऊपर जाते है, बे आत्मटिग महारोकमे तबतक सुख ट
भोगते है ॥ ८२ ॥ भरकूती महत्त अहंकार प॑ंचतन्यात्रा इन आढ बन्धनको वहां स्थित होनेवाठे जानते ई, इस्त भकारसे यह सम्पूणं लोकिकं ठ
ओर वेदिकं जानना ॥८३॥ जो सत्यधम्मयुक्त शिवजीकी पूजा करते है बह अधरमेशटपी महिषप्र आरूढ हुए कार चक्रपे तर जाते है ॥८४॥ त
नमस्कारस्तदर्वहिमदाईकारनाशनः ॥ जनिजंतिरोधानंनानिषिद्धयाततेइति ॥ ८०॥ ज्ञानशन्दार्थएवंहितिरोधाननिवारणात् ॥ रै
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तदवक्परिवतद्याधि भौतिकपूजकाः॥८१॥ आध्यात्मिकाचकाएवतदरषवसंमयातिवे॥तावद्ेवेदिभागंतन्महारोकात्म्िगके॥ ¢
॥८२॥ परकृत्यायटवंधोपिवेद्यतिसप्रतिष्ठितः ॥ एवमेतादशेजञेयसवलौकिकवेदिकम् ॥८३॥ अधर्ममदिषाहटंकालचतरंतिते ॥
सत्यादिधमयुक्तायेशिवप्रूजापराश्चये॥ ८० ॥ तदृष्ववृषभोधरमोत्रह्मचयंस्वरूपधृक् ॥ सत्यादिपादयुक्तस्त॒शिवलोकाथतःस्थितः ४
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॥८९।क्षमाश्गःशमश्रोघोवेदध्वनिविभ्रूषितः ॥ आस्तिक्यचक्षुरनिश्वासशर्बुद्धिमनाव्रषः॥ ८६ ॥ करियादिषृषभाज्ञेयाःकार
णादिषुस्ंदा ॥ तंक्रियात्रृषभषभमकाातीतोधितिष्ठति ॥ ८७ ॥ ब्रह्मविष्णमहेशानांस्वस्वायुर्दिनखुच्यते ॥ तदर्व्वनदिनराथिमै
जन्ममरणादिकम् ॥ ८८ ॥ पुनःकारणसत्याताःकारणब्रह्मणस्तथा ॥ गंधादिभ्यस्तुभुतेभ्यस्तदरष्वनिरयिताःसदा ॥ <९ ॥ &
इसके ऊपर वृषभरूपी धमं ब्रहचयेके प धारण किये स्थित है वह सत्यादि चार पाद युक्त शिषरोकके आगे स्थित है ॥८५॥ उस बृषका वर्णन
करते है क्षमाश्चंग शमश्रोत्र वेदरूप ध्वनि विभूषित आस्तिक्य हपी नेतर वेदाक्षरमय निश्वास शूप उदार भन बुद्धि यक्त सतते भ बुष ॥८६॥ ४
प्रजन, क्रिया, तप ज्ञान ध्यान रूपादि धर्मे कारण बरह्म स्थित हे उत करियाह्प दृषभ धर्मे काठातीत स्थित रहता हे यह वृषं शिवरोकके
अग्रभागे स्थित है ॥८७॥ ब्ह्या विष्ण ओर महेशकी आयु शिवजीका दिन कहराता है, उसके आगे न दिन हैनरात्निहैनजन्महैन 4
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शिण्पु मरण है ॥ <८ ॥ किर कारण सत्यरोकतकं ओर कारण बरहमाका रोक गन्ादिभूतोंे ऊपर रहता हे ॥ < ॥ चोदह टोक सष्षम् गधरं
॥४७॥ || स्थित ई, फिर कारण विष्णके चौदह छोक स्थित है ॥ ९० ॥ फिर कारण रुके २८ अहा छोक है, फिर उर्तकं ऊपर कारणदशके ५६
ठोक है ॥९१॥ उ्तके आगे शिवसेमत बहमच्॑लोक है, वहीं प॑चावरण संयुक्त ज्ञान कैलास है ॥९२॥ उस पांचमण्डलमंयुक्त पचत्रह कटापाहेत
‡ आदि शक्तिसे शोभित आदिलिग विराजता है ॥ ९३ ॥ यही परमात्मा शिवका शिवाख्य हे; परशक्तिके सहित यहां ही परमेश्वर श्थित
ट
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रहते है ॥९४॥ सृष्टि स्थिति संहार तिरोभाव अलुग्रह इन पांच कार्यों थह सचचिदानन्द स्वरूप सदा प्रवीण है ॥९५॥ जो दान धमं आचरण
~ ¢ ५ © वि
सृक्ष्मगंधस्वरूपाहिस्थितालोकाश्वतुर्दश ॥ पनःकारणविष्णोवैस्थितारोकाश्तदश ॥ ९० ॥ पुनःकारणश््रस्यटोकाष्टा्विंशक्।
मताः ॥ पुनश्चकारणेशस्यषटपंचाशत्तदूरध्वगाः ॥ ९१ ॥ ततःपरव्रह्मचय॑रोकाख्यं शिवसंमतम् ॥ तजेवज्ञानकैलासेप॑चावरणसं
युते ॥ ९२ ॥ पंचमंडलसंयुक्तपंचब्ह्मकलान्वितम् ॥ आदिशक्तिसमायुक्तमादिटिगंतुत्वं ॥९३॥ शिवाल्यमिद॑भोक्तं शिवस्य
् प्रमात्मनः ॥ परशत्तयासमायुक्तस्तत्रैवपरमश्वरः ॥ ९४ ॥ सृष्टिःस्थितिश्वसंहारस्तिरोभावोप्यनुभ्रदः॥ पंचकृत्यपृवीणोऽसौसु
|| चिदानंदवियहः ॥९९॥ ध्यानधःसदायस्यसदानु्हतत्परः ॥ समाध्यासनमासीनःस्वात्मारामोविराजते ॥ ९६॥ तस्यसं दृशं
¢ नेसा््यकर्मध्यानादिमिः कमात् ॥ नित्यादिकमयजनाच्छिवकर्ममतिभवेत् ॥ ९७ ॥ क्रियादिशिवकमभ्यःशिवज्ञानग्रसा
| 1 1 रामः ॥ ९८॥ शक्तिरात्मस्वरूपेणस्वात्मारामत्वमेवहि ॥ कियातपोजपज्ञानघ्यानधमेघुसु
वि०सं०१ स्थितः ॥ ९९ ॥ शिवस्यदशनंलभ्ध्वास्वात्मारामत्वमवहि ॥ यथारविःस्वकिरणादश्ुद्धिमपनेष्यति ॥ १०० ॥
४ करता हं उत्क ऊप्र सदा अनुग्रह करते है, वह समाधि आसनम स्थित स्वात्माराम ( अत्यानन्द आनंद्रदरूप ) विराजते है ॥ ९६ ॥
४ उनका दशेन कमं ओर ध्यानादि क्षसे होता है, नित्यकर्मयै यजन कंरनेे शिवकर्भमे प्रीति होती है ॥ ९७ ॥ क्रियादि शिवकमर्भिरे
है || शिवका ज्ञान सिद्ध करना चाहिये, उनकै दशेन करतेही सव युक्तं होजाते है, इसमे संदेह नही ॥९८॥ आत्मस्वहूपका जो अतिशय आनन्द
|| हे उसीको सक्ति कहते है वह क्रिया तप जप ज्ञान ध्यान धमि स्थित है ॥९९॥ शिवके दरशन करनेसे स्वात्मारामत्की प्रापि होती ह चैते सयं
प्व
किरणो, अशुद्धि दूर करते है ॥ १०० ॥ इसी प्रकार कपा करनेम॒विंचक्षण शिवजी अज्ञान दूर करते है अज्ञान निवृत्त होनेसे
शिवज्ञानकी प्रापि होती है ॥ १०१ शिवके ज्ञानसे अपने स्वप आत्माराभको प्राप्त होजाता हे, आत्मारामकी प्रा्तिमं यह मदुष्य ट्.तर्त् ¢
| होजाता हे ॥ १०२॥ सौ ठाख जपनेसे ब्रह्मपद ओौर फिर सौ ठाख जपनेसे विष्णके पदकी भराति होती हे इसमें संदेह नहीं ॥ १०३ ॥ ठ
् फिर सौ लाख जपनेसे रुद्रपद ओर फिर सौ छाख जपनेसे रेश्वयेपदकी प्रापि होती हं ॥ १०४ ॥ पिर सावधान होकर इसी भकारका जप ठ
टै करनेसे शिवलोकादिसे प्रादुभूत हुए काटचक्रफो ॥ १०५ ॥ फिर काढ पथ्चचक्रको रमसे प्राप्त होता हे सषि, मोह, बह्मचक्र भोग, मोह) त
8 कृपाविचक्षणःशंयुरज्ञानमपनेष्यति॥ अज्ञानविनिवृत्तोतुशिवन्ञानेप्रवतंते ॥१०१॥ शिवज्ञानात्स्वस्वकूपमात्मारामत्वमेष्यति॥ 4
‰| आत्मारामत्वससिद्धौकृतक्ृत्योभवेन्नरः ॥ १०२॥ पुनश्चशतलक्षणग्रह्मणःप्दमाप्ुयात् ॥ पुनश्रशतलक्षेणर्षिष्णोःपदमवाप्लु
# यात् ॥१०२॥ पुनअशतलक्षणशद्रस्यपदमाप्नुयात्॥पुनश्वशतलशक्षेण ेश्वयपदमाप्वुयात् ॥ १०७ ॥ पुनश्भवंविधेनैवजपेनस्चस ट
माहितः॥ शिवलोकादिभूतं रि कालचक्रमवाप्नुयात्॥१०५॥ कालचक्रपंचचक्रमेकेकेनकमोत्तरे ॥ सषिमोहौबह्मचक्रभोगमोहौ &
4
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तुवेष्णवम्॥१०६॥ कोपमोहौरोदरचक्रंभरमणचश्वरंविदुः॥शिवचक्रज्ञानमोहोपचचकरपिदुबंधाः ॥ १०७॥ पुनश्वदशकोरयाहिका ६
। रणब्रह्मणःपदम्॥ पुनश्वदशक्रोटयादितत्पदैश्वर्यमाप्लुयात् ॥१०८॥ एवंकमेणविष्ण्वदिःपद॑रष्ष्वामशौजसः ॥ कमेणतत्परैश्च ॥2
४ यङब्ध्वाचैवमहात्मनः ॥ १०९॥ शतकोटिमजप्त्वा्प॑चोत्तरमतंदिितः॥ शिवरोकमवाप्नोतिपिचमावरणाद्हिः ॥ ११० ॥ ॥£'
बेष्णवचक्र ॥ १०६ ॥ कोप ओौर मोह रोद्रवक्र ओर भ्रमण नाम दैश्वरचक्र ज्ञान ओर मोह शिवचक्त इस प्रकार यह पांच चक्कं कहराते है
ठेसा पंडितजन कहते है ॥ १०७ ॥ फिर दशकरोढ् जपे कारण बहमकी धाभि होती है, फिर दशकरोडते तत्पद रेश्वय॑की भाति होती ह 2
॥ १०८ ॥ इस प्रकार करमसे विष्ण आदिके पदको प्रात हो कमते उन् महात्मा देश्यं पदको पाप्र होता है ॥ १०९ ॥ फिर जितेन्डिय हो ठ
एकसौ पाच फरो जप कर पाच आवरणसे बाहर शिवरोकफो प्राप होता है ॥ ११० ॥ क
(५
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शिश्प वहो राजतमेडपहै, भौर उतम नंदीस्थानहै, ओौर तपरूपदृषम भी वहीं दीलता है॥१११॥ वह पांच आवरणते परे सयोजातका स्थाने, चये आवरणे ||
पामदेवका स्थान हे॥ १ १२॥ पीछे तीसरे आवरणसे प्रे अधोरका स्थान है साम्ब एरुषका स्थान दूसरे आवरणमे हे ॥११३ ॥ दशान प्रका स्थान ट
५८८८ || थमाव्रण कहलाता है, प ध्यान धर्मा स्थान पांचा मंडप हे ॥११४॥ बछिनाथरिवक स्थाने जमृतका देनेवाला है यह पाची डप ||
|| पीड चथा मण्डप चन्बरोलरकी मनुत हे ॥११५॥ ोमस्कंदका स्थान तृतीय मण्डप भोर दूरा सत्मण्डप आसतिकरपोारा कहा गया हे ||
| राजसंमंडपंतजनंदीसस्थानखुत्तमम्॥ तपोरूपशववृषभस्ततरैवपरिहश्यते ॥ १११ ॥ सद्योजातस्यतत्स्थानंपचमावरणंपरम्।। वाम (
(^ देवस्यचस्थानचतुथवरणंपुनः॥११२॥अधोरनिरयंपश्वानृतीयावरणंपरम् ॥ षुरुषस्यवसाबस्यद्वितीयावरणंश्ुभ् ॥ ११३॥ ||
| इशानस्यपरस्येवभथमावरणततः ॥ ध्यानधरमेस्यचस्थानंपचमेमंडपततः।। ११४ ॥ बलिनाथस्यसस्थानंतवपूणौमृतभ्रदम् ॥ &
&| चतर्थमेडपंपशाबंदशेसरसूतिंमत् ॥ ११५॥ सोगस्कंदस्यचस्थानदृतीयमंउपंपरम् ॥ द्वितीयमंडपतृत्यमेडपभारास्तिकाः ||
ट| ॥ ११६॥ परथ्ेभरुमायायाःस्थानंततरैवशोभनम् ॥ ततःपरंगभेशरहणिगस्थानंपरुभम्॥ ११७॥ नंदिसस्थानतःपशचाघनविदुः 4
६६|| शिवतैभवम् ॥ नेदीश्वरोबहिस्त्ठन्प॑चाक्षुपासते ॥ ११८ ॥ एवंथस्कमाछन्धनदीशा्मयापुनः ॥ ततःपरस्वसंे्यशिषर |
४ नैवादभावितम् ॥ ११९ ॥ शिवस्यकृपयासाक्षाच्छिवरोकस्यवैभवम् ॥ विज्ञातुंशक्यतेसवैरनान्यथेत्याहरास्तिकाः ॥ १२० ॥ ॥©
, ||| एवकरमणुकतयुह्मणवेजितद्वियाः ॥ अन्येषांचकरमव््येगद्तःशणताद्रात् ॥ १२१ ॥
५4 क | ॥११६॥ प्रथम मंडपे सूलमायाका सुन्दर स्थान हे, उक परे गमगृह पीठे ङिगका स्थान है॥११७॥उ कै पीठे न॑दिका स्थान है, नेदिस्थानके ९
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आगे शिववेभवको कोई नहीं जानता बहा नंदिकेश्वर बाहर स्थित होकर शिवपंचाक्षर मे्रकी उपाप्ना करते है॥११८॥इस भकार सनत्कुमार नंदी त
शरक सम्बादको युरुंकमसे मैने जाना हे इसके आ शिवसे अुभावित परमस्थान् प्रमानन्दूप होकर स्वयं जाना जाता है ॥ ११९ ॥ ठेस न
५॥ महात्माओनि कहा दे, कि शिवलोकका साक्षाद् वैभव शिवकी रपासेही जाना जाता हे ओर किती भकारते कढी॥ १ २०॥ इस भकार जितेन्दिय वाह्ण ॥2
| मुक्त होजाते ई, अब आप दृसर क्षत्नियादिकोका कम सुनिये ॥१२१॥ बाह्णोको गरुके उपदेशम अन्तमं नमः ठगाकर पांचङाख जप ट
| चाहिये इस प्रकार करनेसे मदष्पकी आयु बढती है ॥ १२२ ॥ द्वी इस्तको पांचराख जपकर परुषूपको भाप्रहो कमस यक्त हो जाती ¢
हे, अथौत् पाचटाख जपने ब्लीभाव दूर हो जाता है ॥१२३॥ पांचटाखसे क्षत्रियका क्षत्रीपन दर होकर फिर पांचाख जपनेपे वह ाह्मणके ठ
#
तुल्य होजाता है वा परजन्मभे बाह्मण हो जाता है ॥ १२४ ॥ फिर जप करनेसे मंजसिद्धि ओौर करमते यह परुष मुक्त होजाता है, पांचलाख
जपसे वैश्य वैश्यत्वसे छृटता है ॥१२५॥ फिर॒रपाचछाख मंत्र जपनेसे वह मंत्र कषत्रिय ककत है फिर पांचछख जपनेसे क्षत्नियत्वसे दृटा
गुरूपदेशानाप्यवेत्रा्मणानानमोऽतकम् ॥ पेचाक्षरपचलक्षमायुष्यंप्रजपेद्धिधिः ॥१२२॥ ्रीत्वापनयनाथतुपंचलक्षंजपेत्पुनः ॥
मंतरेणपुरूषोभूत्वाकमान्धुक्तोभवेद्बुधः।१२३।क्षभरियःपंचलक्षेणक्षत्रत्वमपनेष्यति॥ पुन चलक्षेणक्षत्रियोबाह्मणोभवैत्॥१२४॥
मजसिद्धिजपाचैवक्रमान्घुक्तोभवेन्नरः॥वैश्यस्तुपंचलक्षेणवैश्यत्वमपनेष्यति॥१२५॥ पुनशचपंचरक्षेणमभक्षत्रियउच्यते ॥ एन
पचलक्षिणक्षत्रत्वमपनेष्यति ॥१२६॥ पुनश्वपंचलक्षेणमेञव्राह्मणउच्यते ॥ शुदरश्चैवनमोतेनपचविशतिलशक्षतः ॥१२७॥ मंञविप
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ततःच्लीणांतथेवो्यगुरूनिदशंयेत्करमात् ॥१२९॥ साधकःपचलक्षान्तशिवप्रीत्यथमेवहि ॥ महामिषेकनैवेयं्ृत्वाभक्ता पूजयेत्
॥ १३० ॥ प्रूजयाशिवभक्तस्यशिवःप्रीततरोभवेत् ॥ शिवस्यशिवभक्तस्यभेदोनास्तिशिवोहिसः ॥ १३१ ॥
त है ॥१२६॥ फिर पांचछाख जपनेसे वह त्र बराह्मण कहटाता है इसी प्रकार शूद्र अन्तमं नमः ठ्गाकर २५ छाख मं जपे ॥१२७॥ तो सेच
ब्ाह्मणताको प्राप्त होकर शुद्ध होजाता है, स्ली एरुष बाह्ण अथवा ओर कोई हो सव शुध हौ जाते हं ॥१२८॥ आतुर परूषनमः चाहे आदिमे ठगा
ह|| कर जप करं गुरुको उचित है कि श्वी ओर शद्रको प्रणवरहित मंचका उपदेश करे॥ १ २९॥ साधक जब पां चलक्ष जपकर चुके तो शिवजीकी भीतिके
निमित्त महा अभिषेक ओर नैवेघ करक शिवके भक्तोंका पूजन करे ॥१३०॥ शिवभक्तकी पूजा कलसे शिवजी महापरसन होते है, शिवभे ओर
१७
त्वमापदययपच्छुद्धोभवेदिजःनारीवाथनरोवाथत्राह्मणोवान्यएववा ॥ १२८ ॥ नमोन्तंवानसःपू्मातुरःस्वेमातुरः सर्वदाजपेत् ॥ ४
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शिवभक्तमे कुछ भेद नहीं है, बह साक्षात् शिवस्वहूपही है ॥१३१॥ शिवस्वरूप मंत्री धारणा करनेसे शिषवरूपही होजाता ह शरीरम शिवम्क्ित ट
ट होनेसेही बह शिवभक्त प्रधान शिषस्वरूप हो जाता ह॥ १ ३ २। वेदोक्त सम्पूणं क्रियासे युक्त शिवभक्त सब करियाओंको जानते हैजितना रजिन ट्
|| कषस शिवजीका मंत्र जप किंया है ॥१३३॥ उतनीही उसकी देहम शिवजीकी सन्निकटता प्राप्त होती है, इसमे सन्देह नहीं ओर शिवभक्त चये ||
|| ेवीरटिगहूप हो जाती है।॥१३४॥ वे जितना मंत्र जपती है उतनीही उनके देहम भगवतीकी निकटता प्राप्त होती है, जो बुद्धिमान् शिवका पूजन
करते है वे स्वयं शब्दके भागी हो जाते है ॥१३५॥ स्वयं शिवहूप होकर पराशक्षितका पुजन करे श्रित ओर बेरटिगको टिगकर मायारहित
शिवस्वहूप्मजस्यधारणाच्छिवएवहि॥शिषमक्तशरीरेहिशिवेतत्परमोभवेत्॥ १३२॥शिवभक्ताःश्रियाःसर्वावेदसवक्रियांविदुः॥ र
यावद्यावच्छिविमत्रेयेनजपतंभवेत्कमात्॥१३३॥ तावद्वेशिवसातनिध्यतस्मिन्देहेनसंशयः॥ देवीलिगंभवेद्रूपशिवभक्नश्ियास्तथा॥ ॥*
॥१३७॥ या वन्मर्॑जपेरैग्यास्तावत्सातनिध्यमस्तिदि॥ शिवसंपूजयेद्धी मान्स्वयवेशब्दरूपभाक् ॥१३५॥ स्वयं चैवशिवोभूत्वापरां ४
श्तिभ्रपूनयेत् ॥ शक्तिमिरंचरिगंचद्यारेख्यामाययायजेत्॥ १३६॥शिवलिगंशिवंमत्वास्वात्मान॑शवितशूपकम् शक्तिखिगं चदेवीं
न
चमत्वास्वं शिवशूपकम् ॥१३७॥ शिवलिगंनादृरूपविद्षूपंतुशक्तिकम्॥ उपभ्रधानभावेनअन्योन्यासक्तटिगकम्। ।१३८॥पूजये ॥द
रिवंशकितसशिवौमूलभावनात्॥शिवभक्ताञ्छिवमयरूपकाज्छिवरूपकान्१३९१ोडशेरुपचारेपूजयेदिष्टमाप्ठयात् येनरुश्च |
पणायेश्चशिवभक्तस्यखिगिनः॥१४०आनंदंजनयेद्विद्राञ्छिवःप्रीततरोभवेत्। ।शिवभक्तान्स॒पत्नीकान्पतन्यासहसदेवतत्। १४७१॥ ॥६'
पूजन करे ॥ १३६ ॥ शिवरिगको शिवस्वहूप ओर आत्मको शकितिषटप ओर शक्ितिङिगको देवी ओौर अपनेको शिवस्वहप मानकर ९
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॥ १३७ ॥ शिबटिगको नामरूप ओर शक्रितको विन्दुरूप आकारायात्यक रान भूत ॐकारके समीपभावसे परस्पर टिगशकिति जानकर
॥१३<॥ शिवकीही चिन्ता करता हुमा शिव ओर शक्तिका ध्यान करे शिव त्रप शिवर्त्ात्मक शिवभकतोको ॥१३९॥ सोरहरकारपे
पूजन करे तो इ्की प्राप्ति होती है शिवभक्त ओर ङिगधारियोके पूजन करनेसेही ॥१४०॥ दिद्ानूको आनं॑दकी भाषि होती है, ओर शिवजी
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भरसन्न होते है, शिवके भक्तोको सदा च्लीसहित ॥ १४१ ॥ भोजन आदिते पजन करे, ३ पांच दस अथवा सौ हों धन देह ओर मंत्रे
शिवभावना कपटरहित् करे ॥ १४२ ॥ तव वह शिवशक्तिस्वरूप होकर फिर पृथ्वीम जन्मः नहीं छेता नाभी नीचे नह्याका ओौर नाभी
कण्टपयेन्त॒विष्णका ॥ १४३ ॥ स्थान है ओर शिवभक्तका यख ॒शिवरिगस्वरूप१ है इस प्रकार शिवभक्ता शरीर शिवस्वह
है मृत हए दाहादियुक्तं अथवा दाहादिरहित पृतक इए ॥ १४४ ॥ पितरोके उदेशसे आदि पितर॒ शिवजीका पूजन करे पीछे
आदिमाता शिवशक्तिका पूजन करके ॥ १४५ ॥ पितर ठोकको भरा होकर मरकर क्रमसषे युक्त हो जाता है, कपायुकत दश
पूजयेद्धोजनायेश्चपचवादशवाशतम्॥ घनेदेदेचमन्रचभावनायामरवचकः॥१४२॥ शिवशक्तिस्व्पेणनपुनजायतेशचवि ॥ नाभेरधो
ब्रह्मभागमाकंटविष्णुभागकम्॥ १४ २ुखंखिगमितिप्रोक्तंशिवभक्तशरीरकम् मृतान्दाहादिुक्तान्वादाहादिरहितान्मृतान्॥ १४४॥
उदिश्यप्ूजयेदादिपितरंशिवमेवि॥ पूजांृत्वादि मातुः्शिवभक्तांशचपूजयेत् ॥१०५॥ पितृकोकंसमासायक्रमान्मुक्तोभवेन्मृतः॥
क्रियायुक्तदशम्यञ्तपोयुक्तोविशिष्यते ॥ १४६ ॥ तपोयुक्तशतेभ्य्चजपयुक्तो विशिष्यते॥ जपुक्तसदसेभ्यः ॥ शिवक्ञानीवि
शिष्यते ॥१४७॥ शिवज्ञानिषुरक्षषुध्यानयुक्तोविशिष्यते॥ध्यानयुक्तकोरिभ्यःसमाधिस्थोविशिष्यते ॥१४८॥ उत्तरोत्तसैः
शिष्टयालपूनायघुत्तरोत्तरम्॥फलवेशिष्य्पचदुविं्ञेयमनीषिमिः ॥१४९॥ तस्मद्वेशिवभक्तस्यमदहिमानवेत्तिकोनरः ॥ शिवश
तंथोपूजनचशिवभक्तस्यपूजनम् ॥१९०॥ ुरुतेयोनरोभक्तयासशिवःशिवमेषते ॥यदषपठतेऽध्यायमर्थवदरेदसंमतम् ॥ १५१ ॥
नाहमणोि एक अधिक तप करनेवाा विशेष है ॥ १४६ ॥ सौ तपस्वियोते एक जपं कएनेवाठा चष है सहश्च जप करनेवाले
एकं शिवज्ञानी अधिक हे ॥ १४७ ॥ ठाख शिवज्ञानियोते ध्यानयोगी अधिक है करोड ध्यानयोगियोँसे समाधीवाला अधिक है ॥ १४८ ॥
इनकी उत्तरोत्तर भर्ठताे ओर उत्तरोत्तर पूजापे जो फठ भिरता है उसे विद्वान् भी नही जान सकते ॥१४९॥ इस् कारण शिवभक्तकी महि
पाको कोन मद॒ष्य जान सक्ता ३ शिवभक्तका पूजनही शिव ओर शक्तिका पृजन हे।१५०॥ जो मतुष्य भकठितते करता है वह शिवस्वरूप होकर |||
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शि | शिवको भाप होता हे जो इस बेदसम्मत अध्यायको अर्थसहित पदता है ॥ १५१ ॥वह बाह्मण शिवज्ञानी हो शिवके सग॒ आनद करता ह||!
॥५०॥ हे खनिश्वरो ! विशेष जाननेवाखेको यह अध्याय शिवभक्तोको सुनना चाहिये ॥ १५२ ॥ हे बाह्णो ! उपे शिक भरसराद ओर कपास सिद्ध
¢ होजाती है ॥ १५३ ॥ इति श्री शिवमहाषराणे वियेश्वरसंहिताभाषारीकायां सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ कषि बोटे हे स्वाथ जाननेवाे चतजी !
$ आप् हमसे बंध ओर मोक्षका खहूप कहिये खतजी बोठे बंध ओर मोक्षके उपायको कहते है तु आदरसे सुनो ॥ १ ॥ प्ररति आदि आढ
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बधनसे बंधनके कारण आत्माकी जीव संज्ञाहै, ओर इन प्रकतिं आदि आढ बंधने छूटने सक्त होजाता है ॥ २ ॥ भ्रकति आदिका वशं
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शिवज्ञानीभवेद्विमःशिवेनसहमोदते ॥ ्रावयेच्छिभक्तां-धविशेषज्ञोुनीश्वराः ॥ १५२ ॥ शिवप्रसादसिद्धि ःस्याच्छिवस्यक् ट|
पयाडधाः ॥१८९३॥ इतिश्रीशिवमदापुराणेवियेश्वरसंहितायांसप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ ऋषयञ्चु्व॑धमोक्षस्वहपंदिशरूदिसवा ||
भवि्तम ॥ सूतउवाच ॥ बधमोक्षतथोपावंवषयेऽहशणतादरात ॥१॥१्त्याचष्वयेनवदधोजीवः सउच्यते ॥ पकृत्याच्टवधेननि ||
क्तोरक्तउच्यते ॥२॥ प्रकृत्यादिवशीकारोमोक्षत्युच्यतेस्वतः ॥ बद्जीवस्तुनिर्क्तोयु्तजीवःसकथ्यते ॥ ३ ॥ भ्कृत्यग्रेततो ||
बुद्धिरहंकारोणात्मकः ॥ पञ्चतन्मा्मित्येतेप्रकृत्यायष्टकंविदुः ॥ 9 ॥ प्रकृत्याय्य्टजोदेदोदेहजकर्मउच्यते ॥ पुन-कमजो ६
देहोजन्मकर्मपुनःएुनः ॥ « ॥ शरीरंबिविधक्ञेयस्थूलसूष्ष्मंचकारणस् ॥ स्थूरुष्यापारदरोक्तसुक्ष्ममिद्वियभोगदम् ॥ & ॥
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कारणंत्वात्मभोगाथजीवकर्मानुहूपतः ॥ सुखदुःखं पुण्यपापेःकर्मभिःफरमश्वुते ॥ ७ ॥ ट
करनेका नाम मोक्ष है, बेधा हुआ जीव ओर निर्थुकत हवा क्तं होता है ॥ ३॥ भरकतिके आगे बुद्धि ओर बुद्धिके आगे गणातक अहंकार ओर 9
पृतन्मात्रा यह सब भाठ भरकति कहाती ह ॥ ४ ॥ इन्दं भरकुतिकादि आते यह देह ओर देहे किये जानेकै नाम् कम॑ है फिर कमते देह ||
है इस भकार जन्म कमं वारंवार होते है ॥ & ॥ सधूढ सक्षम ओर कारण यह तीन भकारक शरीर हँ सथू व्यापार देनवाठा ओर स्म इवि |)
यका भोग देनेवाला ॥६॥ ओर कारण शरीर जीवक कमालस्ार आत्माके भोगके निभित्त है कम्मंसिही दुःख पाप पण्योकै द्वारा पाप होते ई॥७॥||>
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ं कारण यह जीव कमंरूपा रर्सीसे वारंवार वंघकर कम्मंसि तीनों शरीरसहित चक्रके समान वारंवार सदा भ्रमण करता ह ॥ < ॥ चक्रभ्रमणके
दूर करनेको चक्रकतीका पूजन करे भरकतिआदि यह आढ महाचक्र है इनसे परे शिष है ॥ ९ ॥ वे भकतिजे महेश ही चक्रके कता. हं जिस
भकार वृक्षोके थाओंरे जरुको पानकर उसे वृक्षोभं उगल्ते है ॥ १० ॥ इसी प्रकार शिव प्रति आदिक वशम किंये स्थित हं; सवके
वशीभूत करनेते वह शिब कहटाता रै, शिव ही सर्वज्ञ परिपृणं ओर निःस्पृह है ॥ ११ ॥. वह अपनी सव॑जञतासे तृप्र अनादि बोध है, ओर
स्वतंजतासे नित्य जागरित शक्ति है, उन महेशकी अनन्त शक्ति ह उनके मनके षदूगाणेश्वयंको वेद जानता हे ॥१२॥ इस कारण शिवकै ही
तस्माद्धिकमेरञ्ज्वादिविद्धोजीवःुनःएनः॥ शरीखयकर्मभ्यां चक्वद्राम्यतेसदा। ८॥ चक्रभमनिबृत्यर्थचक्रकर्तारमीडयेत्॥ कृत्या
दिमहाचक्रग्रतेःपरतःशिवः॥९॥चक्रकतामहेशोहिभ्रकृतेःपरतोयतः॥पिबतिवाथवमतिजीवन्बारोजलंयथा ॥१ ° ॥ शिवस्तथा
धरकृत्यादिवशीकृत्याधितिष्ठति॥स्ववशीकृतयस्मात्तस्माच्छिवइतिस्म्रतः॥शिवणएवदिसरवज्ञःपरिपूणंशनिःस्परहः॥ १ १॥ सर्वज्ञात्
पिर्नादिबोधःस्वतवतानित्यमदुपृशक्तिः॥ अनंतशक्तिश्चमहेश्वरस्ययन्मानसेश्वर्यमवेतिवेदः ॥१२॥ अत्ःरिवप्रसादेनप्रकृत्या
दिवशंभवेत् ॥ शितृप्रपादलामार्थशिवमेवप्रपूनयेत्॥१३॥ नि सपृहस्यचपूर्णस्यतस्यपूजाकथं भवेत्॥ शिवोहेशङतं कमैपरसादजन
कभतेत्॥१७॥लिगेविरेभक्तजनेशिवभुदिश्यप्ूजयेत् ॥ कायिनमनसावा चाधनेनापिप्रूजयेत्॥ १९॥ पूनयातुमदैशोहिपकरतेः परमः
शिवः॥ प्रसादेकुर्तेसत्यंपूजकस्यविशेषतः॥ १६॥ शिवप्रसाद त्कमांवंक्रमेणस्ववशं भवेत्कर्मारम्यपकृत्यंतंयदा स्ववशं भवेत्१७॥
ताद भ्रकति आदि वशे होती है, शिक्कौ परसननता भप्त होनिके यि शिवका ही पूजन करना चाहिये ॥१३॥ इच्छारहित् ओर परिपर्णकी
पूजा कित प्रकार हय सकती है, इ कारण शिवके उदेशते जो कम किया जाता है वही शिवकी प्रसन्नता करनेवाखा होता है ॥ १४ ॥ बेर
छग वा भक्तजनमे शिव भावना करके पूजा करना चाहिये, काय मन वचन ओर धने भी पुजा केरे ॥ १५ ॥ पजा करनेसे बह महेश
भरति प्रे प्रम शिव अवश्व पूजा करनेवाठेके ऊपर प्रसन्न होते है सन्देह नहीं ॥ १६ ॥ शिवके प्रसादे कमादिकं कमस अपने वशे
हो जाते है, जिस समय कर्मसे प्रकतिपर्यैत सम्पूणं अपने वशम होज्थँ ॥ १७ ॥
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शिप
॥*१॥
उक्ती समय वह युक्त ओर आतसमाराम का जाता है, परेश्वके परषादसे जिस समय कमं देह अपने वशम होजाता है ॥ १८ ॥ रक्षी
मय शिवछोकमे वास्त होता है अर्थाव् साटोक्षयकी प्राति होती है ओर तन्मात्राको वशम करनेसे साम्बकी स्रामीप्यताको भात
होता हे ॥ १९ ॥ पीछे क्रिया आयुधोंते शिवकी सायुज्यताको पराप्त होता हे अथीत् ्िशूलादिमै शिवकौ समानताको प्राप्त होता है,
महाभरसादके छाम बुद्धि भी अपने वमे होती है ॥ २० ॥ प्रकतिका काम्यं बुद्धि है वह साष्ट कहछाती है फिर महाप्रसाद
कति वशम होजाती है ॥ २१ ॥ रेता होनेते शिवजीका मानस देशव विनाही यत्नके भराप्त होजाता है, सर्वज्ञता आदि शिवका रेष्वय
तदुक्तरतिपोक्तःस्वात्मारामोविराजते॥ प्रसादात्परमेशस्यकमे देहोयदावशः।१८॥ तद विंशिक्छोकेतुवासःसाकोकषयसुच्यते ॥
सामीप्यंयातिस्िस्यतन्माप्ेचवशंगते १९॥तदातुशिवसायुज्यमायुधायेः कियादिभिः ॥महाग्रसादलाभचञुद्धिशचापिवशामवेत्॥
॥ २० ॥ बुदिस्तकार्यभरकृतेस्तत्साटिरितिकथ्यते ॥ पुनमेदाप्रसादेनपकृतिर्वशुमेष्यति॥२१।शिवस्यमानसेश्व्यतदाऽयतनभवि
ष्यति॥साज्ञायंशिवैश्व्थलन्ध्वास्वात्मनिराजते॥२२।ततसायुज्यमितिप्रहवंदागमपरायणाः॥ एव करमेणधुक्तिःस्यािगादौपूज
यास्वतः॥२२॥अतःशिवप्रसादाथक्रिय्यैःपूजयेच्छिवम् ॥ शिवक्रियाशिवतप्ःशिवसंजजप्ःसदा॥२४॥ शिवज्ञानंशिषध्यान्
त्रोत्तरमभ्यसेत॥आसुतिरामृतेःकारटनयेद्रशिवचितया॥२५॥सादिभिशङ्सुमेरचयेच्छिवमेष्यति॥ ऋषयउचुः॥ छिगादौशिव
पूजायाविधानबूहिसवेतः॥२६॥घूतउवाच॥ खिगार्नाचक्रमेव्येयथावच्छणुतद्विजाः॥ तदेवं प्थमेप्रणवं सवेकामिकम्॥२७॥
| रातत करके अपने आत्मामं विराजमान होता है ॥ २२ ॥ वेदशाद्धके जाननेवारे इतीको सायुज्यञुक्ति कहते है इस भकार दिगादि पुजा
करनेवाठोके कमसे स्वयं युक्ति होजाती है ॥ २३ ॥ इस कारण शिवकी प्रसन्नता भप्त करनेको करियादिसे शिवकी पुजा करे शिवकी
| क्रिया शिवका तप शिवमन््रका जप ॥ २४ ॥ शिवज्ञान शिवध्यान यह उत्तरोत्तर अश्याक् करता रहे जवतकं शयन करे तवतक शिवकाही
ह|| ध्यान करता रहे, इस भकार मरणपयंन्त समय बितावे ॥ २५ ॥ ओर पूर्वोक्त भंवरोदारा एर चाकर शिवजीका अर्यन करे तो मंगछ
| होता है, ऋषि बोछे हे सुव्रत ! रगादिभ शिव पृजाका विधान वणेन कीजिये ॥ २६ ॥ स्तनी बोरे हे बाह्मणो ! घनौ हमं टिगादिका
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विं°सं०१
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२०
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कमसे पूजाविधान कहते है, भथम सव कामनाओंका देनेवाठा ॒प्रणवर्टिग है ॥ २७ ॥ बह सुक्ष्म प्रणवहप॒ निष्कल है, ओर स्थूल ु
कलायुक्तं है, उसीको प्ाक्षर कहते ६ ॥२८॥ उन्हीकी पूजाका नाम तप है यह दोनों साक्षात॒भोक्षके देनेवारे है, ओौर परुषारथते परकतिके र
बनाये हुए बहुतसे टिग ह ॥ २९ ॥ उनको विस्तारसे शिवजीही जानते है दूसरा नहीं परन्मु प्रथ्वीविकारके ठिग मँ मति अनुसार तुमसे
कहता हं ॥ ३०॥ स्वर्भू छिग १ बिन्दुर्टिग २ भतिष्ठा किये ठग ३ चरङिग ४ गारुछिग ५ ॥३१॥ देवता आओौर ऋषियोके तपसे सन्तु
होकर उनके निकट भाप होनेको पृथ्वीके अन्तगत बीज ओर नादरूपसे रहनेवाे शिवजी॥ २२॥ जिस प्रकार अंकुर पूथ्वीको भेदकर निकठते
सृ्ष्मप्रणवह्पंदिृक्ष्मरूपंत॒निष्कलम् ॥ स्थूूटिगंहिसकलंतत्पंचाक्षरसुच्यते ॥२८॥ तयोपूनातपःप्रोक्तंसाक्षान्मोकषप्रदेउमे ॥
पौरुषश्रकृतिभूतानिख्गानिसुबहूनिच ॥२९॥ तानिविस्तरतोवक्तुशिवोवेत्तिनचापरः ॥ भूविकाराणिरिगानिज्ञातानिपववीमिव
॥ २० ॥ स्व्भूठिगंपथमविदुखिगद्वितीयकम्॥ प्रतिष्ठितं चरंचेवगरूिगतुप॑चमम् ॥३१॥ देव्ितपसातु्टःसा्निधयार्थतुतजवै
पृथिव्यन्तगतःशर्वोबीजवेनादकूपतः ॥ ३२ ॥ स्थावरांङरवन्ूमिशुद्धियव्यक्तएवसः ॥ स्वर्थभरतंजातमितिस्वथभूरितितेविढुः
॥ ३३ ॥ _तद्िगपूजयान्ञानेस्वयमेवग्रवदवैते ॥ सुव्णरजतादौवापरथिव्यांस्थिडिलेपिवा ॥ ३७ ॥ स्वहस्ताष्िसितंखछिगं
शुद्ग्रणवर्म्कम् ॥ यंअरिगंसमारिख्यप्रतिष्ठावाहनचरेत् ॥ ३५ ॥ बिदुनादम्थलिगस्थावरंजंगर्मचयत् ॥ भावनामयमेतद्धि
शिवदृष्टनसशयः ॥ २६ ॥ यथविश्वस्यतेशंयुस्तजतस्मेफलपदः ॥ स्वहस्ताङिखितेभेस्थावरादावक्रतिमे ॥ ३७ ॥
है इसी भरकार पृथ्वीकै अन्तरे निकठे हए ठिगको स्वयेभू ठिग कहते है ॥३२॥ उप ठिगकी पजा करने स्वयं ज्ञानकी वृद्धि होती है सवर्ण
चादी पृथ्वी अथवा वेदिका ॥ ३४ ॥ अपने हाथसे छसे हुए शुद्ध भणवयुक्त भन्तरको ओर ठिगकरो यन््रपर टिखकर रसकी तिष्ठा ओौर
् | | करे ॥२५॥ यही बिन्दुनादमय डिग स्थावर ओर जंगरूप है, भावनापेही इसमे निःसन्देह शिवका दशन होता है ॥३६॥ जिसे
१८ शिबजीका विवास करे. उपमेही वह निन्दे फट देते है अपने हाथते से हृए य॑ स्थावरादि अथवा कतनम स्थानमे ठिक ॥ ३७ ॥
१८
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आवाहन कर सोरह भकारे शिवजीका पूजन करे तो देश्वरयकी भाति ओर अण्या करने ज्ञान भी होता है ॥ ३८ ॥ जो देवता कषियोने
अपनी आत्मसिद्धि करनेको अपने हाथते शभ केतम जो ॥ ३९ ॥ शुभ भावनासे मन्त्रपूवक स्थापित किया हे वही टिग पौरुष अथात
भरतिष्ठित कहलाता है ॥४०॥ उस्न रिगकी नित्य पूजासे पौरुष देश्व्य भिता है, बडे बाह्णों ओर् राजोने महाधनोे ॥४१॥ शित्प्वियासे
िगकी कल्पनाकर जो मन्वद्वारा स्थापित किया है, जो मल्योने भतिष्टित किया हे वह भाक्त है, उसके पजन करनेसे धात देशव भ्रात
है ॥ ४२ ॥ भाक्त छिगसे पौरुष ठिग श्रेष्ठ है कारण कि जो बलयुक्तं ओर नित्य है, उसे पौरुष ठिग कहते है, जो दुर्बठ ओर
शिण्प |
ट
८
६
¢ आवाद्प्ूनयेच्छधषोडशैरूपचारकेः॥ स्वयमेस्वय॑माप्नोतिन्ञानमभ्यासतोभवेत् ॥३८॥ देषिभिश्चापिस्वात्मसिद्धचर्थमे
ए
९
ए
॥५२॥
वदि॥सरमत्रेणात्मदस्तेनकृतंयच्छद्धमडकले॥३९॥ शुद्धभावनयाचेवस्थापितंलिगशुत्तमम्॥ तरिलगंपौरुषप्राइस्तत्पतिषठितयुच्यते
॥४०॥ तद्धिगपूजयानित्यं पौरूषेश्वर्यमाप्ठयात्॥ मदद्िबीह्मणेश्चापिराजमिश्महाधनेः॥०१॥ शिहिपनाकरिपतलिगंमत्रेणस्था
भति्ठितभातद्पाकृतभयंभोगदम् ॥४२॥ यदूनं चनित्येवतद्धिपौरषषुच्यते॥यददुवलमनित्येचतद्िमाङृतटुच्यते॥४२॥
पितंचयत्॥छिगंनाभिस्तथाजिह्ानासाग्र्चशिखाक्रमात् ॥ कटयादिषु्रिरोकेषुखिगमाध्यात्मिकंचरम् ॥ ७९ ॥ पर्वतं पौर्पं
्ोक्तभृतलप्रक़ृतंषिदुः ॥ बृक्षादिपौरुपजञेयय॒ल्मादिभकृतंविढुः ॥ ७५॥ षाशिकंप्राकृतेजञेयंशालिगोधूमपौकषम् ॥ देश्वयै
पौरषविद्यादणिमाययषटसिद्धिदम् ॥४६॥ सुस्लीपनादिविषयभुह्तंाइरास्तिकाः ॥ पथम चरिगेषुरस्िगंपकथ्यते ।॥। ९७ ॥
वि°्ं० १४|| अनित्य है वह प्राक्त टिग है ॥ ४३ ॥ चर ठिगका वणन करते है, ठिग, नाभि, जिह्वा, नासाथ, शिखाके कमते करिति आदिछे हृद्य,
अ० १८|| || आनन तीनोँ स्थानो आध्यासिक ठिंगकी कल्पना चरटिग है ॥ ४४ ॥ पर्वतम पौरष छिग ौर पृथ्वीम ्राङत छिग है वृक्षादि पौरुष
|| ओर ल्मादिमे भाक्त रिग जानना ॥४५॥ साठि धान्यात्मक प्रकत ओर शाछि तथा गेहं पौरूषते जानने पौरुषे देश्यं भौर अणिमादि
‰॥ अटसिद्धिकी भाति होती है ॥ ४६ ॥ ओर अच्छी सी तथा धनादि देनेवाला प्ाकतर्टिग है प्रथम चरछिगोभे रसछिग कहा है ॥ ४७ ॥
(सक = = 44
९ |
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| बराह्णोको सम्पूणं मनोरथोका देनवाला है, ओर बाणटिग क्षत्नियोको महाराज्यपदका देनेवाखा है ॥ ४८ ॥ सुवणंटिग वैश्योका महा
धनका स्वामी करता है, शिवङ्िग शूद्रोको शुद्ध करनेवाा है ॥ ४९ ॥ स्फरिक ओौर बाणरिग सबको सव कामना देनेवाला है, जो अपने
निमित्त कहा हुआ ठिग है उसकै अभावमे दृपरेका ठिग पूजनम दोष नहीं ॥ ५० ॥ सधवा श्रियोको पाथिव ङिगकी पूजा करनी चाहिये
विशेष करके प्रवृत्ति मागेरत सधवा ओरविधवा च्वियोंको स्फरिक रिगकी पजा करनी चाहिये प्रन्तु यह भोगकी इच्छावाछियोंको विधान है
॥ ५१ ॥ ओर जो संस्ारकी कामनासे निवृत्त है उनको रसङिगका पूजन करना चहिये, बाटक युवा वृद्धावस्थामे हे सुबत ॥ ५२ ॥ च्ियोको
रसलिगंबाह्मणानां सरव भीष्प्रदंभवेत् ॥ बाणलिगंक्षत्रियाणांमहाराज्यपरद॑श्चुमम् ॥४८॥स्वणिगतुवैश्यानांमहाधनपतित्वदम्॥
शिलाखिगंतश्ुद्राणांमदाशुद्धिकरंज्ुभम्॥ ४९ ॥ स्फारिकंबाणलिगंचस्वषां सवकामदम ॥ स्वीयाभावेऽन्यदीयंतपजार्याननिषि
द्यते ॥ «° ॥ श्चीर्णातुपाथिवंखिगंसभवृणांविशेषतः ॥ (विधवानां प्रवत्तानांस्फारिकंपरिकीर्तितम् ॥ ५१ ॥ विधवानांनिवृत्ता
नारसलिगंविशिष्यते ॥ बाल्येवायौवनेवापिवाद्धकेवापिसु्रताः ॥ ५२ ॥ शुदधस्फरिकलिगंतुश्चीर्णातत्सवभोगदस् ॥ प्रवृत्तानां
पीव्पूजास्वाभीष्टमरदाथुवि ॥ ५३ ॥ पातरेणेवप्रवृ्तस्तुसरवपूजांसमाचरेत् ॥ अभिपेकतिनैवेयंशास्यत्ेनसमाचरेत् ॥ ५४ ॥
पूजतिस्थापयेदिगंसंपुरेषुपथग्गृे ॥ करपूजानिवृत्तानांस्वभोज्य॑तुनिवेदयेत् ॥ ५५ ॥ निवृत्तानां परंसृक्ष्मख्िगसमेवविशिष्यते॥
विभूत्यभ्यचनंकु्याद्विभूतिचनिवेदयेत् ॥ ५& ॥
स्फटिक ग सम्पूणं कामनाओंका देनेवाखा है, ससारभोगकी दच्छावाछियोको पीटपृना सदा भंगरु देनेवाखा रै ॥ ५३ ॥ योग्य श॒रुके सहित
संसारसुखवाठोको सब प्रकार पजा करनी चाहिये अभिषेकक अन्तये नेवेय शाली अस्तहित देनी चाहिये ॥ ५४ ॥ पूजाके अन्मे छिगको
सम्पुर पातम रखकर घरमं एकान्त स्थापन करे, हाथकी पासे निवृत हुये उपासकोंको भोजन निवेदन करना चाहिये ॥ ५५ ॥ निष्के
निमित्त पृक्ष्मठिगकी पूजा कही है, विभूतिसे अश्नकरविभूतिही निवेदन करे ॥ ५६ ॥
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शि०पु पूजाकरके षदा छिगिको शिरपर धारण करे, टोक वेद शिव अश्चिसे उत्पन्न हई विभूति तीन प्रकारक है ॥ ५७॥ लौकिकं अश्रिकी भस्म
॥५३ | दट्यशुद्धिक निमित टेन, मृत्तिका काठ ठोहरूप धान्य ॥५८॥ तिादि द्रव्य वल्चादि तथा वासी वस्तुकी शुद्धि ठौकिकाथिे होती है ॥०॥
¢ कते आदिक दूषित हुईं वस्तुकीमी भस्मसे शुद्धि होजाती है, सजर निर्जर भस्मे यथायोग्य शुद्धि करे, जेसी वस्तु हो उसके अनुपारही भस्मते
शद्ध करे ॥६०॥ गाहंपत्य अभिकी भस्म वेद अभिकी भस्म है, कर्मान्तमे उस्षको धारण करना चाहिये म्र ओर करियासे उतपन्न हं कमा
शिही भस्म रूप धारण किये है ॥६१॥ उस्न भस्मके धारण करनेसे वे कथं अपनी आत्मा आरोपित होते ई, अधोर मत्ते वेर काष्टकी भस्म
पू्जाङृत्वाथतद्गंशिरसाधारयेत्सदा ॥ विभरूतिश्िविधाभोक्तालोकवेदरिवाभिभिः॥५७॥लोकाभरिजमथोभस्मदरम्यजञुद्धयर्थमाव
हैत् ॥ मृदारुलोदूपाणांधान्यानांचतथेवच ॥५८॥ तिखादीनांद्रव्यार्णावच्रादीनांतथेवच। तथापरयषितानां चभस्मनाङुद्धिरि
` ष्यते ॥५९॥ शवादिभिदरषितानांचभस्मनाञयु्धिरिष्यते ॥ सजंनिरज॑रंमस्मयथायोग्यतुयोजयेत् ॥६०॥ वेदाग्रिजंतथाभस्मत
त्कमतिष्ठधारयेत् ॥ मेत्रेणक्रिययाजन्यक्मा्नौ भस्मश्ूपधृक्॥६१॥ तद्वस्मधारणात्कमस्वात्मन्यारोपितमवेत्॥अघोरेणात्म्रेण
बिल्वका्टमदाहयेत्॥&२॥शिवाग्निरितिसंपरोक्तस्तेनदगधशिवाग्निजम्॥ कपिलागोमर्पूर्वकेवलंगव्यमेववा॥ ६ २॥ शम्यस्वत्थप
लाशान्वावटारम्बधवित्यकाव्॥शिवाग्निनाद्हच्छुद्धंद्ेमर्म शिवाग्निजम्६४। दर्भाग्नौवादरैत्काष्ठशिवमेत्रसमुचरन्॥ सम्यक्स
शोध्यवश्नेणनवङभेनिधापयेत्॥६५॥ दीप्यर्थततुसंगाह्यमन्यतेपूज्यतेपिच ॥ भस्मशन्दाथएवंदहिशिवःपूर्वतथाऽकरोत् ॥६६॥
करे ॥६२॥ उसीका नाम शिवाभि है, उप्ते जठाये हृएसे शिवाभि भस्म होती है, कपिरके गोवरते अथवा किती गौके गोबर से ॥ ६३॥ शमी
पीपर टाक वर आरग्वध ( अमताप्ष ) बैक इनकी शि
वाभ्रिते जठानेसे शिवाभिसे उतन्न हदं शुद्ध भस्म होती है ॥ ६४ ॥ अथवा शिवमन्त
उचारणकर दभौशरिसे काठको जलाय वह्धसे अच्छी भकार छान षदे भर रक्से ॥ ६५ ॥ दीपके तीभि्भर्म रहण
+ करनी चाहिये, उत्तसे
मान्य ओर पूजनीय होतारै, शिवजीने पूरवकाटमे भस्म शब्दका अथं इत प्रकार कियाहै ॥ ६६ ॥
विं०सं०१
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जढराभनि भक्ष्यादि अनेकं भकारकै प्दा्थोको भस्मकर उसके सारसे देहषष्ट करती है ॥ ६८ ॥ इती रकार भरपंचकर्ता परमेश्वर शिवजी अपने ¢
पीन भरप॑चको जाकर अपने अधिष्ठान परप॑चको भरहणकर सार्हण करते है ॥ ६९ ॥ भरपचको भस्म करके उस्न भस्मको शिवजी अपने £
आरोपण करते हँ उद्भूढन विभूति मठनेके बहानेसेही उन्होने जगतका सार ग्रहण किया है ॥ ७० ॥ अपने शरीरमेही उन्होने अपना रत्न
स्थापित किया है, आकाशके सारसे केश, वायुके सारसे सख ॥ ७१ ॥ अभ्निके सारसे हदय, जोकि सारसे करि, पृथ्वीके सारसे जाल इसी
यथास्वतिषयराजासारगृहातियत्करम्॥यथामलष्याःसस्यादीन्दग््वासारंभजतिवे॥६७॥ यथारिजाठरायिशभक्यादीन्विनिधा
न्बहून् ॥ दग्वासारतरंसारात्स्वदेदंपरिपुष्यति॥&<॥ तथाम्रपंचकर्तापिसशिवः परमेश्वरः ॥ स्वाधिष्टेयमपंचस्यदग्ध्वासारणरी | ८
तवान् ॥६९॥ दग्ध्वाप्रपंचतद्वस्मस्वात्मन्यारोषयर्किवः ॥ उद्ूलनेनव्याजनजगत्सारशृहीतवान् ॥७०॥ स्वरत्नेस्थापयामास ¢
स्वकीयेदिशरीरके॥केशमाकाशसारेणवायुसारेणवेुखम्७१॥ हदयचाग्निसरेणत्वपांसारेणवैकरिम्॥ जाजुचावनिसरिणतदत्सर्ं 6
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तरदगकम् ॥७२॥ ्रहमविष्णवोशरढ्ाणासारचेवतरिपुडकम्॥ तथातिककद्पेणललागनौमहेश्वरः ॥७३॥ भवृद्धयासर्वमेतद्धिमन्य
तेस्वयमित्यसो॥ रपचसारसर्ैस्वमनेनेववशीकृतम्॥७४।॥ तस्मादस्यवशीकतीनास्तीतिसशिव स्मृतः ॥ यथासर्वषृगा णां चरिसको
मृगर्हिसकः ॥ ७५ ॥ अस्यहिसामृगोनास्तिततस्मात्सिद्इतीरितः ॥ शंनित्यखमानंदमिकार'वुरूष स्मृतः ॥ ७६ ॥ ट
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जिस भकारे राजा अपने राज्ये साररूप करके श्रहण करता है जेसे तुष्य धान्यादिको जलाकर सारभ्रहण करते है ॥ ६७ ॥ जिस प्रकार &
भकार उनका सव अग् है ॥ ७२ ॥ यह त्रिष बरहा विष्ण ओर बका सार है, ओर तिरकहपते ठलारके अन्तपे महेश्वर है ॥ ७ ३॥
जिन्न कारणे यह महेश्वर ( म ) जगत्की दधिकं निमित्त शोभित होते ई, ओर इत सब सारको स्वयं समथं मानते है इससे इन्हीने सब
पचक सार वशीमूत कर छिया है ॥ ७४ ॥ इस कारण इतका वश कएनेबाठा ओर फो नहीं केवल शिवही है जिप्त भकार सव मृगो
हिसकरिह हिंसा करता है ॥ ७५ ॥ इसका कोई हसामृग ( मारेबाटा ) नही है इसी यह सिंह कहठाता है, इसी भकार ( शं ) >
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नित्यद्चख आनंदहप ( इ ) रुष ( व ) शक्ति अमूत स्वरूप इन_ तीनोंको मिरुकर शिव शब्द होता है, अथौत नित्य आनन्द् स्वह्प
॥ ५४ ६ शक्तिमान् अमृतमय परुषको शिव कहते है, यह शिव शब्दका अर्थं हभ, इस कारण इती रक्षणे अपनी आत्माकौ शिवह्प करके शिवृक)
पूजा करे ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ उत्ते पहछे मस्म र्गा त्रष्ड् धारण करे, पूजा समयम् जस्तहित धारण करे ओर शुद्धिकै निमित्त निजट्
धारण करे ॥ ७८ ॥ दिनम रातमे ली या परुष कोई हो पूजाकै निमित्त सज भरुमरकर िषण्ड् धारण करे ॥ ७९ ॥ जो सज भस्मस
(3 न्द, ~. ५
तिष्ण् धारण कर पूजा करता है उस्तको शिवपूजा करनेका पर्णं फक मिठता है यह निश्वय हं ॥ <° ॥ शिवमच्रमे भस्म धारण करकं उत्तम्
वृकारःशक्तिरग्रतमेलनंशिवउच्यते ॥ तस्मादेवंस्वमात्मानंशिवृङ्कत्वाचैयेच्छिवम् ॥ ७७ ॥ तस्मादुदधूलनेपूर्वतिपंड्धार
यत्परम् ॥ पूनाकारेहिसजलश्ुद्धयर्थनिजलंभवेत् ॥ ७८॥ दिवावायदिवारभरौनारीवाथनरोपिवा ॥ प्रजाथसजलभस्मचि
पदेणवधारयत् ॥ ७९॥ भिपुडंसजलंभस्मधृत्वाप्ूरजाकरोतियः ॥ शिवपूर्जांफलंसांगंतस्येवटिसनिशितम्॥ ८० ॥ भस्मवेशि
वर्म्रणधृत्वाचत्याश्रमीमवेत् ॥ शिवाश्मीतिसप्रोक्तः शिवकपरमोयतः॥ ८१ ॥ शिवन्रतेकनिषठस्यनाशौचनचसूतकम्॥ लला
टेऽगरसितंभस्मतिलकंधारयेन्मृदा ॥ <२ ॥ स्वहस्ताद्ररुहस्ताद्राशिवभक्तस्यलक्षणम् ॥ शुणान्शयइतिप्रोक्तोगुर्शब्दस्यविग्रहः
॥८३॥ सतिकारान्राजसादीन्गणान्सषेव्यपोहति ॥ य॒णातीतःपरशिवोुङहूपंसमाभितः ॥८४॥ गुणयंभ्यपोद्याम्रशिवंबोधय
तीतिसः ॥ विश्वस्तानांतशिष्याणायुररित्यमिधीयते ॥ ८५ ॥
आश्रमी होता है शिवका परायण होनेमे शिवाश्रमी कहलाता है ॥ < १ ॥ जिशकी शिवतम निष्ठ हे उसे अशौच ओौर सतक नहीं ख्गता
ठठारके अग्रभागमे सफेद भस्म ओर मृत्तिकाका तिरक धारण करे ॥८२॥ तिक अपने हाथमे वा गरक हाथ धारण करे यह शिवभक्तका
लक्षण है जो ८ य॒ ) गणको शिष्यम ( र ) आरोपण करता है उस्चका नाम शुर हे यही य॒रुशब्दका अथ हे ॥ ८३ ॥ अथवा जो विकार
| रहित राजस य॒णोको दूर करता है बह गुणातीत परमशिव टप कहा गया है युर शिवप हे ॥ ८४। अथवा जो विश्वस्त शिष्योके तीनों | £ |
(२) राण दूर कर शिबका बोधन करता ह उसीका नाम युर है ॥ ८५ ॥
8 > + > 494 > 49
(+> + ०२4 > 4
०९९ > >९ 4632.
| कारण पंडित युका शरीर पूज्य रिग है गर् छिगकी पूजाही गरशषरूषा है ॥ ८६ ॥ मन पचन कर्मसे गुरूकी सेवा करे तो शाज्घकी
भाति होती है जो कुछ गर्ने आदेश किया है वह शक्य हो वा अशक्य हो॥<८७॥प्राण या धनके दवारा संपादन करनेसे पवि आत्मा ¢
है, इसी कारण जो शासनके योग्य हो उसीका नाम शिष्य है ॥८८॥ सशिष्य शरीरादि अर्थं सब यारुके निकट प्रदान करके भोजनकी सामी ¢ ।
पहुठे उनके निवेदन कर पीठे उनकी आज्ञासे आप भोजन करे ॥ ८९ ॥ शिष्य सदा शिष्यत्वकै योग्य होनेसे प्रही 8, इस कारण भमाण है कि
तस्माद्वङशरीरतुशृरुणिगभवेदबुधः ॥ य॒रूखिगस्यपूजातुगुरुशशषणभवेत् ॥ ८९ ॥ अतकरोतिश्षाकायेनमनसागिरा ॥
उक्तयदगरूणापूर्वशक्यवाऽशक्यमेववा ॥ ८७ ॥ करोत्येवदिपूतात्माप्राणिरपिधनेरपि ॥ तस्माद्रैशासनेयोग्यःशिष्यहत्यमि
धीयते ॥ ८८ ॥ शरीराचर्थकंसरमगरोदत्वास॒शिष्यकः ॥ अग्रपाकनिवेयमेभुनीयाद्गवयज्ञया ॥ ८९ ॥ शिष्यःपुहतिषो
क्तःसदाशिष्यत्वयोगतः ॥ जिहाख्गान्मव्युक्रकणयोनौनिषिच्यवे ॥ ९० ॥ जातःपुवोभथपु्ःपितसंपूजयेदगङ्म् ॥ निमन
यतिपुत्रैवेससारेजनकःपिता ॥ ९१ ॥ सतारयतिक्षसारादथ॒श्वैगोधकःपिता ॥ उभयौरंतरंज्ञात्वापितरथरूमचयेत् ॥ ९२ ॥
अगुभ्रूषयाचापिधनाचेःस्वाजितेसम् ॥ पादादिकेशपर्यतंखिगान्यंगानियद्यरोः ॥ ९३ ॥ धन्यैःपाडकायैःवादसंयणा
दिभिः ॥ क्षानाभिषेकनेवेवे भोजनेश्चप्रपूजयेत् ॥ ९४ ॥
जिहारूपी ठिगसे मंजरूपी वीये कणेरूप योनिम भवेश करनेते ॥९.०॥यह उत्पन्न होता है, इसी कारण यहं मंब कहाता है, इसको उचित ह
कि यह् पिताका सदा पूजन करे, उतपन्न करनेवाछा पिता पत्रक संसारम डारता है।९१॥ओौर ज्ञानदाता पिता य संसारे तार दैता है, इस
प्रकार दोर्नोका अन्तर जानकर गुरुरूप पिताका विशेष पूजन करे ॥९२॥ ओर अपने उत्पन्न हुए धने यर्की अगशुशूषा करे पभस छेकर शिर
& || कैश पयन्त गारूके सव शरीर शिवटिगस्वरूप है॥९३॥उनको धनप, परदुकादि, चरण दाबने्े व अभिषेक नैवेय ओर भोजने सत्कार कर॥९४ ६
||
१९
न्यव
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| रुकी पूजासेही परमात्मा शिवकी पूजा होजाती है यस्की पूजाते बचा हा सब द्रव्य आत्मशदि करनेवाला है ॥९५॥।जढ ओर अनादिते बने हए
॥५५॥|| || पदाथ य्पूजासे अवशेष रहनेसे शिवकी उच्छिषटताके समान ह, वह शिष्यो तथा शिवभक्तौको रहण करना चाहिये, हे बाहमण।वह भोजनक योग्य है
॥९६॥ ओौर जो द्द युको आज्ञा विना ग्रहण कौ गई ह, बह सव चौरवस्ुके समानहै यरु भी विशेष ज्ञाता होना चाहिये, उसको यत्नपूवेक रहण
४ करे ॥ ९७ ॥ अज्ञानका दूर करनाही यरका साध्य है सो विशेष ज्ञानी गरही अज्ञान दूर कर् सकताहै, प्रथम कमेपूतिके निमित्त विन्न शात करना ¢
¢ चाहिये ॥९८॥ निरविंघ्र ओर पुणे अगते फिया हुआही कम सफठ होता है, इस कारण सबकमकी आदिमं गणेशजीका पूजन करना चाहिये॥९९॥
¢ यरुपूजेवपूजस्याच्छिवस्यपरमात्मनः॥ गरुशेषंतयत्सर्वमात्मडद्धिकरभवेत्॥ ९९॥ य॒रोःशेषःशिवोच्छि्टंजरमत्नादिनिमितम् ॥
¢ शिष्याणांशिवभक्ताना्राह्ं भोज्य भवेदिजाः ॥९६॥ गरवलज्ञाविरदितंचोरवत्सकभवेत् ॥ रोरपिविशेषज्ञयत्नरहणीतवेगुरम् ॥
¢ ॥ ९७ ॥ अज्ञानमोचनंसाध्यंविशेष्ञोदिमौचकः ॥ आदौचविष्नशमनंकतं््यकपूतये ॥९८॥ निविष्नेनक्रतं सां गंकमेवेसफलं
¢ भवत् ॥ तस्मात्सकलकर्मादौविष्नेशंपूजयद्बुधः ॥ ९९ ॥ सर्वबाधानिवरस्यथसवान्देवान्यजेदबुधः ॥ ज्वरादिग्रथिरोगाश्वबा
¢ धाह्याध्यात्मिकामता॥१००॥ पिशाचजबकादीनांवर्मीकायुद्धवेतथा ॥ अकंस्मदेवगोधादिजंतूनांपतनेपिच ॥१०१॥ गुहेकच्छ
4 दीनांप्रसुतिविषयेपिच।॥१०२॥ भाविदुःखंसमायातितस्मात्तिभोतिकामताः॥ अमेध्या
|
पस्प्लीदुजनादशनेपिच ॥ वृक्षनारीगवा
शनिपातश्चमहामारीतथेवच ॥१०३॥ ज्वरमारीविषूचिश्चगोमारीचसरुरिका ॥ जन्पक्षुब्रहसंकरांति्रहयोगास्वराशिके ॥१०७॥
सब बाधा शांत कनेक पंडित सब देदताओंका यजन करे, ज्वरादिक ओर धैथिरोग बाह्य ओर आध्यात्मकादि संपूण बाधाके निवृत्त करनेवााहं
वि०सु०१
अ० १८||& | ॥१००॥ पिशाच जम्बुकादि वाल्मीकादिका उपद्रव ओर अकस्मातुही गोधादि जन्तुका पात ॥१०१॥ घरमे कच्छप सपं खी दुजनोंका दशन
वृष नारी ओर गवादिका भरस॒व देखना ॥१०२॥ इनके दशनसे जआगेको दुःख होना जाना जाताहे, इससे यह भौतिक पातकं होते है अपवित्र
बस्तु वजपात महामारी ॥१०३॥ ज्वरमारी विषूचिका ( हेजा ) गौमारी वसन्तरोग जन्म॒रक्षत्रपर ब्रहोंका आगमन संक्रांति शरहयोग अपनी
ववस्य
शशिप्र होना ॥ १०४ ॥ ओर स्वप्नका देखना यह स्तव आधिदैषिक कहलाते है, मृतक चांडारु प्रतितका स्पश होना अथवा
अन्तर गृहमे प्रवेश करं ॥ १०५ ॥ एसे अरिष्ट होनेसे भी होनहार दुःख सूचित होता हे, बुद्धिमानको उचित है उस्ष दोषकी शान्तिके छियि
शान्तियज्ञका अवुष्टान करं ॥ १०६ ॥ देवाय गोढ युज्ञसथान गृहांगण ऊँचे स्थाने दो हाथ प्रिमाणकी वेदी कर उत्ते अठंकार कर
॥ १०७ ॥ भार् ( आढ हजार तो ) मात्र व्रीही ( जौ ) धान्य स्थापन कर फैठावे वीच कमल छिस, ओर फिर दिशाओं कमठ
टिखि ॥१०८॥ सतसे ठपैर नये षडेको पूप देकर बीचमे उस महाकुम्भको स्थापन कर दिशाओकि स्थानये भी कुम्भ स्थापन करं ॥१०९॥
दुःस्वप्नदर्शंनायाश्चमतावेध्धिदेविकाः॥ शवचांडारपतितस्पशरचतगूहेगते॥। १ ०९९॥ एतादशेससुत्पत्रभाविषः खस्य चके। ।शांति
यज्ञतुमतिमान्डु्यत्तदोषशांतये॥१०६॥ देवारयेऽथगोष्ठवाचैत्येवापिगृरहांगणे॥ रदेशोत्रतपिष्ण्यवेद्िदस्तेयस्वरंकृते ॥१०७॥
भारमतव्रीहिधान्यंप्रस्थाप्यपरिसत्यच॥ मध्येविरिख्यकमलंतथादिश्चुविरिख्यवे॥१० <॥तंत॒नावेषटितङंभनवगुग्युरुधूपितम्॥
मध्येस्थाप्यमदाङ्कभंतथादिक्ष्वपिषिन्यसेत् ॥१०९॥ सनालत्रकृकृ चादीन्कृशांअतथा्टस्॥ पूरथन्मजपूतेनपंचद्व्य॒युतेनहि ॥
॥११०॥ प्रिपेत्रवरत्नानिनीख।दीन्क पशस्तथा ॥ कमज्ञचप्तपत्नीकमाचायैवरयेदुधः॥ १११ ॥सुवर्णपतिमांविष्णोरिदादीनांच
निष्पत् सशिरस्केपध्यङ्कमेविष्णम व ्प्नयेत् ॥११२॥ मग दिषुयथाभतरमिद्रादीन्कभृशोयजेत् ॥ तत्त्ाम्नाचतुरथ्याचन
मोन्तेनयथ(करमम्॥ ११२॥ अ वाहनादिकिपर्वमाचरयं गेवकारयेत् ॥ आचाय॑ऋतिजासार्धतन्मन्तान्वजपेच्छतम् ॥ ११४ ॥
नाठहित् आमक कूची आदिको आढ कठरशोे पच्चद्र्य (लोग कंकोड अगर जायफर कपूर) सहित भंत्र पढकर .जर्े पूणं करं ॥११०॥
ओर कमते नीछादिनवरलोको भी उकम डे, ओर कर्मके जाननेवाठे आच्यको च्ञीशहित प्रण कर ॥ १११ ॥ उस घरमे विष्णुकी ओर
दन्दादिकी सुवण परतिमाको ठि पूणेपत्रुक्त उप्त मध्यम कुम्भमं विष्णका आवाहन कर पूजा करं ॥ ११९ ॥ पूवि दिशाओं मंनपर्वक
ृद्रादि देवत।ओंका कमते पू्जन करे, उन उन देवताओक नाम् चतुर्थीं विभक्धयुक्त लेकर अन्त नमः रावे ॥११ ३॥ आचार्ये आवाहनादि
सब रत्य करावे आचये उन विष्ण आदिक मोको ऋविजोकि सहित सौ वार जपे ॥ ११४ ॥
न रवय
स
क
| जपकै अन्तम कुम्भके पथिमभागमं हवन करं, करोड, टाख, सहस अथवा १०८ एकरौ आढ आहति दे ॥ ११५ ॥ एक दिन वा नौदिन
| अथवा चालीस दिन काल देशके अनुसार यथायोग्य जप होम कर् ॥ ११६ ॥ शान्तिके निभित्त शमीका होम वृद्धिकै निमित्त पराशका
भ
हम ओर समिध अन्न धृतके पदार्थं नाममंत्र उच्चारण कर॒ हवन करं ॥ ११७ ॥ जो दव्य भ्रारम्भमं किया है वह क्रियाकै अन्ततक् करे
ओर पण्याहवाचन कराकर अन्तम कठशोके जके पोक्षण कर ॥ ११८ ॥ बह्र्णोको आहृतिकौ संख्याक अनुसार भोजन करावे, जितनी
कमस्यपश्चिमेभागेजपतिहोममाचरेत् ॥ कोटिलक्षसहलतवाशतमषटोत्तरडाः॥११९॥ एकादंवानवाईवातथा्डरुमेववा॥ यथायो
गय्कीतकार्देशावसारतः॥१ १६॥ शमीहोमश्वशांत्यथेवृतत्यथचपलाशकम्॥ समिदत्नाज्यकेदरवयेनाम्नामत्रणवाइनेत्॥१ १७1]
¦
¢ {
# आहूति दी हों उतने ही बराह्णोको भोजन करावे, आचाय ओर ऋतिज हविष अन्न भोजन करं ॥ ११९ ॥ होमान्तभं आदित्यादि सब ८
६ ए
। प्ारभेयत्कृतंदन्यतक्ियांतसमाचरेत्॥ पण्याहवाचयित्वति दिनेसपोक्षयेलकेः ११८॥बाइ्मणान्भोजयेत्पश्वाद्यावदाइतिसख्यया॥ ट
~^
आचार्यश्वहविष्याशीऋत्विजश्चभवेदबुधाः॥११९॥ आदित्यादीन्यहानिष्टासर्वहोमां तएवदि॥त्विभ्योदक्षिणांद्यात्नवरत्नंयथा ||
+
वानांततःपरम् ॥ तंजोपकरणंसर्वमाचायौयनिवेदयेत् ॥१२२ ॥उत्वातानांच मारीणां डुः खस्वामीयमःस्मृतः ॥ तस्माब्भस्यप्रीत्यर्थं
कालदानंप्रदापयेत् ॥ १२३ ॥ शतनिष्केणवाङ््यादिशनिष्केणवापुनः ॥ पाशांङ्शधरंकाठङ्यात्पुरूषरूपिणम् ॥ १२४ ॥
विसं ०१|| || देवताओंकी पूजा करे, कलिजोको यथाक्रमसे नवरत्नादि दक्षिणा दे ॥ १२० ॥ दश दान करं, अथवा बृहत दान करं षा छुवणे
अ० १८||) || दान करं, यज्ञोपवीत हृए ब।ककोको गृहस्थियोंको वनवातिर्योको ॥ १२१ ॥ सौभाग्यवती त्रिोको कन्या्ओंको इतक पीछे विधवाओंको
दान दे ओर तं्ोपकरण पूजनादिकी सामग्री सम्पूणं आचारयको देदे ॥ १२२ ॥ उत्पात मारी ओर दुखके स्वामी यमराज है, इतत कारण
यमराजकी भरीतिके निमित्त कालपरतिमाका दान करं ॥ १२३ ॥ सौ निष्ककी अथवा दशनिष्ककी सत्ति बनावे ( अश्सी चोटटीका एक कष
।
कमम् ॥१२०॥ दशदान॑ततःछ्याद्रिदानेततःपरम्॥बारानास्ुषनीतानां हिणं वनिनां घनम ॥१२१॥ कन्यानांचसभवर्णांविध ट
त
कृषं
१०८ कषेका एक निष्क होता है ) कारुको पाश अंकुशधारी रुषहप बनावे ॥१२४॥ उतत सुदणैकी प्रतिभाका दान दश्षिणाके सहित |
¢ फिर पुणयुकी सिदधिके निषित्त तिरुका दान करे ॥१२५॥ किर धृतपा्को शोधकर व्यापि दूर करनेके निभित्त दान दे, सह बाहमणोंको ¢
भोजन करावै, दरिद्र हो तो सौ बाहरणोको भोजन करावे ॥ १२६ ॥ अथवा धन न होने यथाशक्ति जिमावे, भूतादिकी शतिक निभिन्
भेरवकी महापूजा करे ॥१२७॥ अन्तम शिवका महाभिषेक कर नैेय समरथेण करे, पीछे अनेक भकारे व्यञनोते बाह्णणोको भोजन कराषे
॥ १२८ ॥ इस भकार यज्ञ करनेसे दोष शान्त होजाता हे यह शान्तियज्ञ भतिवर्षं फ़ाल्ुनमे करना चाहिये ॥ १२९ ॥ ओर द्दशनादिमे
तस्स्वर्णपरतिमादानंङयौदक्षिणयासह॥ तिरदानंततःकर्यातपरणायुष्यपरसिद्धये ॥१२५॥ आज्यावेक्षणदानं चङ्याव्याधिनिवृत्तये ॥
सहसभोजयेद्विभान्दरिदःशतमेववा१२६॥वित्ताभविद्रिद्रस्तयथाशृक्तिसमाचरेत्॥भेरवस्यमहाप्जां र्यादूतादिशां तये॥ १२७॥ ए
¦ महाभिषिरवनैवे्यशिवस्यान्तेतकारयेत्॥ ्ाह्मणान्भोजयेत्व श्वा रिभोजनङ्पतः ॥१२८॥ एवकृतेनयज्ञेनदोषशांतिमवाप्लयात् ॥ $
शातियज्ञमिमंङयादर्षेवर्षेतुफास्गुने ॥ १२९ ॥ दुदंशंनादौसयोवेमासमाञेसमाचरेत् ॥ महापापादिसंभाप्तौ कयाद्धैरवपुजनम् ॥
|| ॥ १३०॥ महाम्याधिससुत्पत्तौसंकटपं पुनराचरेत् ॥ सवाभावेदिदरस्त॒दीपदानमथाचरेत् ॥ १३१ ॥ तदप्यशक्तः स्नात्वावैय ||@
£| त्किचिदानमाचरेत्॥दिवाकःनमस्छरयान्मन्वेणाटोततरंशतम्॥ १३२॥ सहखमथुतंरक्षकोरटिवाकारयेदूबुधः ॥ नमस्कारात्मयज्ञेन ||
तषटास्युःसवेदेवताः ॥ १३३॥ त्वत्स्वहूपेषिताबुद्धिनतेऽशन्येचरोचति॥ याचास्त्यस्मददतेतित्वयिदरेविवलिता ॥ १३९॥
एक मास प्येन्त अवु्ठान करे ओर महापाप होजाने प्र भैखका पूजन करे ॥ १३० ॥ महाव्याधि ओर उत्पाते संकल्प करक फिर ४
भाचमन करे ओर सव वल्तुका अभाव हो तो दरिद्री दीपदान करे ॥ १३१ ॥ इमे मी अस्तम हो तो स्नान करके कख दान करे ओर ठ
एक सौ माढ मन्त्र जपकर सू्को नमस्कार करे ॥ १३२ ॥ अथवा दश सहस्च उक्ष अथवा करोड नमस्कार कर इस नमस्कारात्मकं
यज्ते भी सम्पूणं देवता भसन्न होजाते है ॥ १३२ ॥ शिवजीते यो भार्थना करे हे शिव ! सखण ओर दीप्यमान आपके स्वपे ६
| £
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| है बही पाप दूर करनेमे समर्थ है ॥ १३९ ॥ शिब धर्मम
॥ १४० ॥ जन्म मरण यह दोनों मायाचक्त कहा है, शिदका भायाचक्र वठिपीठ कहलाता ३ ॥१४१॥ बङिपीटतते आरम्भ करके प्रदक्षिणाके
क्रमसे दो चरण चकर 1 निकट जाय ॥१४२॥ नमस्कार करे इसीका नाम॒प्रदक्षिगा हे, दक्षिणा गमने जन्म ओर नमस्कार
करनेसे आत्मसमपेण होता है ।॥ १४३ ॥ जन्मम्रण यह दोनों शिवकी माया समर्पण करे शिककी मायामे समर्पण करने फिर आत्मको |
नत्र मेने अपनी इदि अपण कर दी है, जो कुठ मी हमारा है ह स्च सिति आपका है, अपक देलनेते कोई बभित नहीं है ॥ १३४ ॥
अपनी देहे नम्र ह, हे भभो ! आप महान् हो अपहीका होनेसषे मेरा स्वरूप शून्य नहीं हे मे तुम्हारा दास हं ॥ १३५ ॥ रेस्ा कहकर
आत्मयज्ञ॒ नमस्कार पूवक करे फिर शिवजीको नैवेय सम्पण कर ताम्बरक दे ॥ १३६ ॥ एक सौ आद शिवकर रदश्चिणा करे अथवा
तहत दशसहस्त वा लक्ष वा करोड प्रदक्षिणा करे ॥१३७ ॥ शिवकी भदक्षिणा करनेते क्षणमात्रमे सव पाप नष्ट होजति है, दुःखका
मूढ व्याधि ओर व्याधिका मूल पातक है॥ १३८ ॥ धर्मेही पाप टूर होते है, यह शाने कहा है, शवक उदेशसे जो धमे किया
नम्रोऽहंरिस्पदेहेनभोमहास्त्वमसिप्रभो॥नज्चन्योमत्स्वरूपोवेतवदासोऽस्विसांपरतस्॥ १३५ ॥ यथायोग्यस्वात्मयज्ञंनमस्कारंरकं
ल्पयेत्॥ अथाजरिवनेवेयदत्त्वातांबूर माहरेत् ॥१३६॥ शिवपदक्षिणंङ्यात्स्वयम्ट ्रंशतम्॥ सदसखमयुतंलशक्ष कोरिमन्येनकार
यत्॥१२७॥शिवधदक्िणात्सर्वपातकंनश्यतिक्षणात्॥ दुःलस्यसरुव्यापििव्याधेयूलंहिपातकम्॥ १ ३८॥ प्ेणैवहिपापानामषनो
दनरितम् ॥ शिवोद्ेशकृतोधर्मश्षमःपापविनोदने ॥१३९॥ अध्यक्षशिवधसेषुपदक्षिणमितीरितम्॥ क्रियया जपह्पंहिपरणवंतुप्र
दक्षिमीणम् ॥१४०॥जननंमरणद्द॑मायाचकरमितीरितम् ॥ शिवस्यमायाचक्रंहिबङिपीरेतदुच्यते॥ १४१ बङिपीटसमारभ्यप्राद्
क्िण्यक्रमेणते ॥ पदेपदांतरंगत्वावकिपीठेसमाविशेत् ॥ १४२ ॥ नमस्कारंततःङर्यात्मदक्षिणमितीरितम् ॥ निगमानां
नमस्त्वात्मसमपंणम् ॥ १४३ ॥ जननंमरणेद्रदशिवमायासमपितम् ॥ शिवभायार्पितद्वदोनपुनस्त्वात्मभाग्भवेत् ॥ १४७ ॥
भदक्षिणा सबसे अधिक हे, क्रियायुक्त जपहप ॐकारही प्रदक्षिणा है
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यह् दोनों नही होते ॥ १४४ ॥ जनतक यह देह क्रियाके अधीन है तवतक ओर कद होने जीव _कहलाता है ओर स्थूल कारण |
ेहोको वश करनेको यही सक्त होजाता है ॥ १४५ ॥ मायाचकके भणेता शिवही प्रभ कारण है, शिवकी पायासे अर्पण किये दंदको शिवही
दूर करते ई ॥ १४९६ ॥ शिवकै कल्पित हृदयको शिवे समर्पण करदे हे बाह्मणो ! रिवको षदक्षिणा ओर नमस्कार बहुत भह ॥ १४७
रिव परमात्माके निमित्त प्रदक्षिणा ओर नमस्कार ओर सोलह उपचारसे पूजा करनेका हाफठ होता है ॥ १४८ ॥ रेता कोई पातक नही जं
भदक्षिणा करने नाश न हो जाय, इस कारण श्दक्षिणासेही सव पापोंका नाश करे ॥ १४९ ॥ शिवपूजा करनेमे तत्पर मौनी सत्यादि यणे
यावदैदंक्रियाधीनःसजीवोबद्रउच्यते ॥ देह्यवशीकारेमोक्षइत्युच्यतेबुधैः ॥ १४९ ॥ मायाचक्रपरणेतारिशिवःपरमकारणम् ॥
शिवमायारपितदवदशिवस्तुपरिमाजति॥१४६॥ शिवेनकहिपतंद्हंतस्मननेवसमर्षयेत्॥शिवस्यातिभरिथविघात्पदक्षिणनमोद्खधाः
॥१९७॥ प्दक्षिणनमस्काराःशिवस्यपरमात्मनः॥ षोडशेरूपचारेकृतप्रूजाफरप्रदा॥१४८॥प्रदक्षिणाऽविनाश्य॑हिपातकनास्नि
शूतठे ॥ तस्मात्यदक्षिणेनेवसवैषापैविनाशयेत्॥१४९॥ शिवप्ूनापरोमौनीसत्यादिशणसंयुतः॥ रिया तपोजपज्ञानध्यानेषवेकैक
माचरेत्॥१५.०॥पेवर्दिष्यदेदृशनज्ञानमज्ञानसं शयः॥ शिवसात्निष्यभित्येतेक्रियादीनांफ़लमवेत्॥ १८.१॥ करणेनफलयातितमसः
परिहापनात् ॥ जन्मनःपरिमाजित्वाज््बुद्धथाजनितानिच॥१५२॥ यथादेशं यथाकारंयथादेहेयथाधनम् ॥ यथायोग्यंषवीत
करियादीन्छिवभक्तिमान्॥ १५२ ॥ न्यायाजितसुवित्तेनवसेतपाज्ञः शिवस्थरे॥जीव्िसादिरदितमतिहठशविवितम् ॥१६९४॥
सयुक्त क्रिया जप्, तप ज्ञान ध्याने सम्पुणं वतु करमते करे ॥ १५० ॥ रेशवयं, दिव्यदेह, ज्ञानकी भ(पि, अज्ञानका रंक्षय शिवकरी निकेटता यह
कियादिका फठ है ॥ १५१ ॥ क्रियादि आचरण करनेसे जज्ञाना नाश होता है ओर नहा भरित हू दधिरे जन्मक पाप दूरकर
॥ १५२ ॥ देशकाठ शक्ति धने अलुसार् शिवका मक्त यथायोग्य क्रियाओंको करे ॥ १५३ ॥ लुद्धिभानकरो उचिते क शिवक्षेनमे न्थायसे ६
अजित हए धने वास करे, अर्थात् न्यायके धनमे आजीविका करे, जीविस ओर छशको न करे ॥ १ ५४॥
२०
_ ह|| शवाक्षर मंते जप करने जठ ओर अन्न घुखदायकहै अथवा दरिद्रको भिक्षाका अन्नही ज्ञान देनेवाठाहै ॥ १५५ ॥ (८
॥१८॥ ||| अन शिवम भक्ति बहानेवाढा है, शिवयोगियोको भिक्षान्न शिवयज्ञके समान कहा है ॥ १५६ ॥ य किसी उपायभ्ं जहा १९ भवान
| & शुद्ध अन्न भक्षण कर मौन साधे रहे ओर शिवका गूढ़ रहस्य भकाश न करे ॥ १ ५७॥ शिवके भक्तोकोही शिवका माहात्म्य प्रकाश करक सुनावे;
शिवम रहस्य शिवही जानते दृत्रा कोहं नही ॥ १५८ ॥ शिवका भक्त नित्य शिवटिगके समीप वास करे, हे ब्राहमणो! स्थाएलिगकै आश्रय
कृरनेसे शिवरूपही अचठ समाधियुक्र हो जाते है ॥ १५९ ॥ चररिगकी पूजा करनेसे विद्वान् कमसे खक्त होजाताहै इस संहितामे शिवपद भागिक
् पचाक्षरेणजप्तंचतोयमध्नेविदः सखखम्॥ अथवाऽहुदरिदिस्यभिकषा्नज्ञानदंभवेत्॥ १५५५॥ शिवभक्तस्यभिक्षा्नरिवभक्तिविवधनम् ॥
रथुसतमितिप्राहभिकषत्नशिवयोगिनः १९५६॥येनकेनाप्युपायेनयतुनापिभूतरे॥ शदधात्नथुक्सदामौनीरदस्यनप्रकाशयेव्॥ १५७॥
ट प्काशयेत्तभक्तानांशिवमाहात्म्यमेवदि॥रदस्यशिवमंस्यशिवोजानातिनापर॥१५८॥ शिव मक्तोवतेत्रित्यशिवल्िगंसमाधितः॥
| स्थाण्गाश्रयेणैवस्थाणभेवतिभूस॒राः १५९प्रनयाचरङ्िगस्यकरमान्युक्तोभवेदधुवम्॥ सर्वुक्तंसमासेनसाध्यसाधनसुत्तमम् १६०
¢ म्यासेनयत्पुरापरोक्तयच्छरतंहिमयापुरा॥मद्रमस्तहिवोऽस्माकंशिवभवितटाऽस्तुसा। १६१ ॥ यइ पठतेऽध्यायंयःृणोतिनरःसदा॥
| शिवज्ञानंसलमतेशिवस्यकृपयाबुधाः॥१ ६२॥इतिश्रीशेवेमहाएुराणे वियेश्वरसंदितायां साध्यसाधनखंडे शिवङ्िगमहिमावर्णनं
नामा्टादशोऽध्यायः॥१८॥ऋषयचुः॥ सूतसूतचिरंजीवधन्यस्त्वंशिवभक्तिमान्। ।सभ्यगुक्तस्त्वयाल्िगमदहिमासत्फलप्रद्ः॥१॥
साधन उत्त रीति संकेते वणेन किये ठैः यह सव सानोमे खल्यहै इसी इतका नाम विवेश संहिताहै ॥ १६० ॥ जो कुछ पर्वकाठमे व्यात्जीने
कहा जोर्भने उन्न सुना हे सो तुमको सुनाया. आपका ओर हमारा ष॑ंगठहो आर आप 1शिवकी वहं भक्षित इढ हौ ॥ १६१ ॥ जो मनुष्य सदा इस
भध्यायको सुनते ओर पठते ई; हे महात्माओ ! बह शिवकी रुपासे शिक ज्ञानको भाप होतेह ॥१६२॥ इति भरीशिवमहापएराणे प्रथमवियेश्वरतंहिता
भाषाटीकाया साध्यसाषनसंडे शिवरटिगमहिमवणंनं नामाशादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ ऋषि बोठे हे बतजी ! िरकालतक जिओ तम धन्य ओर 0
वि०से०१
अ० १९
4
५
् भक्तं हो आपने ठिंगकी महिमा ओर फठका विषय सम्यक भकारे कहा ॥१॥ पाथिव महेश्वरकी महिमा आपने सवाक्ृष्ट कही है वहं
आपने व्या्तजीसे सुनी है बह हमारे सुननेकी इच्छा है ॥ २ ॥ सूतजी बोले हे सम्पूण ऋष्यो ! आप सुनो मँ तुम्हारी भक्ति ओर आद्रसे
रन्न होकर कहता हू भँ शिवकै पारथवर्दिगकी महिमा कहता हं ॥२॥ सव कहे हृए ठिंगोमे पाथैवरिग अ्ेष्ठ ह हे बाह्लणो ! उनके पूजने
बूत सिद्धिको पराप्त होगये ह ॥ ४ ॥ हरि ब्रहना भजापति पाथिवटिगको पूजन करक सब अपने ` मनोरथको प्राप्त हूए हैँ ॥५॥ देवता असुर £
मलुष्य गंधव उरग राक्षस ओरभी बहुत उनका पृजनकर परम सिद्धिको -भाप्त हुए ॥६॥ सत्ययुगे रत्नका रिग त्रेतामं सुवणका डिग, दापरमे
य॒त्रपाथिवमादेशख्िगस्यमदिमाधुना॥ सर्वत्कष्टश्चकथितोव्यासतोगरूहितं९नः॥२॥ सूतवाच॥ शृणुध्वमृषयःसवैसद्वक्तयाहरतो
खिलाः॥शिवपाथिवखगस्यमहिमाप्रोच्यतेमया ॥२॥ उकतेष्वेतेषुरिगेषु पाथिवंखिगसुत्तमम्॥तस्यप्ूजनतोविभराबहवःसिद्धिमा
गताः।।8॥ हरिरह्ला च ऋषयः सप्रजापतयस्तथा ॥ संपूज्य पाथवंलिगंपरापुःसवेंप्सितंदविजाः॥५॥ देवासुरमलुष्याश्चगंधर्वोरगरा
क्षसाः ॥ अन्येपिबदवस्तंसंप्ूज्यसिद्धिगताःपरम् ॥६॥ कतेरत्नमयैखिगंबेतायांहेमसंभवम् ॥ द्वापरेपारदंरष्ठपाथिवंतुकरौयओे
॥७॥अष्टसूतिंषुसवीसुमूतिवेपाधिवीवरा॥ अनन्यपूजिताविप्रास्तपस्तस्मान्मदत्फलम्॥ ८॥ यथास्ेुदेवेषुज्ये्ठःरष्ठोमहेश्वरः॥
एवक्वषुटिगेषुपाधि्वशरठसच्यते ॥ ९ ॥ यथानवीषुसवासुन्येष्ठाश्रष्ाञरापगा ॥ तथासवेषुखिगेुपाथिवंभ्रषठ्चच्यते ॥१०॥
यथास्ेुमनेषु्रणवोदिमदान्स्मृतः॥ तथेदंपाधिरवश्रष्ठमाराध्यपूज्यमेवहि॥११॥ यथासरवेषुवणेषुबाद्मणःष्ठउच्यते॥ तथासवेष
दिगेषुपाधिवंश्रषठमुच्यते ॥१२॥
र अं ८ ङि ॥ हे ~ 5 {= >) छ
पारिका भौर कलिमुगमे पार्थवर्टिग शरेष्ठ हे ॥ ७ ॥ सव आढ मूर्तियो पाथैव सूति ष्ठ है हे ब्राक्षणो ! उमका पूजन् कंरनेसे तपसे भी
अधिक फट है ॥ < ॥ जसे सब देवताओंमे महेश्वर ज्येष्ठ ओर भेष्ठ है इसी प्रकार सव दिगो पाथिव दिग श्रेष्ठ हे ॥९॥ जेसे सब नदियों
ध < हि ५९ धिवङिग प [ब = जेस ० ०५५९ ॐ भ्य
गगा श्रेष्ठ ह इसी प्रकार सव लिगं पा भष ह ॥१०॥ जसे सब ममं ऊकार शष्ठ हे इसी भकार पाधेविग गरेष्ठ ओर पूजनीय
है ॥ ११ ॥ जसे सब वर्णोमं बाह्मण भ्रष्ठ है इसी भकार सबदिगोमे पार्थिव भ्रष्ठ है ॥ १२ ॥
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| जेते सब ऽरीयोमे काशी भ्रष्ठ है इसी भकार सवठिगोमिं पार्थिवरिग ष्ट है॥ १३ ॥ जेसे स॒ब वतमं शिषरातरित्रत् भ्ठ है सेह सव गोम
॥१९॥|| पाथिवर्टिग भेषठ हे ॥१४॥ जिस भकार सव शक्तिम शेवी परा शक्ति हे उसी भकार सव लिङ्गम पार्थवलिग श्रेष्ठ हे ॥१५॥ पार्थिव ईिगके
¢ कृरके जो ओर देवताकी पूजा करता ह वह प्रूजा ओर स्नानदानादिक वृथा होता हे ॥१६॥ पाथेव आराधन पवित्र ओर पण्यप धन, आयुका
ट बृढानेवाला हे तष्ट पट लक्ष्मीक देनेवाला ओर कार्यका साधन करनेवाला हे ॥१ ७॥ जो अच्छे उपचार ओर भक्ति भरद्धाके सहित सव कामना
ठ यथापुरीषुसवांसुकाशीशरेठतमास्मृता॥ तथासरवैुरि्गेषुपाथिवशरष्ठञुच्यते ॥१२॥ यथानतेष्ठसर्वषुशिवरा्रिव्रतंपरम्॥ तथासवं
षखिगेषठुपाधिवंभषठभुच्यते ॥१४॥ यथादेवीषुसवांसुशेवीशक्तिःपरास्मृता ॥ तथास्वैषुखिगेषुपाथिरवश्ष्ठसुच्यते॥१५॥ प्रकृत्या
¢ यिवंलिगंयोन्यदेवंप्रपूजयेत्॥ वरेथाभवतिसापूजास्नदानादिकंवृथा॥ १६॥ पाथिवाराधनंपुण्यंघन्यमायुर्विवर्धनम्॥ तुष्टिदेपुिदं
श्रीदंका्थसाधकसत्तमेः ॥१७॥ यथारन्धोपचारैधभक्तया श्रद्धासमन्वितः ॥ पूजयेत्पार्थिवं छिगं सर्वकामार्थसिदिदम् ॥१८॥
¢ यःकृत्वापाथवंङिगेप्ूजयेच्छुभवेदिकम्॥इहेवधनवाज्च्छीमानंतेश्रोमिजायते॥ १९॥िसंध्ययोर्चयद्धिगंङृत्वाविल्वेनपार्थेवम्॥
द्शेकाद्शरकयावत्तस्यपुण्यफलश्रणु ॥२०॥ अनेनेवस्वदेहेन्ढलोकेमहीयते ॥ पापहं सवेमर्त्यानां दशनात्स्पर्शनादपि ॥२१॥
(|| जीबन्क्तःसवै्ञानीशिवएवनसंशयः ॥ तस्यदशीनमव्ेणयुकतिक्ति्जायते ॥२२॥ शिवयःपूनयेतित्यकृत्वारगंतपाधिवम्॥
, ||| यावलीवनपर्ैतंसथातिशिवमन्दिरम्॥२३॥
ह ||देनेवारे पार्थिवरिगका पूजन करता है ॥१८॥ ओर जो पाथिव छिग करक वेदीका पूजन करता हे, यही धनवान ठक्ष्मीवान् होकर अन्तम
[९ || खटोकको जाता है ॥१९॥ जो बिल्वपत्रसे तीनों सध्याओंमे दस्च ग्यारह बारह बार पूजन करता है उसके एण्यका फल सुनो ॥२०॥ इती
५ दहसे बह रटोकको भाप होता है सब मनुष्यकं पाप उक दशन ओौर स्पशते जाते रहते है ॥५१॥ वह ज्ञानी जीवन्छक्त हआ शिवहपही है ट
इसमे संदेह नहीं उसके दशेनमाजसे भुक्ति खकिति होजाती है ॥२२॥ जो पार्थिवडिग बनाकर नित्य शिवका प्रूनन करता है ओर जीवनपरयैन्त
विरस
अ० १९
व 0८49 ज
८५ र
पूजन करनेवाखा शिवके लोकम जाता है ॥ २३ ॥ बह शिवपूजनसे अनन्त वर्षोतक शिवछोकमे स्थित होता है ओर सकाम पूजन करने |
ण्डका राजा होता है ॥ २४ ॥ ओौर जो नित्य पाथिव ङिगको कामनारहित पूजन करता है वह सदा शिवरोकं स्थित हुआ सायुज्य
मुकितिको पराप्त होता है ॥ २५ ॥ यदि बाह्मण शिक्कै पाथिवर्टिंगका प्रूजन न करे तो वह शूनाकं घोर नरकको पराप्त होता है ॥ २६
जिस किंसी विधिसे हो छिगिको मनोहर बनावे पेचख्रका विचार पाथिव ङ्गम न करे ॥२७ ॥ अखण्डटिग करना चाहिये खण्डयुक्त न
करे, दो खण्डका करनेसे पूजाफखकी भराति नहीं होती ॥ २८ ॥रत्न सुण पारद स्फटिक पाव पुष्पराग उत्पन्न अखण्ड ठिगकी कल्पना
मृडनाप्रमितान्वषौञ्छिवरोकेटि तिष्ठति ॥ सकामः पुनरागत्य राजेन्द्रोभारतेभवेत् ॥२९॥ निष्कामःप्ूजयेत्नित्यंपाथिवंङ्गिषु
तमम् ॥ शिवलोके सदातिषठत्ततःसायुज्यमाप्ठयात् ॥२५॥ पाथिवंशिवटिगंचविपरोय॒दिनप्ूजयेत् ॥ सयातिनरकंघोरंश्ुलपोत
सुदारुणम्॥२६॥ यथाकथंचिद्विधिनारस्युटिगंप्रकारयेत् ॥ पंचसु्रविधानंचपाथिवेनविचारयेत् ॥ २७ ॥ अखण्डंतद्धिकतैम्य
नविखण्डंप्रकारयेत् ॥ 1 ॥२८॥ 1 ॥ ग पुष्परागोत्थ
मखडतुपरकारयेत्॥२९॥ अखंडंतुच्रखिगद्विखंडमचरंस्मृतम्॥खंडाखंडविच।रोयसचराचरयोःस्मृतः॥ २०॥ वेदिकातुमहावि्या
किगदेवो महेश्वरः ॥ अतोदिस्थावरेलिगेस्मृताथष्ठादिखंडिता ॥ ३१॥ वि अलञजय
परोक्तशेवसिद्धान्तवेदिभिः ॥ ३२॥ द्विखंडंतुचरंलिगंवेन्त्यज्ञानमोदहिताः ॥ नैवसिद्धान्तवेत्तारोखुनयःशान्चकोविदाः ॥३३॥
अखंडंस्थावरंलिगंद्रिखडंचरमेवच ॥ येदरवन्तिनरामूढानपूजाफरभागिनः ॥३७॥
करे ॥ २९ ॥ चरङ्ग अखण्ड ओर अचर द्विखण्ड कहराता है यह खण्ड असण्डका विचार चराचरम होता है ॥ ३० ॥ वेदिका महाविया है
महेश््रदेव टिगरप है इसकारण स्थावर छिगमे द्विसण्डता कही है ॥ ३१ ॥ विधानरे स्थाव रछिग दोखण्डका करना चाहिये रव सिदान्तके
जाननेवालोने जेगमको अखण्ड कहा है ॥ ३२ ॥ चरिगको अज्ञाने मोहित हए दोखण्डका करते है वे खनि शाक्षमे पंडित ओौर सिदान्तके
जाननेवारे नहीं है ॥ ३३ ॥स्थावररिग भलण्ड ओर चर द्विखण्ड है जो विधिका उद्षन करते ह वे पूजाके फलभागी नही ह ॥ ३४ ॥
+~
त 4 +
` च
$सकारण शाचलोक्तं विधानते अखण्ड ओर चरसंज्ञकं छिगको ओौर दोसण्डयुकत स्थावर ठिगको निमीण करे ॥ ३५ ॥ अखण्डरूप चरिगम्
हदं पजा सम्ूणैतः फठकी देनेवाखी है दोखण्डयुक्त वरे पूजा महाहानि देतीहे ॥ ३६ ॥ अखण्ड स्थावरमं कीडूद पूजा कामयुक्त फक नहीं देती
ु ओर वित्र करनेवाटी है एसा शाञ्च जानने वाने कहा है ॥ २७ ॥इति शरीशिवमहाष्राणे प्रथमाविये° भाषाटीकायां साध्यम्नाधनखण्डे पाथिव
शिवर्टिगपूजनमाहातम्यवर्णनं नामकोनरविशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ खतजी बोरे वेदज्ञाता भक्तोको पार्थिवपूजा कहते है जोवेदिक मागमे मुक्रितखक्रितकी
तस्माच्छाश्नोक्तविधिनाअसंडंचरसंज्ञकम् ॥ द्विखंडंस्थावरंखिगंकरतन्य॑परया्चदा ॥३५॥ अखडेतुचरेप्ूजासम्पूर्णफलदायिनी ॥
दविखंडत॒चरेपूजामहाहानिप्रदास्मृता॥३६॥ अखंड स्थावरेषूजा न कामफ़र्दायिनी। प्रत्यवायकरीनित्यभित्यक्तंशाश्चवेदिभिः॥
३७॥इतिश्रीशिवमहाएराणेविधेश्वरसंहितायांसाध्यसाधनखण्डपाथिवशिवट्िगपूजनमाहात्म्यव्णनेनामेकोनर्विशोऽध्यायः। १९
सतउवाच ॥ अथवैदिकभक्तानंपार्थवारचा निगद्यते ॥ वेदिकेनैवमार्गेणक्तिसुक्तरदाथिनी ॥१॥ सूबक्तविधिनास्नात्वासंध्यां
कृत्वायथाविधि॥ बरह्मयज्ञविधायादौततस्तप्पणमाचरेत्॥२॥ नैत्िकं सकटंकामं विधायानेतरंपुमान् ॥ शिवस्मरणपूर्वहिभस्म
रदवाक्षधारकः ॥३॥ वेदोक्तविधिना सम्यकसंपूरणफलसिद्धये ॥ प्रूजयेत्प्रयाभक्त्यापा्थिवंखिगदुत्तमम् ॥९॥ नदीतीरे तडागे च
पर्वतेकाननेऽपिच ॥ शिवाल्येश्ुचौदेशेपाथिवाचाविधीयते॥५॥ शुद्धभदेशक्षभूतांभदमाइत्ययत्नतः॥ शिवङ्गप्रकल्येतसावधा
नतयाद्विजाः ॥ & ॥ विपरिगौरास्म्रताशोणाबाहुजेषीतव्णका ॥ वैश्येकृष्णापादजति्चथवायञयाभवेत् ॥ ७॥
दैनेवाटी हे ॥ १॥ अपने कहे सत्रकी विधिसे ज्ञान करके विपिपूर्वक सध्या करके पथम ब्रह्मयज्ञ करके फिर तर्पण करे ॥ २॥ फिर य
परुष सम्पूणं नित्य कमे करके शिवका स्मरण कर भस्म ओर रुदाक्षको धारण करे ॥ ३ ॥ वेदकी विधित सम्पूण फलकी सिद्धिके निभि
परमभक्तसे पाथिव छिगका पूजन करे ॥ ४ ॥ नदीकै किनारे सरोवरके तटपर प॑त वा वनमें शिषाख्य वा पवित्र देशमे पाथवपूजा करन
कही है ॥ ५ ॥ ह ब्राह्मणो ! शुद्ध देशम उत्पन्न दुई मृत्तिका यत्ने खाकर सावधान हो शिवङिगकी पूजा करे ॥ ६ ॥ बाह्म गौर,
॥ य+ ज +^ + 9
=-= ~=
उ+ जथ २
स
| पीतवणं वेश्यम, ओर शूद्रमे कष्ण अथवा जेसी हो ॥७॥ मृत्तिका लेकर यत्नसे छग बनावे उस मृत्तिकाको बहुत पवित्र देशम स्थापनं
करे ॥ < ॥ उसको जके सशोधन कर शनेः २ उसके पिण्ड बनाकर षेदमार्मसे इन्दर ठिगको बनावे ॥ ९ ॥ फिर भुक्ति सुकिंत फलकी
्राप्तिकै निमित्त उसका पुजन करे उसका प्रकार मेँ कहता हं तुम सावधान होकर सुनो ॥ १० ॥ "नमः शिवायः इस मंत्रषे पूजाके दव्यको
रक्षण करे “ भूरसि › इस भेत्रे क्षे्रसिदधि करे ॥ ११ ॥ "आपोस्मानु" इस मंत्रसे जका संस्कार करे ` नमस्तेरुद › इस मंत्रे स्फारिकबध ५
समद्यमृत्तिकांलिगनिमीणाथप्रयत्नतः।॥अतीवश्भदेशेचस्थापयेत्तांमृदंश्ुभाम्८॥सशोध्यचजलेनापिपिंडीकृत्यशनेःशनेः॥ विधी
येतञ्युभर्गंपाथिवरबेदमागैतः॥९॥ ततः संपूजयेद्धक्तयाभुक्तिशुक्तिफलाप्तये ॥ तत्प्रकारमहंवच्मिशणष्वंसंविधानतः ॥१०॥ नमः
शिवायमंम्रणासैनंद्रग्यचप्रोक्षयेत्॥भूरसीतिचमेेणक्षेजसिद्धिपरकारयेत्॥११॥ आपोस्मानितिम्रणजलसंस्कारमाचरेत्॥ नमस्ते
शुद्रभन्रणफाटिकाबधमुच्यते॥१२॥ शं भवायतिमं्रणक्षेवशयुद्धिपरकारयेत्॥ नमःपूवैणकुर्यात्पंचामृतस्यापिप्रक्षणम्॥ १३॥ नीलग्री
वायमत्रणनमःपूवेणभक्तिमान्॥ चरेन्छकरणिगस्यप्रतिष्ठापनघुत्तमम् ॥१४॥ भक्तितस्ततएतत्तश्दायेतिचमंजतः॥ आसनंरमणी
यवेददयद्विदिकमार्गकृत्॥ १५॥मानोमहान्तमितिचमेणावाहनेचरेत्॥ यातेष्देणमेत्रणसंचरेदुपवेशनस्॥ १६॥ संजणयामिषुभिति
न्यासंकुय्यांच्छिवस्यच ॥ अध्यवोचदित्िप्रम्णाधिवासंम्ुनाचरेत्॥१७॥मननासौजीवइतिदेवतान्यास॒माचरेत्॥ असौयोवसपं
क
तीतिचाचरेदपसपणम्॥१८॥ नमोस्तुनीलग्रीवायेतिपाद्यमनुनादरेत् ॥ अर्व्यचश्द्रगायञ्याऽचमनंभ्यं बकेणच॥१९॥
करे ॥१२॥ "नमः शभवायः इस मंत्रसे क्षेवशुदि करे ओर नमः पूर्वक प॑चागृतका परोक्षण करे ॥१३॥ "नभो नीटथीवाय" इस भसे भक्तिमान्
मनुष्य शिबरिगकी प्रतिष्ठा करे ॥ १४ ॥ एतत्ते रदाय इस भजसे भक्तिपूर्वक वेदभासे रमणीय आस्षनदे ॥ १५ ॥ “ सानो अहान्त › इस
मत्से आवाहन करे याते रुद्र इस मत्से उपवेश करे ॥१६॥ "यामिषुभूः इस मंसे शिवका न्यास करके "अवोचदिति" संचरते मेभपुर्वक अधिवासन
कृरे ॥ १७ ॥ “असौ जीव इति इस मंत्रते देवतान्यास करे 'असौयोऽवसप॑तीति' इससे उपपण करे ॥१८॥ "नमोस्तु नीरुधीवाय' इस अंते
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| पायस्नान करे रुढगायत्रीते अर्यं दे ज्यम्बक मंसे आचमन करावे ॥ १९ ॥ # दधिक्राव्ण › इस भंत्रसे द्धि स्नान् करावे ' धृतंयाव इस
॥६१॥ ||| मंते एतस्नान करावे "पयः एृथिव्यामू इस मंत्रे दुषसे स्नान करावे ॥२०॥ भपुवाव, मयगक्त) मधुमान् इन मोस ॥२१॥ मुष ओर
ट लाड स्नान करापे यह पृचामृत है अथवा पराय मंत्रो ओर पंचामृतसे स्नान करावे.॥ २२ ॥ 'मानस्तोकै' इस मनसे किवंधुन करे नमो रै
त धृष्यकेः इतस उत्तरीय व्च धारण करावे ॥ २३ ॥ "यति हेति इन चार मंत्रे भरमपूवक भक्त जन वद्ध समपण करे ॥ २४ ॥ नम् श्भ्यः ट
पयःपरथिव्यामितिचपयसास्नानमाचरेत् ॥ दधिक्रान्णेतिमेत्रेणदधिस्नानं च कारयेत्॥२०॥ घृतस्नानेखटुघरतंघृतंयवितिर्मच्तः ||
| मधुवातामधुनक्तंमश्चमात्रहतिच्य चा ॥२१॥ मधुखंडस्नपनंप्रोक्तमि तिपचास्त स्पृतम् ॥ अथवापादयमत्रेणस्नारनपचामृतेनच॥ ५ |
॥२२॥ मानस्तोकेहतिपरेम्णामेत्रेणकटिवेधनम् ॥ नमोधृष्णवेइतिवाउत्तरीयचधापयेत् ॥२३॥ यतिहेतिरितिप्रम्णा्छकचतुष्के क
¢ णवेदिकः ॥ शिवायतिधिनाभक्तश्रेदश्लसमर्पणम्॥२७॥ नमःश्वभ्यइतिपरेम्णागंधंदव्यादचास्धीः॥ नमस्तक्षभ्यइतिचाक्षतान्मेत्रे |<
६| णचारपयेत्॥२८५॥ नमःपार्यायहतिवापुष्पंत्रेणचा्येत्॥ नमःपण्यां यहतिवािल्वपजसमर्पणम्॥२६॥ नमःकपदिनेचेति षूद |
|| ायधाविधि॥ दीपेदच्ाचधोक्तंवनमआशवहत्य॒चा॥२७॥ नमोज्यषठायमत्रेणददयत्रवेचयुत्तमम्॥ मलनाभ्यम्बकमितिपुनराचम |£
८ नंस्मृतम्॥२८॥ इमाशूदायतिचाङ््ात्फरसमर्षणस् ॥ नभो्रज्यायेतिच्छचासकलशं भवेषैयेत् ॥२९॥ मनोमर्हातमितिचमा
| नस्तोकेहतिततः ॥ मेतरदमयेनेकदशाक्षतेश्दान्परपूजयत् ॥ ३० ॥ ट
वि°तं०१ ||| इस भे परमपू्वक गं समपण करे 'नमल्तक्षप्यः' इतत नसे _ अक्षत दे ॥ २५ ॥ (नमः पार्याय इस मजे ष्म चढाये "नमः प्यायः इस |©
अ० २० ||| मजस बिल्वपत्र समपंण करे ॥ २६ ॥ (नमःकपरदिने' इस यंत्रसे यथाविधि धुप दे "नम॒ आशवे" इसत मंत्रसे दीप दे ॥ २७॥ र ©
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इस् मेत्रस नेवेय दे (उयम्बकषू इससे फिर आचमन करावे ॥२८॥ "इमा रु्राय' इस मवसे फठसमपण करे नमो "वन्याय इस मत्से कलश
अपण करे ॥ २९ ॥ "मानो महान्त ओर ानस्तोकै' इन दो मर्भे श््रोको अक्षत चढाबे ॥ ३० ॥ |
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| इस मन्त्रसे दक्षिणा दे ' देवस्यत्वो ' इस मन्त्रे अभिषेक करे ॥ ३१ ॥ दीपमन्बसे शिवका नीराजन करे ओर ‹ इमारद्राय ' ||
इस मन्से उष्पाजछि दे ॥ ३२ ॥ ` मानो महान्त › इस मन्त्रे प्रदक्षिणा करे ओर “ मानस्तोके › इस मेतसे साटंग रणाम करे ॥ ३३ ॥ त
" एषते ' इस मन्तरसे शिवको स॒द्रा दिखावे, यतोयतः › इस मंसे “ व्यम्बकं › इस त्रस ॥ ३४॥ ' नमः सेनान्ये › इस मंत्रसे महामुद्रा दिखने ॥ |¢
` नमोगोक्यः › इस मंत्रसे धेनुमुद्रा दिखे ॥ ३५ ॥ शिर पांच मुद्रा दिखाकर शिवमेत्रका जप करे वेदज्ञाता शतरुद्विय मत्रका जप करे ट
॥ ३६ ॥ फिर बेदज्ञाता पांगका पाठ करे › देवागातु › दस्न मन्त्रे शिवका विसर्जन करे ॥ ३७ ॥ यह॒वि्तारसे शिव |©
दिरण्यगभेइतिञयृचादक्षिणांहिसमर्येत्॥ देवस्यत्वेति मंत्रेणद्यभिषेकंचरेदूबधः ३ १॥ दीपमत्रेणवाशंभोर्नीराजमविधिचरेत्॥ पुष्पां |
जखिचरेद्रत्तयाइमारुद्रायचञयचा ॥३२॥ मानोमदान्तमितिचचरेतप्रज्ञःपदक्षिणाम् ॥ मानस्तोकेतिभत्रेणसाषाद्गेपणमेत्छधीः |©
॥२२॥ एपतेइतिम्ेणशिवमुद्रामदशयेत्॥ यतोयतहत्यभरयाज्ञानाख्यान्यंबकेणच ॥३७॥ नम्ःसेनेतिमत्रेणमहासुदररदरीयेत्॥ |©
दशयेद्धेवभद्ांचनमोगोभ्यनहचानया ॥ २५ ॥ प॑चसुदराश्रदश्याथशिवमंजपचरेत् ॥ शतरद्ियमत्ेणजपेदद विचक्षणः ॥२६॥ ||
तत.पचाङ्गपाठंचङु्यदविद्विचक्षणः॥देवागात्वितिमंमेणयच्छभोविंसजैनम् ३७॥ इत्युक्तः शिवपूजायाव्यासतोवेदिकोषिधिः॥
ममासतश्वश्णतवेदिकविधिसुत्तमम् ॥३८॥ ऋचासद्योजातमितिम्रदाहरणमाचरेत् ॥ वामदेवायङतिचजलमरकषेपमाचरेत्॥३९॥ त
अवरोरेणवर्म्रेणख्गिनिमाणमाचरेत् ॥ तत्पुरुषायमतरेणाहवान इयाथापिधि ॥४०॥ सेयोजयेद्रदिकायामीशानमलनाहरम्॥
अन्यरसवरिधानंचङ्कय्यात्सक्षपतःसधीः ४१॥पेचाकषरेणमंतरेणशुर्दत्तेनवातथा॥इूर्यातपूजां षोडशोषचारेणविधिवल्घुधीः॥९२॥ ट
पूजनकी वेदिक विधि कही है अव इ वैदिक श्रेष्ठ विधैको तुम सेकषपतते सुनो ॥ ३८ ॥ ' सयो › संकसे भृतिका छापे ‹ वामदेवाय ६
इत मतरस उस्म जठ उले॥ ३९॥ अथो इतस मत्से हिंग निमाण करे ततपरूषायविभहे इस्त जसे विधिपूर्वक आहयान करे॥ ४ ०॥ 'ईशानःसर्ववियानाम्
ट इते वेदिकामं शिवको स्थापन करे ओर भी सन् विधान संक्षेपे करे ॥ ४१ ॥ पाक्ष म॑ वा यशुक दिये हए भच बदधिमावु विधिपुवेकं ६
१ प्रायः ये सव मंत्र ख्राध्याथके ह जो यजुवदमे सोकहुवां हे । "= ऋ क ल ब च च्ल
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| | पोडशोपाचारपूरवक पूजा करे ॥ ४२ ॥ भव मवनाशक महादेव का हम ध्यान करते है उपर स्वरूप उग्नोके नाश करनेवाठे शवं शशिमौ टिके
॥६२॥ ¢ निमित्त नमस्कार है ॥ ४२ ॥ इस मंजरसे शंकरका पूजन करे अपनी भक्तिते भ्रमको त्याग पूजे भक्तिसेही शिव फठकै देनेवाटे है॥ ४ ४॥
ठ यह आदरे वेदिक पूजन वर्णन किया है ई बाह्मणो ! द्री साधारण विधिभी वणेन करते है ॥ ४५ ॥ शिव्के ना्मो्े भी पाथिव
&|| ठिगकी पूजा कही है हे सनिभरेष्ठो ! उस सब कामना देनेवालीको सुनो ॥ ४६ ॥ हर महेश्वर शंभु श्ल्पाणि पिनाकधारी शिव पशुपति
६ महादेव इस कमते ॥ ४७ ॥ भृत्तिकाका आहरण कर मिलाप तिष्ठा ओर आह्वानकर स्नान पूजन ओर क्षमा कराकर विसजैन करे
| भवायभवनाशायमहादेवायधीमदि॥उपायञ्यनाशायशर्वायशशिमौरिने॥४३॥ अनेनमलनावापिप्ूजयेच्छकरंसधीः॥ सुभक्त्या
|| चभरमत्यक्ताभक्त्येवफलद शिवः ॥७४॥ इत्यपिपोक्तमाहत्यवेदिककरमपूजनम्॥ भरोच्यतेन्यविधिःसम्यक्साधारणतयाद्विजाः॥
¢| ॥ 84 ॥ प्रजापाथवटिगस्यसंभरोक्ताशिवनामभिः ॥ तां श्रणष्वेुनिश्रष्ठाःसवकामप्रदायिनीम् ॥४६॥ इरोमहेशवरःशं 2
|| प्णिःपिनाकध्ृक॥ शिवःपञयुपृतिशैवमहादेवइतिकरमात्॥७७॥ मृदाद्रणसंघहृशरतिष्ठाह्वानमेवच ॥ स्नपनेपूजनेचेवक्षमस्वेतिविस
जनम्॥४८॥ ञकारादिचतुथ्यतेनैमोन्तेनांमभिःकमात्॥ कर्तव्याचक्रियासवाभक्त्यापरमयासुदा ॥४९॥कृत्वान्यासविधिसम्य
क्षडद्गकरयोस्तथा ॥ षडक्षरेणभंञरेणततोध्यानंसमाचारेत्॥५०॥ कैलासषीगसनमध्यसंस्थंमक्तेःसनंदादिभिरव्य॑मानम्॥ भक्ता
£ तिदावानलमप्रमेयध्यायेडुमाछिगितविश्वभूषणय् ५१॥ ध्यायत्नित्य॑महेशंरजतगिरिनिभवारचन्द्रावतसंरत्राकरपोज्ज्वलां परञ्च
मृगवराभीतिदस्तंपरसत्रम्॥षद्यासीनंसमंतास्स्थितममरगणेग्यौक्ृत्तिवसानंविन्वाद्यविश्वबीजनिखिलभयदरंपं चवक्रंधिने्रम् ५२
४८ ॥ ऊवकार आदिमं करके अन्तमं नमः ठगाय चतुध्यन्तपू्वक नामठे सष क्रिया प्रम भक्ते करनी चाहिये ॥ ४९ ॥ सम्यक्
षडङ्ग विधित न्यास करे फिर षडक्षर भन्त्रसे ध्यान करे ॥ ५० ॥ कैलासे सिंहासषनके ऊपर स्थित भक्तिपुवेक नंदिआदिते तथा भकितपू्वक
र
ट| भक्तो पूजित हो उनके दुःख दूर करनेवाे ९ उमाको आगन करते हए शिषका ध्यान करता हूं जो विश्वके भूषण हँ ॥ ५१ ॥
नित्य महेश्वरका ध्यान करता हू जो चांदीकै पवेतके समान सुन्दर, चन्द्रमाके धारण करनेवाठे, रत्नोकि समान उज्ज्वठ शरीर प्रथु ओर शग | ।
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9 + (2432-4 32 4 ~ 4 ८९९९ + उक =
हाथमे सवि, प्रसन्न सूतिं पृद्नासनपर बैठे चारो ओर अम्रगणोसे सेवित, व्याघ्का चमं धारण किये दिश्वके पापहारी विश्वके बीज सम्पूणं
मयहारी पंचवक्र तिने है ॥५२॥ इस प्रकार ध्यान कर पाथिवरछिगका पूजन करं रुके दिये हुए पंचाक्षर भजक विधिपूर्वकं जप करे॥५३
ओर स्तुतिर्योमे देवेशको प्रणाम करे ओर अनेक प्रकारे शतरुद्रिय र्मत्र जपे ॥ ५४ ॥ फिर हाथमे अक्षय ओर एष्प लेकर भक्तिपूर्वकं इन
तरसे शिवजीकी भारथना करे ॥ ५५ ॥ हे शिव ! आपके गणादुवादका गानेवाखा भँ आपे भन रुगाये हूं हे कपानिधि भूतनाथ ! ठेस
जान आप हमपर भ्रसन्न हो ॥५६॥ अज्ञानसे बा ज्ञानसे जो हमने जप ओर पूजा आदि की है हे शकर ! वह आपकी कपासे सफल हो ॥५७॥
इतिष्यात्वाचसंपूज्यपाथिवंखिगयुत्तमम् ॥ जपेत्पचाक्षरमंनंशरूदत्तयथाविधि ॥५३॥ स्तुतिभिश्रैवदेवेशंस्तुवीतभ्रणमन्सुधीः ॥
नानाभिधाभिविपिनद्राःपठेद्रेशतद्वियम्५४॥ ततः साक्षतपुष्पाणिगृदीत्वांजलिनाञ्दा॥षार्थयेच्छंकरंभक्त्यामेतैरेभिःुभक्तितः॥
॥ ५५ ॥तावकस्त्वद्रणप्राणस्त्वचचित्तोदंसदाभ्ड॥ कृषानिधइतिज्ञात्वाभूतनाथप्रसीदमे॥५६॥ अज्ञानायदिवाज्ञानानपपूजादिकं
मया ॥ कृतंतद्स्त॒सफलंकृषयातवशंकर॥ ५७॥ अहंपापीमहानद्यपावनभवान्महान्॥ इतिविज्ञायगौरीशयदिच्छसितथाङ॥
॥५८॥ वेदै'पुराणे सिद्धान्तेकषिभिविंविधैरपि ॥ नज्ञातोसिमहादेवङुतोदंस्वंसदाशिव ॥५९॥ यथातथात्वदीयोस्मिसर्वमावभहे
९ब२॥ रक्षणीयस्त्वयादवेथसीदपरमेश्वर॥६०॥ इत्येवंचाक्षतान्पुष्पानारोप्यचरशिवोपरि। प्रणमे द्विंततश्शंधुसा्ागंविधिवन्डने
,॥ ६१ ॥ ततः प्दक्षिणांङयायथोक्तविधिनासधीः ॥ पुन.स्तुवीतदेवेशंस्ततिभिःश्रदयान्वितः ॥ ६२ ॥
मि महापापी ओर आप् महापवित्र करनेवाले दै दसा जानकर हे गौरीश ! जो आपकी इच्छा हो तै्ा करो ॥*५८॥ वेद् एरान ओर सिदान्तोमे
अनेकं ऋषिर्योने भी आपको नहीं जाना हे महादेव ! फिर भँ कैते जान सकता हं ॥ ५९ ॥ जेते हो वैते भ सव भाते तुम्हारा ही हं है
परमेश्वर ! भसन हकर आप हमारी रक्षा करिये ॥.६० ॥ इस भकार शिवकरे ऊप्र अक्षत ओर पृ्पोको आरोपणकर हे ने ! पिधिषुवक
शिवको साष्टीग भरणाम करे ॥ ६१ ॥ किर विधिपूवेक दक्षिणा करे फिर त्ुतिसे दापुक देवेशकी स्त॒ति करे ॥ ६२ ॥ 9
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शि | | फिर गेत शब्द करके नत्रतापरवक शन्द करे फिर विज्ञति कर वित्तजैन करे ॥ ६३ ॥ हे सुनिशाूछो ! इस प्रकार यह तुमसे पार्थिवपूजा
॥६२॥
विंभसं०१
अ० २१
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कही है यह भुकषित छक्ति तथ। शिवकी भक्षित बढनेवाटी है ॥६४॥ जो इस अध्यायको अच्छे मनसे रस्ता पृषैक पठता है वह् सव पापे
विशुद्ध हो सब्र कामनाओंको भाप होजाता है ॥ ६५ ॥ आयु आरोग्य यश ओर स्वगेका देनेवाछा हे यह उत्तम आख्यान पुत्र पौरका सुख
देनेवाठा है ॥ ६६ ॥ इति श्रीशेवमहाऽराणे विये० भाषारीकायां साध्यसाधनखण्डे पाथिवशिवङिगपूजाविधि वणेनं नाम विंशोऽध्यायः ॥२०॥
ऋषि बोटे हे महाभाग बूत ! हे व्या्षशिष्य ! अप्को नमस्कार हे आपने भटो प्रकार पार्थिवं पूजाका विधान कहा ॥ १ ॥ अव आप्
ततोगलयखंकृताप्रणमेच्छुचिनभ्रधीः॥ कुरयादविज्ञतपतिमादत्यविसजंनमथाचरेत्॥ ६३॥ इत्युक्ताखनिशादृलाःपाथिवार्चाविधानतः ॥
युक्तिदा्क्तिदाचैवशिवभकतिविव्धिनी॥६४॥ इत्यध्यार्यघचित्तेनयःपठेच्छृणुयादपि॥ सवंपापविशुद्धात्मासर्वान्कामानवाप्ल
यात्॥&५॥आयुरारोग्यदंचैवयशस्यंस्वर्ग्यमेवच॥पु्रपौतादिश्चखदमाख्यानमिदञत्तमम् &६॥इतिश्रीशिवमदहापुराणे प्र विद्यश्च
रसंहितायां साध्यसाधनखण्डपाथिवशिवलिगप्रूजाविषिवर्णनंनामविशोऽध्यायः ॥ २० ॥ षयुः ॥ सूतसूतमहाभागव्यास
शिष्यनमोस्तुते॥ सम्ययुक्तंत्वयातातपा्थिवाचाविधानकम्॥ १॥ कामनामेदमाभित्यसंख्यांबरूहिविधानतः॥ शिवपाभिवङ्िगानां
कृपयादीनवृत्सल ॥२॥ सूतञवाच् ॥ शृणुध्वमृषयः सर्वेषाथवाचाविधानकम् ॥ यस्यालुष्ठानमारेणकृतकृत्योभवेन्नरः ॥ ३ ॥
अङ्कत्वापाथिवंलिगंयोन्यदेरव्रपूजयेत् ॥ बरृेथाभवतिसाप्ूजादमदानादिकबरथा ॥४॥ संख्यापाथिवङ्गानांयथाकामंनिग्ते ॥
संख्यासबोधुनिश्रे्ठनिश्चयेनफलप्रदा॥५॥
काभना भेदके अनुसार शिवकै पार्थिव रिगकी पूजा वणन करो हे दीनवत्सर ! आप हमारे उप्र कपा करो ॥ २ ॥ सूतजी बोषे हे |
ऋषयो ! पार्थिव पूजाका विधान सुनो जिसके अलुष्ठानसे यह राणी कतक्त्य होजाता हे ॥३॥ विना पार्थिव छिगङी पूजा किये जो दुसरे
देवताकी पुजा करता है उसकी वह पूजा ओर दम दानादिक बृथा होजाते है ॥ ४ ॥ पार्थिव रिंगकी संख्या कामनाके अनुकार कही है हे
सुनिभष्टो \ विशेष कर यह संख्या निश्वयसे अधिक फक्की देनेवारी है ॥ “५ ॥ |
व 0
पह आवाहन फिर भरतिमापूजन प्रतिष्ठा करनी चाहिये ङिगाकारके समान ¶थक् पृथक् करना चाहिये ॥ ६ ॥ विया्थीं परुष भसन्न होकर
|| सह पार्थिवरिग बानाकर पूजे तो निश्वय वह पूजन फठ देनेवाला होगा ॥ ७ ॥ धनकी इच्छा ५०० पांचसौ, पत्राथीं दहजार, |
वज्ञाथीं पांचसौ शिवङिगका पूजन करे ॥ ८ ॥ मोक्षकी इच्छावाला एक करोड पृथ्वीकी कामनावाला एक सत्त दयाकी इच्छावाला तीन सहस
ए तीथकी इच्छावाठा दो स॒हल्ञ ॥ ° ॥ सुहदकी इच्छावाला तीन सहस, वशीकरण इच्छांवाा आढ सौ, मारणकी इच्छाशाटा सासो;
ट मोहनकी इच्छावाछा आठसौ ॥ १० ॥ उचारनमें एकसहस्, स्त॑भनमे एक सहश्च देष पांचसौ ॥ ११॥ बधनसे छटनेकी इच्छावाला उेढसहस्
ए परथमावाहनंतजपरतिष्ठापूजनं पथ॥खिगाकारंसम् तसरवज्ञेयप्रथकपरथक ॥६॥ विदा्थीपुरुषःपरीत्यासदस्षमितपाथिवम्॥ पूजये
&|| च्छिविखिगंदिनिश्यात्तःफपदम् ॥७॥ नर'पाथिवखिगानांधनार्थीचतदद्धकम् ॥ पुजा्थीसादंसादसेवश्चार्थीशतपंचकम् ॥८॥
|| मोक्षाथीकौरिगुणितंभूकामशओ्रसदसकम्॥ दयाथीचनिसादसरंतीथाथीदिस्सकम्॥९॥ सत्कामीतिसादसंवश्याथींशतम्कम् ॥
£| मारणाथीसप्तशतमोहना्थींशताष्टकम् ॥१०॥ उचारनपरश्चवसदसंचयथोक्ततः ॥ स्तभनाथासदसंतुदवेषणा्थीं तददेकम् ॥११॥
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निगडान्धुक्तिकामस्तसदसंसाद्वसत्तमम्॥ महाराजभयेपचशतंजञेयंविचक्षणेः॥ १२॥ चौरा दिसंकरेज्ेयंपाथिवानांशत् दयम्॥ डाकि
न्यादिभयपंचशतयुक्तंजपाथिवम्॥१३॥ दरिवपंचसाहसरमयुतंसर्वकामदम्॥ अथनित्यविधिवकषयेशृणष्वशचनिसत्तमाः॥१४॥
एकंपापहरंभोकतंदविठिगंचाथपिद्धिदम्॥ बिलिगंसर्वकामानांकारणंपरमी रितम्॥ १५॥उत्तरोत्तरेवंस्यात्पवोक्तगणानानिधि॥ मरता
तरमथोवक्षयेसंख्यायांयुनिभेदतः॥१६॥ लिगानामयुतेकृत्वाषार्थिवानासुङुद्धिमाच्॥ निभयोदिभवेन्तूनंमहाराजभ्यहरेत्॥ १७॥
महाराजतते भय होनेमे पांच । १२॥ चोर ओर राजाके भयम २०० डाकिनी आदिके भयम ५०० सलौ ॥१ ३॥ दरिदतामे ५००० सहश्च,
सव कामम दशतहस् पूजे । हे निशठो ! घुनो अव मेँ नित्यविधिको कहता हं॥ १४ ॥ एकडिग पापहारी दो अर्थसिद्धि करनेवाे तीनङिम
सृव कामनाओंकै परमकारण कहे है ॥ १५ ॥ यह परोक्तं गणनाकी विभि उत्तरोत्तर जाननी । संख्याम सनियोके भदसे भतान्तरका वणेन करते
हं ॥ १६ ॥ बुद्धिमान दशसह पाथिविग बनाकर निर्भय होकर महाराजके भयते टूर होता है ॥ १७ ॥ |
२२
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व्क
शि° | कारागरहसे दटनेक निमित्त दशसहस्चका पूजन करे, डाकिनी आदिकं भयम सातसरहस बनावे ॥१८॥ पतक निमित्त ५५ पचपनसनहखका पूजन
॥६४॥||© करे दशसहस् ठिगक पूजनसे कन्या संतान होती है ॥ १९ ॥ दशसहस टिगके पूजनेमे विष्णके देश्वयेकी प्रमि होती है तथा दश सहच (1 7
ट पजनसे अतुर रेश्वयेकी भाषि होती है ॥ २० ॥ जो मनुष्य एककोरि ट्िगका पूजन करता है वह् शिवहूप होजाता है दसम सदह नहीं ॥२१॥ ्
पाथिवछिगकी पूजा कोचियज्ञके फर देनेवाटी है कामार्थी भरप्यों को नित्य मुक्ति खक्तिकी देनेवाी ॥ २२ ॥ जिसका य विना ¢
ए कारागृहादिषक्तयर्थमथुतंकारयेदधः॥ डाकिन्यादिभयेसप्तसद्लंकारयेत्तथा॥१८॥ सदस्ाणिपंचपैचाशदपुत्ःपरकारयेत्॥ छिगा ४
ए नामयुतेनेवकन्यकासततिंमेत्॥१९॥ खिगानामयतेनेवविष्ण्वयेश्वर्यमाप्वयात्॥ लिगानांप्रयुतेनेवद्यतलं्चियमाप्लयात् ॥ %
| ॥२०॥ कोटिमेकांतङ्गानांयःकरोतिनरोभुवि ॥ शिवणएवभवेत्सोपिना्कास्याविचारणा ॥ २१ ॥ अचापाथिवलिगानांकोटि ॥4
| यज्ञफलप्रदा ॥ थुवितदाथुक्रितदानित्यंततःकामाथिनांनृणाम् ॥२२॥ विनालिगारचनंयस्यकालोगच्छतिनित्यशः॥महादहानिर्भवे ¢
| त्तस्यदुर्ततस्यद्रात्मनः ॥ २३॥ एकृतःसर्वदानानित्रतानिविविधानिच ॥ तीर्थानिनियमायज्ञाख्गाचौचेकतःस्मृता ॥ २४ ॥ ||
कौलिगाचनंभ्रषठतथालेोकेभरहश्यते ॥ तथानास्तीतिशाश्चाणामेषसिद्धान्तनिश्वयः ॥२५॥ युवितिश्ुवितपरदंरिगंवििधापन्निवा ||
रणम् ॥ पूजयित्वानरोनित्य॑शिवसायुज्यमाप्डुयात् ॥२६॥ शिवानाममयंख्गंनित्यपूज्यमहषिमिः ॥ यत्सवखिगिषुतस्मा |£
४ त्पूज्यंविधानतः ॥ २७ ॥ उत्तममध्ममंनीचंभिविधलिगिसीरितम् ॥ मानतोषुनिंशाद कास्तच्छरणुध्वं वदाम्यहम् ॥२८॥ ¢
‰ि०स०१ ४ व्यतीत होता है उस दुरात्मा दु्वृततकी महाहानि होती हे॥२३॥ एक ओर तो षव दान ओर वत हैँ तथा तीथं नियम ओर यज्ञ है ओर एकं ओर ९
अ० २१|| ठिगकी पूजा है ॥ २४ ॥ कणिगुगमे ठोकमं दिगाचेनहीग्र् कहा है ओर दृ्रारेशषा पदाथ नही है यह शाच्चका निश्चय हे॥ २५॥ मुक्ति सक्तिका ठ
|| दनेवाा छिग अनेक आपृतति निवारण करता ह मलुष्य नित्य पूजनकरके शिवके सायुज्यको भाप होता हे ॥२६॥ शिवनाममय गक पूजा ठ
ॐ | महषि्योंको नित्य कनी चाहिये जिसमे किं सब रिर्गोमें दिधानसे ¶जन कहा हे ॥ २७ ॥ उत्तम मध्यम निरष्ट तीन भकारका ठग का है
|
९
| इसका मान हे हे खनिजनो ! उस्तका प्रमाण भरवण करौ ॥ २८ ॥ चार अंगु ऊंचा मनोहर वेदी युक्तं शाश्च जाननेवाोने उत्तम रिग
६ कहा है ॥२९॥ उससे ऊंचा मध्यम ओर उससे आधा अधम है इस भकार उत्तरोत्तर छिग तीन प्रकारका कहा हे ॥३०॥ जो भरित भ्रद्धासे
\ यकत होकर अनेक चिका पूजन करता है वह सम्पूणं मनोकामनाओंको पराप्त होता हे ॥ ३१ ॥ छिगकी आराधना करनेके समान चारो
¢ वेदम कोर दूसरा एण्य नहीं हे यह सव शाश्चोंका निश्वय हे ॥३२॥ यह सब क्मंजाक छोडकर पण्डित परमभक्रितसे एक टिंगकाही आराधन
¢ करे ॥ ३३ ॥ रिगके अचेन करनेसे स्थावर जंगमात्मक सब जगत् पूजित हो जाता है, जो संसार सागरम ममरहुभंको तारनेका साधन है
४ चतुरंगुलमुच्छा्रम्यवेदिकयायुतम्॥उत्तमणिगमाख्यातेषुनिभिगशाच्लकोविदेः २ सातदर्दमध्यमभोक्ततदद्ेमघमेस्म॒तम्॥ इत्थि
विधमाख्यातशत्तरोत्तरतःपरम् ३०॥ अनेकलिगंयोनित्यभक्तिश्र ् 1स न्वितः॥ पूजयेत्सलमेत्कामान्मनसा मानसेप्सितान् २१॥
ट नलिगाराधनादन्यत्पुण्यवेद चतुष्ये॥ विद्यतेसरवशाच्राणामेषएवविनिश्चयः३२ सर्वमेतत्परित्यज्यकर्मजालमशेषतःभक्तयापरमया
| विदद्रौदिगमेकंप्रपूजयेत् ॥२२॥ र्गिचितेचितंसर्वजगत्स्थावरजंगमम् ॥ संसाराबुधिमथ्रानानान्यत्तारणसाधनम् ३४॥ अज्ञानति
| पिरराधानांविषयासक्तवेतसाम्॥एवोनान्योस्तिजगतिरिगाराधनमंता ३५ दरिबरह्मादयोदेवाश्चनयोयक्षराक्षसाः।गंधवीश्वरणास्सि
| द्वादैतेयादानवास्तथा॥३६॥नागाःशेषप्रभृतयोगरूडायाःखगास्तथा॥ सपरजापतयश्चान्येमनवःकिन्नरानराः ३७॥पूजयित्वामहाम
ह| क्तयारिगंसवा्थसिद्धिदम्॥पराप्ताःकामानभी्टातास्तान्सरवान्डदिस्थितान्३८ब्राह्मणक्षपरियोवेश्यःशुदोवापरतिरोमजः॥ पूजये
४ त्सततंरिग॑तत्तन्मं्रणसादरम्॥३२॥ किबहूक्तेनसुनयःस्रीणामपितथान्यतः॥ अधिकारोस्तिसवेषांशिवर्गाचनेद्रिजाः ॥४०॥
|| ॥३४॥ अनज्ञानतिमिरसे अन्धेहुओंको तथा विष यास्व ? चित्तवाठोको रिगाराधनकै सिवाय ओर कोई उपाय नहीं है ॥३५॥ हरि नह्लादिक
देवता सनि यक्ष राक्षत गंधव चारण सिद दैत्य दानव ॥३६॥ नाग शेष गरुड पृक्षी प्रजापति मलु किन्नर नर ॥३७॥ भहाभक्रितसे सवार्थसाधक
िगको पूजनकर अपने हृदयम स्थित कामनाओंको भ्राप्र होते है ॥ ३८ ॥ बाह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र तथा दृस्री जाति उस्र २ मजे आदर
>| पूवक टिगको पूजन करते है ॥ ३९ ॥ हे य॒नियो ! बहुत कहनेमे कया हे स्ली तथा अन्य जाति शिक पूजने सबका अधिकार ३ ॥४०॥
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् नाणोको वेदिक मागत पूजन करना भरेष् है दर्रे भाणियोंको वेदत पूजनका अधिकार नहीं हे ॥४१॥ वैदिक नासरणोको वैदिक मार्गते पूजा ||
॥६५॥ ||| कही हे उन्हीको ओर मागंसे न करनी चाहिये यह भगवान् शिवने कहा हं ॥४२॥ दधीचि गौतम आदि बाहरणोके शापे द्ग्धचित्तवा्ोकी ||)
पैदिककरममे श्रद्धा नहीं होती वा शापकते दग्धचित्त दधीच गौतमादिके व॑ंशोत्प्नोकी वैदिक कर्ममे श्रद्धा नहीं होती ॥४३॥ जो को$ वेद् ओर र
स्मृतिके कर्मको अनादरकर दूरा कर्मं करता है उस्तको उस्तका फठ नहीं होता ॥४४॥ इस भकार शिवजीका विभिपूर्वक नेवेदपर्यैत अचैन करक +
द्विजानविदिकेनापिमागणाराधनंवरम् ॥ अन्येषामपिजंतूनविदिकेननसंमतम् ॥४१॥ वेदिकानाद्विजानां च पूजाविदिकमागैतः ॥
कतंन्यानान्यमार्गेणत्याहभगवाज्छिवः ॥ ४२ ॥ दधीचि गौतमादीनांशापेनादग्धचेतसाम् ॥ द्विजानांजायतेश्रद्धानेववेदिक ट
कर्मणि ॥ ४३ ॥ योवेदिकमनादत्यकर्मस्मार्तमथापिवा ॥ अन्यत्समाचरेन्मत्यौनसंकल्पफलंलमेत् ॥४४॥ इत्थ॑करत्वाचनंशं ६
|
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॥
४ भोनैे्यतिविधानतः ॥ पूजयेदषटूतीततवनिनगन्मयीः ॥४५।॥ सितिरापोनरोवायराकाशःसु्येसोमकतौ ॥ यजमानइत
ए त्वषटौमूतयःपरिकीतिताः॥७६॥ शवोभवङद्रश्उग्रोभीमइतीश्वरः॥ महादेव ःपञ्चुपतिरेतान्मतिमिसचैयेत्।।४७॥ पूजयेत्परिवारं ॥८
६ चततःशंभोःषभक्तितः॥ ईशानादिक्रमात्त्चंद्नाक्षतपकेः॥७८॥ ईशानंनंदिनैचंडंमहाकांचभंगिणम्॥ वृष॑स्कंदंकपदीशंसोमं ॥६
ह| शकंचतत्कमात् ॥ ४९ ॥ अभरतोवीरमदंचपृष्ठकीरतिखलंतथा ॥ ततएकादशान्बद्वानपूजयेद्विधिनाततः ॥ 4० ॥ ततःप॑चाक्षरं |£
| जप्तवाशतरुद्वियमेवच ॥ स्तुतीनौनाविधाःकृत्वापिचांगपठनेतथा ॥ 4१ ॥ |
६ || वरजगन्मयी आः मूर्तिका पूजन करे ॥४५॥ पृथवी ज अभि वायु आकाश चन्दर सयं ओर यजमान ये इनकी आ सूयं पूज्यमान ह।४६ ट
४ शबं भव रद्र उग्र भीम द्र महादेव पशुपति इनका मूर्तिदारा अचैन करे॥४७॥ फिर भक्तिसे शिवके परिवारकी पूजा कर दंशानादिके कमते चन्दन [|£
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अक्षत पत्र चदावे।॥ ४८॥ देशान नंदि चण्ड महाका भृगि वृष स्कंद् कपदीं सोम शुक्र इनको क्रमते पूजे ॥ ४९ ॥ आगे वीरभद्रका, परठकी ओर |
कीत्तिखखका पूजनकर फिर ग्यारह रुदरोको विधिपूर्वैक पूजे॥*५०॥ फिर प॑ चाक्षरकः जपकर शतरुद्रिय पाठकर अनेक भकरारकी स्वुतिकर परचागपाट
| उत्तरको भ॒खकर करना चाहिये इसी प्रकार उत्तरको सुख कर सदा शिवका पूजन करे ॥*५३॥ शिवजीकै आगे पूर्वको नबेठे न
उत्तरको न भरतीची ( पथ्मिम ) को बढ उत्तरको वेढे ॥५४॥ भस्म त्रिष् ओर रुद्राक्षकी माला बिना तथा बिल्वपत्रके बिना शंकरका पुजन
नकृरे ॥ ५५॥ हे खनिशरष्ठो ! सदि शिवपूजनमं भस्म न भिरे तो मृननिकाकाही भिण्ड मस्तकपर धारण करना चाहिये ॥ ५६ ॥ इति ट
भ्ीरेवे महारणे वियेश्वरसंहिताभाषाटीकायां साध्यसाधनखण्डे पाथिवपूजनवणेनं नामेकविोऽध्यायः ॥ २१ ॥ ऋषि बोरे हमने सुना है कि |©
ततश्रदक्षि्णात्वानत्वाख्गंविस्जयेत् ॥ इतिप्रोक्तमशेषंचशिवपूजनम्ाद्रात्॥ «२ ॥ रााबुदङ्ख॒खःक्यादिवकार्यसदैवहि ॥ |©
शिवाचैनं सदाप्य्वश॒चिःकुर्यादुद दख: ॥५२ ॥ नप्राचीमग्रतःशभोनोदीचींशक्तिसंहितान् ॥ नप्रतीचींयतःपृष्ठमतोभाद्यंसमा ॥©
श्रयेत् ॥५8॥ विनाभस्मभिपूडेणविना््राक्षमाखया॥ बिरवपनैविनानेवपूजयेच्छकरंबुधः ॥५५॥ भस्मापाप्तौसनिश्षठाः प्रवृत्ते |
रिवुधूजने॥ तस्मान्सृदापिकन्यललाटचविथड्कम्॥<९। इतिभीरिवूमहापुराणेभरथमारयावियेन्वरसंहिता्यासाभ्यसाधनखण्डे ||
पार्थिवप्रूजनवर्णननामेकर्विंशोऽष्यायः॥२१॥ ऋषयञचुः॥अथाद्शिवनेवेदयमितिपूषैशचुतंवचः॥ बूहिततिर्णयंबिल्वमाहात््यमपि ६
सन्युने ॥ १॥ सूतउवाच ॥ शणष्वुयुनयःस्वेसावधानतयाधना ॥ सर्ववदाभिसंग्ीत्याधन्यायुयंशिववताः ॥२॥ शिवभक्तः ||
शषिःशद्धःसद्रतीदटनिःयः ॥ भक्षयेच्छिवनेवेयत्यजेदयाद्यभावनाम् ॥२॥ दष्ठापिशिवनेवे्ययांतिपापानिदूरतः॥ युक्तेतशिव
नैवयेपुण्यान्या्यांतिकोटिशः ॥४॥ अलंयागसहसरेणाप्यलयागावदैरपि ॥ भक्षितेशिवनैवेधेशिवसायुज्यमाप्वुयात् ॥५॥ ट
रिवनेषेय अग्राह्य है सो षह ओर बिल्वका माहात्म्य भी वर्णन कीजिये ॥१॥ घजी बोञे हे खनियो ] सावधान होकर सुनो भे सव भीति &
कहता हू म भक्त धन्य हौ ॥२॥ शिवका भक्त पित्र शुद्ध सद्रती इृदनिश्वय शिवजीका नेषेय भक्षण करटे अथाद्य भावनाको छोड ||
॥ ३ ॥ शिवनेवेयको देसुतेही पाप दूरे भाग जाते ह ओर उसकै भक्षण करने अनेक शण्य भाप्त होते है ॥ ४ ॥ सहश्च ओर अरब यज्ञ
करने क्या ह, शिवका नेवेय भक्षण करनेरे शिवके सायुज्यकी भाति होती है ॥ ५ ॥ 4
करे ॥५१॥ किर प्रदक्षिणा कर) छिगको भरणामकर विसजेन -करे यह आदरे सम्पण शिवका पूजन कथना किया ॥५२॥ यह कमं राजिम||;
च्व
| जिसके षरमे शिवके नैवेयका भचार है वह घर महापवित्र है दृकषरे घरोको भी पवित्र करता है ॥६॥ ( नेषेय आया देख शिरसे ग्रहणकरे आर
॥६६॥ || शिवका स्मरणकर भरयत्नसे भक्षणकरे ॥७॥ ओर आणएहए शिवकै नैवेयको अग्राह्य मानकर भक्षण करने देर करनेमे मनुष्यको पाप् खगा १ <॥ ॥|६
& जिसकी शिवके नेवेय यहणमे इच्छा नहीं होती वह महापापी अवश्य नरकमे पडेगा ॥९॥ हृदयम सुवण रचादी आदि की बनी ह चन्द्रकान्तवाटे ह
ट शिवभक्तते यह भक्षणके योग्य है रेता कहाजाता है॥१ ०॥ शिवदीक्ष युक्त भक्त महाभसादसज्ञक सब चिगोंकौ नवय भक्षण करे वह शुभ हं ॥११॥ ह
४ यद्हेशिवनेवे्प्रचारोपिभरजायते॥ तद्हंपावनसर्वमन्यपावनकारणम्॥द॥ आगतंशिवनेवे्यंमृदीत्वाशिरसाषुदा॥ भक्षणीयैपूयते ||
त नशिवस्मरणपू्वकम् ॥७॥ आगतं शिवनैवेद्यमन्यदााद्यमित्यपि॥ विवेषापसंबधोभवत्येवदिमानवे ॥<॥ नयस्यशिवनेवेदयगर $
¢ हणेच्छाप्रनायते॥ सपापिष्ठोगरिष्ठःस्यान्नरकंयात्यपिधुवम् ॥९॥ इदयेचन्दरकान्तेचस्वर्णरूप्यादिनिर्मिते॥ शिवदीक्षावताभक्तेन ४
दभक््यमितीर्यते ॥.१०॥ शिवदीक्षान्वितोभक्तोमहाप्रसादरसंज्ञकम् ॥ सर्वेषामपिलिगाननिवेयंभक्षयच्छुभम् ॥११॥ अन्यदी ||4
( क्षायुजनृणांशिवभक्तिरतात्मनाम्॥ शणध्वंनि्णयभीत्याशिवनैवेदयभक्षणे॥१२॥ शाख्तरामोद्धवेलिगेरसल्वितथाद्विजा॥पाषणि ||4
६ || राजतेस्वणैसुरसिद्धभतिषठिे ॥१२॥ काश्मीरस्फारिकेराल्नेऽयोतिफिगोषुसर्वशः ॥ चान्दरायणसमंोकतशंभोनैवेचभक्षणम्॥१९॥ ६
ए ब्रह्मदापिङचिर्धत्वानिर्माल्यंयस्तधारयेत्॥ मक्षयित्वाद्रुततस्यसर्वपापंप्रणश्यति।॥ १५॥ च॑ंडाधिकारोयतास्तितद्वोक्तम्यनमानवेः॥ ॥६
वे. || चंडाधिकारोनोयवभोक्तव्यंतभविततः ॥ १९ ॥ ट
ट| भौर भी वीक्षे युक्तं शिवभक्तिं प्रीति करनेवाडे मलुष्योका शिवनेवेयकै भक्षणमे निय सुनो ॥१२॥ हे बहमणो ! शाख्ामसे ए
^. ॥ तथा रसगे पाषाण रजत सुवरणकै बने देवताओंकी सिद्धिसे परतिष्ठितम ॥१३॥ काश्मीरे स्फटिक रलज्यो तिरि शिवनेवेय भक्षण करना |£
|
| चान्द्रायण वतक समान फर देनेवाला है ॥ १४ ॥ बह्महत्याराभी पवित्र होकर जो निर्माल्य धारण करे उक्षके भक्षण करनेसे सव पाप | ठ |
होजाते ६॥१५॥।जही चण्डाधिकार है वहां मलुष्योंको भक्षण करना उचित नहीं है, जहां चण्डका अधिकार नहीं है उत्ते भक्तिसे भोजन करना॥>
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4 । १६॥ बाणठिग ोहरिग् सिद्धिम स्वयमूषिगम् तथा समू भतिमाओमिं चण्डका अधिकार हे नही ॥ १७.॥ विधानपू॑क
स्नान कराये हए ठिगका जो जठ है उसे तीनवार पान केसे तीनों ताप शीघ्र न्ट होजाते ई ॥ १८ ॥ अग्राह्य शिवका नेवेय पत्र एष्य ठ
फ जठ यह शािघ्ाम शिाके संगते स पवित होजाता है ॥ १९ ॥ हे खनीश्वरो ! जो गक ऊप्रका दव्य है वह अग्राह्य है ओर जो
त टिगकै स्पशसे पथक् है उसे पवित्र जानना चाहिये ॥ २० ॥ हे स॒निश्रष्ठो इस्त प्रकार तुमसे नेवेयका निणंय कहा है अवर आप सावधान हो ए
ह|| भादसते बिल्वपवका माहालमय सुनो ॥ २१ ॥ यह बिल्व दैवताओोति सतुतिको भात हभा महादेवका स्वरूप है इतकी महिमा कठिनतासे ,
|| बाणर्िचलोहेचसिदेरिगेस्पयंथुषि॥ परतिमासुचसर्वासुनचंडोधिङृतोभवेत्॥१७॥ स्नापयित्वाविधानेनयोखिगस्नपनोदकम्॥ |
भिःपिेत्िविर्धपापतस्येदाद्यविनश्यति ॥१८॥ अग्रद्यरिषनेवेदयपतरषुष्पंफलंजलम्॥ शालय्रामशिखासंगात्सर्वेयातिपवित्रताम्॥
॥ १९ ॥ छ्िगोपारिचयद्रभ्यंतद्भर ुनीश्वराः ॥ सुपवित्र॑चतञ्जेयंयद्िगस्परबा्यतः ॥२०॥ नेवे्यनिर्णयःपरोक्तहत्थवोश्निस
तमाः॥ शणुध्वबिरखमादारम्यसावधनतयाऽदरात्॥२१॥ महादेवस्वरूपोर्यषिरंवोदेवेरपिस्तुतः॥ यथाकथविदेतस्यमदिमाज्ञाय
तेकथम्॥२२॥ पुण्यतीर्थानियावतिकोकेषुप्रथितान्यपि॥ तानिसर्वाणितीर्थानिषितव॒मूरेवसंतिहि॥ २ २॥ बिस्वशरलेमहादेव रिग
पिणमव्ययम् ॥ य^पूजयतिपुण्यात्मासशिवंपराप्ठुयादुवम् ॥२४॥ बिल्वमुरेजले्यस्तुमूद्धानमभिषिचति ॥ सस्व॑तीर्थस्नातः
स्यात्सएवभुविषावनः॥२५॥ एतस्यवित्वमूलस्याथाख्वामवत्तमम्॥जलाकुलंमहादेवोदष्टातु्टोभवत्थरम्॥ २ ६॥ पूजयेद्विल्व ट
मूलयोगंधपुष्पादिभिनरः ॥ शिवलोकमवाप्रोतिसंततिवद॑तेसुखम् ॥२७॥
जाती है ॥ २२ ॥ जितने रोके पवित्र भिद तीथ है वे सन तीथं वित्वे निवा करते हँ ॥ २३ ॥ छिगके भू छिगरपी भहादेष
|| अविनाशीको जो यात्मा पूजन करता है वह धुव कल्याणक प्राप्त होता है ॥ २४ ॥ जौ बिल्वक रमे शिवकै ऊप्र जर चदाता है बह
६ सव तीरथमे स्नान कर चुका ओर बह पृथ्वीम पित्ररप् हे ॥ २५ ॥ इसन विल्भूककै चारों ओर जरते भरा हुभा आख्वार देखकर महादेव
भ्रसन्न होजाते है ॥ २६ ॥ जो मवुष्य॒बित्वमूलमे गेष्ष्पादितते पूजन करता है ह शिषरोकको भाप्त होता है उसकी सेतान ओर
२३
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| सकी दि होती है ॥ २७ ॥ जो आद्रे बिल्वक मूलम दीपमाराकी कल्पना करते हं बह स सम्पन्न हो महेशके अन्तत होता है |
॥६७॥ ॥ २८ ॥ वित्वकी शाखाको ठे हाथसे नये पतते प्रहणकर जो बिल्वको पूजता हं वहं सब् पापोसे छूट जाता हं ॥ २१ ॥ विल्वमूूख्मं जो &
¢ शिवभक्तफो भक्रितसे भोजन कराता हे उत्ते एकके जिमानेमे करोढयुणा फर होता हं ॥ ३० ॥ बिल्वके सूम दुग्धसे युक्त घृत ओर
अनन जो शिवभक्तके निमित्त देता है पह दरी नहीं होता ॥ ३१ ॥ शिविगका पूजन सांगो्पांग कहा है हे बाह्णो ! यह प्रृत्ति ओर
¢ निद्ृत्ति धर्मवालोका दो भेदसे कहा ह ॥ ३२ ॥ प्वृत्तोको पीठ पूजा ६ अभीष्टफलकी देनेवाी हे, पात्रदरारा प्रवृत्त हो सब पूजाको
विल्वमूरेदीपमालांयःकल्पयतिसादरम्॥ सतच्ज्ञानसंपन्नोमहेशांतगतोभवेत ॥२८॥ बिल्वशाखांसमादायदस्तेननवपछवम् ॥
&|| ग्रहीतवाप्ूजयेद्धिलंसचपापैःपरषुच्यते ॥२९॥ बिल्वमूकेशिवरतभोजयेदयस्तुभक्तितः ॥ एकंवाकोरिशुणितंतस्थगण्यप्रजायते ॥
॥२०॥ बित्वमृलेक्षीरसुक्तमन्नमाज्येनसंयतम्॥ योदबाच्छिवभक्तायसदरिद्रोनजायते॥३१॥सांगोपांगमितिपरोक्तंशिवलिगग्रपूज
‰|| नम् ॥ प्रवत्तानांनिवृत्तानाभेदतोदविविधद्विजाः॥३२॥ भरवृत्तानां पीरपूजां सर्वपूजां समाचरेत् ॥ ३३॥ अभिषेकान्तनेवदयंशाल्यत्नन
|| समाचरेत् ॥ प्ूजान्तेस्थापयदधिगंपरेशदधषथग्शृहे॥३७॥ करप्ूजानिवृत्तानांस्वभोज्यंतनिवेदयेत् ॥ निवृत्तानां परसृक्ष्मखिगमेव
&|| विशिष्यते ॥ ३५ ॥ विभूत्यभ्यचेनंकयाद्विभ्ति चनिषेद्येत् ॥ प्रजांकृत्वातथाख्गंशिरसाधारयत्सदा ॥३६॥ इतिश्रीशिवमहा ए
|| पुराणेविचेश्वरसंहितायांसाध्यसाधनखण्डेशिवनैवेयवर्णनोनामद्रा्वि्ोऽध्यायः ॥ २२ ॥ ५
। करे ॥ ३३ ॥ पूजाके अन्तमं टिगको शुद्स्थानमं घरभं स्थापन करे अभिषेकके अन्त नैवेय ओर शाटी अन्नको दे
॥ ३४ ॥ पूजाके उपरान्त भोजन निवेदन करे निदत्त भार्गोको ब्॒ष्मङिग पूजन कहा हे ॥ ३५॥ विभूति अ्चैनक्र किति निवेदन करे ॥
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पुजा करके ठि
विश०सं०१
। ञ् 9 >,५। $ धार क ४ (~> ¢ ् =. 5
गको सदा शिबपर धारण करे ।। ३६ ॥ इति भरीशेवे महाण्राणे वियेश्वरसंहिताभाषाटीकायां साध्यसाधनखण्डे शिवनेकेयवित्षमा
हार्य बणेनो नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२. ॥
| बोढे हे महाभाग सत ! व्यासजीके शिष्य आपको नमस्कार है आप हमको भस्मका माहात्म्य ॥१॥ तथा रद्राक्षमाहासम्य नाममाहालम्य
वणन कीजिये यह तीन वार्त हमारे प्रसन्न करनेको किये ॥ २ ॥ सूतजी बोटे छोकोकै हितके निमित्त आपने भटी वाता पछी तुम |
पवित्र. ओर कुखकै भूषण हो ॥ ३ ॥ जिनको साक्षात् शिवही परमदेवता है उनको सदेव लोकं शिवकी कथा प्यारी है ॥४॥ बे धन्य ओर
कताथ ह उनका देहधारण करना रफ है उन्होंने अपने कुक उद्धार करदिया है जो शिवकी उपासना करते है ॥ ५ ॥ जिते सुखमे
सदा शिव शिव पा नाम है उसको पाप रते स्परे नहीं करते है जेते सेर अंगारक स्पशे नहीं कर सकते ॥६॥ भीशिवके निमित्त नमस्कार
॥ऋषयञचुः॥ सूतसूतमहाभागव्यासशिष्यनमोस्तते ॥ तदेवव्यासतोत्रूहिभस्ममादात्म्यसुत्तमम्॥१॥ तथार्दराक्षमाहात्म्यनाम
माहात्म्यसुत्तमम्॥ नितरयतब्रूहिसुप्रीत्याममानंदयचेतुसम् ॥२॥सुतउवाच॥ साधुपृष्ठभवद्धिरोकानांहितकारकम्॥भवंतोवेमहाध
न्याःपविचाःक्र्भूषणाः॥३॥ यषाचवशिवःसाक्षादेवतंप्रमंश्चभम् ॥ सदाशिवकथारोकेवछभाभवतांसदा॥४॥ तेधन्याशचङ्ता
थासफलदेहधारणम्॥ उ्टृतञ्चकृलतेषांयेशिवंससुपासते॥५॥ सुखेयस्यशिवनामसदाशिवशिवेतिच॥ पापानिनस्परशंत्येवखदि
रंगारंकयथा॥॥ श्रीशिवायनमस्तुभ्येषुखंग्याहसतेयद्॥ तन्धुखंपवनंतीर्थसर्वपापविनाशनम्॥७॥ तन्धुखञ्तथायोवैपश्यत्ति
गरीतिमात्नरः॥ तीर्थजन्यफकरतस्यभवतीतिसुनिथितम्॥८॥यत्र्रथसदातिषठेदेतच्छभतरंद्विज।॥ तस्यदशनमतरेणवेणीस्नानफल
लभेत ॥९॥ शिवनामविभूतिश्तथारुद्ाक्षएवच ॥ एतव्रयंमहापुण्यत्िवेणीसदशंस्छृतम् ॥१०॥ एतत्रथंशरीरेचयस्यतिष्ठतिनि
त्यशः॥तस्येवदशनलोकेदुलभंपापदारकम् ॥ ११॥
हेरेसा जो क कहता हे उसका खख पावन तीथे स्व पापका नाश करनेवाङा है ॥ ७ ॥ भ्ीतिमाद् भलष्य जो उसके उखको देखता हे
उसको तीथका फल भाप्त होता हं इसे सन्देह नहीं ॥८॥ हे बाह्णो ! यह शुभ भरणी जहां जहां स्थित होता है उसके दशनभा वाणीकै
लानका फठ होता ६ ॥ ९ ॥ शिवनाम, विभूति, सुब यह तीनों महापविन वेणीकै फडके समान है ॥ १० ॥ इन तीको जो शरीरम
स्थित नित्य देखता हं उस पापहारीका दशेन ठोकमं दुभ हे ॥ ११ ॥
लन
` च्व
शि शयु
॥६८॥
उ्तका दर्शन पेणीके समान है इसमे कु भी अन्तर नहीं है जो एसा नहीं जानता वह पापिष्ठ हे इसमे संदेह नहीं ॥१२॥ जिसके मस्तकपर
विभूति नहीं अंगमे रुद्राक्ष नहीं खलम शिवमयी वाणी नहीं उते अधमके समान त्यागन् करदे ॥१३॥ शिवनाम गेगा विभूति यना ओर रुद्राक्ष
पापनाशिनी सरस्वती है ॥१४॥ जिसके शरीरम यह तीनों ह उसका फठ एक स्थित हे एकते ही वेणीकै स्ानका फठ पैडिततोनि कहा हे ॥१५]॥
बह्माजीने जगतके हितके निमित्त इसको तौरकी है तो बराबरही हुमा था इस कारण पंडितोंको सदा विभूति धारण करनी चाहिये॥ १६।२स् दिनम
तदशन॑यथावेणीनोभयोरतरंमनाक्॥ एवंयोनविजानातिसपापिष्ठोनसंशयः॥ १२॥ विभूतिय॑स्यनोभालेनागेरदराक्षधारणम्॥ नास्ये
शिवमयीवाणीतंत्यजेदधमंयथा ॥१३॥ रौवंनामयथागंगाविभरतिर्यञ्चनामता ॥ शदराक्षविधिजाप्रोक्तासर्वपापविनाशिनी ॥१५॥
शरीरेचचयंयस्यतत्फटचैकतःस्थितम्॥ एकतोवेणिकायाश्वस्नानजंतफल्डुधेः५१५॥ तदेवैतुखितंपूरवव्रह्मणाहितकारिणा॥ समाने
चैवतनातंतस्मादार्यसदाडुधेः॥ १६ ॥ तदिनंहिसमारभ्यब्रह्मविष्ण्वादिभिःसुरैः ॥ धार्यतेतितयतचदशंनात्पापदारकम् ॥१७॥
ऋषयञचुः ॥ ईहशंहिफटंग्रोक्तंनामादितरितयोद्धवम् ॥ तन्माहात्म्यं विशेषेणवक्तुमहसिसुबरत॥ १८ ॥ सूतउवाच ॥ ऋषयोदि
महाप्रज्ञाः सच्छैवाज्ञानिनांमराः ॥ तन्माहात्म्यंहिसद्क्तयाशृणुतादरतोद्विजाः ॥१९॥ सुगूढमपिशाब्रेषुपुराणेश्चतिष्वपि॥ भव
त्सनेहान्मयाविप्राःप्रकाशःक्रियतेऽधुना॥२०॥ कस्तवितयमाहात्भ्यसंजानातिद्धिजेत्तमाः॥ महेश्वरंविनासर्वत्रह्मण्डेषदसत्परम्
॥२१॥ वच्म्यरंनाममाहात्म्यंयथाभक्तिसमासतः॥ शृणुतप्रीतितोविप्राः सर्वपापहरंपरम् ॥२२॥ -
केकर बह्मा विष्ण आदि देवतोने इन तीनोके धारणका नियम कियाहै जो दशनसेही पाप हरनेवाटी है ॥१७॥ ऋषिं बोठे जब तीनोंके नामका ।
फृठ कहाहै हे सुवत ! तो विशेष करके उनका माहात्म्य हमे कहो॥ १ ८॥सूतजी बे हे ऋषियो ! तुम महापंडित ज्ञानियोँमं शिवके भक्त हो आप्।
आदरसे इनका माहात्म्य श्रवण कीजिये ॥१९॥ यह शन्न एराण ओर श्ुतियोमे गूढ है हे बाह्मणो ! तुम्हारे स्नेहे मँ अब परगट करता हूं ॥२०॥
ब्राह्मणो ! क्छोन् सेपुणंतासे इनतीनोंका माहात्म्य जान सकता है केवर इस ब्हाण्डमं सत् असतसे परे शिवही जानते हँ ॥ २१ ॥ यथाशक्ति संक्षेपे
(+
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विश्स०१
अ० २३
०4०99०9 "न
। ॥ कहता हूं हे बाह्मणो ! उस सव पाप हरनेवाले नापकी महिभा प्रीतिसे सुनो ॥ २२ ॥ “शिवं! इतना नाम ही पापरूपी |£
£ मृहापवंतोके जठानेको दावाभ्ि है नाम लेते ही पाप अनायास दग्ध होजाते है यह सत्य है इसमे संदेह नहीं ॥ २३ ॥ हे शौनक ! पापसे ४
|| उत्सन्न हे अनेक भकारकै दुःख है पे एक शिवकै नामत नष्ट होजाते हँ इसमे संदेह नही ॥ २४ ॥ वही वेदिक वही एण्यात्मा वही धन्य है
£ ओर पण्डित है जो नित्य पृथ्वी शिव नामका जप करता है ॥ २५॥ उसको शीघ्र फठके देनेवाठे अनेकं धर्मं होते है हे यने ! जिसको £
£ शिवनामकैे जपे विश्वास होता है॥ २६ ॥ शिचके नामसे पातक नष्ट होते ओर पवित्रता होती है हे मने ! इतने तो पापभी पृथ्वीम ट
४ शिवेतिनामदावाम्नेरमहापातकपर्वताः ॥ भस्मीम॒वंत्यनायासात्सत्यंसत्यंनसंशयः ॥ २३ ॥ पापमूलानिदुःखानिविविघान्यपि ट
# शौनक ॥ शिवनामेकनश्यानिनान्यनश्यानिसर्वथा ॥ २९ ॥ सवैदिकः सपुण्यात्मासधन्यस्सद्ुधोमतः ॥ शिवनामजपासक्तो त
| योनित्थथुविमानव ॥ २५ ॥ भवं तिषिविधाधर्मास्तेषां सद्यःफलोन्युखाः ॥ येषां भवतिविश्वासःशिवनामजपेशने ॥ २६ ॥ पात ¢
कानिविनश्यतियावंतिशिवनामतः॥ युवितावेतिषापानिक्रियंतेननरेभने ॥ २७ ॥ ब्रह्मत्यादिपापानांराशीनप्रमितान्शुने॥ शिव ॥५
4 नामहतंप्रोक्तंनाशयत्यखिलात्ररेः ॥ २८ ॥ शिवनामतरीँप्राप्यसंसारान्धितरंतिये ॥ ससारमूरुपापानितानिनश्यत्यसंशयम् ॥&
# ॥ २९ ॥ ससारमूलभरूतानांपातकानांमदाशने ॥ शिवनामङकडारेणविनाशोजायतेधुवय् ॥ ३० ॥ शिवनामामृतंपेयपापदावान
&
|
८
लार्दितेः ॥ पापदावाग्नितप्तानांशांतिस्तेनविनानदि ॥ ३१ ॥ ©
नहीं ह इतने पाप मनुष्य करते है जितने नष्ट॒होजाति है ॥ २७ ॥ ह खने ब्रहत्यादि पापोके देर शिव नामके ठते ही न्ट होजाते है
॥ २< ॥ शिव नामकी नौकाको प्राप्त हो जो संस; सागरको तरजाते है उनके ससार मूके पाप नष्ट होजाते है इसमे संदेह नहीं ॥ २९ ॥
हे महासने ! संसारक मूलभूत पातरकोंका. शिवनामके कुठारते नाश हो जाता है ॥ ३० ॥ पापहपी दावानल अर्दित हृ्ओंको शिव नामरूप ट
अगत पान करना चाहिये उसके विना पप्पी दावाभ्रिषे दग्ध हुरओंकी शान्ति नहीं होती है ॥। ३१ ॥ त
` च
शि०प़
शिव इस नामकी अगृतधारासे ष्ठत हये, ससार अभिके मध्यमे स्थित हुये भी कभी शोच नहीं करते ।॥। ३२ ॥ जिन महात्मा्ओंको शिवनामका
॥६०९॥
महाशक्ति है उनकी तत्काछ सक्ति हो जाती ॥ ३२ ॥ हे खनीश्वरो ! जिन्होने अनेक जन्भतक तप किया है उनको सब पाप हरनेवाटी
शिव नामकी भक्ति होती है ॥ ३४ ॥ जिसङो शिवके साधारण नामकी अखण्ड भक्ति है उसको मोक्ष घुखम है ओर को नहीं यह भेरा
निश्वय् है ॥ ३५ ॥ अनेक पाप करके भी जो आद्रे शिवनाम जपता है वह निःसंदेह सब पापोसे टूट जाता है ॥ ३६ ॥ जसे वनमं
दावात वृक्ष भस्म होजाते हैँ इसी भकार शिव नामसे सव पाप दूर होजाते ह ॥ ३७ ॥ जो नित्य शरीरम भस्म गाये आदरसे शिवका ५
शिवेतिनामपीयूषवषेधारापरिप्डताः॥ससारदवमध्येपिनशोचंतिकदाचन॥ ३२ शिवनाग्निमदद्धकित्जातायेषां महात्मनाम् तद्धि
धानातुसहसाुक्ितिभवतिस्वंथा॥३२॥अनेकजन्मभियेनतपस्तपतमुनीश्वर॥ शिवनाम्निभवेद्धक्तिः सवैषापापदहारिणी॥ ३७॥ यस्या
साधारणंशंधुनाम्निभक्तिरखंडिता॥ तस्ये वमोक्षःखरभोनान्यस्येतिमतिमंम॥ २५॥कृत्वाप्यनेकपाप्निशिवनामजपाद्रः॥ सर्व॑पा
पविनि्थुक्तोभवत्येवनसंशयः॥ ३६॥भ्वतिभस्मसाढृक्षादवद्ग्धायथावने॥ तथातावंतिद्ग्धानिपाषानिशिवनामतः॥ ३७॥ योनित्य
भस्मूरतागःशिवनामजपादरः॥संतरत्येवसंसारंसघोरमपिशौनक ॥३८॥ ब्रहमस्वहरणंृत्वाहत्वापिवरह्णान्वहून्॥ नङिप्यतेनरः
पपःशिवनामजपाद्रः॥३९॥ विरौक्यवेदानखिलाच्छिवनामजपःपरम् ॥ संसारतारणोपायइतिपूरवैविनिश्चितः ॥४०॥ किंबहू
तयासुनिश्रषठाःश्लोकेनेकेनवच्म्यहम् ॥ शिवनाम्नोमहिमानसवैपापापदारिणम् ॥७१॥ पापानांदरणेशंभोनांमःशवितिहिपावनी॥
शक्रोतिपातकंतावत्कतनापिनरःकचित् ॥४२॥ शिवनामप्रभावेणलेभेसद्रतिशुत्तमाम् ॥इन्द्रथ्म्नवरपःपूषैमहापापःपुरासुने ॥४३॥
| जपता है हे शौनक ! वह घोर संसारे तरजाता है ॥ ३८ ॥ बाहमणोका द्रव्य हरण करके बाहमणोको मारकर भी शिवनाम भक्ते
जपनेवाङा पापूसे रिप नहीं होता ॥ ४९ ॥ सम्पूणं वेदोको. देखकर शिव ॒नाम् ही प्रम जप है स्तारतारने का उपाय है यही पर्वजोनि
निश्वय किया हे ॥ ४०॥ हे स॒नीश्वरो 1 बहुत कहनेसे कया है एक ही श्छोकते मँ कहता हं शिव नामकी महिमा सष पापको हरमेवाली
है ॥४१।॥ पापेकि हरनेमे शिवकी शक्ति महापावनी है मलुष्य इतना तो पाप भी नहीं कर सकत।।।४२॥ शिवनामके भमावसे उत्तम सद्रति पाम
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होती है हे छने ! पूर्वकाले इन्रयुप्न राजा बडा प्रापी था ॥ ४३ ॥ ओर एक ब्राह्मणकी सी महापापिनी थी इनकीमी शिवनामके , ।
¢ पवित्रगति होगईं ॥ ४४ ॥ हे बाह्मणो ! इस प्रकार तुमसे नाभका उत्तम माहात्म्य कहा है अब सब द पाप दूर करनेवाला मस्ममाहात्म्य सुनो
# | ४५ ॥ इति श्रीशेवे महा ० विये° भाषाटीकायां साध्यसाधनखंडे नाभमाहात्म्यवर्णनो नाम जयोर्विंशोऽष्यायः ॥ २३ ॥ स्तजी बोरे सव
¢ गलके देनेवाली दोभकारकी मस्म कही हे उसका पकार बँ कहता हू सावधान होकर सुनो ॥१॥ एक महाभस्म दूरी स्वल्पसज्क है महा
¢ तथाकाचिदिजायोषासौशनबहपापिनी ॥ शिवनामप्रभावेणलेभेसद्वतिुत्तमाम् 0 ॥ इत्युक्तवोद्विजश्रष्ठानाममाहात्म्य |
सत्तमम् ॥ श्रणुध्वंभस्ममाहात्म्यसर्वेपावनपावनम् ॥ ४५ ॥ इतिश्रीशिवमहापुराणेवियेश्वरसदितायांसाध्यसाधनखण्डेशिव
ह नाममाहात्म्यवणनोनामजयोविशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ सूतउवाच ॥ द्विविधंभस्मसंपरोक्तंसर्वमगलद॑परम् ॥ तत्परकारमहंवक्ष्येसा ॥&
| वधानतयाशरणु ॥ १ ॥ एवंज्ञेयंमहाभस्मद्वितीयस्वल्पसंज्ञकम् ॥ महाभस्महतिभोक्तंभस्मनानाविर्धपरम् ॥ २ ॥ तद्धस्ममिवि |©
| परोक्तंश्रोतस्मार्तचरोकिकम् ॥ भस्मेव स्वत्पसंज्ञहिबहुधापार (
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कतेश्रोतंस्मार्तचलो ॥ कीर्तितम् ॥ २ ॥ श्रौतंभस्मतथास्मातंद्विजानामेवकीर्तितम् ॥
अन्येषामपिसवेषामप्रंभस्मलौकिकम् ॥ ७ ॥ धारणं मंजतःभरोक्त द्विजानां
निपुंगवैः ॥ केवरुधारणं्ेयमन्येषांमंज्वजितम् ||
॥ ९॥ आग्नेयसुच्यतेभस्मदग्धगोमयसंभवम् ॥ तदापिदरन्यमितयुक्त॑मिषुड्स्यमहाघने ॥ ६ ॥ अग्निहोत्ोत्थितभस्मसंभादयं ¢
वामनीषिभिः।अन्ययज्ञोत्थितेवापिन्िपुण्ड्स्यचधारणे ॥ ७ ॥ ९
भस्म नाना भकारकी भर्म कही है ॥ २ ॥ श्रोत स्मातं लौकिक तीन भकारकी भस्म कही है स्वल्पजनकः भस्म भौ बहुधा कही है ॥ ३ ॥
श्रौत स्माते भस्म बाह्म्णोको कही है ओर दसर्योको ठौकिंक मस्म कही है ॥ ४ ॥ बाहणोको मनोत भस्म धरण करना कहा है दूसरोको \
मंज्रवजित धारण करना कहा है ॥ ५ ॥ गोबरसे बनी हृदं भर्म आग्नेय है है यहाखने त
त
। जिषुदेका यही दव्य है ॥ ६ ॥ अथवा बिानोको
अश्निहोत्रकी भस्म धारण करनी चाहिये तथा दूसरे यज्ञसे भादु्ृत भत निषद् धारणमे युक्तं ३ ॥ ७ ॥
श्र
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जाबाट्उपनिषदमे टिल हए अभ्िरित्यादि मते सातवार भस्म जठ उद्लंन करनी चाहिये॥<॥व्णोको आशरमोको मंतरोमि आदर्ने जावाछिनि
म पूवक त्िषण्ड्, ओर उदधून करना कहा है ॥९॥ भस्मसे उदध्ूकन ओर तिरछा चिषण्दू भमादसे मोक्षाथीं न त्यागन् करे एसी श्रुति हे॥१०॥ ¢
शिव विष्ण तिय तिषुण्डर् धारण किया हुभ उमादेवी ओर लक्ष्मीसे नित्य प्रशमित होता हे॥११॥ ब्राह्मण् क्षत्रिय वंश्य शूद्र मंकरजाति तथा ६
अपशोमे भी त्रिषण्डद्ारा भस्म ओर दद्धूकन धारण किया गया है॥ १२॥भस्मठेप ओर च्िष्ण्ड् जो भरद्धासे नहीं खगात्ते उनका वृ्णीश्रमयुक्त ८
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॥७०॥
॥
अग्निरित्यादिभिमर्जाबालोपनिषद्रतेः ॥ सप्तमिधूलनंकार्थभस्मनासजलेनच ॥ < ॥ वर्णीनामाश्रमाणांचमेजतोमंत्रतोपिच ॥
जिषडदध्रलनरोवतजाबलिराद्रेणच ॥ ९ ॥ मस्मनोद्धूरनचेवयथातिर्यक्चिषदकम् ॥ प्रमाद दपिमोक्षार्थीनत्यजेदितिविश्
तिः ॥ १० ॥ शिविनविष्णनचेवतथाति्कििपुड्कम् ॥ उमादेवी चरक्ष्मीश्चवाचान्यामि्नित्यशः॥ 9१ ॥ ब्राह्मणेः क्ष्ये
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वश्यैः शुदररपिचसंकरः ॥
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अपत्रशोधतंमस्मातदरोद्धूलनात्मना ॥ १२ ॥ उदधूलन्िपुंदंचश्रदधयानाचरंतिये ॥ तेषानास्ति |£
समाचारावणाश्रमसमन्वितः ॥ १२ ॥ उद्धूलनंिपुंदंचश्रद्धयानाचरंतिये ॥ तेषांनास्तिविनिभुक्तिस्संसाराजन्मकोटिभिः |
॥ १४ ॥ उद्धूलनं विपह्चश्रदधयानाचरन्तिये.॥ तेषानास्तिशिवज्ञानकरपकोटिशतेरपि ॥ १५ ॥ उद्धूलनंभिपुदंचश्रद्धयाना &
चरन्तिये ॥ तेमहापातके्यक्ताइतिशाश्चीयनिणंयः ॥ १६ ॥ उद्धूलनं जिधुडचश्रद्धयानाचरन्ति ये ॥ तषामाचरिते सर्वविपरी ¢
तफलयहि ॥ १७ ॥ महापातकृयुक्तानांजतूनांशर्ववि द्विषाम् ॥ अिपुण्डोदधूलनद्वेषोजायतेसुदटं शन ॥ १८ ॥
¢ नहीं हे ॥१३॥ उद्धून ओर तरिष्ड् जो श्रदधासे नहीं करते ह वह संसारसागरे भी सक्त नहीं होते ॥१४॥ उद्धूरन ओर तरिण्ड |
जो दासे नहीं करते है उनको सौ करोड कल्प भी शिबज्ञान नहीं होता है ॥ १५॥ उदुधूठन ओग तिषठ जो भ्रद्धासे नहीं करते वै
अ° २९|| महापातकी हँ यह शान्चीय निर्णय है ॥ १६ ॥ उदधूखन ओर तरिष्ण्ड् जो भरद्धासे नहीं करते है उनका सब आचरण बिपरत एके निमित्त |¢
५ है ॥ १७॥ हे सुने ! महापातक युक्त सव प्राणिरयोका देष करनेवाठे जो भाण है उन्हीका जिषुण्डर् ओर भस्मे देष ३ ॥ १८ ॥ &
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जो ज्ञानी शिवागनिसे “यायुषेति" म॑त्रसे भस्म ठेकर ठगाता हे वह भस्मके स्पशं करतेही सब पापो छुट जाता हे ॥ १९ ॥ जो श्वेत , .
तीनों सन्ध्याओमे त्रिष्णड् ठगाता है वह सव पापोसे सक्तं हो शिवके संग प्रसन्न होता है ॥ २० ॥ जो श्वेत भस्मे कारमं िष्ण्द् ठगाता
है वह अनादि मूतलोकोमे अमृत होता है ॥२१॥ जो भस्मसे स्नान नहीं किया हो तो षडक्षरका जप न करे भस्मका भिषड् ठगाकर विधिते ठ
जप करे ॥ २२ ॥ द्यारहित ग्रा अधम् वा जो सब पापोसे युक्त है वधसे युक्त मूर्खं वा पतित कैसाही हो ॥२३॥ ` भस्म धारण किये जि
देशमे निवास करता है वहां सवं तीथं ओर यज्ञंका निवास है ॥ २४ ॥ भरिष्ड् सहित जीव सुर असुर प्राणियों पूजित होता है वह प्रापी
शिवाग्निका्य्ःकृत्वाङुर्याच्रियायुषात्मवित्॥ सुच्यतेसर्वपाधेस्तरेषष्टनभस्मनानरः ॥१९॥ सितेनभस्मनाङ्कय्याधिसन्ध्यंयन्चि
ण्डकृम् ॥ सवेपापविनिसुक्तंःशिवेनसहमोदते ॥२०॥ सितेनभस्मनाकर्याखलरेतुिषण्डकम् ॥ योसावनादिभूतान्हिलोकाना
पीमृतोभवेत् ॥२१॥ अकृत्वाभस्मनास्नानंनजपेद्रेषडक्षरम् ॥ भिपुंदंचरचित्वातविधिनाभस्मनाजपेत् ॥२२॥ अदयोवाधमो
वापिसवेपापान्वितोपिवा ॥ उपःपापान्वितोवापिसुखोवापतितोप्िवा ॥२२॥यस्मन्देशेवसेत्नित्यभूतिशासनसंयुतः ॥ सर्वत
अकरतभिःसानिध्यं क्रियतेसद्॥२९॥ भिषुदसदितोजीवःपूज्यःसर्वै सरासुरेः॥ पापान्वितोषिशुद्धात्माकिषुनःद्धयायुतः ॥२९॥
यस्मिन्देशेशिवज्ञानीभूतिशासनसंयुतः ॥ गतोयदच्छयाद्यापितस्मिस्तीर्थाःसमागताः ॥२६॥ बहुनाधकिषठक्तेनधा्थभस्मसदा
. बुधः ॥ किगाचनंसदाकार्यजप्योमजःषदक्षरः ॥ २७॥ बह्मणाविष्णुनावापिरुदेणनिभिः सुरेः॥ भस्मधारणमाहात्स्यनशक्यं
परिभाषितुम् ॥ २८ ॥ इतिव्णा्रमाचारोटुप्तवणक्रियोपिच ॥ पापात्सङृत्रिषुंडस्यधारणात्सोपिदुच्यते ॥ २९ ॥
हाकर भी शुद्धात्मा होजाता है फिर भरद्धा युक्त करनेवाठेकी तो बातही क्या है ॥ २५ ॥ जिन देशम शिवज्ञानी भूति शा्षनते युत रहता
है वह जाति जाति सम्पुणं तीर्थोका स्थान है ॥ २६ ॥ बहुत कहनेसे क्या है विद्रानोंको सदा भस्म धारण करनी चाहिये सदा दिगार्चन कर
षडक्षर मंचका जप करना चाहिये ॥ २७ ॥ बरहा पिण्ण रुद् सुनि देवताभी भस्मधारणके माहातम्यको नहीं कह सकते ३ ॥२८॥ इस भकार
बणे आचार ओर वणकी क्रिया जिसने कुप्त करदी है वह एकवार विष्के धारणे सब पापो दूर जाता है ॥ २९ ॥
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् | जो भष्य भस्मधारीको त्यागकर कर्मं करते है उनकी संसारं
॥७१ || पव अशान किया जितत ब्राह्मणे शिरपर च् धारण किया
उत्पन्न जानना ॥३२२॥ "मानस्तोके" इस मंत्रसे अभिर्म॑त्नित कर भस्म धारण कर [ह र चबक मेरो ॐ
ते वेश्य ओर प॑ंचाक्षरमंजसे शद छगावे तथा दूसरी विधवा च्लीभी पचाक्षरमंत्रसे रगावे ॥३४॥ मयने गहस्थको प॑चत्रहक म्॑नोंको कहा है ओर
ट
¢ येभस्मधारिणंत्यक्ताकर्मर्वतिमानवाः॥तेषांनास्तिविनिमोक्षःसंसाराजन्मकोटिभिः॥ ३ ०॥तेनाधीतंयुरोःसवेतेनसवमनुष्ठितम्॥
¢| केनविभेणशिरसिनिभस्मनाकृतम् ॥ २१ ॥ ये भस्मधारिणंदृ्ठानराःछ्वतिताडनम्॥ तेषां चंडालतोजन्मनब्र्मन्नूद्यंविपनिता
॥३२॥ मानस्तोकेनमत्रेणमंवितंभस्मधारयेत् ॥ ब्राह्मणशषत्रियञ्चवपरोक्तेष्वंगेषुभवितिमान्॥ ३३ ॥ वेश्यच्चिय॒बकेनवशदरःपचा
¢ ्षरेणतु ॥ अन्येषां विधवाब्नीर्णाविधिःप्रोक्तश्ञयदवत् ॥२७॥ पंचनरन्नादिमनुमिग्रंदस्थस्यविधीयते ॥ तरियंबकेनमलुनाविधिवं
ब्रह्मचारिणः ॥२५॥अघोरेणाथमलनापिपिनस्थविपि स्मृतः ॥ यतिस्तुप्रणवेनेव बिपदादीनिकारयेत् ॥३६॥ अतिवणाश्रमीनि
4 त्यंशिवोहंभावनात्परात् ॥ शिवयोगीचनियतमीशानेनापिधारयेत् ॥३७॥ नत्याज्येसवेवर्णेश्चभस्मधारणमुत्तमम् ॥ अन्येरपि
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कृरोड जन्मसे भी मुक्ति नहीं होती ॥३०॥ उसने गुरुके पास सब पडा ओर
है ॥३१॥ जो मवुष्य भस्मधारीको देख तदना करते हँ उनका जनम चाडार्
करे बाह्मण क्षत्रिय भक्तियुक्त शरीरम र्गावे ॥३२॥ “उयंबकमत्र!
यथाजीवैस्सदेति शिवशासनम् ॥३८॥ भस्मस्नानेनयावंतः कणाः स्वाङ्गतिषठिताः ॥ तावति शिविगानितनौधततेदिधारकः
॥ ३९ ॥ ब्राह्मणाकष्रियावेश्याश्ुदराश्चापिचसंकराः ॥ ल्ियोथविधवाबालाव्रात्ताःषाखंडिकास्तथा ॥ 8 ° ॥
८अयंबकं इस मंत्रे बह्चारीको विधि कही है ॥३५॥ अघोर मत्से वनम स्थितोंकी विधि कही है यति प्रणवेही तिषएण्डादि ठगावे ॥३६॥
अतिवणाश्रमी नित्य शिवोहं" एसी भावनासे धारे शिवयोगी ई शानमंत्रसे धारण करे ॥ ३७॥ किती वर्णको भी भस्म धारण त्यागना उचित
नहीं है ओौर जीरवोकोभी धारनी उचित हे यह शिषकी आज्ञा है ॥ ३८ ॥ भस्म स्नानसे जितने कण अपने अंगमे भरविषट होते है उतनेही वह
अपने शरीरम शिवरिग धारण करते ह ॥ ३९ ॥ बाह्मण क्षत्रिय वैश्य शद संकरजाति ज्ञी या विधवा बाठक पाखंडी ॥ ४० ॥
विशस
अणम्
& | गृहस्थी बनी संन्यासी व्रती नारी यह भस्म धारण करनेसे शक्त होते है सन्देह नहीं ॥ ४१ ॥ ज्ञान अज्ञानसे धारण कीडूदं अभि |
। | समान है ज्ञान अज्ञानसे धारण की हुदै भस्म स्वेथा भलुष्यको प्रवि कर देती है ॥ ४२ ॥ जो भस्म ओर रुद्राक्ष नहीं धारण ; ठ
ह|| उनका. अन् ओर ज थोडा भी ब्रहण न करे गृहस्थी वनी यती वणीं अथवा संकर जाति दन्दके यहांका भोजन करके पराप खानेवाला ठ
8 होता है ओर नरकको जाता है उनके यहाका भोजन कर तीन वणं गायत्री जपसे ओर सन्यासी भ्रणवके जपते पवित्र होता है ॥ ४३॥
टै जो च्रिषुदकी निन्दा करते है भानो ३ शिवकी निन्दा करते है जो उसे धारण करते ह बे शिवको धारण करते है ॥ ४४ ॥ भस्मरहित ¢
ब्रह्मचारीगृदीवन्यःसन्यासीवाव्रतीतथा ॥ ना्योमस्मभिंदडांकाुक्ताएवनसशयः ॥४१।।ज्ञानधृज्ञानतोवापिवहिदाहसमोयथा ॥
ज्ञानाज्ञानधृतं भस्मपावयेत्सकलनरम्॥४२। नाश्नीयाललमन्नमल्पमपिवाभस्माक्षधृत्याविनाथुक्रावाथगृहीवनीपतियतिरवर्णी तथासं |
करः ॥एनोधुङ्नरकं्रयातिसतदागाय्रिजापेनतद्वणनां तु यतेस्त॒ शख्यप्रणवाजापेन शुक्तं भवेत्॥४३॥ बिपुण्डं ये विनिन्दंतिनि
न्द्न्तिशिवमेवते ॥ धारयतिचयेभक्त्या धारयन्ति तमेवते॥४४॥ धिग्भस्मरहितं भारंषिग्यामसशिवाल्यम् ॥ धिगनीशाचनं
¢ जन्मधिग्विद्यामरिवाश्रयाम्॥४५॥ येनिदंतिमदेश्वरंत्रिजगतामाधारभतंहरं ये निन्द॑तििषुंडधारणकरंदोषस्तुतदशेने॥ तेवेसं करु क
रासुरखरश्वकरोष्टकीटोपमाजाताएवभवंतिपापपरमास्तेनारका केवलम् ७६ ॥ तेषा शिभास्करौनिशि दिनेस्वप्नेपिनोकेवरुपश्यंतुश
||९| तिद॑सूक्तजपतोसुच्येततेनादृताः॥ सत्सं भाषणतोभवेदधिनरकंनिस्तारवानास्थितंयभस्मादिविधारणंहिपुश्षंनिदंतिमं दाहिते॥ ४७॥
ह|| भस्तक, शिवाढय रहित भ्राम, दैश्वरके अर्चनरहित जन्म, शिवाभय हीनं पियको धिक्ञार है ॥ ४५॥ जो तीनों जगतकै आधारभूत हरकी
ट| निन्दा करते है ओर जो शरिषुद् धारण करनेवारेकी निन्दा करते हँ उनके दशेन्े दोष है वे निश्वय॒वर्णसंकर शूकर अघुर खर श्वान
६ गद् कीटक समान हैँ पै पपरष उत्पन्न हुए ह केवल नरकहीके जानेको जन्म ठे आये ह ॥ ४६ ॥ बे रात दिन चन्द्र॒ सूर्यो पत्यक
देखकर भी नहीं देखते ह तहां वे आदरे रशुद्रसक्तका जप करनेसे शक्त हो सकते है उन पायधित्तियोपे बाता नहीं करनी चाहिये
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् रेस करने नरक होता है जिससे फिर निस्तार नहीं है जो भस्मधारी एरुषकी निदा करते है वे महामद ह ॥४॥ इस शिवय तात्निकका
॥७२॥|| | जो ऊरषवषण्ड् धारी है उनका तथा तप्त शंखचक बाहोमे जगानेवाठोंका अधिकार नहीं है ॥ ४८ ॥ बरृहज्नाबाख्कै प्ररे हुए बहते छोक है
उनको विचार कर भयत्नसे भस्मधारण करे ॥ ४९ ॥ जो चंदनमे मिलाकर विभूति धारण करते है वह भी उचित है कुछ हो बुद्धिमानुको
माथेपर॒विमूति अवश्य धारण करनी चाहिये ॥ ५० ॥ ब्विरयोको त्िष्ण्ड् धारण करना चाहिये बाह्मणोको तथा. विधवाओंको
ठ भी धारण करना चाहिये इत प्रकार सम्पूणं आशमवाठोंको अपवर्गकी देनेवाटी ओर पाप दूर करनेवाली विभूति सदा धारण करनी
¢ नतामिकस्त्वधिकृतोनोद्धुदधरोुने ॥ सतप्तचकविह्लोवशिवयज्ञेवदिष्कृत्ः ॥४८॥ ततरेतेबहवोोकाब्रहनाबालचोदिताः ॥ तेवि
ठ इ परिमा समना विलि
नोयदिसतिबुद्धयः॥५०॥ खीभिचिपण्ड्मलकावपि धारणीयं भस्मद्विजादिमिरथो विधवाभिरेवम्॥ तद्रत्सदाश्रमवतां विशदा
&| विश्ूतिधांयापवरगफ़ल्दासकलाधहन्ी ॥ ५9 ॥ बिषुण्डु्ुरतेयस्तु भस्मना विधिपूवंकम् ॥ महापातकसंवातिरच्यते चोपपा
£| तकेः॥५२॥बह्मचारीगदस्थोवावानप्रस्थोथवायतिः॥ बह्नक्षराश्चविटञयदास्तथान्ये पतिताधमाः ॥५३॥ उद्धूलनंधिषडं चधृत्वा
¢ शद्धाभवंतिच ॥ भस्मनोविधिना सम्यक्पापरारिविहाय च ॥५४॥ भस्मधारी विशेषेण श्वीगोहत्यादिपातकेः ॥ वीरहत्याश्व
ठै
इत्याभ्यां सुच्यतेनाजसशयः॥५९॥ प्रद्न्यापहरणं परदाराभिमशेनम् ॥ परनिन्दा परक्षे्हरणं परपीडनम् ॥५६॥
वि०सं०१ चाहिये ॥ "3 ॥ जो भस्मे विधिपुवक तिष्ण्ड् छगाता है बह महापातक ओर उपपातकोते भी ट जाता है ॥ ५२ ॥ बरह्मचारी गृहस्थी
अ० २४||@|| अथवा यती बराह्मण क्षत्रिय वैश्य शदर॒तथा दूरे पतित ओर अधम ॥ ५३ ॥ यह भस्म ओर श्िषुण्ड् धारणसे शुद्ध हो जाते हँ भस्मे
विधिपूर्वकं पापराशिको छोडकर शुद्ध ॒होजाता है ॥ ५४ ॥ भस्मका धारण करनेवाला विशेषकर चली ओर गोहत्यादिकपातक तथा
वीरघोरहत्यासे सक्त हो जाता है इसमे संदेह नहीं ॥ ५५ ॥ पराये द्रव्यका हरना पराई श्ियोका धर्षण करना पराई निन्दा करना पराया
# प त
9९
| दू्रोको पीडादेनी॥ ५६॥ खेती ओर बगीचोका हरणकरना धरोमें अभि ठगाना गो सुवणं महिषी आदिका हरणकरना तिर कंबठ ||
। | ॥ ५७ ॥ नीति अन्यधान्य ओर जलादिका छेना दशवेश्या चाण्डाछी शदरी नटी ॥ ५८ ॥ रजस्वला कन्या विधवा मेथुन करना ट
मास॒ चर्म रस॒ ओर ठवणका विक्रय करना ॥ ५९ ॥ चुगली कूट वाद ङी साक्षी देनी इस पकारकै अनेक पाप त्िषण्डूकेधारण करनेसे होजाते ||>
है ॥ ६० ॥ शिव द्रव्यका हना शिवकी निंदा करना शिवभक्तोकी निन्दा करना यह पाप प्रायधित्तसे भी नहीं जाते ॥ ६१ ॥ जि ||
शरीर ररक्ष ओर माथेप्र त्रिषुण्ड् है वह चाण्डाठ होनेषर भी पूजनीय ओर वर्णोमिं उत्तमहै ॥ ६२ ॥ इ्तोकम जितने तीथं ओर गंगादि ४
सस्यारामादिहरणं गृहदाहादिकर्मच ॥ गोहिरण्यमदिष्यादितिलकम्बलवाससाम् ॥५७॥ अन्नधान्यजलादीनां नीचेभ्यश्चपरि | |
गरदः ॥ दशवेश्यामतेगीषुवृषरीषु नरीषुच ॥५८॥ रजस्वलासु कन्यासु विधवा च मेथुनम्॥ मांसचमरसादीनां ख्वणस्य चवि ट
कयः॥५९॥ पेशन्यंकूरवादश्चसक्षिमिथ्यामिलाषिणाम्॥ एवमादीन्यसख्यानिपापानि विधानिच॥ सद्यएवविनश्यतिविपुंडस्य |
च घारणात्॥६०॥ शिषद्रभ्यापदरणंशिवनिदाचङ्जचित् ॥ निदाचशिवभक्तानांप्रायश्चिततेनश्ुद्धयति।॥& १॥रुदाक्षयस्यगानरेषट |£
लरितुश्रिषड्कम्॥सचांडालोपिसप्ज्यस्सर्षवणोत्तमोत्तमः॥ ६२ यानिती्ानिलोकेस्मिन्गंगादयास्सरितश्चयाः॥ स्नातोभव तिस ६
चल्छटियस्िपंडकम्॥६३॥सप्तकोटिमहामंबाःपंचाक्षरपुरस्सराः॥तथान्येकोटिशोमृचाःशेवकैवस्यहेतवः॥६४॥ अन्यम ्ाश्वदेवा ९
नासर्वसोख्यकरासने ॥ तेसवैतस्यवश्याःसयु्योबिभतिंवरिषकम् ॥६५॥ सदसप्वजातानांसहसंजनयिभ्यताम् ॥ स्व्शजानां ||ह
ज्ञातीनाशुद्धरेयस्ि पुडङृत्॥&६९६॥ इह थुक्तखिकान्भोगान्दीघायु्याधिवाजेतः॥ जीवितांते च मरणं घुखेनैव् मपद्यते ॥६७॥ ||
नदी है जिसके माधेपर त्रिष्ण्ड् है वह सव स्थानो स्नान करचुका ॥ ६२ ॥ सातकरोड महामंच् पाक्षरादि तथा ओरभी करोड मंत्र ६
शिवणक्तिक दाता ह ॥ ६४ ॥ है सने ! ओरी दूसरे देवताओंके मंत्र सुखदेनेवाे है परन्तु बरे सब॒च्िषुण्ड् धारण करनेवालेके वशम ह ट
॥ ६५ ॥ सहस्रो पहले हुए ओर सहस्रां आगे होनेवारे अपने जातिवालोको उद्धार कंर देता है जो त्रिषण्ड् धारण करनेवाछा है ॥ ६६ ॥ ¢
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यहां सम्पूण भोगोंको भोग दी्ेआयु व्याधिते वजित होकर सुखे शरीर त्थागनकेर् ॥ ६७ ॥
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आढ एते युक्त दिव्यकल्याणयुक्तं शरीरको भाप. होकर दिव्य विमानपर आरोहण कर दिव्य ह्वियोति सेवितहो॥ ६८ ॥ संपूण वियाधर महापराक्रमी
कम
शि श्पु |
॥७२॥
अक्ेशवर्यशणोपेतंपराप्यदिव्यवपुःशिवस्॥ दिव्य॑विमानमारह्यदिव्यत्रिदशसेवितस्॥६८॥ विद्याधराणां सवेषां गंधवोणां मदौजसाम्॥
इदादिरोकपालानांलोकेषठचयथाक्रमम्॥६९॥ क्रा भोगान्सुविपुलान्प्रजेशानां पदेषु च॥ ब्ह्नणःपदमासादयत्कन्याशतंरमेत्॥
॥७०॥ ततर बह्मायुषोमानंथुक्राभोगाननेकशः ॥ विष्णोोकेलमेद्धोगंयावद्र्मशतात्ययः॥७१॥ शिवलोकंततःप्राप्यलब्ष्वष्का
ममक्षयम्।॥शिवसायुज्यमाप्नोति्तशयोनाजजायते॥७२॥ सर्वोषनिषदांसारंसमारोकष्यञुहसहः॥ इदमेव हिनिर्णति परंश्रय्िषंद्
कृम्॥७३।विभूतिनिदतेयोकेब्ाह्नणःसोन्यजातकः॥ यातिचनरकेघोरेथाव द्रल्ला चतु्ैखः॥७४॥श्राद्धेयज्ञेजपेहोमेवेश्वदेवेसुराचने॥
| धृततिपुङप्ूतात्मामृत्युनयतिमानवः॥७९॥जरस्नानं मरुत्यागेभस्मन्नानसदाश्चचि॥ मञल्लानेहरेत्पाप्ञानस्नानेपरंपदम् ।॥७६॥
सर्वतीथषुयतपुण्यं सवंतीयेषुयत्फलम्॥ तत्फलंसमवाप्नोतिभस्मन्नानकरोनरः ॥७७॥ भस्मन्ञानंपरंतीर्थगंगाक्नानेदिनेदिने॥ भस्म
रूपीशिवःसाक्षाद्गस्म ञलोक्यवावनम्॥७८॥ नतदूनेनतद्धयानेनतदानजपोनक्षः॥ भिषडेणविनायेनविप्रेणयदुष्ठितम् ॥ ७९ ॥
त
वि०सु०१
अ० २४
रज्य येउ ७९.4८9
होताहै ॥७७॥ भस्मल्ञान परमतीथह दिन दिन गंगाल्ञानहै भस्मरूपी साक्षाव शिब भस्म तिरोकीको पवित्र करतीहे॥७८॥ वह स्नान दान ध्यान
गंषवंदद्रादि टोकपालोके लोकम यथाक्रम ॥ ६९ ॥ अनेक भोर्गोको भोगकर भजापतियोके रोकं तथा बरह्ाकै पदको पाप होकर सौ कन्याओि
रमता हुभा॥ ७० ॥ वहां बलाकी आयुपर्यत अनेक भोगोको भोगकर सौ बहमाकी आयुतक वहं रहताहै ॥ ७१॥ फिर शिवरोकको प्राह अक्षय ||
कामनाको छेता है फिर शिवके सायुज्यको भप्त होताहै इसमे संदेह नहीं ॥। ७२ ॥ वारंवार संपुण उपनिषदोके सारको देखकर यही निणेय कियाहे
किं त्रिषण्ड् धारण करना शरेष्ठ ह ॥ ७३॥ जो विभूतिकी निंदा करता है दह बाहयन नहीं है अन्यजाति है वह बह्माकी आयुपर्यत नरकको जाताहै
॥ ७४ ॥ शाद यज्ञजपहोम् वैश्वदेव देवाचेनमं रिका धारण करनेवाला शृतयुको जीतता है ॥ ७५॥ रत्यागमे जलज्ञान है भस्मन्ञान |
| पावित्र हे,मत्रज्ञान पापहरताहज्ञानज्ञानते परपद हो ताहे॥७६॥ सब तीरथोमे ज्ञानका एण्य ओर फठहै षह फक भस्मे ज्ञान करनेवाठेभवुष्यको भाप
||
~~
~ ~
न> 46२ 44
जप नहीं रै जो बाह्मण विष्के बिना अवष्ठान करता हे ॥ ७९ ॥ वानपस्थको कन्याको दीक्षाहीन मल्योको मध्याहसते पहठे जके स्नान ||©
© न (<€ _, न. = = ० न 2
कर्तव्य है फिर जछ्वर्जित है ॥ ८० ॥ जो नित्य नियमित मनसे त्रिषुड् धारण करता हे बह शिवभक्त है भुक्ति खकितिको भाप होता रै ©
| ८१ ॥ जिसके अगम अनेकं एण्यका देनेवाखा एक भी रदराक्ष नहीं है ओर त्रिष्णडूसेभी रहित है तो उसका जन्म निरथक है ॥ ८२ । ४
यह विष्ठा माहात्म्य ने सेक्षेपसे कहा हे यह सब भराणियोका रहस्य तुमको प रखना उचित है ॥ ८३ ॥ हे खने ! ठलादादि अंगों
त्रिष्डूकी तीन रेखा होती है यह पंडितोने कहा है ॥८४॥ भौंक मध्यसे प्रारंभ कर जहांतक भौका अन्त हो उतने भमाणका माथेमं तिष्ट ६
वानप्स्थस्यकन्यानांदीक्षादीननृणां तथा ॥ मध्याह्वासराग्जले्यक्तंपरतोजल्वाजितम् ॥८०॥ एवंत्रिपुयःड्य्यानित्यं नियतम् ८
नसः॥ शिवभक्तःसविज्ञयोभुर्वितशुर्वितचर्विदति ॥८१॥ यस्यांगेनैवरुद्ाक्षएकोपिबहृपुण्यदः॥ तस्यजन्मनिरथस्यात्रिपुड्रहितो ||
यदि॥८२॥ एवंत्िषुड्माहातम्येसमासात्कथितंम्या ॥ रदस्यंसरवजंतूनां गोपनीयमिरदत्वया ॥ ८२ ॥ तिखोरेखाभवंत्येवस्थाने |©
घुसुनिषगवाः ॥ ककारादिषुसर्वेषठयथोकतेषुदुधेखने ॥८४॥ धुवोमेध्यंसमारभ्ययावदंतोभवेदश्चवोः ॥ तावत्प्रमाणसंधार्यललाटेच ||
स मध्यमानामिकास्यामध्येतप्रतिरोमतः ॥ अणषठनकृतारेखािपुण्डाख्याभिधीयते ॥<६॥ मर्येयकिभिरा |©
दायतिसभिरमस्मयत्नतः ॥ विपुण्ड्धारयेद्धत्तयाधुकितसुक्तिप्रदंपरम्॥८७॥ति्रणामपि रेखानां पत्येकंनवदेवताः ॥ सर्वांगेषु |>
तावक्ष्येसावधानतयाश्रणु ॥ <८ ॥ अकारो गापत्याभिभधरमश्वरजोगुणः ॥ ऋगवेदशचक्रियाशक्तिःपातःसवनमेवच ॥ ८९ ॥ |
मदादेवश्वरेखायाःप्रथमायाश्चदेवता ॥ विज्ञेयामुनिशादृंलाःशिवदीक्षापरायणेः ॥९०॥
धारण करे ॥८५॥ मध्यमा ओर अनामिका अंगलीसे मध्यमे प्रतिलोमे अंसे करी इई रेखा चिषुण्ड् कहाती हं ॥८६॥ तीन अंगुलियोके
मध्यमे मस्मको यतनपुव॑क ब्रहण करके भकिततते त्रिष्ण्ड् धारण करे यह सुकिति खकितिका देनेवाडा है ॥ ८७ ॥ तीनों रेखाओंके कमते नौ
देवता हँ वह तन अंगो है सावधान हो सुनो भँ उनको कहता हं ॥ ८८ ॥ अकार गाहेपत्य अशि है भू रजोथुण है कषमेद क्रियाशक्ति
ओर प्रातः स्वन है ॥८९॥ प्रथम रेखाके महादेव देवता द हे खनिशष्ठ ! शिव दीक्षाभे प्रायणोको यह जानना उचित है ॥ ९० ॥
् उकार दक्षिणाभि आकाश सत्वयण यजुवद है मध्यदिनका सवन इच्छा शकत अन्तरात्मा ह ॥ ९१ ॥ दूरी, रेखाके महश्वर देवता है हे, ध
॥७४॥ ||| खनिभेषठ ! यह शिवदीक्षावाटे ठोगोको जानना उचित है ॥ ९२ ॥ मकार आहवनीय परमात्मारूप तमोयण स्वमस्वहूप ज्ञान शक्ति सामवेद ्
५६|| तृतीय सवन स्वरूप है ॥ ९३ ॥ तीसरी रेखाके शिव देवता है हे खनिशरष्ठो ! यह शिवदीक्षावारोको जानना चाहिये ॥ ९४ ॥ इस प्रकार ||
सकितते स्थानके देवताओंको नमस्कार करके शुद्ध हो शरिषण्् पारण करनेसे भुक्त खकितको भरा होता है ॥ ५५ ॥ हे स॒नीश्वर ! इस ||)
४ उकारोदक्षिणाग्नि्चनभस्तत्त्वंयजस्तथा ॥ मध्यंदिनचसवनमिच्छाशृक्तयंतरात्मकौ ॥ ९१ ॥ मदेश्वरश्रेखायाद्वितीयायाश्च |
४५|| देवता ॥ विज्ञयासूनिशादूलशिवदीक्षापरायणेः ॥९५२॥ मकाराहवनीयौचपरमात्मातमोदिवौ ॥ ज्ञानशक्तिः सामवेदस्तृतीयसवनं ट
। तथा॥९२॥ शिवश्चैव च रेखायास्तृतियायाशच देवता ॥ विजञेया्चनिशादंकशिकदीक्षापरायणः॥९४॥ एवंनित्यनमस्कृत्यसद्धत्तया |>
६ स्थानदवताः ॥. तिपुण्डधारयेच्छद्धोभुक्तिसुक्तिच विदृति ॥ ९९॥ 1 तेषां स्बधिनोभक्तया ।
४ स्थानानिश्रणसांप्रतम् ॥ ९8 ॥ द्वानिशत्स्थानकेवाददेषोडशस्थानकेपिच ॥ अहटस्थानेतथाचेवृषैच नान्यसेत्॥ ९७ ॥ <
|| उत्तमगिललटेचकर्णयोनजयोस्तथा ॥ नासावक्रगलेष्वेवंहस्तद्वयअतःपरम् ॥९८॥ कूषरेमणिबंधेचहदयेपांयोद्रयोः ॥ नाभौ ट
|| ष्कृदयेचवसूरवो्ंरफेचजाबुनि ॥ ९९ ॥ जंषादवयेपदद्नदेदा्िशत्स्थानत्तमम् ॥ अभ्यन्भूवाड्दिम्देशदिक्पालान्वसभिः ` | टु
| ` सह ॥१००॥ धराधुवथसोमअपथवानिरोनलः.॥ परत्युषश्वप्रभास्चवसवोषट्रकीतिताः॥ १ ॥ । |
वि०॑०१||‡ || रकार सब अंगके स्थान देवता कीतंन किये है अब उनके सम्बन्धी स्थान सुनो ॥ ९६ ॥ वत्तीस स्थाने, सोरह स्थानम, आदस्थानमे तथा |£
अ० २४|| पाचस्थानमं न्यास न करे ॥ ९७ ॥ शिर मस्तक ठ्लाट कान नेत नासिका सुख गढा दोनों हाथ ॥ ९८ ॥ कूषैर मणिबन्धं हदय दोनों |
|| पाश्वं नाभि सष्क देश ऊरू गुल्फ जानु ॥ ९९ ॥ दोनों जवा दोनों पैर यह ३२ स्थान रेष्ठ है अभ्निभू वायु दिग्देश बुक सहित |>
9 दिङ्पार ॥ १०० ॥ धरा धुव सोम जक पवन अश्रि प्रत्यूष प्रभास आढोँ वहु ॥ १ ॥ . |
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भणिवंध हदय नाभि दोनों पाश्वं ॥ ३ ॥ तथा पीठमें स्थापितकर अश्िनीकुमारका यजन करे शिव शकत रुद्र ईश नारद् ॥ ४ ॥ /
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इनके नाममाज्ते पण्डितजन निष्ड् धारण करं अथवा सोरह स्थानमे त्रि्ण्ड् धारण करं ॥ २ ॥ शिर ठकार कंठ दोनों कंधे भुजा कपर |
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¢ | नौ शकत यह सोठह देवता नासत्य ओर दक्ष ये दो अश्िनीकुमार ॥ ५॥ अथवा शिव कैश कान खस बाह हदय नाभि दोनों ||
| ऊरु ॥ ६ ॥ दोनों जाद चरण पृष्ठभाग इन सोठह स्थानम र्गा, शिव. चन्द्र रुद बहा विप्रैश विष्ण ॥ ७ ॥ शरौ हृदयम शिव नाभिमे ||
¢| एतेषानाममत्रेण्रपुदरधारयेदघुधाः ॥ इूर्यद्वाषोडशस्थानेग्रिषुण्डंतुसमादितः ॥ २.॥ शीर्षकेचलराटे चकंठेचां सद्रयेभज ॥ ||
£ कूषैरेमणिषधेचडदयेनाभिपाश्वके ॥३॥ पष्ठचैवंप्रतिष्ठाययजेत्तचाशिदेवते ॥ शिवशक्तितथारद्रमीशंनारदमेवच॥४॥ वामादिन र
| वशक्तीश्चएताःषोडशदेवताः ॥ नासत्योदस्कश्ेवअस्विनोद्रौप्रकीतितोौ॥५॥ अथवामू्धिकेशेचकर्णयोर्वदनेतथा ॥ बाहृद्रयेचडद् त
# || येनाभ्यामृक्युगेतथा॥&॥ जानुद्रयेचपदयोःपृष्ठभागेचषोडश॥ शिवश्नन्द्रक्द्रको विष्नेशोषिष्णुरेववा॥७॥। श्रीश्चैव दयेशम्थु ||
स्तथानाभौप्रजापतिः ॥ नागश्चनागकन्याश्च उभयोक्रंभिकन्यकाः॥८॥ पादयोश्चसखुद्राशचतीर्थाःृष्ेविशालतः ॥ इत्येवषोडश ||
#|| स्थानमथोच्यते ॥ ९ ॥ गुद्यस्थानकलारश्चकणद्रयमनत्तमम्॥ अंसयुग्मं च इदयं नामिरित्येवमष्टकम् ॥१०॥ ब्रह्नाच्छषयः स
¢| सत्तदेवताशचप्रकीतिताः ॥ इत्येवत॒सयुदिष्ठं मस्मविद्धि्ुनीश्वराः ॥ ११ ॥ अथवामस्तकंबाह्ूददयनाभिरेव च ॥ पंचस्थाना ॥९
%| न्यमून्याहुधांरणेभस्मविननाः ॥१२॥ यथासंभवनंङक्यादेशकालायपेक्षया ॥ उदधूलनेप्यशक्तश्चतिपुण्डादी निकारयेत् ॥१३॥ ट
|| भरजापति नाग नागकन्या दोनों कषिकन्या ॥ < ॥ चरणोके सखद पृष्ठम तीथं यह सोरह स्थान है अव आ स्थान कहते है ॥ ९ ॥ गुह्य- ठ
|| स्थान लाद दोनों कान दोनों कंपे हदय ओर नाभिः यह आढ स्थान है ॥१०॥ बह्मा ओर सातकवि इनके देवता है हे स॒नीश्वरो ! भस्मके र
|| जाननेवाने यह विधान कहा है ॥ ११ ॥ अथवा मस्तकं हदय नाभि इन पंच स्थानोभै भस्म धारण करे देशा मुनिजन कहते है ॥१२॥ | |
८॥ देशकाटकी अपेक्षते यथासंभव कायं करे उदृधृकनमे अस्षम्थं हो तो वरिष्ण्डूमादिक धारणकरे ॥ १३ ॥ र
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(2 ् तीन नेत्र त्रिणाधार तरिदेष उत्पादक शिवको स्मरण करता हआ “नमः शिवाय'इस. मजे निषण्द् धारण करे ॥ १४ ॥ ''ईशा्यां नम्ः”'
||| || रेता कहकर दोनों पाशवम तरिषण्ड् ठगावे "'बीजा$या नमः "? यह मंत्र पठ भकोष्ठमं गावे ॥१५॥ “(कू्पराय नमः 7 इससे नीचे ““पितृश्यां £
९ नमः दोनों ओर “ईशाभ्यां नमः ? इससे ऊपर ८ भीमाय नमः कहकर पृष्ठम ओर शरक पथिम मागमे छगावे ॥ १६ ॥ इति
शीशे महाऽराणे ' वियेश्वरसंहिताभाषारीकायां भस्मधारणवणनोनाम चतुविंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ सूतजी बोढे हे महाभाग शौनकजी ! महा- #
बुद्धिमान शिवरूप रुद्राक्षका माहात्म्म सुनो मँ संकषषसे कहता हूं ॥ १ ॥ प्रमपावन शुद्राक्ष शिवका अत्यन्त प्यारा है दशेन स्पशेन ओर
भिनेतरत्रिशणाधारंतरिदेवजनकंशिवम्॥स्मरत्नमःशिवायेतिललाटेतुभिपुण्डकस्॥१०॥ ईशाभ्यांनमदइत्युक्त्वापाश्वयोतिपैण्ड्कम् 4
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ट बीजार््थानमहत्युकत्वाधारयेचपरकोष्टयोः॥१९॥ छयादघःपित्भ्यांचउमेशाभ्यांतथोप्रि॥ भीमायेतिततःपृष्ठशिरसःपञश्चिमेतथा।॥
, ॥ ११६ ॥ इति श्रीशेवेमहापुराणे विवेश्वरसंहितायां भस्मधारणवर्णनोनामचतुर्विशोऽध्यायः ॥२४॥ सूतउवाच ॥ शौनकं
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महाप्ाज्ञशिवरूपमहापते॥ शृणर्दाक्षमाहात्म्यं समासात्कथयाम्यहम् ॥१॥ शिवभ्रियतमोक्ञेयोश््राक्षःपरपावनः॥ दर्शनात्स्पशे ॥६
नानाप्यात्सर्वपापहरःस्मृतः॥२॥ पुराश्दाक्षमहिभदेग्यमरेकथितोघुने॥ लोकोपकरणार्थायशिवेनषरमात्मना ॥३॥ शिवडवाच॥ ४
शृणुदेविमदेशानिश्दाक्षमदहिमाशिवे॥ कथयामितवीत्याभक्तानां हितकाम्यया ॥४॥ दिव्यवर्षसदस्राणिमहेशानिषुनःपुरा॥ तपः
परकवतश्चस्तंमनःसंयम्यवेमम ॥ ९ ॥ स्वतं्रेणपरेशेनरोकोपशृतिकारिणा ॥ लीलयापरमेशानिचश्ुरन्भीरलितंमया ॥ ६ ॥ ६
जपे सब पाप हरनेवारा है ॥ २ ॥ हे छने ! पहर परमात्मा शिवने छोकके उपकारक निमित्त देवीके आगे रदाक्षकी महिमा कही थी ४
॥ ३ ॥ शिवजी बोढे हे देवि ! महेशानि रदाक्षकी महिमा हनो मतोके हितकी इच्छा कर तुम्हारी प्रीतिके कारण कहता ह ॥ ४ ॥ ||
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||| ह महेशानि ! परे दिव्य सहल बभतक तप करते दष ओर एकाग्र मन करते हए भेरा मन श्ुभित हुआ ॥ ५ ॥ स्वरत परमेश्वर छोकके
>२॥ उपकारके निमित्त हे प्रभेशानि ! भने रीलासे ही नेर मीच खयि ॥ ६ ॥
|
विष्णके भक्त ओर चारों वणोकि निमित्त देने ॥८॥ वे गौडदेशमे रुदरक्षके वृक्ष ५४
सद्यपवंत काशी तथा दूसरे देशों पाप समूहके नाश करनेको बलात्कारसे हए
हुए है पृथ्वीम रुदराक्षोके यह मेद ई शुमाक्च ( भद्राक्ष ) उनकी जातके हीह ॥ ११॥ मसे विदवानोंको इनके श्वेत र्त पीत छङष्ण |
पुटाभ्यांचारूचशुर्भ्यापतिताजरूबिदवः ॥ तजाश्चबिन्दवोजातावृक्षार्दाक्षसंज्ञकाः॥७॥ स्थावरत्वमनुपाप्यभक्तायहकारणात्॥ते
दत्ताविष्णुभक्तेभ्यश्चतुरवणैभ्यएवच॥८॥ भूमौगौडोद्रवा करद्रक्षान्छिववछभाव्॥ मथुरायामयोध्याययांठंकायांमल्येतथा॥९॥
सद्याद्रौचतथाकाश्यांदशेष्वन्येषुवातथा ॥ परानसह्यपापौघभेदनाञ्छ्तिनोदनान् ॥१०॥ ब्राह्मणाःक्ष्ियवेश्याशशुद्राजाताममा
जञया॥शुदराक्षास्तेष्रथि्व्यांततजातीयाःश्ुमाक्षकाः॥११॥ श्वेतरक्ताः षीतछृष्णावणक्ञियाःकमादबुधैः ॥ स्वजाती्य॑त्रभिधाथरदाक्ष
वणेतःकमात्॥१२॥ वर्णेस्तृतत्फटधायथुक्तिशुकितफणेष्स॒मिः॥ शिवभक्तैविंशेषेणशिवयोःपरीतयेसदा॥ १ ३॥ धाजीफख्परमाणं
यच्चेषठमेतदुदाहतम्॥ बदरीफलमाञरतुमध्यमसंपरकीत्तितम्॥ १९॥ अधमंचणसास्यात्यकरियेषापरोच्यते॥ श्णपावतिसुषीत्याभ
क्तानांदितकाम्यया ॥१५॥ बदरीफलमात्रचयत्स्यात्किरमहैश्वरि॥ तथापिफरदंरोकेषखसौभाग्यवदैन् ।।१६॥ धात्रीफरुसमं
यत्स्यात्सवांरि्टविनाशनम्॥। शंजयासदशंयत्स्यात्सवा्थफरसाधनम्।। १७॥
जानने उचित है व्णोके अलुस्ार भ्राणिर्योको अपनी जातके राक्ष धारण करने उचित है ॥ १२ ॥ भुक्ति खक्तिकी इच्छा करनेवारोको
इसका फल अवश्य धारण करना चाहिये विंशेष कर शिवकै भक्तोौको शिवा शिवकी धीतिकै निभित्त यह धारण करना चाहिये ॥ १३ ॥ जो
|| भमङेके फृरके समान है वह भ्रष्ठ है बदरीफलके समान मध्यम है ॥१४॥ चनेगाजका अधम है इनकी पक्रिया कहते ह हे पार्वति ! भन रगाकर
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२६.
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तव मेरे नेत्रषटसे जलके बिंदु भिरे उन आंुओति सुदराक्षके ब्ष उत्य्न हए ॥ ७ ॥ वे भक्तोके अलुयरह करनेको स्थावरपनेको प्राप्न होगये यह
यह शिवके श्रिय षथुरा अयोध्या कंका मलयाचठ ॥९॥
॥ १० ॥ बाह्मण क्षत्रिय वैश्य शूदर॒वर्णवाछे भेरी आज्ञासे
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९९॥ हनो मक्तोके हितकी कामनाते कहता हूं ॥ १५॥ हे महेश्वरि ! बेरे बराबर भी सुदक्ष हो तो भी रोके सुख सौ माग्यका बह नेवाखा ह |
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॥ १६ ॥ जो धात्री फलके समान है बह स्यर्णं अरिटका शान्त. करता है जो चौीके फलके समान है वह सम्पूणं अर्थका साधनेवाखा हं .
॥१७॥ जसा जेसा छोटा होता है वैता वैता अधिक फलका देनेवाला है एक दृसरेते एक एक दशांश फर अधिक देता है ॥१८॥ रुदाक्षका =
धारण पराप नाशने निमित्त है इस कारण इसे सम्पूणं अर्थक साधनेवाटोंको धारण करना चाहिये ॥१९॥ जसा टोकमे फठ देनेवाठा रद्रक्ष #
हे हे परमेश्वरि ! केषी ओर माठा नहीं है ॥२०॥ सम स्निग्ध इढ स्थूढ कंटकोते युक्त शुभ रुदश्च कामनाकै देनेवाठे है हे देवि ! यह सदा
भक्ति खकितके देनेवाला है ॥२१॥ मिसे खाये हुए छिन्न भिन्न कंटकोति हीन बणयुकत गोलाई हीन रेते छः दोषो युक्त रुदाक्षोको स्यागन त
यथायथाट्घुःस्यद्रेतथाधिकफलप्रदम्॥ एकेकतःफटमोक्तदशांशेरधिकंबुधेः॥।१८॥ शुदराक्षपारणयोक्तपापनाशनहैतंवे॥ तस्मा |
चधारणीयोवेसर्वार्थसाधनोधुवम्॥१९॥ यथाचदश्यतेोकेश्दाक्षःफलदः्चुभः॥ नतथाहश्यतेऽन्याचमाटिकापरयेश्वरि॥२०॥ |
समाःसिग्धाददाःस्थूलाःकंटकेःसंय॒ताःञ्चभाः ॥ रुद्राक्षाःकामदादेविथुक्तिञक्तिप्रदाःसदा ॥ २१ ॥ क्िमिदु्चित्नभिन्नकरकैदी ॥£
नमेवच ॥ ब्णयुक्तमधृत्तंचरुद्राक्षान्पद्विवजयेत् ॥२२॥ स्वयमेवकृतद्वारशुदराक्षस्थादिहोत्तमम् ॥ यचपौरूषयत्नेनकृतेतन्मध्यमे |£
भवेत् ॥२२॥ शुदराक्षधारणंप्राप्तमहापातकनाशनम् ॥ शुद्रसंख्याशतंधृत्वारुदरहूपोभवेघ्नरः ॥२७॥ एकादशशतानीषदधृत्वायत्फल |
माप्यते॥ तत्फलं क्यतेनेववकतुंवर्षशतैर पि॥२५॥ शताद्धैनयुतेःपंचशतेरवैभुङ्कटंमतम् ॥ रुदराक्िविरचेत्सम्यग्भक्तिमान्पुरुषोवरः ;
¢
|
॥२६॥ भिभिःशतेःषष्ियुक्तेश्िराघृच्यातथापुनः ॥ रदरक्षिरुपवीतं चनिर्मीयाद्रकितितत्परः ॥२७॥
् दे ॥ २२॥ जिम छ्य चि हो ही उत्तम रुद्राक्ष है पुरूष द्वारा छिद्र किया हभ मध्यम है ॥२३॥ सृ्राकषके धारणसे महापातक
र होते ह एकादश सो रुदाक्ष धारण करनेसे मनुष्य रुद्रह्प होजाता है ॥ २४ ॥ ग्यारहसरौ राक्ष धारण करनेेजो फ भाप होता है वह
सो वषमे भी नहीं कह सकते ॥ २५ ॥ जो ५५० सदिपाच सौ रु्राक्षोका भक्तिपूर्वकं सुकुट धारण करदा है, वह भक्रितवानु पुरुषश्रेष्ठ होता
है ॥ २६ ॥ जो तीनसौ साठ रुदाक्षोकी तीन र्डी करके यज्ञोवीपत धारण करता है ओर भक्ति करता है ॥ २७ ॥
विश्सं०१
अ० २५
शिखामे तीन कानोमि छः २ बाय ओर दक्षिण दोनो पहरे ॥ २८ ॥ कंठे एकम्लौ एक बहम ग्यारह कूर्परं ओर
| प्रकार ॥ २९. ॥ शिवभक्त नुष्यको यज्ञोपवीतमे तीन धारण करने चाहिये पांच किमे धारण करे ॥ ३० ॥ हे परमेश्वरि ! इस भकार
यह रुद्राक्ष जितने धारण किये उसका रूप शिवकै समान होताहै बह स्तुतिके योग्य होता है ॥३१॥इस भकार रूपकर ध्यानमे स्थित हए आसनप
स्थित शिवका उचारण करते हुए मलष्यको देखकर यह भाणी सव पापो ट जाता है ॥३२॥ यह ग्यारहसौकी विधि कहीहे इसके अभाव
शिखायां चजयप्रोक्तरुदराक्षाणां महेश्वरि ॥ कर्णयोः षट् च षट् चैववामदक्षिणयोस्तथ॥२८॥शतमेकोत्तरकेटेबाहोवेरुदसंख्यया॥
कूपैरद्रारयोस्तत्रमणिबेधेतथापुनः॥२९॥ उपवीतेजयधार्यशिवभकितरतेनरेः ॥ शेषादुर्वरितान्पंचसम्मितान्धारयेत्कटौ ॥३०॥
एतत्संख्य]धृतायेनरुद्राक्षाःपरमेश्वरि॥ तद्रूष॑तुप्रणम्यंहिस्तुत्यं स्म हेशवत्॥२३१॥ एवंभूतं स्थितध्यानेयदाकृत्वासनेजंनम्॥ शिवे
तिन्यादरशेवदष्टापापेःप्रषुच्यते ॥३२॥ शतादिकसदसरस्यविधिरेषप्रकीत्तितः ॥ तदभवेप्रकारोन्यःशुभःसंग्रोच्यतेमया ॥३३॥
शिखायामेकरुदराक्षंशिरसात्िशतंवहेत् ॥ पचाशचगलेदध्याद्वाहोःषोडशषोडश ॥३४॥ मणिबधेद्रादशद्विस्कंषेपंचशतंवहेत् ॥
अष्ठोत्तरशतेमाल्यसुपवीतंप्रकस्पयेत् ॥ ३५ ॥ एवंसदसरुदाक्षान्धारयेदयोदटव्रतः ॥ तनमंतिस्राःसवैयथारुदस्तथेवसः ॥३६॥
एकंशिखार्यांशुद्राक्षचत्वारिशत्तमस्तके ॥ द्वाविशत्कण्ठदेशेतुवक्षस्यष्टोत्तरंशतम्॥ २७॥ एकेकंकर्णयोःषटूषड्बाहोःषोडशषोडश॥
करयोरविमनिनद्वि॒णनसनीश्वर ॥२८॥ संख्याप्रीतिर्धृतायेनसोपिशेवजनःपर ॥ शिववत्पूजनीयोदिवंयस्सकवैरभीक्ष्णशः॥३९॥
दस्रा भकार है वह मे तुमसे कहता हूं ॥ ३३ ॥ शिखामे एक रुदाक्ष शिरन तीक धारण करे प्रचास गेम ओर भुजाओंमे सोह २ धारण
करे ॥३४॥ मणिबृधरमे बारह स्कंधमे पांच सौ एकमसौ आढका यज्ञोपवीत कल्पित करे ॥३५॥ इसभकार जो इत हो सह रुदराक्षोको धारण
करता है उसे सव देवता नमस्कार करते है वह रुदरके समान है ॥ ३६ ॥ शिलाम एक रुदाक्ष, यस्तकमे चारी कंटये ब्तीस हदयमे एकौ
आढ ॥ ३७ ॥ एक एक कार्नोमं छः छः भुजाओमि सोरुह सोखह हाथमे बारह बारह अथवा २४ चौविस् ॥ ३८ ॥ इतने जिसने परीतिर
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2223
धारण किये वह भी शिवका भक्त है वह भी निरन्तर सबसे पूजनीय ओर वंदनीय है ॥३९॥ दंशान मंत्रे शिर॑, तत्रुष मेत्रसे कनो, अघोर
¢ मत्से गठे ओर हदयमें धारण करने चाहिये ॥४०॥ अघोर ओौर बीजमेत्रसे हा्थोमं धारण करे पन्द्रह रुद्राक्ष वामदेव मं्से उदरमं धारण करे ४
॥४१॥ स्यो जातादि पंचनहममंजोसे दूसरे अगो तीन भाढा पांच वा सात धरे अथवा मरूलमंत्रसे सम्पूण रुदराक्षोको धारण करे ।॥ ४२॥ मय |||
4 माति ठशुन पाड (प्याज) शिघ्र॒ (सेजना) शे ष्मान्तक (बहुयारवृक्ष) विदवराह ( ल्हसन ) इनको न खाय ॥ ४२ ॥ श्वेत रुद्राक्ष ब्राहर्णोको च
| शिरसीशानमंतरेणकणेततपुर्षेणच ॥ अधोरेणगरेधारयतेनेवहदयेपि च ॥४०॥ अघोरबीजमेतरेण करयोधौरयेत्सुधीः॥ पंचदशा
(^ ्षमथिताामदवेनचोदरे ॥8१॥ पंचनल्नभिरंग्तिमालांप॑चसप्त च ॥ अथवामलमजेणसर्वानक्षास्तुधारयेत् ॥४२॥ मधर्मासि
् तलदयनपलाण्डुरिष्मेवच॥ श्लेष्मातकंविद्वराहंभक्षणेवजयेत्ततः॥०२॥ वलक्षदराक्षद्विनतलभिरेवेदविदितंसरकतंक्षत्राणांरधुदि
| तञ्मेपीतमसकृत् ॥ ततोवेश्यधांयम्रतिदिवसमावश्यकमदहोतथाङ़ृष्णंञुदैःखतिगदितमागोयमगजे ॥७९॥ वर्णीवनीग्रहयतीनिय
( मेनदभ्यादेतद्रहस्यपरमोनदिजातुतिष्ठत् ॥ रदाक्षधारणमिदैषुकृतेशरभ्यत्यक्तेदमेतदसिल त्नरकान्धयांति ॥४८५॥ आदावामल
( कात्स्वतोलघतरारूग्णास्ततःकंटकैःसंदष्टाक्रिमिभिस्ततूषकरणच्छिदरेणदीनास्तथा ॥ धार्यानेव्ुभेष्सुभिश्चणकवद्ुद्राक्षमप्यंत
¢
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शि ७ पु०।
॥७\७॥ |
(| मलिगर्मगलघुमेसृष्ष्मप्रशस्तंसदा ॥७६॥ सर्वाश्रमार्णावणानांन्ञीश्ुद्रणां शिवाज्ञया ॥ धा्याःसदैवह्राक्षायतीनां
प्रणवेनहि ॥ 9७ ॥ |
हितकारी है, भत्रियोको छाठ, ैश्योको पीठे, ओर शद्रोको रृष्वर्णके धारण करने चहिये यह वेद मार्गकी विपि है ॥४४॥ तव वर्णोङ्ो भर
यतिोको भी धारण करने चाहिये यह परभरहत्य है यह रुदश्च बडे पण्यते धा होता है इसके त्यागन करनेते नरककी भाषि होती है ॥४१॥ आगते
छदे अत्यन्त ख्व भभ्रया ओर किसीधकारसे हीन हए कंटकहीन रभिके खाये हए छिदहीन एते रदराकषोको मगलकी इच्छावाटा न धारणकरे ओर
चनेके समान् सक्ष्मकी भशसाकी गई है \ शिवजी कहते है यह हमारा चिह्न स्वरूप सदा धारण करना चाहिये ॥४६॥ सम्पूणं आश्रम ओर वणो ॥2/
विन्त॑०१
अ० २५
| | शोको शिव्रकी आज्ञासे सदा रुद्राक्ष धारण करने चाहिये ओर यतिर्योको ॐकार पू्ंक धारण करने चाहिये ॥ ४७ ॥ दिनमे |
करनेते रात्रिक, रात्रिमं॑धारण करनेसे दिनके इसीभकार प्रभात बध्याह ओर रष्याकाङकै सब प्तक दूर हो जाते है ॥ ४८ ॥ जो
जो निषद् धारण कृरेवाठे है अथवा जो जटा धारण करनेवाले ई सतक्षके पारण करनेवाे जो ह वे यमलोकको नही जाते ॥ ४९ ॥ ||}
एकुदाक्ष शिरे ओर माथेपर तिषण्डू पारण करता है ओर जो पाक्षर मं्का जप करते है वे महातमा पूज्य है ॥ ५० ॥ जिसके अगम ||}
द्रक्ष, माथेपर त्रिषण्ड् तिलक, खलम पञ्चाक्षरं नहीं है उनको भरे यमटोकको ठावो ॥ ५१ ॥ भस्मरुदराक्ष धारण करनेवारोंके उन ¢
दिवाबिभदािकृतैरायोबिभदिवाकृतैः ॥ प्रातभेष्याह्सायाद्वेखच्यतेसर्वपातकेः॥४८॥ येिपुण्डधरालोकेजयाधारिणएवये ॥ येर्
द्राक्षघरास्तेवेयमरोकंपरयांतिन्॥४९। सदरक्षमेकंशिरसाबिमर्तितथा्िपुण्ट्ूचललारमध्ये॥ प॑चाक्षरंयेदिजपंतिभएज्याभवद्धिः
खछतैदिसाधवः॥५०॥ यस्याद्गेनास्तिश्दराक्षक्िपुण्ड्भालपटके॥ सुखेष॑चाक्षरनास्तितमानययमारुयम्॥९५१। ज्ञात्वाज्ञात्वातत्प
भावंभस्मशद्राक्षधारिणः ॥ तेपूज्याःसवैदास्माकंनोनेतव्याः कदाचन ॥५२॥ एवमाज्ञापयामासकालोपिनिजकिङ्करान् ॥ तथे
तिमच्वातिसवतुष्णीमासन्सुरविस्मिताः ॥५३॥ अतणएवमहादेविश्दाक्षोत्यघनाशनः ॥ तद्धरोमत्पियः शुदधोऽत्यघवानपिषारवति
॥५९॥ दस्तेबाहौतथामष्नरुदाकषषारयचयः॥ अवध्य.सरवभरतार्ासदरूपीचरेडपि॥५९॥ सराघषराणास्ैषापिदनीय'सदासवै ॥
पूजनीयोदि दृष्टस्यपापहाचयथाशिवः॥५६।ध्यानज्ञानावश्क्तोपि्दाक्षधारये्तयः॥सर्वपापविनिशक्तःसयाति परमां गतिस्॥।५७॥
उन भरमाबको जानकर पूजनीय जानो उन्हं हमारे छोकको मत॒ ऊाभो ॥ ५२ ॥ वह ययराजने अपने किंकरोते कहा है यह सुन प
विस्मयको भ्राप्हो मौन हए ॥ ५३ ॥ हे महादेवि ! इसभकार रशदराक्ष पहापाप नाश करनेवारा है हे पार्वति | उनका धारण ०
अधिक पापी मी हो तथापि ॥ ५४ ॥ हाथ बाहु शिर जो राक्ष षारण कता है दह सव भाणियोसे अवध्य रुप हो पृथ्वीम विचरण
करता है ॥५५॥ बह सुर असुर सदा सबका वन्दनीय है वह वैसतेही पूजनीय है शिवकरे शमान पाको दूर करनेवाा है ॥५६॥ ध्यानज्ञाने
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अवघ॒क्तं हुआ भी जोरुद्राक्च धारण करता है वह सब पापोते दूटकर प्रमगतिको प्राप्त होता हे ६. । साक्षते संतर जपनेरे
करोडशथणा पण्य होता है उस्तके धारण करनेसे दशकरोड यणा एण्य मदष्य पाता है| ५८॥जवतक जीता है तव तक स्वस्थशरीर हैहे देवि! उसको
कभी अकार मृत्यु नहीं होती ॥ ५९ ॥ तिषण्डूके सहित जितै गमे ररक्ष शोभित होताहै ओौर जो मू्युनयका जप करता हं उस
द्शीनतते सूददशनका फर है ॥ ६० ॥ हे भिये पांच देवताओंकी उपासना करनेवाला स देवताओंका प्रिय रुद्रक्षमाछमे सव देवताओंका
जप करे ॥ ६१ ॥ इत्तको विष्ण आदि देवताओंके मक्तभी धारणकरे इसमे सदेह नहीं रुदरक्षके भक्त तो विशेकर सद्ाक्षको धारण करे) & २
` श्रक्षेणजपन्मन्वे पुण्यकोटिं मवेत् ॥ दशकोटिगणंपुण्य॑धारणाह्भते नरः ॥५८॥ यावत्कारुदिजीवस्यशरीरस्थोभवेत्सवे ॥
तावतकास्वल्पमृत्यु्तंदेविविवाधते।।९९॥ वरिपदधेणचसयकतंरुदक्षाविलर्सागकम् ॥ मृत्यजय जपंतं चटषटाुद्रफटलभेत्।।& ०॥
पंचदेवभियश्चैवसवदेवप्रियस्तथा ॥ सर्वमन्धाज्जपेद्धक्तोरुदाक्षमालयाभ्रिय॥६१॥ विष्ण्वादिदेवभक्ताश्चासयेयुनसंशय ॥ रुर
भक्तो विशेषेणरुद्ाक्षान्धाश्येत्सदा॥६२॥रुदाक्षाषिषिधा प्रोक्तास्तेषां भेदान्वदाम्यहम् ॥ शुणुपावेतिसद्धक्त्याथुकतिश्ुक्तिफलग्
दान्॥६२॥ एकवक्रः शिवः साक्षाद्क्तिषुकितिफलग्रदः॥ तस्यदशनमत्रेणव्रह्महत्याग्यपोहति॥&४॥ य्संपूजितस्तचलक्ष्मीदरतरा
नहि ॥ नश्यल्यपदरवाःससवैकामा भवतिहि ॥६५॥ द्विवक्रोदेवदेवेशस्सरवैकामफलभरद्ः ॥ विशेषतःसङदरक्षोगोवधनाशयेदट्रुतम्
॥ ६६ ॥ चिवक्रोयोदिरुदाक्षः साक्षात्साधनदस्सदा ॥ तत्पमावाद्धेषवैविधाः सवौःप्रतिष्टिताः॥ &७ ॥
राक्ष बहत भकारे होते है पे उनके भेद कहता दं हे पाति 1 सदध्कितते उन भुक्रित क्त देनवार्छोका चरित्र सुनो ॥ ६३ ॥
साक्षात भुक्रित क्रितका देनेवाा शिप है उसके दशनमाजते ब्रहहत्या न्ट होती है ॥ ६४ ॥ जहां बह पूजित होता है वहां सै
र | सक््मी दर नही है सब उपहर शांत होकर सब कामना शिच होती है ॥ ६५ ॥ दो यलवाठा देवदेवेश स काम ओर कटका
देनेवाखा दै विशेष यह रुद्राक्ष गोध हत्याको दूर कर्ता है ॥ ६६ ॥ तीन खख रुद्राक्ष सदा साधन देनेवाला है उ्कै का
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| विया प्रतिष्ठित होतीरै।।६७॥ चार्ली बहला है नरहत्या दूर करनेवाठा है वह दशन स्यशंनसे चारोगेका देनेवाखा ३।६८॥पांचखखी स्वयं ||
द्रप है उसीका नाम काठाधि है सब मुक्ति ओर सब कामनाका देनेवाला है।६९॥ अगम्या गमन करने अभक्ष्य भक्षणकनते जो पापै इत्यादि ||
|| ओर मी पाप प॑चती रा र करता ६।७०॥छ'घती कातिंकेयस्वरप है उसको दक्षि भजाम धारण करे तो वह वहहत्यादिकै पापोति चट जाता ||
8 है इसमे संदेह नही।।७१। हे महेशानि ! सातमुलका अनंग होता है उसके धारण करनेसे दखदिभी ईश्वर होजाता है।७२॥अादखखका ररा वसुमति ट
%|| चतु्वकःस्वरयब्र्मानरहत्याभ्यपोहति ॥ रशना्स्पशंनात्सद्श्चतु्वंगफरम्रदः॥६८॥ पचवक्रःस्वथरदःकालाग्निनामतःप्रथुः ॥ ट
«|| सवेमुवितिप्रदश्चवसव॑कामफलप्रदः ॥६९॥ अगम्यागमनेपापमभक्ष्यस्यचभक्षणम्॥ इत्यादिसर्वपापानि प॑चवक्रोव्यपोडति॥७०॥ $
६|| डलङ्कातिकेयस्तथारणाइतिणेयने ॥ ब्रत्यादिकेपानयतनासंशय्ः॥७१॥ सपतवक्ोमहेशानिदयनगोनामनामतः ॥ ||
ह| घारणातस्यदेवेशिदरिद्ोपीश्वरोभवेत् ॥ ७२॥ श्राशषाटवक्रवसमूतिंश्चभेरवः ॥ धारणाततस्यपूरणायुतोभवतिशचकुधत् |
| ॥७३॥ ओैरवोनववक्रश्चकपिलश्चघ॒निःस्मृतः ॥ दुगावातद्धिष्ठाजीनवरूपामदेश्वरी ॥७४॥ तंधायेद्ामहस्ते्राक्षभक्तितत्पर॥ ||
{ सश्वरोभवेन्नूनंममतल्योनसंशयः ॥ ७९ ॥ दशवक्रोमरशानिस्वयंदेवोजनादैनः ॥ धारणात्तस्यदेषेशिसर्वान्कामानवाप्वयात् |©
॥ ७६ ॥ एकादशमुखोयस्तुरु्राक्षःपरमेश्वरि ॥ सश्दरोधारणात्तस्यसर्वजविजयीभवेत् ॥ ७७ ॥ द्वदृशास्यंतुरद्ाक्षधारयेत्केश ४
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दशके ॥ आदित्याश्चवतेसवद्रादशेवस्थितास्तथा ॥ ७८ ॥
भरव हे उसके धारणे पूणीयु होती है ओर शरीरके अन्तम शिवरूप होता हे ॥७३॥ नौखलका भरव ओौर कपिख्खनि है, या उसकी अधिष्ठात्री
देवता दुगौ महेश्वरी है॥७४॥उस सुब्राक्षको भक्षिते तत्परहो बायेहाथमं धारण करै, बह सवेश्वर तथा भेरी तुल्य होजाता ह इसमे संदेह नही ॥७५॥
हे महेशानि ! दशखखी रद्रा स्वयं नादेन देव है, हे देवेशि ! उसके धारण करनेसे सब कामनाफो भाप होता हे ॥ ७६ ॥ ग्यारहञचखी रुदाक्षके
धारण करनेसे सद्र हो सर्वत्र विजयी होती हे॥७७॥ जो बारह युसका स्ाकष कैशदेशये धारण करता है, वह बारह आदित्यके समान है ॥७८॥
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तेरह लका रुद्राक्ष धारण करनेसे किनदेदेवकी तुल्य होता रै, वह सब कामनाको भाष ही सोभाग्य ओर मगरको भाप कृएता हे॥ ७९॥ चौदहशखी
| राक्ष परमशिरप उपतको भक्तिते शिरपर धारण करनेते सव्र पाप नट होजति दै॥८०॥युलभेदसे इतन (४ भेद् वणन किह हं पवेतराजत्नि
अव क्रमते भर तिपूवक उनके मं्ोंको शुनो ॥८१॥ "“ओंहीनमः । १। ओंनमः ।२। ्कीनमः ।३। ओंहींनमः ।४ ॥ ओंहींनमः ।*५] ओहीह नमः ।&।
¢ ओंहनमः॥७। ओं हंनमः<। ओंहींहंनमः।९। ओंहींनमः।१ ०। ओंदींह नम्ः। ११। ओंकौक्षौसैनमः ।१२। ओंनमो नमः ।१३ ६ ओंनमः 1१४।''
भक्ति ओर भदधाके सहित सम्पूणं काम अर्की सिद्धिके निमित्त इन मरति सद्ाक्षोको धारण करे आरुस्य नके चौदहमखी रुद्ाक्षोतकके चौदह मेज
| अयोदशश्चखोविशवेदेवस्तदारणात्ररः ॥ सवौन्कामानवाप्रोतिसौभाग्यमगललमेत्॥७९॥ चतुर्दशश्खोयोदिष्दाक्षःपरम्ःशिवः॥
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पारेनधूष्नतमत्तथापरवपापं प्रणश्यति ॥ ८० ॥ इतिरुद्ाक्षमेदादिथोक्तावेखखमेदतः ॥ तततन्मजज्छरणभीरयाक्रमच्छेलेश्वरा
त्मजे ॥ ८१॥ ॐ हीनमः १ ॐनमःरॐङ्कीनमः ३ अटरीनमः © अट्रीनमः4 उवी हं नमः ६ उष्टुनमः = ॐनमः
८ उश्टीहिनमः ९ अशटीनमः नमः9° द्रीं नमः ११४ क्षौ रौ वित २ उशीनमः व १३ उनम १७भक्तिश्रदधायुतश्चव्
सर्वकामार्थसिद्धये ॥ शक्षान्धारयेन्भेभेदेवनाखस्य वजिंतः ॥८२ ॥ नामे्ेणयोधत्तसद्रक्ष्ुविमानवः ॥ सयातिनरकं चोरं
यावदिन्द्राअतुरदैश॥८२॥ स्ाक्षमालिनंदृष्टाभूतमरेतपिशाचकाः ॥ डाकिनीशाकिनी चैवयेचान्येदरोहकारकाः। ८8 ॥ कृषिमेचेव
यत्किचिदभिचारादिकंचयत्॥ तत्सर्वद्रतोयातिदृष्ट शंकितविभदम् ॥ ८९ दरक्षमालिनंडष्टारिवो विष्णः प्रसीदति ॥ देवीगण
पतिस्ुर्यःसुराश्ान्येपिपार्वति॥८६॥ एवज्ञात्वातुमाहात्स्यरवाक्षस्यमहेश्वरि॥सम्यग्धार्यास्समंजाथभत्तयाधर्मविवृद्धये ॥८७॥
+ ह पहले मंवरसे एकशसी दृते दोखली इसी क्मसे धारण कर॥८२॥ पृथ्वीम जो मलुष्य विना पंवके शदाक्षको धारण करता है वह चौदह हदकी |
|| अथौत एक कल्पतक घोर नरकमं पडता है॥८ ३।रुा्षकी भालादाठेको देखकर भूत प्रत पिशाच डाकिनी शाकिनी अथवा जो दूसरे द्रोह करनेवाठे
ट| जीव है ॥ ८४ ॥ ओर जो कुछ छतरिम अभिचारादिक है षह दूरसेही रुदाक्षपारीको देख पठायन करते हँ ॥ ८५ ॥ रदाक्ष मालाषारीको
% || देखकर शिब आर विष्ण प्रसन्न होते ६ दे पाती ! देवी गणपति ख्य तथा ओर दूसरे देवता प्रसन्न होते ह ॥८६॥ हे महेश्वरि ! इस भकार
न 4९ 3९434
॥- ८ 46 >> 4
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| माहात्म्य जानकर यंत्र ओर भक्तिते धर्मवृदधिके निभि सम्यक् भकारसे शुदाक्ष धारण करने चाहिये॥८७॥ इस भकार पार्वतीकै आगे परमात्मा
शिवने वणन किंया था भस्म रुद्राक्षका माहात्म्य भुकित खकितके फलका देनेवाखा है॥८८॥ मस्म ओर रदराक्षके धारण करनेवारे शिवके अतिग्रिय
जानने, उसके धारणकै भ्रभावसे भुत सुकित होती है इसमे संदेह नही॥ ८९॥ हे गौरि ! भस्म रु्राक्चका धारण करनेवाला शिवभक्त कहाताहै जो पञ्चाक्षर
जपम आसुक्रितहै बह परिपुणं है॥ ९ ०॥ बिना भस्म ओर त्रिषण्ड्के बिना शदराक्षमाठाके पूजित हुए महादेव अभीष्ट फक नहीं देते ॥९१॥ हे मुनिश्वरो !
जो तुमने यछा वह सब तुमसे वणेन किया भस्म रुद्राक्षका माहात्म्य सब कामना ओर समृद्धिका देनेवाटा रै ॥९२॥ जो इस परम शुभ माहात्म्यको
इत्युक्तंगिरिजागरेदिशिवेनपरमात्मना, ॥ भस्म्ाक्षमादात्म्यंभुक्तिञुक्तिफलप्रदम् ॥ ८८ ॥ शिवस्यातिपरियौज्ञेयौभस्मस्द्रा
क्षधारिणो॥ तद्धारणप्रभावद्धिभुषितश्चैक्ति्मसंशयः ॥ ८९ ॥ भस्परुद्राक्षवारीयःशिवभक्तस्सउच्यते॥ पचाक्षरजपासक्तःषार
पूणश्चसन्ुखे ॥ ९० ॥ विनाभस्मनिपडेणविनाश्दराक्षमाख्या ॥ पूजितोपिमहादेवोनाभीषफरदायकः ॥ ९१ ॥ तत्सर्वच
समाख्यातंयतपृष्दिषुनीश्वर॥ भस्मरुदाक्षमाहात्म्यं सवंकामसमृद्धिदम् ॥९२॥एतद्ःश्णुयात्नित्यंमाहार्म्यपरमंञुभम्॥ स्दाक्षभ
स्मनोभक्त्यासवांन्कामानवाप्वुयात्॥९३॥इदसव॑सुसथुक्तापुत्पौवादिसंयुतः॥'रभेत्परतरसन्पोक्षशिपस्यातिषियोभवेत्॥९४॥
वियेश्वरसहितेयकथितावोषुनीशराः ॥ सर्वसिद्धिपदानित्य॒क्तिदाशिवशासनात्॥९५॥ इति श्रीशिवमहापुरणेपरथमा्यांविये
श्वरसहितायांसाध्यसाधनखण्डेश््राक्षमाहात्म्यवणेनोनामपञ्च्विंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ ॥ विद्येश्वरसंहिता समाप्ता ॥
नित्यप्रति भवणकरते है रुद्राक्ष ओर भस्ममे भक्ति करते है वह सव कामनाओंको भ्रात होते है॥९२॥यहां सव सुखभाग पत्र पौनादिसे संयुक्त हो किर
सुक्तिम शिवकै सापुज्यको भप्त होता है ॥९४॥ हे खनिश्वरो यह तुमसे वियेश्वरसंहिता कही हे शिवकी आज्ञासे यह सब सिद ओर सुक्तिदेनेवाी
हे।९५। इति श्रीशि.बिये. म. सा.सा.खण्डे प ज्वाठापसादभिश्रकतमा. रुदाक्षमाहात्म्यवणनोनाय पंचविंशोऽध्यायः २५॥ इति भरी वि.सं. समापा॥
श्लोकः भूमिवाणांकचनद्रेदे मांगल्ये भृणवाशरे ॥ मादरशह्ठचुर्दशवां टीका पूतत्ुपागमत् ॥ १ ॥
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अथ श्ीशिवमहापरणे मा.टी. घु. दि.द्रसंदिता (प॑चखंडात्मिका) र¢
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श्िवमहापुराणः चख्दरसंहिता २.
दोहा-शकर शुणनिधि ज्ञाननिधिः मंगर नित दातार । तिनके पग वेदन कष, दीका छश्च विचार ॥ १ ॥
¢ | संसारकी उत्पत्ति, पाटन ओर टयके एक हेतु है सब तत्वोके जाननेवारे गौरीपति अनन्तकीर्तिमान्, मायाके आभित ओर मायाक्न |
¢ ह उन अचिन्त्यहटप बोधखह्प नि्भेढ शकरको नमस्कार करता हूं ॥ १ ॥ प्रङूतिसे परे अनादि भरशान्त एक ही पुरुषोत्तम, अपनी माया #
|| इष॒ सव जगत्को निमौण करक अन्तर बाहरमे स्थित हुए शंकरको नित्य प्रणाम करता हूं ॥ २ ॥ सवके अन्तरमे स्थित अपने गृहमे ठ
विराजमान जो विना किसीकी सहायताके इस जगत्को निर्माण करके चेष्टा कर रं है, ओर जिनकी निकरता्े सारा संसार इस भरकारसे
£| ओगणेशायः नमः ॥ ॥ श्रीगौरीशंकराभ्यां नमः ॥ ॥ अथ द्वितीया शद्रसंहिता_भारभ्यते ॥ ॥ विश्वोद्धवस्थितिख्यादिषठ ¢
£ देतुमेकं गौरीपतिविदिततक््वमनन्तकीर्तिम् ॥ मायाश्रयम्विगतमायमचित्यरूपम्बोधस्वरूपममलं हि शिवत्नमामि ॥ ३ ॥ ¢
। वन्देशिवन्तम्भङृतेरनादिम्पशान्तमेकम्पुरुषोत्तमे रि ॥ स्वमायया कृत्सषमिद हि सृष्टा नभोवदन्तरबैदिरास्थितो यः ॥२॥
वन्देतरस्थनिजगूटशूपं शिव॑स्वतस्सष्ट्मिदम्बिचष्े ॥ जगन्ति नित्यम्परितोभमेति यतसत्निधौ चम्बकलोहवत्तम् ॥ ३ ॥ व्यास
4 उवाच ॥ जगतः पितरंशम्धुजगतो मातरं शिवाम् ॥ तत्पुत्र गणाधीशत्नतवैतदर्णयामहे ॥ ४ ॥ एकदा घनयस्सवे नैमि |©
षारण्यवासिनः ॥ पम्रच्छर्वरया भक्त्या सूतन्ते . शौनकादयः ॥ ५॥ ऋषयजचुः ॥ वि्येश्वरसंहितायाः अता सा सत्कथां ॥©
¢ रभा ॥ साध्यसाधनखंडाख्यारम्याद्या भक्तवत्सला ॥ & ॥ ट
भ्रमण करता हे जेस चुम्बक्की सन्निधिसे छोहा चेटा करता है रेते शकरको णाम करता हूं ॥ ३ ॥ ठ्यासजी गोरे जगत्क पिता शिवजी, |©
|| नगव्की माता पर्वतीजी ओर उनके एत्र गणेशजीको यै पणा करके हम “' ररहिता '' वन करते है ॥ ४ ॥ एक समय नेमिषारण्यके. ||
4 एहनेवाठे सव छनीश्र शोनकादि परम भक्तिसे सूजीते पूखने ठे ॥ ५॥ छनीश्वर बोठे वियेश्वर संहिताकी तो सुन्दर कथा हमने हनी |
त
जो साध्यत्ताधन खण्ड नामवाटे अति मनोहर भक्तोको अत्यन्त भिय है ॥ ६ ॥
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ध | ह सूतजी ! महाभाग ठम बहुत कालतक जियो ओर सुखी रहो, जो आप् हमको श्रीशिवजीकी सन्दर कथा सनाते हौ ॥ ७ ॥ तुम्हरे ||
8 ¢ || ससते निकले हुए ज्ञानरूपी नवो पक्त हए हम नहह इस्त हे तात ! मे फिर कते ॥ = ॥ दम व्यारजीके मादर ||
/ ~ । || || स्वजन ओर छतरत्य हो इसते मको भूत भविष्य वर्तमानम कुछ मी अविदित नहीं है ॥ ९ ॥ व्यासजीकी सुद्क्िसे उनकी परम कपाकौ || ४
भाप करके सबको आपने भटी भकार जान छिया है, ओर सव मयुष्योको छेताथं किया है ॥ १० ॥ हे परात्न ! अब इस समय शिविजीका #
| रेष्ठ रूप कहिये, ओर पार्वती तथा शिवजीके दिव्य चरित्र हमको सुनादइये ॥ ११ ॥ छोकमे निरयण महेश्वर सयण कैसे हो जाते दै. हम् ¢
ह|| सूत सूत महाभाग चिरजीव सुखीभव ॥ यच्छावयसि नस्तात शांकरीं परमां कथाम् ॥ ७ ॥ पिबन्तस्त्वन्युखाम्भोजच्युते ||
|| ज्ञानामरतम्बयम् ॥ अवितप्ताः पुनः फिचित्परष्टुमिच्छामहेऽनघ ॥ ८ ॥ व्यासप्रसादात्सर्वज्ञो भरप्तोऽसिृतङ्ृत्यताम् ॥ नाज्ञा ||
|| तम्विद्यते किचिद्धतमव्यं भवच्च यत्॥ ९ ॥ गुरोर््यासस्यसद्धक्त्या समासाय कृषां पराम् ॥ सवज्ञाते विशेषेण सवं साथ कृतं | |
¢ जनुः ॥१०॥ इदानीं कथय प्राज्ञ शिषह्पमठत्तमम् ॥ दिभ्यानि वे चरिवाणि शिवृयोरप्य॒शेषतः॥ ११ ॥ अगुणोशणरतांयाति |£
ठ करथङोकेमहेश्वरः ॥ शिवतत्त वर्य॑सवे न जानीमो विचारतः ॥ १२ ॥ सृष्टः पू कथं शंभुस्स्वहूपेणावतिष्ठते ॥ सृष्टिमध्येस |
¢ हि कथं कीडन्सवृततते प्रथुः ॥ १३ ॥ तदन्ते च कथन्देवस्स् तिष्ठति महेश्वरः ५ कथम्परसन्नतां याति शंकरो लोकशंकरः ¢
॥ १४ ॥ सप्रसत्नोमहेशानः किं प्रयच्छति सत्फलम् ॥ स्वभक्तेभ्यः परेभ्य तत्सर्वं कथयस्व नः ॥ १५ ॥ सद्यः प्रसन्नो भग
ट| वान्भवतीत्यबुहयश्चम ॥ भक्तपयासं स महान्न पश्यति दयापरः॥ १६ ॥
ट| विचारकर भी शिका तत्व नही जान सकते ॥ १२ ॥ सृष्टे पहठे शिवजी अपने स्वहपमे किस भकार स्थित रहते हैँ ओर वह प्रभु
सृष्टके मध्यमे किञ्च भकार कीडा करते ह ॥ १३ ॥ ओर बह देव दृष्टिकै अन्तर्मे जिस प्रकार स्थित होते है, टोकोके कल्याण करनेवाठे
शंकर किम् प्रकार भरसन्न होते ह ॥ १४ ॥ ओर भ्रसन्न होकर वह शकर क्या फर देते है अपने भक्तों भर दततयोको क्या फठ देते ||2
हसो हमसे कटो ॥ १५ ॥ हमने सुना है वह भगवान शीघ्र ही भसन्न हो जाते है, ओर भक्तिका महाभयास द्याके कारण नहीं देखते
प
॥ १६ ॥ बरह्मा, विष्णु महेश यह तीनों देवता शवक अगे भरकर हैँ महेश उनमें पुणाश स्वयं शिषही है॥ १७॥ उनका आविभाव ओर | ह
४ विशेषरूपसे हमसे कहो उमाका आविभीव ओर विवाह हममे कहो ॥ १८ ॥ विशेषकरके शिवजीका गृहस्थ पना ओर ीलाभी हमसे कहियेहे पाप ९
ठै रहित ! यह तथा ओर भी दूरे चरित्र कहिये ॥१९॥ उयास्षजी बोढे जब इस भरकारसे पुछा तब सतजी बडे प्रसन्न हए, ओर शिवजीके चरण ||
¢ कपर्छोका स्मरणकर अनीश्वरोमे बोरे ॥ २० ॥ सूतजी बोठे आपने बहुत अच्छी बात पृषछी हे खनीश्वरो ! तुम धन्य हो जो सदाशिवकी कथाम ठ
¢ बर्मा विष्णुमेहेशश्च्रयो देवाश्शिवांगजाः ॥ महेशस्तञर पूर्णाशरंस्वयमेवशिवोऽपरः ॥१७॥ तस्याविभावमाख्यादि चरितानि 1
%|| विशेषतः ॥ उमाविर्भावमाख्यादि तद्विवादं तथा प्रभो ॥१८॥तद्रास्थ्यं विशेषेणतथालीलाः परा अपि ॥ एतत्सर्व तदन्यच्च |$
४ कथनीयं त्वयाऽनघ ॥१९॥ व्यासउवाच॥ इति पृष्टस्तदा तैस्त सुतो दषसमन्वितः॥ स्मृत्वा शंभुपदां भोजम्प्त्युवाच खनीश्च |<
राच् ॥२०॥ सूत उवाच ॥ सम्यक् पृषं भवद्विश्च धन्या यूयं ्ुनीश्वराः॥ सदाशिवकथायांवो यनता नैष्ठिकी सतिः ॥२१॥ ट
ट| सदाशिवकथागरश्च पुरषांीन्पुनाति हि ॥ वक्तारं पृच्छकं श्रोतृखाहवीसलिठं यथा ॥ २२॥ शंभोयणाडवादात्को विरज्येत ट
द| मान्द्िनाः॥ विना पणन निविधजनानन्दकरात्सदा ॥२३॥ गीयमानो वितरणे वरोगौषधोऽपिडि ॥ मनः्रो्ाभिराम |
|| यत्तस्सवीर्थदस्स वै ॥२९॥ कथयामि यथाबुद्धि भवत्पश्नानुसारतः ॥ शिवलीलां प्रयत्नेन द्विजास्तां ण॒तादरात् ॥ २९५ ॥ र
ह|| भवद्धिः पृच्छयते य॒द्रत्त्तथा नारदेन वै ॥ पृष्टं पित्रे प्ररितेन हरिणा शिवरूपिणा ॥ २६ ॥ ट
तुम्हारी निष्टावाटी मतिहै ॥ २१॥ सदाशिवकी कथाके प्रशन तीन परुषोको पवित्र करते कहनेवाे पूछनेवाठे ओर सुननेवःरोको प्रवि करते है
४ जसे गंगाजठ ॥२२। हे बाह्मणो ! बिना पशुधरके तीन भकारे जनोंको आनन्द करनेवाछे शिवजीकै गणादवादोते कौन धरूष विरक्तं हो सकता ४
टै || ॥ २३॥ तृष्णारहित रुषो गायमान शिवचरितर संसार रोगकी ओषधीहे,मन ओर कानोंको आनददायक ओर सब अ्थका देनेवाखा है ॥२४॥
४॥ आपकषश्के अनुसार मे यथाबुद्धि कहता हं हे बहमणो भयल सादर शिवलीरा सुनो ॥२५॥ जिस परकारसे आपने भशन पूखाहे इसी प्रकारे ६
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शिवहप हसिते परित होकर नारदजीने अपने मिता बरहमाजीते यही बात पंछी थी ॥२६॥ शिवभक्त बाजी अपने उनके यहं वचन सुन भरन नो ही
भीतिपूषक खनिभेष्ठको भसन्न करते हुए शिवजीका यश कथन करने कगे॥ २७॥ग्यासजी बोठे वहं शष्ठ बाह्मण इत भकारते सुतजीकै कटे वचन।क
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पुनकर कुतूहल पूवेक उस्र सम्बादको पठने छगे ॥ २८ ॥ ऋषि बोरे हे महाभाग सूतज ! हे शिवकरे भक्तोँम उत्तम, हे महामतेः आपकर
मनोहरवचन सुनकर हमारे चित्तम बडा कुतहर हुजहे ॥ २९ ॥ यह सुखदाई बहला ओर नारदजीका सम्बाद कव हुभा है जिसमे संसारके भय
युक्तकरनेवाटी शकरकी ठीखा कही गईं है ॥३०॥ विधि ओौर् नारदजीके सम्बादपूषैक जो शंकरका यश ह हे तात ! उनकै ्रश्वके अु्षार् आप
रहना त्वा स॒तवचश्शिवभक्तः प्रसन्नधीः ॥ जगौ शिवयशः प्रीत्या दषयन्पुनिसत्तमम् ॥२७॥ व्यास ॥ सूतोक्तमिति
तद्वाक्यमाकण्यं द्विजसत्तमाः ॥ प्रच्छस्तत्घुसंवादं कतूदलसमन्विताः ॥२८॥ ऋषय उचुः ॥ सूत सूत महाभाग रवोत्तम
महामते ॥ त्वा तव वचो रभ्य चेतो नस्सकुतूदलम् ॥२९॥ कदा बभूव सुखङृद्विधिनारदयोभेदान् ॥ संवादो यच गिरिशसु
लीला भवमोचिनी॥३०॥ विधिनारदसंवादपूवकं शांकरं यशः ॥ ब्रहि नस्तात तत्प्रीत्या तत्तत्परश्नाव॒सारतः॥३१॥ इत्याकण्यं
वचस्तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ सरुतः्रोवाच सुप्रीतस्तत्संवादादसारतः ॥३२॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसं
हितायां प्रथमखडे सृष्टडपाख्याने शुनिप्रश्नवर्णनो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १। सूत उवाच एकस्मिन्समये विप्रा नारदो मुनिसत्तमः ॥
्ह्मपु्रो विनीतात्मा तपोमनआदषे ॥१॥ हिमशैलग॒हा काचिदेका परमशोभना ॥ यत्समी पेसुरनदी सदा वहति वेगतः ॥२॥
। कहिये ॥३१ इस प्रकार उन भवितात्मा सुनियोकै वचन सुनकर उष सम्वादक अनुक्षार प्रसन्न हौ सूतजी कहने टये ॥ ३२ ॥ इति श्रीशि
वमहाएराणे द्वियायां शरस्षहितायां पण्डितज्वालाप्रसादपिश्रकूतभाषाटीकायां परथमनृष्टिखण्डे सुनि प्रशनदणेनं नाम॒ प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ सूतजी
बोटे हे बाह्मणो एकसमय सुनिभरष्ठ नारदजी ब्रह्माजीके एत्र षिनीतआत्मा तप करनेकी इच्छा करते इए ॥ १ ॥ हिमाठ्य परव॑तकी एक प्रमशो ‰
‰॥ भायमान युफा थी जिसके किनारे बडे वेगसे गंगा नदी बहती है ॥ २॥ # |
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| एक दिव्य आश्रम अनेकं शोभाओि शोभायमान हे वह दिव्यदशन नारदजी तपके टिये वहं गये ॥ ३ ॥ उस स्थानको |
खनिशादूढ बहुतकाठतक तप करते रहे, ओर मौन हो आसन रगाय प्राणायामकर शुदमनसे ॥४॥ खनिने समाधि रगादी जिमे"अहप् बहम
यह ब्रह्पताक्षात्कार करनेवाखा विज्ञान होता है ॥ ५ ॥ इस प्रकार जव सनिश्र्ठ नारदजीने तपकरना आरंभ किया तव इन्द्र कंपायमान होगया
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ओर मनकै संतापे विहर . होगया ॥६॥ ओर यह विचार किया किं कदाचित् मुनिराज मेरा राज्य चाहते हों तव उनके विघ्रकरनेके स्यि 4
तत्राश्रमो महादिव्यो नानाशोभासमन्वितः ॥ तपो स ययौ ततर नारदो दिभ्यदृशेनः ॥ ३॥ तां दष्टा सुनिशार्दूटस्तेपे स
सुचिरं तपः ॥ बध्वासनं दृटं मौनी प्राणानायम्य शुद्धधीः ॥ ४ ॥ चक्रे शुनिस्समाधि तमहम्ब्रहमेति यज इ ॥ विज्ञानं
भवति ब्रह्मसाक्षात्कारकरं द्विजाः ॥५॥ इत्थं तपति तस्मिन्वै नारदे घनिसत्तमे॥ चकंपेऽथ शुनासीरो मनस्संतापविहलः ॥६॥
मनसीति विचित्यासौ एनिमं राज्यमिच्छति ॥ तद्विध्नकरणाथ हि दरियंत्नमियेष सः॥७॥ सस्मार स्मर शक्रश्वतसा देव
नायकः ॥ आजगाम दत कामस्समधीमंदिषीसतः ॥८॥ अथागतं स्मर रषा संबोध्य सुरराट् प्रथुः ॥ उवाच त प्रपश्याज्च स्वाथे
ुटिरुशेखुषिः ॥९॥ इन्द्र उवाच ॥ मिजवय्यं महावीर सर्वदा हितकारक ॥ श्रृणु प्रीत्या वचो मे त्वं ङ् साहाय्यमात्मना
॥१०॥ त्वद्रलान्मे बहूनाञ्च तपोगर्वो विनाशितः ॥ मदराज्यस्थिरता भि त्वदयुग्रहतस्सदा ॥ ११ ॥ दिमशेल्य॒शायां दिश्ुनि
स्तपति नारदः ॥ मनसोदिश्य विश्वेशं महासयमवार्हृटः ॥ १२ ॥
कामदेवको आया हुआ देखकर भ्रमु देवराज स्वाथे कुटिरु बुद्धि होनेक कारण शीघतासे बोडे ॥ ९ ॥ इनदर बोढे हे भिव है महावीर ।
सदा हितकरनेवाठे भीति तुम मेरे वचन घुनकर मेरी सहायता करो ॥ १० ॥ तुम्हारेही बते मैने बहृतोंका तपका गर्वं नष्ट कर दिया है
हे मित्र ! दम्हारेही अलु मरे राज्यमे स्थिरता है ॥ ११ ॥ ह्िमारुय पर्वतकी शफा खनिभेष् नारदजी तप करते है, भनम्
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इन्दरने इच्छा की ॥७॥ तब देवनायक इन्द्रने मनसे कामदेवका स्मरण किया, उस समय सान बुद्धिषाा काम वहां आकर स्थित हुआ ॥<॥
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शंकरका उदेश धारणकर महासंयभी हो रहे है, दढतासे स्थितं है ॥ १२ ॥ कहीं बहयाजीसे बह भेरा राज्यतो न मागे, यही भ॒न्ञे शका है
तुम अभी जाओ ओर उनके तपम विघ्न करो ॥ १३ ॥ महेन्द्रसे यह वचन सुनतेही मधुभिय काम उस स्थम बडे गर्वे गया, ओर अपना
उपाय करने रगा ॥ १४ ॥ ओर वहां सम्पूण अपनी कठा उस्ने रची, ओौर वसन्तने भी मद्से अपना अनेक प्रकारका भ्रमाव दिखलाया
॥ १५ ॥ हे खनि भेषठो ! पर नारदजीके मन्म कछ भी विकार नहीं आया ओर शके अनुग्रहसे इन्द्रका गवं ष्ट होगया ॥ १६ ॥ हे
शौनकादि खनियो ¡ आदरसे इसका कारण घनो यह सब दैश्वरका अलुगरह है कामदेवका भरभाव नह ॥१७॥ यहीं कामारि शकरने बडा तप
याचेत्र विधितो राज्यं स ममेति विशंकितः॥ अयैव गच्छ त त्वं तत्तपोविघ्रमाचर॥ १३॥इत्याज्ञतो मन्द्रेण स कामस्समथु
परियः॥ जगाम तत्स्थलं गर्वादुपायं स्वशचकार ह॥१४॥रचयामास तरा स्वकलास्सकखा अपि ॥ वरतोपि स्व्भावं चकार
विविध मदात् ॥१५॥ न वभूव सुनेश्चतो विकृतं खनिसत्तमाः॥ भ्रष्टो बध्व तद्ववो महेशालुयहेण ह ॥ 9६॥ शण॒तादरतस्त
कारणं शौनकादयः ॥ ईश्वरानुपरहेणाज न प्रभावः स्मरस्य हि ॥ १७ ॥ अचैव् शम्मुनाऽकारि सुतपश्च स्मरारिणा ॥ अनैव
द्ग्धस्ते नाञ्च कामो अुनितपोषहः ॥ १८ ॥ कामजीवनहेतोहिं रत्या सपार्ितेस्ुरैः ॥ सम्प्राथित उवाचेदं शंकरो लोकशं
| करः ॥१९॥ कंचित्समयमासाद्य जीविष्यति सुराः स्मरः ॥ परंत्विह स्मरोपायश्चरिष्यति न कश्चन ॥ २० ॥ इह यावश्यते
|| भूर्जनेः स्थित्वाऽमरास्सदा ॥ कामबाणप्रभावो नचङिष्यत्यसंशयस् ॥ २१॥
₹०द.२||@ || किया था ओर यही मुनिक तपम विदरकतौ काम दग्ध किया गया था ॥ १८ ॥ तव रतिने ओर सव देवताओंने कामदेवे जीवनके
अ० २ ||९|| शिबजीसे पाथना कौ तव लोकै कल्याणकती शिवजी कहने रगे ॥ १९ ॥ हे देवताओं ! कुछ समयक पीछे कामदेव जीवित हौ जायगा
परन्तु इस स्थङ्मे कामदेवका भाव कभीमी कुछ न चेगा ॥ २० ॥ यहांकी जौ भूमि आपको दिखाई देती है हे देवताओ ! यहां स्थित
|| होनेसे किसी भकारभी कामदेवका प्रभाव न चरु सकैगा इसमे सन्देह नहीं ॥ २१ ॥
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नारदजीका हुनाया ओर उनकी आज्ञासे वक्न्तकै सहित अपने स्थानको चछा गया ॥२३॥ तब इन्द्र यह सुनकर बडा विसित हु ओर नारदजीकी
्रश॑साकी, कारण कि शिवजी मायात मोहित होनेके कारण यह इनके वृत्तान्तको न जान सका ॥ २४ ॥ सव प्राणियोको शिवजीकी माया दुङ्ञेय है
भक्तके चिना अर्पित आत्मा होने वह सवजगतको मोहित करते है॥२५॥ ओर शिवजीकैअलुग्रहसे नारदजी वहां बहुतेकाक्तक स्थित रह, |
इति शंभूक्रितितः कामो मिथ्यात्मगतिकस्तदा ॥ नारदे स॒ जगामाञ् दिवमिन्द्रसमीपतः ॥२२॥ आचस्यौ सववृत्तातं प्रभावं
च ुनेः स्मरः ॥ तदाज्ञया ययौ स्थानं स्वकीयं स मधुप्रियः ॥ २३॥ विस्मितोभरत्सुराधीशः प्रशशंसाथ नारदम् ॥ तद्वत्ता
तानभिज्ञो हि मोहितश्शिवमाययां ॥२४॥ दुक्ञैया शांभवी माया सवेषां प्राणिनामिह ॥ भक्तं विनापितात्मानं तया संमोह्यते
जगत् ॥ २५ ॥ नारदोऽपि चिरं तस्थौ तत्रेशावुप्रहेण ह ॥ पूर्णं मत्वा तपस्तत्स्वं विरराम ततो शनिः ॥ २६ ॥ कामाजयं निजं
#|| मत्वा गर्वितोऽभून्धुनी श्वरः ॥ वृथेव विगतज्ञानश्शिवमाया विमोहितः ॥ २७॥ धन्या धन्या महामाया शांभवी सुनिसत्तमाः॥
तद्रति न हि पश्यति विष्णुब्रह्मदयोपि हि ॥ २८ ॥ तया संमोहितोतीव नारदो शुनिसत्तमः ॥ कैलासं प्रययौ शीघं स्ववृत्तं
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| अपनी पिथ्यागतिसतमश्चकर नारद्जीके समीपे इन्द्रके पाप स्वगेटोकमे गया ॥ २२॥ ओर वह स वृत्तान्त कामदेवे
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गदितुमदी ॥२९ शर॑नत्व्रवीत्सवै स्वप्रततद्गषवान्षुनिः ॥ मत्वात्मान॑महात्मानं स्वप्रभुञचस्मरलेयम् ॥ ३०॥ तच्छत्वाशंकरः
प्राह नारदं भक्तवत्सलः ॥ स्वमायामोहिते देत्वनभिज्ञ भ्रश्चेतसम् ॥ ३१ ॥
किर अपना पृणेतप सुमज्ञकर तपस्या विराम किया॥२६॥ हमने काम जीता इस्त बातका छनिराजको गव हुमा, ओर शिवी मायासे मोहित होनेकै
कारणज्ञानपे रहित होगये॥२७॥ हे सुनीश्वरो शांकरी महामायाको धन्य है, विष्णतरह्यादिक कोहैभी उनकी गतिकौ नहीं जान सकते॥ २८॥ उसषसमय
उस मायाने नारदजीको अत्यन्त मोहित कर दिया था, ओर अभिमानसे अपना त्तान्ते कहनेकै रथि कैलासो गये ॥२९॥ ओर वहां शंकरको
ई प्रणामक गवेसे अपना वृत्तान्त सुनाया, ओर अपनेको महात्मा मानकर तथा काषजयमें अप्नेको भमु मानते हुए ॥३०॥ यह सुनकर मक्तत्सर
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शिजीने नारदजीते कहा जो नारदजी भगवानकी मायासे मोहित होकर आषटचित् होगये थे ॥ ३१ ॥ रद्र नी हे तात! नामा
हो मेरे वचन सुनो यह बात जो तुमने अकञसे कही सो नारायणके भगे मत कहना ॥ ३ २॥ ओर यदि १९ तो भी उनसे यह वृतान्त न
कहना, स्था इनको प्त रखकर किं प्रकार भी प्रकाशित न करना ॥ ३२ ॥ भँ तुमको विशेष रूपे कंहता हूं कारण किं तुम
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मरे प्यारे हो । तुम विष्के भक्त हो ओौर विष्ण भक्त मेरे अनुगामी होते है ॥ ३४ ॥ इस प्रकार बहुत भोतिसे उन्होनि स्मक्ञाया त
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कारण किं सवेको स्मृति करनेवाठे वही परु है शिवकी माया मोहित होनेके कारण नारदजीने इस्त बातको हितकर न माना ॥ ३५ ॥
रद्र उवच ॥ तात नारद् प्राज्ञ धन्यस्त्वबृणुमद्रचः ॥ वाच्यमेव न कुतापि हरेरग्रे विशेषतः ॥३२॥ पृच्छमानोऽपि न त्रयाः
स्ववृत्तं मे यदुक्तवान् ॥ गोप्यंगोप्यं सर्वथाहि नैववाच्यंकदाचन ॥३३॥ शास्म्यहं त्वांविशेषेण मम प्रियतमो भवान् विष्णुभ-
कृतो यतस्त्वं हि तद्भक्तोतीवमेऽवगः ॥२४॥ शास्तिस्मेत्थञ्च बहुशो रद्रस्घूतिकरः प्रभुः ॥ नारदो न हिते मेने शिवमायवि- ए
मोहितः ॥ ३५ ॥ प्रबला भाविनी कर्मगतिज्ञेया विचक्षणः ॥ न निवार्या जनेः कैथिद्पीच्छा सेव शांकरी ॥ ३६ ॥ ततस्स ४
सुनितर्यो हि ब्रह्मलोकं जगामह ॥ विधिं नत्वाऽनृवीत्कामजयं स्वस्य तपोबलात् ॥३७॥ तदाकण्यं विधिस्पो स्मृत्वा शम्भु- ट
पदाम्बुजम् ॥ ज्ञात्वा सर्वे कारणं तश्चिषिषेध सुतं तदा ॥३८॥ मेने हितच्न विध्युक्तं नारदो ज्ञानिसत्तमः॥ शिवमायामौहितशर
ख्टचित्तभरदाकुरः॥३९॥ शिवेच्छा यादशी लोके भवत्येव हि सा तदा ॥ तदधीन जगः सर्वं वचस्तैत्यात स्थितं यतः ॥४०॥ ४
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| कर्मेगति चतुर जन ही जान सकते है उप्त शांकरी इच्छाको कोह भी निवारण करने समर्थं नहीं हे ॥ ३६ ॥ तत्र खनिराज||
ब्रमलोकको चे गये ओर ब्रत्ाको पभ्रणामकंर अपने तपोवल्ते कामका जय वणेन किया ॥ ३७ ॥ यह सुनकर बह्ाजी शिवजीक |
कमरको प्रणामकर ओर सब कारण जानकर निजुत्रसे निषेध करने कगे ॥३८॥ ज्ञानियोमे शरेष्ठ नारदजी इस्त बातको हितकर नहीं |
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शिवी मायाको मोहित ोनेके कारण उनके मनमे मदका अकुर जानना ॥ ३९ ॥ जेत्ती टोकमें शिषकी इच्छा होती है वैषा
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| करता है उनके अधीन् सब जगत है कारण किं उनकै वचनं म सब स्थितै ॥४०॥ बुद्धि नष्ट हो गई तब नारदजी विष्णलोकको चले जो काम कै ५
>| जया अकार था उसके कहनेके निमित्त नारदजी चे ॥४१॥ नारद्जीका आया देखकर आदरे विष्णजीने शीघतासे उठकर इनका सत्कार ||
् किया कारण कि सब हेतु जानते थे॥४२॥ अपने आस्ननप्र बैठाकर शिवकै चरणकषरको स्मेरणकर नारदजीकै मदनाशकं वचन भगवानने कहै ५
61 कपि विस ५५ यही आवे हो हे डिश! जाप धन्य हो मँ आपके आनते पत्रि होगया हू ॥४४॥ ||
¢ नारदोऽथययौ शीभं विष्णुलोकं विनष्टधीः ॥ मदां्रमना वृत्त गदितुं स्वे तद््तः॥४१॥ आगच्छतं सनिन्दष्ठा नारद विष्ण- ||
¢ रादरत्॥ उत्थिसामर गतोऽ तं शिश्टेषज्ञातदेतुकः॥४२॥ स्वासने ससुपावेश्य स्मृत्वा शिवपदाम्बुनम् ॥ हरिः प्राह वचस्तथ्यं $
| नारदमदनाशनम् ॥४२॥ विष्णुरुवाच ॥ कुत आगम्यते तात किमर्थमिह चागतः ॥ धन्यस्त्वं घुनिशा दल तीर्थोऽहं तु तवाग- €
मात् ॥७९॥ विष्णुवाक्यमिति श्वा नारदौ गवितो सुनिः॥ स्ववृत्तं सवेमाच्ठ समद मदमोहितः ॥४५॥ थत्वा शनिवचौ
| विष्णुर मदं कारणं ततः ज्ञातनानसिलंस्मरतमा शिवपादबजं ददि ॥४६॥ ताव गिरिशं म्या शिवात्मा रैवरा् इरिः॥ ||
(| सांजलिविसधीत्रमस्तकः परमेशरम्॥४७॥ विष्णुरुवाच ॥ देवदेव महादेव पसीद प्रमेशवर॥ धन्यस्त्वं शिष धन्यां ते माया ||
£ स्वै विमौदिनी॥४८॥ इत्यादि स स्तुति कृत्वा शिवस्य परमात्मनः॥ निमीरय नयने ध्यात्वा विरराम पदाम्बुजम् ॥४९॥
वि्णजीके यहं वचन सुन नारदुनि बडे गित हूए मदते मोहित हौ अहंकार सहित सव अपना दृततं सुनाया ॥४५॥ न्[एद्जीकै मदपूषेक तथा
सहैतुक वचन सुनकर मगवान सव कारण जान ठेते हुए ओर शिवभगवानको हृदयमे स्मरण कर ॥४६॥ बडी भक्तिते शिवात्मा शवोंके अधिपति भगवान
विष्ण शिवकी स्तुति कएने कगे, ओर अञलिपूषेक परमेश्वरको मस्तकं शुकाय बोरे ॥ ४७॥ विष्णजी बोछे हे देवदेव महादेष ! परमेश्वर हमपर
असन्न हो तुम धन्य हो ओरसो मोहनेषाटी आपकी माया भी धन्य है॥४८॥ इत्यादि परमात्मा शिवकी स्तुतिकरके तेन मीच शिवजीकेपदाम्बुजका
१ लधुक्षिभ्रमरन्द्रतमित्यमरः ।
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शि०्यु ध्यान करके मौन हए ।४९॥ जो कु शिवजी करना चाहते है, मिशपारक बह सब जानकर शिवकी आज्ञासे खनिभ से कहने ठगे॥५०॥ विम्डनी ||
॥६॥ ||| बोरे खनिशादक! तपोनिधि उदारबुद्धि आप धन्य हो, ह खनिराज ! जिसके हदयमं तीन देवताओकी मक्तिनहींहोती,उसकौ काम मौहादिकं सतातहै ट
¢ ॥५१॥ उप्तीको यह विकार दुखद)ई होते है आप नैष्टिक बह्मचारी सदा ज्ञानविज्ञानवाठे हो ॥५२॥ आपको किंस भकार कामका विकार हो सकता हं ट
¢ आप जन्पसेही विकाररहित सुन्दर बुद्धिधाछे हो इत भकारे वह एनिभ्रे् यह वचन सुनकर ॥५३॥ ददयमे नमस्कार कर रसे ओर भगवान मोठे ४
त यत्कृतेन्यं शंकरस्य स ज्ञात्वा विश्वपालकः ॥ शिवशासनतः श्रीह हदाथ खुनिसत्तमम् ॥८५०॥ विष्ण॒र्वाच ॥ धन्यस्त्वं खुनि- ¢
९|| शा्दरल तपोनिधिरुदारधौः ॥ भक्तित्िकं न यस्यास्ति काममोहादयोश्ने ॥५१॥ विकारास्तस्य सो वै भवद्यखिल्दुःखदाः ४
५ नेष्ठिको बरह्मचारी त्वे ज्ञानवेराग्यवान्सदा ॥५२॥ कथं कामविकारीस्या जन्मनाविकृतस्सुधीः ॥ इत्यायुक्तं वचो भूरि शत्वास्
&|| अुनिसत्तमः॥५३॥ विजहाक् इदा नत्वा प्रत्युवाच वचो हरिम् ॥ नारद उवाच ॥ किंप्रभावः स्मरः स्वामिन्करृपा यद्यस्ति ते $
| मयि ॥५९॥ इत्युक्ता हरिमानम्य ययौ याहच्छिको्चनिः ॥५९५॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुदसंदितायां प्रथमखंडे ||
शष्टचपाख्याने नारदतपोव्णैनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ ऋषय उचुः ॥ सूतसूत महाभाग व्यासशिष्यनमोऽस्तु ते ॥ ॥६||.
अद्धतेयं कथा तात वणिता कृष्या हि नः ॥१॥ ुनौ गते हरिस्तात किं चकार ततः प्रसू ॥ नारदोपि गतः कत्र तन्मे व्या- ||
स्यतुमईसि॥२॥ भ्यास् उवाच ॥ इत्याकेण्यं वचस्तेषां सूतः पौराणिकोत्तमः ॥ प्रत्युवाच शिवं स्मृत्वा नानासुतिकरं बुधः॥३॥ |©
२||@!|| नारदजी बोटे हे भगवन् ! यदि आपकी ङ्प मेरे ऊपर है तो कामदेषं क्या कर सकता है ॥५४॥ यह कह न।रायणको भणाम कर सनि यथेच्छस्थानको £
३४|| गये॥५५॥ 1 ० द्वि° दर ° भवाटीकायां १० घृ ° नारदूतपोवणनं नाम् दितीयोऽध्यायः।। १ कषि बोठे हे सूतजी महाभाग! हे व्यासशिष्य ! |
ट आपको प्रणाम है हे त्ति! आपने कपा क्रक यह अदत कथा वणेन की ॥२॥ हे तात! खनिकै जानेपर फिर भगवानूने कया किया, ओर नारदजी फिर
# || कहां गये सो आप हमसे किये ।२।। व्यास॒जी बके पौराणिको उत्तम खतजी उनकै वे वचन घुनकर शिवजीको स्तुति वाक्योते परणामकर बोठे 1 ३॥
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विस्तारवाखछा मनोहर था ॥५॥ अपने ठोकमसे भी अधिक मनोहर अनेकवस्तुभसे विराजित नरना रियोके विहारोे युक्त चारों वणोसि आकु
& ॥ वहां का शोढनिधि नाम राजा अनेक रेते सेयुक्त था सुताकै स्वयम्बरमे उथुत महोत्सवे युक्त ॥ ७ ॥ चारों ओरसे
| नारदजी जब यर्च्छाते चे गये तव विष्यजीने शिवकी इच्छसे मायाकी मरणा को ॥ ४ ॥ उस्ने सुनिकेमारभमे नगर रचा जो सौ योजन
¢ अये हुए थे ओर कन्याके वरणमें उत्कंदित हुए अनेक वेशोते शोभित थे ॥८॥ रेते एको देखकर नारदजीको मोह हो गया ओर काममदसे
|
|| सूत उवाच ॥ सनौ यदच्छया विष्णुगते तस्मिन्दि नारदे ॥ शिवेच्छया चकारा माया मायाविशारद्ः॥४॥ सुनिमाग॑स्यमध्ये
£| ए तिरे नगरं महत्॥ शतयोजनविस्तारमद्तं सुमनोहरम् ॥९॥ स्वलोकाद्धिकंरभ्यं नानावस्त॒विराजितम्॥ नरनारीविशराठचं
# चतुवेणाक्लं परम् ॥६॥ तत्र राजा शीलनिधिनामेश्वय॑समन्वित्ः ॥ सुतास्वयम्बरोदुक्तो महोत्सवसमन्वितः॥७॥ चतुदिभ्यः
खमायातेस्संयुतं नृपनन्दनेः ॥ नानावेषेस्सुशोभेश्च तत्कन्यावरणोतषुकेः॥८॥ एतादशम्पुरं रषा मोरम्पराप्तोऽथ नारदः॥ कौतुकी
ट| तन्नपदरार जगाम मदनेधितः ॥९॥ आगत मुनिवर्यं तं दृष्ठ शीलनिधिर्नेपः॥ उपवेश्याचर्यांचक्रे रत्नसिंहासने वरे॥१०॥ अथ
राजा स्वतनयां नामतशश्रामतीं वराम् ॥ समानीय नारदस्य पादयोस्समपातयत् ॥११॥ तत्कन्यां प्रक्ष्य स अनिनारदः प्राह
£| विस्मितः ॥ केयं राजन्महाभागा कन्या सुरसुतोपमा ॥१२॥ तस्य तद्र वनं शत्व रजा पाई कुताजलिः ॥ हरितेयं मम सुने
&|| श्रीमती नाम नामतः ॥ १३॥
|| ऋषद्राखो कोतुकाक्र(न्त होकर गये ॥ ९ ॥ शीरनिभि राजाने स॒निभेषटको आया हुआ देकर उनको रत्न ॒सिंहासनपर बेडय पूजा की ||
|| ॥ १० ॥ ततर राजन अपनी श्रीमती न।मवाटी कन्याको ठाकर नरदकै चरणो खा ॥ ११ ॥ उप्त कन्याको देख सनिगरष्ठ नारदजी ठ
ह विमित होकर बटे हे राजन् ! यह महाभागा कन्या देवताओंकी कन्याके समान कौन है ॥ १२ ॥ उनकै यह वचन ष्ुनकर राजा हाथ
|| जोढकर बोरे है खनि ! यह मेर श्रीमती नौमवाढी कन्या है ॥ १३ ॥
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। | अब् इत्ते भदानका समय है यहवरकी खोज है वह संपूण ठक्षणोसे रक्षित स्वयम्बरमं भाप हृ।॥१४॥ हे खनिराज। इव जातक ओर् भाग्य आप्
कहि यह मेरी कन्था कैत वरको भ्रा होगी सो कहो ॥१५॥ यह सुनते ही कामे व्याकुठ ह नारदजीने उसके पानेकी दच्छा की राजान्ते सम्भाषण
त करके नारदजी बटे ॥ १६ ॥ हे राजन् ! यह तुम्हारी कन्या सब ठक्षणोमे ठक्षित है यह महा भाग्यवती धन्य सव ठक्षणोसे क्षित है
| ॥ ३७ ॥ सर्वेश्वर अजित वीर शिवजीके सदश विभु कामका जीतनेवाला देवताओं श्रेष्ठ अवश्य दका पति होगा ॥ १८॥ रेरा कह ध
ह|| नारदजी राजाको आर्मत्रण कर अपनी इच्छसे चे गये, ओर शिवकी मायासे मोहित होनेकै कारण कामके वशीभूत होगये ॥ १९ ॥ नारदजी
परदानक्षमयं मराप्ता वरमन्वेषती श्भम् ॥ सा स्वयंवरसंपराप्ता स्व॑लक्षणलक्षिता ॥१४॥ अस्या भाभ्यं वद् घुने स्वं जातकमा- |©
दगात् ॥ कीदशं तनयेयं मे वरमाप्स्यति तद्वद् ॥१५॥ इत्युक्तो खनिशाईलस्तामिच्छुः कामविहलः ॥ समाभाष्य स॒ राजान
नारदोवाकयमत्रवीत् ॥१६॥ स॒तेयं तव भ्रा सर्वलक्षणलक्षिता ॥ महाभाग्यवती धन्यारक्ष्मीखि शणाल्या ॥१७॥ सुवश्वरोऽ
ठ जितोवीरोगिरीशसदृशो विधुः॥ अस्याः पतिथवं भावी कामजित्घरसत्तमः॥१८॥ इत्युक्ता तृपमामच्य ययौयादच्छिकोमुनिः॥
| बभूव कामविवरश्शिवमाया विमोहितः ॥१९॥ चित्ते विचिन्त्य् स शुनिराप्डुयां कथमेनकाम् ॥ स्वयंवरे वृपालानामेकं मां
वृणुयात्कथम् ॥२०॥ सौन्दर्थस्वनारीणां प्रियं भवतिसवेथा ॥ तदृष्ैवपसनत्ना सा स्ववशानाच् संशयः॥२१॥ विधायेत्थं विष्णुषपं
¢ ग्रहातु मुनिसत्तमः ॥ विष्णुलोकं जगामाश्च नारदः स्मरविहवरः ॥२२॥ प्रणिपत्य इषीकेशं वाक्यमेतदुवाच इ ॥ रहसित्वां |
प्रवक्ष्य मि स्वदृत््न्तमशेषतः ॥ २३॥ _ _ ५ |
₹०हं.९ ||| मने सोचने ठे कि भँ इको कैते भात क, स्वयबरमे आये हुए शजोेसे यह एक भुञ्जहीको किंस प्रकार वरण करेगी ॥२०॥ चिर्योको प्रायः
सुन्दरता बहुत प्यारी होती है सो वह सुन्द्रता देखतेही खज्ञपर प्रसन्न हो जायगी इसमे सन्देह नहीं ॥२१॥ यह मनम विचार खनि नारदजी
विष्णका रूप ग्रहण करनेके खयि कामसे व्याकुर हो शीघ्रही विष्णके ोकको गये ॥ २२ ॥ ओर भगवानको भरणामकर यह वचन वोट मै
एकान्तम् आपसे सच अपना वृत्तान्त कता हूं ॥ २३ ॥
अ०३ ||&
इस भकार शिवकी इच्छा कायैकताये होनेसे भगवान विष्णने नारदजीसे कहा किये तव शनि केशवस कहने कगे॥ ४ ॥ नारदजी बोले
| राजा आपहीके धर्मे तत्पर हुआ है, कथरलोचनी उरुकी कन्या श्रीयती वरगरहणकी इच्छा किये है ॥ २५॥ वह जगते मोहनेभें
विख्यात ओौर निलोकीमं सवते अधिक सुन्दरी है, हे विष्ण मै आज शीप्रही उसको वरण करनेकी इच्छा करता हँ ।॥ २६ ॥ वह राजा अपनी ठ
कन्याका स्वयंवर कर रहा है सहश्चो राजष चारों दिशाओंते आ रहे है ॥२७॥ जो आप अपना रप शङ्षे दे तो वह कन्या अवश्य खञ्चको ट|
प्राप्त हो सकती है आपके स्वरूपको पाये बिना वह वंटम जयमाला न उाटेगी ॥२८॥ हे नाथ | आप अन्ने अपना स्वप दीजिये भँ आपका त
४
¢ तथेतयक्तेतथाभूते शिवेच्छाका्कतंहि ॥ ब्रहीत्यक्तवति श्रीशे शनिराह च केशवम्॥२७॥ नारद् उवाच ॥ त्ववीयोभ्रूपतिः शीर ठ
¢| निधिस द्रषतत्प्रः॥ तस्यकन्या विशालाक्षी भरीमतीन्रवणिनी ॥२९॥ जग॒न्मोहिन्यभिरूयाता जलोकयप्यतिुन्दरी॥ परिणे ||र
तुमह विष्णो तामिच्छाम्य्य माचिरम् ॥२६॥ स्वयंवरंचेकरःसौ भूपतिस्तनयेच्छया ॥ चतुदिंरभ्यसमायाताराजपुजास्सहस्रशः ¢
॥२७॥ यदि दास्यसि हषं मे तदा तां प्रप्लुयां धुवम् ॥ त्वद्रूपं सा विना कंठे जयमालां न धास्यति ॥२८॥ स्वरूपं देहि मे
| नाथ सेवकोऽदं प्रियस्तव ॥ वृणयान्मां यथा सा वश्रीमती कषितिषात्मजा ॥२९॥ सूत उवाच ॥ वचः श्चत्वा सुनेरित्थं विहस्य ट
मधुसूदनः॥ शांकरीं मयता इद्ध्वा भरतयुवाच दयाप्रः॥२०॥ विष्णुर्वा च ॥ स्वेष्टदेशं शने गच्छ करिष्यामि हितं तव ॥ मिषग्बरो
यथात्तस्य यतःप्रियतरोऽसिम ॥३१॥ इत्यक्ता नये तस्मे ददौ विष्णु्खं हरे ॥ स्वहूपमवुशृद्यास्य तिरोधानं जगाम सः ॥३२॥ ५
परियसेवक ह, जेस बह श्रीमती राजाकी कन्या सज्ञे रण करे सो करो ॥२९॥ सूतजी वोढे अनिराजक यह वचन सुन हसते हुए भगवान
शिवजीकी भमुताको जानकर द्यासे यह वचन बटे ॥३०॥ विष्णनी बो हे छनिराज ! आप अपने अभिरषित देशको जाभो नै तुम्हारा ||@
ट| भियकाय कंग जते सेय रोगीका हित करता है कारण कि ठम भेर प्यारे हौ ॥ ३१ ॥ हं कहकर सुनिको विष्णजीने बन्द्रका खल ||
॥ दे दिया, ओर इनपर अनुग्रह करनेके निमित्त अन्तर्घन हो गये ॥ ३२॥ ५
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ता कहनेप्र खनि हरिका स्वरूप भाप्कर बडे भसन्न हुए ओर अपने आपको कताथे मानकर् उनके यत्नक न जाना, ।॥र२। तन् शीच्र ही नारदजी
उत स्थानम आये जहां राजरोके मध्यमे स्वयंवर होरहा था ।३४॥ वह स्वयम्बरकी दिव्यसभा राज्नोसे व्याप्त थी हे नालणो ! बह सभा उस्
तमय इन्द्रस्षमाके समान दीिमाचु थी ॥३५।। उस सभाम नारदजी जाकर प्राप्त हुए ओर वहां जाकर प्रीतियुक्तः चित्ते विचचार करने कगे ।३६॥
विष्णहपधारी स्च वह अवश्य परण करेगी खनिभेष्ने अपने खखका कुरूपत्व न जाना ॥३७॥ सब मल्योनि निका पूरवरूपही देखा, वह राजु
एवसुक्तो सनिदेष्ः स्वरूपं पराप्य वै दरेः॥मेने कृतार्थमात्मानं त्यतन न डुबो सः॥३३॥ अथ तज गतः शीचन्नारदो सनिसत्तमः॥
चके स्वयम्बरं य राजपुतरस्समाकुलम् ॥ ३९॥ स्वयम्बरसमा दिम्या राजपु्रसमा्रता ॥ शुद्भेऽतीव विपनद्रा यथा शक्रस
भापरा॥३९॥ तस्यां गृपसभायां व नारदः समुपाविशत् ॥ स्थित्वा तज विचिन्त्येति भ्रीतियुक्तन चेतसा ॥३९॥ .मां वरिष्यति
नान्यं सा विष्णुङूपधरन्धुवम्॥ आननस्य कुरूपत्वं न वेद् ुनिसत्तमः ॥३७॥ पूर्वहूपं सुनि सवे ददश्ुस्तच मानवाः॥ तद्भदं
बुबुधुस्ते न राजपु्रादयो द्विजाः ॥३८॥ त श्दगणौ द्रौ तद्रक्षणार्थं समागतौ ॥ विग्रहपधरौ गूढौ तद्धेदं जज्ञतुः परम्॥३९॥
मूढ मत्वा खनि तौ तत्निकरं जग्मतुर्मणौ ॥ ङुश्तस्तत्पहसे वै भाषमाणौ परस्परम् ॥४०॥ पश्य नारद रूपं हि विष्णोरिव
महोत्तमम्। शुखं तु वानरस्येव विकटं च भर्यकरम् ॥७१॥ इच्छत्ययं तरपसुतां ब्रृथेव स्मरमोदितः॥ इत्युक्ता सच्छरं वाक्य
युपहासं प्रचकतुः ॥४२॥ न शुश्राव यथाथ तु तद्वाक्य स्मरविह्वलः ॥ परयक्षच्डीमतीं तां वे तद्िप्सरमोहितो शनिः ॥४३॥
रादि उस्र भेदको न जानते हुए ॥ ३८ ॥ जाह्मणका हप गढतासे धारे हुए दो गग यह भेद जानते थे यह दोनों गण नारदजी की रक्षाके
आयेथे ॥३९॥ वह दोनों गण सनिको मढ हुभा जानकर उनके समीप गये, ओर परस्पर संभाषण करते नारदजीका परिहास करने ठगे ॥४०॥
देखो तो नारदजीका रूप साक्षात् विष्णके समान होरहा ३, ओौर खख वानरके समान वडा मयेकर है ।।४१॥ यह कामे मोहित इए थाह
नृपकन्याको चाहते है, इस भकार रके वाक्योसे उपहास करने रुगे ॥ ४२ ॥ कामसे ज्याकुङ होनेक कारण नारदजीने यथाथ॑लपते व्ह
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नहीं सुना ओर उस श्रीमतीको देखते हृए उसीके रूपमे मोहित होगये ॥ ४३ ॥ इसी अवसरमे वह अष्ट राजकन्था अन्तः परस च्ियं
साथ वर वरनेकी इच्छासे चटी ॥ ४४॥ वह् शुभलक्षण वाटी सौोनेकी माढा हाथमे धारणकर उस स्वर्यबरके मध्यमं साक्षात् ठक्ष्मीके समान ट
स्थित दै ।॥ ४५ ॥ वह सुव्रता माला हाथमे ठे प्षारी समामे मी, ओर वह त्रृपश्ुता अपने अनुरूप वर॒ खोजने ठगी ॥ ४६ ॥ | ट
व शरीर सुख वानरकासा पेस्ा खनिको देख वह बडी कृद्ध हई, ओर वहसे दृष्टि बचाकर फिर प्रसन्न भने चरी ॥ ४७॥ जब स्वयम्बरभे
अपने मनका अभिरषित नहीं पाया तब बढी व्याकुठ हुईं ओर सभाके"बीचमे खडी होग वह माढा किसीको न पहराईे ॥ ४८.॥ उसी ए
एतस्मिन्नतरे भूपकन्या चतः पुराच्सा ॥ श्लीभिस्समावृता तत्राजगाम वरवणिनी ॥४४॥ मालां हिरण्मयीं रम्यामादाय ञ्ुभ टर
लक्षणा ॥ त स्वयम्बरे रेज स्थिता मध्ये रमेव सा ॥ ४५ ॥ बाम सा सभां सर्वा मालामादाय सुजता॥ वरमन्वेषती तत्र |©
स्वात्माभीष्ट नृपात्मजा ॥ ४8 ॥ वानरास्यं विष्णुतन सुनि दक्षा चुकोप सा ॥ हटि निवार्य च ततः प्रस्थिता प्रीतमानसा |©
॥ 8७ ॥ न दृष्ठ स्ववरं तज अस्तासीन्मनसेप्सितम् ॥ अंतस्सभास्थिता कस्मित्तरपयामास न सनम् ॥ ४८ ॥ एतस्मिन्नतरे
विष्णराजगाम नृपाकृतिः ॥ न दृष्टः कैञ्चिद्परः केवलं सा ददश हि ॥ ४९ ॥ अथ सा ते समालोक्य भ्रसन्नवदनाभ्बुजा ॥ ठ
अर्पयामास तत्कण्ठे तां मालां वरवणिनी ॥ 4० ॥ तामादाय ततो विष्णू राजशूपधरः परुः ॥ अंतर्धानमगांत्सयस्स्वस्थानं ट
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प्रययो किल ॥५१ ॥ सवे राजङुमाराश्च निराशाः श्रीमतीम्प्रति ॥ घनिस्तु विहठरोऽतीव बभव दनातुरः॥५२॥ तदा ताबूच
तुस्सद्यो नारदं स्वरविहलम् ॥ विप्ररूपधरौ शद्रगणौ ज्ञानविशारदौ ॥ ५३ ॥
मय मनुष्यका रूप धारणकर `विष्णजी तहां आये, इनको राजकन्याके सिवाय कि्ीने नहीं देखा ।॥ ४९ ॥ भगवानुको देखते ही उसका
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छखंकमछ चि गया ओर उक्त वरवार्नीने वह माला विष्ण भगवानूके गख्मे डर दी | ५० ॥ राजदपधारी समथ विष्ण उस कन्याको ||९
। टेकर् तुरंत अन्तधौन् होकर अपने स्थानक चछे ॥ ५१ ॥ तव उस्न भीषतीके भरति सब राजकुमार निराश हो गय, ओर नारदजी कामातुर
होनेकं कारणं वड विहर हौ गये ॥५२॥ तब कामसे व्याकुल हए नारदजीतते बाह्णणहूपधारी ज्ञानविशारद वे दोनों गण बोडे ॥ ५३ ॥
गण बोरे हे नारदजी ! आप तो बृथा कामदेवे माहित हो रहे हो उसके ठेनेकी इच्छा करते हो पर अपना खख तो देखो जो वानरकं
॥ ९ ॥
समान गहत है ॥ ५४ ॥ सतनी बोछे इस भरकार दोनोंके वचन सुन नारदजी बडे विस्मित हए, ओर शिवकी मायासे मोहित होकर दर्पणम् ||;
अपना खल देखा ॥ ५५ ॥ वानरके समान अपना अख देखकर बडे कुद हृए, ओर मोहित हुए खनिने उन ग्णोको शाप दिया ॥ ५& ॥
जितत कारण कि तुमने सञ्च बाह्णका उपहास किया है इस प्रकार तुम ब्राह्मणक बीजसे उत्पन्न होकर भी राक्षस होगे ॥ ५७ ॥। £
ज्ञानि अष्ट शिवजीके गण इस प्रकारे शाप सुनकर खनिको मोहित हुआ जानकर कुछ भी न बोङे॥५८॥ ओर उदासीन हए शिवजीकी £
गणादूचतुः॥ हे नारदनेत्वं हि बरथामदनमोहितः॥ तद्धि्सुस्स्व्खं पश्य वानरस्ये व गरितम्॥५९॥ सूत उवाच ॥ इत्याकष्यं ¢
तयोवांक्यं नारदो रिस्मितोऽभवत्॥ खं ददर्शं चरे शिवमायाविमोहितः॥५९॥ स्वश्ुखं वानरस्येव दक्वा चुक्रोधसत्वरम्॥ शाप £
न्ददौ तयोस्तक्च गणयोमोहितोश्चनिः ॥५६॥ युवां ममोपहासं वै चक्रतुर्बाह्मणस्य हि ॥ भवेतां राक्षसौ विग्रवीयंजौ वे तदाकृती॥५७॥
त्वा हरगणावित्थं स्वशापं ज्ञानिसत्तमौ ॥ न किंचिद्चतुस्तौ दि युनिमज्ञाय मोहितस्॥५८॥ स्वस्थानं जग्मतुर्विप्रा उदासीनो ॑
शिवस्त॒तिम्॥ चकतु्मन्यमानौ वै शिवेच्छा सकलां सदा ॥५९॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसंहितायां प्रथमखंडे ||
सृ्टयुपाख्याने नारदमोहवर्णनं नाम तृती योऽष्यायः॥२॥ ऋषयञखुः॥ सुत सूत महापाज्ञवणिंताह्मदता कथा ॥ धन्या तु शांभवी ॥॥
माया तदधीनं चराचरम् ॥१॥ गतयोगैणयोश्शं भोस्स्वयमात्मेच्छया विभोः ॥ किं चकार ुनिःकृद्धो नारदःस्मरविहलः ॥ २ ॥
| करते हए अपने स्थानको गये ओर उन्होने यही भाना कि यहं सव कुछ शिदजीकी इच्छा है ॥ ५९ ॥ इति श्रीशिवम° द्वि° रद ||
भाषा टीकायां भ° छ ° नारद् मोहन वणेनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ ऋषि बोठे हे महापंडित सतजी ! आपने यह घुन्दर कथा कही ट
शिवजीकी माया धन्य है जिसके अधीन चर अचर है ॥ १ ॥ हे खतजी ! जब वह॒ शिवजीके गण अपनी ईच्छासते चरे गे तव कामत ¢
>)॥॥ च्याकूरु कद्ध. हुए नारदजीने स्या किया ॥ २, ॥
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सूतजी बोे मोहित हुए रनिराजने उनको यथोचित शाप देकर जलय अपना सख देखा शिवजीकी इच्छासे षन व्यार होगया ॥ ३ ॥ /
शिवकी इच्छासेही उनको उस समय बोध न रहा यही समन्ञे किं भगवान विष्णुने छलकिंया ओर पहाकोध करके विष्णके लोकको गये ॥ ४॥
ओर जठती हुईं अभिक समान कोधकर यह वचन बोटे उस सभय शिवकी इच्छसे नारदजी क ज्ञान न्ट होगया, इससे दुरुकितसे गावत उयंग बचन
बोडे ॥*५॥ न।रदजी बोडे हे विष्णजी ! आप मरहाकुरिर कपी संसारके मोहनेवारेहो, आप मायावी भलीन आशयवारे किीके उत्साहको नहीं
सूत उवाच ॥ विमोहितो खनित्वा तयोश्शापं यथोचितम् ॥ जरे खं निरीक्ष्याथ स्वरूपं गिरिशेच्छया ॥२॥ शिवेच्छया
न प्रबुद्धः स्मृत्वा हरिकृतच्छलम् ॥ कोच दुविंषहं कृत्वा विष्णुखोकंजगाम ह ॥४॥ उवाच वचनं ऊुद्स्समिद्ध इव पावकः ॥ दुक्
क्तिगभितं भ्यङ्क न्टज्ञानश्शवेच्छया ॥ ५ ॥ नारद उवाच ॥ है हरे त्वं महादुष्ठः कपटी विश्वमोहनः ॥ परोत्साहं न सहसे
मायावीमलिनाशयः ॥ & ॥ मोहिनीङूषमादाय कपरं कृतवान्पुरा ॥ असुरेभ्योऽपाययस्त्वं वाश्णीसभृतं न हि ॥७॥ चेति
बन्न विषं श्द्रोद्यां कृत्वा महेश्वरः ॥ भवेत्रष्टाऽखिखा माया तव व्याजरते हरे ॥ ८ ॥ गतिस्सकपटा तेऽतिभिया विष्णोषि
शेषतः ॥ साधुस्वभावो नभवान्स्वतंत्ः प्रथुणा कृतः ॥९॥ कृतं सञरचितत्नैव शिवेन परमात्मना ॥ तत्मभाववडं ध्यात्वा स्वतंअ्क
तिकारकः ॥१०॥ त्वद्रति सुसमाज्ञाय षश्चात्तापमवाप सः॥ विप्रं सर्वोपरिप्राह स्वोक्तवेदप्रमाणङृत् ॥ ११ ॥ तज्ज्ञात्वाहं इरे
त्वाद्य शिक्षयिष्यामि तद्ररात् ॥ यथा न कुर्याः इजरापीदशं क्य कदाचनं ॥ १२ ॥
सहते हो ॥६॥ पहर मोहिनीरप धारणकर तुमने कपट किया, असुरोको तुमने वारुणी पियायी अभृत नहीं दिया ॥७॥ यदि दया करके भहादेवजी
विषपान नही करते, तब हे व्याजरत नारायण ! आपकी सब माया नष्ट होजाती ॥८॥ हे विष्ठजी ! विशेषकर आपको कपटगति भियहै तुमसाधु
स्वभाव नहीं हो तुमको भभूने स्वतंत्र कियाहै ॥ ९ ॥ यह परमात्मा शिवने उचित नहीं किया, उनके पभ(व ओर बरुका ध्यान करके स्वतंत्र ति
करेवा भगवान ॥१०॥ आपकी गतिको जानकर बहुत पछताते है उन्होने अपने वेदै भमाणते बाहनणको सर्वोपरि कहा है ॥ ११ ॥ यह
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जानकर उनहीके वसते हे हरि! म आपको शिक्षा देता हं जिसे आगेको किर तुम रसा कम॑ न करो ॥ १२ ॥ अबतक भी तुम निभय
ह, कभी वैगवाठोते पाठा नहीं पडा ह हे विष्णो ! इस समय तुम अपने कर्मका फल पाओगे ॥ १२ ॥ इस प्रकार विष्णजीमे कहकर् ||
भायात मोहित हए नारदजी आप्रना ब्रहते दिखाते हृए॒दुःलीहो भगवानको शाप देने ठगे ॥ १७ ॥ हे विष्णो । ब्ीकै निमित तुमने ||
ुञ्को मोहित ओर व्याकुढ किया है, ओर जिस स्वपते तुमने मेरे साथ कपट किया है ॥ १५ ॥ उसी स्वूपमे तुम मनुष्य होकर दुख र
पओ जेस तुमने भेरा खख किया है, इस्त खसवाठेही तुम्हारी सहाय करगे ॥ १६ ॥ द्रोको दुःख देनेवाछे तुम ब्ीकै ेयोगका दुःख
१ अद्यापि निभेयस्त्वं हि संगं नापस्तरस्विना॥ इदानीं रप्स्यसे विष्णो फलं स्वकृतकमणः॥ १३॥ इत्युक्ता हरिं सोथ शुनि्माया ४
मोदितः ॥ शशापकोधनि्िणनहतेन ्रदशीयन्॥ 9७॥ जीते भया निष्णो मामका्षविमोडकः॥ अन्वकार्षसस्पेण ||
येन कापरयकार्यकृत् ॥१५॥ तद्रूपेण मनुष्यस्त्वं भव तहुःखथुग्धरे ॥ यन्सुखं कृतवान्मेत्वं ते भवंतु सहायिनः ॥१६॥ त्वं ट
स्रीषियोगजं दुःखं रभस्व परद्ःखदः॥ अवुष्यगतिकः प्रायो भवाज्ञानविभोहितः॥१७॥ इति शप्त्वा इरि मोहात्रारदोऽज्ञानमो ठै
हितः ॥ विष्णुज्ाह तं शा प्रशंसन्शाभवीमजाम् ॥१८॥ अथ शंयु्हालीलो निश्चकषं विमोहिनीम् ॥ स्वमायां मोहितो |<
ज्ञानी नारदोप्यभवद्यया ॥१९॥ अंतर्हितायां मायायां पूर्ववन्मतिमानभूत् ॥ नारदौ विस्मितमनाः प्राप्तबोधो निराङ्कछः॥२०॥ ||
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पश्ात्तापमवाप्याति निनिन्द स्वं खुहू्यहुः ॥ प्रशशंस तदा सायां शांभवी ज्ञानिमोहिनीम् ॥ २१ ॥ , 4. 1 ||६
पाओ, ओर अङ्ञानसे मोहित हो तुभको मालपी टीढा करनी पडेगी ॥ १७ ॥ इस प्रकार अज्ञाने मोहित हए नारदजी इस प्रकार भगवान ||©
|| को शापदे चप हृए, ओर विष्टजीने शिषकी माया एत्ताही करना चाहती है यह जानकर उस शापको स्वीकार किया ॥३८॥ तब ॒शिवजीनि
विश्वकी मोहनेवाछी अपनी माया सैचटी जिस मोहिनी माया ज्ञानी खनि नारदजी मोहित हो रहेथे ॥१९॥ज्योंही माया हटी कि नारदजी पूर्वके
%॥ समान मिमान हो गये ओर ज्ञान होनेसेबडे विस्मित तथा व्याकुकता रहित हो गये॥२०॥ बडा पठतावा करते हए वारंवार अपनी निंदाकरने छम भौर ||
| मोहनेवाटी शिवजीकी मायाकौ भरशेसा करने ठगे ॥ २१ ॥ तब गुनिने यह सव मायाका विभ्रम समञ्चकर वैष्णवोमे उत्तम सुनिजी .
विष्णभगवानके चरमं पड गये ॥ २२ ॥ जब भगवानने उढाया तव नारदजी बोे भँ बडा नष्ट दुभैति हं श्च बद्धे मोहिव होकर बहत ||
रे वचन कहे ॥ २३ ॥ हे नाथ ! आपको जो शाप दिया है उसको आप् मिथ्या कीजिये, मैने महापाप किया है इससे अवश्य मेँ नरकको ट |
जागा ॥२४॥ हे भगवन् ! भ कया उपाय करं आप वह ञ्चे आदेश कीजिये जिसे भेरे पाप नष्ट हज ओौर सज्ञे नरक न हो ॥२५॥ त
यहं कहकर ख॒निभ्रष्ठ फिर विष्णजीकै चरणोम गिरे, ओर सुमति भक्तिसे बडा पछतावा करने ठगे ॥ २६ ॥ तब विष्णभगवानू नारदजीको ।
अथ ज्ञात्वा सुनिस्सवैमायाविभरममात्मनः॥ अपतत्पादयोर्विश्णोरनारदो वैष्णवोत्तमः ॥२२॥ इय्यपस्थापितः प्राह वचनं नष
दुमेतिः ॥ मया दुरक्तयः प्रोक्ता मोरितेन कुडुद्धिना ॥ २३ ॥ दत्तश्शापोऽपि तेनाथ वितथ ङुङ् तं प्रभो ॥ महत्पापमका हि. 0
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इत्यक्ता स पुनरविष्णोः पादयोशैनिसत्तमः ॥ पपात सुमतिभक्त्या प्रशात्तापमुपागतः ॥२६॥ अथ विष्णुस्तसत्थाप्य बभाषे
सुतृतं बचः॥ विष्णुर्वाच ॥ न खेदं कुर मे भक्त वरस्त्वं नार संशयः ॥२७॥ “णु तात प्रवक्ष्यामि सहितं तव नि्धयात्॥
निरयस्ते न भविता शिवश्शं ते विधास्यति ॥ २८ ॥ यदकार्षीश्शिववचो वितथ मदमोहितः ॥ स दत्तवानीहशं ते फलं
छाऽखिरं जातं कुर्षित्थं निधितां मतिम् ॥ गर्वापहरतां स स्वामी शंकरः परमेश्वरः ॥ ३० ॥
ट| उगकर सत्यषाणी बोढे हे मेरे मक्त ! सेद मतकरो इसमे सन्देह नही कि तुम मेरे भक्तं ओर भेष ॥ २७ ॥ हे तात ! सुनो तुम्हारा
निश्वयते हितकर पाक्य कहता हूं तुमको नरक न होगा ओर शिवजी तुम्हारा कल्याण करेगे ॥ २८ ॥ जो कि तुमने मदक्े मोहित हो ट
शिवजीकै वचन उद्षन किये, इसीसे कर्मफठके देनेवाटे शिवजीने तुमको यह फठ दिथा है ॥ ३० ॥ शिवकी इच्छसेही यह सब ङृढ इभा ||
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यास्यामि निरयं धुवम् ॥२७॥ कुपायं हरे र्या दासोऽहं ते तमादिश ॥ येन पापङ्कलं नश्येत्निरयो न भवेन्मम ॥ २९ ॥ ९
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कमं फलप्रदः ॥ २९ ॥ शिवेर
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है रेसी निम मति रक्सो यही परमेश्वर शकर स्वामी गर्के हरनेवाछे है ॥ ३० ॥
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् | वह परह प्रभातमा सचिदानन्द बोधस्वरूप ह, निर्थण निर्विकार सत रज तमसे पर है ॥ ३१ ॥ वही अपनी मायाको स्वीकार करे व्रह्मा
विष्ण महेश तीनरूपतसे होते है वही निरयण सयण होते है ॥ ३२॥ निर्यणमे शिवरूप वही परमात्मा महेश्वर होता है, परब्रह्म अविनाशी
अनन्त महादेव उन्हीं को कहते है ॥ ३३ ॥ उनकी सेवा कंरनेके ल्यि जगत्का विधाता मुञ्चको किया है, ओर रुद्रहपते वह सब जगत्का
संहार करते हैँ ॥ ३४ ॥ वह साक्षी शिवस्वरूप नियुण मायामे भिन्न है वह स्वेच्छाचारी स्मान विहारी भक्तोके ऊपर अयुगरह करनेवाछे हैँ ट
प्रं अह्न परात्मा स सञ्चिदानंदबोधनः॥ निशैणा निविंकारो च रजस्सत्वतमःपर ॥ ३१ ॥ स एवमादाय मार्या स्वां धा
भवति शपतः ॥ ब्रह्मविष्णुमहेशात्मानिगणोऽनिथेणोऽपि सः ॥ ३२ ॥ निशणत्वे शिवाहौो हि परमात्मा महेश्वरः ॥ परं
ब्ह्माव्ययोऽनंतो महादेवेति गीयते ॥ ३३ ॥ तत्सेवया विधिस्स्र्टा पालको जगतामहम् ॥ स्वय सर्वस्य संहारी शग्रह्पेण
सर्वद! ॥ ३४.॥ साक्षी शिवस्वह्येण मायाभित्रस्स निशणः स्वेच्छाचारी संविहारी ॥ भक्तादुयह्कारकः ॥, ३५ ॥ शृणु त्व
नारद अने सदपायं सुखप्रदम् ॥ सवंपापापहरत्तारं युक्तिक्तिप्रदं सदा ॥ ३६ ॥ त्युका स्त्वसंशयं सर्वं शंकरसदययशः ॥
शतनामशिवस्तोजं सदानन्यमतिर्जप ॥ २७ ॥ यलपित्वा दरुतं सवं तव पापं विनश्यति ॥ इत्युक्ता नारदं विष्णुः एनः प्राह
दयान्वितः ॥ ३८ ॥ घुने न कुक् शोकं त्वं त्वया किंचित्कृतं नदि ॥ स्वेच्छया कृतवान्शंुरिदं सवं न संशयः ॥ ३९॥
॥ ३५ ॥ हे नारदजी ! तुम घुसदाई ग्ेष्ठउपायको सुनो, जो सव पापका हरनेवाडा भुक्ति खक्तिका देनेवाला है ॥ ३६ ॥ सम्पूणं सन्देहको
त्यागन करके शिवजीका श्रेष्ठ यश गान करो, ओर अनन्यमतिसे शिवजीकै शतनाम स्तोको सदा जपो ॥ ३७ ॥ जिसके जपनेसे शीघही
तुम्हारे सब पाप् नष्ट होजार्येगे, नारदजीसे यह कहकर फिरभी दया करकै विष्णजी बोडे ॥ ३८ ॥ हे खनिराज ! तुम शोकं मत कंरो तुमने ६
कुड नहीं किया ३, इसमे सन्देह नहीं यहं सव शिषवजीने अपनी इच्छसे किया है ॥ ३९ ॥
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| | काम श मदे उन्होने तुम्हारी मति हरणी; ओर उन्हीं महेश्वरने तुम्हारे खखमे सञ्च शाप दिल्वाया ॥४०॥ इस प्रकार ठोकमे
६ यह अपना चरित प्रगट किया, वह मृत्युनय काठ्कै काठ भक्तोके उद्धार करनेवाठे है ॥ ४१ ॥ शिवके समान कोई सुखदायक भ्रियस्वामी
४ भेरा नहीं है, वही परमेश्वर सु सच शक्तिके देनेवाठे है ॥ ४२ ॥ हे खने 1 उन्हीकी उपासना करो उन्हीका सदा भजन करो उनका यश
सुनो ओर गावो ओर उन्हीका नित्य अचेन करो ॥ ४२ ॥ जो मन वचन कर्मे शकरके यशको प्राप्त होता है, वही १डित ओर जीवन्छुक्त
¢ कहाता है ॥ ४४ ॥ शिवनामकी दावाभिते महापातकरूपी पूर्वत अनायास भस्म होजाते हँ यह बात सत्य है २ इसमे सन्देह नहीं ॥ ४५ ॥
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अहार्षित्वन्मति दिष्यां काम छ्ेशमदारस ते॥ त्वन्पुखादापयां चके शापं मे स महेश्वरः ॥४०॥ इत्थं स्वचरितं लोके परकरीकृत |
वान् स्वयम् ॥ मृत्युंजयः कालकालो भक्तोद्ारपशयणः॥९१॥ न मे शिवसमानोस्ति परियः स्वामी सखप्रदः ॥ सर्वशक्तिपदो ॥९'
मेऽस्ति स एव् परमेश्वरः ॥ ४२॥ तस्योषास्थां रु षने तमेव सततं भज ॥ तशः शृण गाय त्वं डर् नित्ये तद्च॑नम् ॥४३॥ ||
कायेन मनसा वाचा यश्शंकरसुपेति भो ॥ स पण्डित इति ज्ञेयस्स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४७॥ शिवेति नामदावाममंहापातकष ट
चताः ॥ भरमीभवन्त्यनायासातसतयं सत्यं न संशय॥४९॥ पापमूलानि दुःखानि विविधान्यपितान्यत्ः॥ रिवराचैनैकनश्यानि ||
नान्य नश्यानि स्वेथा ॥४६॥ स॒ बेदिकस्स पुण्यात्मा स॒ घन्यस्प बुधो यने ॥ यस्सदा कायवाकिवततैश्शरणं याति शंकरम् &
ह|| ॥ ४७ ॥ भरेति विविधा धमौ येषां सदयःफरोन्मुखाः॥ तेषां भवति विश्वासच्ि ुरांतकपूजने ॥७८॥ पातकानि विनश्यंति ©
, यावेति शिवप्ूजया ॥ भुवि ताव॑ति पापानि न संत्येव महामुने ॥ ४९ ॥ (
५ पापमूटवाठे दुःख अनेक भकारके है पर वे शिवकीही पूजति न्ट होते है कोई दूरा उपाय नहीं है ॥ ४६ ॥ हे सने ! वही दिक बही 6 |
ण्यात्मा वही पंडित वही धन्य है जो सदा मन वचन करसे शिवजीकी शरणमे जाता है ॥ ४७ ॥ यपि अनेक धर्म है पर उनमें शीघही
4 फठ्का देनेवाढा धमं शिवका पूजन है जो रेता जानते है वह शिका पूजन कशत है ओर शकरके पूजने उनका विश्वास होता है ॥ ४८ ॥ ८
^॥ शिवके भूजनसे सबही पाप न्ट होजति है हे महाखने ! इतने तो प्थिवीपर पाप है नहीं जितने शिवपूजनसते नश होजाते ह ॥ ४९ ॥ '
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शिण्पु |
॥१२।
हे खने ! बहमहत्या आदि सहसो पाप क स्मरणते नष्ट होजति है यह मँ सत्य २ ही कहता हू ॥ ५० ॥ जो शिवनामक।
नौकाको पराप्त होकर रारो ४: हात त उनके पाप अवश्य नष्ट होजाते है ॥ ५१ ॥ हं खनं ! ससारकं मूलभूत पातकका
शिबनामके कुटारसे अवश्यही नाश होजाता है ॥५२॥ पप्पी दावानल घबराये हृ ओंको शिवनामहूप अगरृतपान करना चाहिये, पाप्हपी
दावाभ्िसे तप्त हुओंको इसके विना शांति नही होती ॥ ५३ ॥ शिवनामहपी अपृतकी वरषीधारासे गीठे होकर संस्ारखूपी अभ्रम पडे हए
शोच नही करते है इसमे सन्देह नहीं ॥५४॥ रागदेषमे भीति करनेवालोकी शकर चरणो भक्ति नहीं होती, ओर उस द्वेषादि रहती
ब्ह्महत्यादिषापानां राशयोप्यमिता मुने ॥ शिवस्प्रत्या विनश्यति सत्य सत्य वदाम्यदम्॥९० ॥ शिवनामतरीं प्राप्य संसारान्धि
तरंति ते॥ संसारमूरषापानि तस्य नश्यंत्यसंशयम्॥ ९ १॥संसारमूलभूतनां पातकानां महाञ्॒ने॥ शिवनामकुठारेण विनाङ्ञोजायते
रुवम् ॥ ५२ ॥ शिवनामामृतं पेयं पापदावानलारदितेः ॥ पापदा वाभितपतानां शांतिस्तेन विना न हि ॥ ५३ ॥ शिवेति नामपी
यूषवर्पधारापरिष्डुतः ॥ संघ(रदवमध्येपि न शोचति न संशयः॥५७॥ न मक्तिश्शंकरे पसा राग्द्वेषरतात्मनाम् ॥ तद्विघानां
हि सदसा य॒क्ति्भवति सर्वथा ॥ ९९ ॥ अनंतजन्मभिर्येन तवस्तप्तंभविष्यति॥ तस्येवभक्तिर्भवतिभवानीप्राणवहभे ॥ ५8 ॥
जातापिशंकरे मक्तिरन्यसाधारणी बृथा॥परत्वव्यभिचारेणशिषभक्तिश्पेक्षिता॥९.७॥ यस्यासाधारणीशंभौ सक्तिरव्यभिचारिणी॥
तस्येवमोक्षस्सुरुभोनास्येतिन्य मतिर्मम ॥५९८॥ छृत्वाप्यनंतपापानियदि भक्तिं हैश्वरे॥ सवैपापविनिशवक्तोभवत्येवन संशयः
॥५९॥ वंति मस्मसाद्वक्षादवदग्धा यथावने॥तथामवंतिदग्धानि शांकराणामघान्यपि ॥ ६० ॥
| मुक्ति होती है ॥ ५५ ॥ जिसने अनन्तजन्मतकं तपस्या की होगी उसीकी भक्ति भवानीपतिभ होती है ॥ ५६ ॥ यदि |
अन्यस्षाधारणी भक्ति हो तो वह वृथा है, शिवम अव्यभिचारिणी भक्ति होनी चाहिये ॥५७॥ जिक्की शिवजीमे अनन्य साधारणी अव्यमि
चारिणी भक्ति है उसीको मोक्ष सुभ हि, ओरको नहीं रसा मेरा मत है ॥५८॥ अनन्त पाप करकै भी यदि शंकरम प्रीति हो तो निःसन्देह उसके
सब पाप दूर होजाते ह इसमे संदेह नहीं ॥५९॥ जेसे वनम दावाभिसे वृक्ष भस्म होजाते है इसी प्रकार शंकरके नामे पाप दग्ध होजाते ह ॥& ०॥
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| नित्य मस्म ठगानेसे पवित्रंग हुआ शिवपूजनमें रत होता है, वह अतिदारूण सार सागरके पार होजातां है ॥ ६१ ॥ बाह्मणका | |
| हरणकर् तथा अनेक ब्राहमणोको मारकर भी शंकरका सेवक पापों से छित नहीं होता ॥ ६२ ॥ सव बेदोंको देखकर शिवका पूजनही
ह| ससारभयका छृानेवाठा है यह पूवषपोने निश्वय किया है ॥ ६२ ॥ आजसे ठेकर यत्नपुक , यथािधै भक्तिसे साम्बसदाशिव
¢ नित्य भजन करो ॥ ६४ ॥ चरणेति छेकर मस्तकतक भस्म लगाकर सब वेदो भसिद्ध '“ ॐ नमः शिवाय › शिवके इस षडक्षर मंचका फे
श जप करो ॥६५॥ ओर शिवके भ्रिय रुदक्षोको सर्वागे यतनपर्वक धारण करो यह भक्ति ओौर भसे धारण करने चाहिये ॥ ६६ ॥ यहां
£ योनित्येभस्मपूतांगोिव॒धूजोन्ुखो भवेत् ॥स तरत्येव संसारमपारम॒तिदारुणम् ॥६१॥ ब्रह्मस्वहरणं कत्वा दत्वापि आह्मणान्व
||| दुनू ॥ चिप्यते नरः पपिविंशपाक्षस्य सेवकः ॥ ६२ ॥ विलोक्य वेदानखिटाज्छिवस्येवाचैनम्परम् ॥ संसारनाशनोपाय इति
भ
ूरवैविनिितम् ॥६२॥ अदयप्रभृति यत्नेन सावधानो यथाविधि॥ साम्बं खदाशिवं भक्त्या भज नित्यं महेश्वरम्॥&४॥ आपाद
मस्त सम्यक् भरमनोकूस्य साद्रम्॥सवेतिशतं शवम्मजजप षडक्षरम् ॥६५॥स्ाद्गख भयत्नेन शदराक्षाञ्छिववछभान्॥
घारयस्वातिसद्भक्त्या समन्ञम्विधिपूर्वकम्॥६६॥ शृणु शैवीं कथां नित्य वद् शेवीं कथां सदा ॥पूजयस्वातियत्नेन शिवभक्ता
नधुनः पुनः ॥&७॥ अप्रमदेन सततं शिवैकशरणो भव ॥ शिवार्चनेन सततमानन्दः पराप्यते यतः ॥द८५उरस्याधाय विशदे
शिवस्य चरणाम्बुजौ ॥ शिवतीथनि विचर प्रथमं युनिसत्तम ॥६९॥ पश्यन्याहारम्यमतुरु शंकरस्य परात्मनः ॥ गच्छानन्दवनं
प््ाच्छयुभ्रियतमं घुने॥७०॥ तच पिश्ेनवरंदष्ठा पूजनं कर् भक्तितः ॥ नत्वा स्तुत्वा विशेषेण निधिकल्पो भतिष्यसि॥७१॥
शेवी कथा सुनो ओर जपो ओर वारंवार शिवमकतोका परमपरवक यत्नसे पूजन करो ॥ ६७ ॥ ओर अभभादस्े नित्य एक शिवकोही शरणमे
§ हौ कारण कि शिवाचेनतेही नित्य आनन्दकी प्राप्ति होतीह ॥६८॥ शिषजीके चरणकमर अपने हदये धारण करके ह मुनिसत्तम शिवे जीकै
| ती्थमिं विचरण करो ॥ ६५ ॥ ओौर परमात्मा शंकरके निर्मरमाहारम्यको देखते इए हे मुने शिवजीके आनन्दवनमे जाओ ॥ ७० ॥ वहां
?॥ विबरि्वरको देखकर भक्तिसे पजन करो, उनको विशेषरूपे नमस्कार ओर भक्तिकरके निविकल्प होजाओगे ॥ ७१ ॥
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शि" | | ह भने फिर भप चाहं जहां गमन करना ओर फिर भरे शानत मक्तिपूर्क बहढोकमे जाना ॥ ७२ ॥ ह मुने अपने स्वामीकी विशेषरूपसे
॥१३॥ |© भक्ति ओर नमस्कार करनेसे बडी प्रीतिस्ते जहां तहां शिवजीका माहात्म्य अनेक भरकारसे पुना चादिये ॥ ७३. ॥ वह शिवजीकै
|| भक्तो श्रेष्ठ ब्लाजी तुमको शकरका माहात्म्य सुनाभ, ओर भरीतिसे शकरके शतनारमोका स्तोचमी करेगे ॥ ७४ ॥ हे मने ! आजसे तुम
टै शिवके भक्त शब होजाओ, शिषजी तुम्हारा कल्याण कैग, ओर हुम विशेषरूपसे मुक्तके भागी होगे ॥७५॥ इस भकार भरसन्नात्मा विष्यजी
| ततश्च भवता वनं विधेयं गमनं घन ॥ ब्रह्मलोके स्वकामाय शासनान्मम भक्तितः ॥ ७२॥ नत्वा स्तुत्वा विशेषेण विधि
स्वजनकं सने॥ प्न्य शिवमाहात्म्यं बहुशः पीतचेतसा॥७३॥स शेवप्रवरो बह्मा माहात्म्यं शंकरस्य ते॥ श्रावयिष्यति स्रीत्या
¢ शतनामस्तवं च दि ॥७४॥अतसतवं भव शने शेवश्शिवपरायणः ॥ ुक्तिभागी विषेण शिवस्ते शविधास्यति ॥७५॥ इत्य
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विष्णि प्रीत्या ह्पदिश्य भसन्नधीः॥ स्मृत्वा ऊत्वा शिवं स्तुत्वा ततस्त्वंतरधीयत॥७६॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां
श्दरसंहितायां प्रथमखंडे शृष्टडषाख्याने नारदस्य विष्णुषदेशवर्णनो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४। सूत उवाच् ॥अंतर्िते हरौ विरा
नारदो मुनिसत्तमः ॥ विचचार महीं पश्यञ्छिविरुगानि भक्तितः ॥ १ ॥ प्रथिभ्या अटनं कृत्वा शिवरूपाण्यनेकशुः ॥
ददश प्रीतितो विप्रा युक्तिषुक्तिपरदानि सः ॥ २॥ अथ तं विचरतं कौ नारदं दिव्यदशेनम् ॥ ज्ञात्वा शंुगणौ तौ तु
सुचित्तमुपजग्मतुः ॥ ३ ॥ शिरसा सुप्रणम्याज्चु गणाब्रूचतुरादरात् ॥ गृहीत्वा चरणौ तस्य शापोद्ारेच्छया चेतौ ॥ ® ॥
मुनिको उपदेश देकर शिवकी स्तुति ओर स्मरण कर अन्तघौन होगये ॥ ७६ ॥ इति शरीशिवम ° रद्र ° भाषारीकारयां भ० रु° विष्णुपदेशवरणनं
अ० ५ || || नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ सूतज बोखे हे नाहमणो ! जव विष्णजी अन्तर्थीन होगये तब मुनिभेष्ठ नारदजी भक्तिसे शिव्िंगोंका दशेन करते हूए
पृथिवीम विचरण करने कगे ॥ १। पृथिवीम विचरण करतेहुए अनेक भुक्तिमुक्छि देनेवारे शिवरिरगोका परमते दशेन किया ॥२॥ जब इस्त भकारसे
दिव्यदशन नारदजी पृथिवीम विचरन कगे तब शुदरगरणोने उनको शांत जानकर उनके समीप गमन किया ॥३॥ ओर शिरसे भ्रणामकर आदरसे बह
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गण बोरे ओौर चरण पक्डकर शापोद्धारको इच्छा की ॥ ४ ॥ शिवगण बोठे हे बहम ! नारदजी भ्रमसे हमारा वचन सुनो, |
अपराध कंरनेवाके बास्तवमे हम दोनों बाह्मण नही हँ ॥ ५॥ हे सने ! आपके अपराधी हम दोनों शिवजीके गण ह, राजयतरीके स्वयंवरे
मायासे मोहित चित्त होकर ॥ & ॥ प्रेशकी पररणासे आपने हमको शाप दिया, कुस्चमय जानकर उस सरमय हमने मौन रहनाही उत्तम जाना
॥ ७ ॥ हमने अपने करमका फर पाया इसमे किसीका दोष नहीं हे हे विभो ! अब प्रसन्न होकर हमारे उप्र अनुध्रह करो ॥ ८ ॥ सतजी
बोले इस भकार भक्तिसे भरे आद्रपुव॑क उन गणोके वचन सुन पछतावा करते हए खनि ग्रेमसे उनसे बोटे ॥ ९ ॥ नारदजी बोठे सत्परुषोभं
त
गिवगणावृचतुः ॥ ब्रहमपुच सुरषं हि अण प्रीत्यावयोवचः ॥ तवापराधकर्तारावावां विप्रौ न वस्तुतः ५ ९ ॥ आवां हरगणौ
विप्र तवागस्कारिणौ भने ॥ स्वयम्बरे राजणुञ्या मायामोदितचेतसा ॥ & ॥ त्वया दत्तश्च नौ शापः परेशपरेरितेन इ॥ ज्ञात्वा
कुसमय तञ मौनमेव हि जीवनम् ॥७॥ स्वकर्मणः फलं प्रापतं कस्यापि न हि दृषणम् ॥ सुप्रसन्नो भव विभो इर्वलमदमयनौ
॥ € ॥ सूत उवाच ॥ वच आकण्यं गणयोरिति भत्तयुक्तमादरात् ॥ प्रत्युवाच सुनिः भीत्या पश्चात्तापमवाप्य सः ॥ ९ ॥
नारद् उवाच ॥ णतं मे महादेव गणौ मान्यतमौ सताम्॥वचनं सुखदं मोहनिर्थक्तं च यथार्थकम्॥१०॥पुरा मम मति्घा
सीच्छिविच्छावशात् धुवम् ॥ सवथा मोहमापत्रश्शपतवान्वां कुशेञचषिः ॥ 9१॥ यदुक्तं तत्तथा भावि तथापि शृणतां गणौ ॥
शापोद्धारमदं वच्मि क्षमेथा मघमदय मे ॥१२॥ वीर्यान्भुनिवरस्याप्तवा राक्षसेशत्वमादिशम् ॥ स्यातां विभवसंयुक्तौ बछिनो
प्रतापिनौ ॥ १३॥ सर्वब्रह्मांडराजानौ शिवभक्तौ जितेन्द्रिय ॥ शिवापरतनोर्भत्य॑भ्राप्य स्वं पदमाप्स्यथः ॥ १४ ॥
मानपाने योग्य महादेवजीकै गणो सुनो, भेरा सुखदायक वचन मोहे निक्त ओर यथार्थ है ॥ १० ॥ निश्वय शिवेच्छा ही परे मेरी भति ||.
भ्रष्ट होगे थी, सवथा मोहकै वशम होकर ही खज्ञ कुखुदधिने तुमको शाप दिया ॥११॥ जो छ कह दिया है वैसा तो होना ही है षर तुभ मेरे
वचन सुनो मेरा अपराध क्षमा करो मे तुम्हारे शापोद्धारका उपाय कहता हं ॥१२॥ तुम अ॒निराजके वीरे जन्म लेकर राक्षस होगे बडे रेश्वर्य
सयुक्त ओर प्रतापशाटी होगे ॥१३॥ स ब्रह्नाण्डके राजा शिवभक्त जितेन्द्रिय होये, शिवके दूरे शरीरसे ही सृत्युको भाप होकर अपने पदो
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शि | भप्त होंगे ॥ १४॥ सतजी बोठे महात्मा जीके इस प्रकारके वचन सुनकर दोनों शिवजीकै गण् भन्न हो अपने स्थानक 4 गये
॥१४॥ | ॥ १५॥ नारदजी भी प्रम प्रसन्न ल मने शिवजीका ध्यान करते हुए वारंवार शिव तीथाका दशन करते परथिवीमे विचरन
८ छ्गे ॥ १६ ॥ तथ वह मुनि ससे ऊपर शोभां विराजमान रिवकी भरिया शिवको छख देनेवारी शिव स्वहूपिणी काशीपरीमं भाग
होकर ॥ १७ ॥ वहां काशी नाथका द्रीन करके रतार्थं होगये प्रम प्रीति ओौर परम् आनन्दप्ते उनका पूजन किया ॥ १८ ॥ आनन्दे
काशीषरीका सेवन करते हए निभे कताभ होगये, भक्तिसे नप्र हो महिमा बेन करते ओर स्मरण करते प्रयसे विह्वल दौगये
सूत उवाच ॥ इत्याकण्यै शनेर्वाक्यं नारदस्य महात्मनः ॥ उभौ इरगणौ प्रतौ स्वं पदं जग्भतुशचदा ॥१५ ॥ नारदोऽपि परं
परीतो ध्यायच्छ्विमनन्यधीः ॥ विचचार महीं पश्यन्छिवितीर्थान्यभीक्ष्णशः ॥१६॥ काशीं प्राप्याथ स.यूनिः सवोंपरि विरा
जिताम् ॥ शिवप्रियां शथुखखपदां शम्भुस्वरूपिणीम् ॥ १७ ॥ दष्ठा काशीं कृताऽथित्काशीनाथ ददश इ ॥ आनच॑ परम
स्तुत्वा च विविधैस्तवैः ॥ पप्रच्छ शिवत्तत्वं शिवसं मक्तमानसः॥२ १।नारदं उवाच् ॥ब्ह्मनब्स्नस्वह्पज्ञ पितामह जगत्पभो ॥
त्वत्परसादान्मया सर्व विष्णोर्माहालम्यघुत्तमम् ॥२२॥भक्तिमागै ज्ञानमार्गे तपोमार्ग सुद्स्तरम् ॥ दानमार्गञ्च तीथौनां माम च
श्रतवाहनम् ॥ २३ ॥ न ज्ञातं शिवतच्ं च प्रूजातियिमतः कमात् ॥ चश्िं विविधं तस्यं निवेदय सम प्रभो ॥ २४॥
॥ १९ ॥ ओर शिवजीकै स्मरणसे निर्म भति होकर व॒ छोकको गये, वृह नारदजी विशेषरूपे शिवततव॒जाननेकी
इच्छासे ॥ २० ॥ भक्ति पूवकं ब्ह्ाजीको भरणाम ओर स्तुति करके शिवभे भन छ्गाये हुए नारदजी शिका त्व पृष्ठने ठे
॥ २१ ॥ नारदजी बोरे हे बहन् ब्रहके स्वरूप जाननेवाडे हे विभो ! सव जगतके पितामह आपके प्रसादे भेँने विभ्णजीका समस्त ||
माहारम्य ॥२२॥ भक्तिमाभं ज्ञानमार ओर दुस्तर तपोमागे दानमार्गं तथा तीर्थोका मागं भी यने सुना है ॥ २३ ॥ मने शिवतत्व ओर कमते ॥>
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|| ॥१९॥ ब्रह्मलोकं जगामाथ शिवस्म्रणसन्मतिः ॥ शिवतत्वं विशेषेण ज्ञातमिच्छंस्स नारदः॥२०॥ नत्वा तच विधि भक्त्या
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्ीत्या परमानन्दसंयुतः ॥१८॥ स शदः सेव्यतां काशीं कृतार्थो युनिसत्तमः ॥ नमन्सवणयन्भक्त्या संस्मरन्प्ेमविह्वरः ॥
। मागे अभी नहीं जाना है हे प्रभो ! उनके अनेक प्रकारके चरित्र मुञ्जे किये ॥ २४ ॥ हे तात ! वह निर्णषूष
किम भकारते हए है भ शिवकी मायसे मोहित हुआ शिवतत्च नहीं जानता हं ॥ २५ ॥ सृके पूर्वमे किस भ्रकार शंकर अपने स्वूपमे
अवस्थान करते हं, ओर वह प्रम सिके मध्यम कित कारसे कडा करते है ॥ २६ ॥ ओर अन्तमें किसभकारसे वह महेश्वर स्थिव होते है
छोककै कल्याणकतौ शकर् किंसभकारसे प्रसन्न होतेह ॥ २७ ॥ ओर वह महेश्वर संतृ्ट होकर अपने भक्त तथा दृसरोंको क्या फठ देते है
हे बरहलाजी । सो खङकते किये ॥ २८ ॥ हमने सुना है कि भगवान शीघ्रही प्रसन्न होजातेहै, वह दयाप्रायण भक्तके भरयास्को
नि्णोऽपि शिवस्तात सगणश्शंकरः कथम् ॥ शिवतत्त्वे न जानामि मोहितश्शिवमायया ॥ २९ ॥ सटः पूवं कथं शंथुस्स्व
रूपेण परतिष्ठितः ॥ सृष्टिमध्ये स हि कथं करीडन्संवतेते भूयुः ॥ २६॥ तदन्ते च कथं देवस्स तिष्ठति मदैश्वरः ॥ कथं श्रस
तां याति शंकरो लोकशंकरः ॥ २७ ॥ संतुष्टश्च स्वभक्तेभ्यः परेभ्यश्च महेश्वरः ॥ कि फलं यच्छति विषे तत्सर्वं कथयस्व
मे ॥ २८ ॥ सद्यः प्रसन्नो भेगवान्भवतीत्यचसं शतम् ॥ भक्तप्रयासं स महात् पश्यति दयापरः ॥ २९ ॥ बह्मा विष्णुर्महेशश
यो देवाश्शिवांशजाः ॥ मदेशस्तत पूर्णाशस्स्वयमेव शिवः परः ॥ ३० ॥ तस्याविभावमाख्याहि चरितानि विरोषतः ॥
उमाविभावमाख्याहितद्विवादं तथा विभो ॥ ३१ ॥ तद्राहस्थ्यं विशेषेण. तथा रीराः परा अपि॥एततस् तथान्यज्च कृथनी
त्वयानघ ॥ ३२ ॥ तदुत्पत्तिषिवादं च शिवायास्त॒विशेषतः ॥ परब्रूहिमेपजानाथ शुहजन्मतयैव च ॥ ३३ ॥ बहभ्यश्च
धतंपूर्वनवृप्तोऽस्मिजगत्परभो ॥ अतस््वांशरणंप्राप्तः कृपाङरुममोपरि ॥ ३९ ॥
नहीं देखतेहे ॥ २९ ॥ बरह्मा विष्णु महेश तीनों देवता शिवके अंगते प्रकट ` उननमे महेशही पृ्णीश ह ओर शिवही स्वयं परमत है
॥ २० ॥ उन शिवके आविभौव ओर चरित्र हमसे कहिये, उमाका आविभीव ओर उनका शकरकैे साथ विवाह किये
॥ ३१ ॥ विशेषकर उनका गृहस्थ तथा दृप्री ीढाभी कहिये, है पापरहित यह सब तथा ओर भी दूसरे चरित्र कहिये ॥ ३२ ॥ उनकी
उत्पत्ति ओर पार्वतीका विवाह विशेषरूपसे किये, हे भजानाथ ! ओर साथमे स्कन्दका जन्भ भी, कहिये ॥२३॥ ययपि भने प्रहरे बहत छ
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सब नष्ट होगया, जिस समय ध्रह नक्षत्र तारा खयं न होनेसे सब अधकारहप था ॥ £ ॥ चुद्रमा दिन रात अञ्चि वायु पृथिवी जल कुछ |
था, तथा प्रधान आकाश तथा दूसरा तेज भी नहीं था ॥ ५ ॥ शब्द् स्पशे तथा इष्ट पदाथ कुछ भी नहीं था, गंध हप रश दिशा आदि
सब अव्यक्तं ( अप्रगट ) था ॥ ६ ॥ इसप्रकार सचीभेयनिरंतर अंधकार वह सद्रह्ही था, जिसको सत् कहते ह ॥ ७ ॥ जब इस
भ्रकारसे सत् असदारमक कुछ नहीं था जिसको योगी अपने हृदयाकाशे निरंतर अवलोकन करते हैँ ॥ < ॥ जोमनवाणीकै अगोचर हँ
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सुना है पर हे पभो! मँ अभीतक स ई इससे आपकी शरणको भराप् हुआहं तुम मेरे ऊपर रूपा करो ॥ २३४ ॥ इत भकार अपने पुच्र
५ त सुन सम नवी इ ॥ ३५ ॥ इति भ्रीशिवम ° रुद्र ° भाषाटीकाया भरत नारदभ्वण॑नो ॥|
पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ बह्लाजी बोरे हे बहन् ! हे बुद्धिमान षठ ! ठुमने बहृत् अच्छी बात पी, त्म छोकोपकारीने लोकक हितकी
कामना यह पृछा है ॥ १ ॥ जिसको सुनकर टोकोके सब पाप क्षय होजाते है , बह भँ तुमको अनामय शवततव सुनाता हू ॥ > ॥
यथाथरूपसे तो भँ शिवतत्व नहीं जान सकता तथा विष्णजी परमअद्धतरूपको कुछ जानते है॥ ३ ॥ जब महाप्रर्यकार्मं स्थावर जगम्
इति त्वा वचस्तस्यनारदस्यांगजस्यदि ॥ उवाच वचनं तत्र ब्रह्मा लोकपितामहः ॥३८॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयाया
शदरसंहितायां प्रथमखंडे सृष्टपाख्याने नारदप्रश्नवर्णनो नाम पञ्चमोऽध्यायः॥५॥ ॥ब्रह्नोवाच॥ भो ब्रूह्न्साधु पृष्टाऽहं त्वया
विहुधसत्तम॥ लोकोषकारिणानित्यं लोकानां हितकाम्यया ॥ १॥ यच्छरत्वा सर्वलोकानां सर्वपापक्षयो भवेत्॥ तदत् प्रवक्ष्यामि
शिवतत्त्वमनामयम्॥२॥ शिवतत्वं मयानैव विष्णनापि यथार्थतः ॥ ज्ञातञ्च परम हषमद्भुतं च प्रेण न ॥३॥ महाभ्रल्यकाले
च नष्टे स्थावरजंगमे ॥ आसीत्तमोमयं सर्वमनर्कयहतारकम् ॥४॥ अचन्द्रमनहोराजमनसभ्यनिरभूजलम् ॥ अप्रधानं वियच्छरन्यम
न्यतेजोविवजितम् ॥५॥अदृष्त्वादिरहितं शब्दस्पशसशज्द्वितम् ॥ अब्यक्तगंघड्पं च रसत्यक्तमदिङ्मुखम् ॥६॥ इत्थं स॒त्यं
धतमसे सूचीभेबे निरंतरे ॥ तत्सद्रमनेति यच्छत्वा सदेकं प्रतिपद्यते ॥७॥ इतीहशं यदा नासीघत्तत्सदसदात्मकम् ॥ योगिनां
तरहिताकाशे यत्पश्यंति निरंतरम्॥८॥ अमनोगोचरम्वाचां विषयन्न कदाचन ॥ अनामहूषवण चन च स्थूलं न यत्करृशम्॥९॥
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| इन्द्ियका विषय नहीं है, जो नामरूप वणंसे रहित स्थूल तथा सक्षम नहीं है ॥९॥ हस्व दीर्घं ठषु गुरुत्वे जित है, जिसमे |
| अपचय नहीं है ॥१०॥ श्रुतिभी जिसको चकित होकर कहती है कि वह सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप अनंतस्वहप परानंद प्रमघरुष है॥११॥
भरभारहित आधारहिंत, विकाररहित ओर आकूतिरहित है, नियौण योगिगम्य सवं व्यापकं एकाकार है ॥१२॥ निर्विकल्प निरारभ मायारहित |
उपुद्रबरहित अद्वितीय आयन्त रहित विकाररहित चिदात्मक ॥१३॥ जिसके इस प्रकार सन्ना संज्ञोक्ति विकल्प करके होतेह उस्तको कितनेका
रमं दूरे की इच्छा हद ॥१४॥ तब उस अमूतेने इच्छसे. ही अपनी भूतिं कल्पत की, जो सब देश्व्यणोति युक्त सर्जञामयी शोभायमान है
अद्वस्वदीषेमलघु्त्वपरिवजितम् ॥ न यत्रोपचयः कथित्तथा नापचयोऽपि च॥१०॥ अभिधत्ते स चकितं यदस्तीति अतिः
पुनः ॥ सत्यं ज्ञानमनतं च परानदस्परम्महः ॥११।अप्रमेयमनाधारमविकारमनाकृति॥ निथणं योगिगम्यजञ्च सव॑ग्याप्येककां
रकम् ॥१२॥ निर्विकरप निरारभं निर्मायं निर्पद्रवम् ॥ अद्रितीयमनाद्यन्तमविकाशं चिदात्मकम् ॥ १३ ॥ यस्येत्थं संवि
कर्पते सन्ञासजञोक्तितः स्म वे ॥ कियता चैव कालेन द्वितीयेच्छाऽभवत्किक ॥ १४॥ अभूतेन स्वभूतिशच तेनाकरिप स्वी
छया ॥ सर्वेशरयगुणोपेता स्ैज्ञानमयी शभा ॥ १५॥ सवैगा सरवेहूपा च स्॑दकंसर्वकारिणी ॥ सवैकतया सर्वाधा सर्वदा
सवसंस्कृतिः॥ १६॥ परिकस्येति तां मूर्तिमेश्वरीं शुदधरूपिणीम् ॥ अद्धितीयमना्यतं सर्वाभासं चिदात्मकम् ॥ अंतर्दधे
पराख्य यद्रूल्न स्वेगमन्ययम् ॥ १७.॥ अमूत यत्पराख्यं वै तस्य मूरतिस्सदाशिवः ॥ अ्वाचीनाः पराचीना ईश्वरं तं जु
धाः ॥ १८ ॥ शक्तेस्तदेकलेनापि स्वैरं विहरता तजः ॥ स्वविथदहात्स्वयं सृष्टा स्वशरीरानपायथिनी ॥ १९॥ ¢
॥१५॥ जो सर्वगामिनी सवेरूपा, सबको देखनेवाटी सवकी करनेवाटी है, सबको एकही वंदनीया सबकी आया सर्वदा सबकी संस्कारकरने ||८
वाटी है ॥ १६ ॥ दस रे्व्सम्बधी शुद्धरूपवाटी भू्तिको कल्पना करके वह अद्धितीय अनादि अनंत स्वाभास चिदात्मा सर्वगामी अविनाशी ल
परारूय् ब्रहमअन्तधौन हो गये ॥ १७ ॥ जो अमूर्ति परतत्व है उसीकी भूतिं सदा शिव है यही अर्वाचीन पराधीन मूर्ति पंडित उस्षको इश्वर ©
कहते है ॥ १८ ॥ उसने अपने शरीसेही स्वच्छन्दशरीरवाटी अनपायिनी शक्ति षकट कौ ह ॥ १९ ॥
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् | वही भधानपकति यणवती प्रा माया ह बहीशवद्धितरवकी जननी है इसीको विकाररहित कहते है ॥ २० ॥ वही शाक्त अभ्बिकाप्रकति सबटोरकोकौ
इरी तीनों देवताओकी जननी नित्या ओर मूक कारण कही जाती है ॥२१॥ इस्तकी आढ भुजा है, यही विचित्र मुखवाटी शुभा है पूणमासीके
सहसचन्दके समान इतकी कांति है ॥२२॥ अनेक आभरण ओर अनक गतिर सयुक्त है अनेकं प्रकारके आयुध धारण किये फूटे कमलके समान
नेतरवाटी ॥२३॥ अचित्यतेजपे शृतं सबकी उत्पन्न करनेवारी वह एकाकिनी माया जव संहोगसे अनेक मकारकी होती है है ॥२४॥ तव परमपुर्ष
परधानं प्रकृति तां च माया शणवतीं पराम् ॥इद्धितत््वस्य जननीमाहृविंकृतिवजिताम् ॥२०॥ सा शक्तिरम्बिका प्रोक्त प्रकृति
स्सकरेश्वरी॥ धिरेवजननी नित्या मूलकारणमिच्युत ॥२१॥ अस्या अषौ भुजाञ्चासन्विचि्रवद्ना शुभा ॥राकाचन्द्रसदसस्य्
वदने भाशनित्यशः ॥२२॥ नानाभरणतयक्ता नानागतिसमन्विता ॥ नानायुधधरा देवी फुषटपकजलोचना ॥२३॥ अचित्यते
जसा यक्ता सर्वयोनिस्सघुदता॥एकाकिनी यदा माया संयोगाचाप्यनेकिका ॥२९॥पर' पुमानीश्वरस्स शिवश्शभुरनीश्वरः ॥
शीरपेमन्दाकिनीधारी मालचन्द्रशिलोचनः॥२९५॥ पंचवक्रः प्रसन्नात्मा दशबाइश्िश्चूरधृक॥ कपूरगौरसुसितो भस्मो द धूलितविम्रदः
॥२६॥ युगपच्च तया शक्तया साकं कालस्वद्पिणा ॥ शिवलोकाभिधं क्षेत्र निमितं तेन ब्रह्मणा ॥२७॥ तदेव काशिकैत्येतत्पर
च्यते क्षेजय॒त्तमम् ॥ परं निर्वाणसंख्यानं सर्वोपरि विराजितम् ॥२८॥ ताभ्यां च रमाणाभ्यां च तरिमिन्क्षेरे मनोरमे ॥ परमान
दहूपाभ्यां परमानन्दरूपिणी॥२९॥मुने प्रलयकाटेपि न ततक्षे कदाचन ॥ तिक्तं हि शिवाभ्यां यद्वित्तं ततो विदुः॥२०॥
ईश्वर शिवशंकर जिनका को ह्वर नहीं शिरपर गेगा धारण करनेवाठे माथेपर चन्द्र तीन नेत्र ॥२५॥ पांचमुख प्रसन्नात्मा दशभुजा
ह| कपूरगौरंग, भस्म शरीरम गाये हए ॥२६॥ भगवानने उत्त कारुरेपिणी शक्तिको ठेकर एकसाथही शिवलोकनामकक्त्र निमण किया ॥ २७ ॥
| उसी उत्तम क्ेत्रको काशीक्षेत्र कहते है, वह प्रम निर्वाणका देनेवाला सवके ऊपर विराजमान है ॥२८॥ उस कषेमे जो किं सवका मन रमानेवाढा है
|| उन परमानेदरूपिणी शिवा शिव द्वारा परमानंदूपिणी ॥२९॥ शक्तिके सहित निवास्न करते हे मुने! भरयकाठमे भी कमी वह त्र शिवा शिवे रहित
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। | | होता इससे वह क्षे अवियुक्त कहाता है ॥३०॥ शिवजीने पहठे इसमे एक आनंद नाम वन निर्माण किया था, कषे्र आनन्दका हेतु |
4 ॥ ओर पीछे अविखक्त कहाया ॥३१॥ शिवा शवक उस आनेद्बनमे रमण करनेपर हे नारदजी.! यह इच्छा हृदं कि कोई ।
॥ रुष् निमौण किया जाय ॥ ३२ ॥ जिसपर स्वच्छन्द विहार करनेवाटे हम यह महाभार अपण करके निर्वाण शान्तिक धारण कर कैवठ
|| काशोमे शयन करं ॥ ३३ ॥ वही सव करे ओर रक्षा करे जो हमारे अुहसे वह सब विषृत करे ॥ ३४ ॥ चित्तरपी सस॒द्रको भाकरुचन
¢ कर चितारूपी तरंगोसे दोलायमान स॒च्वहधपी रत्न तमोरूप अह रजो खणरूप विदधमसे विस्तारित ॥ ३५ ॥ जिसके भसरादसे हम सुखरूप आनंद
£ अस्य।नन्द्वन नाम पुराकारि पिनाकिना ॥ क्षेजस्यानद हेतुत्वादविभक्तमनतरम् ॥ ३१ ॥ अथानन्दवने तर्मिञ्च्छिवयो रम-
माणयोः ॥ इच्छेत्यभूत्सुरषं हि सज्यः कोप्यपरः किल ॥ ३२॥ यस्मिन्यस्य महामारमावां स्वस्थैरचारिणौ ॥ निर्वाणधारणं
कवेः केवरं क।शिशायिनौ ॥ ३३ ॥ स एव स्वं कुर्तां स॒ एव परिपातु च ॥ स एव संबृणोत्वं ते मद हतस्सदा ॥ ३९ ॥
चतस्घुदरमाकुच्य चिताकछोललोलितम् ॥ सस्वरतनं तमोग्राईं रजोविद्मवलितस् ॥ ३५ ॥ यस्य परसा दात्तिष्ठावस्सुखमानेद
कानने ॥ परिक्षिप्तमनोवृत्तो बदिश्चितातुरे सुखम् ॥ ३६ ॥ संप्रथाय्य॑ति स विथुस्तया शक्त्या प्रेश्वरः ॥ सष्ये व्याषार्याचक्रे
द शमरऽगेषुघासवम् ॥ २३७ ॥ ततः पुमानाविराषीदेकल्चैलोकयघुंदरः ॥ शातिस्सत्वशणोदिक्तोगांभीय्या मितसागरः ॥ ३८ ॥
तथा च क्षमया युक्तोधनेऽुन्धोपमोऽभवत् ॥ इन्द्रनीटयुतिः श्रीमान्पुडरीकोत्तमेक्षणः ॥ ३९ ॥ ¢
काननम विहार करं मनकी वृत्ति भी उसमे आरोपण कर बाहिरी चिन्ता छोड श न्तिको भाप हों ॥३६॥ वह रभु इस भकार निश्वय कर उस
पराशक्तिकै दशे अगमं सुधारूपी आसव सत्यभागसे व्यापार करते हए ।॥ २७ ॥ तब उसे चरिरोकीमे एक अति सुम्दर पुरूष भरगट हआ
¢ जो शात सृत्वणणते युक्त गभीरता सागरक समान था ॥ ३८ ॥ एृथिवीकै समान क्षमासे युक्तं हे सुने ! जिनी उपमा किते नहीं दे सकते,
दन्द्रनीठमणिके सुमान कान्तिमान उत्तम कमटठकै समान नेच ॥ ३९ ॥
३३
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| इवणेके समान कान्ति धारण करिये दो दुकरोसे आवत प्रचण्ड भुजाओसि शोभायमान जो दोनों भुजा कहीं पराजित होनेवारी न थीं ॥४०॥
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॥१७॥ ||| तब पहं रुष परमेश्वर शिवको भरणाम कर बोठे हे स्वामिन् ! भेरा नाम रखकर मेरे कमभी किये ५ ॥ ४१ ॥ ४ वचन नौ ध ठ
|| ष शंकर हते हए मेषके समान गेभीरवाणीसे बोठे ॥ ४२ ॥ शिवजी बोरे व्यापक होनेसे जगम तुम्हारा विष्ण नाम होगा ( &
् भी भक्तोके सुख करनेषाठे तुम्हारे बहृतसे नाम है ॥ ४३ तुम ॒दृढतापूरवक परमकायं साधक तपस्या कंरो यह. कहकर शंकर अ ४
स॒वर्णकृतिभचेषठदुङूल्युगलाव्रतः ॥ लसत्परचंडदोरदण्डयुगरोह्यपराजितः ॥ ४० ॥ ततस्सपुर्षरशथु, भरणम्य परमेश्वरम् \
नामानि कुरु मे स्वामिन्वद कमं जगाविति ॥ ४१ ॥ तच्छुत्वा वचनम्प्राह शंकरः प्रहसन्परञुः ॥ पुरूष त महेशानो वाचा ¢
मेषगभीरया ॥४२॥ शिव उवाच ॥ विष्ण्वितिष्यापकत्वात्ते नाम ख्यातं मविष्यति ॥ बहून्यन्यानि नामानि भक्तसौख्यकराणि ||
¢ ह ॥ ४३ ॥ तपः कुरू ददो भूत्वा परमं कार्यसाधनम् ॥ इत्युक्वा श्वासमार्गेण ददौ च निगमं ततः ॥ ७४ ॥ ततोऽच्युत- ¢
श्शिवं नत्वा चकार विपुलं तपः ॥ अंतर्द्धानं गतश्शक्न्या सरोकः परमेश्वरः ॥ ५५ ॥ दिव्यं द्वादशसाहस्रं वष तप्त्वापि ||
ए चाच्युतः ॥ न भाप स्वाभिरषितं सर्वदं शंथुदर्शनम् ॥ ४६ ॥ तत्तत्संशयमापन्नश्वितितं डदि सादरम् ॥ मयाद्य कि प्रकत्त- ||८
|| व्यमिति विष्णश्शिवं स्मरन् ॥ ४७॥ एतस्मि वाणी सुतपा शिवाच्छुमा ॥ तपः पुनः प्रकतम्यं संशयस्या-
९ पनुत्तये ॥ ४८ ॥ ततस्तेन च तच्छत्वा तपस्तप्तं सुदाङूणम् ॥ बहुकालं तदा ब्रह्मध्यानमार्गपरेण हि ॥ 9९ ॥ ¢
¢ शवा्षमागसे उनको वेदरदान किये ॥ ४४ ॥ तब अच्युतने शिवको नमस्कार कर बडा तप किया, ओर शक्ति सहित परमेश्वर अन्तर्धानं ¢
६ || |हो अपने छोकमे गये ॥ ४५॥ इधर विष्णजीने दादश सहल्ञ दिव्य्षेतक तपस्या कौ परन्तु अपना अभिक्षिति कल्याणकारी
ह| करका दैन नही पाया ॥ ४६ ॥ ठब सन्देहको भाष हो मनम चिन्ता करने रगे भ अन कया करं इस भकार शिवजीका स्मरण कते ||
॥ हए ॥ ४७ \ उसी अवसरं शिवजीसे सुन्दर वाणी प्रकट हदं कि सेशयके दूर करनेके निभित्त फिर तपस्या करो ॥ ४< ॥ विष्णजीने यह|/2
रु.स.
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| फिर भी दारुण तप किया, जव वहत समय बीत गया तव बह्म ध्यानमागकै द्वारा विदित हूए ॥ ४९ ॥ तब परुष रिष्णजी |
मार्गम जागे ओर प्रसतन्नतसे विस्मयको भराप् हो बोठे छि यह क्या महान् तत्त है ॥ ५० ॥ तब विष्जीके प्रिभरम करनेसे उनके शरीरस
शिवी मायामे जठधाराये निकलने ठगी ॥ ५१ ॥ हे महा्ने ! वह सब महान् जरु शूल्यमे व्याप्त हो गया, वह जल बह्रूप हुआ जिसके
स्पमात्रसे पाप नाश होते ह ॥ ५२ ॥ तब वह विष्ण॒जी शांत होकर उसी जटमें विमोहित हो बहुतकाट्तक शयन करते रहे ॥ ५३ ॥ उक्ष
६ ततस्सपुरषो विष्णुः प्रबुद्धोः ध्यानमागंतः ॥ सुप्रीतो विध्य प्रातः कफं यत्तव महा इति ॥९4०॥ परिश्रमवतस्तस्य विष्णोः
६|| स्वद्भेभ्यएव च ॥ जलधारा हि संयाता विविधाश्शिवमायया ॥ ५.१ ॥ अभिभ्याप्ते च सकलं श्चन्यं यत्तन्महा्ने ॥ बह्मह्पं
&| जलमभूत्स्पशनातपापनाशनम् ॥ ५२ ॥ तदा श्रातश्च पुरूषो विष्णुस्तस्मिभे स्वयम् ॥ सुष्वाप प्रम प्रीतो बहकालं विमो-
| हितः ॥ ५३ ॥ नारायणेति नामापि तस्यसीच्छृतिसंमतम् ॥ नान्यत्किचित्तदा द्यासीत्प्राृतं पुरूपं विना ॥५४॥ एतस्मि-
|
न्तरे काठे तत्त्वान्यासन्महात्मनः । तत्प्रकारं शृण प्राज्ञ गदतो मे महामते ॥ ॥५५॥ पकृतेश्च महानासीन्महतशच यणा
यः ।॥ अर्हकारस्ततो जातच्चिविधो शणमेदतः ॥ ५६ ॥ तन्मा्राश्च ततो जातिः पञभरतानि बै ततः ॥ तदेव तानीन्द्रियाणि
ज्ञानकर्ममयानि च ॥ ५७॥ तत्त्वानामिति संख्यानसुक्तं ते ऋषिसत्तम ॥ जडात्पकञ्च तत्सव प्रकृतेः पुरुषं विना ॥ ५८ ॥
समय उनक्। शुतिसषम्मत नाम नारायण हुआ उस सपय भ्रति पुरुषके बिना ओर कुछ नहीं था ॥ ५४ ॥ उती समयं उन महात्मास्े तत्व
भगट हए हे मह मते ! हे महा पंडित | मे उसका प्रकार कहता हं सो आप स॒ञ्षते सुनिये ॥५५॥ प्रति महान ओौर अहानतते तीन यण हुए
उत्से अहंकार ओर उषसे शणमेदसे तीन गुण ९ ॥५६॥ उसे तन्मात्रा ओर उनसे पांभूत भगट हए उनते ज्ञानेन्द्रिय ओर कमेन्दिय उतपन्न
हुईं ॥ ५७ ॥ हे ऋषिसत्तम ! आप्ते तसवोका वणेन ज्ञान पू्ही कहा है रतिका यह सव जडात्मक कार्यं परुषको छोडकर जानना ॥५८॥
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शिण वह चोवीस ंख्यावाठे तत्व शिवकी इच्छात हण करके बह्रूपजलमे शयन कर गये ॥*५९॥ इति श्रीशिव. रुद्रसे. भाषारीकाया भ. घ ।
॥१८॥||¢ वणेनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ बह्माजो बोटे नारायण देवके शयन कर जानेसे सहश उनक नाभिसे एकं बडा कङ् गट दज ॥१ जस्षकी नाट
¢ अनत थी, जो कर्णिकार के समान कांति महान अनन्त योजन विस्तार ओर अन॑त योजनतक ऊंचा था ॥२॥ कोरि सयक समान कातिमान् सुन्दर
©
5 त्वोत युक्त अत्यन्त अद्भत महामनोहर ओर महादशनीय था ॥ ३ ॥ उन शंकर प्रमेश्वरन पूववत् यत्नकरकै दक्षिण अंगसे सश्च उन साम्ब शंभुन प्रगट
| तत्तदैकीकृतं तच्च चतुर्विशतिसंस्यकम् ॥ शिवेच्छया रदीत्वा स सुष्वाप ब्र्महपके॥९९॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शद ||&
संहिताया घष्टव्याख्याने प्रथमखंडे विष्णूत्पत्तिवरणनो नाम बष्ठोऽध्यायः ॥६०॥ ब्नोवाच ॥ सतते नारायणे देवे नाभौ पकज टै
| सत्तमम् ॥ आिेभरव् सहसा बद शंकरेच्छया॥१॥ अनतयष्िकायुकतं काणिकारसमग्रभम्॥ अनेतयोजनायाममनंतच्छायकष है
|| यतम् ॥२॥ कोरिघूर्प्रतीकाशं सद्र तत्त्वसंयुतम् ॥ अत्यद्धतं महारम्यं द्शृनीयमलुत्तमम् ॥२॥ कत्वा यत्नं पूर्ववत्स शंकरः ||
८ परमेश्वरः ॥ दक्षि्णागात्रिजान्मां वे साम्बश्शंशुरजीजनत्॥९॥ स मायामोहितं कृत्वा मां महेशो दुतं षने ॥ तन्नामिंकजाद-
विरभावयामास टीखया॥५॥ एवम्पद्यात्ततोजज्ञे पुमोऽदं देमगर्भकः॥ चतुथुखो रक्तवणक्चिपुंडांकितमस्तकः॥६॥ तन्मायामोहित-
9 पु्रोऽहयुतप्ः केनैव निमितोऽधुना ॥८॥ इति संशयमापत्ने इध्म समपद्यत ॥ किमर्थं मोहमायामि तज्ज्ञानं सुकरं खल ॥९॥ |
९५|| किया ॥४॥ हे सते ! वह मश सुचको शोही मायात मोहित कर रोखाते उत नाभिपंकजते भकट करते हुए ॥५॥ हे नारदजी । इस | ।
¢ म हिरण्यगभे उस कमरे भरगट हुआ चार सख रक्त वणं त्रिषदूसे शोभायमान मस्तक ॥ ६ ॥ उनकी मायासे मोहित होकर कमस्के बिना
क
भने ओर कुछ न् जाना हे तात ! भन ज्ञान हीन होनेकै कारण अपने देहके उत्पन्न करनेवाछेको न जाना ॥ ७ ॥ मँ कौन कहांसे आया ह &
भे क्या कप्य है म किसका षुत किंस निमित्त नि्भित हआ हूं यह कुछ न जाना ॥<८॥ तब यह शका करते हए स्ने बुद्धि करी भँ मोहको
रं नाविदं कमलं षिना ॥ स्वदेहजनकं तात पितरं ज्ञानदुबैरः ॥७॥ को वा इत आयातः किं कायं तु मदीयकम् ॥ कंस्य
रु.स.२
अ० ७
क्यों भ्राप् टू, इसका ज्ञान तो सुखम है ॥९॥ इस कमल पत्रक निचे मागको पकडकर नीचै २ चलाजाऊं वहां इसका कत अवश्य भात
इसमे सदेह नहीं ॥३०॥ रेसी बुद्धि कर मँ कमठे नीचे उतरा, हे अने ! षो वषैतक उसकी नाभि पकडे २ नीचेको चटा गया ॥ ११॥ ॥ परन्तु
मञ्चे उस्र कमठनाखका अन्त न भिला फिर सन्देहको पराप्त होकर कमरके ऊपर जानेकी इच्छा की ॥१२॥ हे सने ! फिर नाल्कै द्वारा मैँ ऊपर
को आया तव् मोहित होकर कमठ्कटीको न प्राप्त हुआ ॥१३॥उस नाखमार्भे प्रूमते हए मक्षे बहुत वर्ष अर्थात् सवषं बीत गये तब मोहित हुआ मँ
एतत्कमरपुष्पस्य पजारोहस्थलं ह्यधः ॥ मत्क च स वै ततर भविष्यति न संशयः ॥१०॥ इति बुद्धि समास्थाय कमराद्वरो-
इयन् ॥ नाठे नारे गतस्तत्र वर्षाणां शतकं शुने ॥११॥ न रन्ं तु मया तत्र कमरस्थानशुत्तमम् ॥ संशयं च पुनः प्राप्तः कमे
गन्तुसुस्सुकः ॥१२॥ आरुरोहाथ कमरं नारमार्भण वै ने ॥ कुड्मलं कमलस्याथ छन्धवात्न विमोहिताः ॥१३॥ नालमाभेण
भ्रमतो गते वषशतं पुनः ॥ क्षणमा तदा तत्र ततस्तिष्ठन्विमोितः ॥१७॥ तदा वाणी सबुत्वत्ना तपेति परया श्भा ॥ शिवे-
च्छया परा ग्योम्नो मोदविध्वंसिनी सुने ॥१५॥ तज्तछरत्वा व्योमवचने द्वादशाब्दं प्रयत्नतः॥ पुनस्तप्तं तपो घोरं दषं स्वजनकं
तद्। ॥ १६ ॥ तदा हि भगवान्विष्णुश्वतुर्वाहुर सुलोचनः ॥ मय्येवावुथहं कत दुतमाविभैभूव ह ॥ १७ ॥ शंखचक्राथुधकरो
गदापद्मधरः परः ॥ घनश्यामलसर्वागः पीताम्बरधरः परः ॥१८॥ भुकुटादिमहाभूषः परसत्रश्ुखपकजः ॥ कोरिकंदषैसंकाश-
स्सन्दषटो मोहितेन सः ॥१९॥ तदृष्ठा सुन्द्रं हषं विस्मयं प्रमं गतः ॥ कालभे कांचनामं च सर्वात्मानं चतुर्धुनम् ॥२०॥
क्षणमाजको स्थित हभ ॥१४॥ तब सुश्चको (तप करो" यह शुभवाणी सुन्।ई आई हे डने | यह वाणी पराकाशे पोहकै नाशकरनेवारी सुना
दी ॥१५॥ तव यह भाकाशब्[णीके वचन सुनकर मने बडे भरयतनसे अपने जनकके देखनेके खयि बारह वर्षतक धोर तप॒ किया ॥१६॥ त्
भगवान् विष्ण चारभुना सदर ने, ञुञ्चपर अनुग्रह करनेके यि भगट हुए ॥१७॥ शख, चक्क, गदा, पड, आयुध धरे, घनश्याम अंगवारे, पीतां
धारी ॥१८॥ स॒कटादि मह।राजेकि समान धारे भसन खलकपठवाडे कोरिकामदेवके समान सने उनको मोहित होकर देखा ॥१९॥ उस संद्र शूपकं
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देखकर सञ्च प्रमविस्मय हुआ, काठके समान सुवणेके समान सवौत्मा चतुर्ुज ॥२०॥ नारायण महाभुज सदसन्मय भगवानकौ इस भकार देखकर ट
म वडा भन्न हुआ ॥ २9 ॥ शिवजी मायासे मोहित होकर, जो बडी टीठा करते है उनको भपना जनक जानक म्न्नहो विष्ण कहा ॥२२॥ ||
बह्लाजी बोठे तुम कौन हो एसा कहकर उस सनातन एरुषपर हाथ कगाया, तब वह तीतर ओर दढ उस हाथकै प्रहारसे ॥२३। ॥ जागकर क्षणमात्रकं लिये ¢
बह वशी स्थित हृए, ओर निद्ासे भ्रमराहित नेशते उन्होने स्च देखा॥२४॥जब भगवान हरिने खे वहां स्थित देला तव हेसते हए परमते सञ्च बाते ¢
तथाभूतमहं दृष्ठ सदसन्मयमात्मना ॥ नारायणं महाबाह हषितो ह्यभवं तदा ॥ २१ ॥ मायया मोहितश्शम्भोस्तदा लीला ¢
त्मनः प्रभोः ॥ अविज्ञाय स्वजनकं तमवोचं प्रहषितः ॥ २२॥ ब्रह्मोवाच ॥ कस्त्वं वदेति हस्तेन सुत्थाप्य सनातनम् ॥
तदा हस्तप्रहारेण तीत्रेण सुददेन त॒ ॥ २३ ॥ प्रबुदयोत्थाय शयनात्समासीनः क्षणे वशी ॥ ददशं निद्राविकिलन्ननीरजाम ट
ललोचनः ॥ २४ ॥ मामत्र सस्थितं भासाध्यासितो भगवान्हरिः ॥ आह चोत्थाय ब्रह्माणं हसन्मां मशरुरं सकृत् ॥ २५५ ॥ ए
विष्णुकूवाच ॥ स्वागतं स्वागतं वत्स पितामह महाद्युते ॥ निर्भयो भवदास्येऽहं सर्वान्कामान्र संशयः ॥ २६ ॥ तस्य तद्वचनं ह
रत्वा स्मितपूर्वं स॒रष॑मः ॥ रज १ बद्धवैरश्च तमवोचं जनादेनम् ॥२७॥ बरह्नोवाच्॥। भाषते वत्स वत्सेति सवसंहारकारणम् ॥ ४
मामिहाति स्मितं कृत्वा शुरुश्शिष्यमिवानध ॥ २८ ॥ कतरिं जगतां साक्षात्परकृतेश् प्रवर्तकम् ॥ सनातनमजं विष्णुविरिंचि
तरिष्णुसंभवम् ॥ २९ ॥ विश्वात्मानं विधातारं धातारम्पकजेक्षणम् ।॥ किमर्थं भाषसे सोहाद्रक्त॒मररसि सत्वरम् ॥ ३० ॥
् लगे ॥२५॥ विष्ण बोठे हे वत्स! हे पितायह आप भले आपे भटे आवे हे बहाकांतिषान | तुम निभेयहो नि -सदेहर्मे तुभको सब कामना दान
कृरगा॥ २६॥ हे देवि ! हसते हुए विष्यजीके यह वचन सुनकर रजोगुणपे वैर मानकरविष्णते म बोरा ॥२७॥ बह्।जी बोरे हे पापरहित ! सबके &
हारक कारण सु्चको यहं देखकर भक्तवत्सल कहते हो ओर य॒रशिष्यक समान मेरा शास्तन करते हो ॥ २८ ॥ साक्षात् जगतका, | &
्रकृतिक। भरवतैकं सनातन् अज विष्ण विरंचि विष्णव ॥ २९ ॥ विश्वके आत्मा विधाता धाता कषरलोचन मुङ्ञको भोहसे वत्स कषे कहते हो|
===
| शीघ कहो ॥ ३० वेद अुङ्ञको नियमसे स्वयंभू विभु ओर अज कहते है, तथा पितामह स्वराट् परौ ओौर ग्रेष्ठ कहते ह ॥ ३3 |
यह वचन श्रवण कर रमापति मेरे ऊपर कद्ध हुए ओर सुद्मसे कहा हम जानते है तुम जसे कोकके कर्ता हो ॥ ३२ ॥ दिष्णजी बोरे करने
धरनेको तुम मेरे अविनाशी अंगते गट इए हो, ठम अनामय नारायण जगन्नाथको भूर गये हो ॥ ३२ ॥ जो एष प्रभात्मा परुहूत
पर्षति स्मुतिको प्राप है जो विष्णु अच्युत देशान विश्वकी उत्पत्ति पाटन करते है ॥३४॥ जो नारायण मह बाह सर्व व्यापक ईश्वर है उन भेर
नामि पञ्चते तुम भगट हए हो इसमे सन्देह नहीं ॥ ३५ ॥ इसमे तम्हारा अपराध नहीं है. तुम मेरी मायाकषे मोहित हो हे नह्लाजी ! सुनो
वेदो पाँवक्ति नियमां्स्वयंभुवमजं विभुम् ॥ पितामहं स्वशजं च परमेष्ठिनसुत्तमम् ॥३१॥ इत्याकर्ण्यं हरिवाक्यं मम ऊदो
रमापतिः ॥ सोऽपि मामाह जने त्वां कर्तारमिति छोकतः ॥ ३२॥ विष्णुकूवाच ॥ ॥ कर्तु धनं भवानंगादवतीणों ममान्य-
यात् ॥ विस्श्रतोऽसि जगनान्राथं नारायणमनामयम् ॥२३३॥ पुरूष परमात्मानं पुर्दूतं पुशष्टनम् ॥ विष्णुमच्युतमीशानं बि-
श्वस्य प्रभवोद्भवम् ॥३४॥ नारायणं महाबाह सवभ्यापकमीश्वरम् ॥ मन्नाभिपद्मतस्त्वं हि परसूता नाञ्च संशयः ॥ ३९ ॥
तवापराधो नास्त्यत्रत्वयि मायाकृतं मम ॥ शृणु सत्यं चतुर्वक्र् सवेदेवेश्वरो द्यहम् ॥ ३६॥ कर्ता हतां च भर्ता च न मयारित
समोबिथुः ॥ अमेव परं ब्रह्मपरं तत्त पितामह ॥ २७॥ अदमेवपरंज्योतिःपरमात्मा त्वहं विभुः ॥ अद्य रषं अतं सवं जग-
त्यस्मिञ्चराचरम् ॥ ३८ ॥ तत्तद्विद्धि तुकैक्र सर्वं मन्मयमित्यथ ॥ मया सृष्पुराव्यक्तंचतविंशतितससकम् ॥ ३९ ॥ नित्यं
तेष्वणवो बद्वास्पष्टकोघमयादयः ॥ प्रभावाच भवानंगान्यनेकानीदलील्या ॥ ६० ॥
हे चुसख ! यह मेश वचन स॒त्य है सव देवताओंका ईश्वर भ ॥ ३६ ॥ कती हता भतं
भ ही पह ओर परमत हूं ॥ ३७ ॥ मै ही परमनज्योति परमात्मा ओर विभु हू आ
॥ ३८ ॥ हे ब्रह्माजी ! यह सथर आप मुन्गमे ही जानिये, भने ही पहरे २४ चौवीच्च त
नित्य ही भण बद्ध ह उरते कोध भयादि खृष्टि हुई है ओर मेरे ही प्रभासे आप ओर
३४
= युय
4
व्यापक भेरी समान कोहं नही है हे पितामह
ज देखा सुना हज जो यह चराचर जगत
वसे यह अव्यक्तं निर्माण किया है ॥ ३९ ॥ उनमें
टीलासते सव अंग हए है ॥ ४० ॥
८ .०य ~
मैने इदि निर्माण की है, उससे तीन भकारसे अहंकार इभ है, उससे पञ्चतन्मात्र उससे मन देह इन्द्रिय ॥ ४१ ॥ आकाशादि भूत
भौतिक पदार्थं लीला ही निर्माण कयि है, हे जज्ञा ! हे भजापति ! रे जानकर तुम मेरी शरणको पराप्त हो ॥ ४२॥ इसे सन्देह नही
म म्हारी सब दुःखो रक्षा करंगा, ब्रह्माजी बोठे; दिष्जीके यह वचन सुन य॒ज्ञ बह्याको बडा क्रोध हुमा, ओर मायासे मोहित होकर
रलक्लारकर कहा कि तुम होते कौन हो ॥ ४३ ॥ बहृतसे अनथकारी वचन क्यों कहते हो तुम परब्र दैश्वर नहीं हो, कोई तुम्हारा भी
सृशा बुद्धिर्मया तस्यामहकारक्चिधाततः ॥ तन्मा्नपंकजंतस्मान्मनोदेदेन्द्रियाणिच ॥४१॥ आकाशादीनि भूतानि भोतिकानि
च लीलया ॥ इतिबुदध्वा प्रजानाथ शरणं बज मे विषे ॥४२॥ अहत्वा स्वंदुखेभ्यो रक्षिष्यामि न संशयः ॥ ब्रह्मोवाच ॥
इतिथत्वावचस्तस्यत्र्माक्रोधसमन्वितः ॥ को वा त्वमिति संभत्स्मा्वं मायाविमोहितः ॥ ४३ ॥ किमर्थं भाषसे भूरि
बह्ननर्थकरवचः ॥ नेश्वरस्त्वं परब्रह्म कथित्कर्तां भवेत्तव ॥४४॥ मायया मोहितां युद्धं चकर घुदाङ्णम् ॥ हरिणा तेन वै
सारद्धशंकरस्यमहाप्रभोः ॥ ४९ ॥ एवं मम हरेासीत्संगरो रोमहर्षणः ॥ भ्रलयाणेवमध्ये तु रजसा बद्धवैरयोः ॥ ४६ ॥
एतस्मत्ततेरिगमभवच्चवयोःषुरः ॥ विवादशनार्थ हि भगोधा्थं तथाऽऽवयोः ॥ ७७॥ ज्वाखमारासदलादयं कालान
लशतोपमम्॥ क्षयवृद्धिविनिश्ञमादिमध्यांतवजितम् ॥४८॥ अनौपम्यनिरदश्यमग्य्तं विश्वसंभवम् ॥ तस्य ज्वाखासदसेण
मोहितो भगवान्दरिः ॥ ४९॥
| होगा ॥ ४४ ॥ तव मने महा्रमु शिवकी मायासे भोहित होकर विष्णुम दाङ्ण युद्ध किया ॥ ४५ ॥ इस प्रकार भेरा |
विष्णजीका रोम हषण सभ्र।म हुआ उस भरखयसागरमे रजोशणसे वैर कर दोनों साम करने छगे ॥ ४६ ॥ इसी अव्र हम दोनोकि
मध्यमे शिव ङिगका आविर्भाव हआ, हमारे विवाद शमन् करने ओर बोध देनेकै निभित्त वे प्रगट हृए ॥ ४७ ॥ सहसो ज्वाटा भाठासे
व्याप्त सौक!कानर्के सुमान क्षयं ओर वृद्धि तथा आदि मध्य अन्तज्ञे बजित ॥४८॥ उपमारहित अनिर्देश्य अग्यक्त स्वप जिनसे विश्वषमर
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| है उसकी सहसो ज्वारासे भगवान् हरि मोहित होगये ॥ ४९ ॥ ओर अुद्ञको भोहित होता हुआ देखकर गोटे कि कित |
तुमने अपनी बडाई की थी यह हमारे बीचमें तीसरा पदाथ क्या प्रगट हुआ है, इतने युद्ध रहने दो ॥ ५० ॥ यह अथितेभव ज्योपि कासे
भरगट हई है इसकी हम परीक्षा करं, मे इस अश्चिस्तेभके देखनेको नीचेजाता ह ॥५१॥ हे प्रजानाथ! तुष इसको देखनेके निमित्त वायुवेगसे शीघही ¢
ऊपरको जाइये ॥ ५२ ॥ ब्रह्माजी बोढे हे सने ! इस रकार कहकर विश्वात्मा विष्णजीने अपना वाराहशूप धरा ओर मने हंसरूप धारण किया
॥ ५३ ॥ उस दिने स॒ञचे हस हंस विराट कहते है । जो हंसः हंसः सां जप करते है बह हंस ( बह ) हो जाते है ॥ ५४ ॥ अत्यन्त श्वेत
। मोरित चाहमामञकिमरथं स्पर्ढसेऽधुना ॥ आगतस्तु त्रतीयोऽज तिष्ठतां युद्धमावयोः ॥ 4० ॥ कुत एवा संभ्रतः परीक्षावोऽ
| भरिसंभवम् ॥ अधो गमिष्याम्यनलस्तभस्याजुपमस्य च ॥५१॥ परीक्षार्थं प्रजानाथ तस्य वै वायुवेगतः ॥ भवानुदर््व प्रयत्नेन
गंतुमरैतिसत्वरम् ॥ ५२॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं व्याहत्यविश्वात्मास्वशूपमकरोत्तदा ॥ वाराहमहमप्याश्चु हंसत्वं भाप्तवान्पुने ॥
॥ 4३ ॥ तदा प्रभृति मामाइृसदसो विराडिति ॥ ईसदसेति यो यात्स दसोऽथ् भविष्यति ॥ ५९ ॥ खश्वे ह्यनलप्रख्यो
विश्वतः पक्षसंयुतः ॥ मनोनिलजवो भूत्वागत्वोद्ध्वं चोदरध्वतः षु
&
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रा ॥५५॥ नारायणोऽपि विश्वात्मास्ुश्वेतो ह्यभवत्तदा ॥ दश- ४
योजनविस्तीणशतयोजनमायतम् ॥५६॥ मेश्पर्वतव्माणं गौरतीक्ष्णो्रदधिणम् ॥ कादि ट्
॥५७॥ ह्रस्वपादं विचिर्वांग॑जबं खटमनोपमम् ॥ वाराहाकारमास्थाय गत्वास्तदधौ जवात् ॥ 4८ ॥ ॥©
अभ्रिकै समान कान्तिमान् दोनों ओरके पक्षोते व्याप्त वायुके समान वेगवान् हो मँ ऊपर ऊपर चला गया ॥५५॥ ओर विश्वात्मा नारायण भी
सौ योजनको विस्तार करनेवाले दशयोजनकै चौँड।वमे श्वेत वराह बने ॥ ५६ ॥ बेरुपर्वतके सपान दोदीका अध्रभाग गोरी ओर तीक्ष्ण उने-
वाठे काठहपी सूयक सम।न॑कान्तिमान् दी घोणा ( नातिका ) महाशब्दवाछे ॥ ५७ ॥ छोटे चरण विचित्र अग इढ जैत्र (जयशीर)
उपमारहित वाराहके आकारमं स्थित हो बडे वैगसे नीचेको गे ॥ ५८ ॥
` चः
इत भकारसहसवरषतक विष्यजी नीचे ९ चरे गये,उसी दिने टोकमशवेतवाराहतेजञक कल्प ॥ ५५॥ है नारदजी मोको काटरख्याक विये हज। समभ
| विष्यजी नीचे २ जाकर बहुभ ्मे॥६ ०॥ प्रतु उन वााहरूपने इस टिंगको मूढका अल्पचिह भौ नहीं देख] ओर इतनेही समृयतक शतखदन भी ऊपरको ४
८ गया ॥६ १॥ मेने भी त्तव यत्नसे उसके अन्त जाननेकी इच्छसे चेष्टा की, थक गया ओर उक्षका अन्त न पाया तवमे समयपर नीचेको आया ॥ ६२॥ दसी प्रकार
4 कमरलोचन भगवान् विष्णजी भी शान्त होकर यह सर्वदेवमय महाशरौरवाठे ऊपर आये ॥ ६३ ॥ हम् दोनों ९क स्ायही वहां उपस्थित ¢
( एवम्व्षसदसं च चरन्विष्णरथोगतः ॥ तथाप्रभृति ठोकेषुश्वेतवाराहसज्ञकः. ॥५९॥ कपोबभरव देवष नराणां कालसंज्ञकः ॥ ट
वत्राम बहुधाविष्णुःप्रभविष्णुरधोगतः ॥ &° ॥ नापश्यदटपमप्यस्यभ्रूलं खिगस्यश्ूकरः ॥ तावत्कालं गतश्वादध्वमदमष्थरि- टै
¢ सूदनः ॥&१॥ सत्वरं सवयत्नेन तस्यान्ते ज्ञातुमिच्छया ॥ श्रान्तो न रक्षा तस्यातमहं कालादधोगतः ॥६२॥ तथैव भगवा- ¢
¢ न्विष्णुश्वति कमललोचनः ॥ सर्वदेवनिभस्तर्णञुत्थितस्समहावपुः ॥ ६३ ॥ समागतोमयासार्धं प्रणिषत्यभवं हुः ॥ मायया
£ मोदितश्शंभोस्तस्थौ संविग्रमानसः ॥ ६४ ॥ पृष्ठतः पारश्वतशेव हयभ्रतः परमेश्वरम् ॥ प्रणिपत्य मया सार्धं सस्भार किमिदं ट
तिति ॥६९॥ अनिद्य च तद्रूपमनाम कर्मवजितम् ॥ अलिगं छ्गतां प्रपत ध्यानमार्भप्यगो चरम् ॥६६॥ स्वस्थं चित्तं तदा |£
|| कृत्वा नमस्कार परायणो ॥ बभरवतुरूभावावामरं हरिरपि धुवम् ॥६७॥ जानीवो नहि ते इषयोऽसियाऽसि महाभ्रमो ॥नमो- | ¢
|| ऽस्तुतेमहेशान इपंदशंयनौत्वरन् ॥ ६८ ॥ ६
९६|| इ९ ओर शिवजीको बरवार प्रणाम करके शिवजौकी मायसे मोहित होकर चैचरचित्तते स्थित हृए ॥ ६४ ॥ पृषठसे पावभागसे आगते उस
¢ परमात्माको मेरे साथ प्रणामकर स्मरण कृरने रगे किं यह क्या है ॥६५॥ वह हप निदेश केके अयोग्य नाम ओर कर्मे रहित छिग(चिह) ५
रहित ईिगताकौ भाप हुए । ध्यानमागमे भी न आने वाठे ॥६६॥ देवको स्वस्थचित्त करके नमस्कार करने कगे, इस भकार जब तै ओर हारे प्रणाम &
¢ कर कहने रुगे ॥ ६७ ॥ हे महाप्रभो आप जो कुछ भी हो हम आपके रूपको नहीं जानते, हे महेशान ! आपको प्रणाम है शीर आपृ अपना >
। | हमे दिखाश्ये ॥६८॥ हे मुनिश्रेष्ठ । मदम स्थित हम दोनोके दस प्रकार नमस्कार करते सौ वषं बीत गये ॥३९॥ इति भ्रीशिवम
¢ भाषारीकायां भ° सृ° विष्णु्रहमविवाद्वणैनं नाम स्पमोऽध्यायः ॥७॥ ब्रह्लाजी बोरे हे सनिभ्रेष्ठ ! दस् प्रकार दशैेनकी इच्छा करनेवाटे उन
दोनों देवतारभोका जब गवे जाता रहा ॥ १ ॥ तवर दोनोंकी पाटना करनेवारे शिवजी दया हुए, जो गर्वियोके गर्व दूर करनेवाठे है ओर
|| भमु अविनाशी है ॥ २.॥ उस् समय वहां शब्दरक्षणवाछा नाद प्रगट हआ, हे देवताओं ! यह शब्द ॐ ॐ ठक्षणवाला प्रगर हुआ जौ
|| ष्टुत ठक्षणवाखा था ॥ ३ ॥ यह क्या है इस प्रकारे महान् शम्द इभा) विष्ण सव देवता ओके पूजनीय निर्वै होनेते सन्तुष्ट हृए ॥ ४ ॥ त
५ एवेशरच्छतान्यासत्नमस्कारं भङ्वैताः॥ आवयोशनिशाईलमदमास्थितयोस्तदा॥६९॥ इति श्रीशिवमहापुराणेद्धितौ यायांश्ढसं-
हिताया प्रथमखंडविष्णु
मह्मविवादवर्णनो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ ब्रह्मोत्च॥एवतयोनिश्ेष्ठद्शनेकाक्षमाणयोः॥विगवैयो च
सुरयोःषदानौस्थितयोषुने॥ १॥ दयालु रभवच्छंमुदीनानांप्रतिपारुकः ॥ गविणां गवैहतां च स्वेषां प्रभुरव्ययः ॥२॥ तदा सम-
&|| भवत्तव्रनादविरशब्दलक्षणः॥ ओमोमिति सुरशरष्ठा्सुव्यक्तः प्ठतलक्षणः ॥३॥ किमि दैत्तिति संचित्य मया तिष्टन्मह।स्वनः ॥
£ विष्णुस्सवेसुराराध्योनिररस्तुष्टचेतसा ॥४॥ छिगस्य दक्षिणेभागे तथापश्यत्सनातनम् ॥ आ्यंवणैमकाराख्यञ्चकारं चोत्तरं
%
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ततः ॥५॥ मकारं मध्यतश्च नादम॑तेऽस्य चोमिति ॥ सुथ॑मंडल्वहष्ावणंमायंतुदक्षिणे ॥ ६ ॥ उत्तरेपावकपल्यञ्चकारशषि
शत्तम ॥ शीतां्चुमण्डलप्रख्यमकारंतस्य मध्यतः ॥७॥ तस्योपरि तदाऽप्श्यच्छदस्फयिकसपभम्॥ तुरीयातीतममलंनिष्कलं
निङूपद्रवम् ॥८॥ निद्वदकेवलंशन्यं बाह्यभ्य॑तरवजितम् ॥ स बाह्यभ्यंतरे चेव बाह्यभ्यंतरसंस्थितम् ॥ ९ ॥
उन्होने गक दक्षिण भागगे सनातन आय अकारवणे ओर उसकै उत्तम उकारको ॥ ५ ॥ मध्यमे मकारको अस्तम नादको देखा इस प्रकार
ओमको देवा आदिवणेको दक्षिणम सथेमण्डटके समान देखा ॥ ६ ॥ हे ऋषिसत्तम ! उत्तरे पावकके समान उकारको देखा ओर शीतांशु
सद्र मण्डलक समान् मकार उसकै मध्यस्था नभे देला ॥ ७ ॥ फिर उक ऊपर शुध व समान तुरीयातीत निभेल निष्कठ उपद्रव
रहित ॥ < ॥ निदैनद केवर शून्य वाद्य ओर आभ्यन्तरे वजित बाहर भीतरके बाह्य आभ्यन्तरभे संस्थित ॥ ९ ॥
आदि म्यभन्तरहित आनेदका भी कारण सत्य आनंद अश्व परब प्रायण दिखाई दिया ॥१०॥ यह कासे भगट दुआ है इस अञ्ितेभवक हम
परीक्षा करं हम इस स्त॑मके नीचेकी ओर जाकर देस ॥११॥ तब वेद शब्दे उभय वेशवाठे इस विश्वात्मको विचारने गे तव उस सभय वहा एक
कवि हआ जो ऋषिका सारतम समज्ञा जाता है ॥१२॥ उसी ऋषिस विष्णजीने परमेश्वरको जाना जो महादेव परबहय शब्द बहापर दूरा ब्रह्मशरीर
है ॥ १३ ॥ यह रुदविन्तामे नही आते इनक विचारे मनहहित वाणी नित हो जाती है वह एकाक्षर ॐ, से ही जाने जाते हं ॥१४॥
आदिमध्यांतरहितमानदस्यापिकारणम् ॥ सत्यमानन्दमसृतेषरंब्रहमपरायणम् ॥१०॥ इतएवाजसंभ्ूतःपरीक्षावोऽत्चिसंभवम् ॥
अधोगमिष्याम्यनलस्तभस्यानुपमस्यच ॥ ११॥ वेदशब्दोभयावेशं विश्वात्मानैव्यवितयत् ॥ तदाऽभवदषिस्तजऋषेष्सारतमं
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स्मृतम् ॥१२॥ तेनेवऋषिणाविष्णुज्ञातवान्परमेश्वरम् ॥ महादेवं षरं रह्म शब्दब्रह्मतरैपरम् ॥१३॥ चितया रहितो रदौ वाचौ
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॥२२॥
यन्मनसा सह ॥ अप्राप्य तत्निवतते वाच्यस्त्वेकाक्षरेणसः ॥१७॥ एकाक्षरेण तद्वाक्यघृतं प्रमकारणम्॥ सत्यमानन्दममृतं परं
ब्रह्मपरात्परम् ॥१९॥ एकाक्षरादकाराख्याद्रगवान्बीजकोण्डजः ॥ एकाक्षरादईकाराख्याद्रिः परमकारणम् ॥१६॥ एकाक्षरान्थ-
काराख्याद्भगवात्नीरलोहितः ॥ सगैकतांत्वकाराख्योह्यकाराख्यस्तुमोहकः ॥१७॥ बकाराख्यस्तुयोनित्यमनुब्रहकरोऽभवत्॥
मकाराख्योविथुबींजीद्यकाो बीजऽच्यते ॥ १८ ॥ उकाराख्यो हरिर्योनिः प्रधानपुङषेश्वरः ॥ बीजीचबीजंतद्योनिनांदाख्यश्च
महेश्वरः ॥ १९ ॥ बीजी विभज्य वात्मानेस्वेच्छया तु व्यवस्थितः ॥ अस्य् रिगादरद्रीजयकारोबीजिनः प्रभोः ॥ २० ॥
एकाक्षरहपउनका वाक्ष्य ऋत ओर परमकारण है, सत्यस्वहप आनन्द स्वप परम् अशत बह्न परात्पर अर्थात् परेसे परे है ॥१५॥ एकाक्षर अकारसे
भगवानु बीजस्वहूप अण्डोतपन्न बऋ्लाजी है एकाक्षर उकारसे प्रधकारण हरि है।॥। १६॥ एकाक्षर षकारसे भगवान्न लो हित है अकार सृषिकता उकार
मोहन कएेवाडा ॥१७॥ ओर मकार नित्य ही अनुग्रह करनेवाला है, यकार विभुबीजी ओर अकार बीज कहलाता है ॥१८॥ उकार हरिकी योनि
प्रधान पुरुबेश्र दै, बीजी ओर बीज उसकी योनि ओर नाररज्ञक महैश्वरहै॥१ ९॥ बीजी आत्मको बिभाग करके स्वेच्छाते ही स्थित हुआ है, इस भभु॥>
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टिगीकै बीजे अकार हुआ है ॥ २० ॥ यह उकाररूपर योनिम पडकर सवं ओरसे बढने रगा, उससे सोनेका यह अण्ड हुआ, उस् ्
| अण्ड अवैय ओर अलक्षण था ॥ २३ ॥ यह दिव्य अण्ड अनेकं व्षोतक जले स्थित रहा सहस वर्षके पीछे बह्माजीने इसके दो भाग
किये ॥ २२ ॥ इस्त जलम स्थित हए अण्डको जब परमेश्वरने उ्याघात किया तब इसका एक कपाठ ` ऊर्ध्वस्थित होकर शोभित हुआ
॥ २३ ॥ उसे युटोक हुआ ओर नीचेके कपाठमे पांचतत्वकी पृथिवी प्रगट हदं उत्त अण्डसे भव ( शंकर ) ओर ककार नामवाठे चतुयैख
भगर हूए ॥ २४ ॥ वह सब ठोकोकि सटा ओर बही तीनरूपधारी है, इससे यजुर्वेदी इनको ॐ ॐ एसा कहते है ॥ २५ ॥ यजुके वचन
उकारयोनोनिःक्षिप्तमवद्धेतसमततः॥ सौवणं मभवचचांडभावेयंतदलक्षणम् ॥ २१ ॥ अनेकान्दं तथा चाप्सुदिव्यमेडव्यवस्थितम्॥
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ततो वषसहसखांते द्विधाकृतमजोद्धवम्
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म् ॥२२॥ अंडमप्सुस्थितं साक्षाब्याघतिनेश्वरेण तु ॥ तथास्यभं दैमकपां चोदर््वसं
स्थितम् ॥२३॥ जज्ञेसा यौस्तदपरप्रथिवीपचकक्षणा ॥ तस्मादं डाद्ववो जज्ञे ककाराख्य्तुरैखः ॥२४॥ स खा सर्वलोकानां
स एव धिविधः प्रभुः ॥ एवमोमोमिति भरोक्तमित्याहर्यजषां वराः ॥२५॥ यज्चषांवचने्त्वा ऋचः समानिसाद्रम् ॥ एवमेव
दरे्रहमननित्याइश्चावयोस्तदा ॥२६॥ ततोविज्ञाय देवेशं यथावच्छक्तिसं मवैः॥ मं महेश्वरं देर्वतुष्टावसुमहोदयम्॥२७॥ एतस्मिन्न
तरेऽन्यच्च रूपमदधतखन्दरम् ॥ ददशे च मयासार्दभगवान्विश्वपाखकः ॥ २८॥ पचवक्रदशयुजंगौरकषुंखन्छने॥ नानाकांति
समायुक्तं नानाभरूषणभरूषितम् \॥ २९ ॥ महोदरं महावीर्यं मदापुक्षलणम् ॥ तं दृष्टापरसं्पं कृतार्थोऽभून्मयाहरिः ॥३०॥
|| सुनकर ऋक् भर सागआदरमे हे हरे ! बर्मन इस प्रकार हम दोनंको कहते ह ॥ २६ ॥ तब देवेशको जानकर यथायोग्य अपनी शक्तिम
संभवर्मजोसे महादेव महेश्वर देवको भसन्न करने ठगे ॥ २७ ॥ इती समय संसारक पान करनेवाले विष्णभगवानू मेरे संग एक बहुत सुन्दर
अद्ुत हप देखने ठे ॥ २८ ॥ हे सने ! पांच दशमुजा गोरा कपुरके समान सुन्दर अनेक कान्तियोति ुक्तं ओर भूषणो भूषित ॥२९॥
महोदर महावीयवान् महाणरुषके रक्षणो युक्त था उत्त स्वहपको देखकर गुरुसहिव हरि तार्थं हो गये | ३० ॥
रु. २
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शिण्पु
॥२२॥
तब भगवानु महेश्वर परमेश्वर भसन होकर दिव्यशब्दमय रूप करकै स्थित हुए ॥ ३१ ॥ उनका शिर अकार ओर माथा व
दी था इकार दक्षिणेतर वाम कमलने्र था ॥ ३२ ॥ उकार दहिना ऊकार वायां कान था ओर ऋकार उन परमेष्ठीका द
कृपोक था ॥ २३ ॥ ऋकार बा्यां कपोर, ल्द दोनों नासाषट, एकार ऊपरका होढ, ओर एेकार नीचेका होढ था ३४ ॥ ओ अं र
ओ यह कमे ऊपर नीचेकी बाई पंक्ति थी, उन देवदेव शख्धारीका * अं ' ताकु हभ ॥ ३५ ॥ कखगष ड यहं पाचि शत
अथ भस्ोभगवानमद्ेशःपरमेश्वरः ॥ दिव्यं शब्दमयं रूपमास्याय प्रहसन्स्थतः ॥ ३१ ॥ अकारस्तस्य मृदां हि लागी
दीधे उच्यते ॥ इकारो दक्षिणंनेतरमीकारोवामलोचनम् ॥३२॥ उकारो दक्षिणं श्रोत्रमूकारो वाम उच्यते ॥ ऋकारोदक्षिणं तस्य
कपोपरमेष्ठिनः ॥२२॥ वामं कपोकमूकारो छ द नासापुरेउभे ॥ एकारशयो्द्व॑श्चदकारस्त्वधरोविभोः ॥३७॥ ओकारश्च
तथौकारो दन्तप॑क्तिद्यं कमात् ॥ अमस्तु तानी तस्यदेवदेवस्य शूलिनः ॥३५॥ कादि्चाक्षराण्यस्यपश इस्ताश्चदक्षिणे ॥
चादिपचाक्षराण्येवं पंच हस्तास्तु वामतः ॥ ३६ ॥ टादिषेचाक्षरं पादास्तादिपं चाक्षरं तथा ॥ पकार उदरं तस्यफ्कारः पाश्च
उच्यते ॥३७॥ बकारोवामपारशवस्तु भकारः स्कंउच्यते ॥ मकारोडदयं शंभोभहादेवस्ययोगिनः ॥३८॥ यकारादिक्षकारान्ता
विभोवेसप्तधातवः ॥ इकारोनामिरूपोहि क्षकारो राण उच्यते ॥३९॥ एवं शब्दमयं हपमगृणस्य गुणात्मनः॥ दृष्टा तञुमया
सादं कतार्थोऽभून्मयाहरिः ॥४०॥ एवं दष्टा महेशानंशब्द्ब्ह्म तव शिवम् ॥ प्रणम्य च मयाविष्णुः पुनश्चापश्यदृद्ध्वेतः॥७१॥
| है, चचछजन्च नज यह वाम ओरके पाच हाथरहै॥ ३६॥टदठडटढण यह पांच अक्षर दहिनाचरण,तथद् धन यह पाच
अक्षर वाम चरण है एकार उदर ओर एकार पारश्वभा रै कहाता है ॥ ३७ ॥ बकार. वाभपाश्वं भकार स्कंधं॒कहाता
है महादेव योगी शभुका हदय भकार है ॥ ३८ ॥ यकारे सकार तक उस विभुकी सात धातु है हकार नाभि ओर
चकार प्राण है ॥३९॥ इसपभकार उस अगगगुणात्माका शब्दमय रप देखकर मेरे सहित विष्णजी कृतार्थं होगये ॥४०॥ इस भकार महेशानका
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| बहममप शरीर देखकर मेरे सहित विष्णजी उनको प्रणाम कर फिर ऊपरको देखने ठगे ॥ ४१ ॥ वहां ओंकारसे प्रकट हु भव |
कलास संयुक्त शुद्ध स्फटिकमणिके समान स्वच्छ सुन्दर अडतीप्न अक्षरो सम्पन्न है ॥ ४२ + बुद्धिका करनेवाखा सनका मत था अका त
साधक है वह मंत्र गायत्रीते परगट चौबीस वणेवाठा वश कटनेवाठा यथा “तसुरुषाय विग्रह महादेवाय धीमहि तन्नोरुढः प्रचोदयात्? अथवा त
तत्सुवितु° यह गायत्रीटेनी ॥ ४३ ॥ यह चोवीस वणंसि युक्त चारों काठमे श्रेष्ठ है ओर प॑ंचसित मंत्र ॐनमः शिवायः आठ कलाओं युक्त ठै
॥ ४४ ॥ आभिचारक मंत्र प्रायः तीस अक्षरोसे सम्पन्न यजुवेदसे युक्त पवी शुभाक्षरोसे सम्पन्न ॥ ४५ ॥ आढ कलाओं सम्पन्न सुश्वेतं ठ
उथ्कार्रभवेमत्रकलपचकरयुतम् ॥ शुदधस्फटिकसकाशंशभाष््रिशदक्षरम् ॥ ७२॥ मेषाकारमगभृद्धयस्सर्वधर्मार्थसाधकम् ॥ ¢
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¢ गायजीपभवं भत्र सदिते वश्यकारकम् ॥ ४२ ॥ चतुर्विंशतिवणीदयचतुष्कालमतत्तमम् ॥ अथ प॑ंचसिते भ्रं कलाष्टकं ||
समायुतम् ॥ ७९ ॥ आभिचारिकमत्यथप्राय्चिशच्छमाक्षरम् ॥ यजषदसमायुक्तपथर्विशच्छभाक्षरम् ॥४५॥ कलाष्टकसमा
। क्तं सुश्वेत शतिकं तथा ॥ अयोदशकलायुक्तं बाल येस्सद केतम् ॥ ७६ ॥ बभूवुरस्य चोत्पत्तिवृद्धिसंहारकारणम् ॥ |
|| वर्णाएकाधिकाः षष्टिरस्य मजरवरस्य त॒ ॥ ७७ ॥ पुनमत्थुजय मन्ध पथक्षरमतः परम् ॥ चितामणि तथात्र दक्षिणामूतिं |©
| संज्ञकम् ॥ ९८॥ त॒तस्तत््वमसील्यक्तं महावाक्य हरस्य च ॥ पञमजंस्तथा रब्ध्वा जजाप भगवान्हरिः ॥ ६९ ॥ ट्
ट| ओर शांतिदायक मंत्र ओर तेरह कठा युक्त बाठादिके सहित ठेहित ॥४६॥ यह उत्पतति पाठन ओर सृहारका कारण ह भौर इस म॑तरके ||
६१ वणं हं ॥ ४७ ॥ फिर मृत्युंजय मंत्र ( ॐ ज सः ) अथवा ८ ज्यैवकं यजामहे सुगन्धि एष्िवद्धंनम् उवारुकमिवं बन्धूनान्भृत्योक्षीय ६
मामृतात् ) इसके उपरान्त ( नमः शिवाय ) यह पंचाक्षर मंच ओर ( क्यौ ) यह चिन्तामणि अच यथा ( अशि; सम्ब्कादित्यावनिखौ ||
ट पष्ठ विन्दुमत् । चिन्तामणिरिति ख्यातं वीजं सवं समृद्धिदम). ओर (ओं नमो भगवते दक्षिणामूर्तये म्य मेधां भयच्छ स्वाहा) यह चिन्तामणि च|
ओर दक्षिणामूतिं मंत्र है ॥४८॥ तत्वमसि यह शिवका महावाक्य है इन पाचों मोको ठेकर मगवान जप करने खगे ॥ ४९ ॥ ६
शि०पु°
॥२४॥
रूस. २
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किर ऋक् यजु सामरूपी कठा वर्णको देखकर जो दशान ईश खकुट प्रुष् धरातन ईै॥ ५ ॥ ॥ अवर हदय मनोहर् सर्म श)
वामपाद् महादेव महाभोगीन्द्रका भूषण धारे ॥ ५१ ॥ सब ओर चरण ओर सव ओर् नेवा बहक अधिपति सगं स्थिति अर हं
करनेवाटे ॥ ५२ ॥ वरदाई साम्बशिवके वाणियोि सतषट करने रगे, इस भकार भने ओौर विष्णजीने बडे प्रेमे उन सतति कौ ॥ ५३ ॥
इति श्रीशिवम० रु° भ्र सृ ° भाषारीकांयां शब्दब्रह्चतुवणनो नामामोऽध्यायः ॥८॥ ब्रह्लाजी बे विष्णकी की हृदं सतुतिको सुनकर महेश्वर
अथदष्टाकलावर्णमरग्यजस्सामरूपिणम् ॥ ईंशानमीशसुङ्टंपुरूषाख्य पुरातनम् ॥ «० ॥, अचोरदद यह यसवगुद्यं सदाशिवम् ॥
वामपादं महादेवं महामोगीन्द्रभुषणम् ॥ «१ ॥ विश्वतः पादवन्तं तं विश्वतोकषिकरं शिवम् ॥ ब्रह्मणोऽधिपति सर्गस्थि
तिसंहारकारणम् ॥ ९२ ॥ तुष्टाव वाभ्भिरिष्टाभिस्साम्बे वरदमीश्वरम् ॥ मया च सहितो विष्णर्भगवांस्तुष्टवेतसा ॥ ५३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुदर संहितायां प्रथमखण्डे सृषटडपाख्याने शब्दबरह्मतदवर्णनो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
ब्रह्मोवाच ॥ अथाकण्यं लतिविष्णक्ृतां खस्यमहैश्वरः ॥ प्रादबेभव सुप्रीतस्सवाम करूणानिधिः ॥ १ ॥ पैचवक्रन्चिनयनो
भालचन्द्रो जटाधरः ॥ गौरवर्णो विशाल क्षोभस्मोद छितविध्रहः ॥ २ ॥ दशबाडुर्नीरगल सवांभरणभूषितः ॥ सर्वागसुन्दरो
भस्मबिपुण्डांकितमस्तकः ॥ ३॥ तं दृषा तादशं देवंसवाभ परमेश्वरम् ॥ तुष्टाव पुनरिष्टाभिर्वाग्मिरविष्णुरमयासह ॥ ९ ॥
निगमं श्वासरूपेण दरौ तस्मे ततो हरः ॥ विष्णवे च प्रसत्रात्मा महेशः कङ्णाकरः ॥ «< ॥
रेमे दया करक दोनोके सन्मुख भग हए ॥ १ ॥ पा चय तीन नेत्र मारच जटाधारी गौरवणं विशा ने शरीरमे भस्म रगये ॥ २॥
दश बाहू नीठकण्ड सम्पूणं आभरणे भूषित स्वागते सुन्दर भस्म ओर रिषुदूसे अंकित मस्तक ॥ ३ ॥ इस प्रकारके शक्ति सहित परमे-
श्वरको देखकर मेरे सहित विष्णजी सुन्दर वचनो स्तुति करने ्गे ॥ ४ ॥ तवं शिवजीने श्वास रूपसे उनके निमित्त वैद दिये यह
प्रसन्नात्मा महेश्वरने बडी कृपाकर दिया ॥ ५ ॥
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। फिर हरिपरमात्माके निमित्त ज्ञान दिया, हे शुने ! हरिने फिर कपा करके मुञ्च ज्ञान दिया ॥ ६ ॥ इस प्रकार निगमको प्राप्त करके |
|| फिर ढा ओर ुज्ञसहित हाथ जोडकर बोले ॥ ७ ॥ विष्जी वोछे हे देव ! किस भकार आप भरसन्न होते है ओर मँ किस भकार
|| पजन कर् आपका ध्यान किम भ्रकारसे करना चाहिये. किस प्रकार आप वशीभूत होते है ॥ ८ ॥ हे महादेव ! आपकी आज्ञासे हमको
ठै क्या करना चाहिये, हे शकर ! प्रीतिके निमित्त आप सदा हमको आज्ञा करते रहिये ॥ ९ ॥ हे महाराज ! हे शकर ! हम दोनोको अपना
£| ततौ ज्ञानमदाततस्मेहरयेपरमात्मने ॥ परमात्मा पुनरमदयदत्तवान्कृपयासुने ॥ & ॥ संप्राप्य निगमे विष्णुःपप्रच्छ पुनरेवतम् ॥
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कृतार्थस्सांजलिनत्वा मया सह महेश्वरम् ॥ ७ ॥ विष्णुरूवाच ॥ कथं च तुष्यसे देव सया पूज्यः कथ श्रमो ॥ कथं
ध्यानं प्रकतंञ्ये कथ व्रजसि वश्यताम् ॥ ८ ॥ किं कर्तव्यं महादेव द्यावाभ्यां तव शासनात् ॥ सदासदाज्ञापय नौ प्रीत्यर्थे
र् शंकर॥ ९ ॥ एतत्स्वेमहाराज कृषांकृत्वाऽवयोः प्रभो ॥ कथनीयं तथान्यच्च विज्ञाय स्वालगौशिव ॥ १० ॥ बद्नोवाच
| इत्येतद्वचनं 0 भसन्नो भगवान्हरः ॥ उवाच वचनं प्रीत्या सुभसन्नः कृपानिधिः ॥ ११ ५ ॥ आीशिव उवाच ॥ भक्त्या
|| च भतान अतोहं सरसत्तमौ ॥ पश्यते मां महादेवं मय सर्व विषचताम् ॥ १२ ॥ मम ङ्गं सदा पजय ध्येयं चैताहशं
| मम ॥ इदानीं दश्यते यद्रत्तथा कारय प्रयत्नतः ॥ १३ ॥ पूजितो छिगरूपेण प्रसन्नो विविधफलम् ॥ दास्यामि सर्बलोकेभ्यो
मनोभीष्टान्यनेकशः ॥ १४ ॥ यदा दुःखं भवेत्तत्र युवयोस्सुरसत्तमौ ॥ पूजिते मम ङ्गे च तदास्याहःखनाशनम् ॥ १९ ॥
ट अनुगामी जानकर यह सव किये ॥ १० ॥ ब्रह्माजी बोे यह वचन सुनकर भगवान् हर भसश्न हुए ओर क्पानिधि प्रननतास
४ कहने ठगे ॥ ११ ॥ भ्रीशिवजी बोटे हे श्रेषठदेवताओ ! आपकी भक्तिसे भँ भसत हुआ हू, स्ञ महादेवको देखते हए तुम सब भयत्यागन
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करो ॥ १२॥ सदा भेरे छिंगकी पूजा करो ओर सदा मेरा ध्यान करो, इत सभय जेरा दीसता है वैषा भयते करना चाहिये ॥ १३ ॥
म िगरपते पूजित हुभआ अनेक प्रकारके फणोको सबटोकोंके मनके अभीषटौको देता हं ॥ १४ ॥ हे भरषठदेवताभो जब किती पकारे दुःखकी
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भ्रानि हो तो मेरा िगपूजनेसे सब दुःख भिटजारयेगे ॥१५॥ तम दोनों महाबली भेरी प्रकत ओर मेरे दहिने यि अगते प्रगट हए हौ ॥१ (०
ठ यह टोकपितामह बह्माजी मेरे दक्षिणपारश्वसे भ्रगर हृए है, हे विष्णजी तुम परात्माके वामपार्श्वे प्रगट ह हो ॥ १७ ॥ म तुम दोनो बहुत
प्रसन्न ह, शेप्सित वर देताहूं मेरी इच्छसे मेरी दढभक्ति हो ॥१८॥ तुम दोनों मेरी पाथिवमूतिं बनाकर ओर,अनेक प्रकारक सेवा पूजा करोगे
६ तो हुम दोनों महात्मा सुख पावोगे ॥१९॥ है बहाजी ! मेरी आज्ञाकै पाठन करनेवाठे तुम सृष्टि करो ओौर हे वत्स ! नारायण तुम चराचरका
| शवां प्रसूतौ परकृतेमैदीयाया महावरौ ॥ गा्ाभ्यां सव्यं सम्याभ्यांमम स्श्वरस्य हि ॥ १६ ॥ अय मे दक्षिणात्पाश्वी
|| द्रन्ना कोकपितामहः ॥ वामपार्शवाच् विष्णुस्त्वं समुत्पन्नः परात्मनः ॥ १७ ॥ रीतो युवयोस्सम्यग्बरं द्यां यथेप्सितम् ॥
ह| मथि भक्तिटंडा भूयाह्वयोरभ्यलज्ञया ॥ १८ ॥ पार्थिवीं चैव मन्मूतिं विधाय इरतंयुवाम् ॥ सेवां च विविधां भराज्ञो कृत्वा
| सुखमवाप्स्यथ ॥ १९ ॥ ब्रहन्सृषि रुत्वं हि मदाज्ञापरि ग रकः ॥ वत्स वत्स हरं त्वं च पाल्येवं चराचरम् ॥ २० ॥
|| ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता नौ प्रयुरताभ्यां पू नाविधिमदाच्छभाम् ॥ येनैवपूजितश्शंथुःफटयच्छत्यनेकशः ॥ २१ ॥ ब्रह्मोवाच ॥
इत्याकण्यं वचश्शंभोर्मया च सहितो हारः ॥ प्रत्युवाचमदेशानं प्रणिपत्य कृतांजलिः ॥ २२ ॥ विष्णुर्वाच ॥ यद्प्रीतिः
सुत्पत्ना यदि देयोवरश्चनौ ॥ भक्तिभवतु नौ नित्यत्वयि चाव्यभिचारिणी ॥ २३ ॥ त्वमप्यवतरस्वा्य लीलया निशंणोपि
हि ॥ सहायं कुङ् नौ तात त्वं परः परमेश्वरः ॥ २४॥
पाठन कंरो ॥२०॥ ब्रह्माजी बोठे रेता कहकर विभुने हम दोनोंको अपनी श्रेष्ठ पूजाविधि दी, जिन्षकै द्वारा पूजित होकर शिवजी अनेक प्रकारके
| ए देते ह ॥२१॥ वरहाजी बो इत् भकार भगवान् विष्यजी सुच सहित शिवजीके वचन घुनकर हाथ जोड भणाम कर शिवजीसे बोखे ॥२२॥
द| विम्डजी बोडे पदि प् मन्न है ओर हम दोनोको वर देते हँ तो हमारी आप निश्चला भक्ति हो ॥२३॥ओर नि्युण होकर भी लीटात्ते आप्
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१ ्कन्ध्वादित्वात्थर ल्पम् श्िष्टभ्रयुक्तानां ययाकयस्जितसाधुत्व।न्वाख्यान॥त् सभ्यासन्यगात्राम्यां वा पाठोऽनुसंषेयः ।
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अवतार केकर हमारी सहायता करिये कारण कि आप प्रमश्वर है ॥ २४. ॥ हे देवदेवेश । हम दोनोंका विवाद भी अच्छा हभ जो |
दोनोके विवाद शांतिके ख्ये आपने दशन दिया ॥२५॥ ब्रह्माजी बोले उनके यह वचन सुन किर विष्टजीसे शिवजीने कहा ओर बिष्णजी
प्रणाम कर हाथ जोड शिरश्ुकाये खडे रहे ॥ २६ ॥ श्री. शिवजी बोले मँ निरीण प्षगुण होकर भी सृष्टि पान ओौर संहार करता हं म
परब्र विकाररहित सवदानंद लक्षणवाखा हूं ॥ २७ ॥ हे विष्जी ! विष्ण बहा जौर शिव नामस प तीन भकारे स्थित ह हे हरे ! भे
|| उत्पत्ति, रक्षा ठय इन गणो सदा निष्फल हं ॥ २८ ॥ हे विष्ण ! जो तुमने मेरी स्तुति की है, ओर बज्लाजीने युद्धभे भेरी स्तुति रक्षके
आवयोददैवदेवेशविवादमपिशोभनम ॥ इहागतोभवान्यस्माद्विवादशमनायनौ ॥ २५ ॥ ब्ह्नोवा३॥ तस्यतद्वचनंश्त्वापुनःप्ाह
इरोहरिम् ॥ प्रणिपत्यस्थितं मूध्नाकतांजरिपुटः स्वयम् ॥२६॥ श्रीमदेश उवाच ॥ प्रख्यस्थितिसगाणांकेतहिसथणोऽयणः ॥
परब्रह्म निविकारीसञ्चिदानंदलक्षणः ॥ २७ ॥ जियाभि्नो ह्यंविष्णोब्र्मविष्णुहगख्यया॥ सगरक्षाल्यशणेरनष्कलोहं सदार
॥२८॥ स्तुतोऽहं यत्वयाविष्णोत्रह्मणा मेऽवतारणे॥ प्रार्थनां तांकरिष्यामि सत्यां यद्धक्तवत्सलः ॥२९॥ मदूपंपरमं बहमन्नीहशं
अवदगतः | प्रकरीभविता लोकेनाम्ना श्द्रःप्रकीरितः ॥ ड ०॥ मदंशात्तस्यसामर्थ्यन्युनं नैवभविष्यति ॥ योहसोहं न् भेदोस्ति
पूजाविधिविधानतः॥३१॥ यथा च ज्योतिषस्सगानलादेःस्पशंना न वै ॥ तथाममायुणस्यापि संयोगाद्न्धनं न हि ॥ ३२॥
शिवरूपं ममेतञ शुद्रोऽपि शिषवत्तरा ॥ न तथ परभेदो वै कर्तव्यश्च महाशरने ॥ ३३ ॥ वस्तुतो श्यकह्पं दि द्विषा मित्त
जगत्युत ॥ अतो न भेदा विज्ञेयः शिवे शुद्र कदाचन ॥ ३९ ॥
निमित्त ठी है, तो मे मक्तवत्मङताके कारण इस प्राथनाको सत्य ककंगा ॥ २९ ॥ हे बहलाजी ! तुम्हारे अंगसे जो मेरा हप भरगर हआ है
|| लोकम उसका नाम र {4 ॥३०॥ मेरे अंश होने उसकी साम्य न्यून न होगीजोभर हं सो बह दै, पूजाफे विधाने इम
दोन् भेद न हौगा ॥ ३१ ॥ ञे ज्वोतिकै संग होनेपर भी जलादि स्पशंता नहीं है इसी प्रकार युस निर्यणको ' सेथोगसे वंभन नही
होता है ॥ ३२॥ मेरा रूप यही है रुदर भी शिवरपही है हे महासने ! इते परपरा भेद नही जानना ॥ ३३ ॥ वस्तुतः एकरूप ही यह
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शि | जगते दो रपर दिखाई देते है इससे शिवरुरम कदाचित् मी भेद् न जानना ॥ ९४ श ॥ हे देव । स सुवणंकी अनेक ५ १९१ (
॥२६॥ ||| अकार नाम आकतिका भेद् है वास्तव भेद नही ५ 1 1/4 भनति ह नामि
¢ वास्तवे वह सव मृत्तिकाही है । इसी प्रकार कारमं भेद है कारणमे नहीं । यह द्टात वहत है ॥ २६ ॥ हं बल्ला विष्ण निमटन्नानवाट
? पंडितोंको यह बात भटीर्भोति जाननी चाहिये, एसा जानकर तुम दोनोको भी भद् नहीं मानना चाहिये ॥ ३७ ॥ मेरे मतमं वस्तुक समान
र्त्र शिवहूप देखना चाहिये, मँ आप बहा ओर जो यह रर होंगे ॥ ३८ ॥ यह सव एकरूप है इनमे भेद नहीं है, ओर जो भेद मानने
सुव्णस्यतथैकस्यवस्त्॒वं नैव गच्छति॥ अट्कृतिकृते देव नामभेदौ न वस्ततः ॥३५॥ तथेकस्यामृदो ेदोनानापामे न वस्तुतः॥
कारणस्यैव कायें च सच्निधानं निदशनम् ॥३६॥ ज्ञातव्यं बुधवर्थ्निमल्ञानिमि'खरो ॥ एवज्ञात्वा भवभ््ां तुन दृश्यं भेद कार
णम्॥२७॥ वस्तुवत्सर्वहश्यं च शिवरूपम्मतम्मम ॥ अदभवानजश्चव रुद्रो योऽ्यभविष्यति ॥३८॥ एकषूपान भेदस्तु मेदे वै
बधनं भवेत् ॥ तथापि च मदीयं हि .शिव्ूपंसनातनम् ॥३९॥ मूलीभूतं सदौक्तं च सत्यज्ञानमनंतकृम्॥ एवं ज्ञात्वासदाध्येय
मनसा चैव तत््वतः॥ ४० ॥ श्रूयतां चैव भो बरह्मन्योप्यं कथ्यते मया ॥ भवतौ प्रकृतेर्यातौ नाय वे प्रकृतेः पुनः ॥ ४१ ॥
मदाज्ञा जायते तत्र ब्रह्मणो शुकुटेरहम्॥ गुणेष्वपि यथा प्रोक्तस्तामसःपरकृतोहरः॥ ४२ ॥ वेकारिक्च विज्ञेयो योऽदंकार उदा
हतः ॥ नामतो वस्तुतो नैव तामसः परिचक्ष्यते ॥४३॥
उनको बधन होगा, तौ भी मेरा सनातन शिवषूप ॥ ३९ ॥ मूलभूत सतु सत्थज्ञान ओर अनन्त है, इस प्रकार तच्वसे सदा मनट्गाकर
जानना चाहिये ॥ ४० ॥ हे बहन ! जो मँ युपतवाद् तुमसे कहता हं सो तुम शुनो तुम दोनों भरकतिसे भ्रगट हए हो, पर यह रुद्र वैते नही
॥ ४१ ॥ अपनी इच्छासेही भँ तुम ब्रहयाकी मृकटीतते भग हआ हूं ओर योम जो रद्रको प्रकतिका तामन्त गुण कहा है ॥ ४२ ॥ उते
वैकारिक जानना वास्तवमे नहीं, दह वही है जिसे अहंकार कहते ह नामे है पर व।स्तवमं तामस नहीं कृहाता ॥ ४३ ॥
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बह्माजी ! इस कारण आपको यह करना चाहिये कि तुम सृष्टिक कती बनो, ओर यह नारायण सृष्टिक पाठक होगे ॥ ४४ ॥ ओर |
अंश यह रद्र ठयकन्त होंगे, ओर जो यह उमानामक परमेश्वरी प्रकति देवी है ॥ ४५ ॥ इतीकी शक्ति वाग्देवी बह्लाकी अद्धीगिनी होगी, ©
ओर दूसरी शक्ति जो है वह प्रकतिसे उत्पन्न होगी ॥ ४६ ॥ वह लक्ष्मीरूप हो विष्णका आश्रय करेगी ओौर फिर काटी नामत्े निश्वय ठ
मेरे अशको प्राप्त होगी, ॥ ४७ ॥ वहां वह ज्योतिरूपते कारके टिप पभ्रकट होंगी, इस प्रकार देवीकी तीन प्रकारकी शक्तिप कही गह है ट
एतस्मात्कारणाद्रह्मन्करणीयमिदे त्वया ॥ सृषटिकता भव ब्रह्मन्सृष्ेश्च पालको हरिः ॥ ७९ ॥ मदीयश्च तथांऽशो यो ल्यकतां ठै
भविष्यति ॥ इयया प्रकृतिदवीष्यमाख्या परमेश्वरी ॥४५॥ तस्यास्तु शक्तिवादेवी ब्रह्माण सा भजिष्यति ॥ अन्या शक्तिः व
पुनस्तजप्रकृतेः सेभविष्यति ॥७६॥ समाश्रयिष्यति विष्णु लक्ष्मीरूपेणसा तदा ॥ पुनश्च काली नाम्ना सा मरदशं प्राप्स्यति ¢
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धुवम् ॥४७॥ ज्योतीरूपेण सा तत कायाथ संभविष्यति ॥ एवं देव्यास्तथापोक्ताश्शक्तयःपरमाश्ाभाः ॥७८॥ सिस्थिति
ख्यानां हि कायं तासां कमादधुवम् ॥ एतस्याः प्रकृत्तेरंशा मत्पियायास्सुरोत्तम ॥ ४९ ॥ त्वं च र्ष्मीष्ठपाश्रित्य कार्थं
कतभिहारसि ॥ ब्ह्स्त्वं च गिरां देवीं ्कृत्यशामवाप्य च ॥५०॥ सृष्टिकार्थ हदा कर्म्पत्रिदेशादिहाईसि ॥ अहं काली
समाध्रित्यमत्यिर्यांशां परात्पराम् ॥ ५१ ॥ रद्रह्पेण प्रख्य करिष्ये कार्यघत्तमम् ॥ चतर्वणमय रोकं
॥ «२ ॥ तदन्ये विविधः काथः कृत्वा सुखमवाप्स्यथः ॥ ज्ञानविज्ञानसंयुक्तो लोकानां हितकारकः ॥ ५३ ॥ ट
॥ ४८ ॥ ओर क्रमसे उनका कायं सृष्ट स्थिति ओर सहार करना है, हे देवता भो ! उत्तम कमते इतत मेरी प्यारी भरतिके अश ॥ ४९ ॥ ट
लक्ष्मीको बरहण कर तुम अपने कायं करो । ओर हे बहाजौ ! तुम मेरी प्रूतिकै अश भिरादेवीको भात होकर ॥ ५० ॥ मेरी आज्ञास ©
सृषटिका कायं करो, ओर जो भेरी भियाका अश परात्पर काटी है उसको ॥ ५१ ॥ भप्त करके भै त
>
<: १ रदररूपमे भलय कलग । सब आश्रम ओर
चा वणवाटे छोकके विभागको ॥५२॥ इसके सिवाय ओौर भी दूसरे कायं कर षु पाओ ज्ञानविज्ञान सक्तं टोकोके हित करके र्थि ॥५३॥
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तत्स्वराश्चमेचवम्
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रुणं.
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मेरी आज्ञाते तुम लोकोको अक्ति देनेवाछे हो जो मेरे दरीनका फर है वही तुम्हारे दशनका फठ होगा ॥ ५४ ॥ यह जो ने तुमको वर दिया
है यह सत्य होगा इसमे संदेह नहीं भरे हृदये विष्ण ओर विष्णके हदयमे भ हूं ॥ ५५ ॥ हम दोनोमिं जो अन्त्र नहीं जानता है वही
मरे सम्मत है, हरि मेरे वामांगते उत्पन्न ओर बरहा मेरे दक्षिणांगे उत्पन्न हँ ॥ ५९ ॥ ओर महाभख्य करएनेवाठे विश्वात्मा रद्र मेरे दय
उलन्न है हे विष्ण मँ ही बरहा विष्ण रुद्रपते तीन. भकारका हं ॥ ५७ ॥ ओर तीन शणो उत्पत्ति पाठन ओर ्रख्य करता हः
शिवजी साक्षात् यणोे भिन्न भरकति परुषसे प्रे है ॥ ५८ ॥ वह परब्रह्म अद्रय अविनाशी अनन्त पृण निरंजन हं, भीतर तम॒ बाहर सतव
युक्तिदोऽज भवान भव लोके मदाज्ञया ॥ मदनफलं यद्रत्तदेव तवदरशने ॥५९॥ इति द्तोवरस्तेद्य सत्यं सत्य न संशयः॥
ममेव हदये विष्णुविष्णोश्चहदयेद्यहम् ॥५५॥ उभयोरंतरं यो वे न जानातिमनो मम ॥ वामांगजो मम हरिदक्षि्णागोद्धवो
विधिः ॥ 4६ ॥ महाप्रल्यङृद्ुदोविश्वात्मा डदयोद्धवः ॥ त्रिधा भिन्नोद्यहं विष्णोब्रह्मविष्णुभवाख्यया ॥५७॥ सगरक्षाख्य
करच्चियणेरजआदिभिः ॥ युणभिन्नश्शिवस्साक्षात्परकृते परूषात्परः ॥ ५८ ॥ परं ब्रह्माद्रयो नित्योऽनन्तः पूर्णो निरंजनः ॥
अंतस्तमोषरहिस्सत्वश्िजगत्पारको हरिः ॥ ५९ ॥ अतस्सत््वस्तमोबाद्यक्चिजगछयङ्द्धरः॥ &०॥ अतर्बदीरजाश्चवत्रिजगत्स्
श्िकद्विधिः ॥ एवं शणाश्चिदेवेष यणमित्नःशिवःस्थृतः ॥ ६१ ॥ विष्णो सृशिकरप्रीत्या पालयैनं पितामहम् ॥ संपूज्यच्िषु
लोकेष भविष्यसि मदाज्ञया ॥६२ ॥ तवसेग्योषिधेधापिश््र एव भविष्यति ॥ शिवप्रणौवतारो हि बरिजगहयकारकः॥६३॥
| भ्रकार तीन जगतकै पाटन करनेवाठे हरि है ॥ ५९ ॥ भीतर सत्व बाहर तम रेपे तीनों टोककै ठ्य करनेवाछे महादेव है ॥ ६० ॥
अन्वह _रजोगाणवाठे तीनों _ छोककी_ दष्ट करनेषाठे ब्रल्ाजी है इत रकार तीनों देवताओं यण है, ओर सदाशिव गणे भिन्न ह
॥ ६१ ॥ हे विष्णजी ! इन सृष्टि करनेवाठे ब्ह्माजीको तुम प्रेमसे पाटना करना, भेरी अज्ञासे तुम तिरोकीमें पुजित होगे ॥ ६२ ॥ तुम्हारे
ओर ब्ह्याजीके भी सेव्य यह सव होंगे, तीन जगतके ख्य करनेवाठे रुदजी पु्णाीवतार है ॥ ६३ ॥
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| होगि ॥ १ ॥ बरह्माजीकै निमीण किथे लोकप जब दुःख होगा तब तुम सब लोकोकि दुःखनाश करनेभँ तत्पर होगे ॥ २ ॥ नैं तुम्हारे
पाने भविष्यति सुतः कल्पे तव पितामहः ॥ तदा दरक्ष्यसि मां चेव सोऽपि द्रक्ष्यतिपद्यजः ॥६७॥ एवभ्क्रा महेशानः कृपां
कृत्वातुलां हरः ॥ पुनः प्रोवाच सुप्रीत्याविष्णुं स्श्वरःप्रथुः ॥६५॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां संहितायां प्रथम
खण्डे सृ्टयुपाख्याने शिवतत्त्वव्णनो नाम नवमोऽध्यायः॥९॥ परमेश्वर उवाच ॥ अन्यच्छरणु हरेविष्णो शासनं मम सुत्रत॥
सदा सवषु रोकेषु मान्यः पूज्यो मविष्यसि ॥१॥ ब्रह्मणा निर्मिते कोके यदा इखं प्रजायते ॥तदा त्वं सर्वदुःखानां नाशाय
तत्परोभव ॥ २ ॥ सहाय ते करिष्यामि सर्वकार्ये च दुस्सहे ॥ तव शद्न्दनिष्यामि इुस्साध्यान्परमोत्करान् ॥३॥ विविधा
नवतारांशवगरहीत्वा कीतिंषुत्तमाम् ॥ विस्तारय हरे रोके तारणाय परो भव ॥ ४ ॥ गुणल्ूपो यं श्रो शयनेन वषा सदा ॥
कार्य करिष्ये कोकानां तवाशक्यं न संशयः ॥ 4 ॥ रुढरधयेयो भवभिव भवद्धेययो हरस्तथा ॥ थुवयोरन्तरत्ैव तवं शरस्य
किंचन ॥ & ॥ वस्तुतश्चापि चैकत्वं वरतोऽपि तथेव च ॥ लीख्यापि महाविष्णो सत्थ सत्यं न संशयः ॥ ७॥
सब दुःसहकार्योम सहायक हूगा मे तुम्हारे दुःसाध्य परम उत्कट श्ुओोंका भी संहार कंगा ॥ ३ ॥ है विष्ण ! तुम भी अनिकभकारके
अवतार धारणकर सततारके जीका उद्धार करने ण्वि अपनी कीतिका विस्तार करो, लोगो दुःखनाश करनेम तत्पर हो ॥ ४ ॥ भँ
य॒गरूप रद्र सदा इस शरीरे दम्हारा ओर ठोकका अशक्य कायं करंगा इसे सन्देह नहीं ॥ ५ ॥ तुम दोनोंको रुका ध्यान करना
चाहिये ओर हे हाजी ।वृमहार ध्येय हरि ह दम दौरनोभं ओर तुमं सदम क अन्तर नही है ॥ ६ ॥ वास्तवे तुम तीनों एकतत्वही
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पञ्कल्पमं पितामह तुम्हारे इ होगे तब उस्न समय तुम सुञञे देखोगे ओर बह्लाजी भी देखगे ॥ ६४ ॥ इसप्रकार महेशने कहकर ओर
अतु कपा करके फिर वह सर्वेश्वर प्रमु विष्णजीते कहने ठे ॥ ६५ ॥ इति श्रीशिवमहाषएराणे रद्र भाषादीकायां १० सर ° शिवतच्ववणेनं
नाम नवमोऽष्यायः ॥ ९ ॥ परमेश्वर बोरे हे हरी हे विष्णजी ! ओर भी मेरी आज्ञा सुनो हे सुव्रत ! त॒म सदा सब छोकोभें मान्य ओर
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सत्य सत्य ३ ॥ ७ ॥ जो र्रका ( भक्तं मनुष्य तुम्हारी निन्दा करेगा उ्तका
सम्पण शरण्य तत्काठ भस्म होजायगा ॥ < ॥ हे एरुषोततम ! तुमसे देष कृरनेसे इरूष नरकमे गिरेगा हे विष्णजी ! इसमे सन्देह नही यहं
सब मेरी आज्ञासे होगा ॥ ९ ॥ इस छोकमे तुम मदष्योके सक्तिदेनेवाठे भोगदेनेवाटे होंगे, तुम्हारा भक्त ध्यान पूजन करगे तुम निग्रह
धरकर् शंकरने का तुम इनकै दुःखम सदा सहाय करना ॥१३॥
अु्हमे समर्थं होगे ॥ १० ॥ यह कहकर सुज्ञ विधाताको हरिके हाथमे धरकः 6 त
ठम सवके अध्यक्ष वको सक्ति देनेवारे होंगे; ओर सब कामके साधक तुम सवते ष्ट होगे ॥ १२॥ मेरी आज्ञासे तुम सवके प्राण् हीर
शुढभक्तो नरो यस्तु तव निंदां करिष्यति ॥ तस्य पुण्यं च निखिलं दतं भस्म भविष्यति ॥ < ॥ नरके पतनं तस्य त्वेषा
पुरुषोत्तम ॥ मदाज्ञया भवेद्िष्णो सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ९॥ लोकेऽस्मिन्धक्तिदो नृणां अेक्तिदश्च विशेषत् ॥ ध्येय्ः
पूल्यश्च भक्तानां निग्रहाचुग्रहौ कुरु ॥ १० ॥ इत्युक्ता मां च धातारं दृस्ते धृत्वा स्वय दृरिम् ॥ कथयामास दुःखेषु सहायो
मव सर्वदा ॥ 99 ॥ सर्वाध्यक्षशच सर्वेषु थुक्तिखक्तिप्रदायकः ॥ भव त्वं सर्वथाश्रेष्ठस्सर्वकामप्रसाघकः ॥१२॥ सवेषां प्राण
रूपञ्च भव त्वं च ममाज्ञया ॥ सकट भजनीयोदहि स रुद्रोमततनुरे ॥ १३ ॥ त्वां यस्समाधितो नूनमामेव स समाश्रितः ॥
अंतरं यश्च जानाति निरये पतति धुवम् ॥१४॥ आयुर्बलं शरण्य तरिदेवानां विशेषतः ॥ संदेहोऽ् न कर्तव्यो ब्रह्मविष्णु
हरातमनाम् ॥ १९ ॥ चत्गसदस्णि ब्रह्मणोदिनशुच्यते ॥ रातिश्च तावती तस्य मानमेतत्करमेण ह॥ १8 ॥ तेषां धिशदहिने
मासो द्वादशेस्तेवत्सरः॥ शतवषेप्रसाणेन ब्ह्मायुः परिकीतितम् ॥ १७ ॥ ।
शंकर मेरे शरीर सदरशरीरका सदा भजन करना ॥ १२ ॥ जो तुमको आश्रय किये हँ वह सु्चको आश्रय किये है, जो हम तुमम अन्तर
जानता है वह अवश्य नरकमे गिरेगा ॥ १४ ॥ आप ॒देवताओंके आयुबल्को विशेषकर सुनो ब्रह्मा विष्ण ओौर शिवकी एकतामे संदेह न
करना चाहिये ॥ १५ ॥ चार सहच युगका ब्रहमाका दिन कहाता है इतनीही इस करमते राति जाननी ॥ १६ ॥ दृप्त प्रकार इन तीष दिनो
महीना ओरं बारह महीने वषं होता है, रेते सौवषकी आयुका बह्नाका दिन कहाता है ॥ ३७ ॥
ह हे विष्णो ! यह टीखामा्रका भेद है वास्तवमे नहीं यह
--
| एकवर्षं विष्णजीका दिन कहाता है वह भी अपने मानसे सौ वर्षतक जीता है ॥१८॥ विष्णके एकवर्षं रुद्रका एक दिन होता है
न्रखूप रुदरकी स्थितिक्रे जब सौवरष त्रत जाते ह॥१९॥ तव सदाशिवके स॒लका एकश्वास निकठता है यह श्वास जव तकं निकठता हे तनतक
शक्ति प्राप्त होती है॥ २० ॥ निश्वासके नेमे सब देहधारी बहा, विष्ण, हर गेवे, उरग, राक्ष होजाते है ॥ २१ ॥ इकीस् सहस्च सौ ओर
छः सौ दिनरात कं गये है ॥२२॥ हे सुर सत्तमो ! छः निश्वास ओर उच्छवास एक पठ होता है साठ पकी एक घडी ओर साठ घडीका
ब्रह्मणो वर्षमात्रेणदिनं वैष्णवथुच्यते ॥ सोऽपि वषैशतंयावदात्ममानेन जीवति॥ १८॥बेष्णवेन तु वषेण दिनरौदंभवेद्धुवम्॥
हरो वषंशते याते नररूपेण संस्थितः॥ १९ ॥ यावदुच्छसितंवक्रे सदाशिवसञुद्धवम् ॥ पश्चाच्छर्वित समभ्येति यावत्नि्वसितं
भवेत् ॥ २० ॥ निःश्वासोच्छरवसितानां च स्वेषामेव देहिनाम् ॥ ब्रह्मविष्णुहराणां च गंधर्वोरगक्षसाम् ॥२१।॥ एकविशसह
` खाणिशतेः षडभिश्शतानि च ॥ अहोराजाणि चोक्तानि प्रमाणंसुरसत्तमौ ॥२२॥ षड्भिच्छरवासनिश्वसेः पलमेकं प्रवातिंतम् ॥
घटी षष्टि पला परोक्ता सा षष्टया च दिनं निशा ॥२३॥ नि्वासोच्छरवासितानां च परिसंख्या न् विदते॥ सदाशिवृसञचत्थान
मेतस्मात्सोऽक्षयः स्मृत्ः ॥ २९ ॥ इत्थं शूप त्वयातावद्रक्षणीयं ममाज्ञया ॥ तावत्स कार्य वै कतन्य॑विविधणेः ॥२५॥
ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वच्श्शंभोमया च भगवान्हरिः ॥ प्रणिपत्यच विश्वेशं भाद मैद्तरं वशी ॥ २६ ॥ विष्णुरूवाच ॥
शंकर श्रूयतामेतत्कृषा सिधो जगत्पते ॥ सव॑मेतत्करिष्यामि भवदा ज्ञाषशावुगः॥ २७ ॥ मम ध्येयस्सदा त्वं च भविष्यसि
न चान्यथा ॥ भवतस्सवेसामथ्य रब्धं चेव चुरा मया ॥ २८ ॥
एक दिनरात होता हे॥२२॥ शिक निश्वास उच्छासकी संख्या नहीं है, इसे सदाशिवका उत्थान अक्षय कहाता है ॥२५॥ इस भकार मेरी
आज्ञासे मेरारूप तुमको रक्षा करना चाहिये, ओर अनेक गणो सृ्टका कार्थ करना चाविये॥२५॥ बह्माजी बोरे भै ओर भगवान् इरि इस्भकार
शिवजीकै वचन सुनकर विश्वेश्वरो प्रणामकर हमरे अन्तरम वह वशी बोटे॥२६॥ विष्णजी बोले हैषपृप्तागर ! जगत्पते हे शकर सुनो आप
की आज्ञाके वशीभूत होकर भं स कहंगा ॥२७॥ तुम सदा मेरेयेय होगे इमे सदेह नहीं है, आपतेही चैने प्रहे सामथ्यं पातत की रै।॥२८॥
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ु | ह स्वामिन्! क्षणमात्रको भी आपका ध्यान भेरे चिक्तसे उतरे न भू यही चाहता हं ॥ २९ ॥ हे स्वामिन् ! जो को भेरा भक्त तुम्हारी
| निंदा करेगा, उत्ते आप नरकमे निश्वय वास देना ॥ ३० ॥ हे स्वामिन् ! जो आपका भक्त होगा वह भेरा प्यारा होगा इसत प्रकार जौ
जानता है ऽसतको खक्ति दुभ नही है ॥ ३१ ॥ आपने जो निश्वय हमारी महिमा बडाई हे कदाचित् अवयां दसा नहीं होता आप क्षम
| कौजिये ॥ २२ ॥ ब्रहाजी बोढे तब शिवजी विष्णजीके यह उत्तम वचन सुनकर भरेम गौडे हमने आपकी अवयुणताको क्षमां किया
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£| क्षणमात्रमपि स्वामिस्तव ध्यानं परं मम ॥ चेतसो दूरतो नैव निगच्छतु कदाचन ॥२९॥ मम भक्तश्च यः स्वार्मिरतव निंदा
&|| . करिष्यति ॥ तस्य वै निरये वासं प्रयच्छ नियतं धुवम् ॥ ३० ॥ त्वद्भक्तो यो भवेत्स्वाभिन्मम प्रियतरोहि सः ॥ एवं वै यो
&|| विजानाति तस्य शक्तिनं दुखभा ॥३१॥ महिमा च मदीयोद्य वद्धितो भवता वम् ॥ कदाचिदगुणश्वैव जायते क्षम्यतामिति
|| ॥३२॥ बरह्मो्राच ॥ तदा शयुस्तदीय हि त्वा वचनसुत्तमम् ॥ उवाच विष्ण सुप्रीत्या क्षम्या तेऽशुणता मया ॥३३॥ एव
|| स्त हरि नौस क्राभ्यांपरमेश्वरः ॥ पस्पशे सकरागेषु कृपया तु कषानिधिः॥३६॥ आदिश्यविविधान्धर्मान्सरवैदुःखदरो
|| इरः ॥ ददौ वराननेकां आवयोहितचिकीषया॥ ३५ ॥ ततस्स भगवान्छंषुःकृषया भक्तवत्सलः दष्टयासंपश्यतोःशञौष ततरे
¢ वांतरधीयतः ॥ ३६ ॥ तद्। प्रकृति कोकेऽस्मिषटिगप्रूजाविधिः स्मृतः ॥ गे पतिष्ठितश्शंभु्ुकितशुक्तिप्रदायकः॥ ३७ ॥
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॥ ३३ ॥ परमेश्वरं हम दोनों यह बात कहकर अपने हाथसे छुपाकर ङपानिधिने सब अगोको स्पशं किया ॥ ३४ ॥ सव दुःख हरने
बाठे हरिने अनेक धभाको उपदेश करके हम दोनो हितकी इच्छसे अनेक षर॒देते हुए ॥ ३५ ॥ तब भगवान् शिव ऊपासे भक्तवत्सठ
|| हम् ॒दोनोको कपास देखकर वहांही अन्तधौन होगये ॥ ३६ ॥ तभीसे इतसटोकमे ठिग पूजापिभि चटी है, दिग भ्तिष्ित शिवजी भुक्ति
मुक्ति देनेबठे है ॥ ३७ ॥
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दिगवेदी महादेवी है टि साक्षात् महेश्वर है ठयकर ठेनेसे ही इसा नाम रिग है इसी सब जगत् है ॥ ३८ ॥ जो शिवृिगके समीपमे
| व्याख्यानको सुनता है बह छः महीनेमं शिवहप होजाता है इमे विचार कर्तव्य नहीं है ॥ ३९ ॥ जो कोई ठिगके समीपतमं
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कुछ काये करता है हे महासने उसके पण्यफर कहनेको मँ समथ नहीं हूं ॥ ४० ॥ इति श्रीशिवमहाए्रणे रदरसंहिताभाषारीकायां ठ
प्र" सृ° दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ऋषि बोठे हे महाभाग सतजी ! हे व्यपशिष्य ! अपको नमस्कार है आपने परम पावनी शिवकथा
दिगवेदिदादेवी खगं साक्षान्मरैश्वरः ॥ ल्यनाद्टिगमित्युक्तं तैव निखिलं जगत् ॥ ३८ ॥ यस्तु ठैगं पठेतित्यमाख्यानं ठ
छिगसच्निधौ ॥ षण्मासाच्छिवदूपो वै नार कार्या विचारणा ॥ ३९ ॥ यस्तु सिगसमीपे तु काय किंचित्करोति च ॥ तस्य ¢
पुण्यफलं वक्तु न शक्रोमि महासने ॥४०॥ इति ्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसंहितायां प्रथमखंडे स॒ष्ठयपाख्याने परम ¢
शिवततत्ववणनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ऋषय उचुः ॥ सूतस्रूत महाभाग व्यासशिष्य नमोस्तु ते ॥ श्रावितायद्धता
शेवकथा परमपावनी ॥१॥ तघ्राद्धता महादिग्या टिगोत्पत्तिः ता शुभा ॥ त्वा यस्थाः प्रभावं च दुःखनाशो भवेदिह ॥२॥ ट
ब्रह्मनारदसवादमवुसत्य दयानिधे॥ शिवाचनविधि ब्रूहि येन तुष्टोभवेच्छिवः ॥३॥ बाह्मणेःक्षतियेवश्येःशुरैवां पूज्यते शिषवः॥ ४
कथं कायं च तद् ब्रूहि यथा ग्याससुखाच्छरृतम् ॥४॥ तच्छ्रत्वा वचनं तेषां शरमदं अतिसमतम् ॥ उवाच सकर पीत्या सुनि |£
परशावसारतः ॥५॥ सूत उवाच ॥ साधु पृषं भवद्भिश्च तद्हस्यं शनीश्वर: ॥ तदह कथयाभ्ययं यथाुदधि यथाश्चुत् ॥६॥ |©
हमको सुनाई ॥१। उत्तमे परम अदत दिष्य छिगोत्पतनि सुनी जिसका प्रभाव सुनकर इष संहारं दुःखनाश होता है ॥ २॥ हे दयानिषे ! बहा || |
ओर नारदजीका सम्बाद स्मरण करके अव आप शिवाचनकी विधि किये जिहत शिवजी सन्तु होते है॥ ३। नाण, क्षत्रिय वैश्य ओर शूदर यह ठ
चारों बणे शिवजीका पूजन करते है व्यासजीने इसको केता करना छ्खिा है सो आप कहिये ॥४॥ कल्याणदायक शरुति्म्भत उनके यह वचन एन ||
कर ब॒तजी परश्नके अयुततार सब कहने ठगे ॥५॥ हे खनीश्वरे ! तुमने यह बात बहुत अच्छी पृ्ठी सो भने जेता सुना है वैषा कहता हं ॥ ६ ॥ +
/| जैसा आप पते हो पूरवकामंव्या्तजीने सनत्कुमारते पूषा ओर जो उन्होने कहा ओर उपमन्युन घना ॥ ७ ॥ फिर शिवपूजादिकं जौ क्ट
है सो व्या्जीने कोकोके धिवकी कामनासे कषे पाया ॥ ८ ॥ उपमन्यु महात्माने वह सब शरीरुष्णसे कहा वह भ सव तुमसे कहता हू जे
पहठे बह्माजीने कहा है ॥ ९ ॥ बह्याजी बोठे हे नारदजी ! सुनो संक्षेपे टिंगपूजन विभि कहता ह, हे सने विस्तारते तो कई सो वषमे भी
नहीं कह सकता है ॥ १० ॥ इप्मकार शिवजीका सुलदायक स्वच्छ सनातन रूप है सब काम ओर फरकी भाततिकै छम प्रमभक्तिते उनका
भवद्धिःपच्छयते यदवत्तथा व्यासेन वैषुरा॥ पृष्ट सनत्कुमाराय तच्छत दयुपमन्युना॥७॥ ततो व्यासेन धत्वा शिवपूजादिकं
च यत् ॥ मद्यं च पाठितं तेनकोकानां हितकाम्यया ॥८॥ तच्छतं चैव कृष्णेन इयुपमन्योर्महात्मनः ॥ तदहं कथयिष्यामि
यथा ब्रह्मावदत्पुरा॥९॥ब्रह्मोवाच॥ श्रणु नारद वक्ष्यामि संक्ेपाद्िगप्ूजनम्॥ वक्तं वषंशतेनापि न शक्य विस्तरान्सुने ॥१०॥
एवं तु शांकरं रूपं सुख स्वच्छे सनातनम्॥ प्रूजयेत्परया भक्तया सर्वकामफलाप्तये॥११॥ दारि्रोगदुःखं च पीडनं शब्ुसंभ
वम् ॥ पापं चतुर्विधं तावद्यावत्राचयते शिवम्॥१२॥ सम्पूजिते शिवे देवे सव॑दुःखंविलीयते ॥ संपद्यते एखंसर्वं पश्चान्मुक्तिरवा
प्यते ॥१३॥ येवे मावुष्यमाश्चित्य ख्यं संतानतस्सुखम् ॥ तेन पूज्यो महदेवःसवंकार्यार्थसाधकः॥१९॥ ब्राह्मणाः क्षिया
वृश्याश्ुदराविधिवत्कमात्॥ शंकरार्चाप्रहर्वत सर्वकामार्थसिद्धये॥१५॥ प्रातः कारे समुत्थाय सुहूतं बह्मसंज्ञके ॥ गुरोश्च स्मरणं
करत्वा शंभोश्वैव तथा पुनः ॥१६॥ तीर्थानां स्मरण कृत्वाध्यानचैव हरेरपि॥ ममापि निजसणां वै सुन्यादीनां तथा मुने॥१७॥
पूजन करना चाहिये ॥११॥ दख रोग दुःख शतुकी पीडा यह चार प्रकारका दुःख पाप शकरकी पूजा जबतक नहीं कौ तवतकही रहते है
॥१२॥ देव शिव शंकरका पुजन करने सब दुःख बिला जाते है सव सुख होकर पीछे यक्त पराप्त होती है॥ १ ३॥मद॒ष्य जन्भको प्राप होकर सख्य
सुख संतानका है, इसके लिये सव कायं अर्थके साधक महादेवजीका पूजन करना चाहिये ॥१४॥ सब कामसिद्धिके ल्यि बाह्नण क्षत्रिय वेश्य शुद्र
॥ ऋमसे शिवजीका पूजन करे ॥१५॥ भ्रातःकाठ बाह्सुहूतंमे उढटकर गुर् ओर शिवजीका स्मरण करके ॥१६॥ तीर्थोका स्मरण कर शंकरका|
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कग गागुणदगुशकय
ततःस्तोरं शुभ नाम गृहणीयाद्विधिूरवकम् ॥ ततोत्थाय मलोत्सगं दक्षिणस्यां चरेदिशि॥१८॥ एकान्ते त॒ विधि ङर्थान्मलो
त्सस्य यच्छृतम्॥ तदेव कथयाम्यद्य शृण्वाधाय मनो सुने॥१९॥ शद्धा मृदंद्िजो रिप्यात्प॑चवारं विडुद्धे॥ क्षत्रियश्च चतुवौरं
वैश्यो वरय तथा ॥२०॥ शद्धो द्विवारं च मृदँ गरह्णीयाद्विधिशद्धये ॥ दे बाथसकृ्टिगे वारमेकं प्रयत्नतः ॥२१॥ दशवारं
वामरस्ते सप्तवारं द्वथोस्तथा ॥ पत्येकम्पादयोस्तात अवारं करयोः पुनः॥२२॥ च्रीमिश्वञूद्वत्का्य भ्दायदणडत्तमम्॥ हस्तौ
पादौ च प्रक्षाल्य पून्मृदमादरेत् ॥२३॥ दंतकाष्ठं ततःछ्यात्स्ववर्णक्रमतो नरः॥२९॥ विप्रः यदितकाषठद्रादशांय॒मानतः॥
एकादशा गुलं राजाविश्यःकु्यादशांगुलम् ॥२५॥ शूद्ो नवां यादिति मानमिदैस्सृतम्॥ कारुदोषं विचाय्थैव मनुष विव
जयेत् ॥२६॥ षष्टयाद्यामाश्च नवमी व्रतमस्तं रेदिनम् ॥ तथा श्राद्धदिनं तात निषिद्धे रदधावने ॥२७॥
चरणतछम तीनवार किर तीनवार हाथ धोे ॥ २२ ॥ स्लीजरनोको शद्रके्तमान शृत्तिका धहण करनी चाहिये हाथ पैर भोकर पूर्ववत् पृत्तिका
छावे ॥ २३ ॥ फिर मनुष्य अपने वणेक्रमसे दतौन करे ॥ २४ ॥ ब्राह्मण बारहर्जगल्की दतौन करे, क्षत्रिय ग्यारहञअय॒र्की वैश्य दश
अय॒छकी दतौन करे ॥ २५ ॥ शुद्र नौ अंयठकी करे, इसभकार यह मान कहागया है कार्दोषको इसभरकार विचारकर मलुद््टको वर्जित
करदे ॥ २६ ॥ छट, अपावत, नवमी वतका दिन) अस्तक समय रषिवारकै दिन तथा धाद्धकेदिन दँतौन, न करे ॥ २७ ॥
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. धरे मेरा देवता ओर सुनिरयोका ध्यान करे ॥ ॥ १७ ॥ शिवनामका स्तोत्र विधिपूर्वकं जपे फिर उठकर दक्षिणदिशामे भटोस्सगं
कृरे ।। १८ ॥ एकान्तम शाश्चायुसार मलोत्सर्गं दिधि करे, हे खने सो मँ आपसे कहता हूं तुम मन ठगाकर सुनो ॥ १९ ॥ बाह्मण शुद्धिके
लये पचार पृक्तिकासे हाथ धोवे क्षत्रिय चारवार वैश्य तीनवार ॥ २० ॥ ओर शूद्र॒ दोबार शुद्धिकैष्ियि शृत्तिका शरहण करे, दा ओर
छिगमे एकवार प्रयतनसे मृत्तिका ठ्गावे ॥ २१ ॥ वामहाथमे दशवार फिर दोनों हार्थोमं सातसातवार भृक्तिका ठगावे, हे तात ! प्रत्येक
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| तीर्थादिमे कमसे विधिपूर्वकं क्षानकरना चादि विशेष करकेदेशकाठ अवु्तार समत्र ल्ञान करे ॥२८॥ पहठे लानकरकै धौ तवचन धारण करे! ठकान्त
॥३१ अच्छे स्थले बैढकर सध्या करे॥२९॥ यथायोग्य विधिकरकै पूजा आरंभ करे, मनस्थिर करके पुजास्थानमं प्रवेश करके ॥३०॥ पूजाविधिको ठेकर ¢
अपने आसनम बैठकर न्यास्तादिकका विधान करके कमसे शकरका पूजन करे ॥३१॥ पहडे गणेशजी शिर द्वारपाख दिकूपाखोंको पूजकर सिंहास्षनकी
कल्पना करे ॥३२॥ अथवा पूजाद्रव्यके समीप अष्टद्कमल करके आप् बैठकर ओर शंकर प्रमुको बहा स्थापनकर ॥३३॥ तीन आचमन कर पीछे ४
स्नानं त॒ विधिवत्कार्थं तीर्थादिषुक्रमेण तु ॥ देशकार्विशेषेण स्नानं कायं सर्म्रकम् ॥२८॥ आचम्य प्रथमंततर घौतवंश्चेण
चाधरेत् ॥ एकान्ते सस्थे स्थित्वा संभ्याविधिमथाचरेत् ॥ २९॥ यथायोग्यं विधि कृत्वा प्रजाबिधिमथारभेत् ॥ मन ¢
सतुपुस्थिरं कृत्वा पूजागारं प्रविश्य च ॥३०॥ पूजाविधि समादायस्वासने ह्युपविश्य वे ॥ न्यासादिकं विधायादौ पूजयेक्रमशो ४
हरम्॥३१॥ प्रथमे च गणाधीशं द्वारपालास्तथेव च ॥ दिक्पाल सुसंपूज्य पश्वात्पीे प्रक्पयेत् ॥ ३२ ॥ अथ वाऽ्टदटं ट
करत्वा प्ूजादरव्थसमीपतः॥ उपविश्य ततस्तत्र उपवेश्य शिवम् प्रथुम्॥३३॥ आचमनं कृत्वा प्रक्षाल्य च पुनः करो ॥ प्राणा ६
यामघरयङृत्वा मध्ये ध्यायेचयम्बकम्॥२४॥ पेचवक्गं दशुजं शुदधस्फटिकस्निभम् ॥ सर्वाभरणसंयुक्तं भ्या्च्मोततरीयकम् ||
॥३५॥ तस्य साह्प्यतां स्मृत्वा दहेत्पापं तरस्षदा ॥ शिवं ततःसद्ुत्थाप्यं पूजयेत्वरमेवरम् ॥३६॥ देदञयुधि ततःकृत्वा मूल ४
यं न्यसेत्कमात् ॥सर्वञप्रणवेनेव षडंगन्यासमाचरेत्॥३७॥ कृत्वा डदि प्रयोगं च ततः पूजां समारभेत् ॥ पाययार्घाचमना्थं च ४
पात्राणि च प्रकल्पयेत् ॥ ३८ ॥
हाथ धोकर तीन प्राणायाम कर मध्यमे उयम्बकदेवका ध्यान करे ॥३४॥ पाँच सुख दश भुजा शुध स्फणिकं मणिके समान उज्ज्वर सब आभरण
व्याघ्र चमं ओौर उत्तरीयकै सहित शोभायमान ॥३५॥ शिवजीकी साद्प्यताको प्राप्त होकर राणी अपने पाप सदा नष्ट करे, फिर परमेश्वर शिवको
उढाकर पूजन करे ॥३६॥ फिर देहशुद्धिकर कमह मवका न्यास करे सवेन ओंकारके सहित षडंगन्यास करे ॥ ३७ ॥ हदयमे भरयोग कर ||
रुप. २
अ० ११
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फिर पूजा आरंभ करे, पाय अधं आचमनके ये पा्ो्ी कल्पना करे ॥३८॥ बुदधभान् यथाविधि नये षडोको स्थापन करे पिर कुशाओंति
|| आच्छादन ओर जलसे छिडककर ॥३९॥ उन सव पारत्रोभ शीतरजर छोडे ओर बद्धिभान् द्रध्योको देखकर ओकारपुवेक उनमें उल ॥४ ् ठ
# पामे उशीर ओर चन्दन दे, जायफर, कंकर) कपूर, वटमूट, तमा ॥ ४१ ॥ यथायोग्य चण करके आचमनमे डाले इन सव पदार्थोमें ्
¢ चन्दनादिकं दाठे ॥४२॥ देवदेवके पाश्वभागमे नंदीग्वरकी पूजा करे) विविध गेष धूप दीपसे शिवकी पूजा करे ॥४३॥ फिर मूनुभ्य प्रसन्न ता त
# पवक रिगशुद्धि करक चित्तके अनुसार ओंकार नमस्कार युक्तं बोरकर ॥४४॥ ओंकारपरषक स्वस्तिपञ्नादि आसनकी कल्पना करे उससे पूवेकी
ए स्थापयेद्धिविधान्डुभात्रव धीमान्यथाविषि॥ दभैराच्छायतेरेव संस्थाप्याभ्युश््यवारिणा ॥३९॥ तेषुतेषु च सरवेषुक्षिपेत्तोयंसशी ए
|| तलम्॥ प्रणवेन ्षिपततेषु दव्याण्यालोक्यबुद्धिमान् ॥४०॥ उशीरं चन्दनंचेव पाय तुषारकल्पयेत्॥ जातीकं कोट्कृपूरवेटसूल ट
तमालकम्॥४१॥ चणयित्वा यथान्यायंक्षिपेदाचमनीयके ॥ एतत्सवेषु पातर दापयेचन्दनान्वितम्॥७२॥ पाश्व॑योदेवदेवस्य |£
नदीश तु समचयेत् ॥ ग॑धेरधूपेस्तथा दीपेविविधेः प्ूजयेच्छिवम्॥४२॥ खिगुद्धिततः कृत्वा खुदायुक्तो नरस्तदा॥ यथोचितंत॒ |©
अवेः भणवादिनमोतिकतैः ॥४७॥ कर्पथेदासनेस्वस्तिपद्ादि प्रणवेन तु ॥ तस्मातपूर्वदिशं साक्षादणिभामयमक्षरम् ॥४५॥ ||
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4
रषिम दक्षिणं चेव महिमापञ्चिमं तथा॥ प्रा्तिथवोत्तरं पत्र प्राकाभ्यं पावकस्य च ॥४६॥ ईशित्वं नैतं पञ्चवशित्ववायुगोचरे॥
ए | कंटपयत् क्रमात् ॥ ४८ ॥ अव्यक्तादि चतुश्च सोमस्याति शणत्रयम् ॥ सयोजातं प्रवक्ष्यामीत्यावाद्य परमेश्वरम् ॥ ४९ ॥
सर्वज्ञत्वं तथेशान्य कणिका सोम उच्यते॥४७॥ सोगस्याधस्तथा सूर्यस्तस्याघः पावकस्त्वयम्॥ धर्मादीनपितस्याधो भवतः
ओर साक्षात् अणिमामय अक्षरको ॥ ४५ ॥ ठधिमा सिद्धि दक्षिणको महिमा पथिको प्ाधतिकी उत्तरको भाकाम्यको अभिदिशामें ॥४६॥
2
ईैशिको ने त्यदिशा्मे वशित्वको वायुकोणसे दले सर्वज्ञ सिद्धिको ईशाने कल्पना करे कणिका सोभ कहटाती है ॥४७॥ सोमक नीते सुरथं ४
उसके नीचे पावक उसक नीचे धमौदि कमस कल्पना करे ॥४<८॥ अव्यङ्तादिको चारों दिशाभे सोमक अन्तक तीनों यणोको कल्पना करे ह
सयोजातं प्रवक्ष्यामि° इस मंत्रसे परमेश्चरका आवाहन करे ॥ ४९ ॥ =
३८
इत मेते पूजन करे पाय आचमनका विधान कर फिर अध्यंदे ॥ ५१ ॥ विधिपु्वक गन्धचंदनके जरसे सद्रकी स्थापना करे फिर पंचगव्यकै
विधानत गरह्यपाजमे अभिेत्नित कर ॥५२॥ भणवपर्वक प्चगव्यसे शकरको स्नान करावे, दही, शहत आओौर गन्नेके रसे ॥*५३॥ तथा परीमे सव
(~ (^~ 16 मोंकार 6५, = = (९ गँ
कामना ओर हितकरनेवाठेका पूजन करना चाहिये, पवित्र द्रव्योंे ओंकारपूवक महादेवका पूजन करे अभिषेक करे ॥ ५४ ॥ पवित्र जटोँकै
वामदेवेन मंेण तिषठेचेवासनोपरि ॥ सातिध्यं श्गायञ्या अघोरेण निरोधयेत्॥५०॥ ईशानं सर्वविच्रानामिति मंत्रेण पूजयेत्॥।
पाद्यमाचनीयं च विधायार्व्यप्रदापयेत्॥4१॥ स्थापयेद्धिधिना शद्रगंधचंदनवारिणा ॥ पञ्चागव्यविधानेनगरद्यपाजरेऽभिमेञ्य च॥
॥९२॥ प्रणवेनैवगब्येनक्नापयेत्पयसा च तम् ॥ दध्ना च मधुना चेव तथा चेक्षुरसेन त्॥५३॥ घृतेन तु यथा पूज्य सर्वकामद
तावहम्॥ पुण्ये्ै्ये्महादेवं प्रणवेनामिषेचयेत् ॥५४॥ पवि्रजलभाण्डषु मंतरैःतोयं क्षिपेत्ततः ॥ शुद्धीकृत्य यथान्यायेसितवघ्रेण
साधकः ॥६९॥ तावदृदूरं न कर्तव्यं न यावज्चन्दनं क्षिपेत् ॥ तंदुलेस्पन्द्रेस्तच प्रूजयेच्छकरम्मुदा ॥५६॥ कुशापामागैकप्र
जातिच॑पकपाय्ठैः॥ करषीरेस्सितेश्चैव मदिकाकमलोत्पठेः॥५७॥ अपवंपुष्पर्विविधेन्दनायैस्तथेव च ॥ जलेन जलधारा
कृलपयेतपरमेश्वरे ॥ ५८ ॥ परेश्च षिषिधैदवं स्ापयेच महेश्वरम् ॥ मंअपूवं प्रकर्तव्या पूजा सर्वफलप्रदा ॥ ५९ ॥
पारमे मंत्रे जर डे, ओर वह साधक यथायोग्य श्रतवद्चसे जठको छानकै ॥*५५॥ तवतक दूर न करे जवतकं चन्दन न डे ओर सुन्दर
चांवलोंसे आनंदपुवंक शकरका पूजन करे॥५६॥ कुशा; चिरचिटा, कपूर, जाती, चम्पक, पारक, कनेरके एर मिका ओर कमठ ॥५७॥ तथा
अनेकं दृप्रे अपुवं ए चन्दनादिसे पजन कर परमेश्वरपर जठ्की धारा छोडनी चाहिये ॥ ५८ ॥ अनेक प्रकारके पानम जठ भरकर देवदेव
१ खद्राष्टाध्यायोमं यह् मंत्र लखि हे ।
रु०स्,२
अ० ११
4८०९ + > ०९40 ०९4 २८ ०4 = = 0 ०९43-4
परमेश्वरका पूजन करे मंनू्वक पूजा करनेसेपूजा सब कामना ओर फलक देनेवाल है॥५९॥हे तात ! सव कामक सिद्धिके ख्ये भै उन को ||
संक्षेपे कहता हू तुम सावधान होकर सुनो ॥ ६० ॥ पटाये हुए मंत्र तथा वाङ्मय कण्ठस्थ मन्त रुदरसक्तके मन्त नीटषुक्तके मन्त शुङ्कयनुरवेदके ||)
सुन्द्र मन्त्ोसे ॥६१॥ होतारम् ° यजुके मन्त्र अथवशीरषेके मन्त्र शांति एनः शांति आर्णिमन््र अरुणमन्वोंसे ॥६२॥ जो अपनेको अभीष्ट || ^
हो पेते अथ ओर सामद्रारा तथा देवत्रतमन्व॑से ॥६२॥ रथां तर मंत्र पुष्पसुक्तसे युक्तेन इतत मनसे मूत्युजय मन्त्र तथा प॑चाक्षरमत्रसे ॥ ६४ ॥ ठ
मर्ोितुभ्यं तस्तात सर्वकामार्थसिद्धये ॥ प्रवक्ष्यामि समासेन सावधानतया शृणु ॥ ६० ॥ पाठ्यमानेन मत्रेण तथा वाड्
मयकेन च॥श्दरेण नीटश्रेणु्ुकले न समेन च ॥६१॥ होतारेण तथा शीष्णाश्मेनाथर्वणेन च ॥ शां त्या वाथएनश्शात्या ट
मारणेनारूणेन च॥ ६२ ॥ अथाभीष्टेन साम्ना च तथा देवव्रतेन च॥६३॥ रथांतरेण पुष्पेण सूक्तेन युक्तेन च ॥ सूत्यंजयेन
मंत्रेण तथा पंचाक्षरेण च ॥६९॥ जरधाराः सदखेणशतेनेकोत्तरेण वा ॥ कर्तव्या वेदमागेण नामभिर्वाथ वा एनः ॥ &4 ॥
तत्ंदनपुष्पादि रोपणीय शिवोपरि ॥ दापयेत्प्रणवेनैव खुखवासादिकं तथा ॥ &६ ॥ ततः स्फटिकसंकाशं देवं निष्कलमक्ष
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यम् ॥ कारणं सवलोकानां सर्वलोकमयं परम् ॥६७॥ ब्र्न्द्ोपेन््रविष्ण्वायैरपि देवैरगोचरम् ॥ वेदविद्धि वेदाति त्वगोचर
ठ
मिति स्म्रतम् ॥ ६८ ॥ आदिमध्यान्त्रहिते भेषजं सर्वरोगिणाम् ॥ शिवतत्वमिति ख्यातंशिवदिगं व्यवस्थितम् ॥ ६९ ॥
प्रणवेनैव मेत्ेण पूजयेिगमूदधनि ॥ पूपेदीपिश्च नेवेयेस्ताम्बूलेःसुन्दरेस्तथा ॥ ७० ॥
सहसत जारा बा १०१ एकौ एक जटधारा बेदमागं वा नाममन््ते शिवजीके ऊपर करनी चाहिये ॥६५॥ फिर शिवजीके ऊपर चन्दनं ष्पादि
चाने चाहिये, तथा खुसवासादिक निमित्त सामी ओंकायपूक देनी चाहिये ॥६६॥ पीछे स्फरिकपणिकै समान देव निष्कर अक्षयं स्तव टोको
कारण सब छोकमय प्रमरूप॥६७॥ बहा इद उपन् विष्ण आदिक भी अगोचर तथा वैदज्ञाताओंको भीवेदान्तमे अगोच२॥६८॥ आदि मध्य अतरहित
सव रोगि्ोकी आपिम मिस्यात शिवत् शिवरदिग व्यवस्थित है ॥६२॥ भूप दीप देकर नवय ताभ्बरूर सुन्दर शिवङिगप्र चढावे, ओर प्रत्येक
बार वस्तु चढनेभे ओंकारका उच्चारण करे ॥ ७० ॥ फिर यथोक्त विधिसे मनोहर नीराजन करे, नमस्कार स्तुति ओर अनेक भकार न £
से न
पडे ॥ ७१ ॥ अर्यं देकर पीछे शिवजीके चरणो शूक बसेर, पीठे देवेशको णाम करकं आराधन करे ॥ ७२ ॥ फिर उढकर हा
॥३२॥
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पष्य ठेकर इष अगठे छिस मेत्रसे ईशान देवकी भाश्रना करे ॥ ७३ ॥ जोज्ञान वा अज्ञान मेने पुजा की है हे शकर ! वह॒ आपकी
कपासे सब सफ हो ॥ ७४ ॥ यह पठकर शंकर के ऊपर प्रेमसे ए चढावे, फिर स्वस्तिवाचन कर आशीवौद् ठे ॥ ७५ ॥ रर शिवकै
नीराजनेन रम्येण यथोक्नविधिना ततः॥ नमस्कारैः स्तवैशवान्येतर्नानाविधेरपि ॥७१॥ अष्यैद्वा तु पुष्पाणि पाद्योस्सुवि
करीयं च ॥ प्रणिपत्य च देवेशमात्मनाराधये च्छिवम् ॥७२॥ इ्तेगृररीत्वा पुष्पाणि संुत्थाय कर्ताजकिः॥ प्राथयेत्पुनरीशुान
मंत्रेणानेन शंकरम् ॥ ७३ ॥ अज्ञानाघदि वा ज्ञारालपपूजादिकं मया ॥ कृतंतदस्तु सफलंकृषया तव शंकर ॥७४॥ पटित्वेव ¢
च पुष्पाणि शिवोपरि अदा न्यसेत् ॥ स्वस्त्ययने ततः कृत्वा श्चाशिषो विविधास्तथा ॥७५॥ माज॑न तु ततः कार्यं शिवस्यो
प्रि वै एनः ॥ नमस्कारं ततः क्षांति षुनराचमनाय च ॥७६& ॥ अघोज्चारणश्ुायं नमस्कारं प्रकल्षयेत् ॥ प्रार्थयेच्च पुनस्तत्र ट
सर्वभावसमन्वितः ॥७७॥ शिवि भक्तिश्शिवे अक्तिश्शिवे भक्तिैवे भवे ॥ अन्यथा शरणे नास्ति त्वमेव शरणं मम ॥७८॥ ||
इतिर्पाथ्य देवेशंसवंसिद्धिमदायकम् ॥ पूजयेत्परया भक्तया गर्नादैवशेषतः ॥ ७९ ॥ नमस्कारं ततः त्वा परिवारगणे ¢
ससह ॥ प्रहषंमतुरं लब्ध्वा कयं कुर्या्यथासुखम् ॥ ८० ॥
ऊषर माजन करे नमस्कार अपराध क्षमापन कर फिर आचमन करावे ॥ ७६ ॥ किर अधोरम॑त्र उच्चारण कर नभस्कारक१ कल्पना करे
किर सव भावे शकरकी भाथेना करे ॥ ७७ ॥ शिव्भे भक्तिहो शिवम भक्ति निरन्तर हो तुम्हारे सिवाय से कोई शरण दे नेवाडा नही
शरणदेनेवाठे हो ॥ ७८ ॥ इस भकार ष सिद्धि देनेवाठे देवेशकी भा्ना कर प्रम भक्ति ओर विशेषकर गढनादके श>.रोसे भरनन
करे ! ७९ ॥ फिर परिवारगणोँ सहित नमस्कार कर वी प्रसन्नताको भ्राप्त हो यथाश्चुख कार्यं करे ॥ ८० ॥ #
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एवं यः पूजयेत्नित्यं शिवभक्तिपरायणः ॥ तस्य वै सकला सिद्धि्जायते तु पदे पदे ८१ ॥ वाग्मी स जायते तस्य मनोभी
एफलंधुवम् ॥ ोगं दुःखं च शोकं च हद्ेगं छृतरिमं तथा ॥८२॥ कौटिल्यं च गरं चैव यद्यहःखशपस्थितम् ॥ तडःखं नाश
यत्येव शिवः शिवकरः परः॥८३॥ कल्याणं जायते तस्य शुक्लपक्षे यथा शशी॥ वद॑ते सद्वणस्तञ धुवं शंकरपूजनात्॥८४॥
इति पूजाविधिश्शंभोः परोक्तस्ते शनिसत्तम ॥ अतःपरं च शुश्रूषुः कि म्रष्टासि च नारद ॥८९॥ इति आशिवमहापुराणे द्विती
यायां ढसदितायां प्रथमखण्डे सृषठयुपाख्याने शिवप्ूजाविधिवणनो नमेकादशोऽध्यायः॥११॥ नारद उवाच ॥ बरह्नन्भरनापते
तात धन्यस्त्वंशिवसक्तघीः ॥ एतदेव पुनस्सम्यग्ब्रूहि मे विस्तराद्विधे ॥ १ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एकरिमिन्समये तात ऋषीनाहूय
सरवतः ॥ निजेरांशवाऽवदं भ्रीत्या सुवचः पद्मसंभवः ॥ २॥ यदि नित्यखे शद्धा यदि सिद्धे काशुकाः ॥ आगंतव्यं मया
साधं तीरं क्षीरपयोनिधेः॥३॥ इत्येतद्वचनं त्वा गतास्ते हि मया सह ॥ यास्ते भगवान्विष्णुस्सवषां हितकारकः ॥ & ॥
नामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ नारदजी बोडे हे तात ! हे बहानू ! भजाकै पति ! शिवजी भन रुगानेवाठे आप् धन्य ह हे बह्ाजी ! आप इस
बातको हमसे विस्तारपूषक कहो ॥ १ ॥ बह्याजी बटे प एक समय सब कषियोको बुखाकर परीपिपर्वक तँ सव देवताओं कहने खगा ॥ २ ॥
जो तुम्हारी नित्य छसमं शद्धा है ओर जो ठुम॒नित्य सिदधिकी इच्छा करनेवाछे हो तो भेरे साथ क्षीरसागरे आ ॥ ह ॥ यह वचन
पुनकर वह सब मेरे साथ चरे, जहां, सवके हितकारक भगवान् विष्ण विराजमान है ॥ ४ ॥
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| परायणहो जो इसप्रकारसे नित्य पुजन करवे ह उनको पदपदे सव सिद्धि होती है॥८ १॥ बह वाग्मी होताहै ओर मन इच्छित |
अवश्य भिकता है, रोग दुःख शोक उद्वेग बनादट॥८२॥ कुटिर्ता तथा विषपरयोगके दुःख कल्याण करनेवारे शिवजी नाश करते ई।८३॥
शुङ्पक्षके चन्द्रमाके समान उसका कल्याण होता है ओर शकरके पूजनसे अवश्य सदूयण बढते ई ॥८४॥ हे यनिसत्तम! इस भकार आपसे शिव
जीकी पूजाविधि कही हे नारद् ! इषके उपरान्त कया सुनना चाहते हो ॥<८५॥ इति भरीशिवमहा° ₹° सृ ° माषारीकायां पुजाविधिवणंनो
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शिण्पु
॥३४।
बहां जाकर सव देवता देवदेव जगनाथजनार्दनकी स्तुति करतेको हाथ जोडकर स्थित हुए ॥५॥ भगवान् विष्णज बह्माकौ आदि ठे सव ४
¢ उपस्थित हआ देखकर शिवकरे चरणकमछोंको स्मरण करते हए बोटे ॥६॥ विष्णजी बोठे ब्रह्माजीसे आदि ठेकर तुम देवता यहं क्यों आयेहा
|
|| हं सव कहिये कि आपका इस समय क्या कार्यं है ७॥ नल्लाजी बोठे इतत भकार जब्र विष्णमगवानूकै यह वचन रमन ओर देवताओनि सुने
2 फिर प्रीतिस्ते उनको भणाम करके कि इससमय कया कार्यं है ओर अपना कार्यं निवेदन करनेकटिये इस भरकार सुन्द्र वचन बोठे॥८ ॥ देवता बोटे
%|| तत्र गत्वा जगन्नाथं देवदेवं जना्ईनम् ॥ उपतस्थुस्सुरा नत्वा सक्ृताजल्योः सने ॥ < ॥ तान्दष्ा च तद्] विष्णरल्ाद्यान
$| मरान्स्तान्॥ स्मरञ्च्छिवपदां मोजमव्रवीत्परमंवचः॥६॥ विष्णुर्वाच ॥ किमथमागता यूच ब्रहमा्याच्च सुरषयः॥ स्वे वदत्
|| तत्त्या किं काय मिच्यतेऽघना॥७॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति प्रष्टास्तदा तेन विष्णना च मया सुराः ॥ पुनः प्रणम्य तं प्रीत्या किं
ए कार्यं वि्यतेऽधुना ॥ विनिषेदयितं कार्थ ह्यष्ठवन्वचनं शुभम् ॥८॥ देवा उचुः॥ नित्यं सेवा तु कस्यैव कायां दुःखापहारिणी
| ॥९॥ इत्येतद्वचनं शत्वा भगवान्भक्तवत्सलः ॥ सामरस्य मम प्रीत्या कृपया वाक्यमव्रवीत्॥१०॥ श्रीभगवालवाच ॥ ब्रह
€ ज्च्छरणु सुरेस्सम्यक्श्ुतं च भवतापुरा॥ तथापि कथ्यते तुभ्यं देवेभ्यश्च तथा पुनः॥ ११॥ दं च दश्यतेऽयेवकि पुनः पृच्छयते
|| ऽधुना ॥ व्रहन्देवेस्समस्तैश्च बहुधा कार्यतत्परेः ॥१२ ॥ सेग्यसेव्यस्सदा देवश्शंकरस्सर्वदुःखदा ॥ ममापि कथितं तेन ब्रह्म
|| णोऽपि विशेषतः ॥१३॥ प्रस्तुतं चैव दष्टं वस्र्व दृष्टातमदधुतम् ॥ त्याज्यं तदचैनं नैव कदापि सुखमीप्सुभिः ॥ १९ ॥
₹०६।.२ || || दुःखोकी दूरकरनेषारी नित्य सेवा किक्तकी करनी चाहिये ॥९॥ यह वचन सुनकर भक्तवत्स भगवान देवताओंकी परीतसे कपापूर्वक यह वचन ||
अ० १२|| || बोरे ॥१ ०॥ श्रीभगवान वोठे हे बर्न्! सुनो आपने ओरदेवताओंने यह भलीभकार सुना है, पर तो मी आमके ओर देवताओकेपंठनेते आपतते कहते है |© ||
| ॥ ११ ॥ जो अव देखा है ओर देखरदेहो उसको इस समय कया पढते हो हे वहम्! संपूण देवता बहुधा कर्थम तत्पर रहते है ॥ ३ २॥ सदा सब ठ |
>| दुःखोके दूर करनेवाठे भगवान शेकरही सेव्य है, मैने ओर विशेषकर ब्रह्माजीनि मी यह वात कही है ॥ ३३ ॥ ओर प्रत्यक्ष भी तुमने सब इृषटन्त |©
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देखा है, सुखकी इच्छावाोको कभीभी शंकरका पूजन नहीं व्यागना चाहिये ॥ १४ ॥ हिगमरूतिं महेश्वर देवदेवको त्यागनकरके तारके
बाधर्वोके सहित न्ट होगये थे ॥ १५॥ ओर मेरे द्वारा भेरी मायान्ते मोहित होकर वै दूर करदिये गये, भौर शिकसे रहित होकर यह |
६ || मौर ध्वस्त होगये ॥ १६ ॥ दकारण दिगमूतिथारी शृकरका सदा पूजन कना चाहिय, हे देता भोम भो ओर विरोषकरके उनकी
सेवा कनी चाहिये ॥ १७ ॥ शिवछिगके अचनसे देवता ओर दत्य ओर तुम सबही श्रेष्ठ हूए है, हे बहमन ! यह आपने किञ् भकार भुखा
|| दथा ॥१८॥ इस ङिगमूतंको किसी न किसी कारणतते नित्य अचेन करना चाहिये, हे बज्ञाजी ! इसी कारण सब काम ओौर फलकी इच्छसे
५ सत्यज्य देवदेवेशं छिगमूरतिमहेश्वरम् ॥ तारपुत्ास्तथेवेते नष्टास्तेऽपि सनांवाः ॥१९५॥ मया च मोहितास्ते वै मायया दूरतः
कृताः ॥ सर्वेविनष्टाः भरभ्वस्ताः शिन रहिता यदा॥१६॥ तस्मात्सदा पूजनीयो रगमूर्तिधरोहरः ॥ सेवनीयो विशेषेण थद्धया
# देवसत्तमः ॥१७॥ श्वैलिङ्गार्चनादेवं देवा दैत्याश्च सत्तमाः ॥ अहं त्वं च तथा बहमन्कथं तद्विस्मृतं त्वया॥१८॥ तदिङ्गम्
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ेत्नित्ययेन केनापिरेतुना ॥ तस्मात् ब्रह्मन्सुरःशर्वःसर्वकामफलेप्सया॥१९॥ साहानिस्तन्मदाख््रं सान्धता सा च स॒ग्धता ॥
यन्महृत्त क्षणं वापि शिवेनैव समचैयेत्॥२०॥ भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः ॥ भवसंस्मरणा ये च न ते दुःखस्यभाजनाः
॥२१॥ भवनानि मनोज्ञानि मनोज्ञाभरणाः च्ियः॥ धनं च तुपरं पुचपौत्ादिसंततिः ॥२२॥ आरोग्यं च शरीरं च प्रतिष्ठं
चाप्यरौकिकीम् ॥ ये वांछति महाभागाः सुखं वा अिदशाख्यम् ॥२३॥
शिवजीका सदा सेवन करे ॥ १९ ॥ वही बडी हानि वही महाछिद वही अन्धता ओर छग्धता है किं जो खहूतं ओर क्षण विना शिवकरे
भचेनकै जाता है ६ २० ॥ जो शिवी भक्ति तत्पर है, जो शंकरे मन गाये है जो शिवजीका स्मरण करते है उनको कभी दुःख नही
होते ई ॥ २१ ॥ जो मनोहर भवन मनोहर आमरण परे कविय तुषटिपयैन्त धन इत पौ्ादि की सन्तति ॥२२ ॥ शरीरकी आरोग्यता
अोौक्िकी भतिष्ठा वा जो महामाग वैकृण्ठमं सल चाहते है, उनकी सव सिद सफर होती ओर बह पापोते छिप नहीं होते है ॥ २३ ॥
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भन्ते खक्तिका फल वा परमेश्वरकी भक्ति होती है'पूर्वषण्यके भभावे व
सिंगकी अर्च करता है ऽस्तकी सिद्धि सफठ है । ओर वह पापि ङ्प न न
मणाम् किया, ओर सव कामनाकी भापिकेल्यि शिवरिगोकी प्राथना कौ॥ २६॥ यहं सुनकर विष्णजी
जीबोंके उद्धारमे परायणहूं॥ २७॥ विश्वक्मसि कहा हे विश्वकम् १
अतेसुक्तिफरचेषमक्तिव्ापरमेशितुः ॥ पव॑ पुण्यातिरेकेणतेऽचयंतिसदाशिवम्॥२४॥ योऽचैयेच्छिवलिगंवेनित्यभक्तिपरायणः॥
तस्य व सफलासिद्धिनंसपापैःप्रुज्यते ॥ २५ ॥बर्मोवाच॥ इत्यु्ताश्च तदा देवाःप्रणिपत्यहरिस्वयम् ॥ छिगानिभाथयामासु
स्सरवकामाप्तयेनृणाम्॥२६॥ तच्छत्वा चतदाविष्ण॒विश्वकर्माणमत्रवीत् ॥ अहंचषुनिशारदूरूजीवोद्धारषरायणः॥२७॥ विश्वकर्म
न्यथा शंभोःकलपयित्वा्मानि च॥ ठिगानि सर्वदेवेभ्योदेयानि वचनान्मम ॥२८॥ ब्रह्मोवाच ॥ सिगानिकरपयित्वेवमधिका
राब॒ह्पतः ॥ विश्वकर्मा ददौतेभ्योनियोगान्मम वा हरे,॥२९॥ तदेव कथयाम्यच् श्रूयतामुषिसत्तम ॥ पद्मरागमयं शको हेम विश्र
वसस्घुतः॥३०॥ पीतंमणिम्यघरमोवक्णश्श्यामरंशिवभ् ॥इन्द्रनीरमयं विष्णुतरह्चा हेममयं तथा ॥३१॥ विश्वेदेवास्तथा सेप्यं
वसवश्च तथैव च ॥ आरङ्टमयं वापि पा्थिवह्मभ्विनौ सुने॥३२॥ लक्ष्मीश स्फाटिकं देवीदयादित्यास्ताप्रनिरमितम् ॥ मौक्तिकं
सोमराज वजरं विभावसुः॥३३॥ मृण्मयं चैव विगर विभ्रषत्न्यस्तथैव च॥ चांद्नंच सयोनागाः प्रवारमयमाद्शात् ॥३७॥
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२८॥ बह्लाजी बोटे तब विश्वकमीने अभिकारके अतुसतार डिगोंकी कल्पना करके भेरी ओर हरिकी आज्ञा सव देवताओंको देदिये ॥२९॥ ह १
ऋषिगेष्ठवही कहता सो भप निवे पश्चगमणिङ इन्द्को, हुवणेका कुबेरको,॥ ३०॥पीतमणिमय ध्मराजको, श्याम वरुणको, ॥ ©
विष्यको, हेभका बह्ाजीको॥ ३ १॥ चांदीका विंशेदेवाओको'वुओंको चां दीका, हे खनि! आरक्ट (पीतर)वा पार्थिवरिग अभ्रिनीकुभारोको॥ ३२॥ ठ
स्फरिकं मणिका ठकष्मीको, ताम्बेका आदित्योको, मोतीक। चन्दरभाको, वजरिग अभिको॥ ३ ३॥ बाह्मण ओर ब्राहर्णोकी वियोंको मद्रीका, नागो ||
सदाशिवकी अचौ करते है ॥२४॥ जो नित्य भक्तिमे परायण होकर शिव
हीं होता ै॥ २५॥ब्रहञाजी बोरे एेसा कहनेपर देवताओं नारायणको
ने विष्वकमासि कहा, हे उनिशादंङ ! भ तौ
न् ! तुम शिवजीके शुभ ठिग कल्पना करक ओर मेरे वचनते सब देवता्ओंको देदो ¢
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को चन्दनका तथा मगेका आदरसे दिया ॥३४॥ देवको मक्खनका, योगीको भस्मका, यक्षोको दहीका; छायाको पिीका ठिग दिया ॥३ ्
ब्रह्माणी रत्नमयं शिवङिगका पूजन करती ६, पारेका पृथिवीका बाणको दिया तथा ओर भी उनका पूजन करते हँ ॥ ३६ ॥ इसप्रकारके ठग
व्ि्वक्मीने दिये देवता ओर ऋषिगण उन टिंगोँकी पुजा करते है॥ ३ ७॥ इसप्रकारसे देवता ओके हितकी कामनाे विष्ने ठिग देकर तब स॒ङ्ञसे शिवजीकी
पूजाका बिधान कहा।। ३८॥उनकै यह व चन सुनकर मै ब्रह्मा देवता ओके सहित अपने स्थानपर आया, ओौर अपने स्थानपर आकर हषसे मन पणं होगया
नवनीतमय देवीयोगीभस्मम्यतथा॥ यक्षा दधिमयं खगं छाया पिष्टमयं तथा ॥३५॥ शिवर्िगं च ब्रह्माणी रलनं पूजयति भुवम्॥
पारदं पाथिवे बाणस्समचतिपरेऽपि वा ॥३६॥ एवं विधानि शिगानिदत्तानि विश्वकर्मणा ॥ ते पूजयति सवे वे देवा ऋषिगणा
स्तथा ॥२७॥ विष्णुरद्॑वा च ख्गानि देवेभ्यो दितकाम्यया॥ पूजाविधिसमाचष्व्रह्मणे मे पिनाकिंनः॥३८॥ तच्छत्वा वचनं
तस्य ब्रह्माददेवसत्तमेः ॥ आगच्छे च स्वकंधामं दषेनिभंरमानसः॥३९॥ तजागत्य ऋषीन्सर्वान्देवाारं तथा सुने॥ शिवपूजा
विधिसम्यगन्रुवंसकलेष्टदम्॥४०॥ ब्रह्मोवाच॥ श्रूयताषरषयः सवे सामराः प्रेमतत्पराः॥ शितपूजाविधि परीत्या कथयेभुक्तिमुक्ति
दम् ॥७१॥ मानुषं जन्म सप्राप्य दुलंभसर्वैजतुषु ॥ तच्चापि सत्कुरदेवादुष्प्राप्य च घुनीश्वराः ॥४२॥ अव्यंगं चैव विप्रेषु
साचारेषुसुपुण्यत्ः ॥ शिवसंतोषहेतो्चकर्मस्वोक्तं समाचरेत् ॥ ४३ ॥ यद्यनातिससुदिष॑तत्तत्कम न रंघयेत् ॥ यावहानस्य
संपत्तिस्तावत्कमं समावहेत् ॥ ४९॥ कर्मयज्ञसदसेभ्यस्तपोयज्ञो विशिष्यते॥ तपोयज्ञसदसेभ्योजपयज्ञो विशिष्यते ॥ ८ ॥
॥३९॥ ह सुने ! वहां आकर सन ऋषि ओर देवताओंति सव अभीष्ट देनेवाी शिवजीकी पूजाविधि मैने कही ॥ ४० ॥ ब्रह्माजी बोरे सब देवता
ओर ऋषि प्रमे तत्पर होकर सुनो, भुक्ति युक्तिक देनेवारी शिवकी पजाविधि कहते है।॥४१॥सब भराणियोँमे भुष्यजन्म बडा र्भ ह, हे देवता
नियो ! उसमे भी सत्कृलमे जन्महोना बडा दुभ है ॥४२॥ बाह्म उ्यगता न करता हआ दण्यहूप आचरण करता ५ शिवजीके सेतोषके
हेतु अपना कभ करे॥४२॥जो अपनी जातिमे कहा है उस कर्मक उरंषन न करे जहांतक दानकीम्पतनिहो तबतकक्म आरभ करे॥४१४। ।सहसकर्ं
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० यज्ञते तपोयज्ञ विशेष जपयज्ञ विशेष है ॥ ४५ ॥ ध्यानयज्ञसे परे कुठ नहीं है ध्यानही ज्ञानका साधन है कारण कि
६ षमरससे योगी म भ न भाप्त होता { ॥ ४६ ॥ जो ध्यानयज्ञमे निरत ह शकर सदा उनके समीप है विज्ञानिर्योको
ध 4 भायधित्तादि शोधन कुछ नही है ॥ ४७ ॥ हे बहमन ! इत विशुद्धवियसे जो बहा्ञानी इस परमशिवतत्वको जानते है उनको सुखदुःखकै
६ | विचारक कुठ क्रिया नहीं है ॥ ४८ ॥ ध्म अधरम जप होम ध्यान ओर ध्यानकी विभि इसमे इत विये बह सदा निर्विकार है ह
ट दवताओ ॥ ४९ ॥ यह शिषङिग प्रमआनंदका कलेवाढा विशुद्ध कल्याणदायक अक्षर सवरप है यह निष्कट सर्वगाभी योगियोकै हृद्ये
|| ध्यानयज्ञात्परंनास्ति ्यान॑ज्ञानस्यसाधनम् ॥ यतस्समरसं स्वे यागी ध्यानेन पश्यति ॥४६॥ ध्यानय्ञरतस्यास्य सदस
| निदितर्शिवः ॥ नास्ति विज्ञानिनां किचित्परायथित्तादिशोधनम् ॥४७॥ विशुद्धा विद्यया ये च अ्न्व्र्मविदोजनाः ॥ नास्ति
६ क्रिया च तेषां वे खं दुखंविचारतः ॥४८॥ धर्माधर्मौ जपो होमो ध्यानं ध्यानविधिस्तथा ॥ सर्वदा निर्विकारास्ते विद्यया च
तयामराः ॥४९॥ परानंदकरं छिगं विदे शिवमक्षरम् ॥ निष्कठंसर्वगं ज्ञेयं योगिनां हदिसस्थितम् ॥५०॥ लिग॑तु द्विविधं
प्रोक्तं बाह्यमाभ्यंतरं द्विजाः ॥ बादयस्थूं सखुदिष्ठं सक्ष्ममाभ्यतरंमतम्॥५१॥ कमैयज्ञरता ये च स्थूखखिगाचने रताः॥अस॒तां
& भावनाथायं घुक्ष्मेण स्थुकविग्रहाः ॥ ९२ ॥ आध्यात्मिकंतु यद्धिगं प्रत्यक्ष यस्यं नो भवेत् ॥ स तद्धिगे तथा स्थूले कृरपयेन्च
, ॥&| न चान्यथा ॥ ९२ ॥ ज्ञानिनां सृक्ष्मममलं मावात्सत्यक्षमन्ययम् ॥ यथा स्थूलमयुक्तानाश्कृ्टादौ प्रकसिषतम् ॥ 4 ॥
र्.सं. २ || षदा स्थित है ॥५०॥ हे बाह्णणो ! बाह्य ओर आ्यन्तर भेदे ठिग दो भकारके है स्थरखिग बाह्य कहा गया है ओर सक्ष॒ आश्यन्तर
अ० १२ ||| छिग है ॥ ५१ ॥ जो कम्म प्रीति करते है वह स्थृरुरिगम भ्रम करते है, जो उस तत्वको नहीं जानते है उनकी भावनाके यि बक्ष्मही
सथूढ विषह हभ है ॥५२॥ जो आध्यात्मिक दिग है जिस्तका पत्यक नहीं होता वह उप्त ठिग तथा स्थूरि, पूजाकी कल्पना करे इसमे ४
| # अन्यथा नहीं है ॥ ५३ ॥ ज्ञानियोको सक्षमरिग नि्भेकताका कारण है बह अविनाशी भावे ही प्रत्यक्ष होता है, जसे अयोगिर्योको स्थूर्टिग॥.>
॥ करनेवाढा ह ॥५४॥ ओौर ततार्थवादियोंको तो विचारसे को भेद नहीं है कारण कि सवके चित्तम निष्कठ है ओरसारा जगत्
शिवहप ह ॥ ५५ ॥ ज्ञानरहित ोगोको दोष नहीं है उनको कोई विधिनिषेध भी नहीं है ॥ ५६ ॥ जसा जभ कषठ रहकर जलो
टिप नही होता इसी प्रकार ज्ञानी घरमं स्थित हुआभी कर्मोसे बद्ध नहीं होता ॥५७॥ इस भकार का ज्ञान जवब॑तक मलुष्यको उद्य नहीं |
तबतक कद्रारा देवदेव शकर की अराधना करता रहे ॥ ५८ ॥ जगतकै विंशवासकै निमित्त एकही स्थित हभ दिवाकर जर्धारादि वस्तुओं
अनेकल्पमे देखाई देताहै ॥ ५९ ॥ जो कुछ ठोकमं सद् असदात्मक दिखाई देताहै, हे देवताओ ! वह सब तुमपर ब्छशिवात्मक जानो ॥६०॥
अहो विचारतो नास्ति हन्यत्तत्वा्थवादिनः ॥ निष्कृरः सककं चित्त सर्वं शिवमयं जगत् ॥५५॥ एवज्ञानविषक्तानां नारित
दोष विकंटपना ॥ विधिश्चैव तथा नास्ति विदिताविहिते तथा ॥५९॥ यथा जरेषु कमलं सरििनौवकिप्यते ॥ तथा ज्ञानी
गृहे तिष्ठन्कमेणा नावबध्यते ॥ ५७॥ इति ज्ञानं समुत्पन्न यव्त्रैव नरस्य वै ॥ तावच्च कमणा देवं शिवमाराधयेन्नरः ॥५८॥
भरत्ययाथै च जगतामेकस्थोऽपि दिव करः एकोऽपि बहुधा दृष्ट जलाधारादिवस्तुषु ॥५९॥ दश्यते श्यते रोके यद्यत्सदस
दात्मकम् ॥ तत्तत्सर्व सुरा वित्त परं बरह्म शिवात्मकम्॥६०॥ भेदौ जलानां ोकेऽस्मिन्परतिभावे विचारतः ॥ एवमाहस्तथा
चान्ये सवैवेदार्थतत््वगाः॥६१॥ इदि संसारिणः साक्षात्सकलः परमेश्वरः ॥ इति विज्ञानथुक्तस्य किं तस्य प्रतिमादिभिः॥&२॥ .
इति विज्ञानरीनस्य प्रतिमकल्पना शुभा ॥ .पदसुचैस्समारोटं पसोध्यारुम्बनं स्परतम् ॥ ६३ ॥ आरम्बनंविना तस्यपदसुचैः
सुदुष्करम् ॥ निशुणप्राप्तये नृणां परतिमारम्बनं स्मृतम् ॥ &४ ॥
जठोंका भेद इस रोकं विचारक अमावसे है इसी प्रकारसे शकरमे भद विचारसे नहीं है इ भकार समर वेदाथतत्वके जाननेवाछे कहते ह ॥६१॥
सब संसारियोकि हृदयम साक्षात् परमेश्वर वियमान है जब जिस परुषको एसा ज्ञान हौजाय तब चाहे तो प्रतिषादिमे पजन न करे तो उसको
दोष नहीं है ॥६२॥ जबतक एसा पुणेज्ञान न हो तबतक उक्षको भ्रतिमामे पूजन करना सर्वथा उचित है यह उचपदपर चठनेकै लिये परूषको ६
परम अवलम्बन है ॥६२॥ अवछम्बनक बिना ऊँचेपदपर चढना बडा कठिन है निथेणपदधािकै स्थि मदुष्योंको भतिमाका अबछम्बन कहाहै ॥६४॥
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सगणते निर्यणकी भाति होती है यह निश्चय है इस प्रकार सब देवताओंकी प्रभिमाये विश्वास्को बदानेवाटी है ॥ &५ ॥ यहं महादव
बडे देवता है इस कारण इनके निभि्त यह पूजन है भरतिमाके चिना गंष अक्षत॒चन्दन पष्पादि कुछ नहीं है ॥ ६६ ॥ जवतक् िङ्ञानकं
भराति न हो तबतक बराबर प्रतिमापूजन करता रहे ओर जो ज्ञानके बिनाही पूजन त्यागदेता हे बह निश्चय पतित होजाता ६ ॥
हे नाह्नणो ! इस्कारण तुम परमार्थे भेरा वचन सुनो अपनी जातका कहा हुआ जो कमं है उसको भयत्नते करना . चाहिये ६६६ ॥
सय॒णानिेणा प्रातिर्भवती सनिधितम् ॥ एवं च सर्वदेवानां प्रतिमा प्रत्ययावहा ॥९५॥ देवश्चाय महीयान्वै तस्याथ पूजनं
त्विदम् ॥ गंधचन्द्नपुष्पादि किमथ प्रतिमां विना ॥६६॥ तावच्च परतिमा पूज्य यावद्िज्ञानसं भवः ॥ ज्ञानाभावेन पूज्येत
पतनं तस्य निश्चितम् ॥ ६७ ॥ एवस्मात्कारणाद्विभाः शरूयतां परमाथैतः॥ स्वजात्यक्त तु यत्क कर्तन्यं तत्पृय॒त्नतः॥ ६८ ॥
यत्र यत्र यथ। भक्तिः कतंन्यं पूजनादिकम्॥ विना पूजनदानादि पातकं न च दरतः ॥६९॥ यावच पातकं देहे तावत्सिद्धिनं
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|| जायते ॥ गते च पातकेतस्य सर्व च सफटठं भवेत् ॥७०॥ तथा च मलिने वने रंगः ज्ुभतरो न हि ॥्षालने दि कृते शुद्धेस्वों
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॥३७॥
रंगः प्रसनते ॥ ७१ ॥ तथा च निभे देहे देवानां सम्यगचैया ॥ ज्ञानरंगःप्रजायेत तदा विज्ञानसंभवः॥ ७२ ॥ विज्ञानस्य
च सन्मूलं भक्तिरब्यभिचारिणी ॥ ज्ञानस्यापि च सन्मूलं भक्तिरेवाऽपि धीयते ॥ ७३ ॥ भक्ते तु सत्कमे स्वेष्टदेवादि
पूजनम् ॥ तन्मूलं सद्र: प्रोक्तस्तन्भूठं संगतिः सताम् ॥ ७४ ॥ ध
जहां जहां जेसी भक्ति हो वैसा पूजन करना चाहिये, बिना पूजन दानादिके पातक ठगता हे ॥ ६९ ॥ जवतकं देहम पातकं है तवतक
सिद्धि नहीं होती पातकं नष्ट होतेही सव सफठ्ता होजाती हे ॥ ७० ॥ जेसे मलीन वद्लपर अच्छा रंग नही चढता, ओौर धोकर शुद्ध कर
नसे सब रंग चदजाते ह ॥ ७१ ॥ एे ही निक देहम देवताओंकी भलीभ्रकार पूजा कलेस ज्ञानका रंग ठ्गता है, ओर विज्ञान होजाता है
॥ ७२ ॥ विज्ञानसे अव्यभिचारिणी भक्ति उत्पन्न होती है कारण कि ज्ञानका मूर संसारे भक्ति ही है ॥ ७३ ॥ भक्तिका मूढ सत्कर्म ओर
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अपने इष्ट देवताका पूजन है उसका भूल सद्थर ओर उसका मूक महात्मा ओंकी संगति है ॥७४॥ संगतिसेही रकी भाति ओर रुके भिखने {
| पूजन होताहै पूजनसे भक्ति ओर भक्तिते ज्ञान होताहे।७५। ज्ञाने विज्ञान ओर उससे बहका भरकाश होताहै जिसस्मय विज्ञान हआ किं
उसरी समय ेदनिवृत होजाताहै॥ ७६। दके निवृत्त होते ही सव दुःखदं नित्त हो जातेहै दद दुःखे विहीन होकर यह शिवहूप होजाताहै॥७ | ठ
ऋषियो।दंदकी निग्त्तिमं दुःख सुख निवृत्त होजातेहै फिर उसको कृछ विधिनिषेध भी नहीं रहता॥७<॥ गृहस्थाभ्रमसते वजित इसप्रकारके ठोग संसारम ¢
सगत्यागुरुराप्येतयुरो्मजादिपूजनम् ॥ प्रजनानायतेभक्तिर्भक्ताज्ञानंप्रजायते ॥७८५॥ विज्ञानजायतेन्ञानात्परज्ह्मप्रकाशकम्॥ ६
विज्ञानं च यदा जातं तदा मेदो निवर्तते ॥७६॥ भेदेनिवृत्तसकले द्वद्रदुःखविहीनता ॥ द्द्दुःखविदीनस्त॒ शिवरूपोभवत्यसौ
॥७७॥ दवदाभाप्तौ न जायतां खखदुःतले विजानतः ॥ विदिताविषिते तस्य न स्यातां च स॒रर्षयः ॥७८॥ ईशो विरलोरोके
गृहाश्रमविवजितः ॥ यदिलोके भवत्यस्मिन्दर्शनात्पापदहारकः ॥७९॥ तीर्थानि श्ाचयतीरह तारं ञानित्तमम् † व ठ
यस्स परब्रह्मात्मकंशिवम्॥८०॥ तादृशानि न तीथनि न देवा मृच्छिलामयाः॥ ते पुरनतयुर्कारेन विज्ञानीदर्शंनादपि।॥।८१॥ ¢
यावद्गृाश्रमे तिषठत्तावदाकारपूजनम् ॥ कर्याच्रष्ठस्य सप्रीत्या सुरेषु खट पंचसु ॥८२॥ अथवा च शिवः पूज्यो मेकं ॥६&
विशिष्यते ॥ मूर सिक्ते तथा शाखास्तृप्तास्सत्यखिखास्सुराः॥ ८२ ॥
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कोई विरही है, यदि को पेसा इस ोकपं हो तो उसके दशनसे पाप हरे जातेहै ॥ ७९ ॥ तीथांकी श्लाघा जेसीहै वैसेही ज्ञानी कीहै, सन देवता
भौर खनि परबहात्मक शिवको ध्यातिहँ ॥<०॥ वैते तीथं नहीं हे न देवता केवर सूरतियोभेहीहै [ कित् विज्ञानी देवता ओर तीर्थं दोनों निवाप
करते] कारण कि केवर तीथे अवगाहन ओर प्रतिमामे पूजन दीधकाठमे मलष्यको पिच करते है, ओौर विज्ञानी दश॑नमाजसेही पित्र कर देता
है ॥८१॥ जबतक गृहस्थाश्रमं रहे तवतक आकार (भतिमा) मँ पंचदेवताओंक भेम पुजा करता रहे ॥८२॥ अथवा एक शिबजीकाही पूजन र
करछेना चाहिये, कारण किं यही सवके सूररहमूरके सींचनेपे सब शाखा सिंच जातीहै ठेसेही एक शिवके पूजनसे सब देवता पूजित हो जातिहै॥८३॥ ||#
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शाखाओंको सीचनेसे मूक कभी नहीं तृप्त होता. हे खनिश्रेष्ठो ! इसीभकार सन देवताओकि तृप्र होनेमे ॥८४॥ सर्वथा शिवजी तृप्र नहीं होते
यह घ्म ुद्धिवाछे जानते ह ओर शिवकर पूजन करनेसे सव॒ देवता पूजित होजाति है ॥ ८५ ॥ इस कारण ठोकके कल्याण करनेवाटे
देवदेव शकरका पूजन स्व कामना ओौर फठ्केटिये तथा सव प्राणि्योके हितकैलिये करना चाहिये ॥ ८६ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणे इद्र”
भाषादीकायां भ०स° पूजारिधिर्नाम द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥ ब्रह्माजी बोटे अब इतके उपरत म ष्ट पूजाविभि कहताहू ह देवताओ घनो यह सव
शाखाञ्च चशता मूलं तृप्तं न किचित् ॥ एवं सवेंषुतपेष सुरेषु निसत्तमाः ॥८४॥ सर्वथा शिवतृ्तिनो विज्ञेया भूकष्म
बुद्धिभिः ॥ शिवे च पूजिते देवाः प्रजितास्स्ै एव दि ॥८८॥ तस्माच पूजयेदेवं शंकरं लोकशंकरम् ॥ सर्वकामफ़लावाप्त्ये
सर्वभृतदितैरतः ॥८६॥ इतिश्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्रसंहितायां प्रथमखण्डे सुषटञपाख्यानेपूजाविधिवणने सारासार
विचाखर्णनो नामद्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अतः परवक्ष्यामि प्रजाविधिमलत्तमम् ॥ श्रूयतामृषयो दैवास्सव
कामसुखावहम् ॥ १ ॥ ब्रा श्तं चोत्थाय संस्मरेत्सांबकं शिवम् ॥ कर्यात्ततमार्थनां भक्त्या सांजटिनंतमस्तकः ॥ २ ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश उत्तिष्ठ खदयंशय ॥ उत्तिष्ठ त्वसुमास्वामिन्त्र्नाण्डेमगलं ङ ॥ ३॥ जानामि धम न च मे पवृत्तिजौ
नाम्यध्म न च मे निवृत्तिः ॥ त्वया महादेव इदिस्थितेन यथा नियुक्तोऽस्सितथा करोमि ॥ ¢ ॥ इत्युक्ता वचनं भक्तया
स्मृत्वा च पादे ॥ बहिर्गच्छेदक्षिणाशां त्यागाथं मलसूक्योः ॥ ५॥
कामना ओर सुलकी देनेवाटी है ॥ १ ॥ बराह्म्हू्तमे उठकर शिव ओर पार्वतीका स्मरण करे ओर हाथ जोड मस्तक काय भक्तिसे उनकी
्ार्थना करे॥२॥ हे देवेश ! हे हद शयनकरनेवाछे आप उषे, हे उमास्वामी आप उष्ि ओर ब्रहमाण्डका मंगल कीजिये ॥३॥ भ धमं जानताहं
प्र भेरी उसे भ्वृनि नहीहै, भ अधर्मको जानताहू पर उससे भेरी निदृत्ति नहीहै, हे महादेव आप हदये स्थित हुए जेसी पेरणा करते हो वैसा करताहूं
॥ ४ ॥ इस प्रकार भक्तिसे वचन कहकर तथा गुरूपादुकाको स्रण कर, र सूतके त्यागनेको ध्रामसे बाहर दक्षिण दिशामं जाय ॥ ५ ॥
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ओर जलपते पथात् देहशुद्धि करके हाथ पे, धोकर दतौन करे ॥ ६ ॥ सर्थके निकलने पहरे दँतौन करके जले सोह कटे
करे ॥ ७ ॥ छठादि यमकी तिथि नौमी रविवार हे देवता ऋषियो ! इन दिनोमे दतौन नहीं करनी चाहिये ॥ < ॥ अवकाशके अनुसार
नदी आदि अथवा घरमे स्नान करे मलुष्यको देशकाखके अनुसार स्नान करना चाहिये ॥ ९॥ रविवार श्राद्ध संक्रान्ति रहण तीथं ओर
उपवासक दिन ॥१०॥ ओर आशौचकी ्रा्षिम गरम जसे स्नान न करे, भक्तिमानु परुष तीर्थाीदिमें उनके अभियुख स्नान करे ॥११
देदशुद्धिततःकृत्वासमरनलविशोधनैः॥ दस्तौपादौ च प्रक्षाल्यदंतधावनमाचरेत्॥६॥ दिव नाथेत्वलदितेकृत्वा वे दंतेधावनम्॥
मुख षोडशवारं तु प्रक्षार्याजछिभिस्तथा ॥७॥ षष्ठयाद्यमाश्च तिथयोनवम्यकदिने तथा ॥ तज्यस्पुरर्षयो यत्नाद्धक्तेन रदधा
वने ॥८॥ यथावकाशं सुस्नायात्र्यादिष्वथवा गृहे ॥ देशकालाविश्दध च स्नानंकायं नरेण च ॥९॥ रवे्दिनेतथाश्रादेप्करान्तौ
ग्रणतथा ॥ मदादनितथा तीरथैदञ्चपवासदिने तथा॥१०॥ अशौचेप्यथवा प्राप्तेन स्नायादुष्णवारिणा ॥ यथा साभिभ्ुखंस्नाया
त्ीथोदौ भक्तिमान्नरः ॥११॥ तेखाभ्यंगं च कुर्वीति वारान्दष्टारमेण च ॥ नित्यमभ्यंगके चैव वासितं वा न इषितम्॥१२॥
श्रद्धे च अरहणेचैवोपवासेप्रतिपद्िने ॥ अथवा सार्षपतैरं न दुष्येद््रदणं विना ॥१३॥ देशं कारं विचाय्यैवं स्नानं ऊुर्या्था
विधि ॥ उत्तरामिसुखश्वेव प्राङ्खुखोप्यथवा पुनः॥१९॥ उच्छि्टेनेव वश्चेण न क्नायास्सकदाचन ॥ शुद्धवच्रेण स स्नायात्तदे
वस्मरपूवकम् ॥१५॥ प्रधार्य च नोच्छिष्ट रा्ौ च विधृतं च यत् ॥ तेनस्नानं तथां कार्य क्षालितं च परित्यजेत् ॥ १६॥
वारको देखकर क्रमालुस्तार ते ठगावे, नित्य तेर रुगानेवाछेको वासित दूषित नहीं है ॥ १२॥ श्राद्धमे हणम उपवासे पडवाभे सरसोका
तेठ ्रहणके विना दूषित नहीं है ॥ १३ ॥ देशकाल्को विचारकंर यथाविधिसे स्नान करे उत्तर वा पूरवक्रो स॒खकर स्नान करे ॥ १४ ॥
उच्छिष्ट वचसे कभी भी स्नान न करे अपने देवताके स्मरणपुवेक शुखवच्रते स्नान करे ॥ १५ ॥ दूसरेका धारण किया उच्छ है तथा जो
एक रात्रिका धारण किया है वह उच्छिष्ट नहीं उक्षत स्नान सदा करना चाहिये ओर धोये हृएको किर छोड दे ॥ १६ ॥
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फिर देवता ऋषियोकी तृतिके ठिये सदा तर्पण करना चाहिये किर धुरे वल्लक धारण करके फिर आचमन करे ॥१७॥ पीठे गोबरसे (
पवित्र स्थानम जाकर हे बाह्षणो ! वहां सुन्दर आसन रचना चाहिये ॥१८॥ जो शुद्ध काष्ठका पृण चिकना हो रेप्ता सकाम ओौर फटका देनेवा
वित्रासन बनावे ॥ १९ ॥ ओर फिर मृगचमादि यथायोग्य ग्रहण करने चाहिये उत्तप् टकर बुद्धिमान् भस्मसे त्रिषण्ड् ठगावे ॥ २० ॥
त्रिषण्ड् ठगानेसे जप तप ओर दान सव सफठ होजाता है, भस्म न हो तौ जलपेही तिषण्ू ठगाठे ॥२१॥ इसप्रकार तिषणडू रुगाकृर फिर
तर्पणं च ततःकार्यदेवषिपिततप्तिदम्॥ धौव ततो धार्य पुनराचमनं चरेत् ॥१७॥ चौ देशे ततो गत्वागोमयायुपमानिते॥
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ट| आसनं च छ तत्र स्वनीयद्विजोत्तमाः ॥१८॥ शु्काष्सभु्प्ं पूर्ण स्तरितमेव वा ॥ चि्रासनं तथा ङु्ात्सवकामफल
ए दम् ॥१९॥ यथायोग्यं पुनरथ भरगचर्मादिकंचयत् ॥ त्नोपविश्य र्वी त्रिध भस्मना सुधीः ॥२०॥ जपस्तपरतथा दानं
४ तिषण्डात्सफलंभवेत् ॥ अभावेभत्मनस्त्च जलस्यादिप्रकीतितम् ॥२१॥ एव कृत्वा विषुड् च रदराक्षान्धारयेतनरः ॥ सपाय च
¢ स्वकं कम पुनराराधयेच्छिवम्॥२२॥ पुनराचमनं कृत्वा त्रिवारं मंत्रपूवेकम् ॥ एकं वाथ भ्रङर्याच गंगाचिन्दुरिति ्वन्॥२३॥
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अन्नोदकं तथातव्रशिवपूजा्थमाहरेत् ॥ अन्यद्वस्तु च यत्किचिवथाशक्तिसमीपगम् ॥२७॥ कृत्वास्थेयं च तयैव धेय॑मास्थायवे
पुनः ॥ अपात्रं तथा चैकं जलगंधाक्षतैयैतम्॥ २५ ॥ दक्षिणांसे तथा स्थाप्यश्चपचारस्य कलत्तये ॥ गुरोश्च स्मरणं कृत्वा
तदचज्ञामवाप्य च ॥ २६ ॥ संकल्पं विधिवतकृत्वाकामनां च नियुज्य वै ॥ पूजयेत्परया भक्त्या शि्वेसपरिवारकम् ॥२७॥
| शुदाक्षोंको धारण करे, इसभकार अपना करम सम्पादन करके फिर शिवकी आराधना करे ॥ २२ ॥ फिर तीनवार मंत्रपूवंक आचमन |
करके, गंगाविष्ण कहता हुआ एकवार तिलक करे ॥२३॥ फिर शिवजीकी पूजाके छ्य अन्नजठ वा ओर जो कुड वस्तु होय यथाशक्ति समीपम
छाव ॥ २४ ॥ यह सव कफे धीरतापरवक वहां वे, फिर जर गध अक्षतसे युक्त एक अर्घ्यपात् ठेकर ॥२५॥ उपचारक पू्िके छ्यि अपने
दक्षिणांसे स्थापन करके गुरुका स्मरण कर ओर उनकी आज्ञा भाप करके ॥ २६ ॥ विधिपूर्वकं सेकल्प करके ओौर उत्तमं अपनी कामना ¦
रु°स.२
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| परभक्तिते परिवारसहित शिवजीका पूजन करे ॥ २७ ॥ फिर एक सद्वा मेरी दिखाकर विननेश्वरका पूजन करे इनको . सिन्दूरादि
पदाथ चटाबे ओर सिद्धि बुद्धिस पुजा करे ॥ २८ ॥ लक्षराभसे युक्तं ¶जा करकै फिर नमस्कार करे, जव प्रणाम करे तो |
नामे चतुथी विभक्त कगाबे अन्तमं नमः छुगावे ॥ २९ ॥ फिर देवसे क्षमा कराकर स्कन्दधाताकै स्षहित प्रमभकितसे पूजन कर वारंवार ¢
प्रणाम करे ॥ ३० ॥ ओर महोदरनाम द्वारपाङ जो सदा दवारस्थित रहता है, उस्षका पूजन कर फिर सती गिरिजाका पूजन करे ॥३१॥ ५
चन्दन कुंकुम धूप दीप ओर नेवेयसे फिर शिवजीका पूजन करे ॥ ३२ ॥ फिर नमस्कार करके शिवजीके समीप जाय जो परमे पार्थिव ||
ॐ चह भ
सुद्रामेकां प्रदशथैवपूजयेद्वि्हारकम्॥ सिद्रादिपदार्थैश्सिद्धिद्धिसमन्वितम्॥२८॥ लक्षखाभयुतं त. पूजयित्वा नमेत्पुनः॥
चतुध्यतेनामपदेनमोन्तैःप्रणवादिभिः॥२९॥ क्षमाप्येन तदा देवं भाजा चेवसमन्वित॒म् ॥ परूजयेत्परयाभक्तया नमस्छु्यात्युनः
पुन्: ॥ ३० ॥ द्वारपारं सुदा द्वारितिष्ठतं च महोदरम् ॥ परूजयित्वाततः पश्वात्पूजयेद्विरिजां सतीम्॥२१॥ चंदनेः ऊंङुमे-वैव
धूपेदीपिरनेकशः ॥ नेवेयाेविषेशवव पूजयित्वा ततशिङिवम्॥३२॥ नमस्कृत्य पुनस्त गनच्छेचशिवसम्निधौ॥ यदिगेेषाधिवींना
हैमीं वा राजतीं तथा॥३३॥ धातुजन्यां तथेवान्या पारदां वा प्रकृरपयेत् ॥ नमस्कृत्य एनस्तां च प्रजयेद्धक्तितत्परः ॥३४॥
तस्यातुपूजितायां वे सवे स्युःपूजितास्तदा ॥ स्थापयेच्च मृदा खगं विधाय विधिषूवकम् ॥३९॥ कतव्य सर्वथा त्न नियमास्स्वशहे
स्थितेः ॥ ्राणप्रतिष्ठां ङर्बीत भृत्ुदि विधाय च ॥३६॥ दिक्प्खान्पूजयेत्तच स्थापयित्वाशिबाख्ये ॥ गृदैशिवस्सदाप्ूज्यो
मलमत्राभियोगतः ॥२७॥ तत्र तु द्वारषालानां नियमो नास्तिसवंथा ॥ शृहे खगं च यत्पूज्यं तस्मिन्सर्व प्रतिष्ठितम् ॥३८॥
सुवण चादौ ॥ २३॥ वा अन्य धातुक वा पारेकी सूति हो उसको नमस्कार कर भक्ितमं तत्पर होकर् पूजन करे ॥ ३४ ॥ उसके पूजन
ट| करनेसे स्व पूजित होजाते है, विधिपूर्वक यृत्तिकाका रिग् स्थापन करना चाहिये ॥ ३५ ॥ अपने षरे स्थित होकर नियष करने चाहिये
भूतशुद्धिकरक भाणरति्ठा करनी चाहिये ॥३६॥ शिवाख्यं स्थापित करके दिकूपालेोका पूजन करना चाहिये मूरभेजरे ं
त | व से घरमे सदा शिवजीका ह
|| पूजन करना चाहिये ॥ ३७ ॥ वहां द्वारपाटोका नियम् नहीं है षरमे जो ठंग पूजित है उत्तमे सव प्रतिष्टित है ॥ ३८ ॥
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॥ ४२ ॥ किर दीपकरके ओर युको नमस्कार करके पन्नासनन अथवा भद्रासनं बाधकर ॥ ४२३॥ उच्तानासन् वा परयकासन करक
पूनाकारे च सांगं वै परिवारेण संयुतम् ॥ आवाद् प्ूजयेदेवं नियमोऽच् न विद्यते ॥ ३९ ॥ शिवस्य संनिधि, कृत्वा स्वासन
परि कल्पयेत्॥ उदङ्खखस्तदा स्थित्वा पुनराचमनं चरेत्॥४०॥ क्षाल्य हस्तौ पशाद पणायां परकटपयत् ॥दरमनेण तचव्
दशावती नयेत्ररः ॥ ४३ ॥ पैचञुदाः प्रकर्तभ्याः प्ूजावश्यं करेप्सिताः ॥ एता ख॒दराः परदश्य॑व चरेत्पूजाविपि नर, ॥४२॥ दीष
कृत्वा तदा तत्र नमस्कारं शरोर ॥ बध्वा पद्मासनं तज मद्रासनमथापि वा ॥४३॥ उत्तानासनकं कृत्वा प्यकासनकं तथा॥
यथाघ्ुखं तथा स्थित्वा्रयोगं पुनरेव च ॥४४॥ कृत्वा पूजां पुराजातां वह केनैव तारयेत् ॥ यदि वा स्वयमेवेह गृहेन नियमोऽस्ति
च ॥४५॥ पथाजेवा्ेपातेण क्षारयेद्धिगशत्तमम्॥ अनन्यमानसो भूत्वा पूजाद््यं निधाय च ॥४६॥ पश्चाञ्चावाहयेददेवं मंत्रेणानेन
वै नरः ॥ कैटासशिखरस्थं च पार्व॑तीपतिठत्तमम् ॥ ७७ ॥ यथोक्तरूपिणं शं नि्ुणं शणङपिणम् ॥ पंचवक्रं दशथुजं
पिन वृषभध्वजम् ॥ ७८ ॥ कषूरगौरं दिष्यांगं चन्द्रमौरि कपर्दिनम् ॥ व्याघचमोत्तरीयं च गजचमांम्बरं शुभम्॥ ४९ ॥
| बैठकर ` प्रयोग करे ॥ ४४ ॥ पूर्वके समान पूजा करक वकते तारण ( ! ) करे ओर यदि अपने षरमेही हो तो इस
नियम नही है ॥ ४५ ॥ फिर अरघ्यपा्रमे शिवटिगको स्नान करावै फिर अनन्य मन होकर पूजाद्रन्यक्ता विधान कर ॥ ४६ ॥ इस
अगे म्स देवका आवाहन करे कैठासके शिखरमं स्थित पावंतीपति उत्तम ॥ ४७ ॥ निगुण, यण यथोक्तरूप शकर पांचमख
दशभुजा तीन नेर वृषभध्वज ॥ ४८ ॥ कपूरके समान गौरवणे भायेपर चन्द्र॒ जटाक्टके शोभायमान व्याधचर्भका उत्तरीय वच्च ओर
पूजाकै समय सरंगपरिवारकं सहित आवाहन कर देवका पूजन करे, इसमे कोई नियम नहीं है ॥ ३९ ॥ शिक्कै समीपम अपना आसन
कृल्पना करे, फिर उत्तरको सुखकर वेढे फिर आचमन करे ॥ ४० ॥ फिर हाथ धोकर भ्राणायाम करे मूख्चसे दशवार प्राणायाम करे
॥ ४१ ॥ फिर पाचों खदा दिखावे कारण कि इसे पूजा हाथमे स्थित होती है इन सुद्राओंको दिखाकरही मदुष्य पूजाविधि सम्पन्न कर्
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| गजचर्म धारण किये ॥४९॥ वासुकी आदि सपे अगं छ्पैर हूए, पिनाकादि आयुध हाथमे छि जिनके आगे आढों सिद्धि निरन्तर |>
नृत्य करती रहती ह ॥ ५० ॥ जिनकै चारों ओर भक्तजन जयजय शब्द कर रहे हँ जो दुःसह तेजते देवताओं सेषित हो दुक्षय होरे है ठ
॥ ५३ ॥ सब जीवोंके शरणदेनेवाठे प्रसन्न कमठस॒खवाठे वेदशा गीयमान विष्ण जहास स्तुतिको पराप्त ॥ 4२ ॥ भक्तवत्सढ आनंद स्व र
प सदाशिवको भै आवाहन करताहूं, इस प्रकार साम्बशिवको ध्यान करके पवात् आसनकी कल्पना करे ॥ ५३ ॥ सबवस्तुओंका समर्पण ठ
वासुकयादिपरीतामं पिनाकायायुधान्वितम्॥ सिद्धयोऽषटौ च यस्य कृत्यतीह निरंतरम्॥९०॥ जयजयेति शब्दैः सेवितं भक्त ठ
पंजकैः ॥ तेजसादःसदेनैव वुु्ष्यं देवसेवितम् ॥५१॥ शरण्यं सर्वसत्त्वानां प्रसन्नखुखपंकजम् ॥ वेदृश्शाश्चेयंथा गीतं विष्युन्रहम
लतंसदा ॥५२॥ भक्तवत्सलमानेदं शिवमावाहयाम्यदम्॥ एव॑ध्वात्वा शिवं साम्बमासनं परिकल्पयेत् ॥५२॥ चतुध्यंतपदेनैव |£
॥ ततश्चाचम्नंकृत्वा शंभवे परमात्मने॥ पश्चाज्चपचमिद्रव्ैः |£
सवं कर्यायथाक्रमम्॥ ततः पाय परदयद्वे तत्य शंकराय च ॥५४॥ ततश्च
योग्यं नामभिर्वा सम्॑रकैः ॥ चतुर््यतपदैर्मक्तया दरग्याण्येवायेत्तदा ॥५६॥ तथाभिलषितं ¢
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ज्ञापयेच्छकरं सुदा ॥५५॥ बेदमतरर्यथा
दरव्यमरपयेच्छकरोपारे ॥ ततश्च वारुणं सानं करणीयशिवाय वै ॥५७॥ सुगंध चदनं दययादन्यलेषानि यत्नतः ॥ ससुगंधजले ¢
नैव जरधासं प्रक्पयेत् ॥५८॥ वेदमवैः षडगेवा नामभी श्दरसंख्यया॥ यथावकाशं तां दत्वा वखेण माजंयेत्ततः ॥५९॥ $
चतुथयन्तपदसे करे, फिर शकरके निमित्त पाय अर्य दे ॥ ५५ ॥ फिर आचमन करके परमात्मा शंभुक निमित्त पंचद्रव्य धृत शकरा जला टै
। || दिते भ्रसन्न हो ज्ञान करावे ॥५५॥ वेदमंघरोते व नामभत्रोसे चतु्यैन्त पदसे भक्तिपूर्वकं सब वस्तु समर्पण करे ॥५६॥ सब अभिरुषित पदा ट
शोको शिवजीके ऊपर अर्पण करे फिर ॒पार्वतीको जके ज्ञान करावे ॥ ५७ ॥ सुगंषुक्तं चन्दन तथा द्रे अलरेपन पदाथ रुगावे फिर
सु्गधित जल्की धारा चढावे ॥ ५८ ॥ फिर वेदर्म्न षडंग वा एकादशनाभंसे स्नान कंराय फिर वल्ञसे भाजन करे ॥ ५९. । 9
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शि । फिर आचमन कराकर वच समर्पण करे तिरु जौ गहूं मूंग ॥ ६० ॥ यहं नाम् रमत पढपढकर शिवजीको श
॥४ १॥ ||| खलोपर पांचष्प चढावें ॥ ६१ ॥ प्रतिखखका अभिकाषाके अदततार् ध्यान करे कमर शतपत्र तथा शख॒षष्पोकि ए ॥ ६२ ॥ कुश०,
करका परमभक्त पूजन करे यदि ओर वस्तु न मिङे तो बेपरही
को समर्षण करे फिर महात्ाके पाचों
|| तूर, मंदार बरोण, तुरसीपतर, वेपते ॥ ६३ ॥ भक्तवतसठ श „0 =
|| शिषजीफो चढावे ॥ ६४ ॥ बेटपतके अर्पणतेही सव पूना शद्ध हो जाती हं पिर हन्त चत वषित सुन्दर तड ॥ ६५॥ परम |©
| पृशवादाचमनंदयय तततो वं समर्येत् ॥ तिराशचैव जवा वापि गोधूमा दरमापका*॥६०॥ अणीया शिवायैव मत्रननातिषैरपि॥
् यानं यथायोग्यासिलाषतः ॥ कमल्श्शतपयेश्च शखपुर्घ्पः
ततः पुष्पाणि देयानि पंचास्याय महात्मने ॥९६१॥ परतिवक्रं यथाध्यान य (त य कर
परैस्तथा॥६२॥ कुशपुष्पैश् धल््मदारेदोणसमवेः ॥ तथा च तुलसीपतरविर्वपत्रविशेषतः ॥६३॥ पूजयेत्परया भक्त्या शंकरं
| । भक्ततसलम् ॥ स्ाभवि बित्वपत्नमर्षणीयं शिवाय वै ॥ ६९ ॥ बिल्वपनारपैणे नैव सर्वपूजा अरसिभ्यति ॥ ततस्षुगंधचणं वै
वासितं तैलुत्तमम् ॥ &<4 ॥ अर्पणीय च विविधं शिवाय प्रया खुदा ॥ ततो धूषः प्रकतेभ्यो गुग्युला ग॒रूभिंदा ॥ &8 ॥
दीपो देयस्ततस्तस्मे शकराय प्रतप्तः ॥ अं दद्यात्पुनस्तस्मे मंत्रेणानेन भक्तितः ॥६७॥ कारयेद्धावतो भक्त्या व्चणसुख
माजनम् ॥ रूपं देहि यशो देहि भोगं देहि च शंकर ॥६८॥ युक्तिश्ुकितिफलं देहि शृदीत्वाध नमोस्तुते ॥ ततो देयं शिवायेव नैवेयं
¢
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|| विविधं शुभम् ॥६९॥
| धरसन्नतासे शिवजीको अर्पण करना चाहिये, फिर गगर ओर अगरकी धृष प्रेते अर्षेण करे ॥ ६६ ॥ फिर पतसे भरा हआ दीपक शंकरकै
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निमिच् देना चहिये, ओर फिर इत मंतरसे भकतिपुवक अध्यं दे ॥ ६७ ॥ फिर भावभकरंतसे ववसे सुखमाजेन करे; भरा्थना करे हे देव
भुकितिचकितका फठ अर्घग्रहणकर दीजियेगा, तव॒ शिवजीके
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॥
मुञ्चे प यश ओर भोग दीजिये ॥ ६८ ॥ हे भगवन आपको रणाम है आप
निभित्त सुन्दर नेवेय देनी चाहिये ॥ ४९ ॥
| विरमते पीतिूरवक आचभन करावे, पीठे शिवजीके लिथि ताम्बू सगोपांग विधान करक ॥७०॥ पाचनतीकी आतीं करे, चरणो ||
| नामि मेडलमे दो बार ॥ ७१ ॥ सुखपर एकवार सर्वागे सातवार फिर यथोक्त ध्यान करक मंत्रका उचारण करे ॥ ७२ ॥ पथ् ||
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हरय ओर यथाज्ञान भंत्रविधि मुप्यको करनी चाहिये ओर गरक उपदिष्टमागे बुद्धिमान् मन्त्र जपता हभ ॥७३॥ गास्कै उपदिष्टमागके ||
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अनुसार ही म॑त्रको उचारण करे, यथासंख्य यथाज्ञान मन्त्रकी विधि करनी चाहिये ॥ ७४ ॥ ओर प्रसन्न हो अनेक प्रकार स्तोत्रम
तत आचमन प्रीस्या कारयेद्वा विलम्बतः ॥ ततश्शिवाय ताम्बूरं सांगोपाङ्ग विधाय च ॥७०॥ इयादारातिकं पञचवतिकाम
नुसख्यया ॥ पादयोश्च चतुर्वारं द्विःकृत्वो नाभिमण्डले ॥ ७१ ॥ एकंकृत्वे सुखे सप्तकृत्वः स्वाङ्ग एव हि ॥ ततो ध्यानं $
यथोक्तं वै कृत्वा मञघुदीसयेत् ॥ ७२॥ यथासंख्य यथाज्ञानं कुर्यान्मं्विधिन्नरः ॥ग॒ूपदिष्टमार्गेण कत्वा मज्जय सुधीः
॥ ७३ ॥ ‹गुूपदिष्टमामैण कृत्वा मन्त्रसुदीरयेत् ॥ यथासंख्यं यथाज्ञानं कुरयान्मेजिधित्नरः'' ॥ ७४ ॥ स्तोवरर्नानाविधैः ए
भ्रीत्या स्तुवीत वृषभध्वजम् ॥ ततः प्रदक्षिणां ्याज्छिवस्य च शनैश्शनैः ॥ ७५ ॥ नमस्कारास्ततः इयौत्सा्ांगं विधिव ट
त्पुमान् ॥ ततः पुष्पांजल््दियो मंमेणानेन भक्तितः ॥७६॥ शंकराय परेशाय शिवसंतोषदेते॥ अज्ञानादि वा ज्ञानाययत्पू
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जादिकं मया ॥ ७७.॥ कृते तदस्तु सफर कूपया तव शंकर ॥ तावकस्त्वद्रतप्राणत्वञचिततोदं सदा भरड ॥७८॥ इति विज्ञाय
गौरीश भूतनाथ प्रसीद मे ॥ भूमौ स्खछितवादानां भूमिरेवावलंबनस् ॥ ७९ ॥
शिवजीकी सतति करे फिर शनैः शनेः शिवकी प्रदक्षिणा करे ॥ ७५॥ विधिपूर्वकं सांग नमस्कार करे फिर इसत मन्तरसे भक्तिूरवक
ष्पांजलि दे ॥७६॥ शंकरपरेश शिवके संतोषके लि ज्ञान वा अज्ञानसे जो मैने पुजादिक की है ॥७७॥ हे शकर तुम्हारी कूपासषे यह सव
सफक हो भरे भाण हुममे है हे शिव ! सुखदायक मेरा॒चित्त तुममे है ॥ ७८ ॥ हे गौरीश ! हे भूतनाथ ! दसा जानकर आप भेरे ऊपर
सनन हूजिये जिनका चरण पृथिवीसे फिं्ङता है उनको पृथिवीही अवरुम्बन ह ॥ ७९ ॥
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शि°्प | मभ जो अपराध खक्ष हए है उमे आही शरण है इकार विधिपूरवक बहृतसी विजञमि करके ।<०॥ पुष्पांजलि देकर ५. त
॥४२॥ || ओर के हे भमो ! अब षरिवारके साथ आप अपने स्थानको जाहये।। ८ १।।ह नाथ ! पूजाके समय फिर आदसते इस स्थानमे आना, इत भ्रका
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श्प. २
अ० १४
भक्तवत्षक शंकरकी बहुत भकारे भाथा करके ।८२॥ विसर्जन कर उनकी जटमयमूतति अपने हृदयम धारण कर, हे नियौ ! यह. शिवजीका
पूजन तुमसे हमने विस्तारपूर्वक कहा यह भक्ति खक्तिका देनेवाला है अब आगे कया सुननेकौ इच्छा है ॥८२॥ इति श्रीशिवमहाषराणि रद्रसंहिता
त्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं प्रभो ॥ इत्यादि बहुविज्ञति कृत्वा सम्यग्विधानतः ॥८०॥ पुष्पांजलि समर्प्यवः (नः
कु्यात्रितिम्रहुः ॥ स्वस्थानं गच्छ देवेश परिवारयुतः प्रभो ॥८१॥ पूजाकाले एुन्नाथ त्वया गंतभ्यमादरात् ॥ इति संग्रा्य बडु
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श्शंकरं भक्तवत्सलम् ॥८२॥ विसजयेत्स्वहटदये तदपोमूध्नि विन्यसेत्॥ इति प्ोक्तमशेषेण सुनयः शिवपूजनम् ॥ थुक्तियुक्ति
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रदं चेव किमन्यच्छोत॒मरैथ ॥८३ ॥ इति श्रीशिवमहापुरागे द्वितीयायां इरसंदिता्ां प्रथमखंडे सृष्टयुपाख्याने शिवप्रूजन
वर्णनो नाम अयोदशोध्यायः ॥ १३ ॥ ऊऋषय उचुः ॥ ॥ व्यासशिष्य महाभागकथय त्वं प्रमाणतः ॥ केः पुष्पैः पूजितश्शंथुः
किं किं यच्छति वे फलम् ॥१॥ ॥ स्रुत उवाच ॥ ॥ शौनकाद्याश्च ऋषयः शृणुतादरतोऽखिलम् ॥ कथयाम्यद्य सुप्रीत्या
|
|| उष्पारपणविनिर्णयम् ॥ २॥ एष एव विधिः पृष्टो नारदेन महर्षिणा ॥ प्रोवाच परमत्या पुष्पारपणविनिणयम् ॥ २.॥ |
¢ ब्रह्मोवाच ॥ कमलेबिंल्वपञेश्च शतपतरैस्तथा पुनः॥ शंखपुष्पेस्तथा दैवं लक्ष्मी कामोऽचयेच्छिवम् ॥ 9 ॥ |
ह| माषाटीकायां भथमे सृष्टिं शिवपूजनवणेनो नाम चयोदशोऽध्यायः ॥१३॥ ऋषि बोठेहेव्यासशिष्य!हे महाभाग आप् यह किये किन किन एूलोके
ह पूजनसे शिवजी क्या कंया फल देते है ॥१॥ खूतजी बोट हे शौनकादि ऋषियो ¡ आद्रसे इस्त वातको घमो मेँ कमे पष्पोके अरपणका निर्णैय
र| कहता हू ॥२॥। यही विधि परमि नारदजीने पृद्धी थी तब ब्रह्माजीने भ्रसन हो उनसे ष्प॒अपंणकी विधि सुनाई थी ॥ ३॥ बह्माजी बोटे
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परापकी हानि हो, ओर निःसदेह लकष्मीकी प्रापि होती है ॥५॥ वीसकमलोंका एक भस्थ होता है ओर सहश्च बेरपतरोका आधा प्रस्थ होता है॥६॥
¢ ओर सहस शतपत्रका आधा भस्य होता है, सोह पठका एक भर्थ, ओर दशटंकका एक पट होता है ॥७॥ जब इत मामसे तराजपर चदावे तो ||
ट| षब कामना पाता है, यदि निष्काम इतने शपो पूजे तो शिवरूप होता है ॥८॥ जिसको राज्यकी कामना हो बह दशकरोड पाव पूजा शिवको ट
|| एतैश्च लक्षसेख्याकःपूजितभदधवच्छिवः॥ पापहानिस्तथा विभ लमीसस्ान्नाच संशयः ॥< ॥ निशतिः कमलाना तु मस्थमकं ||
| मुदाङतम् ॥ बिल्वो दलसदसेण प्रस्थाद्ध परिभाषितम् ॥६॥ शतप्रसहसरेण प्रस्थाद्ध परिभाषितम् ॥ पलः षोडशभिः प्रत्थः ¢
पलं टेकदशस्मृतः॥७॥ अनेनव तु मानेन तुलामारोपयेद्यदा ॥ स्बीन्कामानवाप्नोति निष्कामश्वैच्छिवो भवेत् ॥८॥ राज्यस्य र
काको यो वै पार्थिवानां च पूजया ॥ तोषयेच्छैकरं देवे दशकोष्ठया खनीश्वराः ॥९॥ लिगं शिवं तथा पुष्पमखण्डं तंडुलं ६
तथा ॥ चितं चंदनेनैव कधा तथा पुनः ॥१०॥ प्रतिरूपं तथा मभ बिस्वीदलमलुत्तमम् ॥ अथवा शतपुत्रं च कृमर वा
तथा पनः॥ ११ ॥ शंखपुष्पैस्तथा प्रोक्तं विशेषेण पुरातनैः॥ स्वेकामफलं दिव्यं पर्रेहापि सवथा ॥१२॥ धूपं दीपं च नैवेयं ट
चारातिकं तथा ॥ प्रदक्षिणां नमस्कारं क्षमापनविसजंने ॥१३॥ कृत्वा सांगं तथा भोज्यं कृतं येन भवेदिह ॥ तस्य वै सर्वथा ४
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| | कमठ बेठपत्र शतपत्र शखप्पोते देवका पूजन करनेसे ठक्मीकी भाषि होती है ॥४॥ यदि इन ाखणूरोसि शिवजीका पूजन करे तो है बाह्मणो !
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राञ्य शंकरः प्रददाति च ॥१९॥ प्रधान्यकाञुको योवै तद्दैनाचैयेत्पुमान् ॥ कारागश्रहगतो यो वे लक्ेनेवाचयेदधरम् ॥ १५॥
। सतषट करे, हे सनी श्वरो॥९॥ शिवङिगपर जो एुष्प अखण्ड चाव॑ चदाकर चदन ओर जठधारासे चचित करे॥ १ ०॥रतिषप प्रति॑जसे बेरपत्र
चावे अथवा शतपन्न वा कमल चडावे ॥११॥ पुरातन पुरुषोने शखरुष्पोके एष्पोमे विशेष पुजन कहा है यह दोनों छोकमे दिष्य सब कामं फर देते
है ॥१२॥ प्रप दीप नैवेय अधं आरती बरक्षिणा नमस्कार क्षमापन विजन ॥१३॥ यह संग करके जिसने महैश्वरको भोग ठगाया है उसको
अवश्य शंकर राज्यप्रदान करते ह॥१४॥ ओर जो अपना प्राधान्य चाहता हौ वह सपे आधा शकरका पूजन करे कारागारसे खक्तिकैष्यि रक्ष
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त प जे कन्याकी चचीस् १६॥ वियाकी
ु || कमलोति शिवजीका पून करे ॥१५॥ जो रोगब्सत हो बह पचा सह कमलोते पूजे कन्याकी कामनावाढा प्च्चीस् सहते ॥
॥४२॥ ||| शामनावाला इते आषा, वाणीकी कामनावाा वीते शकरकी पूजा क२।१९॥ शतरुओकि उचाटनकै निमित्त भी उतनाही पूजन करे, मारण छक्ष
ओर मोहने पचाससहस पूजन है ॥१८॥ सामन्तोके जयमे एक कोटि पूजा करनी चाहिये, राके वशीकरणमे दशखाल पूजा है ॥१९॥
¢ यशकैल्यि भी इतनीही ओर वाहनादिके भापिकैरयि एकह पूजा करनी चाहिये खक्तिकी इच्छावाठा भक्तिसे पांचकरोढ पूजन करे ॥२०॥
| रोगयस्तो यदा स्याद्वै तदर्धेनाचैयेच्छिवम्॥ कन्याकामो भवेद्यो वे तदद्ेन शिवं एुनः॥१६॥ विद्याकामस्तथा यः स्यात्तदर्देना
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चैयेच्छिवम् ॥ वाणीकामो भवेयोवे घृतेनैव सयेच्छिवम् ॥१७॥ उच्ाटनाथ शत्रूणां तन्मितेनेव पूजनम् ॥ मारणे वै तु लक्षेण
मोहने तु तदर्धतः ॥१८॥ सामतानां जये चैव कोटिपूजा प्रशस्यते ॥ राज्ञामथुतसंख्यं च बशीकरणकमंणि ॥१९॥ यशसे च
तथा संख्या वाहनः सहसिका ॥ युक्तिकामोर्चयेच्छभुं पंचकोरटया सुभक्तितः ॥२०॥ ज्ञानार्थी पूजयेत्कोरया शंकरं लोक
शंकरम् ॥ शिवदर्शनकामो वै तदर्धेन प्रपूजयेत् ॥ २१ ॥ तथा पृत्यंनयो जाप्यः कामनाफलषपतः ॥ पंचलक्षा जषा यहि
परत्यक्षं तु भवेच्छिवः ॥ २२ ॥ लक्षेण भजते कथिद्दितीये जातिसंभवः ॥ ततीय कामनालाभश्वतुथं तं प्रषश्यति ॥ २३ ॥
पचम च यदा लक्ष फर यच्छत्यसंशयम् ॥ अनेनैव तु मंत्रेण दशलक्ष फलं भवेत् ॥२७॥ शक्तिकामो भवेद्यो वे दर पूजनं
चरेत ॥ लक्षसंख्या तु स्व॑र ज्ञातव्या ऋषिसत्तम ॥ २५ ॥ |
ज्ञानकी इच्छावाठा लोकोकि कल्याण करनेवाठे शकरकी एकं करोडसे पजा करे । शिवके दशेनकी इच्छावारा इससे आधा पुजन कंरे॥२१॥
अन्य कामना फलके दिये मृत्युंनयका जप करना चाहिये । पां चक्ष जप करने शिवजी त्यक्ष होते ई।२२॥ कोई एक ठाखतसे पूजन करते है,
दो ठाखते जातिका सेभव होता है, तीक्षरे ठाखमं कामना छाम ओर चौथे ठाखमे शिका दशन होता है ॥२३॥ फिर पांचराखमं निःतन्देह पूणं
फल मिरुता है, इसी मन्वते दशठासमैपुणफल होता है।।२४।। युक्तिकी कामनावाठा कुशाओंसि पूजन करे,हे ऋषियो 1 इस पूजामे सर्वव ठकषतंख्यक
रु. २
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| जाननी ॥२५॥ आयुकी इच्छावाछा लक्ष दरवासे शिवजीका पूजन करे प्रकी इच्छावाका ठाख धतुरेसे पुजा करे ॥२६॥ पूजनमे | ठ
दंडीवाला धूर टेना चाहिये अगस्त्य भूक ¶जनसे बडा यश भिकता है ॥२७॥ तुके पूजनते भुक्ति खित मिती । कष्ज कल्हार ||
ओर भकके फूलोके पूजनसे भताप बढता है ॥२८॥ जपाके षठोसिपूजे तो शओंका नाश होताहैरोग ओर उानकर्ममे कनेरके एकोत पूजाक्रे॥२९॥
बेधूकके फूलोसे मूष्णोकी भाति जाती (चेरी) एूलोसे पूजनेसे निश्चय वाहनकी भाति होती है अलसतीके एत पजने विष्णको भिय होता है॥ ३ ०॥ ट
आयुःकामो भवेयो वै दूवौभिः परूजनरेत् ॥ पुजकामो भवेद्यो वै ध्त्रकसुमेश्रेत् ॥२६॥ रक्तदण्डश्च धत्तूरः प्रजने शुभदः 4
स्मृतः ॥ अगर्त्यकुसुमेशवव पूजकस्य महद्यशः ॥२७॥ थुक्तिक्तिफरं तस्य तलस्या पूजयेद्यदि॥अकेपुष्पेः प्रतापच इन्नकल्हा ह्
रकैस्तथा ॥ २८॥ जपाङ्कसुमपूजा त शरणां मृत्युदा स्मृता ॥ रोगोच्चाटनकानीह करवीराणि वे कमात्॥२९॥ बंधुकेभुषणावा्तिजा ¢
त्यावादात्र संशयः॥ अतसीपुष्पकेदेवं विष्णवद्यभतामियात्॥ ३०॥ शमीपतेस्तथा शुक्तिः प्राप्यते पुरुषेण च ॥ मछिकाङसुमे ६
दततेःखिय शुभतरं शिवः ॥३१॥ यूथिकाङसुमेश्शस्येशृह नैव विश्ुच्यते ॥ कर्णिकारस्तथा वह्लसंपत्तिजीयते तरणाम् ॥३२॥ |©
निशण्डी कुसुमेकोकि मनो निमेलतां त्रजे | विल्वपत्ेस्तथा रक्षैः सवौन्कामानवाप्ठयात्॥ २२॥ शङ्गारहारपुष्पेस्तु वधते सुख |©
सम्पदां ॥ ऋतुजातानि पुष्पाणि सुक्तिदानि न संशयः ॥३४॥ राजिकाकुसमानीह शत्रणांमृत्य॒दानि च ॥ एषां लक्षं शिवे दद्याद्
द्याञ्च विपुलं फलम् ॥ २५ ॥ विद्यते कुसुमं तत्न यत्रैव शिववछछमम्॥ चंपकं केतकं दित्वा स्वन्यत्सर्वे समपंयेत् ॥ ३६ ॥ र
शमीपत्रसे पजनेसे एरुषकी खक्रितहोती है मदिकाके फूल से शकर सुन्दर शरिय देतेहँ ॥ ३ १॥ गथिकाक एलो ¶जनेसे घरमे धान्योका अभाव नहीं होता र
कणिकाके एूोके पजने वञ्च तथा सम्पत्ति होती है ॥२२॥ निरगैढीके एलोसे मन निमैर होता है ाख वेर्पत्रोे पूजेतो स्र कामना पुरी होती र
है ॥ ३३ ॥ हारसिंगारके एूोति पूज तो सुखस्म्पत्ति बहती है कुक उत्पन्न हुए शूर निःसदेह खकितदेनेवारे है ॥ ३४ ॥ राजिका ॥
(राई) कै शेति पूज तो शत्रुओं मृत्यु होती है यदि यह छाश शिवजी पर चढाये जाय तो बडा फर होता है ॥ ३५ ॥ रेस्ा कोई ए
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उ+^उर२4+^२
| कू नहीं जो शिवजीको प्यारा न हो, चपा ओर केतकीको छोडकर ओर सव एक चढावे ॥ ३६. ॥ दुस॒के आगे धान्यद्वारा शुकररकै पूजनेका
फ़ल भरमाण ओर भीतितते सब सुनो ॥ ३७ ॥ चाव चटानेसे महष्यको रक्ष्मीकी वृद्धि होती ह, पर वे चावङ अखण्ड भक्तिसे शिवकै
त ऊपर चाये जांय ॥ ३८ ॥ वेः प्रस्थवा तीन प्रस्थवादो परवा संख्याम एक ज्क्ष हों ॥ ३९ ॥ रद्रकी प्रधानता पूजा कर्
फिर एक सुन्दर वञ्च शिवके ऊपर उरावे यह उत्तम तंदुर अपंणकी विधि है ॥ ४० ॥ फिर उसके ऊपर एक श्रीफल ओर गेध्ष्पादि चावे,
अतः परं च धान्यानां पूजने शंकरस्य च ॥ प्रमाणं च फलं सुरव प्रीत्या श्रृणु च सत्तम ॥ ३७ ॥ तदुलारोपणे नृणां ठक््मी
द्धिः प्रजायते ॥ अखण्डितविधौ विप्र सम्यग्भक्तया शिवोपरि ॥ ३८ ॥ षट्केनैव तु प्रस्थानां तदर्धेन तथा पुनः ॥ पलद्र्ं
तथा लक्षमानेन समदाडतम् ॥३९॥ पूजां शुद्रप्रधानेन कृत्वा वशं सु्न्दरम्॥ शिवोपरि न्यसेत्तच तंदुखापणञुत्तमम् ॥४०॥
उपरि श्रीफलं त्वेकं गंघपएुष्पादिभिस्तथा॥ रोपयित्वा च धूपादि कृत्वा पूजाफलं भवेत् ॥९१ ॥ प्रजापत्यद्रयं रौप्यमासंख्या
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॥४४॥
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तव मन्त्रकी विधि एकौ आढ वणेकी है लासपठ तिर चडानेसे महापातक दूर होते है ॥ ४४ ॥ ग्यारह परक ८ ६४ भासे ) तोढमें एक
#॥ छाख तिक होजाति है हितकी कामनासे पूवेकै समान पूजन करना चाहिये ॥ ४५॥ ओर बा्ञणोको भक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिये जो
ह|| च दक्षिणा ॥ देयाः तदुपदेष्ट्रे हि शक्तया वा दक्षिणा मता ॥४२॥ आदित्यसख्यया तच ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः ॥ लक्षपूजा
|| तथा जाता साद्गश्च मन्पूर्वकम् ॥ ४३ ॥ शतमष्टोत्तरं त्र मंञे विधिक्ूदाडतः ॥ तिलानां च पटं लक्ष महापातकनाशनम्
| ॥ ४९ ॥ एकादशपंैरेव लक्षमानखुदाहतम् ॥ पूर्वंवत्पूजनं त्र कतेग्ये हितकाम्यया ॥४५॥ भोज्या वै बाह्मणास्तस्माद
कायां नरेण हि ॥ महापातकजं इखं तत्क्षणातघ्नश्यति भुवस् ॥ ७६ ॥ ।
रुणं. ४ फिर धप दीपादि देकर पूजाका फठ प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥ भरजापति देवताषाछे दोरुपये वा माषकी संख्यासे दक्षिणा दे अथवा उपदेषटाके
अ° १४|| निमित्त शक्तिके अलु्तार दक्षिणा ॥ ४२ ॥ ओर बारह बाह्नणोको भोजन करे जव सांग भन्त्रूर्वक ठक्ष पूजा होजाय ॥ ४३ ॥
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| उलन्न हमा दुःख तत्काठ नाश होजाता है ॥ ४६ ॥ हे शिव जव इसीभकार छाल जोत शिवजीकी पूजा करनी कही है, आठ
अथवा चार प्रस्थ ॥४७॥ वा दो पटका इसका मान कहा है, जौकी पूजा खनियोन स्वगे ओर सौभाग्य बढानेवाटी कही है ॥४८॥ फलकी इच्छा
वालको प्रजापतिके उदेश्य ब्ाहण जिमाने चाहिये, गोधूम अन्ते की हई पूजा मी शैकरका सतोष करती है ॥ ४९ ॥ ठास गोधूम की हृद
शंकरकी पूजा संतानको बदानेवारी है, आभि द्रोण ( ८ सेर ) मे एकलाख गेह होते दँ, विधान इसका विभिपूवक है ॥ ५० ॥ मूके दवारा पूजन
यवपूजा तथा प्रोक्ता लक्षेण परमा शिवे॥ प्रस्थानामष्टकं चैव तथा प्रस्थाद्ंकं पुनः॥४७॥ पलद्वययुतं तच मानमेतत्पुरातनम् ॥ यव
पूजा च मुनिभिः स्वगेसौख्यविवरद्धिनी॥४८॥ प्राजापत्यं ब्राह्मणानां कतैव्यं च फठेप्सुभिः ॥ गोधूमात्नस्तथा पूजा प्रशस्ता ९(कर
स्य वै ॥४९॥ संततिर्दधते तस्य यदि लक्षावधिः कृता॥ द्रोणारदधेन भवेहक्ष विधानं विधिपूर्वकम् ॥९०॥ सुद्ानां पूजने देवःशिवो
यच्छति वै सुखम्॥ प्रस्थानां सप्तकेनैव प्रस्थार्देनाथवा पुनः॥५१॥ पलद्रययुतेनेव लक्षयुकतं पुरातनः ॥ ब्राह्मणाश्च तथा भोज्या
सुद्रसख्याप्रमाणतः ॥५२॥ प्रियंग॒पूजनादेव धर्माध्यक्ष परात्मनि ॥ धर्माथैकामा वर्दते पूजा सर्वेसुखावहा ॥५३॥ परस्थेकेन च
तस्योक्तं लक्षमेकं पुरातनेः॥व्रह्मभोजं तथाप्रोक्तमकंसंख्याप्रमाणतः।॥५७॥ राजिकापूजनं शंभोश्श्रोत्युकरं स्मृतम्॥साषैपानां
तथा लक्षं पठैर्विंशतिसंस्यया॥५५॥ तेषां च पूजनदेव शगोमृत्युश्दातः॥ आटकीनां दलेश्चव शोभयित्वाचयेच्छिवम्॥५६॥
करनेसे शिवजी सुख देते है, सात प्रस्थ अथवा आधे प्रस्थे ॥५१॥ ओर दो परमं एक छख मूग होजायगी रेसा पुरातन महात्माओंने कहा है
{ ओर ग्यारह बाहर्णोको भोजन कराना चहिये ॥५२॥ धमध्यक्ष परमात्माका मियय पूजन करे तो धमौथकामकी बृद्धि होती है ओर बह पूजा
|| संब सुखोकी देनेवाटी है ॥५२३॥ एक प्रस्थमे एक ठाख प्रियंय (ककुनी) होते है, रेता एरातन पुरुषोंने कहा है, इसमे भी बारह ब्राह्मणोंको भोजन
कराना चाहिये॥ ५४॥ रासे शिवका पूजन करे तो शनओौकौ मृत्यु होती हैवीसंपठ(३६ ° तौले) मे एकठाख राजिका (राई) होती है ॥५९५॥ उने
१ पाच चौर्लोका १ मासा सोलह मासका १ क्षं चार कषं वा ८ तोका एक पल होता है ।
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पूजन करनेसे शुकी पृत्यु॑होती है आढकी ( अरहर वा शमीके
यह पूजा अनेक भकारकै सुख करनेवाली ओर सव फठ देनेवाटी है ॥
वृता गौश्च भ्रदातभ्या बलीवरदस्तथैव च ॥ मरीचिसंभवा पूजा श्रोनाशकरी स्मृता ॥ «७ ॥ आटकीनां ददे्भैव रंजयि
त्वार्चयेच्छिवम्॥ नानासुखकरीं द्येषा पूजा सर्वफलप्रदा॥५८॥ धान्यमानमिति प्रोक्तं मया ते घूनिसत्तम ॥ लक्षमानं तु पष्पा
णा शरण प्रीत्या खनीश्वर॥५९॥ प्रस्थानां च तथा चैकं शंखपएष्पसयुद्धवम् ॥ प्रोक्तं व्यासेन लक्ष टि सुहष्ममानप्रदरिना ॥8०॥
रस्थेरकादशेर्नातिलक्षमानं प्रकीतितम् ॥ यूथिक्रायास्तथा मानं राजिकायास्तदद्वकम् ॥६१॥ मरस्थर्िंशतिकैश्चव मदिकामान
मुत्तमम्॥ तिल्पुष्यैस्तथा मानं परस्थान्न्यूनं तथैव च॥६२॥ ततश्च द्विणं मानं करवीरभवे स्मृतम् ॥ निशृडीकुस॒मे मानं तथेव
कथितं बुधैः ॥६३॥ कणिंकारे तथा मानं शिरीषढखमे पुनः ॥ बेषुजीवे तथा मानं अस्थानं दशकेन च ॥६४॥ इत्याधेविविध
मानं दषा छर्याच्छिवार्चनम् ॥ सवकामसमृध्यथं सुक्तय्थं कामनौज्द्वितः ॥६९॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि धारापूनाफलं महत् ॥
यस्य श्रवणमात्रेण कल्याणं जायते तरृणाम् ॥ 8६ ॥
॥६०।६१॥ बीसपस्थमे मीक एक एकठाख होति है एक सरसे कुछ कमम तिरुकै ए एकठाख होते ह ॥६२॥ कनेरके एर दो सरमे
एकटाख होते है इतनाही निथीण्डीकै एलोंका मान प॑सितोने कहा है ॥ ६३ ॥ कणिकार शिरस्षके णू तथा बन्धुजीवक दुपहरिया शूठ
द्शसेरम एकठाख होते है ।।६४॥ इसप्रकार अनेक मान देखकर शिवजीका पूजन करना चाहिये, सव प्रकारकी समृद्धि ओर सक्तिके अर्थ
%॥ कामना त्यागकर ॥६५॥ पूजन करे, अब धारापूजाका महाफठ कहता हूं जिसके भवणमात्रसे मदष्योका कल्याण हो जाता है ॥ ६६ ॥
प्ते शिवजीका पूजन कर शोभित करे ॥ ५६ ॥ प्रीतिक निभित्त
एक गौ ओर एक बैर देना चाहिये भिरचोसे पूजा करनेते भी शतरुका नाश होता ह ॥ ५७ ॥ आढकीके पतसि रंजित कर् शिषजीको पूजे
{ ५८ ॥ हे खनिभ्ष् ! यह आपसे हमने धान्योका मान कहा, हे
सनीश्वर ! अब प्रसन्नता एका ठक्च मान सुनो ॥५९॥ सक्षम मानके जाननेवाठे व्यास्जीनि एक परस्थम खास शखदष्पोका मान कहा है,
ग्यारह भर्थम एकलाख जाति ( चमेली ) के शूक होते है, इतनाही यूथिका (चभेरी विशेष्) का मान है ओर राजिका (राई) का उससे आधा
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भकितिपूवक विधान करके शिवजीकी पजा करके पीठे भक्तपुवेक शिवके ऊपर जरुधारा करनी चाहिये ॥६७॥ उबर भररापकी
जठधारा बडी शोभायमान है, शतरुद्धिय मन्त्र वा एकं दश रद्र. मन्वसे॥६८॥वा रुद्रनाप्य सुद्रसक्त वा परुषसक्त षडंग व् महामृत्युंजय ॥६९॥
गायत्री वा अन्तमं नमः लगाकर वा ॐकार मन्व वा द्रे आगमोक्त मन्त्रोे जठधारा करनी चाहिये ॥७०॥ सुख ओर सन्तानघ्रृद्धिके दयि ट
रापूजन बडाभरष्ठ है अनेक भरकारके सुन्दर दिव्य तथा प्रीतिसे सद्स्म धारण करनेसे ॥७१॥ सहस्र मन्त्र पढकर शिवके ऊपर घृतकी धारा ठ
| चाहिये तब निःसन्देह वंशका विस्तार होता है ॥७२॥ इस प्रकार मेरे मन्तरसे शिवजीका पुजन कराना चाहिये ओर प्रजापति संख्यक ||
विधानपूर्वकं पूजां कृत्वा भक्त्या शिवस्य वै ॥ पश्चाच्च जरूधारा हि कर्तव्या भक्तितत्परः ॥६७॥ ज्वरम्रलापरशात्यर्थं जल |£
धारा शुभावहा ॥ शतरृद्रियमंतरेण श्रस्येकादशेन त॒ ॥६८॥ रुदरजाप्येन्वा तच सक्तेन पौरूषेण वा ॥ षडंगेनाथ वा तत्र ||&
महामृ्युजयेन च ॥६९॥ गायत्रा वा नमोते नामभिः प्रणवादिभिः॥ संतरवाथागमोक्तेश्च जर्धारादिकं तथा ॥७०॥ सुख ¢
संतानबृद्धयर्थ धाराप्ूजनयुत्तमम्॥ नानाद्रव्यैः श्ुभेदिग्यः प्रीत्या सद्धस्मधारिणा ॥७१॥ घतधारा शिवे कायां यावन्मंजसदख
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कम्॥ तदा वशस्य विस्तारो जायते ना संशयः॥७२॥ एवं मदुक्तमभेण कार्य वे शिवपूजनम् ॥ बरह्मभ्य तथा भक्तं प्राजा
पत्यं सुनीश्वरेः॥७३॥ केवर दुग्धधारा च तदा कायां विशेषतः॥ शकंराभिभिता तजर यदा इुदधिजडो भवेत्॥७७॥ तस्था संजा
यतेजीवसदशी इद्धिरुत्तमा॥ यावन्मंभायुत् न स्यात्तावद्धाराभपरूजनम्॥७९॥ यदा चोज्ाटनं दहेजायते कारणं विना॥ यञ्ञङ्क्ापि
वा त्रेम दःखं च परिवर्धितम् ॥७६॥ स्वगृहे कलहो नित्यं यदा चैव प्रनायते॥ तद्ारायां कृतायां वै सर्व दुःखं विखीयते॥७७॥ `
धारह ब्राहर्णोको भोजन कराना चाहिये ॥ ७३॥ यदि किसकी जडबुद्धि हो तो शकरा भिकाकर शिवजीपर केवर दुग्धधार देनी चाहिये
॥ ७४ ॥ तव उसकै बरहस्पतिकै समान उत्तम शुदि हो जाती है जबतक न्त १०००० न हो जाय तवतक धारासे पुजन ॥ ७५॥ ओौर
जब विना कारणही देहे उाटन होजाय जहां कहीं मेमहो बह न्यून होजाय ओर दुःखही की वृधि हो ॥७६॥ ओर अपने धरम नित्यही
करुह होता हो तो इस धारके करनेषे सब दुःख शान्त हो जाते है ॥ ७७ ॥
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| शभक तापदेनेक छिये शिषके ऊपर तेलकी षारा देनी चाहिये; भयतनपूरवक यह कायं कर कायतिद्धिहोती है ॥७८॥ घुगभित तरप ५ (|
#|| उदि होती है ओौरसरसोके तेकते अवश्य शतरभोका नाश होता है ॥७९॥ मधुरा शिवजीकी पूजा करनैसे यक्षराज हीजाता ह, दे पार्वती गक £
|| रकौ धाराभी सब आनंद करनेवाली ह ॥८०॥ मेगाजलकी पारा मुकिति सक्तिकी देनेवाटी है यह सब मृ्युनयसेही भगट &॥८१॥ इसमे विस
4 अयुत १०००० सेख्याका विधान करना चाहिये, ओर ग्यारह बाह्मणोको भोजन करना चाहिये ॥८२॥ हे खनीश्वर ! जो आपने पूछा सो ट्
|| शद ताना व तैलधारा शिवोपरि ॥ कव्या सुभरत्नेन कोर्थसिदि्वं भवेत् ॥ ७८ ॥ वासितेनैव तेलेन भोगवृद्धिः
| पजायते ॥ सा्षपेनेव तेन श्चनाशो मवेदुवम् ॥ ७९॥ मधुना यक्षराजो वै गच्छेच शिवप्ूजनात् ॥ धारा वेक्षुरसस्यापि
९ ` सर्वानन्द्करी शिषे ॥८०॥ धारा गंगाजलस्यैव भुवितसुकितिफलप्रदा ॥ एतास्सवांश्च याः प्रोक्ता षृत्यंजयसमुद्धवाः ॥८१॥
तजाऽयुतप्रमाणं दि कर्तव्यं तद्विधानतः॥ कर्तैव ब्राह्मणानां च भोज्यं वै शद्रसंख्यया ॥८२॥ एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्लोऽरं
|| सनीश्वर ॥ एतद्रे सफलं लोके स्वकामहितावहम् ॥८३॥ स्कंदोमासहितं शंथुं संपूज्य विधिना सद्॥ यत्फलं लभते भक्त्या
| तद्वदामि यथाश्चतम् ॥८४॥ अघर थुक्तािलं सौख्यं पुवपौ्रादिभिः छुभम्॥ ततो याति महेशस्य लोकं सर्वसुखावहम्॥८८५॥
सर्यकोिप्रतीकाशेविमनैः सर्वकामगेः॥ हदकन्यासमाकीरणेगिंयवाव्समन्वितैः ॥ ८३ ॥
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|| षब तुमको छुना दिया, यही ठोकमे सफढ ओर सव कामं तथा हितका करनेवाछा है ॥८३॥ शिवजीको स्कन्द् उमाकै सहित पूजन करके
५ | भक्तिसे जो फल मिकता है वह कहताहू जेस सुना है ॥८४॥ यहां पौत्ादिकै क्म्पुण सुखोको पराप्त करके शिवजीके सब सुखदायक. टोकको
|| जाते है ॥८५॥ कोरिसयैकै समान प्रकाशमान कामगामी विमानोँपर स्थित हो गीत बाजे ओर शद्रकन्याओसे सेवित हो ॥८६॥
गगन वगय
म
शंकरके जनोंके साथ कडा करते है फिर अविनाशी विज्ञानको भाप होकर भक्ष हो जाते ह ॥८७॥ इति श्रीशिवमहाएराणे |
भाषाटीकायां प्रथमे सृष्टिसंडे शिवपूजाविधिवणैनो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ नारदजी बे, हे देवताओम भ्।महाभाग बह्लाजी ! हे देव ।
आप धन्य हो, आपने हमको परमपावनी शिवी कथा सुनाई है ॥१॥ ओर महादिव्य सुन्दर डिगोत्पत्ति आपने सुनाई जिसका भभाव सुनकर
षव दुःख नाश होजाते है ॥२॥ इसके उपरान्त जो माहात्म्य ओर चरि हुआ तथा सृष्टिका भकार आप् विशेषकर कहिये ॥३॥ बह्लाजीबोठे,
क्रीडते शिवभूतश्च यावदाभूतसंएुवम् ॥ ततो मोक्षमवाप्नोति विज्ञाने प्राप्य चान्ययम्॥८७॥ इति श्रीशिवमहापुराणे भरथम.खंडे
द्वितीयाया शद्रसदितायां सृष्टधपाख्याने शिवप्रूजाविधानवर्णनो नाम चतुदशोऽध्यायः॥१४॥ नारद उवाच॥ विधे विधे महाभाग
न्यस्त्वं सुरसत्तम ॥ श्राविताद्याद्ता शेवकथा परमपावनी ॥१॥ तत्राद्ता महादिग्या र्िगोत्पत्तिः ता शुभा॥ चत्वा यस्याः
प्रभावे च दुःखनाशो भवेदिह ॥ २ ॥ अनंतरं च यजातं माहात्म्ये चरितं तथा ॥ सरेशैव प्रकारं च कथय त्वं विशेषतः
॥ ३ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ सम्यक् पृष्ट च भवता यजातं तदनंतरम् ॥ कथयिष्यामि सक्षेपा्था पै तं मया ॥ ७ ॥ अंतदहिते
तदा दैवे शिवर्पे सनातने ॥ अहं विष्णुश्च विप्रेन्द्र अधिकं सुखमाप्तवान् ॥५॥ मया च विष्णुना यं ईंसवाराहयोस्तदा ॥ सं
वृते तु ततस्ताभ्यां लोकसगांवनेच्छया ॥६॥ नारद् उवाच॥ विधे ब्रह्मन् महाप्राज्ञं संशयो इदि मे महान् ॥ कषां कृत्वातुखं
शीधे तं नाशयितुम्हंसि ॥७॥ हंसवाराहयो हूपं युवाभ्यां च धृतं कथम् ॥ अन्यद्ूषं विहायेवं किंमञ्न वद् कारणम् ॥ ८ ॥
आपने भटीबात पी इसके पीछे जो हुआ सो जेसा भेन सुना है संकषेपसे कहता हूं ॥४॥ जब शिप सनातन देव अन्तौन होगये, हे विमेन्द !
तब् भने ओर विष्णजीने बडा सुख पाया ॥५॥ चैने ओर विष्णजीने हंस वाराहका रूप धारण करके उन रपो ठोकंको सम्धृत कर छिया, ओर
सगकी इच्छाकी ॥६॥ नारदजी बोरे हे विषेहे महापंडित हे महाभाज्ञ ! भरे हृदयम वडा सन्देह है, सो आप अतु कपा कर मेरे हदयका संदेह
शीघ्र नाश कीजिये॥७॥भपने हंस ओर वाराहका हप कों धारण किया, ओर रू्पोको छोडकर इसहपके धारण करनेका कया कारण ३ १॥८॥
४३ ॥
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| सूतजी बोठे महातमा नारदजीके यह बचन सुनकर शिवे चरणकमलको स्मरणकर नाजी आदरसे बोढे ॥९॥ ब्रह्माजी बौ हंसकै
गमनम निश्वर्गति होती है ओर जठदुग्धके विभागके समान तच्व ओर अतस्वका १ है ॥१०॥ हंस अज्ञान ओर ज्ञानक नि
समरथ है इसकारण सृष्टिकारीब्रहाने हका रूप धारण किया ॥११॥ विवेकके भात न होनेसे यहं हंस (म वहहूं) ीन होजाताहै. ज्योतिंूप
शवततव जाननेते भगर होता है ॥ १२ ॥ फिर जिसकी सुष्टिकी भृते कामना हौ उसकी कि भकारसे ज्ञान होता है इस कारणसे
सूत उवाच ॥ इत्येतद्भचनं धत्वा नारदस्य महात्मनः॥ स्शृत्वा शिवषदांभोज ब्रह्मा सादरमव्रवीत् ॥९॥ ब्रह्मोवाच ॥ हंसस्य
चोद्ध्वगमने गतिर्भवति निश्वका॥ तत्वातत्वविवेकोऽस्ति जल्दुग्धविभागवत्॥१९॥ अज्ञानज्ञानयोस्तत्त्वं विवेचयति दसकः॥
हेसूपं धृतं तेन ब्रह्मणा सृधिकारिणा ॥११॥ विवेको नैव लब्धश्च यतौ हसो ग्थरीयत॥ शिवस्वहूपततवस्य ज्योतिषूषस्य
नारद ॥ १२ ॥ सृ्िभवृत्तिामस्य कथ ज्ञानं परजायते ॥ यतो रब्धो विवेकोऽपि न मया दंसरूपिणा ॥ १३ ॥ गमनेऽधो
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रिणा ॥१७॥ अथवा भवकल्पाथ तद्रूपं हि प्रकटिषतम् ॥
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वराहस्य गतिभवति निश्चला ॥ धृतं वाराहं हिं विष्णुना वनचा
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॥४५७।
विष्णना च वराहस्य थुवनावनकारिणा ॥ १५ ॥ यदिनं हि समारभ्य तद्रू धृतवान्डरिः ॥ तदिनं प्रति कल्पोऽसौ कल्पो
वाराहसज्ञकः ॥ १६ ॥ तदिच्छा वा यदा जाता ताभ्यां श्प हि धारणे ॥ तदिन प्रतिकल्वोऽसौ कल्पो वारादसंज्ञकः
॥ १७॥ इति प्रश्नोत्तरं दत्तं प्रस्तुतं शृणु नारद् ॥ स्मृत्वा शिवपदा भोज वक्ष्ये सृ्िविधि ने ॥ १८ ॥
हंस खपने विवेक न प्राप्त किया ॥ १३ ॥ अधोगमनमें वराहकी गति निश्वरु होती है इसकारण विष्णने वनचारी वराहका हप धारण |
॥ १४ ॥ अथवा भव ( वाराह ) कल्पके निमित्त उन्होने यह हप धारण किया, भुवनके नमनकारी विष्णने इस प्रकार यह शूप धारण
किया ॥ १५ ॥ जिस दिनते विष्णने यह हप धारण किया उस दिनसे यह कल्प वाराह कल्प कहाया ॥ १६ ॥ जिस दिनसे उत्त पके
धारण करनेमे उनकी इच्छा हृद, उस्र दिनसे प्रतिकल्पं यह कल्प वाराहकल्प कहाया ॥१७॥ हे नारदजी ! इसप्रकार तुम अपने प्रश्नोचरको
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रत. २
अण० १५
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| | हेखने ! अब शकरके चरणकमट स्मरण कर सिका विधान कहता हूं ॥१८॥ हादेषके अन्तर्धान होनेषर म छोकपितामह |
उनके वचन करनेको ध्यानम तत्परहो ध्यान करनेरगे॥ १९॥ शिवजीको प्रणाम करके उस्ष समय हरिस ज्ञान भराप्त करके परमआनंदकोप्राप्त होकर सृष्टि
\ करनेमे मन ठकगाया॥ २० ॥ ओर विष्णजी भी सदा शिवको प्रणाम करके सज्ञे समज्ञा बुञ्षाकर अन्तर्धान होगये॥ २१॥ तब ब्र्मण्डसे बाहर होकर शिवजीका
अलुरह पराप्त कर विष्णजी ने तो बैकुण्ठ निवास किया ॥ २२॥ ओर भने सृष्टिकी कामना विष्ण ओर शिवको प्रणाम करके उस पूवं निर्माण
ध किये जठमं एक अंजटी जर उढाकर डाखा ॥२३॥ तन हे विप्र! चौवी्ष तच्वोंका उसमे एक अण्ड भरगट हुआ उस्न जठहूपको देखतेहु९ विरा-
४ अंतिहिते महदिवे त्वहं छोकपितामहः॥ तदीय वचनं कतैमध्यायन्ध्यानतत्परः ॥ १९॥ नमस्कृत्य तदा शं ज्ञानं भाष्य दर
स्तदा॥ आनदं परमं गत्वा सृष्टि कर्तं मनो दधे ॥२०॥ विष्णुश्चापि तद् त प्रणिपत्य सदाशिवम् ॥ उपदिश्य च मां तात्
| द्यतधानमुपागतः ॥२१॥ ब्रह्माण्डाच बहिगैत्वा प्राप्य शम्भोरु्रहम् ॥ वेकुठनगरं गत्वा तमोवास इरिस्सदा ॥ २२ ॥ अहं
६ स्प्रत्वा शिवं तत्रविष्णुं वै सुष्िकाम्यया ॥ पूं सृष्टं जलं यच्च तर्बाजि्ठदाक्षिपम्॥२३॥ अतोऽण्डमभवत्तज चसुर्विंशतिसंज्ञ
कम् ॥ विरादूपमभूदिप्र जलकूपमपश्यतः ॥२४॥ ततस्सशयमाप्नस्तपस्तेपे दारणम् ॥ द्वादेशाब्दमहं ततर विष्णुध्यानप
रायणः ॥ २५ ॥ तस्मिश्च समये तात प्रादुधैतो दरिस्स्वयम् ॥ माञुवाच महाभीत्या सरद संस्प्रशन्धुदा ॥ २६ ॥
|| ॥ विष्ण वाच ॥ ॥ वरं शरदि भसत्नोऽस्मि नादेयो विद्यते तव ॥ बरहन्छेषुभसादेन सर्व दातं समर्थकः ॥२७॥ बह्ोषाच ॥
॥ युक्तमेतन्महाभाग दत्तोऽहं शंभुना च ते ॥ तदुक्तं याचते मेऽयं देहि विष्णोनमोऽस्तु ते ॥ २८ ॥
४ ट्रूप होगया ॥२४॥ तब में सन्देहको भाप होकर कटिन तप करने खगा ओर बारहव्षतक विष्णजीका ध्यान करतारहा ॥ २५ ॥ हे तात!
उस समय फिर विष्णजी भगटहए ओर परमते भेरा अग चृतदुए सुञचसे बोे ॥२६॥ विष्णुजी बोढे हे ब्याज ! तुम वर मांगो नै पसनन तुम्हारे
५ ल्यि सु्ञे कोई वस्तु अदेय नही है है नन् ! शिवजीके भसादते य सव कुछ देनमे समथ हं ॥२७॥ बहमाजी बोरे े महाभाग ! यह आपका
|| कथन युक्तही है शिवजीने छे आपको देदिया है सो मँ उन्हीका कहा मागता हूं आपको पणाम् है आप दीजिये ॥ २८ ॥
र, 1.
चौवीस तलका यह विरादहपी अंड ह सो चैतन्य नही होता जडरूपी दीसता है ॥ २९५ ॥ हे हरे ! भाप शिवकरे अवहत भदत ४
ये हो, अव शकरकी संभूतिसे इस अण्डको चैतन्य करो ॥३०॥ यह कहने पर शिवकी आज्ञामे परायण महानिष्णजी अननतरप उत 1
भश करगे ॥ ३१ ॥ बह परुष सहसो शिर सहसोनत्र सहसो चरणो समस्त मूमिको आक्रमण कर उस अंडे व्याप्त होगये ॥ ३२ ॥ मे
॥४८॥ ¢
| सुतिसे जव विष्णजी उस अडमे भवेश करगये तव वह चौवीस तत्वका अण्ड चैतन्य होगया ॥ २२ ॥ पाताकपे आरंभ करकं (य
विरादशूपमिदंद्यडं चतर्विशतिसंज्ञकम्॥ न चैतन्यं भवत्यादौ जीमूतं पहश्यते॥२९॥ ्रादुधूतो भवानद्य शिवानुग्रहतो हरे ॥
प्राप्तं शंकरसंभरत्या ह्यण्डं चैतन्यमावह ॥३०॥ इत्युक्ते च महाविष्णुश्शंभोराज्ञापरायणः ॥ अनतरूपमास्थाय प्रविवेश तर्देड
कम् ॥२१॥ सदस्रशीषां पुशूषस्सदखाक्षः सहस्रपात् ॥ स भूमि सवतस्पृरत्वा तदण्ड व्याप्तवानिति ॥ ३२ ॥ प्रविष्ठे विष्णुना
तस्मित्रण्डे सम्क्स्तुतेन मे ॥ सचेतनमभूदण्ड चतुरविंशतिसंज्ञकम्॥ ३३ ॥ प(तारादि समारभ्य सप्तलोकाधिपः स्वयम् ॥
राजते स्म हरिस्तच वैराजः पुरुषः प्रथुः ॥३४॥ केलासनगरंरमभ्यं सर्वोपरिविराजितम् ॥ निवासार्थं निजस्यैव प॑चवक्रश्चकार
ह ॥३५॥ ब्रह्माडस्य तथा नाशे वैडण्ठस्य च तस्य च ॥ कदाचिदेव देवष नाशौ नास्ति तयोरिई ॥३३॥ सत्य पदसुपाश्चित्य
स्थितोऽहं खनिसत्तम ॥ सष्टिकामोऽभवं तात महादेवाज्ञया हदम् ॥ ३७ ॥ सिसृक्षोरथ् मे प्रादुरभवत्पापसगंकः॥ अविदयापचक्
| स्तात बुद्धिपर्वस्तमोपंमः ॥३८॥ ततः प्रसत्नचित्तोऽहंमसुजं स्थावरायिधम् ॥ शुख्यसग च निर्संगमध्यार्यं शंथुशासनात्॥३९॥
रुपं. २ ए अधिपति हारि विराटूषरुषपसे विराजमान हए ॥ ३४ ॥ उसमे केठासनगर सबके ऊपर विंशाजमान हुआ, उसको शकरने अपने निवास्वे
अ० १५ ट||स्मि किया ॥ ३५ ॥ बहाण्ड ओर वेकुण्ठका भी जिस सभय अभाव होजाता है हे देवष 1 .उस् समय भी कैठस्षका नाश नहीं होता
ट| ॥ ३६ ॥ हे सनिभ्रे ! भे सत्यप्दको भाप होकर स्थित हआ हूं) हे तात ! महादेवकी आज्ञासे मे सृष्टिकी कामनासे ॥ ३७ ॥ जब रचना
( करनेरुगा तब प्रथम पापसृष्टि होनेगी वह बुद्धिपूरवक अवियापेचकं तमधरधान ये ॥ ३८ ॥ तव भेँने प्रस्नचित्त हो स्थावर परदाथाफी रचना
१ यलोपस्य त्रेपादिकत्वेतासि्त्वेऽप्यावद्ूगुण : आषंः 1
गि 00940 49
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की, फिर शख्यसर्गके निभित्त शिवजीकी आज्ञासे ध्यान करने र्गा ॥ ३९ ॥ तव उस ष्टिको देख मँ अपने कायं साधनके स्यि |
| करने लगा, तब॒तिरछे चलनेवाे जीव प्रगट हए जो .दुःखरूप थे वह भी कायं साधक न हए ॥ ४० ॥ उस्न सृष्िको असाधक
मानकर जब किर भने. विचार किया तब ऊष्वेगामी स्रातिक सषि परगर हुदै ॥ ४१ ॥ वह देवताओंकी सुषि बहुत ही सुखदायक हु, पर
उसको भी असाधक मानकर म फिर विचार करने छगा ॥ ४२ ॥ तब शंकरकी आज्ञासे राजसस्तगे भरगर हुआ वह मनुष्य नाम् अर्वाक्ल्ञोत
प्रसाधक रै ॥ ४३ ॥ किर महादेवजीकी आज्ञासे भूतादि सवं भगर हुआ, इस भकार मेरी की हूं शष्ट पांच पकारकी हुईं ॥४४॥ तीन
तं दृष्ठामे सिसृक्षोश्च ज्ञात्वा साधकमात्मनः ॥ सूर्गोऽवतंत॒दुःखाटयस्तिर्यक्सोता न् साधकः ॥ ७० ॥ तं चासाध
कमाज्ञाय पुनथ्चितयतश्च मे ॥ अभवत्सात्तविकस्सगं उधष्वस्रोता इति दतम् ॥ ४१ ॥ देवसर्गः प्रतिख्यातस्सत्योऽतीव
सुखावहः ॥ तमप्यसाधकं मत्वाऽचितयं परथुमात्मनः ॥ २ ॥ प्रादुरासीत्ततस्सर्गो राजसः शंकराज्ञया ॥ अवाक्सोता इति
ख्यातो माचषः प्रसाधकः॥ ७३ ॥ महादेवाज्ञया समेस्ततो भरूतादिकोऽभवत् ॥ इति पंचविधा सृष्टिः प्रत्ता वै कृता मया
॥७९॥ जयस्सर्गाः प्रकृत्याश्च ब्रह्मणः परिकीतिताः ॥ तायो महतस्सरगो द्वितीयः सुक्ष्मभौतिकः ॥४५॥ वैकारिकस्ततीयश्च
इत्येते प्रकृता्चयः॥ एवं चाष्टविधास्सगांः प्रकृते्वकृतैः सद॥४६॥कोमारो नवमः प्रोक्तः प्राकृतो वैकतश्च सः ॥ एषाम्वांतरो
भेदो मया वक्त न शक्यते ॥७७॥ अल्पत्वादुपयोगस्य वच्मि सओै द्विजात्मकस्॥ कौमारः सनकादीनां यञ सगो मानयत्
॥ ७८ ॥ सनकाद्याः सुता मे हि मानसा ब्रह्मसंमितः ॥ महावेशग्यसंपन्ना अभवन्पच सुबताः ॥ ९ ॥
सगं भकतिकै बरहदवारा ए है उनम पहला महत्सगै ओर दूरा सक्षम भौतिक ॥ ४५॥ ओर तीरा वैकारिक सग घष्टिका किया है, इस
प्रकार यह आढ भरकारकी सृष्ट भारुतिक ओर विरूतिकै पाथ है ॥ ४६ ॥ नौव कुमारस है वही रति ओर विरूतिवाखा है ओर इनके
भवान्तर मेद् इतने ह किं, जिनको म नहीं कह सकता ॥ ४७ ॥ थोडा भौर उपयोगी जानकर द्विजातमक घृष्टि कहता ह । सनकादिकोंका
जहां महान् सगं हुआ है ॥ ४८ ॥ यह सनकादि मेरे मानस्तएतर बहमसतमित ह यह पां चों सुवत हातैराग्यते सम्पन्न हए ॥ ४९ ॥
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शि०
॥४९॥
शस. २.
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| वै पाचों पण्डित मेरी आज्ञासेही सारसे विखख हए है ओर शिव्कै ही ध्याने मन ठ्गाकर सृष्टिक करने इन्होने मति नही की ^ १
ट| हे उनिभेष् ! उनका सृष्टनिषेषुका उततर सुनकर मोहको पराप्त होकर भन च कोध किया ॥ *५१ ० मुने ! जव मेँ कोधसे व्याकु
त होगया तव भेर नेबोंसे जक वदं गिरीं ॥५२॥ उसी समय मनते स्मरण करते ही तुरन्त आकर विण्जीने युस सम्चाया ॥*५२॥ कि) तुम
अभी शंकरके संतोषके च्यि घोर तप करो । जव भगवानु विष्णने यह शिक्षा की तव हे खनिसत्तम ! भने घोरतप किया ॥ ५४ ॥ त्
|| भ्व छ्य तप करते हए मौह ओर घराणके मध्यसे अवियुक्त नाम देशे ओर विशेषकर शुकसे ॥५५॥ तिमूतिकै आदिकारण रपानिषि
{| याज्ञा अपि च ते संसारवि्ुखा खुधाः ॥ शिवध्यानैकमनसो न सृष्टौ चक्रिरे मतिम्॥५०॥पत्युत्तर च तदत अत्वादसुनि
ट सत्तम॥ अकार्षक्रोधमत्युथं मोहमाप्तश्च नारद ॥५१॥ दस्य मोहितस्याथ विहरस्य्ुन मम॥ कोषेन खट नाभ्यां परापतन्न
शिदवः॥५२॥ तस्मिन्नवसरे तत स्मृतेन मनसा मया ॥ परमोधितोरं त्वरितमागतेना हिं विष्णना॥५२॥ तप, कर् शिवस्येति
हरिणा शिक्षितोऽप्यहम्॥ तपोकारी महद्धोरं परमं ख॒निसत्तम॥५४॥ तपस्यतश्च सृष्टयथ शुवोर्बाणैस्थ मघ्यतः॥ अिसुक्तामि
धादेशात्स्वफीयान्मे विशेषतः ॥५५॥ बिमूरतीनां सदेशस्य प्रदुशीद्षणानिधिः ॥ अर्दिन(रीश्वरो भूत्व पूणा शस्सकलेश्वरः
ट| ॥ ५६ ॥ तमजं शंकर साक्षा्तेनोरािषुमापति् ॥ सर्वज्ञं सवंकरतारं नीररोदितसंकञकम् ॥ 4७ ॥ इष्वा नत्वा महाभक्तया
¢| स्त्वाह त महमित ॥ अवोचं देवदेवेशं सृज त्वं विविधाः प्रजाः॥९८॥ शरुत्वा मय वचर्स्ोथ देवदेवो मदेश्वरः॥ ससजं स्वात्मन
स्तुल्याङ्द्रो श्द्रगणान्बहून ॥ ५९॥ अवोचं एुनरेवेशं पहार महेश्वरम् ॥ जन्मसृत्यु भयाविष्ठास्सज देव प्रजा इति ॥६०॥
ट| सक्र अर्नारी्र होकर ूर्णीश सकटेश्वर भगट हूए ॥ ५६ ॥ उन अजन्था तेजोराशि साक्षात् उमापति सवज्ञ सवके कत्त नीरटोहित
है || शकरको देखकर ॥ ५७ ॥ महाभक्तिसे स्तुति ओर नमस्कार कर मँ बडा भसन्न हभ, ओर देवदेवे कहा आप अनेक भ्रकारकी सृष्टि
है | कीजिये ॥ ५८ ॥ तब यहं देवदेव महेश्वर मेरे वचनको सुनकर अपने समान बहुतसे रुदोकी सृष्टि करने ठगे ॥ ५९ ॥ तन महारुद्र
‰॥ महेश्वरसे भने फिर कहा हे देव ! आप जन्ममृत्युके भयवाली भ्रजाकी रचना कीजिये ॥ ६० ॥ |
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| महादेवजी इसपरकारसे भेरे वचन सुनकर हें खनिशरेष्ठ ! दते हए कहने रगे ॥६१॥ महादेवजी बोढे हे बह्लाजी मेँ जन्ममृत्यु
भयवारी भ्रजा नहीं रदरंगा, जो अशोभन कमेवश दुःखस्षागरभं भस हो ॥ ६२ ॥ तो दुःखस्ञागरमे मग्न हदं भरजाओंका उद्धार करता
म, उनको भी भकार अपनी गशमूरतिसे ज्ञान देता ॥६३ ॥हे प्रजापते ! यह दुःखसे व्याकु प्रजा आपही निर्माण कीजिये भेरी आज्ञासे
तुम मायासे बद्ध न होंगे ॥ ६४ ॥ ब्रह्माजी बे इसपरकारसे वह नीरछोहित भगवान् स॒ङ्जसे कहकर भेरे देखते २ गणोसहित अन्तधांन
एवे. श्रत्वा महादेवो मद्वचः करणानिधिः ॥ प्रदस्योवाच मां सद्यः प्रहस्य श्ुनिसत्तम॥& १॥ महादेव उवाच ॥ जन्मभ्त्युभया
विष्टा नादं सक्षय प्रजा विघे॥ अशोभनाः कमवशा विमगभ्रा दुःखवारिधौ॥६२॥ अहं दुःखोदधौ मध्र उद्धरिष्यामि च प्रजाः ॥
सम्यवज्ञानप्रदानेन गुर्मूतिंपरिभ्रदः ॥ ६३ ॥ त्वमेव सृज दुःखाटयाः परजास्सर्वाः प्रजापते ॥ मदाज्ञया न बद्धस्त्वं मायया
॥ ६५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां १ प्रथमखंडे सृष्टदपक्रमे शद्रावताराविभाववर्णनो नाम पञ्चदशो
ऽध्यायः ॥ १५ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ शब्दादीनि च भूतानि प॑ंचीकृत्वाहमात्मना ॥ तेभ्यः स्थूलं नभो वां वह्वि चैव जलं महीम्
॥ १॥ पव्तांशच समुद्रा पृक्षादीनपि नारद ॥ कलादियुगपर्यतान्कालानन्यानवासृजम् ॥ २ ॥ सृष्टचंतानपरांापि नाहं
तुष्टोऽभव मुने ॥ ततो ध्यात्वा शिवं साम्बं सांधकानस्रजं शने ॥ ३॥ |
होगये ॥ ६५ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणे रुद्रसेहिताभाषादीकायां प्रथमे पृष्टिखण्डे रुद्रावतारवणनो नाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ ब्रह्माजी
बोे हे नारद ! भेने स्वयं शब्दादि पचमूतोंदारा पंचीकरण करके उनसे स्थूक आकाश वायु, जल, असि, प्रथिवी ॥ १ ॥ तथा पर्वत, सुद्र,
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। संभविष्यसि ॥ ६९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युकत्वा मां ख भगवान्सुश्रीमाप्रीरकलोहितः ॥ सगणः पश्यतो मे हि इतमंतर्दधे दरः
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वृक्षादि ओर कठादि ुगपयेन्त कारठोकी भी भेन रचना की ॥२॥ हेखने ¡ ओर भी ष्ठे पृदार्थोकी रचना की प्र भँ संतुष्ट नहीं
दुआ, त भने साम्बशंकरका ध्यान करके सृष्टिक पदाथ निर्माण किये ॥ ३ ॥
१ सृष्टेरिति शेषः 1 ५
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अपने नेवोषे मरीचिको, हदये भूयको, शिरसे अगिराको, व्याने ऋषिभ्रष्ठ उलहको निर्माण किया ॥ ४ ॥ उदानसे पठस्त्यको, समानस
| वसिषठनीको, अपानते कको, ते अतनिको ओर भाणसे दक्षजीको निर्माण किया, गोदीते हे नारदजी । तुमको ओर् छायाते कर्दमजीकौ
ठ निर्माण किया ॥ ५ ॥ ओर सव साधनक साधन धर्मको संकल्पते निर्माण ॥ ६ ॥ हे सनिशरष् ! इसभकारसे म महादेवजीकी छपा इन
© हिते साभनोको निर्माण करके कता हो गया ॥ ७ ॥ हे तात ! फिर मेरी आज्ञासे संकल्पसतभव ` प्सनाधकोके साथ मुष्यते वृत्त
ठ मरीचि च स्वनेनाभ्यां डदयादभरयमेव च ॥ शिरसोऽगिरसं व्यान त्पुलदं खनिसत्तमम् ॥४॥ उदाना पकसत्यं दि वसिष्ठ
ठ समानतः ॥ कतुं त्वपानाच्छोजाभ्यामि दक्षं च प्राणत्ः॥५॥अश्नजं त्वां तदोत्संगाच्छायायाः करदम् युनिम् ॥ संकल्पादसृजं
ध सर्वसाधनसाधनम् ॥ ६ ॥ एवमेतानहं सृष्टा कृतार्थस्साधकोत्त मान् ॥ अभवं शनिशाटूर महादेवप्रसादतः ॥ ७ ॥ ततो
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मदाज्ञया तात धर्मः संकल्पसंभवः ॥ मानवं रूषमापत्तस्साधकेस्तु प्रवतिंतः ॥ ८ ॥ ततोऽसजं स्वगावेभ्यो विविषेभ्योऽभि ,
तान्पुताच् ॥ स॒रास्रादिकांस्तिभ्यो दत्वा तां तां ततं सने ॥ ९ ॥ ततोऽहं शंकरेणाथ वरेरितोऽतगतेन ह ॥ द्विधा कृत्वा
त्मनो देहं दविशूपश्चाभवं घने ॥ १० ॥ अद्धैन नारी पुङ्षश्व्धैन संततो शने ॥ सतस्यामसृजदंद्र सव॑साधनश्त्तमय् ॥ ११॥
स्वायथवो मवुस्ततर पुरषः परसाधनम् ॥ शत्पाभिधा नारी योगिनी सा तपस्विनी ॥ १२ ॥ सा पुन्मवुना तेन गृहीता
तीव शोभना ॥ विवाहविधिना ताताऽप्रजत्सग समेथुनस् ॥ १३ ॥
हुआ ॥८॥ हे सने ! फिर मैने अपने शरीरे सुर अहुर आदि अनेक पत्र बनाये ओर उनको उन उनके अुटप एत्र दिये ॥९॥ तब अन्त
यामी शकरकी प्रणामे चैने अपने कै दो भाग करके दो हप कयि ॥१०॥ हे छने | यँ आधत्ते नारी ओौर आधे रुष हुआ, उसमे सवका
साधन परमोत्तम एक मिथुन बनाया ॥ ११ ॥ दसम परुष परमसाधक स्वायंभुव मल हआ ओर योगिनी तपस्विनी शतषूपा ज्ञी हुईं ॥१२॥
उस् अत्यन्त शोभावारीको मलन श्रहण किया हे तात ! उन्होनि विवाहकी विधिसे मैथुनी प्रष्टि उत्पन्न की ॥ १३ ॥
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| उन्होनि पियत षुत्रको उत्पन्न किया, दृ्षरा त्र उत्तानपाद ओौर तीन कन्या जन्मी॥१४॥ जो आकती देवहूती ओर भवती नामवाठी थीं रुचिकै
निमित्तआकूती ओर करैमके निमित्तदेवहूती दी॥ १५।उन्तानपादकी छोटी बहन भती दक्षभजापतिकै निमित्त दीउनम भखतीकी संतानसे चराचर जगत् ||
व्याप्त होगया ॥१६॥ आकूतीमे रुचिते दक्षिणासहित यज्ञ उन्न हभ, यज्ञके दक्षिणामे बारह धत्र उलन हुए ॥१७॥ हे खने! देव हूतीमे कर्दमे ||£
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बहुतसे प्र उत्पतन हए, दक्षके चौबीस कन्या हुई ॥१८॥ दक्षजीने भद्धाको आदि ठे तेरहकन्या धमैको दीं हे स॒नीश्वर ! उन धमकी च्वियोके
तस्यां तेन सपुत्पत्नस्तन यश्च प्रियव्रतः ॥ तथेवोत्तानपादश्च तथा कन्या्यं पुनः ॥ १४ ॥ आङतिदेवहूतिश्च प्रस्रतिरिति
विधृताः ॥ आङृति रुचये परादात्कदमाय तु मध्यमाम् ॥ १५.॥ ददौ भ्रति दक्षायोत्तानपादाठजां सताः ॥ तासां भसूति ||
पसवेस्सव ग्यां चराचरम् ॥ १६.॥ आकृत्यां च शचेश्वाभददरं यज्ञश्च दक्षिणा ॥ यज्ञस्य जज्ञिरे एता दक्षिणायां च ||
दवादश ॥ १७॥ देवहूत्यां कर्दमा बह्मयो जातास्प॒ता्नने ॥ दक्षानाताश्चतस्श् तथा पञ्यश्च विशतिः ॥ १८॥ धमय
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दत्ता दक्षणश्रद्धायास्तु योदश ॥ शृणु तासां च नामानि षर्मश्चीणां सुनीश्वर ॥ १९ ॥ श्रद्धा रक्ष्मीधरंतिस्तुषिः पुष्टिमेधा ं
तथा क्रिया ॥ बसुःबुद्धिलना शांतिः सिद्धिः कीति्लयोदश ॥ २० ॥ ताभ्यां शिष्टा यवीयस्य एकादश खोचनाः ॥ ख्याति
स्सत्पथसंभूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा ॥ २१ ॥ सन्नतिश्वानुरूपा च ऊर्जास्वाहा स्वधा तथा ॥ भरयुभवो मरीचिश्च तथा चैवां #
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गिरा भनि: ॥ २२ ॥ पुरस्त्यः पुलदशेवक्रतुश्वषिवरस्तथा ॥ अिर्वासिषठो वहश्च पितस्थ यथाक्रमस् ॥ २३ ॥ ख्यातास्ता
जगरहुःकन्या भृग्वायास्साधका वराः ॥ ततस्संप्रितं सर्व चेलोक्य सचराचरम् ॥ २४ ॥
नाम सुनो ॥१९॥ श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, टना, वसु, शांति, सिद्धि, कीति, यह तेरह धमकी ली रै॥ २० ॥
उनके छोरी जो ग्यारह कन्या थीं वे ख्याति, सत्पथसभूति, स्मृति प्रीति, क्षमा ॥२१॥ सश्चति, अनुपा, ऊजा, स्वाहा.स्वधा, भुय, भव, मरीचि
अंगिरा, नि ॥२२॥ धरस्य पह, कतु, अत्रि, वशिष्ट, वहनि, पितर इन ग्यारहोंको यथाक्रमः ॥२३॥ यह श कन्या व्याही गई, इनकी
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प्रकार अम्बिकापतिकी आज्ञासे कमौचस्ार अनेकप्राणी ओर ब्राह्मणश्रेष्ठ उतन्न दए ||
धर्मको साई चन्द्रमाको॥ २६॥ ओर परिधि १ २कश्यपको दीह हे नारद् । ओर
कोदो दो कन्या दीं उनसे चराचर बहृतसी खि हुई
सतानोसे चराचर सहित त्रिरोकी व्याप्त होगहं ॥२४॥ इस
॥ ॥ २५ ॥ कल्पभेदपते दक्षके साढकन्या कही गहे है उनमें दश
चार प्ररूप ताक्ष्यं॑( गरुड ) जीको दीं ॥ २७ ॥ मृ अंगिरा ओर शाश्च न
|॥ २< ॥ हे खनिभरेष्ठ ! जो दक्षजीने विंधिपूर्वक १३ शी कश्वपजीको दीथीं ॥ २९ ॥ उनकी सन्तानो चराचर व्रिकोकी व्याप्त होगदै,
|| एं कमदिरूपेण भाणिनामविकापते॥ आज्ञया बहवो जाताअसंख्याता द्विजर्षभाः ॥ २५ ॥ करपभरदेन दक्षस्य षष्टिः कन्याः
परकीतिंताः ॥ तासां दश च धर्माय शशिने सप्तविंशतिम् ॥ २६ ॥ विधिना दत्तवान्दक्षः कश्यपाय उयोदश् ॥ चतसः प्रर
पाय ददौ ता्ष्याय नारद् ॥२ 9॥ भृग्वंगिरःछृशाभभ्यो दव द्रे कन्ये च दत्तवान् ॥ ताभ्यस्तेभ्यस्तु संजाता बहनी सृष्टिश्राचरा
६| ॥ २८ ॥ यो दशमितास्तस्मे कश्यपाय महात्मने ॥ दत्ता दक्षेण याः कन्या विधिवन्शुनिसत्तम ॥ २९ ॥ तासां प्रषरूति
| भिन्यीपतं मलोक सचराचरम् ॥ स्थावरं जगमं चैव श्ुन्य नैव तु किंचन ॥ ३० ॥ देवाश्च ऋषयश्चैव देत्याश्वैव प्रजज्ञिरे ॥
| वृक्षाश्च पक्षिणश्चैव सवे पर्वतवीरूधः ॥ ३१ ॥ दक्षकन्यापरसुतशच व्याप्तमेवं चराचरम् ॥ पातारुतलमारभ्य सत्यलोकावधि
६ धुवम् ॥ ३२॥ ब्रह्मांडं सकलं व्याप्त शुन्यं नैव कदाचन ॥ एवं सृष्टिः कृता सम्यग््ह्मणां शंथुशासनात् ॥ ३३ ॥ सती
||| नाम श्रिद्चुलामे सदा रूढेण रक्षिता ॥ तपोर्थं निमिता पूं शंयुना सर्वविष्णुना ॥ ३७॥ |
+ © || स्थावर जंगम इनमे कहीभी शून्यता न रहय ॥ ३० ॥ देवता ऋषि ओर दैत्य प्रक हुए, वृक्ष पक्षी पवेत वीरुध (८ छेयेवृक्ष ) हुए
| ९ ६||॥ ३१ ॥ इसप्रकार दक्षकी कन्याओंसे यह चराचर जगत् व्याप्त होगया, पाताठते ठेकर सत्यलोकतक ॥ २२ ॥ सव ब्रह्माण्ड व्याप्त होगया,
{ तारीस्थान न रहा इसप्रकार शिवजीकी आज्ञासे ब्रह्ाजीने यह सृष्टि की॥ ३३॥ सतीकै तरिशूखके अथ्रभागसे सदाशिषने रक्षा की,
सुवव्यापी शिवजीने उसको तपकै निभित्त ही निमाण कियाथा ॥ ३४ ॥
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| दक्षजीते छोकके कल्याणके निमित्ती भगट हुदै थी,भक्तोकेउद्धारके निमित्तउन्होने बहृतसी टीका की॥ ३५॥। जिका वामां गवैकुट है, दक्षिणाङ्ग
ह. जिसके हदयसे है इसभकार शिवको निषिध कहते द ॥ ३६॥ पै विष्ण ओर रुद यह तीनों रणै परब अविनाशी शिव स्वयं सदा निर्शण ई।३५।
ट् विष्ण सत्वयुण म रजोयाण ओर रुदर तमोखणके अधिष्ठाता है टोकाचारमे इसमकार नाभहै वास्तवं तो ॥३८॥ अन्तरे तम बाहरर्े सत्व रेते विष्ण है,
ट बाहरमे तम अन्तरम सत्वयणी रुर है, भीतरम सत्व ओर तम बाहरमे रजोयण प्रधान भै ब्रहम हूं ॥३९॥ रजोयणी सुरा देवी है, सत्वशटपा वहसती है
# सेव दक्षात्समुद्रता रोककाया्थमेव च ॥ लीलां चकार बहुशो भक्तोद्धरणहेतवे॥ ३५॥ वामांगो यस्य वैकुगोदक्षिणांगोऽहमेव च॥
प शदो इदयजो यस्य प्रिविधस्तु शिवः स्षरतः ॥३६॥ अहं विष्णुश शद्र च गणाञ्चय उदाडताः॥ स्वयं सदा निथंणश्च परनब्रह्माग्यय
|| शशर्वः॥२७॥ विष्णुस्सत््वं रजोऽदं च तमोदर उदाडतः॥ लोकाचारतहत्येवं नामतो वस्त॒तोऽन्यथा॥३८॥अंतस्तमो बरिस्सत्त्वतो
विष्णुरुदरस्तथा मतः॥अंतस्सत्वस्तमो बाह्यो रजोहं सर्वथास॒ने॥३९॥राजसी च सुरादेवी सत्वहूपात्तसा सती॥ क्ष्मीस्तमोमयी
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ञेया तरिूपा च शिवा परा॥४०॥एबं शिवा सती भूत्वा शंकरेण विवादिता ॥ पितुर्थजञे तलँ त्यक्ता नादात्ता स्वपदं ययौ ॥४१॥
पुनश्च पार्वती जाता देवप्राथनया शिषवा॥ तपः कृत्वा सविर पुनश्शिवसुपागता ॥४२॥ तस्या नामान्यनेकानि जातानि च
मुनीश्वर ॥ कालिका चंडिका भद्रा चाञचंडा विजया जया॥४३॥ जयंती भद्रकाली च दुर्गां भगवतीति च॥ कामाख्या कामदा
दयम्बा मृडानी सवैमेगला ॥४७॥ नामधेयान्यने कानि थुक्तिसुक्तिपरदानि च ॥ शुणक्ाबुरूषाणि पायशस्तञ पार्वती ॥७५॥
तमोमयी ठक्ष्मी है इसभकार परा शिषा तीनदपवाटी है ॥४०॥ इसप्रकार शिवा सती होकर शेकरके साथ ग्याहीगई, पिताक यज्ञम शरीर छोडकर
नारदते उस अपने पदको भाप हई ॥४१॥ पिर देवता्ओकी भाथनासे वह शिवा पाती ह, बडी तपस्या करके फिर शिवजीके समीप.भत ह
॥४२॥ हे छनीश्वर ! शिवाकँ अनेक नाम हुए, काठिका, चटिका, भद्रा, चाण्डा, विजया, जया ॥ ४३॥ जयन्ती, भद्रकाठी, दु्गाभगदती
कामाख्या, कामदा, अम्बा, मृडानी ,सव॑मंगठा ॥ ४४ ॥ यह अनेक नाम भुक्तिखक्तिकै देनेवारे
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है । यणकमंके अनुतार भ्रायशः पार्वती ॥ ४५ ॥
यं करते ६।४६॥ ह खनिभेष्ठ इसभकारसे तुमसे यह सष्टिका भकार वणेन किया,
शि०घ णमयी तीनोदेवी ओर यणमय तीनों देवता मिखके सृष्टके उत्तम कायं करते ह व ॥
॥५२॥ ||2|| शिवकरी आन्न मने सब बहाण्डकी रचना की है ॥४७॥ पररह शिव हँ उनके तीन रूप हे विष्णु व रद्र यहं व भदे ह ॥ ५ ध ट
निर्यगस्वयण स्वतंत्र परमात्मा शिव शिवाके सहित मनोहर शिवलोकम रमण करते है॥४९॥उनक पूण वतर रद्र सक्षात् । शब् ह उन प॑च॒लीदेवने ||
कैलासमें अपना मनोहर भवन बनायाहै ह्ाण्डके नाश होनेपर मी जिसका नाशनहींहोता॥ ५० ॥इति श्रीशिव ° महा ° सरसं ° भावायां पथम ° खंड
गुणमय्यस्तथा देव्यो देवा गणमयाघ्चयः ॥मिकित्वा विविधं सृचेश्कस्ते कारयसुत्तमम् ॥४६॥ एवं सृिध्रकारस्ते वणितो सुनि
सत्तम॥ शिवारज्ञया विरचितो बह्मांडस्य मयाऽखिलः॥ ॥४७॥ परं बरह्म शिवः प्रोक्तस्तस्य हपाल्नयः खराः ॥ अईं विष्णुश्च
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रदश य॒णभेदाुङूपतः ॥४८॥ शिवयारमते स्वैरं शिवोके मनोरमे ॥ स्वतः परमात्मा हिं निैणस्सयुणोऽपि ३॥ ४९ ॥ #
तस्य पूर्णवतारो दि शदरस्साक्षाच्छिवः स्मृतः ॥ केलासे भवनं रम्य पंचवक्रश्चकार इ ॥ ब्रह्मास्य तथा नाशे तस्य् नाशोस्ति व ¢
न हि ॥ ५० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शुदरसंहितायां प्रथमखंडे सष्टडषाख्याने ब्रह्मनारदसंवादे सृशिणनो नाम `
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षोडशोऽध्यायः ॥१६॥ सूत उवाच ॥ इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य ब्रह्मणस्ष तुनारदः ॥ पुनः प्रच्छ तं नत्वा विनयेन सुनीश्वराः ६
॥ १ ॥ नारद उवाच ॥ कदा गतो हि कैलासं शंकरो भक्तवत्सलः ॥ क्र वा सखित्वं तस्यासीत्छुबेरेण महात्मना ॥ २॥ किं ट
चकार हरस्तर्जपरिपूरणः शिवाृतिः ॥ एतत्सर्वं समाचक्ष्व परं कौतूहलं सम ॥ ३ ॥ ब्रह्लोवाच ॥ शृणु नारद् वक्ष्यामि चरितं ए
शशिमौलिः ॥ यथा जगाम कैलासं सखित्वं धनदस्य च ॥ ४ ॥ |
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४ | नामषोडशोऽध्यायः॥ १६॥ सतजी बो हे छनियो | बह्लाजीके यह वचन सुनकर बह नारदजीः फिर नमस्कार कर उने पुछने छे ॥ १ ॥
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नारदजी बोडे भक्तवत्सर शंकर किस समय केठासपर गये ओर महात्मा कुबेरकै साथ उनकी मित्रता कहां हुदे॥ २॥ ओर परिपुणं शिवाकति हरिने
बही कया किया, यह सच कु सुञञसे काहिये इस वातका सुज्ञे परमकौतूहठ ह ॥ २ ॥ बह्माजी बोठे सुनो नारदजी शेकरका चरित्र कहता हूं ||
उ+ यथ य य+ 9९ +र +
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| | प्रकार कृबेरसे मित्रता हदं ॥ ४ ॥ काम्पिल्यनगरम एक सोभयाजीकै कर्मे उत्पन्न यज्ञवियामे विशारद ॒यज्ञदत्तनामा दीक्षित ।
५॥ वह बाह्मण वेद वेदागका जानने वाढा वेदान्तादिे चतुर राजमान्य बोखनेमे चतुर कौर्तिभाजन् था ॥ ६ ॥ अधिकी शुश्रषामे रत
बेदके पदनेम तत्पर॒शुन्दर रमणीयअंग चन्द्रनिम्बके समान आङतिवाढा था ॥ ७ ॥ उस्न यज्ञदत्तदीक्ितका यणनिधि नामकं एर था
आदह वर्षम यज्ञोपवीत होकर जिश्तको पढानेको भेजा था. पर पिताकै अनजानमे वह शत खेर्ने ठगा ॥ < ॥ माताक पासे बहुतता धन
% || ला लाकर अभिमाने ज्वारियोके साथ हो मित्रता करने ठगा ॥ ९ ॥ कमते ब्राहमणोके आचार छोड दिये सन्ध्या स्नानस भी प्राङ्-
आसीत्कपिर्यनगरेसोमयाजिङ्कलोदधवः॥ दीक्षितो यज्ञदतताख्यो यज्ञविद्याविशारद<। वेदवेदांगवित्प्ाज्ञ वेदान्तादिषुद्क्षिणः॥
राजमान्योऽथ् बहुधा वदान्यः कौतिंभाजनःदेअग्िञु्रूषणरतो वेदाध्ययनतत्परः॥घन्द्रो रमणीर्यागश्चन्द्रमिवसृमाकृतिः॥७॥
आसीद्रणनिधिनांम दीक्षितस्य स्य वे सुतः॥कृतोपनयनस्सोष्टौ विदय जब्र दभूरिशः॥अथ पित्रानभिज्ञात यूतकमरतोऽभवत्<॥
आदायादायबहुशो धनं मातुस्सकाशतः॥ समदाद्चूतकरिभ्योभेवीं तेश्च चकार सः॥९॥ संत्यक्तबाह्मणाचार्ः सध्याज्ञानप्राङ्
सुखः।निदकोवेदशाघ्राणां देवव्राह्नणनिदकः१ ०।स्पृत्याचारविहीनस्त गीतवाय्यविनोदभाक्॥ नटपाखंडभाण्डंस्तु ब्गरेमप्रंपरः
॥११॥ प्रेरितोऽपि जनन्यास न ययौ पित्रंतिकम् ॥ गहकाययातरव्यापरो दीक्षितो दीक्षितायिनीम्॥ १२॥यद् यदैव तां पृच्छेदये
सम्य वै देवनितावेतमनेदसम्॥१४॥ भधीत्याध्ययना्थं स द्विमिनेस्समं यथौ।।एकपुतेति तन्माता षरतारयति दौक्षितम्॥१५॥
मख हुआ वेदशाल्च ओर देवबाह्मणोकी निंदा करने र्गा ॥ १० ॥ स्यति आचारसे विहीन होकर गीत॒बाजेकै सरमे बन गया, न
|| पाखण्डी ओर भांडोके साथ प्रेम कृरने र्गा ॥ ११ ॥ भाताके कहने भी वह पिताके समीप न जाता ओर शह पिता कार्थं तथा
¢ दीक्षामे लगाकर रहता ॥ १२. ॥ ओर जब कभी वह अपनी श्वी पूछता हे कल्याणि इस समय हमारा यगनिधि शव घरमे नहीं है क्या
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द तदेति नीं हिरत ए
गुणनिधिस्खतः ॥ न दश्यते मया गेडे कल्याणि विदधाति किम् ॥१३॥ तद् तदेति सां श्रयादिदानीं स बहिगतः ॥ स्ञात्वा
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ु पठनके निमित्त बह दो तीन मित्रोके साथ गया है एकही ऽत्र होनेके कारण माता दीक्षितको प्रतारणा कर देती ॥ १५ ॥ इससे दीक्षितने
॥५३॥
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| उस त्रके कर्म॑ ओर इको कुछ भी न जाना, फिर उक्ते सोटहवं वर्षम इसका केशान्त कमं किया ॥ १६ ॥ पीठे दीक्षित यक्ञदत्तन
|| उतत उत्रका शोक्तं विधानते विवाह कराया ॥ १७ ॥ हे नारद भ्रतिदिन उसकी माता उतत यणनिभिकौ एकान्तम बढाकर बहुत सम्-
|| ती ओौर प्यारे कहती ॥ १८ ॥ हे ऽतर तुम्हारे महात्मा पिता बडे कोधी है, यदि बह तुम्हारा ओर मेरा चरित्र जान ठंगेतो
| कचे ओर सुले मारेगे ॥ १९॥ भै तेरे पिताके आगे नित्य तेरी कुचेष्टको छिपाये रहती ह सदाचारसेही तुम्हारे पिताकी प्रतिष्ठा
¢ न तत्कमे च तद्वृततर्किचिद्ेत्ति स दीक्षितः ॥ सर्वं केशांतकर्मास्य चकर वऽथ षोडशे ॥ १६ ॥ न स दीक्षितौ यज्ञदृत्तःपुत्
| स्वतस्य च।श्यक्तेन विधानेन पाणिमाहमकारयत् ॥१७॥ प्रत्यहं तस्य जननी खतं यणनिधि मृड्॥ शास्ति सनदाद्रडदथा
¢ ्यपवेश्य स्म नारद ॥१८॥ क्रोधनस्तेऽस्ति तनय स महात्मा पितेत्यरम् ॥ यदि ज्ञास्यति ते पृं एवां च मां ताडयिष्यति
$ ॥ १९ ॥ आच्छादयामि ते नित्यं पितुर कचेष्टितम् ॥ रोकमान्योऽस्ति ते तातस्सदाचारेनवैधनेः ॥ २० ॥ बराह्मणानां
धनं तात सद्विया साधुसंगमः ॥ किमथ न करोषि त्वं सुचि प्रीतमानसः ॥ २१ ॥ सच्छरोियास्तेऽन्रूचाना दीक्षितास्सो
|| मयाजिनः॥ इति रूटिमिह प्राप्तास्तव पूर्वपितामहाः ॥ २२॥ त्यक्ता दुर्वृत्तसंसर्ग साध्रुसंगरतो भव ॥ सद्वियाश्च मनो येहि
| ब्रह्मणाचारमाचर ॥२३॥ तातानुह्पो शूपेण यशसा इर्शीरतः ॥ ततो न अपसे किभ्रस्त्यज दवृत्ततां स्वकाम् ॥ २४ ॥
ह.त. २ || || है धनते नहीं है ॥ २० ॥ हे तात ! बाह्नणोका धन सद्विया ओर सराधुओोंका समागम है तू इसमे प्रसन्नतासे अपना मन कयो नहीं ठ्गाता
अ° १७ ||(|॥ २१ ॥ सोमयाजी अच्छे श्रोत्रिय यथायोग्य कमं करनेवाटे दीक्षित दै ठस्री विख्यात तुम्हारे दादाकी चली आती है ॥ २२ ॥ तुम
र्का सप्तगे छोडकर साधुओके संगमे भीति करो अच्छी विया षन ठ्गाओ बाहणोंके आचार कृरो ॥ २३ ॥ पिताक समान यश कुट-
शीर चो उनकै से कार्यं न करके तु ज्जिव क्यों नहीं होता. यह अपनी बुरी चार छोड ॥ २४ ॥
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। पका तू है ओर सोठहवषकी यह तेरी बहू है इस सद्ृ्तवाटीसे युक्त होकर पिताकी भक्ति यक्तहो॥ २.५ गुण ओर शीले श्वशुर भौ तुम्हारा ||
|| मान्य है, तोभी तूजित नहीं होता अरे इस दुषृत्तताको व्याग कर ॥ २६ ॥ हे एत्र तेरे मामाभी वियाकुर शीलये अर्ह, दोनों वंशमे शुद्ध होकर ९
द तू उनसे भी नहीं डरता ॥२७॥ इन अपने स्थानम स्थित बाह्मण कुमारोको तो देख ओौर इन विनयपरायण धरके शिष्योको तो देख ॥२८॥ हं ¢
त्र जब राजा इस तेरी कुचेष्ाको सुनेगा,तो तेरे पितासे भ्रद्धा हटाकर आजीविका नष्ट कर देगा ॥२९॥ अभीतो ठोग तेरी बाठचेष्टा कहं देते है, अनन्तर ठ
4 उनविङातिकोऽसि त्वमेषा षोडशवाषिकी ॥ एतां संबृण॒ सदृततां पितभक्तियुतो भव ॥२५॥ शव्ुरोऽपि दि ते मान्यस्सरवतर ठ
$ गुणशीरुतः ॥ ततो न पसे किन्नस्त्यज ुश्त्ततां सुत ॥२९॥ मात॒लास्तेऽतुलाः पुत्र वियाशी्छलादिभिः ॥ तभ्योऽपि न ¢
। बिभेषि स्वं शदधोऽस्छभयवंशतः ॥ २७ ॥ पश्येतान्प्रतिवेश्मस्थान्ब्राह्मणानां ङमारकान् ॥ गृहेऽपि शिष्यान्पश्येतान्पितुस्ते
र विनयोचितान् ॥२८॥ राजापि श्रोप्यति यदा तव दुष्टं सुत ॥ रद्धं विहाय ते ताति इृत्तिोपं करिष्यति ॥ २९ ॥
बालचेष्टितमेवेतदवदंत्यद्यापि ते जनाः ॥ अनंतरं हरिष्यति एकता दीक्षिततामिह ॥ ३० ॥ सवेप्याक्षारयिष्यंति तव तातं च ट
| मामपि ॥ मातुश्रिजं तनयो धत्ते दुमाषणेरिति ॥३१॥ पितापि ते न पापीयान्छरुतिस्पृतिपथाडगः ॥ तदधिलीनमनसो मम |£
| साक्षी महेश्वरः ॥३२॥ न वचतुल्ञातयापीह शुखं दुष्टस्य वीक्षितम्॥ अहो बलीयान्स विधियैन जातो भवानिति ॥ ३३ ॥ ठ
(|| भरतिक्षणं जनन्येति शिक्ष्यमाणोऽतिदुम॑तिः ॥ न तत्याज च तद्धमं दर्बोधो व्यसनी यतः ॥ ३७ ॥ टं
४ व. दीक्षितपना हरणकर ठंगे ॥३०॥ पीठे सबही तेरे पिताको ओर सु्ञेदुनाम धरगे, किं यह बारक माताके चरितरपर गया है ॥३१॥ कारण कि |£
|| तेरा पिता तो पापी नहीं है शुतिस्ृतिका अगामी है, भे भौ उनके चरणोमे मन रगानेवाली हू, इस वातके साक्षी महेश्वर हँ ॥३२॥ ऋुक्ञानकै ||
{ समय भने तो किसी दुषटका सुख भी नहीं देखा, अहो विधाताकी गति बडी बर्वान है, जिससे त्च सरीखा एत्र उत्पन्न ह ॥ ३३ ॥
इसप्रकार प्रतिक्षण माता उसको शिक्षा देती, पर उसने उस कथको न छोडा, कारण ह निबोध उसके वयसनम रत हो गया था॥ ३४ ॥ ६
मृगया, मय, चुगखी, असत्यभाषण, चोरी, पाशक्ीडा, वारां गना इनमे पडकर कोन खंडित नहीं हमा है ॥ ३ ५॥ वह दुर्मति जो जो
घरमे देते वह वह ठे जाकर व् पेटी आदि षब ज्वारियोंको दे आपे ॥ ३६ ॥ एकं समय उसने रत्नमयी अपने पिताके हाथकी अगरी
जो षरमे परी थी ठेकर ज्वारीको दे दी ॥ ३७ ॥ संयोग वंश दीक्षितने उसको ज्वारीके हाथमे देला ओर् उससे पूछा किं यह अगरी
तुमने कहि पाई ॥ ३८ ॥ जब उससे वारंवार पुच्छा तव॒ उसने कहा हे ब्राह्मण ! भेरेपर आक्षेप क्यों करते हो क्या भने चोरीसे यह
मृगयामबपेञयन्यानृतचौरयदुरोद्रेः ॥ स वारदारैव्यसनेरेभिः कोऽ न खंडितः ॥२५॥ यदयन्मध्यगृहे पश्ये्त्तन्नीत्वा सुदुर्मतिः
॥ अर्पयेदयूतकाराणां सङुप्यं वसनादिकम् ॥३६॥ न्यस्तां रत्नमयीं गेहे करस्य पितुह्यमकाम् ॥ चोरयित्वेकदादाय दुरो
द्रकरेऽपंयत् ॥ ३७ ॥ दीक्षितेन षरिज्ञातो दैवाददयतकृतः करे ॥ उवाच दीक्षितस्तं च कुतो रन्धा त्वयोमिंका ॥ ३८ ॥
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| £ पष्ठस्तेनाथ निर्बधादसकृत्तष्ठवाच सः ॥ आमाक्षिपसि विपरोजवैः किं मया चौर्यकमेणा ॥ ३९॥ न्धा अद्रा त्वदीयेन पु्ेणेव
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समर्पिता ॥ मम मातु पूरवेदयुजित्वा नीतो हि शाटकः॥ ४० ॥ न केवलं अमेवेतदंगुलीयं ससर्ितम् ॥ अन्येषां दूतकतृणां
भूरि तेनार्पितं वसु ॥ ७१ ॥ रत्नङ्कप्यहुकूलानि शरंगारपभृतीनि च ॥ भाजनानि विचित्राणि कस्यताप्रमयानि च ॥ ७२ ॥
नग्रीङृत्य प्रतिदिनं बध्यते चूतकारिभिः॥ न तेन सदशः कश्िदाक्षिको भरूमिभंडरे ॥ ७३॥ अद्यावधि त्वया विग्र दुरोद्र
शिरोमणिः ॥ कथ् नाज्ञायि तनयोऽविनयानयकोविदः ॥ 9७ ॥
३९ ॥ अगरी टी हे रुपया देकर तुम्हारे एसे मोड टी है अपनी पाताकी साडी एरवेदिन जीतकरकै गया था, ॥ ४० ॥ केवर उसने
सही यह अगरी नहीं दी है ओर ज्वारियोंको उसने बडा धन सभर्पण किया है ॥ ४१ ॥ रत्नोंकी पैरी, दुकूढ वज्ञ, श्षारी आदि विचित्र
कसी तावेक पात्र दिये है ॥ ४२॥ जवारी उत्को भतिदिन नंगा करके बांध छेते है, तब वह धन देता है, उर्तके समान तो अब पृथिवीमे
कोद यत्कारी नहीं है ॥ ४३ ॥ हे दीक्षितजी ! अबतक आपने दूतकारियोँभे शिरोमणि अविनय अनीतिमें पंडित अपने प्रको क्यो न
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उसकी महापतिब्ता चलो थी उससे ्रौतकरममे परायण दीक्षित यज्ञद कहने रगा ॥ ४६ ॥ यज्ञदत्त बोला हे दीक्षितायनि ! हे धूतं ।
| | ॥ ४४॥ यह सुनकर ठनज्नासे दीक्षितका शिर नीचा हौ गया ओर वचसे मुल ॒ठककर अपने घरमे आथा ॥ ४५ ॥
बह राणनिषि इत्र कहां हे, अच्छा इससे कया है कहीं हो वह भेरी अंगूठी कँ है ॥ ४७ ॥ जौ उवरना करते समय तैने भरे हाथसे ठेटी
¢ थी, वह रत्नमयी भेरी ओॐगूढी खाकर शीघ्र सज्चेदे॥ ४८ ॥ र वचन सुनतेही दीक्षितायिनी इर गह ओर बोली इस समय मध्याह
¢ इति श्रुत्वा अपामारविनघ्रतरकंधरः ॥ प्रावृत्य वाससा मौर प्राविशत्रिजमन्दिरम् ॥४५॥ महापतितव्रतामस्य पत्नीं प्रोवाच
तामथ ॥ स दीक्षितो यज्ञदत्तः श्रौतकर्म॑परायणः ॥ ७९ ॥ यज्ञदत्त उवाच ॥ दीक्षितायनि नास्ति धूतं शणनिधिस्स॒तः ॥
अथ तिष्ठतु किं तेन क्र सा मम श्ुभोमिका ॥ ४७ ॥ अंगेद्र्तनकारे या त्वया मेऽङ्गकितो हता ॥ सा त्वं रत्नमयी शीं
¢ तामानीय ग्रयच्छमे ।। ४८॥ इति त्वा तद्वाक्य भीता सा दीक्षितायनी ॥ प्रोवाच स्नानसध्याह्ीं क्रियां निष्पादथैत्यथ
९५|| ॥४९ ॥ व्यम्रारिम देवपूजा्थ्ुषहारादिकमेणि ॥ समयोऽयमतिक्रामेदतिथीनां प्रियातिथे॥५०॥ इदानीमेव पक्ात्रकारणव्य
¢| ग्रया मया ॥ स्थापिता भाजने कापि विस्मृतति न वेद्म्यहम् ॥५१॥ दीक्षित उवाच ॥ हं हेऽसतपु्रनननि नित्यं सत्यपभा
#5|| पिणि ॥ यदायदा त्वां संप तनयः क गतस्त्विति ॥५२॥ तदातदेति त्वं ्रयाह्यथेदानीं स नि्ग॑तः॥ अधीत्याध्ययनायथै च
९ दविधिेस्सयुम्बहिः ॥५३॥ कुतस्ते शाटकः पलि मांजिष्ठो यो सया्ितः॥ ठंभते योऽनिशं धाम्नि तथ्यं घरूहि भयं त्यज ॥५७॥
स्नानकी क्रियाम मेँ ॥ ४९ ॥ व्यप्र हू, हे देव ! इस समय पुजाकै निमित्त समधी एकच करती हं हे भ्रियातिथि | अतिथियोक आगमनका
|| यह समय बीता जाता है ॥ ५० ॥ यै इस समय पक्वान्न बनाने व्यथ हो रही ह, यै उसे किसी वतन रखकर भूकगहे हूं, अभीतक
¢ || से याद नहीं आह है ॥ ५१ ॥ दीश्चितने कहा ठीक अरे असत््रकी उत्पन्न करनेवाङी सत्य बोरनेवाटी जब जब तुज्से पूछा किं
|| पत्र कहां गया है ॥ ५२ ॥ तब तब तूने कहा किं बह अभी दौ तीन भिघोके साथ पठनेको बाहर गया है ॥ ५३ ॥ हे पति ! बह मजीद
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रंगकी साडी जो मने तन्चे दी थी सो कहां है, जो रोज यहां ठगी रहतीथीतू भयको , छोडकर सत्य कह ॥ ५४ ॥ दसं समय वह
मृणिजयिति कारी भौ दिल नकीं देती, ओौर रेशमकी जो त्रिषरी ( वद्ञविशेष ) धेने तके द थी ॥ ५५॥ हे दीक्षितायिनी । बह
दक्षिणदेशका कास्यपात्र गौडी ताम्रवटी कहां है? ओर हाथीदांतकी बनी हदं वह् पुखकोतुकमचिका [ शेदारपठगीरी । कहा है
॥ ५६ ॥ ओर वह पृ्वतदेशकी बनी हई चन्त्रकान्तमणिके समान शोभायमान दीपक हाथमे च्थि शगार वाटी ऽतख्य कहां है ॥ ५७ ॥
हे कुोलन्ने ! बहुत कहनेते क्या है ओर तेरे ऊप्र कोपकरना बृथा है, म अव॒ तबही भोजन करूंगा जव य॑ दतरा विवाहं कर दगा
सांप्रतं नेक्ष्यते सोऽपि भंगारो मणिमंडितः॥ प्सू्रमयी सापि तरिषटी या मयापिता॥५५॥क प तत्कस्य गौडीतात्र
घटी क सा ॥ नागृदंतमयीसा क सृखकौतुक मचिका ॥ «६ ॥ क सा पर्वतदेशीया चन्द्रकंतिरिवाद्भुता ॥ वीपकभ्यग्रहस्ता
म्ालंृता शालभधिका ॥ ५७ ॥ फ बहूक्तेन रजे तुभ्यं कुप्यास्यहं वृथा ॥ तदाभ्यवहारिष्येदुपर्यस्याम्यहं यदा ॥५८॥
अनपत्योऽस्मितेनाहं द्टेनकुख्दरषिणा ॥ उत्तिष्ठानय पाथस्त्वं तस्मे दबास्तिलांजयिम् ॥५९॥ अपुत्रत्वं वरं दृणां कुपुनात्ड
लपांसनात् ॥ त्यजेदेकं कलस्यां नीतिरेषा सनातनी ॥ ६० ॥ स्ञात्वा नित्यविधिङृत्वा तस्मि्नेवाहि कस्यचित् ॥ ओय
स्य सुतां प्राप्य पाणि जग्राह दीक्षितः ॥ &१ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां हदरसहितायां प्रथमखण्डे सृष्यपाख्याने
गुणनिधिचाशिवणंनोनाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥ ब्रह्मोवाच ॥ थत्वा तथा स वृत्तां प्राक्तनं स्वं विनि च ॥ कांचिदिशं
समालोक्य निर्ययौ दीक्षितांगजः ॥ १ ॥ |
॥ ५८ ॥ उस्न कुढको कठंक ठगानेवडे दुष्ठते तो मँ संतानरहितही अच्छा, जल्दी उढ पात्रा किं भ उसको तिलांजछि ई ॥ ५९ ॥
कुतर कठंकीप्रपेमलष्यका संतानहीन रहनाही अच्छा है । ङुख्कै ख्ि एकको त्याग देना श्रेष्ठ है यह सनातनी रीति है॥ ६० ॥
यह कह दीक्षितने स्नानकर निवयविधि करके उसी दिन किसी भोत्रिय कन्यासे अपना पाणिग्रहण करङिया ॥ ६१ ॥ इति श्रीशिव महाप
राणे द्वि° शद्रसंहिताभाषाटीकायां भथमसृष्िखंडे गणनिधिचरित्रवणनोनाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥ ब्रहलाजी बोरे यह वृत्तान्त सुनकर अपने
| धन है वही देशान्तरमं सुखपाता है, धन होनेसे चोरका भय होता है वह विघ्रभी सब ओरसे प्राप्त है ॥४॥ याजककै कुट जन्म लेकर
मुदञे यह वयुन क्यों ख्गा, अहो षारञ्ध बठ्वान है, होनहार क्मका यह फ है ॥५॥ बँ तो भिक्षामांगनाभी नहीं जानता, न भेरा कों पह
चानवाला है, न मेरे पास कुछ धन है फिर अव किंसके पास जाऊं ॥६॥ सये उदय होतेही सदा मेरी माता स॒ज्ञको भिषटन्न देदेती थी; अब
कियच्चिरं ततो गत्वा यज्ञदत्तात्मजस्स दि॥ दु्टो गणनिधिस्तस्थौ गतोत्सा दो विसजितः॥२॥ चितामवाप महतीं क यामि कर
वाणि किम् ॥ नाहमभ्यस्तविययोऽस्मि न चैवातिधनोऽस्म्यदहम् ॥३॥ देशांतरे यस्य धनं स सदयस्सुखमेधते ॥ भयमस्ति धने
चौरात्स विष्रस्सवतोभवः ॥४॥ याजकस्य कुले जन्म कथ मे व्यसनं महत्॥ अहो बलीयान्दि विधिभावि कर्माबुसं धयेत् ॥९५॥
भिक्षितुन्नाधिगच्छामि न मे परिचितिः कचित् ॥ न च पाश्वं धनं किञित्किम शरणं भवेत्॥६॥ सदानभ्युदिते भानौ परसुमें
मिष्ठभोजनम् ॥ दद्यादा कं याचे न चेह जननी मम् ॥७॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ इति चितयतस्तस्य बहुशस्तञच नारद् ॥ अतिं
दीन तरले भानुरस्ताचरं गतः॥८॥ एतस्मिन्नैव समये कथ्िन्माहैश्वरो नरः ॥ सहोपहारानादाय नगराददिरभ्यगात् ॥९॥
नानाविधान्महादिव्यान्स्वजनेः परिवारितः ॥ समभ्यचितुमीशानं शिवराघाबुपोषितः॥१०॥ शिवाख्यं षविश्याथ स भक्तश्थि
वसक्तधीः ।॥ यथोचितं सुचित्तन पूजयामास शंकरम् ॥ ११ ॥
किससे यचाना करं वह माता तो यहां नहीं है ॥ ७ ॥ ब्रह्माजी बो है नारदजी ! जव इसपभकार हं बहुत चिन्तातुर हभ ओर अति दीन
होगया तब वृक्षके नीचेही खयभगवान् अस्ताचको प्राप होगये ॥ < ॥ इसी समय को शकरा पूजन करनेवाडा पूजनकी सामभरी छियि
नगरमे बाहर आया ॥ ९ ॥ वह अनेकप्रकारके दिष्य व्च धारण किये स्वजनोकै सेग शिवरात्रिकै व्रतम शवक पजनको आया ॥ १० ॥
शिवाख्यमे प्रवेश करकै उस बुद्धिमान् शिवके भक्तने प्रमभक्तसे शिवजीकी पूजा की ॥ ११ ॥
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भाग्यकी निन्दा करता हभ वह दीक्षतका एत्र किरी ओरको चल दिया ॥ १ ॥ वह यज्ञदत्तका इत्र कुछ दूर जाकर उत्साहरहित होकर् एक ६
स्थानपर स्थित हुआ ॥२॥ ओर बडी चिन्ताको पराप्त होकर बोला करहांजाऊं, क्याकरं न ने वियापठी है ओर न भँ धनी हूं ॥३॥ जिसके
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_ पालकी गंष देवकर यज्ञदत्तके धरे पिता माताके त्यागसे वयाकृढ हो भूलसे उत्का पीछा किया॥१२॥किजौ क ६
अभ्र चाढाया ह भ उत्त सबको ठटटरगा, यह॒रिवके भक्त जमी सोजायैगे तवी सब ठेटुगा ॥ १२ ॥ एसी आशां बह शिवजीकं मदक ||
॥५६॥ || || न = गा, ¦ नृः ८ १ सोगये, तब उसने
ठ दवारे बेठ रहा, उस भक्तकी की हुईं महापूजाको देखने ठ्गा ॥ १४ ॥ जव चत्व गीतादि करक क्षणमात्रका भक्तजन प्षागयै, तव् उक्त ||
¢ नैवेय ठेनेको मंदिरमे प्रवेश किया ॥ १५ ॥ दीपकको मन्द् देखकर पकान्न देखनेकै टये उसने अपने व्रसे बन्तीवना कर दीपकृको भका £
पकातरगंघमान्राय यजञदत्तात्मजोद्विजः ॥ पितत्यत्तो भातृहीनः क्षुधितः स तमन्वगात ॥ १२॥ इदमत्र मया गर्म शिवायो ||
¢ पकरतं निशि ॥ सुप्ते शवजने दैवात्सर्वस्मिन्विविधं महत् ॥ १३ ॥ इत्याशामवलम्न्याथ द्वारिशंभोहूपाविशत् ॥ ददश च ¢
|
महापूजां तेन भक्तेन निर्मिताम् ॥१४॥ विधाय नृत्यगीतादि भक्तास्मुपाः क्षणे यदा ॥ नैवेयं स तदादातु भ्गांगारं विवेश ह
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|
| ॥ १६॥ दीपं मेद दक्वा पक्ात्रवीक्षणाय सः ॥ निजचैलांजाद्रतिं कृत्वा दीपं भकाश्य च ।॥१६॥ यज्ञदत्तात्मजस्सोऽथ £
¢ शिवनैवेयमाद्रात् ॥ जपराह सहसा भीत्या पक्वान्न बडुशस्ततः ॥ १७ ॥ ततः पकान्नमादाय त्वरितं गच्छतो बहिः ॥ तस्य ||
पादतलाघातात्परषप्तः कोप्यद्ुध्यत ॥ १८ ॥ कोऽयं कोऽयं त्वरापन्नो द्यां ग्द्यताम सौ ॥ इति चुकोश स जनो गिरा भय ४
६ महोज्चया ॥ १९ ॥ यावद्भयात्समागत्य तावत्स पुररक्षकैः ॥ पलायमानो भिहतः क्षणाद॑धत्वमागतः ॥ २० ॥. अभक्षयच्च |£
नेवेयं यज्ञदत्तात्मजो शरन ॥ शिवाबुमहतो त्रूनं माविषुण्यबलात्न सः ॥ २१ ॥ ४
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रुण्स.२ है| शित किया ॥ १६ ॥ तव यद्ञदत्तके पतरने आदरसे शिवकै नेवेयको प्रभते पक्ताशचके सहित ध्रहण किया ॥ १७ ॥ जही पृक्ान्न ठेकर
अ° १८|| पह शीघताते बाहर चखा उसके अरण भहारके आवातते कदं इरूष उस्मय जाग उदा ॥ १८ ॥ यह कौन है कौन है पकडो
|> || पकडो । रसा वह भयकी वाणीस चघ्ठाने ठगा ॥ १९ ॥ जबतक वह भये भागा तवतक परकै रक्चकोँने उसे भारा ओर
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|| बह क्षणम अधा होगया ॥ २० ॥ हे सने | उस यज्ञदत्तक पवने नेवेय भक्षण नहीं किया था यह मावी एण्यका बल था ओर कवठ शिव्रका
|
था ॥२१॥ इतनेहीमे पाश स्र हाथमे च्यि सेयमनीषरीके यमदूत विकटभट उसे ठेनेको आये ॥२२॥ इतनेहीभे किंकणीजार्पे भाठत ||ह
दिव्य बिमान छ्यि शूरधारी शिवजीकै पार्षद भी आनकर प्राप्त हुए ॥२३॥ शिवगण बो हे यमराजकै गणोँ ! इस परम धमत्माको छोड
दो, यह बाह्मण दंडके योग्य नही है, इसके सब पाप नष्ट होगये है ॥२४॥ यह उनके वचन सुन य॒मराजकै गण बहुत चकित होक्र महादेवके ।
गणे बोरे ॥ २५॥ शिबजीके गणको देखकर भयभीत हए यके गरणोने यह कहा किं) हे गणो ! यह ब्ाहण तो बडा दूत है ॥ २६ स
यमगण बोठे इसने कुढाचारको त्यागन कर दिया, पिता माताके वचन न मामे, सत्य शौच ओर संध्या ल्ञानसे भी यह षट है ॥ २७ ग मला ||
अथ बद्धस्मागत्य पाशमुदररपाणिभिः ॥ निनीषठभिः संयमनीं याम्येस्स विकटैभटेः ॥२२॥ तावत्पारिषदाः पराप्ताः किंकिं ६
णीजालमाछिनः ॥ दिन्य विमानमादाय तं नेतुं शूलपाणयः ॥२३॥ शिवगणा उचुः ॥ ॥ भचतेनं द्विजं याम्या गणाः परम् ठ
धामिकम् ॥ दण्डयोग्यो न विप्रोऽसौ दग्धसर्वाघसंचयः ॥२४॥ इत्याकरण्यवचस्ते रि यमराजगणास्ततः ॥ मंहादेवगणानाहृबं |©
भूबुश्चकिता भृशम् ॥ २५ ॥ शंभोगणानथारोक्य भीतसतर्यमर्किकरेः ॥ अवादि प्रणतेरित्थं इररत्तोऽयं गणा दविजः ॥२६॥ ||
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यमगणा ऊचुः ~ ॥ कुलाचारं प्रतीस्यँष पि्रोवांक्यपराद्सुखः ॥ सत्यशौचपरिभ्रष्टस्संध्यास्नानविवनितः ॥ २७ ॥ अस्तां
दरेस्य कर्मान्यच्छिवनि्मास्यरंघकः ॥ भत्यक्षतोऽज वीक्षध्वमस्पृश्योऽयं भवादृशाम् ॥२८॥ शिवनिभस्यिभोक्तारश्शिवनिम्मा
र्यलंघुकाः ॥ शिव॒निमाल्यदातारःस्पशंस्तेषां हय पुण्यकृत्॥२९॥विषमाखोक्य वा पेय अरयो वा स्पर्शनं परम्॥ सेवितव्यं शिवस्वं
न प्राणेः कण्ठगतैरपि ॥३०॥ यूयं प्रमाणं धर्मेषु यथा न च तथा वयम् ॥ अस्ति चेद्ध्रेशोस्य गणास्तं णुसो वयम्॥३१॥
ओर कभभ तो अग रहे इसने. शिवनिमौल्यको उदंषन किया है, यह आप भर्यक्षसे देखो बल्कि यह आप सरीसोको स्पशकेयोग्यभी नहीं है
॥२८॥ शिवनिमील्यके खानेवाठे, शिवनिमील्यके उदन करनेवाठे, शिवनिमल्यकै देनेवारे इनका स्पशं अपुण्यका करनेवाा है ॥ २९ ॥
विषको देखकर पीना चाहिये व उस्षका स्पशं करना चाहिये, कण्डमे प्राण आजानेपर शिवकाधन स्वयं सेवन न करे ॥३०॥ धर्थमे जेसे आप प्रमाण
है वैसे हम नहीं है, यदि इसमे कुछ धर्मका ठेश हो तो हे गणो ! हय भी श्चुना चाहते रै ॥ ३१ ॥
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व +
४६|| शिवजीके गण इस्त भकार यमदूतोके बचन भवणकर शिवजीके चरणकमोकौ स्मरणकर ऽनते बोठे ॥ २२॥ शिवजी गण बोढे हे यमकं
करो ¡ जो सुक्ष्म शिवध है जिनको च्म इषटिवाटे जानस्कते है उनको स्थूढक्षयवाठे तुम कैते जान्कते हो ॥३३॥. हे गणो ! इस पापरहित
यज्ञदत्ते एत्रने जो कर्मं किया है उत्ते सावधान होकर सुनो ॥३४॥ गक शिरपर गिरती हुई दीपककी छायाको इसने निवारण किया, ओर
रातिम इसने अपना वच्च फ़ाडकर उसमे बत्ती डाली ॥ ३५॥ हे किंकरो ! ओर भी इसने धर्मं किया है जो प्रसंगसे दृस्रे ठोगोकिं छ्य शिवना
इत्थं तद्वाक्यमाकण्यं यामानां शिवर्किकराः ॥ स्मृत्वा शि्वपदाम्भोजं प्रोचुः पारिषदास्तु तान् ॥३२॥ शिवकिंकरा उचुः ॥
॥ करिकराश््थिवधर्मा ये सृक्ष्मास्ते त॒ भवादशैः ॥ स्थूरक्ष्यैः कथ रक्ष्या ल्या ये सृक्ष्मदशटिमिः ॥ ३३ ॥ अनेनानेनसा
कुम यत्कृतं शृणतेद तत् ॥ यज्ञदत्तात्मजेनाथ सावधानतया गणाः ॥ ३९ ॥ पतंती खिगशिरसि दीपच्छाया निवारिता ॥
स्वचैरांचलतोऽनेन दत्त्वा दीपदशां निशि ॥३५॥ अपरोपि परो धर्मो जातस्तस्य किंकरः ॥ शृण्वतः शिवनामानिप्रसंगा
द्पि शृहताम्॥३६॥ भक्तेन विधिना प्रजा क्रियमाणा निरीक्षिता ॥ उपोषितेन भूतायामनेनास्थितचेतसा॥३७॥शिवलोकमयं द्य
द्य गंतास्माभिस्सहेव त॒ ॥ कंचित्कालं महाभोगान्करिष्यति शिवावुगः॥ ३८॥कङ्िगराजों भविता ततो निधूतकरमषः॥एष द्विज
वरो नूनं शिवप्रियतरो यतः॥३९॥ अन्यत्किचिन्न वक्तव्यं यं यात यथागतम् ॥ यमदूतास्स्वलोकं तु सुप्रसत्रेन चेतसा ॥४०॥
मोको भी इसने रुना ६ै॥ ३६ ॥ ओसोसे विधिपूर्वकं की हुई पजा इसने देखी, ओौर स्थिर चित्तसे निराहार बढा रहा ॥ ३७ ॥ इससे पह
हमारे साथ अब शिवटोकंको जायगा, ओर शिका अयुगामी हो कुछ सभयतक महाभोगोको भोगेगा ॥ ३८ ॥ फिर पाप्रहित हो यह कठि
। राजा होगा, यह बाह्णभरेष्ठ अवश्य ही शिवको प्यारा है ॥ ३९ ॥ ओर कुछ मत कहो तुम जहाने आये हो वहांको च्छे जाओ,
तब यमके दत् प्रसन्न चित्तसे अपने रोकको चे गये ॥ ४०॥
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| | बोरे हे नारदजी 1 जब यह वचन पुन बे यमराजके दूत पराङ्खल हौकर अपने लोकंको चरे गये ॥४१॥ हे सने ! ओर यमराजको
| सब चरित्र निवेदन किया, तथा शिवके दू्तोका भी आदि सत्र वृतान्त कहा ॥ ४२ ॥ तव धर्मराज बोढ़े हे गणोँ ! सावधान होकर
<| मरे कचन सुनो, ओर प्रस्न् हो प्रीतिसे सब मेरा शासन मानो ॥ ४३ ॥ ह गणो ! संसारं जितने तरिषडधारी है, जितने सफेद विभूति ठगाये
¢ हुए है, उन सबको तुम छोड देना, हमारे पास कभी मत छाना ॥४४॥ हे गणो ¡ जो श्वेत विभूति अपने अगमं गाये हए है, उन सबको
॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ इत्याकण्यं वचस्तेषां यमदूता शनीश्वर ॥ यथागतं यगुस्सवं यमरोकं पराङ्सुखाः॥७१॥ सर निवेदयामा
सुश्शमनाय गणा घ॒ने ॥ तदरत्तमादितः प्रोक्तं शंधुदरतैश्च धम॑तः ॥ ४२ ॥ ॥ धमराज उवाच ॥ ॥ सर्वेश्रणत मद्वाक्यं
सावधानतया गणाः॥ तदेव ्रीत्या इर्त मच्छासनपुरस्सरम्॥४३॥ ये भिपुण्ड्धरा कोके विभूत्या सितया गणाः॥ते सर्वे षरि
इत्या नानेतव्याः कदाचन ।॥४४॥उद्धूलनकरा ये हि विभूत्या सितया गणाः ॥ ते सवे परिहतंग्या नानेत्याः फदाचन।।५५॥
शिववेषतया कोके येन केनापिदेतुना॥ ते सवे परिहतैव्या नानेतव्याः कदाचन ॥४६॥ ये शदाक्षधरा रोके जटाधारिण एवं ये॥
ते सवे परिहर्तव्या नानेतम्याः कदाचन ॥४७॥ उपजीवनहेतोश्च शिववेषधरा हिं ये ॥ तेसं परिहतंव्या नेतव्याः कदाचन ॥
॥४८॥ द॑मेनापि च्छलेनापिं शिववेषधरा हि ये ॥ ते स्वँ परिहतैव्या नानेतव्याः कदाचन ॥७९॥ एवमाज्ञापयामास स यमो
¢ निज किंकरान् ॥ तथेति मत्वा ते सवं तूष्णीमासच्छुचिस्मिताः ॥ ५० ॥
|| छोढ देना हमरे पास न छाना ॥ ४५ ॥ जो किसी भकार भी कोके शिषवेषधारी ई, पह सबही त्यागने, हमारे प्राक्च उनको कभी नं छाना
॥ १६ ॥ जो टोकमे जटाधारी है जो छोकमे रुदराक्षधारी है, वह सव छोढने, उनको भरे पाच न छाना ॥ ४७ ॥ जो जीविकाके निमित्त
|| शिवेषके धारण करनेवारे है उनको भी छोड देना भे पास न छाना ॥ ४<॥ जो दंभ ओर छठे शिववेषके धारण करनेवाे ३, बह
सब छोड देना मेरे पास न ठाना ॥ ४९ ॥ इसप्रकार यमने अपने किंकरोको आज्ञा दी, बहुत अच्छा रेस्ा कह वे हते हृए चुप होगये ॥ ५० ॥
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शि०पु० ब्रह्माजी बोरे यभराजके इतोपि छडाया जाकर वह बाहण शिवके दूतोद्ारा पवित्रमन होकर कैटास्को गया ॥५१॥ वहां अनक भोग भोगकर
॥५८॥ || || शिवाशिवका सेवन कर क्टिगक राजा अरिंदमका पतर हुभ ॥५२॥ इसका नाम दम ओर यह शिवकी तेवा प्रायण हआ, वाक अभर
बाखकोके साथ शिवकी भक्तिकरने ठगा॥५३॥ कमस पिताक उपराय होनेपर युवावस्थामं राज्य पाय उस्न प्रीतिभे बहूतसे शिवधमाको भवृच्च किया
॥५४॥ वह दमनक अयोग्य राजा दम ओर धको नही जानता था, सव शिवाखयोप दीपदानक तिवाय मोर नही जानता ा ॥५५॥ हव अपन
॥ ब्रह्मोवाच ॥ पार्दैमदूतेभ्यो मोचितस्त्विति स द्विजः ॥ शिवलोकं जगामा तैर्गणेश्ुचिमानसः ॥५१॥ तञ धु्ताखि
लान्भोगान्संसेव्य च शिवाशिवौ ॥ अरिंदमस्य तनयः कङिगाधिपतेरभूत् ।५२॥ द्म इत्यभिधानोऽभूच्छिवसवापरायणः ॥
बालोऽपि शिद्यभिः साकं शिवभक्तिं चकार सः ॥५२॥ कमाद्राज्यमवापाय् पितय्यषरते युवा ॥ भीत्या प्रवतंयामास शिवधं
माचि सर्वशः ॥५8॥ नान्यं धर्म स जानाति दुद॑मो भूषतिदेमः ॥ शिवाल्येषु सवेषु दीपदानाहते द्विजः ॥ ५५ ॥ भामाधी
शान्समाहूय सरवांन्स विषयस्थितान् ॥ इत्थमाज्ञापयामास दीपा देयाश्शिवाल्ये ॥५६॥ अन्यथा सत्यमेवेदं स मे दण्डयो
भविष्यति ॥ दीप दानाच्छिवस्तुष्टो भवतीति अतीरितम् ॥ «७ ॥ यस्ययस्याभितो भ्रामर याव॑तश्च शिवाख्याः ॥ ततत्र
सदा दीपो योतनीयोऽविचारितम् ॥५८॥ ममाज्ञाभंगदोबेण शिरछेस्स्याम्यसंशयम् ॥ इति तद्धयतो दीपा दीप्ताः प्रतिशिवा
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लयम् ॥ ५९ ॥ अनेनैव स धमैणयावनीवं दमो कृषः ॥ धमं महती प्राप्य करधसवशं गतः ॥६०॥
राज्यके प्रामाधीशोंो बुराकर् यही आज्ञा दी किं भरति शिवाख्योँम दीपदान दौ ॥ ५६॥ रत्न करनेवाछेको भ देड दगा वैदमे |
है दीपदानसे शिवजी संतुष्ट होति है।५७॥ जिस जिस भाममे जितने २ शिषाख्य है वहां विना विचारे सदा दीपदान करने चाहिये ॥५८॥ जो मेरी ९
आज्ञाका भग करेगा उस्षका शिर छेदन करगा, तब इस भयसे स्रव शिवाख्योमे दीपावलि होने लगी ॥५९॥ इस धर्मम राजा दम अपनी तारी |
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रु°सृ.२
अ० १८
उ 9९ यय २ २-4^9२॥
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अवस्था विताकर बडे मको प्रप्त होकर काटधर्थके वशीभूत हुम ॥६ ०॥ वह दीपोकी वासनाकै योगसे बहुतसे दीपोंको भज्यत करक रत्नोकै दीपके
¢ शिखामं आश्रय करनेवाठा काका पति हुआ ॥६१॥ इसप्रकार थोढीभी सेवा सस्य पर बहुत फठती है, रेषा जानकर सुखाथियोको शिवका भजन |
¢ चाहिये ॥ ६२ ॥ सब धमति रहित कहां तो बह दीक्षितका एव! देवयोगसे शिवाख्यमें धनचुराने चरा, अपने स्वार्थके निमित्त बत्ती बाटकर्
रिगके मस्तकका भंधकार दूर किया ॥ ६३ ॥ इतनेहीसे करटिगदेशका राज्यपाणा, पहिरी वासनाके उद्यसे शिवाख्यभं बहूृतसे दीपक बाटकर
¢ स दीपवाक्षनायोगाद्रहून्दीषान्प्रदीप्य वे ॥ अलकायाः पतिरभूद्रत्नदीपशिखाश्रयः ॥६१॥ एवं फति कारेन शिवेऽल्पमपि
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यत्छृतस्॥ इति ज्ञात्वा शिवे काय भजने सुसुखार्थिभिः॥६२॥ क स दीक्षितदायादः सर्वधर्मारतिः सदा ॥ शिवाल्ये दैवयोगा
आतश्चोरयितुं वसु ॥ स्वार्थदीपदशोद्योतछिगमौलितमोदरः ॥६३॥ कटिगविषये राज्यं प्राप्तो ध्मरतिंसदा ॥ शिवाख्ये सघ
दीप्य दीपान्पराग्वासनोदयात्॥६७॥ कैषा दिक्पारुपदवी खुनीश्वर विखोकय ॥ मयष्यधामिंणानेन सांप्रतं येह भुज्यते॥&॥
ईति परोक्तं यणनिषेयंज्ञदत्तात्मजस्य हि ॥ चरितं शिवसंतोषं शृण्वतां सवंकामदम्॥६६॥ सर्वदेवशिवेनासौ सखित्वं च यथेयि
वान् ॥ तदप्येकमना भूत्वा शृणु तात ब्रवीमि ते॥&७॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट
पाख्यान कैराशगमनोपाख्याने गणनिधिसद्तिवर्णनो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ बरह्नोवाच ॥ पाद्ये कल्पेमस पुरा बरह्मणो
मानखात्स॒तात् ॥ .पुलस्त्याद्धिश्रवा जज्ञे तस्य वैश्रवणस्सुतः ॥ १॥
| ॥६४॥ हे खनी श्वर ! यह तो देखिये कि दिक्पाठपदवीको पाया भयुष्य धर्मवाेने इससमय् अरकाष्रीका भोगभोगा ॥६५॥ हमने यज्ञदत्तके षन युणनि
धिका चरित्र तुमसेकहा है।यह शिवजीका चरित संतोष करके घुननेवाखोको शब कामना देता है॥६६॥ जेते यह सब देवताओंके शिरमौर शिवके सखापनेको
भात हए बह आप एकांत मनसे घनो हे तात। भ तुमसे कहता हूं ॥ ६७ ॥ इति श्रीशिवमहाषराणे ह° शुदरसहिताभाषारोकायां भथमसृष्टिसंडे शणं
निपिुद्रतिवणेनो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ हाजी वोठे -प्हठे प्ाकल्पे भेरे भानस व षरस्त्यजीसे विथवाका जन्म हुआ उनका उक
। ५
~~ न्नः
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०पु° || वैभवण हआ ॥।१॥ उन्होने रिश्वकर्माकी निर्माण की हुई इस अल्काषुरीको भोगा ओौर हा तपस्यासे शकरको संतुष्ट किया ॥ २॥ जव् बह कल्प
# || बीतकर र कल्प आरंभ हुमा ओर यजञद्के ऽव श्रीमानने बडा तप किया ।॥३॥ दीपदान माके रिवजीकी उत भक्तिके रभाव व ट
। ४ चित्ती भकाश करनेवाली शिवकर काशीमे भाष होकर॥।४।।चित्त रत्के दीपक ग्यारह रकि समीप बाङकर अनन्य मक्तिसे तन्मय हौकर ज्ञ = ट
¢ निश्च हो ॥ ५ शिवकाही एक महापात तपकी अभिसे वृदधिको भराप्त काम कोषरूपी महावि्नोके पतंग अधातसे वजत ॥ ६ । । भाणायाम करन ||
त तेनेयमल्का शक्ता एरी विश्वकृता कृता ॥ आराध्य अयंबकं देवमत्यु्तपसा पुरा ॥२॥ ग्यतीते तञ कल्पे वै रवृत मेषवाहन॥ ९
¢ याज्ञदत्तिसौ श्रीदस्तपस्तेपे सुदस्सहम् ॥२॥ भक्तिभावं विज्ञाय शंभोस्तदीपमातः ॥ रा षरर्संमाप्य काशिका चितम ||
काशिकाम्॥४॥ शिवैकादशबुद्धोध्य चित्तरत्नपदीषकेः ॥ उवास 1 ॥५॥ शिवेकयं सुमहा र
|| पात तपोभरिपखिदितम् ॥ कामक्रोधमहाविघ्नपतंगाघातवजितभ् ॥६॥ भाणसंरोषनिरवातं निरं नि्मलक्षणात् ॥ संस्थाप्य £
शभिवंरिगं सद्धावङुुमा्ितम्॥७॥ तावत्तताप स तपस्त्वगस्थिपरिशेषितय्॥ यावद्रशूव तदरष्मं व्षाणामयुतं शतम् ॥८॥ ४
|| ततस्सह विशालाक्ष्या देवो विश्वेश्वरस्स्वयम्॥ अरुकापतिमारोक्य परसत्रेनांतरात्मना ॥९॥ छिगे मनस्समाधाय स्थितं स्था
णस्वह्पिणम्॥ उवाच वरदोऽस्मीति तदाचक्ष्वारकाषते ॥१०॥ उन्मीर्य नयने यावत्स पश्यति तपोधनः ॥ तावदु्यत्सदसां ए
. ॥६| श्सदल्ाधिकतेजसम् ॥ ११ ॥ पुरो ददश श्रीकंठं चन्दरच्ड्ुमाधवम् ॥ तत्तजःपरिभरताक्षितेजाः संमीरय रोचने ॥१२॥ ए
रु.स.२ | ४ वातरहित निभे दिते निर्मरु शिवजीकै रिगकी स्थापना कर सुद्धावकै एकमे पजाकर।।७।।तबतकं बह तपस्या करता रहा जबतककि अस्थिमा्र
ट
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अ० १९
।
शेष रहगयी ओर इस अवसतरभे दशसहश्चसौ व्षव्यतीत होगये।।८॥ तव विश्वेश्वर देव विशालाक्षि उाकै सहित भसन्न मनते अङकापतिको देखकर ॥ ९॥
कि जो अलकापति स्थाणहपते स्थित शिवरिगमे षन गा रहेथे, ठेस देखकर बोरे हे अरकापते ¡ जो इच्छा हो षो वर मांगो ॥ १ ° ॥ जवतकं
बह तपोधन नेत्र खोकर देखते है किं तबतक सहल्ञसूय॑से भी अधिक तेजसम्पन्न ॥ ११ ॥ चन्द्रचूड उमापति शंकरको आगे देखा, उत्त तेजसे
| होकर इनके नेत्र भिचगये ॥ १२. ॥ ओर मनोरथक देनेवाठे देवदेवे कहा हे नाथ ! अपने चरणकमठकै दशनकी सामथ्ये भरे नेको
दीजिये॥१३॥ हे नाथ।यही वर है कि आपका साक्षात् दशन हो भौर हे शशिशेलर। दूरे वरे कया है आपको नमस्कारहै ॥१४॥ देवदेव उमापति ट
इसभकार उसके बचन सुनकर पणित ठते स्पशकर उसको दशनकी सामथ्यं देते भये ॥ १५ ॥ उन्होने नेत्र फटाकर पहडे उमाकाही दशन / ठ
तव यह यज्ञदत्तका एत्र उस सामथ्यैको प्राप्त करके ॥१६॥ विचारने रगे शिवजीकै समीपम यह सर्वोगसुन्दरी कोन है इसने कया तप किया है क्य,
उवाच देवदेवेशं मनोरथपदातिगम् ॥ निजांभिदशने नाथ क्साम्य प्रयच्छ मे ॥१३॥ अयमेव वरो नाथ यतं साक्षाप्निरी ठ
ह्यसे ॥ किमन्येन वरेणेश नमस्ते शशिशेखर ॥ १९ ॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा देवदेव उमापतिः ॥ ददौ दशनसामर्यं स्पृष्टा ६
पाणितलेन तमू ॥ १५॥ प्रसारय नयने पूर्वुमामेव भ्यलोकयत्॥ ततोऽसौ याज्ञदत्तिस्त॒ तत्सामभ्यैमवाप्य च ॥ १६ ॥ शंभो
स्समीपे का योषिदेषा सर्वागघुन्दरी ॥ अनया किं तपस्त ममापि तपसोऽधिकम् ॥ १७ ॥ अहो हूषमहो म्म सौभाग्यं ||&
श्रीरहो भृशम् ॥ इत्यवादीदसौ पुतो शुहर्हुरतीव हि ॥१८॥ कूरहम्वीक्षते यावत्पुनःपुनरिदं वदन् ॥ तावत्पस्फोर तत्रेव म॑ |
वामाविलोकनात् ॥ १९ ॥ अथ देव्यत्रवीदेवं किमसौ द्टतापसः॥ असक्ृद्रीकष्य मां वक्ति कुङ् त्वं मे तप्ःभास् ॥ २० ॥
असकृदक्षिणेनाक्ष्णा पुन्मामिव पश्यति ॥ असूयमानो मे हपप्रेम सौभाग्यसंपद् ॥२१॥ इति देवीगिरं अत्वा प्रहस्य भाद
ताँ प्रभुः ॥ उमे त्वदीयः पुबोऽयै न च कृरेण चक्चुषा ॥ २२ ॥
इसका तप स्ते विशेष है ॥१७॥ अहो इनका ₹प प्रम सोभाग्य ख्ष्मी आधर्ष है इसभकार यज्ञदचके एने वारंवार यह बात कही ॥ १८ ॥
ओर बारंबार यहीकहूे हए करूर दष्टे उमाको देखने ठगे, तबतक कुटिरुतासे देखनेक कारण इनका बायानेष फूट गया ॥१९॥ तव देवीने शंकरे कहा
यह दुष्ट तपस्वी कौन है वारंवार मुञ्चे देखकर कहता है अ।प मेरे तप प्रभावो किये ॥२०॥ वारंवार दक्षिणनेत्रे फिर सज्ञे देखता है मेम सौभाग्य
परत भरे पकी जदयाकरता ह ॥२१॥ यह देवी षचन नकर शिनौ उनते नोढेहेउमा । ह महारा वहै रदत मको नही ॥२२॥
=== लो. ॥ ६
खता तुम अधिक है, रेते देवीसे कहकर किर शंकरने यज्ञदत्तकै त्रत कहा ॥ २३ ॥ € वत्त
९ 4 ¢ पुम्हारे 1 ध ! "4. 0 अभिपति ओर यद्योके ईश्वर होगे ॥२४॥ यक्ष ओर किंन्नरोकै राजा-
ट ओके राजा होगे षण्यजनोंके पति ओर सवके धन देनेवाठे होगे ॥२५॥ मँ ठुमसे नित्य मित्रता करक सदा तुम्हारे समीप निवास कषगा हं
ट| भिव! दम्हारो भीपिके बढानेके निमित्त अककाके समीप रहूंगा ॥२६॥ हे यज्ञदत्ते एत्र ! आ यह उमा तेरी माता है हे महाभक्त ! तू इस
& || वरणोमिं प्णामकर ओर भ्सन्न चिकतसे दंडवतकर ॥ २७ ॥ बरह्ाजी बोरे इस प्रकार शिवजी उसको वर दे फिर उमासे बोटे हे देवेशि ! इस
|| संपश्यति तपोलक्ष्मीं तव कि त्वधिवर्णयेत् ॥ इति देवीं समाभाष्य तमीशः पुनरजवीत्॥२३॥ वरान्ददामि ते वत्स तपसानेन
|| तोषितः ॥ निधीनामथ नाथस्त्वं गद्यानां भवेश्वरः ॥२४॥ यक्षाणां किन्नराणां च राज्ञा राज च खनतः॥ पतिः पुण्यजनानाच
|| सवेषां धनदो भव ॥२५॥ मया सख्यं च ते नित्य वत्स्यामि च त्वातिके ॥ अलकां निकषा मि तव भ्रीतिविददये॥२६॥
आगच्छ पादयोरस्याः पत ते जननी त्वियम् ॥ यज्ञदत्ते महाभक्त स॒प्रसतनेन चेतसा॥२७॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति दत्वा वरान्देवः
द| पृनराद शिवां शिवः॥ परसादं कुर् देवेशि तपस्विन्यंगजेऽ वै ॥ २८ ॥ इत्य करण्यं वचश्शंभोः पावती जगदम्बिका ॥
अत्रवीयाज्ञदत्ति तं सुप्रसन्नेन चेतसा ॥ २९ ॥ देव्युवाच ॥ वत्स ते निमंलां भक्तिभवे भवतु सर्वदा ॥ भवेकर्पिगो नेतरेण
¢ वामेन स्फुटितेन ह ॥३०॥ देवेन दत्ता ये तुभ्यं वशस्संत तथेव ते ॥ इबेरो भव नाम्ना त्वं मम ह्पेर्ष्यया सुत ॥ ३१ ॥
इति दत्त्वा वरान्देवो देव्या सह महेश्वरः ॥ धनदायाविवेशाथ धाम वैश्वेश्वराभिधम् ॥ ३२ ॥ _
त अपने अंगज धतरपर भरसन्न हो ॥२८॥ शिवृजीके यह वचन हुन जगदम्बा पावती भसनन चिततसे यज्ञदत्तके एते बोरी ॥ २९.॥ देवी बोली
ह|| हे वत्स ! सदा शंकरम तुम्हारी निम भक्ति हो तुम एक नेतरे रहित होगे तुम्हारा बाभनेत्र न होगा ॥ ३० ॥ आओौर जो वर देवदेवने तुमको
|| दिये ई ठीक तती भकार रदैगे हे एत्र भेरा हप देखकर जो तुमने इषौ की है इते तुम्हारा नाम कुबेर होगा ॥३१॥ इस प्रकार देवीके सहित
र| महेश्वर वर देकर वेश्वेश्वर नामकं स्थानम कुबेरफो भ्रवेशित करादिया ॥ ३२ ॥ |-#
रु.स.२
अ० १९
> +> ९ +> 49 ९९ > 4 > 4 > 4 > > 4 3-3९-0 >.
|
| कुवेरने शेकरका सखित्व पर्वकाख्मे इतधकार पाया था अलकाके निकट्ही शंकरका त्थान केलास हुआ ॥ ३३ ॥ इति | ४
पराणे द्वि° रुद्रसेहिताभाषाटीकायां भरथमसृष्िखंडे कुषेरस्य शिवमित्रत्ववणनं नामेोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ बरह्ाजी बोट हे नारदजी
¢ तुम पवेतशरेष्ठ केछासमे कुबेरके तपोबरते शिवका आगमन सुनो ॥ १ ॥ कुवेरको वर देकर ौर अपने गरष्स्थानमे जाकर वह कुबेरे वर ह
४ देनेवाठे विश्वेश हदयमें विचार करने गे ॥ २ ॥ विधाताके अंगसे प्रगट हुआ, मेरा स्वरूप पूणे भरख्यकायं करता है उस खवहूपसे यद्यकके ‰
इत्थं सखित्व श्रीशंभोःप्रपेष धनदः पुरम्॥ अलकात्निकषा चासीत्कैलासश्शंकराख्यः॥२२॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ||
4
४ रुदरसंदितायांमृथमखण्डे कैलासगमनोपाख्याने कुबेरस्य शिवमितरत्ववर्णनो नामेकोनविंशोऽध्यायः ॥१९॥ ब्रह्मोवाच ॥ नारद्
४ त्वं शृणु घुने शिवागमनसत्तमम् ॥ कैलासे पर्वतश्रेष्ठ कुबेरस्य तपोबखात् ॥ १॥निधिपत्ववरं दत्त्वा गत्वा स्वस्थानसुत्तमम् ॥ ¢
विचिन्त्य इदि विन्वेशः कुषेरवरदायकः ॥२॥ विष्यगजस्स्वरूपो मे प्रणैः प्रख्यकार्यृत् ॥ तद्रूपेण गमिष्यामि कैलास ९
ए गु्यकाल्यम् ॥ ३ ॥ श्द्रोहदयजो मे हि पूर्णीशो ब्रह्मनिष्फलः ॥ दरि बह्यादिभिस्सेग्यो सदभिन्नौ निरंजन ॥ 8 ॥ तत्स्वरू ए
| पेण तत्रै सुदद्त्वा विखास्यदम् ॥ कुबेरस्य च वत्स्यामि करिष्यामि तपो महत् ॥५॥ इति संचित्य ङ्ढेऽसौ शिवेच्छा ग॑त॒ ट
| श॒त्छकः॥ ननाद त्र टकरास्वां सुगति नादरूपिणीम् ॥६॥ बेलोकष्यामानशे तस्या ध्वनिरत्साहकारकः ॥ आहानगतिसंयुक्तो ठ
ठ विचिः साद्रशब्दकः ॥७॥ तच्छृत्वा ॥ विष्णुब्रह्मायाः सरा सुनयस्तथा॥ आगमा निगमा सूतौरिसिद्धा जगुश्च त वै ॥८॥
£ || स्थान कैठासको जाऊंगा ॥३॥ पू्णौश निष्फठ रुदर भेरे हदयसे भगट दै, षह निरंजन सुते अभिन्न हरि ओर बहयादिते सेवनीय है ॥ ॥ ||
|| पो वहां मं घुृदयताके कारण उसी स्वपते कुबेरके समीप निवासत करता हुआ महा तप् कूगा ॥ ५ ॥ यह वरिचारकर रुद शिवेच्छा तहां ट
ट || जानेकी इच्छा कर सुगतिदायक नादरूपिणी अपनी दक्ञा बजाने कगे ॥ & ॥ उ्साहकारक उ्चकी ध्वनि त्रैलोक्य व्याकर होगथा, जो द
>| आहयान गतिसे संयुक्तं विचित्र मनोहर शब्दयुक्तं था ॥७॥ वह शब्द सुनकर विष्णः बहा देवता ओर निं आगम निगम मूर्तं सिद सब गमन | ६
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| | करने ठगे ॥ < ॥ सुर असुर बडे उत्सवके सहित वहां गमन करने ठगे जहां कहीं भी स्थित ध सब प्रथमगण चले ॥ १ ॥ +. £
॥६१॥ ||| तव लोकोंसे नमस्कत गणप भी उस स्थानम गये सावधान होकर सुनो ५/8 संख्या कहता ह ॥ १० ॥ शसकृणनाम॒क गणेश्वरोकि। £
¢ एकं कोटी, दशकोटि कैकराक्ष, आढकोटि विक्त ॥ ११ ॥ चौसठकोरि विशाख, नौ कोरि पारियात्रक, छः न आढक 1
ठ भीमानदुदुभिः ॥१२॥ बारहकोटि जाठंकनामक ष्ठगण, सातकोटि मानु समद इतनेही विक्तानन ।१३॥ पंचकोटि कपरी, छः कोटि ¢
सुरासरायास्सकटास्तच जगुश्च सोत्सवाः॥ सर्वेऽपि प्रमथा जगषर्य्र ङजापि संस्थिताः ॥९॥ गणपाश्च महाभागास्सर्वलोक ४
¢ नमरङ्ृताः ॥ तेषां सल्यामदं वच्मि सावधानतया शृणु ॥ १० ॥ अभ्ययाच्छंलक्श गणकोटया गणेश्वरः ॥ दशभिः |£
केकराक्ष्च विकृतोऽषटाभिरेव च ॥११॥ चतु.षृष्टया विशाखश्च नवभिः पारिया्रकः ॥ षद्भिः स्वान्तकः श्रीमान्दुन्दुभोऽष्ठा ||
ट भिरेव च ॥१२॥ जाको हि द्वादशभिः कोटिभिर्गणर्धुगवः ॥ सप्तभिस्समदः श्री्स्तिथैव यिकृताननः ॥ १३ ॥ पचमिञ्च टै
| कपाली हि षडूमि सन्दारकश्ुभः॥ कोटिकोटिभिरेषेह कण्डुकः ङण्डकस्तथा॥१४॥ विषटंभोऽ्टाभिरगमद्टभिशन्द्रताप्नः
¢| ॥ १९ ॥ महाकेशस्सहस्रेण कोरीनां गणपो वृतः ॥ १६ ॥ कुण्डी द्वादशमिर्वाहस्तथा प्वत्कश्जुभः ॥ कालश्च कालकश्चैव ४
&|| महाकालः शतेन वे ॥ १७॥ अभ्रिकश्शतकोटया वै कोटयाभिष्ठुख एव च ॥ आदित्यमृद्धौ कोटा च तथा चैव धनावहः
||| ~ । सब्रह्म शतक ददः कोटिभिस्तथा ॥ अमोघः कोकिरश्चैव कोटिकोव्या सुर्मे्कः ॥ १९ ॥ ४
अ° २० ||| शुभसन्दारक, कण्डुकं कुण्डक एकएकः। कोटि ॥ १४ ॥ विष्टम्भ आढकोटि चन्द्रतापन आढकोटि, ॥ १५ ॥ मंहाकैश सहश्चकोटि गणपति ¢
| क जाया ॥१६॥ इण्डीवाह ओर धेष्ठ पर्वतक बारह कोरि, कार काठक महाकार सौ कोरि १७॥ भिक स कोरि, अभिञ्ख एककोरि) ठ
|| आदित्य सधौ ओर धनावह एक एक कोटि ॥१८॥ सन्नाह सौ कोरि, कुखद् भी इतनीही कोरि, अमोष कोकिठ घ्ुमन्क एक एक कोटि ॥१९॥ ॥
| ओर सन्तानक परभु साठ साढ को, महावर नौ कोटि इतेही मधुपिंग ओर पिंगल ॥ २० ॥ पुणेभद् ओर नीर न्वै करित ् ध
शके समीप आये महावटी चतुरवक्र सात कोटि टेकर आया ॥ २१॥ को २ सहश्च ओर एकौ वीप कोस्ति युक्त सर्वैश कैलाश जानेकै दिये
आया ॥ २२॥ सुकेश वृषभ भौर काषटगूढ चौसढकोरिस, चैत्र सात कोटि सहित, इतना ही स्वयं परभु नकुलीश ॥ २३॥ छोकान्तक दीपरास्।, ¢
देत्यान्तक प्रभु देव, भगी रिटि श्रीमान् देवप्रिय ॥ २४ ॥ अशनि भानुक सनातन यह चोंट २ कोरिथोसे आये, महाबटी गणाधीश नदी,
काकपादोऽप्रः षष्ठया पष्टया संतानकः परभुः॥ महाबलश्च नवभिर्मधु पिगलश्चु षिगलः॥२०॥ नीलो नवत्या देवेशं परणैभद्रस्तथेव ए
च॥ कोटीनां चैव सप्तानां चतुरवक्रो महाबरः॥२१॥ कोरिकोरिसदस्राणां शतेविंशतिभिवृतः॥ तत्राजगाम सवशः केलशगमनाय &
वै॥२२) काष्ठागूढश्चतुष्ष्टया सुकेशो वृषभस्तथा ॥ कोटिभिस्सप्तभिशवत्रो नङलीशस्स्वयं प्रभुः॥२३॥ लोकातकश्च दीप्तात्मा ट
तथादैत्यांतकः प्रभुः ॥ देवा भगौ रिरिः श्रीमान्देवदेवपरियस्तथा ॥२४॥ अशनिभलुकैव चतुष्षष्ठया सनातनः ॥ नदीन्वरो |£
गणाधीशः शतकोस्या महाबलः ॥२५॥ एते चान्ये च गणपा असंख्याता महाबलः ॥ सव सदख्दस्ताश्च जटाधङकटधारिणः ॥|&
॥२६॥ सवै चदरावतंसाश्च नीखकण्डाक्चिलोचनाः॥ हारङण्डलकेगूरथुकुटायेरलंकृताः ॥२७॥ बरहन्दविष्णसंकाशा अणिमादि ||
गणेतरैताः ॥ घथैकोरिप्रतीकाशास्तत्राजग्घुगेणेन्वराः॥२८॥ एते गणाधिपाश्चान्ये महात्मानोऽपल्परभाः॥ जग्ुस्तज महाप्रीत्या ||
शिवदशंनखालसाः ॥२९०॥ गत्वा तत्र शिवं रष्ा नत्वाः चछ्रुः परं वुतिम्॥ सवं साख्यो विष्णुपरशुला नतमस्तकाः॥३०॥
श्वर सौ कोरिगणपतियोके साथ आया ॥ २५ ॥ यह तथा ओर भी महाबली अख्यत गणप सव ही सहश्च २ हाथवारे जगयङ्कर्धारी ठै
॥ २६ ॥ सही माथेपर चन्द्रमा धारे नीकण्ड चिटोचन हार) कुंड, बाज्रद, सुकर आ। दिस अठंङत ॥ २७ ॥ बह्ञा इन्दर विष्णुके समान ¢
अणिप्रादिगणोपे आवृत कोरिस्यके समान कांतिमान् गणेश्वर वहां आये ॥ २८ ॥ यह तथा भौर भी नि्भेठ कांतिवारे महात्मा शिवदशेनकी ट
रार्तातते बड परमे वहां गये ॥ २९ ॥ वहां जाकर ओर शिवजीको देखकर बडी स्मृति करने छ्गे ओर विष्ण आदि हाथ जोड भस्तकं श्लुका संडे ट
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होगे ॥३०॥ दस प्रकार विष्य आदिक संग महेश परमेश्वर ्रेूर्वक महात्मा कुबेरकै करेास्को गये ॥३१॥ कुबेरने भी शिवजीकौ आया दस
आद्रे पूजा की भक्तिमूरवक परिवारे सहित नानाभकारते पूजा कौ ॥२२॥ ओर फिर शंकरके संतोषे निमित्त पिष्ट आदि देवता तथा ओर्
शिवे अङगामी गणो पूजा की ।॥ ३३ ॥ फिर भरसन्न मनसे शिवजीने कुबेरको आ्टिगन कर ओर उनका शिर् वैघकर सव गणोके सहित
वहं निवास किया ॥३४॥ फिर शिवजीने उस पर्तपरं अपने ओर दूरे देवता ओके अनेक भक्तो निवासयोग्य् स्थान बनानेकी आज्ञा दी
इति विष्ण्वादिभिस्सादं महेशः परमेश्वरः ॥ कैराममगमत्प्रीत्या कुबेरस्य महात्मनः ॥२३॥ कुबेरोप्यागते शंभुं पूजयामास
सादरम्॥ भक्तया नानोपहरें परिषार समन्वितः॥३२॥ ततो विष्ण्वादिकान्देवान्गणां अन्यानपि धुवम्॥ रिवाबुगान्समानचं
| |
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|| शिवतोषणेतते ॥३२॥ अथ शम्धुस्समार्ग्य कुबेर भीतिमानसः ॥ सूर्भिं चाघ्राय संतस्थावलका निकषाखिेः ॥ ३९ ॥
ए
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ह
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॥&२॥
रारास विश्वकर्माणं निर्माणार्थं गिरौ प्रुः॥ नानाभेक्तैनिवासाय स्वप्रेषां यथोचितम् ॥ ३५॥ विश्वकमां ततो गत्वा तर
नानाग्रिधां शुने ॥ रचनां रचयामास दरुतं शम्भोरदज्ञया ॥३६॥ अथ शम्धुः प्रहितो हरिपार्थनया तदा ॥३७॥ कुबेरानुगरद
कृत्वा ययौ कैलासपर्वतम् ॥ सुयुहृतं प्रषिश्यासौ स्वस्थानं परपेश्वरः ॥३८॥ अकरोदेखिलन्प्ीत्या सनाथान्भक्तवर्सलः॥
अथ सव प्रषुदिता विष्णुप्रभृतयस्सुराः ॥ श्ुनयश्चापरे सिद्धा अभ्यिचन्धुदा शिवम् ॥ ३९ ॥ समानचुः कमात्सवं नानो-
पायनपाणयः ॥ नीराजनं समाकाषुमंहोत्सवपुरस्सरम् ॥ ४० ॥
॥ ३५ ॥ हे सुते ! शिवजीकौ आज्ञासे विश्वक्माने वहां जाकर बहुत शीघ्र सुन्दर स्थान बनाये ॥३६॥ तब हरिकी भ्रा्थनासे शिवजी प्रसन्न
ए ॥ २७ ॥ कुबेरपर अलुपरह करके कैठास पवैतको गये ! परमेश्वरे अपने स्थानम शुभ सुहूतमे पवेश किया ॥ ३८ ॥ तब विष्णको
। आदि ठेकर सब देवता खनि ओर सिदध परम भक्ति शिवका अभिषेक करने ठगे ॥ ३९ ॥ अनेक स्ामभ्रियोसे ऋमप्ते सव पूजा
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| ठगे ओर महोत्सवपूवक नीराजन कणे ठगे ॥ ४० ॥ हे सुने उस स्मय मंगलकारिणी की वषा होनेढगी ओर गाने तत्पर |
। अप्सरा नाचने गीं ॥ ४१ ॥ उस स्मय स कोद जयशब्द नमः शब्द कहने ठगे उस समय सवके सुख बढानेषाठा महा उत्साह हज
| ॥ ४२ ॥ सिंहासनपर स्थित हो शिवजी महाशोभित हए विष्य आदि समयं देवताओि अत्यन्त सेवित हृए ॥ ४२ ॥ फिर स्व देवता
पृथरपृथक् स्तुति करने ठे, बडे २ अथवा इष्टं वाणियोसे छोकके आनद देनेवारे शंकरकी स्तुति की ॥ ४४ ॥ स्ति तुन प्रसन्न हो
शिवजीने उनको अनेक कामना दीं सरवेशवर प्रुने सबको भनवांछित वर दिये ॥ ४५॥ हे सने ! शिवजीकी आज्ञासे वे सव कों अपने ठ
तदासीत्समनोवृष्टिर्मगलायतना मुने ॥ सुग्रीता ननृतुस्तताप्स॒रसो गानतत्पराः ॥४१॥ जयशब्दो नमश्शृब्दस्तनासीत्सवसं-
| सकृतः ॥ तदोत्सादयो महानासीत्सव॑षां सुखवर्धनः ॥ ४२॥ स्थित्वा सिंहासने शंथुविराजाधिकं तदा ॥ स्वस्संसेवितोऽभीकष्णं
विष्ण्वायेश्च यथोचितम् ॥ ३ ॥ अथ स्व सुरायाश्च तुष्ट्वुस्तं अ ॥ अथ्यामिर्वाभ्मिरिषटाभिश्शंकरं लोकशंकरम् ||
||| ॥१॥ प्रसत्रात्मा स्तुति धत्वा तेषां कामान्ददौ शिवः ॥ मनोभिलपितान्परीत्या वरान्सरवैश्वरः अथुः ॥४९॥ शिवाज्ञयाथ ||८
६ ते सवं स्वंस्वं धाम यथु्ुने॥ प्राप्तकामाः प्रषुदिता अहं च विष्णना सद॥४६॥ उपवेश्यासने विष्णु साओ शम्भुरुवाच ह ॥ बड़ ह
|| सम्बोध्य सप्ीत्याबुगरहय परमेश्रः॥४७॥ शिव उवाच ॥ हे हरे ह विधे तातौ युवां प्रियतरौ मम॥ सरोत्तमौ त्रिजगतोऽवनस- ु
गंकरौ सदा ॥४८॥ गच्छते नि्भयत्नित्यं स्वस्थानश्च मदाज्ञया ॥ घुखपरदाताईं वै वाभ्विशषात्ेक्षकस्सदा॥४९॥ इत्याकण्यं वच- \
श्शम्भोस्मुप्रणम्य तदाज्ञया ॥ अहं हरि स्वं धामागमाव प्रीतमानसौ ॥ ५० ॥
२ स्थानोको चके गये, मेरे ओर विष्के सहित कामना पाकर सब प्रसन्न हुए ॥ ४६ ॥ आत्तनपर बैढाकर शिवजीने सङ्घे ओर धिष्णी ट
भीति ओर अनुग्रह् कर सम्बोधन देकर कहा ॥ ४७॥ शिवजी बोढे हे विष्ण ! हे बहा ! तुम दोनों देवताओं भ्ठ हो ओर मेरे प्यरे हो तीनों |©
जगतकी उत्पत्ति ओर पाठन सद्ा करो ॥ ४८ ॥ तुम भेरी आज्ञासे निभेय अपने स्थानक गमन् करो भँ तुष दोनोका सुखदाता ओर विशेष
निरीक्षक रहूगा ॥ ४९ ॥ यह शिवजीके वचन पुन उनकी आज्ञा ठे प्ेमसे उनको षणाम् कर भँ ओर हारे अपने स्थानको आये ॥ ५० ॥
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् उसी स्मय प्रसन्न होकर शिवजी कुबेरके पास आय उनका हाथ पकड
॥६३॥ ||| मित्रता ओर तुम्हरे मेमसे तमहा वभूत हृ, ठम भयरहित अव अपने स्थानक जाभो ई पापरहित ! भँ सदा तुम्हारा सहायक दू ॥५२॥
यह शिवजीके वचन सुन कुबेरजी भसन हो शंकरकी आज्ञासे अपने स्थानको गये ॥ ५३ ॥ ओर शिवजी पर्वतश्रेष्ठ कैठासमें निवास कलन
ठम गणो योग्थमे निरत हो खच्छन्दतासे ध्याने तत्पर हृए ॥ ५४ ॥ कमी अपने आत्माका ध्यानं करत कभी योगम निरत होते
तदानीमेव पुप्रीतश्शंकरो निषिपम्बुदा ॥ उपवेश्य गृदीत्वा तं कर आइ शुभं वचः ॥ ५१ ॥ शिव उवाच ॥ तव प्रेष्णा
वशीभूतो मि्रतागमनं सखे॥ स्वस्थानङ्गच्छ विभयस्सदायोहं सदानघ ॥५२॥ इत्याकृण्य वचश्शम्भोः कुवेरः प्रीतमानसः ॥
तदाज्ञया स्वकं घाम जगाम प्रषठदान्वितः॥५३॥ स उवाच गिरौ शम्धुः कैलासे पवैतोत्तमे॥ सगणो योगनिरतस्स्वच्छन्दौ ध्यान
तत्परः ॥५४॥ कचिदध्यौ स्वमात्मानं कचि्योगरतोऽभवत्॥ इतिहासगणान्प्रीत्यावादीत्स्वच्छन्दमानसः ॥५५॥ क्रचित्केलास
ुधरमुस्थानेषु महेश्वरः ॥ विजहार गणेः प्रीत्या विविधेषु बिदारवित्॥५६॥ इत्थं श्द्रस्वष्पोऽसौ शकरः परमेश्वरः ॥ अका-
षत्स्वगिसै लीला नाना योगिवरोऽपि यः॥५७॥ नीत्वा कालं कियन्तं सोऽपत्नीकः परमेश्वरः॥ पश्वादवाप स्वाम्पत्नीन्दक्षप-
त्नीसशुद्भवाम् ॥ ५८ ॥ विजशर तथा सत्या दक्षपुत्रया महेश्वरः ॥ सुखी बभव देवषं रोकाचारपरायणः ॥ ५९ ॥
् स्वच्छन्दमनते प्रसन्न हो गणोे कोई इतिहास कहते ॥ ५५ ॥ महैश्वर कभी केला पवतकै स्थानों प्रीपिपुवैक विहार करते ॥ ५६ ॥
इस प्रकार रुद्रके स्वहप परमेश्वर शंकर अनेक योगिवतके साथ अनेकं टीला अपने पवैतमं करने ठगे ॥ ५७ ॥ इस्त प्रकार पत्नीके विना
श् कृ\ कितना एक समय व्यतीत करक पीडे दश्चकी पतनी उत्पन्न सतीसे विवाह करके ॥ ५८ ॥ उक्ष दक्षकी पुत्री सतीकै साथ
यह शुम वचन बोठे ॥ ५१ ॥ शिवजी बोरे हे भित्र ! मै बुम्हारी
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वस यतण
विहार करेगे हे न।रदजी ! छोकाचरामे परायण होकर बहुत सुखी हुए ।॥ ५९ ॥ हे खनीश्वर ! इस् भकार तुमसे यह शुद्रका अवतार .
किया जिस रकार शिवजी कैठासमे आये ओर कुषेरसे भिवता की ॥ ६० ॥ भौर इसके अन्तर्गत ज्ञानके बढनेवाटी रीठा वणेन कौ जो ¢
इसछोकं ओर प्रछाकमे सदा सव काम ओर फलक्री देनेवाटी है ॥६१॥ जो इर कथाको पठते वा सावधान होकर सुनते हँ वे यहां भोग प्राप्त ¢
| इत्थं शुद्रावतारस्ते बणितोऽयं भनीश्वर ॥ केलासागमनश्चास्य सखित्वास्निधिपस्य रि ॥ ६० ॥ तदन्तर्गतटीलापिवणिता
& | ज्ञानवधिनी ॥ इदा च या नित्यं सर्वकामफलप्रदा ॥ ६१ ॥ इमां कथाम्पटेदयस्तु श्रणयाद्रा समारितः ॥ इद यक्त समा
| साद्य लमेन्सुक्तिम्पर् सः ॥ ६२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शुदरसंदितायां प्रथमखंडे कैकासोपाख्याने शिवस्य
केलासगमनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
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प्रलोकमे युक्ति पाते है ॥ ६२ ॥ इति श्रौशिवमहापएराणे दितीयायां रुदसेहितायां प्रथमखण्डे भाषारीकायां कैडासतोपाख्याने शिवस्य
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कैलासगमने नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ &
इति श्रीशिवमहाएराणे भाषारीकायुते पचखंडास्मिकद्वितीयशुदरहितायां प्रथमः हष्िखण्डः समाप्तः ॥
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॥ इति श्रीरिवमहापएरणे भाषाटीकायुते प॑चखंडास्मिकदितीय
ृद्रसंहिता्ां प्रथमः शष्टिखण्डः समाप्तः ॥
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| | बो ह ब्रह्माजी ! आप महादेवजीकी कपास सब जानते है, आपने पावती ओर शिवकी कथा अषप कही ॥ १ ॥ हे भभु ! कमठ
ट हपी आपके सुस उत्तम शिवकी कथाको सुनकर अतृप्त मेँ फिर उनकी कथा सुनना चाहता हूं ॥ २ ॥ आपने जो शकरकाही पूर्णीश | ठ
टै सवास 1जतेन्दरिय रुद्रको कहा ॥ ३ ॥ विष्ण आदि ठेकर सब देवताओं पूजनीय, साधुओंकी गति निर्विकार महाप्रभु बह योगी सव॑दा ट
# निदन्द्रतासे कीडा करते ई ॥ ४ ॥ वही भगवानकी प्रार्थना भ्रसन्न होकर अपनेहीको ध्यान करतीहुद मंगखरूपिणी श्रष्ठ ज्ञीका विवाहं करक ¢
&|| शीगणेशाय नमः॥अ सतीखंडो द्वितीयः प्रारभ्यते॥ नारद उवाच ॥ विधे सर्वं विजानासि कृषयाशंकरस्यच ॥ त्वयाद्ता
8 हि कथिताः कथा मे शिनयोश्ुभाः॥१ ॥त्वन्युलां भोजसंदृततं धत्वा शिवकथा पराम्॥अतृपो हि षनस्ता व श्रोतमिच्छाम्यहं
# परभो॥२॥ पूर्ाशश्शंकरस्येव यो रुद्रो वणितः पुरा॥विधे तया महेशानः कैटासनिर्यो वशी॥३॥ स योगी सर्वविष्ण्वादिसुरसे ट
न्यस्सतां गतिः । नर्दः करीडति सदा निर्विकारी महाप्रभुः ॥४॥ सोऽभूरनयदस्थश्च विवाय परमा श्ियम् ॥ दरिपराथनया ९ ट
| रीत्या मगल स्वतपस्विनीम्॥८॥ परथमे दक्षपुत्री सा पश्वात्सा पर्वतात्मजा॥कथमनकशरीरेण द्वथोरप्यात्मजा मता॥६॥ कथं ||
| सती पार्वती सा पुनश्शिवसुपागता॥एतत्सवं तथान्यच्च ब्रह्मन् गदितुमईसि ॥७॥ सुत् उवाच॥ इति तस्य वचः अत्वा सरैः ||
४ शंकरात्मनः ॥ प्रसन्नमानसो भूत्वा ब्रह्मा वचनमव्रवीत्॥८॥ ब्ह्मोवाच॥ शृण तात खनिश्रष्ठ कथयामि कथां श्चुभाम्॥ यांशचत्वा |©
४ सफलं जन्म भविष्यति न संशयः॥९॥ पुरां स्वसुतां दष्ठा स्याहं तनयेस्सई॥ अभवं विङ्तस्तात कामवाणमपरषीडितः॥१०॥ ||
गृहस्थ हए ॥ ५॥ पहर दक्षकी पुत्री फिर हिमाख्यकी पत्री एकही शरीरस दोनोकी कन्या कैसे हई ॥ ६ ॥ पतिव्रता वह पावती महादे ट
|| उजीको कसे मिटी, यह सब ओर भी आप कहिये ॥ ७ ॥ तजी बोढे इसथकार शिदभक्त घुरि नारदकै वचनको सुनकर भरसनन हो ठ
ठ ब्रह्माजी बोरे ॥ ८ ॥ ` बह्लाजीने कहा हे एत्र ! कल्याण देनेवाटी कथाको कहताहू जिसको सुनकर निस्सन्देह जन्भ सफर होता है
|| ॥ ९ ॥ पहके तै पतक साथ सन्ध्यानान्नी अपनी कन्याको देखकर कामवाणसे पौडित हयमा ॥ १० ॥ ८
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मैने परम भमु महादेवजीके साथ वैर किया ॥ १२ ॥ शिवकी मायाति
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बह महायोगी परभुर धमक स्मरण करते दए पतरोके साथ ससे धिका
बहुत यत्न किया॥ ३३ ॥ हे मुनि ! परन्तु ५ प्रभु उस शभुम मेरे ओर मेरे सुतोके सज उपाय निष्फृट होगये ॥ १४ ॥ ठव एत्र
सहित निष्फठ मैने भगवानका ध्यान किया ओर शिवभक्त ४
धर्मः स्मृतस्तदा ङ्द महायोगी परः प्रथुः॥धिक्कृत्य मां सुतैस्तात स्वस्थानं गतवानयम् ॥११॥ .यन्मायामोितशराह वेद्
वक्ता च मूढधीः ॥ तेनाकार्ष सहकार्य परमेशेन शंभुना ॥ १२ ॥ तदीर्षेयादमाकाषे बहृपायान्सुतः स॒ह ॥ कटु तन्मोहनं
मूढः शिवमाया विमोहितः ॥ १३ ॥ अभरवंस्तेऽथ वै सवे तस्मिञ् शंभौ परमरभौ ॥ उपाया निष्फलास्तेषां मम चापि अनी
श्वर ॥ १४ ॥ तदाऽस्मरं रमेशानं व्यर्थोपायस्सुतेस्सह ॥ अवोधयत्स आगत्य शिवभक्तिरतस्युधीः ॥ १५॥ प्रबोधितो
रमेशेन शिवतच्वपरदश्चिना॥ तदीर्षामत्यजं सोहं तं इठं न विमोदितः ॥१६॥शर्वित संसेव्य तत्प्रीत्योत्पादयामास तां तदा ॥
- दक्षादशिकन्यां वीरिण्यां स्व ुत्राद्रमोदने ॥ १७ ॥ सोमा भूत्वा दक्षता तपः कृत्वा तु इस्सदम् ॥ रुद्रपन्यभवद्त्तया
स्वभक्तरितकारिणी ॥ १८ ॥ सोमो रो शह भरत्वाऽकारषीडटीलां परां भ्रुः ॥ मोहयित्वाथ मां तत्र स्वविवाहेऽविकारधीः ॥
॥ १९ ॥ विवाद्य तां स आगत्य स्वगिरौ सूतिङत्तया ॥ रेमेबहुविमोहो हि स्वतंत्रस्स्वात्तविग्रहः ॥ २० ॥
समज्ञा हए मोहित भने उने द्वेष छोड दिया परन्तु हठ न छोड़ा ॥ १६ ॥ हठी रने शक्तिकी सेवाकर महादेवजीको मोहितः केक
ष्ि अपने इ दक्षते अक्िक्नी वीरिणी उत॒ तीको उत्पन कराया ॥ १७ ॥ वह दकषपुता उमा दुह तपकौ करकं भक्तीको
कल्याण देनेवाटी भसन्नतासे सुदरकी पत्नीः हदं ॥ १८ ॥ शुदधबुद्धि वह रद्र अपने विवाहे श्च मोहित कर पादंतीके साथ गृहस्थ होकर
उत्तम लीखाको करनेखगे ॥ १९ ॥ उभाका विवाह करके अपने पर्वत प॒र आकर स्वतंत्र होकर संतानकी इच्छासे मोहित रमण करनेटगी ॥२०॥
र देकर कैठासको चटेगये ॥११॥ जि्तकी मायासे मोहित वेदवक्ता मख
मोहित मूखं तोके सहित भन देषसे उनको मोहित कृरनेके व्यि
भगवानने आकर मक्षे समन्ञाया ॥ १५॥ शिवत्वके जाननेवाठे विष्णसे
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उमाके साथ विवाह करते हए निकार उन शंभुक{. बहुत सषमय बीत गया ॥ २१ ॥ फिर शिवकी मायातते मोहित अहंकारी मसं ||
दक्षके साथ वैर हुआ ॥ २२ ॥ उन्हीके प्रभावे मूखं अर्हकारी मोहित दक्षने शात निविकार रुद्रकी निन्दा की ॥ २३ ॥ फिर संसारक त
(वामी दक्षे सब देवताओंको विष्णको बुठाकर . ओर मुह्यको बुटाकर शिवके विना अर्हकार यज्ञ॒ किया ॥ २४ ॥ महादेवजीकै दषे त
भकु द्वेषते मोदित दक्षन सतीनाभ्री अपनी एतीको नहीं बुलाया, तब_ पतिव्रता आगे कहा हभ चरित्र किया ॥ २५.॥ ॥ २६. ॥ £
तया विदरतस्तस्य ब्यातीयाय महान् घुने॥कारस्पुखकरश्शभोनि्वैकारस्य सद्तेः॥।२१।।ततो शरस्य दक्षेण स्पा जातानिजे
च्छया ॥ महामूटस्य तन्मायामोहितस्य सुगर्विणः॥२२॥ ततप्रभावाद्धरंदक्षो महागवीं विमूढधीः ॥ महाशतं निविंकारनिनिद ट
बहु मोहितः ॥२३॥ ततो दक्षः स्वयं यज्ञ कृतवान्गरवितोऽह॑म् ॥ सवांनाहूय देवादीन् विष्णं मां चाखिलाधिपः॥२७॥नाज्ञहाव ठ्
तथाभूतो श्रं रोषसमाकुलः ॥ तथा त सतीं नाम्ना स्वपुरीं बिधिमोहितः ॥२५॥ यदा नाकारिता पिना मायामोहितचेतसा |©
लीलां चकार सुज्ञाना महासाध्वी शिवा तदा॥२६॥अथागता सती त शिवाज्ञामधिगम्य सा॥अनाहृतापि दक्षेण गविणास्वपि |©
तुैदम् ॥२७॥ विरोक्य रुद्रभागं नो पराप्यावज्ञां च ताततः ॥ विनिंद्य तत्र तान्सर्वान्देहत्यागमथाकरोत् ॥२८॥ तच्छत्वा ||
देव देवेशः कोधं कृत्वा तु दुस्सदम्॥जराघुत्कृत्य महतीं वीरभद्रमजीजनत्॥२९॥ सगणं तं ससुत्पाय कि कुर्यामिति वादिनम्॥ त
सर्वापमानपूरवं हि यज्ञध्वंसं दिदेशई॥२०। तदाज्ञां प्राप्य स गणाधीशो बहुबरान्वितः॥गतोऽरं तञ्च सहसामहबिरुपराक्रमः॥२१॥ ¢
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अहंकार दक्षसे विना बुखाई हृदं भी सती शिवकी आज्ञाको ठेकर अपने पिताक घर् गहै ॥ २७ ॥ वहां हादेवजीका भाग न देख पितासे
अपमानित सतीने सबकी निन्दाकर शरीर छोड दिया ॥ २८ ॥ यह सुन शिवने कठिन कोधकर जटा उखाड वीरभद्को उत्पन्न किया
॥ २९ ॥ गणोके सहित पीरभद्रको उत्य्ञकर कया करं यह कहते हृए बीरभद्रको अपना तिरस्कार कथनपूवक दक्षकै यज्ञको नाश करनेकी
आज्ञा दी ॥ ३० ॥ उनकी आज्ञा पाकर गणाधीश बहुत बसे युक्त वरहो गये ॥ ३१ ॥
१ हररहितम् ।
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0 ओर उनकी ओआज्ञासे गणोँने महा उपद्रव करके सबको दंडित किया
॥६६ || र्का शिर काटकर अथिमे हवन कर दिया ॥ ३३ ॥ महा उपद्रव कर
रणाम किया ॥ ३४ ॥ देवताओंकर देखते ही देखते रुरक अनुचर वीरभद्र
र्ट होनेपर छोकका कल्याण कैसे हो ? हे खनि 1 यह नीति श्रुति ५
महोपद्रवमाचेर्गणास्तचर तदाज्ञया॥ सर्वान्स ईंडयामास न कश्चिदवशेषितः ॥३२॥ विष्णुं संजित्य यलेनसामरं गणस ॥
चक्रे दक्षशिरश्छेदं तच्छिरो जहाव च ॥ ३३ ॥ यज्ञध्व॑सं चकाराशु सहोपद्रवमाचरन् ॥ ततो जगामस्वगिरिं रणनाम प्रथु
शिवम् ॥२४॥ यजञप्पंसोऽभवच्चेतथ देवलोके हि पश्यति ॥ स्रस्यालुचर्तत् वीरभद्रादिभिः कृतः॥२९॥ सुने नीतिरियं ज्ञेया
शतिस्मृतिषु संमता ॥ रुद्रे श्ट कथं रोके सुखं भवति सुप्रभौ ॥३६॥ ततो शः परसन्नोभृत्स्ततिमाकण्यं तां पराम् ॥ विज्ञपि
सफलां चकते सवषां दीनवत्सलः ॥ ३७॥ पूर्ववच्च कृतं तेन कृषात्वं महात्मना ॥ शंकरेण मदैशेन नानारीकावि हारिणा
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४ ॥ ३८ ॥ जीवितस्तेन दक्षो हि तञ स्वँ हि सत्कृताः ॥ पुनस्स कारितो यज्ञः शंकरेण कृपालुना ॥३९॥ रश्च पूजितस्तत्र सवै
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किं्ीको नही छोडा ॥ ३२ ॥ विष्ण ओर देवतोंको यल्पूर्वक जीत
ते हृए गरणोनि यज्ञको विध्व॑सकर केटाप् पवतपर जाकर महादेवजीको
दिकों करके यज्ञका विध्वंस होगया ॥ ३५ । उत्तम भु रुद्रै
ओर स्थृतिके सम्मतिसे जानिये ॥ ३६ ॥ तदनन्तर
दवेरविरोषतः॥ यज्ञे विश्वादिभिर्मत्तया सुप्रसत्नात्मभिशचुने ॥४०॥ ॥ सतीदेदससुत्पत्रा ज्वाला लोकसुखावहा ॥ पतिता पर्व॑ते
हस. २ त प्रूजिता सुखदायिनी ॥४१॥ ज्वाला्ुखीति विख्याता स्वैकामफरपदा ॥ बभूव परमा देवी दशेनात्पापहारिणी ॥४२॥
स स.२ ||| सुतिको सुन दीनवत्सङ इद्र भसन्न हो सबकी विज्ञतिको सफ़ठ करते हए ॥ ३७ ॥ शकर महादेव नाना लीला ओौर विहार करनेवाञे ||
अ= 9 ||@ | महात्माने कपास सव पूर्ववत कर दिया ॥ ३८. ॥ दक्षकरो जीवित कर उनके दारा सवका सत्कार कराकर छपा गंकरजीने यज्ञ ||?
करवाया ॥ ३९ ॥ त यज्ञम॑विश्वादिक समप्णं देवता ओंने अत्यन्त भ्रसन्न हो रुद्रका पूजन किया ॥ ४० ॥ ओर सतीके देहे
उन्न, रोकको सुख देनेवारी ज्वाखा पर्वत प्र जाकर गिरी, वह॒ पूजित होनेपर घुसखदायिनी ॥ ४१ ॥ सम्पूणं कामोके फठ्को॥>
| सब हमने कहा जिसके सुननेसे मनुष्य सम्पूणं पापोति चू जाता है इसमे संदेह नहीं ।॥ ४६॥ इति भीशिवमहाष्राणे द्वितीयायां सुदसंहि
तायां द्वितीये सतीखण्डे भाषाटीका सतीरकषेपचरिववर्णनं नाम भथमोऽध्यायः ॥ १ । सतजी बोरे हे नेभिषारण्यवासियो ! इस प्रकार उनक
इदानीं पूज्यते कोके सर्वैकामफलाप्तये ॥ संविधाभिरनेकामिमंदोत्सवपरस्परम् ॥ ४३ ॥ ततश्च सा सती देवी हिमाख्यस॒ता
ऽभवत् ॥ तस्याश्च पर्वतीनाम प्रसिद्धमभवत्तदा ॥ ४९ ॥ सा पुनश्च समाराध्य तपसा कठिनेन वै ॥ तमेव परमेशानं भर्तारं
सथुपाभिता ॥ ४५ ॥ एतत्सर्वं समाख्यातं यत्पृठोदं खुनीश्वर ॥ यच्छरत्वा सर्वपापेभ्यो खुच्यते नाच संशयः ॥ ६ ॥ इति
श्रीशिषमहापुराणे द्वितीयायां सुद्रसंहितायां द्वितीये सतीसंक्षेपचरित्रवणनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ सूत उवाच ॥ इत्या
करण्यं वचस्तस्य नैमिषारण्यवासिनः ॥ पप्रच्छ च सुनिश्रष्ठः कथां पापप्रणाशिनीम् ॥ १ ॥ नारद उवाच ॥ विधेविधे महा
भाग कथां शंभोश्टुभावहाम् ॥ शृण्वन् भवन्धुखांभोजाच्र तपोस्मि महाप्रभो॥२॥अतेः कथय तत्सवं शिवस्य चरितं शुभम्॥
सतीकीत्यंन्विते दिष्यं श्रोतुमिच्छामि विश्वकृत् ॥ ३॥ सती हि कथघुत्पन्ना दक्षद्रषु शोभना ॥ कथं हरो मनशचक्रेदाराह
रणकर्मणि ॥ ७॥ कथं वा दक्षकोपेनत्यक्तदेहा सती पुरा ॥ दिमवत्तनया जाता भूयौ वाकाशमागता ॥ « ॥
वचन सुनकर नारदजी पापनाश करनेवाटी कथाको पंडा ॥१। नारदजी गोड हे विधि ! हे महाभाग ! शुभदायिनी शभुकी कथाको कषरुहपी
आपके सुखे सुनकर हे महापमु भँ तृप्र नहीं हुआ ॥२॥ हे विश्वके रचनेवाछे ! बह सम्पूण शुभ शिवजीके चरित्र दिञ्य सषतीजीकी कीस
युक्त किये, स्॒ञे सुननेको इच्छा है ॥ ३ ॥ किंतपरकार सती दक्षकी च्नीमे उत्पन्न हद ओर केसे महादेव जीने स्षीके करनेभं भन दिया ॥ ४ ॥
वही किसीपकार पक्षके कोपते सतीजीने शरीर छोडा ओर हिमवानकी कन्या होकर फिर आकाशम आईं ॥ ५ ॥
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| | ज्वाठामुखीके नामते विरूयात हो दशनसे परातकोंका नाश क्रनेवाटी शर देवी ईं ॥४२॥ अब भी सम्पूणं काके फएठ्की श करके
महोसपवमे परस्पर बहते उपचारों द्वारा संसार उनका पूजन करता है ॥४२॥ उसके पौ बह सती देवी हिमाठ्यकौ कन्या हौ पावतीकै नामस
भसि हई ॥४४। बह फिर कटिन तपस्ये दवारा आराषन कर उसी परम् ईश पतिको पाप है ॥ ४५ ॥ हे खनीश्बर ! जो तुमने पुछा
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युपर दिव्य सती ओर शिवजीका शुभयश सुनो ॥८॥ विष्ण करकेबडी प्री
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नेवारे महादं गी कैसे हूं ॥ ६॥ है
आ ओर स्मरकी नाश करनवां महादेवजी अद्धारग
पाषतीका उथ तप ओर उनका विवाह किस प्रकार हुआ (1 0 +:
डा गा 1 तित पडे हुए शिवजीने पथम भक्त भ्ठ परोपकारी विष्णसे यहं कहाथा
॥९॥ किर हमे पूेहुए भगवानूने प्ेमसे विस्तारपूवेक कहा ॥१०॥ सब कामक देनेवाी सती ओर शिकवकै यशसे युक्त उसी रानी १
पार्वत्याश्चतपोऽत्युभरं विवाहश्च कथं त्वशूत् ॥ कथमरद्धशरीरस्था बभूव स्मरनाशिनः ॥ & ॥ एतत्स समाचक्ष्व विस्तरेण
महामते ॥ नान्योस्ति संशयच्छेत्ता त्वत्समो न भविष्यति ॥ ७ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ण॒ त्वं च सुने सवं सतीशिवयशर्मम् ॥
पावनं परम दिव्यं गद्याद्वद्यतमं परम् ॥ ८ ॥ एतच्छथुः पुरोवाच भक्तवयाय विष्णवे ॥ पृष्टस्तेन महाभक्त्या परोपकृतये
घने ॥ ९॥ ततस्सोपि मया प्रशे विष्णुश्टीववरस्स॒धीः ॥ प्रीत्या मह्यं समाचख्यौ विस्तरान्धुनिसत्तम् ॥ १० ॥ अहं
तत्कथयिष्यामि कथामेतां पुरातनीम् ॥ शिवाशिवथशोयुक्ता सवैकामफरभ्रदाम् ॥ ११ ॥ पुरा यदा शिवो देवो नियुंणो नि
विकल्पकः ॥ अद्पश्शक्तिररितथिन्मां्स्सदसत्परः ॥ १२ ॥ अभवत्सगणस्सोपि द्विश्पश्क्तिमान्परथुः ॥ सोमो दि्याङ्
तिम निर्विकारी परात्परः ॥ १३ ॥ तस्य वामांगजो पिष्णब्हयाहं द्िरणागजः ॥ श्रौ हदयतो जातोऽभवचच घुनिसत्तम
॥ १९ ॥ सृषिकर्तामिवं ब्रह्मा विष्णुः पालनकारकः॥ र्यकर्ना स्वयं सदरह्चिधाभूतस्सदाशिवः॥१५॥ तमेवाई समाराध्य ब्रह्मा
लोकपितामहः॥ प्रजा ससजं स्वास्तास्सुराख्चरनरादिकाः ॥ १६ ॥
मेँ कहता हूं ॥११॥ प्रथम निशैण निर्विकल्प परहित शक्किरहित चिन्मात्र सस्वहप शिव ॥१२॥ परेसेभी परे निरंकार बह उमाके सहित
द्िहप सण शक्तिमान् हए ॥१३॥ उनके यि अगते विष्ण ओर दक्षिण अगे भ बह्मा हदयपे रुद्र उत्पन्न हए ॥१४॥ सृष्ट करनेवाटे ब्रह्मा, पाठन
करनेवारे विष्ण, य करनेवाठे ३ स्वयं शिवजी हए ॥ १५॥ लोकपितामह ने दन्हीका आराधनकर सव भ्रजाओं ओर देवता दैत्यो ओर मण्यादि
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कोको बनाया ॥१६॥ देकभे्दक्षादिक भजापतियोको बनाकर भरसन्न ने सव तेजोपे युक्त अपनेको माना ॥१७ ॥भरीचि, अत्रि, भह |
| , कत्, वशिष्ट, नारद, दकष, मृयको ॥१८॥ जिस समय नैन मनसे उतपन्न किया उसी समय भेरे मनसे सैदरी एक कन्या उत्पन्न हुई ॥१९॥
दिवसक अंतमे सायंकाठकी सेध्याके समान सुन्दरी सुष्ड भौँहोंवाटी खनि्योके भी चित्तको मोहन करनेवाटी जिसका नाम सध्या था ॥२०॥
निश्वय करके सब गो यक्त तीनों काठ ओर तीनों छोकोमिं वैस नारी न थी ॥२१।। उनको देखकर उढकर भे जर खट करनेवाठे दक्षादिक ओर
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#|| सष्ठ प्रजापतीन् दकषपरखान्पुरसत्तमान् ॥ अमन्यै सुप्रसननोहं निजं सर्वमहोत्रतम् ॥१७॥ मरीचिमर्चि पुलहं पुकस्त्यांगिरसौ ||
¢| कतुम् ॥ वसिष्ठं नारदं दक्ष भृ चेति महाभ्रभून् ॥१८॥बह्नादं मानसान्षु्रानसजं च यद शुने ॥ तद् मन्मनसो जाता चार ¢
ह्पा वरांगना ॥१९॥ नाम्ना संध्या दिवक्षांता साय संध्या जपंतिका ॥ अतीत सुन्दरी सश्चचंनिचेतो विमोहिनी ॥२०॥ न
तादृशी देवरोके न मत्य न रसातरे ॥ कालत्रयेपि वै नारी सम्पूर्णग्रणशाखिनी॥२१॥ दष्टाईं तां सस्रत्थाय चिन्तयन्डदि इद् ¢
तम्॥ दक्षादयश्च सष्टारो मरीच्याद्याश्च मत्सुताः ॥२२॥ एवं चितयतो मे हि ब्रह्मणो शनिसत्तम ॥ मानसः पुरूषो मजरावि
भूतोमहाद्धतः ॥२३॥ कांचनीकृतजाताभः षीनोरस्कस्सुनासिकः ॥ सुृत्तोरुकरीजंघो नीरूवेटितकेसरः॥२४॥ लग्शरयुगलो
लोलः पर्णचन्द्रनिभाननः ॥ कपाटायतसद्वक्षो रोमराजीवराजितः ॥२५॥ अभमातंगकाकारः षीनो नीर्षवासकः ॥ आरक्तपा ||&
णिनयनभुखपादकरोद्धवः॥२६।॥क्षीणमध्यश्चाश्दन्तः प्रमत्तगजगंघनः॥ प्रफुपदयपाक्षः केसरघाणत्पणः ॥ २७ ॥ ह
मरीच्यादिक मेरे एत्र सोचने ठगे ॥ २२॥ सोचते हृए मेरे हदयस सुन्दर बडा अद्भुत एक परुष उत्पन्न हुआ ॥ २३ ॥ जो तपे हुए सुवणके समान |£
कौतिधारी मरे वक्षःस्थल्वाला ओर उत्तम नासिकावाछा सदर सुख, उर, कटि, जंषासे युक्तं ओर भ्रभरकै समान कारे बो शोभित ॥ २४ ॥ ५
| पिढी हई दोनों भोहि प्यारा पू्णचन्द्रमाकी तरह दीपरिवाछा कपाटकैश्षमान दीं हदय रोभरूपी कमठे शोभित ॥ २५॥ श्यामगजके सहश आकारवाहा,
|| स्थूढ, नी, उत्तम सुगेषियोति युक्तं ओर रक्त वके हाथपेर सखनेतसे शोभायमान ॥ २६ ॥ क्षीण मध्यभाग भौर सुन्दर दोँतवाखा मतवाे गजक |
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| शि 6 पु
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रुण्सं.२ ४
स॒.खं.२
अ०२
न्द्र गदं ध्वजामं
समान गंधसे युक्त एके कमठपतके समान नेत्र वाठोकी सुगधसे सुवासित करता इना ॥ २७ ॥ सुन्द्र गदंनवाढा मीन हि ध्व
> पसे दोनों स
जिसके रेस मकरवाहन पंचषष्पायुध, शीघगामी ष्पे धलुषसे शोभित काम ॥ २८ ॥ हे तात ! कटगक्षोपे दोनों नेको घुमाता इजा
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¢ सवका मिय सुगधित श्वास्तवाला श्ंगार रससे सेवित ॥ २५ ॥ एते उ पुरुषको देख चकित दक्षादिक मेरे त्र प्रसन्न हौ बडी आश्वयैताको
कवुीवो मीनकेतः भ्र्म॑करवाहनः ॥ पंचपुष्पायुधो वेगी पुष्पकोदं डमडितः ॥ २८॥ कांतः कटाक्षपातिन भ्रामयत्रयनद्
यम् ॥ सुगंधिमार्ूतो तात शरंगाररससेषितः ॥ २९ ॥ तं वीक्ष्य पुरूष स्वे दक्षाद्या मत्सुता ते ॥ ओत्घुक्यं परमं जग्ध
विंस्मयाविष्ठमानसाः ॥ ३० ॥ अभवद्विकृतं तेषां मत्तानां मनो द्रुतम् ॥ धेयं नैवारुभत्तात कामाकुख्तिचेतसाम् ॥३१॥
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भ्ाप्त हुए ॥ ३० ॥ कामबाणसे पीडित उन मेरे एत्रंका चित्त शीप्रही विरत होगया ओर धीर नहीं रहा ॥ ३१ ॥ विनयपुवक ¢
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मां सोपि वेधसं वीक्ष्य सरष्टारं जगतां पतिम् ॥ प्रणम्य पुरषः प्राह विनयानतकंरः ॥ ३२ ॥ पुरूष उवाच ॥ किं करिष्या
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म्यहं कम ब्रह्म॑स्त् नियोजय ॥ मान्यो पुरूषो यस्मादुचितः शोभितो विधे ॥ ३३ ॥ अभिमानं च योग्यं च स्थानं ट
पत्नी च या मम ॥ तन्मे वद् धिकोकेश त्वं खटा जगतां पतिः ॥३४॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं तस्य वचः थत्वा पुरुषस्य महात्म ||ह
नः ॥ क्षणं न किंचित्मावोचत्स सष्टा चातिषिस्मितः ॥ ३५ ॥ अतौ मनस्पुसंयम्य सम्ययु्सृज्य विस्मयम् ॥ अवोचत्पु ||
रुषं ब्रह्मा तत्कामं च समावहन् ॥ ३६ ॥ ` | ¢
स्कंधको सयुकाकर वह प्रुष संकारे स्वामी प्रजाओंकै रचयिता शक्न ब्लाक देख प्रणाम करके बौटा ॥ ३२ ॥ पह्ष बोढा
हे बहान् ! मेँ क्या कर सु्ञे पसे क्म नियोजित कीजिये जिससे तै शर्षोका माननीय हँ ॥ ३३ ॥ ओर अभिमानयोग्य स्थान ओर ||
जो मेरी प्त है उते हे विोकेश ! जगतके पति खष्टि करनेवाठे छते आप करिये ॥३४॥ नाजी बोठे महात्मा कामके इत वचनको ||
सुनकर अति चकित हो थोडी देरतक बया कुछ न बोडा ॥ ३५ ॥ फिर मनको सावधानकर स्िस्मयको छोड कामको समीप ठाकर ||
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| बोले ॥ २६ ॥ बह्माजी बो तुम इस अपने हप ओर पाँच दष्पोके बणोसे परुष ओर स्रि्योको मोहित करते हूए सृष्टि |
| तुम्हारे सन्छल त्रिलोक चराचर देवता ओर जीभ को न ठहर सकेगा ॥ २७ ॥ ३८ ॥ भ ओर वासुदेव ओर शिवजी भी तुम्हार व
हेग ओर जी्ोकी तो बात ही क्या है ॥ ३९ ॥ युपरूप ठुम सर्वदा भाणधारिोकि हदये पवेश करते हुए सुखरूप होकर स्षनातनी
शृष्ठको करो ॥ ४० ॥ सदा तुम्हारे एष्पबाण मनक आश्वं देनेवाखा सुखरूप ठक्ष्य सव प्राणियोको नित्य मद॒देनेवाला होगा ॥ ४३ ॥
॥ ब्रह्लोवाच ॥ ॥ अनेन त्वं स्वरूपेण पुष्पवाणश्च पंचमिः॥ मोहयन् पुरुषान् ष्रीश्च रु सृष्टि सनातनीम् ॥३७॥ अस्मि
जीवाश्च देवाययाचेलोक्ये सचराचरे ॥ एते सव भविष्यन्ति न क्षमास्त्यवलंबने ॥ ३८ ॥ अहं वा वासदेवो वा स्थाणुवापु्
षोत्तमः ॥ भविष्यामस्तव वशे किमन्ये प्रणधारकाः ॥२९॥ प्रच्छत्ररूपो जंतूनां प्रविशन् दयं सदा ॥ सुखहेतुः स्वयं धृत्वा
सशि कुर् सनातनीम्॥४०। त्वत्पुष्पबाणस्य सदा सुखक्ष्यं मनोद्धतम् ॥ सवेषां प्राणिनां नित्यं सदा मदकरो भवान् ॥४१॥
इति ते कमं कथितं सृष्टप्रावतैकं पुनः ॥ नामान्येते वदिष्यंति सुता मे तव तत््वतः॥४२॥ बर्लोवाच ॥ इत्युक्तादं सरश्रष्
स्वसुतानां षुखानि च॥आलोक्य स्वासने पाञ्च प्रोपविष्टोऽभवं क्षणम्॥७३।३ति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शुदरसंहितायां
द्वितीये सतीखंडे कामप्रादुर्भावो नाम द्वितीयोऽध्यायः २॥ ब्रह्मोवाच॥ ततस्ते घुनयः सवे तदाभिभ्रायवेदिनः ॥ चछ्कस्तदुचितं
नाम मरीचिप्रपुखास्स॒ताः॥१॥ सुखावरोकनादव ज्ञात्वा वृत्तांतमन्यतः ॥ दक्षादयश्च सष्टारः स्थानं पत्नीं च ते ददुः ॥२॥
थह सृष्टि चरानेवाटा कमं मेने तुमसे कहा फिर यह मेरे एत्र वास्तवमे तुम्हारे नाम कहंगे ॥ ४२ ॥ ब्रह्लाजी बोटे हे सुरभेष्ठ ! यह कहकर
अपने पत्रोका मुख देख मँ अपने कमलासनपर बैठ गया ॥ ४३ ॥ इति श्रीशिवमहाषराणे द्वि° रु द्वितीपे सतीखण्डे भाषारीकायां द्विती
|| योऽ्यायः ॥ २ ॥ फिर उततके अमिपरायको जाननेकाठे मरीच्यादिकोने कामदेवका उचित नाम रख दिया ॥ १ ॥ सृष्टि करनेवाखे दक्षादि
कोने दूसरों उसका वृत्तान्त जान उसका मुख देखतेही स्थान ओर ज्लीको उत्ते देदिया ॥ २ ॥
फिर मरीच्यादिक मेरे ्ोने उसके नाम निध्वितकर उसे कहं दिये ॥ ३ ॥ ऋषि बोरे; जो तुमने पहटेही हमारा ओर ब्रह्माजीका चित्त
कोई सुन्दर नहीं है इससे तुम्हारा कामभी नाम हौगा
मथ दिया इससे संसारम मन्मथ तुम्हारा नाम॒ होगा ॥ ४ ॥ संसारे तुम्हारे समान 6
होगा ॥ ६ ॥ तुम्हारे समान किसी देवता्भे पराक्रम
॥ ५ ॥ मोहनसे मदन, अहकारसे तुम अहंकारी कन्दपं भी वुम्हारा नाम
न होगा इससे आपके सव स्थान ओर आप सर्वव्यापी ह्यँगे ॥ ७ ॥ पुरुषोत्तम प्रजाओके स्वामी दक्ष यथेष्ट कामिनी च्वी आपको देगे
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ए ततो निच्चित्य नामानि मरीचिप्रसुखा द्विजाः॥उचुस्संगतमेतस्मे पुरुषाय ममात्मजाः ॥२॥ ऋषय उः ॥ यस्मास्ममथसे |
|| त्वं जातोस्माकं यथावरिपेः॥तस्मान्मन्मथनामात्वं लोके ख्यातो भविष्यसि।॥8॥जगृत्सु कामरूपस्तं त्वत्समो न हि विद्यते॥ ||६
९ || अतस्त्वं कामनामापिख्यातो भव मनोम्ब॥५॥मदनान्मदनास्यसत्वं जातो दर्पत्सद््पकः ॥ तस्मात्कंदषैनामापि रोके ल्यातो ट
। भविष्यसि ॥६॥ त्वत्समं सर्वदेवानां यद्वयं न भविष्यति ॥ततः स्थानानि सर्वाणि सर्वव्यापी भवांस्ततः ॥७॥ दक्षो भवते ट
£| पलं स्वय दास्यति कामिनीम् ॥आदयः प्रजापतिर्य हि यथेष्टं पुर्षोत्तमः॥८॥एषा च कन्यका चारुरूपा बरह्ममनोभवा ॥ ठ
|| संध्या नाम्नेति विस्थाता सर्वछोके भविष्यति ॥९।अ्रह्मणो ध्यायतो यस्मात्सम्यग्जाता वरांगना ॥ अतस्संध्येति विस्याता ||
ह. २ ||| कतमा त्यमद्िका ॥ १० ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ कौसुमानि तथाङ्चाणि पैचादाय् मनोभवः ॥ प्रच्छत्रहपी तत्रैव चितया |©
मास निश्चयम् ॥ ११ ॥ हणं रोचनार्यं च मोहनं शोषणं तथा ॥ मारणं चेति ग्रोक्तानि शनेरमोहकराण्यपि ॥ १२ ॥ |£
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८ ॥ यह ब्रह्माजी मनसे उत्पन्न सुन्दरी सेसारमं सन्ध्या नामं वाटी होगी ॥ ९ ॥ अच्छी प्रकार ध्यान करते हुए ब्रह्माजीके ८
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हदयसे यह उतपन्न हृद है इससे इसका सन्ध्या नाम ॑है ॥ १० ॥ ब्रह्माजी बोठे, यपररूप कामदेव दृष्पहूपी पोच अञ्च ठेकर
वहीं सोचने ल्गा ॥ ११ ॥ रोचन, हर्षण, मोहन, शोषण ओर मारण यह पांच बाण सनियोकै मी चित्तको मोहन ¢
। परजापतिजी वर्तमान ई, इनके सामने कम्मंकी सत्यता निश्वय होजायगी ॥१४॥ ब्रह्ञाजीकी कही हुई संध्या भी कर्म्मोकौ परीक्षा करके
निमित्त बोढी ॥१५॥ बह्याजी बोठे यह मनमे सोच ओर निश्वयकर कामने धलुषको योजित किया ॥ १६ ॥ सुन्दर स्थानमें पहुंचकर यत्नत
धूलुष खींच धन्वीवर कामने धलुषको बडीकी तरह बनादिया ॥ १७ ॥ उसके षठुषको ठीक करनेपर भ्रसन्न करनेवाटी शुगन्धित वायु चलने
बरह्मणा मम यत्क सुदिष्टं सनातनम् ॥ तदिदैव करिष्यामि सनीनां सत्निधौ विषे ॥ १२ ॥ तिष्टति अनया स्वर्यं
चापिप्रनापतिः ॥ एतेषां साक्षिभूतं मे भविष्यत्यद्य नियम् ॥१४॥ संध्यापि ब्रूह्णा परोक्ता चेदानीं भेषयेदधचः ॥ इह कमं
प्रह्व भरयोगान्मोहयाम्यहम् ॥ १५. ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति संचित्य मनसा निधित्य च मनोभवः ॥ पुष्पजं पष्पजातस्य
योजयामास माणः ॥१६॥ आलीटस्थानमासाद्य धनुराकृष्य यत्नतः ॥चकार बल्याकारं कामो धन्विवरस्तदा ॥ १७ ॥
संहिते तेन कोदंड मारुताश्च सुगंधयः ॥ वुस्तत सुनिश्रष्ठ सम्यगाह्यादकारिण्ः ॥ १८ ॥ ततस्तानपि धानञादीच् सवनिव च
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मानसान् ॥ प्रथक् पुष्पशरैस्ती
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४ करनेवाठे ई ॥ १२ ॥ सनातन जो कमं ब्रह्माजीने स्स कहा है उसकी परीक्षा खनियोक समीप यहीं कर ॥१३॥ यहां बहुतसे ऋषि ्
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्णेमोहयामासमोहनः ॥१९॥ ततस्ते भुनयस्सवे मोहिताश्वाप्यहं सुने ॥ संहितौ मनसा कंचि
द्विकारं प्राएरादितः ॥ २० ॥ संध्यां सवं निरीक्षतस्सविकारं हशः ॥ आसन् प्रबृद्धमदनाः शची यस्मान्मद्नैधिनी
॥ २१ ॥ ततः सर्वान्स मदनो मोहयित्वा पुनःपुनः ॥ यथेन्द्रियविकारं ते प्रापुस्तानकरोत्तथा ॥ २२ ॥ उदीरितद्ियो धाता
वीक््याहं स यदा च ताम् ॥ तदेव चोनप॑चाशद्धावा जाताश्शरीरतः ॥ २२ ॥
ठगी ॥ १८ ॥ रिंर मोहन ( कामदेव ) ने अङग २ तेज पष्प बाणणोँसे ब्ह्लादिक सवके भन मोहित कर स्थि ॥ १९॥ तब म ओर
सब नि मोहित होगये ओर प्रस्पर भिखकर विकारको पराप्त हुए ॥ २० ॥ बार २ सध्याको देखते हुए जिस कामरूपी अभिकी खी ईधन
होती है शते कामसे अं होगये ॥ २१ ॥ उस कामने वारम्बार उन सवको मोहित करके उनको इन्दियविकार भप्त कृरदिया ॥ २२ ॥ उसे
देख उदी द इन्द्रियवाठे मुच्च ब्रहमाके शरीरसे ४९ भाव उत्पन्न होगे ॥ २३ ॥
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कामरूपी बाणके गिरनेते उन लोगोते दैसती कटाक्षहपी आवरणोंको करती हुं ॥ २४ ॥ स्वभावसेही सुन्दरी उस संध्याने मनसे उत्पन्न उन
भावोको शरीरकी दीपिते बढा दिया ॥ २५ ॥ धर्मसे व्याप्त शरीरवाले भजापतिने भावयुक्तं सन्ध्याको देखकर उम् अभिलाषा की ॥२६॥
फिर मरीच्यादिक ओौर दक्षादिक इन्दियोके बिकारको प्राप्त होगे ॥ २७ ॥ दसमरकार मरीच्यादिकोको मुञ्लको आर सन्ध्याको दख काम्ने
अपने का््यमे विश्वास करिया ॥२८॥ जो कुछ ्हलाजीने भेर कम्म नियत किये भे वह करनेको समथ हुआ हूं ॥ २९॥ इकार मायो ओर
सापि तेवीकष्यमाणाथ कंदर्षशरपातनात् ॥ चके श॒हु्हर्मावान् कटाक्षावरणादिकान् ॥ २९ ॥ निसर्गखद्री संध्या तान्भा
वाच् मानसोद्धवाय् ॥ कर्वत्यतितशं रेजे स्वर्णदीव तनूभिः ॥ २५ ॥ अथ भावुतां संध्यां बीक्ष्याकां भ्रजाप्तिः ॥
_ धर्मामिपूरित तबरभिलाषमदुने ॥ २६ ॥ ततस्ते मुनयस्सर्वे मरीच्यतिष्ठवा अपि ॥ दक्षायाच् द्विजश्रेष्ठ परापुवेकारिकेन्द
यू ॥ २७ ॥ दषा तथाविधा दक्षमरीचिप्रहलाश्च माम् ॥ संध्यां च कमणि निजे श्रदधे मद्नस्तदा ॥२८॥ यदिदं ब्रह्मणा
कमं ममोदिष्ठं मयापि तव ॥ कर्त शक्यमितिद्यद्धा भावितंस्वथुवा तदा ॥२९॥इत्थं पापगति वीक्ष्य ्रातृणां च पितुस्तथा ॥
धरमस्सस्मार शंभुं वै तदा धर्मविनं प्रथुम्॥ ३० ॥ संस्मरन्मनसषा ध्म शंकरं धर्मपालकम् ॥ तुष्टाव विविधेरवाक्येदीनो भूत्वा
जसभवः ॥३१॥ धम उवाच ॥ देवदेव महादेव धर्मपार नमोस्तु ते ॥ सृषटिस्थितिविनाशानां कतां शंभो त्वमेव हि ॥३२॥
सृष्टौ ब्रह्मा स्थितौ विष्णुः प्रलये इरडपधृक् ॥ रजस्सतत्वतमोभिध बिणणेरयुणः भभो ॥ ३३॥
पिताकी पापलुद्धिको देख धम्मन धरम्भ॑मूरिं शिवजीका स्मरण किया ॥ ३० ॥ वह धमं धम्मंकै पाठक शिवजीकै मनसे स्मरण करता हुजा
दीन होकर नाना वाक्यो शिव॒जीकी स्तुति करने खगा ॥३१ ५ धम्मं बोरा, हे देवदेव ! हं महादेव ! हे धर्म्मपाटक ! आपकर नमस्कार है ।
शम्भु ! सृष्टिक स्थिति, ओर विनाशक करनेबाठे आपही है ॥ ३२ ॥ खधकितां कहा, स्थितिकर्ता विष्य ओर भरख्यकत्ता हर है परन्तु
प्रमु 1 आप् सुच्, रज, तम, इन तीनों शुणोसे रहित हो ॥ ३३ ॥
| परे तीनों यणो रहित, निर्गुण विकाररहित नानाभरकारकी ीराओंको करनेवाडे हे शिष ! वह चतुथ साक्षात् आपही ह ॥ ३४
हे महादेव ! इन दुस्तर पापो रक्षा करो यह मेरे पिता ओर भाई पराप बुद्धि है ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजी बौखे इस्त भकार जव ||
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परम प्रभु महादेवजीकी स्तुति धर्मने की तव॒ उक्ती समय धूर्मकी रक्षा करनेके हेतु मेँ ब्रह्मा वरहो गया ॥ ३६ ॥ शम्भुजी स्च बह्लाको
आया देख सुञको ओर दक्षादिकोंको मनम रते हृए ॥ ३७ ॥ वह उन स्वको बारंबार हकर ज्ञ बरह्माको ठज्नित करते हुए बरषभ ||)
निखैगण्यः शिवः साक्षाततर्यश्च प्रकृतेः परः ॥ निगंणो निविकारी त्वं नानालीलाविशारदः ॥३४॥ रक्षरक्ष महादेव पापान्मां
दुस्तरादितः ॥ मत्ितायं तथा चेमे भ्रातरः पापबुद्धयः ॥ ३५ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्तुतो महेशानो ध्मणेव परः प्रभुः ॥
तत्राजगाम शीन्र वै रक्षितुं धमेमात्मभूः ॥ ३६ ॥ जातो वियद्रतश्शंथुविधि दृष्टा तथाविधम् ॥ मां दक्षायां श्च मनसाजदासो
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पजदासच ॥ ३७ ॥ ख साधुवादं तान् सर्वान् विहस्य च पुनः एनः ॥ उवाचेदं सुनिश्रे्ठ रुलयन् ब्रषमध्वजः ॥३८॥ शिव ९
उवाच ॥ अहो ब्रह्म॑स्तव कथ कामभावस्समृद्रतः ॥ दषा च तनयां नैव योग्यं वेदासारिणाम्॥३९॥ यथा माता च भगिनी ८
भ्रातपत्नी तथासुता ॥ एतः कुदृष्टया द्रष्टव्या न कदापि विपश्चिता ॥ ४० ॥ एष वै वेदमागैस्य निश्वयस्त्वन्मुखे स्थितः ॥ ¢
कथं तु काममात्रेण स ते विस्मारितो विषे ॥ ४१ ॥ धेये जागरिते ब्रह्मन्मनस्ते चतुरानन ॥ कथं श्चदरेण कामेन रतु बिगरितं ¢
विधे ॥ ४२ ॥ एकातयोगिनस्तस्मात्सर्वदादित्यदशिनः ॥ कथ दक्षमरीच्याया रोडधषाः च्लीषु मानसाः ॥ ९३ ॥ |
ध्वज बोरे ॥ ३८ ॥ शिवजी बोठे हे बह्मा ! कन्याको देखकर कते आपके कामका भाव भरकर होगया १ जो वेदके मताद्तार योग्य |©
नहीं है ॥ ३९ ॥ जसे माता, भगिनी ओर माकी बली होती है वैसेही कन्याको जानिये, इनको भूकर कुदे न देखना चाहिये |©
| ॥ ४० ॥ इस वेदके मागेका निश्वय आपके मुखमे स्थित है, हे बिधि ! कैप कागमाचहीे आपने उपे भुखा दिया ॥ ४१ ॥ हे चतुरानन ! हे ||
र | बहन्! आपके मनम किस भकार धेयका जागरण न हआ जिसे एक श्वुद् कामसेही रतिकी हच्छाका विधान किया ॥४२॥सदा सू्यका दरीन करने ||
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वं ~ हि क क
। वाड वक मरीच्यादि एकान्त योगियोका चित कैते बभ ठोट्प होगा ॥ ४ ३ ॥ ओर किंस भकार व भद् बुचिवाे र त
।७१॥ ||| रने भगठ्ताति बाणोके दारा हित किया ॥ ४४ ॥ वर्को छोड चपलता जिसका मन दवा है ओर सदा जिहके मनकी । व 1 € =
है उप्तके सत्संगको धिक्कार है ॥ ४५ ॥ बह्याजी बोरे इस प्रकार लोकेश भ श्रीशिवजीका वचन सुन द्विशण ठनाको भ्रा हौ पतीन
¢ म इवगया ॥ ४६ ॥ कामहपिणी उत सध्याको चाहता हुआ भी भ शिवजीकै भयते कामको रोक विकारको छोडता हुजा ॥ ४७ ॥ ह
कथं कामोपि मदात्मा भराबल्यात्सोधुनैव हि ॥ विकृतान्वाणेः कृतवानकालज्ञोदपचेतनः ॥ ४९ ॥धिक्तं थतं सदा तस्य यस्य
कांता मनोहरत् ॥ पर्यादाकृष्य रौल्येषु मनयत्यपि मानसम्॥४५॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति तस्यवचः थत्वा छोके सोदशिवस्यच॥
त्रीडया द्वियुणीभूत स्स्वेदादसत्वभवक्षणात् ॥४६॥ ततो निशृ्धैद्वियकं विकारं चात्यजंघुने ॥ जिधृ्षुरपितद्धीत्या तां संध्यां
कामदपिणीम् ॥ ४७॥ मच्छरीरात्न धर्माभो यत्पपात द्विजोत्तम ॥ अभनिष्वात्ताः पित्तगणा जाताः षितरगणस्ततः ॥ < ॥
भिन्नाजननिभार्सवैफुदराजीव लोचनाः ॥ नितांतयतयः पुण्यास्स॑सारविष्ठलाः प्रे ॥ ४९ ॥ सहस्लाणां चतुःषषिरधिष्वात्ताः
प्रकीतिता ॥ षडशीतिसदस्राणि तथा बर्हिषदो शुने ॥ ५०॥ घर्माभः पतितं भूमौ तदा दक्षशरीरतः ॥ समस्त्णसंपन्ना तस्मा
लाता वरांगना ॥५१॥ तन्वंगी सममध्याच तवुरोमावली शता ॥ पृद्गी चारदशना नवका चनसुभभा ॥५२॥ सर्वावयवरम्या
5 स २ ||§|| च पणैचन््ाननामबुना ॥ नाम्ना रतिरिति स्थाता इनीनामपि मोहिनी ॥ ५२ ॥ ू
=. द्विजोत्तम ! जो भेरे शरीरसे जल गिरा उषसे अशिष्वात्तादि पितृगण उत्पन्न हुए ॥ ४८ ॥ भेवके समान कान्तिवाढे, एल हुए कष् ट
स.सं.२ ||| रके समान आंसदाठे, नित्य यतिभावते रहनेवाडे, शण्यहप, संसारे विल ॥ ४९ ॥ चौद हजार अभिष्वात्ता पितर ८६ हना ||
सः || बरदिषद् पितर दै ॥ ५० ॥ जो दक्चजीके शरीरे जङ गिरा उसमे समस्त णयुक्त एक कन्या उलन्न हृदं ॥ ५१ ॥ इं शरीरवाली ||
2 सद्मकमरवारी, मृदु अगवाटी सुद्र दत ओर सोनेके समान दीपिवाटी ॥ ५२ ॥ सम्पुर्ण अग रमणीय पूर्णचन्दके समान अखवाटी | |
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जज जन 3399392
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समान कान्तिवारी, खनियोंके भी मनको मोहन करने समथ रतिनामवाटी श्ञीको देख ॥ ५३ ॥ निगृहीत इन्द्रिय
परीच्यादिक छहोके मध्य्मेसे वसिष्ठ ओर करतुको छोड ॥ ५४ ॥ दूसरे चारो इरस्त्य ओर आं गिरसका भी वीयं परथ्वीपर गिरपडा उससे
दूसरे पितृगण उत्पन्न हृए ॥ ५५ ॥ सोमपा, आज्यपा, सुकाटी, हविष्मान, कञ्यवाह संज्ञक हुए ।॥५६।। क्रतुके सोमप, वसिष्ठसे घुकाटी)
पठस्त्यसे आज्यपा, अंगिरसे हविष्मान् उत्पन्न हए ॥५७॥ हे विन्द्र ! चारों दिशा्ओने संारकै पितर, कव्यवार ओर अभिष्वात्तादिकोके
उतपन्न होनेप्र ॥ ५८ ॥ धमे कर्मसे प्रायण शम्भुके द्वारा सेदृष्ट॒निदोष सन्ध्या पितरोँके उत्पन्न करनेवारी होकर उनके उदेशसे युक्त
मरीचिप्रषुखाः षड् वै निश्ीतिन्द्रियक्रियाः ॥ ऋते कतुं वसिष्ठं च पुरुस्त्यागिरसौ तथा ॥५७॥ कृत्वादीनां चतुर्णां च बीजं
भूमौ पपात च ॥ तेभ्यः पितगणा जाता अपरे सुनिसत्तम॥५५॥ सोमपा आज्यपा नाम्ना तथेवान्येस्कालिनः॥ हविष्मंतस्ख
तास्सवे कव्यवाहाः परकीतिताः ॥ ५६ ॥ कतोस्तु सोमपाः पुत्रा वसिष्ठात्काछिनस्तथा॥ आज्यपाख्याः पुलस्त्यस्य हविष्भं
तोगिरस्सुताः ॥५७॥ जातेषु तेषु विग्रन्द्र अभिष्वात्तादिकेष्वथ्॥ छोकानां पित्वरगेषु कब्यवाट् स समंततः ॥ «८ ॥ संध्या
पितृप्रसूधूत्वा तददेशयुताऽमवत् ॥ निदोषा शंयुसंदृष्ठा ध्मैकरमपरायणा ॥ ५९ ॥ एतस्मिन्नंतरे शम्भुरवग्चाखिलान्दर
जान् ॥ धम ॒संरक्ष्य विधिवदंतधानं गतो द्रुतम् ॥ ६० ॥ अथ शंकरवाक्येन लजितोहं पितामहः ॥ कंदप्पायाकोपितं हि
भरकटीकुटिलाननः ॥६१॥ दृष्टा सुखमभिप्राय विदित्वा सोपि मन्मथः ॥ स्वबाणान्संनहाराश्चु भीतः षञ्चुपते्ने ॥ ६२ ॥ `
ततः कोपसमायुक्तः पद्मयोनिरदं मुने ॥ अज्वलं चातिवख्वान् दिधक्षुरिव पावकः ॥ ६२ ॥
हो जाती मद ॥ ५९ ॥ फिर॒शंकरजीके वृचनसे ठ्लित पितामह भँ मौह टेढीकर कन्दप॑से कोपित हआ ॥ ६० ॥ इसी बीच
महादेवजी सम्पूणं खनिर्योको अवुगहीतकर ओर पमेकी रक्षामी करके शीघरही अन्तद्धन होगये ॥ ६१ ॥ सस देख अभिभाय जान
महादेवजीे भयभीत कामने शीघही अपने बाण सखीचच्यि ॥ ६२ ॥ अतिबटी कोधित कभठको उत्पत्तिवाखा भ जलती हुदै अश्रिके
परमान जलने ठ्गा ॥ ६३ ॥
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जीकै नेते जल जायगा ॥ ६४ ॥ यती खनियों ओर पितृग्णोकै सामने
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महादेवमे इष्कर कमं करके अकारे मोहित हे कन्दं ! तू शिव २ ॥
मैने कामफो यह शाप दे दिया ॥ ६५ ॥ इस भरकार भयभीत रतिपति धन्वाको छोड बडा कनि शाप सुन प्रकट ईहुजा ॥ ६९
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९ स+ ०९ -4 > 4+ > > + + >२ 4
रेषा कठिन शाप कैते दिया गया ॥६८॥ हे बह्ाजी ! जो कुछ सक्ते आपने कमं बताया वही मैने किया दस्य मञ्ञे शाप देना अनुचित था
मवनेनाभिनिकधः कंदर्पो दरषमोदितः ॥ भविष्यति महादेवे कृत्वा क सुदुष्करम् ॥ ६४ ॥ इति वेधास्त्वहं काममक्षयं
दविज सत्तम ॥समक्ष पितृसंवस्य यनीनां च यतात्मनाम् ॥ ६५ ॥ इति भीतो रतिपतिस्ततक्षणाच्यक्तमागेणः ॥ भरादर्भुव
त्यक्ष शापं शत्वातिदारुणम् ॥ ६६ ॥ ब्रह्माणं मायुवाचेदं सदक्षादिसतं ने ॥ शृण्वतां पितसंघानां संध्याया विगर्वधीः
॥ ६७ ॥ कामउवाच ॥ किमर्थं मवता ब्रह्मज्ञ शपोहमिति दारणम्॥ अनागास्तव रोकेश न्यास्यमार्गाुसारिणः॥ ६८ ॥
त्वया चोक्तं व मत्कर्म यत्तद्रह्मन् कृतं मया ॥ तर योग्यो न शाषों मे यतो नान्यत्ते मया ॥ &९ ॥ अहं विष्णस्तथा
शंभुः सवे तच्छरगोचराः ॥ इति यद्भवता प्रोक्तं तन्मयापि परीक्षितम्॥ ७०॥नापराधो ममाप्य ब्रह्मन् मयि निरागसि ॥ `
दारुणः समयश्ैवशाषो देव जगत्पते ॥ ७१ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति तस्य वचः त्वा ब्रह्माहं जगता प्तिः ॥ प्रत्यवोचं यतात्मानं
मदनं द्मयन्धुहृः॥ ॥ ७२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ आत्मजा मम संध्येयं यस्मादेतत्स कामतः ॥ लक्ष्यीकृतोई भवता ततश्शापो
मयाकृतः ॥ ७३ ॥
॥ ६९ ॥ ब्रहम, विष्ण, शिव येसब तुम्हारे बाणसे पीडित होंगे, यह जो आपने कहा था मने परीक्षा की थी ॥ ७० ॥ हेज गत्तिता बह्लाजी 1
मँ निरपराधी हू मेरा अपराध नहीं है यह शाप ओर यह समय कठिन है ॥७१॥ बहयाजी बो, हे जगत्पति! मेँ बरह्मा इस् भकार उत्तके वचनको सुन
बारम्बार कामको टौटता हभ बोला ॥ ७२ ॥ बह्ाजी बोरे, सन्ध्या इस मेरी कन्याको आपने जो कामे ठक्षित किया इससे तने शाप
ॐ ९ + ९ +
् ॥ ७३ ॥ हे काम ! शान्तकरोध होकर रँ तद्गते कहता ह गतसंदेह हो भयछोड सुखी हो ॥७४॥ महादेबजीके नेूपी अधित | |
कर तुम शीघ शरीर पाओगे ॥ ७५ ॥ जिस समय महादेवजी अनायास विवाहं करेगे तब वही आपको शरीर दगे ॥ ७६ ॥ ब्ह्याजी बोटे
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खनियोके देखते हए लोकपितामह भँ कामसे कहकर अन्तद्धीन होगया ॥७७॥ इस भकार मेरे वचनको सुनकर वे खनि ओर काम ससी हो
शीघरही अपने स्थानको चे गये ॥ ७८ ॥ इति भीशिवमहापुराणे शदररंहिताऽन्तगेत द्वितीये सतीखण्डे भाषाीकायां कामशापाुग्रहो नाम ठ
अधुना शांतरोषोहं त्वां वदामि मनोभव।शृणुष्व गतसंदेदस्स॒खी भव भ्य त्यज ॥७४।।त्वं भस्म भुत्वा मदन भगैरोचनव ||
हिना ॥ तथेवाञ् समं पश्ाच्छरीरं प्रापयिष्यसि ॥७८॥ यदा करिष्यति दरोजसा दारपरि्रदम् ॥ तदा स एव भवतश्शरीरं |¢
भापयिष्यति ॥७६॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवयुक्ताथ मदनमहं लोकपितामहः ॥अंतगेतो उनीनद्राणां मानसानां भपश्यताम् ॥७७॥ ||
इत्येवं मे वच^त्वा मदनस्तेपि मानसाः॥तवभवुस्सुतास्सवं खखिनोऽरं शरदं गताः॥७८॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ||
रुद्रसदितायां दितीये सतीखंडे कामशापायग्रहो नाम ततीयोऽध्यायः॥ ३॥ नारदं उवाच॥ विष्णुशिष्य महाप्राज्ञ विधेरोककर |५
प्रभो ॥ अद्धतेयं कथा परोक्ता शिवलीलामृतान्विता ॥१॥ ततः किमभवत्तात चरितं तद्दाध्चना॥अईं अद्वान्वितः श्रोतुं यदि
शम्भुकथाश्रयम् ॥ २ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ शंभौ गते निजस्थाने वेधस्यतर्हिते मयि ॥ दक्ष प्राहाथ कंदं संस्मरन् मम तद्वचः ||
॥ ३ ॥ ॥ दक्ष उवाच ॥ मदेहजेय कंदे सद्रपगुणसंय॒ता ॥ एनां गृहीष्व भार्यार्थं भवतस्सदशीं गणैः ॥ ४ ॥ ६
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ नारदजी बो, हे विधि ! हे महाभाज्ञ ? हे छोक रचनेवाछे भमु ! हे विष्णशिष्य ! शिवरीखाह्पी अभृतसे युक्तं यह ट
अव कथा आपने कंदी ॥ १ ॥ दे पिता ! उसके परे क्या हुआ ! सौ अव किये शी शाम्धुजीकी कथा सुननेभे भेरी रुचि है ॥ २ ॥ ||
राजी बोटे जव शम्भु निजस्थानको गये ओर भँ ब्रह्मा अन्तद्धीन होगया तव भेरी बातका स्मरणकर दक्ष कन्दप॑से बोठे ॥ ३ ॥ दक्ष बोरे ठ
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|| है काम ! आपके समान णवा देहसे उत्पन्न उत्तम रप ओर युणसे युक्त इपतको भायौक छ ग्रहण कीजिये ॥ ४ ॥
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| वानी ह देहके पसीनिते उत्पन्न च्रीका रति
यह महातेजा ज्ञी सदा आपकी सहचारिणी ओर यथाकाम वावान होगी ॥ ५॥ हाजी बोर, यह कह ५ क 0 ©
नाम रख आगे करके कन्द्पको दे दिया॥॥६।॥ नारद खनियोंका भी मन मोहनेवाखी दक्षसे उत्पन्न उत्तम कन्यका [वाहं करकं ९
च॑चठांगी वह रति उप्त कामहीकी माया हृदं ॥९॥ उसकी दोनों भह देख कामको यह सन्देह हभ कि मानौ नह्ाजीने मेरे धन्वाके क ¢
एषा तव महा तेजास्सर्दा सहचारिणी ॥ भविष्यति यथाकाम धतो वशवतिनी ॥ ५ ॥ बन्नोवाच्॥ इत्युक्ता ददौ तस्म ट
रन्न हभ ॥७॥ फिर मदन उस्र रतिनाम्नी अपने यणकेसदश उत्तम स्लीको देखकर रतिस्ते रंजित हो मोहको पराप्त हु ॥८॥ गौरी मृगदशी ॥
देहस्वेदाबसम्भवाम् ॥ कंदरप्पायाग्रतः कृत्वा नाम कृत्वा रतीति ताम् ॥ & ॥ विवाह्य तां स्मरस्सोपि मुमोदातीव नारद ॥ ||@
दृक्षजां तनयांरम्यां मुनीनामपि मोहिनीम् ॥ ७ ॥ अथ तां वीक्ष्य मदनो रत्याख्यां स्वक्लियं श्भाम् ॥ आत्मा यणेन विद्धोसौ
मरमोह रतिर जितः॥८॥ क्षणग्रदाऽमवत्कांता गौरी श्रगदशी खदा ॥ रोलापांम्यथ तस्यैव भायां च सदशी रतौ र ॥९॥ तस्या
युगलं वीक्ष्य संशयं मदनोकरोत् ॥ उत्सादनं मत्कोदण्डं विधा्ास्यां निवेशितम् ॥ १० ॥ कटाक्षाणामाश्च 1 तस्या
द्विजोत्तम ॥ आञ्ज गन्तं निजाञ्लाणां श्रदधे न च चार्ताम्॥११।तस्याः स्वभावसुरभिधीर्वासानिरं तथा॥आच्राय मदनः ४
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रद्ध त्यक्तवानूमलयांतिके ॥ १२ ॥ पूणेन्दुसदशं वक्र इष्टा रक्ष्मसुलक्षितम् ॥ ८ मदनो भेदं तन्मुखचन्द्रयोः £
॥ १३ ॥ सुवणं पद्मकलिकातुल्यं तस्याः इवद्वयम् ॥ रेजे चचुकधुग्मेन भरमरेणेव वेषठितस् ॥ १४ ॥ ¢
| निवेशित किया है ॥ १० ॥ हे नारद ! उक्षे कटाक्षकी शीघगति ओौर बुन्दरताको देख उसक सन्मुख अपने अन्लोको मन्दगति माना ठ
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॥ ११ ॥ उसका स्वभाव उत्तम वायुके समान मन्द श्वासको सषकर मदनने मर्याचठ्क सरमीपकी श्रद्धा छोडदी ॥ १२ ॥ लक्ष्मीते रक्षित ||>
प्णचन्दरके समान खुलको देख उसके सुख ओर चन्द्रमा मदन कुछ भेद न समञ्जसका ॥१ २ सुव्ेकमककी कटीके समान उसके दोनों ऊच |+
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जिनपर दोनों इच॒क भरमरके समान शोभित थे ॥१४॥ इटभोे ओर उन्नत स्तन नाभिषपर्प्यन्त कटकनेवारी भाराको धारण किये कृशोदरी
| सुन्दरीको देख मोहित हु ॥१५॥ एृष्पायुध कामदेव भौरोकी प॑क्तिरूपी प्रत्यचाको भूर उस्चको छोड इसे देखने ठगे ॥ १६
नाभिरंभ बडा गंभीर था चारों ओरसे मानो चिरा हुभा, खख बडा भ्रष्ठ दोनों नेत्र बंडे कमलके समान रक्तवणे थे ॥१७॥ कामदेकसे श्रमरकी
तरह कांतिवाटी सोनेकी बेदी क्षीण मध्यभागवाटीकै समान वह रति देखी गई ॥ १८ ॥ कदली स्तंभ सदश चिकने मनोहर दोनों जघा्ओंको
हृदपीनोघ्नतं तस्यास्तनमध्य विलंबिनीम् ॥ आनामिप्रतलं मां तन्वीं चन्द्रायितां श्चुभाम् ॥१५॥ ज्यां पुष्पधनुषः कामः
षट्पदावकिसंअमाम् ॥ विसस्मार च यस्मात्तां विशज्यैनां निरीक्षते ॥ १६ ॥ गम्भीरनाभिरंधात्तःपारश्वत्वगावरृतम् ॥
आननान्जेऽक्षणद्रद्मारक्तकफरु यथा ॥१७॥ क्षीणमध्येन वपुषा निसर्गाष्टापदप्रभा ॥ श्क्मवेदीव ददृशे कामेन रमणी हि सा
॥ १८ ॥ रंभास्तभायते स्निग्ध ॒यदृर्युगलं मृदु ॥ निजशक्तिसमं कामो वीक्षांचक्रे मनोहरम् ॥ १९ ॥ आरक्तपाष्णिपादा
भ्ातभाग पदद्वयम् ॥ अलुरागमिवाऽनेन मि्र तस्या मनोभवः ॥ २०॥ तस्याः करयुगे रक्तं नखः कि्चुकोपमेः ॥ वृत्ता
भिरंशरीमिच सुक्ष्माग्राभि्भनोदरम् ।॥२१॥ तद्राहृयुगलंकांतं श्रणाल्युगलायतम् ॥ सदु स्निग्धं चिरं राजत्कातिरोहप्रवा
लवत् ॥२२॥ नीलनीरदसकाशः केशपाशो मनोहरः ॥ चमरीवाल भरवद्विभाति स्म स्मरप्रियः ॥२३॥ एतादृशीं रति ना
म्ना प्राखेयाद्रिसमुद्धवाम्॥ गंगामिव महादेवो जयादोत्फुषटलोचनः ॥ २४॥
अपनी शक्तिके समान कामदेवने देखा ॥१९॥ दोनों पेरोके पाश्वं ओौर अथभागमें रक्तवणेवाली रतिको देख कामदेव प्रेमे उसका मित्र हो
गया ॥२०॥ उस्षके दोनों हाथ टेषके पष्पकै सहश ठार नखों ओर सक्षम अग्रभाग, गोर अंशङियोषे मनोहर थे ॥ २१ ॥ कमल्की नाल्कै
सदश ठम्बे मृदुल भूगोके सदश चिकृण ओर कांतिवाठे दोनों हाय दै ॥२२॥ का मेषके समान चमरीकी तरह धरषराङे मनोहर वाल्वाठी
॥ २३ ॥ जिप्नप्रकार हिमाछयतते उत्पन्न गेगाजीको शिवजीने शरणं किया उसी भकार भसन्न हो कामने रेस्री रतिको ग्रहण किया ॥ २४ ॥
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चक पोते युक्त छु्दर कर जिन कमलो धारण किये ओर ठहरिषोके समान दोनों मौहोकै विध्रमते शोभित ॥ २५ ८ =;
पह्श धारावारी, कमलरपी नेत्रोतते युक्त, सेवाररूपी रोमसे युक्तं मनरूपी वृक्षौ विकास करनेवाटी ॥ रद् ॥ भव ूपना युक्तं ५ प
्वोग सुन्दरी सम्धूणे घुन्दरताकी सदन ठक्ष्मीके समान शोभायमान ॥ २७ ॥ बारह प्रकारक आध ओर् षोडश शगार युत सम्ब
लछोकोंकी मोहन करनेवाी अपनी काति दशोदिशाओंको पूरित करती ॥ २८ ॥ दस भकार रतिको देख कामने ग्रहण किया ( जंते गेगाकौ
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चकरपद्यां चारुबाहं मृणाल्शकलान्विताम् ॥ श्चयुग्मविभमव्राततनूमिपरिराजिताम् ॥ २ ॥ कट क्षिपातठुग।वा स्वीयनेच
त्पलान्विताम् ॥ तबलोमांइशेवालां मनोद्धुमषिलासिनीम् ॥ २६ ॥ निम्ननामिह्वदां क्षामां स्वागरमणीयिकाम् ॥ सवाव
ण्थसदनां शोभमानां रमामिव ॥ २७ ॥ द्वादशाभरणेर्य्तं शृगारैः षोडशरयुताम् ॥ मोहनं सबलोकानां मासर्य॑ती दिशो दश
॥ २८ ॥ इति तां मदनो वीक्ष्य रति जाह सोत्सुकः ॥ रागाद्पस्थितां लक्ष्मीं षीकेशइबोत्तमाम् ॥२९॥ नोवाच च तदा
दक्षं कामो मोदभवात्ततः ॥ विस्मृत्य दारुणं शापं विषिदततं विमोहितः॥ ३० ॥तदा महौत्सवस्तात बभूव सुखवद्धनः ॥ दक्षः
परीततस्थासीन्धुसदे तनया मम ॥ ३१ ॥ कामोतीव सुखं प्राप्य सर्वदुःखक्षय गतः ॥ दक्षजापि रतिः कामं प्राप्य चापि ज
हषे ह ॥ ३२ ॥ रराज चेतयासार्द भिन्नाङ्वचः स्मरः ॥ जीमूत इव संध्यायां सौदामन्या मनोज्ञया ॥ ३३ ॥
महादेवजीने ग्रहण किया था ) प्रेमे आई हई उत्तम ठक्ष्मीको दिष्णके समान घरहण कर ॥२९॥ काम ब्रह्ाके कठिन शापक भूक आरनद्कै मारे
दक्षसे उस समय न बोढा ॥ ३० ॥ हे नारदजी ! उस्र समय सुख बहानेवाखा महोत्सव हज ओर मेरी कन्या -पस्लहुह दक्ष भी बहत भरसन्न
हुये ॥३१॥ काम अत्यन्त सुखी हो दुःखत छूट गया दक्षसे उत्यनन होनेवाढी रति भी कामको पाकर अत्यन्त पसनन हदं ॥ ३२ ॥ संध्या समय
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| बिंजी से युक्तं मेधके समान दक्षकी कन्याके साथ प्रथक् विराजित हुमा ॥ ३२ ॥ कामने रतिक प्रहण किया जेसे योगी ह
ग्रहण करते है रतिभी कामको पाकर अतिप्रसन्न दईं जसे पुणैचन््रके समान मुखवाटी लक्ष्मी विष्एको पाकर प्रसन्न होती है ॥ ३४ ॥ इति 0
४ श्रीभिवघराणे द्वितीये सतीखण्डे भाषाटाकायां कामविवाहवणन नाम॒ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ खतजी बोढे बह्माजीके वचनोंको सुनकर मुनि ठ
¢ रेष्ठ भरसन्चित्त नारदजी शकरका स्मरणकर बोठे ॥ १ ॥ नारदजी बोढे हे महाभाग ! बह्ञाजी हे विष्णशिष्य ! महामति आपने शिव त
| इति रतिपतिश्ब्मोदयुक्तो रति तां पार जगे वै योगदर्शाव विद्याम् ॥ ६ पतिमम्यं भाप्य सा चापि रेजे हरिमिव ||)
| कमला वै पू्णचन्द्रोपमास्या॥३४॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रूदसंहितायां द्विती ° स° कामविषवाहवर्णनं नाम चतु त
ट्
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नारद उवाच ॥ ॥ ब्रह्मन् विपे महाभाग. विष्णुशिष्य महामते ॥ अद्धता कथिता लीला त्वया च शशिमौखिनः ॥ २ ॥ |
गृरीतदारे मदने ष्टे दि स्वगरदं गते ॥ दक्षे च स्वग्रहं याते तथा हि त्वयि कत्तेरि ॥ ३॥ मानसेषु च पुष गतेषु स्वस्वधा ट
मसु ॥ संध्या कुज गता सा च ब्रह्मपुरी पितपरसुः ॥ ॥ किंचकार च केनेव पुरषेण विवाहिता ॥ एतत्सव विशेषेण सध्या ट्
याश्वरितं बद् ॥ 4 ॥ सूत उवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य ब्रह्मपुत्रश्च धीमतः ॥ संस्मृत्य शंकरं सत्तया बरह्मा भरोवाच तत्व
्थोऽध्यायः ॥४॥ सूत उवाच ॥ इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य ब्रह्मणो सनिसत्तमः ॥ स सुदोवाच संस्मृत्य शंकरं प्रीतमानसः ॥१॥ ९
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ट| वित्॥ & ॥ ब्रह्मोवाच ॥ शृणु त्वं च सुने सर्व संध्यायाश्चरितं शुभम् ॥ यच्छुत्वा सर्वकामिन्यस्साध्न्यस्स्युस्सर्वदाघुने ॥७॥ |©
जीकी अद्भुत कथा कही ॥ २ ॥ स्वीक पाकर प्रसन्न कामके ओर् दक्षके तथा आपके घर चरे जनेपर ॥ ३ ॥ ओर मनसे उत्पन्न होने ४
वाठे एत्रोकेभी अपने २ स्थानको चे जानेपर ब्रहती सध्या कां गहं ॥ ४ ॥ उसने क्या किया ओर किसके साथ उसका विवाह ||
{ रुमा यह सब ओरभी सन्ध्याका चरित्र कहिये ॥५॥ खतजी बोटे तच््ञाता बह्याजी इभपकार नारदजीकै वाकर्योको सुन शंकरका स्मरणकर
{ बोढे ॥६॥ ब्रहलाजी बोे हे नारदजी आप सन्ध्याका सम्पूण शुभचरित्र सुनिये जिसके सुनने सर्वदा सम्पूणं ्वियां पतिवता होती है ॥ ७ ॥ ६
रन्त.
सखं.२
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मेरे मनते सन्ध्या पथम उत्पन्न हु वही तपस्याकर शरीरी छोड
करनेवाटी ॥ ९ ॥ सन्ध्यानेभी वसिष्ठको अपना पति स्वीकार किं
उसने तप किया किये ओर कहा -ओौर कित भकार शरीर छोड मेधाुनिकी कन्या ६६ ॥ व ्
कथित बसिष्ठको पति स्वीकार किया ॥ १२ ॥ हे बह्माजी सुनने वाठे मुञ्षसे एः धतीका चरित्र किये ॥ १३ ॥ व्हा
अरुन्धती हृदं ॥ ८ ॥ बरहा विष्ण ओर॒शिवके कचन मा व्रत धारण
या ओर वह पूज्य वंय ओर पतिव्रता हू ॥ १० ॥ नादजी बोठे क्यो
११॥ ओौर किंसपरकार विष्ण रहा शिक्त
द्र अश्न १
सा च संध्या सुता मे हि मनोजाता पुराऽ भवत् ॥ तपस्तत्वा तवं त्यकत्वा सव जातां त्वरधती ॥८॥ मेघातिथेस्सुता भूत्वा
सनिभष्ठस्य धीमती ॥ बरह्मविष्णमहेशानवचना चरितव्रता ॥९॥ वव्रे पतिं महात्मानं वसि रसितम् ॥ पतिव्रता च घख्य्ऽ
दरया पूज्या त्वभीषणा ॥१०॥ नारद उवाच॥ कथं तया तपस्तप्तं किमर्थ कुत संध्यया ॥ कथ शरीरं सा त्यक्ताऽभवन्मेधातिथेः
सुता ॥११॥ कथ वा विहितं देवतरहमविष्णशिवैः पतिम् ॥ वसिष्ठं तु महात्मानं सवत्र शंसितव्रतम् ॥१२॥ एतन्मे श्रोष्यमाणाय
विस्तरेण पितामह ॥ कौतुहलमरंधत्याश्वरितं ब्रूहि तत्त्वतः ॥१३॥ ब्रह्मोवाच ॥ अहं स्वतनयां संध्यां दृष्टा पूमथात्मनः॥ का
मायाश्च मनोऽकारष त्यक्ता शिवभयाच्च सा ॥१४॥ सध्यायाश्चरिति चित्त कृामबाणविरोडितम्॥ ऋषीणामपि सर्द्धमानसानां
महात्मनाम् ॥ १८५॥ भरीस्य वचनं त्वा सोपहासं च मां प्रति ॥ आत्मनश्चछि तत्वं ३ ह्यर्यादमृषीन्प्रति ॥१६॥ कामस्य
तादशं भावं भुनिमोहकर शहुः॥ दृष्टा सध्या स्वयं तत्नोषयमायातिडुःखिता॥ १७ ॥
बोटे भने पथम सन्ध्यानाम्नी अपनी कन्याकोदेल अपने चित्तको शीघ कामकी ओर अका्षित किया, परन्तु शिवके भयसे छोढदियां
॥ १४ ॥ जितेन्दिय माहात्मा ऋषियों ओर सन्ध्याका चित्त भी कामम चायमान होगया ॥ १५ ॥ उपहासयुक्त शिककै
वचनसे कऋषिर्योमे भेरी अभतिष्ठा हुईं ॥ १६ ॥ छनिरयोकै भी मोहन करनेवाे उत कामभावको बारंबार देख सन्ध्या अष्यन्त
दुभ्खी हू ॥ १७ ॥
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| शिवकं कैलास जानेपर मुञ्च बहते कामके शापहोनेषर भँ अन्तद्धौन होगया ॥१८॥ आमर्षयक्तं वह मेरी पत्री संध्या विचारकर ध्यान कर |©
नेम तत्पर ह्ोेगई ॥ १९ ॥ बुद्धिमती सन्ध्या कुछ दर पुवं वृत्तका ध्यानकर यह उस समय यथायोग्य विचार करने ठगी ॥ २० ॥ सध्या बोटी ||
कामे भरित मेरे पिताने युदती उत्पन्न हई मुञ्चको देख मेरी इच्छा क ॥ २१ ॥ मानसमुनि्ोको देखते हए मुञ्चको देखकर उनका चित्त मय्यीदा £
छोड कामस युक्तं होगया ॥ २२॥ ओर दुष्ट कामने भरे चित्तकोभी चाठित कर दिया जिससे मनियोंको देख मेरा चित्त अत्यन्त चायमान ट
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ततस्तु ब्रह्मणा शते मदने च मया मुने ॥ अंतभते मयि शिवे गते चापि निजास्पदे॥१८॥ आमषंवशमापत्रा सा सभ्या खुनिसत्तम॥ ¢
मम पुती विचार्यैवं तदा ध्यानपराऽमवत् ॥१९॥ ध्यायती क्षणमेव पूवं वत्ते मनस्विनी ॥इद्ं विमसृशे सध्यातस्मिन्काले ¢
यथोचितम् ॥२०॥ सध्योवाच ॥ उत्पत्नमात्रां मां दृष्टा युवतीं मदनोरेतः ॥अकाि्सानुरागोयमभिलारष पिता मम ॥२१॥
पश्यतां मानसानां च सनीनां मावितात्मनाम्॥ दैव माममर्यादं सकाममभवन्मनः॥२२॥ममापि मथितं चित्ते मदनेन दुरात्मना
येन दषा सुनीन्सर्वाश्रलितंमन्भनो भृशम् ॥२३॥फर्मेतस्य पापस्य मदनस्स्वयमपतवा्॥ यस्तं शशाप इपितःशंभोरे पिता €
महः॥२७॥ प्राप्लुयां फल्येतस्य पापस्य स्वघकारिणी ॥ तच्छोधनफलमदमाश्चु चेच्छामि साधनम्।॥२९॥ यन्मां पिता आतर ४ |
सकाममपरोक्षतः ॥ दष्टा चङर्स्पहां तस्मान्न मत्तः पापछृत्प्रा॥२६॥ममापि कासभावोभ्रूदमयादं समीक्ष्य तास् ॥ षत्या इव
स्वकेताति सर्वषु सदजेष्वपि॥ र७कारिष्याम्यस्य पापस्य प्रायथित्तमरस्वयम्॥आत्मानमथौ होष्यामि वेदमागासारतः ॥२.८॥
होगया ॥२३॥ इस पापका फल स्वये पाया किं महादेवजीके आगे कुपित पितामहने इते शाप दिया ॥२४॥ पापिन रं मी इस पापका फठ ||
पाऊगी इस पापके नाशका साधन भँ शीघही चाहती ह ॥ २५ ॥ जो पूञको देख पिता ओर भाई कामकी इच्छा करते हुये इससे स्ते कों ह
बी पापिन नहीं है ॥ २६ ॥ उनको देख पिता ओर भादयोम जो अमप्याद मेरा कामे चिन चरा ॥ २७ ॥ इस पापका भायित भर स्वयं
कृरगी वेदमागंके अनु्रार अपने शरीरको जछादंगी ॥ २८ ॥ ¢
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इस संसारम उत्पन्न होतेही मनुष्य जसे कभी न हो एसी म््यादा स्थापित करूगी ॥ २९ ॥ इसीटिये मेँ कठिन तपकर मम्यीदाको स्थापित
करंगी ओर पीछे शरीर छोद्गी ॥ ३० ॥ जिस्न भरे शरीरम पिता ओर भादयोने कामभाव किया वह अच्छे कामका नहीं है॥ ३१ ॥ संध्या
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इसभकार मनमे विचार कर चन्द्रभागानदीवारे बरेष्ठ चन्द्रभाग पर्वतपर गईं ॥ ३२ ॥ ३९ ॥ आर् तपस्याके हेतु संध्याको शरेष्ठ पवतर
गहं जान ब्रह्माजी ॥ ३४ ॥ समीपम मैदे वेद वेदाङ्गके ज्ञाता योगी वशिष्टजीसे बोरे ॥ ३५॥ ब्रह्माजी बोे हे पुत्र ! सर्वज्ञ वशिष्ठ तप
किं त्वेकां स्थापयिष्यामि मर्यादामिह भूतटे॥ उत्पत्रमाज्ा न यथा सकामस्स्युश्शरीरिणः ॥२९॥एतदथमह छृत्वा तपृन्वरम्
दारूणम् ॥ मर्यादां स्थापयिष्यामि प्चात््यक्षामि जीवितम् ॥३ ०; ।यस्मिञ्च्छरीरे पित्रा मे ह्यमिलाषर्स्वयं कृतः॥ भातृभिस्तेन
कायेन किं वित्नास्ति प्रयोजनम्॥३१॥मया येन शरीरेण तातेषु सहजेषु च ॥ उद्वावितः कामभावोन तत्सुकृतस्ाघनम्॥३२॥
इति संचित्य मनसा सध्या शेरवरं ततः ॥जगाम चन्द्रभागाख्यं चन्दरभागापगा यतः ॥२२॥ अथ तन गत्। जञात्वा सन्य
गिखिरं भ्रति ॥ तपसे नियतात्मानं बरह्मावोचमहं सुतम् ॥३४॥ वशिष्टं संयतात्मानं सर्वज्ञं ज्ञानयोगिनम् ॥ समीपे स्वे समा
सीनं वेदवेदाङ्गपारगम् ॥३५॥ बह्नोवाच्॥वसिष्ठ पुत्र गच्छ त्वं सध्यां जातांमनस्विनीम्॥ तपसे धृतकामां च दीक्षस्वेनां यथा
विधि ॥३६॥ भंदाक्षमभवत्तस्याः पुरा द्षैव काञचकान्॥ युष्मान्मां च तथात्मानं सकामां सृनिसत्तम॥ २७॥अ भूतपर्व तत्कम पु
मृत्युं विमृश्य सा ॥ युष्माकमात्मनश्चापि प्राणान्सत्यक्त॒मिच्छति॥ ३८॥ समयदिषु मयादां तपसा स्थापयिष्यति।॥तपः कतुं
गता साध्वी चन्द्रभागाख्यभूधरे॥३९॥न भार्वतपसस्तात साठजानाति कंचन॥ तस्मा्यथोपदेशात्सा प्राभरोतिवघठं तथा कु₹॥४०॥
ट स्के ख्ि जाती हूं मनस्विनी सन्ध्याको तुम जाकर अच्छे प्रकार विधिपूक दीक्षा दो॥ ३६ ॥ हे मुमिगरेष् पिरे हमको
|| स॒ञ्ञको कामुकं देख ओर अपनको सकामा समञ्चकर उर्षके नेत्रोकी चपठता जाती रही ॥ ३७ ॥ आपके दुष्कर्मो तथा अपनी पूर्व
4 || ृत्युको विचार वह अपने पराणोको छोडनेकी इच्छा करती है ॥ ३८ ॥ वह तपके दवारा म््यीदामे भी मस्यीदा स्थापित करेगी ९
तु वह साध्वी तप् करनेको चन्द्रभाग पूवतपर गई है ॥ ३९ ॥ हे तात ! वह तपके किती भाक्को नहीं जानती है, इतये
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| जिसभरकार वह उपदेशसे अपने इष्टको पराप्त हो वैता करो ॥४०॥ हे खनि ! इ अपने हपक छोड दूसरा रूप धर उसके समीप जाकर तपकी क्रियाओँको
॥ दिखाओ ॥४१॥ पहिरेउसने इस मेरे ओर तुम्हारे शटपको देखा दै इसखिये वह कुछ न भप्त करेगी, इससे दृस्रारूप धारण करो, ॥४२॥ बह्माजी बोढठे ठ
¢ हे नारदजी ! इसप्रकार दयावान् वशिष्ट मेरी आज्ञाको पाकर रेसराही होगा यहं कहं सन्ध्याके समीप गवे ॥ ४३ ॥ ओौर वहां जाकर मनके समान ठ
| पूणं देवर ओर उसके समीपम गई हुई सन्ध्या देखा॥४४॥ कमले युक्त उस सरके समीपे ग हुई सन्ध्याको ओर सरको संध्यास॒मयमं उदय
इदं पं परित्यज्य निजं ूपांतरं घुने ॥ परिग््यांतिके तस्यास्तपश्वर्या निद शयन् ॥४१॥ इदं स्वरूपं भवतो दृष्टा पूर्वं यथात्र ट
वाम् ॥ नाप्नुयात्साऽथ किंचिद्र ततो रपांतरं कुर् ॥४२॥ ब्रह्मो च ॥ नारदेत्थं वसिष्ठो मेसमाज्ञपो दयावता॥ यथाऽस्विति ट
च मां परोच्य ययौ सं्यांतिकं शनिः ॥४३॥ त देवसरः प्रण गणमौनससंमितम् ॥द्दशे स वसिष्टोथ सध्यां तत्तीरगामपि |
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॥ ४९ ॥ तीरस्थया तया रेजे तस्सरः कमरोज्ज्वलम् ॥ उद्यदिदुञनक्षं प्रदोषे गगनं यथा ॥ ७५ ॥ सुनिररष्टाथ तां त्र ट
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ह| सुसंभावां स कौतुकी ॥ वीक्षंचक्रे सरस्तत्र बरदछोदितसं्ञकम् ॥ ४६ ॥ चन्द्रभागा नदी तस्मात्पाकारादकषिर्णाधिम् ॥ ट
॑ याती सा चैव दशे तेन साव शिरेभेहत् ॥ ४७ ॥ निभिय प्रथिमं सा तु चन्द्रभागस्य सा नदी ॥ यथा हिमवतो गंगा £
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वशिष्ठ उवाच ॥ किमर्थमागता भद्रे निर्जनं त्वं महीधरम् ॥ कस्य वा तनया किं वा भवस्यापि चिकीर्षितम् ॥ ५० ॥ ह
हये उत्तम नक्षत्र चन्द्रमसे यक्त भाकाशके समान देखा॥ ४५॥ सुनिने वहा स्थितकौतुकयुक्त सन्ध्या तथा रक्त वणक ताखावको देखकर उसे देखनेकी £
इच्छा की ॥४६॥ ओर उप शरेष्ठ पर्वतके दक्षिणे सुरसं जाती हदं चन्द्रभागानदीको देखा ॥४७॥ जिस्षभकार हिमाख्यते भरीगंगाजी सरागरको जाती ठ
तथा गच्छति सागरम् ॥४८॥ तस्मिन् गिरौ चन्द्रभाग बरद्छोहिततीरगाम्॥ संध्यां दृष्टाय पच्छ वसिष्ठस्सादरं तदा ॥४९॥ |©
है उसी भकार यह चन्द्रभागानदी चन्द्रमागपवैतको पथिमसे काटकर ससुदरमै जाती है ॥ ४८ ॥ उष चन्द्रभाग पर्वतम रक्तवणे सरके समीप
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सन्ध्याको देख सत्कारपरवक वशिष्टजीने पुा ॥४९॥ वशिष्ट बोे हे मदे ! इस निजेन पवेतप्र तुम कि्ष्यि आई ! तुम किसकी कन्याहो ओर ¢
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। ह|| तम्हारा यहां कया भयोजन है ॥ ५० ॥ यह मेरे षुननेकौ इच्छा है अगर छिपानेके योग्य नहीं है तौ कही ओर् पृणचन््रमाके पमान १६ |||
॥७७॥ ||| महारा खख मीन क्यों है ॥ ५१ ॥ बह्माजी बोडे ¦ भ्रज्यङिति अश्रिके समान तेजस्वी महात्मा वशिष्ठजीको देख ओर उनकं वचन एन ||
||॥ ५२ ॥ सन्ध्या जयको धारण करनेवाठे बहार तपोधन श्रीशिषठजीको प्रणामकर आदर पूर्वक बोटी ॥ ५३ ॥ संध्या वाटी जिसस्यि ट
् मँ इत प्तप आई हँ वह सत्र मेरे मनोरथ आपके दशन माही र्णं होगे ॥ ५४ ॥ हं बनू ! म सन्ध्यानाघ्नी ब्ह्मजीको सन्या तु ||
४ एतदिच्छाम्यहं श्रोतं वद यद्यं न चेद्भवेत् ॥ वदनं पूर्णचन्द्राभं निश्चेष्टं वा कथं तव ॥५१॥ ब्रह्मोवाच॥ तच्छत्वा कचन वर्य ॥|६ |
| वशिष्ठस्य महात्मनः॥ दष्टा च तं महात्मानं ज्वरंतमिव पावकम् ॥५२॥ शरीरधृगब्ह्मचर्थ विलसतं जटाधरम् ॥ सादरं प्रणिषं॑||&
|| त्याध संध्योवाच तपोधनम् ॥५२३॥ संध्योवाच ॥यद्र्थमागता शेकं सिद्धं तन्मे निबोध ₹्॥तव दशनमत्रेण यन्मे सेत्स्यति ||
वा विभो ॥५४॥तपव्महं ब्ह्नमिजनं रोलमायता॥बह्मणोहं सुता जाता नाम्ना संध्येति विशता॥५५८५॥यदि ते युञ्यते सद्यं ||
|| मां त्वं समुपदैशय् ॥ एतच्चिकीरषितं गद नान्यैः किचन वियते॥५६॥ अज्ञात्वा तपसो भावं तपोवनञुपाचिता ॥चितया परि |
ठ प्यहं वेपते हि मनौ मम्॥९७॥ ्रह्नोवाच॥ आक्यं तस्या वचनं वसिष्ठो ब्रह्मवित्तमः ॥ स्वयं च सर्वकृत्यज्ञो नान्यत्किंचन र
पृष्ठवान् ॥ ५८ ॥ अथ तां नियतात्मानं तपसेतिधृतो्यमाम् ॥ प्रोवाच मनसा स्मृत्वा शंकरं भक्तवत्सलम् ॥ ५९ ॥ $
रत. २ ||) || केके हे इष निर्जनपतप्र आई हूं ॥ ५५ ॥ यदि आपको श्रुगम जान पडे शे उपदेश दीजिये यही मेरा यु कां है भौर कुठ नही |
॥ ५६ ॥ भ तपके भावे अज्ञात इस तपोवनमे आग ह, इसी चितासे ख्खती ह ओर भेरा मन कापिता है ॥ ५७॥ ब्रह्माजी बोटे ||&
बरह्म्ञानी भीवशिष्टजीने उसका वचन सुन फिर उपे कुक नहीं पडा श्योकिं उनको सब ज्ञात था ॥ ५८ ॥ मनम भक्तवत्सट श्रीशकग्जीका ||| `
| स्मरणकर उस नियतासमा तपम उयमको धारण करनेवारी सन्ध्यासे बोडे ॥ ५९ ॥ , ॥
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| बोे ! जो प्रम महान् तेज जौ परम महान् तप ओर जो प्रम, प्रम आराधना करने योग्य है उन श्रीशंभुजीको मनम धारण कंरो
॥ ६० ॥ जो एकही धमे, अथे, काम, मोक्षके आदि कारण ह उन्हीं एकं ज॒गतूके आदि पुरुषोत्तमका भजन करो ॥ ६१ ॥ हे शुभानने !
इस मन्त्रत देवेश शकरका तुम भजन करो इसीपे तम्हारी सम्पूण इच्छायं पुणे होंगी इषम सन्देह नहीं ॥ ६२ ॥ “ ॐ.नमः शंकराय ॐ
अन्तम ओंकार सोजितकर मौन तप प्रारम्भ करो सो भ कहता हूं सुनो ॥ ६३ ॥ प्रथम दोनों षष्ठकारमे पुणजलका आहारकर मौन धारण
कर स्नान ओर हर पूजन करना ॥ ६४ ॥ तीसरे षष्ठ काठमे उपवा करना इसत भकार तपकी समाति होनेपर च्डे कालम क्रिपा होती है
वसिष्ठ उवाच॥परम यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ॥ परमः परमाराध्यः शम्भूर्मनसि धार्यताम् ॥&०॥ षर्माथकाममोक्षाणां
य एकस्त्वादिकारणम्॥ तमेकं जगताप्रायं भजस्व पुरूषोत्तमम् ॥६१॥ मंत्रेणानेन देवेशं शम्भु भज श्युभानने॥तेन ते सकला
वापतिर्भषिष्यति न संशयः ॥६२॥ ॐ नमश्शंकरायेति अधमित्यतेन सन्ततम्॥ मौनतपस्याप्रारम्भ तन्मे निगदतः श्ृणु॥६३॥
स्नानं मौनेन कतंभ्यं मौनेन हरपूजनम् ॥ द्वयोः पूर्णजलाहारं प्रथमं षृष्ठकालयोः ॥ ६४ ॥ तृतीये षष्ठकाले तु ह्युपवासुपरो
भवेत् ॥ एवं तपस्समाप्तौ वा षष्ठे कारे क्रिया भवेत् ॥ ६५ ॥ एवं मौनतपस्याख्या ब्रह्मचय॑फलपरदा ॥ स्वाभीष्टप्रदा देवि
स्यंसत्यं न संशयः ॥ ६६ ॥ एषं चित्ते समुदिश्य कामं चितय शंकरम्॥ स ते प्रसन्न इष्टाथैमचिरादेव दास्यति॥ 8७ ॥
ब्रह्मोवाच ॥ उपविश्य वसिष्ठोथ सध्याये तपसः क्रियाम् ॥ तामाभाष्य यथान्यायं तपरेवांतईैषे शनिः ॥ &८ ॥ इति भीशि
वमहापुराणे द्वितीयायां शदरसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे संध्याचरिखवर्णनो नास पंचमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
॥ ६५॥ हे देवि ! इतसभरकारकी मौन तपस्या सम्पूणं फलक देनेवाठी ओर त्र्य फलक देनेवाटी सत्य है इमे सन्देह नहीं ॥ ६६ ॥ इ
प्रकारका उदेश्य चिन्त धारण कर शंकरजीकी चितना करो वह तुमसे भसन होकर शीघही तुम्हारे मनोरथको पणे करेगे ॥ ६७ ॥ ब्रह्माजी
बोटे, वसिष्ठजी वहां बेठकर सन्ध्याको तपस्याकी सम्पृणं क्रिया बताकर अंतधौन होगये ॥ ६८ ॥ इति श्रीशिवमहाषराणे द्वितीमे सतीसण्डे
रद्रसंहिता भाषारीकायां सन्ध्याचरितिवर्णनो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५॥
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बहाजी बोरे हे बद्धान् ! हे एकर ! बडाभारी संध्याका तप सुनो जिसके सुननेसे पापका समूह निश्चय ही नष्ट हो जाता है ॥१॥ तपकी ||
क्रिया सुन ओर वसिष्ठजीकै घर जानेषर संध्याभी तपका प्रभाव जान् भतन हुई ॥ २ ॥ बहोहितको समीप गहं हृदं स्याने भ्न चित्त हौ ह
ठ उसी भकारका वैशकर तपकरना प्रारम्भ किया ॥ ३ ॥ वसिष्ठजीने जेता तप साधनम मन्त्र कहा था उही मन्तरसे भक्तिपूवेकं शंकरजीका पूजन
किया ॥ ४ ॥ एकान्त चित्तवाटी बडाभारी तप करती हृदं शभुम चित्त गाये उस सन्ध्याको एक चतुयुंग बीत गया ॥ ५॥ उस तपसे सत
|| ॥ ब्रह्मोवाच ॥ सुतवयं महाप्राज्ञशृणु संध्यातपो महत्॥यच्छरत्वा नश्यते पापसबरहस्ततक्षणाद्धुवम् ॥१॥ उपविश्य तपोभाव
वसिष्ठ स्वग्रहं गते ॥ संध्यापि तपसो भवं ज्ञात्वा मोदमवापं ह ॥ २ ॥ ततस्सानेदमनसो वेषं कृत्वा तु यादृशम् ॥ तपश्च
| समरिभे ब्रहोदिततीरगा ॥३॥ यथोक्तं त॒ वशिष्ठेन मेघं तपसि साधनम् ॥ मंतरेण तेन सद्भत्तया पूजयामास शक्रम्॥६॥
६ एकान्तमनसस्तस्याः डर्वत्याः सुमहत्तपः ॥ शंभौ विन्यस्तचित्ताया गतमेकं चतुर्थुगम् ॥८५॥ प्रसन्नोभूत्तदा शंभुस्तपसा तेन
# तोषितः ॥ अंतबंहिस्तथाकाशे दशीयित्वा निजञ वषुः ॥६॥ यद्रूपं चितयंती सा तेन प्रत्यक्षतां गतः ॥७॥ अथ सापुरतो दक्षा
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मनसा चितितं प्रथुम् ॥ प्रसन्नवदनं शातं अुमोदातीव शंकरम्॥८॥ससाध्वसम्ह वक्ष्ये किं कथ स्तौमि वा हरम् ॥ इति चिता
परा भूत्वा न्यमीलयत चक्षुषी ॥९॥ निभीरिताक्षयास्तस्यास्तु परविश्य हदयं हरः ॥ दिन्यं ज्ञानं ददौ तस्ये वाचं दिव्ये च
चक्षुषी ॥ १० ॥ दिष्यज्ञानं दिभ्यचक्ुदिंवयां वाचमवाप सा ॥ प्रत्यक्षं वीक्ष्य दु्गशं तुष्टाव जगतां पतिम् ॥ ११ ॥
महादेवजी भसन हए; बाहर भीतर ओर भाकाशमे अपना शरीर दिलाकर ॥ ६ ॥ जि रूपका वह ध्यान कर रही थी उसी हसे भ्रगट हो
गये ॥ ७ ॥ मनते चितित भ्रष्नश्ल् शां शकरजीको आगे देख सन्ध्या बडी भन्न हृदं ॥ ८ ॥ मँ कया कहूं ओर कैत शिवजीकी स्तुति
क, इस्त चितामे मघरहो सन्ध्याने आंखे मूदी ॥ ९ ॥ निमीठितचक्षु उस्कै हदयर्मे शकरजी प्रवेशकर दिव्यज्ञान दिञ्यवाणी दिव्य ओंखिं
देते हृए ॥ १० ॥ यह सव भप्त होनेसे जगत्पति पावतीको सामने देख स्तुति करने ठगी ॥ ११ ॥
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| बरोटी निराकार ज्ञाने परेन स्थूढ न उच अतएद आपका हप योगियोति चिन््य है, एते लोकौ माप छिये नमस्कार है ॥१२॥
, शात निरमड निविकार ज्ञानसे अगम्य अपने भरकाशमे विकार रहित परत्रह् मार्गै ज्ञाता ध्वात माग॑से परे रूपवाठे सत्न चित्त आपको नमस्कार
करती हू ॥ १३ ॥ एक शुद्ध भरकाशमान अज चिदानन्द सहज विकाररहित नित्यानन्द सत्यैश्व्यसे भन्न रूपवाडे आपके निमित्त नमस्कार
है ॥ १४ ॥ मेत्रहप वियसे पराप्त अभिन्न सत्यस्वरूप ध्यानकै योग्य आत्मस्वरूपसार पवित्रके भी पवित्ररूपवारे आपको प्रणाम है ॥ १५ ॥
॥ संघ्योवाच ॥ निराकारं ज्ञानगम्यं परं यत्रैव स्थूलं नापि सृष्षमे न चोन्चम् ॥ अंतचित्यं योगिभिस्तस्य ख्पं तस्मे तुभ्य
लोककवरै नमोस्तु ॥ १२ ॥ सर्व शातं निभकं निविकारं ज्ञानगम्यं स्वभरकाशेऽविकारम् ॥ खाध्वभख्य् ध्वांतमार्गात्परस्तद्रूषं
4 यस्य त्वा नमामि प्रसन्नम् ॥ १३ ॥ एकं शं दीप्यमाने तथाजं चिदानेदं सदजं चाविकारि ॥ नित्यानंद सत्यभूतिभसत्र
| यस्य शरीदङपमस्मे नमस्ते ॥ १४ ॥ विदयाकरोद्ावनीयं मभि स्वच्छ ध्येयमात्मस्वूपम् ॥ सारं पारं पावनानां प
विघ्े तस्मे रपं यस्य चैवे नमस्ते ॥ १५ ॥ यत््वाकारं शुद्धरूपं मनोज्ञ रत्नाकलपं स्वच्छकपरूरगौरम् ॥ इष्टाभीती शूरश्रंड
ए दधाने दस्तैनैमो योगयुक्ताय तुभ्यम् ॥ १६ ॥ गगनं भूदिंशश्चेष सिकं ज्योतिरेव च ॥ पुनः कारुश्च हूपाणि यस्य तुभ्य
|| नोस्तु ते ॥ १७॥ प्रधानपुरुषौ यस्य॒ कायत्वेन विनिगैतौ ॥ तस्मादव्यक्तपाय शंकराय नमोनमः ॥ १८ ॥ यो ब्रह्मा
कुर्ते सृष्टि यो विष्णुः कुरूते स्थितिम् ॥ संहरिष्यति यो शुदरस्तस्मै तुभ्यं नमोनमः ॥ १९ ॥
जो आकार शुदधरप है मनोज्ञ रत्नवत् शरीरकी काति है स्वच्छ कपूरके सदश गौर, सेवकको अभपदेनेवाठे, हार्थो शूर ओर सडको धारण
करनेवाछे, योगयुक्त आपके छ्य नमस्कार है ॥ १६ ॥ आकाश, पर्वी, दिद, जल, ज्योति, समय॒रूपवाछे आपके डिये नमस्कार हि
॥ १७॥ जिसके शरीरस ऋा ओर विष्ण उत्पन्न हूए एसे अव्यक्त आपकै छिथ नमस्कार है ॥ १८ ॥ जो ब्रह्माजी सृष्टि करते हे ओर
विष्ण पाठते है, रुद्र सहार करते ह एसे हपत्रययुक्त आपकै छ्ि नयस्कार् है ॥ १९ ॥
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शि. | कारणक कारण दिव्यज्ञान एश्वधके दाता संस्ारको रेशर्य॒देनेवाठे भ्रकाशरूप परे परे शंकरके छिये नमस्कार है॥ २० । # 1.
॥७९॥ ||ह १ पृथ्वी दिशाये सयं चन्द्रमा काम् ओर नाभि वर्स ५ आकाश उत्पन्न हए पते आपके टिप नमस्कार द है ॥ ६ ¢
¢ शंकरजी आप प्र ह, परमात्मा है नाना भ्रकारकी पिया आपकी है, सद्रहन ओर परवह _आप्ही ह ओर विचार चतुर् आपही हं ॥ २२ ॥
¢ जित्तका न आदि हैन अंत हैन मध्यहै वाणी ओर मनते परे देव शिवजीकी स्तुति कैसे कर ॥ २३ ॥ जिपतके हपको बह्ादिक
नमोनमः कारणकारणाय दिव्यामृतज्ञानविभरूतिदाय ॥ समस्तलोकांतरभरूतिदाय प्रकाशङूपाय परात्पराय ॥ २० ॥ यस्याऽ
। परं नो जगदुच्यते पदात् क्षितिदिंशस्सूरयं इदुम॑नोजः ॥ बरुला नामितश्वान्तरिक्ं तस्मे तभ्य शंभवे मे नमोस्तु ॥ २१ ॥
४ त्वं परः परमात्मा च त्वं विद्या विविधा हरः ॥ सद्म च परं ब्रह्म विचारणपरायणः ॥२२॥ यस्य नादिनं मध्यं च नांतम
ट| स्ति जगतः ॥ कथ स्तोष्यामि तं देवं वाङ्मनोगोचरं हरम् ॥ ॥ २३ ॥ यस्य ब्रह्मादयो देव भुनयश्च तपोधनाः ॥ न वि
&| प्रण्वति पाणि वर्णनीयः कथं स मे॥ २४॥ किया मया ते कि ज्ञेया निर्ुणस्य गुणाः प्रभो ॥ नैव जानंति यद्रूषं सेन्द्रा
4 अपि सुरासुराः ॥ २५ ॥ नमस्तुभ्य महेशान नमस्तुभ्य तमोमय ॥ प्रसीद शंभो देवेश भ्रूयोभ्रयो नमोस्तु ते ॥ २६ ॥ ब्रह्मो
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वाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्यास्संस्तुतः परमेश्वरः ॥ सुप्रसन्रतरथभुच्छंकरो भक्तवत्सलः ॥ २७ ॥ अथ तस्याश्शरीरं त॒
वल्कलाजिनसंयुतम् ॥ परिच्छन्नं जटाव्रातेः पिते मूर्धि राजितैः ॥ २८ ॥
देवता तपरूप धनवाठे सनि नहीं जान सकते उन्हे भ कैसे कह सकती हं ॥ २४ ॥ जिस आप्कं हपको इन्द्रादिकं देवता ओर दैत्य
नहीं जानते ह उतत नि॑ण आपके युणको क्या्भे बली होकर जान स्षकती हं अर्थाव् कदापि नही ॥ २५ ॥ हे महेशान
आपके खयि नमस्कार है हे देवेश ! प्रसन्न होवो आपके स्यि बारम्बार नमस्कार है ॥ २६ ॥ ब्रह्माजी बोठे भक्तवत्सल परमेश्वर
शकरजी उसके स्तुति किये हुए वचनोंको सुन अत्यन्त भर्षन्न हए ॥ २७ ॥ पवित्र॒ शिरमें देदीप्यमान जटसमहोतत युक्त वल्कल |
रु०स.२
स.खं.२
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ओर भृगचरभे धारण किये शिरके ऊपर कुश पवित्र विराजमान थे ॥ २८ ॥ कमलके ऊपर जैसे तुषार पडी हो इसभकारसे उसका |
परज्ञा रहाथा इसप्रकार उसको देख कपाकर भक्तवत्सल शंकरने उससे कहा ॥२९॥ शिवजी बोटे हे भद्रे मेँ तेरे परम तपसे प्रसनहं । हे शभे!
तेरे स्तोमेभी भसनहं जो तेरे मनम आवे सो बर मागो ॥ ३० ॥ जिसमे दुमहारा कां हो जो तैरे मनम हो हे मदे बही करंगा । हे भदे
तेरे बतते प्रे भसन ।। २१ ॥ नहयाजी बोखे जव शकरके यह वचन सुने तब सन्ध्या बडी रतन हो वारंवार भणाम कर कहने ठगी ॥ ३२ ॥
दिमानीतजितांभोजसदशं वदने तदा ॥ निरीक्ष्य कृषयाविष्ठो हरः प्रोवाच तामिदम् ॥ २९ ॥ महेश्वर उवाच ॥ प्रीतोस्मि तप
सा भद्र भवत्याः परमेण वै ॥ स्तवेन च डभराज्ञे वरं वरय सांप्रतम् ॥ २० ॥ येन ते वियते कार्थ वरेणास्मिन्मनोगतम् ॥ तत्क
रिष्ये च भद्रं त प्रसप्नोदं तव तरतेः ॥ ३१ ॥ व्रह्नोषाच ॥ इति शर्वा महेशस्य प्रसत्नमनसस्तदा ॥ सध्योवाच सुप्रसन्ना प्रण
म्य च शुहुधहुः ॥ ३२॥ संध्योवाच ॥ ॥ यदि देयो वरः प्रीत्या वरयोग्यास्म्यहं यदि ॥ यदि शद्धास्म्यहं जातातस्मात्पापा
न्मदैश्वर ॥ ३३ ॥ यदि देव प्रसन्नोऽसि तपसा मम सांप्रतम् ॥ व्रतस्तदायं प्रथमो वरो मम निधीयताम् ॥३४॥ उत्पन्नतमाजा
देवेश पाणिनोप्मतरमः स्थले ॥ न भवतु समेनैव सकामास्संमव् वै ॥ २९ ॥ यदि वत्त हि लोकेषु ष्वपि भ्थिता यथा ॥
भविष्यामि तथा नान्या वर एको ब्ेतो मया ॥ ३६ ॥ सकामा मम श्रष्टिस्तु ऊुचिन्र पतिष्यति ॥ यो मे पतिभवेन्नाथ
सोपि मेऽतिसुदच वे ॥ ३७ ॥ ्
पन्ध्या बोटी यदि तुम प्रमे वरदेते हो यदिमे वरके योग्य हहे महेश्वर ! यदि मेँ उस पापे शुद्ध ह ।। ३३ ॥ हे देवं ! यदि आप मेरी
तपस्यते भन्न हौ तो पठे भप सञ्च को यही बर दीजिये ॥ २४ ॥ है देवेश ! इत संपनरमे भाणीजनोकि उत्पन्नमात्र से कोई तुरतही कामी
नहो ॥ ३५॥ यदि मँ तीनोकमे विषयात ओर वतवाठी ह तो भै जेसी हं दूसरी न॒हो यह वर मुञ्चको दीजिये ॥। ३९६ ॥ भेरी घि
सकामा कहीं नहो हे नाथ ! मेरा जो पतिहो बहमी मित्रके समान हौ महाकामी न हो ।। २७॥
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शि०ड= ||| जो ऽर्ष पतिके पिवाय अभिलाषे देसे उसका परुषाथे नाश हो जाय ही => देवि सन्ध्या ! चुनो
॥ शकर इसभकार उसके वचन सुनकर बोरे ओर प्रशन्नतासे कहा कषम कोई पाप नहीं है ॥ ३९ ॥ शिवजी बोेहं दे सन्ध्या ने ६
॥॥< ¢ र {है ॥ ४० ॥ हे मे! जोजोरतैने ्मागासोसो सव नेत
तुम्हारा पराप सन शात होगया है मेरा कोध तुञ्षपर नहीं तू शध हौ गई न
दिया । ह रन्धया ! तरे तप भौर वसते भ॑ भसन ॥ ४१ ॥ पहा शशवमाव दूरा कृमारमाव तीरा य धन ओर चौथा वाद्धक्य
यो द्रक्ष्यति सकामो मां पुरुषस्तस्य पौर्षम् ॥ नाशं गमिष्यति तदा सच द्कीनो भविष्यति ॥३८॥ ब्रह्मोवाच। ।इतिशत्वा त
स्तस्यश्शंकरो भक्तवत्सलः॥उवाच सुप्रसन्नात्मा निष्पापायास्तयेरिते ॥३९॥ महेश्वर उवाच्॥ णु देवि च संध्ये त्वं त्वत्पापं
भस्मतां गतम्॥त्वयि त्यक्तो मया क्रोधः शुद्धा जाता तपःकरात् ॥४०॥ यद्यद्वृत त्वया भद ठत तदखिरंमया।॥ सुप्रसन्नेन तपसा
वह न$सक होजाय ॥ ३८ ॥ व्रह्ाजी बौर भक्तवास ||
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तव संध्ये वरेण दि ॥४१॥ रयम शेशवो भावः कौमाराख्यो द्वितीयकः ॥ तृतीयो यौवनो भावश्तुरथो वादकरुतथा ।॥४२॥
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||| हती तथ संपाते वथोभागे शरीरिणः॥सकामाससयद्वितीयांतो मविष्यति कचित् कचित् ।॥४३॥ तपसा तव मर्यादा जगति
४ स्थापिता मया ॥ उत्पत्नमात्रा न यथा सकामास्श्युश्शरीरिणः॥७९।त्वं च रोके सतीभावं तादशं समवाप्नुहि ॥ िषु लोकेषु
|| नान्यस्या यादशं संभविष्यति ॥ ४५ ॥ यः पश्यति सकामस्त्वां पाणिन्राहमृते तवं ॥ स सद्यः कोबतां प्राप्य दुबेलत्वं
४ गमिष्यति ॥ ४६ ॥ पतिस्तव महाभागस्तपोहपसमन्वितः ॥ सप्तकल्पांतजीवी च भविष्यति सह त्वया ॥ ७ ॥
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र होगा ॥ ४२ ॥ जब शरीरधारी तीक्षरी अवस्था जवानीको प्राप्त होंगे तब वे सकाम होंगे ओर कोई कोद दृस्षरी अवस्थाके अन्तमे सकाम
-स.२ होगे ॥ ४३ ॥ तेरे तपे ओने जगतमे मयादा स्थापित की कि, कोद भी शरीरधारी उत्पनलमाक्से सकाम न होगे ॥ ४४ ॥
० ओर तु इस ोकरमे रेते सती भावको प्राप्त होगी कि तीनरोकमे तेरे समान कोह न होगा ॥ ४५ ॥ पाणिबरहणवाठे पतिको छोड
जो को को सकाम देखेगा वह त्कार हवीवताको भाप हो दुरबङ होजायगा ॥ ४६ ॥ हे महाभागे तेरा पति महातपस्वी होगा ओर तेर॥
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| स्ातकल्प पर्यन्त जीवित रहेगा ॥ ४७ ॥ इसभरकार तेने अङ्गम जो
॥४८॥ तेरा अश्म शुरीर त्यागना पहकेेही निधित है, उसका उपाय
द्ादशव्षकी यज्ञम बढी प्रबरुतासे जती हृदं अभिमे तुम शीघही पवेश क
तिथि ऋषि यज्ञ करते है ५१ वहां तुम स्वच्छन्द जाकर सुनि्योसे
इति ते ये वरा मत्तः प्राथितास्ते कृता मया ॥ अन्यच्च ते वदिष्यामि पूर्वजन्मनि संस्थितम् ॥ ४८ ॥ अभ्रौ शरीरत्यागरो
पूर्वमेव प्रतिश्चतः ॥ तदुपायं वदामि त्वां तत्ुरुष्व् न् संशयः ॥७९॥ स च मेधातिथिर्थजञे ने द्वादशवार्षिके ॥ कत्परज्व
रित वह्वावचिरात् क्रियतां त्वया ॥ ५० ॥ एतच्छैलोपत्यकायां चद्रभागानदीतटे ॥ मेधातिथिमंहायज्ञं डरूते तापसाभमे
॥ ५१ ॥ तज गत्वा स्वयं छदं खनिभित्नोपरक्षिता ॥ मत्प्रसादादरह्विजाता तस्य पुत्री भविष्यसि ॥ ५२ ॥ यस्ते वरो वा
ज्छनीयः स्वामी मनसि कश्चन ॥ तं निधाय निजस्वाति त्यज वह वपुः स्वकम् ॥ ५३॥ यदा त्वं दारुणं संध्ये तपश्चरसि
पवते ॥ यावच्चतुययगं तस्य व्यतीते तु कृते युगे ॥५७॥ भेतायाः त भागे जाता दक्षस्य कन्यका ॥ वाक्पाश्शीलसमापत्ना
यथा योग्यं विबादिताः ॥ ५९ ॥ तन्मध्ये स॒ ददौ कन्या विधवे सप्तविंशतिः ॥ चन्द्रीऽन्यास्संपरित्यज्य रोहिण्यां भ्रीतिमान
भूत्॥ ५६ ॥ तद्धेतो हि यदा चन्दरश्शुप्ो दक्षेण कोपिना ॥ तदा भवत्या निकटे सवं देवास्समागताः ॥ ५७ ॥ न दष्टा
त्वया संध्ये ते देवा ब्रह्मणा सूह ॥ मयि विन्यस्त मनसा खं च दष्क रभेत्पुनः ॥ ५८ ॥
जी स्वामी बरे तुमे मांगना हो उसे स्मरण कर अभम शरीर छोडना ॥ ५३ ॥ चारयुग ्षतयुग उयतीत होनेपर जब तुम परवतोभे घोर् तप्
करोगी ॥*५४।। तव तताके प्रथमभागमे दक्षके कन्यारूपसे उत्पन्न होगी ओर यथायोग्य विवाही जावोगी ॥५५॥ उने दक्ष सत्ाइस कन्था
चन्द्रमाको दंगे शशि सबको छोड रोहिणीसे प्रसन्न होगे ॥५६॥ तव कुपित हो दक्षजी चन्द्रभाको शाप देगे ओर सब देवता तुम्हारी शरण आवेगे
॥ ५७ ॥ हे सन्धया ! तुमने उन देवताओंको ब्रह्लाके साथ नहीं देखा स॒कषको सनमे धारणकर आकाशको देख फिर प्राप्त करोभी ॥ ५८ ॥
ब्र गि सोने तञ्च दिये ओर भी पुवेजन्मकी बात तुञचसे कहता हू
मँ तक्षत कहता हं निश्वय उसको करो ॥ ४९ ॥ उन् मेधातिथिकी
ते ॥५०॥ पर्वतभेणियोमे चन्द्रभागा नदीके तीर तपोभूमिमे मेधा-
दृष्टिगोचर न होती हदं अभिमे परविषशटहो मेषातिथिकी पत्री होगी ॥ 4२ ॥
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चन्द्रभाके शापक मोक्षकेटिये बह्माजी वहीं चन्द्रभागानदी उत्न्न करगे, ओर वहीं मेधातिथि ऋषि प्राप्त होंगे ॥ ५९ ॥ तपम उनके समान
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॥८१॥ कोई है न होगा, उन्होने ज्योतिष्टोम यज्ञ पभरारम्भ किंयाहै ॥ ६० ॥ तुम वहां जा जरती हद अमे अपने शरीरकौ | छोडो तुम्हारी || +|
यं सिद्ध करो । यह कह देवेश अन्तर्धान
¢ भतिज्ञा पूरी होगी ॥६१॥ यह स्थान भने अपने लि सोचा था प्रतु तुम जाओ ओर अपना काये सिद्ध करं
¢ होगये ॥६२॥ इति भ्रीशिवमहाएणाणे द्वितीयायां शरसहितायां द्ितीये सतीखण्डे भाषाटीकायां सन्ध्याचारेत्र वणनो नाम बष्टोऽध्यायः ॥ & ॥
त चद्रस्य शापमोक्षार्थं जाता चंदनदी तदा ॥ चष्ट धात्रा तदेवात्र मेधातिधिक्पस्थितः ॥ ५९ ॥ तपसा सत्समो नास्ति न
| भूतो न भविष्य॒ति॥येन यज्ञस्समारन्धो ज्योतिष्टोमो महाविधिः॥8०॥ तत प्रज्वलितो वह्विस्तस्मिन्त्यज वपुःस्वकम्॥सुपविघात्व
मिदानीं संपर्णोस्ति षणस्तव ॥8&१॥ एतन्मयास्थापितन्ते कार्यार्थं भो तपस्विनि ॥ तत्कुरूष्व महाभागे याहि यज्ञे मदामुनेः॥
¢ तस्या हितं च देवेशस्ततरवांतरधीयत॥६&२॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसदहितायां द्वितीये सतीखंड संध्याचरिघवर्णनं
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नामषष्ठोऽध्यायः ॥8॥ ब्रह्मोवाच॥ वरं दत्वा शुने तस्मिन् शंभार्वतर्दिते तदा॥संध्याप्यगच्छत्त्रैव यञ मेधातिथिश्ंनिः॥१॥
तत्र शंभोःप्रसादेन न केनाप्युपलक्षिता ॥ सस्मार वणिनं तं वे स्वोपदेशकरं तपः ॥ २॥ वसिष्ठेन पुरा सा तु वर्णीभरत्वा महा
सुने ॥ उपदिष्टा तपश्तुं वचनात्परमेष्ठिनः ॥ ३॥ तमेव कृत्वा मनसा तपशर्योपदेशकम् ॥ पतित्वेन तदा संध्या ब्राह्मणं अह्न
चारिणम् ॥ ॥ समिद्धनौ महायज्ञे ्ुनिभिर्नोषरक्षिता ॥ दा शंुप्रसदेन सा विवेश विधेः सता ॥ ^ ॥
बह्लाजी बोठे इसप्रकार वर देकर शम्भुजीकै अन्तान होजानेके पीछे संध्या मेधातिथि नामक निके समीप गई ॥ १ ॥ ओर मृहादेवजीके ||
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पल. || || भसादसे उसे किसीने न देखा । उस समय स्याने अपने तपोपदेश कर्तीका स्मरण किया ॥ २ ॥ हे छनि । पूव बरह्ाजीकी आज्ञाते वसिष्- ||
अ० ७ जीने तपके टियि इसे उपदेश किया था ॥ ३ ॥ उस तपश्वयाके उपदेश करनेवारे बहमचारी नाह्मणको मनम धारणकर स्या गिरी ॥ ¢ ॥ |
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उस महायज्ञकै विषे होम कौ हुई अभिम गिरते हुए किसी खनिने न देखा, महादेवजीके भ्रसादसे वह बरह्ाकी कन्या उत्तम भेशकर गई ॥ ५ ॥
उत्का परोडाश हव्यके समान शरीर तत्काल भस्म होगया, ओर उस्तके अलक्षित शरीरसे हव्यके समान गंध निकली ॥६॥ किर शम्भुजीकी
आज्ञासे अभिने उसके शरीरको भस्म करके शुद्ध शरीर छेकर सु्मंउलमे प्रवेश किया ॥ ७ ॥ सयंने अपने रथम उसके शरीरका विभाग कर
देवता ओर पितसोकी ्रसन्नताके छ्यि उसे स्थापित किया ॥ < ॥ हे मुनीश्वर ! उप्तकै शरीरवाा ऊपरका भाग रात्रि ओौर दिनके मध्यमे |
हानेवाडी भरातसन्ध्या होगई ॥९॥ ओर शेष भाग पितरोंको प्रसन. करनेवाटी दिनके अंतमे होनेवारी सरायंसन्ध्या होगदं ॥१०॥ सर्योदयसे
तस्याः पुरोडाशमथ शरीरं तर्क्षणात्ततः ॥ दग्धं पुरोडाशगंध तस्तार यदलक्ितम् ॥६॥ वहिस्तस्याः शरीरं त दग्ध्वा स्य
स्य मेडलम् ॥ शद्ध प्रवेशयामास शंभोरेवाज्ञया पुनः ॥७॥ सूरयो म्यर्थं विभज्याथ तच्छरीरं तदारथे ॥ स्वकेशं स्थापयामास
प्रीतये पितेदेवयोः ॥८॥ तदृद्वभागस्तस्यास्तु शरीरस्य घुनीश्वर ॥ प्रातस्सध्याभवत्सा त॒ अहोरा्ादिमध्यगा ॥९॥ तच्छेष
भाग स्तस्यास्तुअहोराजांतमध्यगा ॥ सा सायमभवत्संध्या पितरप्रीतिप्रदा सदा ॥ १० ॥ सूर्योदयात प्रथम यदा स्यादरूणो
दयः ॥ प्रातस्सध्या तदोदेति देवानां प्रीतिकारिणी ॥ ११॥ अस्तं गते ततः शय्य शोणपद्मनिभे सदा ॥ उदेति सायंसंध्या
पि पितृणां मोदुकारिणी ॥ १२ ॥ तस्याः प्राणास्तु मनसा शंथुनाथ दयाछना ॥ दिव्येन तु शरीरेण चक्रिरे हि शरीरिणः
॥ १३ ॥ सुनेयज्ञावसाने तु संप्राप्ते खुनिना तु सा ॥ प्राता पुरी वदहिमध्ये तत्तकांचनसुप्रभा ॥ १४ ॥ तां जथाह तदा पुरीं
मुनिरामोदसंयुतः ॥ यज्ञा तान्तुसंन्नाप्य निजकरोडे दधौ शुने ॥ १५ ॥
पिछे जो अरुणोदय होता है वह देवताओंको भ्रसन्न॒करनेवाटी प्रातःसन्ध्या है ॥११॥ ओर सूर्यके अस्त होनेपर जो खां कमरुके समान
उदय होती है वह पितरोको प्रसन्न करनेवाली सायंसन्ध्या है ॥ १२ ॥ उसके प्राणको दयालु श्रीशफरजीने अपने दिभ्यशरीरमं सम्मिरिति
क्रिया ॥ १३ ॥ हे खनि ! यज्ञकी समामे सम्पूणे खनि्योनि भाप होनेपर तपे हए सुवणे समान कांतिवाटी कन्याको अभरिमे पराया ॥१४॥।
उस एत्रीको छे नि बडे प्रसन्नहो यज्ञके निमित्त उसे ज्ञान कराकर गौदीमं ठे छिया ॥ १५॥
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ओर मुनिने उसका अरुंधती नाम रक्खा शिष्योि युक्त मेधातिथि मुनि बडे त्थ हए | १६ | उक्षन् किसी कारणस भी |
अवरोषन नही करिया इस हेतु तीनोरोकर्ेः विदित हो उस नामको स्वयं भाप इद ॥ १ ॥ यज्ञ समाप्तकर वह नि छतरृत्यकं म
भाप हो कन्याके लामते संपदा यकत हो शिष्यवरगोक साथ उस अपने आशम उसका पाटन करने ठग ॥ १८ ॥ उत्त चन्रमा 1
तापस्ारण्यवाडे मेधातिथि खनिके आश्रमम बह कन्या बढने ठगी ॥ १९॥_ पाच वषेकी अवस्थाको प्राप्त हो वह अपने गणोके द्वारा
अकूषतीठ तस्यास्तु नाम चकते महाशनिः ॥ शिष्यैः परिवृतस्तज् महामोदमवाप इ ॥१६॥ विरूणद्ि यतौ धरम सा कर्मा
दपि कारणात् ॥ अतच्चिलोके विदितं नाम समराप तत्स्वयम्॥१७॥यज्ञ समाप्य स खनिः कृत छत्यभावमासाय् सपदयुतस्त
नयाप्रलंमात् ॥ तस्मित्निजाश्रमपदे सह शिष्यवर्स्तामेव संततससौ दयिते रषे ॥१८॥ अथ सविव देवी तस्मिन्युनिवरा
श्रमे ॥ चन्द्रमागानदीतीरे तापसारण्यरस्ञके ॥ १९॥ संप्राते पञ्चमे वषँ चन्द्रभागां तद् शणः ॥ तापसारण्यमपि सा पवि
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वमकरोर्सती ॥२०॥ विवाहं कारयामासुस्तस्या बरह्मसुतेन वे ॥ वसिष्ठेन द्यङंधत्या ब्र्मविष्णुमहेश्वराः ॥२१॥ तद्विवाहे महो
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॥८२॥
त्साहो बभूव सुखवद्नः॥ सवे सुराश्च युनयस्सुखमापुः परं धुने॥२२॥बह्मविष्णुमहेशानां करनिस्सृततोयतः ॥ सतनदस्ससु्प
त्ाश्शिप्रा्यास्सुपवित्रकाः ॥ २३ ॥ अ्घती महासाध्वी साध्वीनां प्रवरोत्तमा ॥ वसिष्ठं प्राप्य संरेजे मेधातिथि सुता शने
॥ २९ ॥ यस्याः पुत्रास्सशुत्पन्नाः अ्रष्ठाश्शक्तयादयश्श्ुभाः ॥ वसिष्ठं प्राप्य तं कतं संरेज शुनिसत्तमाः ॥ २९ ॥
रुण. रनों = द
चन्द्रमागानदी ओर तापसारण्य दोनोंको पवित्र करती हदं ॥ २० ॥ किर बरहया विष्ण शिवने बहमएत्र वशिष्टके साथ उप्त अरधप्तीका
स.खं.२
१ | ॥ २२ ॥ ओर बहा विष्ण शिवजीके हाथते निकटे हुए जल्के द्वारा शिप्रादिक पवित्र सात नदी हदं ॥ २३ ॥ पतिवताओंमं श्रेष्ठ
उत्तम महापतिचता अरुंधती मेधातिथिकी कन्या वशिष्ठको पाकर रमण करती हदं ॥ २४ ॥ ओर उ्तके शक्त्यादिक भ्रष्ठ भत्र उत्पन्न
विवाह कराया ॥ २१ ॥ हे सनि ! उक्षके विवाहम सुखके बदानिवाला बडाही उत्स हुवा सम्पूणं देवता ओौर सनि सुखको प्राप्त हुए
॥
॥ ००
। | ठते वसिष्ठ कांतको पाकर वह रमण करती हृदं ॥ २५ ॥ हे खनिषत्म ! इस प्रकार संध्याका चरित्र मेने तुमसे कह जो अत्यन्त /
है दिव्य ओर पावन सम्पूण कामके मूको देनेवाखा है ॥ २६ ॥ जो श्वी या पुरुष शुद्ध चित्ते इसको सुनेगा वह सपृणं कामोंको पराप्त होगे
# इसमे सदेह नहीं ॥ २७ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणे द्वितीये सतीखण्डे रद्रसंहि ताभाषारीकायां सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ सूतजी बोटे इसभरकार |
8 पति ब्ह्याका वचन सुनकर प्रसन्न हो नारदजी बोठे॥१॥ हे ब्रह्मन् ! हे विधि ! हे महाभाग! हे विष्ण शिष्य ] महामतिं
8 एवं सेध्याचरितर ते कथितं स॒निसत्तम॥ पवित्र पावनं दिव्य् सर्वकामफलभरदम्॥२६ ॥य इदं शृणुयान्नारी पुरुषो वाञ्ुभव्तः ॥
‡ सवांन्कामानवाप्नोति नात्र कायां विचारणा ॥ २७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसंहितायां द्वि°सतीखंडे सप्त
॑ मोऽध्यायः ॥ ७ ॥ सूत उवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य ब्रह्मणो हि प्रजापतेः ॥ प्रसन्नमानसो भूत्वा तं प्रोवाच स नारदः ॥१॥
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नारद् उवाच ॥ ब्रह्मन् विधे महाभाग विष्णुिष्य महामते॥घन्यस्त्वे शिवभक्तो हि परतत्वप्रदर्शकः॥ २ ॥भ्राविता सुकथा
दिभ्या शिवभक्तिविवद्धिनी ॥ अर्धत्यास्तथा तस्याः स्वरूपायाः परे भवे ॥ ३ ॥ इदानीं श्रूहि धर्भज्ञ पवि्ैचरितं परम् ॥
शिवस्य परपापत्र मेगलप्रदय॒त्तमम् ॥ ४ ॥ गररीतदारे कामे च दृष्टे तेषु गतेषु च संध्यायां किं तपस्तप्तं गतायामभवत्ततः
॥ ९ ॥ सूत उवाच ॥ इति त्वा वचस्तस्य ऋषेवं भावितात्मनः ॥ स॒प्रसन्नतरो भूत्वा बल्ला वचनघवीत् ॥ 8 ॥ बह्म
वाच ॥ श्रृणु नारद् विघ्रनद्र॒॑तदेवं चरितं शुभम् ॥ शिवलीखान्वितं भक्त्या धन्यस्त्वं शिवसेवकः ॥ ७ ॥
आप् प्रतत्वकै जानने वाटे शिवभक्त धन्य हो ॥ २॥ आपने शिवभक्तिके बठानेवाटी अरुंधती ओर उसके स्वरूपकी दिव्य कथा कही ॥३॥
है धमेके जाननेवाठे अब दूरा पक्त्र पापोको नाश करनेवाखा उत्तम मंगल्कै देनेवाला शिवका रिध किये ॥४॥ बी अहणकर् कामको जाते
ए देख ध्याने जाकर कया तप् किया ॥५॥ सतजी बोठे इसभकार नारदजीके कचन सुन प्रसन्न हो ब्रह्माजी बोरे ॥ ६॥ नहञाजी बोडे हे
किभनद्र नारदं ! शिवटीठासे युक्त वह शुभ चरित्र भक्तिपूवक हनो तुम शिवजीकै सेवक धन्य हो ॥ ७ ॥
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शि०ड० । |> मँ जव पूर्वही मोहित हो अन्तर्धान होगया तवते सदा शवक वाक्यते दुली हौ सोचता र्हा ॥ ^ शिवकी मायाते मोहित बहत दिनतक (4
8 सोचकर रिते ईषया की बह सुनो दुमे कहता ह ॥ ९॥ उप्त मदन व रतिको देख किंचित् मदे युक्त ह १ दक्षादिकोके समीप आया ||
॥ १० ॥ हे नारद ! शिव्की मायसि मोहित मैन दश्षादिक धमे भरसन्नतापूवक कहा ॥ ११ ॥ बहाजी बोट, हे दक्ष! ह मरीच्यादि सुत ! ||£
|| मरौ वातको सुनकर मेरे कषक दूर हीनिका उपाय करो ॥ १२॥ ज्ीके अमिराष मातरतेही ९ महादेवजीनि सुञ्चको ओर तुमको बहत ||
#| अहं विमोदितस्तात यदैातरदितः पुरा॥अचितयं सदाहं तच्छंथुवाक्यविषादिंतः ॥८॥चितयित्वा चिरं चित्ते शिवमायाविमो ||
् दितः ॥ शिते वेरष्यामिकार्षं हि तच्छणुष्व वदामि ते ॥ ९ ॥ अथाहमगम तच यन दक्षादयः स्थिताः ॥ सरति मदनं दष्टा ||&|
0 सगं हि किञ्चन ॥ १० ॥ दक्षमाभाष्य सुप्रीत्या परान्पुतरंशच नारद ॥ अवोचं वचनं सोहं शिवमायाविमोहितः ॥ ११ ॥ #
| ब्रह्मोवाच ॥ हे दक्ष ह मरीच्यायास्स॒ताः शृण॒त मद्वचः ॥ शुत्वोपायं विधेयं हि मम कष्ठापयुत्तये ॥१२॥ कां नामिलाषमान्र ||
8 मे दृषा शम्धुरगदईैयत् ॥ मां चयुष्मान्महायोगी धिक्कारं कृतवान्बहु ॥ १३ ॥ तेन दुःखामितपों रभेदं शमं न कचित् ॥ ||
| यथा गरह्णात कतां स स यत्तः कार्यं एव हि ॥ १७ ॥ यथा गृह्णातु कांतं स सुखी स्यां दुःखवमितः ॥ दुलभस्स तु कामो |
ए ने परं मन्ये विचारतः ॥ १९ ॥ काताभिलाषमाघ्रं मे दृष्टा शंुरगरहयत् ॥ घनीनां पुरतः कस्मात्स कतां सथरीष्यति <
रसं. २ || ॥ १६॥ का वानासै त्रिलोकरेस्मिन् या भवेत्तन्मनाः स्थिता ॥ योगमागेमवज्ञाप्य तस्य मोहं करिष्यति ॥ १७ ॥ ट
म.सं२ ह|| धिद्टारा ।॥ १३ ॥ उस दुःखते दुःखी मुञ्ञको कहीं चेन नहीं पडता जिस प्रकार महादेवजी श्लीको ब्रहण करं वहं यत्न करो ॥ १४ ॥ जब ट
क || बह खीको ग्रहण करं तथ प दुःखमे रहित हो सुखी होऊं । परन्तु मेरे विचारसे यह काम दुरम है ॥ १५ ॥ ख॒निर्योकै सन्खख काताके ||६
| अभिलाष मा्रासेही शम्भुने सञ्च धिङ्कारा तो वहं कैम खीको ब्रहण करेगे ॥ १६ ॥ कौनसी शली तीनों ठोकमें दप है जो उनके मनमे स्थित ठ
>| हो सके, ओर योगमागैको जानकर उनका मोह न करे ॥ १७ ॥ >
। मोहनमे मन्मथ मी नही समर्थ होगा, ३ निरंतर योगी चि्योके नामका भी सहन नहीं करते ॥ १८ ॥ वे आदिहृर तो वाणीस भी
चवियोको नहीं कहते हँ तो भला बताये विवाह कर वे सृष्टि कैत करगे, ॥ १९ ॥ सेारमे कोई महासुर मेरे वध्य होंगे, कोई हरिके वध्य
होगे, कोई निश्वयसे श्रीशंमुजीके उपायते मारे जाये ॥ २० ॥ एकान्त विरागी संसारसे विख शम्भ इससे विपरीत दूरा कर्म नहीं करगे
इसमे संदेह नहीं ॥ २१ ॥ यह कह भने दक्षादिक एत्रोको देखा उसी समय रति ओर् मदन दोनों आनन्द पूर्वक वह आकर प्राप्त हये
मन्मथोपि समर्थो नो भविष्यत्यस्य मोहने॥ नितांतयोगी रामाणां नामापि सहते न सः॥१८॥अगृहीतिषुणा चैव हरेण कथमा
दिना ॥ मध्यमा च भवैत्सृशिस्तदवाचा नान्यवारिता ॥१९॥ भुवि केविद्धविष्यंति मायाबद्धा महासरः ॥ बद्धा केचिद्वर्न
केचिच्छभोरुपायतः ॥ २० ॥ संसारपिषुखे शंभौ तथेकांतविरागिणि॥ अस्माहते न कमौन्यत् करिष्यति न संशयः ॥२१॥
इत्य्॒रा तनर्याशाईं॑दक्षादीन् सनिरीक्ष्य च ॥ सरति मदनं तत्र सानंदमगदं ततः ॥ २२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ मत्पुत्र वर काम
त्वं सर्वथा सुखदायकः ॥ मद्वचशशृणु सुप्रीत्या स्वपरन्या पित्तवत्सल ॥ २३ ॥ अनया सहचारिण्या राजसे त्वं मनोभव ॥
एषा च भवता पत्या युक्ता संशोभते भृशम् ॥ २९॥ यथा ्चिया इषीकेशो हरिणा सा यथा रमा ॥ क्षणदा विधुना युक्ता
तया युक्तो यथा विधुः ॥ २५॥ तथेव युवयोश्शोभा दांपत्यं च पुरस्कृतम् ॥ अतस्त्वं जगतः केतुर्विश्वकेतुभविष्यसि
॥ २६ ॥ जगद्धिताय व॒त्स त्वं मोहयस्व पिनाकिनम् ॥ यथाञ्चु स॒मनश्शंयुः छ्य्यादारपतिग्रहम् ॥ २७ ॥
॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोठे सवेदा सुखके देनेवाठे मेरे रेष्ठ एत्र हे काम ! हे पितृषत्सल ! तुम व्री सह पसञनतापूर्वक मेरे वचनको सुनो ॥२३॥
हे काम ! इत श्वीकै साथ तुम शोभाको दे रहे हो, ओर यह तुमत युक्त शोभित है ॥ २४ ॥ जेते हषीकेश बियो आर वि | र
तहिणी चन्दमतति ओर चन्रमा रोहिणी शोभित है ।। २५॥ उसी भकार तुम्हारी खी परुपोकी शोभा है इसव्यि तम जगत् जौर सारकं
कैतु होगे ॥ २६ ॥ हे वत्स ! संसारके हितके खयि तुम महादेवजीको गोहन करो, जिससे शध प्रसन्न हो शकर घ्लीको ध्रहण कर ॥ २५ ॥
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निर्न स्थानें उत्तम देशमे पर्वतम ताछाबमे जहौ जलँ ईश जाये वहां वहां तुम इ
क है॥ २९ ॥ हे काम! प्राणियोपर महादेवजीके अुराग
शंकरका मोहन करो, तुम्हारे सिवाय उनको मोहन करनवाला ओर दुसरा नहीं
करनेसे तुम्हारे भी शापोकी शांति होगी इस्यि तुम॒ अपना र
करगे, तब महादेवजी तुमको तार दैगे ॥ ३१ ॥ इसलिये महादेवजीके मोहनाथ दुसरी
तुम संसारके केतु हौ ॥३२॥ जह्ञाजी बोठे संसारके प्रमु सक्च अपने पिताकी बातको सुन
विजने स्निग्धदेशे त॒ पर्वतेषु सरस्सु च ॥ य्य प्रयातीशस्ततर तन
हरम् ॥ त्वहते विद्यते नान्यः कशिदस्य विमोहकः ॥ २९ ॥ भूत
तस्मा दात्महितं र ॥२०॥ सालुरागो वरारोहां यदीच्छति मडेश्व
तस्मालायाद्वितीयस्त्वं यतस्व हरमोढने ॥ विश्वस्य भव केतुस्त्वं मोहयित्वा महे ई
उवाचमन्मथस्तथ्यं तदा मां जगतां पतिम् ॥ ३२॥ मन्मथ उवाच॥ करिष्येहं तव विभो वचना
महाञ मे तत्कंतां भगवन् सृज॥३९॥मया समोहिते शंभौ यया तस्थावुमोहनम् ॥ कतंव्यम
^ मोवाच ॥ एवंवादिनि कंद्पै धाताहं स प्रजापतिः ॥कया समोहनीयोसाविति चिताम
यामहम् ॥ ३६ ॥ विताविष्स्य मे तस्य निःश्वासो यो विनिस्सृतः ॥ तस्माद्वसंतस्संजातः पष्पत्रातविभूषितः ॥ २७ ॥ |
हि जनकस्य जगत्प्रभोः ॥ उ
च्छभुमोदनम् ॥ किं तु योषिन
धुना धातस्त्रोपायं परं कुर् ॥३९॥ ब
मन्मथ बोढा हे स्वामी ! आपकी आज्ञासे भँ शमुको मोहन कग परन्तु हे भगवत् !
महादेवजीके मोहन करनेपर उसका मोहन म होजाय, हे बह्मा ! इसे द्रा उपाय आप कीजिये ॥ ३५ ॥ बह्लाजी बोठे इस प्रकार फंदप॑की
बातोंको सुन मे बह्मा भौर प्रजापति दश्च किसके द्वारा उनका संमोहन करे यह सोचने
दारा पुष्पबाण विभूषित वसेत उत्पन्न इवा ॥ ३७ ॥
हित करो ॥ ३० ॥ अराग
ली उलसन्न करो दस विधि महादेवजीका मोहन करकैः
नया सह ॥२८॥ मोहय त्वं यतात्मानं वनिताविमुखं
द्रे साबुरागे भवतोपि मनोभव ॥ शापोपशातिभंविता
रः ॥तदा भवोपि योभ्यार्यस्त्वां च संतारयिष्यति।।२१॥
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थ जाकर ।२८।। तुम वनितासे विख इृन्द्रीजित
से युक्त हो शकरजी जब उत्तमं खीकी इच्छा
मन्थे ठीक ठीक जगत्क पति म॒ञ्चसे कहा ॥ ३२२ ॥
3९९ ज ९ > 4
०९4
श्वरम्॥३२॥बर्मोवाच ॥ इति श्रत्वा वचो मे
मेरे अच्च च्वीको आप बनाये ॥ ३४ ॥ जिसमे मेरे
लगे ॥ ३६ ॥ चितम भरविष्ट हये मेरे श्वासे |
कमरके समान कांति एूषषटये तामरसके समान नेत्र ओर संध्यास्मय उदय हए चनद्रसंडके समान उत्तम नासिका ॥२८॥ शाङ्खके समान
चरणोके आव, काठे राड वाठ, संध्या समयके सर्थके सश दो कुडलोसे मंडित॥ ३९॥तवारे हाथीकीसी चार, चिकने व चौडे जंघा, ऊंचे कषे
| क्रूरके समान गर्दन चौढी छाती सन्॒लका भाग उदाहृवा॥४ ०॥ सम्पूण अग सन्दर श्याम सब ठक्षणोपि युक्तं देखनेके योग्य सबको मोहित ९
करनेवाङा कामको बढानेवाछा ॥ ४१ ॥ इसप्रकारके पष्पोको उत्पन्न करनेवारे वतक उत्पन्न होनेपर सुगेधित वायु चने ठगी ओर वृक्ष एूढ ट
शोणराजीवसंकाशः फुतामरसेक्षणः॥संध्योदिताखंडशशिप्रतिमास्यस्सुनासिकः ॥३८॥ शाङ्गवच्चरणावत्तश्श्यामङ्कचितमूदधं ठ
जः।सं््या्चमाकिसदशः कुंडलद्वयमंडितः ॥३९॥ प्रमत्तेभगतिः पीनायतदोशत्रतांसकः॥ कंञमीवस्सुविस्तीणंडदयः पीनस त
न्घुखः॥ ० ॥ सर्वागञन्दरः श्यामस्सम्पू्णस्सर्वलक्षणेः ॥ दशनीयतमस्सर्वमोहनः कामवद्धंनः ॥ ७१ ॥ एतादृशे सत्पन्न ठ
वसंतेकुसुमाकरे॥ ववौ वायुस्सुसुरभिः पादपा अपि पुष्पिताः ॥४२॥ पिका विनेदुश्शतशः पंचमं मधुरस्वनाः ॥्रफु्षद्या
अभवन्सरध्यः स्वच्छपुष्कराः ॥७२॥ तसुत्पत्रमहं वीक्ष्य तदा तादृशश्ुत्तमम् ॥ हिरण्यगर्भो मदनमगदं मधुरं वचः ॥४४॥ ४
ठ
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ब्रह्मोवाच ॥ एवं स मन्मथनिभस्सदा सहचरोभवत् ॥ आबुकूल्य तव कृतः सरवै देव करिष्यति ॥४९५॥ यथाभ्चैः पवनो मितं
स्त्रोपकरिष्यति ॥ तथायं भवतो मिं सदा त्वामयास्यति ॥ ४६ ॥ वसतेरंतहेतुत्वाद्रसंताख्यो भवत्वयम् ॥ तवागमनं
४ कमै तथा लोकानुरञनम् ।॥४७॥ असौ वसंतश्रंगारो वासंतो मख्यानिरः ॥ भवेत्त सुडदो भावस्सदा ्वद्वशवत्तिनः॥७८॥
गये ॥४२॥ पचम मीठे स्वरसे कोकिठ बोढने कगे, कमठ व कोकावरी शरगद, ताटाब स्वच्छ होगये ॥४३॥ इस भकार उत्तम उस्तको उत्प हुवा
देख हिरण्यगर्भ मदनसे मैने मधुर वचनमे कहा ॥४४॥ ब्रह्माजी बोटे इस भरकारका मन्मथे समान ॒कांतिषाठे वेत तुम सदा कामके सहचरहो
दैव तुम्हारी सदा अलु्ूकता कर ॥४५॥ जिस प्रकार अभिका मित्र पवन स्वत्र उपकार करताहै उपती प्रकार यह तुम्हारा मित्र सदा तुम्हारे साथ
>| रहे ॥ ४६ ॥ यह रमणका देतु है इस इसका नाम वर॑तहो इसका कषं तुम्हारा अलुगमन ओौर स्ारका रंजन है ॥ ४७ ॥ इस वतका
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| शगार सदा मख्याचठकी पवनम बसे ओर सदा तुम्हारा इसका मित्रभाव हौ सदा तुम्हरे वशम रहे ॥४८॥ रतिके क्रि हुये विव्वोकादि क ओर
(||स कटा तुम्हारी भरसनताके षयि तुम्हारे सुहद हों ॥ ४९ ॥ हे काम ! इस अपने सहचर वरत ओर रतिके साथ उयत हौ महाद्वर्जाका
| मोहन करो ॥ ५० ॥ हे एत्न ! मँ उप्त ब्लीको यत्न पूर्वक बिचारकर कहुगा जो महादेवजीका मोहन करेगी ॥ १ ॥ बरहमाजी बोठे इसभकार
|| मेरे कहने प्र कामन भन्न होकर भेर चरणोमे सपत्नीक भणाम किया ॥ ५२ ॥ फिर दक्षको मनसे उत्पन्न होनेवाटे मेरे एवोको प्रणाम
ह|| कर जितत स्थानमे महादेवजी गये थे वहीको मन्मथ गया ॥ ५३ ॥ इति श्रीशिवमहाऽराणे द्वितीये सतीखण्डे रदरसंहिताभापारीकायां सतीच
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विव्वोकायास्तथा हावाश्चतष्षष्टिकलास्तथा ॥ रत्याः र्त् सौय सददस्ते व तव ॥४९॥ 1 काम वसत
्रसुखेभेवान् ॥ मोहयस्व महादेवं रत्या सह महोयतः ॥९५०॥ अहं तां कामिनीं तात भावयिष्यामि यत्नतः ॥ मनसा सुवि
चार्येव या हरं मोहयिष्यति ॥ 4१ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवसुक्तो मया कामः सुरज्येष्ठेन षितः ॥ ननाम चरणौ मेऽपि स पत्नी
४ सहितस्तदा ॥५२॥ दक्ष प्रणम्य तान् सर्वान्मानसानभिगाद्य च ॥ यत्रात्मा गतवाज्शंधुस्तत्स्थानं मन्मथो ययौ ॥ ५३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शद्रसंहितायां सतीचारिते द्वितीये सतीखंडे वसंतस्वह्यवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
ए ब्रह्मोवाच ॥ तस्मिन् गते सादुचरे शिवस्थानं च मन्मथे ॥ चरि्मभविनं तच्छृणुष्व भुनीश्वर ॥१॥ गत्वा तच. महावीरो
| मन्मथो मोहकारकः॥ स्वभरभावं तानाशु मोहयामास प्राणिनः॥२। वसुतोपि प्रभावे स्वं चकार हरमोदनम्॥ सवे वृक्षा एकदैव
४ प्रफुह्टा अभवन्भुने ॥ २ ॥ विविधान्कृतवान्यत्राच् रत्या सह मनोभवः ॥जीवास्सवे वशं यातास्सगणशश्शिवो न हि ॥४॥
रिते वसतरूपव्णनो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ < ॥ ब्रह्माजी बोरे, अलुचरोके साथ उस कामको शिवके स्थानम जानेपर जो कुछ विचित्र चरित
ह|| हृ उसे सुनो ॥ १ ॥ मोह करने वारे महावीर कामने वहां जाकर अपने प्रभावको विस्तारित कर प्राणियोँको मोहित करख्या ॥ २॥
ठै || वसन्त ऋतुनेभी महादेवजीकै मोहित करनेवाछा अपना परमाव किया सभी वक्ष एकं साथ प्रफुठ होगये ॥३॥ रतिके षाथ कामनेनाना भकार
‰॥ यत्न् किये सब जीव् वश होगये प्रन्तु शिब ओर गणेशजी वशी न हये ॥ ४ ॥
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इस कामके सव प्रयास निष्फृठ होगये ओौर यह मद्रहित हौ अपने स्थानको चखा गया ॥ ५ ॥ गद्रद॒बाणीसे सञ्च बह्माजीको |
| अहंकाररहित उदृसीन काम ख्षसे बोखा ॥६॥ काम बोढा, योगप्रायग शमुजी मोहित होनेवाटे नहीं ह उतत शभुके मोहन करने दूषरोकी
ं ओर भेरी सामथ्यं नहीं है ॥ ७ ॥ समित्र मैने नाना उपाय किये परंतु रतिके साथ शिवे संपूण उपाय निष्फठ हो गये ॥८॥ हे ऋ्याजी ।
| | मोहनमे जो कुछ हमने उपाय किया कहते हए स्स उन प्रयाततोको आप सुनिये ॥९॥ जब शिवजी समाधि ठगाकर बढ गये, तब
ठ समधोदनस्यासन्प्रयासा निष्फला सुने ॥। जगाम स॒ मम स्थानं निघृत्त्य विमदस्तदा ॥ 4 ॥ त्वा प्रणामं विधये मदं
%|| गद्रदया गिरा ॥ उवाच मदनो मां चोदासीनो विमदो सने ॥६॥ काम उवाच ॥ ब्रह्नन् शयुरमोहनीयो न वै योगपरायणः ॥
ह| न शक्तिमेम नान्यस्य तस्य शंभो मोहने ॥ ७ ॥ समित्रेण मयां बरह्मन्नुपाया विविधाः कृताः ॥ रत्या सहाखिखास्ते च
¢ निष्फला अभवच्च्छि ।॥। ८ ॥ शृणु ब्रह्मन्यथाऽस्मामिः कृतां हि हरमोरने ॥ प्रयासा विविधास्तात गदतस्तान्धुने मम
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॥ ९ ॥ यदासमाधिमाश्रित्य स्थितश्शुभुनियंत्रित्ः ॥ तदा सगंधिवातेन शीतलेनातिवेगिना ॥ १० ॥ उद्धीजयामि श्रं स्म
नित्य मोहनकारिणा ॥ प्रयत्नतो महादेवं समाधिस्थं चिरोचनम् ॥ 9१ ॥ स्वसायकांस्तथा पंच समादाय शरासनम् ॥
तस्यामितो च्रम॑तस्तु मोहयस्तद्रणानहम् ॥ १२ ॥ मम प्रवेशमात्रेण सुवश्यास्सर्वजतवः ॥ अभवद्रिकृतो नैव शंकरस्सग
णः प्रभुः ॥ १२ ॥ यदा हिमृबतः प्रस्थं स गतः प्रमथाधिपः ॥ तथागतस्तेदेवाहं सरतिस्पमधुविधे ॥ १४ ॥ यदा मेरंगतो
द त्न
॥ रुद्रौ यदा वा नागकेशरम् । कैलासं वा यदा यातस्तवादं गतर्वोस्तदा ॥ १५ ॥
ट् अतिशीतट सुगन्धित वायु चरने छगी ॥ १० ॥ मोहनकारी पवने समाधिस्थं चिलोचन शिवजीको निलही उद्रीजन किया ॥ ११ ॥ अपने
ह| पोच बाणको ठे शिवके सामने घूमता हुआ भँ उनके ग्णोको मोहित करने र्गा ॥ १२ ॥ मेरे पवेश करतेही सब भराणी वश हो गे प्रस्त
ह|| गणोके सहित शिवजी वश न हूए ॥ १३ ॥ जब शिवजी हिमवान् पवतपर गये हे विधि ! उक्ती सपय् भँ रति ओर वतको साथमे छे वहं
?॥ आया ॥१४॥ जब शिवजी भेर पर्वतको गये तब म वहां गया जव नागकेशर गगरे तव भँ
॥ वहा गया, जअ केठास॒ गये तब मँ वहां गया ॥ १५ ॥
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ं च उत्तम नाना-
जब शिवजीनि किती भकार समाधि न छोडी तवर्मैने दो चक्र बनाये ॥ १६ ॥ हावभाव युक्तं त भ्रयुगरने च्च परुषके क्रमते उत्त
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भकारोके भावो किया ॥१७॥ गणोंके सहित नीरकट शिवजी समीप स्थित मृग भौर व 1. ध सिक
उनके चारों ओर नाना प्रकारकी गतियोका आश्रयणकर रस्तकै उत्सुक करनेवाे भयूरोने बहा धुत ॥ | क छ कम वसन्ते किया
कदाचिद् स्थान नहीं पाया सत्य कहता हूं उनके मोहन करने मेरी शं्ति नहीं है ॥ २० ॥ उनके मोहन युक्त जी छ कन
यदा त्यक्तसमापिस्त॒ हरस्तस्थौ कदाचन ॥ तदा तस्य पुरश्चक्रयुग रचितवान्हम् ॥ ॥ १द् ॥ तच चरूृग १ हावभाव
युतं सहः ॥ नानाभावानकार्षी्च दापत्यकरमसुत्तमम् ॥ १७ ॥ नीरकंठे महादव सगण ततपुरःस्थिताः ॥ अका्ुमोहिते
भावं मृगाश्च पक्षिणस्तथा ॥ १८ ॥ मयूरमिथुनं ताकार्षीदरावं रसोल्सुकम् ॥ विविधां गतिमाश्रित्य पाश्वे तस्य परस्तथा
॥ १९ ॥ नालमद्धिवरं तस्मिन् कदाचिदपि मच्छरः ॥ स्यं बरवीमि लोकेश मम शक्तिनं मोहने ॥ २० ॥ मधुरप्यकरोत्कम
युक्तं यत्तस्य मोहने ॥ तच्छृणुष्व महाभाग सत्यं सत्यं वदाभ्यहम् ॥ २१॥ च॑पकान्के शरान्बाखान्कारणान्पाटर्खस्तिथा ॥
नागकेशरपुत्नागान्कि्कान्केतकान्करान् ॥ २२ ॥ मागंधिमद्धिकापणभरान्छ्प्वकास्तिथा ॥ उत्फुटयति तत्रस्म यत तिष्ठति
वै हरः ॥ २३ ॥ सरास्युत्फखपद्यानि वीजयन् मलयानिकेः ॥ यत्नात्सुगंधीन्यकरोदतीव गिरिशाश्रमे ॥ २७ ॥ रतास्स
वास्सुमनसो दधुरंङपसंचयान् ॥ वृक्षाकं चिरमावेन वे्ठयंतिस्स त च ॥ २५ ॥
सत्य २ कहता ह उक्को सुनो ॥ २१ ॥ चैपक, केशर, कटहर, पाटर, नागकेशर, एलाग, किंशुकः, केतकी, कुरबक ओर पारक ॥२२॥
मारुती, चमेरी, पत्र, कुरबकोंको जहां शिवजी बेढे थे भरुित करदिया ॥ २३ ॥ शिवजीके आशभरममं फएठेकमल्वाठे सरोको मलयागिरीके
बायुते यलपुवैक सुधित करदिया ॥ २४ ॥ धतूरेके अंकुरकै समूह ओर एूटी हृदं सव रताये बडे परमते इक्षोको टिपर गं ॥ २.५ ॥
भ्र.
#उ९ 46२९ -4+ > -4 # उ -4 ०९ -4+ २९ 4
ध 22
् पवनो उन दृक्ोकों भफुषधित देख खनिभी कामके वश होगये ओरोंकी तो कया बात है ॥२६॥ इसमकार होनेपरभी शभक मोहनका
कारण भावमात्रमी न देखा; ओर अपनेपर शकका कोप ॥ २७ ॥ यह सव देव ओर उनकी भावनाको जान शंभुके मोहते जिस प्रकार मे
विसुख हभ वह तुमसे कहताहु ॥२८॥ कोपते मोहित समाधिको छोडे हूए उन शंभुके सन्यस भ ठहर न सका, भरा उन्हं कौन मोह सकत)
है ॥ २९ ॥ जिनके जठती हूं शिखाओति युक्त अभिके समान नेतर ररे श्रगीको देख उनके समीप कोन ठहर रकता है ॥ ३० ॥ बह्लाजी
तान्वक्षाशच सुपुष्पौघान् तैः सुगंधिसमीरणेः॥ दृष्टा कामवशं याता सुनयोपि परे किम ॥२६॥ एवं सत्यपि शंभोरन दं मोह
स्यकारणम् ॥ भावमामकार्षन्नो कोपो मय्यपि शकरः ॥ २७ ॥ इति सर्वमहं दृष्टा ज्ञात्वा तस्य च भावनाम् ॥ वियुखोहं
शंभुमोहात्नियतं ते वदाम्यहम् ॥२८॥ तस्य त्यक्तसमाधेस्तु क्षणं नो दृष्टिगोचरे॥शक्छयामो बय स्थातु तं इद को विमोहयेत्
॥ २९ ॥ ज्वलदग्िप्रकाशाक्ष जहाराशिकरालिनम् ॥ शृगिणं वीक्ष्य कस्स्थातुं ब्रह्मन् शक्रोति तल्पुरः॥३०॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥
मनो भववचञचत्थ त्वाहं चतुराननः॥ विवक्ुरपि नावोचं चिताविष्टोऽभवे तदा॥३१॥मोदनेहं समर्थो न हरस्येति मनोभवः ॥
वचः त्वा महादुःखात्निरन्वसमहं सुने ॥३२॥ निश््वासमाङ्ता मे हि नाना हूपमहबिरः ॥ जाता गता लोखजिह्वालोला
श्ातिभयकराः ॥ ३२ ॥ अवादयंत ते सवं नानावा्यानसख्यकान् ॥ परहादिगणास्तास्तान् विकरालान्महारवान् ॥ ३७ ॥
अथ ते मम निश्न्वाससंभवाश्च महागणाः ॥ मारयच्छेदयेत्यूचु्बह्मणो मे पुरः स्थिताः ॥ ३५ ॥
बोठे, इस भकार कामके वचन सुन म चतुरानन ( बह ) चिन्तामे मर हो फिर कुछ पूछनेके स्थि भी नहीं बो सका ॥ ३१ ॥ भँ महादे
६ वजीके मोहनमे नहीं समथहू इस प्रकार कामका वचन सुन बडे दुःखसे मँ श्वास्रहित होगया ॥ ३२ ॥ फिर प्रगटहुए मेरे श्वास्तकी पवनसे
र| चठ बडे मकर जिहाको टपठपानेवारे बडे बढी नानाभकाके लपधारी गण प्रगट हूए ॥ ३३ ॥ कोलाहल करनेवाछे असंस्य पिकरारु गण
जो नानाभकारकै पटहादिवा्योको बजातेथे ॥२४॥ मेरे श्वाससे उत्यन्नहुए वै महागण मेरे समीप मारो काटो इसप्रकारका शब्द करने लगे ॥२५॥
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यह गण बिना अपनी पूजाके प्रसन्न न हों ॥ ४३॥ हे काम ! सदा तुम्हारे अुकुढ रहना यह उनका स्य कर्म है, ओर सदा तुम्हारे सहायक
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सञको मारने काटनेका वाक्य सुन काम कु कहनेकेखिये तत्पर होगया ॥ २६ ॥ ,काम् यह देखकर उनको निवारित कर ग्णोके
मुषे बोला ॥ ३७ ॥ हे बरह्मन भजानाथ ! सम्पूणं सिके परततकं आपने इन विक्रार भयकर किंन वीरयोको उत्पन्न किया ॥ ९ ँ
ह बहा ! इनका क्या काम है यह कहौ रगे इनका कया नाम है वह किये भौर वहा इनकी नियोजित कीजिये ॥ ३९. ॥ ह देवश इनको ||
अपने कृत्ये नियोजित कर नाम ओर स्थान दे कृपाकर जो उचित हौ वेह मुञ्चे आज्ञा दीजिये ॥ ० ॥ ब्रह्माजी बोट) हे खनि ! लोककती
तेषां तु वदतां त्र भारयच्छदयेति माम्॥वचः श्वा विधि कामः प्रवक्तुयुपचकमे ॥२६॥युनऽथ म्। समाभाप्यतान द|
मदनोगणान् ॥ उवाच वायन ब्ह्मन्मणानामभतः स्मरः ॥ ३७॥ काम उवाच ॥ ह ब्रह्मन् हे प्रजानाथ स्सृषिमवतकं ॥
उतपतनाः क इमे वीरा विकार भयंकराः ॥३८॥ किं करमते करिष्यंति कुतर स्थास्यति वा विधे॥ किननामेषा एते तद्द तज
नियोजय ॥२९॥ नियोज्य तात्निजे त्ये स्थानं दत्वा च नाम च ॥ मामाज्ञापय देवेश कषां कृत्वा यथोचिताम् ॥४०॥
ब्रह्मोवाच ॥ इति तद्वाक्यमाकण्य सुनेऽहं कोककारकः ॥ तमवोचं ह मदनं तेषां कर्मादिकं दिशन् ॥४१॥ ब्रह्मोवाच ॥ एत्
दतपत्नमा्ा हि मारयेत्यवदन् वचः ॥ बुहहरतोमीषां नाम मारेति जायताम् ॥४२॥ सदैव विन्नं जंतूनां करिष्यन्ति गणा
इमे ॥ विना निजार्चनं काम नाना कामरतात्मनाम् ॥४३॥ तवावुगमनं कर्म घुख्यमेषां मनोभव॥ सहायिनो भविष्यंति सदा
तव न संशयः ॥ ४४ ॥ यजयत्र भवान् याता स्वकरमार्थं यदा यदू ॥ गंता स॒ तततवत सहायार्थं तदातदा ॥ ५. ॥ | £
ने इस उसकी बातको सुन उन गणोंको कमीदिककी आज्ञा दे उत्त मदनहते कहा ॥ ४१ ॥ ब्रह्माजी बोरे यहं उतपन्न होतेही बारम्बार ।
भारय मारय इस भरकारका वचन कहनेटगे, इसखिये मार इनका नाम हो ॥ ४२॥ यह गण सदेव जन्ुओंको विघ्न कर ओर नानाकामोम रत ६
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होगे इसमे सदेह नहीं ॥ ४४ ॥ जब जब जह आप अपने कामकेटिये जयगे तब तन वहो तुम्हारे सहायताथै जाया करगे ॥ ७५ ॥
| अद्ञके दशमे चठनेवाटे मरुष्योके चि्तको भ्रमित करदिया करगे, ओर ज्ञानियोके ज्ञानमागेमे सदा विप्र करगे ॥४६॥ बह्लाजी बोटे यह
मेरा वचन सुन रति ओर काम दोनों कुछ भसन हये ॥४५॥ वह सष गण सुनकर शुङ्ञको ओर कामको छोड वर्ह काके अनुकूक अपनी आरुतिमे ट
के ॥४८॥ यह कह व्रहमाने फिर कायते कहा किं हे काम ! तुम अद्र हो भेरी आज्ञाको करो, इनको साथमे ठे फिर महादेवजीके मोहनक ट
च्थि जाओ ॥ ४९ ॥ मनको स्थिरकर भारगणकि साथ यत्न करो जिससे स्वी अ्रहणाथ महादेवजीका मोहन हो ॥*५०॥ हे नारद ! यह वचन (1
चित्तभांति करिष्यंति त्वदश्ववशवर्विनाम्॥ ज्ञानिनां ज्ञानमाश च विघधरयिष्यंति स्व॑था॥४६॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याक्यं वचोमे हि ९
सरतिस्समहालुगः ॥ किचितरसन्नवदनो बभूव सुनिसत्तम॥४७॥ धत्वा तेपि गणास्सवें मदनं मां च सर्वतः॥ परिवाय्थं यथाकामं |+
तस्थुस्तच निजाङृतिम् ॥ ४८ ॥ अथ रह्मा स्मरं प्रीत्याऽगदन्मे कुर् शासनम् ॥ एभिस्संहैव गच्छ तवं पुने दरस)हं
॥ ४९ ॥ मन आधाय यत्नाद्धि कुरू मारगणेस्सह ॥ मोहो भवेथा शंभोदारग्रहणहेतवे ॥ ५० ॥ इत्याकण्यं वचः कोभः भर
वाच वचनं पुनः ॥ देवष गौरवं मत्वा प्रणम्यःविनयेन माम् ॥ ५१ ॥ काम उवाच ॥ भया सम्यक् कृतं कमं मोहने तस्य य
त्नतः ॥ तन्मोहो नाभवत्तात न भविष्यति नाधुना ॥५२॥ तव वाग्गौरे मत्वा ष्ठा सारगणानपि ॥ गमिष्यामि पुनस्तत्र
सदारोहंत्वदाज्ञया ॥५२॥ मनो निश्चितमेतद्धि तन्मोहो न भविष्यति ॥ भस्म इयात मे देहमिति शंकास्ति मे विपे ॥५४॥
इत्युक्ता समधुः कामभ्रतिस्सभयस्तदा ॥ ययौ मारगणेः साद्धं शिषस्थानं ुनीश्व्र ॥ ५५ ॥
सुन गोरवमान विनयूर्वकं सङ्ग प्रणाम कर काम फिर बोढा ॥ ५१ ॥ काम बोखा हे तात ! ने गुक्तिपूरवक उनके मोहनक निमित समपर्ं
उपाय किये प्रन्तु उनका मोहन न हुआ है न अव होगा ॥५२॥ परंतु आपकी आज्ञासे आपकी वातीकेा गौरव मान भौर मारगणोको देख फिर
म उस समारोहं जाङगा ॥५३॥ हे बह्लाजी ! मेरे मनम यह निश्वय है किं, उनका मोहन न होगा, ओर सन्ने यह शंका है कि, कदाचिद् भ
शरीरको भस्म न करदं ॥५४॥ हे खनीश्वर ! यह कहकर काम् वसंत, रति ओर मारगणोंकी साथ ठे शिक्कै स्थानम गया ॥ ५५ ॥
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„गमद
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शि० ५ ओर वरह जाकर पहकेके समान काम ओर मधुने इद्धिमानीते बहते भ्कारके उपाय ओौर अपने भरभावको किया ॥ ५६ ॥ ओर मारगणोनि भी
बहुतसे उपाय किये प्रतु परमात्मा शंभुजी मोहको नहीं प्राप्त हए ॥ `4७ ॥ तब निवृत्त होकर काम फिर मेरे पास आया .ओर गवं व हर्षरहित
` ॥ निरुत्सव हो मार ओर मधु दोनों मेरे समीपं बेड कामने प्रणाम कर
स॒ज्ञसे कहा किं ॥ ५९ ॥ महादेवजीके मोहनमे पूरवसे अधिक कमं किया ।
।उपायं स चकाराति तत्र मारगणोऽपि
॥८<॥ |
वै दोनों काम ओर मारगण वहांसे आकर भेरे सामने खडे होगे ॥ ५८ द्
¢ परन्तु ध्यानमें रत आत्मावाटे शिबका मोहन नहीं हुमा ॥ &° ॥
पूर्ववत् सवभ्रभावं च चरे मनसिजस्तदा।बहूपाथ स हि मशुविविधां इद्धिमावदन्।।५९।
¢ स्मरस्तद्॥॥ असीन्भार गणोऽग वो ऽदरषो
¢ च ॥ मोरोभवत्न वै शंभोरपिकथित्परात्मनः ॥५७॥ निघ््य पुनरायातो सम स्थान
नेपि परस्थितः ॥५८॥ कामः प्रोवाच मां तात ्रणम्य च निशत्सवः ॥ स्थित्वा मम पुरोऽगर्वो मरि मधुना तदा ॥५९॥
६ कृतं प्रवांदधिकतः कमं तन्मोहनेविधे॥नाभवत्तस्य मोहोपि कथिद्धयानरतात्मनः ॥६०॥ न दग्धा न्ने तनुओ्चैव तञ तेन दया
¢ हुना॥कारणं पूरवपुण्यं च निविंकारी स वै प्रथुः॥&१॥ेद्ररस्ते हरो भार्या गृह्णीयादिति पद्मज॥परोषायं कुङ् तदा विगवं इति
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मे मतिः ॥६२॥ ब्रह्मोवाच इत्युक्ता सपरीवारो ययौ कामस्स्वमाश्रमम् ॥ प्रणम्य मां स्मरन् शंभुं गर्वदं दीनवत्सलम् ॥६२॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्ढसंहितायां सतीखंडे सत्थुषाख्याने कामप्रभावभारगणोत्पत्तिवर्णनो नाम नवमोऽध्यायः
॥ ९ ॥ नारद उवाच॥ ब्रह्मन् विषे महाभाग धन्यस्त्वं शिवसक्तधीः॥कथितं सुचरिते शंकरस्य परात्मनः ॥ 9 ॥
उन दयाटु निर्विकारी भभुन पूं एण्यके कारण मेरे शरीरको दग्ध नहीं किया ॥६१॥ ह ब्रह्मा ! यदि तुम्हारी यह इच्छा है किं महादेवजी |
रहण करं तो अहंकार रहित हो दूरा उपाय कीजिये यह मेरी सम्मति है ॥६२॥ बह्लाजी बोठे यह कह गकके देनेवाठे दीनवत्सक शंभुका स्मरणकर्
(| ओर सुङ्धको प्रणामकर् सपरिवार काम अपने आश्रमको गया ॥६३॥ इति श्रीशिवमहापुराणे भाषारीकायां श्रसंहिताऽन्तर्गतदितीय सतीखंड
‰ || कामभ्रमाबमारगणोत्पत्तिबणने नाम॒ नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ नारदजी बोठे हे बहन् ¡ हे विधे ! हे महाभाग ! शिवजीमं आसक्तं अद्धिवाटे
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| धन्य है परमात्मा भरीशंकराजीके चरि्रको आपने कहा ॥ १ ॥ रति ओर गणोके सह कामको अपने आश्रमम चे जानेपर कया |
आपने कया किया दह चरित्र इस समय कहो ॥ २ ॥ बह्लाजी बोरे हे नारद ! प्रसन्नता पंक महादेवजीके चरित्र सुनो जिसके भवणमाजसे
| मनुष्य निर्विकार होजाता है ॥ ३ ॥ कामके सपरिवार अपने आश्रमम चरे जानेपर उस समय जो हुवा वह चरित्र स॒ज्ञमे सुनो ॥ ४॥ हे
&|| नारद ! श्रीशिवजीमे अपना मनोरथ अपुण देखकर मेरे हृदयम विस्मय उत्पन्न हो मेरा मद नष्ट होगया ॥ ५ ॥ मै अपने चित्तम बहुत सोचत
£| निजाश्रमे गते कामे सगणे सरतौ ततः ॥ किमासीत्किमकार्षीस्त्वं तश्चरि्ं वदाधुना ॥ २ ॥ ब्रह्मोवाच॥ शणु नारद सुप्रीत्या
चरित्रं शशिमौलिनः।'यस्य श्रवणमाेण निविं कारो भवेन्नरः ॥ ३ ॥ निजाश्रमं गते कामे परिवारसमन्विते ॥ यद्वभूव तदा
जातं तच्चि निबोध मे ॥ ॥ नष्टोभूत्नारद मदो षिस्मयोऽभूच्च मे हदि ॥ निरानंदस्य च सुनेऽप्रणों निजमनोरथे ॥ ५ ॥
अशोचं वहुधा चित्तेगरह्णीयात्स कथं श्ियम्॥ निविंकारी जितात्मा स शंकरो योगतत्परः ॥ & ॥ इत्थं विचायं बहुधा तदाहं
५ विमदो सुने ॥ हारि तं सोऽस्मरं भक्त्या शिवात्मानं स्वदेहदम् ॥ ७ ॥ अस्तवं च श्ुभस्तोरेदीनवाक्यसमन्वितेः ॥ तच्छत्वा
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भगवानाश्चु बभूवाविहिं मे पुरा ॥ ८ ॥ चतुभुजोरविदाक्षः शंरववाजंगदाधरः ॥ ल्त्पीत पटश्श्यासततभक्तप्रियो हारि
॥ ९ ॥ तं दष्टा तादशमहं सुशरण्य मुहुसहुः॥ अस्तवं च एनः प्रेम्णा बाष्पगद्रदया गिरा ॥ १० ॥
रहा कि, वह विकार रहित निजात्मा योगम तत्पर शंकरजी किंञ्च प्रकार स्लीका हण करं ॥ ६ ॥ हे नारदजी इस भकार बहुत सोचकर मद्
रहित हो चैने शिव आत्मावाछे स्वदेह देनेवाठे हरिजीका भक्तिपूर्वकं स्मरण किया ॥ ७ ॥ ओर दीन वाक्योे युक्त उत्तम स्तोनोंदारा स्तुति
की, वह सुनकर भगवान शीघ्री मेरे समीप भरगर होगे ॥ < ॥ जो चतुभज कमर नेन शख पञ्न गदाधारी पीनपरटको धारण किये श्यामवणं
अग भक्तप्रिय श्रीहरिजी ॥ ९ \ शरणागत वत्सरुको वारवार देख नेमं जरुभर गद्वदवाणीरे फिर मरेमपुवंक स्पुति की ॥ १० ॥
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ह बोरे हे विषे! ||
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. द & स्ततिको सुन प्रसन्न हो ससे बोठे ॥११॥ हार बाट € +^.
९ भक्तोके = अं टये दख मेरी की दुर स्तु ट १ क ह्न
शि०्पु० अपने भक्तोके दुःखको नाश करनेवाे ब्रहमको शरणमे अये ह कदि करते हो ॥१२॥ तुमको कया दुत दवा वह मर सन्स कर र
|| न् ! महाभाज्ञ हे लोककं कर्ता ! तुम धन्य हो किस दिये मेरा स्मरण कर म्
॥८९॥ ||| बहन् ! महभाज्ञ ! ह लोक क्ती ! तुम धन्य ह ५११३ ब्रानी वोट, इसभकार विम्णका वचन सुन कुछ उच्टी शास
¢ हाथ जोड प्रणाम कर विष्णते भ बोढा ॥१४॥ ब्रह्माजी बौठ
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भने कृ । न 7 ञ् यकता नह् द ४ मर ¢
२ हे देवोंके देव हे रामनाथ हे मानक देनेवाटे ! मरी वात्तीको सुन कृपाकर दुःखको
हरिराकण्यं तत्सतो सुभरसन्न उवाच माम् ॥ दुःखहा निजभक्तानां ब्रह्माणं शरणं गतम् ॥ ११ ॥ इरिरवाच ॥ विधे ब्रह्मन्
क्रियते बुति: ॥ १२ ॥ किं जातं ते महदुःखं मदमे तद्रदा ४
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महाप्राज्ञ धन्यस्त्वं लोककारक ॥ किमथ स्मरणं मेऽय कृतं च विष्णोर किचि
धुना ॥ शमयिष्यामि तत्सवं नात्र कार्यां विचारणा ॥१३॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति चश्शुत्वा किचिद्च्छरवसिताननः ॥
¡ वचनं विष्णं प्रणम्य सुकृतांजलिः ॥१४ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ दैवदेव रमानाथ मद्वार्ता शृणु मानद् ॥ अत्वा च कर्णा
उ ॥ १ ५ रद्रसंमोहनार्थ हि कामं प्रषितवानदम् ॥ परिवारयुतं विष्णो समारमधुरबाधवम् ॥१६॥
चङ्कस्ते धिविधोपायन् निष्फला अभरव॑शच ते ॥ अभवत्तस्य संमोदो योगिनस्समदशिनः ॥ १७ ॥ इत्याकण्यं वचोमेस
हरिमा प्राह विस्मितः ॥ विज्ञातासिलदज्ञानी शिवततत्वविशारदः ॥ १८ ॥ ॥ विष्णु्वाच ॥ कृस्पाद्धेतोरिति मतिस्तव
जाता पितामह ॥ सर्वं विचार्यं सुधिया व्रह्मन् सत्य हि तद्वद् ॥ १९॥
दरकर सुती कीजये ॥१५॥ हे विष्ण ! रुके संमोहनाथे मेने सपरिवार मारगण ओर वर्तक साथ कामको भेजा था ॥ १६॥ उन्होने ५
हां बहुतसे उपाय किये परन्तु वह निष्फ होगये, उन समदर्शी योगीको मोह नहीं हुवा ॥१७॥ शिवतत्व विशारद सवज्ञ ज भ्रीहरिजी इस
|| भकार मेरे कचन सुन विस्मित हो सदमे बोटे ॥१८॥ विष्णजी बो हे पितामह ! कित ठि इसप्रकारकी म्हारी ठद्ि हई हे बहन्! यह सब
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| सत्यसत्य सङ्ञते कहो ॥१९॥ ब्रह्माजी बोछे हे तात ! उस्र चरित्रको सुनिये मोहन करनेवाटी आपकी माया है जिस्तके अधीन संपूणे जगत्
ह ओर वही सुखदुःखोको देनेवाटी है ॥ २० ॥ उसने सचे पाप करनेके ठ्य उयत किया हे देवेश ! सोमे आपकी आज्ञासि कहता हू ॥२१॥
भ्रारम्भमे दक्षादिकं दशणुत्र उत्पन्न हए ओर वाणीके द्वारा अत्यन्त सुन्द्री एक कन्या उतपन्न हदं ॥२२॥ छातीपे र्म, मनसे काम, देहे ओर
बहत हुए हे हरि!तब उस कन्याको देख सचे मोह उतपन्न हुवा ॥२३॥ ओर आपकौ मायते मोहित हो भने उस कन्याको कुदष्टिते देखा, तब उसी
॥ ब्रह्मोवाच ॥ शृणु तात चि तत् तव माया विमोहिनी ॥ तदधीनं जगत्सर्व घखडुः खादितत्परम् ॥२०॥ यथेव प्रेषित
आहं पाप करत समुद्यतः ॥ आसे तच्छृणु देवेश वदामि तव शासनात् ॥२१॥ सृष्टिप्रारंभस्षमये दश पुत्रा हि जज्ञिरे ॥ दक्षा
द्यस्तनया चैका वाग्भवाप्यतिसन्दरी ॥ २२॥ धमो वक्षःस्थलात्कामो मनसोन्योपि देहतः ॥ जाता स्तत्र खतां दृष्टा मम मोहो
भवद्धरे ॥२३॥ कुदष्टया तां समद्राक्ष तव मायाविमोहितः ॥ ततक्षणाद्धर आगत्य मामनिन्दत्छ॒तानपि॥२४॥ पिद्घरं कृतवान्
सर्वान् निजं मत्वा परप्रभुम्॥ ज्ञानिनं योगिनं नाथभोगिनं विजितेन्द्रियम्॥२५॥पुोभरत्वा मम हरेऽनिन्दन्मां च समक्षतः ॥
इति दुःखं महन्मे दि तदुक्ते तव सत्निधौ ॥२६॥ गृ्नीयायदि पत्नीं स स्यां खी नषटदुःखधी ॥एतदर्थं समायातुश्शरणं तव
केशव ॥ २७॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचो मे हि ब्रह्मणो मधुसूदनः विहस्य मां दुं राह , इर्षयन्भवकारकष् ॥ २८ ॥
विष्णुरूवाच ॥ विधे शृणु हि मद्वाक्यं सर्व भ्रमनिवारणम् ॥ सवं वेदागमादीनां संमतं परमार्थतः ॥ २९॥
समय महादेवजीने आकर सन्ने ओरमेरे पर्रोको बहुत धिकारा॥२४। हे नाथसे ज्ञानी योगी भोगरहिंतइन्द्रीजित परमभमुने अपना समञ्ञ सबको धिङ्ार
दिया ॥२५॥ हे हरे ! मेरे एत्र होकर सबके सन्यत मेरी निंदा की, यह य॒ज्ञे बडा दुःख है वही आपके समीप कहा ॥२६॥ हे केशव ! वह
जीका ग्रहण करं तब रे दुःख दृरहों ओर मे सुखी होऊ इसीषिे म आपकी शरण आया हूं ॥२७॥ बहलाजी बो खञ्च नहाके इसप्रकार वचन सुन
मधुसदन भगवानृने सकर संसारके करनेवले सञ्चको भसन करते हुए शीघ कहा॥ २८॥ विष्ण बोटे हे पिधि ! संपुणे वेद ओर आगमोंका सम्मत
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शि०४० || परमअरथते युक्त संपूणं श्रमोको निवारण करनेवाटामेरा वचन सु
॥९०॥
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वैसे होगये ॥३०॥ हे मदात्मा जडताको छोडो एेसी बुद्धि मतकरोतुमस्मर ( =
$ || रद परमेश्वरको अपना त्र जानते हो हे विधि ! तुम असिर वेद वक्ता होकर भी विज्ञानको भूरगये ॥३२॥ शंकरको सामान्य देवता समुकचकर
उने दोह करते हो तुम्हारी उत्तम बुधि नष्ट होग्ई, ओौर तुम्हारे कुमतिका आविभौष हवा ॥ ३९ ॥ निगमे कहा हुवा कल्याणके देनेवाला त्वक
महामृढमतिश्वा्य सजातोसि कथं विषे ॥ वेदवक्तापि निखिकलोककत्तौ हि दुभतिः ॥२०॥ जडतां त्यज मन्दात्मन् र् त्व
नेदशीं मतिम् ॥ किं इवत्यखिला वेदाः स्तुत्या तत्स्मर सद्धिया ॥ २१ ॥ र? जानासि दुबदध स्वृसुतं प्रमेश्वरम् ॥ वेद्व
क्तापि विज्ञानं विस्मतं तेखिं विधे ॥ ३२ ॥ शंकरं सुर्तामान्यं मत्वा दरोदं करोषि दि ॥ सुबुद्धिविंगता तेयाविभूता मति
स्तथा॥३३॥तत्त्वसिद्धांतमाख्यातं शृणु सद्बुद्धिमावह ॥ यथार्थं निगमाख्यातं निर्णीय भवकारकम्॥३९॥ शिवस्सवस्वकतां
हि भर्ता हतां परात्परः ॥ पर्ह्म परेशश्च नि्ंणो नित्य एव च ॥३५॥ अनिर्दश्यो निविकारी परमात्माऽद्रयोऽच्युतः ॥ अनं
तोतकरः स्वामी ग्यापकः परमेश्वरः ॥३६॥ शृष्टिस्थितिविनाशानां कत्ता िषणभाग्विधुः ॥ ब्रह्मविष्णुमहेशाख्यो रजस्सत्व
तमःपरः ॥३७॥ मायाभित्रो निरीदश्च मायो मायाविशारदः ॥' सगुणोपि स्वतंतरश्च निजानंदौ विकरपकः ॥ ३८ ॥ आत्मा
रामो हि निद॑न्द्ो भक्ताधीनस्सुविभरहः ॥ योगी योगरतो नित्य योगमागेभ्रदशंकः ॥ ३९ ॥
॥३५॥ अनिर्देश्य विकारर हित परमात्मा दरैतभावसे रहित अच्युत अनत ॐकार यमके स्वामी स्ंडयापक परमेश्वर है॥ ३६ ॥ सष्िकी उत्पत्ति स्थिति
विनाशक कारणके तीनों गणेि युक्त संसारके स्वामी ब्रह्मा विष्ण महेश इन नामोको धारण करनेवाठे सत्व, रज, तमेपरे ॥ २७ ॥ मायासे
भिन्न निरीह मायाकी मायाको जाननेवाठे यासे युक्त स्वतंत्र अपनेहीमं आनन्द माननेवाठे निर्विकल्पक ॥ ३८ ॥ अपनेहीमे रमण करनेवाठे
नो।; २९ ॥ हे विभि ! आप संपूणे लोकोकि क्ती ओर वेदकै वक्ता होकर महामृढमति
णकरो किरणं वेद स्ततिके द्वारा उन्हँ क्या कहते है ॥३१॥ हं सब्॒द्ध । |
सिद्धातको यथाथ निर्णय करके तुमसे कहता ह सो उसे चित्तदेकर घुनो॥ २४॥ शिवसबके कत्त देनेवाठे ओर हत्त परेसे परे परह परमईश निर्शण
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| निद, भक्ते आधीन उत्तम शरीरा योगी योगम रत नित्य॒ योगमागकै दिलानेवारे ॥ ३९ ॥ गर्वके हरनेवाछे सम्पूणं छोकोकै पति
£ | दीनपर प्रसन्न होनेवाछे इसपरकारके जो स्वामी है उन्हं तुम पत्र मानते हो ॥ ४० ॥ इस अपने अज्ञानको छोड उनकी शरणं जाओ
|| ओर सब भरकार आत्मा शम्भुका भजन करो वहं तुमको संतोष देंगे ॥ ४१॥ हे बहमन ! सदि तुम्हारा विचार है किं, शिवजी स्लीको श्रहण
ठ करं तो पार्वतीके उदेश्यसे शिवका स्मरण करके तप करो ॥४२॥ अपने कामका उदेश्य करके हदयमे पावंतीका ध्यान करो यदि वह भगवती ||
|| पर होगी, तो तुम्हारे सब काम पूणं होंगे ॥ ४३ ॥ वह पावती अवतार ठे गणस युक्त हो लोकम किंञ्लीकी मानुषी कन्या होगी तब वह ठ
¢ गवांपदारी लोकेशृस्सवेदा दीनवत्सलः॥ एतादृशो हि यः स्वामी स्वषु मन्यसेदि तम् ॥४०॥ इदृशं त्यज ज्ञानं शरणं बज ¢
| तस्य वै॥ भज सवांत्मनाशम्धुं सन्तष्श्शंविधास्यति॥४१॥ गृीयाच्छंकरः पत्नीं विचारो हदि चेत्तव ॥ शिवाशदिश्य खतपः ||
|| इरत शि समरन् ॥४२॥ छरभ्यानं शिवायात्स्वं कामसुदश्यतं डदि ॥ सा चेत्सा देवेशी स्व कर्य विधास्यति॥९३॥ ||
| ६ करृत्वावत।रंसणा यदि स्यान्मादषी शिवा॥ कस्यचित्तनया रोके सा तत्पत्नी भवेदधुवम्॥७७॥ दक्षमाज्ञापय ब्रह्मन् तपः कु््यां
४ तप्रयत्नतः॥ ताभरुत्पादयितं पत्नीं शिवार्थं भक्ति तर्स्वतः॥४५॥ भक्ताधीनौ चतौ ताते सुविज्ञेयो शिवाशिबौ।। स्वेच्छया सय॒णौ ४
जातौ पर्रहमस्वरूपिणौ ॥४६॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ इत्युक्ता तत्क्षणं मेशश्शिवं सस्मार स्व्रधुम्॥ कृषया तस्य सुप्राप्य ज्ञानसूचे
ट| च माततः॥०७॥ विष्णुरुवाच ॥ विधे स्मर परोक्तं यद्वचनं शंकरेण च॥ पराथितेन यदाबाभ्यासत्पत्नाभ्यां तदिच्छया ॥४८॥ ||
|| शीघरह शिवकी पत्नी होगी ॥ ४४ ॥ हे हनु ! तुम दक्षको तपकरते कषये आ्ञादो, वह पार्वतीको उत्पन्न केके स्यि युक्तिसे भक्तिूरवक ५
१ तप् करं ॥ ४५॥ हे तात ! उन दोनों शिवा शिवको भक्तकै अधीन जानो वहं परवहस्वहपी अपनी इच्छात सथण होते ह ॥ ४६ ॥ काजी ||
बोठे यह कह उसीक्षण अपने परभु ईश शिवका स्मरण कर उनकी रूपे ज्ञानको पाकर सघत बोरे ॥ ४७ ॥ विष्ण बोठे हे विधि ! उनकी ||£
>॥ इच्छासे उत्यन्न दूये हम दोनोके पार्थना करनेपर शंकरजीने जो वचन कहेथे उनका स्मरण करो ॥ ४८ ॥ ९
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शि०४० || +| वह शेकरकी माया धन्य है जिसके द्वारा मोहित हो वह सव भूख्गये जौ शिवजीकै विना दुःखत जानन योग्य है॥४९ ५ ( ध ¢
॥९१॥ ||2१|| इच्छासे सगुण हए, तब खुञ्चको ओर तुमको उत्पन्न कर अपनी शक्तिम विहार करतेहुए ॥५०॥ ह बथच् त ५. करनव्। 1 ्
£ जीने तुमको सृष्टि करनेका कार्थ ओर सश्ञे उनके पाठनका उपदेश दिया ॥ 4१ ॥ हाथ जोड नतमस्तक हो आप ओर हम दोनों शि सम्। ||
जाकर यह कहा कि, सवके ईश इच्छते अवतार टेनेवारे सखणरूपोको धार ह। ह (
|| विस्मृतं तव् तत्सर्व धन्या या शिवी परा ॥ तया मोहितं सर्व दुविज्ेया शिवं विना
च्छया निर्शंणश्शिवः ॥ मात्या ततस्त्वां च स्वशक्तया खविहारकृत् ॥ «° ॥ उपा
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| भूषुः ॥ तत्पालनं च मां अन् सोमस्शतिकरोऽभ्ययः ॥५१॥ तदा वां वेश्म संप्राप्तौ सांजली नतमस्तक ॥ भव त्वमपि सव
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ण करनेवाठे आपही ह ॥ ५२॥ इसपरकार कहनेषर नानारीकाओमें
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॥ ४९ ॥ यदा हि सशुणो जातस्स्े ¢
दिदेश त्वां शम्भुस्सृष्िकायं तदा #
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शोऽवतारी यणङूपधक् ॥५२॥ इत्युक्तः भाद स स्वामी विहस्य करुणान्वितः ॥ दिवसुदरीक्ष्य सुप्रीत्या नानालीलाविशारद ॥ ||
॥५३॥ मद्रूपं परमं षिष्णो हदशंदयंगतो विधेः ॥ प्रकरीमविता रोके नास्ना रदः भकीतिंतः ॥५8॥ पूणङपस्त म पूज्यस्सदा वां #
सर्वकामकृत् ॥ लयकर्ता गणाध्यक्षो निविशेषः सुयोगङ्ृत् ॥५५॥ भरिदेवा अपि मे हप इरः पूर्णो विशेषतः ॥ उमाया अपि ह
ह्ूपाणि भविष्यंति तिधा सुताः ॥ ५8 ॥ लक्ष्मीनाम हरेः पत्नी ब्रह्मपत्नीसरस्वती ॥ पूर्णह्या सती नाम इद्रपत्नी भविष्यति ४
॥५७॥ विष्णुक्वाच ॥ इत्युकत्भातर्हितो जातः कषां कृत्वा महेश्वरः ॥ अभूतां सुखिनावावां स्वस्वकार्थपरायणौ ॥ ५८ ॥ ४
प्रवीण करुणासे युक्त वे शिवजी हकर स्वगको देख बडी भरसननतासे बोले ॥५३॥ विष्णमेराही हप है इसी प्रकार विधिसे प्रगट हो छोकमेंरुद्रनामसे परसि
होनेवाटा भीही ह्॥ ५४॥ वे कयकःनेवाठेमेग णह नििशेष यो गोको करेवारे युणके खरप अ पटोगोके कायक पूणेकतेवाटे स लोगो पूजनीयहं ||
॥ ५५ ॥ विष्ण, बहला, शिव भेरेही रप, परंतु विशेषकर हर मेर पृणेहप है, पवंतीजीके भी इसीभकार तीनरूप होगे ॥ ५६॥ विष्णकी खक्ष्मी, ||
ब्हमाका सरस्वती, शिवकी पूणरूप सती होगी ॥ ५७ ॥ विष्ण बोठे छुपाकर महैश्वरजी यह कहकर अतर्धान होगये किर अपने कायम छ हम ॥-
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। ओौर आप ससी हृए।॥५८॥ हेवहानु समय पाकर हम दोनों पननीक होगे ओर शंकरने रु्नामसे कैठासपर्वतपर अवतार लिया है ॥५९॥ अब
४ | उत्पादनाथैयत्न करो ,जिसरम भजेश दशके यहा सतीनामसे शिवा पर्वती अवतार ले ॥६०॥ अत्यन्त करुणाकरके इतभकार कहं विष्णअंतधौन ||
# होगये तब भ अहंकार सक्त हो अधिक प्रसन्न हुआ ॥६१॥॥ इति श्रीशिवमहाष्राणभाषारीकायां रद्रसेहिताऽन्तगेतद्वितीयसतीखेडे कन्ना विष्णसवादो ठ
४ नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ॥ नारदजीवोठे हे बहनु ! तात ! हे महाभाज्ञ ! वक्ताओंमे शरेष्ठ विष्णक जानेपर कंया हवा, आपने क्याकिया सो
|| समथ पाप्य सञ्चीकावानां रह शंकरः ॥ अवतीरणस्स्वयंरुढनाम् कैलाससंश्रयः॥५९॥ अवतीणां शिवा स्यात्सा सतीनाम प्रजे |©
|| शवर ॥ तदु्पादनदेतोहि यलनोतः कायं एव वै ॥९०॥ इत्य का्दभ विष्णुः कृत्वा स कक्णां परम् ॥ पराप्ठुवं प्रदं चाथ ह्यधिकं त
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| गतमत्सरः ॥६१॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दरसंहितायां द्वितीये सतीखण्डेब्रह्मविष्णुरवादो नाम दशमोऽध्यायः त
|| ॥१०॥ नारद उवाच ॥। ब्रह्मन् तात महाप्राज्ञ वद नो वदतां वर॥ गते विष्णो किमभवद्कार्षीत्कि विधे भवान्॥१॥ ब्रह्मोवाच ॥
||| विग्रनन्द्नव्ं त्वं सावधानतया श्रण्॥ विष्णौ गते भगवति यदका्षमहं खलु ॥२॥ वियाविदयात्मिकां ्चद्धां परबक्मस्वहूपिणीम्॥
¢ स्तौमि देवीं जगद्धात्रीं दुर्गा शम्धुप्रियां सदा ॥३॥ स्त्र व्यापिनीं नित्यां निराटेबां निराङ्खाम्॥ भिदेवजननीं वंदे स्थूरस्य
लामरूपिणीम् ।४॥ त्वं चितिःपरमानद्ा परमात्मखशूपिणी । प्रसन्ना भव देवेशि मत्का् कक ते नमः ॥९॥ बरह्लोवाच ॥ |®
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ट| एवं संस्तूयमाना सा योगनिद्रा मया ने ॥ आविबेभूव प्रत्यक्ष देव चंडिका मस ॥ & ॥
तीनों देवताओंको उत्न्न करनेवारी स्थूटसे स्थ रूप्रहित भगवती आपको नमस्कार है ॥४॥ चिति प्रमआनंद प्रमात्माकै पको धारण करनेवारी
छद्से कदिे॥ १॥ बहलाजी वोटे टे भर विपणत् विष्णकै जानेपर भगवतीकै अथं जो भने किया बह तुम सावधान होकर सुनो ॥२॥ विथाकास्वूप शु \
|| आप प्रसन्न होकर मेरे कार्यको कर आपको नमस्कार है ॥५॥ बह्माजी बोठे हे खनि ! भेरे इसप्रकार स्तुति करनेपर योगनिङ्का चैडिका मेरे सन्खख 4
४ पर्रहप शिवकी प्रिया दुगा संसारक माता देवीजीकी सदा मेँ स्तुति करता रहा ॥ ३ ॥ हे सवस्थानवािनी नित्य अवलंबरहित, निराकुछ
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प्रगट होगई ॥६॥ चिकन अंजनके समान जिनकी युति सुन्दररूप दिव्य चतुभज सिंहपरसवार वरको हाथमे दयि युक्तामणिकै समान बारोकाटेदापन
॥७॥ शरत्काले चन््रमाके समान सुख उत्तम चन्द्रमा मस्तकमे तीननेत्र पूणे अंग सदर कमखके समान चरणके नखोकी शुति ॥८॥ ह छनि म उस
शिवजीकी शक्ति उमाको सन्खख देखसाटाङ्ग भणामकर स्तुति करेगा ॥९॥ बरह्ाजी बोडे जगत्क परवृत्ति निवृत्ति स्थिति खपको धारणकरनेवाटी
चर ओर अचरोंकी शक्ति सनातनी स्क मोहित करनेवाठी आपको नमस्कार है ॥१०॥ जो ठक्ष्मी सदा भगवानूकै मूतिकी माला ससारकापाठन
स्निग्धांजनद्युतिश्वारषूप। दिष्यचतुधुंजा ॥ सिंहस्था वरहस्ता च क्तामणिकचोत्कंटा ॥ ७ ॥ शरदिद्रानना श्रचन्द्रभाखा
त्रिलोचना ॥ सर्वावियवरम्या च कमलांभरिनखदयतिः ॥८॥ समक्ष ताघ्ुमां वीक्ष्य सुने शक्ति शिवस्य हि ॥ भक्त्या विनततुगंशः
परस्तं सुप्रणम्य वे ॥ ९॥ ब्रह्मोवाच ॥ नमोनमस्ते जगतःपवृत्तिनिवृतिरूपे स्थितिसगरूपे॥ चराचराणां वती सुशक्तिस्स
नातनी सर्वविमोह्न।ति ॥ १० ॥ या श्रीः सदा केशवमूर्विमाला विश्वंभरा या सकं बिभति ॥ या त्वं पुरा सृरिकरी महेशी
ह्रीं विलोक्य परा गुणेभ्य ॥११॥ या योगिनां वै महिता मनोज्ञा सा त्वं नमस्ते परमाणुसारे ॥ यमादिषते हदि योगिनां
या या योगिनां ध्यान पथे प्रतीता ॥ १२ ॥ प्रकाश्ुद्धयादिं युताविरागा स त्वं हि विद्या विविधावरबा ॥ कूटस्थमग्य
क्तमनतद्पं त्वं बिभती कारमयी जगंति ॥ १३॥ विकारबीजं प्रकरोषि नित्य गुणान्विता सवेजनेषु नूनम् ॥ त्वं वे गुणानां
च शिषे जयाणां निदानथूता च ततः परासि ॥ १४॥
करनेवाटी ओर सबको धारण करनेवारीहै जो आपपहिडे सट करनेवाखी हरेवारी ओर गणोके दारा तीनों लोकमि परे॥ ११॥जो यो गि्योके चित्तकी
हेतु ओर परमाणओंका सार है उस आपको नमस्कार है यमादिक ओर यो गियोके पवित्र इदयमे जो विराजमान जिसे योगी ध्यान मागमे देखते हँ
॥१२॥ शुद्ध प्रकाशसे युक्तं मोह रहित नाना प्रकारके अवटबोसे युक्तं वह विया आपही है, कूटमे स्थित अव्यक्त बहुतसे पोको धारण करनेवाटी
आप काटरूपसे संसारको धारण करती है ॥ १३ ॥ निश्वयते संपुणं प्राणियोम नित्यही यणे युक्त विकारे बीजको भरगट करती हो, है
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। आप तीनों यर्णोकी निदानमूत हो ओर उतत प्रे हो ॥ १४ ॥ सच्च, रज, तम, इन तीनो गाणोकि विकार से हीन आप ससार ||
य॒णोकी एक हतु दहको धारण करनेबाढी आप रक्षा करो ॥ १५ ॥ संपूणे सैसारकौ बीज जाननेबछे ओर ज्ञानकी स्वरूप संसारकी हित ||
शिषकी प्लनी आपको नमस्कार है ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी बोटे, यह मेरा वचन शुन संसारकी पूज्य काटी ्रीतिपुवेक सुज्ञ संसारकै उत्पन्न करने है
| बहते बोढी ॥ १७॥ देवी बोढी हे बधन ! किं णि आपने भेरी स्तुति की, यदि वह॒ कथनयोग्य हो तो भेरे समीप शीर कहो ||
॥ १८ ॥ भेर भ्यश्च होनेप्र ससारके काथ सिदध होते है यह निधित है इसटियि तुम अपना मनोरथ कहो जिसे मे भ्सन्नताे कर् ॥ ,१९ ॥
सत्वं रजस्तामस इत्यमीषां विकारदीना सञुवस्तिती्या ॥ सा त्वं गुणानां जगदेकटेतु ब्रह्मां तरारंभसि चात्सि पासि॥१८॥ अशे
घजगतां बीज जञेयज्ञानस्वूपिणि॥ जगद्धिताय सनतं शिवपत्नि नमोस्तुते॥ १६॥ ब्रह्नोवाच ॥ इत्याकण्यं वचः सा मे कारीरोक
विभाविनी ॥ प्रीत्या मां जगतामूचे सारं जनशब्दवत् ॥१७॥ देव्युवाच ॥ बरह्मनूकिमथं भवता स्तुताहमवधारय ॥ उच्यतां
यदि धृष्योसि तच्छीघ्रं पुरतो मम ॥ १८ ॥ प्रत्यक्षमपि जातायां सिद्धिः कार्यस्य निशिता ॥ तस्मात्त्वं वांछितं शरूदि या
करिष्यामि भाविता ॥१९॥ ब्रह्मोवाच ॥ शरण देवि महेशानि कृपां कृत्वा ममोपरि ॥ मनोरथस्थं सर्वज्ञे प्रवदामि त्वदाज्ञया
॥२०॥ यः पतिस्तव देवेशि लारान्मेऽभवत्पुरा॥ शिवो श्द्राख्यया योगी स वैँ कैलाततमास्थितः ॥२१॥ तपश्चरति भूतेश
एक एवाविकट्पकः ॥ अपत्नीको निर्विकारो न द्वितीयां समीहते ॥ २२ ॥ तं मोहय यथा चान्यां द्वितीयां सति वीक्षते ॥
त्वहते तस्य नो काविद्धविष्यति मनोहरा ॥२३॥
ब्रह्माजी बो हे देवि हे महेशानि ! स॒ज्ञपर रुपाकर सुनिये ! हे सर्वज्ञे ! आपकी आज्ञासे म अपने मनोरथको कहत हं ॥ २० ॥ हे देवेशि |
जो आपके पति पह मेरे मस्तके हुए थे रुदनामके शिवयोगी वह कैठास्े वियमान है ॥ २१ ॥ जो प्राणियों एकही विकल्प्रहित तप &
कृरते है वहं अपत्नीक विकाररहित दूसरेकी इच्छा नहीं करते ॥ २२ ॥ उनको आप मोहित कीजिये जिससे वे दृसरेकी ओर देसे आपको ट
‰॥| छोड ओर दूसरी उनके मनको हरनेवाढी कोह न होगी ॥ २३ ॥ त
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हे शिवे ! इसष्मि तुम्ही दक्षकी कन्या होकर हप दवारा हरको मोहित करके रुकी पतनी हौ ॥ २४ ॥ जिन्त भकार ठक्षमीका म
||| धारणक विष्यको भसन्न करती हो, उक्ती प्रकार संसारके हितके ल्यि उनको भी वसाही करो ॥ २५ ॥ ह दावं । काताके अभिलाषा मात्र
ही देखकर महादेवजीने मेरी निन्दा की सो वह अपनी इच्छसे किप भकार ली को रहण करगे ॥ २६ ॥ आओौर महादेवजीके ग्रहण करने
पर भी कैते उत्तम सृष्टि होगी १ क्योकि आदि मध्य अन्त इन तीनों अवस्थाओंम वह विरागयुक्त है ॥ २७ ॥ इस भकार चिता से युक्त
तस्मात्वमेव रूपेण भवस्व हरमोहिनी॥ खता भत्वा च दक्षस्य सदरपत्नी शिवे भव॥२४॥ यथाधृतशरीरा त्वं लक्ष्मीरूपेण केश
` बम्॥भमोद्यसि विश्वस्य हितायेतं तथा ङ ॥२५॥ कातामिलाषमा् मे दषटाऽनिदददृषध्वजः ॥ स कर्थं वनितां देवी स्वे
च्छया सं्रहीष्यति ॥२६॥ दरे शृदीतकांति त॒ कथ् सृष्िश्भावहा ॥ आद्यंतमध्ये चैतस्य हेतौ तसि्मिन्विरागिणि ॥२७॥ इति
शिण्पु° ¢
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वितापसे नाहं दन्य शरणं दितम् ॥ कृच्छरास्तेन विश्वस्य हितायेतत्कुर्ष्व मे॥२८॥ न विष्णुस्तस्य मोहाय न लक््मीनं ह
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॥९३२॥
मनोभवः ॥ न चाप्यहं जगन्मातनान्यस्त्वां कोपि 1 ॥२९॥ तस्मात्वं दक्षजा भूत्वा दिव्यष्पा सहेश्वरी ॥ तत्पत्नी भव
मद्धक्तया योगिनं मोद्येश्वरम् ॥३०॥ दक्षस्तपति देवेशि क्षीरोदोत्तरतीरगः॥ तवाघुदिश्य समाधाय मनस्त्वयि दत्रः ॥३१॥
ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्सा चितामाप शिवा तदा ॥ उवाच च स्वमनसि विस्मिता जगदम्बिका ॥ ३२ ॥
मिरेको सिवाय आपुकै दृसरेकी शरण हित नहीं है इस हेतु संसारके हितके निमित्त यह कीजिये ॥ २८ ॥ न विष्ण न लक्ष्मी न काम न मँ उनकै
मोहनम समथ हआ । हे जगन्माता ! आपके बिना ओर दूरा कोई समथं नहीं है ॥ २९ ॥ हे महेश्वरी ! इसलिये आप दिव्यहूपवारी दक्षकी
कृन्या होकर मेरी भक्ति उन योगी महेश्वरकी ब्वीहो ॥ ३० ॥ हे देवेशि ! क्षीरसुद्के उत्तरतीरपर दक्ष दृढवत हो अपने मनको ठगाकर
¦ आपहीके उदेशसे तप करते ह ॥३१॥ बरह्ाजी बोढे यह भेरा वचन सुन शिवा चिताको भप्त हहे ओर वह जगदम्बिका अपने मनमे सोचने
रु°्स.२
स.ख.२
अ०११
उरा जप > 4 + +न
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| ॥३२॥ देवी बोढी अहो यह बडा आशर्यं है कि, वेदके वक्ता संसारक रचनेवाठे विधाता महाअज्ञानसे युक्त हौ क्या कहं रहे हं ॥२३॥ ||
। हु रहित महामोह विधिके चित्तम उत्पन्न हुभा जिते निविकार शिवको मोहित करना चाहते ह ॥३४॥ महादेषजीकै मोहका व्र स्चसे नहा ¢
चाहते ई उन संसारकेस्वामी निह निविकल्पके मोहन करने क्था काम है ॥३५॥ परह वह शिव नियण विकाररहित् ई भ उनकी सदा ९
आज्ञाकी वशवर्िनी दासी हू ॥२६॥ वह स्वत परमेश्वर भक्ते उरणके हेतु शिव पूणैरपते रू हुये ॥ ३७॥ वह हरि ओर विधिके स्वामी
देव्युवाच ॥ अहो सुमददाशवयै वेदवक्तापि विश्वक्ृत्॥ महाज्ञानपरो भूत्वा विधाता कं वदत्ययम् ॥३३॥ विधेश्वेतसि संजातो ६
मदामोहोऽसुखावदः॥ यदवरं निविकारं तं समोदयितुमिच्छति॥३९॥ हरमोदवरंमत्तस्समिच्छति विधिस्त्वयम् ॥ कौ खाभोस्या्
स॒ विशरुनिमोहि निविंकलपकः॥३५॥ परत्रन्नाख्योयश्शंभुनिणो निविंकारवान्॥ तस्यां सर्वदा दासी तदाज्ञावशगा सदा ॥३६॥ ¢
स॒ एव पूरणष्पेणशुढनामाभवच्छिवः ॥ भक्तोद्वारणरेतो स्वतंजः परमेश्वरः ॥३७॥ हरोवधेश्च स स्वामी शिवान्न्यूनो न करहि
चित्॥ योगादसे द्यमायस्थो मायेशः परतः प्रः॥२८॥ मत्वा तमात्मने बर्मा सामान्य॒रसंनिभम् ॥ इच्छत्ययं मोदयितुम ||
तोऽज्ञानविमोदितः॥२९॥ न दावेदररं वेदनीतिभष्ठा भवेदिति॥ किं क्या येन न विभुः ऊदस्स्यान्मे महेश्वरः ॥४०॥ ब्रह्मो ||
वाच ॥ बिचा््येत्थं महेशं तं सस्मार मनसा शिवा ॥ प्रापाल्ञां शिवस्याथोवाच इगां च मां तदा ॥४३१॥ ॥ इर्गोवाच ॥ |£
यदुक्तं भवता ब्रह्मन् समस्तं सत्यमेव तत् ॥ महते मोदयिजीड शंकरस्य न विद्यते ॥ २ ॥
शिब किसी प्रकारसे कम नहीं है बह योगी मायासे रहित ओर मायाकै स्वामी परमे भी परे द ॥३८॥ अज्ञानसे मोहित बहा रेते रुदरको अपना
त्र मान सामान्य देवताके सदश जान मोहन कएनेकी इच्छा करते है ॥३९॥ यदि भँ बर न दूं तो वेदक नीति भरट होती है भै क्या कं
जिसमे वह स्वामी महेश्वर करद न हों ॥ ४० ॥ ब्रह्माजी बोले शिवने यह सोच महादेवजीका स्मरणकर महादेवजीकी आज्ञाको पाकर दुर्गानि
म्स कहा ॥ ४१ ॥ दुगा बोरी हे ब्रह्मन् ! जो आपने कहा सव सत्य ह से छोड शंकरको मोहन कणेवाटी दूरी नहीं है ॥ ४२ ॥
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शि०पु० ||| ओर यह आपका कथन सप है कि, महादेवजीकै खीय्रहण
॥९४॥ ८ हूं परन्तु आपके वाकयसे यज्ञम दिगण प्रयत्न हुआ ॥ ४४ ॥
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स.खं.२
अ०१२
न करनेपर सनातनी सृष्टि न होगी ॥४२॥ मै भी उस महापभुकै मोहनमे समथ नहीं
हे विधि, म वह उपाय करगी जिसमे शंकरजी मोहित हो स्वयं चीका रहण
करे ॥ ४५ ॥ जिस भकार महाभागा उक्ष्मीजी विष्णकी श्रिया है, तीका रूप धारण कप उसी भकार मँ उनकी वशवाविनी होगी ॥४६॥
ओर उन्हीकी कपासे मेँ वह उपाय करंगी जिसमे वह सद् भेर वशवर्ती रहै ॥४७॥ हे पितामह ! दक्षकी स्ञीम उत्पन्न ह सतीरपसे भँ टीला
हीते शकरजीको जीत हंग ॥ ४८ ॥ जिस रकार ओौर भी जन्तु द्ीके वमे होते ह उसी प्रकार मेरी भक्तिसे वहं महादेव ख्रीके वश हो जायेगे
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त्दाक्या्िगणोमेदप्रयत्नोऽभूत्स निर्भरः॥४४॥ अदं तथायतिष्यामि युथा दारा रहम्। ९९ कृरिष्यतिविषेस्वयमेव विमोहितः
॥४५॥सतीमरूतिमरधृत्वा तस्येव वृशवतिनी॥ मविष्यामि महाभागा लक््मीर्विष्णोर्यया परिया॥४६॥यथा सोपि मयवेय् वशवर्तीसदा
भवेत्॥ तथा यतनं करिष्यामि तस्थेवं कृपया विधे॥४७॥ उत्पत्रादक्षजायायां सती्पेण शंकरम्॥ अहंसभाजयिष्यामि लीख्या तं
पितामह ॥४८॥ यथान्यजंतुरवनौ वतते वनितावशे॥ मद्वक्त्या म॒ हरो वामावशवतीं मविष्यति॥४९॥ ब्रह्मोवाच ॥ मह्यमिर्त्थ
समाभाष्य शिवा साजगदभ्विका। वक्ष्यमाणा मया तात तचैवदषे ततः॥५०॥ तस्यामता्ितायां तु सोदकोकपितामहः॥अगमं
|| क्र स्वघुतास्तेभ्यस्सर्वमवर्णयम्॥५५१॥ इति श्रीशिवपुराणेद्वितीयायां ङूटसंहितायां सतीखण्ड दुगास्त॒तित्रह्वरमप्तिव्णनोनामे
कादशोऽध्यायः ॥११॥ नारद उवाच ।॥ ब्रह्मन् शंयुवर प्राज्ञ सम्यगुक्तं त्वथानध्॥ शिवाशिवचरिं च पावितं जन्म मे दितम् ॥१॥
॥ १९ ॥ बह्नाजी बे हे तात ! स॒मे यह ककर वह जगतकी भाता पार्वती मेरे देखते ही देखते अन्तधीन हो गई॥५०॥उनके अन्तधीन
हो जानेषर सञ्च संसारके पितामह बह्माने अपने एरौके पास आकर सवे कहा ॥ 4१ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणभाषारीकायां रद्रसंहिताऽन्तगेत
4 वितीयसतीसण्ड दुगौस्तुतिवहवरभाभिवर्नंनामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ ॥ नारदजी बटे हे ब्रहाजी । हे भ्रज्ञ ! हे पापरहित ! हे शिवभक्त ।
|| आपने कल्याण देनेवाछे पाती ओर शिवके चरित्रको कहा, ओर भेरा जन्म पवित्र किया ॥ १ ॥
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६
हरऽगदीतदारे तु स्॒नैषा सनातनी॥ भविष्यतीत तत्सत्यं भवता ग्रतिपादितम्॥९२॥ ममापि मोहने यत्नो वियतेस्य॒ महाप्रभोः॥ |
|
इदानीं वद दक्षस्तु तपः कत्वा दृढव्रतः ॥ कं वरं प्राप देव्यास्तु कथ सा दक्षजाऽभवत् ॥ २ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ शृणु नारद
धन्यस्त्वं अुनिभिरभक्तितोखिेः ॥ यथा तेपे तपो दक्षो वरं प्राप च सुव्रतः ॥ ३ ॥ मदाज्ञपस्खधीदंक्षस्समाधाय महाधिषः ॥
अपाद्यष्ं च तां देवीं तत्कामो जगदंबिकाम् ॥ ¢ ॥ क्षीरोदोत्तरतीरस्थां तां कृत्वा हदयस्थिताम् ॥ तपस्तप्तु समारेभे दष्टं
म्रत्यक्षतोम्बिकाम् ॥ ५॥ दिव्यवपण दक्षस्तु सदखाणां य समाः ॥ तपधचार नियतस्सं यतात्मा दटत्रतः ॥६॥ मार्ताशी
निराहारो जखाहारी च पर्णथुक् ॥ एवं निनाय ते काटे चितयन्तां जगन्मयीम्॥७॥ दुर्गाध्यानसमासक्तधिरं कालं तपोरतः॥
यमेबेहुमिर्देवीमाराधयति सुत्रतः॥ ८॥ ततो यमादियुक्तस्य दक्षस्य सुनिसत्तम ॥ जगदम्बां प्ूजयतः प्रत्यक्षमभवच्छिवा
॥ ९ ॥ ततः प्रत्यक्षतो द्रा जगदम्बां जगन्मयीम् ॥ कृतकृत्यमथात्मानं मेने दक्षः प्रजापतिः ॥ १० ॥ सिदस्थां कालिकां
कृष्णां चार्ूवक्रां चतुुजाम् ॥ वरदाभयनीलाब्जखद्धदस्तां मनोहराम् ॥ ११ ॥
दक्षने पत्ते ओर वायुभक्षण करते ओर निराहार हो समय व्यतीत किया ॥७॥ शिवाकै ध्यानम कदाचित् बहत दिनतक अनेक नियमो देवीका
आराधन करते हुये तप करने गे ॥८॥ हे सने ! यमादिकोसे युक्त जगदम्बाका पूजन करते हये दक्षे सामने शिवा भरगर हो गर्द ॥ ९ ॥
जगन्मयी जगत्की माता शिवाको देख भरजापतिं दक्षन अपनेको छतरूत्य माना ॥१ ०॥ सिंहर बेठे हदं रुष्णवणं सुन्द्र खखवाटी चारभुना धारे
५९
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| सभय यह किये कि हदबत दक्षजीने शिवाका तपकर किस वरको प्राप्त किया, ओर शिवा कैमे दक्षकी कन्या हुई ॥ २ ॥ अह्लाजी बोरे
नारदजी आप सब यनियोमे धन्य ह जेसे दक्षने तप किया ओर वर पाया, सो भक्तिसे षुनो ॥ ३॥ मेरी आज्ञासे दक्षने उस कामके छ्य जगत्
करी माता देवीकी धारणा कर दशय निमित्त ॥ ४ ॥ क्षीरोदके उत्तर तीरप्र उनको मनम धारणकर प्रत्यक्ष जगदम्बिकाको देखनेकै टिये तप
करना भ्ारम्भ किया ॥ "५ ॥ दक्षने ३ हजार वषं नियतात्मा ओर हतास नियमपुवक तप किया ॥६॥ जगन्मयी उस शिवाका ध्यान करते हए
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वर देनेवाटी नीककमलके समान हस्तभं खद्ध वारण कथि हए मनोहर लाठनेजवाटी खुरेकेश जगतकी सृष्िकी कारणी सुन्दर कान्तिवाटी
शिवाको भणाम कर दक्षने विचित्वाणि्ोसे शिवाकी स्तुति की ॥ ११ ॥ १९ ॥ दक्ष बोढा, हे जगन्माता ! हे महामाया ! जगत्की सा |£
मिनी ! है महेष्परि ! आपने बडी छुपाकर अपने शरीरका दशन दिया है, इसमे आपको नमस्कार है ॥१३॥ शिवस्वरूपिणी आया शुक्ति है
भक्तको वर देनेवाटी संसारकी माता आप भरतम् होओ, आपके ठिए नमस्कार हे ॥ १४॥ ब्रह्माजी बोडे, बतसंयमवाले दृक्षसे दस प्रकार &
सुति की हृदं शिवा उस दृक्षके ईप्सितको जानती हृदं दक्षसे बोटी ॥ १५॥ देवी बोली, हे दक्षजी ! आपकी इस सद्धकितसे अरत्यत प्रसन्न :
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॥९२।
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¢ आरक्तनयनां चारशक्तकेशीं जगत्सम् ५ तष्टा वाम्मिधित्राभिः खु्रणम्याथ सखुम॒भाम्॥१२॥ दक्ष उवाच ॥ जगदेव महामाये ||
¢| जगदीश महेश्वरि ॥ हपाङतवा नमसतस्त॒ दशितं स्ववपुरमम॥१२॥ प्रसीद भगवत्याये भसीद शिवह्पिणम्॥ प्रसीद भक्तवरदे |©
¢ जगन्माये नमोस्तुते ॥१४॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्तता मदेशानी दक्षेण भ्रयतात्मना ॥ उवाच दक्षं ज्ञात्वापि स्वयं तस्येप्सितं घुने ||)
| ॥१ ८५॥ देग्युवाच॥ तुष्टाहं दक्ष भवतस्सद्वक्तया द्यनया शम् ॥ व वृणीष्व स्वाभीष्ठं नादेयं विद्यते तव ॥१९॥ ब्रह्मोवाच ॥ $
¢ जगदम्बावचशशुत्वा ततो दक्षः प्रजापतिः॥ सुप्रतर, प्राई नाम नां च तां शिवाम् ॥१७॥ दक्ष उवाच॥ जगदम्बा महामाये ;
¢ यदि त्वं वरदा मम॥ मद्वचः सुप्रीत्या मम कारम प्रपूरय ॥१८॥ सम स्वामी शिवो यो हि स जातो ब्रह्मणस्त॒तः॥ शद्रनामा ए
९ परणूपावतारः परमात्मनः॥१९॥ तवावतारो नो जातः का तत्वत्नी भवेदतः॥ तं मोहय महेशानमवतीयै क्षितौ शिवे ॥२०॥ ५
।
रु. ध द
५ ह ह, स्वाभीष्ट वर मागो आपके किए अदेय कुठ नहीं ॥ ॥ १ ६॥ बहा बोरे, प्रजापति दक्षन जगदम्बाके वचनको सुन महाप्रसन्न हौ शिवाको
१ प्रणाम करते हूए बोठे ॥ १७ ॥ दक्ष बोठे, हे जगन्षाता ! ह महामाया | आप् याद् भसन ह तो मेरे दचनको सुन ओर भ्रसन्नतासे |
कामको पूणे करं ॥ १८ ॥ जो शिव भेर स्वामी है वै परमात्मा बहक पूर्णं अवतार ब्ह्लाके एत्र हपसे हुए है ॥ १९ ॥ हं शवे ! ओर
आपका अवतार नहीं हुआ है, उनकी ची कौन हो अतः आपी पृथ्वीपर अवतार ठे उनको मोहौ ॥ २० ॥
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तुमको छोड उनको मोहनेभं कितीकी शक्ति नहीं है, इतत मेरी पत्री हो शिवकी पत्नी आप् हों ॥ २१ ॥ इस भकार ीठाकर हरमोहिनी ]|
आप हो, यही हमारा वर है, सो आपके सामने सत्य कह दिया ॥ २२ ॥ बहला, विष्ण, शिव ओर सब रंसारकै कंल्याणहीकै घ्य कैवङ ट
ब्र्ाजीने मुञ्चे भेजा है ॥ २३ ॥ बाजी बोरे, जगदम्बा शिवा रसे दक्षके वचनको सुनकर शिवजीको मनमे स्मरणकर हंसकर बोली ¢
॥ २४ ॥ देवी बोटी) हे एत्र ! प्रजापति दक्च ! बुनो, तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न मै सत्य कहती हं ॥ २५ ॥ तुम्हारी भक्तिसे वशीभूत मेँ
म्
त्वहते तस्य मोदाय न शक्तान्या कदाचन ॥ तस्मान्मम सुता भत्वा दरजायाभवाऽधुना ॥२१॥ इत्थं कृत्वा सुलीलां च भव
त्वं दर मोहिनी ॥ ममेवैष वरो देवि सत्यशुक्तं तवाय्तः॥२२॥ केव स्वार्थमिति च स्वेषां जगतामपि ॥ बरह्नविष्णुशिवानां च
बरह्मणा प्ररतो ह्यहम् ॥२२॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं प्रजेशस्य वचनं जगदम्बिका ॥ पत्युवाच विहस्येति स्म॒त्वा तं मनसा
शिवम्॥ २७॥ देव्युवाच्॥ तात् प्रजापते दक्ष शृणु मे परमं वचः॥स॒त्यं वीमि त्वद्भक्त्या सुप्रसत्राखिख्प्रदा ॥२५॥ अहं तव सुता `
दक्ष त्वलायायां महेश्वरी॥भविष्यामि न संदेदस्त्वद्धक्तिवशवतिनी॥२६॥तथा यत्नं करिष्यामि तपः कृत्वा दुस्सहम् ॥ हरजाय।
भविष्यामि तद्वरं प्राप्य चनघ्॥२७॥ नान्यथा करयसिद्धिहिं निर्विकारी च स् प्रथुः॥ विधेर्विष्णोश्च संसेव्यःपूणं एव सदाशिवः
॥२८॥ अहं तस्य सदा दासी प्रियाजन्मनि जन्मनि॥ मम स्वामी स वे शंभुनौनाहूपधरोपिह॥ २९॥ वरपभावाद्थुङ्कटेरवती्णों
विधत्म च्॥ अहं तद्वरतोपीहावतरिष्ये तदाज्ञया ॥३०॥ गच्छ स्वभवनं तात मया ज्ञाता तु दूतिका॥ हरजाया भविष्यामिशरता
ते तनयाचिरात्॥२१॥ इत्युक्ता सद्रचो दक्षं शिवाज्ञां पराप्य चेतसि ॥ पुनः प्रोवाच सा दवीं स्मृत्वा शिवपदाम्बुनम् ॥२२॥
तुम्हारी श्म तुम्हारी पत्री होऽगी, इतं सन्देह नहीं है ॥ २६ ॥ देस दुःसह तपृकर यतन करूंगी जिस तपसे वर॒ पाकर शिवजीकी पत्नी
होजाऊं ॥ २७॥ बहला विष्णते सेवित निर्विकारी उन पृणशिक्मं बिना तपृके कार्थमिद्धि न होगी ॥ २८ ॥ म उनकी भत्येक जन्ममे दासी
हीह, ओर नानारूप धारण करनेवाठे पै भी मेरे प्रति है ॥ २९ ॥ कहके वरके भावे बे रुद् हुए है, हमभी उन्ीके वर ओर आज्ञा
अवतार ठेगी ॥ ३० ॥ हं एत्र ! घर जाओ शीघही भँ तुम्हारी कन्या हौ शिवपत्नी होगी ॥ ३१ ॥ इस प्रकार दक्षको ब्र ओर ६
04
~
£~
> 4९4 00 ~ 6
च्व
शिवा फिर बोटी ॥२२॥ हे दक्षजी! मेर भ्रणको चिन्तसे याद रक्खो, किमे जो कुछ
१ । ॐ ॐ
वरजानेकी आज्ञा दे शिवकै चरणारविन्दको स्मरण कर ह चि
कहती ह वह त्यही है हठ न समजञाना ॥३३॥ यदि भाप मेरा निरादर करगे ता ५ अपना शरीर छोडी मँ अपनेमं वशीमूत हूं ॥३४॥ ह
दक्षजी ! मेँ भत्येक सृषं आपकी सुता हो शिवकी पत्नी होऊगी, यह वर आपको दिया ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजी बोठे, महेशानी शिवा मुख्य
प्रजापति दक्षते यह कहकर शीप्रही दक्ष देखते हुए अन्तर्पान होगई ॥२६॥ दु्गाके अन्तर्धान होनेपर दक्ष भी अपने आश्रमको चटेगये, यह
हमारी हता होंगी यह मान हषको भप्त हुए ॥३७॥ ॥ इति शरीशिवमहाराणमाषारीकायां रदरसंहिवाऽन्तगतद्वितीयसतीसडे दक्षवरामिवल
परन्तु पण आधेयो मनसा ते. परजापते॥ श्र षयिष्यामि ते तैःवे सत्य जानीदि नो सृषा॥३३॥ युदा भवान् मयि पुनर्वन्मं
शि०४० ¢
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६ > निजं + ।
ट| दाद्रस्तषा ॥ देहं तयक्षये निजं सत्यं स्वात्मन्यस्म्यथ वेतरमू ॥२६॥ एष दततरतन वरः प्रतिसग् प्रजापते ॥ अहं तव सुता
ए
ट
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॥९६॥
त्वा भविष्यामि दुरम ॥३५॥ बर्मोवाच ॥ एवा महेशानी द युख्यभनापतिम्॥ अंते तं तन सम्यग् दकस्य
पश्यतः॥३६॥ अतदितायां दगांयां स दक्षेपि निजाश्रमम् ॥ जगाम च सुदं लेभे भविष्यति सुतेति सा॥२७॥ इति श्रीशिवमहा
पुराणे द्वितीयायां शदरसंहितायां द्वितीये सतीखंडे दक्षवरपराप्निवर्णनो नाम द्वादशोऽध्यायः॥१२॥ नारदं उवाच ॥ ब्रह्मन्विधे महा
जञ वदनो वदतां वर ॥ दकष गृह गते प्रीत्या किमभूततदनंतरम् ॥१॥ ब्रह्मोवाच ॥ दक्षः प्रजाप्तिगत्वा स्वाश्रमं ₹ष्टमानसः ।
सरी चकार बहुधा मानसं मम चाज्ञया ॥२॥ तमढंहितमालोक्य प्रजासर्ग प्रनापतिः॥ दक्षो निवेदयामास बरह्मणे जनकाय मे
॥ ३ ॥ दक्ष उवाच ॥ ब्रहमस्तात प्रजानाथ वदधते न प्रजाः प्रभो ॥ अया विरचितास्सर्वास्तावत्यो हि स्थिताः खड ॥ ४ ॥
नाम दवादशोश्यायः ॥ ॥ १२ ॥ नारदजी बोठे, हे बहन् ! हे विषे ! महाभाज वणन करनेवाटोभ भष भीतिपूवं कहौ दक्षै षर |
क्या हभ ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोठे, भतन हो दक्षे षरजानेपर मेरी आक्ञसे दक्षने बहृतत्ती मानती सृष्टिकी रचना की ॥२॥ दक्ष उस्
भासक बढता दभा न देल उलन करनव रह्मते यह बोले ॥ ३॥ दक्ष बोढे, ह बहन् ! ताव ! हे परनानाथ ¦ मैने बहुत विचारकर
देला है कि, आपकं प्रजाकी बृद्धि नहीं होती, उतनेही विमान ह ॥ ४ ॥
स.खं.२
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हे भरजानाथ ! मँ कया कर अपनेको किम प्रकार बढाऊ, वह उपाय आप बाताङ्ये जिससे म निस्सन्देह प्रजाकी सृष्टि कर ॥ ५ ॥ बह्ाजी
बोछे, हे दक्ष प्रजापति ! हे तात ! मेरा वचन सुनो, तुम वही करो शिवजी तुम्हारा कल्याण करेगे ॥ ६ ॥ हे प्रजापति ! जो पंचजनक
अगे उत्पन्न असिक्नी नामकी कन्या है हे प्रजेश ! उसे तुम ब्खीके टियि ग्रहण करो ॥ ७ ॥ च्ीके व्यवाय रूपी धककै द्वारा फिर इस प्रजा
| करो ओर तुम उस्र कामिनीमे बहते भाव करो ॥ < ॥ ब्रह्माजी बोरे, फिर मेरी आज्ञासे मेरे एत्रने मेथुनधर्मके द्वारा बीरिणीे
किं करोमि प्रनानाथ वद्धैयुः कथमात्मना ॥ तदुपायं समाचक्ष्व प्रजाः कुर्या न संशयः ॥ ^ ॥ ब्रन्नोवाच ॥ दक्ष प्रजापते
तात शृणु मे परम् वचः॥ तत्छुश्ष्व सुरश्रष्ठ शिवस्ते शं करिष्यति॥&॥ या च पञ्चजनस्यांग सुता रम्या प्रजापतेः ॥ असिक्री
नाम पनीत प्रनेश प्रतिगह्यताम्॥७॥ वामग्यवायधमेस्त्वं प्रजासगेमिमं पुनः ॥ तद्विधायां च कामिन्यां भूरिशो भावयिष्यसि
॥८॥ ब्रह्मोवाच ॥ ततस्समुत्पादयितु प्रजा मेथुनघर्मतः॥ उपयेमे वीरणस्य निदेशान्मे सुतां ततः॥९॥ अथ तस्यां स्वपलन्यां
च वीरिण्यां स प्रनापतिः ॥ दय॑श्वसंज्ञानयुतं दक्षः पुत्रानजीजनत् ॥ १० ॥ अप्थग्धमंशीटास्ते सर्वं आसन् सुता सने ॥
पित्तभक्तिरता नित्ये वेदमागैषरायणाः ॥ ११ ॥ पितप्ोक्ताः प्रजासगैकरणा्थ ययुदिशम्॥ प्रतीचीं तपसे तात सवे दाक्षायणा
स्सुताः ॥१२॥ तच्च नारायणसरस्तीथ परमपावनम् ॥ संगमो यत्र संजातो दिव्यसिन्धुसशुदयोः ॥ १३ ॥ तदुपस्परीनादेव
प्रोत्पन्नमतयोऽभवन् ॥ धम पारमहंसे च विनिदूर्धूतमलखाशयाः ॥ १४ ॥
भजाका उतपन्न करना भारम्भ किया ॥ ९॥ ओर प्राजापतिने उस्च अपनी वीरिणी च्ञीमे हरयश्च नामके एतरोको उत्पन्न किया ॥ १० ॥ ह
खनि ! वह एत्र वेदमागेमे परायण पिताक समान धमेवाे नित्य ही पिताकी भक्तेभं रतहये ॥ ११ ॥ वह सब दक्षक द्वारा उत्पन्न होनेवारे
त्र पिताकी आज्ञासे प्रजा उत्पन्न करने निमित्त तपके हेतु पवदिशाको गये ॥ १२ ॥ वै उत्तम सिन्धुसमुदरसेगममें परम पवित्र नारायणसषर
नामक तीथपर गये ॥ १३ ॥ जिसके स्पशमात्रसे निभेढ बुद्धि हो मल्कै आशयोतते ट पारमहंसधर्ममं स्थित हो ॥ १४॥
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शि०इ०॥ ६८|| पिताकी आज्ञाते दक्षके एत्र दवत हो प्रजाबृद्धि करनेकै हेतु वहां उत्तम तप करनेकगे ॥9 ५॥ है नारद { तन् तुम् सृष्टिक हत तप् करते दए उनकौ =
लक्ष्मीपतिके हार्दको जान वहां गये॥ १६॥ ओर दक्षके एत्र हयश्वादिकोति सत्कारपर्वक बोटे कि,पृथ्वी को विना देखे हूए वित्त प्रकार सुषि क
॥९.\७।
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त उपदेश किये हूए निद देनेवाे उत्तम शाच्चको जो नहीं जानता वह शणरहित किंत॒भकार सर्मको करसकता ३॥ १९॥ उत्तम बुद्धि वएकही
४ रजावि्द्धये ते वे तेपिर त सत्तमाः ॥ दाक्षायणा दढात्मानःपिादेशसुयत्रिताः॥ १५॥ त्वं च तान् नारद् ज्ञात्वा तपतस्खछष्टि
¢ हेतवे ॥ अगमस्त भूरीणि हारदमाज्ञाय मापतेः॥१६॥ अदृक्वा त धुवस्सृषटि कथ कतु सुदता ॥। यर्वा दक्षतनय इत्यवोचस्त
मादशत् ॥ १७॥ ब्रह्मोवाच ॥ तत्निशम्याथ इर्य॑श्वास्ते त्वदुक्तमतंद्रिताः ॥ ओत्वत्तिकधियस्सव स्वयं विममुजुभशम् ॥१८॥
सुशाघ्लजनकादेशं यो न वेद निवर्तकम्॥स कथं यणविश्र॑भी कतं सगेसुपक्रमेत्॥१९। ।इति निभित्य ते पुतरास्युधियश्चकचतसः॥
प्रणम्य त परिकिम्यायुर्मागमनिवर्तकम्॥२०॥ नारद त्वं मनश्शंभोर्छोकानन्यचरो सुने ॥ निर्विकारो महेशानमनोव्त्तिकरस्तदा
॥२१॥ काले गते बहुरे मम ञः प्रजापतिः॥ नाशं निशम्य प्राणां नारदादन्वतप्यत ॥ २२ ॥ युदुरूवाचेति सुप्रजात्वं
डुचां पदम्॥ जुशोच बहुशो दक्षशशवमायाविमोहितः॥२३॥ अहमागत्य सुप्रीत्या सात्वयं दक्षमात्मजम्॥ शांतिभावं प्रदश्यैव
देवं प्ररलमिस्युत ॥२४॥ अथ दक्षः पैचजन्यां मया स परिसांत्ितः ॥ सबराश्वाभिधाच् पुत्रान् सदश्च चाप्यजीजनत्॥२५॥
चित्तवाटे बह एत्र यह निध्वय कर परिक्रमा व प्रणामकर रसे मार्गमे गये जिहते खौट न सके ॥ २० ॥ हे नारद सुने । लोकम घूमनेवारे शेकरके मन
ह|| भाप निविकारी शकरजीके मनकी इ्तिको सदा करनेवाके॥ २१(.फिर बहतकार वीतजानेके पीठेभेर भरजापति एत्र अपने हरय॑श्वादिक एतो का नाश
ट| जानकर नारदसे कुद हुये॥ २२॥ तुम पवित्रपदवाठे उत्तम भजसे युक्त इसभकार बारम्बार कृकर शिवकी भाया मोहित दक्ष अत्यन्त शोच करने
|| खमे॥ २३॥ तब मेने आकर अपने प्र दक्षकरो देवकी पवता बताकर शांतिका भाव दिखाय भीतिपू्वक शांत किया ॥ २४ ॥ मेरेदारा शांवकियेटय
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¢ निमित उयत होगपे हे ॥ १७ ॥ ब्रह्माजी बो, तब हयेश्वोने तुम्हारी बातको सुन उत्पन्न करनेवारी बुद्धिको स्वय भूटगये ॥ १८ ॥ पिताक ४
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| करनेके ङि उनके पहिले भाई गये थे ॥ २६ ॥ उशके स्पशते पापको नषटकर नि्ैर बुद्धि हो उ्तमवतसे बहो जपते हुए कठिन
तप॒ करने ठगे ॥ २७ ॥ ईश्वरकी गतिका स्मरणकर उनको भरजासरगमे उयत जान नारदजीने वहां जाकर पहिरेहीकै समान उनसे भी
कहा ॥२८॥ हे शने ! तुमने उन्हं भी भाईके मागैको दिलाया तन वे एत्र भी अपने बडे माहयोके भागको चे गये ॥२५॥ वह प्रजापति
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तेपि जग्युस्तच सुताः पिजरादिष्ठा रदव्रताः ॥ प्रजासगें अर सिद्धास्स्वपूर्वभ्रातरो यथुः ॥२६॥ तदुपस्पर्शनादेव नघ्ठाघा विमला ट्
शयाः ॥ तेपुर्मदत्तपस्तज जपन्तो बह्म सुत्रताः ॥२७॥ प्रजासर्गोयतांस्तान् वै ज्ञात्वा गत्वेति नारद ॥ पूर्ववच्चागदो वाक्यं संस्म है
रतरश्वरीं गतिम् ॥२८॥ भातृपंथानमादिश्य त्वं शनेमोघदशेनः ॥ अयाश्चोदरध्वगति तेऽपि भात्मारगं ययुस्स॒ताः ॥२९॥ उत्पा ह
तान् बहुशोऽपश्यत्तदेव स प्रजापतिः ॥ विस्मितोभूत्स मे पुत्रो दक्षो मनसि दुःखितः॥३०॥ पूर्व॑वत्त्वत्छृतं दक्षश््ुश्राव चकितो ट
भृशम् ॥ पुत्रनाशं शशोचातिषुत्रोकविमूछितः॥३१॥ क्रोध तभ्य दक्षोसौ दु्टोयमिति चाजवीत्॥ आगतस्तज दैवात्वमन |¢
गरहकरस्तदा ॥३२ ॥ शोकाविष्स्सदक्षो हि रोषविस्फुरिताधरः ॥ उपरभ्यतमाहत्य धिग्धिक् परोच्य विगह॑यन् ॥३३॥ दक्ष ९
उवाच ॥ किं कृतं तेऽधम्रेष्ठसाधूनां साधुरिगतः ॥ भिक्षोमार्गोऽभैकानां वे दशितस्साधुकारि नो ॥३४॥ ८
अपने उत्पन्न किंये हए बहूतसे एत्रोको आया न देखकर मेरे एत्र दक्ष ॒विंस्मयको भराप्त हौ मनम दुःखी होते हए ॥ ३० ॥ पहिेके समान ट
तुम्हारे किंयेको सुन दक्ष चकित हो पुत्रका नाश जान शोचकर पुत्रके शोके सूत होगये ॥३१॥ कोधकर दक्षने तुमको कहा कि, यह ट
दष्ट हे उसी समय अलु्रह करनेवाठे देवता आगे ॥३२॥ शोके आविष्ट ओर कोधे जिसक हठ हिरु रहे हँ रते दक्षने उनके समीप धिक रपूर्वक र
| तुम्हारी निंदा की॥ २३॥ दक्षजी बोठे, हे अधमभेठ यह तने क्या किया! हे भिक्षुक यह कै विरक्तं कर देनेवाला मा्गमिरे एनोको दिखाया ॥३१४॥ ||
६०
दक्षने प््चजन्धामे सवलाश्वनाभयारे हजारो णर उत्पन्न किये ॥ २५ ॥ पिताजी आज्ञासे टढवत वह एत्र भी वहीं गये जिस सिद्धाभ्रममे प्रजा ै
|
४
शिण्पु
। तीनों ऋणोति द्री पाये जो मडष्य माता पिताको छोड मोक्षी इच्छाकर धरे विरक्त होनेकी इच्छामे जाता है वह नीची गतिको प्राप्त
॥९८
हाता है ॥ २४ ॥ हे निर्दय । निरन ! यशको नाश करनेवाले तूने वकी बुद्धिका भेदन किंपा हं मरू ! तु हरिके पार्षदोमि वृथा िरत।
ह ॥३७॥ हे अधमाधम ! तूने बारबार मेरा अकल्पाण करिया है इसरिर धूमनेसे संसारम तेरा पैर स्थिर न रहे ॥ ३८ ॥ शिवकौ माया
जमगैधिभिसुक्तानां लोक्योरुमथोः कृतः॥ विघातररेयसोऽमीषां निर्दयेन शेनते॥२५॥ ऋणानि यीण्यपाङत्य यो गदालयत्रजे
त्पुमान्॥ मातरं पितरं त्यक्ता मोक्षमिच्छन् बजत्यधः ॥ ३६॥ निरद॑यस्त्वं सुनिर्खननश्शिङ॒धीभिद्यशोऽपहा ॥ द्रः पाषदमध्ये हि
वृथा चरसि मूढधीः ॥२७॥ डयम त्वमचरो मेऽधमाऽधम ॥ विभवेद्रमतस्तेऽतः पद लोके न रिथरम् ॥३८॥ शशपिति
शुचा दकषसतवां तदा साधुसंमतम्॥ छबोध नेश्वरेच्छां स शिवमायाविमोदितः ॥ ३९ ॥ शापं प्रत्ययी त्वं स सुने निविका
रथीः ॥ एषु एव ब्रह्मसाधो सहते सोपि च स्वयम् ॥४०॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसदितायां द्वि° सतीखंड दक्ष
सृष्टौ नारदशापो नाम अयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ व्रह्लोवाच ॥ ॥ एतस्मिन्नन्तरे देवघुने ोकपितापद ॥ तथ्ागममं प्रीत्या
ज्ञात्वा तच्चरितं द्वत् ॥ १॥ असांत्वयमर दक्ष पूर्ववत्सुषिचक्षणः ॥ अकार्षं तेन सस्नेहं तव सुप्ीतिमावदन् ॥ २ ॥ स्वात्मजं
मुनिवर्यं त्वां सुप्रीत्या देववद्टभम् ॥ समाश्वास्य समादाय प्रत्यपद्ये स्वधाम इ ॥ ३ ॥ |
मोहित दश्वरकी इच्छाको न जानकर पवित्रताप्वक दक्षन तुमको शाप दिया ॥३९॥ हे खनि ! निर्म॑ठ बुद्धिवाछे आपने शापको बरहण किया
जहक्ञानी साधु इसीभरकार स्वयं सहन करते हँ ॥४०॥ ॥ इति भ्रीशिवमहा° भा० टी° रद्रसंहिताऽन्तगतद्वि ° स ° खण्डे दक्षघषटिनारद शापवणनं
नाम ्रयोदशोऽप्यायः ॥१३।॥ ब्रह्ाजी बोरे, हे सने ! इसीसमय ोकपितामह मेँ देवचरि्र जाननेक द्यि शीघ्र वहां गया ॥१॥ पहिखेके
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समान जब र्भने दक्षको शात किया तब वह उत्तम परीतिको धारण करते हुए तुमसे उत्तम स्नेह करने लगे ॥२॥ देवता ओके प्रिय अपने एत्र खनियोमे ॥>>
तुम शढने दोनों कोको भरे रोको तीनपकारफे ऋणो अयक्त किया ओर हे निर्दय ! पून इस मर कल्पाणि बात किया ॥२५॥ विना ||
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ष्ठ तुमको भतिूर्वक समज्ञाकर साथमे ठे अपने स्थानको आया ॥ २ ॥ उसके पीछे भजापति दक्षे अपनी विये साठ कन्या ५ उत्पन्न |]
की ॥ ४ ॥ है सनीश्वर ! उनका विवाह धर्मादिकोे किया वह मँ भीतिपूवैक कहता ह सुनो ॥ ५ ॥ दक्षने दश कन्या धर्मको दीं, ओर ट
तेरह कश्यपको ओर अव्रिमुनिको उन्नी ॥ ६॥ मूतांगिरस ओर कशाश्वको दो दो कन्या दीं ओर शेष कन्या ताक्षयं ( गरुड ) को सृष्ट ठै
करनेके हेतु दीं ॥ ७ ॥ उनसे तीन ठोक पूरति हौ गे में बहुत बढजानेके भये नहीं कहता ह ॥ < ॥ कोई शिवाको ज्येष्ठ कहते, ह ठ
कोई मध्यमा कहते है कोई सबसे अन्तमं होनेवाटी कहते हैँ कल्पके भेदे वह तीनों स्त्य है ॥ ९ ॥ उसके अनन्तर एुतोतपति सपत्नीकं ¢
ततः प्रनापतिक्षोऽचनीतो मे निजघ्ियाम्॥ जनयामास दुदितृस्॒भगाः षष्टिसंमिताः॥४॥ तासां विवाहं कृतवान् धममादिभिरतं ९
द्वितः ॥ तदेव शृणु सुप्रीत्या प्रवदामि सुनीश्वर॥५॥ ददौ दश सता दक्षो धर्माय विधिवन्युने॥जयोदश कश्यपाय सनये चिन
वेदवे ॥६॥ भूतागिरःकृशाश्वेभ्यो ददे पवः प्रदत्तवान् ॥ ता्याय चापरः कन्या परसूतिपरसवे्थतः ॥७॥ सिोकाः पूरिता ||
स्तन्नो वण्यते व्यासतो भयात् ॥८॥ केचिद्रदति तां ज्येष्ठां मध्यमां चापरे शिवाम्॥ सवानन्तरजां केचित्कल्पभेदात्र्य च सत् |©
॥९॥ अनंतरं सुतोतपत्तः सपत्नीकः प्रनापतिः॥ दक्षो दधौ सुप्रीत्मा तां मनसा जगदम्बिकाम् ॥१०॥ अतः प्रेम्णा च तुष्टाव |£
गिरा गद्रदया हि सः ॥ भूयोभूयो नमस्कृत्य सांजटिविनयान्वितः ॥ ११ ॥ सन्तुष्ठा सा तदा देवी विचारं मनसीति च ॥ ¢
चक्रेऽवतारं वीरिण्यां कुर्या पणविपृरतैये ॥ १२ ॥ अथ् सवास मनसि दक्षस्य जगदम्बिका ॥ विललास तदातीव स दक्षो 2
मुनिसत्तम ॥ १३ ॥ सुयुदूतेनाथ दक्षोऽपि स्वपरन्यां निदधे छदा ॥ दक्षपत्न्यास्तदा चित्ते शिवोवास दयान्विता ॥ १४ ॥
प्रजापति दक्षने भरसन्नतापरवक मनमे उस जगदम्बिकाको धारण किया ॥ १० ॥ ओर गदरद स्वरसे परमपुवेक स्त॒तिकर हाथजोड विनयपर्वक वार ४
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म्बार नमस्कार करते हृए ॥ १३ ॥ तव देवीने सतषट हो मनमे विचार किया कि, मँ अपनी भरतिज्ञा पृणकरनेके द्यि वीरिणीमे अवतार धारण
कर् ॥ १२. ॥ हे मुनिप्त्तम ] यह शोच जगदम्बिकानं दक्षै मनम वास किया तब वह दक्ष अत्यन्त शोभित हुए ॥ १३ ॥ दक्षने उत्तम सुहुते
रसन्न होकर उन्हे अपनी -ज्ीमे रखदिया तवे वह दयात युक्तं शिवा दक्चकी पतनीकै चित्ते बास करने ठगीं ॥ १४ ॥ ओर सपण कन्याके चिह
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बन भण - ---- न १ तत्रते --- = = ----- ~ ---- -- -- ~ ~ भरमौर
सि ` चः
भरगट हो गये ॥१५॥ हे तात ! महामंगखरूपको धारण करनेवाटी शिवाके वासके प्रभावसे वीरिणी अधिक भरसन्न चित्त हो १८. हदं ॥ 9 ट
दक्षन देद्विहित क्क सम्पदायके द्वारा सन्न हो भीतिपूर्वक पसवनादि क्रियार्ओका किया ॥१७॥ ५. उस कमम भत्य॑त उत्सर क
बराणोको यथारुचि बहत द्र्य दिया ॥१८॥ उसी समयम हरिआादिक पूण देवता वीरिणीके गमम गई ह देवीको जान भसन्नतापू्वक वह ||
शिण०्पुण &
। गये ॥१९॥ ओर वहां जाकर उस्र टोककै उपकार करनेवाटी जगदभ्बिकाकी स्तुतिकर वारम्बार भरणाम करने गे ॥ २० ॥ फिर दक्ष प्रजा #
॥९९॥
आविषभूथिह्वानि दोहदस्याखिलानि वै ॥१५॥ विरेजे वीरिणीतात ह्टवित्ताधिका च सा ॥ शिवावासभ्रभावान्चु महार्मगटं ठ्
हिणी ॥ १६ ॥ कुलस्य संपदश्चैव शरतेधित्तसुननतेः ॥ व्यधत्त सुक्रिया दक्षः प्रीत्या पुंसवनादिकाः ॥१७॥ उत्सवोतीव |£
सुनातस्तदा तेष च कमभ ॥ विततं ददौ द्विजातिभ्यो यथाकामे प्रजापतिः ॥१८॥ अथ तस्मिन्नवसरे सवं दयाद्यस्सुराः ॥ टं
जञात्वा गर्भगतां देवीं वीरिण्यास्ते शुदं युः॥१९॥ तत्रागत्य च सें ते तुष्ट्बुजगद्म्बिकाम् ॥ लोकोषकारकरिणीं प्रणम्य च
शह ॥२०॥ कृत्वा ततस्ते बहुधा परशंसां ह्मानसाः ॥ दक्षप्रनापतेश्चैव वीरिण्यास्स्वगृहं यथः ॥२१॥ गतेषु नवमासेषु
कारयित्वा च लौकिकीम् ॥ गति शिवा च पै सा दशमे मासि नारद ॥ २२ ॥ आविब॑भूव पुरतो मातुस्सद्यस्तदा सुने ॥
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हतँ सुखदे चन्द्रहताराबकूरके ॥ २३॥ तस्यां तु जातमाघरायां सुप्रीतोऽसौ प्रजापतिः ॥ सेव देवीति तां मेनेद्ष्ातां म
ह. ९ ||| तेजसोस्बणम् ॥ २९ ॥ तदाभृत्युष्पसव्छृष्िमेषाश्च वब्षुजजलप् ॥ दिशश्शांता द्रुतं तस्यां जातायां च नी वर ॥ २५ ॥
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त.सं.२ |© || एि ओर बीरिणीकी बहुत परसञाकर भरसन्न हो अपने घर गये ॥२१॥ हे नारद ! नव मास पूणे होनेपर छौ किक गतिको आश्रयकरर शिवा पूरणं |||
अ०१४ ५ दशै मासमे ॥२२॥ हे खनि सुखदेनेवाछे उत्तम सूप ओर चेद रह तारके अलुकूहोनेपर शीघ्रही माताकैसषमीप भगट होगई॥२३॥ उनके उतवन्न
|| होतेह पसनन हो भजापतिने उन्हं तेज देख शिवकी देवी माना ॥ २४ ॥ हे छनीश्वर ! उनके उत्पन्न होतेही उत्तम एकोकी इषि हदं जोर मेषोनि
| सव उत्तम म॑गठ होगये ॥२६॥ दक्षने वीरिणी उत्पन्न जगदम्बिकाको देख भक्तिमूवक हाथ जोड नमस्कार कर बहत स्तुति की 12७
दक्ष बोरे, हे जगतकी माता ! सनातनी शिवा । आपको नमस्कार है सत्यमे सत्थरूप्को धारण करनेवाली हे भहादेवी ! कूपा करो ॥ २.८ ॥ ह
हे शिवा ! हे शान्ता ! हे महामाया ! हे संसारमयी ! योगनिनद्ा ! वेदके ज्ञाता दसभकार आपको कहते ईँ हे संसारके हितकरनेवाटी आपको
नमस्कार है ॥ २९ ॥ जिन्होंने पूर्वही बको उतन्नकर जगत्की सृष्टम नियुक्त किया, देसी प्रमा जगवकी माता महेश्वरी आपको
अवादयत तरिदशाश्शुभवायानि खे गताः॥जज्ज्वडश्वाभ्रयश्शां ता सवैमासीत्सुमगलम्॥२६॥वीरिणोसं भवां हष्ठा दक्षस्तां जगद
म्बिकाम् ॥ नमस्करत्य करौ बद्वा बहु त॒ष्टाव भक्तितः ॥ २७ ॥ दक्ष उवाच ॥ महेशानि नमस्तुभ्यं जगदम्बे सनातनि ॥
रपां र् महादेवि सत्ये सत्यस्वरूपिणि ॥२८॥ शिवा शांता महामाया योगनिद्रा जगन्मथी॥या पच्यते वेदविद्धिनमामिर्त्वा
विष्णगत्स्थित्ये नियुक्तस्तां सदाकरोत्॥ तां त्वां नमामि परमां जगद्धात्रीं महेश्वरीम् ॥३१॥ यया दौ जगत्राशे नियकतस्तां
सदाकरोत्॥ तां त्वां नमामि परमां जगदा महैश्वरीम्॥३२॥ रजस्सत््वतमोरूपां स्वका्यकरीं सदा ॥ बिदेवजननीं देवींत्वां
नमामि.च तां शिवाम्॥ ३२॥ यस्त्वां विर्चितयेदीं विद्याविद्यात्मिकां षराम्॥ तस्य शुक्गिश्च शक्तिश्च सदा करत स्थिता॥३७॥
नमस्कार है ॥३०॥ जिन्होंने संसारकी स्थितिके निमित्त विष्णको नियुक्तं किया उन प्रभा जगद्धात्री महेश्वरी आपको नमस्कार है ॥३१॥ \
जिन्होनि संसारके नाश करनेके ट्यि रु्रको नियुक्तं किया उन परमा जगन्माता महेशवरौको नमस्कार है ॥ ३२ ॥ सव, रज, तम ह्पोको ठै
|| पारण करनेवारी ओर सम्पूण का्योको साधनेवारी देवताओंको उतपन्न करनेवाडी शिबादेषी आपको नमस्कार है॥ ३३ ॥ हे देवी ! जो ¢
आपको वियावियाहूप स॒वसेपरे चितन करते है भुक्ति ओर अक्ति सदा उनके हाथमे वियभान है ॥ ३४ ॥
दितावहाम् ॥२९॥ यया धाता जगत्सृष्टौ नियुक्तस्तां एराकरोत् ॥ तां त्वां नमामि प्रमां जगदा महेश्वरीम्॥३०॥ यया ट
जट बरसराया ओर शीघही सब दिशाय शान्त होगदं ॥ २५ ॥ देवता आकाशे आकर उत्तम शुभ बाजे बजाये जरती हदे अभि शत हो ठ
न
खते ह उनकी अवश्य सक्ति होती है ॥३५॥ जो आपकी
इसमे संदेह नहीं ॥ ३६ ॥ ब्हाजी बोरे, जव इम् ट
हे वियाको भकाश करनेवाी विथादेवी ! जो भक्ष पवित्र शिवा आपको दे
॥ ३७ ॥ अनेक प्रकारकी क्रीडा करनेवाढी
जगन्माता भवानी अम्बिका संस्ारमयी दुगा इन नामोत स्तुति करते है सब उनके है
रकार जगन्माता शिवाकी दक्ने स्तुति की तब दक्षसे एते बोरी, जिसमे माता न सुने च 6 र
परमेश्वरो सनको मोहित करके सत्यवाक्य इस प्रकार कहती भई जिसमे दक्षही सनै दृस्त न सनं ॥ ३८ ॥ देवी बोढी हं
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यस्त्वां प्रत्यक्षतो देवि शिवां पश्यति पावनीम् ॥ तस्यावश्यं भवेन्सुक्तिविंदाविद्याप्रकाशिका ॥२५॥ ये स्तुवंति जगन्मात
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॥१००॥
्रवानीमेविकेति च ॥ जगन्मयीति दुत स्व तेषां भविष्यति ॥ ३६ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्तता जगन्माता शिवा दक्षेण
धीमता ॥तथोवाच तदा दक्ष यथा माता शृणोति न ॥ ३७ ॥ सर्व मुमोद तथ्यं च तथा दक्षः शृणोतु तत् ॥ नान्यस्तथा
शिवा पराह नानोतिः परमेश्वरी ॥.३८ ॥ दे्युवाच ॥ अहमाराधिता पूर्व सुता ते प्रजापते ॥ ईप्सितं तव सिद्धं तु तपो
धारय संप्रति ॥ ३९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवमुक्ता तदा देवी दक्ष च निजमायया ॥ आस्थाय शेशे भावं जनन्यंते रूरोद सा
॥ ४० ॥ अथ तद्रोदन चत्वा खियो वाक्यं ससं्रमाः ॥ आगतास्ततर सुप्रीत्या द्ास्योपि च ससंभ्रमाः ॥४१॥ दृष्टासि
क्रीसताूपं ननन्दुस्सर्वयो षितः ॥ सवे पौरजनाश्वापि चछ्कजयरं तदा ॥ ७२ ॥ उत्सव महानासीद्रानवाद्यपुरस्सरम् ॥
दक्षोसिक्री सुदं लेभे छम दृष्टा सुताननम् ॥ ४३ ॥ |
|| भजाप्रति ! तमने सुताके अथं पिरे मेरी आराधना की सो तुम्हारा अभीष्ट पूरा हभ अव तपको धारण करो ॥ ३९ ॥ ब्रूमाजी बोटे
|| दक्षते देवी यह कह अपनी मायामे बै शिशुकरा भाव करके मातके पस रोने ठगी ॥ ४० ॥ रोदन सुन संभ्रमयुक्त हो श्ियां बोखने
ठगी ओर दायां संभ्रमसे युक्तं हो भीतिपूषेक वहां आईं ॥ ४१ ॥ देवीको । सुताकै रूपमे देख पष च्ियां प्रसन्न ह ओर नगरमे ठ्
वसनेवाठे सुमपूण जनोँने जय जय शब्द् किया ॥ ४२॥ गान वाके द्वारा बडा उत्सव हुभा ओर . कन्याका सुख देख सपत्नीक दक्ष बडे
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भये ॥ ४३॥ ओौर दक्षने विधिपरवक वेदोक्त कुकाचार कर ब्राह्मण तथा अन्य मलुष्योको नाना भकारकै दान दिये ॥४४।॥ मंगलाचारपूवेक
नानाप्रकारके गान तथा नृत्य ओर मंगल्के बाजे बजे ॥ ४५॥ जन्मोत्सवके समय अुचरोके साथ ओर मुनियोके वृन्दे युक्तं हरिआदिकं देव
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ताओनि आकर नानाभरकारका उत्सव किया ॥ ४६ ॥ सम्पूण देवताओंने जगतकी परमेश्वरी दक्षकन्याको देखकर नम्रतापूरवेक भणाम कर
नानाभकारके स्तोत्रं दारा स्त॒ति की ॥ ४७ ॥ सम्पण देवता जय जय शब्द कर दश्च ओर दक्षपत्नी वीरिणीकौ भरीसा करने रगे ॥ ४८ ॥
सम्पूणं णोति युक्तं होनेसे परशस्त उस देवीका हरि आदिक देवताओंकी आज्ञा दक्षने भसन्न होकर उमा रसा नाम रक्खा ॥ ४९ ॥ पीछेसे
दक्षः अतिङ्कलाचारं चक्रे च विधिवत्तदा ॥ दानं ददौ द्विजातिभ्योन्येभ्यश्च द्रविणं तथा॥४७॥ बभूव सर्वतो गान नतन च
यथोचितम् ॥ नेदुर्बायानि बहुशस्ुमंगलपुरस्सरम् ॥ ४५ ॥ अथ दर्याद्यो देवास्सवं साुचरास्तदा ॥ स॒निष्न्देःसमाग
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त्योत्सवं चक्घर्यथाविधि ॥७६॥ दष्टा दक्षसुतामेवां जगतः परमेश्वरीम् ॥ नेषुः सविनयास्सवं तुट्च शभेस्तवेः ॥ ४७ ॥
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उचुस्सर्व प्रमुदिता गिरं जयजयात्मिकाम् ॥ प्रशशंसुशैवा दक्ष वीरिणीं च विशेषतः ॥ ७८ ॥ तदीमेति नाम् चक्गे तस्था ||
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दक्षस्तदाज्ञया ॥ प्रशस्तायास्सर्वगुणसत््वादपि सुदान्वितः ॥ ४९ ॥ नामान्यन्यानि तस्यास्त॒॒ पश्चानातानि लोकतः ॥
महामगलदान्येव दुःखध्रानि विशेषतः ॥ ५० ॥ दक्षस्तदा हरिं नत्वा मां सर्वानमरानपिः॥ सुनीनपि करौ बदध्वास्तुत्वा
चान भक्तितः ॥ ५१ ॥ अथ विष्ण्वाद्यस्सवं सुप्रशस्याजनंदनम् ॥ प्रीत्या यथुस्वधामानि संस्सरन् सशिवंशिवम्
॥ ५२ ॥ अतस्तां च सुतां मावा ससंस्कृत्य यथोचितम् ॥ शिङ्ञुपानेन विधिना तस्ये स्तन्यादिकं ददौ ॥ ५२ ॥
लोकम म॑गलकै देनेवाटे ओौर विशेषकर दुःखोके दूर करनेवाठे भगवतीके अनेक नाम हए ॥५०॥ दक्ष भरजापतिने हरि ओर स॒ङ्ञको ओर पूणे
देवता व स॒नि्योको हाथ जोढकर प्रणाम किया तथा विधिपूर्वकं भक्तिसे सबका पूजन किया ॥ ५१ ॥ तवं विष्ण आदि सब देवता ब्रह्मकै
दश पुत्रकी प्रशस्ता करके कल्याणरूप शकरको स्मरण करते अपने स्थानोँको गये 1 ५२ ॥ वीरिणी भाताने विधिपूर्वकं उस कन्याका संस्कार
कर बाठकोके स्तनपानेके विधानसे उसको दृध पीनेको दिया ॥ ५३ ॥
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तब तब काम शातन करनेवाङे शकरका स्मरण करती थी ॥५७॥ दोनों ली इरुषोका प्रेमं उस॒पर प्रति
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तथापि दोनों ल्ली परुष उसको बडा प्यार करते थे ॥५९॥ संपूण बाख्युर्णोको अतिक्रमण करनेवाली
बारंबार प्रसन्न करने ठगी ॥ ५८ ॥ इति श्रीशिवषहीषुराणेभाषाटीकायां र्रसं
॥ १४ ॥ बह्लाजी बोरे, एक समय वह त्रिोीकी सारभु१ सती पिताकी गोदमं वेदी थी कि, भने तुम्हारे षाथ जाकर उसको देखा ॥१
पितासत हम दोनोंको नमस्कार किया जाता देख ठोकटीटाका अनुसरण करते हए भक्तिसे प्रणाम किया , ॥२॥ प्रणामकै पीठे सतीको देख
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्ीरिणी ओर महात्मा दक्ष उस कन्याका पालन करने खगे वह कन्या शुदपक्षकै
सियो कडा करती हई प्रतिदिन भगवान शंकरी परतिमा निमीण करती थी ॥
पालिता साथ वीरिण्या दक्षेण च महात्मना ॥ववृषे श्धपक्षस्य यथा शशिकृलान्वहम् ॥8 ॥ तस्यां तु सद्रणास्सवँ विवि
दविजसत्तम ॥ शेशवेपि यथा चन्र कृास्सवां मनोहराः ॥ ५५ ॥ आचरघ्निजभावेन षखीमध्यगता य॒दा ॥ तदा
मर्मस्य श्रतिमामन्वहं बहुः ॥५६॥ यदा जगौ खुगीतानि शिवा बाल्योचितानि सा ॥तदा स्थाणुं हर रप्र सस्मार स्मरशास
नम् ॥ 4७ ॥ वबृधेतीव दंपत्योः प्रत्यहं करूणातुका ॥ तस्या बाल्येपि भक्तायास्तयोनित्य बुद्डः ॥५८॥ सवंबालायुणा
ऋतां सदा स्वाख्यकारिणीम्॥ तोषयामास पितरो नित्यनित्यं शहघहः ॥५९॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसंहितायां
सतीखण्डे सतीजन्म बारलीरावर्णननाम चतुदैशोऽध्यायः ॥१५॥बरह्मोवाच॥ अथैकदा पितुः पाश्वे तिष्ठतीं तां सतीमहम् ॥
त्वया सह घुनेदराक्षं सारभृतां ्रिरोकके ॥ 9 ॥ पित्रा नमस्कृतं वीक्ष्य सत्तं त्वां च मां सती ॥ प्रणनाम दा भक्त्या
लोकलीलाडसारिणी ॥ २ ॥ प्रणामति सतीं वीय दक्षदत्तश्ुभासने ॥ स्थितोहं नारदं त्वंच विनतामहमागदम् ॥ २ ॥
नग्रताको भा हृष ओर आप दक्षकै दिये हुए आसनपर बैठ गये ओर सीते बोठे ॥ ३ ॥
चन्द्रमाके समान प्रतिदिन बढने गी ॥५४॥ हे हिजतत्तम !
उत कन्याम संमू यणोने आकर निवास किया जेते बालकपनमेभी चद्रमाकी सन कठा मनोहर होती ह ॥ ५५ ॥ वह अपने भावे सब
५५६ ॥ जिन समय शिवा बाककोकि उचित गीत गाती थी
तेदिन बढता था ययपि वह बाठ्क थी
गृहकार्ये निं एण भगवती भाता पिताकौ
हिताऽन्तर्मवद्धितीयसतीखण्डे दुर्गो्त्तिवणनंनाम चतुदशोऽध्यायः
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है सती ! जो आपकी इच्छा करे है ओर तुम जिसकी इच्छा करती हो उस सवज्ञ जगदीश्वर पिको तुम भाप होगी ॥४॥ जिसने अन्य छ
वीक अ्रहण नहीं किया न रहण करते न ग्रहण करेगे हे शुभे ! वही अनन्यसहश तुम्हारा पति होगा ॥ ५॥ चिरकारमे वहं ४
| करेगे, इस प्रकार सतीसे कह दक्षते पूजित हो हम दोनों अपने स्थानोको गये ॥६॥ दक्ष यह सुनकर प्रम पर्तन ओर चिन्ता रहित ४
हुए ओर अपनी कन्पाको परमेश्वरी जानकर बडा सत्कार किया ॥ ७ ॥ अपनी इच्छासे मदुष्यशरीर धारण करनेवारी भक्तवत्सल देवीने ए
सन्दर कौमार विहारोके साथ कौमार अवस्थाको अतिक्रमण किया ॥ ८ ॥ अत्यन्त तपकै प्रमावते सौगते मनोहर सती बाल्यादस्थाको ह
त्वामेव यः कामयते यन्तु कामयसे सति॥ तमूप्लि पतिं देवं सर्वज्ञ जगदीश्वरम्॥४॥योनान्यां जग्रह नापि गृह्णाति न री ट
ष्यति ॥ जायां ख ते पतिभंयादनन्यस्दटशश््ुभे॥५॥ इत्युकत्वा सुचिरं तां वे स्थित्वा दक्षालये पुनः॥विश्च्टौ तेन संयातौ स्वस्थानं ट
तौ च नारद ॥&॥दक्षोभवज्चसुपरीतम्तद्कण्यं गतज्वरः॥ आददे तनयां स्वां तां मत्वा हि परमेश्वेरीम्॥७॥ इत्थ विहारे रुचिरैः |£
कौमारेर्क्तवत्स॒ला ॥ जहाववस्थां कौमारीं स्वेच्छाधरतनराङृतिः॥<॥बास्यं व्यतीत्य सा प्राप किञ्चिद्यौवनतां सती ॥ अतीव ट्
तपसागेन सर्वागेषु मनोहरा॥९॥दकषस्तां वीक्ष्य कोकेशः मरो द्धत्ातर्वयस्थिताम् ॥ चितयामास भगाय कर्थ दास्य इमां सुताम् ||@
॥१०॥ अथ सापिस्व् भग प्राप्तुमेच्छत्तदान्वहम् ॥ पितुमेनोगति ज्ञात्वा मातुर्निकटमागमत्॥ १ १॥पप्रच्छज्ञां तपोहेतश्शं ¢
करस्य विनीतधीः ॥ मातुश्शिवाथ वैरिण्यास्सा सखी परमेश्वरी ॥१२॥ततस्सती सदैशानं षति प्राप्तु दद्त्रता॥सा तमाराघया ६
मास गृहे मातुरल॒ज्ञया॥१३॥आभ्थिने मासि नन्दायां तिथावानचै भक्तितः॥ शडौदनेस्सरुवणेदेरं नत्वा निनाय तस् ॥१७॥
विताकर कुछ युवावस्थाको पराप हुईं ॥ ९ ॥ ठोकेश दक्षजी युवाषस्थाे स्थित उत्त तीको देख इस्त एत्रीको शिषको कैत देव यह सोचने
लगे ॥१०॥ पिताके मनकी वात जान वह भी माताकै समीप आय् शिवकी भाषिक दिये स्वयं इच्छा करती हुई ॥ ११ ॥ शकरकै
ह|| तपके कारण विशाठ बुद्धि परमेश्वरी सतीजी वीरिणी अपनी माताकी आज्ञाको पानेकी इच्छा करने गीं ॥ १२ ॥ शिवको पति पानेकै
द्यि इढवता सतीने माताकी आज्ञप्ति घरही्म उनका आराधन किया ॥ १३ ॥ आश्रिनकी नंदा तिथि यड ओर चावरु तथा ख्वणसे
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॥१०२॥
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अ०१५ ||| कर उस मासको व्यतीत करती हू
करती मई विशेषकर फाल्य॒नमे प्रायः स्र रात्रिम जागरण ओर पूजन करती
स्मरण करती हृ, सती पठाश ओर दवनासे शिवको पूजती हुईं ॥ २० ॥ वैशाख श ३ को नभ्य तिर यत् चावलोमे शिवका पूजन
॥ २१ ॥ ज्येष्ठकी पूणैमासीको वञ्च ओर माठतीकै एलो शिवका पूजनकर उत्त मास्रको व्यतीत
| किया ॥ २२ ॥ आषाढ शुक १४ को काठे व्च अथवा कस्तूरी ओर माठतीके ए्पोसे शिवको पूजा ॥ २३ ॥ ्राषण शुङ्क <-१४
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सतीने हरका पूजन किया ॥ १४ ॥ कात्तिककी चतुर्दशीको खीर ओर पओंसे शिवकी आराधनाकर उनको स्मरण करन गी, ॥ १५ ॥
अगहनके ष्ण पक्षक अष्टमीको यव तिर चावलोसे शिवका पूजन कर दिन बिताती हद ॥ १६ ॥ पौपशुङ्क सपमीकी रात्रिको
जागरण कंर खिचडीसे भातःका शिवका पूजन करती हृदं ॥ १७ ॥ माघकी पूर्णमासीकी रात्रिको जाग्रण ओर भीगे कपडे धारणकर
नदीकै किनारे शिवका पूजन करती हृदे ॥ १८ ॥ फाल्यन दौ चतुदशीकी रात्रिको जागरण ओर शैटूष बिल्वफठसे शिवकौ पूजा
कातिकस्य चतुरदश्यामप्रपैः पायसैरपि ॥ समाकी्णस्समाराध्य सस्मार् परमेश्वरम् ॥ १५ ॥ मारगशीरषैऽसिताषटम्यां सतिटे
स्सयवौ दनैः ॥ पूजयित्वा हरं कीटीननाय दिवसान् सती ॥ 9६ ॥ पौषे त श॒ङ्धसपम्यां कृतवा जागरणं निशि ॥ अप्ूजय
च्छि प्रातः कृशरात्रेन सा सती ॥ १७॥ माघे तु पौर्णमास्यां स कृत्वा जागरण निशि ॥ आप्रैवश्चा नदीतीरेऽकरोच्छंक
रपूजनम् ॥ १८ ॥ तपस्यसितभरतायां कृत्वा जागरणं निशि॥विशेषतस्समानच शदृषस्सर्वयामसु॥ १९॥ चै शुङ्कचतुदैश्यां
पकारदंमनेश्शिवम् ॥ अप्रूजयदिवारा्ौ संस्मरन् सा निनाय तम्॥ २०॥ राधश्चङ्कतृतीयायां तिलादारयवौदनेः॥ पूजयित्वा
सती दरं नव्येमीसं निनाय तम् ॥ २१ ॥ ज्येष्टस्य पूणिमायां वै राते संपूज्य शंकरम् ॥ वसनेवैहतीषष्पेनिरादारा निनाय
तम् ॥ २२ ॥ आषाटस्य चतुदेश्यां श॒ङ्धायां कृष्णवासा ॥ वृहतीङ्सुमेः प्रजा शद्रस्याकारि वे तया ॥ २३ ॥ श्रावणस्य
सिताष्टम्यां चतुर्दश्यां च सा शिवम् ॥ यज्ञो पवीतेर्वासोभिः पवितैरप्यपूजयत् ॥ २४ ॥
दं ॥ १९ ॥ चैव शुक चतुदंशीको दिनि राति शिवका
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462८
| ्ञोपवीत ओर वदति पूजन किया ॥२४॥ भाद ष्ण तेरस चौदशको नाना पष्प ओर फरो पूजन कर जछं पीकर रहगई ॥ २५ ॥ |
नानाभकारके इष्य फल ओर अन्न जो जिर ऋतु होते है उनसे निराहार रहकर शकरका पूजन किया ॥ २६ ॥ अपनी इच्छासे मभ्यं
आङतिको धारण करनेवाटी देवी दृढव्रत हो सव मासके सबदिरनोम शिपूजनमे रत होती दै ॥ २७ ॥ इस्भकार विधिपुवेक सम्पूण नन्दा
व्रतको समा कर अनन्य भावको धारण करतीहृई सतीने भेमपूरवक शिवको धारण किया ॥ २८ ॥ उसी समय सम्पणे देवता ओौर सुनि ओर
भदे कृष्ण्योदश्यां पुष्यर्नानाविधैः फलैः ॥ संपूज्य च चतुदश्यां चकार जभोजनम् ॥ २५ ॥ नानाविधैः फलैः पुष्पे
स्वस्यैस्तत्कारसंमवैः ॥ चके सुनियतादाराजपन्मासे शिवार्चनम् ॥ २६ ॥ सर्वमासे सर्वदिने शिवाच॑नरता सती ॥ दटव्रता
भवदेवी सखेच्छाधृतनराकृतिः ॥ २७ ॥ इत्थं नंदात्रतं कृत्स्नं समाप्य सुसमाहिता ॥ दध्यौ शिवं सती प्रेम्णा निश्चराभूदन
न्यधीः ॥ २८ ॥ एतस्मि्नते देवा भुनयश्चाखिला शने ॥ विष्णुं मां च पुरस्कृत्य युष सतीतपः ॥ २९ ॥ दृष्टागत्य
सती देवैमूर्ता सिद्धिखिापरा ॥ शिवध्यानमहामभ्रा सिद्धावस्थां गता तदा ॥ ३० ॥ चः सवं सरास्सत्यै शरदा सांजलयो
नतिम् ॥ मुनयश्चनतस्कंधा विष्ण्वाद्याः प्रीतमानसाः ॥ ३१ ॥ अथ सवे सुप्रसन्ना विष्ण्वादयाश्च खरषयः ॥ प्रशशंसस्तपस्त
स्यास्सत्यास्तस्मात्खविस्मयाः ॥३२॥ ततः प्रणम्य तां देवीं पुनस्ते अुनयस्षराः ॥ जग्धुगिंरिवरं सयः कैलासं शिववहछभम्
॥ ३३ ॥ सावि्ीसदितश्चाहं सद लक्ष्म्या भदान्वितः ॥ वासुदेवोपि भगवाञ्जगामाथ दरांतिकम् ॥ ३४ ॥
स्ञको आगे कर् सतीकी तपस्या देखनेके निमित्त गये ॥., २९ ॥ शिवजीकै ध्यानम मञ्च सिद्ध अवस्थाको प्राप्त वहं सती आकर देवताओं ||2
दूसरी सिद्धिके समान दलीगईं ॥ ३० ॥ सव सनिभेमपूवेक विष्णआदिक संपूण देवतोसहित हाथ जोड कर भणाम करने ठगे॥३१॥ भसन्नहो
| विष्णआदिक देवता ओर सुरपिं विस्मित हो उन सतीके तपकी भरशस्ा करनेरगे ॥ ३२ ॥ उन सतीजीको प्रणाम कर वे देवता ओर खनि
शिवकरे भिय कैटास्को चेगये ॥ ३३ ॥ प्रसन्न सावित्रीके सहित यै, रक्ष्मीके सहित विष्ण, महादेवजी के पास गये ॥ ३४ ॥
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् वहां प्च शिवजीको देख चक्रित हो परणाम् कर् हाथ जोड नत्र हो नानास्तुतियोपि स्तुति करनेङुगे ॥ ३५ ॥देवता बोट जौ कु यह चर
भौर अचर है सब आपहीका ह, एसे छह देष््योसि युक्त आपके छ्य नमस्कार है परुष महेश परेश महात्मा ॥ ३६ ॥ सवकं थम कारण
चिद्रूप निकार प्रकृति ओौर परुषसे परे हो ॥ ३७ ॥ जो इसको विरचता है जिसे यहं भकाशमान होतांहै जिससे यह है जिसका यहं
|| ओर जहाते आप ॥ ३८ ॥ जो इसते ओर परमे परे है ओर जो निविकारी महामु अपनी आत्माको देखता है स्वय होनेवाठे उत्त देषको
|| हम ठोग प्रणाम करते है ॥ ३९ ॥ दिवाचश्नु, परसाक्षी, सबका आत्मा, अनेक हपोकि धारण करनेवाछे, स्वयं होनेवाटे तप॒ करते हये उस
ह|| गत्वा ततर प्रु ष्ठा सुप्रणम्य ससंभ्रमाः ॥ तु्वुविविधेःस्तोतरैः करौ बद्ध्वा विनघ्रकाः ॥ ३५ ॥ देवा उचुः॥ नमो भगवते
ह||. तभ्यंयत एतच्राचरम् ॥ पुरूषाय महेशाय परशाय महात्मने ॥३६॥आदिबीजाय सर्वेषां चिद्रूपाय पराय च ॥ ब्रह्मणे निवि
काराय प्रकृतेः पुरुषस्य च ॥ २७ ॥.य इदं ्रतिपंच्येदं येनेदं विचकास्ति दि॥ यस्मादिदं यतद यस्येदं स्वं च यत्नतः
४ ॥ ३८ ॥ योस्म त्परस्माच्च परो निर्विकारी महाप्रभुः ॥ ईक्षते यस्स्वात्मनीदं तं नताः स्म स्वयंभुवम् ॥ ३९ ॥ अविद्धदृक्
है| परः साक्षी सब्माऽेकरूपधृक् ॥ आत्मभूतः प्रह तपतं शरणं गताः ॥ &० ॥ न यस्यदेवा ऋषयः सिद्धाश्च न विदुः
¢| पदम् ॥ कनन रपरो ज्ञातमरंति वेदितुम् ॥४१॥ दिदृक्षवो यस्य पदं षक्तसंगार्सु साधवः ॥ चरितं सुगतिनैसत्वं सलोकन्
| मयम् ॥ ९२॥ त्वजन्मादिविकारा नो विद्यते केपि ॥ दुःखदा ॥ तथापि मायया त्वं हि गृह्णासि कृष्या च तान् ॥ ४३ ॥
११ तस्मे नमः परेशाय तुभ्य मा्र्थकर्मणे ॥ नमो गिरां विदूराय ब्रह्मणे परमात्सने ॥ ७७ ॥
₹ ०.२ ||¬\|| प्रब्ह्मकी हम छोग शरण आये ह ॥ ४० ॥ जिसके पदको देवता ऋषि ओौर सिद्धने नहीं जाना फिर दूसरा कौन जन्तु उसके पदको
स.खं.२ ||£ || जान सकता दै अथौत् कोई नहीं ॥ ४१ ॥ सत्यलोकके कत्त बणरहित जिसके पदको शक्तिके चाहनेदाठे घुकम्भा दिश सलनगण चाहते
अ०१५ ||| है ॥ ४२॥ दुःखके देनेवाले जन्मादिविकार जिनको नहीं प्रघ हते, तो भी आप्र अपृनी भायासे कपाकर् उनको अरहण करते है ॥ ४३ ॥
‰ | आश्वयकमे करनेवाठे परेश वाणीसे परे परमात्मा बहमस्वहूप उस आपके छ्यि नमस्कार है ॥ ४४ ॥ ।
हपरहित स्वस्वरूप पर अनन्तशाक्तं चखोकपति ्षवके साक्षी सवत्र गतिशीढ ॥ ४ ॥ आत्मपरदीप निवौणपदक सुखरूपी संपत्ति, ज्ञानस्वरूपः
उयापक इश्वर आपके ट्य नमस्कार है ॥ ४६ ॥ सुकर्मसे भाप्र कैवल्यपति, परुष, परेश सव कुछ दाता आपके खयि नमस्कार है ॥ ४७ ॥
षेज्ञ आत्मस्वूप सब परत्य्योके कारण परुष परेश सब कुछ देनेवाठे आपको नमस्कार है ॥ ४८ ॥ सबके अध्यक्ष महान् मूलग्ररति परुष
परेश सबकुछ देनेवाठे आपको नमस्कार है ॥४९॥ चिनेत्र पंचख स्वेदा तेजस्वूप सब इन्दर ओर गणोके देखनेषारे निष्कारण आपकै लियि
नमस्कार ह ॥ ५० ॥ तरैटोक्यके कारण अपवगेके दाता शीघ्रही शरणागतको तारनेवाठे आपके छ्य नमस्कार है ॥ ५१॥ सब आश्नाय |
अशूपायोरुखूपाय परायानंतशक्तये ॥ चिरोकपतये सव॑साक्षिणि सवेगाय च् ॥४८॥ नम आत्मप्रदीपाय निर्वाणसुखसंपदे ॥
ज्ञानात्मने नमस्तेऽस्तु व्यापकायेश्वराय च ॥४६॥ नेष्करम्यण सुरभ्याय कैवल्यपतये नमः ॥ पुक्षाय परेशाय नमस्ते सर्व
दाय च ॥४७॥ क्षरज्ञायात्महूपाय सवप्रत्ययहेतवे ॥४८॥ सवाध्यक्षाय महते भूलभ्रकृेतये नमः ॥ पुक्षाय परेशाय नमस्ते
सर्वदाय च ॥४९॥ भिने्ायेषुवक्राय सदाभासाय ते नमः ॥ सर्वेन्द्रियशण द्रष्ट निष्कारण नमोस्तु ते ॥५०॥ तिलोककारणां
याथापवगांय नमोनमः॥अपवगप्रदायाश्चु शरणागततारिणे ॥५१॥ सर्वाम्नायागमानां चोद्धये प्रेष्ठिने॥ परायणायभक्तानां
गुणानां च नमोस्तु ते ॥ ५२ ॥ नमो शुणारणिच्छन्नचि इ महेश्वर ॥ सूटद्ष्परा्तरूपाय ज्ञानिडद्वासिने सदा ॥ ९५३ ॥
पञयुपाशविमोक्षाय भक्तसन्य॒क्तिदाय च ॥ स्वप्रकाशाय नित्यायाऽव्ययाया जखसंविडे ॥ ५७ ॥ परत्यग्दष्टेऽविकाराय परमे
श्वय धारिणे ॥ यं भजन्ति चतुर्ग कामयतीष्सद्रतिम् ॥ सोऽभरूदकर्णस्त्वं नः प्रसन्नो भव ते नमः ॥ ५4 ॥
मके समुद्र परमेष्ठी भक्तं ओर याणोकि परायण आपके छ्य नमस्कार है ॥५२॥ गणकी अरणीसे आच्छन्न चिच ऊष्माहपं महेश्वर भूढोको
ुष्भाप्य रूपवाछे सदा ज्ञानियोकै हदये वास करनेवाठे आपको नमस्कार है ॥ ५३ ॥ प्रशुओके पाशको दूर करनेवाछे भक्तोके सन्धक्ति दाता ४
स्वयंप्रकाश नित्य अव्यय निरन्तर सर्वेश ॥ ५४ ॥ सम्यब्रष्टा विकारे रहित उक्क्ट एेष्र्थको धारण करनेवाछे इक दाता जिन शिवको धर्भ |
अथे काम मोक्ष मजते ह ओर इच्छा अपनी पुणं करते हँ रसे कारुणिक आप् हमारे ऊपर पसनन हो आपके छ्य नमस्कार है ॥ ५५॥
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जो आपके अनन्य भक्त किसी अरथकी इच्छा नहीं करते किन्तु प्रम सेगढ आपके यणोहीका ध्यान किया करते हं उनको नमस्कार ह
॥ ५६ ॥ अव्यक्ताकति विभु ब्रह परम अध्यात्म योगसे प्रप्त, परिपूर्णं अक्षरको हम छोग स्तुति करते है ॥ ५७ ॥ इन्दिसे पर् आभार
रहित सबके आधार, कारण रहित जिसका अन्त नहीं है, आदि सक्षम सम्परणके स्वामीके लिय नमस्कार हे ॥ ५८ ॥ हरिआदिक सम्पुण
देवता ओर छोकं तथा चर ओर अचरके कार्थके खि नामहप भेदसे आप अङ्ग स्थित करते हौ रसे विध्वस्वरूप आपके ल्िवि नमस्कार
है ॥ ५९ ॥ अभिक तेन ओौर सविता अथौत् सभ्धका प्रभाव ओर वायु ये जो कुढ है स्व॒ आपके गौण-भभाव हं एते स्यं रीवा
एकांतिनः कंचना्थ भक्ता वांछति यस्य न ॥ केवलं चरितंतेते गायति परमंगलम् ॥ 48 ॥ अक्षरं परमे ब्रह्मतमव्यक्ताकृति
विथ्म् ॥ अध्यात्मयोगगम्थ त्वां परिपूर्ण स्तुमो वयम् ॥५७॥ अतींद्रियमनाधारं सर्वाधारमहैतुकम् ॥ अन॑तमार्यं सुह्मं त्वां
प्रणमामोऽसिलेश्वसम् ॥ ५८ ॥ हयोद्योऽखिला देवास्तथा रोकाश्चराचराः ॥ नापहपतिभेदेन फरूग््या च कल्या कृताः
॥५९॥ यथाचिषेमेस्पवितर्याति नि्योति वासकृत् ॥ गभस्तयस्तथायं वै प्रवाहो गौण उच्यते ॥६०॥न त्वं देवोऽसुरो सत्यो
न तिर्यङ् न द्विजः प्रभो ॥ नच्ली न ष॑टो न पुमान्सदसन्न च किंचन ॥ &१ ॥ निषेधशेषस्सर्वं त्वं विश्वक्रद्विश्व पाटकः ॥
विन्वलयङ्कद्िश्वात्मा प्रणतास्स्मस्तमीश्वरम् ॥६२॥ योगरंधितकर्माणो य प्रपश्यन्ति योगिनः॥ योगसंभाविते चित्ते योगेशं
स्वां नता वयम् ॥ ६३ ॥ नमोस्तु तेऽसद्यवेग शक्ति्िय यीमय ॥ नमः प्रसन्नपालाय नमस्ते भूरिशक्तये ॥.&९ ॥
युस्वकूप आपके टि नमस्कार है ॥ ६० ॥ हे भ्रमु! न आप देवता हैन. असुर हिन मनुष्य हैन तिर्यह्न ब्राह्णरहैन्खी ह
न नुक है, न परुष है ओर आप् सत् अपतत् कुछ नहीं करते ॥ ६१ ॥ है संसारके करनेवठे संसारके पाट्क ओर संसारके
|® करनेवारे ससारकी आत्मा सम्पूणं निषेके शेष आयपही ह देसे आप दैश्वरको भे. प्रणाम करता हूं ॥ ६२॥ कमं योगमे ||
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मन् ङगानेवाडे योगी छोग योगम ठ्नचित् हौ योगीश आपको देखते ह, देसे आपके टिये नमस्कार है ॥ ६३ ॥ अर्य ठेग | >
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। शक्तियोते युक्त भसन्न चित्त महाशकित पाठक आपके छिये नमस्कार है ॥६४॥ हे दुगेश जो विषयलघर मनुष्य आत्माको नही भाष करसकते || £
उनके मी शरणमे आनि उनके उद्धार मे वित्तरुगानेवा गृढुदधि आपके ल्यि नमस्कार है ॥६५॥ मूख भ्रचष्य जिसकी मायासे अपनेको नही जानते ||
रते अकथनीय माहातम्यवाटे महापरमु आपकैटिये नमस्कार है ॥ ६६ ॥ ब्रह्ाजी बोटे शिर श्ुकाये हुये विष्णआदिकं सव देवता महादेवजी इस ||;
प्रकार स्तुति कर मौन होगये ॥ ६७ ॥ इति श्रीशिवमहाषएराणभाषारीकाा रद्रंहिताऽन्र्गतद्वितीयसती खंडे नेदाबत विधानशिवस्तुतिवणेनं नाम ||
|| कदिद्ियाणां दुगैशानवाप्यपरवत्मने ॥ भक्तोद्धाररतायाथ नमस्ते गूढवचैसे॥६५॥यच्छक्त्याहं धियात्मानं हंत वेद् न मूटधी॥तं ठ
दुरत्ययमादारम्य त्वां नताः स्मो महाप्रभुम् ॥६६॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्तुत्वा महादेवं सवै विष्ण्वादिकास्पुराः॥ तूष्णीमास
नप्रभोरमे सद्धक्तिनतकंधराः॥६७॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शु्रसंहितायां द्वितीये सतीखंड नंदाव्रतविधानशिवस्तुति
वर्णनं नाम पंचदशोऽध्यायः ॥१५॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्तुति च हयांदिकृतामाकण्यं शंकरः ॥ बभूवातिप्रसन्नो दि विजहास
च सूतिङृत् ॥१॥ ब्रह्मविष्ण तु दृष्टा तौ सख्रीकौ संगतौ दरः॥यथोचितं समाभाष्य प्रच्छागमनं तयोः ॥२॥ इद् उवाच॥
देदरे हविषे देवा सुनयश्चा्य निर्भयाः ॥ निजागमनहेतु हि कथयस्व सुतत्वतः ॥ ३ ॥ किमर्थमागता यूयं किं कार्थ चेद वि
दयते ॥ तत्सर्व श्रोतमिच्छामि भवत्स्तुत्या प्रसन्नधीः ॥ ९ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति प्रष्ठ हरेणाहं सर्वलोकपितामहः ॥ सुनेऽवोचं
महादेवं विष्णुना परिचोदितः ॥५॥ देवदेव महादेव करूणासागर प्रभो ॥ यदर्थमागतावावां तच्छृणु स्वं सुरषिमिः ॥ & ॥
पचदशोऽध्यायः ॥१५॥ ब्रह्माजी बोटे इप्रकार हरि इत्यादिकोंकी स्तुतिको सुन सृष्टिकतौ शिवजी भरसन्न हो हंसे ॥ १ ॥ ्वियोके सहित जह्य
ओर विष्णको देख हर यथोचित कह उनके कारण पृछने छगे ॥२॥ रुद्र बोले हे विष्ण हे विधि हे देवता है नियो निभेयहो अपने आगमनका
यथार्थं कारण कहो॥३॥ आपकी स्तृतिसे मे प्रसन्नहूं आप किञ्च निमित्त आये है ओर आपका यहां क्या कायं है वह सब सुननेकी इच्छा है॥ ४॥
|| बहमाजी बोरे इसभकार जव महादेवजीने पुछा तोसव छोकोंका पितामह भँ बह्मा विष्णजीमे भरित होकर महादेवजी बोढा ॥५॥ हे करुणासागर]
# > 46 2 4 > 4
८०९८-4 ~ 6 > > ++ ८4 > 3९ ~
क +
|| जित्तकारण हम आये ह हे देवदेव ! वहं आपसुरषियोपे सुनिथे॥६॥ हे दृषमध्वज ¡ विशेषकरके हम आपहीके निमित आये आप्ता हमारी सहायता
>| कीजिये नहीं तो जगत् न होगा ॥७॥ हेमह्र। कोर अपुर तो मेरेवध्यहोगे कोई हरिके ओर कोई आपसे मरेगे॥८॥ दे महाभरभो। कोई आपकै वीर्यम उतवन्न
ट हुए ुवद्रारा मरे हे प्रभो! कोदैत्यभदि शितकेद्वारा मारेजांयगे ॥९॥ हेशिव! अ।पहीकी कपासे देवताओंको उत्तम सुख होगा घौर अघुरको
|| मार जाप जगृतका रे मंगल करो॥१०॥ाप् रागदेषते रहित सदा योग युक्त हो आप द्याम रत है आप किभ्ीको बध नहीं करते ॥११॥ €
ठ विरेषतस्तवैवाथमागतादृषमध्वज॥सहार्थिनस्सदायोग्यमन्यथा न जगद्धेत्॥७॥केचिदधविर्यत्यसुरा मम् वध्वा महेश्वर ॥
|| इरे्भ्यस्तथा केचिद्धवतश्ापि केचन॥८॥केचित्दीर्यनातस्य तनयस्य महापरभो॥मायावध्याः भभौ केविद्धविर््य्यसुरास्सदा
ठ ॥९॥ तवेव कृपया शंभोस्खराणां षखसत्तमम्॥ नाशयित्वाऽसुरान् घोराजगत्स्वास्थ्यं सदाभयम्॥१० ॥ योगयुक्ते त्वयि सदा राग
¢ द्ेषनिवर्जिते॥ दयापतरकनिरते न वध्या ह्यथवा तव॥११।अराधितेषठ तेष्वीश कथं इषटस्तथा स्थितिः॥अतश्च भविता शुक्त
नित्य॑नित्यं वृषध्वज ॥१२॥ सृष्टिस्थित्यंतकमाणि न कार्याणि यदा तदा ॥ शरीरभेदश्वास्माकं मायायाश्च न युज्यते ॥१३॥
४ एकस्वहूषा हि वयं मित्रः कायस्य मेदतः॥कार्थमेदो न सिद्धश्रपमेदोऽपरयोजनः॥ १४॥ एक एव त्रिधा मित्रः परमात्मा मह
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शिण०्ए°
॥१०५॥
शवरः॥मायास्वाकारणादेव स्वतंत्रो लीलया प्रुः॥१५॥ वामाङ्गजो हरिस्तस्य दक्षिणांगभवो इ्यहम्॥ शिवस्य हद्यानातस्त्व
हि पू्णतनुश्शिवः ॥१६॥ इत्थं वयं त्रिधा भूताः प्रभामित्रस्वहूपिणः ॥ शिवाशिवसुतास्तच्ं हदा विद्धि सनातन ॥ १७ ॥
देवेश उनके आराधनामे फिर सृष्टिक स्थिति कैसी होगी १ हेवृषभध्वज इसकारण आपको योग्यकार्यौम मिित होना उचित है॥ १ २॥यदि सष्िस्थिति
ओर अतक कम न किये जांय तो उस समय हमारा शरीरभेद मायते युक्त न होगा॥ १ ३॥हमारा एकह स्वरूप है हम कार्थ भेदे पथक् हँ यदि
काय भद् न हो तो शपमेद की आवश्यकता नहीं है ॥१४॥ परमात्मा महेश्वर एकही कार्यवश तीन भदको पराप हूए है मायाही इससे कारण है भभुटी
छसे स्वतंत्र ॥ १९५ ॥ हरि उनके वाम ओर भ दक्षिण अंगसे उत्पन्न हुआहूं आप पूणशरीर शिवशंकरके दयसे उत्पन्न हृए हो ॥१६॥ हे रभो 1
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रुम्सं.३
स.खं.र्
अ०१६
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# 3
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॥ हम भिनस्वरप तीनभकारसे हृए है शिवाशिवका हमको एकभकार त्र जानो हे सनातन 1 ॥१९७॥ का्यके कारण हम ओर विष्णजी
तो ब्जीसहित होगे है हे प्रभो आपकी आज्ञासे मरमपुव॑क लोका कायं करते है ॥ १८ ॥ इसरकारण संसार ओर देवताओंके सुखकै निमित्त ¢
मा्यारूपसे आप कोई श्री प्रहण करं ॥१९॥ हे महेशान ! ओर मी एक रानी बात भँ कहता हं आप उसको छनं जो शिवहूप आपने पह
| सामने कहा था ॥ २० ॥ हे बरह्ाजी ! मेश जो परमप है वह तुम्हारे अंगसे शुढनाम कहठानेवाछा भक होगा ॥ २१ ॥ ¢
अहं विष्णुश्च स्रीकौ संजातौ कायैदेतुतः ॥ रोककायैकरौ प्रीत्या तव शासनतः प्रभो॥१८॥ तेस्माद्विश्वहिताथांय सराणां |©
सुखहेतवे ॥ परिगरहीष्व भार्याथ रामामेकां खशोभनाम् ॥ १९॥ अन्यच्छृणु महेशान पूर्ववृत्तं स्मृतं मया ॥ यत्न पुरःएुरा ||
रकतं त्वयेव शिवरूपिणा ॥२०॥ महं परमं ब्रहमत्रीदशं भवदगतः ॥ भकटी भषिता लोके नाम्ना शदः प्रकीतिंतः ॥२१॥ ||
सृष्िकर्ताऽभवद्र्ञा हरिः पारनकारकः ॥ रुयकारी भविष्यामि श्ढरूपो यणाकृतिः॥२२॥ श्ियं विवाह्य रोकस्य करिष्ये ट
कायैयुत्तमम्॥इति संस्मृत्य स्वपोक्तं पूरणं ङ निजं पणम् ॥२३॥ निदेशस्तव च स्वामिन्नदं सृष्टिकरो हरिः ॥ पारुको ख्य ठ
हतुस्त्वमाविभतस्स्वयं शिवः ॥ २७.॥ त्वां विना न समर्थौ हि आवां च स्वस्वकर्मणि ॥ रोककार्य॑रतौ तस्मादेकां गृह्णीष्व ¢
कामिनीम् ॥ २५ ॥ यथा पद्माया विष्णोस्सावि्री च यथा भम ॥ तथ सहचरीं शंभो कतां शह्नीष्व संब्रति ॥ २६ ॥ . $
जहा पाठनकरनेवाटे विष्ण ओर यणाङति भँ शुग्नासे कयकरनेवाखा हूंगा ॥ २२ ॥ एक् श्ञीको व्याहकर रोकका उत्तम छायं कंगा, यह ¢
अपना कहा स्मरण कर भप अपना भ्रण पूणं करं ॥ २३ ॥ हे स्वामिन् आपकी आज्ञासे भँ खटिका, विष्ट पारनकती, भौर आदिभूतं
स्वयं शिव आप ठयकायी ह ॥ २४ ॥ आपके विना हमं अपना कायं करनेम समर्थं नहीं है इसकारण लोककारथभे तत्पर आप एक ज्ञीको ¢
रहण करं ॥ २५ ॥ जेसे विष्णके लक्ष्मी मेरे सावित्री है पैसे आप भी कोर कान्ता गृहीत कीजिये ॥ २६ ॥
ह,
शि ७पु9
॥१०६॥
= + ९ 4९4 44 19 4944 ज ज
रु०सं.२
स.खं.२
अ०१६
बह्ाजी बोठे यञ्च न्षाके
हे हरि | आप दोनों भेर
दोनों निश्वय करके तीनों
अपनीही आत्मामं रमण करनेवाटे
ब्रह्मोवाच ॥ इति भत्वा वचो
हे ब्रह्मन् हे हरे मेदि
इन वच्नोको सुन विष्णके समीप प्रसन्न मुखवारे टो
सदा अत्यन्त श्रिय हँ आप दोरनोँको देख निश्वय कर
लोकके स्वामी है आप दोनों कथनमें
विवाह करना उचित नहीं है, क्योकि भ तपम रत सदा विरक्त ओर विदित
निरंजन अवधूत तल ज्ञानी
मे हि ब्रह्मणः पुरतो हरेः ॥ स मां जगाद
युवां प्रियतरौ सदा ॥ दृष्ठ त्वां च मभानंदो भवत्यतितरां
` वक
गरिष्ठ है आप सदा संसारके
योगी हूं ॥ ३०
अपनेको देखनेवाठे कामसे वजित ॥ ३१ ॥
लोकेशः स्मेराननष्चखो हरः ॥२७॥ श्वर उवाच ॥
केकि ईश महादेवजी सुक्षसे बोठे ॥२७॥ ईश्वर बटे हे व्रह्मा !
के म्चे बढा आनन्द होता है ॥
२८ ॥ देवताओं घ्र आप
कार्येमिं रत ह॥ २९॥ हे सुर ! मष
॥ जो निवृत्तिके उत्तम मागम सदा स्थित
विकाररहित भोगरर्ित, सदा
खलु ॥२८॥ युवां सुरविशिष्ौ हि भिम
स्वामिनौ किक ॥ कथनं. वां गरिष्ेति भवकार्यरतातमनोः॥२९॥उचितं न सुरश्रेष्ठो विवाहकरणं मम्॥ तपोरतविरक्तस्य सदा
विदितयोगिनः॥३०॥ यो
कारी ह्यभोगी च सदाशचिरमगलः
जगद्धितम् ॥ ३५ ॥ म्वा वचो
अशुचि ओर अमंगर रूप
आनन्द है, ज्ञानहीन पुरुष कामक
नहीं है मै सत्य सत्य कहता हू ॥३४॥ सम्यक्
ह इस संप्ारमे स्वीका उन्हे कया प्रयोजन
दृच्छा करते ह ॥ ३३ ॥ संसारं विवाहका करना यहं परम
©
निवृत्तिरमागेस्थः स्वात्मारामो निरंजनः ॥ अवधूततल्ञानी स्वद्रष्टा कामवर्जितः
॥ तस्य प्रयोजनं लोके कामिन्या किं वदा्ुना ॥ २२ ॥ केवलं
दास्ति वै ॥ ज्ञानदीनस्तु पुरषो मनुते बहु कामकम् ॥ ३३ ॥ विवाईकरणं लोके विज्ञेय
सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ३४ ॥ न स्वाथे
गरिष्ठं वा नियोक्तिपरिपूतत
हैसो दस समय किये ॥३२॥
क
मे प्रवर्ति
४
प्रकारसे स्वार्थका विचार करनेसे उसपर भी आप
सदा भक्तके वशम आप छोगोके वचन मान इस् कार्मुकी प्रीतिके खयि विवाह कषगा ॥ ३६
ये ॥ करिष्यामि विवाईं वे
©
॥३१॥ अवि
योगटय्रस्य ममानंदस्स
रुचिर्न मे
ईं सम्यकस्वार्थविचितनात् ॥ तथापि तत्करिष्यामि भवदुक्त
रसै
भक्तवश्यस्सदा ह्यहम् ॥ २६ ॥
केवल योगहीमे गे रहनेसे /
बधन समक्घिये, इसलिये म॒ङ्ञे उसकी रुचि
के कहनेसे ओर संसारके हितत करूगा ॥२५॥
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हे हारे ! हे बह्मा ¡ जै लीक मर रहण करगा वह भेरा भरण तथ्य वचन सुनो ॥३७॥ उस कामहपिणी गोगिनीको स्लीके छथि आप् उपदेश ४
द जो विभागपर्वैक भरे तेन ग्रहण करनेमे समथ हो ॥ ३८ ॥ जब मँ योगमे युक्त हो जाऊं तब वह योगिनी होजायः ओौर जब कामसे युक्त
होजाऊ तब वह कामिनी होजाय ॥३९॥ जितत अश्षरको वेदके जाननेवाठे बुद्धिमान कहते ई उसे सनातन ज्योतिदह्प शिवकी चितना करती ९
रहे ॥ ४० ॥ हे जान् ! उसकी चिन्तामे जब म आसक्तं होजाऊं उस समय विघ्न करनेवाटी न हो अन्यथा बह हतयोगी ॥ ४१ ॥ आप॑
परंतु यादृशीं कांतां अरीष्यामि तथापणम् ॥ तच्छण॒ष्व दर ब्रह्मन् युक्तमेव वचो मम ॥३७॥ या मे तेजस्समथां हि अरदतं ४
।
स्याद्विमागशः॥तां निदेशय भार्याथ योगिनीं कामदूपिणीम् ॥३८॥ योगयुक्ते मयि तथा योगिन्येव भविष्यति ॥ कामासकते
मयि तथा कामिन्येव भविष्यति ॥ ३९ ॥ यमक्षरं वेदमिदो निगदति मनीषिणः ॥ ज्योतीङ्पं शिवं ते च चितयिष्ये सनात ||
नस् ॥४०॥ तञ्वितायां यदा सक्तो ब्रह्मन् गच्छामि भाविनीम् ॥ तञ्च या विघ्ननननी न भवि हतास्तु मे ॥४१॥ त्वं वा ¢
विष्णुरद वापि शिवस्य ब्रह्मरूपिणः ॥ अंशभूता महाभागा योग्य तदबुचितनम् ॥ ४२ ॥ तचचितया विनोद्वाहं स्थास्यामि ||
कमलासन ॥ तस्मानाया प्रदिश त्वं मत्कर्मालगतां सदा ॥४३॥ तवाप्येकं पणेत व्रण बर्हश्चमां भरति ॥अिश्वासो मडु &
कतेचेन्मया त्यक्ता भविष्यति ॥४४॥ ब्रह्लोवाच ॥ इति तस्य वचशथुत्वाहं स॒विष्णुैरस्य च ॥ सस्मितं मोदितमनोऽवोचं |
चेति विनघ्रकः ॥४५॥ शृणु नाथ महेशान मानिता यादशी त्वया ॥ निवेदयामि दप्ीत्या तां लियं तादृशीं भमो॥ ५६ ॥ |¢
ब्रह्मा, विष्ण ओर मँ महाभाग ब्ह्रपी श्रीशिवजीके अंश है, इस हेतु उनका चिन्तन योग्यं है ॥४२॥ है कमङासन ! उसकी चिन्तकं बिना ©
म विवाह कर्ममे स्थिति कग इसकारण आप् मेरे अचुकूक चरुनेवाटी बीका चिन्तन करं ॥४३॥ हे बह्म ! मेरे एक भरणको सुनिये यदि
मेरे वाक्यमे उसे विश्वास न होगा तो भँ उसे त्याग कर दगा ॥ ४४ ॥ ब्रह्माजी बोरे इस पकारके उनके वचन दुन मँ ओर विष्ण प्रसन्नं हो
हैसकर अत्यन्त नत्र हो बोठे ॥४५॥ हे महान् ईश ! हे नाथ ! सुनिये जिस भरारी ज्ञी आपने बताई हे भरभो ! उसी भकारकी उस श्ञीको
६२
` वथ
रि भरसन्नतापुेक निवेदन करूगा ॥ ४६ ॥ कारक साधन करनेवाटी उमा भिन्नरूपसे उत्नन हृदं 8 हे भु ! जितपकार पहिले उन्होनि ष ह
ह || नके दो रूप धारण कथि थे ॥ ४७॥ दकम मगवानूकी ओर सरस्वती मेरी कोता हई कोकके कायरूप हितके करनेवाठ, भगव १ ||
॥१०७॥ || | तीसरा हप नहो धा था ॥४८॥ हे विभो ! जो सती नाते भिद दक्षकी कन्पा है वह हितके करनेवाटी उती पकरकी ज्ञ होगी ॥५९॥
ह देवेश ! वह महातेजधाढी सती आपके पति होनेकी इच्छासे दढवत हो आपके अर्थं तप॒ करती है ॥५०॥ हे महेश्वर 1 कपाकर उनको वरदेनेकं ¢
८
९
|| उभा सा भित्रषटपेणं संजाता कार्यस्ाधिनी ॥ सरस्वती तथा लक्ष्मद्विधा षा एरा पमो॥७७॥पाद्माकांताऽभवद्विष्णोस्तथा ||
ट| मम सरस्वती ॥ ततीयदूपा सा नाथरू्टोककायदितेषिणी॥७८॥ दक्षस्य तनया याभूत्सती नाम्ना तु सा विभो॥सेवेदशी भवे |©
द्रायां भवेद्धि हितकारिणी ॥ ४९॥ सा तपस्यति देवेश त्वदर्थं हि ढता ॥ त्वां पति भ्ाप्ठकामा वे महातिजोवती सती ||६
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॥५०॥ दातु गच्छ वरं तस्थै कृषां रू महैश्वर ॥ तां विवाहय सुपीत्या वरं दत्त्वा च तादृशम् ॥५१ ॥हरेभैम च देवानामियं
4
वाज्छस्ति शंक ॥ परिपूरय सद्या पश्यामोत्सवभादराव् ॥ ५२ ॥ मङ्गलं परमं भूयात्रिलोकेषु खलावहम् ॥ सवैज्वरो ||
विनश्येद्रे सवषां नत्र संशयः ॥ ५३ ॥ अथवास्सद्चश्शेषेवदैतं मधुनः ॥ रीराजाकृतिमीशानं भक्तवत्सलमच्थुतः ||)
॥ ८४ ॥ विष्णु्वाच ॥ देवदेव महादेव क्णाकर शंकर ॥ यदुक्तं ब्रह्मणा सवं मदुक्तं तत्न संशयः ॥ ५ ॥ #
ह, २ ||| छवि आये, ओौर उसी भकारका वर देकर भीतिपू्वक उनका विवाह कीजिये ॥५१॥ हे शंकर ! विष्णकी मेरी ओर देवताओोंकी यही इच्छा है उपे ट
त.खं.२ ||@४|| पूरी कीजिये जिस्म आदरपुवंक इत उत्सवको अपनी दते देख ॥५२॥ ओर तीनों लोकम, सुखके देनेवाठा परमर्भगर हो, सवके संपुणे ज्वर ||| .
अ०१६ | नष्ट हो इसमे सदेह नही ॥५३॥ हे अच्युत ! पधुषदन अपनी रीरा हप धारण करनेवाठे ! भक्तत्सक शिवस कहते हए भेरे वचनम जो ।
|| अवशिष्ट हो उते आप किये ॥५४॥ विष्णजी बोठे हे देवोके देव शिवजी ! हे करुणाकर जो ब्रह्ाजीने कहा वह सब भेराही कहा जानिये॥>2
पणरपांिीीीिाीथीयस श म
इसमे संशय नहीं ॥ ५५॥ हे महान ईश स॒ज्ञपर कृपाकर उनका विवाह कर तीनों छोकको सनाथ कीजियि ॥ ५६ ॥ बरह्ाजी बोडे यह् दै
कह विष्णु चुप हो रहे ओर भक्तवत्सठ भ्रमु शिवजी हैसकर तथास्तु कहते हृए ॥ ५७ ॥ हम छोग शिष्रकी आज्ञा पाकर हषित हो चियोकै ट
| देव ऋषियों सहित अपने स्थानको चरे गये ॥ ५८ ॥ इति श्रीशिवमहाषराणभाषारीकायां रुद्रसंहिताऽन्तगेतद्वितीयसतीसेडे विष्णबह् ६
रतशिवभार्थना नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी बोठे हे छनि ! इस भकार सव देवताओंने शिवी प्राथना की ओर स॒त्कारपूेक
तत्छुरूष्व महेशान कृषां कृत्वा ममोपरि ॥ सनाथं कुर् सदष्टया भरिलोकं सविवाह्य ताम् ॥५६॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता भगवान् ¢
विष्णु स्तष्णीमास सुनेसुधीः॥ तथा स्तुति विहस्याहस् प्रभुभ॑क्तवत्सलः॥५७॥ततस्त्वावां च संप्राप्य चाज्ञां स भनिभिस्मुरेः ॥ $
अगच्छावस्वेषटदेशं सक्चीको परहर्षितौ॥५८॥इति श्रीशिवमहापएुणे द्वितीयायां शद्रसंहितायां द्वितीये सतीखंड विष्णुबह्मक्कतशिष ठं
प्रा्थनावर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता सर्वदेवेश कृता शंभोर्ख॑तिः षरा ॥ शिवाञ्च सा वरं पराप्ता ॥¢
शृणुद्याद्रतो सुने ॥१॥ अथो सती पुनः शुष्पक्षेऽष्टम्याभुपोषिता ॥ आस्विने मासि स्वैशं पूजयामास भक्तितः ॥२॥ इति ट
नदात्रते पूणे नव्यां दिनभागतः ॥ तस्यास्तु ध्यानमभ्रायाः प्रत्यक्षमभवद्धरः ॥३॥ स्ाद्गखन्दरो गौरः पंचवक्रक्चिरोचनः॥ ठ
चद्रभालः प्रसत्रात्मा शितिकठचतुथंज ॥ 9 ॥ चिञ्चलव्रह्मकवराभयधृग्भस्मभास्वरः ॥ स्वश्ुन्या विरुसच्छीषस्सकलाद्गम ५
नोदरः ॥ ५ ॥ महाावण्यधामा च कोरिचन्द्रसमाननः ॥ कोरिस्मरसभाकांतिस्सर्वथा श्चीपियाक्ृतिः ॥ ६ ॥ ।
उनसे वर पाया बह कथा आप आद्रे सुनिये ॥ १ ॥ क्षिर॒स्तीजी आश्विन शु < को भकतिपुवैक महादेवजीका पुजन करती हदं ट
॥ २ ॥ दस भकार नंदाव्रतके पुणे होनेपर नवमीको उन्हीके ध्याने मग्र प्वतीजीकै सन्युख शिवजी भरगर हुए ॥ ३ ॥ सौग सुन्द्र ट
{ गौर परौच ख तीन नेतरवाठे चन्द्रमा प्रसन्न शरीर नीलकंठ चतुभज ॥ ४ ॥ भेष्ठ॒बहयादिकोंको अभय देनेवारे चिशूकको धारण किथे
हुये भस्मसे देदीप्यमान मस्तके गेगाको धारण कयि हये सौग सुन्दर ॥ ५ ॥ सम्पूण शोभाके घर करोदों चन्द्रभाके समान सखवार
चव
करोढों कामदेवोकी कान्तिकी छजानेवाठेः सर्वथा चिरयोको मोद देनेवाडे ॥ ६ ॥ शिवको भरत्यक्ष देख नासे नीचा खख कि प
चरणो मणाम् करती इं ॥ ७ ॥ तपस्याके फठको देनेवाछे शिवजी पाणि अ्हणकी इच्छा क्रते हये भी त ताध
मते बोठे ॥ ८ ॥ महादेव बोठे हे दक्षए्री 1 तुम्हारे इस जतते भरँ प्रसन्न ह जोकुछ तुम्हारी ईच्छा हो वर मेगि भ द् छथि उत्
हे ॥ ९ ॥ ब्रह्माजी बोठे जगत्पति शिवजी उनके चित्तके भावको जानते हये मी उनकै वाक्य सुननेकी इच्छाम वर मृगौ यह् ५ कहते हूए
रत्यक्षतो हरं वीक्ष्य सती सेदग्विधं प्रधुम् ॥ ववन्दे चरणौ तस्य सुरुनावनतानना ॥ ७ ॥ अथ प्राह महादेवस्सतां सद्रतं
शि 6 पुं ©
॥१०८॥
|
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६
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८ धारिणीम् ॥ तामिच्छन्नपि भारया्थं तपश्चर्या फलप्रदः ॥ ८ ॥ महादेव उवाच ॥ दक्षनेदिनि श्रीतोरिम ब्रतेनानेन सुव्रते ॥ व्र ¢
|| वस्यसंदास्थे यत्त वाभिमत वेत् ॥ ९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ जान्नपीह तद्भावं महादेवौ जगत्पतिः ॥जगौ वरं वृणीष्वेति तद्वाक्य £
४ श्रवणेच्छ्या ॥ १० ॥ सापि अपावशा युक्ता वक्तुं नो डदि यत्स्थितम् ॥ शशाक सात्वभीष्टेयत्तहटनाच्छादिते पुनः ॥११॥
+|
्रममभ्ाऽमवत्साति त्वा शिववचः प्रियम् ॥ तज्ज्ञात्वा खभसत्नोभच्छैकरो भक्तवत्सलः ॥ १२॥ वरं शरदि वर बरद प्राहेति |£
स पुनषैतम् ॥ सतीभक्तिवश श्शुरंतयामी सतांगतिः ॥१३॥ अथ अपां स्वासधाय यदा प्राह हरं सती ॥ यथेष्ठं देहि वरद ट
वरमित्यनिवारकम् ॥ १९ ॥ तदा वाकंयस्यावसानमनवेक्ष्य वृषध्वजः ॥ भव त्वं मम म्यति प्राह तां भक्तवत्सलः ॥१५॥ ट
एतच्छ्रत्वा वचस्तस्य साभीष्टफर भावनम् ॥ तूष्णीं तस्थौ भरबुदिता वरं प्राप्यं मनोगतम् ॥ १६ ॥ ट्
4
रु.स.२ \/
||
ससं. |
अ०१७ ठ
॥ १० ॥ ठजायुक्त वह जो कुछ हदयं था कहनेको न समथ हई ॥ ११ ॥ शिवके भिय व्चनकौ हुन रमम मग्न होगरई भक्तवत्सल |£
शकर उत्ते जान अत्यन्त रन्न हये ॥ १२ ॥ सजनोंकी गति अन्त्मी शिव सतीकी भक्तिकं वश हो शीघ्र ही कर वर मागो २ यह ||?
कहने ठे ॥ १३ ॥ छन्नाको धारणकर सतीने शिवे कहा जो कु आपकी इच्छा हौ वही षर देदीजिये ॥ १४ ॥ भक्तवत्सल ||
वृषभध्वज सतीकै वाक्यको सुन हमारी वार्मागी हो यहं कहते हृए ॥ १५ ॥ इस भकार शिवके षचनको सुन जो कुछ मनम इच्छा थी उसे
| । | अत्यन्त भन्न हो सती चुप हो गई ॥१६॥ काषयुक्त शिवे सामने स्थित सुन्दर हसन करती हृद सतीमे कामको बढानेवाठे हावभावोँको
¢ किया ॥ १७ ॥ उन समय उसके भावोको स्वीकार कर शेगाररसच उन दोनोंके चित्तं शीघही भवैश करगया ॥ १८ ॥ संसारकी रीटाकै
|| अदकरण करनेवाले उनके चित्तम शगाररसके प्रवेश होनेसे कोटं चित्र इच्छा उत्पन्न हुई ॥१९॥ बन्दर कान्तिवारी सती चन्द्रोदये स्फटिक
£ पत्थरके समान शवेतवाल्म पीठी रेखाके समान शिवको पाकर शोभित हृदे ॥ २० ॥ तव भन्न बह सती दोनों हाथ जोड भक्तवत्सलः शिवसे
४
£
¢ |
ट
|| सकामस्य हरस्याभ स्थिता सा चाक्हासिनी ॥ अकरो त्रिजभावांशच हावान्कामविवद्ंनान् ॥१७॥ ततोभावान्समादा यश्वंगा
¢ राख्योरसस्तदा ॥ तयोधित्ते विवेशाशुकला दावा यथोदितम् ॥१८॥ तत्परवेशात्त देवष लोकलीलाबसारिणोः ॥ काप्यभि
£| ख्या तयोरासीचचित्राचन्द्रमसोयैथा ॥१९॥ रेजे सती हरं प्राप्य सनिग्धमित्ाजनग्रभा ॥ चन्द्राभ्यारोऽभरेसेव स्फटिकोज्ज्व
| 11" अय सा तसवाचेदं इर दक्षायणी खः ॥ समसन्ना करो बद्वा नतका भक्तवत्सलम् ॥२१॥ सत्युवाच ॥
४ देवदेव महादेव विवाद विधिना प्रभो॥पितुम गोचरीकृत्य मां ग्रहाण जगत्पते ॥२२॥ ॥ ब्लोवाच ॥ एवं सतीवचः अत्वां `
महेशो भक्तवत्सलः ॥ तथा स्त्विति वचः प्राह निरीक्ष्य प्रेमतश्च ताम् ॥२३॥ दाक्षायण्यपि तं नत्वा शंभर विज्ञाप्य भक्तितः ॥
ए प्राप्ताज्ञा मातुरभ्याशमगान्मोषघदान्विता ॥२७॥ हरोपि हिमवत्प्रस्थ परविश्य च निजाश्रमम् दाक्षायणीवियोगाद कृच्छ्ध्या
|| नपरोऽभवत् ॥२५॥ समाधाय मनः शंथुलोकिकीं गतिमाधितः ॥ चितयामास देवष मनसा भां वृषध्वजः ॥ २६ ॥ ट
¢ फिर नम्र हो बोरी ॥ २१ ॥ सती बोटी हे जगत्ति देवोके देव पिताके शन्छस विवाहकी विधिते आप सु स्वीकार कीजिये ॥ २२॥ |£
(९
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ठ
ट
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६
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¢ || ्ह्ाजी बोटे इसप्रकार भक्तवत्सर शिवजी सतीकं वचनको सुन भेमल््र उसको दंखं॒तथास्तु बोखे ।॥ २३ ॥ सती भी शिवको भक्तिपु॑क
4 प्रणामं कर शिव्की आज्ञा पा प्रसन्न हो भाताके स्पीप चटी गह ॥ २४॥ शिवं भी अपने आथमको जा सतीकै वियोगसे ध्यानको ६
त
२
~~
घटा देते भये ॥ २५॥ हे खने सांसारिक गतिको स्वीकार किये हुए शिवजीने चित्तसमाधान कर ख्चको ध्यानम स्मरण किंया ॥ २६ ॥
|
` च
। त्रिथली शिवजीसे ध्यान किया हुभा मै शिवकी सिद्धिसे भरित हो शीघ्र उनके समीप पंच गया ॥ २७ ॥ जहां तीके वियोगे १
् बहे थे वहीं सरस्वतीके साथ मे भी पहुंच गय। ॥ २८ ॥ बे सरस्वतीयुक्त ये देख उत्सुक सतीके मे बद्ध शिवजी बोढे ॥२९॥ शि
त नोटे हे बहमाजी ! हम बडे सवाथा है जो इस समय आपको कष्ट दिया, अतएव इस समय भेरी स्वाथता चमक रही है ॥ ३० ॥ दक्षत्री
तीनि भे आराधना बडे भ्रमते की थी उप्ते भने नन्दावतके भरमावते उसको यह वर दिया ॥ ३१ ॥ उन्होने कहा कि आप् मेरे पति ¢
£| ततस्वंचित्यभानोदं महेशेन बिशचिना ॥ पुरस्तात्पराविशंतू्णं हरसिद्धिभचोदितः ॥ २७॥ यत्रासौ हिमवत्पस्थे तद्वियोगी ४
हरः स्थितः ॥ सरस्वतीयुतस्तात तत्रैव सथुपस्थितः ॥ २८ ॥ सरस्वतीडुतं मां च देवषे वीक्ष्य स प्रभुः ॥ उत्घुकः प्रेमबद्धच 4
¢ ट
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ट
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ट
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सत्या शंयुरुवाच इ ॥२९॥ शंथुरूवाच ॥ अहं बरहन्सवार्थपरः परिअदङृतौ च यत् ॥ तदा स्वत्वभिवस्वा्ं प्रतिभाति ममा ||ज
तया मत्तो जह्नन् वो वृतः ॥ मम भार्या भवेत्युक्तं मया तुष्टेन सर्वथा ॥३२॥ अथावदत्तदा मां सा सती दक्षायणीत्विति ॥
ट
-4
शुना ॥३०॥ अहमाराधितस्सत्यादाक्षायण्याथ भक्तितः ॥ तस्ये वरो मया दत्तो ने दाब्रतप्रभावतः ॥ ३१ ॥ भता भवेति च
पितुम गोचरीकृत्य मां शाण जगत्पते ॥३३॥ तदप्यंगीकृतं ब्रह्मन्मया तदधक्ति तुष्टितः ॥ सा गता भवनं मातुरहम्ागतो
विधे ॥ ३९ ॥ तस्मात्वं गच्छ भवनं दक्षस्य मम शासनात् ॥ तां दक्षोपि यथा कन्यां दद्यान्भेऽरं तथा वद् ॥ ३५ ॥ सती
वियोगभगस्स्या्यथा मे त्वं तथा ङुङ् ॥ समाश्वासय तं दक्ष सवविद्याविशारदः ॥ ३६ ॥ ¦
होव ओर भने उनसे कहा कि आप् मेरी वामांगी हों ॥ ३२ ॥ किर सतीने कहा किं आप म्चे पिताकै सन्मुख ॒विवाहविंधिे स्वीकार
करे ॥ ३३ ॥ उसकी भक्तिते प्रष्च हो मैने बह भी स्वीकार कर छिया वे अपनी माताके समीप गदं ओर भँ यहां चटा आया ॥ ३४ ॥
+ | अतः आप भेरी आज्ञासे दक्षसे जाकर कह दीजिये . जिसमे किं ३ शीघही अपनी कन्याको सञ्े देदेवं ॥ ३५ ॥ स्मे सतीका वियोग
‰|| छूट जावे वैसेही रब वियाविशारद आप दक्षको सभक्लादेव ॥ ३६ ॥ ऋ
| बहाजी बोहे दकषके समीप जानेकैटिये से कह सरस्वतीको देख शिवजी सतीके वियोगमं भ्र हौ गे ॥ ३७ ॥ उनसे आज्ञा पा ङतछ्यं १
| मँ जगत्पति भक्छवत्सर उनसे कहने गा ॥ ३८ ॥ ब्रह्लाजी बोरे ह भगवन् शंभु जो कुछ आपने विचार कर निभ्ित किया है
¢ उक्षे भेरा ओर देवताओंहीका हतै ॥ ३९ ॥ दक स्वयं अपनी कन्या आपको देवैगे मे भी आपके वचन को दक्षसे कहगा ॥ ४० + ह
¢ ब्रह्माजी बोरे सवके दैश्वर प्रमु महादेवजी यह कहनेषर अत्यन्त वेगसे युक्त रथपर सवारहो मं दक्षकै भवनम आया ॥ ४१॥ नारद ¢
#|| ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युदीयं महादेवस्सकाशे मे प्रजापतेः ॥ सरस्वतीं विरोक्याञ्ु वियोगवशगोभवत्॥ ३७॥तेनाहमपि चाज्ञपः
£| इतङृत्यो खुदान्वितः ॥ प्रावोचं चेति जगतां नाथं ते भक्तवत्सलम्॥३८॥ ॥ बरह्मोवाच॥यदात्थ मग्वज्शम्भो तद्विचा्ं सनिः ¢
4 चितम् ॥ देवानां खख्यस्स्वाथो हि ममापि वृषभध्वज॥२९॥दकषस्तुभ्य सुतां स्वां च स्वयमेव पदास्यति॥अहं चापि वदिष्यामि ¢
| सद्वाक्यं तस्समक्षतः॥४०॥ बरमोवाच ॥ इत्यदीय महादेवमहं सेश्वरं भ्रथुम्॥ अगमं दक्षनिखयं स्यंदनेनातिवेगिनां ॥७१॥ $
¢ ॥ नारद् उवाच ॥ विधे प्राज्ञ महाभाग वदनो वदतां वर ॥ सत्ये गृहागताये स दक्षः किमकरोत्ततः ॥ ४२ ॥ बह्मोवाच ॥
तपस्तप्वा वरं प्राप्य मनोभिलषितं सती॥गृदं गत्वा पितुर्मातुः प्रणाममकरोत्तदा ॥४३॥ मा पितरेऽथ तत्सवं समाचख्यौ महे ४
६ श्वरात् ॥ वरप्राप्तिः स्वसख्या वे सत्यास्तुषटस्तुभक्तितः॥४४॥माता पिता च वृत्तांतं सर्वं श्रत्वा सखीश्चखात् ॥ आनन्दं परमं
लेभे च्रे च परमोतसवम्॥४५॥ द्रव्य ददौ द्विजातिभ्यो यथाभीष्टशुदारधीः॥ अन्येभ्यचांधदीनेभ्यो वीरिणी च महामनाः॥४६॥ ||
बोढे हे विधे ! महाभाग कहनवारोम शरेष्ठ | यह सङ्षसे कहिये कि उसके गृह आनेपर दक्षने क्या किया ॥ ४२ ॥ ब्रह्ाजी बे तीते
तपकै द्वारा मनोमिरषित व्र पाकर घरमे आया मातापिताको प्रणाम किया ॥४३॥ फिर सतीन भक्तिसे भस्त्हो जिसभकार सतीने महादेव-
ह|| जीते वर पाया वह सव वृत उनकी सीने मातापितासे कहा ॥४४॥ मातापिताने पके ससे भव दृ्तान्त सुनकर प्रम आनंदमे महो बडा
| उत्सव किया ॥ ४५ ॥ अत्यन्त उत्साहवाटी वीरिणीने उदार बुद्धिते बाह्ण ओर अपे दीनोको उनकी रुचके अनुसार दव्य दिथा ॥ ४६ ॥ र
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्ीरिणी माता भीतिके बढानेवाटी उस अपनी पुत्रीका आिगनकर प्रसन्नता मस्तकं घय वारम्बार प्रशंसा करती हं ष
बीतनेप्र धर्मको जाननेवाे दक्ष विचारने कगे किं इस कन्याको किस भकार महादेवजीका द ॥ ४८ ॥ श्रीमहादेवजी आकर यहि भसन्न होगये
अव वह फिर किसभकार कन्या षि यहो आवेगे ॥ ४९ ॥ यदि नँ किंसीको शिवके समीप भेक तो यह योग्य नहीं. कदाचित् वंह न अगीकारः
करं तो यह उयोगही वयर्थ होगा ॥५०॥ अथवा भक्ति उन्हीं वृषभध्वज शिवका पूजन करूंगा जिसे वह मेरौ कन्थाके स्वर्यं पति हवं ॥ ५१ ॥
वीरिणी तां समािग्य स्वतां प्रीतिवद्धिनीम् ॥ुध्न्युंपा्राय घदिता प्रशशंस घुहषहुः॥४७॥अय दक्षः कियत्कताल व्यतीते
धर्मवित्तमः ॥ चितयामास देयेयं स्वसुता शम्भवे कथम् ॥७८॥ आगतोपि महादेवः प्रसघ्नस्सजगाम् ह ॥ पुनरेव कथं सोपि
सुतायँऽजागमिष्यति ॥४९॥ प्रास्थाप्योथ मया कश्चिच्छमोनिकटमंजसा ॥ नैतद्ोग्यं निगरहीयायेवं विफलाद॑ना ॥५०॥
अथवा पूजयिष्यामि तमेव वृषभध्वजम्॥मदीयतनयाभक्तय स्वयमेव यथा भवेत्॥५१। तयेव प्ूनितस्सोपि वांछत्यायपरयल्तः॥
॥ १७ ॥ अब कु काक
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४ शंथुर्भवतुमद्व्तत्येवं दत्तवरेण तत्॥५२॥ इति चितयतस्तस्य दक्षस्य पुरतोऽन्वहम्॥उपस्थितोहं सदसा सरस्वत्यन्वितस्तद्।५३॥
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॥११०।
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मां दृष्टा पितरं दक्षः प्रणम्यावनतः स्थितः ॥आसनं च ददौ मद्यं स्वभवाय यथोचितम्॥५७॥ततो मां सर्वलोकेशंतत्रागमन
कारणम् ॥ दक्षः पप्रच्छ स क्षिप्रं चिताविषटोपि दरषितः॥५५॥ दक्ष उवाच ॥ तवाघ्रागमने हेतुः कः ग्रवेरो स सृष्िकृत्॥ ममो ` ट
परि सुप्रसादं कृत्वाचक्ष्वजगद्वरो ॥५६॥ पुरस्नेहात्कार्यवंशादथ वा लोककारक॥ ममाश्रमं समायातो इष्ठस्य तव दशेनात्॥८५७॥ ४
₹०स.२ ||| ओर उने पूजित वे उनको भा्याबनानेकी इच्छा भग करगे भौर शिवजी उनके परति होगे जसा किं प्रथम वर भ्रात हौ चुका है ॥५२॥ इसप्रकार ||
स.खं.२ चिता करते हुये दक्षके समीप सरस्वतीसे युकंत मेँ सहसा उपस्थित हवा ॥*५३॥ दक्षनेशङ्ञ पिताको देख मस्तकञ्चुका प्रणामकर अपने कल्याणक निमित्त ६
अ० १७ [2 || सज्ञे यथोचित आसन दिया ॥ ५४ ॥ चिता व्याकुङ होनेपरभी दक्ने परसन्रहो खस संपूण टोकोकि कताको देख शीघ्री अपने यर्हौक आग्रमनका (८
कारण पूछा ॥५५॥ दक्ष बोरा हे स्के करनेवाठे जगतके यरु स॒ञ्षपर भरसन्नहो अपने यह आनेका हेतु कहे ॥ ५६ ॥ हे टोकके करनेवाटे ।
४ जीतछिया है ॥६३॥ वह् कामवाणते विदध आत्मचितनको छोड भाकुत मदप्यक सपान व्याकुल हौ तीके चिंतन भ्रून है ॥ ६४ ॥ उस्
| भशरुतवाणीको भूक गणक सन्यल सती कां है इस भकारके शब्द कहते है ॥६५॥ तँ तुम काम ओर मरीच्यादिको जो पहिे चाहा था ह
आपके दशने संत मेरे आशममे पत्रे भ्रमते अथवा किप दूसरे कायते आप आये ॥ ५७ ॥ बरह्ाजी बोरे हे मुनिसत्तम ! अपने पुत्र दक्षके इस
प्रकार पुनेर प्रजापति दक्षको प्रसन्न करता हुआ मै बोढा ॥ ५८ ॥ ब्रह्मा बोठे हे द! जिसललिये में तुम्हारे पास आया हू 9 सुनो तुमसे
अधिकं ओर कौन भेरा हित् है जिसटियि पै तुम्हारे पात आया हं दह तुग्हं भी ईप्सित है ॥ ५९ ॥ तुम्हारी पुत्रीने जगत्पति महादेवकी आराधना
करके जो वर मागा है अन यह उसका समय उपस्थित हुआ है ॥ ६० ॥ महादेवजीने तुम्हारी पत्रीके लिये शीघही सुने तुम्हारे समीप भेजा है
इसमे जो उत्तम कत्य हो उसे ग्रहण करो ६१॥ श्रीशेकरजी वर देकर जसे गये तवे तुम्हारी त्क वियोगसे उन्हे कड नहीं पडती॥६२ ॥ जिका
बह्मोवाच ॥ इति पृष्स्स्वपु्ेण दक्षेण ॒निसत्तम ॥ पिदसत्ठवं वाक्य मोदयस्त प्रजापतिम् ॥५८॥ ब्रह्मोवाच ॥ शृणु दक्ष
यदथ त्वत्समौपमहमागतः॥ त्वत्तोकस्य दितं मेपि भवतोपि तदीप्सितम् ॥५९॥ तव पुत्री समाराध्य महादेवं जगत्पतिम् ॥
यो वरः प्राधितस्तस्य समयोयष्ुपागतः ॥ ६० ॥ शंभुना तव पच्यर्थ त्वत्सकाशमहं धुवम् ॥ अरस्थापितोस्मि यत्कृत्यं श्रेय
स्तद्वधास्य ॥ ६१ ॥ व॒रं दत्वा गतो शदरस्तावत्परभति शंकरः ॥ त्वत्सुताया वियोगेन न शम लमतेजसा ॥६२॥ अलन्ध्
च्छिद्रमदनो जिगाय गिरिशं न यम् ॥ स्वैः पुष्पमयेबणिययलं कृत्वापि भूरिशः ॥६३॥ स॒ कामबाणविद्धोषि परित्यज्यात्म
चितनम् ॥ सतीं विचितयत्नास्ते ग्याङ्कछः प्राकृतो यथा ॥ &९ ॥ विस्मृत्य परतां वाणीं गणा विप्रयोगतः ॥ क्र सती
त्येव मभितो भाषते निकृतावपि ॥ ६५ ॥ मया यद्ांछितं पूर्व त्वया च मदनेन च् ॥ मरीव्यायशैनि वरेस्तत्सिद्धमध्ुना
सुत ॥ ६६ ॥ त्वत्पुत्रयारापितश्शंभुस्सोपि तस्या विचितनात् ॥ अवुशोधयितु प्रप्स्वत्तते हिमवद्विरौ ॥ &७ ॥ ,
भद् नहीं भराप्त हो सकता रस्ता वह काम भी अपने स एष्पोके बाणोसे उनको अनेकं कारके यत्न करके भी न जीत सका इस समय उसने इन्हे
सुत ! वह अव सिद्ध ै ॥६६॥ तुम्हारी इत्रीनि शंमुकी तपस्या की ओौर वे भी उत्सुकहो उनके चितनमे म्र हिमाखयपर्वत पर है ॥ ६७ ॥
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शि्पु० जैत नैदाव्तसे नानाभाव सतीने शंभुकी आराधना की केसी ही शंभुने सतीकी इच्छा की है त ॥ व इसटिये ग ४
५१११ अकृत कर शीघ्रही उनको दौ ॥ ६९ ॥ भँ ओर नारद् उनको तुम्हारे स्थानम लाङगा आर् उन तुम इतत कन्यां ८ ट
£ उनको देदो ॥ ७० ॥ बह्माजी बोढे इस भकार वचन सुन मेरे एत्र दक्ष सन्न हौ म्स बोडे कि रेसाही होगा ॥ ७१ ॥ हे छने ! तब १ ४
अत्यन्त हरित हो वहां आया जहां लोकम रत॒ अत्यन्त उत्सुक महादेवजी थे ॥ ७२ ॥ हे नारद् मेरे च्जानेक पीछे सकुड्म्ब दक्ष भी ट
यथा नानाविधैभीविस्सत्त्वाततेन ब्तेन च ॥ शंभुराराधितस्तेन तथेवाराध्यते सती.॥ ६८ ॥ तस्मात्त दक्षतनर्यां शंभ्वथे परि |
कल्पताम् ॥ तस्म देह्यविरंषेन कृता ते कृतकृत्यता ॥ ६९ ॥ अहं तमानयिष्यामि नारदेन त्वदाख्यम् ॥ तस्मे त्वमेनां ¢
संयच्छ तदं परिकल्पताम् ॥ ७० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ शत्वा मम वचभेति स मे पुत्रोतिहर्षितः ॥ एवमेवेतिमां दक्ष उवाच् £
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|| परिद्षितः ॥ ७१ ॥ ततस्सोहं घुने तत्रागममत्यंतहषितः ॥ उत्सुको लोकनिरतो गिरिशो यञ संस्थितः ॥ ७२॥ गते |$
# नारद दक्षोपि सदार तनयो ह्यपि ॥ अभवत्पूणंकामस्तु पीयूषैरिव पूरितः ॥ ७३ ॥ ॥ इति श्रीशैवे महापुराणे द्वितीयायां
शद्रसंहितायां द्वितीये सतीखंडे सतीवरलाभो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ नारद उवाच ॥ रुद्रपाश्वं त्वयि गते किम ||
भरितं ततः ॥ का वातां श्यभव्तात किं चकार दरः स्वयम् ॥ १ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथाहं शिवमानेत सन्नः परमश्वरम् ॥ ट
आसदं हि महादेवं हिमवद्विरिसंस्थितस् ॥ २॥ मां वीक्ष्य रोकलषारमार्यांतं वृषभध्वजः ॥ मनसा संशयं चक्रे |©
|| सतीप्राप्तौ बुः ॥ ३॥
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रुभ्सं.
सुखं.र
अ०१८
मानो अमृते पूरित हो पुणकाम होगये ॥ ७३ ।॥ इति श्रीशिवमहाष्राणे भाषादीकायां रषरसंहितातगेतद्वितीयसतीखण्डे सतीवरखाभो नाम
हपदशोऽ््यायः ॥१७॥ नारदजी बोरे, आपके रुके समीप जानेपर कया चरित्र ओर कया वार्ता हु ओर स्वयं महादेवजीने कया किया सो
कहो ॥१॥ नहा बोठे, उसके पीठे भ भ्रसन्नतासे हिमारुय पवैतपर स्थित परमेश्वर महादेव शिवको खानक निमित्त गया ॥२॥ वृषभध्वज महादेव
शिवजीने ठोकके करनेवारे अज्ञको आतेहुये देख मने सतीक शाकी वारंवार चितना की ॥ ३॥ महादेवजी अपनी ठर को ९
। 8 कक गिभ स्थित
हो प्रात मनुष्यके समान सतीकी भक्ते चसे शीघही बोरे ॥ ४ ॥ दैश्वर बोठे, ह देव्तोमे ज्ये! उस आपके एने भेर निमित्त सुतीकै भरति
| 1 विचार किया वह कहिये जिसमे मन्मथ मेरे अतःकरणको न -विदीण क्रे ॥ ५॥ हे सुरभेष्ठ ! बियोगी मँ शिव अन्य वासको छोड
४ इच्छा कृतता हू अन्यके भति मेरा मन नही ६ै॥६॥ है ब्रह्माजी ! आप् निरतेर यही सीसे कहं कि मेँ निरंतर तुम्हारा ध्यान
# हप कार्ये करता हूं वह भेरी अभेद् श्रिया होर्जोय हे विधता ! सो आप करें ॥ ७ ॥ बह्लाजी बोठे हे नारदजी इस भकार रु्रजीकै रोका
अथ रीत्या रो रोक गतिमाधित्यटीखया ॥ सत्या भक्तया च मां क्िभरुवाच भाक्तो. यथा ॥ ६ ॥ ईशर उवाच ॥
| किम काषीरसुरज्येष्ठ सत्यं त्वत्सुतस्स् माम् ॥ कथयस्व यथा स्वातिं न दीयं मन्मथेन हिं ॥ « ॥ धावमानो विप्रयोगो
ठ (1 च सतीं प्रति ॥ अभिहति सरज्येष्ठ त्यान्यां भ्राणधारिणीम् ॥ ६ ॥ सतीति सततं बह्मन् वद कार्यं करोम्यहम् ॥
ट| अभेदान्मम सा माप्या तद्विधे क्रियतां तथा ॥ ७॥ जल्नोवाच ॥ इति शश्रोक्ततचनं लोकाचारसुगाभेतम् ॥ त्वां नारद
| 14 ५ ॥ 0६ य॒न्मम सुतो वदतिस्म वृषध्वज ॥ तच्छणृष्वं निजासाध्य सिद्धमि
&|| र २ स्म मया पुरी तदथ परिक्षिता ॥ ममाभीष्टमिदै कायं त्वद्वाक्यादधिकं पुनः ॥ १० ॥ मः
¢ ञयाराधितश्शंयुरेतदथं स्वयं एनः ॥ सोप्यन्विष्यति मां य॒स्पात्तदा देया भयां न
¢ च सोतिकम् ॥ तदा ल तनयां भिक्षां शंभवे विधे ॥ १२ ॥ गा ॥
# चारके वचन सुन मँ समक्ञाता हुआ शिवजीसे बोढा ॥८॥ हे वृषभध्वज ! सतीकै विषयमे को
|| ओर सिद्ध सय्ञिये ॥ ‰ ॥ उन्हीके अथै परिकल्पित इस पुत्रीक भँ उन्हे दया भेरा 1 ॥ श
| भेरी पतीन इसी निभित्त शम्भुकी आराधना कीहै ओौर वह भी असे इच्छा इस हेतु यै पा
ध म्भुव ह इच्छा करते है इस हेतु यै महादेवजीको दंगा ॥ धि
२ ॥ शुम तेम वह आवें तब महादेवजीको भिक्षाके अथं कन्या दू ॥ १२ ॥ प
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ह वृषध्वज ! दक्षने यह सकते कहा है इसं हेत् आप॒ शुम शुभमहृेमं उनके
ग्तिका आश्रय छे भक्तवत्सल रुद्र॒ इन मेरे वचनोको पुन सकर युषसे बोरे ॥ १४ ॥ र्द बोः › इ्हार
धर जाञगा इसल्ि हे जगतके रचनेवारे बह्मा ! आप॒ नारदका स्मरण करं ॥ १५॥ ह विधै ! मरीच्या
इत्युवाच स मां दक्षस्तस्माच्वं वृषभध्वज ॥ शुभे सहते तद्वेश्म गच्छ तामानयस्वच ॥ १२ ॥ व ॥ इति श्रत्वा
वचौलौकिकीं गतिमाश्रितः ॥ उवाच विहसद्द्रो ने मां भक्तवत्सलः ॥ १४ ॥ ₹द्रडवाच ॥ गमिष्ये भवतासा्ध ५
तदगृहम् ॥ अहमेव जगत्छष्टस्तस्मत्तवं नारदं स्मर ॥१५॥ मरीच्यादीन् स्वपुर्ना च मानसानपि सस्मर ॥ तेः साद दक्षनिय
गमिष्ये सगणोविे ॥ १६ ॥ ब्रह्नोवाच ॥ इत्याज्ञपोदमीशेन कोकाचारपरेण हं ॥ संस्मर नारत् तता च मरीच्यादीन्सुतां
स्तथा ॥ १७॥ ततस्समागतास्सरवे मानसास्तनयास्त्वया ॥ मम स्मरणमात्रेण दष्टासतं इतमाद९।त् ॥ १८ त
गतस्तूरणं स्मृतो शरेण शेवराट् ॥ सस्वसेन्यः कमलया गरूडारूढ एव च ॥१९॥ अध् चै्रसिते पक्ष नकषतर ध
दश्यां दिन भानौ निर्गच्छत्स महेश्वरः ॥ २० ॥ स्वेसुरगणेस्साद ब्रह्मविष्णु पुरस्सरः ॥ तथा तेषंनिभिर्गच्छन् सबभौ ष
शंकरः ॥ २१॥ मागें सशुत्सवो जातो देवादीनां च गच्छताम् ॥ तथां हरगणाना च सानदमनसामति ॥ २२ ॥
मैने तुम नारदका ओर अपने त्र मरीच्यादिकोंका स्मरण किया ॥ १७ ॥ तव मर स्मरण माते शीघ्रही प्रसन्न हो तुम ओर मरीच्यादि
मेरे मानसुत्र आगये ॥ १८ ॥ ओर रके स्मरण करनेषर लक्ष्मीसह गरुडाहूढ शेवराज सैन्य विष्ण शीघही आगे ॥ १९॥ चत
श्धपक्ष अयोदशी रविवार पू्ीफल्यनी नक्षत शिवजीने यात्रा कौ ॥ २० ॥ बह्मा विष्ण आदि संपूण देवता ओौर ७ खनियोक
साथ जाते हये मार्गमे श्रीशिवजी अत्यन्त शोभाकौ प्राप्त हए ॥ २१ ॥ अत्यन्त आनन्द्से युक्तं देवता ओर हर मागमे
के षर जाद्ये ॥ १३ ॥ बहा बो, हे छने 1 लौकिकी
तुम्हारे ओर नारदकै साथ उनके
दि अपने मानस्षए्रौका भी
ह्मरण करो उनके साथ गणोके सहित मे दक्षके स्थानको चहगा ॥१६॥ बह्माजी बोटे कोका चारसे युक्त ईशने जव इस प्रकार घश्च आज्ञा दी तनं
ट
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| बडाही उत्सव हु ॥ २२ ॥ शिवकी आज्ञाते यथायोग्य भूषणके निमित्त हाथी गऊ ना सपे जटा चन्द्रमाकी कठायुक्तं जाति हुए
॥२३॥ वेगवान् बलीवदंक द्वारा विष्य आदि देषताओं सहित प्रस्नतापरवक महादेवजी दक्षके स्थानमे पच गये ॥२४॥ विनीत आत्मा दक्ष
पूणे अपने सहचरोको साथ ठे भसन्न हो रके सन्छस गये ॥ २५॥ किर दक्षन पूणे देवता ओर समीपम स्थित ख॒नि्योका यथागोग्य
सत्कार किया ॥२६॥ फिर संपूण देवता ओर स॒नियोको परिवारित करके दक्ष शिवजीको अपने घरमे छेगये ॥२७॥ ओर प्रसननतापूत्रक दक्षन
गजगोभ्या्सर्पाश्च जया चंद्रकला तथा ॥ जग्बुःसव भूषणत्वं यथायोग्यं शिवेच्छया ॥२३॥ ततः क्षणेन बलिना बलीवर्देन
योगिना ॥ स विष्णुपरसुखः रीत्या प्राप दक्षाखुयं हरः ॥ २९ ॥ ततो दक्षो विनीतात्मा संप्रहटतनूरुहः ॥ प्रययौ सन्युखं
तस्य सयुक्तस्सकलेनिजैः ॥२५॥ स सुरगणास्त् स्वयं दक्षेण सल्कृताः॥ पाश्वे श्ष्ठं च घुनिभिरूपविष्टा यथाकमम ॥२६॥
परिवासर्याखिलान्देवान्गणां श शुनिभियंथा ॥ दक्षस्समानयामाख गदाभ्यतरतश्शिवम्॥२७॥ अथ दक्षः प्रसन्नात्मा स्वयं स्वे वरं
द्रम् ॥ समानचे विधानेन दत्वासनमवुत्तमम् ॥२८॥ ततो विष्णं च मां विधान्सरान्सवन्गरणास्तथा ॥ पूजयामास सद्धक्त्या
यथोचितविधानतः ॥ २९ ॥ कृत्वा यथोचितां पूजां तेषां प्ूज्यादिभिस्तथा ॥ चकार संविदं दक्षो युनिभिरमानसेः एनः ॥
॥ ३० ॥ ततो मां पितरं प्राह दक्षः प्रीत्या हि मत्सुतः ॥ प्रणिपत्य त्वया कमै कार्यं वैवाहिकं विभो ॥ ३१ ॥ वाटमित्य
हमप्युक्ता प्रडषैनातरात्मना ॥ सुत्थाय ततोऽकार्षं तत्का्थ॑मखिलं तथा ॥ ३२ ॥
सैर हरका दिषिवत् पूजनकर उत्तम आसन दिया ॥ २८ ॥ किर यथा उचित विधाने भक्तिूर्वकं दक्षने विष्ण स्च बहा खनिगण ओर
सम्पण देवताओंका पूजन किया ॥ २९ ॥ इत्तभकार पूजा आदि दक्तने उन सवका सत्कार कर भानस्त खनि्ोक साथ ओसनादिका सत्कार
किया ॥ ३० ॥ मेरे सुत दक्च प्रसन्नतापुवेक ञ्चे अपने पितासे भणाम कर बोरे कि हे विभो ! आप विवाहकै कार्यको कीजिये ॥ ३१ ॥
तब प्रसन्न हो बहुत अच्छा कंह उढकर मने सम्पूणं कार्योको किया ॥ ३२ ॥
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शुभयुहूवं ओर अरहो करके बरी उमे दधने अपनी कन्या सतीको हषपुवेक महादेवजी दिया ॥३९॥ दक्षकौ जलीकैदारा पूजित वृषभध्वजने विंवाहकी
विषिते हित हो सतीके पाणिका ब्रहण किया ॥३४॥ फिर हरिः तुमको भदिढे सम्ुणं सनि ओर देवतागण नमस्कार कर स्तुतिकै द्वारा इश्वरको
असन्न करने ठम ॥३५॥ चृत्यगानके दारा गाही उत्सव हुवा ओर सम्पूणं देवताओंहित खनिगण परम आनंदको प्रात हुये ॥३६॥ कन्थाक देकर भैर
हुत दक कताथ हए ओर सम्पूणं मंगखके स्थान शिवपार्वती दोनों भस हये ॥ ३७ ॥ ॥ इति शीशिंवमहाष्राणे भाषाटीकायां शुद्रसहितान्तगत्
ततश्ुभे शतं हि ठरे प्रहलान्विते ॥ सतीनिजसुतां दक्षो ददौ हण शंभवे ॥ ३३ ॥ उद्वाहविधिना सोपि पाणि जगा
हर्षितः ॥ दाक्षायण्या वरतनोस्तदानीं वृषभध्वजः ॥३७॥ अहं हरिस्त्वदा्या तै भुनयश् सुरा गणाः ॥ नेशुस्सवें संस्तुतिभि
स्तोषयामासुरीश्वरम् ॥३५॥ समुत्सवो महानासीन्तृत्यगानपुररस्सरः ॥ आनन्दं परमं जग्भस्सव शुनिगणाः सुराः ॥ २६॥
कन्या दत्वा कृताथोऽभ्तदा दक्षो हि मत्स॒तः ॥ शिवाशिवौ भ्न्नौ च निखिलं मेगलालयस् ।३७॥ इति श्रीशिवमहापुराणे
द्वितीयायां श्रसहितायां द्वितीये सतीखंडे कन्यादानवर्णेनो नामा्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ ब्रह्मोवाच ॥ कृत्वा दकषस्स॒तावान्
यौतकं विविधं ददौ ॥ हराय सुप्रसननश्च द्विजेभ्यो विविधं धनम् ॥ १ ॥ अथ ॒शंधुसदागत्य सघुत्थाय कृतांजलिः ॥ सादं
कमलया चेदूसुवाच गर्डध्वजः ॥ २ ॥ विष्णुवाच ॥ ॥ देवदेव अहादेव करुणासागर पभो ॥ त्वं पिता जगतां तात स्त
हस ° ||| मातासिलस्य च ॥ ३ ॥ युवां लीलावतारौ वै सतां क्षमाय सर्वदा ॥ खलानां निग्रहाथांय शतिरेषा सनातनी ॥ ॥
ससं २ ||£ || द्ितीयकतीखण्डे कन्यादानवणेनो नामा्टादशोऽध्यायः ॥१<८॥ बाजी बोरे, दक्षने धरसन्न होकर कन्यादान कर महादेवजीको बहुत कुछ दायज
अ०१९ दे बाह्णणोको बहत दव्य दिया ॥ १ ॥ लक्ष्मीसहित गरुडध्वज विष्ण उठकर हाथ जोड शिवकै सभीप आकर बोडे ॥२॥ विष्य बोटे हे देवक
। महादेव हे करुणासागर भमु ! आप संसारके पिता है ओर सती अलिर संसारकी भाता है ॥३॥ वंदा सज्जनोके कल्याणक निभित्त ओर ८
(4
शि ७पु9
॥११२॥
क 2222
~
व
46 49 4 4 34 34 324
र
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॥ 1
लोके निगरहके हेतु आप दोनों टीटावतारी है यह सनातनी श्रुति है ॥ ४ ॥ हे हर ! भाप चिकने नीरुअजनके श्याम शोभाकै समान् दश्षक |
नवाते शोभित ह जते विपरीतताते लक्ष्मी ओौर तँ ॥५॥ हे शिव ! इत सतीत युक्त आप देवता ओर भलुष्योकी रक्ष कर ससारियौका
मग कीजिये ॥६॥ हे संप पराणियोके ईश ! जो इनको साभिाष देसे अथवा सुने उसका हनन कीजिये हे भ्रमु ! यह मेरी प्राथना है ॥७॥ ६
हमा बोठे परमेश्वर सर्वज्ञ शिवजी इन विष्णके वचनोंको सुन हैसकर मधुसदनसे एवमस्तु कहते हृए ॥ < ॥ हे सनीश्वर उसके पीठे हरिजी |
स्निग्धनीरांजनश्यामशोभया शोभसे हर॥ दाक्षायण्या यथा चाहं प्रतिकोमेन पद्मया ॥५॥ देवानां वा तृणां रक्षा डर् सत्या ¢
ऽनयासताम् ॥ ससारसारिणां शम्भो मंगं स्वेदा तथा ॥६॥ य एनां साभिकाषो वै दष्ठा श्त्वाथवा भवेत् ॥ तं इन्यास्स ¢
भूतेश विक्ञपिरिति मे भ्रमो ॥७॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ इति शत्वा वचो विष्णोषिदस्य परमेश्वरः॥ एवमस्त्विति सर्वज्ञः प्रोवाच
मधुसूदनम् ॥ ८ ॥ स्वस्थान हरिरागत्य स्थित आसीन्युनी~वर ॥ उत्सवं कारयामास ऊगोप चरितं च तत् ॥ ९ ॥ अहं देवीं ए
समागत्य गृ्ोक्तविधिनाऽखिरम् ॥ अभिका यथोदिष्टमकार्षं च सुविस्तरम् ॥१०॥ ततश््शिवा शिवश्चैव यथाविधि प्रह ट
वत् ॥ अ्रे.रदक्षिणं चक्रे मदाचार्यद्विजाज्ञया ॥११॥ तदा महोत्सवस्तजाद्धतोभूदिजसत्तम ॥ सवेषां खसदं वाद्यं गीतवृत्यपुर ट
स्रम् ॥१२॥ तदानीमद्धतं तत्र चरिते समभूदति ॥ खुविस्मयकरं तात तच्छृणु त्वं वदामि ते ॥१३॥ दुज्ञेया शांभवी माया ट
तया संमोदितं जगत् ॥ सचराचरमत्यंतं सदेवासुरमाठुषम् ॥ १९ ॥ ट
अपने स्थानम आकर उत्सव करक स्थित हो उस चरित्रको छिपाते भये ॥ ९ ॥ ओर ने देवीके समीप भाकर गृल्योक्तं विधिे विस्तार पवक |©
यथोदिष्ट अभिका कायं किया ॥ १० ॥ उक्तके पीठे युञ्ञे बाह्मण आचायेकी आज्ञासे शिवा ओर शिवने यथाविधि प्रसन्न हो अशिक प्रदक्षिणा |©
¢ || की ॥ ११ ॥ हे नारद ! तब गीत नृत्यक द्वारा सबको सुख देनेवाखा अद्भुत षहाउत्सव हुम ॥१२॥ हे तात ! उस्र समय वहां बिरस्मयकै करने ६
वाढा अद्भुत चरित्र हुवा सो तुमसे कहता हँ उसे नो ॥१३॥ शंकरी माया दुःखत जानने योग्य है उसीने चर अचर भलुष्योते युक्त ससार ४
# ११
शि ७ पु9
॥११४।
। (२८24 326 २2; 2 च 24 2 2 र 26 ८26 2 क 24 ३९६ ० 33
` च
ओर देवताओंको मोहित कर ॒रक्खा है ॥ १४ ॥ जो मँ कपटके द्वारा पूवं हो शंकरको मोहित करना चाहता था हे तात ! उन्हीं शकरने
य्ञको अपनी टीटाते मोहित कर छ्या॥१५॥ जो दूसरेका अपकार चाहता है उसका शीघ ही बह हौ जाता है यह मानकर् जरूष किंीका
अपकार न करे ॥ १६ ॥ हे छने ] अभ्चिको सतीकी .पदद्य परिक्रमा कृरनेपर वञ्च उडनेसे जो पदका दशन हभ उसे देख मे ॥ १७ ॥ हं
द्विजभेष्ठ ¡ शिवमायासे मोहित मदनसे आविष्टचित्त हो अगोंका अवटोकन करने ठगा ॥ १८ ॥ कौतुकसे सतीके जसे जसे उत्तम अर्गोको देखे
योऽहं शंभु मोहयितुं पुरेच्छं कपटेन ह ॥ मां च तं शंकरस्तात मोहयामास रीलया ॥१५॥ इच्छेत्परापकार्ं यस्स तस्थ॑व भवे
दू॒वम्॥ इति मत्वाऽपकारं नो कुयादन्यस्य परषः॥१६॥ प्रदक्षिणा ्रर्वत्या वहेरसत्याः पदद्रयम्॥ आविषंभूव वसनात्तद राक्ष
महं घने ॥ १७॥ मदनाविष्टचेताशच भूत्वां गानि म्यलोकयम् ॥ अहं सत्या द्विजश्रषठ शिवभायाविमोदहितः ॥१८॥ यथा यथाहं
रम्याणि व्यैक्षमंगानि कौतुकात्॥ सत्या बभूव संहृष्टः कामात हि तथा तथा॥१९॥ अहमेव तथा दष्टा दक्षां च पतिव्रताम् ॥
स्मराविष्टमना वक्र रष्कामोभवं सुने ॥२०॥ न शंभोरुनया वक्रं परत्यक्ष च विरोकितम्॥ न च सा र्नयाविष्ठा करोति प्रगटं
खम् ॥ २१ ॥ ततस्तदर्शनार्थाय सदुपायं विचारयन् ॥ धूब्रघोरेण काभार्तोऽकार्षं तच्च ततः परम् ॥२२॥ आप्रधनानि
भूरीणि क्षिष्वा तत्र विभावसौ ॥ स्वल्पाज्याहृतिविन्यासादादद्रनयोद्धवस्तथा ॥२३॥ श्रादर्धूतस्ततो धूमो भूर्यास्तन सम॑ततः॥
ताहय् येन तमो भतं वेदीभूभिविनिमिंतस् ॥ २४ ॥
तिच तरह प्रसन्न होता हुआ ॥१९॥ हे खने दक्षते उत्पन्न हृ पतिवता सतीको इस भ्रकार देख मै कामसे आविष्ट चित्त हो मुख देखनेकी 8
करनेरगा ॥ २० ॥ न म शिवकी कासे उनका सुख देखा ओर न उन्होने कलाक भरे खख खोखा ॥ २१ ॥ कामसे दुःखी भने
उसके देखनेके छ्यि अत्यन्त धुं करनेकी इच्छा की इसका खख देख यही विचारते हूय भरने उसके पीछे यह किया किं ॥ २२ ॥ अभम
सब गीरी ककड छोडी ओर धीरे थोडी आद्रूतिके छोडनेसे गीे वयो उञ ॥२३॥ बहुत धुआं चारों ओरसे फेलगया ओर धूमाधिक्य
॥ २२-०९-९3 ९49९ 4 > + 9९ 9 य न > 94
२९
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। कारण वैदीके आसपासक पृथ्वी धूषयुक्त होगदं ॥ २४ ॥ नाना रीखा्ओकि करनेवाछे समथ परमेश्वर शिवने धसे व्याकर दोनों |
होते अपने नेव भद लिये ॥ २५॥ फिर धरषन्न हो कामातं भने सतीके सलक वको हदा सतीके खलको देखा ॥ २६ ॥ हे त्र \ भं
बार बार सतीके युखको देखने रगा ओौर इन्दियविकारको भी पराप्त होता इजा ॥ २७ ॥ ओर भेरा चार बिन्दु वी्यं पृथिवीप्र |
¢| २< ॥ तव चकित मौनी म अयन्त आर्यको प्रा होगया ओर उस वीरको छिपाया जिम ओर कोई न जाने ॥ २९ ॥ भगवान्
ततो धूमा ने महेशः परमेश्वरः ॥ दस्ताभ्यां छादयामास बहुलीखाकरः भ्रुः ॥ २५ ॥ ततो वं समु्किप्य सतीवक्रमहं
शने ॥ अवेकष किल कामार्तः भ्रहेनां तरास्मना ॥ २६॥ सुहहरदं तात पश्यामि स्म सतीखखम् ॥ अथेन्दरियविकारं च भाप
वानस्मि सोऽवशः ॥ २७॥ मम रेतः प्रचस्कंद् ततस्तद्वीक्षणाद्दुतम् ॥ चतुबिन्दुमित भ्रमौ तुषारचयसंनिभस् ॥२८॥ ततोहं
शकितो मौनी ततक्षणं विस्मितो ने ॥ आच्छादयेरुम तद्रेतो यथा कश्चिदूबुबोध न॥२९॥ अथ तद्धगवाज्छधज्ञौत्वा दिव्येन
चकुषा ॥ रेतोवस्कंदनात्तस्य कोपदेतदुवाचई ॥ ३० ॥ सद्र उवाच ॥ किमेतद्िहितं पाप त्वया कम॑ विगर्हितम् ॥ निवाहे मम्
कांताया व्क दृष्टं न रागतः ॥३१॥ त्वं वेत्सि शंकरेणेतत्कमै ज्ञातं न किंचन ॥ ञरोक्येपि न मेऽज्ञातं शृं तस्मात्कथं विधे
॥३२॥ यत्किचि्िषु लोकेषु जंगमं स्थावरं तथा ॥ तस्याहं मध्यगो मूढ तैकं यद्रत्तिखांतिकम् ॥२३॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता
भरियविष्णमा तदा विष्णुवचः स्मरन् ॥ इयेष दंत ब्रह्माणं शरयम्य् शंकरः ॥ २९ ॥
शमभु दिष्य चक्षुसे यह वीरयस्सरन जान कुड हो बोटे ॥ ३० ॥ रुद बोढे जो आपने विवाहं भरी कान्ताकै छलक रागसे देखा यह
कृत्स कम्मे आपने कया किया ।॥ ३१ ॥ आपने जाना कि शिबने यहं कम्म कख नहीं जाना परु देसी कौन बात संसार है जिसको
म नहीं जानता हं ॥ ३२ ॥ जसे तिमे तैर वैसेही तीनों ठोक ओर स्थावर जंगभमे थे हूं ।॥ ३३ ॥ बहा बोढे यह कह विष्णभिय
शृकरजी विष्णके वचनको स्मरण करते हूए शूक ठे सञ्च बह्याको मारनेकी इच्छा कएने ठे ॥ ३४ ॥
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ते मारमेके अथं शुके शूक छेतेही मरीच्यादिकोने हाहाकार किया ॥ ३५ ॥ तब सब देव॒ता ओर मुनिर्योने व्याकुरहो कोषित हुए
शिवजीकी स्तुति की ॥ ३६ ॥ देवता बोठे हे शरणागतवत्सर देवदेव परमेश्वर शिवजी 1 रुपा करिये ओर ब्हाजीकी रक्षा करियं ॥ ३७ ॥
आप सत्तारके पिता ओर सतीजी ससारकी माता ओर बह्लादिकं देवता सव आपके दास है ॥ ३८ ॥ आपकी रीला अदधत है ओर आपकी
माया अद्भुत है उततीने आपकी भक्ते विरक्त रहने वेको मोह रक्खा है ॥ ३९ ॥ बहा बोरे इस भ्रकार वृद्धनि्योनि नत्रतापूवक
श्थुनोयमिते श्रे मां च ह॑तं द्विजोत्तम ॥ मरीचिपरषुास्ते वै हाहाकारं च चक्रिरे ॥ २५ ॥ ततो देवगणार्सवं शुनयश्चा
खिलास्तथा ॥ तुष्टुबुश्याकरं त्र परज्वलंतं भयातुराः ॥३६॥ देवाः ॥ देव देव महादेव शरणागतवत्सल ॥ ब्रह्माणं रक्ष
कश कषां कुर् महेश्वर ॥२७॥ जगत्पिता महेश त्वं जगन्माता सती मता ॥ इशिब्ह्नादयस्सवे तव दासास्सुरप्रभो ॥२८॥
अद्धताकृतिलीरस्त्वं तव मायाद्भता प्रभो ॥ तया विभोहितं सर्वै विना त्वदधक्तिभी“वर ॥ ३९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्थं बहुतरं
दीना निज॑रा शनयश्च ते ॥ तुष्टुबुदंवदेवेशं कोधाविष्ं महेश्वरम् ॥ ४० ॥ दक्षो मेवे मैवमिति पाणिठ्म्य शंकितः ॥
वारयामास भते क्षिभरमेत्य पुरोगतः ॥४१॥ अथामर संगतं वीक्ष्य तदा दक्षं महेश्वरः॥ प्रत्युवाचाप्रियमिदं संस्मरन्परर्थनां
हरः ॥ ४२ ॥ महेश्वर उवाच ॥ विष्णुना मेतिभक्तेन यदिदानीश्दीरितम् ॥ मयाप्यगीकृते कर्तु तदिदैव प्रजापते ॥ ४३ ॥
सतीं यस्याभिलाषस्सन् वीक्षेत वध तं प्रभो ॥ इतिदिष्णुवचस्सत्यं विधि हत्वा करोम्यहम् ॥ 8४ ॥
देवताओके साथ नब्रहो कोधुक्तं देवदेवेश शिबजीकी स्तुति की ॥ ४० ॥ उसीसषमय महासंदेहको भ्ाषहो दक्षजीने शिवकै समीप आय हाथ
उढाकर कहा किं कपाकः रे न कीजिये ॥४१॥ किर शिवजी आगे दक्षको देख ओर विष्णकी भराथनाको स्मरण करते हुये यह भियवचन
बोरे ॥४२॥ महेश्वर बोे हे दश्चजी ! जो भ्राषभक्ति दिष्णने इसकषभय कहा उसको भने स्वीकार करखिया ॥ ४३ ॥ जो सतीको कामक
अभिखाषासे देखे उसे आप पारं इस दिष्णके वचनसे बह्लाको मार भरण सत्य कर्गा ॥ ४४ ॥
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बह्ाने कैते सतीको देला अतएव अपराधी बरहमाको जहर भारे ॥ ४५.॥ बह्मा बहे करोधयुक्त महेशके यह् कहनेप्र देवता ॥
| मनुष्य काप उदे ॥ ४६ ॥ चारोंओर हाहाकार ओर उदासीनता छागदे ओर भँ भोहितहो अति विकर होगया ॥ ४७ ॥
तब कार्यम चतुर सुधी महेशभिय विष्णने इस रकार कहते हुये रुद्रजीकौ स्तुति कौ ॥ ४८ ॥ भक्तवत्सठ शिवजीकौ नानास्तोत्रोसि स्तुतिकर
शीघ्रही आगे हो वारण करते हुए यह बोठे ॥ ४९ ॥ विप्णजी बोे हे मूतोकै भभु आप् जगतुके बनानेवाठे ब्ह्ाजीको भारिये यह आज ठ
ाभिलाषः कथं ब्रह्मा सतीं समवरोकयत्॥ अभवत्यक्तरेतास्त॒ततो हन्मि कृतागसम् ॥ ७५ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तवति
देवेशमंहेशे क्रोधसंङले॥ चकंपिरे जनाः सवै सदेवूषनिमानुषाः ॥७६॥ हाहाकारो महानासीदौदासीन्यं च सर्वशः ॥ अभूवभ्वि
कृलोऽतीव तदार तद्विमोहकः॥४७॥ अथ विष्णुमेहेशातिमरियः का्यविचक्षणः ॥ तमेरववादिनं श्रं तुष्टाव प्रणतस्सुधीः ॥४<॥
स्तुत्वा च विविधैः स्तोतश्शकरं भक्तवत्सरम् ॥ इदमरचे वारयस्तं ि" भूत्वा पुरस्सरः ॥७९॥ विष्णुरुवाच ॥ विधित जहि भूतेश
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¢| सरष्टारं जगतां प्रधुम् ॥ अय शरणगस्ते्य शरणागतवत्सरः ॥५०॥ अहं तेऽतिगप्रियो भक्तो भक्तराज इतीरितः ॥ विज्ञप्ति हदि
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मे मत्वा कषां कुरु ममोपरि ॥ ५१ ॥ अन्यच्च श्रृणु मे नाथ वचनं देतुगभितम् ॥ तन्मलरुष्वे महेशान कषां कत्वा ममोपरि
॥५२॥ प्रनास्सष्टमयं शंभो भादुर्भतश्चतखखः॥ अस्मिन् हते प्रनासष्ठा नास्त्यन्यः भराकृतोऽना॥५३॥ सष्टिस्थत्यंतकर्माणि
करिष्यामः पुनः पुनः ॥ अयो देवा वय नाथ शिवह्ूप त्वदाज्ञया ॥५४॥ एतस्मित्निहते शम्भो कस्त्वत्कर्म करिष्यति ॥ तस्मान्न
वध्यो भवता सृष्िकृयङ्ृद्धिभो ॥ ५५ ॥
आपकी शरण है ॥ ५० ॥ आप स्॒े भक्तराज कहते है ओर भँ आपका वडा भरियहूं भेरी विज्ञ हदयमे धर भेर ऊपर छपा कीजिये ॥ ५१॥
हे शिवजी भरे ऊपर कृपाकर हेतुयुक्त मेरे दूरेभी षचनोको सुनिये ॥ ५२ ॥ है शिवजी ! भजाओंकी शष्ट करनेकै खयि ये चतुखख
उतपन्न हये है इनके मरनेकै पीछे इम समय को प्रजाका कष्टा नहीं है ॥ ५३ ॥ आपकी आज्ञासे हम तीनों देवता शटि कर्को करते है
॥ ५४ ॥ इनके म।रनेप्र आपका काम कोन करेगा १ अतः सृष्ठिके छ्य करनेवाे आप् इनको न भारं ॥ ५५ ॥
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इन्होनही दकषकी कन्या सतीको आपकी मार्क खि भ्कल्पित किया है ॥ ५६ ॥ बला बौठे शिव
पुन सबको सुनाते हए
करे क्योकि यह दुष्ट है ॥ ५८ ॥ प्रथम
र स्वयंही भजाओंको बना्गा अथवा अपने तेजसे दूसरे सृष्टि करनेवाछेको उत्यन्न करगा ॥ ६० ॥ इत बहक मारकर अपने
` तत्वतस्सुविचारय ॥ ६४ ॥
भरणके पूणे करकै एक उत्पन्न करनेवाेको उतपन्न कग
करते हुए भगवानू अुसकयायकर फिर बोखे ॥ &२ ॥ अर
` च
जी इसभकार विष्णकी विज्ञपिको
यह बोरे ॥ ५७ ॥ महेश बोे हे देवदेव रमापति मेरे प्राणभ्रिय विष्ण॒जी ! इक मारनेसे शुञ्चे भापन निवारण
श [9 ० «
अगीरूत आपकी विज्ञपिको भ पूणं करगा ओर पापी इस चतुराननको भारूगा ॥ ५“ ॥
अनेनैव सती कन्या दक्षस्य च शिवां विभो ॥ सदुपायेन वै भार्था मवदं प्रकल्पिता ॥५९॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकर्ण्यं महे
शस्त विज्ञप्तिं विष्णुना कृताम् ॥ प्रत्युवाचाखिलोस्तांशच श्रावय दटत्रूतः ॥५७॥ महेश उवाच ॥ देव देव रमरेशान विष्णो
मत्पराणवह्णम ॥ न निवारय मां तात व॒धादस्य खस्त्वयम्॥५८॥ पूरयिष्यामि विज्ञपति पूवां न्तेंगीकृतां मया ॥ महापापकरं
दृष्ठं हन्म्येनं चतुराननम् ॥ ५९ ॥ अहमव प्रजारसक्य सर्वाः स्थिर्चरा अपि॥ अन्यं सक्षये सृष्टिकरमथवाहं स्वतेजसा ॥६०॥
हत्वैनं पिधिमेवाई स्वपणं पूरयन् छृतम्॥ खष्टारमेकं क्ष्यामि न निवारय मेश माम् ॥६१॥ बह्नोवाच ॥ इति तस्य वच^शत्वा
गिरीशस्याई चाच्युतः ॥ स्मितप्रमित्रहदयः पुनमभैवमितीरयन् ॥ ६२ ॥ अच्युत उवाच ॥ प्रतिज्ञप्रणं योग्यं परस्मिन्पुश्षे
स्ति वै॥ विचारयस्व वध्येश भवत्यात्मनि न प्रभो ॥ ६३ ॥ अयो देवा वयं शंभो त्वदात्सानः परा नहि ॥ एकल्पा न मित्राश्च
ञ्चे न रोकियि ॥ ६१ ॥ ब्ह्ा बोटे इन महादेवजीकै वचनोंको सुन निषेध
र युत बो हे भमु ! भतिज्ञा पृण करन। दूसरे परुषो योग्य है अपनये नही है
ईश इस वध्य बहक पति विचारिये ॥ ६३ ॥ हे शंभु हम तीनों देवता आपकीही आत्मा है दूसरे नहीं एकही रप हँ भिन्न नहीं इसका
तच््पुवक विचार कीजिये ॥ ६४ ॥ ४ |
|| अत्यन्त भिय विम्णके ईन वचनोंको सुन अपनी गतिक कहते हुए शम्भुजी फिर बोे ॥ ६५॥ शमु बोठे दे सेपूणं भक्तेकि ईश विष्ण, नञा कैसे
५ लोग अपने मनमे रैवतरवको धारण करो ॥७०॥ हे भमु ! प्रधान अभरधान भाग अभाग हपवले ज्पोतिरभंय भागसे हम तीनों देवता है ॥७१॥
मेय आत्मा है यह प्रयक्ष आगे बेटे हुए भिन्न॒ दिखलाईं पडते है ॥ ६९६ ॥ ब्रह्मा बोरे सबके सन्छस महादेवजीने जब यह् आज्ञा कौ तव
भगवान् विष्ण महादेषजीको भ्रसन्न करते हृए यह बोढे ॥ ६७ ॥ विष्ण बटे हे सदाशिव ! बरहा आपसे भिन्न नहीं है आप उससे भिन्न |
ओर हे परमेश्वर ! न भै आपसे भिन्न हं न आप् मुक्ते भिन्न ह ॥६८॥ हे सदाशिव ! परमेश्वर ! हे सवेन ! आप सथ जानते है जो आप्
तन्छस कह रहे है यह केवट सबको सुनानेकी इच्छात है ॥ ६९ ॥ हे ईंश आपकी आज्ञासे मँ कहता हू सपृण देवता ओर खनियो सुनौ आप
ततस्तद्वचनं शत्वा विष्णोर्स्वातिपियस्य सः ॥ शंथुरूचे पुनस्तं वे ख्यापयत्नार्मनो गतिम् ॥ &4.॥ ॥ शम्भुरुवाच ॥ हे
विष्णो सरवभक्तेश कथमात्मा विधिमेम ॥ लक्ष्यते भिन्न एवाय प्रत्यक्षणा्रतः स्थितः ॥६६॥ ॥ बह्मोवाच् ॥ इत्याज्ञप्ो महे
शन सुषा पुरतस्तदा ॥ इदगूचे महादेवं तोषयन् गरुडध्वजः ॥ ६७ ॥ विष्णर्वाच ॥ न ब्रह्मा भवतो भिन्नो न त्वं तस्मा
त्सदाशिव ॥ नवादं भवतो भिन्नो न मच्वं परमेश्वर ॥ ६८ ॥ सवं जानासि सर्वज्ञ परमेश सदाशिव ॥ मन्भ्ुखादखिखोन्सवे
सेश्रावयितमिच्छसि॥ ६९॥ त्वदाज्ञया वदामीश शृण्व॑त् निखिलास्सुराः ॥ खुनयश्चापरे शेवं तत्त्वं संधार्यं स्वं मनः ॥७०॥
परधानस्याऽपरथानस्यभागाभागस्य ङूपिणः॥ ज्योतिमंयस्य भागास्ते वरय देवाःपरभोघ्लयः॥७१॥ कृस्त्वं कों च को ब्रह्मा तवैव
प्रमात्मनः॥ अंशज्रयमिदं भिन्न ृष्िस्थत्यंतकारणम्॥७२॥ चितयस्वात्मनात्मानंस्वलीलाधृतविथरः॥ एकस्तव ब्रह्म सशुणो
हंशभूता वयं जयः ॥ ७३॥ शिरोभ्रीवादिभेदेन यथेकस्यैव वर्मणः ॥ अंगानि ते तथेशस्य तस्य भेगन्यं हर ॥ ७8 ॥
आप कौन इँ कौन हं ओर बहा कौन है आपही परमात्मत सृष्टि पाटन ओर अंत करनेकै खमि तीन अंश भिन्न हए ई ॥ ७२ ॥ अपनी
आत्मासे अपनेको विषारये अपनी ठीटाकै द्वारा आपने हपोंको धारण किया है एक आपही हा है यणे युक्तं हम तीनों आपके अंशभूत है
॥७३॥ हे हर ! जिसप्रकार एकही शरीरम शिर प्रीवा आदि भेद होते है उसी रकार आपक तथा उस दशके यह तीनों भाग अंग ह ॥ ७४ ॥ 9
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2 कि 24 के 24 च 25 26 32 चे च> च> चेह ३९८३६ >~
एतस्मिन्नैव कालेऽहं प्रसन्नो निर्भयो शुने॥ अस्तवं शंकरं भक्त्या विविधैश्च श्चुभस्तवैः ॥५॥
चथ
जो ज्योति अभ्रस्वरूपर पराणऽर्ष कूटस्थ अव्यक्तं अनन्त नित्य दीवा दिविशेषणोसे हीन कहा जाता है जो एक रस अनादि निर्विकार हं बही
दह शिव भाप है यह विचारिपे ॥ ७५ ॥ बहा बो हे यनीश्वर ! महादेवजी इन विष्णके वचनोको सुन अव्यन्त प्रसन्न हो सञ्चको नही
मारते हए ॥७६॥ इति शरीशिवमहाषराणे भाषायां रुतं हितान्तगेतद्वितीयसतीखंड सती विवाहशिवलीठावणनं नामेकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
नारद उवाच ॥ हे बहन् ! विधि ! हे महाभाग ! अष्ट शिवभक्त ! हे भ्रु ! मंगठका स्थान रसा अदधत शिवजीका चरि आपने सुनाया
यज्ज्योतिरभं स्वपुरं पुराणं कूटस्थमग्यक्तमनंतशूपम् ॥ नित्यं च दीर्घादिविशेषणायहीनिं शिवस्त्वं तत एव सर्वम्॥७५॥ ब्रह्मो
वाच ॥ एतच्छरत्वा व चस्तस्यं महादेवो भुनीवर ॥ बभूव सुप्रसघ्रश्च न जघान स॒ मां ततः ॥७६॥ इति श्रीशिवमहापुराणे
द्वितीयायां शूदसंहितायां द्वितीये सतीखंड सतीविवाइशिवीखावर्णनं नामैकोनविशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ नारद् उवाच ब्रह्म्
विधेमाहाभाग शिवभक्तवर प्रभो ॥ श्रावितं चरितं शंभोरडतं संगलायनम् ॥ १ ॥ ततः किमभवत्तात कथ्यतां शशिमौखिनः
सत्याश्च चरितं दिष्यं सर्वाघौघविनाशनम् ॥ २ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ निवृत्ते शंकरे चास्मद्रधाद्भक्ता्कंपिनि ॥ अभवव्रि्भया
स्सवें सुखिनस्पुप्रसत्रकाः ॥ ३ ॥ नतस्कंधास्सांजल्यः प्रणेषुनिंखिलाश्च ते ॥ तुष्ट्बुश्शंकरंभक्तया चक्कुजंयरवं दा ॥ ४ ॥
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॥ १ ॥ हे तात ! फिर सम्पूणं पापोंको नाश करनेवाढा अहादेवजी ओर सतीका क्या दिभ्य चरित्र हुआ सो किये ॥ २॥ बह्मा बोठे भक्त
परं दयाकरनेवाठे शकरकै मेरे वधे निदृत्त होनेपर हली ओर प्रसन्नं हो सब निभेयं होगये ॥३॥ वह सब हाथ जोड नीची गदंनकर रणाम
करते हए ओर भक्तिपुवक शंकर की स्तुतिकर जयजय शब्द करनेगे ॥४॥ हे खनि ! उसी समय मैने प्रसन्न ओौर निभेय हो नानापरकारकै उत्तम
९ यह् कथा अघ्यात्मवादकी है इसमे गूढ तत्त्व है
¢ | भक्तिपूर्वकं शंकरकी स्पुतिकी ॥ ५ ॥ हेखनि। बहुतसी टीला करनेवारे भभु शंकरजी भसन चित्हो सबके सन्खुख सुञ्से बोरे ॥\ ६1
ह बोठेहे बनू तात 1 पँ भसननहूं अव तुम निभैय हो ओर संशयरहित हो भेरी आज्ञाको करते हये हाथते अपने मस्तकंका स्पश करो ॥७॥
नञा बोठे बहुततसी कीरा करने वाटे भमु महादेवजीकै वचनको हुन उसी भकार हौ शिवकी आज्ञा मान अपने शिरको स्पश करनेकगा ॥ <
| रै अपने हाथसे अपने शिरका स्पशं कं तवतक शीप्रही उसीरपम वृषमध्वजको स्थित पाया ॥ ९ ॥ तब इनदरादिक देवताओं देखते ट
ततस्तुष्टमनाश्शं्बहलीलाकरःपरथुः ॥ षने मां सखवाचेद्ं सर्वषां श्रृण्वतां तदा ॥६॥ ॥ शुद्र उवाच ॥ ब्रह्मन् तात भसननोहं
नि्यस्त्वं मवाधुना ॥ स्वशीरष स्पृश हस्तेन मदाज्ञां ङुवंसशयम् ॥७॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचश्शम्भोरषहुलीलाकृतः
प्रमोः॥ स्परशन् स्वं कं तथा भूत्वा प्राणमं दृषभध्वजम्॥८॥ यावदेवमहं स्वं कं स्पृशामि निजपाणिना ॥ तावत्त्स्थिते सय
स्तदरषवरृषवाहनम् ॥ ९ ॥ ततो रनापरीतांगस्स्थितश्वादमधोषखः ॥ इन्द्रायेरमरस्सस्सुदृष्टस्सव॑तरिस्थतेः ॥ १० ॥ अथाहं
रनयाविषटः प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ प्रवोचं संस्तुति कृत्वा क्षम्यतां क्षम्यतामिति ॥११ ॥ अस्य पापस्य शुष्यर्थ परायश्चित्तं
वद् प्रभो ॥ निग्रहं च तथान्यायं येन पापं प्रयातु मे ॥ १२ ॥ इत्युक्तस्तु षया शंशरूवाच षणतं हि तस् ॥ सुप्रसन्नतरो भत्वा
सरवैशो भक्तवत्सरः ॥१३॥ शंभुवाच ॥ अनेनैव स्वशूपेण मदधि्ितकेन हि ॥ तपः इङ्षसत्नात्मा मदाराधनतत्परः ॥१४॥
ख्याति यास्यसि सर्वत्र नाम्ना श्रशिरः क्षितौ ॥ साधकः सर्वकृत्यानां तेजोभाजाँ द्विजन्मनाम् ॥ १५ ॥
9६|| हय भ लासे भधोशचल हो स्थित रहा ॥१०॥ फिर भ ङनाते युक्तहो महादेषजीकी स्ति ओर भणामकर क्षमाकीजिये क्षमाकी जिषे कहता हभ
॥११॥ हे परभु ! इस पापकी शुद्धिके अथ परायभ्ित किये जिससे भेरा पाप दूरहो ॥१२॥ सवके देश भक्तवत्सर शम्भु भसननहो इस भेरे कहनेपर
५८|| बोडे ॥ १२॥ शमु बोटे भसन्नहो भरे आराधनम तत्प्र होकर इसी भरे अधिषटित हपसे तप करौ ॥ १४ ॥ पृथ्वीम सर्वे रुद्रशिर नामसे
तुम्हारी भिदि होगी ओर सबकार्योकै साधक बाहों तेजस्वी होगे ॥ १५ ॥ ९
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शि." ||| ह मतप्योका ₹त्य ह जैसा तुमने वी्थका पात किया इसर्थि हुम मलुष्य होकर पृथ्वीम विषरो ॥१६॥ इसखूपते पृथ्वीं धूते हुये जो तमको ||
हेग तब पे कगे कि बह्माके मस्तकमे कया है ॥ १७ ॥ तव तुम्हारे किये येको कौतुके जो छुनग सो ूषरेकी बीका त्यागकर शीघ्ही
^ । छक्तिको भात होगे॥१८॥ जिस जिततभकार मलष्य इस तुम्हारी कीरतिको करेगे उसरी उती भकार तुम्हारे पापोँकी शुदि होगी ॥ १९॥ हं बहन् ।
सारम म्हारी निन्दाकरनेवाखा ओर तुमको हैषनेवाढा यह भायभ्ित् मने मते कहा ॥२०॥ कामे दुःसी यहं तुम्हा वीय वेदी मध्यमे पतित
मदष्याणामिदं कृत्यं यस्माद्रीय्यं त्वयाऽधुना ॥ तस्मात्वं मालषो भूत्वा विचरिष्यसि भूतले ॥ १६ ॥ यस्त्वां चानेन ह्पेण
ष्ठा कौ विचरिष्यति ॥ किमेतद्रह्मणो मूध्नि वदद्निति पुरान्तकृः॥१७॥ ततस्ते चेष्टितं सर्वं कौतुकाच्छोष्यतीति यः ॥ परदी
रकृतातत्यागान्मुक्षि सघयस्स यास्यति ॥१८॥ यथा यथा जनश्वतत्कृत्यन्ते कीतैयिष्यति॥ तथा तथा विष्द्धिस्ते पापस्यास्य
भविष्यति ॥१९॥ एतदेव दि ते ब्रह्मन् प्रायश्चित्तं मथेरितम्॥ जनहास्यकरं रोके तव गहाक्रं परम् ॥२०॥ एतञ्च तव वीर्य्यं
हि पतितं वेदिमध्यगम् ॥ काम॑स्य मया षटं नैतद्धार्थ भविष्यति ॥ २१ ॥ चतुबिन्दुमितं रेतः पतितं यतिक्षतौ तव ॥
तन्सितास्तोयद्ा व्योम्नि वेयुः प्ररुयंकराः ॥२२॥ एतस्मिन्न ते तत्र देवषीणां पुरो हुतम् ॥ तद्रेतसस्समभर्वस्तन्मिताश्च
बलाहकाः ॥ २३ ॥ संवतैकस्तथावर्तः पुष्करो द्रोण एव च ॥ एते चतुर्विधास्तात महामेघा रर्यकराः ॥२४॥ गजता
भुच॑तस्तोयानीषच्छविच्छया ॥ फेडु्योम्नि शनिश्रे् तोयदास्ते कदारवाः ॥ २५ ॥
नैन देखा इसहेतु यह धारण करनेयोग्य न होगा ॥२१॥ चार विन्दुं जो तुम्हारा वीय पृथ्वीम गिरा है बह भरटय करनेवाटे चारमेव आकाशे
| ॥ २२ ॥ उसी समय शीघही देवपियोके समीप वह वीर्यं उसी संख्याक चारभेष होगये ॥ २३ ॥ हे तात ! संवत, आवतं, पुष्कर्, द्रोण यह
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चार भकारके प्रख्य करनेवाटे महामेष होते हूए ॥२४॥ हे सनिभे्ठ ! शि्रकी इच्छसे गजेते थोडा थोडा जठ वरस्ते एकत उत्पन्न होनेवाठे
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| आकाशको चे गये ॥ २५ ॥ जव बह मेष जाकर आकाशम गजं तव शकर भगवानु दाक्षायणी देवक सहित शांत हुए ॥ २९ ॥ हे
ने ! तब मैने भयरहित हो शंकरकी आज्ञासे शेष विवाहके कर्मको समाप्त किया ॥ २७ ॥ हे स॒निभरेष्ठ ! सर्वच भ्रसन्नतापूवक देवताओं
दारा छोडे हुये पष्पोंकी शिव ओर सतीके मस्तकमपर वृष्टि हृदं ॥२८॥ भक्तिते युक्त बाहाणोके पढने बाजन बजने ओर गान होनेपर ॥२९॥
हे नारद ! रंभादि अप्तराओंके नाचने प्र देवता ओको कविय बड।ही उत्सव हुभा ॥३०॥ फिर कम॑हप परमेश्वर प्रसन्न होकर ससारीगतिमं
तेस्तु संछादितेव्योभ्निस॒गजेद्धिश शंकरः॥परशान् दाक्षायणी देवी भृशं शांतोऽमवद् दतम्॥२६॥ अथ चाहं वीतभयश्शंकरस्या
ज्ञया तदा ॥ शेषं वेवादिकं कमं समाप्तिमनयं सुने ॥२७॥ पपात पुष्पवृष्टिश्च शिवाशिवशिरस्कयोः॥ सर्वत च शुनिभ्रे्ठ युदा
देवगणोजिज्ञिता ॥२८॥ वाद्यमानेषु वायेषु गायमानेषु तेषु च ॥ परत्यु विप्रवयैषु वादान् भक्त्यान्वितेषु च ॥२९॥ रंभादिषु
पुरीषु बरत्यमानासु साद्रम्॥ मदोत्सवो महानासीदेवपत्नीषु नारद ॥३०॥ अथ कमैवितानेशः प्रसन्नः परमेश्वरः ॥ प्राह मां
भरांजङि प्रीत्या रौकिकीं गतिमाश्चितः ॥ ३१ ॥ ईश्वर उवाच ॥ हे ब्रह्मन् सुकृत॑कमं सर्वे वेवादहिकं च यत् ॥ प्रसत्नोस्मि
त्वमाचायो दयां ते दक्षिणां च काम् ॥३२॥ याचस्व तां सुरज्येष्ठ ययपि स्यात्पुदरेभा॥ ब्रहि शीघ्र महाभाग नादेयं वियते
मम ॥ ३३ ॥ ॥ ब्रह्नोवाच ॥ इत्याकण्ये वचस्सोहे शंकरस्य कृतांजछिः ॥ शुनेऽवोचं विनीतात्मा प्रणम्येशं युह्हुः
॥३९॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ यदि प्रसन्नो देवेश वरयोग्योस्म्यहं यदि ॥ तत्र त्वं महेशान सुपीत्या यददस्यंहम् ॥ ३५ ॥
स्थित हो भीतिपू्वक क्षते बोढे ॥३३॥ दश्वर बोठे हे नहम् । संपूरणं वेवादिक दुरुत कम जो था वह समाप हुआ अव यँ भन्न हँ आप्
आचाय है तुमको कया दक्षिणा दूँ ॥२२॥ हे देवता ओंम ज्येष्ठ दुकेम होनेपर भी उते मांगिवे हे महाभाग ! उसे शीघरही किये भेरे कुछ अदेय
नहीं हँ ॥३३॥ बहा बो हे सनि ! वह मे शंकरजीके इन व चनोंको हुन हाथ जोड ईशको वारंवार प्रणाम कर बोढा ॥३१॥ बहला बरे हे
देवेश ¡ यदि आपृ प्रसन्न है ओर मेँ वरै योग्य हूँ तो हे महान् ईश ! जो मै कटु उत्ते आप भसन्नतापुरवक कीजिये ॥ ३५ ॥
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पृ स्थित रहिये ॥ ३६ ॥ हे शशिशेखर शंकर ! जिसे शसीक
चैत्रशुह चयोदशी भगदेवत नक्षत्र रविवारमे पृथ्वीम जो भचष्य
जी बी दुभगा वध्या कानी
सुखके देनेवाठे इन मेरे वचनोको
हे महेश्वर ! मलष्योके पापकी शुदिकै लिये सदैव यहां इसीख्पसे इसी वेदीमे आ
समीप अपना आश्रम बनाकर अपने पापक विनाशके निमित्त थ तप करं ॥२७॥
भृक्तिूरवकं आपको देसेगे ॥ २८ ॥ तभी उनके पाप नष्ट होंगे अत्यन्त पुण्य बदेगा ओर सम्पूणं रोग नष्ट होंगे ॥३९॥
कुप होगी वह भी उत खहू्म आपका दशनकर शीप्रही निर्दोष हो जायगी ॥४०॥ ब्रहम(जी बोठे अपने संपूण घुल
अनेनैव तु शूपेण वेद्यामस्यां मदैश्वर॥ त्वया स्येथ सदेवा नृणां पाषविश्ुद्धये ॥३९॥ येनास्य संनिधौकृत्वा स्वाश्रमं शशि
शेखर ॥ तपः कुर्या विनाशाय स्वपापस्यास्य शंकर ॥ ३७ ॥ चैवङक्जयोदश्यां नक्षत्र भगदैवते ॥ चुरयवारे च यो भक्तया
वीक्षेत भुषि मानवः ॥३८॥ तदैव तस्य पापानि प्रयांतु हर संक्षयम् ॥ वद्धैते विषुलं पुण्यं रोगा नश्यतु सर्वशः ॥३९॥ या
नारी दुभेगा वध्या काणा ङूपविवजिता ॥ सापि त्वद्शनादेव निदोषा संभवेद्धुवम् ॥४०॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्य वचो
त्रे हि स्वात्मसर्वसुखावह् ॥ तथाऽस्त्विति शिवः भराई सुप्रसन्नेन चेतसा ॥ ४१॥ शिव उवाच ॥ हिताय सर्वलोकस्य वेया
तस्यां भ्यवस्थितः ॥ स्थास्यामि सहितः पत्न्या सत्या त्वद्वचनाद्विषे ॥४२॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता भगरवास्तत सभार्यो
वृषभध्वजः ॥ उवाच वेदिमध्यस्थो भूति कृत्वांशङ्पिणीम् ॥४३॥ ततो दक्ष समामत्य शंकरः परमेश्वरः ॥ पलन्या सत्यार्गतु
मना अभूत्स्वजनवत्सलः ॥७४॥ एतस्मत्नते दक्षो विनयावनतस्सुधीः॥ सांजखिन॑तकः प्रीत्या तुष्टाव वृषभध्वजब् ॥४५॥
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स.सं.२ || सुन शिवजी प्रसन्न हो तथास्तु कहते हुये ॥४१॥ शिवजी बोट हे विधि ! आपके व्चनसे सम्पूणं कोककै हितके अथ उस वेदीमें अपनी सती |
~. सहित वास करूगा ॥४२॥ बहा बोठे यह कहं ृषभध्वज भगवानु उत्तमूरतिको कर वहां वेदीके मध्यमे वास कृरते भये ॥ ४ ३ ॥ अपने जनोँपर
| दया करनेवाख परमेश्वर शिवजी दक्षते सम्तिकर सतीपत्नी सहित जानेकी इच्छा करते हषे ॥ ४४ ॥ उञ्ञ समय दक्ष हाय जोड विनयपुवेक
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भीति दृषभध्वजकी स्तुति करने गे ॥ ४५ ॥ विष्ण आदि सम्पूरणं देवता ओर सुनिगण स्तुतिपूवक नमस्कार कर जयजय शब्द करने कगे ||
४६ ॥ दक्षकी आज्ञा प्रत्न हो मह देषजीने सतीको वैटकर बेढाकर आप भी वृषभपर स्वार हो हिमाय पर्वतको गमन किया ॥४ ्
बह चारुहासिनी सती बेखपर बैठी शंकरे समीप चन्द्रमामे रष्णरेलाके स्षमान शोभित मई ॥ ४८ ॥ विष्ण आदि सम्पूणं देवता ओर
मरीच्यादि सृम्पूणे ऋषि दक्ष ओर भी बहुत मलप्य मोहित होगये ॥ ४९ ॥ कोई बाजन बज।ति को गाते भसतनता पूर्वक शुद्ध कल्याणक ||
विष्ण्वादयस्सुरास्सवें मुनय गणास्तदा ॥ नत्वा संस्तूय विविधं चछुजयरवं शुदा ॥४६॥ आरोप्य वृषभे शंभुस्सतीं दक्षा
ज्ञया मुदा ॥ जगाम दिमवत्परस्थं बृषभस्थस्स्वयं प्रभुः॥७७॥अथ सा शंकराभ्यासे सुदती चाश्शासिनी ॥ पिरेजे बशभस्था वैं
चन्द्रति कालिका यथा ॥ ७८ ॥ विष्ण्वादयस्मुरास्सवै मरीच्याास्तथषयः ॥ दक्षोपि मोहितश्वासीत्तथान्ये निश्चला जनाः
॥७९॥ केचिद्रायान्वादयन्तो गाय॑तस्सुस्वरं परे ॥ शिवं शिवयशश्जुद्धमयजग्ुः शिवं शुदा ॥५०॥ मध्यमार्गाद्धि्ो हि दक्षः
त्याथ शम्बुना ॥ वधाम प्राप सगणः शम्भुः प्रमसमाङकलः॥५१॥ विसृष्टा अपि विष्ण्वा्याश्शम्थुना पुनरेव ते॥ अनुज
गशुशशिवं भक्तया सुराः परमया सुदा॥५२॥ तेस्स्वैससगणेश्शायुस्सत्यः च स्वश्चिया य॒तः॥ प्राप स्वं धाम संहो हिमवद्िरि
शोभितम् ॥ ५३ ॥ तञ गत्वाखिखान्देवान्पुनीनपि परांस्तथा ॥ एदा विसज॑यामास बहु सम्मान्य सादरम् ॥ ५४ ॥
दनेवारे शिवका यश शिव्के साथ चछा ॥ ५० ॥ दक्ष प्रीतियेक महदेवजीको आधे भार्गतक पवाकर् गोहित अपने स्थानको सौर
आये, उधर शम्भुजी प्रेमे आरुढ हो चरे गये ॥ ५१ ॥ शिवजीने उन विष्ण आदि सव देवताओंको भिदा भी कर दियातोभी बे सब
ट परमभक्ति ओर प्रेमे शंकरके सेग संग कैठसतक गये ॥ ५२ ॥ उन सवो साथ सञीयुक्तं सगण शंभु अपने धाममे शोभित हिभागिरिपर
पहुच गये ॥ ५३ ॥ वहां जाकर सम्पूण देवता ओर खनियोको प्रसन्न हो शन्भानपुर्वैक निदा किषा ॥ ५४ ॥ `
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बह सब विष्य आदि देवता ओर सुनि महादेवजीते कहकर स्मृति ओर नमस्कार कर भपने अपने स्थानक ॥ ५५॥ शिव भी
सदित हो अपनी ज्ञी दक्षकन्याके सहित हिमाठ्य पर्वतपर स्थित हो विहार करने ठे ॥ ५६ ॥ शकरजी गणि युत सतीसहित परसलता
त रवक प्वैतोमिं उक्तम अपने स्थान केठास्च पवंतपर प्राप्त हुए ॥ ५७ ॥ हे मुनि ! यह स्वायभुवमलके समयम होनेवाठे महादेवजी विवाहका
कणन किया जैसा पहिे हभ था ॥ ५८ ॥ महादेवजीका पूजन करके जो मुष्य इ कृथाको विवाहक समय अथवा यज्ञकै आरम्भे
शंमामाष्य ते स विष्णवाचया छदिताननाः ॥ स्वंस्वं घाम ययु्नत्वा स्तुत्वा च छनयस्छराः ॥५५। शिवोपि शुदितोत्यथ
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ट स्वपलन्या दक्षकन्यया ॥ हिमवत्पस्थसंस्थो हि विजहार भवाुगः ॥५६॥ ततस्स शकरर्सत्ता सगणस्घूतिकरन्धुने ॥ प्राप्
¢ स्वं घाम संहृष्टः कैलाशं पर्वतोत्तमम् ॥ ५७ ॥ एतदरस्स्वमाख्यातं यथा तस्य पुराऽभवत् ॥ विवाहो वृषयानस्य मवुस्वा्यं
ट भवान्तकं ॥५८॥ विवाहसमये यज्ञे प्रारंभे वा शृणोति यः ॥ एतदाख्यानमव्यथ्रस्संपूज्य वृषभध्वजम् ॥५९॥ तस्याऽविष्न
‰| भवेत्सर्वकमे वैवाहिकं च यत् ॥ शुभाख्यमपरं कै निरविष्नं सर्वदा वेत्।।६०॥ कन्या च सुखसौभाग्यशीखाचारणुणान्विता॥
£| साध्वी स्यात्पुतरिणी प्रीत्या चत्वाख्यानमिदं श्चुभ् ॥६१॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
४ सती विवाहव्णनं नामरविंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ ॥ नारदं उवाच ॥ समीचीनं वचस्तात सर्वज्ञस्य तवाऽनघ ॥ महाद्भुतं तं नो
, ॥९|| वे चरितं शिवयोश्भम् ॥ १ ॥ विवाहश्च अतस्सम्य सर्वमोहापहारकः ॥ परमज्ञानसंपत्नो भगलाल्य उत्तमः ॥२॥ |
र.सं. २ ||| हुने हई ॥ ५९ ॥ उनके सम्ूणं वैवाहिक कमं ओर जितने शुभकर्म ह बह सव सदैव निर्वि पणं होजाते ह ॥ ६० ॥ इस उत्तम कथाको
स.सं.२ || || भीतिपूर्वक सुनकर कन्था सुस सौभाग्य उत्तम॒शीढ _आचारहपी गोते युक्त हो पतिवता ओर ए्वती होती है ॥ ६१ ॥ इति भरीशिव
अ०२१ ||| महारणे भाषारीकायां रदरपेहितान्तमीतद्वितीय्ततीसंडे सतीविवाहवर्णने नाम॒ रविशोऽध्यायः ॥ २० ॥ नारद बोठे हे तात ।
‰
। \॥| आपका सरवजञके उत्तम वचनद्वारा मेने महाअद्धुत शिवका शुभ चरित्र बुना ॥ १ ॥ सम्पूणं मोहोके करनेवाछा परज्ञान युक्त मंगोका ,
0 4 + 0
ह
स्थान उत्तम श्रीशिवजीके विवाहको अच्छे भकारसे सुना ॥ २॥ हे महाभाज्ञ ! भेरी शिदकै शुभचरिजकै सुननेकी फिर भी इच्छा है सो
यन्चपर कपा करफ वणन कीजिये ॥ ३ ॥ बहला बोडे हे उनि ! अच्छे ्रकार करूणाकरनेवाछे शिवजीकी लीठावणनमे जो तुमसे कहा ओर
जो नहीं कहा उसे हुनिये ॥४ ॥ दक्षते उत्पन्न होनेवाटी तीनोंटोकोकी माता सतीदेवीका विवाह कर प्रीतिपुवंक अपने स्थानक जाकर जो
ह|| किया वह खक्ष सुनो ॥ ५ ॥ महादेवजी गणों सहितं अपने स्थानये पहु अत्यन्त भ्सन्नतापरक ' बेरे उतरे ॥६॥ हे देवछषि । संस(रीटीला
भूय एव विवित्सा मे चरितं शिवयोश्जुभम् ॥ तद्रणय महाप्राज्ञ कृपां कृत्वाऽतुलामरम् ॥ ३ ॥ ॥ बरह्मोवाच ॥ सम्यज्ञा
ङ्णिक स्येव भरने ते विचिकित्सितम् ॥ यदद नोदितस्सौम्य शिवलीलादवर्णने ॥४॥ विवाह्य दक्षजां देवीं सतीं रोक्यमा
तरम् ॥ गत्वा स्वधाम सुप्रीत्या यदकार्षीत्निबोध मे ॥ ५ ॥ ततो हरस्स स्वगणर्स्वस्थानं प्राप्य मोदनम् ॥ देवष तञदृष
भादवातर दतिप्रियात् ॥ & ॥ यथायोग्यं निजस्थानं प्रविश्य स सतीस्षखः ॥ शरुशुदेऽतीव देवष भवाचारकरश्शिवः ॥ ७॥
ततो विद्पाक्ष इमां प्राप्य दाक्षायणीं गणान् ॥ स्वीयानिर्यापयामास नदादीन् गिरिकंदरात् ॥८॥ उवाच चैतास्ताब् सवात्नं
द्यादीनतिसूदतम् ॥ लोकिकीं रीतिमध्रित्य करूणासागरः प्रभुः ॥ ९ ॥ महेश उवाच ॥ यदाहं च स्मराभ्यच्न स्मरणादरमां
नसाः ॥ समागमिष्यथ तदा मत्पार्श्वं मे गणा दतम् ॥१०॥ इत्युक्ते वामदेवेन नंयाद्यास्स्वगणाश्च ते ॥ सहवेगा महावीरा
नानास्थानेषु संययुः ॥११॥ ईश्वरोपि तया सद्धं तेषु यतेषु विन्रमी ॥ दाक्षायण्या समसं रेमे रस्ये सुदितो शशम् ॥ १२ ॥
करनेवारे शिवजी यथायोग्य अपने स्थानम भरवैशकर अत्यन्त भ्रसन्न हुये ॥ ७ ॥ तव शिवजीने सतीको पाय नंदी ओर गणोको पहाडकी
न्द्रासे अन्य स्थानको भेजदिया ॥८॥ करुणास्तागर भ्रमु शिवजी संसारी रीति इन सबसे बोले ॥९॥ महेश बोठे जव नै आप ठोगोका
५ || बडे प्रमे स्मरण करु तव॒ आप छोग शीघरही मेरे पास आजावें ॥ १० ॥ शिवजीकै यह कहतेही शीघगामी वीरगण ओर नदी आदि
नानास्थानोको चछेगये ॥ ११ ॥ अत्यन्त परनन शिवजी भी उनक चङ्ेजानेपर सतीजीकै साथ रमण करनेरुगे ॥ १२ ॥
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चक
| | ३ शिवजी कभी वनकै कोको तोड सुन्दरमाको बना सतीको हारक स्थानम पहिराते ॥ १३ ॥ कभी सतीजीकैद्पणमे खख देखते हए
॥१२१॥ ||| आपभौ पेते जा अपना ल देखने ठगते॥१४॥सतीजीके रोकनेपर भी उनके कुण्डलोको वार् बार उधारकर कमभीखोढं ओर कमी बाँधे॥ १५॥
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ठ कृमौ वह भगवान, शकर स्वभावे रक्तवणं अभिके समान निर्मठ इन सतीजीकै चरणोंको भसन्नतासे रंगङ्गाकर बहुत छाठ करते ॥१६॥ जो कुछ
६ बात द्रे मदु्योके सामने भी सतीपे कहने योग्य थी उसको भी सतीके देखनेकी इच्छासे काननें कहते ॥ १७॥ शंकर कभी दूर नजति,जाते भी तौ
ट| कदाचिदवन्यपुष्पाणिसमाहत्यमनोहदराम्॥ मालां विधाय सत्यास्त॒ हारस्थाने स योजयत्॥१३॥कदाचिदरषणे चैव वीक्षतीमात्म
‰| नस्सतीम्॥अलुगम्य हरो वक्र स्वीयमप्यवलोकयत् ॥१४॥ कदाचि्छडरं तस्या उ्टास्योहछास्य संगतः॥ बधाति मोचयत्येव सा
ठ स्वयं माजंयत्यपि॥१५॥सशगौ चरणावस्याः पावकेनोज्ज्वलेन च॥ निसगीरक्तौ कुक पूर्णरागौ वृषध्वजः॥१६।उचेरपियदास्ये
|| यमन्येषां पुरतो बहु ॥ तत कणे कथयत्त्यस्याहरो दरष्टुं तदाननम्॥१७॥न दूरमपि गन्तासौ समागत्य प्रयत्नतः॥ अुब्ातिना
|| माक्षी पृष्ठदशेन्यमानसाम्॥१८।अतरितस्तु तत्रैव मायया वृषभध्वजः॥तामाछिखिग भीत्या स्वं चकिताम्याङलाऽमवत्॥१५५॥
|| सौवर्णपद्यकलिकातुर्ये तस्या कुचद्रये ॥ चकार भ्रमराकारं शगनामिविशेषकम् ॥२०॥ हारमस्याः कुचयुगाद्वियोज्य सदसा
ट हरः ॥ न्ययोजयच्च तत्रैव स्वकरस्पशेनं सुहुः॥२१ ॥अगदान्वलयानूर्मान्विश्लेष्य च पुनः पुनः॥ तत्स्थानात्पुनरेवासौ त्स्थाने
\ प्रत्ययोजयत् ॥२२॥ कालिकेति समायाति सवणा ते सखी चिमाम्॥ यास्यत्वस्यास्तथक्षत्याः प्रोचंगौ साहसं चौ ॥२३॥
₹०स.२ |+ ||छिपकर पीठपीछे आ सडहोते कि देस सतीका मन किनवातोम गा हुआ है ॥१८॥ कमी अप्नीमायासे अन्तद्धान होकर सतीजीका आगन
इ .सं.२ || ||करेते ओर सतीजी चकित हो अत्यन्त ठयाङुकहोतीं ॥१५॥ सुवरणक कटके समान उनके दोनो स्तन भरमरोंका आकार धारण किये थे ओर
अ०२१| मृगनाभकी उपमाके थे ॥२०॥ कभी बडी शीघतासे इनके स्तनोके स्पशकी इच्छा कर स्तनोके बीचसे हार उढा ओर किर छोड देते ॥ २१ ॥
। (वाच् कैगन ओर कडोंको वारवार निकाठते ओर पहराते ओर जहंकी जो वस्तु होती फिर ऽसे उसी स्थानम पहारा देतेथे॥२२॥ काठिकानात्नी
(स+ ० + 4 + ०
+
4 0
कदाचिन्मदनोन्मादचेतनः प्रमथाधिषः ॥ चकार नमं शर्माणि तथाकृत्पियया श्ुदा॥२४॥ आद्त्य पदमपुष्पाणिरभ्यपुष्पाणि
शंकरः ॥ सर्वगिषु करोति स्म पुष्पाभ्रणमादरात् ॥२५॥ गिरिकुजेषु रम्येषु सत्या सह महेश्वरः॥ विजहार समस्ते प्रियया
भक्तवत्सलः॥२६॥ तया विना स्म नो याति नास्थितो न स्म चेष्ठते॥तया विना क्षममपि शमं ठेमे न शंकरः॥२७॥ वित्य
सुचिरं कारंकैलासगिरिकुजरे॥अगमद्धिमवत्प्रस्थ सस्मार स्वेच्छया स्मरन्॥२८॥ तस्मिन्प्रविष्टे कामे त॒ वस्षतश्शंकरांतिके ॥
वितस्तार निजं भावं हार्द विज्ञाय यत्प्रभोः॥२९॥सवे च पुष्पिता ब्क्षा लताशान्याश्च पुष्पिताः ॥ अंभांसि फएुटपद्यानि पञ्चा
स्सभ्रमरास्तथा॥३०॥ प्रविष्टे त्र सटहतौ ववौ स मलयो मरत् ॥ सुगंधिगंधपुष्पेण मोदकश्च खगंधिथुक् ॥३१॥ संध्याद्रैचन्दर
संकाशाः पलाशाश्च विरेजिरे ॥ कामाघ्नवत्सुमनसः परमोदात्पाद्पाधरः॥२२॥ बुः पंकजपुष्पाणि सरस्सु संकखञ्जनान्॥ समो
दयितुशुशयक्ता सुखी वायुदेवता॥३३॥ नागकेशरृक्षाश्च स्वणवर्णेः प्रसुनकैः ॥ बधु्मदनकेत्वाभा मनोज्ञाश्ंकरांतिके ॥ ३९ ॥
कामके शिवजीके पास जानेपर वसंतने अपने हार्देभावको शिवजीपर फेडाया॥२९॥ पूणे वृक्ष भरित होगये छता एग है जर कमलों्हित ओर
कमछ भ्रमरोंसहित होगये हं ३०॥वसंतकै प्रविष्ट होतेही सुगेधित पुष्पोकी गंधे युक्त सुन्दर मरुपवायु वहने गी॥३१॥ सध्याके अर्भचन्द्रके समान
पठाश शोभित हो रहे थे, ओर उनम जो षप फूल रहे थे वही मानो कामदेवके अन्च थे ॥३२॥ तडाग कमखकै दुष्प शोभित हो रहे थे ओर वायु
देवता मरुष्योंको मोहित करनेको उयत थी ॥३३ वहां शकरकै समीपे नागकैशरकै वृक्ष अपने स्व्णवणके पष्पोति मदनकेतुक समान शोभित
६८
ब्हारी यह सखी आती है, शसक साथ जाओ यह कहनेपर उसको देखते हए सतीके ऊंचे स्तनोका स्पशे करते॥२२॥कामसे ठयथितचित्त कभी भरियासे ९
अत्यन्त प्रसन्न हो छ्नाको छोडदेते॥ २४॥कभी कमठ ओौर २ सदर ष्पोको राकर बडे पेषसे सब शरीरम एूठोके आभरण बनाकर पहराते ॥२५॥
भक्तवत्सर शिवजी सपण रमणीय कजम सतीजीके साथ विहार करते ॥२६॥ न उनके बिना कहीं गये न बैठे न देखा उनके विना क्षणभर भी
शिवजी सुख न पाते॥२७॥कैठास परव॑तके कुजंम बहुत दिनों तक विहारकर हिमारयपर अगये ओर अपनी इच्छासे कामका स्मरण करते हुए॥२८।
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नरह थे॥ ३४॥ ठंग कता सुंदर घुगंधते वायुको वा्षित करके कामीजनं
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लर्वगवह्धीश्चरमिगंघेनोद्वास्य माश्तम् ॥ मोहयामास चेतांसि भृशं कामिजने पुरा ॥ ३५ ॥ चार्पावकचचित्सु सस्वराश्रत
शारिनः ॥ बधुमैदनवाणौघ पर्यकमदनावृताः ॥ ३६ ॥ अंभांसि मर्दीनानि रेः $ख्ङशाशयाः ॥ मुनीनामिव चेतांसि
्रवयक्तज्योतिरुदरमम् ॥ ३७ ॥ तुषारास्सूर्यरश्मीनां संगमादगमन बहिः ॥ प्रमत्वानीक्ष्यतेक्षाश्च सखि लीददयास्तदा
॥ ३८ ॥ ग्रसत्ास्सह चन्द्रेण ननिषारास्तदाऽभवन् ॥ विभावर्थः प्ियेणेवं कामिन्यस्छ॒मनोदराः ॥ ३९ ॥ तस्मिन्काङे महा
देषस्सह सत्या धरोत्तमे ॥ रेमे स सुचिरं छन्दं निजेषु नदीषु च ॥ ४० ॥ तथा तेनसमं रेजे तद् दाक्षायणि मुने ॥ यथा
हरः क्षणमपि शांतिमाप तया विना ॥ ४१ ॥ संभोगविषये देवी सती तस्य सनः प्रिया ॥ विशतीव हरस्यांगे पाययत्निव
तद्रसम् ॥ ४२ ॥ तस्याः कसुममालामिभषयन्सक्ला तलुम् ॥ स्वहस्तरचिताभिस्तु नवशर्माकरोच सः ॥ ७३ ॥ आपे
वीक्षितैहंस्येस्तथा संभाषणेहररः ॥ तस्यादिदेश गिरिजां सपतीवात्मस्ंविदेम् ॥ ४४ ॥
उप्त समय महादेवे उस परवतपरे निकुञ ओौर नदियोमे तीके पाथ बहुत का पूर्यत सवच्छन्द् रमण किया॥४०॥ ह खने ! दक्षकी एव महादेवजीकै
साथ अतिशय शोभित हृद ओर शिष भी उसके विना क्षणभर भी न शांत रहते थे॥४१।सती भी शिवके मनको भन्न करती हृईं ओर मानो सभोगका
रस्षपान कराती हद शिवके शरीरम भ्रविष्टसी हृदे जा रही थी॥२॥ ओर शंकर भी उसके अंगोको ए्पोकी माठात्े शोभित करते हुये नवीन नवीन
क प्रकारके मंगढ कर रहे थे ॥४३॥ शिव भी आरापवीक्षित हास्य ओर सम्भाषणसे उस विषयमे अपने ज्ञानका परिचयस्ता दे रहे थे ॥ ४४ ॥
क चित्तो वारंवार मोहित कर रही थी॥३५। दर अश्रिकै समान चर्चित
न्दर स्वरवाठे आमपर वैठनेवाटे भ्रमर कामकेबाणके समूह ओर कामपे व्याप्त वे मदनके पर्यैक जनेगये॥ ३६ ज्ञानक वठसे जिनके हदयांधकात
दूर हो गये ह एते सनि्योके चित्तके समान एठे हुए कमले पूरित निक जठ शोभा दे रहे थे ॥ ३७॥ सर्यकी करिरणेकिं ठगने बरफ़ गरक बहगई थी
तढागोके मध्य गाधहो रहे ये ॥३८॥ रत्नि चन्दमके साथ होनेके कारण वैेही शोमित हो रही थी जसे अपने भ्रियतमके साथ सुन्दर च्वौ हौ ॥३५॥
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| चन्द्रहूपी स॒खके अभृतके पानसे प्रसन्न हए शि अपनी विशिष्ट अदस्थाका कछ ध्यान न करते थे ॥ ४५॥ उस युखकमरुकी आावा-
ते उसकी सुन्दरतासे उपतकी ऋीडासि महादेवजी रेते वैष ये जेते कोई हाथी रस्सियोपे वेधा हो ॥ ४६ ॥ इस प्रकारे हिमाङ्यक ईजे ||६
साप ओर यफाओमं शिवजी सतीके साथ प्रतिदिन रमण करते थे शिवजीके ठेस क्रीडा करते हुए देवताओंके परचीस वषं गत हो गये
॥ ४७ ॥ इति श्रीशिवमहाऽरागे मााीकायां रुढरसंदितान्तगैतदवितीयतीरण्डे एकर्दिशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ बाजी बोटे कभी , वपु
तद्वक्रचद्रषीयुषपानस्थिरतनुरदरः॥नानावेशेषिकीं तन्वीमवस्थां ' घ कदाचन ॥४५॥ तद्रक्राम्बुजवासेन तत्सौन्दर्यश्नमभिः ॥
गुणैरिव महादती बद्धो नान्यविचेष्टितः ॥ ४६ ॥ इति हिमगिरिकुंजप्रस्थभागे दरीषु प्रतिदिनमभिरेमे दक्षपुत्या महेशः ॥
कतुभुजपरिमणेः कीडतस्तस्य जाता दश दश च सुरषँ वत्सराः पंच चान्ये ॥ ४७ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणे द्वितीयायां
श््रसहि तायां द्वितीये. शतीखंड सतीशिवकीडावर्णन नामेकर्विंशोध्यायः ॥ २१ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ कदाचिदथ दक्षस्य तनया
जख्दागमे ॥ केकासक्ष्माभृतः पराह प्रस्थस्थं वृषभध्वजम् ॥१॥ सत्युवाच ॥ देव देव महादेवं शंभो मत्प्राणवछछम ॥ शृण
मरे वचनं नाध श्रुत्वा तच्छ मानद् ॥ २ ॥ घनागमोयं संप्राप्तः कालः परमदुस्सदः ॥ अनेकवर्णमेौघास्संगीरताबरदिक्चयाः
॥ ३ ॥ विर्वांति वाता दयं इारयंतीत वेगिनः ॥ कदंबरजसा धौताः षाथोबिन्दुविकर्षणाः ॥ 9 ॥ मेघानां गनितेरचेर्धाय
सारं विस्रुचताप् ॥ वियुत्पताकिनां तीतः धुन स्यात्कस्य नो मनः ॥ « ॥
जब किं महादेवजी कैलाश पवतकै एक शिखर पर बेटे थे तब सतीने यह षश्न किया ॥ १ ॥ सती बोरी हे देवताओंक देवता ! हे भेरे भाणके
बहम । हे मानद ! हे नाथ ! भेरे दचनोंको सुनो ओौर वैसा करो ॥ २. ॥ हे नाथ ¡ यह प्रम दुस्छह वषाकांर आकर भाप हुआ नानाव्णैके
ट मेष दशोदिशाओंम धिरे है ॥ ३ ॥ हृदयको हरनेवाटी वायु बह रही दै कदम्बक करन्द भि हुए जठ्के शीकर आरहे है ॥ ४ ॥ धाय-
समक समूह बरम्ाते हए विजटीको चमकाते दए ओर गजते हुए मेधोको देखकर किंकरा मन श्ुभित नहीं ह्ये जाता ॥ ५ ॥
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यह कतु दिरहियोको दुःख देनेवाठा जिसमे न तो दिनम सूयं भकाशित होता है ओर न रात्रिको चन्द्रमा रेस दिनको भी रात्रिके समान
रखनेवाडा शोभित हो रहा है ॥ ६ ॥ हे शंकर ! वायु वेगसे परित शब्द करते हए मेषभी एकत्र नही ठहरते किंतु छोगोक शिरपर गिरते
हृए दिला देते है ॥ ७ ॥ हे शकर 1 वायुसे परित बडे बडे वृक्ष, अन्तरिक्षम नाचतेसे दिखाई देते है जो रनेवाठोको डरावने ओर कामिः
योको हुल देनेवारे है ॥ ८ ॥ चिकने ओर काठे अजनकै समान मेधके ऊपर उडती हृद वकपृक्ति रेस शोभा दे रही है जसे यश्चना नदीकै ठै
ृषठपर फेन बहता हो ॥ ९ ॥ रातरिके आजानेमं श्यामता आजानेसे वियुत बख्याकार दीखती है जैसे सखदरमे प्रदीप वडवाखस अभि होती है
न सूयो दश्यते नापि मेघच्छन्नो निशापतिः ॥ दिवापि रातनिवद्भाति विरदिभ्यस॒नाकरः॥६॥मेघा नैक् तिष्ठतो ध्वनन्त पवने
रिताः ॥ पतंत इव लोकानां दृश्यंते मूध्नि शंकर ॥ ७ ॥ वाताहता महावृक्षा नतैत इव चाबरे ॥ दश्यते हर भीरूणां आसदाः
कासकेप्सिता ॥ ८ ॥ स्निग्धनीखांजनस्याश्चु सदिवौघस्य पृष्ठतः ॥ बलाकराजीवात्युच्चेर्॑श्नापृष्ठफेनवत् ॥ ९ ॥ क्षपाक्षये
षृवलयं दृश्यते कालिकागता ॥ अदुधाविव संदीप्तपावको वडवाश्चखः ॥ १० ॥ प्रारोद॑तीह सस्यानि मदिरं ्ाङ्गणेष्वपि ॥
किमन्य विद्पाक्ष सस्यौद्धूतिं वदाम्यहम् ॥ ११॥ श्यामे राजतेरक्तेविंशदोयं हिमाचलः ॥ वेदराश्रयमेघौघः पतरदर्धाब
पिर्थथा ॥ १२ ॥ असमश्रीशच कुटिलं भेजे यस्याथ किं्ुकान् ॥ उावचान् करौ लक्ष्मी गैन्तासंत्यञ्य सननाच् ॥ १३॥
मंदारस्तन पीनां शब्देन इषिता शुहुः ॥ केकायंते प्रतिवने सततं पृष्ठस चकम् ॥ १७ ॥ |
॥ १० ॥ हे विहपाश्च ! एते समयमे अन्द्राचपर छोर वृक्ष जम रहे है दूसरे स्थानी क्या चच है ॥1१॥ कारे सफेद ओर राढ मेधोति ४
विरा हृ यह पर्वत वैसेही शोभा देता है जे पक्षयो धिरा हुआ दुग्धका समुद्र ॥१२॥ भिन्न भिन्न भरकारकी शोभा दिखाते हूए वृक्षोके ( '
पट्व शोभित हो रह है जेते कछिकारमे सजनोको छोडकर नीचे ऊंचे एरुषोंको रक्षमी भाप्त होती है ॥ १३ ॥ मन्द्र पवैतके मेधोकी ध्वनि ||
से भसन्न हए ये मयूर वनवनमे अपनी पीठ दिलाकर नाच रहे है ॥ १४ ॥
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| मेषोके रिए उत्सुक यह चातकोंकी मधुर ध्वनि सुनाई पड रही है.॥ १५ ॥ भेकी यह दुनीति देखिये जो किं अपने अनुगामी मयुर
र ओर चातकोंको ओङेति ठंकता है ॥ १६ ॥ मयूर ओर सारंगका भित्ते भी प्राजय देखकर उनका मन हष॑को भाप होता है ॥ १७॥ इस्
¢ विषम कार्म काक ओर मयूर भी अपना षोंस्ला बनाते है भठा कहो कि ठम बिना _ घरक कते शांति पाओगे ॥ १८ ॥ ह पिनाकी 1
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ञ्चे मेधो बडा डर ठगता है इस हैतु भरे कहनेसे कहीं घरका वंध करो ॥ १९ ॥ हे वृषभध्वज । केठासमे अथवा दमाय वा महा-
६ भधोत्स॒कानां मधुरथातकानां मनोहरः ॥ धारासारशरे्तां पेतः ्रतिपथोदरतम् ॥ 9५॥ भवानां पश्य मेदे दुर्नयं करक
| त्रेः ॥ ये छादयत्यवुगते मयूरा ातकांस्तथा ॥ १६ ॥ पि 1 मिजादपि पराभवम् ॥ हष गच्छंति गिरिशं `
है| विदूर्मपि मानसम् ॥ १७॥ एतस्मिन्विषमे कारे नीडं काकाश्चकोरकाः॥ छवैति त्वां विना गेहान् कथं शांतिमवाप्स्यसि ॥
६ ॥ १८॥ महतीवाद्य नो भीति मेघोत्या पिनाकधृक् ॥ यतस्व यस्माद्वासाय माचिरं वचनान्मम ॥ १९ ॥ कलसे वा
दिमाद्रौ वा महाकाश्यामथ क्षितौ ॥ तज्नोपयोग्यं संवासं कुर् त्वं वृषभध्वज ॥ २० ॥ ॥ जह्मोवाच ॥ एवुक्तस्तया शथदा
प क्षायण्या तथाऽसङृत् ॥ सजदास च शीर्षस्थचन्द्ररश्मिस्मिताल्यम् ॥ २१ ॥ अथोवाच सतीं देवीं स्मित्भिन्नीष्ठसंपुटः ॥
| महात्मा सरवतत्त्वज्ञस्तोषयन्परमेश्वरः ॥ २२ ॥ ईश्वरः. उवाच् ॥ यच प्रीत्य मया कायो वासस्तव मनोहरे ॥ मेघास्ते न
गंतारः कदाचिदपि मस्मे ॥ २३ ॥ मेघा नितंबषयंतं संचरति मदीथृतः,॥ सदा प्राखेयसानोस्त॒॒व्षस्वपि सनोहरे ॥
¢ ॥ २९ ॥ कैलासस्य तथा देषि पादगाः प्रायशोचनाः ॥ संचरति न गच्छंति तत ऊर्धं कदाचन ॥ २५ ॥
काशीम अथवा पृथ्वीम जहां उचित हो भरवेध करो ॥ २० ॥ बरह्ाजी बोडे एसी दाक्षायणीकी विनती श्ुनकर् शकर वारंवार हषे ओर उनके
ह|| मस्तक प्र स्थित अरधचन्द्रके भरकाशसे वह स्थान भरकाशित होगया ॥ २१ ॥ अनन्त्र परमेश्वर सब तस्वौके जाननेवाे सतीको प्रसन्न
|| करते हए हेसकर बोडे ॥ २२ ॥ ईश्वर बोठे हे भिये 1 जह तेरी भसन्नताके छिए भ स्थान बनाङगा वहां भेष नहीं जायृभे ॥ २३ ॥ हे
# || मनोहरे ! व्षीकारमे मी दिमार्यके शिखरके नीब ही नीचे मेष धरभण करते रहते है ॥२४॥ ओर कैखाक्तफे तो नीचे ही भेष रहते ह ऊपर
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कदापि नहीं जाते ॥२५॥ पुष्करावतंक आदि भेष जम्बुके मूरुतक पराप्त होकर सुभेरुके शिखरके ऊपर नहीं जाति ॥ २६ ॥ इतने कहे हुए पव॑तोतिे |
जिसपर निवास करनेकी तुम्हारे मनकी इच्छा हो उसको खसे शीघ्र कहो ॥ २७ ॥ हिमाख्य पतपर हुवे पकषवाडे अनिखदनद नार ५८. |
समूह अपने ऊँचे ऊंचे मधुर शब्दो तमहारे इ्च्छालसार विहारे कोतकोका गान करगे ॥२८॥ तहां सिद्धी बयां तुम्हारे स्वच्छा विहारं समय
मणिम जडजडकर बना द वेदीरप आसनकी भूमिको कौतुक साय तुम्हारे अर्पण करगी, ओर नाना भरकारकै फ आदि छाकर् भी तुम्हारे सामने ।
सुमेरो्वां गिरे दरध्वं न गच्छंति बलाहकाः ॥ जब्बरमूलं समासा युष्करावर्तकादयः ॥२६। इत्युक्तेषु गिरीन्द्रे यस्योपरि
भवे दि ते ॥ मनोशुचिनिंवासाय तमाचक्ष्व हुतं दि मे ॥ २७ ॥ स्वेच्छाषिहारैस्तव कौतुकानि खवणपक्षानिलृनदुबरन्दः ॥
शब्दोत्तरगेमं धुरस्वनैस्तेडेदोपगेयानि गिरौ दिमोत्थ ॥२८॥पिद्धाङ्गनास्ते रचितासना थुवमिच्छंति चवोपडतं सकौतुकम् ॥
स्वच्छाविहारे मणिकुष्टिम गिरौ कर्वन्ति चेष्यति फलादिदानकैः ॥ २९॥ फणीन्द्कन्या गिरिकन्यकाश्च या नागकन्याश्च
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१२४॥
तुरंगथुख्याः ॥ सर्वास्तु तास्ते सततं सहायतां समाचरिष्यंत्यनुमोद्विधरमेः ॥ ३० ॥ हषं तदेवमतुलं वद्नं चार् दश्वा
गना निजवपुनिजकांतिसह्यम् ॥ डका निजे वएषि ङपगणेषु नित्यं कर्तार इत्यनिमिषेक्षणचाश्हूपाः ॥ ३१ ॥ या मेनका
पर्वतराज जाया श्यैणेः ख्यातवती कोके ॥सा चापि ते तच मनोुमोदं नित्यं करिष्यत्यबुनाथनायेः ॥ ३२ ॥ रं हि
वगिरिराजवचैः शीति विचिन्वद्भिरूदाररूपा ॥ शिक्षा सदा ते ल शोधितापि कार्याऽन्वं ्रीतियुता शणायैः ॥ ३२ ॥
रखना चाहंमी ॥२९॥ नागकन्या, परव॑तकन्या तथा तुरङ्गय॒खी नागकन्या (किन्नरी ) यहं सव निरन्तर कोडाकै समय सुन्दर २ वचन कह तुम्हारी
सहायता करेगी ॥३०॥ तहाकी अतिघुन्दरी देवांगनाय तम्हारे इस अदपम रुप ओर परममनोहर छलको देखकर अपने शरीरम हप ओर णको
धिक्कार करेगी ओर तुम्हायी ओर टकटकी लगाकर देसगी ॥३१॥ जो पवैतराजकी ली भेनका रूप गुणसे त्रिोकीमे विखूयात है वह भी तुम्हारे
मनकी भ्रसन्नता अनेक भरकारसे करेगी ओर तुम्हारी अजुकूकता करेगी ॥ ३२ ॥ गिरिराजको वंदन करनेवाटे सव एरक परिवारके लोग म्हारी ¢
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प्रीति करगे यदि तुमको कु शोच मी होगा तो वह तुम्हारी रिक्षा करगे ओर तुमको समञ्वेगे ॥३३॥ बडे विचित्र कोकिराओकिं ए
आङाप ओर मोदवाटे कुंजोके समृहोसे पिरे हृए स्थानम हे भिये ! कया सदा कसन्तकी उत्पत्तिवारे स्थानम जाना चाहती हो ॥ ३४ ॥ ट
अनेकं बहरतसे जसे पृण सरस शीतम युक्त सेकडो कमङिनियोति युक्तं अचरराज ` हिमाख्य है ॥ ३५॥ सब कामना देनेवाठे शाद तथा कल्प ¢
क्से सम्पन्न एूटोको अश्व करि गोवजकं समान क्षणमा्रको देसो ॥३६॥ यहांके सक जीव सब शात है खनि यतियो यह संपन्न देवा-
ठय है हे महामाये ! यह अनेक पृगगणोपि युक्त है ॥३७॥ स्फटिक मणि ओर सुवणकी गोखादि तथा चांदीके स्थानो विराजमान मानादि ४
विचित्रैः कोकिखाङापमोदैः कुंजगणावृतम् ॥ सदा बसंतप्रभवं गतुमिच्छसि कि भिये ॥ ३४ ॥ नानाबहुजलापू्णसरश्शीत
समावृतम् ॥ पथिनीशतशोयुक्तमचलेन्द्रं हिमालयम् ॥ ३५९ ॥ सवंकामप्रदृकषेश्शाद्रछेः कल्पसंज्ञकैः ॥ सक्षणं पश्य समा
न्यथाश्वकरिगोत्रने ॥ ३६ ॥ प्रशातश्वापदगणं सुनिभियतिभिवंतम् ॥ देवालय महामाये नानासृगगणेंतम् ॥ २७ ॥
स्फाटिक स्वरणवप्राये राजते विराजितम् ॥ मानसादिसरोरगेरभित्ः परिशोभितम् ॥ ३८ ॥ दिरण्मये रत्ना पंकजे ||&
कुरेव॑तम् ॥ शि्चुमारिस्तथासंस्येः कच्छपेमकरेः करैः ॥ ३९ ॥ निषेवितं भजकैश्च तथा नीरोत्परादिभिः ॥ देवेशि तस्मा ©
न्यक्त सव गंधे कुकुमेः ॥ ४० ॥ लसदरंथजरेः शुभेरापूरणैः स्वच्छकांतिभिः ॥ शाद्रेस्तरूणेस्तंमेस्तीरस्थैहपशो |¢
मितम् ॥ ४१ ॥ तृ्यद्धिरिव शाखोटेवैर्जयत्ं स्वसंभवम् ॥ कामदेवेस्सारसे मत्तचक्रंगशोभितेः ॥ ४२ ॥ ‰ ` › ` `
सरोवरकै रंगेसि सब प्रकारसे शोभित ॥३८॥ सुवण ओर रत्नोकी डंडीवारे कमर ओर बवृरोति संपन्न, शिशुभार तथा असेख्यं कच्छप सकर
ठयाप्त ॥३९॥ बडे उज्ज्वठ नीठकमटादिकोंमे संपन्न है हे देवेशि ! इसी कारण कंकुमादिकी सब ओरसे गेषं भप्त हो रही है ॥४०॥ जलें
मसे गंध आरही है स्वच्छ कान्तिवाठे सरोवर भर रहे ह बडे तरण ऊचे वृक्ष तथा शादरोमे शोभायमान है ॥४१॥ यके अखरोरेके वृक्ष
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मानो अपनी शाखा हिराफर नृत्य कर रहे र कामदेव सारस ओर मतवाङे चकवाचकवियोते शोभित है ॥ ४२ ॥
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भमरादि मधुरध्वनि य॑जार रहे ह ओर भेमसे शब्दायमान कामोदीपन करनेवाठे शब्द हो रहे है ॥४३. ॥ इन्द्र | ४ ब व
करोणपति पवनादिकी एरियं ॥४४॥ जिनके शिखरपर शोभायमान हो रही है, मेरुपवेतमं इस भकार सब दवता निवास करते है रंभा शची मेनकः
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आदि अप्सराओ सेवित है॥४५॥ हेदेवि! कया तुम इन समस्त भूमियोके सारभूत महामनोहर महापरवतोमे विहार करनेकी इच्छा करती है ॥४६॥ यहां
॥१२५॥
जानिते ससियोपि युक्त अप्सरागणोसे मंडित शचीदेवी तुम्हारी नित्यं सहायता करेगी।। ४७॥। अथवा पर्वतराज सब वस्तुओसि शोभायमान मेरे पवैतराज |||
मधुरारापिभिर्मोदकारिभिरभमरा दिभिः॥ शब्दायमानं च शुदा कामोदहीपनकारकृम् ॥४ २॥ वासवस्य कुबेरस्य यमस्य वरुणस्य
च्॥ अग्रैः कोण पराजश्य मारुतस्य परस्य च ॥४४॥ पुरीभिश्शोभिशिखरं मेरोस्तैस्पुरालयम्॥रंभाशचीमेनकादिरंभोरूगणसे
वितम् ॥४५॥ किं त्वमिच्छसि सर्वेषां पवतानां हि भूभेताम्॥ सारभूते महारभ्ये संवित महागिरौ ॥ 8६ ॥ तच देवी सखि ¢
युता साप्सरोगणमंडिता॥ नित्यं करिष्यति शची तव योग्यां सहायताम्॥४७॥ अथवा मम कैलासे परवेद सदाश्रये ॥स्थानमि ‡
चछसि वित्तेशपुरीपरिविरानिते॥४८॥गंगाजलौवपयते पूणंचन्द्रसमपरभे ॥ दरीषु सादुषु सदा बरह्मकन्यभ्बुदीरिते॥४९॥नाना 6
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मृगगणैध्े पदयाकरशतावृते॥स्वैरीणेशच सदरसतुसुमेरोरपि संदर ॥५०॥ स्थानेष्वेतेषु यन्नापि तवांतःकरणे स्पृहा ॥ तं दतं मरे
समाचक्ष्व वासकर्तास्मि तत्र ते ॥५१॥ ब्रह्मोवाच ॥इतीरिते शंकरेण तदा दाक्षायणी शनेः॥ इदमाह महादेवं लक्षणं स्वप्रकाश
नम् ॥ ५२ ॥ ॥ सत्युवाच ॥ दिमाद्रावेव वसितुमहभिच्छे त्वयासह ॥ न चिरात्छुर् संवासं तस्मित्रेव महागिरौ ॥ ५३ ॥
कैठासे जो कुबेरकी एरीके भी ऊपरमागमे विराजमान है तू रहनेकौ इच्छा करती है ॥४८॥ जहां पूणं चन्द्रमाकौ कांतिकै स्मान नित्य जठ बहता है
जहांकी फा (कन्दरा) ओंम बह्मकन्या सुन्दर गान करती है वहां रहना चाहती हो ॥४९॥जो अनेक पृगगणोे युक्तं सैकडों कमरे व्याप्त सब ४
गोम अष सुमेरूते भी सुन्दर है ।॥।५०॥ हे देवि ! इन श्थानोमिसे जहां हुम्हारे मनमे इच्छा हो उस वृकषादिके स्थानको कहो वही स्थान बनाय
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निवास करं ॥५१॥ बह्याजी बोठे जव शकरन रेस्ा कहा तव सती शनैः महादेवे अपने रहनेके उक्षण भरकाश करने लगी ॥५२॥ सती बोटी मे |
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मोहित हूए शकरजी हिमायके ऊंचे शिखरमे पार्वतीके सहित गये ॥ ५४॥ जो सिद्धौकी लियो सेवित है जहां पक्षीभी नहीं जासकते उस ||
कमलो वनसे विराजमान मनोहर शिखरमं शिवजी गये ॥५५॥ बिचित्रहपवाठे कमठो वह शिखर चित्रित होरहाथा, भभातक सथके समान
शोभायमान उस शिखरपर सतीसहित शिवजी भाप हृए ॥ ५६ ॥ स्फटिकमणि ओर अथमय शाद्रल वकषौते विराजमान विचित्र प्ष्पराजी
ओर कमछिनिोसे संयुक्त ॥ ५७ ॥ ए्ठे वृकषोकी अग्रशासावाठे नार करतेहए भ्रमरो सेवित ष्ट हए पैकरुह ओर नीडे कमृलोते शोभा
ब्रह्मोवाच ॥ अथ तद्वाक्यमाकण्यै हरः परममोहितः ॥ दिमाद्विशिखरं तगं दाक्षायण्या सुम ययौ ॥ ९४ ॥ सिद्धागनागण
युत मगम्यं चैव पक्षिभिः ॥ अगमच्छिखरं रम्य सरसीवनराजितम् ॥ ५५ ॥ विचिषरहूपैः कमलैः शिखरं रत्नकड्ैरम् ॥
बाखार्कसदृशं शंथुराससाद सतीसखः ॥ ५६ ॥ स्फटिकाभमये तस्मिन् .शाद्रलद्कमराजिते ॥ विचि्रपुष्पावलिभिस्सरसोभि
श संयते ॥ ५.७1 प्रषुतर्शाखायं गुजद्रमरसेवितम् ॥ प॑केरुरैः प्रफेश्च नीलात्यकचयेस्तथा ॥ 4८ ॥ शोभितं चक्रता ||
कायः कादेईसशकुभिः ॥ ्रमत्तसारसैः कौचैरनीरस्कंषैश् शब्दितेः ॥५९॥ पुंस्कोकिलानां निनदेभशुरगणसेितेः ॥ तुरं
गवद्नैस्सिदधैरष्सरोभिश्च शद्यकेः ॥ ६० ॥ विद्याधरीभिदेवीभिः किननरीमिरविंहारितम् ॥ फर्रीभिः पार्तीभिः कृन्याभिरमि ¢
संगतम् ॥ ६१ ॥ विषचीतांचि कामत्तमृदंगपटहस्वनेः ॥ नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च कौतुकोत्थेश्च शोभितम् ॥ ६२ ॥ दैविकाभिदीं
विकामिर्गयिभिस्षुसमाव्ृतम् ॥ प्रफुट्कुसुमेनित्यं सङुजरूपशोभितम् ॥ ६२ ॥ ट
यमान ॥ ५८ ॥ चक्रवाक, कादम्ब, हंस, शकु, मतवटे सारस ओर नीटी गद॑नवाठे कंच पक्षियों सेवित तथा शब्दायमान् ॥ ५९ ॥ ४
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स्कोयलोके मधुरालाप तथा गणो सेवित तुरंगवदनवाठे सिदध ओर अप्सर ओक समृहोसे व्याप ॥६०॥ वियाधरी देवी ओर किञञरियोकि विहारमे
सम्पन्न पैकी रहनेवाटी चली ओर कन्याओंसि संघटित ॥६१॥ मूरदेग परह वीणा सितारकै बाजोंपर नाचतीहुई अप्सराओक्रे कौतुके नित्य
व्याप्त ॥६२॥ देवताओंद्ारा निर्माण की हुई बाबी ओर उने आती कमरूगंधिसे व्याप एूरेहुए एरोवाठेवृक्षौकी कुजो नित्य शोभायमान ॥ ६ ३॥॥
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शढराजके इसभकार सब भाणियोसे शोभायभान उत्तम शिखरपर सतीकै सहिव शकर बहुत शढ्तक रभण करते रहे ॥ ६४ ॥ उस्न
स्मान स्थानम महादेवजी सतीके साथ परम प्रसन्नतासे देवता ओके दशसहश्च वर्पतक विहार करते रहे ॥ ६५ ॥ कभी उप्त स्थानमे शिवजी अन्य
स्थानम जाते कमी देवी देवतापि व्याप्त भेर् शिखरपर जाते ॥ ६६ ॥ पृथ्वीके अनेक द्वीप तथा दिव्य उथान पृथ्वीम विचरण करते
तीके साथ रमण करने कगे ॥ ६७ ॥ यज्ञ तप॒ निजकप चिन्तन यह सरव छोड शिवने सतीर्ेही मन ठगाया ॥ ६८ ॥ इमृभरकार सती सदा
शैकराजपुराभ्यणें शिखरे वृषभध्वजः ॥ सहसत्या चिरं रेमे एर्वभूतेषु शोभनम् ॥ 8 ॥ तस्मिनूस्वगीसमे स्थाने दिव्यमा
नेन शंकरः ॥ दशवर्षसदस्ाणि रेमे सत्या समं खदा ॥ ६५ ॥ स॒ कंदाचित्ततस्स्थानादन्ययाति स्थलं हरः ॥ कदाचिन्मे
शिखरं देवी देववृतं सदा ॥ && ॥ द्वीपान्नानातथोद्यानवनानि वइधातलम् ॥ गत्वागत्वा पुनस्तभ्येत्य रेमे सतीसुखम्
॥ ६७ ॥ न जज्ञे स दिवा रात्रौ न ब्रह्मणि तपस्मस् ॥ सत्यां हि भनसा शंयुः प्रीतिमेव चकार इ ॥ ६८ ॥ एवं महदिवघ
सं सत्यषश्यत्स्म सर्वदा ॥ महादेवोऽपि सर्वर सदाद्राकषीत्सतीश्चुखम् ॥ ६९॥ एवमन्योन्यसंसर्गादनुरागमरीरश्दम् ॥ वृद्धया
मासतः कालीशिवौ भावांबुसेचनेः ॥७०॥ इति श्रीशिवमदहाएराणे द्वितीयायां श्दरसंदितायां द्वितीये सतीखंडे शिवाशिववि
` हारवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥२२॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं कृत्वा विहारं वै शंकरेण च सा सती ॥ संठष साननाति विरागा
समजायत ॥ १ ॥ एकस्मिन्दिवसे देवी सती रसि संमता ॥ शिवं प्रणम्य सद्धक्तया न्यस्योैः सुङ्ृतांजिः॥ २ ॥
महादेवकाही खख देखती ओर महादेवजी सदा सतीका यख देखते ये ॥ ६९ ॥ इसभरकार परस्पर एक दूसरेके अतुरागसे प्रस्पर शिव काटीने
वका जर छिढककर परममी वृको बढाया ॥७०॥ इति शरीशिवमहा्राणभाषाीकायां दरंहितान्तगेतसतीसेडे दवा्विंशौोऽध्यायः ॥ २२ ॥
हाजी बोरे इसभकार बह सती शंकरे साथ विहार करक संतुष्ट हो फिर कामसे विरक्त हुईं ॥१॥ एक समय एकांते घुखसे वदी हई
नउ ऋज 9९ जज 3९ 9९9२
रेष्ठ मक्तितते शिवको भणामकर ओर हाथ जोड॥२॥बह दक्ष कन्या सती भरसनन हुए अपने भभुको भणागकर बदी नघ्र ओर भक्तिसे कहने र्णी \३\ }|2\
सती बोटी हं देवदेवाहि महादेवा हे करूणासागर।हे भमो! दीनोकि उद्धार करनेवाखे हे षहायोगी!य्षपर रूपा करो ॥४॥ हे स्वामी! आप प्रमषरुष हो ||
| सत, तमसेपर हो, निशैण सगणके साक्ष निविकारी महा भगुहो॥ ५ बियो धन्य हू जो विहारशीढ आपकी भरिया द ह हेहर। भक्तिवस्सर्तसे ||} |
आप भेर स्वामी हए हो ॥६॥हे नाथ! आपनेभेरे साथ बहुत काठतक विहार किया; है महेशान!उसते भ संतुष्ट हदं ओर मेरा मन् निवृत्त होगया ॥ ् ध
सुप्रसत्न परभुं नत्वा सा दक्षतनया सती॥उवाच सांजलिभक्तया विनयावनता ततः ॥२॥ सत्युवाच ॥ व कृङ्णा |
सागर प्रभो॥दीनोद्धर महायोगिन् कषां कर् ममोपरि ॥४॥ त्वं परः पुर्षस्स्वामी रजस्सत्त्वतमःपरः ॥ क्षी ठ
निर्विकारी महाप्रथुः ॥ ५ ॥ धन्याईं ते प्रिया जाता कामिनी सविहारिणी ॥ जातस्त्वं मे पतिस्स्वाभिन्भक्तिवात्सल्यतो हर ¢
॥६॥ कृतो बहसमा नाथ विहारः परमस्त्वया ॥ संतुष्टं महेशान निवृत्तं मे मनस्ततः ॥७॥ ज्ञातुमिच्छामि देवेश षरं तत्त
सुखावहम् ॥ य न संसारदुःखादवे तरे्नीरवोजसा इर ॥८॥यत्कृत्वा विषयी जीवस्स रूभेत्परमं पृद्म्॥ संसारी न भवेन्नाथ तत्त्वं ट
वद् कृपां कुर् ॥ ९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्यपृच्छत्स्म सद्धक्तया शंकरं सा सती घुने ॥ आदिशंक्तिभहेशानी जीवोद्धाराय केवलम् ट
॥ १० ॥ आक्यं तच्छिवः स्वामीस्वेच्छयोपात्तविभ्रहः ॥ अवोचत्परमप्रीतस्तीं योगविरक्तधीः ॥१३१॥ ॥ शिव उवाच ॥ £
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि दाक्षायणि महेश्वरि ॥ परं त्वं तदेवालशयी शक्तो भवेद्यतः ॥ १२ ॥ ®
हे देवेश ! अव सुख देनेवाडे परम तत्वके जाननेकी इच्छा करती ह हे हर!जिसकै कारणते यह जीव संसारक पार हौ सकता है॥ < ॥ विषयी
जीव जिसको भा्कर परमपदको ेता है हे नाथ!ओौर फिर भी बह सपनारी न हो रुपा करके वह त कहो ॥९॥ नहाजी बोठे हे खने ! जब ४
तीन भेष मक्तिकर शकरसे रेसा पंखा ओर आदिशक्ति मंहेशानीने केवर जीवो उद्धारकी इच्छा कौ ॥ १० ॥ तव अपनी इच्छसे शरीर ||
धारण करनेवाटे शिवजी यह वचन शुन, योगसे विरक्त बुद्धि होनेके कारण प्र ममते सती बोठे ॥११॥ शिवजी बोठे हे दाक्षाषणि महेश्वरि !॥/>
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शि ०० ||| घनो मँ तुमसे कहता ह जिस परमतको जानकर यह अद॒शयी जीव सक्त होजाता है ॥१२॥ हे परमेश्वरि तुम विज्ञानको ही परमत जानो ह
|| स्मरण उ स्थठपर नहीं द बुदधिसे केवट बहमका स्मरण है॥१२॥हे भिये इस तखका जाननेवाछा कदं विरही होता है भर त्रिलोकीं दुखभ ह |
॥१२७॥ ¢ मँ दास हूं ओर वह बह साक्षात् परते परे है ॥१४॥ मुक्ति आर स॒क्तिकी फल देनेवाटी उस विज्ञानकी माता भेरी भक्ति है वह मक्त भी मेरीही रुपात |
ह|| ठम होती है ओर वह नौ प्रकारक है॥ १ ५।क्ति ओर ज्ञानमे कुछमेद नहीं है मक्तिकरनेवाठेको सद सुल होताहै मक्तिते ्रिरोष करनेवाटेक कभी |
त विज्ञानकी भाप नहीं होती॥ १६॥ ह देवि ! मँ मक्तिके सदा आधीन हं मक्तिके भ्माकते जाति हीन नीच र्षोकै रोम भी जाता हू देवि ।|
६ प्रतत विजानीहि विज्ञानं परमेश्वरी ॥ द्विती्यस्मरणं यतर नाहं ब्रहेति शुदधधीः॥१२।तडंभं त्रिरोकेस्मिस्तज्ज्ञाता विरलः |
$| परिये ॥ यादृशो यस्सदासोहं बह्मसाक्षात्परात्परः॥१४॥ तन्मातामम भक्ति शुक्तिघक्तिफलग्रदा॥ सुरभा मत्प्रसादाद्धि नवधा |
सा प्रकीतिंता ॥१८॥भक्तौन्ञाने न भेदो हि तत्कतस्सर्वदा सुखम् विज्ञानं न भवत्येव सति भक्तिषिरोधिनः ॥ १६ ॥भक्तया |
हीनस्सदाहं वै तत्प्रभावांदरहेष्वपि ॥ नीचानां जातिहीनानां यामि देवि न संशयः॥१७॥सा भक्तिद्रविधा देवि सगुणा निथुणा
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र“ न्न्दवटटय क ~
| मता ॥ वेधी स्वाभाविकी या या वरा सा त्ववरा स्थता ॥ १८ ॥ नेष्ठिक्यानेषठिकी भेदादिविधे द्विविधे हि ते ॥ षड्विधा
नैष्टिकी ज्ञेया द्वितीयेकविधा स्मृता ॥ १९ ॥ विहिताविहिताभेदात्तामनेकां विदुदंधाः ॥ तयोबेहुविधत्वाच्च तच्छं त्वन्य
क्थ्य टय
, |&| वर्णितम् ॥ २० ॥ ते नांगे उभे ज्ञेय वर्णिते सुनिभिः श्रिये ॥ वर्णयामि नवांगानि परमतः शृणु दक्षजे ॥ २१ ॥
१६ ४ इसमे संदेह नहीं है ॥ १७ ॥ हे देवि ! सण नियणके भेदे वह भक्ति दो प्रकारक है नियम संबंधी ओर स्वभावकी इसमें पहटी भ्रष्ठ ओर दूसरी
ए
नव्-तन्-
22 2,
स.सं,२ || || अवर है ॥ १८ ॥ वह दोनों भकारकी भक्ति नेठिकी ओर अनेष्ठिकी भेदसे दो दो भकारकी है इसमे ने्िकी छः भरकारकी ओौर अनैष्ठिकी एकही |
अ०२३ ||| भरकारकी है॥ १ ९॥इसको विहित अविहित भेदसे पंडित अनेकं कारकी कहते ई ओर वह अनेक भरकारके होनेसे उनका तत्व अन्यत्र वर्णन करिया |
॥ ॥ है ॥ २० ॥ हे भरिये!उन दोनोकै अंग खुनिर्योने नौ धकारकै वणेन किये हहे देवि!उन नौ अंगोकि लक्षण परथ पृथक् कहता हं सावधान होकर प्रेमे
न न
ुनो॥ २१॥भरवणकरना, कीर्तनकरना स्मरण, सेवन, दास्य॒पन; अचन ओर सदा वन्दन करना २२॥सख्यता ओर पश्वात् आत्मस्मपेण, यह नौ अग
विद्रानोनेकहे ह शिवे! उसके उपगतो बहुतही ६॥ २३॥ हेदेवि! अब नवां गोका रक्षण पृथक् पथस् कहता ह जो मेरा भक्त इनम मन र्गाद तो उसको भुक्ति
प्रापि होतीहै ॥२४॥ कथा आदिमे देहादिते नित्य सन्मान करे स्थिर आसनसे बेट कृर उसका पान करे यह भवण कहाता है ॥ २५ ॥ भरे
जन्म कको हदयरूपी आकाशम देखता हआ उनको प्रीति उचारण करे इसका नाम कीरवेन है ॥ २६॥ हे देवि ! सचको नित्य सर्वत्र सवेदा ष्या
|
४ ६
|| श्रवणं कीततनं चेव स्मरणं सेवनं तथा ॥ दास्यं तथा्चनं देवि 1 मम सर्वदा ॥ २२ ॥ सख्यमात्मा्पणं चेति नवांगानि ४
£| विदुबवैधाः ॥ उपगानि शिवे तस्या बहूनि कथितानि वै॥२२॥ शृण देति. नागानां लक्षणानि प्रथकषथक् ॥ मम भक्तमनो ||
|| दत भक्ति ुक्तिप्रदानि दि ॥२९॥कथादेनित्यसम्मानं र्वन्देहादिमिर्ुदा ॥ स्थिरासनेन तत्पानं यत्तच्ूषणशुच्यते ॥२५॥ ९
# इदाकाशेन संपश्यञ् जन्मकर्माणि वे मम॥ परीत्याचोचारणं तेषामेतत्कीत॑नसुच्यते ॥२६॥ग्धापकं देति मां द्वा नित्यं सरवन
सर्वदा॥ निर्भयत्वं सदा के स्मरणं तदुदाडतम् ॥२७॥अशूणोदयमारभ्य सेवाकटेचिता हदा॥ निभयत्वं सदा लोकै स्मरणं ए
ए तदुदाडतम्॥२८॥ सद् सेभ्याुकूल्येन सेवनं तद्धि गोगणेः॥हदयाश्रतभोगेनप्रियं दास्यश्ुदाडतम्॥२९॥सद्ा भत्याचकूट्येन
| विधिना मे परात्मने १ अपणं षोडशानि पाद्यादीनां तदचेनम्॥३०॥मंभोचारणध्यानाभ्यां मनसा वचसा कसात्॥ यदष्ठांगेन
£| भूस्पर तदव वेदनशुच्यते ॥३१॥ मंगलार्मगलं यद्यत्करोतीतीश्वरो हि मे ॥ सर्व तन्धगखायेति विश्वासः सख्यलक्षणम् ॥३२२॥ ||
|| पक जानकर निर्भय होकर छोकमे सदा विचरे ॥२७॥ अशणोदयसे आरंभ करके सेवाकाल्ये हदयस विचारकर सदा निभैय हो स्मरण करे इसका |22
नाम् स्मरण है ॥ २८ ॥ सदा सेवके अनकूढ हो अपनी इन्दियोको भगवत्तेवाभं रुगावे हदयसे उनकै अभृतका भोग करे उनका भिय चिन्तन ४
करे इसका नाम॒ दास्य है ॥ २९ ॥ मृत्यके समान भेरी सदा अनुकूढता करे ओर सोह पकारसे भरा पूजन करे पाय अर्घ दे यह अर्चन है ©
|| ॥३०॥ मन वचन कर्मे मंत्रोचारण ओर ध्यान करे आढ अगो भूमिको स्पशे करे इसका नाम वंदन है ॥३१॥ संगर अरमंगर जो कुछ ईश्वर
\७9
` चः |
† ध" ||ह मेरेठिये विधान करता है वह सव मंगक हा जो विस है यह मित्रताका उक्षण ह ॥ ३२ ॥ भीतिसे देहादि. सव उत्क व
|| मेण करदेना आप्र शन्यल सम्ञना यही आत्मसम है ॥ ३२ ॥ यह मेरी भक्तिके नौ अंग मुक्ति यक्तिके देनवाठे हं यह ज्ञानक ||
ए || उन्न कररनेवाठे पुद्षको बहुत प्यारे ई ॥ ३४ ॥ ओर मेरी भक्ितके उपांग तो बहृतही बेरुपत्र आदिते सेवन यह विचारसे जानटेने
्|॥ ३५ ॥ हे भिये ! इसभकारसे सांगोपांग भेरी भक्ति सर्वाम है यह ज्ञान वैशग्यकी उत्पन्न करनेवाटी है इसकी सुकतित दासी होकर #
$ रहती है यह सदा शोभायमान है ॥ ३६ ॥ हे भिये ¡ इससे सव कर्म॑ ओर फठकी उत्ति होती है सदा तुम्हारे समान श्रिया है जि
ट| कृत्व देहादिकं तस्य भरीत्ये र्वतद्रपणम् ॥ निर्वाहाय च ञ्चन्यत्वं यत्तदात्मसमरपंणम् ॥३३॥ नवागानीति मदधक्तेक्तिषुक्तिप्रदानि ४
च ॥ मम प्रियाणि चातीव ज्ञानोत्पत्तिकराणि च ॥३४॥ .उपांगानि च मद्कतवुदूनि कथितानि वे ॥ विस्वादिसेवनादीनि समू
९ ल्यानि विचारतः ॥३५॥ इत्थं सांगो्पागभक्ति्मम सोत्तमा भिये ॥ ज्ञानवैराग्यजननी शक्तिदासी विराजते ॥३६॥ सर्वकमफरो ६
ए त्प्तिस्स्वदा त्वत्समभ्रिया॥ यञ्चित्तेसास्थिता नित्यं सर्वदा सोति मत्परियः॥२७॥ ेलोकषये भक्तिसदशः पथानास्ति सुखावहः ॥ ¢
र| चतयगेषठ देवेशि कलौ तु सुशेषतः ॥३८॥ कलौ तु ज्ञानवेरागो वृद्क्पौ निश्सवौ ॥ भराहकाभावतो देवि जातौ जजर ए
६ तामति ॥ ३९॥ कलौ पत्यक्षफलदा क्तिस्सर्वयुगेष्वपि ॥ तत्पमावादहं नित्यं तद्वशो ना संशयः ॥४०॥ यो भक्तिमा ||
ी ४ न्पु्मोहटोके सदाहं तत्सहायकृत् ॥ विघ्नदर्ता रिपुस्तस्य दंडयो नार च संशयः॥ १॥ -
०, ण
स.सं.२ ||@|| युगो प्रधान है प्र कटि भें विशेष है ॥ ३८ ॥ कलियुगे ज्ञान वैराग्य वृद्ध॒ ओौर निरुत्सव है हे देवि ! प्राहकके अभावे वे जजर
अ०२३॥| || होरहे है ॥ ३९ ॥ सव युगो ओर विशेषकर कमं भक्ति विशेष फर देनवारी है इसके भतयक्च फक्के पभावसे मेँ सद्ा इतक वशीभूत रहता
। ९॥ ह ॥४०॥ जो परुष लोकम भक्तिमान् होता है पँ दा उसकी सहाय करताहू, मेँ विद्नोका हरनेवाखा उरते यहां जो विप्र करताहै उसका शतु
# |
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चित्तम यह स्थित हो सदा मेरा प्रिय है ॥ ३७ ॥ तीनों कर्मे भकरितकै समान को मागे सुखदायी नहीं है हे देवेशि | यह चारो ४
^
| हं इसमे संदेह नही ॥ ४१ ॥ ह देवि! भक्तोके हेतु ही भे काठ कोधे व्याप्त होता हूं ने भक्तोके निमित्त ही अपने ने््ोकी अश्निसे उसको |£
दग्ध किया था॥४२॥ हेदेवि ! भक्तोके निमित्तं ही भसत उप्र हुआ ओर बड करोधसे शरु उढाकर उसको जय किया ॥४२॥ हे देवि ! |
भक्तके निमिन हीने रावणको कोध करके गणोके सहित त्याग दिया ओर उस्चका पक्षपात नहीं किया ॥ ४४ ॥ हे देवि! मक्तौकै निमित्त ही ठै
मैने एकवार कुमति करनेपर व्यास्रजीको नेदीदारा काशीसे निकटवा दिया था॥४५। हे देवेशि! बहुत कहनेसे क्या है मँ सदा भक्ति अधीन ¢
ह ओर भक्ति करनेवाछे परूषक अधीन रहता हूं इसमे संदेह नहीं ॥४६॥ बहलाजी बोठे दक्षकन्या सती इस प्रकार भक्तिका माहात्म्य सुनकर
भक्तदेतोरदं देवि कालं करोधपरिप्डतः ॥ अदं वद्धिना नेरभवेन् निजरक्षकः ॥ ४२ ॥ भक्तदेतोरहं देवि रब्युप््थभं किंल ॥ ए
अतिक्रोधान्वितः शुं गरदीत्वाऽन्वजय पुरा ॥४३॥ भक्तदेतोरदं देवि रावणं सगणं कधा ॥ त्यजति स्म कृतो नेव पक्षपातो हि ।
ट
ट
त
22
तस्य वे॥४४॥ भक्तरेतोरहं देवि व्यासं हि कुमतिग्रदम् ॥ काश्या न्यसारयत् कोधादण्डयित्वा च नंदिना ॥५॥ किं बहूक्तेन
देवेशि भक्तयाधीनस्सृदा हदम् ॥ तत्कर्त पुरुषस्यातिवशगो नात्र संशयः ॥ ७६ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्थमाकृण्यं भक्तेस्तु महन्तं
दक्षजा सती ॥ जहषांतीव मनसि प्रणनाम शिवे युदा ॥ ७ ॥ पुनः पप्रच्छ सद्धक्तया तत्काण्डविषं शुने ॥ शाघ्चं सखकरं
जीवोद्धारपरायणम् ॥४८॥ स्यजमंजशाघ्लं च तन्माहात्म्यं विशेषतः ॥ अन्यानि ध्वस्तूनि जीवोद्धारकराणि हि ॥
॥४९॥ शंक्रोपि तदाकण्यं सतीप्रशर प्रहृष्टधीः ॥ वर्णयामास सप्रीत्या जीवोद्धाराय कृत्स्नशः ॥५०॥ तज शाघ्चं स्यतं हि
सषंचाङ्ं महेन्वरः ॥ बभाषे मदिमानं च तत्तदैववरस्य वै ॥ ५१ ॥
बडी प्रसन्न हृदे ओर प्रमसे प्रणाम किया ॥ ४७ ॥ हे ने ! फिर भी भक्तिकाण्डके विषयमे पूछने क्गी जो शाश्च लोकम सुखदायक तथा
जीवोके उद्धारका करनेवाढा है ॥ ४८ ॥ यतर म्र शाच्च ओर विशेषकर उस्तका माहात्म्य तथा जीवोंके उद्धार करनेवाडी ओर भी अनेकं
धर्म वस्तुओंके, पूछा ॥ ४९ ॥ शिवजी भी सतीकै प्रनश्न सुनकर बडे प्रसन्न इए ओर जीवोके उद्धारक निभित्त परम भक्तिसे उस्षको वणैन
करने ठगे ॥ ५० ॥ यंत्र ओर पचागके हित देव शकरने उस शाद्को महिमा सहित वणन किया ॥ ५१ ॥
` च
¢ ५ £
इतिहास ओर मक्षिके माहात्म्य सहित वह सव कथा वर्णाभम धर्मे राजधमम ॥५२ ॥ एत्रओौर ल्ली धमक माहात्म्य वणाभमक अविनाशी धूम ||
तथा जीवोके उद्धार करनेवाखा वैयक ओर ज्योतिष शाद ॥५३॥ साम॒द्िक शाच्च तथा ओर भी दूसरे शाश्च कपा करके शिवजीनं त्वमे वणन ट
किया ॥ ५४॥ इस भकार त्रिछोकीके सुख देनेवाठे सवज सती ओर शिवजीने मक्तोके हेतु शरीर धारण करे यह सव वणेन किया ॥ ५५॥
शिण०्ु°
॥१२९॥
इस भकार हिमाय पर्व॑तपर अनेक भरकारसे ऋीडा करने रगे तथा दोनों परवह स्वरूप शिव।शिव अन्य स्थो विहार करने े॥*५६॥इति ¢
सेतिहासकथं तेषां भक्तमाहात्म्यमेव च॥ सवणांश्रमधर्मोश नृपधर्मान् भुनीशवर ॥५२॥ सुतच्चीध्मैमाहात्भ्यं वर्णाश्रममनश्व
रम् ॥ वे्यशाघ्रं तथा ज्योतिश्शाच्रं जीवसुखावहम् ॥५३॥ सामुद्रिकं परं शाञ्चमन्यच्छाच्लाणि भूरिशः ॥ कृपां कृत्वा महै
शानो वर्णयामास तत्त्वतः ॥ ५४ ॥ इत्थं परिलोकसुखदौ सर्वज्ञो च सतीशिवौ॥ खोकोपकारकरणधृतसद्रणविग्रहौ ॥ ५५ ॥ ट
£
॥(
विक्रीडाते बहुविधं केलासे हिमवद्विरौ ॥ अन्यस्थटेषु च तदा परब्रह्मस्वशूपिणौ ॥५६॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ४
४
रदरसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे भक्तिपरभाववर्णनं नाम अयोविशोऽध्यायः ॥२३ ॥ ॥ नारद उवाच ॥ व्रह्मन् विषे प्रजानाथ ||
महाप्राज्ञ कृपाकर ॥ श्रावितं शंकरयशस्सतीशंकरयोः शुभम् ॥१॥ इदानीं ब्रूहि सत्प्ीत्या परं तद्यश उत्तमम् ॥ किमकार्णा
हि तत्स्थौ वे चरितं दंपती शिवौ ॥२। । रहमोवाच ॥ सतीशिवचसििं च शृणु मे प्रेमतो ने ॥ लौकिकीं गतिमाभ्चित्य चिकी
डाते सदान्वहम् ॥ ३ ॥ ततस्खती महादेवी वियोगमलभन्धुने ॥ स्वपतश्शंकरस्येति वद॑त्येके सुद्ुद्धयः ॥ ९ ॥
र्० १. 7 टी 1 ५ ¢ खंडे ध न न [ष्व
२५ भ्रीशिवमहाप्राणेभाषारीकायां शुदरसहितान्तगतद्वितीयसतीखडे चयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ नारदजी बोठे हे ब्रह्न, 1 हे विधै ! हे महाभाग ।
प्रजानाथ ¡ महापंडित ! कपास्ञागर ! आपनेशिवा शिवका प्रभसुन्द्र यश श्रवण कराया ॥१॥ इसी प्रकारसे अन फिर भी उनक[ उत्तम यश कहिये ||
वहां स्थित होकर शिवाशिवजीने कया चरित्र किया है।२॥बह्माजी बोटे हे खने पमस शिवाशिषके चरित्र श्रवण करो वह ठोकिकी गतिकोआशरय ||
करके सदा क्रीडा करने रुगे ॥३॥ हे मुने ! तज सहदेवी सतीने वियोगक्री प्रापि शकरके शयन करनेपर की रस्ता कोई २ सुबुद्धि कहते है ॥४॥॥>
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& | तो चित्तसे शिवाशिव बाणी ओौर अर्थके समान मिहे हए है, हे सुने ! तरवे उनका विपोग कैसे सभव हो सकता है ॥ ५ ॥\ अथवा
| टीढा करनेमे वह सब सगठित होजाता है जो जो भवरीतिसे गिवाशिव कप्ते घे ॥ ६ ॥ फिर शक्ते व्यक्त होकर सतीने पिताजीकै यज्ञम
£| जाकर शिवजीकै अन्द्रकै कारण अपना शरीर त्याग दिया ॥७॥ फिर वह हिमाटयके यहां जाकर सती प्रगट हुईं ओर तप् करके फिर भी
शंकरको पराप हूं ओर वहां पावती नाम्रा इई ॥ < ॥ षतजी बोठे नारदजी बरह्मजीके यह वचन सुनकर फिर भी विधरातासे शिवा शिव्कै
ह महानु यशके पूछने ठगे ॥ ९ ॥ नारदजी बो हे विष्णशिष्य।महामाग् ब्ञाजी! आप् विस्तार सहित यह टोकटीटाका शिवाशिवचरित्र वणेन
| वागर्थाविव संपृक्तौ शक्तीशौ सर्वदा चितौ ॥ कथ् घटेत च तयोवियोगस्तत्वतो सुने॥९॥ रीलाश्चित्वादथ वा संघरेताऽखिकं
| च तत् ॥ कुरुते यद्यदीशश्चु सती च् भवरीतिगौ ॥ & ॥ सा त्यक्ता दक्षजा दृष्टा पतिना जनकाध्व्रे ॥ शंभोरनादरात्त दें
|| तत्याज संगता ॥७॥ पुनर्िमालये सेवाविभ्रूता नामतस्स॒ती ॥ पावतीति शिवं प्राप तप्त्वा भूरि विवाहतः ॥८॥ सूत उवाच
&| ॥ इत्याकण्य वचस्तस्य ब्रह्मणस्सतु नारदः॥ पप्रच्छ चविधातारं शिवाशिवमददयशः ॥९॥ नारद् उवाच ॥ विष्णुशिष्य महा
भाग विधे मे वद् विस्तरात् ॥ शिषाशिवृचरितरं तद्वाचारपरावुगम्॥१०॥ किमर्थं शंकरो जायां तत्याज भाणतः प्रियाम् ॥
| तस्मादाचक्ष्व मे तात विचिनमिति मन्महे ॥ 9१॥ कुतोऽद्यध्वरजः पा ते ॥ कथ तत्याज सा देहं गत्वा
¢ तत्र पितरकरतौ ॥१२॥ ततः किमभवत्तच किमकार्षीनमदेश्वरः ॥ तत्सत मे समाचक्ष्व श्रद्धायुक् तच्छरतावहम् ॥ १३ ॥ ब्रह्मो
वाच ॥ ॥ श्रृणु तात परप्रीत्या सनिभिस्सह नारद ॥ सुतवयं महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः ॥ १४॥
ह|| कीलिपे ॥१०॥ पराणोकी प्यारी जायाको शिवजीने किस भकारते त्यागन किया१हे तात ! भ इस बातको बडी विचित्र मानता हं आप अक्षम इस
|| चरिि्रिको कहिये ॥११॥ किं प्रकारसे आपके एत्र शकरका अनादर हुभा १ ओर पिताक यज्ञम जाकर सतीने किस भरकारसे देहको त्यागन
६ किया ॥१२॥ फिर इसके पश्चात् कथा हुआ ओर शंकरने क्या किया बँ भदवास ्ुनना चाहता हं आप यह सव स्पे कदिये ॥ १३ ॥
ब्रह्माजी बोडे हे नारदजी ! सनि्ोके साथ परम प्रीतिसे इस बातको नो हे पंडित ने ! मै शेकरका चरित्र कहता हू ॥ १४ ॥
ध
न
| `
व्व
| हरि आदिसे सेवित महेशानको भरणाम करके महाअद्भुत परमबह्मका चरित्र कहता हं ॥१५॥ बहती 11 करनेवाठे भभु शंकण्कौ यह अद्भुत |©
॥१३० ||| || खीठा है दह स्वतंत्र ओर निविंकार है सती भी इी प्रकारकी है ॥१६॥ हे सुने ! अन्यथा उप्त कर्मके करने कौन समथ है परमात्मा परहा ©
बही परमेश्वर है ॥१७॥ जिनका भजन सदा भीपति विष्ण मँ ओर सव देवता करते है महात्मा खनि ओर सिद्ध सनकादिक जिनका भजन
कृरते ह ॥ १८॥ रेषजी सदा जिनके यशको प्रमे गाते हँ हे तात ! ओर उक्षका पार नहीं पाते वही भु सर्वेश्वर शकर है ॥ १९ ॥ उसकी
नमस्कृत्य महेशानं दर्यादिसुरसेवितम् ॥ परब्ह्र प्रवक्ष्यामि तच्चरितं महाद्धतम् ॥१८॥ सर्वेयं शिवलीला दि बहुलीलाकरः ||
रुः ॥ स्वतो निविंकारी च सती सापि हि तद्विधा ॥ १६ ॥ अन्यथा कस्समथो हि तत्कमैकरणे शुने ॥ परमात्मा
९|| परब्रह्म स एव परमेश्वरः ॥ १७॥ य सदा भजते श्रीशोऽदहं चापि सकलाः सुराः ॥ नयश्च महात्मानः सिद्धाश्च
¢ सनकादयः ॥ १८ ॥ शेषस्सदां यशो यस्य शुदा गायति नित्यशः ॥ पारं न रूभते तात स प्रथुश्शकरः शिवः ॥ १९ ॥
तस्येव लीलया सर्वोयमिति तत््वविधरमः ॥ त॒ दोषो न कस्यापि ' सर्वैन्यापी स प्रेरकः ॥ २० ॥ एकस्मिन्समये शद
द| स्सत्या भरिभुवने भवः ॥ वृषमारदयपर्याद्रसां लीराविशारदः ॥ २१ ॥ आगत्य दण्डकारण्यं पर्थटन् सागराबराम् ॥ दशं ४
¢ यन् त्रगां शोभां सत्ये सत्यपणः परथुः ॥२२॥ तञ रामं ददशासौ कक्ष्मणेनान्वितं इरः॥ अन्विष्यत प्रियां सीतां रावणेन
| हतां छलात् ॥ २३ ॥ हा सीतेति प्रोञ्रतं विरहाविष्टमानसम् ॥ यतस्ततश्च पश्यतं श्द॑तं हि अघः ॥ २४ ॥
९०६. ||| ठीकासे यह सब तत्का विछास दिला देता है उश किपतीका दोष नहीं है वह सवैडयापौ सवका परक है ॥२०॥ एक समय टीला करने
स.खं.२ चतुर शकरजी सतीके सहित दृषपर स्थित होकर त्रिभुवन भूभिमे विचरण करने रगे ॥ २१ ॥ स्षागरपयन्त जव भूमिम भ्रमण करते हुए
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दण्डकारण्यम आये तब सत्य प्रतिज्ञ शिवजी सतीको भूमिक शोभा दिखाने ठे ॥ २२ ॥ उ समय शिवजीने राम ठक्ष्मणको उत्त स्थानम
देखा जो छठ करके रावणकं द्वारा हरी हृद जानकीको खोज रहे थे ॥ २३ ॥ उस समय रामचन्द्र हा सीता ¡ एसा कहकर विरहंमे ्याङुढ ट
हो रहे थे ओर इधर उधर खोजते हये रो रहे थे ओर जानकीको खोज रहे थे ॥२४॥ उसकी प्रापिकी इच्छसे उसकी गतिकी खोज करते हुर्
बुद्धिरहित होजानेश्षे वृक्षोसे पढ रहे थे शोके व्याकु थे ॥ २५॥ इसध्रकार सूयववशमं उत्पन्न वीर दशरथऽत्र भरतके बडे भ्राता आरन् ओर |
रहित ॥ २६ ॥ शोकके अधीन होकर वनमे भमणकरतेहुए छक्ष्मणसहित रामको देख उदारबुदधि शंकरे भणाथ किया॥२७॥ ओर जय एसा उच्चारण
कर दूसरी ओरसे अपना दशनं दिया जब भक्तवत्सर शकरने रामचन्द्रको अपना दर्शन दिया ॥२८॥ तब रेस मोहनेवाटी शिवकी टीलाको देखकर
मायासे मोहित हो सती शिवजीसे बोटी ॥ २९॥ सती बोी हे देवदेव ¡ हे परब्रह्म हे सवेश ! प्रभेश्वर ! आपको हारि बह्लादि देवता षदा सेवन करते हँ ९
समिच्छतं च तत्पाप प्रच्छतं द्रति डदा॥कुजादिभ्योनष्टधियमजपंशोकविहृरुम्॥२५॥सूर्यवंशोद्धवं वीरं भूषं दशरथात्मजम् ॥
भरतागरजमानंदरहितं विगतप्रभम्॥२ द॥ पूर्णकामो वराधीनं प्राणमत्स्म शुदा हरः ॥ गम भ्रमन्तं विपिने सरक्ष्मणसुदारधीः॥२७॥
जयेत्युक्ताऽन्यतोगच्छत्रदात्तस्मे स्वदशंनम्॥रामाय विपिने तस्थिजञ्छकरो भक्तवत्सलः॥२८॥ इतीदहशीं सतीं दृष्ठ शिवलीखां विमो
हनीम्॥ सुविस्मिता शिवं प्राह शिवमायाविमोदिता॥२९॥सत्युवाच॥ देव देव परब्रह्म स्वश परमेश्वर॥ सेवते त्वां सदा स्वँ हरििह्मा
दयस्सुराः ॥३०॥ त्वं प्रणम्यो हि सर्वेषां सेव्यो ध्येयश्च स्वेदा ॥ वेदांतवेयो यत्नेन निर्विकारी परषधुः॥३१॥ काविमौ पुरूषौ
नाथ विरदग्याकुलाकृती ॥ विचरंतौ वने छ्िष्ठौ दीनौ वीरौ धलधरो॥३२॥ तयोरज्यषठं कंजश्यायं दष्टा वै केन हेतुना॥ुदितस्सुप्र
स॒त्रात्माऽभवो भक्त इवाऽधुना॥३३॥ इति मे संशयं स्वाभिज्शंकर छमरसि ॥ सेग्यस्य सेवकेनैव घटते प्रणतिः प्रभो ॥३६॥
॥ ३० ॥ आपही सबके प्रणाम ध्यान ओर सेवन करनेवाडे हो आप् यत्नसे बेदान्तसे जाननेयोग्य निर्विकारी प्रभु हो ॥ ३१ ॥ हे नाथ !
विरहे आकुक आकूति किये यह दोनों परुष कोन है जो धलुष धारण किये वीर वनम विचरण करते है प्र विरहे व्यार ह ॥ ३२ ॥
उनमें श्यामकमल्कै समान ज्येष्ठ पुरुषको देखकर आप भक्तकै समान किसभकारसे सन्न हुए ॥ ३३ ॥ हे शंकर नाथं ! आप् इस प्रकार भेर
षेदेहको दूर कीनति हे भ्रभो ! स्वामीका तेवकको प्रणाम करना ठीक नहीं होता ॥ ३४ ॥
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ब्रह्माजी बोरे सती देवी आदिशक्ति शिवा परमेश्वरी है शिवकी मायासे वशीभूत होकर
तीके यह वचन ुनकर हदयमे हते ठीठा करनेमं चतुर यह बोडे ॥३६॥ शिवजी
इसमे कठ सन्देह नहीं वरदानके प्रभाते मेने आद्रसे भणाम किया है ॥२७॥यह राम ठक्ष्मण
महाभज्ञ दशरथएत्र है ॥ २८ ॥ जो गौरबणं इनका छोटा भराता है वह ॒वीरसम्मत शेष है जये राम नामवाे र्णी निरुपद्रव विष्णहप हं
ब्रह्नोवा्च ॥ आदिशक्तिस्सती देवी शिवा सा परमेश्वरी ॥ शिवमायावशीभूत्वा पगरच्छेत्थ शिवं प्रभुम् ॥ ३५ ॥ तदाक
वचस्सत्याश्शंकरः परमेश्वरः ॥ तदा विहस्य स प्राह सतीं लीलाविशारदः॥३द परमेश्वर ऽवाच॥ शरण देवि सति भीत्या यथा
कर उसने परमेश्वर शिते एता पूखा ॥ २५॥ शंकर परमशवर
वजी बोठे हे सती ! देवी मँ यथाथ कंहता हू तुम तुनो किं
नाभवाठे दोनों भाई वीरसम्भत है सयंवशमे उत्पन्न ||©
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वच्मि नच्छलम्॥ वरदानपभावाच प्रणामे चैवमादरात्॥२७॥ शसलक्ष्मणनामानौ भ्रातरौ वीरसम्भतो॥ घर्ंवशोद्धवौ देवि राज्ञो ||
दशरथात्मजौ ॥३८॥ गौखणौँ र्षु्ेषुश्शोषेशो रक्ष्मणाभिधः ॥ ज्येष्ठो रामामिधो विष्यः पूर्णाशौ निर्पद्रवः॥२९॥ अवतीर्ण ¢
क्षितौ साधुरक्षणाय भवाय नः ॥ इत्युक्ता विररामाऽसौ शंयुसछतिकरः प्रः ॥ ° ॥ शत्वाषीत्थं क्चशम्भोन विशश्वास ६
तन्मनः ॥ शिवमाया बलवती सैव जैकोक्यमोहिनी ॥ ४१॥ अविश्वस्तं मनो ज्ञात्वा तस्याश्शंयुस्सनातनः ॥ अवोचद्वचनं
चेति परथुर्कीकाविशारदः॥४२॥ शिव उवाच॥ श्रृणु मद्वचनं देवि न विश्वसिति चेन्नः ॥ तव रामपरिकषां हि कुर् त स्वया
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धिया ॥ ७३ ॥ विनश्यति यथा योहस्तत्छुह त्वं सति भिये ॥ गत्वा त्र स्थितस्तावद्रटे भव परीक्षिका ॥ ४४ ॥ ट
रसं. २ ॥३९॥ यह भूमिम साधुओंकी रक्षाकै निभित्त अवतार छे आये है यह कहकए जगत्कत शंकर मौन हुए ॥ ४०॥ शिवजीकै यह वचन सुनकर ठ्
सखद | भी सतीके मनये विश्ववास नही आया शिवजीकी भाया बडी बठ्वती है ओर सव छोकोंको ोहित करनेवाटी है।४१॥ शिवजी यह वचन सुनकर ह
अ०२.४ ६ हीको अविशवासयुक्त जानकर कीटा करनकी इच्छासे यह वचन कहे ॥ ४२ ॥ शिवजी वोठे हे देवि ! मेरे वचन घनो यदि तुम्हारे मनमे ट
(2)॥ दिशवास नहीं आता ह तो अपनी हु्धिते रामचन्द्की परीक्षा करो ॥४३॥ हे भिये! सती जिसपरकारसे तुम्हारा मोह नष्ट होजाय वैता करो मै तव वक ॥7
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ष्टकी छायाम स्थित होता हूं तबतक तुम जाकर परीक्षा छो॥ ४ ४।बह्नाजी बोरे शिवकी आज्ञासे दैश्वरी सती जाकर विचार करनेरुगी कि षर इन}
वनचारी रामकी परीक्षा किंसपरकार कह ॥४५। सीताका हप धारण करकै रामचन्द्रके समीप जाऊ यदि राम हरि होंगे तो भेरी बातको सब प्रकार |
जान जांयगे॥ ४ ६॥ इसभकार सीताजीका रूप धारणकर बहरामके समीप गदं ओर मोहपरायण होकर परीक्षाकी इच्छा की सतीका सीताका रूप देख |
शिवनाम जपते हूए इक्षवातको जान हँसते हुए प्रणामकर रामचन्द्रजी बोठे॥४७॥४<८॥ रामचन्द्र भोरे हे सती ! आपको प्रणाम है परमसे कहिये कि |
ब्रह्मोवाच ॥ शिवाज्ञया सती तत्र गत्वाचितयदीश्वरी॥ कुर्या परीक्षां च कथं रामस्य वनचारिणः ॥४७५॥ सीताश्पमहं धृत्वा ।
गच्छेयं रामसन्निधौ॥ यदि रामो हरिस्सव विज्ञास्यति न चान्यथा।४६॥ इत्थं विचार्यं सीता सा भूत्वा रामसमीपतः॥ आगम |
तत्परीक्षार्थं सती मोहपरायणा ॥ ०७ ॥ सीताङ्पां सतीं दृष्टा जपन्नाम शिवेति च ॥ विहस्य तत्पविज्ञाय नत्वावोचदघूदरहः |
॥७८॥ राम उवाच ॥ प्रेमतस्त्वं सति ब्रूहि क शंथुस्ते नमोगतः॥ एका हि विपिने कस्मादागता पतिना विना ॥४९॥ त्यक्ता
स्वरूपं कस्मात्ते धृतं शूपमिदं सति॥ ब्रूहि तत्कारणं देवि कषां कृत्वा ममोपारि॥५.०॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति रामवचः चत्वा चकितासी |
रसती तदा ॥ स्मृत्वा शिवोक्तं मत्वा चावितथं ललिता भृशम् ॥५१॥ रामं विज्ञाय विष्णुं तं स्वरूपं संविधाय च ॥ स्मृत्वा ।
शिवपदं चित्ते सत्युवाच प्रसन्नधीः ॥५२॥ शिवो मया गणेशैव पयन् वसुधां परथुः ॥ इहागच्छच्च विपिने स्वतः परे |
श्वरः ॥ ५३ ॥ अपश्यद््र स त्वां हि सीतान्वेषणतत्परम् ॥ सरक्ष्मणं विरिणं सीतया चछिष्टमानसम् ॥ ५४ ॥ |
शकर इस समय कहां है पतिके विना अङ्ेटी तुम वनमे क्यो आई हो॥४९॥हे सति! अपना ह्पछोडकर तुमने यह हप क्यों धारण किया 1
मरे उप छपा कके इसका कारण कहो ॥५०॥ ब्रह्माजी बोरे रामचन्द्रके यह दचन सुनकर सती बडी चकित हू ओर शिषे वचन स्मरण कर
बहुत ठजित हृद॥ ५१॥रामचन्दरको सक्षात् विष्णही जाना तब अपना प धारण कर चित्तम शिवजीको स्रणकर पप्तन हो सती बोडी ॥५२॥
मरे ओर गणोके सहित भूमिपयैटन करने शिषजी यहां आये ओर स्वतंन होकर पह परमेश्वर नमे विचरने रगे ॥ ५३ ॥ यहां उन्होने
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किया तुम सुञ्चको शीघरही संदेहरहित करके कल्याणको भप्त करो ॥ ५९ ॥ ब्रहलाजी बोरे सतीकै यहं वचनं सुनकर श्रीरामचन्द्र
हते प्रफुहित होगये ओर अपने भ्रमु शंकरको स्मरणकर उनके हद विशेष मेम हुआ ॥ ६० ॥ हे खने 1 सतीकी आज्ञाकं विना
शिवजीके समीप न गये ओर उक्त महिमाको वणन करते हृए शीराम सतते बोडे ॥ ६१ ॥ ॥ इति भीशिवमहापराणे भाषाटीकायां
शदरसहितान्तगेतद्वितीयसतीखेडे चतुर्विशोध्यायः ॥ २४ ॥ ॥ रामचन्द्र बोठे हे देवि ! प्रभकल्याणकारी शंकरने एक समय प्हठे प्रेमे परे॥>॥ `
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सीताके खोजनेमे तत्पर तुमको देखा कि सीताजीके विना ठक्ष्मणसहित तुम दुःखी हो रहे हौ ॥ ५४ ॥ तुमको प्रणाम् कर वह वटक भू
स्थित हो रहे है ओर आपकी वैष्णवी प्रशंसा कर रहे है ॥ ५५ ॥ आपको विना चतुरमून देखे हए भी वह बहुत प्रसन हए
इस निरमढ पको देखकर उन्होने बहुत आनंद माना है ॥ ५६ ॥ प्र शिवजीके वचनोँसे मेरे मनमें भरम हो गया, हे प 1
आज्ातते भँ आपकी परीक्षा ठेने आदं थी ॥ ५७ ॥ हे राम ! मेने अपक प्रभुता देखी आपको साक्षात् ष्ण जाना सन्देहरहित हो (५
हं हे महामते ! तो भी खुञ्ञे कुछ कहना है सो तुम सुनो ॥ ५८ ॥ आप यह बात श्त सत्य सत्य कहं किं शिवजीने आपको प्रणाम कं
नत्वा त्वां स गतो भूरे वटस्य स्थित एव हि ॥ प्रशंसन् महिमानं ते वेष्णवं परमं शद ॥५॥ चतुथज हार त्वा नो दष्ठैवं मुदि
तोऽभवत्॥ यथेदं रूपममलं पश्वननानंदमा्तवान्॥५९॥ तच्छत्वा वचनं शंभौभैममानीय चेतसि॥ तदाज्ञया परीक्षा ते कृतवत्य
स्मि राघव ॥ ५७॥ ज्ञां मे राम विष्णुस्त्वं हटा ते प्रयुताऽखिका ॥ निःसशंया तदापि तच्छ तवं च महामते ॥५८॥ कथ
प्रणभ्यस्त्वं तस्य सत्यं व्रूहिममाग्रतः॥ कुर् निस्संशयां त्वं मां शमलं प्ाप्ठहि इतम्॥५९॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्य वचस्तस्या
रामश्योत्छछलोचनः॥ अस्मरत्सव धु शं पेाभूदधदि चाधिकम् ॥६०॥ सत्या विनाज्ञया शंथुसमीपंनागमन्षुने ॥ संबण्यं महि
मानं च प्रावो चद्राषवस्सती् ॥६१॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ह्रसहितायां द्वितीये सतीखंडे शमपरीक्षाव्णनं नाम
चतुपिशोऽध्यायः॥२९॥ राम उवाच ॥ एकदा हि पुरा देवि शंधुः परमसुतिकृत्॥ विश्मक्माणमाहूय स्वलोके परतः परे॥१॥
नद्रके नेतर
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अषने लोके विश्वकर्माको बुलाया ॥ १ ॥ ओर उससे बडी भनोहर अपनी गोशाला बनवादईं ओर एक बडा मनोहर भदन ओर एकं परम
|| मनोहर तिंहासन बनवाया ॥ २ ॥ ओर बढा अदभुत परम भनोहर छच्रभी शिवजीने दिश्वकभासे गणेशजीके निमित्त बनवाया ॥ ३ ॥ ओर
। ृ्द्रादिकं संपूण देवताओंको बकाया तथा गण सिदध गथवं नागादि स्वको बुखाया ॥ ४ ॥ सव देवता ओर बक्षाजीके एको भी बुलाया
ओौर सव देवियं अप्सराओकि साथ अनेक स्थानो आई ॥ ५ ॥ देवता सिद्ध ऋषि तथा सपीदि यह सब आये ओर सोखह सोह कन्या
स्वधेबशालायां रम्य कारयामास तेन च॥ भवनं विस्ततं सम्यक् तञ सिंहासनं वरम् ॥२॥ तजच्छनं महादिव्यं सवैदाद्भतथुत्त
मस्॥ कारयामास विघ्नार्थं शंकरो विश्वकमेणा ॥३॥ शक्रादीनां चहावाश्चु समस्ताब् देवतागणान्॥ सिद्धगंधर्वनागाडपदेशां च
कृत्स्षशः ॥४॥ देवाच् सवांनागमां श्च विधि पुतरशुनीनपि॥ देवीःसवां अप्सरोभिर्नानावस्तुसमन्विताः ॥५॥ देवानां च तथर्षीणां
सिद्धानांफएणिनामपि॥ आनयन्मंगलकराःकन्याःषोडशषोडश ॥६॥ वीणाभदैगप्र्खवाययात्रानाविधान्घुने॥ उत्सवं कारयामास
|| वादयित्वा सुगायनेः॥७॥राजाभिषेकयोग्यानि द्रव्याणि सकलोषयेः॥ मत्यक्षतीर्थपाथोभिः पंचङंमाच प्रितान्॥<॥तथान्यास्सं
|| विधादिव्याआनयत्स्वगणेस्तदा ॥ ब्रह्मघोष महारावं कारयामास शंकरः ॥९॥ अथो इरि समाय वैङुंडत्भीतमानसः॥ तद्भक्ता
पूर्णया देवि मोदतिस्म महेश्वरः ॥ १०॥ सुहत महादेवस्त सिदासने वरे ॥ उपवेश्य हरि प्रीत्या भूषयामास सर्वशः॥११॥
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आदि ॥ ६ ॥ बीणा मृदंग आदि अनेक भ्रकारके बजे बजाने ठे ओर गायनाचार्यौछो लुखावा देकर उत्सव कराया गथा ॥ ७ ॥ राजाके
अभिषेक योग्य सब द्रव्य ओर ओषधी ओर तीथेके जछोके भरे हए पांच घट ॥ < ॥ तथा दृततरी भकारकी भी सव साभ शिवजीकेः
| गण छाये उस्न समय शंकरकी आज्ञासे बहघोष होने र्गा ॥ ९ ॥ तव वब प्रयते वैकुण्डसे श्रीहरिको बुखाकर हे देवि ! उनकी सद्धक्तिसे
॥ शकर बडे प्रसन्न हुए ॥ १० ॥ तव उतत शरेष्ठ खहूतेमै महादेवजीने उक्त शष्ट सिंहासनपर हरिको बेदाकर उनको भूषणोसे सजाया ॥ ११ ॥
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ह| कौतुक मंगल करके उनके महतकप्र सकट बाषा ओर बरहाण्ड मण्डप्म सवयं शंकरने उनको अभिषेक किया ॥१२॥ जौ ४ £
0६३ ¢ नहीं जाता बह सव॒ अपना एय शंकरने हरिको दिया ओर कतवतठ सवत्र परमेश्वर विष्णजीकी स्तुति करने रगे ॥ १३॥ ओर टोक ||
| कर्ता बह्मा जीसे इस प्रकारके वचन बोरे ओर भक्तवत्सठ स्वतन्त्र परमेश्वरने अपनी भक्तवत्सरता सर्वत्र व्याप्त करदी ॥ १४ ॥ शिवजी बटे ¢
हे छोकेश ! आप ओर सत्र रोक सुने आजे छेकर यह हरि ओरोको तो क्या मेरे भी वंदनीय हए ॥ १५ ॥ हे तात ! सव देवताओकि ¢
सहित तुम इन हरिको प्रणाम करो ओर यह बेदभी मेरी आश्ञासे इन हरिका यश वन करगे ॥ १६ ॥ रामचन्द्र बोढे रेसा कहकर शंकरने ~
आबदधरम्यघु्कटं कृतकौतकमंगलम्॥ अभ्यरषिचन्महेशस्तु स्वयं ब्रहमांडमंडपे ॥१२॥ दततवा्निखिकेश्व् यमजं नान्यगामि ||
यत् ॥ ततस्तुष्टाव तं शुस्स्वतरो भक्तवत्सलः ॥ १३ ॥ ब्रह्माणं लोककर्तारमवोचद्वचनं त्विदम् ॥ व्यापयन्स्वं वराधीनं
स्वत भक्तवत्सकः॥१४॥ महेश उवाच॥ अतः प्रभृति रोकेश मच्निदेशादयं हरिः ॥ मम वं्ः स्वय विष्णु्जातस्स्वश्थणोति ¢
हि ॥ १५ ॥ सरवदवादिभिस्तात प्रणम त्वमश्चं हरिम् ॥ वर्णयतु हरिं वेदा भमेते मामिवाज्ञया ॥ १६ ॥ राम उवाच ॥ इत्यु ¢
कत्वाय स्वयं ्द्रोऽनमद्रे गर्डध्वजम्॥ विष्णुभक्तिपसत्नात्मा वरदो भक्तवत्सलः॥१७॥ततो बरह्मादिभिर्देवेः सर्वहपसुरेस्तथा ॥
मुनिसिद्धादिभिशेवं वेदितोभुद्धरिस्तदा ॥१८॥ ततो महेशो हरयेशंसदिविषदां तदा॥ महावरान् सुप्रसत्रो धृतवान्भक्तवत्सलः
॥१९॥ महेश उवाच ॥ त्वं कतां सर्वलोकानां भता हरतां मदाज्ञया ॥ दाता धर्मार्थकामानां शास्ता दुनैयकारिणाम् ॥२०॥ \
गरुढध्वजको प्रणाम किया ओर भक्तवत्सरु शंकर विष्णकी भक्तिसे प्रसन्न वरदायक ए ॥ १७ ॥ तब उक्ष समय ब्रह्मादि देवता सनि स्व॑प
सिद्ध देवता सबने हरिको भरणाष किया ॥ १< ॥ तब शिवजी देवताओंके समक्ष विष्यजीकी बडाई करते हृए प्रसन्न होकर भक्तवत्सरताके ¢
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कारण विष्णको अनेक वरदान देनेगे ॥ १९ ॥ महेश्वर बोढे काप सव छोकोके कर्ता हरता मता भेरी आज्ञा होगे धर्मं अथं काम मोक्षके
देनेवाडे तथा अधर्मियोके शासन करनेवाठे होगे ॥ २० ॥
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|| ठम जगदीश जगत्य महाबल पराक्रमी होगे तुम युद्धम अजेय होगे ओर कभी युञ्चको भी अजेय होगे ॥ २१ ॥ सुकते दी हदं तम तीन शक्तियोको
ग्रहण करो तुम अनेक टीठाके करनेवाङे तीनों भुवनम प्रतापी होगे ॥२२॥ ह विष्णजी ! जो आपसे देष करेगे मेँ अद्य उनका शासन
ठ हे विष्णजी ! आपके भक्तोको मे अवश्य निर्वाणपद दंगा ॥ २३ ॥ ओौर जिस्षको कों देवता भेदन नहीं कर सकते उस मायाको भी आप्
मु्षसे ्रहण कीजिये जिससे मोहित हआ यह संसार अचिद्रूप होगा ॥२४॥ हे हरे ! तुम साक्षात् मेराही प हो यह विधाता मेरी दक्षिणभुजा
४ है तुम इन विधाताके उत्पादकं ओर रक्षक भी होंगे ॥ २५॥ भेरा हृदयजोश्रहैसो साक्षात मेही हं षह रुद्र तुमसे तथा ब्रह्मादि
जगदीशो जगत्पूज्यो महाबलपराक्रमः ॥ अजेयस्त्व् रणे कापि ममापि हि भविष्यसि ॥२१॥ शक्त्य गृहाण त्वमिच्छादि
£ ध्रापितेमया ॥ नानालीलाप्रभावत्वं स्वतैजत्वं भव्ये ॥२२॥ तवृदद्वष्टारो इरे सूनं मया शास्याः प्रयलनतः॥ त्वद्क्तानां मया
४ विष्णो देयं निर्वाणमुत्तमम् ॥२३॥ मायां चापि गृहाणेमां इःप्रणोयां सुरादिभिः ॥ यया संमोहितं विश्वम चिद्रूपं भविष्यति
६ रश्ढस्स एवां न संशयः ॥ पूज्यस्तव सदा सोपि ब्रह्मादीनामपि धुवम् ॥२६॥ अञ स्थित्वा जगत्सर्व पालय त्वं विशेषतः ॥
ट| नानावतारभेदेश्च सदा नानोति करभः ॥ २७ ॥ मम् रोके तवेद् व स्थानं च परमर्धिमत् ॥ गोरो इति विख्यातं
|| भविष्यति महोज्ज्वलम् ॥ २८॥ भविष्येति हरे ये तेऽवतारा वि रकषकाः॥ मदक स्तान् धृव र्ये प्रीतानथ निजाद्ररात्
॥ २९ ॥ राम उवाच ॥ असंडेशव्यमासाय दरेरित्थं दरस्स्वयम् ॥ कैलासे स्वगणेस्तस्मिन् स्वैरं करीडस्युमापतिः ॥ ३० ॥
पूज्य होगिं इमं सन्देह नहीं ॥२६॥ यहां स्थित होकर तुम सब्र जगत्की पारना करो अनेक अवतार धारण करके तुम भनेकं टीला करो
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॥ २९ ॥ मम बाहमदीयस्त्व दक्षिणोऽसौ विषिदरे॥ अस्यापि हि विधेः पाता जनितापि भविष्यसि ॥२५॥ इदयं मम यो ||
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विष्णजी । तुम्हारे जो अवतार पृथिवीम रक्षारूपसे होगे मेरे बरसे भरसन्न हुए मेरे भक्तजन अवश्य उनका दशन करेगे ॥ २९ ॥ रामचन्द्र
॥ ॥ २७ ॥ मेरे छोकमं तुम्हारा यह स्थान महासमृद्धिवाा होगा ओर यह प्रम उञ्ज्वर स्थान गोलोक नामे परसिद्ध होगा ॥ २८ ॥ ह||
बोटे इस प्रकार शंकरते विष्णजीने अखण्ड देश्वयं भप्त किया ओर कैरासषमे शिवजी उथाके साथ कीडा केने खगे ॥ ३० ॥
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हि*9० || || उती समयते कलापिन मौ गोपे पारण किया ओर गोप गोपौ वथा गौओोके रक्षक होकर आप वहां निवास करने कगे ॥३१॥ ओर प्रष्न हा
त विष्यनी सव जगतका पठन करने ठगे ओर शिक आज्ञासे अनेक अवतार धारण कर रक्षा करने ठगे॥ २२॥ इस् समय उसने शिवजीकी आज्ञास चार्
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` ॥१२४ प्रकारते अवतार धारण किया है वह मे राम ओर दृ कक्ष्मण ओर शत्रुर है॥ ३३॥हे देवि ! भँ पिताकी आज्ञा छक्ष्मण ओर सीताके सहित वनम
आया हूं ओर देवश दुःखी हुआ हं ॥३४।मेरी सीता भाया किरी निशाचरने हरटी है सो मन वरियोगी होकर भ्रातासहित उसको वनम खोजता हू
तदाप्रभृति रुक्ष्मीशो गोपवेषोभवत्तथा॥ अयासीत्तत् सुप्रीत्यागोपगोपीगवां पतिः ॥३१॥ सोपि विष्णुः प्रसन्नात्मा जगोप
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¢ निखिलं जगत् ॥ नानावतारस्संधतांवनकतां शिवाज्ञया ॥ ३२॥ इदानीं स चतुद्धाजावातरच्छंकराज्ञया ॥ रामों तच भरतो
लक्ष्मणश्शङ्हेति च ॥३३॥ अथ पिराज्ञया देवि ससीतारक्ष्मणस्सति॥ आगतोहं वने चाच दुःखितौ देवतोऽभवम् ॥३४॥
८ निशाचरेण मे जाया डता सीतेति केनचित् ॥ अन्वेष्यामि परियां चाञ विरही वधुना वने॥ ३५॥ दशनं ते यदि प्रापतं सर्वथा
& || कुशकंमम ॥ भविष्यति न संदेहो मातस्ते कृपया स॒ति॥३६॥ सीताभ्राप्तिवरो देति भविष्यति न संशयः ॥ तं इत्वा "खद्
| ` पापं राक्षसं त्दबुहात् ॥ ३७ ॥ मदृद्राग्य ममायेव यद्यका् कृषं युवाम् ॥ यस्मिन् सकक्णौ स्यातां स धन्यः पुरूषो
व्रः ॥ ३८ ॥ इत्थमाभाष्य बहुधा सुप्रण्य सतीं शिवाम् ॥ तदाज्ञया वने तस्मिन् विचचार रषृद्रहः ॥ ३९॥ अथाकण्यं
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सती वाकयं रामस्य प्रयतात्मनः ॥ इण्टाभूत्षा प्रशंसन्ती शिवभल्लिरतं इदि ॥ ९० ॥
॥ ३५ ॥ हे माता सति ! अब आपका दर्शन पाया है तो सदा कुशर होगी यदि आपकी छपा होगी तो सवथा मंगर होगा ॥३६॥ हे देवि ! ©
सीता भराप्िका बर प्राप्त होगा इसमे सदेह नहीं ओर उस दुःखदाईं राक्षस्रको म अर्ेश्य मागा इसमे संदेह नहीं प्र यह सब तुम्हारी कपासे ©
होगा ॥३७॥ मेरे आज बडे भाग्य है जो तुष दोनोँने छपा की जिसके ऊपर तुम दोनोंकी कपा हो वह परुष धन्य है ॥३८॥ इस भकार बहुत £
कुछ कहकर ओर सतीको प्रणामं करकै उनकी आज्ञा ठे रघुनाथजी वनम विचरने ठगे ॥ ३९ ॥ तव सतीजी जितेन्द्रिय रघुनाथजीके ॥2 |
| वचन सुनकर उनको शिवजीका भक्त जानकर हदयसे प्रशंसा करने र्गी ॥ ४० ॥ ओर अपना कमे जानकर हदयुमे बडा शोक
किया तब उदासीन ओर विवर्णं खले शिवजीके समीप गमन किया ॥ ४१ ॥ भार्म जाते हूए देवी वारंवार विचरे ठगी ने शिवजीके
वचन न मानकर रामचन््रके प्रति कुचेष्टा की ॥ ४२॥ अब शिवजीके समीप जाकर भँ क्या उत्तर दृगी रसा वारंवार विचारकर सती पछ
ताने ठगी ॥४३॥ ओर शिवजीके समीप जाकर उनको हदयसे भरणाय किथा शोके व्याकुठ्सुख होगई शरीरकी कांति जाती रही ॥ ४४॥
सतीको दुःखी देख शिवजीने कुशर पछी ओर पमस बोरे कहो किस भकारे परीक्षा छी ॥ ४५ ॥ शवक वचन सुनकर स्षतीने मस्तक
समृत्वा स्वकमं मनसाकार्षीच्छोकंसुविस्तरम्॥ प्रत्यागच्छदुदासीना विवणां शिवसप्निधौ ॥४१॥ अचितयत्पथि सा देवी संचरंती
पुनः पुनः ॥ नांगीकृते शिवोक्तं मे रामं प्रति कुधीः कृता ॥४२॥ किभुत्तरमहं दास्ये गत्वा शंकरसत्रिषौ ॥ इति संचित्य बहुधा
पश्चत्तापोऽभवत्तदा ॥४३॥ गत्वा शु समीपं च प्रणनाम शिवं इदा ॥ विषण्णवदना शोकब्याङला विगतप्रभा॥७४॥ अथ तां
दुःखितां दष्टा पप्रच्छ कुशलं इरः ॥ प्रोवाच वचनं प्रीत्या तत्परीक्षा कृता कथम् ॥ ४५ ॥ चत्वा शिववचो नाहं किमपि
प्रणतानना ॥ सती शोकविषण्णा सा तस्थौ तज समीपतः ॥.४६ ॥ अथ ध्यात्वा मदेशस्तु बुबोध चरितं हदा ॥ दक्षजाया
महायोगी नानालीटखा विशारदः ॥ ४७ ॥ सस्मार स्वपणं पूर्वं यत्कृतं हरिकोषतः॥ तत्पराथंतोथ ्दोसौ मर्यादाप्रतिषारकः
॥ ४८ ॥ विषादौभूत्प्रभोस्तत् मनस्येवसुवाच इ ॥ धम॑वक्ता ध्मकर्ता धर्मावनकरस्सदा ॥ ७९ ॥ शिवं उवाच ॥ र्या चेद
क्षायां हि स्नेह पूवं यथा महान् ॥ नश्येन्मम पणः श्युद्धो रोकलीखाबसारिणः ॥ ५० ॥
घकाछ्या ओर कहा कु भी परीक्षा न ठी यह कहकर शोकसे व्याकुल हो शिवजीके समीप स्थित हुईं ॥ ४६ ॥ तब शिवजीने ध्यान
करके सब चरित्र जान छिया महायोगी नाना टीटा करनेमं चतुर शिवजीने दक्ष दरुताका सब चरि जान छिया ॥ ४७ ॥ ओर अपना
पहा प्रण हरिके कोपसे समयका स्मरण किया जो मयौदाके भतिपालक रुदको अभीष्ट था ॥ ४८ ॥ शकरको उस्न समय बहुत विषाद
हुआ ओर धर्ेके वक्ता धमेके कतौ धर्मक रक्षकने मनम यह कहा ॥ ४९ ॥ शिवजी बोठे यदि भ दक्षकी कन्यास पूर्वत् लेह कल तो
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शिण्पु°
॥१३५॥
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लोकटीकाकी अदुसरण करनेवाटी मेरी भतिज्ञा भग होजायगी ॥ ५० ॥ ब्रह्माजी बोठे वेद धर्मे प्रतिपाटकं शकएने अपनी भतिजञा, नहीं
छोडी ओर बहुत भकारे हृदयमे विचारकर सतीको त्याग दिया ॥ ५१ ॥ इस प्रकार परमेश्वरने मनसे सतीक त्यागनकर् अपन प्तक
गमन किया ओर इस भेदको भकाश ने किया कारण कि परभु ह ॥ ५२ ॥ तब मार्गम चते हुए आकाशते बाणी हदं जिस वाणीकं सबने
ओर विशेषकर सतीने सुना ॥ ५३ ॥ आकाशंवाणी बोी हे परमेशान महायोगी महाप्रभु आप धन्य हो आपके समान त्रिटोकीर्े कोई
्रतिज्ञाकी रक्षा नही कर सकता ॥ ५४ ॥ बरहमाजी बोठे व्योमवाणी सुनकर सती शिवजीते पूछने लगी हे नाथ ! हे परमेश्वर ! आपने
बह्मोवाच ॥ इत्थं विचार्यं बहधा ददा तामत्यजत्सतीम् ॥ पणं न नाशयामास बेदधरमप्रपालकः ॥५१॥ ततो विहाय मनसा
सतींतां परमेश्वरः॥ जगाम स्वगिरि भेदं जगावद्धा स दि प्रथुः॥५२॥ चलेत पथि तं व्योमवाण्युवाच महेश्वरम् ॥ सवान् संश्रावयन्
तञ दक्षजां च विशेषतः ॥५३॥ व्योमवाण्युवाच॥ धन्यस्त्वं परमेशान त्वत्समोद्य तथा पणः ॥ न कोप्यन्यच्िरोकेस्मिन्
महायोगी महाम्रथुः ॥५४॥ ब्रह्मोवाच ॥ थत्वा व्योमवचो देवी शिवं फषरच्छ विप्रमा ॥ कं पणं कृतवात्नाथ ब्रूहि मे परमेश्वर
॥९९ ॥ इति पृष्ठोपि गिरिशस्सत्या हितकरः परुः ॥ नोद्राहे स्वं पणं तस्ये कदर्यग्रेऽकरोत्पुरा ॥५६॥ तदा सती शिवं ध्यात्वा
स्वपतिं प्राणवषछभम्॥ सर्व॑इुबोध हेतु तं परियत्यागमयं मुने ॥५७॥ ततोऽतीव ज्चुशोचाश्च बुध्वा सा त्यागमात्मनः॥ शंभुना दक्षजा
तस्मात्रिश्वसंतीश्हुहुः॥५८॥ शिवस्तस्याः समाज्ञायगपतं चक्रे मनोभवम् ॥ सत्ये पणं स्वकीर्याहि कथा बहरीरवदन् प्रभुः ॥५९॥
क्या प्रण किया है सो आप किये ॥ ५५ ॥ हित करके भी सतीने शकर पुछा तथापि शिवजीने बह्मा विष्णके आगे की हहं अपनी
प्रतिज्ञाको न कहा ॥ ५६ ॥ तव सतीने प्राणप्यारे अपने पति शंकरका ध्यान करके वह अपने त्यागसतम्बन्धी षव विषयको जान टिया
॥ ५७ ॥ तब अपना त्याग जानकर सती बडा सोच करने र्गी ओर वह दक्षसुता शिवजीके निमित्त वारंवार श्वास ठेनेठगी ॥ ५८ ॥
शिबजीने सतीके हदयमे अपनी भ्रतिज्ञा `णपूपसे प्रगट हदं विचारकर उसके मन॒ बहटानेको बहुतस्ती कथा कही ।। ५९ ॥
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इस प्रकार अनेक कथा कहते हृए सतीके साथ कैसे पहुचे ओर वहां स्थित हो समाधी गाय अपने निजरूपका ध्यान करनेरुगे॥६०॥
ओर सती महा्याकृक हो वहां स्थिति करनेखगी हे सने ! शिवाशिवक इस ॒चरित्रको वहां किसीनेभी नहीं जाना ॥ ६१ ॥ हे महासने । 8
|| दोनोंके इस प्रकारमे वहां महासमय उ्यतीत होगया इस प्रकार टोकटीखा करनेके कारण वह देहं धारणकर चरित्र करनेरगे ॥ ६२ ॥ जब
भगवान, शकरने समाधी त्यागी तब यह जानकर सती उनके समीप गई ॥ ६३ ॥ ओर व्याकु हदयसे देवीने उनको प्रणाम किया उदार-
सत्या प्राप स कैलासं कथयन् विविधाः कथा ॥ वरे स्थित्वा निजं ख्पं दधौ योगी समापिभृत्॥६०॥ तञ तस्थौ सती धाभ्नि
महाविषण्णमानसा॥ न बुबोध चरि तत्कशचि्च शिवयोशने॥&१॥ महान्कालो व्यतीयाय तयोरित्थं महासुने॥ स्वोपात्तदेदयोः
प्रभ्वोर्लोकलीराबुसारिणोः ॥६२॥ ध्यानं तत्याज गिरिशस्ततस्स परमातिंहत् ॥ तज्ज्ञात्वा जगदंबा हि सती तत्राजगाम सा
॥ &३॥ ननामाथ शिवं देवीददयेन विदूयता॥ आसनं दत्तवाञ्शंमुः स्वसम्थुख उदारधीः॥६४॥ कथयामास सुप्रीत्या कथा
बहीमनोरमाः ॥ निश्शोकां कृतवान् सदयो खीला कृत्वा च तादृशीम् ॥६३५॥ परव॑वत्सा सुखं रेभे तत्याज स्वपणं न सः॥ नेत्या
अयं शिवे तात मंतव्यं परमेश्वरे॥६६॥ इत्थं शिवाशिवकथां वदन्ति अनयो अुने॥ किरु केचिदविद्वांसो वियोगश्च कथं तयोः
॥ &७ ॥ शिवाशिवचस्त्रं को जानाति परमार्थतः॥ स्वेच्छया कीडतस्तो हि चस्ति इश्तस्सदा ॥ ६८ ॥
दधि शंकरने उनको अपने सन्सुख आसन दिया ।॥ ६४ ॥ ओर भरमसे बहुतसी मनोरथ कथा सुनाई ओर वैसी खीला करके तीको शीघही
शोकरहित करदिया।६५।। ओर सतीको पूवंवत, सुखभ हभ मानो शंकरने अपनी भतिक्ञा छोडदी हे तात! परमात्मा शिवे यह ससक वयापारका
कोद आश्वये नहीं है ।। ६६ ॥ हे सने ! खनिजन इस भकारे शिवाशिवकी कथा कहते है अविद्वान, ही उनका वियोग कहते ह ॥ ६७ ॥
परमाथसे शिवाशिवके चरितरको कौन जान सकता है वे दोनों अपनी इच्छसे क्रीडा करतैहुए चरित करते है ॥ ६८ ॥
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वन्वन ~
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शि०अ० ||| सती ओर शेव सदा वाणी ओर अथके समान मिहे हृष है उनके वियोगकी फिर संभावना कहां जो कुछ उनका इच्छा है सोई होता है
।१३६॥||&||॥ ६९ ॥ ॥इति श्रीशिवमहाऽराणे भाषादीकायां सदसंहितान्तगेतद्वितीयखण्डे पंचविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी बोटे पूर्वकाटमे प्रयाग
¢
राजमे एकतर हए खनिजनोंका एक महान् यज्ञ हुजाथा ॥ १ ॥ वह सिद्ध प्रमि रिं सनकादिक प्रजापति ब्हज्ञानी देवता एकत्रित हए ||
चे ॥ २॥ रँ भी.अप्ने परिवारके सहित वहां उपस्थित हभ था निगमागम सूति धारण किये मेरे संग थे ॥ २॥ उत्सवके सहित उनका वहं ||@||
वागर्थाविव संपृक्तौ सदाखल सतीशिवौ ॥ तयोविंयोगस्संभाव्यस्सं भवेदिच्छय् तयोः ॥६९॥ इति श्रीशिवमहापराणे द्वितीयायां
रूदरसहितायां द्वितीये सतीखंडेसतीवियोगो नाम षैचविंशोऽध्यायः॥२५॥ ब्रह्मोवाच ॥ पराभव स्वैषामध्वरो विधिना महान् ॥ ४
प्रयागे समवेतानां नीनां च महात्मनाम् ॥१॥ तत्र सिद्धास्समायातास्सनकाबस्परषैयः ॥ सप्रजापतयो देवा ज्ञानिनो ब्रह्मद ४
शिनः ॥२॥ अहं समागतस्त्र परिवारसमन्वितः ॥ निगभेरागभेथु्तो मतिमद्धिषैदापभेः ॥३॥ समाजोभद्िचिभ्रो दि तेषासुस ¢
वसंुः॥ ज्ञानवादोऽभवत्त् नानाशाघ्चसश्ुद्वः॥४॥ तस्मिन्नवसरे रदस्सभवानीगणः प्रभुः ॥ भरिलोकदितक्ृत्स्वामी तजागात्घू
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्तिकरन्धने॥५॥ द्वा शिवं सुरास्सवे सिद्धाश्चषुनयस्तथा॥ अनस्तं पथं त्तथा ठष्टुड५ तथा ह्यहम् ॥६॥ तस्थुश्शिवाज्ञया ट
सँ यथास्थानं शुदान्विताः॥ प्रथुदशनसंत्ठाः वणैयन्तो निजे विधिम् ॥ ७ ॥ तस्मिन्नवसरे दक्षः प्रजापतिपतिः प्रभुः ॥ ट
आगमत्त् सुप्रीतस्युवचस्वीयदच्छया ॥ < ॥ ठ
विचित्र समाज ह वहां अनेक शाजलोका ज्ञानवाद उपस्थित हुआ।।४।। ऽस समयमे भवानीपति रुदभी अपने गणोको साथ षिथि त्रिकोकीका हित |
ओौर पाटन करनेवाठे यहां आपे।।५॥ शिबजीको देते ही सब सिदध देवता ऋषि ओर खनि अपना भमु मानकर प्रणाम करतेहुए ओर भ भक्ते ४
हुति करनेकगा ।।६॥ तब शिवजीकी आज्ञासे सव कोई अपने स्थानो स्थित हए ओर प्रुके दुर्शनसे संतुष्ट होकर सब कोद अपने भाग्धको ॥
सराहना करनेरगे 1\ ७11 उसी समय प्रजापतिययोकेभी पति बहातेजस्वी दक्षजी प्रसन्नतापवंक अपनी इच्छापे वहां आये ॥ < ॥ >
स.खं.२
अ०२६
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रुभ्ृ.र
बह्ञाण्डके अधिपतिके मान्य तत्ते बहिर्युख अभिमानी दक्षजी केवट सचही पणाथकर बेरी आज्ञासे वहां बेठगये।। ९ ॥ उस समय सब देवता ऋषियेनि उन
सुति भौर भणामि भतिष्ठा की ओर पुजाकर नघ्रहो हाथजोढ शसा की ॥ १ ० ॥ परन्तु अनेक पकारकी टीखाविहार कएनेवाठे पर
अस्वतं् महेश्वर अपने आसनपर वेदे रहे उन्होने दक्षजीको भणाम नहीं किया॥ १ १। तब शिकजीको णाम करता हुआ न देखकर भेरा एत्र दक्च बडा अभरन
हआ ओर शिवजीप्रबडा कोष किया॥ १२. ॥ ओर महागरवे रदिते शिवजीको देसते ए ज्ञाने रहितो सबको सुनाते हए दक्षजीने कहा ॥ १३
मां प्रणम्य स दक्षो हि न्युष्टस्तवमदाज्ञया॥ ब्रहमाण्डाधिपतिर्मान्यो मानी तच्वविुखः ॥९॥ स्तुतिभिः परणिषातेश्च दक्ष
स्सर्वैस्पुरषिभिः ॥ पूजितो वरतेजस्वी करौ बध्वा विनब्रकैः ॥१०॥ नानाविहारज्ब्ना थस्स्तर्ततर षरमोतिकृत्॥ नानामत्तं तदा
दक्षं स्वासनस्थो महेश्वरः ॥११॥ दष्टाऽनतं हरं तज स मे पएरोऽप्रसन्रधीः॥ अङ्खपत्सदसा शदे तदा दक्षः परजापतिः ॥ १२ ॥
इूरदष्टया _महागवो दक्षा र्द महाप्रभुम् ॥ सर्वान्संश्रावयन्वुजैरवो चज्ज्ञानवजितः ॥१३॥ एते हि सवे च सरास॒रा भश
नमंति मां विप्रवरास्तथषैयः ॥ कर्थं ध दुजनवन्महामनास्त्वभूच यः प्रेतपिशाचसंबृतः ॥ १७ ॥ श्मशानवासी निरपत्रपो
हययंकथं परणामं नकरोति मेऽधुना॥ छुप्तक्रियो भ्रूतविशाचसेरषतो मत्तोऽविधो नीतिविदूषकस्सदा ॥१५॥ पाखंडिनो दुजंनपाप
शीला दष्टा द्विजं प्रोदढतनिदकाशच ॥ बध्वां सदासक्तरतिप्रवीणस्तस्मादश्ं शप्तुमहं प्रवृत्तः ॥१६॥ बरह्मोवाच॥ इत्येवसुक्रा
स महाखरस्तदा शूषान्वितो शुदरभिद श्मवोचत ॥ शृण्वत्वभी विध्रवरस्तथा सरा वध्यं हि मे चाहंथ कतैमेतम् ॥ १७ ॥
दश्च बे यह सब सुर अमुर नाह्लण ऋषि सुज्ञे देखकर सव परणामं करते है परन्तु यह मेव पिशा चते आत सहा भानी दुजनके समानक भकारसे
स्थित रहे॥ १४॥ इत श्यशानसेवी निरज करियाहीन भूतपिशाचोसे सेवित सतवाछे विधिहीन नीतिके विडषकने सने प्रणाम क्योनहीं किया ॥ १५॥
पासंडी दुज॑न पापशीठ ब्राह्मणकी निंदा करनेवाठे सदा वधूर्मे आसक्त रति भवीण होने थँ इनको शाप देने निमित त्तहोता हू ॥ १६॥ बह्ाजी बोरे
यह कहकर महादुषट भरजापतिने क्रोध करके ुदरके परति यह वचन कहे हे बाह्णो ! देवताओ ! सव सुनो यह सुने वध्य होनेके योग्य है ॥ १७ ॥
७३
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| दक्षनी बो इन रको न ते बाहर किया, वणोपिभी बाहर ह विवणंरप है यह आजे देवताओं मध्यमे भाग न पावगे कारण कि यह श्मशानवासी ||
॥१३७॥ ||| ढजन्मते हीन ह ॥ १८ ॥ ब्रहाजी बोढे मूयभादि बहते ऋषि दक्षजीके यह बचन सुनकर देवताओोके समान रको ५ निदा करने ||
¢ लगे ॥ १९ ॥ प्र नदी भरजापतिके वचनो छाठ आंख होई ओर वह भ्रष्ठ गण दक्षको शाप देतेहुए बोडे ॥२०॥ शवर बोठे अरे शठ ¢
|| महाम दक्ष दुषटमति ! तैन मेरे स्वामी महेश्वरको यज्ञस बाहर किंभ्कारण किया॥२१ ॥ जिनके स्मरणमाते यज्ञ सफठ होतेह तीथं पवित्र होतेह उन ठ
|| ॥ दक्ष उवाच ॥ ॥ शरौ घय यज्ञबदिष्कृतो मे वर्णेष्वतीतोथ विवणहपः॥ देवेन भागं रभतां सदैव श्मशानवासी कक्जन्म ¢
|£ दीनः ॥१८॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ इति दकषोक्तमाकण्यं भृग्वाद्या बहवोजनाः ॥ अगहयन् इ्टसत्त्वं रुदं मत््वामरस्समम् ॥१९॥ ||#
¢ नन्दी निशम्य तद्वाक्यं कोलाक्षोतिङ्षान्वितः॥ अनरवीत्तरितंदक्षं शापं दातुमना गणः ॥२० (१ उवाच ॥ रेरेशठ महा ¢
¢| शूट दस इष्मतेत्या ॥यजञवहयो हि म सवामी महेशो दिकृतः कथम् ॥२३॥ ल्म रमरणमानिण भवति सपा मलाः ॥ ||9
> तीर्थानि च पवित्राणि सोयं शप्तो हरः कृथम् ॥२२॥ वृथा ते ब्रह्मचाषल्याच्छक्ोय दक्ष दुर्मते ॥ वृथोपहसितभ्वादुो खो महा
|| प्रभुः॥२३॥ येनेदं पार्यते विशव ्ष्टमंते विनाशितम्॥ शप्तोय स कथ श्द्रौ महेशो ब्राह्मणाधम ॥२४॥ एवं निभत्सितस्तेन नन्दिना ©
ट| दि्रनापतिः॥ नन्दिने च शशापाथ दक्षो रोषसमन्वितः॥२८॥ दक्ष उवाच॥ यूं सरव ङ्रगणा वेदबाह्या म्वतुवे॥बेदमार्गपरित्य ||
, | क्तास्तथातयक्ता महपिभिः॥२६॥ पालंडवादनिरताः शिष्टाचारबरिष्कृताः॥ मदिशपाननिरता जटाभर्मास्थिधारिणः॥२७॥ |£
हत. २ || शकरको तुमने शाप दिया॥ २२॥ हे दुभति दक्ष ! बह्मचपठतासे तुमने शकरको ब्रेथाही शाप दिया इन सरल महाभमु र्रका दृथाही तूने उपहास किया ||
स.सं.२ ||2॥|| ॥२३॥ जो इस जगतको पारुनकर सुष्टिके अंते दिनाश करते है हे बाह्णणाधम ! उन रुक तुमने कैसे शाप दिया ॥२४॥ इसभकार जन नंदीने भजा ||
अ०२६् || परतिकी भर्वन की तब करोधकर दक्षने नंदीको शापदिया ॥२५॥ दक्ष बोढा तुम सब रुदरके गण वेदसे बाहर होगे वैद ओर महार्ियोपि तुम त्यागे #।
२ जाओगे ॥ २६ ॥ पाखण्ड बादमं निरत शिष्टाचारे हीन मदिरापान करनेवाडे जटा भस्म ओर अस्थियोके धारण करनेवाठे होगे ॥ २७ ॥॥/2
ग 2 वव 2
बह्माजी बोले जब इतपभकार दक्षने शिवको किंकरो शाप दिया तव शिवके भिय नन्दी यह सुनकर महाक्रोधित हुए ॥ २.८ ॥ ओर उस्
वमण्डी महादुष्ट क्षपे शीघतापूर्क शिङादपुत्र शिवके प्रिय नन्दीने कहा ॥ २९ ॥ नन्दीश्वर बोठे रे शढ दुखुदधि दक्ष ॥ शिवकै तको न ||#
जाननेवारे तेने बह्मचपरतासे पृथाही शिक्कै किंकरोको शाप दिया ॥ ३० ॥ दुष्टचित्तवाठे भृ आदि जनो हंसी कराई बाह्मणलकै अहका
रसे महाप्रभु महेशानका निरादर किया ॥३१॥ जो सु्रसे विख तेरे समान खल बाह्मण है शुद्रकै तेजके परभावसे म उनको शाप देता हू॥ ३२॥
वेदवाद्े रत होकर भी तुम वेदका तत्व न जानसकोगे ओर तुम निरन्तर
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति शप्तास्तथा तेन दक्षेण शिवकिंकराः ॥ तच्छरत्वातिरूषाविष्ठोभवत्नदी शिवप्रियः ॥२८॥ व पक्षं
` गवितं तं महाखलम्॥ शिलादतनयो नंदी तेजस्वी शिववदछभः॥२९॥ नन्दीश्वर उवाच॥ रे दक्ष शठ दुध वृथेव शिव्किकराः॥
शप्तास्ते बरह्मचापटयाच्छिवतत्वमजानता ॥२०॥ भृग्वायेष्टचित्तेश् मूढेसस उपहासितः॥ महा प्रधुमहेशानो बराह्मणत्वादहमते
॥२१।ये सुद्रतिषुखाश्चाच ब्राह्नणास्त्वादशाः खलाः॥रुढतेजःपरभावत्वाततेषां शापं ददाम्यदम्॥३२॥ वेदवादरता यूय वेदतत्तवब
दिषुखाः ॥ भरव॑तु सततं विद्रा नान्यदस्तीति वादिनः॥३२३॥ कृमात्मानस्स्व॑गीषराः करोधलोभमदान्विताः॥ भवंतु सततं विप्रा
भिक्षुका निरपत्रपाः॥३४॥ वेदमा पुरस्कृत्य ब्राह्मणाश्शुदरयाजिनः ॥ दारिद्रा वै भविष्यंति प्रतियदरतास्सदा ॥३९५॥ असत्परति
ओर कुछ नहीं है देषा कहनेवाटे होगे ॥ ३३ ॥ केवट
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गदाश्ैव सवं निरयगामिनः भवष्यति सदा दक्ष केचिद बरह्मरा्षसाः॥२६॥ यश्व सुरसामान्यशुदिश्य परमेश्वरम् ॥ ्र्यत्यजो ९
दु्टमतिस्तत््वतोविुखो भवेत् ॥३७॥ कूट धमे गदेषु सदा राम्यसुखेच्छया।। कमत वितता वेदवादं च शाश्वतम् ॥३८॥
कामनातेही अनुष्ठान करनेवाठे स्वगेपरायण क्रोध छोभ मदसे युक्त होगे ओर भिक्षा मांगनेवाले रुज्जारहित होगे ॥ ३४ ॥ वेदार्गको आगे
करक बाह्ण शूद्रको यज्ञ करावोगे ओर सदा कुदान ठेनेवाठे द्री होगे ॥ ३५ ॥ अस्षसरति्रह ठेनेकै कारण नरकगामी होगे हे दक्ष !
इनम कोई २ ब्रह्मराक्षस होंगे ॥ ३६ ॥ जिन शिवजी परमेश्वरको तुम देवताओं सामान्य देव जानते हो उनसे जो दुष्टमति दोह करेगा वह
तत्वे विख होगा ॥३७॥ यह शिवजीके द्रोही कूटधमम तत्पर घरमे पड हुए राम्पुखकी इच्छा करगे कर्मतंजमे कगे हुए बेदवाद् करेगे॥ ३८<॥
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शिण) इसके आनंद नष्ट होजायंगे अपनी गति भूकजानेसे पसुहूप भायः होजायगा कम नीतिसे विखल होनेे शीरही दक्षका वकृरेका मुख होजायगा॥ ३९॥
॥१३८॥ | जिस मय नदीने रोष करके बाह्णको शाप दिया उस समय हाहाहाकार मचगया जन कि दक्षे मौ शकरको शाप दिया ॥४०॥ यह नकर
ठ मैनेदक्ष आदि तथा दूसरे बाह्मणभय॒ आदिकी निन्दा की किं बेद ओर शिवतत्व जानकरभी रेसा किया॥४१॥ शकर नैदीकै यह बचन सुन हंसते
र हुए उसको समश्चाते हृएयह बोटे॥४२।सदाशिव बोठे ह महाभाज ! हें नंदि ! तुमको क्रोध नहीं करना चाहिये भ्रभसे य॒ञ्चको शाप दता |
¢ विनष्टानंदकसखो विस्मृतात्मगतिः पञ्चः ॥ अ्षटकर्मानयसदा दक्षो बस्तश्चसोऽचिरात् ॥ ३९ ॥ शप्तास्ते, कोपिना तत्र
¢ नंदिना ब्राह्मणा यदा ॥ हाहाकारो महानासीच्छप्तो दक्षेण चेश्वरः ॥ ° ॥ तदाकण्यामहत्यतमनिद॑तं शुड्डः ॥ भृग्वादी
ह नपि विरा वेस्ट शिव तत्त्ववित् ॥ ४१ ॥ ईश्वरोपि वचः त्वा नंदिनः प्रदसश्निव ॥ उवाच मधुरं वाक्यं बोधरथसतं
सदाशिवः ॥४२॥ सदाशिव उवाच॥ शृणु नंदिन् महाप्राज्ञ न कत कोधमरहसि॥ वृथा शपो ब्रहमकृलो मत्वा शप्तं च मा मात्
¢ ॥४३॥ वेदो मेचाक्षरमयस्साक्षातघुक्तमयो भृशम् ॥ सुकते प्रतिष्ठितो द्यात्मा सवंषामपि देहिनाम् ॥ ४४ ॥ तस्मादात्मविदो
नित्यं त्वं मा शप ङषान्वितः॥ श॒प्या न वेदाः केनापि दु्दंयापि कृदाचन ॥४९॥ अं शप्तो न चेदानीं तत्त्वतो बोद्धुमहसि॥
४ शान्तो भव महाधींमन् सनकादिविबोधकः॥४६॥ यज्ञोह यज्ञकमांहं यज्ञांगानि च सर्वशः॥ यज्ञात्मा यज्ञनिरतोयज्ञबाद्योहमेव
ह| वै ॥४७॥ कोयं कस्त्वमिमे के हि सवोहमपि तत्वतः इति बुद्धया दि विश बृथा शपतास्त्वया द्विजाः ॥४८॥
₹.सं. २ ||| देखकर तुमने बहकुकको वृथा शाप दिया ॥४३॥ वेद बेत्रक्षरमय है वह साक्षात् शक्तमयहै ओर सकतमे स देहधारियोकी आत्मा तिष्ठित है
त् सं.२||९||॥ ७४ ॥ इष कारण आलज्ञानी होनेके कारण तुम कोधकरशाप मतदो किन्त दुषदधिसे भी कभी वेद शापित नहीं होसकते॥४१५॥ तुम तत्वसे
अ०२६ || || जानसकतेहो फि भै शापित नहीं हो सकता हे उद्धिमान्। तुमने सनकादिकोको बोध दियाहै इसे शान्त हो ॥४६॥ यक्ष,यज्ञके कम, यज्ञके भग,
॥ || यज्ञात्मा यज्ञम निरत, यज्ञे बाह्य, सब भेँही हूं ॥ ४७॥ यह तुष सव कौन हो तत््वसे विचारो सव मही द फती बुद्धिस विंचारकरनेसे विदित,
म ५04 > 49८ 94 +> 09
ससौ
होगा कि बामणोो इथा शाप दिया ॥ ४८ ॥ तततक्ञानते इस भपंचकी बातको जानकर तुम शत होजाओ हे महाबुदिवाडे । कोष छोड
कृर सवस्यहो ओर इत बातको समञ्ञो ॥ ४९ ॥ बह्ञाजी बोे जव॒शिवजीने इस धकारे नन्दिकैश्वरको समक्ञाया तव वे परज्ञानको भा
¢ होकर कोष त्याग शान्त हृए ॥ ५० ॥ इत प्रकार शिदजी अपने भाणव्यारे गणको समज्ञाकर पसननतापूेक गणो सहित उत स्थानसे चे
¢ | ॥ ५१ ॥ इधर दक्षजीमी कोधे मेहर बाह्णोंके सहित मनम शिवका द्रोह करकं उञ स्थानसे _अपृने स्थानको चे आये ॥ ५२
इस भरकर रुदरको शाप देकर प्रम कोधर्मे भरकर दक्ष भ्रद्धाको त्याग सूढताके कारणं शिवके पूजकोकी निन्दामे तत्पर इए ॥ *\३ ॥ हे
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ट| त्चज्ञानेन नित्य भरपचरचनो भ्॥ डुसस्वस्थो महाबुद्धे नन्द् ोधादिवूजितः ॥४९॥ ॥ बरह्मोवाच॥एवं रनोधितस्तेन ||
|| शम्भुना नन्दिकेश्वरः ॥ विवेकपरमो भूत्वा शांतोऽधूत्कोधवजितः ॥ «° ॥ शिबोपि तं भरबोध्याञ्च सगण प्राणवद्भम् ॥ ए
स॒गणस्सययौ तस्मासस्वस्थानं भ्रणदान्वितः ॥ ५१ ॥ दक्षोपि स रूषाविषटस्तेदरिजेः परिवारितः ॥ स्वस्थानं च य॒यौ चित्ते 2
शिवद्रोहपरायणः ॥ ५२ ॥ शरं तदानीं परिशप्यमानं संस्मृत्य दक्षः परया रुषान्वितः ॥ शरद्धां विहायैव स भूढबुदिनिदाप |©
रोभूच्छिवपूजकानाम् ॥ ५३ ॥ इत्युक्तो . दकषदुबद्िश्शंयुना परमात्मना ॥ परां इधिषणां तस्य “णु तात वदाम्यहम् |©
॥ «8 ॥ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शदरसंदितायां द्वितीयखण्डे सत्युपाख्याने शिवेन दक्षविरोधो नम षड़् ||@
४ विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एकदा त॒ खन तेन यज्ञः भारंभितो महान् ॥ ताहूतास्तदा सवे दीक्षितेन स॒रषयः
॥ । ॥ महषेयोऽखिलास्त निजंराश्च समागताः ॥ यद्यज्ञकरणाथ हि शिवभायाविमोहितः ॥ २ ॥ ए
|| वात दुबद्धि दक्षजीकी यह धृष्टता शकरके भ्रति वणन की अब जौ उनकी धर्षणा शं रक द्वारा इई उसको तुम श्रवण कंरो ॥ ५४ ॥ इति
९ ड तु इ
¢ भ्रीशिवमहाएराणमाषारीकायां व 1 शिवदक्षविरोधो नाम दटदूविंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ ब्रह्माजी बोरे हे नारदजी !
| एक समय उस दक्षने एक महान् यज्ञका आरंभ किया ओर दीक्षा ठेकर सब शहषियोको बुखाथा ॥ १ ॥ शि हि
‰॥ देवता ओर ऋषि उक् स्थानमे यञ्च करानेके निमित्त आये ॥ २ ॥ प ६
शि०पुर
॥१३९।
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अगस्य, कश्यप, अत्रि, वामदेव, भृ. दधीचि, भगवान् व्यास्त, भरद्वाज, गौतम, ॥२॥ पेठ, पराशर गगं भागेव, ककुपसितः घुमंतु, त्रिक; कक, ्
पायन॥४।इनको आदि ठेकर ओर भी बहते खनि रसन होकरभाये यह सव मेरे एव्र दक्षे यज्ञं जी ए्ोसहित आये ॥५॥ इसी भकार् ओर सव
देवता छोकपाक आदि इसीभकार दूसरदेवता उपकरण तथाबल्े संपन्न आये ॥६।सत्यटोकते भाथैनाकर स्च विश्वसष्टाको भी बुलाया प्रपिार ओर
मूतियुक्त वेदशा्ञादि संयुक्त म भआया॥७॥ ओर बडे आदर प्ा्थनाकर वैकुंठे विष्णनीको बकाया वहमी अपने पाषेद् परिवारयुतं वैके यज्ञम आये
अगस्त्यः कश्यपोत्रिश्च वामदेवस्तथा भगः ॥ दधीचिर्भगवान् व्यासो भरद्वाजोऽथ गौतमः ॥ ३॥ पैलः पराशरो गर्गो
भार्गवः ककुपस्सितः ॥ स॒मत॒तिककंकाच वैशंपायन एव च ॥ ४ ॥ एते चान्ये च वहवो शुनयो हर्षिता ययु ॥ मम पुरस्य
दक्षस्य सदारास्सशुता मखम् ॥ & ॥ तथा सवं सुरगणा लोकपाला महोदयाः ॥ तथोपनि्जरास्सवें स्वापकारवान्विताः
॥ & ॥ सत्यलोकातसमानीतो उतोहं विश्वकारकः॥ सख॒तस्स परीवारो मूतवेदापिसयुतः ॥ ७ ॥ वैङुटञ्च तथा विष्णुस्सं
पराथ्यै विविधादरात् ॥ सपारषदपरीवारस्समानीतो मखं भ्रति ॥ ८ ॥ एवमन्ये समायाता दक्षयज्ञं विमोहिताः ॥ सत्कृता
स्तेन दक्षेन सवं ते हि इरात्मना ॥ ९ ॥ भवनानि महार्हाणि सुप्रभाणि महांति च ॥ त्वषा कृतानि दिव्यानि तेभ्यो दत्ता
नि तेन वै ॥ १० ॥ तेषु सवेषुधिष्ण्येषु यथायोग्यं च संस्थिताः ॥ सन्मानिता अराजंस्ते सकला विष्णुना मया ॥ ११ ॥
वर्तैमाने महायज्ञे तीर्थं कनखले तदा ॥ ऋत्विज कृतास्तेन भृभ्वाद्याश्च तपोधनाः ॥ १२ ॥ अधिष्ठाता स्वयं विष्णुस्सह
सवेमरूहणेः ॥ अहं तत्राऽभवं ब्रह्मा अयीविधिनिदशंकः ॥ १३ ॥ .
॥<॥ ओर भी बहुतसे महात्मा मोहित होकर दक्षके यज्ञमे भये ओर उस दरोहीदक्षने उन सवका सन्भान किया॥ ९॥ बडे २ प्रकाशमान भवन विश्वकर्मा
बनाये उनके रहनेको दिये ॥ १० ॥ उन स्थाने देता आदि संभानित होकर भेरे ओर दिष्णजीके सहित विराजमान हए ॥ ११॥ जिस समय वह
महायज्ञ कनसर तीथे भारभ हुआ उस समय तपस्वी भुयआादि उस्म ऋषिर् हुए ॥१२॥ ओर सव मरुदरणोके सहित विष्यजी उत्तमे अधिष्ठाता
4" > 44 4 0 4 आय 4 > 4-९-46 पे९-4
9
हृए ओर वेद्रयीकी विधि जाननेवाछा यँ उस यज्ञम बरहा हमा ॥ १.३ ॥ इती भकार सव दिक्पा दवारपाररूपसे रक्षक हए वे आयुष छि
हूए परिवार सहित कृतृहटम तत्पर थे ॥१४॥ उस यज्ञम यज्ञ भी अपने स्वहपसे स्थित हुआ सव महाखुनि स्वयं वेदधारी हुए ॥१५॥ अशने
भी अपने सहसरंरूप धारण किये ओर उस बहाउत्सववाटे यज्ञम आहूति रहण करने कगे ॥ १६ ॥ अढासी सहस ऋषि अ्चिमं आहुति देते
धे चौसठ हजार ऋषि उस यज्ञम उद्राता थे ॥ १७ ॥ इतनेही अध्वयुं ओर होता थे ओर नारद आदि सपतक्रषि पृथक् पृथक् गाथा करते थे
॥ १८ ॥ गंधं विद्याधर सिद्धोके समूह आदित्यगण यज्ञोँके गण समस्त संख्यावाठे नाग समस्त चर दक्षने अपने यज्ञे वरण किये ॥१९॥ £
तथेव सर्वदिकृपाला द्वारपाला रक्षकाः ॥ सायुधास्सपरीवाराः कुतुहलकरास्सदा ॥ १४ ॥ उपतस्थे स्वय यज्ञस्ुहूपस्तस्य
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चाध्वरे ॥ सवे महाधुनिश्रेष्ठाः स्वयं वेदधराऽभवन् ॥१५॥ तन्रूनपादपि निज चक्रे हपं सदस्रशः॥हविषां ्रहणायाञ्जु तस्मिन् ठ
यज्ञे महोत्सवे ॥ १६ ॥ अष्टाशीतिसदस्राणि. जहति सद ऋत्विजः ॥ उद्रातारश्चतुषष्टिसहस्ाणि सरषयः॥१७॥ अध्वयैवोथ ¢
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¢ होतारस्तावन्तो नारदादयः ॥ सप्तषयस्समा गाथाः कुर्वति स्म प्रथकए्थक् ॥ १८ ॥ गंधर्वविद्याधरसिद्धसंघानादित्यसंघान्
ट| सगणान् सय्॒ञान्॥ संख्यावरान्नागचरान् समस्तान् वत्र स दक्षोहि महाध्वरे स्वे॥१९॥ द्विजषिराजषिखरषिंसघात्पास्समितराः
¢ सचिवास्स॒ सेन्या॥वसुप्रमुख्या गणदेवताओच सरवे वृतास्तेन मखोपवेच्रा॥२ ०॥दीक्षायुक्तस्तदा दक्षः कतकौतुकमंगलः॥ भाय॑या
सुहितो रेजे कृतस्वस्त्ययनो भशम् ॥ २१ ॥ तस्मिन् यज्ञे वृतश्शथुनं दक्षेण दुरात्मना ॥ कपालीति विनिित्य तस्य यज्ञा
हेता न हि ॥ २२ ॥ कपालिभार्यैति सती दयिता स्वष्ठतापि च ॥ नादूता यज्ञविषये दक्षेणाशुणदरिना ॥ २३ ॥
४ ब्रहमषि, राजर्षि, सुरि, मित्र, मंत्री ओर सेनासहित समस्त राजा वषु तथा गणदेवता इन सवको दक्षने वरण किया ॥ २० ॥ तब कौतु
&|| मंगर करने उपरान्त दक्षने दीक्षा टी ओर स्वस्तिवाचनके उपरान्त भायासरहित अव्यन्त शोभायमान हुजा ॥ २१॥ पर दुरात्मा दक्षन
( उस्न यज्ञम शिवजीको नही, बुठाया कि, वे कपाठी है उनको यज्ञम योग्यता नहीं ठेसा कह दिया ॥ २२ ॥ ययपि अपनी सती कन्या प्यारी
|| थी प्र कपाटीकी भाया है रेसरा विचारकर अथणदशीं दक्षने सतीको भी यज्ञम नहीं बुलाया ॥ २३ ॥
७४
एवं प्रवतंमाने हि दक्षयज्ञे महोत्सवे ॥ स्वकाय॑लग्रास्तत्ासन् सवै तेऽध्वरसंमताः ॥ २४॥ एतस्मत्नतरेऽदष्टा तञ वे शंकर
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जब इस प्रकारसे दश्च यज्ञका महौत्सव आरम्भ हभ ओर वे सब अध्वथु अपने अपने कार्येमे तत्पर हूए ॥ २.४ ॥ तव वर्ह अपन भभु
शंकरको स्थित न देखकर उदवि्र मनसे परम शेव दधीचि कहने ठगे ॥ २५॥ दधीचि बोठे सव देवता ऋषि इस सभामे मेरा वचन सुन
इस महोत्सव यज्ञम शिवजी क्यों नहीं आये ॥ २६ ॥ यह सब सुरेश्वर सखनिजन टोकपाठ इस यज्ञम आये हँ पर महात्मा शंकरकै विना
यह यज्ञ शोभायमान नहीं होता ॥ २७ ॥ महात्मा कहते है किं जिसके द्वारा समस्त मंगर होते है वही एराण परुष नीरकण्ड परेश
धुम् ॥ प्रोद्वि्ममानसश्शेवो दधीचो वाक्यमव्रवीत् ॥ २५ ॥ दधीच उवाच ॥ ॥ सवं शृणुत मद्वाक्यं देवषिभ्रषुखा बुदा ॥
कस्मात्रैवा गतश्शंभुरस्मिन् यज्ञे महोत्सवे ॥२६॥ एते सुरेशा मुनयो महत्तरास्सरोकपालाश्च समागता हि ॥ तथापि युज्ञस्तु
न शोभते भृश पिनाकिना तेन महात्मना विना ॥२७॥ येनैव सर्वाण्यपि मंगलानि भवंति शंसन्ति महाविपश्चितः ॥ सोऽसौ
न दृष्ठोऽज पुमान् पुराणो व्रृषध्वजो नीटगरः परेशः ॥ २८ ॥ अमंगलान्येव च भगलानि भवति येनाधिगतानि दक्षः ॥
तिषचकेनाप्यथ मंगलानि भवति सद्यः परतः पुराणि ॥२९॥ त्स्मात्वयेव कर्तव्यमाह्वानं परमेशितुः ॥ त्वरितं ब्रह्मणा वापि
विष्णना भरुविष्णुना ॥ ३० ॥ इन्द्रेण कोकपाठेश द्विजेस्सिद्धस्सदाधुना ॥ सर्वथाऽऽनयनीयोसौ शंकरो यजञपर्तये ॥ २१ ॥
सर्वेभेवद्धि्गतव्यं यञ देवो महेश्वरः ॥ दाक्षायण्या समं शब्थुमानयध्वं त्वरान्विताः ॥ ३२ ॥ तेन सवं पवित्रं स्याच्छम्भु
ना परमात्मना ॥ अजागतेन देवेशास्सबिन परमात्मना ॥ ३३ ॥
वृषध्वज यहां दिखादं नहीं देते ॥ २८ ॥ जिनकी प्रापिते अपंग भी मंग्षूपहो जाते है ओर आं दिशाओं सव
ओरसे मंगर्ही दिखाई देते है ॥ २९ ॥ इस कारण तुमको बहुत शीघ बरह्मा वा विष्णजी महाराजको भेजकर ॒शिवजीको. शीघ्र बढाना ह
चाहिये ॥ ३० ॥ इन्र वा ठोकपार वा सिद्ध बाहमणोके सहित तुमको यज्ञकी पृर्तिकै निभित्त शिवजीको . शीघ्र बुखाना चाहिये ॥ ३१ ॥ ¢
षव तुमको महेश्वर शकरके समीप जाना चाहिये ओौर शीघ्र उनको दाक्षायणीके सहित छाना चाहिये ॥ ३२ ॥ यदि वह देवेश शैकर 6
(५ 3 3)
न न प ~
& यहां सती सहित आगये तो यह सब यज्ञ प्रवित्र होजायगा कारण कि वह परमात्मा ई ॥ ३२ ॥ जिनके स्मरण ओर नाम उच्चारणसे सव ||
६ रुत ह्ोजाता है इस कारण ` वृषभध्वजको सब प्रयत्नसे छाना चाहिये ॥ ३७ ॥ शकरके अति ही यज्ञ प्र होजायगा नहीं तो अपृण |||
। यह भ सत्य कहता हं ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजी बोठे दधीचकै यह वचन सुनते ही दक्षको बडा क्रोध हभ ओौर वह दुष्बुद्धि मूढ हसता ४
¢ हुभा बोढा ॥ ३६ ॥ देवताओंके मूढ िष्णजी ह जिनमे सनातन धर्म स्थितै सो भने यज्ञम बुला ही व्यि है अब इस् यज्ञ ¢
|| स्य स्मृत्या च नामोक्त्या समरं सुकृतं भवेत् ॥ तस्मात्सर्वप्रयतेन श्यानेतव्यो वृषध्वजः ॥ ३७ ॥ समागते शंकरेऽत्
५ पावनो दि भवेन्मखः ॥ भविष्यत्यन्यथाऽप््णः सत्यमेतद्रवीम्यहम् ॥ ३५ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तस्य तद्वचनं थत्वा दक्षो रोष ९
र समन्वितः ॥ उवाच त्वरितं मूढः प्रहसत्निव दुष्टधीः ॥ ३६ ॥ मूलं विष्णुदवतानां यत्र धर्मस्सनातनः ॥ समानीतो मया
| सम्यक किमूनं यज्ञकर्मणि ॥ २७ ॥ यस्मिन्वेदाश्च यज्ञाश्च कर्माणि विविधानि च ॥ पूतिष्ठितानि सर्वाणि सोऽसौ विष्णरि ए
ट| इहागतः ॥ २८ ॥ सत्यलोकात्समायातो बरह्ञा रोकपितामईः ॥ बेदैस्सोपनिषद्धिश्वविविधरागमेस्सह ॥ ३९ ॥ तथा सुरगणे ४
| स्साकमागतस्पुरराट् स्वयम् ॥ तथा यूये समायाता ऋषयो षीतकर्मषाः ॥ ° ॥ येये यज्ञोचिताश्शांताः पाजश्रतास्समा ॥|&
| गताः ॥ वेदवेदाथ॑तचछ्ञास्सवं यूयं दढ्रताः ॥ ॥ ४१ ॥ अत्रैव च किमस्माकं र्रेणापि प्रयोजनम् ॥ कन्या द॑त्ता मया |
ह| विप्र ब्रह्मणा नोदितेन दि॥ २॥ ठ
क्या है ॥ ३२७ । जिसमे अनेक विधिके कमं॑यज्ञ॒ ओर वेद स्थित ह विष्णजी यहां डाहीगये है ॥ ३८ ॥ छोकपितामह बरहा सत्य
लोकसे आगये है वेद उपनिषद ओर आगम इनके साथ ह ॥ ३९ ॥ इसी भकार देवताओंके साथ स्वयं सुरपतिने आगमन किया है इसी ४
{ प्रकार पापरहित आप सव ऋषि यहां आये ह ॥ ४० ॥ जो जो यज्ञम उचितं पाच्रहूप शांत बेदवेदाथकै तत्व जाननेवाङे इवत है वे सब
4 यहां आगये है ॥ ४१ ॥ तव रुद्रे अव हमारा भरयोजन क्या है विप्र ! ब्ह्ाजीके कहनेसे मैने अपनी कन्या उनको देदी थी ॥ ४२ ॥ ६
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शिग्र ¢ हे विर! र तो अकुलीन पितामातास रहित भूत प्रेत पिशाचके पति दुगंम ई ॥ ४३ ॥ तथा आत्माकी रैमावनावाठे मूढ स्तञ्ध मौनी £
॥१४१ || भौर अकारी हैन इमे कमं न योग्यता है इस कारण मैने उनको न बढाया ॥ ४४ ॥ इतत कारण फिर तुमने इस प्रकारक वचनं न ||
$ || कहना, तुम सब ही मिलकर इस मेरे यज्ञको सफ करो ॥ ४५॥ ब्रह्माजी बोरे दक्षके यह वचन सुनकर दधीच कहने ठगे वह उनकी ट
तारे वचन देवता मुनि सवने सुने ॥ ४६ ॥ दधीचने कहा शंकरके बिना यह यज्ञ अयज्ञ ही हुआ है विशेषकर इसमे तुम्हारा नाश होगा र
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हरोऽङली नोसौ विप्र पित्मातूषिवजितः॥ भरतप्रेतपिशाचानां पतिरेको दुरत्ययः॥४३।आत्मसंभावितो मृढस्तन्धो मौनी सम ठ
त्सरः ॥ कर्मण्यस्मित्न योग्योसौ नानीतो हि मयाऽधुना॥४४॥ तस्मात््वमीदशं वाक्यं एनर्वाच्यं न हि कचित् ॥ सवभवद्धिःक
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युतम् ॥ ४६ ॥ दधीच उवाच॥ अयज्ञोयं महाजातो विना तेन शिवेन हि॥विनाशोपि विशेषेण श्त् ते हि भविष्यति॥४७॥
एवमुक्ा दधीचोसावेक एव विनिर्गतः ॥ यज्ञवाटाज्च दक्षस्य त्वरितः स्वाश्रमे ययौ॥४८॥ततोन्ये शांकराये चञुख्याश्थिवमता
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४ तव्यो यज्ञो मे सफलो महान्॥४५॥बरह्नोवाच॥एतच्छत्वा वचस्तस्य दधीचो वाक्यमव्रवीत्॥ सर्वेषां श्रृण्वतां देवञ्ुनीनां सारस £
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४ लगाः ॥ निर्ययुर्स्वाश्रमान् सद्यश्शापं दत्त्वा तयैव च ॥४९॥ सनौ विनिर्गते तस्मिन् मखादन्येषु दृष्टयः ॥ शिवदोदी युनीन् ||
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दक्षः प्रहसत्निदम्रवीत् ॥ ५० ॥ ॥ दक्ष उवाच ॥ गतः शिवभियो विप्रो दधीचो नाम नामतः ॥ अन्ये तथाविधा ये च |
गतास्ते मम चाध्वरात् ॥ ५१ ॥ एतच्छभतरं जातं संतं मे हि सर्वथा ॥ सत्य ब्रवीमि देवेश सुरा मुनयस्तथा ॥५२॥ |©
॥ ४७ ॥ यह कहकर इकठे दधीच ही वहसे चरे गये ओर दक्षकै यहांमे उठकर तुरन्त अपने आश्रमे चरे आये ॥ ४८ ॥ इसके पीठे ।
ओर भी जो शिक भक्तं थे वेभी दक्षो शाप देकर शीघही अपने श्थानोको चठे गये ॥ ४९॥ जव दूसरे सुनि भी वहा उढ गवे तव वह ट
मूढबुद्धि शिवद्रोही दक्ष हसता हुभा दृषरे नियो बोढा ॥ ५०॥ दक्ष बोला शिवका भिय दधीच यहांसे चटा गया तथा उतत ट
परीखे ओर भी यहांसे उठ गये ॥ ५१ ॥ यह ॒ बहुत ही अच्छा हभ ओर मँ चाहता भी था,. हे देवेश ! देवता ओर खनियों यह मै
₹०सं.१।
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| कहता हूं ॥ ५२ ॥ नष्टवुदधि मंदातमा मिथ्यावादे निरत वेदबाह्य दुराचारी इनको तो यज्ञम लुकानाही न चाहिये ॥ ५३ ॥ आप् ¢
ठ 1 वेदवाद्म रतहोह ह्मणो ! तथा देवताओ | आपं शीघ्र मेरे यज्ञको सफर करो ॥५४॥ ब्ञाजी बोरे इसभकार दक्षके £
ह ५४ ५ मोहित हए उस यज्ञम देवता ऋषि देवयजन करनेगे ॥५५॥ हे खनीश्वर ! इसपभकारसे यज्ञम शापका वणेन किया
# प दरस यज्ञकै विध्वस होनेका वृत्तान्त सुनो ॥५६॥ ॥ इति श्रीशिवमहा एुराणभाषायां रुद्रसंहितान्त्गताद्वितीयक्षतीखण्डे यज्ञभारभो नाम ६
¢ नष्टचितता मंदा मिथ्यावादरताः खला ॥ वेदबाह्या दुराचारास्त्याज्यास्ते मखकर्मंणि॥५२॥व यूय सवे ६
1 4 कृ्मणि॥५३॥ वेदवादरता यय सवे विष्णुपरो
र र सफलं वि्रारघुराः षत् माऽचिरम् ॥५४॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकर्ण्य वचस्तस्य शिवमायाविमोहिताः ॥ ६
# ५ 7 प हि वणितो मे भुनीश्वर ॥ यज्ञविध्वंसयोगोपि प्रोच्यते शृणु साद् ४
। पुराणे द्वितीयायां श्द्रसंदिता्यां द्वितीये सतीखंडे यज्ञप्रारंभो नाम सप्र्विंशोऽध्यायः
६ ॥ ब्रह्मोवाच।।यदा ययुदैक्षमखभरुत्सवेन सुरषैयः॥ तस्मित्रैवां तरे ते गंधमादने त्
तरे देवो पर्वते ॥ १।धारागरहे वितानेन सखीभिःपरि ट
दाक्षायणी महाक्रीडाश्चकार विविधास्सती ॥२॥ कीडासक्ता तदा देवी ददशौ तिं 4 ¦
प ददशौथ शुदा सती॥ दक्षयज्ञे मर्यातं च रोहिण
सत्वरम् ॥ ३ ॥ दष्टा सीमतया भूतां विजयां प्राह सा सती ॥ स्वसखीं प्रवरां ॥ (1
६ प्रवरां प्राणमियां सा हि हितावहाम् ॥
` सत्युवाच ॥ हे सखीप्रवरे प्राणपरिये त्वं विजये मम ॥ क गमिष्यति चन्दरौः दा 1५५५
८ नद्रौय रोहिण्याषुच्छय स॒
सुप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ ब्रह्माजी बोटे के यज्ञम दे ठे ( => ॥ ६. ट
|| नो (0. ध क व ऋषि जारहे थे उस अवरम सती देवी गेधमादन पर्वतके ॥ १ ॥ |©
८; र ६ कारकौ क्रीडा कर रही थी ॥२॥ उस समय क्रीडा करते करते देवीने
4 ध द ॥ ॥ ३ ॥ उसकौ शगार कथि देख सती विजयासे बोटी यहं विजया सतीकी निज्सी भाणभिया बडी 1) ६
स वेज चन्द्रमा कहां > ९ कारिणी ||
हे विजया ! तू भेरी भराणोंके समान प्यारी है यह चन्द्रमा कहां जाता है सो तू रोहिणीसे आदरपुवंक पड ॥ ५ ॥ >
शि०पु०)
॥१४२॥
रुण्सं.२
स.खं.२
|
२९२८4
बरहाजी बोठे यह सुनकर विजया उस स्थानम जाकर चन्द्रमा पूछने ठगी तुम कां जाते
दक्ष यङञोलवका वृत्तान्त ओर उमे अपना गमन आदरपवकं वणेन किया ॥ ७ ॥ यहं सुन
देवीसे आकर सव वृत्तान्त तत्काठ वणेन किया जौ कुछ चन्द्रमाने कहा था ॥ ८ ॥ यह सुनकर काटिका
उसका कारण विचारमे न आनेसे सोचने ठगी ॥ ° ॥ दक्ष मेर पिता माता मेरी वीरिणी इन्होने ज्ञे क्यों न घुलाया शश्च अपनी प्यारीकौ
च
देवी सती बडे आशर्े हृदं ओ
ब्रह्मोवाच ॥ तथोक्ता विजया सत्या गत्वा तत्सत्निधौ दतम् ॥ क गच्छसीति पप्रच्छ शशिनं तं यथोचितम् ॥ & ॥ विजयो
क्मथाकण्यं स्वयां पूरवमाद्रात् ॥ कथितं तेन तत्सवं दक्षयज्ञोत्सवादिकम् ॥ ७ ॥ तत्वा विजया देवीं त्वरिता जातस
भ्रमा ॥ कथयामास तत्सर्वं यङुक्तं शशिना सतीम् ॥ ८ ॥ तच्छत्वा कालिका देवी विस्मिताभू्सती तदा ॥ विष्य
कारणं तथाज्ञात्वा चेतस्यचितयत् ॥ ९ ॥ दक्षः पिता मे माता च वीरिणी नौ ङतस्सती ॥ आह्वानं न करोति स्म विस्मृ
ता मां प्रियां सुताम् ॥ १० ॥ पृच्छेयं शंकृरं तत्र कारणं सर्वाद्रात् ॥ चितयित्देति सासीदरे तत्र गंतु खुनिश्वया ॥ १३ ॥
अथ दाक्षायणी देवी विजयां वरां सखीम् ॥ स्थापयित्वा इतं त समगच्छच्छिर्वातिकम् ॥ १२ ॥ ददशं तं सभामध्ये
संस्थितं बहुभिर्गणेः ॥ नेयादिमिमंहावीरेः भवरेधुथयुथपै ॥ १३॥ दष्टा तं ब्रधुमीशान स्वपति साथ ॒दक्षजा ॥ भरष्ट
तत्कारणं शीघं प्राप शंकरसंनिधिष् ॥ १४ ॥
मुढा दिया ॥ १० ॥ मै इसका कारण चडकर शकरते पृं पसा विचारकर शंकरके सथीप॒जानेका निश्चय किया ॥ ११ ॥ तब सती
देवी विजयासखीको वहीं ठहरा कर शीधतासे शिवजीके समीप गईं ॥ १२ ॥ वहां जाकर देखा किं सभा जुडरही है नन्दी आदि महागण
बैढे ह बीचमे शंकर शोभायमान होरहे है ॥ १३ ॥ दक्षकुमारौ इसमकार अपने पतिक युथपोके मध्यमे देखकर उस कारणक ध
शीघही शकरक समीप गद ॥ १४ ॥
हो ॥ & ॥ विजयाकै वचन् नकर चन्द्रमाने
कृर विजयाको बडा आश्वपै हृभा ओर् उने
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शिवजीनि प्रेमे अपनी मरियाके गोदे वेढाया ओौर बडे मानक वचने उसको भरस्न किया ॥ १५ ॥ तब महारीखा करनेवाटे]||>)
सुख देनेवारे शिवजी गणोकि मध्यमेही आदरपूर्वक सती बोरे ॥ १६ ॥ शिवजी बोढे इतनी शीघतासे विमित हृद तुम सभाके ठै
# | मध्यमे कैते आगई हे सुमध्यमे ! प्रमपर्वक शीघ्र इसका कारण कहो ॥ १७ ॥ बरह्ाजी बोे हे सनीश्वर ! जब॒शकरने एसा कहा तब #
ठ हाथजोढकर शिवा अपने परतिपे बोटी ॥ १८॥ सती बोरी भन सुना है मेरे पिताके यहां महान यज्ञ हता है वहां बडा ¢
र शिवेन स्थापिता स्वांके प्रीतियुक्तेन स्वप्रिया ॥ प्रमोदिता वचोभिस्सा बहुमानपुरस्सरम् ॥ १५ ॥ अथ शंयुमहालीटस्सवेश ¢
स्सुखदस्सताम् ॥ सतीश्ुवाच त्वरितं गणमध्यस्थ आदरात् ॥१६॥ शंभुरूवाच ॥ किमथमागतात त्वं सभामध्येसविस्मया
कारणं तस्य सुप्रीत्या शीर वद सुमध्यमे ॥१७॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवसुक्ता तदा तेन महेशेन सुनीश्वर ॥ सांजलिस्सुप्रणम्याञ्च ४
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६ सत्युवाच भ्रुं शिवा ॥१८॥ सत्युवाच ॥ पितुर्मम महान् यज्ञो भवतीति मया शतम् ॥तवरोत्सवो महानस्ति समवेतास्सुर
ट| षयः ॥१९ पितुर्मम महायज्ञे कस्मात्तव न रोचते ॥ गमनं देवदेवेश तत्सर्वं कथय प्रभो ॥२०॥ सडदापेष वे धर्मस्सुहद्धि
ह| स्सह संगतिः ॥ कुर्वति यन्महादेव सुद्टदः प्रीतिवर्धनीम् ॥ २१ ॥ तस्मात्सर्वपरयत्नेन मयागच्छ सह प्रभो ॥ यज्ञवाटं
ह| पितम स्वामिन् पराथनया मम ॥ २२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तस्यास्तद्वचनं शत्या सत्था देवो महेश्वरः ॥ दक्ष वागिषुहद्धिद्रो
| बभाषे सूनृतं वचः ॥ २३ ॥ महेश्वर उवाच ॥ दक्षस्तव पिता देवी मम दोही विशेषतः ॥ २४ ॥
| उत्सव है सव॒ कषि सनि एकन हृए है ॥ १९ ॥ सो मेरे पिताका यज्ञ॒ आपको कयो न अच्छा ल्गा {हे देव} आप् वहां क्यों
ठ || नहीं गये खसे यह सब किये ॥ २० ॥ सुदोका सुहदोके साथ मिठना परमधर्मं है हे महादेव ! आप्रभी इस म्रमनढनेवारी रिका ©
| पाठन करो ॥ २१ ॥ है प्रभो ! इतस्त कारण यत्नसे भेरे साथ आप वहां चटे हे स्वामिन् ! भेरी प्राथेना है किं आप मेरे पिताक यज्ञवाटे £
४॥ चरं ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बटे मह्वरदेव सतीकै यह वचन सुनकर दक्षके दचनोको हदये स्मरण करते सत्य वचन बोरे ॥ २३ ।॥ महेश्वर बोखे ४
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शिण्पुर
॥१४३॥
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| च सर्वेषामागतानां दुरात्मनाम् ॥ ३३ ॥
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हे देवि ! तुम्हारे पिता दक्ष स्मे वैर रसते है ॥ २४॥ उसके जो देवता क्षि मान्य है वही मूढबुद्धि तुम्हारे पिताक यन्मे प्राप |€
हृए है ॥ २५॥ हे देवि ! जो विनावुाये किसके षर जाते ह वह महा तिरस्कार तथा कहीं मरणा दिक भी पाते ह ।! २६ ॥ ४
पराये घर जानें इन्द्रको भी ठ्घुता पराप होती है वृररोकी तो बावही क्या है देसी यात्रा अनर्थकारी होती है ॥ २७॥ ||
इसकारण सन्ने दक्षे यज्ञमे जाना उचित. नहीं यह मने सत्यही कहा है ॥ २८ ॥ इस प्रकारसे श्ओकि बाणो व्याकुढ नही |£
यस्थ ये मानिनस्सव ससुरषिश्चलाः परे ॥ ते सूढा यजनं प्राप्ताः पितुस्ते ज्ञानवर्जिताः ॥ २५ ॥ अनाहूताश्च ये देवी ||
गच्छंति परमंदिरम् ॥ अवमानं प्राप्युवंति मरणादधिकं तथा ॥ २६ ॥ पराख्य गतोपींदो घुभेवति तद्विधः ॥ का कथा ट
च परेषां वै रीढा यात्रा हि तद्विधा ॥ २७ ॥ तस्मात्वया मया चापि दक्षस्य यजनं प्रति ॥ न गंतव्यं विशेषेण सत्यशक्त तँ
मया प्रियै ॥ २८ ॥ तथारिभिर्न व्यथते ह्य्दितोपि शरेजंनः ॥ स्वानां दुङक्तिभिमंमंताडितस्स यथा मतः ॥ २९ ॥ विद्यादि ९
भिर्येः षड़मिरसदन्येस्सतां स्मृतौ ॥ हतायां भूयसां धाम न पश्य॑ति खलाः प्रिये ॥ ३० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवसक्ता सती त
तेन महेशेन मदात्मना ॥ उवाच रोषसंथुक्ता शिवे वाक्यविदां वरम् ॥ ३१ ॥ सत्युवाच ॥ यज्ञस्स्यात्सफरो येन स त्वं ¢
शंभोखिरेश्वर ॥ अनाहूतोसि तेनाद्य पित्रा मे इष्टकारिणा ॥ ३२ ॥ तत्सर्व ज्ञातुमिच्छामि भव भावं दुरात्मनः ॥ सुरर्षीणां £
होता जेषे अपने बंधुओंकी दुरुक्त्सि मनुष्योंके अन्तःकरण उ्यथित होति है ॥ २९ ॥ हे भिये ! वियाआदि छः गुणो युक्त ् ठ
अपने सम्पन्न विदित नहीं होते खक उनका तेज हत करते ह उनको देखते नहीं ।॥ ३० ॥ ब्रह्ाजी बोटे जब महात्मा महेश्वर ठ
पतीसे रेसा कहा कब बोलनेवाठोँमे भ्रे्ठ शकरसे कोधकर बोी ।॥ ३१ ॥ सती बोटी हे शंकर ! आप सबके इश्वर हो तुम्हारे जानेतते बह ठ
|| पन्न सफठ होजाता पर दुष्टकमी मेरे पिताने आपको नहीं बुखाया ॥ ३२॥ सो यँ उस्र दुरात्माके भाव जाननेकी इच्छा करती हृ हे शीकर । ठ
जो वहां दुरात्मा होकर देवता ऋषि गये ह ॥ ३३ ॥ इसे मँ उक्ष अपने पिताके यज्ञम जाती हूं हे महेश्वर ! आप मुञ्चे वहां जानेकी
आज्ञा दं ॥ ३४ ॥ ब्ह्ञाजी बटे जब इतत भरकर स्वयं देवीने शंकरम कहा तथ सव कुछ जाननेवाटे रीटाकारी शकर देवीे बोरे ॥३ ्
शिवजी बोठे हे देवि ! यदि तुम्हारी वहां जानेकी अवश्यही शुचि है तो हे हुवे ! ठम मेरे षचनसे पिताके यज्ञम शीघध जाओ ॥ ३६ ॥
इत् नन्दीनामक बरृषभको आद्रे सजाय इसपर चढकर महाराजोंक सम्बन्धके सब उपचार सजाकर ॥ ३७ ॥ अपने सब गहने पहनकर
तस्माच्चाथूव गच्छामि स्वपितुरयजनं प्रभो ॥ अनुज्ञा देहि मे नाथ ततर गंतु महेश्वर ॥३४॥ ॥ ब्रह्मोषाच ॥ इत्युक्तो भगवान्
्रस्तया देव्या शिवस्स्वयम् ॥ विज्ञातासिकटर् दरष्टा सतीं सूतिकरोऽ्रवीत् ॥३५॥ ॥ शिवउवाच ॥ येवं ते रुचिईैवि
तच गंतुमवश्यकम् ॥ सुत्रते वचनान्मे त्वं गच्छ शीर पितुमखम् ॥ ३६ ॥ एतं नेदिनमार्द्य वृषभं सनमाद्रात् ॥ महारा
जोपचाराणि कत्वा बहुशुणान्विता ॥ ३७ ॥ भषितं वृषमारोदैतयुक्ता शुदरेण सा सती ॥ सुभूषिता सती यक्ता ह्गमत्पितमं
दम् ॥ ३८॥ महाराजोपचाराणि दत्तानि परमात्मना ॥ सुच्छवचामरादीनि सद्स्चाभरणानि च॥ ३९ ॥ गणाः षष्टिसह
सणि रोद्रा जग्बुश्शिवा ज्ञया ॥ तूहधुताः प्रीता महोतसवसमन्विताः ॥ ४० ॥ तदोत्सवो महानासीद्यजने तथ सर्वतः ॥
सत्याश्शिवभियायास्त॒ वामदेवगणेः कतः ॥ ४१॥ कुतूदकं गणाशकरुश्शिवयो्यश उनः ॥ बालांतः ष्वः
महावीराश्शिवप्रियाः ॥ ७२॥ पुष्टयबुः प्रीत्या
रथपर चढो यह सनतेहौ सती सब कुछ पहन ओढ पिताक मदिरको चरी ॥ ३८ ॥ परमात्मा शिषने महाराजोके सम्बन्धकी सब वस्मुपं
भदान की छत्र, चमर सद्वस्तु ओर आभरण दिये ॥ ३९ ॥ शिषकी अज्ञत साठ हजार शिषजीकै गण सतीके सग चे वे महोत्सव ओर
कोतूहर करते चठे ॥ ४० ॥ उस समय उस देवयजन स्थानम महा उत्सव आरम्भ हुआ शिवकी भरिया तीके साथ व
॥ ४१ ॥ शिवारिवका यश गति गण कुतूहढ करते चरे वह महाबीर शिक भिय दूर २ तक ूदने कगे ॥ ४२ ॥
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पब प्रकारसे जगदम्बाके चलनेमे महा शोभा हुईं उनके मुखके शब्दोपि
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पुर असुर खनि ओर इन््रादिक वहां कौतूहल कर रहे थे ॥ १॥ उस समय अपने पिताक स्थानको अनेक आश्वयंपि सयुक्त देखा
जो बडा मनोहर देवता खनियोपि तुक्त था ॥ २ ॥ दरम स्थित हही देवी अपने असनत उतरी ओर कैवढ नन्दीके साथही
सर्वथासीन्महाशोभा गमने जागदम्बिके ॥ सुखारावस्संबभूव पूरितं भुवनत्रयम् ॥४२॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां
सद्रसहितायां द्वितीये सतीखंडे सतीया्रावणैनं नामाष्टर्विशोध्यायः ॥ २८ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ दाक्षायणी गता तत्र तच यज्ञो
महाप्रभः ॥ सुरासुरखनीन्द्रादि्तूदलसमन्वितः ॥ १॥ स्वपितुभवनं तञ नानाश्वर्यसषमन्वितम् ॥ ददर्शं सुप्रभं चार् सुरषिंगण
सुथुतम् ॥२॥ द्वारि स्थिता तदा देवी ह्यवरह् निजासनात् ॥ नन्दिनोऽभ्य॑तरं शीघमेकैवागच्छदध्वम् ॥ ३ ॥ आगता च
सती दृष्टाऽसिक्री माता यशस्विनी ॥ अकरोदादरं तस्या भगिन्यश्च यथोचितम् ॥.४ ॥ नाकरोदादरं दक्षो दृष्टा तामपि
किचन ॥ नान्योपि तद्भयात्तच शिवमायाविमोहितः ॥ 4 ॥ अथ सामातरं देवी पितरं च सती मुने ॥ अनमद्विस्मितात्यतं
सर्वलोक पराभवात् ॥ & ॥ भागानपश्यदेवानां हर्यादीनां तदध्वरे ॥ न शंूभागमकरोत् कोषं दुर्विष सती ॥७॥ सत्युवाच
॥ तदा दक्ष दहन्तीव रषा पूर्णां सती भृशम् ॥ कृरदष्टया विलोक्यैव सर्वानप्यषमानिता ॥ ८ ॥
भीतर यज्ञभूमिं गई ॥ ३ ॥ सतीको आया देख यशस्वी उक्तकौ अशिक्की माता तथा भगिनि्योने यथोचित आद्र किया॥ ४॥
प्र दक्षे उसको देखकर कुड भी आद्र नहीं किया ओर शिकरकती मायाति मोहित होनेके कारण ओरोने भी आदर नहीं किया
॥ ५ ॥ तब देवने अपने माता पिताको बडे विस्मयक साथ प्रणाम किया ओौर सव॒ जनोकै पराभवसे महादुःख माना ॥ ६ ॥ उत्त
यज्ञम हरि आदि देवताओंका भाग सतीने पथक् २ देखा पर शेभका भाग न देखने सतीने बडा क्रोध किया ॥ ७ ॥ तब प्रम
तीनों भुवन मरय ॥ ४३ ॥ ॥ इतिं श्रीशिवमहाएयण
भाषादीका्ां रुद्रसंहितान्तगंतद्वितीयसतीखण्डे अष्टविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥ तव सती वहां गं जहां वह महाप्रभावशाटी यन्न होर्हाथा
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कोधते सती कूर इसे मानो दक्षको भस्म करती हई सबसे अपमानित होकर बोट ॥ ८ ॥ सती बोट जिसकी कपासे यह चराचर विश्व ||
पवित्र होजाताहै तैने किञ्च कारणस उन प्रम शोभायमान शकरको नहीं काया ॥ ९ ॥ यज्ञस्वरप यज्ञ जाननेवाछोँम शरेष्ठ यज्ञकै अग यज्ञके |
दक्षिणास्वदूप यज्ञकेकती शिवे विना यज्ञकैे सम्पादन होसकताहै ॥१०॥ जिनके स्मरण मात्रसे यह सब पवित्र होजाता है उनकै विना सबही र
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अपवित्र होगा ॥११॥ सव द्रव्य मंत्र हव्य कव्य शकर के विना निथक है उनके विना यह यज्ञ॒ किसभ्रकारसे पृक्त हुआ ॥१२॥ कया शकर
को सामान्यदेवता जानकर तुमने अनादर कषा हे पिताधम ! तुम बडे भ्रषटुद्धि हो ॥१३॥ विष्ण ब्रह्मादिक देवता जन महेश्वरकी सेवा करके ९
सत्युवाच ॥ अनाहूतस्त्वया कस्माच्छ्ुः परमशोभनः ॥ येन पूतमिदे विश्वं समग्रं सचराचरम् ॥९॥ यज्ञो यज्ञविदां श्रष्ठो
यज्ञागो यज्ञदक्षिणः॥ यज्ञकतां च यश्शथुस्तं विना च कृथ मखः ॥१०॥ यस्य स्मरणमा्रेण सवं प्रतं भवत्यहो ॥ विना
तेन कृतं सवैमपवि्चं भविष्यति ॥११॥ द्रभ्यमंादिकं सर्वं हव्यं कव्यं च यन्मयम् ॥ शंभुना हि विना तेन कथं यज्ञः प्रवर्तितः
॥१२॥ कि शिवं स॒रसामान्यं मत्याकार्षीरनादरम् ॥ अष्टबुद्धिभवानयं जातोसि जनकाधम ॥१३॥ विष्णुब्रह्मादयो देवा यं
संसेभ्य महेश्वरम् ॥ प्राप्ताः स्वपद््वीं सवं तं न जानासि रे दरम् ॥ १४ ॥ एते कथं समायाता विष्ण॒ब्ह्नादयस्संराः ॥ तव
यज्ञे विना शंथु स्वप्र षनयस्तथा॥१५॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता परमेशानी विष्ण्वादीन्सकलान् पति ॥ प्रथकप्रथगवोचत्सा
भत्संयंती भवात्मिका ॥ १६ ॥ सत्युवाच ॥ हे विष्णो त्वं महादेवं किं न जानासि तत्वतः ॥ सुण निथेणं चापि धुतयो
ये वदंति इ ॥ १७ ॥ यद्यपि त्वां करं द्वा बहुवारं महेश्वरः ॥ अशिक्षयत्पुरा शाल्वप्रुखाकृतिभिहरे ॥ १८ ॥
अपनी पद्वीको प्राप्त हए है अरे तरू उन शकर को नहीं जानता॥ १४॥यह विष्ण बरह्ादिदेवता यहां कैसे आगये ओौर इन देवता सामयोनि अपने
भमु शकर कै विना कैसे आगमन किया ॥१५ ब्रह्माजी बोरे परमेशानी विष्ण आदि सव देवताओंके परति र्ता कहकर पीछे सको पृथक् द्
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| धुडकती हृदं बोढी ।।१६॥ सती बोरी हे विष्णजी ! कया तुम तत्स महादेवजीको नहीं जानते जेसतको शरुतिये सयुण निरण कहती है॥१७॥
हे विष्ण ! यथपि बहू वार शंकरने हाथदेकरं शाल्वादिकै समय तुमको शिक्षा दी है ।॥ ३< ॥
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शि०ध० | ुम परे पांचयलवाठे थे गवित होकर सदाशिवके भति दोह किया जिससे ठुमको चार खलवाढा किया यह तुम बहुत शीव्ही भूकगे ८
॥१४५। ||| २० ॥ हे इन्दर क्या तु महादेव का प्राक्म नहीं जानता कटिनकरमां शकरने तुम्हारा बज भस्म कर दिया था ॥ २१ ॥ हे देवताओ । ४
या तुम षादेषका कमे नही जानते हे अत्रि ! हे वसिष्ठ ! तुमने यह क्या किया१॥२२॥ जब भमु दारूवनमे भिक्षा मांगने ग्
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र| हे मतिते हीन ! तो भी तम्हारे चित्तम ज्ञान नहीं आया अपने स्वामी शिवके भागके विना अपना भाग स्वीकार करिया ॥ १
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ह|| थे ओर उत्त समय आप॒ खनियोने भिश्चुकरूपधारी उन शंकरको शाप दिया था ॥ २३ ॥ सो शापित होकर रुढरने जो कु किया सो
||| तदपि ज्ञानमायातं नते चेतसि दुर्मते ॥ भागा्थीं दक्षयज्ञस्मिन् शिवं स्वस्वामिनं विना॥१९॥ पुरा पंचथुखो भूत्वा गर्वितोऽसि
&|| सदाशिवम् ॥ कृतश्रतुयखस्तेन विस्मृतोसि तदद्धतम् ॥ २० ॥ इन्द्रत्वं किं न जानासि महादेवस्य विक्रमम् ॥ भस्मीकृतः
पविस्ते हि हरेण कूरकर्मणा ॥ २१ ॥ हे सुराः किन्न जानीथ महादेवस्य विक्रमम् ॥ अमरे वसिष्ठ खुनयो युष्माभिः किं कृतं
६ तिह ॥ २२॥ भिक्षाटने च कृतवान् एुरा दाक्बने विधुः ॥ शप्तो यद्धिक्षुको श्रौ भवद्विश॑निमिस्तदा ॥२३॥ शतेनापि च
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रुद्रेण यत्कृतं विस्मृतंकथम् ॥ तद्धिगेनाखिरं दग्धं भुवनं सचराचरम् ॥ २४ ॥ सवं भटा संजाता विष्णुब्रह्मादयस्मुराः ॥
मुनयोऽन्ये विना शंथुमागता यदिदाध्वरे ॥ २५॥ स्वँ वेदाश्च संभूताः सांगाश्शाघ्नाणि वाग्यतः ॥ योसौ वेदांतगश्शम्बुः
कैश्चिज्ज्ञातं न पार्यते ॥२६॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्यनेकविधा वाणीरगदनगदम्बिका ॥ कोपान्विता सती तत दयेन विदूयता
२ ॥ २७ ॥ विष्ण्वादयोखिा दैवा घुनयो ये च तद्वचः ॥ मौनीभूतास्तदाकण्यं भयम्याङ्कलमानसाः ॥ २८ ॥
९०.२९४ || क्या तुमने भुला दिया उस शिवर्गसे चराचर विश्व दग्ध होने ख्गाथा ॥ २४ ॥ इस स्मय विष्णु ब्रह्मादिक देवता सबही
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9९००९ ८ +^ 924 9९4 ०९ -0)> > 4 3.4 3 4
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स... ||| मूढ हो गये अच्छा शिक्कै विना जो देवता नि इत यज्ञम आये ह ॥ २५ ॥ अगं सहित सब वेद ओर शास्र जिते
अ०२९| मौन है प्र उन वेदान्तसे जानने योग्य शकर कै जाननेको कोई भी समथे नहीं है ॥ २६ ॥ बहाजी बोे इस भकार जगदम्बाने अनेक &
|| वचन कहे ओर दुःखी हदयसे सती बडी क्रोधित हदं ॥ २७ ॥ विष्णु आदि सव देवता ओर खनि पार्वती के वचन सुनकर भयते |
ं उयाकृढ भन हो मौन होगये।॥।२८॥ तब दक्ष अपनी तरीके साथ उस कारकै वचन् हूनकर करूरदषटिसे सतीको देख कोष ५५ बोला ॥२९॥ दक्ष बोरा त
¢| ह द्र ! बहुत कहनेसे कया है यहां तेरा क्या काम है चाहे रह या जा परंतु यहां क्यों आई ॥३०॥ सव पंडित जानते हँ तुम्हारे स्वामी शिव अभग
ठीक है अकुलीन वेदबाह्य भूत परेत पिशाचोकि स्वामी है ॥३१॥ इतसकारण उन कुवेषधारी शंकरको भने नहीं बुलाया मैने बुद्धिमानीे विचार ४
छिया किं देवता कऋषियोंकी सभाम उनका क्या काम ।॥ ३२ ॥ सञ्च मंद पापीने ब्रह्माके कहनेसे तञ्च रुद्रको दिया, मेने यह नहीं जाना कि रुर
अविदित अथवारे करोधी ओर दुरात्मा है ॥ ३३ ॥ है शुचिस्मिते ! इसकारण कोपको त्यागन करके स्वस्थ हो यदि तु इस यज्ञम आगई ह
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|| क्तेन कार्यं नास्तीद सांभतम्॥ गच्छ वा तिष्ठ वा भद्रे कस्मात हि समागता ॥२०॥ अमंगलस्तु ते भतां शिवोसौ गम्यते बुधेः॥
| अङलीको वेदबाद्यो भूतप्रतपिशाचराद् ॥३१॥ तस्मात्राहारितो रुपो यज्ञार्थं सुङ्वेषभत्॥ देवसंसदि मया ज्ञात्वा पु विष
४ अिता॥३२॥ विधिना भ्ररितेन त्वं दत्ता मदेन पापिना॥ श्दायाविदितार्थाय चोद्धताय इुरात्मने॥३३॥ तस्मात्कोपं परित्यज्य
६|| स्वस्था भव् शुचिरिमते ॥ ययागतासि यजञेस्मिन् दायं ध चात्मना॥३७॥ब्रह्लोवाच॥ दक्षेणोक्तेति सा पुत्री सतीरेलोकषय ,
¢ पूजिता ॥ निदायुक्तं स्वपितरं दक्षासीदुषिता भृशम्॥३५॥ अचितयत्तदा सेति कथ् यास्यामि शंकरम्॥ शंकरं दष्टुकामाहं
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अथ दक्षस्समाकण्यं स्वपुत्रयास्तादशं वचः॥ विलोक्य क्ूरदष्टया तां सतीं द्धोऽत्रवीद्रचः॥२९॥ दक्ष उवाच॥ तव किं बहनो ४
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पृष्टा वक्ष्ये किषत्तरम्॥३६॥ अथ भोवाच पितरं दक्षं तं इ्टमानसम् ॥ निश्न्वसंती रषाविष्ठा सा सती भिजगत्पसूः ॥३७॥
सत्युवाच ॥ यो नदति महादेवं निद्यमान शृणोति वा ॥ ताबुभौ नरकं यातौ यावचन्ददिवाकेरौ ॥ ३८ ॥ |
तो अपना भाग बरहणकर ॥ ३४ ॥ ब्रहाजी बटे दक्षकै वैसा कहने. पर वह चरलोक्यपूजिता सती निंदायुक्तं अपने पिताको देखकर बडी रुष ट
इदं ॥३५॥ ओर विचारने र्गी किप भकार भै शेकरकै पान जाऊं म शिवको देखनेकी इच्छा करती हूं पर जव वह पूगे तव क्या उत्तर दशी
६||॥ २६ ॥ तीन छोककी भगट करनेवाटी देवी क्रोधसे वारंवार स्वोसि,ठेती हृदं दुष्ट मनवाठे अपने पिता दक्षते बी ॥ ३७ ॥ स॒ती बोली जो हि
2४|| महादेवकी निंदा करते है वा निंदा करते हुएको सुनते है चन्द सर्यी स्थितिपरयन्त नरकम जते है ॥ ३८ ॥
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इसे अभम भवेशकर देहत्यागन करती हं ह तात । स्वामीका अनादर सुननेसे फिर ञे जीनेसे कमा प्रयज
नाको बल्परवक छेदन करे तब शुद्धि होगी इसमे संदेह नहीं ॥ ४० ॥ यदि समथन हो तो कानोपर् हाथ
जनोने कहा ३॥ ४१ ॥ ब्रह्माजी बोे इस भकार धर्मनीति कहकर पीठे देवीको बडा ताप हा ओर दुःखीचित्तमे शकरसे वचन स्मरण
६|| ॥४२॥ फिर कोषकर निश्यक भाकसे सबविष्ण आदिदेवता ओर नियति निश्वयपूवैक वटी ॥४२॥ सती बोटी हे तात।तुम शिवजीकी निंदाकरत
९|| तस्मात्यक्षयाम्यईं देहं परेष्यामि इताशनम्॥ फं जीवितेन मे तात ्वत्यानादरं भभोः ॥३९॥ यदि शक्तस्स्वयं शंभो निद्
ह|| कस्य विशेषतः॥ छित् प्रसद्य रसनां तदा शुदधयत्र सशयः॥४०॥ यद्शक्तो जनस्तत्र निरयात्घपिधाय वे ॥ कणां धीमान्
ह ततशुदधयेदरदतीदं बुधान्वरान्॥४१॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता धर्मेनीति पश्चातापमवाप सा ॥ अस्प्रच्छाकर वाक्ये दूयमानेन
८ चेतसा॥४२॥ ततस्संकृदय सा दक्ष निश्शंकं राह तानपि॥ सवान्विष्णवादिकान्देवान्घुनीनपि सती धुवम्॥४३॥ सत्युवाच ॥
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नह॥३९॥ यदि समर्थं हो तो ्निंदककी स्त
धरके वुद्धिमान् वहसि चछा जाय यहं 44
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॥१४६॥
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तात त्वं निदकश्शंभोः प्ा्तापं गमिष्यसि ॥ इद भुक्ता महादुःखमंते यास्यसि यातनाम्॥४४॥ यस्य ोकेऽप्रियौ नास्ति
प्रियश्चैव परात्मनः॥ तस्मिन्नवैरे शर्वेस्मिन् त्वां विना कः पतीपकः ॥ ९५॥ महद्विनिदा नाशर्यं सर्वदाऽसस्मु सेध्यकम् ॥
महदभरिरजो ध्वस्ततमस्सु सैव शोभना ॥ ४६ ॥ शिवेति द्वयक्षरं यस्य तृणां नाम गिरेरितम् ॥ सकृत्प्रसंगात्सकंठमवमाश
विहंति तत् ॥ ४७ ॥ प्विरकीतितमरं भवान् दवेष्टि शिवेतरः ॥ अरृष्यशासनं शुम सवे वरं खलः ॥ ७८ ॥
९०.२४ || हो इसकारण बडे पर्वात्तापको भाप होगे यहां महादुःख भाप करके अन्तमं यषयातनाको प्राप्त होगे ॥४४॥ सस्ारमे जिसका कोड अभय नहीं है ||
स.सं.२ |£ जिस प्रमात्माके सबही परिय है उन कैररहित शंकरसे तुम्हारे सिवाय कौन वैर करता है ॥ ४५ ॥ इसर्मे आश्वयं भी नहीं असतरुष महत्परुषोकी
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निदा करते है हां महस्छल्षोके चरणोंकी रजसे अज्ञान न करना शोभा यही है ॥ ४६ ॥ जिसने शिव इनदो अक्षरोको वाणीसे उचारण किया
है बह एकवारके उचारणसे अपने सब पाप नष्ट करते हँ ॥ ४७ ॥ अहो शिवजीका शासन यंयपि अछृष्य है पवित्र कीर्तन है पर तुम अमं
| उनतत वैर करते हो ॥ ४८ ॥ जिनके चरणकमठोमे षडे बडे रूपोका मन रगा रहता है जो बहस द्वारा सम्पूण अधिर्योको आदससे ||
तव भ्रकार कामनाके अनुसार फल देते है ॥ ४९ ॥ जो अतिथियोपर शीघ ही कामनाकी दष करते है आदर करते है उन लोक बन्धु ्
शंकते तुम द्रेष करते हो ॥ ५० ॥ उन शिवको अशिव तेरे सिवाय दूर नहीं जानते बरहलादि तथा सनकादि दृ खनि क्या नहीं जानति ४
॥ ५१ ॥ वह जटा खोढकर मूतगणोकि स्षाथ श्यशानम कपाङ पारण करते है सृतककी अस्थिकी माठा ओर भस्मको उदार बुद्धि पेमसे ४
धारण करते है ॥ ५२ ॥ जो उनके चरणोकी रजको आदरसे शिरपर धारण करते है बे पापरहित होते है खनि देवता जिनके निमौल्यकी
यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिसनिषेवितम् ॥ सवां्थदंबरहमरसेः सर्वाधिभिरथादरात्॥४९॥ यदवष॑त्यथिनश्शी् लोकस्य शिव |
आदरात् ॥ भवान् दुद्यति मूरखत्वा्स्मे चाशेषेधवें ॥ ५० ॥ किंवा शिवाख्यमशिरव॑त्वदन्ये न विदुबेधाः ॥ ब्रह्माद्यस्तं ठ
भुनयस्सनकायास्तथापरे ॥५१॥ अवकीयै जटाभूतैश्मशाने स कृपारुधृक् ॥ तन्माल्यभस्म वा ज्ञात्वा प्रीत्यावसदद्।रपीः ४
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| ॥ ५२ ॥ ये मृदध॑भिर्दधति तज्चरणोत्सृष्टमादरात्॥ निर्माल्यं नयो देवास्सशिवः परमेश्वरः ॥९३॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं
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कमे चोदितम् ॥ वेदे विविच्य वृत्तं च तद्धिचा्थ मनीषिभिः ॥ ५९ ॥ विरोधियौगपयैककर्तके च तथा द्यम् ॥ परनरह्मणि
शंभो तु कमेरच्छंति न किंचन ॥ ८ ॥ मा वः पदभ्यस्स्म पितयं अस्मदास्थितास्सदा ॥ यज्ञशाखघ बो भरभ्रवत्मभृक्तो
जिलोताः परम् ॥५६॥ नोऽव्यक्तरिगस्सततमवधूतसुसेवितः ॥ अभिमानमतो न त्वं कुरू तात ङडुदधिधक् ॥५७॥ किं बहूक्तेन
वचसा दुष्टस्त्वं सर्वथा षीः ॥ त्वदुद्धवेन देदेन न मे किंचित्पयोजनम्॥ ५८ ॥
इच्छा करते है वही देव परमेश्वर शिव है ॥ ५३ ॥ प्रृत्ति निवृक्तिकै भेदे दो भ्रक।रके कमं कहे है वेदे वह निणथ है बद्धिभानोंको विचारना
चाहिये ॥ ५४ ॥ एक ही कतीमे बे दोनों विरोधी है परह शंकरम कुछ कमौदिकी इच्छा नहीं है ॥ ५५ ॥ हे पितः ! तुम्हारे पदका
व्यय न हो जो हमारे कारणस तुमको उपस्थित हुआ है यज्ञशाछामे तुम्हारे धू अपना मागे त्यागन करे ॥ ५६ ॥ वह अग्यक्त रिग ६ |
सदा अवधूत गणो सेवित है हे तात ! कुुद्धिसे उनम अभिमान मत करो ॥ ५७ ॥ बहुत कहनेसे कया है कुषुद्धिकै कारण तुम महादुष्ट हो
शि०१० || तुमसे भगर इस दहसे भेरा कुछ भी प्रयोजन नहीं है ॥ ५८ ॥ उस जन्मको धिकार है जितत जन्ममं महान् परुषोकी निदा हो र
|| विशेषकर तमहारा सम्बन्ध त्याग देना चाहिये ॥ ५९ ॥ तुम्हारे गोसे जो शंकर भृ दक्षायणी कहत है म अब इससे दुःखी हूगी ॥६०
1 इस कारण तुम्हारे शरीरसे उत्पन्न हुए इस गाहित देहको मेँ अभी त्यागकर सुखी हंगी ॥ ६१ ॥ हे देवताखनियो ¡ सब मेरे वचन सुनो दुष्ट
¢ चिततवारे तुम ठोगोका यह कम सवथा निंदित हुजा है ॥ ६२ ॥ तुम सव मूढ होगये कटिगप्रिय तुमने शिवकी निंदा की है इसका दण्ड
तलन्म धिग्यो महतां सर्वथावदयक्ृत्खलः ॥ परित्याज्यो विशेषेण तत्सं्बधो विपश्चिता ॥५९॥ गोत्रं त्वदीयं भगवान् यदह
वृषभध्वजः ॥ दाक्षायणीति सहसाहं भवामि सुदुर्मनाः ॥ ६० ॥ तस्मात्वदंगजं देहं कुणपं गदिते सदा ॥ व्युत्सृज्य नूनमधुना
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| विमूढा हि शिव्निदाः करिपरियाः ॥ प्राप्स्यति दण्डं नियतमखिलं च हरादभुवमू् ॥ &३ ॥ ॥ बह्नोवाच ॥ द्र्षसुक्ताध्वरे
ट| ता म्यरमत्सा सती तदा ॥ अनूद्य चेतसा शम्युमस्मरत्माणवछछभम्॥६९॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्रसंहितायां
|| द्वितीये सतीसंडे सतीवाक्यवर्णनं नमेकोनर्विशोऽध्यायः ॥२९॥ ॥ नारद उवाच ॥ मौनीभूता यदा सासीत्सती शंकरवभा
ट| ॥ चख किमभूत्तत् विधे तद्वद चादंत् ॥ 9 ॥ ॥ ब्रह्लोवाच ॥ मौनीभूता सती देवी स्मृत्वा स्वपतिमादरात् ॥ क्षिताबु
हत (|| दीच्यां सहसानिषसाद भरशातधीः ॥२॥ |
तुम शकरसे बहुत शीघ पाओगे ॥ ६३ ॥ ब्रह्माजी बे दक्षके यज्ञम यह बात कहकर सती मौन हृदं ओर दुःखी चिक्तसे प्राणवह्ठम शकरका ||
१ स्मरण करने ठगी ॥ ६४ ॥ इतिं श्रीशिषृमहा़राणे माषारीकायां रुरसंहितान्तगतद्वितीयपततीसण्डे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ नारदजी |||
०२० ||| बोटे जिस समय शेकरकी भिया मौन हूं हे बहाजी 1 तव क्या हुआ सो आप् आदसपूषक सक्ष कहं ॥ १ ॥ बह्माजी बोठे जब आदस्ते ||
२2॥ अपने पतिको स्मरणकर सती मौन होगदईं तब शांत होकर उत्तरकी ओर भूमिम बेदी ॥ २ ॥ ।
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भविष्यामिसुखावहा ॥&१॥ हे सुरा सुनयस्सवे यूयं शृणुत मद्रचः ॥ सर्वथादुचितं कमे युष्माकं दुष्टचेतसाम् ।॥ ६२॥ सवे यूयं ४
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विधिपुवंक आचमन करके नियमे तत्परहो शुदधवच्न धारणकर नेत्र मंद पतिको स्मरणकर योगमागम तत्पर हुईं ॥३॥ उस् शतस॒खवारीनि प्राण
अपान वायुको समानकर ओर नाभिचक्रे यत्नपुवंक उदानको उठाकर ॥४॥ बुद्धिुवैक उनको हदये स्थापनकर पीछे निन्दारहित शकरकी प्राण
ं सतीने कंठमें छाकर पीछे भौके मध्यमे प्राणवायुको स्थापित किया ॥ ५॥इपरकार दक्षके कोपसे सहसा अपने देहको त्यागनेकी इच्छा करती
कुछ नहीं उसने स्वामीका ध्यानकर योगमार्गे अपनी बुद्धि रगाई ॥ ७ ॥ उसका देह सर्वेथा विकाररहित होगया ओर चारोंभरसे उस्म अधि ठग
जलमाचभ्य विधिवत् संवृता वाससा शुचिः ॥ दद्निमील्य पति स्मृत्वा योगमार्गं समाविशत् ॥३॥ कृत्वा समानावनिरौ
प्राणापानौ सितानना ॥ उत्थाप्योदानमथ च यत्नात्सा नाभिचक्रतः ॥४॥ हदि स्थाप्योरसि पिया स्थितं कंटाद्श्ववोस्सती ॥
अनिदितानयन्मध्य् शंकरपाणवछछभा ॥ ५॥ एवं स्वदेदं सदसादक्षकोपानिहसती॥ दग्धे गा वायुश्ुचिधारणं योगमागेतः
॥ & ॥ ततस्स्वभर्त्रणं चितयती न चापरम् ॥ अपश्यत्सा सतीं तत्र योगमार्गनिविष्ठधीः ॥७॥ हतकल्मषतदेहः प्रापतच्च
तदग्निना ॥ भस्मसादभवत्सयो शुनिश्रे्ठ तदिच्छया ॥८॥ तत्पश्यतां च खे भ्रमौ वादोऽभृत्खमहास्तदा॥ हिति सोदतश्चि
अस्सुरादीनां भयावहः ॥९॥ हंत प्रिया परा शंभोर्देवी दैवतमस्य दि ॥ अहाद् सती केन सुद्टेन कोपिता ॥१०॥ अहो
त्वनात्म्यं सुमददस्यदक्षस्य पश्यत ॥ चराचरं प्रजा यस्य यत्पुस्य प्रजापतेः ॥ ११ ॥ अहोधद्विमनाऽभत्सा सती देवी
मनस्विनी ॥ पृषध्वजग्रियाऽभीक्ष्णं मानयोग्या सतां सदा ॥ १२॥
उठी हे स॒निश्रष्ठ ! उसकी इच्छासे तत्काही देह भस्म होगया ॥ < ॥ यह देखतेही आकाश ओर भूमिम बडा कोलाह हआ देवताओकै हाहा
कारसे ध्वनि हई क्या अद्भुत क्या विचित्र बात हदं ॥ ९ ॥ सेदहै कि प्रम देवता शकरकी भिया सतीदेवीने अपने षाणोंको त्यागदिया किच
दने इसको कोपित किया ॥ १० ॥ अहो ! इस दक्षकी महामूखेताको देखो जिस भरजापतिकी चराचर भजा एप है उप्षका अज्ञान देखो
॥ ११ ॥ अहो ! ओज सतीदेवी विमना हदं वह शंकरकी भरिया निश्वयही भानयोग्य थी ॥ ३२ ॥ ष
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दं सतीने योगधारणकी वायते शरीरको भस्मकरना आरंभ किया ॥ ६ ॥ उस समय बह कवठ अपने भरताकेही च्रणोंको स्मरण करती इई ओर ¦
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॥१४८<॥
¢ शिवजी द्रोह तिरस्कार किया यह अन्तमे महानरकका भोगी होगा यह बडा अपराध हमा ॥ १४ ॥ स॒ती
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परन्तु यह प्रजापति महा अभिमानी ऋद्रोही हा इसने सव संसारम महा अपीति पाई ॥ १३ ॥ जिसने अपने अगते उन्न घुताको
कह्रहे थे तब यह देख शकरकै गण हाथमे आयुध ठेकर उढ खडेहुए ॥ १५ ॥ द्रारमेभी सातसह्ञ गण स्थित थे वे शके ॥
महाक्रोधको भप्त हृए ॥ १६ ॥ वे सव हाहाकार करतेहुए बोट हमको धिङ्कार है हमको पिक्वार है रेसा कह वे शकरकँ वीर गण ऊंचे स्वरसं
सोयं दुमष्दयो ब्रह्म स प्रजापतिः॥महतीमपकीति हि प्राप्स्यति त्वखिरे भवे॥१३॥ यत्स्वांगजां सुतां शंथुद्धिद न्यष
धत्सघु्यताम् ॥ महानरकभोगी स मृतये नोऽपराधतः ॥ १४ ॥ वदत्येवं जने सत्या दृष्ाऽसुत्यागमदतम् ॥ दूतं तत्पार्षदाः
करोधादुदतिष्टन्वदायुधाः॥ १५॥ द्वारि स्थिता गणास्सवे रसायुतमिता रषा॥ शंकरस्य प्रभोस्ते बाऽकुष्यत्नतिमहाबलाः॥१६॥
हाहाकारमकर्वस्ते धिक्धिक् न इति वादिनः ॥ उचेस्सवैऽसङकृद्रीरःश्शकर्स्य गणाधिपाः ॥ १७ ॥ दाहाकारेण महता व्याप्त
मासीदिगन्तरम् ॥ सवे पापन् भयं देवा सनयोन्येषि ते स्थिताः ॥ १८ ॥ गणास्तं्मन्च ते सवेऽथूवन् द्धा उदायुधाः ॥
चैग्याततं दिगंतरम् ॥ १९॥ शद्चिरघत्निजां गानि केचित्तत्र ्ुचाङराः ॥ शिरोश्चुखानि देवर्षे सुतीक्ष्णः
कुर्वन्तः प्रलयं वायशक्चेष्यापं | 1
प्राणनाशिभिः ॥ २० ॥ इत्थं ते विलयं प्राता दाक्षायण्या सम तदा ॥ गणादत @ च तदा तदद्भुतमिवाभवत् ॥२१॥ गणा
नाशाऽवशिष्ठा ये शंकरस्य महात्मनः ॥ दक्ष तं कोधितं हन्तं इदातिष्ठन्बुदायुधाः ॥ २२ ॥
|| चिहाये ॥ १७॥ उनके हाहाकारसे भूमि ओर आकाश भर गया सब देवता छनि जो वहां थे महाभयभीत हृष् ॥ १८ ॥ गर्णोने परस्पर
| अच्च उदये उनके वाय ओर श्लोके शब्दे भानो भरकय उपस्थित इदं ॥ १९ ॥ किन्हीं २ ने तो श्लो अपने अगही
छेदन करडाङे हे नारद ! किन्हीं २ ने तीक्ष्णशक्षोसे अपने शिर ओर अखं नष्ट कर दिये ॥ २० ॥ इसभकार वे सतीकँ स्ाथही नाशको
भाप हए इसप्रकार वीससहस्च गण नष्ट हुए यह॒वडी अद्भुत बात हुईं ॥ २१ ॥ ओर जो महात्मा शेकर गण अवशिष्ट रहे वे कोधकर
क प्राणत्यागनेपर् जब कोई देषा ||
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् मारनेको आयुध ठेकर उड ॥ २२ ॥ भृण॒जी महा्षिने उनके इस आक्रमणको देखकर यज्ञ विघ्न दूर करनेवाे यजुभे्रोि दक्षिणाशचिमं
हवन करना आरम्भ किया ॥ २३ ॥ मृराके उस हवन करनेपर ऋभवनामवाठे महावीर, सहस्तोही उस कुण्डे भरगर हए ॥ २४ ॥ हे
मनीश्वर ! उनके चक्रायुधोमे सहसरं शकरकै भ्रमथवीर युद्ध करने कगे ओर वहां उनका बडा भयंकर रोमहषण संग्राम होनेख्गा ॥ २५ ॥
ऋभु ओर महावीर गण परस्पर एक दृरेको प्रहार करने ठे ब्रहमतेजकै कारण विनाही यत्क शकरकै गण नष्ट होनेकगे ॥ २६ ॥ शिवकै
इच्छारप महाशक्ति से बह गण हत ओर दिद्रावित होगये यह बात अद्ुतसी हई ॥ २७ ॥ इस बातको देखकर इन्द्रादि सब देवता मरुदरणोके
तेषामाप ततां वेगं निशम्य भगवानभणुः ॥ यज्ञर्रेन यजषा दक्षिणा चदोन्सुने ॥२३॥ हूयमाने च भरयणा ससुत्पेतमडा
सुराः ॥ ऋभवो नाम प्रबल्वीरास्तञअ सदसशः ॥ २४ ॥ तेरकातायुधैस्तत् प्रमथानां सुनीश्व्र ॥ अभरछद्धं सविकटं श्रृण्वतां
रोमदर्षणम्॥२५॥ ऋशुभिस्तेमंहावीरेदन्यमानास्समन्ततः ॥ अयत्नयानाः प्रमथा उशब्धतरह्नतेजसा ॥२६॥ एवं शिवगणासते
व हता विद्राविता इतम् ॥ शिवेच्छया महाशक्तंया तदद्धतमिवाऽमघत्॥२७॥ तदष्टा ऋषयो देवाश्शक्रायास्समशद्रणाः॥ विश्वे
भ्विनौ ोकपालास्तष्णीं भृतास्तदाऽभवन् ॥२८॥ केचिद्विष्णं प्र तच परार्थयन्तस्समन्ततः॥ उद्विथा मेन्बयंतश्च विघाभावं
मुहुषहुः ॥२९॥ सुविचार्योदक॑फलं महोद्विभ्ास्सुबुदधयः॥ सरविष्ण्वादयोभरवन् तत्नाशाद्रावणान्शडः ॥३०॥ एवं भरतस्तदा यज्ञो
विघ्रो जातो दुरात्मनः ॥ ब्रहमबधोध् दक्षस्य शंकरदरोहिणो सुने ॥ ३१ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसंहितायां
द्वितीये सतीखण्ड सस्युपाख्याने सतीदेहत्यागोपद्रववर्णनं नाम तिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
सहित तथा विश्वेदेवा अश्रिनीकुमार सब ठोकपार मौन हो गये ॥२८॥ कोई उस समय स्वाभी विष्णकी भार्थना कंरनेकगे कोहं उद्विभर होकर
विरोके अभावकी पाथना करने खगे ॥ २९. ॥ अगले होनेवारे फल्को विचार कर विष्णआदि देवता शोच करनेरुगेभौर उक्त विघ्रको दूर् न
कर सकनेके कारण उद्वि्र होगये ॥ ३०,.॥ इसभ्कार स बहवेधुं शंकरकै दोही दुरात्मा दक्षके यज्ञमे विघ्र होगथा ॥ ३१ ॥
इति श्रीशिवमहाषराणभाषाीकायां सुद्रसंहितान्तगतद्वितीयसतीसड तिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
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बाजी बटे हे खनीश्वर ! उसीसमय वहां दक्ष ओर देवता आदिक सुनते हुए आकावाणी हू
॥ १ ॥ आकाशवाणी बोटी अरे दुराचारी |
(1 ध दक्ष ¡ दंभ आचारम परायण अरे मूढ ! यह तैन क्या अनर्थकारी कम किया ॥ २ अरे मूढ ! ततने व॒ आान॑दका देनेवाला शेवराज |©
॥१४५ || |||दधीचक जेष्ठ वचन न एुना ॥ ३ ॥ वह बाण घोर शाप देकर दहरे यज्ञे चलागया तो भी ठ मून चितम कु न समञ्च ||
&||॥ ४॥ फिर तने अपनी कन्याका भी आद्र किया जो मंगला सती स्वयं तेरे षर आईं थी ॥ ५॥ अरे अज्ञानी ! ने सती ओर ठ
¢| बहमोवाच ॥ एतस्मत्नतरे तत्र नभोवाणी सुनीश्वर॥ अवोचच्छृण्तां दकषुरादीना युथार्थतः ॥ 9 ॥ व्योमवाण्डुवाच ॥ रे र
|| दकष दुराचार द॑भाचारपरायण ॥ कि कृतं ते महामूढ कम चानथकारकम् ॥२॥ न कृतं रव्राजस्य द्धीचेर्वचनस्य दि ॥ प्रमाणं ४
¢ तत्कृते मूढ सवानिंदकरं शुभम् ॥३॥ निगतस्ते मखाद्विभः शापं दत्तवा ुदुस्सदम् ॥ ततोपि इद्धं किंचितनो त्वया मूढेन् चेतसि |
|| ॥8॥ ततः कृतः कथं नौ वे स्वपुत्यास्त्वाद्रः प्रः ॥ समागतायास्सत्याश् मंगलाया शृं स्वतः ॥५॥ सतीभवौ नाचितौ दि ||
|| किमि ज्ञानुचल ॥ बहमन इति वृथा गविंतोसि विमोहितः ॥॥ ६ ॥ सा सत्येव सदाराष्या सवां पापफलमदा ॥ त्रिखी |¢
कमाता कल्याणी शंकरा्दागभागिनी ॥ ७ ॥ सा सत्येवाचिता नित्यं सर्वसौभाग्यदायिनी ॥ माहश्वरी स्वभक्तानां स्वमेगल ||
ध दायिनी ॥८॥ सा सत्ये वाचिता नित्यं संसारभयनाशिनी ॥ मनोमीष्ग्रदा देवी सर्वोपद्रवहारिणी ॥ « ॥ सासत्ये वाचिता ||
, ९ नित्यं कीतिसंपत्पदायिनी ॥ परमा परमेशानी भुक्तिुक्तिभरदायिनी ॥ १० ॥ ट
ह. २ || || करका आदर न किया तू पोहित होकर बहाका एर ह॑ इत बाते गवं करता है ॥ ६ ॥ सब शण्योके फलकी देनेवाठी सतीकी ट
स.सं.२ ४ आराधना तूञ्चे सदा करनी उचित थी दह ॒त्रिोकीकी भाता कल्याणी सदा शंकरकै अद्धागभे निवासन करनेवाली थी ॥ ७ ॥ &
अ०३१ ||| उत सब सौभाग्यदेनेवाटी सतीकी सदा सेवा करनी चाहिये थी वह महेश्वरी अपने भक्तोको सदा पंगङ देनेवाटी है ॥ ८ ॥ वह नित्य ||
|| पूजन करनेसे संसारका भय नाशकरनेवाटी है बह देवी मनका अभीष्ट देकर सव उपदरवका नाश करनेवाटी हँ ॥९॥बह नित्यपूजित होने कीति |£
स
| ओर सम्पत् देनेटी ई वह प्ररमा प्रमेशानी भुक्ति यक्त देनेषाटी ह ॥१ ०॥ वह जगत्की माता सती जगत्रस्षण करनेवाटी है वह अनादि शक्ति ||
४ | | जगवृका संहार करनेषाटी है ॥११॥ वह सतीही विष्णमाता जगन्माता विापिनी बरहा, इन्द, चद्, अभि, खयौदिकी अनादि जननी है || `
\ ॥१२॥ बह सतीही तपस्या दान धर्मके फठकी देनेवाी ई बह शिवी शक्ति महादेवी दुषोकी मारनेवाटी पसे परे हँ ॥ १३ ॥ इसभकारकौ सती |©
देवी जिकी है परियपत्नी अरे मृढ।कुषिचारी तने उनको भाग नहीं दिया॥१ ४ शिदही परमेशान सके स्वामी परात्पर हँ वह विष्ण ब्रहलादिसे सेवित ।
# सा सत्येव जगद्धानी जगद्रक्षणकारिणी ॥ अनादिशक्तिः कल्पान्ते जगत्संहारकारिणी ॥११॥ सा सत्येव जगन्माता विष्णु ह
| माताविकासिनी॥ ब्रह्नन्द्रचन्दरवह्वयकैदेवादिजननी स्म्रता॥१२॥ सा सत्येव तपोधमेदातादिफल्दायिनी। शंधुशक्ति्महादेवी है
¢ दुदी परात्परा ॥१३॥ ईटग्विधा सती देवी यस्य पत्नी सदां प्रिया॥तस्मै भागो न दत्तस्ते मूढेन कुिचारिणा॥१४॥ शंथुहि न
¢ परमेशानस्सर्वस्वामी परात्परः विष्णुब्रह्मादिसंसेग्यः स्वकल्याणकारकः॥१५॥ तप्यते हितपः सिद्धेरेतदशनकांक्षिभिः॥ युज्यते ॥*
| योगिभिर्योगेरेतदशंनकांक्षिभिः।॥ १६॥ अनंतधन धान्यानां यागादीनां तथेव च॥ दशनं शंकरस्येव मदत्फरश्ुदाहतम् ॥१७॥ ¢
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शिव एव जगद्धाता सव॑विद्यापतिः प्रथुः ॥ आदिषिद्यावरस्वामी सवैमंगलमंगलः ॥ १८॥ तच्छक्तेनं कृतो यस्मात्सत्करोय
त्वयाखल॥ अत एवाऽध्वरस्यास्य विनाशो हि भविष्यति॥१९॥ अभमगलं भवत्येव प्रूजार्हाणामप्नया॥ पूज्यमाना च नासौ हि
यतः पूज्यतमा शिवा॥२०॥ सहस्रेणापि शिरसां शेषो यत्पादजं रजः॥ वहत्यहरहः प्रीत्या तस्य शक्तिः शिवासषती ॥ २१ ॥
सबके कल्याणकती है॥१५॥ इनक दरीनकी इच्छा करके सिद्ध जन तप करते है इन्हीके दशनकी इच्छसे योगी योग करते है ॥१६॥ अनन्त धन
धान्य तथा यज्ञादिका फ शकरकै दशनरेही होजाता है ॥१७॥ शिषही जगत्के धाता सव वियाके पति भु हँ वही आदि विंयके भेष्ठ स्वामी सब
म॑गलोके मगठ करनेवाठे है ॥१८॥ अरे खठ!जो कि तेने उनकी शक्िका सत्कार नहीं किया इ कारण दत यज्ञका विनाश होजायगा ॥१९॥ जहां
पूज्यजनोंकी पूजा नहीं होती वहां अमंगलही होता है क्या यह शिवा तुम स्वको पूज्यमाना नहीं थी ॥२०॥ शेषजी निके चरणोकी रजको
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सहश्षशिरसे प्रतिदिन प्रीतिपूर्वकं धारण करते है वही यह शिवा है ॥ २१ ॥ जित्तके च
प्र हए ह वही यह सती शिवजीकी भरिया है ॥ २२ ॥ जिनके चर्णोका ध्यान भौ
यही सती शिवकी भिया ह ॥ २३ ॥ जिनके चररणोका ध्यान ओर पूजन करके हृन्द्रादिक छोकपा्ने अपना पद पाया है॥२
शिषर जगतके पिता सती जगत्की माता ह हे मूढ ! तने उनका सत्कार न किया तेरा कल्याण कैसे
र पूजन करनेसे ब्रह्माजी ब्ह्मापनको प्रात हुए £ ||
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होगा ॥ २५ ॥ तञ्चमँ दुर्भाग्य ओर
यत्पादपद्यमनिशं ध्यात्वा संपूज्य सादरम् ॥ विष्णविष्ण॒त्वमापत्रस्तस्य शंभोः प्रिया सती॥२२॥ यत्पादपद्ममनिशं ध्यात्वा |©
संपूज्य साद्रम्॥ ब्रहम बरह्लत्वमापन्नस्तस्य शंभोः पिया सती ॥२३॥ यत्पाद्पद्ममनिशं ध्यात्वा सूज्य सादरम् ॥ इन्द्रादयो 0
रोकपालाः प्रापुस्स्वंसवं परं पदम् ॥ २४ ॥ जगत्पिता िव्शक्तिजंगन्माता च सा सती॥ सत्कृतौ न त्वया मूढ कथं त्रयो
भविष्यति ॥२९५॥ दौर्भाग्यं त्वयि संकरतं संकरतास्त्वयि चापदः ॥ यौ चानाराधितौ भक्तया भवानीशंकरो च तौ ॥२६॥ ट
अनभ्यच्यं शिवं शंय कल्याणं पराप्ठयामिति॥ किमस्ति गवो दुरवारस्स गव्य विनश्यति ॥२७॥ सवैशविषुखो भूत्वा | ¢
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षवेतेषु कस्तव ॥ करिष्यति सहायं तं न ते पश्यामि ७ यदि देवाः करिष्यंति साहाय्यमधुना तव ॥ तदा नाशं
समाप्स्यंति शरभा इव वह्विना ॥२९॥ ज्वरत्वद्् सुखं ते वै यज्ञध्व॑सो भवत्वति॥ सहायास्तव यावेतस्ते जवंत्वद्यसत्वरम्
॥ ३० ॥ अमराणां च सवेषां शपथोऽ्मगलाय ते ॥ करिष्यंत्यय साहाय्यं यदेतस्य दुरात्मनः ॥ ३१ ॥
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आपतति आकर प्रप्र होगदई जो तने भक्ति भवानी. शकरका आराधन नहीं किया ॥ २६ ॥ शकर शिवका विना अचेन् कयि भे कल्याण
कर दगा इस तेरे दवार गर्धका आज संडन होजायगा ॥ २७ ॥ सवैश शंकरे विल होकर देवताओभे तेरी कौन सहायता करेगा
मँ उसको प्वेथा नहीं देखता ॥ २८ ॥ यदि इस समय देवता तेरी सहाय करगे वै भी अभनिमे शठभके समान नाश ||
ह जागे ॥ २०. ॥ तेरा सुख जढजाय ओर यह यज्ञ ध्वंस होजाय ओौर जो तेरे सहायक है बह मी जठ जाँ ॥ २० ॥ सव देवताओको ||
रणोक्ा प्रतिदिन ध्यान करके विष्ण विष्णपनका र
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| नाश हो जायगा ॥ ३२ ॥ खनि नागादि शीघ इस यज्ञम निकठ जांय नहीं तो सवथा नाश हो जायगा ॥ २२ ॥ हे विष्ण ! तुम
भी शीघ्र इत मंडपते निकठ जाओ नहीं तो सर्वथा तुम्हारा नाश हो जायगा ॥ ३४ ॥ हे विधाता ! तुम शीघ दइ स्थानत निकठो नहीं र
ती स्वथ) तुम्हारा नाश होगा ॥ ३५॥ ब्॑ञाजी बोठे इसप्रकार सबके बडे हए यज्ञशालामे सबके कल्याणक निमित्त वह आकाशवाणी बोकर
त्वनिर्गच्छमरार्स्वोकमेतदध्वरमंडपात्॥ अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यय॒ सर्वथा॥३२॥ निर्गच्छंत्वप्रे सवे मुनिनागादयो
ठ मखात्॥ अन्यथा भवतां नाशो भविष्यत्य सर्वथा॥३३।॥ निगच्छ त्वं दरे शीघमेतदध्वर्मडपात्॥ अन्यथा भवतो नाशो भवि
है| ष्यत्ययय सर्वथा ॥३॥ निर्गच्छ त्वं विधे शीध्मेतदध्वरमडपात्॥ अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा ॥२८॥ ब्रह्मो
|| बाच॥ इत्यु्काध्वरशालायामखिलायां सुसस्थितान् ॥ म्यरमत्सा नभोवाणी सर्वकस्याणकारिणी॥२६॥ तच्छत्वा व्योमवचनं
% | सव हयादयस्पुराः अकाषुविस्मये तात घनयञ्च तथा परे ॥३७॥ इति श्रीशिवमहाएराणे द्वितीयायां ्रसंहितायां द्वितीये
¢ सतीखंड सल्युपाख्याने नभोवाणीवर्णने नामेक्चिशोऽध्यायः॥५१॥॥ नारद उवाच ॥ थत्वा व्योमगिरं दक्षः किमकार्षीत्तदाऽ
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ध तेरे अम॑गलके ल्म शपथ है किं यह इष॒ दुरात्माकी सहाय करे ॥ ३१ ॥ देवता बहुत शीघ्र इस मण्डपे निकरं जाये नहीं तो सेधा
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बुधः ॥ अन्ये च कृतवतः किं ततश्च किमभूद्रद ॥१॥ पराजिताः शिबगणाभय॒म॑जरबखेन वै॥ किमकाषचैः त गतास्तच्तवं वद
महामते ॥२॥ ब्रह्मोवाच॥ श्रत्वा व्योमगिरं स्वँ विस्मिताश्च सुरादयः ॥ नावोचत्किचिदपि ते तिष्ठन्तस्तु विमोहिताः ॥२॥
मौन हदं ॥ ३६ ॥ हरि आदि सब देवता भौर मुनि आकाशवाणीके इसभकार वचन सुनकर बडा विस्मय मानते भये ॥३७॥ इति श्रीशिव
महापराणेभाषादीकायां रुदरसंहितान्तगेतद्वितीयसतीखण्डे एकव्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ नारदजी बोरे आकाशवाणी सुनकर अदूरदशीं दक्षने अया
किया तथा ओर दृरोने कया किया आप इस बातको कहो॥।१॥ जब शिवजीके गण भुके मंजु पराजित होगये उन्होने क्या किया वे कहां गे |©
¢ हे महामते ! यह आप् तचे किये ॥२॥ ब्हयाजी बोरे आकाशवाणी सुनकर सब देवता विस्मयको भाप हृए ओर किंसीने कुछ न कहा मोहित होकर ॥2
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बैड रह गये ॥ ३ ॥ उधर भृयके मन्त्रवरक्े जो बीर भागगये थे वह॒ अवशिष्ट शंकरके गण शिवजीकी शर
तेजस्वी शकरके निकट जाय प्रणामकर आदरसे उन्होने सव चरित्र सुनाया ॥ ५॥ गण बोठे हे देवदेवं ! महा १
रक्षा कसो हे नाथ | आद्रसे विस्तारपूवक सतीकी वात्ता सुनो ॥ ६ ॥ है महेशान ! उत्त दुरात्मा दक्षन महागर्वसे देवता ओके सहित तीका ८
णमे गवे ॥ ४ ॥ ओर अमित
अनादर किया है ॥७॥ दुमको माग न देकर उन्होने अन्य देवताोको भाग दिया है ओर गर्वित हो दक्ने बड २ दवचन कहे ६।८॥हे भभौ ||!
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देष हम शरणमे आये हक ||
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॥१५१॥
पलायमाना ये वीरा भृयमेजबलेन ते ॥ अवशिष्टा श्शिवगणाश्शिवं शरणमाययुः ॥ ४ ॥ सर्वं निवेदयामाच श्द्रायामितते |
जे ॥ चरितं च तथभत सुप्रणम्यादराच ते ॥ ५.॥ गणा उदः ॥ देवदेव महादेव पाहि नश्शरणागताद् ॥ संशृण्वादरतो ||
नाथ सती वाता च विस्तरात् ॥ ६ ॥ गवितेन महेशानदक्षन सुदुरात्मना ॥ अवमानः तस्सत्याऽनादरो निर्जरस्तथा ||
॥ ७ ॥ तुभ्य भागमदात्नो स देवेभ्यश्च प्रदत्तवान् ॥ दुर्वचांस्यवदत्प्रोचेद्ो दक्षस्सु गविंतः ॥ ८ ॥ ततो दष्ा न ते भागं 8
यज्ञेऽकप्यतसती प्रभो ॥ विनि बहृशस्तातमधाक्षीत्स्वतज तदा ॥९॥ गणास्त्वयुतसंख्याका भृतास्त विकनया ॥ स्वां
गान्याछिघ्् शब्ैश्च ध्याम ह्यपरे वयम् ॥ १०॥ तज्ञ ध्वंसितं वेगात्सत्रदयास्त॒ भयावहाः ॥ तिरस्कृता हि भशणा ||4
स्वप्रमावाद्विरोधिना ॥ ११ ॥ ते वयं शरणं प्राप्तास्तव विश्वंभर प्रभो ॥ निभेयान् कुर् नस्तस्मादयमानभवाद्भयात्
॥ १२ ॥ अपमानं विशेषेण तस्मिन् यज्ञे महाप्रभो ॥ दक्षा्यास्तेऽखिला दष्टा अह्र्वन् गविंता अति ॥ १३॥
₹०६.१ ||@१|| यज्ञम आपका भाग न देखकर सती बडी कुपित हदं ओर अपने पिताकी निंदा करके उन्होंने शरीर त्यागन कर दिया ॥९॥ ठनाकै मारे दशवीस
प-स.२ ||@ || सह गणोने अपने शरीर त्यागन करदिये अपने शरीरोको शस काट्डाठा मौर शेष हम छोगोने श््रहण किये ॥१०॥ ओर भय देकर हम ||
अ०३२. ||| उस यज्ञको न्ट करनेको तस्र हृए उस् सभय आपके चरो मे म्बके हमारा पिरकार किया ॥१३॥ हे शंकर भमो ! हम भयत वाङ ||
| होकर आपकी शरण हूए है हमारा निदैयताके साथ तिरस्कार हा है आप हमपर दया करे निर्भय करं ॥ १२ ॥ ह गहाभमो ! उत यज्ञम ||
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|
| बडा अपमान हभा है ओर उन दुष्ट दक्ष आदिने गर्वे यह अपमान किया है ।। १३ ॥ यह हमने अपना ओर सतीका सब वृत्तान्त ]|
¢ आपसे कहा उन मूढबुद्धियोफे अपमानकी बात कही अब आपकी जो इच्छा हो सो करो ॥ १४ ॥ बरह्ाजी बोले इसभकार महामुने अपने ह
¢ गणक खसे इस बातको सुनकर उस चरित्रको शीघ जाननेकी इच्छा कर मनसे नारदजीको स्मरण किया ॥१५॥ हे दिव्यदशन नारदजी 1 #
तुम बहुत शीघर वहां पटच ओर भक्तिपूवेक प्रणामकर हाथ जोड स्थित हुए॥ १ ६। तुम्हारी शंसा करके स्वामीने सतीकी बात पृष तथा दक्षै |
ए यज्ञम जानेके सव समाचार प॥१७॥ह तात! जब शिवात्मा शंकरने तुमसे यह पा तब तुमने जो कुछ वहां हमा था सो सव कहेसुनाया ॥१८॥ ट ।
|| इत्यत्तं निखिरं वृत्त स्वेषां सत्याश्च नारद ॥ तेषां च मढबुदधीनां यथेच्छसि तथा कुरु ॥१९॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥इत्याकरण्यवच ट
| स्तस्य खगणाना वचः ्रथुः ॥ सस्मार नारदं सर्व ज्ञातं तच्चरितं रघ॥१८॥ आगतस्वं हृतं तज देवष दिम्यदशंन्॥पणम्य |©
शंकरं भक्तया सांजिस्तञ तस्थिवान् ॥१६॥ त्वां प्रशस्याथ स स्वामी सत्या वार्ता च प्ृ्टवान्॥दक्षयज्ञगताया वै परं च ||
चरितं तथा ॥१७॥पृष्ठन शंभुना तात त्वयाश्वेव शिवात्मना॥ तत्सवं कथितं वृतं ष दक्षाध्वर हि य॑त्॥१८॥तदाक्येश्वरो ||
वाक्यं सुने तच्वन्धुखोदितम्॥चुकोपातिद्तं शुद्र महारौदरपराक्रमः॥१९॥ उत्पायेकां जटां श्रो रोकसंहारकारकः॥आस्फा ||न
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लयामास रुषा पवैतस्य तदोपरि ॥ २० ॥ तोदनाच द्विधा भूता सा जटा च घने प्रभोः ॥ संबभूव महारावो महाप्रलयभीष |९
णः ॥ २१ ॥ तनटायास्समुद्धूतो वीरभद्रो महाबलः ॥ पूर्वभागेन देवष महाभीमो गणाथणीः ॥ २२ ॥ स भूमि विश्वतो ठ
` वृत्त्वयतिष्ठदशांग॒लम् ॥ प्रल्यानलसंकाशः प्रोन्नतो दोरस्सदसरवान् ॥ २३ ॥ ठ
है सने ! तब तुम्हारे मुखसे शिवजी वह सव चरित्र सुनकर महारो द्र पराक्रमी शंकर अत्यन्त कुषित हूय ॥१९॥ ठोकसंहारकारी रुदरने अपनी ट्
एक जटा उखाडकर बडे कोधसे पर्वतकै ऊप्र देमारी ॥२०॥ हे प्रभो ! पटकतेही उस जक दो खण्ड होगये ओर महाभरख्यके समान उसमेसे ||
| | भयेकर शब्द हुआ ॥ २१ ॥ उस जरासे महाबटी वीरभद्र उत्पन्न हुआ यह महाभयंकर वीरम अग्रणी जक पूवेभागसे उतपन्न हभ ॥२२ ॥ यह
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सभस्त भूमिके व्याप्त करके दशांयुपरिमित स्थानमे स्थित हभ प्ररयाधिके समान तेजस्वी दोसहस्च भुजावाखा था ॥ २३ ॥
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शि ०४० | >| उत समय महारुदके कपत सौ ज्र ओर तेरह भकारे सन्निपात परगट हूए ॥२४॥ जटाके वृरे भागे महाकाठ भ्रगट &३ 1 व |
॥१९५२॥ ||| महामयंकर ओर कोिभूतोते आदृत हदं ॥२५॥ यह सव ज्वर महाभरथकर कूरं धारण किये थे अपने तेज भज्यत हए महाकु
* 4 || तव ओरको जलानि रुगे ॥ २६ ॥ तव वीरभद्र वीर प्रमेश्वर्को प्रणाम करके हाथजोड बोरनेवारोमं शष्ठ इत भरकारसे कहने ठगा ॥ २७ ॥
कोपनिःश्वासतस्तज महाशद्रस्य चेशितुः ॥ जातं ज्वराणां शतकं संनिपाताघ्लयोदश ॥२४॥ महाकाली सयत्यत्रा तनटापरभा
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गतः ॥ महामथकरा तात भूतकोटिभिरावरृता ॥२५॥ सवे मूत्तिथराः कृशः स्वर छोकभर्यकराः ॥ स्वतेजसा प्रज्वलतो दहत ध
ठ इव सर्वतः ॥ २६ ॥ अथ वीरो वीरमद्रः प्रणम्य परमेश्वरम् ॥ कृतांजलिपुटः प्राह वाक्य वाक्यविशारदः ॥ २७ ॥ वीरभद्र
४ उवाच ॥ महारुद्र महारोद्र सोमसूर्याभिलोचन ॥ किं कर्तव्यं मया कायं शी्रमाज्ञापय प्रभो ॥ २८ ॥ शोषणीयाः किमी
शान क्षणर्दिनेव क्ििधवः ॥ पेषणीयाः किमीशान क्षणाद्धैनैव पर्वताः ॥ २९ ॥ क्षणेन भस्मसात्छुर्या ब्रह्मांडमुत किं हर ॥ ६
| क्षणेन भस्मसात्छर्यम्सुरान्वा कि बुनीश्वरान् ॥ ३० ॥ व्याश्वासः सर्वलोकानां किष चार्यो हि शंकर ॥ कतैव्य किमुतेशा |
६ | न सर्वप्राणिषिदिसनम् ॥३१॥ ममाशक्यं न छुवापि त्वत्पसादान्मरैश्वर ॥ पराक्रमेण सततुटयो न भूतो न भविष्यति ॥३२॥ ||६
६ | यर यत्का्दिश्य प्ेषयिष्यसि मां प्रभो ॥ तत्कार्य । सत्वरं त्वत्प्रसादतः ॥ ३३ ॥
ध हे ईशान ! क्या क्षणमात्रमें ससुद्रको सोख डाटं १ हे देव ! कया क्षणमेही पवेतोंको चरणं करडा ॥ २९ ॥ हे हर ¡ क्या क्षणमात्रमे बरह्माण्डको
१.१.२९ |© || भस्म करडा अथवा क्षणमात्रे देवता वा सुनीश्वरोको भरम कर दाहं ॥३०॥ हे शकर ! कया सव ठोकोंको अस्तव्यस्त करडा ॥ ३१ ॥ ||
अ०३२ ||| हे महेशान ! कया, म सव भाणिर्योको नष्ट कर डां हे महेश्वर ! आपकै परदे सञे कु भी अशक्य नहीं है पराक्रमम मेरे तमान न हभ है ‰
|| न होगा ॥३२॥ हे भभो ! जिस जिस कायक उदेश्यसे आप सुञ्चको भेजंगे बह वह कायं भँ आपकी छपे सम्पादन करेगा ॥३३॥ (५
वीरमद्र बोटे हे महार हे महारौद ! ह सोम्यं अभि नेतवाछे ! हे भमो ! सङ्े क्पा कायं करना होगा सो शीघ्र आप अज्ञा दीजिये ॥२८॥ ||}
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शंकर । आपके शासनसे शषुद्धरुषमी संसारसागरे पार होजाति है फिर क्या मँ आपकी कपासे महाआपत्तिके सागरमे तरनेको समथे नही) |
हं ॥२४॥ हे शंकर ! आपकी कपासे तृणभी महत् कायं करनेको समथं होस्कता है ओर आप क्षणमातमे करसकता है इसमे संदेह नही ॥ ३५॥ दे ||
शभो! यद्यपि आपकी ठीठामा्रसे सब सिद्ध कायं होता है तोभी अलुप्रह कारथके निमित्त सक्षे भेजो ॥ ३६ ॥ हे शकर] आपके अनुरहस सु ट
इतनी शक्ति है हे शंकर ! आपके अलुग्रहके विना किसे वह शक्ति नहीं ॥३७॥ आपकी आज्ञाके विना कोई तृणको चायमान करनेम भी ठै
ुद्ास्तरति छोकान्ि शासनाच्छकरस्य ते ॥ हरातोहं न फं तत महापरसागरं क्षमः ॥३४॥ त्वत्मरेषिततणेनापि महत्कार्यं |
मयत्ततः ॥ क्षणेन शक्यते कर्त शंकरा न संशयः॥३५॥लीलामत्रेण ते शंभो कायै यद्यपि सिद्धयति॥ तथाप्य परषणीयो त
तवैवानग्रहो द्यम् ॥३६॥ शक्तिरेतादशी शंभो ममापि त्वदनुग्रहात् ॥ विना शक्तिनं कम्यापि शंकर त्वदचयहात् ॥२७॥ 0
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त्वदाज्ञया विना कोपि तृणादीनपि वस्तुतः ॥ नैव चारयितुं शक्तस्सत्यमेतन्न संशयः ॥ ३८ ॥ शंभो नियभ्यास्सवेपि देवा
द्यास्ते महेश्वर ॥ तथेवाहं नियभ्यस्ते नियंतुस्सर्वदेहिनाम् ॥३९॥ प्रणतोस्मि महादेव भूयोपि प्रणतोस्भ्यहम् ॥ प्रेषय स्वेष्ठ
सिद्धयथ मामद्य हर सत्वरम् ॥ ४० ॥ स्पदोपि जायते शंभो सख्यांगानां सुहरुहः ॥ भविष्यत्यद्य विजयो मामतः प्रेषय
प्रभो ॥४१ ॥हर्षोत्साहविशेषोपि जायते मम क्न ॥ शंभो त्वत्पादकमले संसक्तञच मनो मम ॥४२॥ भविष्यति प्रतिपदं
सुभसंतानसंततिः ॥४३॥ तस्येव विजयो नित्यं तस्यैव श्चुभमन्वहम् ॥ यस्य शंभौ दढा भक्तिस्त्वयि शोभनसंश्रये ॥४४॥
प॒मथे नहीं होसषकता यह सत्य कहता हू इसमे संदेह नहीं ॥ ३८॥हे शंकर! जिस प्रकारसे सब देवता आपके नियममे स्थित हैँ हे देव! उसी प्रकारे
म आपके नियमे स्थित हूं ॥ ३९ ॥ हे महादेव! मे आपको वारंवार भरणाम करता हूं हे हर ! अपनी इ सिद्धिकरे खयि आप सङ्घे प्रेषित कीजिये
॥४०॥ हे शिवजी! मेरे दहने अग वारंवार फडक रहे ह हे भमो! आप जह स्ञे भजेगे वहीं विजय होगी ॥४१॥ सङ्घे किंञ्षी पकारका हषं ओर
विशेष उत्साह होरहाथा हे शिवजी! मेरा मन आपके चरणकमले गरहा है ॥४ २॥प्रतिपदमे अच्छे सन्तानकी सन्तति होती ३ै॥४३॥ उसीकी
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नित्य विजय ओर उसतीका निरन्तर कल्याण होगा जिततकी घुन्दर आशभयवाठे भाप रीकरकै चररणोमे मक्ति हौ ॥४४॥ ब्रह्माजी बोठे मगठा ||
॥१५२३॥ [||| पति भगवान् एसा घुनकर संतुष्ट हुए ओर हे वीरभद्र ! तेरी जय हो इत भ्रकारका आशीवाद दिया ॥४५॥ महेश्वर बोठे हे तात। ह वीरम् ||
¢ अच्छे चित्ते मेरे वचन सुनो मेरे सन्तोषकै निभित्त शीघ्रही मेरा वचन मानो ॥४ &॥ बह्याका पत्र दुष्ट दक्ष यज्ञ कर् रहा है वृह विशेषकर ट
मेरा विरोधी महाअहंकारी मूसे है ॥ ४७ ॥ यागपरिवार सहित उसका यज्ञ भर्म करके हे गण ! मेरे समीप शीघ्रही आओ ॥ ४८ ॥ ठ
¢ बरह्मोवाच ॥ इत्युक्तं तद्वचः थत्वा संतुष्टो मगलापतिः ॥ वीरभद्र जयेति त्वं प्रोक्ताशीः प्राह तं एनः ॥ ४५ ॥ महेश्वर ट
| उवाच ॥ श्रृणु मद्वचनं तात वीरभद्र सचेतसा ॥ करणीयं प्रयत्नेन तदूदुतं मे प्रतोषकम् ॥ ७६ ॥ यागं कतं सखुदयक्तो दक्षो
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विधितः खलः ॥ मद्विरोधी विशेषेण महागर्वोऽब्ुधोऽधुना ॥७७॥ तन्मखं मस्मसात्कृत्वा सयागपरिवारकम् ॥ पुनरायारि ट
मत्स्थानं सत्वरं गणसत्तम॥४८॥सुरा भवत गंधवां यक्षा वान्ये च केचन॥ तानप्ययेव सहसा भस्मसात्छुर् सत्वरम्॥४९॥ ट
तरास्व विष्णुर्न वा शचीशो वा यमोपि वा ॥भपि चायैव तान्सर्वान्पातयस्व प्रयत्नतः ॥५०॥ सुरा मवतु गंघवां यक्षा ट
वान्ये च केचन ॥ तानप्यदैव सहसा भस्मसात्छु सत्वरम् ॥ ५१ ॥ दधीविकृतयुष्य शपथं मयि ततर ये ॥ तिष्ठंति ते ॥2
प्रयत्नेन ज्वानीयास्त्वया धुवम् ॥५२॥ प्रमथाश्चागमिष्यंति यदि विष्ण्वादयो भमात् ॥ नानाकर्षणमत्रेण ज्वालयानीय ॥2
सत्वरम् ॥ ५३ ॥ ये तवोटष्य शपथं मदीयं गर्विताः स्थिताः ॥ ते हि मद्रोहिणोऽतस्तान् ज्वालयानलमालया ॥ ५९ ॥ |©
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₹० ६.९ ||@|| देवता गन्धव जो कोई भी वहां हो सहसा उन स्वको भस्म करदो ॥ ४९ ॥ विष्ण बरहा इद यम कोद भी वहां हो सबको जाकर नष्ट कुर ४
स.सं.२ ||| शठो ॥ ५० ॥ देवता गन्धवं यक्ष वा कोई जो हो उन सबको शीघही भस्म॒ करडाटो ॥ ५१ ॥ दथीचिके कत्यको उदधन करके ४
अ०३य् १ जो उनकी शपथको उद्वन करके स्थित हए है उनको तुम शीघ्रही भस्म॒ करडारो ॥ ५२ ॥ यदि प्मथोकि संग विष्ण भ्रमसे कोई कार्थं ||
कृरं तो अनेक भ्रकारके आकर्षण मत्रोते इनको भ्रज्वछ्िति करडालो ॥ ५३ ॥ जो उक्त ऋषिकी शपथके उ्षन करके गवंसे वहां ||
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स्थित हए है भरे बे दोही है अभिक ज्वाठामाङासे उन सबको भर्म करडाो ॥५४॥जितने दक्ष यज्ञम स्थित ह उनको ची धन आदिक स॒हित् 2
भस्म करके शीघ मेरे पास चके आओ ॥ ५५ ॥ तुम्हारे जानेपर विश्वादि देवता तुम्हारी स्तुति करगे तो भी तुम न मानकर उनको अश्चिसे ४
भस्म करदेना॥५६॥ जितने देवता हमे द्रोह करते है उनको शीघ्रही ज्वारामाराते आकुर कर अश्चिसे जखाडाटना ध्यान मत कंरना कि यह् मं्पाल्कं ४
है ॥५७॥ ओर सपत्नीक तथा गंधर्वोसहित सब दक्षादिको भस्म करके हे वीर! पीछे नीरधाराका जठ पीना॥५८॥ ब्रहनाजी बोडे वेदमयीदापाटक ¢
सपत्नीकान्ससारां च दक्षयागस्थलस्थितान् ॥ प्रज्वाल्य भस्मसात्कृत्वा एुनरायाहि सत्वरम् ॥ ५५ ॥ तर त्वयि गते देवा
विश्वाय अपि सादरम् ॥ स्तोष्यति त्वां तदाप्याशु ज्वालया ज्वाख्येव तान् ॥ ९६ ॥ देवानपि कृतद्रोहान् ज्वारामालासमा |
कुलेः ॥ ज्वालय ज्वलनेश्शीध्रे माध्यायाध्यायपाखकम् ॥ ५७ ॥ दक्षादीन्सकलांस्त् सपत्नीकान्सर्बांधवान् ॥ प्रज्वार्य वीर ए
दक्ष नु सलीरं सखिरं पिब ॥ ५८ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तो रोषताभ्राक्षो वेदमयीदषाखकः ॥ विरराम महावीरं कालारिस्सकले ट
श्वरः॥ ५९ ॥ इति श्रीशिव महापुराणे द्वितीयायां शूदसंहितायां द्वितीये सतीखंड वीरभदोत्पत्तिशिवोपदेशवर्णनं नाम द्वा ॥£
शोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तं श्रीमहेशस्य त्वा वचनमाद्रात्॥ वीरभद्वोतिसंतुष्टः प्रणनाम सदहेशवरसम् ॥१ ॥ ||
शासनं शिरसा धृत्वा देवदेवस्य श्ूकिनः॥ प्रचचार ततः शीरं वीरभद्रो मखं प्रति ॥२॥ शिवोथ प्रेषयामास शोभार्थं कोटिशो |£
गणान्॥ तेन साद्धे महावीरान्प्रख्यानलसत्निभान् ॥ ॥ ३ ॥ ८
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शिवजी रोधसे टाठनेत्रवाठे काठके भी शतु सकटेश्वर महावीरसे एसा कह भौन हए ॥ ५९ ॥ ॥ इति श्रीशिवमहाऽराणभाषादीकाथां रुद
संहितान्तगेत द्वितीयस्तीखण्डे द्वा्िंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ ॥ श्रीब्ह्ाजी बोरे इसप्रकार सदेश्वरके कहे हए वचन आदरसे सुनकर वीरभद्रन
बहुत संतु होकर महेश्वरको प्रणाम किया ॥ १ ॥ देवदेव शंकरके शासनको शिरप्र धारणकर वीरभद्र बहुत शीघ यज्ञस्थानको चला ॥ २ ॥
शोभाके दिये शंकरने ओर भी कोयियों ग्णोको भेजा बह महावीर प्रखयाधिके समान उष्के साथ चे ॥ ३ ॥
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| तब वे सव परवल गण वीरमदरके आगे २ ओर पी पीछे बडे कुतूहक करते चे ॥ ४ ॥ वीरभद्र साथ जो भवटंगणथे प काछ्कै 9
शंकरे जो पार्षद थे वह सबही रुद्रके स्वरूप थे ॥ ५॥ वह महात्मा वीरभद्र शिबजीका ष धारण किये सहस्र मुजा धारे पपराजप वर्त
महाभवल शत्रुओंको भय देनेवाछे रथके ऊपर स्थित होकर चला ॥६॥ उसके रथकृ भरमाण दोह नल्व ( ४०० हाथ ) था ओर उसको
दशसह सिंह वहन करते थे ॥७॥ इसीभकारते पावरक्षक भी बहते सिंह थे, शाद मकर त्सय ओर हाथी सुहस्चों चठे ॥८॥ जिससमय
अथ ते वीरभद्रस्य पुरतः प्रबला गणाः॥ पश्चादपि यथुर्वीराः कुतूहलकरा गणाः ॥४॥ वीरभद्रसमेता ये गणाश्शतसदस्रशः॥ पाष
०,
दाः कालकालस्य सव द्रस्वरूपिणः॥५। गणेस्समेतः किरतेमंहातमा स वीरभद्रो हर्वेषभूषणः॥सदखबाहृयजगाधिपादयो ययौ
रथस्थः प्रबकोतिभीकरः ॥६॥ नल्वानं च सहसे दवे परमाणं स्यंदनस्य दि॥अयुतेनैव सिंहानां वादनानां भ्रयत्नतः॥ ७॥ तथेव
प्रलाः सिंहा बहवः पार््वरक्षकाः ॥शादखा मकरा मत्स्या गजास्तत सदस्शः॥८। ।वीरभद्रे प्रचलिते दक्षनाशाय सत्वरम् ॥
कतपवृक्षसयुत्सृष्टा पष्पवृटिरथेत्तदा ॥९॥ तुष्ट्डु् गणा वीरं शिपिविष्ट भरचेष्टितम्॥ चङ्घः कुतूहलं सव तस्मिश्च गमनोतसवेः
॥१०॥ काटी कात्यायिनीशानी चाथडा घंडमरदिनी॥मद्रकारी तथा भद्रा त्वरिता वेष्णवी तथा ॥ ११ ॥एताभिर्नवदुर्गामिमं
हाकाली समन्विता॥ययो दक्षविनाशाय सर्वभूतगणेस्सई॥१२॥ डाकिनी शाकिनी चेव भूतप्रमथयुद्यकाः ॥ करष्माडाः पटा
ञ्चैव चरका ब्रह्मराक्षसाः ॥१३॥ भेरवाः क्ेनपााशच दक्षयज्ञविनाशकाः ॥ निर्थयुस्त्वरितं वीराशिशवाज्ञाप्रतिपालकाः ॥१४॥
दक्षके नाश करनेके निमित्त वीरभद्रने गमन किया उस समय उनपर् कल्पत्रक्षके ष्पोकी वपाँ हई ॥ ९ ॥ शिवकौ चेष्टावाटे उस रकी
गण स्तुति करने कगे ओर उसके गमनये सवकोदं कोतूहठ करने ठगे ॥१०॥ कारी) कात्यायनी, ईशानी, चाण्डा, अडमर्दिनी; |
भद्रा, लसिता, वैष्णवी ॥ ११ ॥ इन नौ दु्गीओंके संग महाकाटी दक्षके नाश करनेके निमित भूतगणोके प्राथ चटी ॥ १२ ॥ डाकिनी,
शाकिनी, भूत, प्रमथ, गुद्यक, कूष्माण्ड, पप, चटक, बहमरा्षस ॥ १३ ॥ भैरव, कषेतरपाठ यह सब शिवजीकी आज्ञासे दक्षके यज्ञ विनाशकै
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॥१५४॥
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५ छिये बहुत शीघरतासे चठे ॥ १४ ॥ इसी भकार चौसठ योगिनी गरणोके साथ चीं यह सब कोधकर दक्षका यज्ञ नाश करनके स्थि चे
॥ १५ ॥ हे नारदजी मे तुमे उन ग्णोकी सख्या कहता हं उन धैयेशाटी महावलि्योमभं संवगण सख्य था ॥ १६ ॥ शकुकणे दशकोरि
गण ठेकर चढा, केकराक्ष, दशकोरि, वित आढ कोरि, ॥ १७ ॥ विशाख चौं कोरि, पारियात्र नौकोरी, सर्वाकक छःकोटि, वीरविकता
नन छःकोटि ॥ १८ ॥ गणश्रष्ठ ज्वाठ कोश बारह कोरि, समद, सातकोरि, दु्रस् आढ कोरि ॥१९॥ कपाटीश पंचकोटि, संदारक छःकोरि
तथेव योगिनीचक्रं चतुःषष्टिगणान्वितम्॥नियंयौ सदसा छदं दक्षयज्ञं विनाशितुम्॥१५।। तेषां गणानां सवेषां संख्यानं शण
नारद्॥महाबलवरता संघो खख्यानां घेथशाछिनाम्॥१६।अभ्ययाच्छंङु कण दशकोल्या गणेभ्वरः॥ दशभिः केकराक्षश्च विकतो
हामिरेव्॥१७।चनुःषष्टया विशाखश्च नवभिः पारयात्रिकः ॥ प्ड्भिस्सवाङ्को वीरस्तथेव विकृताननः ॥१८॥ ज्वाखकंशो
द्ादुशभिः कोटिभिर्गणर्ुगवः॥ सप्तभिः समदन्नीमान् इदभोष्टाभिरेव च॥१९॥पचभिश्च कपालीशः षडभिस्संदारको गणः ॥
कोटिकोटिभिरेवेह कोरिङकण्डस्तथेव च ॥२०॥ विष्ठभोऽष्टाभिर्वीरेः कोरिभिर्गणसप्तमः॥ सहस्कोटिभिस्तात संनादः पिप्पल
स्तथा ॥२१॥ आवेशनस्तथाष्टाभिरष्टामिशचद्रतापनः ॥ महवेशः सहस्रेण कोरिना गणपो वृतः ॥२२॥ ङृण्डौ द्रादशकोरी
भिस्तथा पवतको सने ॥ विनाशितं दक्षयज्ञं निर्ययौ गणसत्तमः ॥२३॥ कालश्च कालकथेव महाकालस्तथेव च ॥ कोटीनां
शत केनेव दक्षयज्ञं ययौ भ्रति ॥ २७ ॥ अग्िङृच्छतकोलया च कोव्याभिञ्चख एव च ॥ आदित्यमर्ध कोल्या च तथा चैव
चनावहः ॥ २५ ॥ सन्नादश्शतकोव्या च कोटा च कुञुदो गणः ॥ अमोघः कोकिल्शथेव कोरिकोल्या गणाधिपः ॥ २६ ॥
कोटिकुण्ड एकएक कोटि ॥ २० ॥ किष्टमवीर आढकोटि, वीर सातकोटि, शनाद ओर पिप्पल सहन्न कोटि ॥ २१ ॥ आविशन आढकोरि,
चन्दतापन आठकोटि, महावैशगणपति सहस्रकोटि ॥ २२ ॥ ण्डी ओर पवैतक १२ कोटितैना छेकर दकषयङ्गके नाश करको चे ॥२३॥ ||£
काठ काठकं ओर महाकाठ यह सौ सौ कोटि ठेकर दक्षका यज्ञ नाश करनेको चे ॥ २४ ॥ अ
भित शतकोटि, अशित एककोटि, ||£
आदित्यमूप्र ओर वनाबह एकएकं कोटि ॥ २५ ॥ सन्ना सौ कोटि, कुखदं एककोरि अमोघ कोकिंठ गणाधिप एकं एककोरि ॥ २६ ॥
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यः
> 24 324 बट > रे 24 चट ‰4 दद
| काष्टागुढ, सुकेशी, वृषभ, गणाधीश, सभचरक यज्ञ सव चौसठ चौसठ कोटि ठेकर चठे ॥ २७ ॥काकपादोदर साठकोटि, सन्तानक गण ए ट्
& कोरि ॥ २८ ॥ भष्ठगण महार नौ कोरि ॥ २९ ॥ इसी प्रकार गणाधीश मधूर्पिग चछा नीर ओर पूणभद्र नब्वेकोटि ॥२०।। चतुवक्र
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कोटि ठकर चला काषठगूह सुकेश दृषम, चौसठकोटि। ३३॥ गणेश्वर विपक्ष चौसषठकोटि ताख्कैतु षट्खस पचस गणेश्वर ॥३२॥ सम्ब
¢
कुटिश स्वयं भमु हे मुने ! ठोकान्तक दीपतासा तथा दौयान्तक ॥ ३३ ॥ देवदेवके श्रिय श्रीमान् भृगीरिटि अशनी ओर भाककगण चौसठ सह ४
काष्ठागूटश्चतुःषषटय। सुकेशी व्रषभस्तथा ॥ समन्वको गणाधीशस्तथा तात सुनिर्ययौ ॥२७॥ काकपादोद्रः ष्िकोटिभिग र
णसत्तमः ॥ तथा सन्तानकः षष्टिकोटिभिगंणपुगवः ॥ २८ ॥ महाबलश्च नवभिः कोटिमिः पंगवस्तथा ॥ २९ ॥ मधुषिग ठै
स्तथा तात गणाधीसो हि निर्ययौ ॥ नीलो नवत्या कोटीनां पूरणभद्रस्तथैव च ॥ ३० ॥ निर्ययो शतकोटीभिश्वतुरवक्रो गणा र
पिषः ॥ काष्ठायुटेश्चतुष्षष्टया सुकेशो वृषभस्तथा ॥३१॥ विह्ूपाक्षश्च कोटीनां चतुःषष्टया गणेश्वरः ॥ तालकेतुः षडास्यश्च
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ट| प॑ंचास्यश्च गणाधिपः ॥३२॥ संवतकस्तथा चैव इुलीशच स्वयं परभुः ॥लोकांतकश्च दीप्तात्मा तथा दैत्यान्तको सुने ॥३३॥ ६
गणो भगीरिरिः श्रीमान् देवदेवपियस्तथा ॥ अशनिर्भाखकश्चैव चतुःषष्ठया सदस्कः ॥३४॥ कोरिकोरिसहस्राणां शतेर्विंश ट
ट| तिभिक्रतः ॥ वीरिशो ह्मभ्यथाद्रीरः वीरभद्रं शिवाज्ञया ॥३५॥ भूतकोरिसदसेस्तु प्रययौ कोटिभिच्िभिः ॥ रोमजेः ~वगणे ठ
|| ओव तथा वीरो ययौ इतम् ॥ ३६ ॥ तदा भेरीमहानादः शंखाश्च षिविधस्वनाः ॥ जटादरोभरुखाश्चेव श्रंगाणि विविधामि ट
|| च ॥ ३७ ॥ ते तानि विततान्येव बेधनानि सुखानि च ॥ वादित्राणि विनेदुः विषिधानि महोत्सवे ॥ ३८ ॥ ट
कोटि ठेकर् चे ॥ ३४ ॥ इत प्रकार वीरेश वीरभद्र शिवजीकी आज्ञासे सहश सकट बियो कोियों सेनापते आघ्रृत होकर चछा ॥३५॥ |©
सहशञोकोटि भूत तीनकोटि दूरी जातिकै मूत रोमज ओर श्वगणोके साथ वीरभद्र चछा ॥ ३६॥ उस समय मेरी शखका बडा शब्द होनेटगा
जटाहर ओर सुरखोके अनेक प्रकारके शब्द होने ठे शरगोके शब्द हूए ॥ ३७ ॥ वे बधस्थानोंपर सुखदायक शब्द विस्तृत होने छगे उस उत्सवमे ॥
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# अनेक भकारके शब्द होनेठगे ॥ ३८ ॥ हे महासने ! सबल्वीरभद्रकी याताम अनेक सुखदायक शकुन हुए ॥ ३९ ॥ इति भरीशिवमहापएरा
£ णभाषादीका्यां रद्रसंहिताऽन्ततद्वितीयसतीखण्डे त्रय्धियोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी बोरे जन इसप्रकारके गणोँके सहित वीरभद्र चला
|| तब दक्षने ओर देवताओंने चिह्न जान च्ि॥ १॥ हे देवँ ! उत्त समय यज्ञके विध्वंस होनेवाटे तीन प्रकारक उत्पात वीरभद्रके चठ
ह|| नेमं हए ॥ २ ॥ दक्षकौ बाई आंस बाहू ऊर फडकने ठगी ओौर भी अनेक प्रकारके कष्टभद् उत्पात दिखाई देनेरगे ॥ ३ ॥ उत्त समय
|| बीरभद्रस्य स सबलस्य महाशुने ॥ शङ्कनान्यभवस्तञ् भूरीणि ५ सुखदानि च ॥ ३९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्विती
¢| याया संहितायां द्वितीये सतीखण्डे वीरभद्रयावावर्णनं नाम अयच्िशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं प्रचछिते चा
र स्मिन् वीरभद्रे गणान्वित ॥ दु्टचिह्वानि दक्षेण दृष्टानि विदुधेरपि ॥ १ ॥ उत्पाता विविधाशासन् वीरभदे गणान्विते ॥
र िविधा अपि देवष यज्ञविध्वंससूचकाः ॥ २ ॥ दक्षवामाक्षिबादूरूविस्पद स्समजायत ॥ नानाकष्टप्रदस्तता सर्वथाऽश्चुभसू
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कुरोभूदिवाकरः ॥ परिवेषसदहसेण संकातश्च भयंकरः ॥ ५॥ नक्षत्राणि पतंतिस्म विष्ठद्चिष्रभाणि च ॥ नक्षत्राणामभुद्रका
गतिश्चाधोभखी तदा ॥ 8 ॥ गधा दक्ष शिरः स्पृष्ठा समुद्धताः सदखशः॥ आसीद्गधपक्षच्छयेस्सच्छायो यागमंडपः ॥ ७ ॥
ववाशिरे यागभरमौ कोटरो नेवकस्तदा ॥ उल्कावृटिभूत्तच शवेतशिकंभवा ॥ ८ ॥
दक्षकै यज्ञम् भूमि केपायमान होनेगी म॒ध्याहमेही दक्षको नक्षत्र दिखाई देनेकगे ॥ ४ ॥ दिशा मलीन होगईं स्थम काठेदाग दिखाई देने
ठगे ओर संकडों भयंकर परिषेश दिखाई देनेकगे ॥ ५॥ ओर बिजली ओर अभिक्रे समान नक्षत्र गिरनेुगे ओौर नक्षत्रोकी गति वक्र हो
गं तथा अधोमुखी गति होगदं ॥६॥ सैकडों गृद्ध दक्षका शिर स्पश करके उडनेकगे धहोकी छाये यज्ञमण्डप आच्छादित होगया ॥ ७ ॥
गीदड ओर नेत्रकपृक्षी उस समय शष्द करने ठगे खेत वृभिकोके साथ उल्कादृष्टि होनेखभी ॥ < ॥
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चकः ॥ २ ॥ पूर्कपस्समभूत्तच दक्षयागस्थके तदा ॥ दक्षोपश्यच मध्या नक्षवाण्यद्धतानि च ॥४॥ दिशश्चासन्घुमछिनाः 9
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पाशुद्रधके साथ तीक्षण पवन बहनेखगी चारो ओर शम भगट होगे आवतकी पवन बडे वेगे चछनेगौ ॥ ९ ॥ रीतिवाटी पवनोसि
॥१५६॥
दिक सब रुधिर वमन कंरनेटगे तथा शल्य
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दक्षका मण्डप उढने ठग दैवते दक्षके यागे यह अदत नूतन बात हदं ॥ १० ॥ दक्षा
गये शद्खधारासे हतहुएके समान सव को ४
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¢5|| सहित मांसके संण्ड वमन ॒करनेटगे ॥ ११. ॥ सव॒ दीपक वातसे हतके समान कषित हौ हे एह गये
(|| दुभ्खी हो गये ॥ १२ ॥ उस्न समय बडे शब्दे आंस बरसने ठगे जसे सवेर् ओकी बंदोति कमृ व्याप हींष सवके ५ ही
|| सरा वाता वबुस्तच पा्चवष्टिसमन्विताः ॥ शकभाश्च सयुदरत। विवर्तानिलकंपिता।९॥ रीत पवनरुदष्व स दकान्वरमडप ¢
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देवान्वितेन दक्षेण यः कृतो गूतनोद्धतः ॥ 9१° ॥ बेषदक्षादयस्सवे तदाशोणितमद्धतम् ॥ वेषुश्च मांसखण्डानि सशल्यानि हु
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संहः ॥ ११॥ सकंपाश्च बभूबस्ते दीपा वातहता इव ॥ दुःखिताश्वामवन्सवे शख्लधाराइता इव ॥ १२॥ तदा निना दजातानि ||
बाष्पवर्षाणि तत्क्षणे ॥ प्रातस्तुषारव्षीणि पद्चानीव वर्नातरे ॥१३॥ दक्षा्यक्षीणि जातानि द्कस्माद्विशदान्यपि ॥ निशायां ४
कमला्ैव कुयुदानीव संगवे ॥१४॥ असग्ववर्ष देवश्च तिमिरेणाघ्रता दिशः॥दिग्दाहोभूद्विशेषेण ्रासयन् सकलाना न् ॥१५५॥ ¢
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८ एवं निधान्यरिष्टानि दद्शविबुधादय्ः॥ भयमापेदिरेऽत्यंतं शने विष्ण्वादिकास्तदा ॥१६॥ धुवि ते मृषिताः पेतुहां हताः स्म |||
¢| इतीरयन् ॥ तरवस्तीरसंनाता नदीवेगहता इव ॥ १७ ॥ पतित्वा ते रिथिता भूमौ ऋूराः ८ सुपां इता इव ॥ कंदुका इव ते ९
||! पतिताः पुनरुत्थिताः ॥ १८ ॥ ततस्ते तापूसंतप्ता इदुः कुररी इव ॥ रोदनध्वनिसंकरातोरुकतप्रतयुक्तिका इव ॥ १९ ॥ ४
स.खं.२ ||५४|| अंधकारसे व्याप हो गई विशेषकर सव जनोंको दुःख देनेवाा दिग्दाह होनेढगा ॥ १५ ॥ इस प्रकार देवताओनि अनेकं अरि देखे ट
अ०३४ ||| है सने । विष्ण आदिकोने बडा भय पाया ॥ १६ ॥ हा हम मरे दा ककर बे भूमिम गिरपड जैसे नदीके वेगसे फिंनारेकै क्ष गिरजाते ह ठ
। १७ ॥ करूर सर्पते हतहएके समान वै पित होकर भूमिप्र स्थित हूए गेदके समान वे उढते ओौर गिर पढते थे ॥ १८ ॥ र षे तापते॥९/
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रसं. २ ||| ॥ १३ ॥ अकस्मात् दक्षादिके नेतर विशद हो गये जेते रातं कद होजाते है ॥ १४ ॥ आकाशते रुभिर वर्षे ख्गा दिशा
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सन्तप्त हो कुररीकेत्तमान रोने लगे उक्ति त्युक्ति करके रोने गे॥ १ ९॥ विष्णसहित सबकी शक्ति कुठित होगरं करके समान अपने अपने स्थाने
रोटने छगे ॥२०॥ उसी समय वहां आकाशवाणी हई ह सव देवताओने ओर विशेषकर दक्षन सुनी ॥ २१ ॥ आकाशवाणी बोटी हे दक्ष
तुमको धिक्कार है तुम बडे पापी मूढहो त्को हरते अनिवायं दुःख भाप होगा ॥२२॥ सेद है किं यहां जितने देवता स्थित है उन सबको भी
महादुःख उपस्थित होगा इसमे सदेह नहीं ॥ २३ ॥ बरहाजी बोठे यह आकाशके कचन सुन ओर आरि देख दक्ष ओर दूरे देवताओंने बडा
सेङंस्ततस्सवें तदा कुंितशक्तयः ॥ स्वस्वोपकंठमाकंठं लुटः कमग इव्॥२०॥ एतस्मिंत्रतरे त्र संजाता चाशरीरवाक्
॥ श्रावयत्यखिलान् देवान्दृक्ष चैव विशेषतः ॥२१॥ आकाशवाण्युवाच ॥ धिक् जन्म तव दक्षाय महामढोसि पापधीः ॥
भविष्यति महृढःखमनिवार्य दरोद्भवम् ॥२२॥ हाहापि नोच येमूटास्तव देवादथस्थिताः ॥ तेषामपि महादुःखं भविष्यति न
संशयः ॥२३॥ ब्रह्लोवाच ॥ तच्छत्वाकाशवचनं दष्ठारिष्टानि तानि च ॥ दक्षः रापद्धयं चाति प्रे देवादयोपि इ ॥२४॥ वेष
मानस्तदा दक्ष विकलश्चाति चेतसि ॥ अगच्छच्छरणं विष्णोः स्वप्रभोरिदिरापतेः ॥२५॥ सप्रणभ्य भयाविष्टः संस्तूय च
विचेतनः ॥ अवोचद्रेवदेवं तं विष्णं स्वजनवत्सलम् ॥ २६ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां हढसंदिताथां द्वितीये सती
सड इुशङकनद्शनं नाम चतु्धिशोऽध्यायः ॥२९॥ दक्ष उवाच ॥ देवदेव हरे विष्णो दनवंधो कृपानिे ॥ मम रक्षा विधा
तन्या भवता साध्व्रस्य च ॥१॥ रक्षकस्त्वं मखस्येव मखकमां मखात्मकः ॥कृपा विधेया यज्ञस्य भगो भवतु न प्रभो॥२॥
ल माना ॥२४॥ द्षकम्पायमान होकर् चित्तम बडा व्याकुठ हुआ ओर ठक््मीपति अपने परभुकी शरणमे गया ॥ २५।। प्रणामकर स्तुति की
वमहाष्याणभाषादीकायां रुदर हिताऽन्तर्मतद्वितीयस्षतीखण्ड चतु्चिशोऽ
भयके मारे व्याकरुक अचेतन हो मक्तवत्सक विष्णनी बोरे ।२६॥ इति श्रीश
ध्यायः ॥३४॥ दक्षजी बोठे हे देवदेव 1 हे हरे ! हे विष्णो ! हे दीन्धरु ! हे कपाकषागर ! सेरी रक्षा इश यज्ञम जेसे हो वैसे करनी चाहिये ॥ १ ॥
भाप यज्ञके रक्षक मखके करवाठे साक्षात यज्ञात्मा हो हे पभो ! रती छपा करो जिसमे शृज्ञका भग नहो ॥ २॥
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बह्माजी बोटे इतपरफार आदरे दक्षने बहुत विज्ञ की ओर भयसे व्या
| कुड मन होकर दक्ष विष्णजीके चरणो गिरे ॥ ३ ॥ तन व्याकरट ||@
॥१५७॥ ||| मन द्षजीको विष्णने उढाक्र ओर उतत कुमतिके वचनो सुनकर शिवजीको स्मरण किया ॥ ४ ॥ महेशान अपने भु परमेश रिवो &
स्मरण कर शिवतत्वके जाननेवाठे हरि दक्षको समञ्चाते हए बोरे ॥ ५॥ हरि बोटे दक्षजी तुम तत्वसे मेरे वचन सुनो भै कहता हूं सर्वथा पे ट
तुमरे हितका करनेवाला महा्म्र कहता हं ॥६॥ हे दक्षजी ! आपने सबके अधीश्वर शकर परात्माका तस्व न जानकर उनका निराद्र किया ४
॥ ब्र्लोवाच॥ हत्थं बहुविधां दक्षः कृत्वा विज्ञप्तिमादरात् ॥ पपात पादयोस्तस्य भयग्याकुखमानसः ॥३॥ उत्थाप्य तं ततो ¢
विष्णं वि्कित्नमानसम् ॥ अत्वा च तस्य तद्वाक्यं ङमतेरस्मरच्छिवम् ॥४॥ स्म्रत्वा शिवं महेशानं स्वप्रभुं परमेश्वरम् ॥ ९
महाम॑जसलपदम् ॥६॥ अवज्ञा हि कृता दक्ष त्वया तत््वमजानता ॥ सकलाधीश्वरस्यैव शंकरस्य परात्मनः ॥७॥ ईन्वराव ९
ज्ञया स्वं कायं मवति सर्वथा ॥ विफलं केवलं नैव विपत्तिश्च पदेपदे ॥८॥ अपूज्या यच पूज्यंते पूजनीयो न पृूज्यते॥ीणि |£
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तत्र भविष्यंति दारि मरणं भयम् ॥९॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन माननीयो वृषध्वजः॥ अमानितान्मदेशाच्च मदद्यषुपस्थितम् ४
॥ १० ॥ अद्यापि न वयं सवं प्रभवः प्रभवामहे ॥ भवतो दुनैयेनैव मया सत्यशुदीय्यंते ॥ ११ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ विष्णोस्तदर |©
चनंशरत्वा दक्ष्ितापरोऽभवत् ॥ विवणवदनो भूत्वा तुष्णीमासीद्धवि स्थितः ॥ १२ ॥ {
७॥ दै्रकी अवज्ञा करनेते केवठ कार्यं विफठही नहीं होता किन्तु पदपदमं विपत्ति पडती है ॥ ८ ॥ जहां अपूजयोका पूजन ओर पूज्योका ||#
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। अवदच्छिवतचत्छज्ञो दक्ष सबोधयन्हरिः ॥ « ॥ हरिर्वाच ॥ श्रृणु दक्ष प्रवक्ष्यामि तत्वतः शृणुमे वचः ॥ सर्वथा ते हितकरं
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सख. || सत्कार होता है कहां दाख मरण ओर. भय यह तीन बाते होती है ॥ ९ ॥ इस कारण शिवजी सब प्रयतते मान्य है शिवजीका मान्य न ||
अ०३५ || || करनेते यह महाभय उपस्थित हुआ है ॥ १० ॥ तुम्हारी दुनींतिसेही इस समय हमारा किततीका भभाव नहीं रहेगा यह भँ सत्यही कहता हूं
||| ॥११॥ ब्रह्माजी बोरे विष्णकै यह वचन सुन दक्षजीको बदी चिता हूं ओर व्याकु मन बिवणं खल होकर पृथ्वीम मौन हो स्थित हए ॥ १२॥ ||५
५६|| इसी अवस्रमं महापेनाकै नाथ रुद्रसे भरित गणनायक वीरभद्र वहां उपस्थित हआ ॥ १३ ॥ कोई गण उप्के पीछे ओर कोई आकाशते
८; आये कोई दिशा विदिशासे आकर वहां स्थित हए ॥ १४ ॥ वह गण शिवजीकी आज्ञा निर्भय महाशूर भयंकर पराक्रमी थे वह वौरशभेष्ठ
4 अरूप सिंहनाद् करने ठगे ॥ १५ ॥ उमकै नादे तीनोभुवन शब्दायमान हो गये रजते आकाश ओर अंधकारसे दिशा व्याप्त होगई।।१ ्
भयके मारे सातद्वीपवरी पृथिवी चायमान होगदं परवत बनोंस्हित सखद चलायमान होगये ॥ १७ ॥। इसभकार वह टोककी क्षय करनेवाली
६८८ > च> ३) ८2 ३
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एतस्मित्नतरे वीरभद्रः सेन्यसमन्वितः ॥ अगच्छदध्वरं द्रप्रेरितो गणनायकः ॥ १३ ॥ पृष्ठे केचित्समायाता गगने केचिदा
गताः ॥ दिश विदिशः सवे समार्य तथापरे ॥ १४ ॥ शर्वाञया गणाः शरा निर्भया रदरविक्रमाः॥ असंख्याः सिंहना
दान्तं कुवेतो वीरसत्तमाः ॥ १५ ॥ तेन नादेन महतानादितं भुवनत्रयम् ॥ रजसा चावृतं व्योम तमसा चाघ्रता दिशः॥ १६ ॥
सतद्रीपान्विता पृथ्वी चचालाति भयाङला ॥ सशेखकानन् तघर ु्षुभुस्सकलान्धयः ॥१७॥ एवंभूतं च तत्सैन्यं लोकक्षयकरं
मइत् ॥ दृष्टा च पिरिमितास्सवें बधूवुरमरादयः ॥ १८ ॥ सेन्योयो गमथाटोक्य दक्षशासड्साङ्लः॥ दैडवत्पतितो विष्णं
सकठचोऽभ्यभाषत॥ १९.॥ ॥ दक्ष उवाच ॥ भवद्रलेनैव मया यज्ञ प्रारंभितो महान् ॥ सत्कमसिद्धये विष्णो रमाणं लं श
भरभो ॥ २० ॥ विष्णो त्वं कर्मणां साक्ष यज्ञानां परतिपारकः.॥ धर्मस्य वेदगर्भस्य ब्ह्मणस्तवं महाभभो ॥ २१ ॥ तस्माद्र
क्षा विधातम्या यज्ञस्यास्य मम प्रभो ॥ त्वदन्यः यस्समर्थोस्ति यतस्त्वं सकलपरुः ॥ २२ ॥
महासेना उपस्थित हृदं देवतादिक उसको देखकर सबही क्षुभित होगये ॥ १८ ॥ सेनाका उयोग देलक दक्षका पिर नीचा होगया ओर
विष्णजीकै आगे दंडके समान गिरकर कटत्रके सहित कहनेकगा ॥ १९ ॥ दक्ष बोा आप्हीके बर्ते भने यह महान् यज्ञ आरंभ किया ३ ह
भमो विष्णजी! इस सत्कर्मकी सिद्धिम आप्ही प्रमाण है॥२०॥ हे विष्णजी! आप कर्णे पाक्षीयज्ञोके पाठन करनेवाछे ह हे महाभभो! धर्मक वेदक
भीतरकै तुमही अधिष्ठान ब्रहहो॥२१॥ हे पमो | इसकारण हमारे इस यज्ञी रक्षा करनी ठुमको उचित है आपके सिवाय ओर कौन रकषाकरनमे |
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समर्थं है कारण कि आप सबके भ्रु है॥२२॥बहाजी बोरे दक्षके वचन हुनकर विष्णजी बहुत दीन
समञचते इए बोठे ॥२३॥ विष्यजी बोटे हे दक्षजी।ँ तम्हारे यज्ञकी रक्षा करूंगा कारणकि धका पाठ्न करना मेरा पण है॥२४॥ तुमने स्त्य
सो तुम सुनो इस समय कूर बुद्धित्यागन करो ॥२५।नेभिषारण्यमे
कृहाहै अब उत्ता व्यतिक्रम नही हो्कता, हे दक्ष! मँ जो तुमसे कहता हू |
जो अदत वृत्तान्त हुआ, कया बह स्मरण नहीं ! हे दक्ष! कूरद्धिसे तुमने उक्षको मुखादिया ॥ २६ ॥ रके कोपसे तुम्हारी रक्षा करनेमं कान
॥ ब्न्नोवाच ॥ दक्षस्य वचनं श्रत्वा विष्णु्दीनतरं तदा ॥ अबोचद्रोधथस्तं वे शिवतत््वपराडचखम् ॥ २२ ॥ विष्णुर्वाच ॥
मया रक्षा विधातम्या तव यज्ञस्य दक्ष वै ॥ ख्यातो मम पणः सत्यो धर्मस्य परिपालनम् ॥ २७ ॥ तत्सत्यं तु त्वयोक्तं दि
फं तत्तस्यग्यतिक्रमः॥ श्ण त्वं वर्म्यहं दक्ष कूरबुद्धि त्यजाऽधुना ॥२५॥ नैमिषे निभिषक्षेत्र यनातं वृत्तमद्तम् ॥ तत्किं
न स्मर्यते दक्ष विस्थृतं किं कुडद्धिना ॥२६॥ शद्रकोपाञ्च को ह्यज समर्थो रक्षणे तव ॥ न यस्याभिमतं दक्ष यस्त्वां रक्षति दुम
तिः ॥२७॥ किं कम किमकमेति तन्न पश्यसि दुर्मते ॥ समथ केवलं कम न भविष्यति सर्वदा ॥२८॥ स्वकमविद्धि तथन
समर्थत्वेन जायते ॥ न त्वन्यः कर्मणो दाता शं भवेदीश्वरं विना ॥ २९ ॥ ई~्वरस्य च यो भक्त्या शांतस्तद्रतमानकषः ॥
कर्मणो हि फलं तस्य प्रयच्छति तद्। शिवः ॥ ३० ॥ केवलं ज्ञानमाध्रित्य निरीश्वरषरा नराः ॥ निरयं ते च गच्छंति कल्ष
कोटिशतानि च ॥ ३१ ॥ पुनः कर्ममयः पशर्बद्रा जन्मनि जन्मनि ॥ निरयेषु प्रपच्यते केवट कर्मरूपिणः ॥ ३२ ॥
तमर्थ है हे दक्ष ! तुम्हारी रक्षा करना भी दुर्मति है ॥ २७ ॥ हे दुर्ेते ! तुम कर्म ओर अकर्म कुछ नहीं देखतेहो केवर सदा सव बात
करमही सफर नहीं होता ॥ २८ ॥ वही अपना कथं जानो जिसमे समथपन होजाय प्र शिवजीकै विना तो कोर्दभी कर्थका फर देनेको सम
नहीं है ॥ २९ ॥ जो भक्तिसे शान्त होकर हैश्वरम षन ठगाता है सदाशिव उस्ीको कभेका फठ देते हं ॥३०॥ जो ईश्वरको नहीं माननेवा
पनुप्य केवछ ज्ञानका आश्रय करके उन्नति चाहते है षे सेकडों करोँडों वर्षतक नरकं जाते ई ॥ ३१ ॥ फिर जन्मजन्भान्तर कमी फ़ंसीते
होगये, ओर शिवतस्वसे पराङ्छख उसकं) ||
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|| कंपते है केवट कमं हटपी नगरमे बारंबार पडतेह।। ३ २।यह रुद्के गरणोपिं अधीश्वर शत्रुनाशी वीरभद्रहै रद्रकी कोधाभिसे भरगर होकर यज्ञम आयाहै 2
२४||॥ ३ ३॥इ्मसन्देह नहीं कि यह हमरे विनाशक निमित आयाहै इतका निवारण कृरना कल्पनामे मी अशक्यहै वास्तवमे तो कपा ॥३४॥ यह महाप
¢ स्वह इस यज्ञम हम सबको भज्वठित करक पीछे शांत होगा इसमे सन्देह नहीं ॥ ३ ५॥ श्रमे ने श्रीमहादेवकी शपथको उदठंषन करकेजो यहा स्थिति
ट की उस्षका दुःख हमने तुमसहित यह प्राप्त किया ॥३६॥ हे दक्ष अब इस उपद्रवे निवारणे मेरी सामथ्ये नहीं है शपथके उ्टवन करनेमे भ शिद्रोही
|| अरय रुदगणाधीशो वीरमभद्रोऽरि मदेनः॥ रुदकोपािसंशूतः समायातोध्वरांगणे॥३३॥ अयमस्मद्विनाशाथंमागतोस्ति न संशयः॥
| अशक्यमस्य नास्त्येव किमप्यस्तु तु वस्तुतः॥२४॥ प्रज्वाल्यास्मानयं सर्वानू ध्रुवमेव महाप्रथुः॥ ततः प्रशांतहदयो भविष्य
९ ति न संशयः ॥२५॥ ओरीमहादेवशपथं सखुध्य भमान्मया ॥ यतः स्थितं ततः राप्यं मया दुःखं त्था स।३९॥ शक्ति
8| ममतु न्त्येव दक्षायेतत्निवारणे॥ शपथोघनादेव शिवद्रोदी यतोस्म्यहभ्॥२७॥ कालरयेपि न यतो मदेशद्रोरिणां सुखम् ॥
ततोऽवश्यं मया प्राप्त दुःखम त्वया सद।२८॥स॒द्र्शनाभिधं चक्रमेतस्मिन्न कगिष्यति ॥ शेवचक्रमिदं यस्मादशेवल्यकार
४ णम्॥३९॥ विनापि वीरभद्रेण नामेतच्चकभे*वरम्॥ इत्वा गमिष्यत्यधुना सत्वरं दरसन्निधौ॥8 ०॥ रेष शपथय्धष्य स्थितं मां
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चक्रमीदशम्॥असंहत्येव सदसा कृपयेव स्थिरं परम्॥४१।अतः परमिदं चक्रमपि न स्थास्यति भुध्॥ गमिष्यत्यचना शीरं ||६
ज्वाकामालसमाङलम्॥४२।॥ वीरभद्रः पूजितोपि शीघ्मस्मामिरादरात् ॥ महाक्रोधसमाकरंतो नास्मान्संरक्षयिष्यति ॥४३॥ |£
हआ ॥२७ ॥ तीनकाढमे मौ शंकरके दोहीको हुल नदीं मिठता इसकारण भने तुम्हारे सहित दुःख पाया ॥३८॥ घुदशन चकत भी इसपर
भहार नहीं करसकेगा करण कि यह शेवचक्ं अशो रही चता है ॥३९॥ यह शिबजीका चक वीरमदगपर विना भहारकिथे छोऽतेही शिवजी ५
पाको चटा जायगा ॥४०॥ शिवजीकी शपथ को उहटंवन करके यह चक्र मेरे पस स्थितै तो यह समन्चना कि उनकी प्रम पा है ॥४१॥
नही तो यह चकर किती भकारभी स्थित नहीं र्का ओरज्वालामालते आकु होकर शीघही चाजायगा ॥४२॥ यहा हम आद्रे य॒दि ४
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| शच्च सब स्थानम जाप्तकते है ॥ ५० ॥ त्िशटी भगवान् शंकरकै जितने गण ह उन सबकी निश्वय देसी ही शक्ति है ॥ ५१ ॥
काशी्मे शिवजीकी आज्ञासे श्रीकाठभेरवने ीठापूेक अपने नखोते ब्रहमाजीका पांचवां शिर छेदन करदिया ॥ ५२. ॥ यह कहकर
अ०३५।
| #5|| षीरमद्रका पूजन करं तो भी यह शंकरके कोधित होनेसे किसी भकार हमारी रक्षा नही कर सकैगा ॥ ४३ ॥ अहो इस समय ई
॥१५९॥ || हमारी भरख्यहु हा सेद हमारा तुम्हारा इस समय नाश उपस्थित हुआ ॥ ४४ ॥ त्रिकोकीमे इस समय हमारा कौ रक्षक नहीं धोक ट्
|| भी है शकसोहीकी त्रिटोकीम कौन रक्षा करस्कता है ॥ ४५॥ _शरीरका नाश होजाय (=: भोगृनी पृ प्र यहं दुःख त |||
८ इस समय सहा न जायगा ॥ ४६॥ कारण कि शिबद्रोहीको देखतेही यमराज दांत परीसने र्गते है ओर निस्सन्देहं उसको तेलक त
¢ अकांडप्रखयोऽस्माकमागतोद्य हि हा हदा ॥ हा हा बत तवेदानीं नाशोस्माकषपस्थितः ॥ ४४ ॥ शरण्योऽस्माकमधुना ना ||ह
८ सत्येव हि जगत्रये ॥ शंकरदरोदिणो कोके कश्शरण्यो भविष्यति ॥ ४५ ॥ तलनाशेपि संप्राप्यास्तेश्वापि यमयातनाः॥ ता नैव ||@
| शक्यते सों बहृदुःलपरदायिनीः ॥ ४६ ॥ शिवद्रोदिणमालोकय दष्टदेतो यमः स्वयम् ॥ तप्ततलकंटारिषु पातयत्येव नान्य :
था ॥ ७७ ॥ गन्तु मेवाहमुदक्तं सवथा शपथोत्तरम् ॥ तथापि न गतश्शी्ं दुष्टसंसगेपापतः. ॥ ४८ ॥ यदद्य क्रियतेस्माभिः ४
पटायनमितस्तदा ॥ शार्वं ना कपषकश्शच्चैरस्मानाकषयिष्यति ॥ ७९ ॥ स्वगे वा थुवि पाताले यत्र कुत्रापि वा यतः ॥ श्री ¢
¢| बीरमद्रशघ्नाणां गमनं न दि _ दुुभम् ॥९०॥ यारवेतश्च गणास्संति श्रीरुद्रस्य त्रि्यलिनः ॥ तावतामपि स॒षां शक्तिरेताद #
५ शी धुवम् ॥ ५9 ॥ श्रीकारुमैरवः काश्यां नखामरेणेव लीखया ॥ पुरा शिरश्च चिच्छेद पंचमं बरह्मणो भुवम् ॥ ५२॥ एत॒ ॥
, ||| उच्छा स्थितो विष्णुरतिवस्तश्ठलाम्बुजः ॥ वीरभद्रोपि संप्राप तदैवाऽध्वरमं डपम्॥ ५३ ॥ | ।
९०.९ ||| तते कराहमे शख्देते हँ ॥ ४७ ॥ भँ सवेथा शपथके उत्तर जासकताहं प्र दुष्ट संसर्गे पापे भँ न पहचस्का ॥ ४८ ॥ यदि अव ट
त.सं.२ | हम हासि भागजांय तो शिवजी अपने आकषण शब्खोते हमस्वको आकर्षण करेगे - ॥ ४९ ॥ स्वगं॑भूमि पाताङ कही भी हो ट
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विष्णजी बडे व्याकुठ खखते स्थित हये इधर पीरभबर मी यज्ञमण्डपे आकर पराप्त हए ॥ ५३ ॥ गोविन्द्के रसा कहने सेनसागर आन ]] £
कर उपस्थित ह्रं वीरमद्रके साथ इतस सेनाको देवतानि देखा ॥ ५४ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणभाषाीकायां शबरसंहितान्तगेतद्रितीय् त
सतीखण्डे विष्णवाक्यवणेनं माम पंच्निंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ बह्लाजी बोडे उस्न सभय इन्द्र विष्णजीका हास्य करते हए आत्मप्रशंसा करते टै
वीरभद्रसे युद्ध॒करनेको व्रज हाथमे देवताओंके सहित स्थित हए ॥ १ ॥ उस समय हाथीपर इन्द्र, मदेपर अधि, महिषपर यम, परेतप्र ।
एवं हवति गोविन्द आगतं सैन्यसागरम् ॥ वीरभद्रेण संहितं ददञयुश्च सुरादयः ॥ ५४ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ¢
सद्रसंहितायां द्वितीये सतीखंड सल्युपाख्यने विष्णुवाक्यवणेनं नाम पंचर्चिशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इन्द्रोऽपि
परदसन् विष्णुमात्मवादरत तदा ॥ वन्नपाणिस्सुरेस्सादं योदधुकामोऽमवत्तदा ॥ १ ॥तदेन्दो गजमारूढो वस्ताङूढोऽनरस्त ॥|५||
था ॥ यमो मदिषमाशूढो निकैतिः प्रेतमेव च ॥ २॥ पाशी च मकराषूढो भ्रगाङूढोस्सदागतिः ॥ ङुमेरः पुष्पकाड्ढ ¢
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24-24-30 26 ब 26 कह 2; ३८८ ३
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स्संनद्धोभूतदतंदवितः ॥ २ ॥ तथान्ये सुरसंचाश्च यक्षचारणगुद्यकाः ॥ आश्य वाहनान्येवस्वानि स्वानि प्रतापिनः ॥ € ॥
तेषाु्योगमारोक्य दक्षश्वासृङ्घुखस्तथा ॥ तदंतिकं समागत्य सकल्बोऽभ्यभाषत ॥५॥ दक्षउवाच ॥ युष्मद्रखेनैव भया
यज्ञः प्रारंभितो महान् ॥ सत्कर्मसिद्धये यूयं प्रमाणास्स्युम॑हाप्रभाः ॥ ६ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तच्छ्रत्वादक्षवचनं सें देवास्सवा
सवाः ॥ निर्य॑युस्त्वरितं त युद्धं कर्तं समुद्यताः ॥ ७ ॥ ¦
निक्रति ॥ २ ॥ मकरप्र वरुण, भृगपर वायु, शृष्पकपर आरूढ कुबेर हुए ओर भी सबं तयार हए ॥ ३ ॥ इसी प्रकार भौर भी बहुतसे
देवता यक्ष चारण ॒द्यक अपने भरतापी वाहनोके ऊपर चढकर चे ॥ ४ ॥ उनका उभोग देखकर नीचेको अख कयि हए दक्षजी
इनदरके समीप आकर बोठे ॥ ५ ॥ दक्षन कहा किं आपहीकै भरोसे प्र भने महायज्ञ आरभ किया है आपस
हाभभाववारे है इस सत्कर्मको
सिदधिके लि आप ही महादुमाव प्रमाण है ॥ ६ ॥ दक्षके यह वचन सुन इन्द्रक सहित षब देवता शीधताभे युद्ध करनेके निमित्त चरे ॥७॥
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शि° | | तब वे सव बठ्वानु देवता युद्ध करने गे बह ओर वे इन्द्रादि देवता शिवजीकी मायते मोहित होगये ॥ < ॥ उस समय् देवता (ओर गरणोका | नौ |
॥१६०॥ [|@|| मयेकर स्म हआ तीक्ष्ण तोमर ओौर नाराचोते वे परस्पर युद्ध करने ठगे ॥ ९ ॥ उस्र युद्धके महोत्सवम् शख ओर मेरिये बजने ठग्। ||!
महा दुन्दुभी पटह ओर डिमडिम बजने ठे ॥ १० ॥ उस्र महाशब्दसे सब देवता श्ाध्यमान होकर टोकपाटोके सहित उन शिव किंकरोको ©
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४ मारने ठे ॥ ११ ॥ हे खनिभेष्ठ ! भृके मंत्रवरसे इन्द्रादि ठोकपारोने शिवजीके गणोको छेदन कर दिया ॥ १२ ॥ यज्ञ करनेवाठे भूृयनं
¢ अथ देवगणाः से युयुधुस्ते बरान्विताः ॥ शक्रादयोलोकपाला मोहिताः शिवमायया ॥ ८ ॥ देवानां च गणानां च तदा |£
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सीत्समरो महान् ॥ तीक्ष्णतौमरनाराचेधुयुधस्ते परस्परम् ॥ ९ ॥ नेदुश्शंखा्च म्य त॒स्मिन् रणमहोत्सवे ॥ मद।ददुभम |£
योनेदुः पटहा िडिमाद्यः ॥ १० ॥ तेन शब्देन महता ॐध्यमानास्तदा राः ॥ रोकपलेश्च सडिता जघ्यस्ताज्छिवर्विकं ||
रान् ॥ ११ ॥ इन्दरायेखोकपारेश्च .गणाश्शंभो पराद्खुखाः॥ कत्ताशच शुनि शद्रैर भृगो्ज्रबलेन च ॥१२॥ उच्[टने कृतं ठै
|
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तेषां भृय्णा यज्वना तदा ॥ यजनाय च देवानां तुष्यथ दीक्षितस्य च ॥ १३ ॥ पराजितान्सवकान्दष्ा वीरभ श्षान्वि
तः ॥ भूतप्रेतपिशाच शच कृत्वा तानेव पृष्ठतः ॥ १४ ॥ वृषभस्थान् पुरस्कृत्य स्वयं चेव महाबलः ॥ महाथिद्ूलमादाय पात ४
यामास निर्जरान् ॥ १५ ॥ देवान् यक्षान् साघ्यगणाच् गुह्यकान् चारणानपि ॥ शकघातेशच ते सवे गणा वेगात् प्रजभिरे #
क ॥ १६ ॥ केचिदिधा कृताः खद्धैदरे्च विपोथिताः ॥ अन्थेश्शब्चेरपि खरा गणेभंत्रास्तदाऽभवन् ॥ १७ ॥
.कं.२ ||| एवका उचाटन किया यह कायं देवता यजन भोर दशक धैतोषक निभि किया ॥ १३॥ उन मूत मेत ्रिशाचोको पराजित देख वीरभद्र
ट क्रोधकर उनको पीछे किंया ॥ १४ ॥ षहावीने वृषभे स्थित उनको आगे करके महाञिश्चूढ ठेकर देवताओंको गिराना आरभ किया ॥१५॥
>| देवता यक्ष साध्य गुद्यक चारण शूकघातसे इन सबको गिरा दिया ॥ १६ ॥ किन्हीकै खदगते दो खंड कर दिये किन्हींपर अुद्ररका प्रहार
किया दूरे गणोके शब्लोसे भी इसीभकार देवता ्रिदीण होने ठगे ॥१७॥ इसभकार देवता पराजित् होकर परस्पर एक दूसरेको त्यागकर पखा र
यमान होते हुए स्वगंको गये ॥१८॥ केवर महाबलवान् इन्द्रादि दिक्पाही उक दारुण संथामम भय पूरके उत्साहसे स्थित भये ॥१९॥ तव् र
इन्र आदि सव देवता संमामस्थरमे इकटे हो बडी नग्रतासे बरहस्पतिस्े ¶छने कगे ॥ २० ॥ ठोकपा बोले हे यरो ! हे बृहस्पते ! हे तात ! महा |
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पंडित । हे दयासागर । शीघ्र आप हमसे कहं जिस्म हमारी जय हो ॥ २१ ॥ ब्रह्ाजी बोरे बृहस्पति उन सवके इस भकारफे वचन सुन |£
शंकर का स्मरण कर ज्ञानम दुबेढ इन्द्रे कहने कगे ॥२२॥ ब्रहस्पति बोरे जो पहर विष्णजीने कहा था वही सब अब हुआ हे इन्द्र पँ अब ठ्
एवं पराजितास्सवं पलायनपरायणाः ॥ परस्पर परित्यज्य गता देवाक्िविष्टपम् ॥ १८ ॥ केवरं रोकपालास्ते .शक्रायास्त |©
स्ुरु्सकाः ॥ संमामे दारणे तस्मिन् धृत्वा थेथ महाबलाः ॥१९॥ सव मिणित्ता शक्या देवास्त रणाजिरे ॥ बरदस्पूति ||?)
चपभरच्छुनिनयावनतास्तदा ॥२०॥ लोकपाला उचः ॥ गुरो इहस्पते तात महाभराज्ञ दयानिधे ॥ शीभं वद पृच्छतो नः तोऽ ||
स्माकं जयो भवेत् ॥२१॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तेषां स्मृत्वा शंथु परयत्नवान्॥बहस्पतिशूवाचेदं मदेन्दरं ज्ञानदुबम् |
॥२२॥ ब्रहस्पति श्वाच ॥ यदुत विष्णना पूरव तरस जातम वै ॥ तदेव विवृणोमीन्द्र सावधानतया शृणु ॥२३॥ अस्ति ¢ |
यक्षि^व्र' कश्चित् फलद्ः स्वकर्मणाम् ॥ कर्तारं भजते सोपि न स्वकः परुं सः ॥ २४ ॥ अभबौषधयस्सवे नाभिचाण ॥६
न् लौकिकाः ॥ न कमांणि न वेदाश्च न मीमांसाद्वयं तथा ॥२५॥ अन्यान्यपि च शाक्ाणि नानवेदय॒तानिच। ल्ञतं नशं ||
संभवति वदत्येवं पुरातनाः ॥ २६ ॥ न स्वञेयो महेशानस्सर्ववेदायुतेन सः ॥ भक्तेरनन्यशरणेर्नान्यथेति महाश्चतिः ॥२७॥ ट
सन् कहता दं सावधान होकर सुनो ॥ २३ ॥ जो कोई स् कर्मो फलका देनेवाला दैश्वर है वहे भी कत्तीकी अक्षा करता है वह भी ह
स्वय करने प्रमु नहीं है ॥ २४ ॥ मंत्र.ओषपि अभिचार लौकिककर्म वेद दोनों मीमांसा ॥ २५ ॥ ओर दृस्रे भी वेद यक्तं संपूण शाश्च
यह उक विना कुछ नहीं है न उस्तको जानने समथ हो सकते है एसा परातन कहते है ॥२६॥ सर्व वेदका ज्ञाता भी- महेश्वरको नहीं जान
सकता है अनन्य शरण भक्तही उसको जान सकते है एसी श्रुति है ॥ २७ ॥ ५
८१
गग 6
जाता ह ॥२८॥ हे इनदर ! तो भी कार्यीकार्यके निणयमे मँ सिद ||
शांत निंविकार प्र इष्ट हो ओर उत्तका अनु हो तव. शंकरतख जाना व
॥१६१॥ ||६|| अशको तमे कहता हू सावधान होकर हनो ॥ २९ ॥ हे इन्र ! तुम मू्वताके. वश होकर छोकपारोषटित दक्षै यज्ञम आपे हो मला ठम
कया प्रक्रम कर सकते हो ॥३०॥ यह रुके परमकोपदाठे गण यज्ञके विघ्रके व्यि आये ह अवश्य विन्न करेगे ॥३१॥ यह मँ सत्यही सत्य कहती
& || हं कि यहां कोई मी उपाय इस यज्ञ विप्र विनाश करनेका नहीं है ॥३२॥ ब्रह्माजी बोे वह सब देवता इसभरकार हस्पतिके वचन सुनकर इनदर तथा
>| शात्या च परया इष्टया सर्वथा निर्विकारया ॥ तदुयहतो तनं ज्ञातव्यो हि सदाशिवः ॥२८॥ परं तु संवदिष्यामि कार्यां
ष्यत्यसंशयम्॥ ३१ ॥ सर्वथा न ह्यपायोतर केषांचिदपि तत्त्वतः ॥ यज्ञवि्रविनाशार्थं सत्यं सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ ३२ ॥
ब्रह्मोवाच ॥ एवं ब्रहस्पतेवाक्यं शत्वा ते दि दिवौकसः ॥ चितामापेदिरे सवं रोकपालास्सवासवाः ॥ २३॥ ततोत्रवीद्रीर
मदो महावीरगणे््र॑तः ॥ इन्द्रादीन् लोकषालास्तान् स्मृत्वा मनसि शंकरम् ॥ ३९ ॥ वीरभद्र उवाच ॥ सवे यूयं बािश
त्वादवदानार्थमागताः ॥ अवदानं प्रयच्छामि आगच्छत ममांतिकम् ॥ ३५ ॥ ३ शक्र हे शुचे मानो हे शशिन् ३ धनापि
ट
कायै विवक्षितौ ॥ सिर्यंशं च सुरेशान तं श्ण त्वं दिताय वै ॥ २९ ॥ त्वमिंद्र बाछिशो भूत्वा लोकपः सदाय वै ॥ आ
¢ गतो दक्ष यज्ञं हि कं करिष्यसि विक्रमम् ॥ ३० ॥ एते श्रसदहायाश्च गणाः परमकोपनाः ॥ आगता यज्ञविघ्राथ तं करि
८
।
¢ प॥ है पाशपाणे ह वायो निरते यम शेषं हे ॥ ३६ ॥ हे सुरासुरसंघाश्च दीतेत च विचक्षणाः ॥ अवदानानि दा
स्यामि आतृध्या्यासतां वराः ॥ ३७ ॥
ट| ोकपारोक सहित स्न चिन्ता करने कगे ॥३३॥ तव महावीर वीरभद्रे गणोके सहित बडे कोधपरवक सव इन्द्रादिक टोकपारोसे कहा ॥३४॥ ||
वीरभद्रे कहा सब त॒म मूसैतासे ईस यज्ञमे पराप हुए हो अव मेरे समीप आओ बँ इसका फठ तुमको चलाङंगा ॥ ३५.॥ हे इन्द्र ! अग्रि, ||
› चन्द्र कुबेर, वरुण, वायु, निक्त, यम्, शेष ॥ ३६ ॥ हे देवताओ ! हे चतुरो ! अब मेँ इसका फ तुमको देता हं हुम अच्छी | |
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परकारसे इस्तका फ भोगो ॥३७॥ ब्रह्लाजी बोठे यह कहकर तीक्ष्ण बाणे उनपर प्रहार करने गे जब गरणोम अग्रणी वीरभद्र तीक्ष्ण बाणेसि प
|| हार करनेढगा तव इन्द्रादि सव देवता उन बाणोति बडे व्यथित हुए ॥ ३८ ॥ तव वे सव दशोँ दिशाओं भागनेढगे जब रोकपाड दशोदिशा र
ठ ओंम भागगये तब वीरभद्र गणोके सहित यज्ञस्थलमे आया ॥ ३९ ॥ तव वे समस्त ऋषि उरकर विष्णजीके पास शीघतासे आकर किज्ञपि करने #
गे ॥४०॥ कृषि बोठे हे रमानाथ ! हे सर्वेश्वर ! हे महाप्रभो आप दक्षके यज्ञकी रक्षा करो कारण कि. आप साक्षात् यज्ञस्वरूप हौ ॥४१
ए यज्ञके कमे यज्ञके रप य्ञके अग ॒य्नके रक्षकं आप हो इरे आप यज्ञकी रक्षा करो । आपके विना को रक्षक नहीं ह ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी
| ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवमुक्ता पितै्बाणिज॑घानाथ रुषान्वितः ॥ निखिलस्तान् सुरान् स्यो वीरभद्रो गणा्णीः ॥ तैवणिनिहता |
६|| स्सवैवासवायाः सुरेश्वराः ॥ ३८॥ पलायनपरा भूत्वा जग्णुस्ते च दिशो दृश ॥ गतेषु लोकपालेषु विदतेषु सुरेषु च ॥ ||
| यज्ञवारोपकंठं हि वीरभद्रोगमद्रणः ॥ ३९ ॥ तदा ते ऋष्व खभीता रि रमेश्वरम् ॥ विजञप्त॒कामास्सदसा शीघमू ||
ह|| उनैता भृशम् ॥ ४० ॥ षय उलुः ॥ देवदेव रमानाथ स्ेन्वर महाप्रभो ॥ रक्ष यज्ञं हि दक्षस्य यज्ञोसि त्वं न संशयः |£
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॥ १
॥।
॥ 8१ ॥यज्ञकम्ा यज्ञरूप यज्ञागो यज्ञरक्षकः ॥ रक्ष यज्ञमतो रक्ष त्वत्तोन्यो न् हि रक्षकः ॥ ७२ ॥ ॥ त्रह्मोवाच ॥
इत्याकंण्यं वचस्तेषामृषीणां वचनं हरिः ॥ योद्धु कामो भयाद्िष्णुवींरभदरेण तेन् वे ॥ ७३ ॥ चतुयुजस्सुसंनद्धो चायु
धरः करैः ॥ महाबलोमरगणेर्यज्ञवाटात्स नियंयौ ॥ ४४ ॥ वीरभद्रः शलपाणिर्नानागणसमन्वितः ॥ ददर्शं विष्णं संनदं
योदधुकाम मदाप्रधुम् ॥ ७५ ॥ तं दष्टा वीरभद्रोभरूदधुकुरीकुटिखाननः ॥ कृतांत इव पापिष्ठ भ्रगेन्द्र इव वारणम् ॥ ४६ ॥
बोटे विष्णजी इस भकारे उन सवके वचन सुनकर वीरभद्रे भय करके भी उत्क युदकी इच्छा करने कगे ॥ ४३ ॥ चारभुजा धारे हाथमे ||
सुदशन चक्र ट्य महाबटी देवताओके साथ ठे यक्ञस्थानसे बाहर निकठे ॥ ४४ ॥ इधर अनेक गणोंके साथ शूर हाथमे लवि वीरभदने
|| युद्ध करनेकी इच्छा किये महापरमु विष्णजीको सन्न द देखा ॥ ४५ ॥ वीरभद्रे विष्णको देखतेही बडी देडी भौं करली ओर काठ जे पापको
४५|| देखता वा ह जेसे हाथीको देखता है ॥ ४६ ॥ >
इस भकारे शतरुनाशी वीरभदरने विष्यजीको देखा ओर वीर गणोति आदृत हए बहुत शीघरतासे करोधकर बोटे ॥ ४७ ॥ वीरभद्र कहा €
विष्णु तुमने महादेषकी शपथ उद्वनकी यह तुम्हारा चित्त पसा कैसे हु ओर तुमने किस बातका अभिमान किया है ॥ ४८ ॥ कया
शकरफी शपथ उहंषन करनकी तम्हारी शक्ति है, तुम कौन हो ओर त्रिके तुम्हारा रक्षक कौन है ॥ ४९ ॥ तुमयहां कैसे आये ही
इस बातको भँ नही जानता, त॒म दक्षके यज्ञकी रक्षा कि भकार कर सकते सो कहो ॥ ५० ॥ जो क सतीने किया सो क्या तुमने मही
तथाविधं इरिं दृष्टा वीरभद्रोरिमर्दनः ॥ अवदतत्वरितः ऊधो गणेवीरिस्समावृतः ॥ 8७ ॥ . वीरभद्र उवाच् ॥ रेरे दरे महादेव
शपथोष्टघनं त्वया ॥ कथमद्य कृतंचित्ते गर्वः किमभवत्तव ॥ ४८ ॥ तव श्रीर्द्शपथोटवने शक्तिरस्ति किम् ॥ कोवा
त्वमसिको वा ते रक्ष कोस्ति जगत्रये॥ ४९॥ अअ त्वमागतः कस्माद्वयं तत्नैव विद्यहे ॥ दक्षस्य यज्ञपातात््वं कथं जातोसि
तद्द ॥ ५० ॥ दाक्षायण्याकृतं यच्च तत्रष्ठ किसु त्वया ॥ प्रोक्तं यञ्च दधीचेन तं तन्न कि त्वया ॥ ५१ ॥ त्वञ्चापि दक्ष
यज्ञेस्मिन्नवदानार्थमागतः ॥ अवदानं प्रयच्छामितव चापि महाज ॥ ५२॥ वक्षो विदारयिष्यामि च्िद्यूलेन हरे तव ॥
कृस्तवास्ति समायातो रक्षको ममांतिकंम् ॥ ५३ ॥ पातयिष्यामि भूपृष्ठे ज्वालयिष्यामि विना ॥ दग्धं भवंतमधुना
पेषयिष्यामि सत्वरम् ॥ ५8 ॥ रेरे हरे दुराचार महेश विश्चुखाधम ॥ श्रीमहाश्द्रमाहात्म्य किञ्च जानासि पावनम् ॥ ५५ ॥
देखा जो दधीचने कहा था सो क्या तुमने नहीं सुना ॥ ५१ ॥ श्या तुमभी इस दक्षके यज्ञम कुत्सित दानके निभित्त आये हो हं महाभुज !
म आपको इस्तका कुत्सित दान देता हं ॥ ५२ ॥ है हरे ! तरिशूरते मै तुम्हारी छातीको विदीणं करदृगा जो तुम्हारा कोई रक्षक हो
भेरे समीप आवे ॥ ५३ ॥ मेँ तुमको पृथिवीम परक कर पृथिवीम परज्वाडित करदगा ओग तुमको जाकर पीसडाटंगा ॥५४॥ हे दुराचारी !
हरे महेशसे विसुख अधम कया तुम महश्वरके पवित्र माह्यतम्यको नहीं जानते ॥ ५९५ ॥
शि ७पु
॥१६२॥
04 494 + 9९ 40 3२4
रुप. २
स.खं.२
अ०३६
=-= अनय
0 4 44 1
९५
+
£ तो भी तम महाथुज होकर युदधकी कामना कर अगे हए हो यदि तुम स्थित रहोगे तो भँ तुभको रसे स्थानम भजगा किं रौटना न् पडे \\ ५ ॥
|| बाजी बोटे पुरर इदधिमान् विष्टजी वीरभदरके वचन तुनकर दशते हुए बोरे ॥५७ ॥ विष्णजी बोले हे वीरमद्र ! सुनो भ तुषसे तत्वसे कहता
हं खञ्च शंकरके सेवकको तुम रुद्रसे विमुख मत जानो॥५८॥इस दक्षने यज्ञके टे वारंवार भा्थना की थी यहं कभैनिष्ठतो है पर इसने मूता की ॥५९
¢ मे भक्तोके पराधीन हूं ओर महेश्वर भी भक्ताधीन है हे तात ! दक्ष मेरा भक्त है इते म यज्ञम आया ह ॥ ६०॥ हे रुढकोपसे उत्पन्न वीर तुषं भेरी
# तथापि त्वं महाबाहो योदधुकामोग्रतः स्थितः॥नेष्यामि पुनरावृत्ति यदि तिष्ेस्त्वमात्मना॥५६॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ तस्थ तद्वचनं
¢| अत्वावीरभदस्य बुद्धिमान् ॥ उवाच विहसन् प्रीत्या विष्णुस्तञ सुरेश्वरः ॥५७॥ विष्णुरूवाच ॥ श्रुणु त्वं वीरभदाद्य परवक्ष्या
¢ मि त्वद््तः॥ न ुदरविघुखं मां त्वे वद शंकरसेवकम् ॥ 4८ ॥ अनेनप्राथंतः परव यज्ञायै च पुनः एनः ॥ दक्षेणाविदिताथैन
# कंमेनिषठेन मोब्यतः॥५९॥अद भक्तपराधीनस्तथा सोपि महेश्वरः॥दक्षो भक्तो हि मे तात तस्माद्ागतो मखे॥&०॥श्ण परति
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ज्ञां मे वीर र्द्रकोपसमुद्धव ॥ श्दरतेजर्स्वरूषो दिसुप्रतापालयप्रभो ॥६३१॥ अहं निवारयामि त्वां त्वं च मां विनिवारय ॥
तद्भविष्यति यद्धावि करिष्येऽहं पराकमम् ॥६२॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तवति गोविन्दे पदस्य स महाधनः ॥ अवदत्सुपस
न्नोस्मि त्वां ज्ञात्वास्मत्प्रभोः प्रियम्॥६३॥ततो विहस्य सुप्रीतोवीरभदरौ गणा्रणीः॥्रश्रयावनतोवादीद्विष्णं देवं हि तत्वतः
॥ &९ ॥ ॥ वीरभद्र उवाच ॥ तव भावपरीक्षाथमित्यक्तं मे महाप्रभो ॥ इदानीं तत्त्वतो वच्मि शृणु त्वं सावधानतः ॥६९॥
रतिज्ञाको सुनो तुम रुके तेजते उत्पन हो ओर मु भरतापके स्थान हो॥६१। र तुमको ओर तुष स्क निवारण करो जो होना होगा सो होगा तन
पराक्रम कर्गा ॥ ६२ ॥ बह्लाजी बोरे जव गोविन्दने एेत्रा कहा तब वहं महाभुज वीरभद्र बोढा मै तुमको अपने भमुका भिय जानकर
| भसन्न ह ।।६२॥ फिर गणम अग्रणी वीरभब्र असन्न होकर नघरतापूर्वक तत्वे विष्ण देवताते बोढा ॥। ६४ ॥ वीरभद्रने कहा है महाभभो । ह
` ॥>॥ दमहारे मावकी परीक्षाके निमिन्तही मने तुमसे वचन कहे थे इस समय जो विचारते कः षह तुष सावधान होकर सुनो ॥ ६५ ॥ |
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जैसे शिव वैसे म जैसे तम तैसेही शिब हे हर ! शिवी आज्ञसि वेद दसा कहते ह ॥ ६६ ॥ शिवकी ही आश्ञते हम सब उनके सेवकः है
तो भी हे रमानाथ ! आद्रसे यह परषाद उचित है ॥६७॥ बह्माजी बोडे षीरभदरके यह वचन सुनकर भगवान् हंसतेहुए वीरभद्रे यह वचन
बोठे ॥६८॥ विष्णजी बोले हे महावीर ! मेरे साथ शकारहित होकर युद्ध करो मै तुम्हारे अलोप पूण होकर अपने स्थानक जाङगा ॥६९॥
बहमाजी बोठे विष्णजी एेसा कहकर विरामको प्राप्त हो युद्धके ख्ये तत्पर हए ओर महाबटी वीरभद्र भी अपने गणोके साथ युद्धको तैयार
यथा शिवस्तथा त्वं हि यथा तं च तथ[ शिषः॥ इति वेदा वर्णयति शिवशासनतो हरे ॥६९॥ शिवाज्ञया वयं सुवे सेवकाः
शंकरस्य वै ॥ तथापि च रमानाथ प्रवादोचितमाद्रात् ॥६७॥ ॥ बरह्मोवाच॥ तच्छत्वा वचनं तस्य वीरभद्रस्य सोऽच्छतः ॥
| प्रहस्य चेदं प्रोवाच वीरमभद्रमिदं वचः ॥ ६८ ॥ ॥ विष्णुक्वाच ॥ युद्धं रू महावीर मया सा्धमशंकित्ः ॥ तवाघ्नः
पूयंमाणोहगमिष्यामि स्वमाश्रमम् ॥६९॥ ॥ बह्नोवाच ॥ इत्युक्ता हि विरभ्यासौ सत्रद्रोभूद्रणाय च ॥ स्वगणेर्विरभदरोपि
सन्नद्धो महाबलः ॥७०॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्संदहितायां द्वितीये सतीखंड विष्णुवीरभदसम्बादो नाम
षदटूर्चिंशोऽध्यायः ॥३६॥ ॥ ब्र्मोवाच ॥ वीरमभद्रोथ यद्धे वै विष्णुना-स॒ महाबलः ॥ संस्मृत्य शंकरं चित्ते सवापद्विनिवारणम्
॥१॥ आरद स्यंदनं दिभ्य स्ववेरिवि मदनः।॥ गृहीत्वा परमाघ्नाणि सिंहनादं जगज _३॥२॥विष्णुश्चापि महाघोषं पांचजन्या
भिधत्रिजम् ॥ दध्मौ बली महाशंखं स्वकीयान् इषयभ्रिव॥ ३॥ तच्छ्रत्वा शंखनिहादं देवा ( च परायिताः॥रणं हित्वा गताः
पूवं ते इतं एुनराययुः ॥ 9 ॥ वीरभद्र गणैस्तेषां लोकपाल[स्सवासवाः ॥ युद्धशऊुस्तथा सिदनादं कृत्वा बरान्विताः ॥५॥
हुआ ॥७०॥ इति भ्रीशिवमहाणराणमषारीकायां रुदंहितातगेतद्ितीयप्ततीखण्डे षटतरंशोऽध्यायः ॥३६॥ बह्नाजी बोे तब महाबटी वीरभद्र
सब आपक्तिके निषारण कणएनेवाछे शंकरको मनम स्मरणकर विष्ण साथ युद्धको तेयार हुभा ॥१॥ स वैरि्ोको मारनेवाढा वह दिव्य रथप्र
चकर परम् अश्च ्रहणकृर सिंहनादे गजने खगा ॥ २॥ इधर बहाबटी विष्णजी अनेक पक्षक देवताओंको भ्रसन्न करते हुए अपने पांचजन्य
शंखका महाशब्द करने ठ्गे ॥ ३ ॥ उस शंका शब्द सुनकर देवता भाग गये थे वे शीघ संम्ामल्थल्मे आये ॥ ४॥ तब वे इन्द्रादि
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सव छोकपाठ भी वड ऊचे स्वरसे सिंहनादकर वीरभद्रके साथ युद्ध करने गे ॥ ५ ॥ सिंहनाद गजेते हए गण ओौर रोकपालोका बडा
भयेकर युद्ध हआ ॥ ६ ॥ नन्दी इन्द्रका अनङते वैष्णवोका ओर कूष्माण्डपति महाबटी कुबेरसे युद्ध करने ठे ॥ ७ ॥ उस् समय सौपवै
| वजसे इन्दरने नन्दीको ताडन किया ॥८ ॥ नन्दीने त्रिंशूढद्वारा इन्द्रकी छातीमे आघात किया ॥ ९ ॥ इस प्रकार दोनों बी बडे
उत्साहसे परस्पर युद्ध करने रगे, नन्दी ओर इन्द्र जीतनेकी इच्छसे अनेक प्रकारके प्रहार करने ठगे ॥ १० ॥ परम कोपन
अभिने शक्तिसि अश्माको ताडन किया उसने भी बडे वेगसे सौधाराछे शरसे अभ्रिपर प्रहार किंया ॥ ११ ॥ यमके साथ महाटोक नामकं
गणानां लोकपालानां दन्द्वयुद्धं भयावहम् ॥ अभवत्तज तुलं गजंतां सिहनादतः॥ ६ ॥ नन्दिना युयुधे शक्रोऽनलो वै वैष्णवा
स्तथा ॥ कुषेरोपि हि कूष्माण्डपतिश्च युयुधे घटी ॥ ७॥ तदेन्दरेण हतो नन्दी वन्रेण शतपर्वण। ॥ < ॥ नन्दिना च हत
शशक्र्चिश्लेन स्तनांतरे ॥९॥ बङिनो द्वावपि प्रीत्या युयुधाते परस्परम् ॥ नानाघातांङर्व॑तौ नन्दिशकौ जिगीषया ॥१०॥
शक्त्या जघान चाश्मानं शुचिः परमकोपनः ॥ सोपि शूलेन तं वेगाच्छितधारेण पावकम् ॥ ११॥ यमेन सह सथाम महा
लोकोगणाग्णीः ॥ चकार तुमुलं वीरो महादेवं स्मरन्सदा ॥ १२ ॥ नेकैतेन समागम्य चंडश्च बखवत्तरः ॥ युयुधे परमा
छेच नेत्रति निविडं बयन् ॥ १३ ॥ वरणेन समं वीरो संडश्चैव महाबलः ॥ युयुषे परया शक्तया अिरोकीं विस्मयश्िव
॥ १७ ॥ वायुना च हतो भंगी स्वाश्चेण परमोजसा ॥ भृगिणा च हतो वायुश्िश्ुलेन प्रतापिना ॥ १९५ ॥ कुबेरेणेव संगम्य
कूष्मांडपतिरादरात् ॥ युयुधे बलवान् वीरो ध्यात्वा इदि महेश्वरम् ॥ १६ ॥ ट्
गणका संभ्ाम होने खगा यह वीर प्रसनतासे महादेवो स्मरण करकै सभाम करने ठगा ॥ १२ ॥ बलवान् चंडने नेतके संग आकर टै
उपक वचना करते हुए परम अ्लोते युद्ध आरम्भ किया ॥ १३ ॥ वरुणके साथ वीरखंडका संभाम होने ठ्गा यह त्रिलोकीको विस्मय करते
द| ए परमशक्तिे सं्राम करने कगे ॥ १४ ॥ वायुने अपने प्रम अशते भृगीपर हार् किया ओर भृगीने बडे प्रतापी शूर वायुपर प्रहार 8
|| किया ॥ १५ ॥ तब कूष्माण्डपतिने बडे उत्साहे हदयमे महेश्वरका ध्यान करके बडेवेगसे कुबेरे साथ युद्ध आरम्भ किया ॥ १द् ॥ ||
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शि०घ, | योगिनी चक्रके सहित भेरी नायकने सब देवताओंको विदावित कर उनका रुधिर पान् करना आरम्भ किया ॥ १७ ॥ इसी प्रकार ्षेत्रपाक
= | भी देवताओंको भक्षण करनं ठ्गे काटी भी उनको विदीणेकर उनका रुधिर पान करने ठगी ॥ १८ ॥ इधर महातेजस्वी विष्णजी भी युद्ध
॥१६४ | ट करने ठगे ओर दशो दिशाओंको भस्म करते हए उन्होने अपने चक्रका प्रहार किया ॥ १९ ॥ तव क्षे्रपारोने वेगसे उश्च चक्रको आता
¢ देखकर वह महावीर वहां सहता सन्छख उपस्थित हए ओर उक्त चक्रको यास्त कर छ्य ॥२० ॥ शत्ुओकि एर जीतनेवाठे
|| विष्यजीनि उत्त चक्रको भरित हुआ देखकर उसका खख पकड़कर उस चक्रको उगख्वाख्या ॥ २१ ॥ तब वह संसारके
योगिनीचक्रसंयुक्तो भेरवीनायको महान् ॥ विदीर्य देवानखिलान्पपौ शोणित मद्धतम् ॥ १७ ॥ क्षेवपाखास्तथा तच बुभुक्षुः
सुरपुंगवान्॥ काली चापि तरिदायत तान्पपौ रुधिरं बहु ॥ १८ ॥ अथ विष्णमदातेजा युयुषे तेश्च शहा ॥ चक्रं चिक्षेप
ह|| वेगेन दहन्निव दिशो दश ॥ १९ ॥ क्षजपाटस्समायतिं चक्रमारोकय वेगतः ॥ तत्र गत्यागतो वीरश्ाय्सत्सदसा बरी ॥२०॥
। चकर असितमालोक्य विष्णुः परषुरंजयः ॥ सुखं तस्य परामृज्य तसुद्ालितिवानरिम् ॥२१॥ स्वचक्रमादाय दा
चातीव भवेकभत्ता ॥ महाबली तेयुयुे भ्रवीरस्सछुद्नानायुषधारकोशचैः ॥२२॥ चरे महारणं विष्णस्तेस्साद युयुधे सुदा ॥
नानायुधानि संक्षिप्य तुखुलं भीमविक्रमम् ॥ २३॥ अथ तं भेरवायया्च युयुधुस्तेन भूरिशः ॥ नानाघ्चाणि विञंच॑तस्सं
| दयः परमोजसा ॥ २४ ॥ इत्थं तेषां रणं दष्टा इरिणातुरुतेजसा ॥ विनिवृत्य समागम्य तान्स्वयं युयुधे बली ॥ २५ ॥
£| अथ विष्णुर्महातिजाश्चक्रभु्यम्य सूच्छितः ॥ युधे भगवांस्तेन वीरभद्रेण माधवः ॥ २६ ॥
रुस् । एक स्वामी अपना चक्र ठेकर बडे क्रोधित हृए ओर वह महावरी अनेक भकारके अन ओर आयुष धारण करके बडे
कोधे युद्ध करने ठगे ॥ २२ ॥ उनते उत्साहके साथ युद्ध करते हृए ॒विष्णने बढा कोध किया ओर अनेक आयुर्धोको निभषेप करके
भर्यकर युध करिया ॥२२॥ भेरादिक अनेक उनकै साथ युद्ध करने कगे ओर प्रम कोषकर अनेक प्रकारके शब्च त्पागने ठगे ॥२४॥ इस
भकार उनका यदध देखकर भगवान् भी ठोटकृर फिर उनकै सग युद्ध करने कगे ॥२५॥ तव विष्णजी महाकोधकर चकर उदढाय परम वेगते वीरभद्र
स.खं.२
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साथ युद्ध करनेकगे ॥ २६ ॥ उन दोनोंका महाघोर रोमहषं युद्ध हुआ विष्णजी उस्र सभय अनेक अशोका प्रहार करनेढगे॥ २७ ॥ विभ्णकी ]|
१ देहमेपे योगवल्के कारण शख चक्र गदा हाथमं लिये असंख्य वीर प्रगट हए ॥ २८ ॥ वे सव विष्णजीके समान महावटी अनेक प्रकारके आयुध है
¢ धारण किये वीरभद्रके संग युद्ध करनेटगे ॥२९॥ वे महावीर नारायणके समान प्रभाववाठे थे वीरभद्रने शकरफी स्मरणकर उन सबको शरसे भस्म ठ
टै कृरदिया ॥३०॥ उसी समय महाबली वीरभद्रन अपने त्रिशरूलने विष्णको युद्धे प्रहार किया ॥३१॥ उस्न घातसे सहसरा पुरुषोत्तम मगवाचु ताडित
¢ तयोः समभवद्यद्वं सुघोरं रोमहर्षणम् ॥ महावीरान्धिपत्योस्तु नानाघ्लधरयोधन ॥ २७ ॥ विष्णोर्योगबलात्तस्य देवदेव खदा ||
र| रणाः ॥ शङ्खचक्रगदारस्ता असंख्याता जज्निरे ॥ २८ ॥ ते चापि युुधुस्तेन वीरभद्रेण भाषत ॥ विष्णुवत् बलवतो हि रै
४ नानाखुधधरागणाः ॥ २९ ॥ तान्सवानपि वीरोसौ नारायणसमप्रमाच् ॥ भस्मीचकार शुलेन इत्वा स्परत्वा शिवं अशम् ठ
॥ ३० ॥ ततओोरसि तं विष्णुं लीरयेव रणाजिरे ॥ जघान वीरभदो हि अिश्चटेन महाबरी ॥ ३१ ॥ तेन वातेन सहसा ¢
ट विहतः पुरुषोत्तमः ॥ पपात् चतदा भूमौ विसंज्ञोभून्सुने हरिः ॥ ३२ ॥ ततो यज्ञोदधतं तेजः प्र्यानलसश्निम् ॥ वरैरोक्य ॥६
ट दाहकं तत्रं वीराणामपि भीकरम्॥ ३३ ॥ क्रोधरक्तेक्षणः श्रीमान् पुनश्त्थाय स प्रधुः ॥ प्रहत चकष्ुयम्य द्यतिष्ठत्पुर्ूषषभः ट
|| ॥ ३४ ॥ तस्य चक्रं महासै कालादित्यसमप्रभम् ॥ व्यष्ठंभयददीनात्मा वीरभद्रश्शिवः प्रथुः ॥ ३५ ॥ सने शंभोः प्रभा ¢
ह| वाहन मायेशस्य महापभोः ॥ न चचालहरेकं करस्थं स्तभितं धुवम् ॥ ३६ ॥ ४
। ४
हए) हे छने ! हरि उस्न अवातसे सहस्रा मूच्छित हो भगवानु पृथिवीपर गिरे ॥३२॥ उक्षसमय वीरको भयदेनेवाठे परलय अभिक समान निलो
कीक दाहं करनेवाठा तेज प्रगट हुआ ॥ ३३ ॥ ओर कोधसे छार नेत्रकर भीमान् महाप्रभु किर उठकर महाकोधकर् फिर चक्र उठाकर
मारनेको उदतहुए ॥ ३४ ॥ वीरभद्र शिवप्रमुने महात्मासे काठादित्यके समान कान्तिमान उस चक्रको स्तंभित करदिया ॥ ३५ ॥ भहापभ्
मायेश शकरक प्रभावे विष्णके हाथमे स्थित वह सदशन चक्र स्तंभित होगथा ॥ ३६ ॥
शिण्यु उक्त समय महावीर गणेश्वर वीरभदरके दारा स्त॑भित हए िष्णजी भगवान् निश्वल पर्वते समान स्थित हए ॥३७॥ हे नारदजी ! जव विष्णजीको वीर ट
॥१६५॥ ||| मदे स्तंभित किया, तब यजञक मनक स्तंभन कारण खक्तहुभा ॥३८॥ जव शाङ्गथषथारी उस स्तमनते क्त होकर अपना शाङ्ग दष उदात श ९
उत्षपर बाण चढाया ॥ ३९ ॥ हरिके उप्त शाङ्गधलषते निकठे तीन बाणोपि वीरभद्र ताडित हूए हे तात | वीरमद्रने उनको तीन भरकारसे छेद्नकररा दम् ¢
॥ ४ ०॥ तब भने ओर सरस्वतीने उससमय विष्णनीको उक्ष गणके विषयमे समञ्ञाया ओर वीरभद्रजीको असद्य कान्तिवाढा जानकर अन्तधीन होनेकी ठ
|
|
दरेणनारद ॥ यज्वोपमेत्रणमना नीरस्तंभनकारकम् ॥२८॥ ततस्स्तंभननिरथक्तः शाङ्ग॑धन्वा रमेश्वरः ॥ शाङ्ग जग्राह स॒ ऊद्ः &
स्वधलस्सशरं घुने ॥ ३९ ॥ तिभिश्च धर्षितो बाणेस्तेन शाद्खः धवुरहैरेः ॥ वीरभद्रेणतत्तात विषाभृत्तकषणान्सुने ॥४०॥ अथ
विष्णुर्मया वाण्या बोधितस्तं महागणम् ॥ असद्यवच॑सं ज्ञात्वा द्य॑तर्धातं मनो दधे॥ ॥४१॥ ज्ञात्वा च तत्सर्वमिदं भविष्यं
अथ विष्णुगैेणेशेन वीरभद्रेण भाषता ॥ अतिष्ठत्स्तंमितस्तेन शंगवानिव निश्वलः॥ ३७ ॥ ततो विष्णुः स्त॑भितो हि वीरभ ठ
©
सतीकृतं दुष्प्रसहं परेषाम् ॥ गताः स्वलोकं स्वगणान्वितस्तु स्मृत्वा शिवं सर्व॑पतिं स्वतंजम्॥ ४२॥ सत्यलोकगतश्वाहं पु ॥६
शोकेन पीडितः ॥ अचितयं स॒दुःखातो मया कि कार्यमद्य वै ॥४३॥ विष्णौ मयिगते चैव देवाश्च सुनिभिस्सह॥ विनिजैता ॥६
गणेस्सव ये ते यज्ञोपजीविनः ॥ 88 ॥ सथुपद्रनमालकष्य विध्वस्तं च महामखम् ॥ मृगस्वरूपो यज्ञो टि महाभीतोऽपि दुधवे ९
॥ ४९ ॥ तं तदा मृगरूपेण धाव॑त गगनं प्रति॥ वीरभ्रस्समादाय विशिरस्कमथाकरोत् ॥ ४६ ॥ ट
₹०६.९ ||| इच्छा ॥ ४१ ॥ तव यह वात जानकर कि सतीके मरणका दुःसह पाप है तव भगवान् विष्ण अपने स्वामी स्वत॑न शकर स्मरण करते ए अपन
प.स.२ || || गणो सहित अपने टोकको गये ॥ ४२॥ मै भत्रशोकते पीडित होकर सषतयोकको चका आया ओर दुःखीहोकर सोचने ठगा किं भ अव
अ०३७ || || कया कं ॥४३॥ जव मँ ओर विष्णजी वहासि चे आये तब वीरभब्रने यज्ञके सव देवता ओर स॒नियोको जीतलिया ॥४४॥ यह महाउपदरव =
ओर यज्ञका विध्वंस देखकर यज्ञभी महाभयभीत हो मृगका हप धारणकर वहसे परठायमान हआ ॥ ४५ ॥ जव वह मृगका हप धारणकर॥¢
=
आकाशमार्गमं धावमान हआ तव वीरभद्रने उस्तको ्रहणकर उसका शिर छेदन करडा ॥ ४६ 1 तब प्रजापति, धर्म, कश्यप, अरिष्टनेमि
बहूपत्रसुनि ॥ ४७ ॥ तथा आंगिरस, कशाश्च्ुनिको वह महावीर प्रहणकर इन महासनिके शिरपर अपना चरण प्रहार किंया ॥ ४८
सरस्वती देवमाताकी नाभा छेदन करडाटी, यह प्रतापी वीरभद्रे अपने हस्तखाषवसे एसा कायं किया ॥ ४९ ॥ फिर ओर भी देवताओंको
विदीणैकरकै महाक्रोधितनेत्र हो वीरभद्रने पृथिवीप्र गिरादिया ॥५०॥ इस प्रकार वीरभद्र सुख्यदेवता ओौर स॒निर्योको विदीणे करके कोभित
ततः प्रजापति धर्म कश्यप च प्श्य सः ॥ अरि नेमिनं वीरो बहुपशनीश्वरम् ॥ ७७ ॥ सरुनिमांगिरसं चैव कृशाभ्वे च
मदा गणः ॥ जघान मृधि पादेन दत्तं च मुनि्पुगवम् ॥४८॥ सरस्वत्या नासाभ देवमास्तु तथेव च ॥ चिच्छेद करजाभ्ेण
वीरभद्रः ` प्रतापवान् ॥ ७९ ॥ ततोन्यानपि देवादीन् बिदा प्रथिवीतछे ॥ पातयामास सोयं वै कोधाक्रांतातिखोचनः
॥ ५० ॥ वीरभद्रो विदास्यांपि देवान्पुख्यान्ुनीनपि ॥ नाभरूच्छांतो द्ुतक्रोधः फणिराडिव मंडितः ॥ ५१ ॥ वीरभदोदध
तारातिः केसरीव वनद्विपान् ॥ दिशो विरोकयामास कः कुास्तीत्यवक्षणम् ॥ ५२ ॥ व्यपोंथयद्भथं यावन्मणिभदः प्रता
पवान् ॥ पदाक्रम्योरसि तदाऽकार्षीत्तचच्मश्ुधंचनम् ॥ ५३ ॥ चंडओोत्पारटयामास पएृष्णो देतान् प्रवेगतः ॥ शप्यमाने हरे
पूर्व योऽदसदरयन्दतः ॥ ५९ ॥ नन्दी भगस्य नेत्रे हि पातितस्य रुषा थुवि ॥ उनहार स ॒दक्षोक्ष्णा यश्शपंतमूसुचत्
॥ ५५ ॥ विडंबिता स्वधा तञ सास्वाहा दक्षिणा तथा ॥ मंजास्तंजास्तथा चान्ये तस्था गणनायकः ॥ ५६ ॥
सपराजके समान शांत न हु ॥५१॥ जिसप्रकार सिंह वनके हाथियोको भगाकर चारोभर देसे इसभकार वीरभद्र देखने रगा ॥*१२॥ जब
तकं मणिभद्र प्रतापीगणने भृयजीको दबोचकर उनकी छातीपर पैर रखकर उनकी डादी उखाडली ॥५३॥ ओर चैडने बडे वेगसे पूषाकै दाति
उखाड द्यि कि तुमही हरक शप्यमान होनेपर पहछे दात सोककर हंसे थे ॥५४॥ नन्दने करोधकर भगदेवताके ने निकार टये दक्षके कारण
शंकरकी निन्दासे उस्तकी आंख उखाडी गई ॥५५॥ स्वधा स्वाहा दक्षिणा मंत तेत्र जो कछ भी ये गण नायकोंने उनको प्रहार किया ॥ ५६ ॥
२+^२<॥
34 > आ >९ 4 > 4 > ८ 4
ओर ग्णोने कोधकर वितानाभिपर परीषी वर्षी की महावीरग्णोनि उस यज्ञको अनिर्वाच्य करदिया ॥ ५७ ॥ यह दक्षु इस वटी वीरभदकँ
भयते अन्तवेदीमे छिपगया जानकर वीरमद दक्षको वहासि छे आया ॥ ५८ ॥ तव॒कपोखको ग्रहणकर वीरभद्रने उसके शिरपर खद्खका
रहार किया परन्तु योगके प्रभवते उत्तका शिर अभेद हो गया ॥ ५९ ॥ जब शच्रअश्चोते उसका शिर अभेद जाना तव उक हृदयम चरण
रखकर हाथ इसका शिर नोच छिया ॥ ६० ॥ शंकरके वैरी दुष्ट उप्त दक्षका शिर महागण वीरभद्रे अश्रिङ्ण्डमं डाठदिया ॥ ६१. ॥ तब
उससमय हाथते` व्रिशक धुमाते हए वीरभद्रने रणम बडी शोभा पाई ओर युदधकी संवतैअभि पर्ववके समान इप्तको करोधकर जलाने ठगी
वधषुश्ते पुरीषाणि वितानाऽौ रषा गणाः ॥ अनिर्वाच्यं तदा चक्गैणा वीरस्तमध्वरम् ॥ «७ ॥ अंतवेँ्॑तरगतं निलीनं
तद्भयाद्रलाव ॥ आनिनाय समाज्ञाय वीरभद्रः स्वभूषुतम् ॥ ५८ ॥ कपोरेऽस्य ग्रदीत्वा त् खद्गेनोपडतं शिरः ॥ अभेद्यम
भवत्तस्य तञ्च योगप्रभावतः ॥ ५२ ॥ अभेदं तच्छिरो मत्वा शच्चाक्चेश तु स्वंशः ॥ करेण ओटयामास षञ्यामाकम्य चोर
सि ॥ &० ॥ तच्छिरस्तस्य दुष्टस्य दक्षस्य इरवैरिणः ॥ अभिङुंडे ्रचिक्षेव वीरभद्रो गणाब्रणीः ॥ ६१ ॥ रेजे तदा वीर
मद्रशिश्चं भामयन्करे ॥ $द्धा _रणक्षसंवतांः परज्वाल्य पवतोपमाः ( ! ) ॥ &२॥ अनायासेन इत्वेतान् वीरभद्रस्ततोऽ
भिना ॥ ज्वालयामास सक्रोधो दीप्ताथिश्शकभानिव ॥ ६३॥ वीरभद्रस्ततो दग्धा नहृष्ट दक्षपुरोगमान् ॥ अद्ाहृहासमकरो
तयूरयंश्च जगत्रयम् ॥ ६8 ॥ वीरश्चिया उतस्तत्र ततो नन्दनसंभवा ॥ पुष्पवृषठिरभूदिम्या वीरभद्रे गणान्विते ॥ ६५ ॥ वयु
| गधवहाश्शीतास्सगन्धास्संखदाः शनैः ॥ देवदुदुभयो नेदुस्सममेव ततः परम् ॥ 8६ ॥
६२ ॥ इसप्रकार वीरभदरने अनायासही इन .सवको दीप अश्म शङभके समान भस्म करना आरंभ किया ॥ ६३ ॥ तच वीरभद्रने
प.८.२ || || दक्षआदि सवको भस्म करके तीनो जगत्को पूणकरनेके खये बडा अद्राहास् किया ॥ ६४ ॥ उस्र समय वह वीरभद्र ठक्ष्मीसे आवृत हआ
ओर वीरभद्रके ऊप्र नन्दनवनके एूटोंकी वषा होनेटगी ओर सव गण प्रसन्न हए ॥ ६५ ॥ सुखदायक शीतर सुगंधस्ननी पवन चने ठगी |
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ओर उसीस्मय देवताओंकी दुंदुभी बजने ठगीं ॥ ६६ ॥
च क वव्कणककरकाददयाकककाकवयोक यका ~~~ - ----~
इतके उपरान्त कृतकायं होकर वह वीर केठासपव॑तको गया ओर सूर्यके समान सव अथकार दुर कर दिया॥।६७॥ वीरभई तकायै देखकर सतु्हो
परमेश्वरे वीरभद्रको गणेश्वर करदिया ॥६८॥ इति श्रीशिवमहापएराणमभाषायां द्रसंहितान्तगतादितीयसतीखण्डे सप्तरिशोऽध्यायः ॥ ३७1 सूतजी
बोठे महाबुदधिमान् विधाताक वचन् सुनकर द्विजोनम नारदजीके प्रमे विस्मितहो पृछने कगे ॥ १ ॥ नारदजी बोरे किं है ब्रह्माजी ! शिब
जीके विना विष्णजी दक्षके यज्ञम कैम चठेगये इसकारणको आप हमारे आगे प्रकाश कीजिये ॥२॥ क्या हरि शंकरका परखयके समान पराक्कम
कैलासं स य॒यौ वीरः कृतका्स्ततः परम्॥निनाशितदृदध्वांतो भावुमानिव् सत्वरम्॥६७॥ कृतका वीरभ हष्ठा संतुष्टमा
नसः॥शयुर्वीरगणाध्यक्षं चकार परमेश्वरः॥६८॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखंड यज्ञविष्वं
सवृणनो नाम सप्तधिशोऽध्यायः॥ ३७] ॥ सूत उवाच ॥ ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य वीधेरमितधीमतः ॥ पप्रच्छ नारदः प्रीत्या
विस्मितस्तं द्विजोत्तमः ॥ १ ॥ ॥ नारद उवाच ॥ ॥ शिवं विहाय दक्षस्य सुरैय्॑ञं दरिगेतः॥ हेतुना केन तद् ब्रूहि यथावज्ञाऽ
भवत्ततः ॥२॥ जानाति क स शुं नो हरिः भलयविक्रमम्॥ रणे कथं च कृतवान् तद्रणेरबुधौ यथा ॥३॥ एष मे संशयो
भूयास्तं छथि करुणानिधे ॥ चरितुं बरूहि शंभोस्तु चित्तोत्सादकरं प्रभो ॥9॥ ब्रह्मोवाच ॥ द्विजवर्य शृण परीत्या चरितं शशि
मौलिनः ॥ यत्पृच्छते कुर्वतश्च सर्वसंशयदारकम् ॥५॥वृधीचस्य घुने: शापाद्धषज्ञानो हरिः पुरा ॥ सामरो दक्षयज्ञं वै गतः
छवसहायङ्कत् ॥ & ॥ ॥ नारद उवाच॥ किमथ शप्तवान्विष्णं दधीचो सुनिसत्तमः ॥ कोपाकारः कृतस्तस्य इरिणा तत्सा
यिना ॥७॥ ब्रूहमोवाच ॥ सघुत्पत्नो महातेजा राजा श्चुव इति स्मृतः ॥ अभृन्मिय दधीचस्य शनीन्दस्य महाप्रभोः ॥ ८॥
नही जानते थे ओर अपडितके समान उनके शण न जानकर कैत युद किया ॥ ३ ॥ हे करुणानिधे ! यह शने बडा संदेह है सो आप इसको छेदन
कीजिये हे भ्रभो ! चिमे उत्साह करनेवाे शकरके चरित्रको आप किये ॥ ४॥ बह्माजी बोठे हे दविजभेषठ ! वेते चरितरको सुनो जो पृष
नेवाठे सब सदेह दूर करता है ॥ ५ ॥ पहठे दधीचके शापे हरिका ज्ञान ष्ट होेगया था इससे वह दक्षकी सहायता करनेवाछे दक्षै यज्ञमं
भये ॥६॥ नारदजी बोठे सुनिश्रेष् द्धीचने विष्णजीको कैसा शाप दिया था उनके सहायक इरिने उनको कैते कोष दिवाया ॥ ७।॥ नह्ञाजी
८३
| | बोरे एक् महातेजस्वी राजा शुष था ओौर वह महातेजस्वी दधीचका मित्र धा ॥८॥ ङ" काठमे तपकै भरसगते षव ५ 0) नि
॥१६७॥||& || महाअनथ करनेवाठा त्रिोकीमे विख्यात हुभा ॥९॥ वेदक जाननेवाठे शिवकं भक्त दधीचने कहा कि बाह्मण तीनो वणा ऋ ह ।
दधीचके यह वचन सुनकर् श्रीके मदस्ते मोहित होकर श्वुव बोला ॥११॥ रुव बोढा राजा आढ छोकपाठोकूा शरीर धारण् कुपता है इस कारण ठ
वणेआभमका पति राजा परमश्रेष्ठ है ॥१२॥ यह श्रुति कहती है कि, राजा सम्पूणं देवमय है जो महादेवता ह हेखने! सोमे ॥१ ३॥ ह
¢ च्यवनएत्र ¡ इ्तारण यह बात विचारो किं राजा बडा होताहै राजाका कभी निराद्र न करना चाहिये भैं सर्वैथा तुम्हारा पूज्य हू ॥ १४ ॥ ४
&| प्राह दधीची हि शिवभक्तस्तु वेदवित॥१०॥तच्छरत्वा वचनं तस्य दधीचस्य महाणुनेः॥ वः पराति कृपतिःश्रीमदेन विमोहितः
|| ॥११॥ श्व उषाच॥ अष्टानां छोकपाटानां वपुर्धारयते वृषः ॥ तस्मान्नरो वरिष्ठो हिक्णांश्रमपतिः प्रथः ॥१२॥ सर्वदेवमयो
|| राजा अ ति ्रहिति तत्परा॥महती देवता या सा सोहमेव ततो सने १२॥ तस्माद्विभादररो राजा च्यवनेय विचा्॑ताम्॥ नावम
ट| तव्य एवातः पूज्योऽहं सर्वथा त्वया ॥१४॥ ब्रह्मोवाच ॥ यत्वा तथा मतं तस्य श्षुवस्य॒सुनिसत्तमः ॥ अतिस्प्रतिविर्ध तं
टू
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चिरात्तपपरसंगादे वदःश्ुवदधीचयोः॥महानर्थकरः रूयातश्चिकोकेष्वभवत्षुरा॥९॥त भरिवर्णतः शरो विप्र एव न संशयः॥इतिं ४
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चुकोपातीवभागेवः॥१५॥ अथ द्धो महातेजा गौरवाज्चात्मनो शुने ॥अताडयत्शुवं मूध दधीचो वामश्शितः॥१९॥ वरेण तं ‡
ट
च चिच्छेद दधीचं ताडितः क्ुवः॥जगनांतीव सङ्द्धो ब्रह्ांडाधिपतिः कुधीः ॥१७॥पपात भूमौ निहतो तेन वज्रेण भार्गवः॥शुक्रं
¢
¢ सस्मार श्ुवङृद्धागवस्य कुरुंषरः॥ १८॥श्गुङ्कोथ सधयामास ताडितं च क्षुषेन तु॥योगी दधीचस्य तदा देहमागत्य सद्ुतम्॥१९
५५९ ब्रह्माजी बोठे यह श्षुवके वचन सुनकर उस स॒निभरष्ठने यह शरुतिस्पृतिकै विरुद जानकर उपर बडा कोप किया ॥ १५ ॥ महातेजस्वी दधीचने ४
प.खं.२
|| अपने गौरवे महाक्ोधकर बाया ध्रूसा श्ुवके शिवे भारा ॥ १६ ॥ श्ुवने ताडित होकर दधीचपर वज्रका प्रहार किया ओर वह बरह्माण्डकै
|
|| अधिपतिने बडे वगसे गजना कि ॥ १७ ॥ भागव दधीच उस वजे ताडितहो पृथिवीम गिरपडे ओर भार्गवने राजाकै निमित्त शुक्रका स्मरण
२९|| किया ॥ १८ ॥ शुक्रने तत्काठ आकर श्षुवके प्रहरक संधानको ठीक करदिया अथात् दधीचयोगीका शरीर ॥ १९ ॥
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रवतत ठीक करदिया कारण कि वह शिवकं भक्तोमे अग्रणी ओर मृत्युंजय वियाका भवतेक है ॥२०॥ शुक्र बोखे हे तात दधीच ! सुवैश्वर शकरका
पजन करके महामृत्युंजय वैदिकमंत्र मे तुमको देता हूं उको कहता हं ॥२१॥ त्रिटोकीके पिता श्रेष्ठ शेकरका यजन् करते ह जो तीनमंडर्कै पितर
त्रियुण महेश्वर है ॥२२॥ तीन तीनि तीनप्रकारते तीन देव तीनबाहु तथा तीन प्रकारे स्थितं है ॥ २३ ॥ वह तीन देवताओंके
सुगंधि ओर ष्टके बढानेवाछे है सब मूतोमे स्व॑र तीनयणोमे सतके समान है ॥ २४ ॥ स्व दंद्विय तथा दूसरे देवतागणों पष्पोमे सुगेधिके
समान सर सुगधियुक्तं परमेश्वर है ॥ २५ ॥ हे द्विजोत्तम ! जिस प्रकार किं, प्रकतिसे षटि होती है हे सुवत ! महदादिसे विशेष पर्यन्त
संधाय पूर्ववदेदं दधीचस्याह भगवः ॥ शिवभक्ताग्रणीृत्यजयविदयाप्रवतेकः ॥ २० ॥ शुक्र उवाच ॥ दधीच तात संपूज्य
शिवं सु्वे्वर भ्रथुम् ॥ महामृत्युंजय मंच श्रोतमग्यं वदामि ते ॥२१॥ अयम्बकं यजामहे वरेलोकयं पितरं प्रथम् ॥ जिमंड
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लस्य पितरं त्रिगुणस्य् मदैश्वरम्॥२२॥ तत्वस्य. वहश्च परिधाभूतस्य् सर्वतः॥ तिदिवस्य् भिबाहोश्च बिधाभतस्य सर्व॑तः॥
॥२२।यिदेवस्य महादेवस्सुगंपि पुशिवद्धनम्॥। सर्वभूतेषु सर्वत्र विण छतो यथा॥२४।इन्दियष् तथान्येषठ दवेषु च गणेषु च॥
पुष्पे सुगंधिवत्सुरस्सुगंधिममरेशवरः ॥२५॥ पुष्टिश्च प्रकृतेर्यस्मातपुरषादरे द्विजोत्तम॥ महदादिविशेषांतविकर्पश्ापि सुबत॥
॥२९॥ विष्णोः पितामहस्यापि सनीनां च महासुने॥ इन्द्रियस्य चदेवानां तस्माद्र पटिषर्दनः॥२७॥तं देवममृतं रूढ कर्मणा
तपसापि वा स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च प्रजापते॥२८॥ सत्येनान्येन स्ष्माथान्भृत्युपाशाद्ववः स्वयम् ॥ बधमोक्षक
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यस्मादुवाुकमिव प्रथः ।॥२९॥ मृतसंजीवनीमन्त्रो मम सर्वोत्तमः स्मरतः ॥ एवं जपपरः प्रीत्या नियमेन शिव स्मरत्॥३०॥
उत्से विकल्प है ॥ २६ ॥ हे महासने ! विष्ण ओर महाशचनियोका भी वह, पितामह है तथा देवताओंकी इद्रियोक्ी भी षष्ट करता है
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इसकारण उत्को एष्टिवधन कहते हँ ॥ २७ ॥ उस देव अगृतरूप रुके वा तपसे त्वाध्यायपोग ओर ध्याने भरकर करते है ॥ २८ ॥ वह ¢
त्यते सक्षम मृतयुपार्ोको छेदन करते अर्थात् स्यसे वंधको उर्वारुकं ( फठ विशेष ) $ समान योक्ष करते है इसे भमु है ॥ २९ ॥ यह
मेरा मृतसंजीवनी मंत्र सबसे उत्तम है नियमपूर्वक शिवको स्मरते हुए इतत म्॑का जप् करो ॥ ३० ॥
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इतके जपहोमके साथ अमिजण करकजा करो रातदिन शंकरके समीप स्थित हो धयानकुरनते म्युका मय नहीं है।३.१।ब न्यासादि ा (८
प्क शंकरका पूजन इसप्रकार कर निर्व्ययहोकर भक्तवत्सक शंकरका ध्यान करो ॥३२॥ म् इसका ध्यान कहता हू जो करके मत्र जपा (६ ॥ ध
प्रकार शंकरके भभावसे मंत्र सिदध होजाय॥३ ३ दोनों कमरे हाथमे घटको उटाकर शिरके ऊपर जठ छोडते हृष ओर दो हाथो परनी गोदी
धट धरे दूए रुदराक्षकी माला मृग भौर कमङ हाथमे वि शिरमे स्थितचनब्रमाते निकठतेहृए अमृते आद्रशरौर मृत्युंजय तीननेत् शंकरकौ भवानीपर्हित
जप्त्वा इत्वाभिमञयेवं जटं पिब दिवानिशम्।।शिवस्य स्त्रिघो ध्यात्वा नास्ति म्रल्युभयं क्रचित् ।॥ ३१॥ कृत्वा न्यासादिकं.
सर्व संपूज्य विधिवच्छ्विम्॥ संविधायेदं निर्व्यगरश्शंकरं भक्तवत्सलम्॥३२॥ध्यानमस्य् वक्ष्यामि यथा ध्यात्वा जपेन्मवम् ॥
सिद्ध मन्तो वेदीमान् यावच्छुपभरमावतः॥३२॥दस्तांभोजयुगस्यकुंभयुगलादद्त्यं तोयं शिरर्सिचतं करयोयुगेन दधतं स्वांके
सभौ करौ ॥ अक्षसस्म्रगहस्तमंबुजगतं मूदधंस्थचन्द्रसवत्पीयुषादरेतनं भजे सगिरिजं अयक्षं च मृत्युंजयम् ॥ ३९ ॥ ब्रह्मो
वाच ॥ उपदिश्येति शुक्रः स्वं दधीचि भुनिसत्तमम्॥ स्वस्थानमगमत्तात संस्मर्च शंकरं प्रभुम् ॥३५॥ तस्य तद्वचनं शरुत्वा
दधीचो हि महा अनिः ॥ वनं जगाम तपसे महाप्रीत्या शिवं स्मरन् ॥३६॥ तत्र गत्वा विधानेन महामृत्युंनयामिघम् ॥ तं
मवं प्रजपन् प्रीत्या तपस्तेपे शिवं स्मरन् ॥ ३७ ॥ तन्मठुं सुचिरं जप्त्वा तपसाराध्य शंकरम् शिवे संतोषयामास महा
मृत्युंजयं हि सः ॥ ३८ ॥ अथ शंभुः प्रसत्रात्मा तनपाद्धक्तवत्सलः ॥ आविर्बभूव पुरतस्तस्य प्रीत्या महामुने ॥ ३९ ॥ तं
दष्टा स्वप्रथं शंभुं स श्ुमोद मुनीश्वरः ॥ प्रणम्य विधिवद्भक्त्या तुश्ठाव सुकृतांजलिः ॥ ० ॥ |
प्रण करता हू॥ ३४॥बह्माजी बोठे इस्प्कारते दधीचजीपे शुक्राचायैने उपदेशकर शंकरको स्मरण करते हए अपने स्थानको गमन किंया॥ ३५ उनके
यह वचन सुनकर महाखनि दधीचजीने मरहाभरी तिकषे शंकरको स्मरणकर तपके निभित्त वनको गमन किया ॥३६॥ वहां जाकर विधिपूरवेक प्रमते महा
मृत्युजयमंत्र जपते हुए शिवका स्मरण करते ओर वनको गमन किया ॥३७॥ वहं बहुतकाठतक उप मंत्रो जपते हए महाम्युंजयके आराधने
शकरको स्मरण किया ॥३<॥ तब भक्तवत्सल शंकर उस्र मंत्रे भरसन्न हो प्रेमे उक्त, सनिके आगे भरकर हुए ॥३९॥ महानि अपने भ्रमु शंकरको॥
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|| देखकर बहुत भतन हए ओर वे विधिपूर्वकं भक्तिते भरणामकर हाथ जोड स्तुति करने रुगे ॥ ४० ॥ हे खनि ! तब दधीच ऋषिप्र शंकर
प्रम भरस्न्न हो भ्स्न्नचिन्तसे वर मोगनेक व्यि बोठे ॥ ४१ ॥ भक्तभेष्ठ दधीचजी शकरकै यह वचन तुन हाथ जोड भक्तवत्सर शकरसे बोठे ||.
॥ ४२॥ दधीच बोठे हे देवदेव ! महादेव ! आप शु्ञे तीन बर दीजिषे भेरी वके समान अस्थि होजांय सबसे अवध्य ह ओर सर्वथा दीन रै
|| न ह ॥ ४३ ॥ बरहमाजी बोठे कषिके वचन सुनकर शंकर बडे प्रसन्न हए ओौर तथास्तु कहकर शकरने उनको तीन वर दिषे ॥ ४४ ॥ ¢
|| शिवे तीन वर पाकर नि बडे आनंदको भाप हूए ओर वेदमार्गम प्रतिष्ठित होकर शीप्रही श्ववके स्थाने प्राप ए ॥ ४५ ॥ हाजी ||
अथ प्रत्या शिवस्तात ्रस्नश्च्यावनिं शने ॥ वरं ब्रदीति म॒ प्राह सुप्रसत्रन चेतसा ॥ १ ॥ तच्छत्वा शंञुवचनं दधीचो र
भक्तसत्तमः॥सांजलि्नतकः प्राह शंकरं भक्तवत्सलम् ॥४२॥ दधीच उवाच॥ ॥ देवदेव महादेव मयं देहि वशरयम् ॥ वजा
स्थित्वाद्वभ्यत्वमदीनत्वं दि स्वेतः ॥४३॥ ब्रह्मोवाच ॥ तदुक्तवचनं अुत्वा प्रसन्नः परमेश्वरः॥वर्यं ददौ तस्मै दधीचाय |
तथास्त्विति ॥४४॥ वर्यं शिवात्प्राप्य सानंद्च महासुनिः॥ छुवस्थानं जगामाश् वेदमानें परतिष्ठितः ॥४९॥ ब्रह्मोवाच ॥ (
भराप्यावध्यत्वसुभ्ात्स वत्रास्थित्वमदीनताम्॥ अताडयच राजेन्द्रं पादमूलेन मूर्दनि॥ ४६।।क्षुवो दधीचं वन्रेणजवानोरस्यथो तरपः॥ ल
कोधं कृत्वा विशेषेण विष्णुगौरवगविंतः॥४७।नाभूत्राशाय तद्वजंद्धीचस्य महात्मनः॥परभावात्परमेशस्य धातषु्ो विसिस्मिये |£
॥४<५दक्वाप्यवध्यत्वमदीनतां च वचस्य चात्यंतपरप्रभावम्॥क्षुवो दधीचस्य सुनीश्वरस्य विश्षिस्मिये चेतसि धात॒पु्रः॥४९॥ |£
बोढे इस प्रकारसे वह॒ कपिं शेकरमे अवध्यत्वं ओौर उत्व पाकर फिर जाकर उस राजाकै शिरपर चरणका प्रहार किया ॥ ४६ ॥ तब
| राजाने दधीचकी छातीमे वजञका प्रहार किया यह विष्णके गौरवके कारण राजाने विशेष कोष किया ॥ ४७॥ उ्षके ठगनेसे महात्मा दधी ||
चकौ कुछ भी हानि न हू यह ॒स्षव शेकरका प्रभाव था विधाताका प्र उसे बडे विस्मयको पात हुमा ॥ ४८ ॥ महाप्रभववारे वजे ||
उसको अदीनता प्राप्त होने ओर अवध्यत्व भरा होनेसे महा्चनिकी ढता देखकर क्व बडे विस्मयको भाप्ता हुमा ॥ ४९ ॥ |;
उने हरि सकुन्द इन्दरके अनुज दीनोकि पाठक नारायणका वनम जाकर आराधनं किया कि मृत्युनयका सेवक दधीच खर 1 1
॥ ५० ॥ भगवान् मधुखदन उसके तपसे सनतषट हए ओर ॒गर्डध्वजने अपने दिष्य दशन उनको दिखाया ॥ ५१ ॥ जनादन देवका ६2
दशन देखकर सुन्दर बाणीसे गरुढध्वजकी स्तुति करने ठगा ॥ ५२ ॥ देवता सहित उनका पूजन करके अजेय ईश्वरकी सतुति करके परम
भक्तिसे विज्ञापना की ओौर भक्तिमूर्वक ममते प्रणाम किया ॥५३॥ राजा बोका हे भगवन् ! कोई दधीचनामक ब्राह्ण है वह धम ज्ञाता विनीत
आराधयामास हरि अकन्दमिन्द्रा्ज काननमाश्चु गत्वा ॥ प्रपत्रपाश्च पराजितो हि दधीचृत्युंजयसेवकेन ॥ ५० ॥
पूजया तस्य सन्तुष्टो भगवान् मधुसूदनः ॥ प्रददौ दर्शं तस्मे दिभ्यं वै गक्डध्वजः ॥ ५१ ॥ दिष्येन दर्शनेनैव दक्षा देवं
जनार्दनम् ॥ तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य गङ्डध्वजम् ॥ ५२ ॥ सम्पूज्यचैवं अिदशेभ्वरायेः स्तुतं देवमजेयमीशम् ॥
विज्ञापयामास निरीक्ष्य भक्तया जनार्दनाय प्रणिपत्य मूधा ॥ ५३ ॥ राजोवाच ॥ ॥ भगवन् ब्राह्मणः कञिहधीच इति षि
शतः ॥ ध्ैवेतता विनीतात्मा सखा मम पुराभवत् ॥ 48 ॥ अवष्यस्सर्वदा स्वश्शंकरस्थ प्रभावतः ॥ तमाराध्य महादेवं
मृत्युंजयमनामयम् ॥ «< ॥ सावज्ञं वामपादेन मम सुधि सदस्थपि ॥ ताडयामास वेगेम स दधीचो महातपाः ॥ ५६ ॥
उवाच तं च गण न बिभेमीति स्वेतः ॥ सृत्यंजयाप्त सखुवरो गर्वितो यतुं हरिः॥ ५७ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथ ज्ञात्वा
दधीचस्य ह्यवध्यत्वं महात्मनः ॥ सस्मारास्य महेशस्य प्रभावमतुलं हरिः ॥ ५८ ॥
स.खं.२ आत्मा पहठे मेरा भित्था ॥ ५४ ॥ वह शंकरके भावत अब सदा अवध्य है उसने मृत्युंजय अनामय शकरदेवकी आराधन की है॥ ५५ ॥ उतने
भाके बीचमे अवज्ञापुवंक मेरे शिरपर बाय चरणका भ्रहार किया वह महातपसे गविंत है ॥*५६॥ ओर गर्वसे सञ्चसे कहा कि तँ कहीभे नही डरता ह
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हरिबह मतयुनयका वर प्राप्तकर गर्वसे महा अभिमानी हो रहा है।॥५७॥जज्ञाजी बोठे इसप्रकार महात्मा दधीचका अवध्यत्व भवण करके हरिने
उत्सो महैश्वरका अतुढ प्रभाव स्मरण कराया ॥५८॥ दस प्रकार शंकरको स्मरणकर हरिने श्षुवसे कहा हे राजन् ! ब्राह्णोको कहीं भौ किसीसे
भय नहीं है ॥५९॥ हे भूपते ! विशेषकर शंकरके भक्तों को कहीं मी भय नहींहै उनको दुःख देनेसे सके ओर देवताओंको शाप होता है ॥६०॥
हे राजन् ! दक्षके यज्ञम उस ऋषिक शापसे भेरा विनाश ओर एनः उत्थान होना है ॥६१॥ हे राजन् ! इस कारणसे सब यज्ञोमे वा कार्योमें
साहस्र नहीं किया जाता पर भँ दधीचके विजयके डिये कोद यत्न करताहूं ॥६२॥ यह वचन सुनकर क्षुवने कहा रेसराही होगा ओर बडेप्रेमसे
उस्र कामनाकै खयि उसने वहां स्थित की ॥६३॥ इति भरीशिवमहाष्राणभाषादीकायां शुद्रसेहितान्तगेतद्वितीयसतीखण्डे अषटत्रिंशोऽध्यायः॥३८
एवं स्मृत्वा हरिः प्राह क्षुवं विधिसुतं दतम् ॥ विप्राणां नास्ति राजेन्द्र॒ भयमण्वपि कुजचित् ॥ ५९ ॥ विशेषादुदभक्तानां
भयं नास्ति च भूपते ॥ दुःखं करोति विप्रस्य शापाथं ससुरस्य मे ॥६०॥ भविता तस्य शापेन दक्षयज्ञे सुरेश्वरात् ॥ विना
शो मम राजेन्द्र पुनरत्थानमेव च ॥६१॥ तस्मात्समेत्य राजेन्द्र सू्वयज्ञो न् भूयते॥करोमि यतनं राजेन्दर दधीचविजयाय ते
॥ ६२ ॥ त्वा वाक्यं क्षुवः प्राई तथास्त्विति .हरेनपः॥ तस्थौ तरेव तत्प्रीत्यातत्कामोत्सुकमानसः ॥६२॥ इति श्रीशिवम
दापुराणे द्वितीयायां श्संरितायां द्वितीयसतीखंडे क्चुवदधीचवाद्वर्णनं नामाष्टविशोऽध्यायः ॥३८॥ अह्मोषाच ॥ श्षुवस्य हि
त्कृत्येन दधीचस्याश्रमं ययौ वि्रहूपमथास्थाय भगवान् भक्तवत्सलः॥१। दधीचं प्राह विप्राषिमभिर्वेद्य जगद्रर्। क्षुवकार्य्या
थमुदयक्तश्शवन्ट् छलमाश्चित ॥२॥ विष्णुरुवाच ॥ भो भो दधीच विप्रे भव्] चैनरताग्यय।।वरेकं बणे त्वत्तस्तद्रवान् दातुम
हंति ॥ ३ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ याचितो देवदेवेन दधीचश्शेवसत्तमः ॥ क्षुवकार्याथिना शीभं जगाद वचनं हरिम् ॥ £ ॥
बहमाजी बोरे भक्तवत्सरं शिवकी कार्यक निमित्त बाह्मणरूप धारणकर दधीचकै आश्रमम गये ॥ १ ॥ जगद्शूने दधीचको प्रणाम करके
कहा उप्त समय छले शिवकै कायक निभित्त विष्णजी उयत हए ॥ २ ॥ विष्णौ बोठे हे दधीच बर्षि ! हे शंकरकं पूजनम तत्पर ! ह
अविनाशी ! मे तुमसे एक वर मागता ह सो आप सक्ञे दीजिये ॥३॥ बह्लाजी बो जव देषदेवने ऋषिभेषते इसपभरकारकी याचना की तव शिवके
>| काय करनेवाे हरिस दधीच बोटे ॥ ४ ॥
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दधीच बोढे हे विप्रे ! म तुम्हारे भावको जान गया कि तुम शिवे कारके निमिन्न आये हो आप मायात ब्ाहणरूप धारण करके आये दी
सक्षात् हरि हो ॥५॥ है देवेश ! हे जनार्दन ! जो भविष्यत् वतमान है यह तीन कालका ज्ञान शेकरकी पते यन्न सद्ा बाप्त है
॥ ६ ॥ म आपको हरि विष्ण जानता हं आप यह रूप त्याग दीजिये दुष्टबुद्धि श्वने आपकी आराधना की है यह भी म जानता हूं
॥ ७ ॥ हे हरे ! मेँ आपकी भक्तवत्सरताको भी जानता ह छठ त्यागकर शंकरको स्मरण कर अपना पूर्वरूप धारण करो ॥ < ॥ शंकरकै
पूजन करते हृए सञ्च यदि कहते भय होय तो त्य धारणपर्वकं आप यत्ने मुञ्चते कहे ॥ ९॥ करको स्मरण करते हुए मै कभी
दधी चउवाच।।ज्ञातं तवेप्सिते विप्र क्ववकायार्थमागतः भगवान् विप्रह्पेण.मायी त्वमसि वै हरिः॥८५।भूतं भविष्यं देवेश वतं
मानं जनादन ज्ञानं प्रसादाद्रुदस्य सदा वैकालिकं मम ॥६॥ त्वां जानेहं हरिं विष्णुं द्विजत्वं त्यज सुव्रत ॥ आराधितोऽसि
भूपेन श्ुवेण खख्बुद्धिना ॥ ७ ॥ जाने तवैव भगवन् भक्तषत्सलतां हरे ॥ छं त्यज स्वह्पं हि स्वीकुर् स्मर शंकरम् ॥८॥
अस्ति चेत्कस्यविद्धीतिर्भवार्चनरतस्य् मे ॥ वकमरंसि यत्नेन सत्यधारणपूर्वकम् ॥ ९ ॥ वदामि न मृषा क्रापि शिवस्मरण -
सक्तधीः ॥ न बिभेमि जगत्यसिमन्देददैत्यादिकृदपि ॥१०॥ विष्णुह्वाच ॥ ॥ भयं दधीच सर्वत्र नघ च तव सुव्रत ॥ भवा
चैनरतो यस्माद्भवान्सर्वज्ञ एव च ॥११॥ बिभेमीति सङृद्रक्तुमरसि त्वं नमस्तव ॥ नियोगान्मम राजेन्द्र ुवात् भतिसदस्य
च ॥ १२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एव त्वपि तद्राकयं विष्णोस्स तु महा्रुनिः ॥ विहस्य नियः प्राह दधीचश्शीवसत्तमः ॥ १३ ॥
दधीच उवाच ॥ न बिभेमि सदा कापि इुतश्चिद्पि किंचन ॥ प्रभावादेवदेवस्य शंभोस्साक्षात्पिनाकिनः ॥ १४ ॥
असत्य नहीं बोठता हं ओर इस्त जगम देवता दैत्य किसे मी मँ नहीं इरता ॥ १० ॥ विष्णजी बटे हे सुबत ! हे दधीच !
सब ओरसे तुम्हारा भय नष्ट हो गया है ओर शंकरके पूजनसे तुम सर्वज्ञ भी हो ॥ ११ ॥ प्र हम तुमको नमस्कार करते ई आप एकवार
यह श्षुवराजाके पास जाकर यह कह दीजिये कि मँ तुमसे इरता हूं ॥ १२ ॥ बह्ाजी बोरे बह महानि विष्णके इस प्रकारके वचन सुनकर
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शेव ष्ठ दधीच ऋषि हसते हये निभय हो बोढे ॥ १३ ॥ दधीच बोरे यै कभी किससे कहीं भी नहीं ढरता यह सब भगवानु पिनाकी
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पक्षात् शेकरका भ्रमाव है ॥ १४ ॥ ब्ह्लाजी बोठे ऋषिके यह वचन सुन विष्णजी महाकुपित हये ओर सुनिकै भरम करनेकी इच्छासे ठ
अपना चक्र उठाया ॥ १५॥ राजाके समीपम देखते हृएही भगवानूका वह कठिन चक्र शकरके भरभावे कुंठित होगया ॥ १६ ॥ उप्त
चक्रको कुवित हुआ देखकर दधीचने साक्षात् सद् असद् व्यक्तिकै कारण विष्णु हेसते हुए कहा ॥ १७ ॥ दधीचने कहा, विष्णुजी आपने
तो बडे प्रयत्से यह दारुण सुदशंन चक्र पाया था ॥ १८ ॥ इतस्त कारण यह शिवजीका दिया हआ चक्र मुञ्चको बाधा नहीं दे सकता तब
|
# बरहमोवाच ॥ ततस्तस्य सुनेः त्वा वचनं कुपितो हरिः ॥ चकु्यम्य संतस्थौ दि धक्ुस॒निसत्तमम् ॥ १९ ॥ अभवल्छठितं
र तघविग्रे चक्रं सुदार्णम् ॥ प्रभावाचतदीशस्य नृपतेस्संनिधावपि ॥ १६ ॥ दृष तं ठितास्यं तच्चफ विष्णुं जगाद ह ॥
४ दृधीचर्सस्मितं साक्ात्सदसव्यक्ति कारणम् ॥ १७ ॥ दधीच उवाच ॥ ॥ भगवन् भवता न्धं पुरातीव सुदारुणम् ॥ खुद
४ शंनमिति स्यातं चक्र विष्णोः प्रयत्नतः ॥ भवस्य तच्छुभं चक्रं न निर्घासति मामिह ॥ १८ ॥ भगवानथ कुद्धोऽस्मै
सवांल्ाणिकमाद्यरिः ॥ बरहमा्रायेः शरेश्वाचेः प्रयत्नं कतेमरैसि ॥ १९॥ व्रह्ोवाच ॥ स तस्य वचनं थत्वा दृषा निरवी
ए य्यैमातुषम् ॥ ससजाथ कुथा तस्मे सर्वाल्राणि कमाद्धरिः ॥ २० ॥ च्दवास्ततस्तस्य विष्णोस्साहाय्यमादसत् ॥ द्विजे
४ नैकेन संयोद्धुं प्रसृतस्य विबुद्धयः ॥ २१ ॥ |
हरि भगवानूने कौधकर उत्तपर सव अशञका परहार् किया दपीचने कहा यह क्या आप बहअच्च आदिका प्रहार कीजिये ॥ १९ ॥ बह्माजी
बोठे हरिने उसके यह वचन सुनकर उप्तको निर्वीयं मुष्य जानकर करोधकर उ्तके ऊपर संपृणी शच्च चाये ॥ २० ॥ ओर देवताओने भी
उत्स्ाहसे विष्णकी सहायता की एकं बाह्लणसे युद्ध करनेको सबने अपनी बुद्धि चराई ॥ २१ ॥
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ओर सवनेही अपने अपने अज्ञ श्च चठाये इन्द्रादि हरिके पक्षपाती देवताओंने दधीच पर परहार किया ॥२२॥ दभीचजीने शकरको संमरण
करते हृए कुशाकी खी उढाकर सव देवताओंका भरहार बचानेकै खयि वर्जोकी अस्थिकी रचना की ॥ २३ ॥ शिवजीकं भभावत मनिकी वह
शाकी खटी काडाभिके स्मान दिव्य त्रिश हग ॥ २४॥ तव वह प्रमैव दधीचका त्ंशढ व ओरसे जता हा भख्याभरिकै
समान आयुधं ओर शिखासहित देवताओके जलानेकी इच्छा करने ठ्गा ॥२५॥ नारायण चन्दर इन्दर जिन सुखुय देवताओंने अनेक अच्च शच्च
छोडे ये उन सबने दधीच ऋषिके शूको भणाम किया ॥२६॥ तव पराक्रम नष्ट हो जानेसे सब देवता भागने लगे केवर माया जाननेवाोमं
चिक्षिपुः स्वानि स्वान्याश्च श्लाण्यश्चाणि सर्वतः ॥ दधीचोपरि वेगेन शक्रा्या हरिपाक्षिकाः ॥ २२ ॥ कुशशुशटिमथादाय
द्धी चस्संस्मरन् शिवम् ॥ ससज सर्वदेवेभ्यो वचास्थि सर्वतो वशी ॥२३॥ शंकरस्य परभावात कुशमुष्टिशनेरिं सा ॥ दिव्यं
शिग्ुलमभवत् कालाभिसदशं खन ॥ २४ ॥ दम्ब देवान् मति चक्रे सायुधं सशिखं च तत् ॥ भञ्वलत्सवतरं युगातास्य
धिकप्रभम् ॥ २५ ॥ नारायणेन्दुसुख्यस्त देवैः क्षिप्तानि यानि च ॥ आयुधानि समस्तानि प्रणेश्॒िशिखं च तत् ॥ २६ ॥
देवाश्च ददरडस्सवे ध्वस्तवीयां दिवौकसः ॥ तस्थौ ततर हरिभीतः केवरं मायिनां वरः ॥२७॥ ससज् भगवाय् विष्णुः स्वदे
हात्पुरुषोत्तमः ॥ आत्मनस्सदशान् दिव्यान् रक्षलक्षायुतान् गणान् ॥२८॥ ते चापि युयुधुस्तञ्र वीरा विष्णुगणास्ततः ॥
सुनिनेकेन देव दधीचेन शिवात्मना ॥ २९ ॥ ततो विष्णगणान् तान्वै निुभ्य बहुशो रणे ॥ ददाह सदसा सर्वान् दधी
चश्रीव सत्तमः ॥ २० ॥ ततस्पद्िस्मयाथाय दीने शुनेदैरिः॥ विश्वमूर्तिरभूच्छी्े महामायाविशारदः ॥ ३१ ॥
ष्ठ हरिही तहां स्थित रहे ॥ २७ ॥ तन परूषोत्तम भगवानु विष्णने अपनी देहस्े अपने समान दिभ्य लक्षणवाठे संहसरोंगण प्रकर किये
॥ २८ ॥ हे नारदजी ! शिवात्मा इकर दधीच ऋषिके संग वे सव वीर अञ्च श्च ठेकर युद्ध करने ठगे ॥ २९ ॥ इस् भकार विष्के
गण बहुत कार्तक संग्राम करके थक गये शव भ्रष्ठ दधीचने उन सबको भस्म कर दिया ॥ ३० ॥ तव हरिने दधीच ऋषिको विस्मय
प्रकट करनेके निमित्त महामायाकै आशित हो शीधही विश्वमूर्ति धारण की ॥ ३१ ॥
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ट द्धीचने उस्न समय विष्णके शरीरम देवता ओर सहसो जीगोका दशेन किया ॥ ३२ ॥ करोडों भूतगण, क्रोडो अण्डकाहं २
| ख विश्वमूतिके शरीरं दिखाई दिये ॥ ३३ ॥ दधी चक्रषिने यह सव देखकर जगत्पति जगतके स्तुतियोग्य अज अविनाशी विष्णुस कहा ४
|| ॥ २४॥ दधीच बोठे हे महाबाहो ! हुम मायाको त्यागन करो विचारसे यह सब प्रतिभा है हे माधव ! मै सहो कटिनादसे जानने योग्य ¢
‡ पदार्थोको जानता हं ॥ ३५ ॥ मँ तुमको दिष्य दष्ट देता हं तुम सावधान होकर मुक्षमे सब जगत् ह्या ओौर शद्रके सरित देखो ॥ ३६
|| तस्य देहे हर सकषदपश्यदिजसत्तमः॥ दधीचो ता च सहसकम्॥२२॥ भताना कोटयेव गणानां कोटय ||
¢ स्तथा॥अंडानां कोटयभ्चव् विश्वमूतस्तनौ तदा ॥३३॥ दृष्टैतदखिलं त् च्यावनिस्पततं तद्ा॥ विष्णुमाह जगन्नाथं जगत्स्तु ¢
£| वमनं विधुम् ॥३९॥ दधीच उवाच ॥ मायां त्यज महाबाहो प्रतिभासो षिचारतः॥ विज्ञातानि सदस्राणि इुविंज्ञेयानि माधव
# ॥ ३५ ॥ मयि पश्य जगत्सर्व त्वया युक्तमतंद्ितः 1 ब्रह्माणं च तथा रुद्रं दिभ्यां दष्ठि ददामि ते ॥ ३६ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ६
|| इत्युक्रा दशयामास स्वतनौ निखिरं मुनिः ॥ ब्रह्मांडं च्यावनिश्शंयुतेजसा परणदेहकः ॥२७॥ ददाह विष्णु देवेशं दधीच ६
ट् वसत्तमः॥संस्मरय शंकरं चित्ते विहसन् विभयस्मुधीः ॥२८॥ दधीच उवाच॥ मायया त्वनया किं वा संशक्षत्याथ वा हरे ॥ ६
ट| सत्कामायामिमां तस्मायोद्धुमदंसि यतनतः॥३९॥बर्नोवाच॥एतच्छरत्वा श्नेस्तस्य वचनं निर्भयस्तद्॥शंधुतेजोमयं विष्णु ||
४ श्चुकोपातीव तं स॒निम् ॥४०॥ देवा ददुबुरभूयो देवं नारायणं च तम् ॥ योद्धकामाश्च निना दधीचेन प्रतापिना ॥४१॥ ||
नलाजी बोढे यह कहं कषिने अपने शरीरे शिवजी तेज से पूणैदेह हौ स बहाण्ड दिलाया ॥ ३७ ॥। ओौर वभे दधीचजी शिब्रजीको ||
स्मरण करते मनमे हसते निभय भ्ष्ठुदधि सहित विष्णजीको भज्वछित करने रुणे ॥ ३८ ॥ दधीचने कहा इस माया बा मंतरिशक्तिते क्या ह ह
ठै आप भ्रष्ठ कामनाकर तनके साथ युद्ध कीजिये ॥ ३० ॥ बह्याजी बोरे इत भकार उन छनिक निर्भय वचन सुनकर शिक्कै तेजरूप दिष्णने||>
>॥ निप्र बढा कोप किया ॥ ४० ॥ देवनारायणके साथ दधीचछनि महाभतापीको युदधकी फामनासे स्थित देखकर सब भागने ठगे ॥ ४१ ॥ 4
| इती समय बहप शष संगमे मँ आया ओर निशे देवता तथा हरिको उस कारये निवारण किया ॥४२॥ ओर ने कहा यहं जाह्ण नह
& जीतागया तव विष्णजीने खनिराजके निकट जाकर भरणाम किया ॥ ४३ ॥ ओर श्वुवभी महादीन हो निके निकट जाकर व्याकुढ हो प्रणाम
कर द्धीचकी भाथैना करने ठगा ॥ ४४ ॥ क्षु बोढा हे शिवके भक्तोमे शिरमोर स॒निभरेष्ठ ! आप प्रसन्न हूजिये हे परमेश ! भरसन्न ही
¢ दजन आपको जाननेमे समर्थं नहीं हो सकते ॥ ४५॥ ब्रह्माजी बोढे इस भकार राजा ओौर सब देवताओंके वचन सुनकर तपस्वी दधीचजीने
ठ उन सवके ऊपर कपा की ॥ ४६ ॥ परं विष्ण आदिको देखकर खनिको वडा क्रोध हुभा हृदयम शकरको स्मरणकर कषिने विष्ण ओर
| एतस्मिन्नतरे तञागमन्मत्संगतः श्वः ॥ अवार्यतं _निश्वषठं पद्मयोनि हरिं सुरान् ॥४२॥ निशम्य वचनं मे हि ब्राह्मणो न
विनिजितः॥ जगाम निकटं तस्यं प्रणनाम खनिं हरिः ॥ ४३ ॥ शचुवो . दीनतरो भृत्वा गत्वा त शनीश्वरम् ॥ दधीचममि
वाययैव प्रार्थयामास विद्वः ॥ ४४ ॥ श्षुव उवाच ॥ प्रसीद सुनिशादल शिवभक्तशिरोमणे ॥ प्रसीद परमेशान दक्षे .
दुजनेस्सह ॥ ५ ॥ बरह्नोवाच॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य राज्ञस्सुरगणस्य दि ॥ अलुजग्राह तं विप्रो दधीचस्तपसां निधिः
॥ ४६ ॥ अथ ह श रमेशादीन् कोधविहृठितो इनिः ॥ हदि स्मृत्वा शिवं विष्णुं शशाप च सुरानपि ॥ ९७ ॥ दधीच
उवाच ॥ शद्रकोपा शना देवास्सदेवेदरा अनीश्वराः ॥ ध्वस्ता भवेतु देवेन विष्णुना च समं गणेः ॥ ९८ ॥ ॥ ब्रह्लोवाच ॥ ॥
एवं शप्त्वा खरान् प्रय क्षुवमाई ततो शनिः ॥ देवै पूज्यो राजेन्द्र तृषैशवैव द्विजोत्तमः ॥ ४९ ॥ बराह्मणा एव राजेन्द्र
. बलिनः प्रभविष्णवः ॥ इत्युक्ता स स्फुट विपः प्रविवेश निजाश्रमम् ॥ ९० ॥
ए दव्ताओको शाप दिया ॥ ४७.॥ दधीच बोे इन्द्रादिदेवता ओर सनीश्वरोके सहित विष्णजी अपने गणोकि्हित रुकी कोपाश्च ध्वस्त
हे जायगे ॥ < ॥ हाजी बोढे इसप्रकार देवता आदिको शाप देकर श्चुवको देखकर खनिने कहा है राजेन्द्र ! आपने जाना किं ब्राह्ण
|| ओर देवता राजाओंषि भी पूज्य ई ॥ ४९ ॥ हे राजेन्द्र बाहञणही बटी ओर समथ होते है यह स्पष्ट कहकर कषिने अपने आशम
>| पवेश किया ॥ ५० ॥
(८ ९49९ 4 46 4९4 42 4 ९4624२९4
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२९
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६
९
एुनाई ॥ १ ॥ जिस समय वीरमद्रन दक्षका यज्ञ विनाश किया ओर वह कैलासको चा गया उक्त समय
उस्न समय सब देवता ओर सनि पराजित होकर् रुकी सेनापते छिन्न भिज्ञ .अंग हो भेर लोकको
दधीचको प्रणाम कर श्षुव भी अपने आश्रमम गया ओर विष्णजी देवताओकि साथ अपने ठोकंको गये ॥ ५१ ॥ वह स्थान उस सभयसे
स्थानेश्वर ८ थानेश्वर ) तीथं हुआ यहां शकरका दशेनकर यह मनुष्य शिवकी सायुज्य ख॒क्तिको भाप होता है ॥ ५२ ।॥ यह आपसे श्व
ओर द्धीचका विवाद सकषपपूवंक कहा इस प्रकार राजाके कारणसते उनको शाप मिला ॥ ५३ ॥ जो इस ्षुव दधीचकै वादको नित कीतेन
करते ह वह अकाठभूत्युको जीतकर अन्तम बह्मलोकरो जति ह ॥ ५४ ॥ जो इ्तको कीर्तनकर युद्धम भवेश करता है उसको भू्युका भय
दधीचमभि्वद्यैव क्षुवो निजगृहं गतः ॥ विष्णुजगाम स्वं लोकं सुरैस्सह यथागतम् ॥ ५१ ॥ तदेवं तीर्थमभवत् स्थानेश्वर
इति स्म्रतम् ॥ स्थानेश्वरमवुपाप्य शिवसयुज्यमाप्ुयात् ॥ ९२ ॥ कथितस्तव सक्षेपादवादः श्चुवदधीचयोः ॥ वृषाप्तशाप
योस्तात ब्रह्मविष्ण्वोः शिवं विना॥ ५३ ॥ य इदं कीत्तये्नित्यं वादं श्चुवदधीचयोः ॥ जित्वापभृत्यं देहान्ते ब्रह्मलोकं
प्रयाति सः ॥ ॥५४॥ रणे यः कीतयित्वेद प्रविशेत्तस्य सर्वदा ॥ सृत्युभीतिर्भवत्नैव विजयी च भविष्यति ॥ 4५ ॥ इति
श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां सुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे विष्ण॒दधीचयुद्धवर्णनो नाम नवर्चिशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ ॥
नारद् उचाच ॥ विधे विधे महाप्रज्ञा शेवतत््वपरद्शंक ॥ श्राविता रमणीभाया शिवलीरा महाद्धता ॥ 9 ॥ वीरेण वीर
भद्रेण दक्षयज्ञ व ॥ कैरासाद्रौ गते तात किमभृत्तदरदा्ुना ॥ २॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथ देवगणास्सवे भुनयश्च
पराजिताः ॥ शद्रानीकेविभित्रांगा मम लोकं यथुस्तदा ॥ ३ ॥
नहीं होता ओर वह विजयी होता है ॥ ५५ ॥ इति श्रीशिवमहाऽराणभाषाटीकायां रुदरसंहितान्तगत द्वितीयसतीखण्डे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
॥ २९ ॥ नारदजी बोठे हे महाभाग ब्रह्ाजी हे शिवत्वके भवतत करनेवाछे ! आपने यह महाअद्ुत प्रम भनोहर शिवी रीठा ज्ञ
क्या हुभा ॥ २ ॥ जह्लाजी बोे
गये ॥ ३ ॥
८५
` ॥१७३।
शिज्डु° स्च ब्ह्माजीको नमस्कारकर ओर भेरी बडी स्तुति करके अपना सव डश विशेषकर वणेन किया ॥ ४॥ यह् सव सुनकर भ दश्चकी मृत्युस बडा ||
शोकिंत हुभा ओर दुःली चित्तसे उयाकुठ हो सोचने गा॥५।इससमय भै देवताओंके सुखके निमित्त शीघतासे क्या करू जिम यह दक्षजी जाय ||
ओर यज्ञ पूणं हो जाय ॥ ६ ॥ हे खमे ! एसा बहुत विचार करनेते भी ञे शान्ति भात न हदं उस्समय भक्ति विष्णका स्मरण करनेमे यथोचित ||
ज्ञान पय ॥७॥ तब दैवत ओर खनि्थोको साथ ठेकर मँ विम्णलोकको गया ओौर बड स्तुतिकरकै मेने उनसे सब दुख निवेदन किया॥< ॥ जिस
स्वयेथुवे नमस्कृत्य मद्यं संस्त्रय भूरिशः ॥ तत्स्वङकेशं विषेशेण कात्स्यैनैव न्यवेदयन् ॥४॥ तदाकण्यं ततोहं वं पुत्रशोकेन
पीडितः ॥ अचिन्तयमतिभ्ययो दूयमानेन चेतसा ॥५॥ किं काय्य कायैमाञ्च मया देवसुखावहम् ॥ येन जीवतु दक्षोसौ ट
मखः पूर्णो भवेुरः ॥ & ॥ एवं विचार्यं बहुधा नारं शमहं सने ॥ विष्णुं तदा स्मरन् भक्तया ज्ञानमाप्ते तदोचितम् ट
॥ ७ ॥ अथ देवैशचषनिमिर्वष्णोर्छोकमहं गतः ॥ नत्वा चत्वा च विविधैस्स्तवैडैःखं न्यवेदयम् ॥ < ॥ यथाध्यरः प्रपूणैः ||#
स्यादेव यज्ञकरश्च सः ॥ खुखिनस्स्यस्स॒रास्सवे नयश्च तथा कुर् ॥ ९ ॥ देव देव रमानाथ विष्णो देवसुखावह ॥ वयं ||
त्वच्छरणं प्राप्तास्सदेवश्चनयो धुवम् ॥ १० ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचो मे हि ब्रह्मणस्स रमेशवरः ॥ प्रत्युवाच शिवं ए
स्मृत्वा शिवात्मा दीनमानसः॥ ११ ॥ ॥ विष्णु्वाच ॥ तेजीयसि न सा भूता कृतागसि बुभूषताम् ॥ तत्र क्षेमाय बहुधा हु
भूषा हि कृतागसाम् ॥ १२ ॥ कृतपापस्पुरा सवं शिवे हि परमेवरे ॥ परादडुर्ज्ञभागं तस्य शंभोविधे यतः ॥ १३॥ ४
५
रु. २
स.खं.२
अ०४०
ट
| उप्त देवयज्ञ करनेवाटेका यज्ञ पूणं हो जाय देवता सुनि सब भुखी होजांय आप वैसा करं ॥ ९॥ हे देवदेव रमानाथ ! देवताओंके सुख
देनेवाठे विष्णुजी ! हम देवता सुनियोके सहित आपकी शरणमे भाप हए है ॥ १० ॥ ब्रह्माजी बोठे विष्णजी इस भरकारसे मेरे वचन सुनकर वह |
दीन हो शिवको स्मरणकर शिवात्मा होकर बोढे ॥ ११ ॥ विष्णजी बोठे यदि तेजस्वीका अपराध किया जाय तो फिर नप्ता उनके खयि भूषण |||
नहीं, हां अप्राधियोपर क्षमाही बडे पुरुषोका भूषण है ॥ १२ ॥ शिव परमेश्वरका सब देवताओंने अपराध किया है जो किं इन सबने उन शकरको |
नच्च
॥
@&|| यज्ञभाग नहीं दिया ॥ १३ ॥ तुम सब देवता शुद्धचित्तसे भगवान् शंकरको भरसन्नकरो ओर शिवके चरणकमर पकंडो वे भस् होगे \॥ १४ ||
जिन शकरके कोप करनेपर स्रव जगत् नष्ट होजाता है छोकपाट यक्ष सव उन्हीके शासनसे जीवित होति है ॥ १५॥ उन देवको जो इससमय ठ
भरियाते विहीन है दक्षने बडी दुरुक्तियोंपे वेधित किया है उनसे वह अपराध क्षमा कराओ ॥ १६ ॥ हे विधाताजी यही उनकी शातिका परम ||
उपाय है मेँ इसीते शभुका संतोष मानता हूं यह सत्यही कहा है ॥ १७ ॥ पँ तुम तथा दूसरे देवता ओर स॒नि को$ भी उततकेबख्वीयका ¢
&|| भरसाद्यभ्यं सवे दि गू शदेन चेतसा॥ अथापरमसादं तं गरहीताभियुगं शिवम् ॥१४॥ यस्मिन् परककपिते दैवे विनश्यत्यसिटं ठ
& || जगत्॥सलोकपालयज्ञस्य शासनानीवितं इतम् ॥१९॥ तमा देवं प्रियया विहीनं च दुरश्क्तिभिः ॥ क्षमापयध्वं इद्विधं दक्षेण
४ सुदुरात्मना ॥ १& ॥ अयमेव महोपायस्तच्छंत्ये केवलं विधे ॥ शंभोस्संतुष्टये मन्ये स्यमेवोदितं मया ॥ १७॥ नाहं न |
४
#
॥
त्वं सुराश्वान्ये सुनयोपि तनूभतः ॥ यस्यतत्तवं परमाणं च न बिदुर्बलवीर्ययोः ॥ १८॥ आत्मतंनस्य तस्यापि परस्य परमा
त्मनः ॥ क उपाय विधित्सद्रे परं मूं विरोधिन् ॥ १९ ॥ चरिष्येदमपि ब्रह्मन् स्वैः सारद शिवाख्यम् ॥ क्षमापयामि
गिरिश कतागाश्च शिवे धुवम् ॥२०॥ ब्रह्मोवाच इत्थमादिश्य विष्णर्मा ब्रह्माणं सामरादिकम् ॥ सार्धं देवेम॑ति चके तद्विरौ
गमनाय सः ॥ २१ ॥ य॒यौ स्वपिष्ण्यनिल्यं शिवस्याद्विवरं शुभम् ॥ कैलासं सामरखुनिपजेशादिमयो हरिः ॥२२ ॥ अति
प्रियं प्रभोनित्यं सज्कित्ररादिभिः ॥ नरेतरैरप्सरोभिर्योगसिदमंहोत्ततम् ॥ २३॥
पराक्रम् नहीं जान सकते ॥१८॥ तथापि स्वाधीन प्रम परमात्माे विरोध करके कौन उपाय करसक
भ भी केठासको चरता हूं ओर अपना अपराध शिवजी क्षमा करावै ॥ २० ॥ बह्लाजी बौ इसभकारसे मुक्ञे ओर सब देवताओंको सभन्ञाकर
विष्णजीने देवताओं सहित केछासमं जानकी इच्छा की ॥२१॥ उस्न समय भगव
न् विभ्जी देवता सनि ओर प्रजापतियोकै सहित शिवके कैला
सप्व॑तपर गये ॥२२॥ जो परभुका स्थान नित्यप्रिय है किन्नरादिते तवित है देवता अप्रा योग्षिद्ध जनोंसे महा उन्नतिको प्राप्त है ॥ २३ ॥ |>
ताहै॥ १९॥ हे बरहमाजी ! सबके साथ
----------- न~ शा -
शि०
॥१७४॥
|| चारो ओर अनेक मणिमय गोते व्याप्त है अनेक धातुओं विचित्र अनेक द्ुमक्ताओति सम्पन्न है ॥ २४ ॥ अनेक नि गत
|| पक्षयो पयुक्तं अनेक जोक टपकनेवाठ इचरनोति तथा अमर सिद्धो योषाओति व्याप्त ॥ २५ ॥ अनेक य वि
& प्यारोे विहार करती हृदं जो अनेक भकारके ठता वबृक्षोसे सम्पन्न ओर चांदीके समान कांतिमान् ॥ २६ ॥ व्याघ्र आदि महाजी
त तेवित जिन जीवोँने कूरता त्यागन करदी है जो सव शोभाओंस युक्तं महादिव्य तथा महा विस्मयका करनेवाठा है ॥ २७ ॥ गंगास्ञतीते १
¢| नानामणिमयैः शोममानं समेतः ॥ नानाधाठविनित्र वे नानाहुमरताङ़लम् ॥ २8 ॥ नानाृगगणाकीरणं नानापशि
| समन्वितम् ॥ नानाजल्भलवणेरमरस्सि्योपिताम् ॥२५॥ रमणेवाहरतीनं नानाकदरसादमि हमजातिमिरन्यामी राजितं
राजतप्रभम् ॥ २६ ॥ भ्याधादिभिमहासचतेर्नष्ं रतोज्ज्ञितम् ! स्वशोभान्वितदिव्यं महाविस्मयकारकम् ॥२७॥ पर्यस्तं
| गगया सत्या स्थानपुण्यतरोदया ॥ सर्वपावनसंक्यां विष्णपद्या स॒नि्म॑लम् ॥ २८ ॥ एवंविधं गिरि दष्टा कैासाख्यं
¢ शिवगप्रियम् ॥ ययुस्ते विस्मयं देवा विष्ण्वाय्यास्समुनीर्वराः ॥२९॥ तस्समीपेऽलकां रम्यां दृयुनाम ते पुरीम् ॥ कवेरस्य
ट
-महादिष्यां शुदमिस्य निज॑राः ॥३०॥बनं सौगंधिकंचापि ददृडुस्तत्समीपतः॥ सर्वहुमान्वितं दिभ्य यतर तत्नादमद्धतम् ॥३१॥
तद्राह्यतस्तस्य दिष्य सरितावतिपावने ॥ नंदा चालकनंदा च दरशंनात्पापदारिके ॥ ३२॥ पपुः सुरश्ियो नित्यमवगूह्य स्वरो
कतः ॥ विगाह्य पंभिस्तास्ततर कौडति रतिकशिताः ॥३३॥
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रुं २
स.खं.२
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ओरसे वैशित पण्यश्प उदयवाढा है सबका पवित्र करनेवाठा तथा विष्पदीमे नि है ॥ २८ ॥ इस प्रकार कैठास्त नामक शिककै त्रिय
प्वेतको देखकर विष्णआदि देवता खनीश्वर सव विस्मयको भरा हुए ॥ २९ ॥ उत्तीकै समीप उन्होने प्रम मनोहर अल्काएरी देखी जो रुढके ||
भित्र कुबेरकी महादिष्य अल्काएरी है ॥३०॥ उसके समीपम उन्होने सुगंधित बन देखा, जो सव वृक्षो युक्त दिव्य अनेक नादे अद्भुत था ©
॥ ३१ ॥ उससकै बाहर दो प्रम दिष्य नदी बहती है नंदा -अठकनंदा नदी दशने पाप हरनेवाटी है ॥ ३२.॥ देवश्धियां अपने छोके आकर॥न
त
उसका जल पान करती ह ओर रतिसे काशत होकर परुषोके साथ क्रीडा करती ह ॥ ३३ ॥ य्ञेश्वरकी एरी ओौर सुगन्धित बनको छोडकर
वै देवता आगे बे ओर वहां उन्होने शिवजीकां वट देखा ॥ ३४ ॥ जिशके चारो ओर अचक छाया थी एकचरणसे परगट सौ योजनका
जिका वेरा पक्षियोके षोंसोंपे रहित तापवजिंत ॥३५॥ शण्यात्माओंके देखने योग्य बडा मनोहर ओर भेष्ठ साक्षात् शिवजीका योगस्थक
दिव्य योगियो सेवित प्रम मनोहर ॥३६॥ यु॒श्ुभंको शरण देनेवाठे उस्न महायोगमय वृक्षक नीचे बेटे हुए सव देवताओनि शंकरको |
॥ ३७ ॥ शिवभक्तिमे तत्पर विधाताके सनकादि ऽत्र सेवित ओर शांत वि्रहवारे भहात्माओति आरनंदपुव॑क उपासित ॥ ३८ ॥ इसी प्रकार
~=
दिता यक्षेश्वरपुरीं वनं सौगधिकं च यत् ॥ गच्छतस्ते सुरा आराददृश्शांकरं वटम् ॥ ३४॥ पर्थक कृताचरुच्छायं पादोन
विरपाय तम् ॥ शतयोजन कोत्सेधं निर्नीडं तापवलितुम् ॥२५॥ महापुण्यवतां दृश्यं सुरम्यं चातिपावनम् ॥ शंथुयोगस्थलं
दिन्यं योगिसेम्यं महत्तमम् ॥ ॥ ३६ ॥ सुखुश्षुशरणे तस्मिन् महायोगमये वटे ॥ आसीनं ददृुस्से शिवं विष्ण्वाद्य
स्स॒राः॥ ३७ ॥ विधिषुनैर्महासिद्धेश्शिव भृक्तिरतेस्सदा 1 सञुदा शतिस्संशातविग्रहैः ॥ ३८ ॥ तथा सख्या
कुबेरेण भां शद्यकरक्षसाम् ॥ सेब्यमानं विशेषेण स्वगणेज्ञातिभिस्सदा ॥ ३९ ॥ तापसाभीष्ठसद्रूषं बिध्रतं परमेश्वरम् ॥
बात्सट्याद्विश्वखडदं भस्मादिसुविशजितम् ॥ ४० ॥ घुने तभ्यं परवोच॑तं पृच्छते ज्ञानयुत्तमम् ॥ शासने सूपविष्ट स्वेषां
शृण्वतां सताम् ॥ ७१ ॥ कृत्वोरौ दक्षिणे सव्यं चरणं चैव जानि ॥ बाहुपकोष्ठाक्षमालं स्थितं सत्तक॑शचद्या ॥ ४२ ॥ एवं
विधं शिवं दृष्टा तदा विष्ण्वादयस्सुराः ॥ प्रणुस्त्वरितं सव करौ बध्वा बिनम्रकाः ॥ ४३ ॥
युकं राक्षस जनोकै स्वामी अपने सखा कुवेर ओर् विशेषकर अपने ज्ञतिगणोपि सेदित ॥ ३९ ॥ तज्रते भक्तोकी इच्छादुक्ार मनोहर सद्रूप
४ धारण किं, वत्सटतासे विश्वके सुहृद भस्मादिते विराजमान ॥ ४० ॥ हे नारदजी ! उत्तमन्ञान पृते हुए आपसे कुछ कह रहे कुशाप्तनपर
बैठे उनका सव कोई उपदेश सुन रहे थे ॥ ४१॥ दक्षिण जंधाप्र वामचरण धारे भुजा ओर पहुंची स्राक्षमाठा धारे त्कखु्ासते स्थित
‰॥॥ ४२ ॥ विष्णु आदि देवता इसप्रकार शिवजीको देखकर हाथ जोड नघ्र हो स्तुति करने लगे ॥ ४३ ॥
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५
शि ७
॥१७५॥
रु०्स.२
स.खं.२
अ०४१
न्त
जब सत्परुषोकी गति ने स॒ देखा तो उन भभुने उठकर शिरसे अभिवादन किया ॥४४॥ जव विष्णु आदि स देवताओनि शिवजीके चरणोः
रणाम किया तब ठोकोके सृद्रतिने विष्ण ओर कश्यपको भणाम किया ॥ ४५ ॥ सुरसिद्गणाधीश ओर महिंयोते नमस्छत 9 आदरपूर्वकं
विष्णजी ओर देवताओपे सम्भाषण क्रिया ॥४६॥ इति श्री शिवमहाषराणमाषाटीकायां रुद्रसंहितान्तगेतद्वितीयसतीखण्डे चत्वारिशोऽध्यायः ॥४०॥
विष्ण आदि देवता बोे हे देवदेव महादेव हे लौकिक आचार करनेषाे हे महाभरभो ! हम आपकी कपासे आपको ब्रह ईश्वर शिव जानते है ॥१॥
हे तात ! परमायासे आप हमको क्यो मोहित करते हो हे महेश्वर ! वह आपकी मोहिनी माया भराणियोंको सदा दुङ्ञेय है ॥ २ ॥ जगत्के योनि
८.4
प
की
उपलभ्यागतं रूदो मया विष्णु सतां गतिः ॥ उत्थाय चक्रे शिरसाभिवंदनमपि भरुः ॥ ७९ ॥ वदितांभिस्तदा स्वदिग्येविं
ष्ण्वादिभिश्शिवः ॥ ननामाथ यथा विष्णुं कश्यपं लोकसद्रतिः ॥ ०५ ॥ सुरसिद्धगणा धीशमदषिंखनमस्कृतम् ॥ सुमु
वाच सुरर्वष्णं कृतसत्रतिमादरात् ॥ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां .इ्रसंहितायां द्वितीये सतीखंड .शिवदशैन
वर्णनं नाम॒चत्वारिंशोध्यायः ॥ ४७० ॥ विषुण्वाद्य उचुः ॥ देवदेव महादेव लोकिकाचारकृत्पभो ॥ ब्रह्म त्वामीश्वरं शंभुं
जानीमः कृपया तव ॥ १॥ फं मोहयसि नस्तात मायया प्रया तव ॥ दुक्ञंयया सदा पुंसां मोहिन्या परमेश्वर ॥ २॥
कृतेः पुरुषस्यापि जगतो योनिबीजयोः ॥ 1 परस्त्वं च म॒नोवाचाभगोचरः ॥ ३ ॥ त्वमेव विश्व सृजसि पास्यत्सि
निजरतजतः॥स्वरूपांः शिवशक्ति हि करडन य॒था ॥४॥ त्वमेव करतुमीशान ससनिथ दयापरः ॥ दक्षेण सूत्रेण विभो
सदा अय्यमिपत्तये ॥ « ॥ त्वयेव रोकेवसितास्सेतवो यान् धृतव्रताः ॥ शुद्धान् अदधते विप्रा वेदमागविचक्षणाः ॥ & ॥
| भृति रुषे भी आप परे है मन वचन इन्दो परे आप मनवाणीते प्रे हो ॥ ३ ॥ आपही विश्वको उत्पन्न कर फिर पाठन् करते
हो अपनी स्वहपवाटी शिव भक्तिमं आप ऊणंपटके समान कीडा करते हो ॥४॥ हे ईशान ! आपनेही कपाकर यज्ञकी सृष्टि की है हे विभो ।
दन्नयीकी रक्षाकै छि यह आपने दक्षिणसत्रसे किया है ॥ ५॥ जो आपने भर्यीदा बाध दी है उनपर वेदभागे चतुर ` बाह्मण भद्धा करते
ओर वह वतधारी शुद्ध उनके अनुक्तार चकते है ॥ ६ ॥
|
8
हे विभो ! अपने ओर पराये ससक निमित्त आपृ गछ करतेहो हितकारीकोमंगङ ओर अहितकारियोंको अरमंगरुमिभरितको मिभित प्रदान करतेहो
॥७॥ सव कृमकि फल देनेवाठा सदा तुमही हो वेद् कहतेहँ ओर सब कहतेह किं सब यशोके आप पतिर ॥८॥ पृथङ् बदधिके बर कभैकी द्वारे
दुराशय मंसे पीडित होतेह वमढ दुरुक्तियोसे दूसरोको पीडित करतेहै ॥९॥ हे विभो ! उनको भारज्धकै कारण आप बध करतेहो हे भगवन् ! हे
परमेशान ! अब देवताओं प्र आप छपा करो ॥ १०॥ रुद॒शात बहन परमात्मा कपदा महेश ज्योतिस्वरूप आपको रणाम है ॥ ११॥ तुम
करैस्त्वं मंगलानां दि स्वपरं त॒ सुखे विभो ॥ अमंगलानां च हितं मिश्रं वाथ विपर्ययम् ॥ ७ ॥ सर्वकर्म॑फलानां हि सदा
दाता त्वमेव दि ॥ सवे हि प्रोक्ता हि यशस्तत्पतिस्त्वं ्॒तिश्ुतः ॥ ८ ॥ प्रथग्धियः करमटशोऽरतदाश्च दुराशयाः ॥ वितु
दृति परान् मूढा दुरु्तैम॑त्सरान्विताः ॥ ९ ॥ तेषां देववधानां भो भरयात्वच्च वधो विभो ॥ मगवन्परमेशान कषां कुर् पर
प्रभो ॥१०॥ नमो सुराय शांताय व्रह्मणे परमात्मने ॥ कपर्दिने महेशाय ज्योत्स्नाय महते नमः ॥११॥ त्वं हि विश्वस्रजां
सृष्टा घाता त्वं प्रपितामहः ॥ अिगणात्मा निशणश्च प्रकृतेः पुरूषात्परः ॥ १२ ॥ नमस्ते नीलकंठाय वेधस्ते परमात्मने ॥
विश्वाय विश्वबीजाय जगदानंदहेतवे ॥ १३ ॥ ओंकारस्त्वं वषटकारस्सर्ारभप्रवर्तकः ॥ हंतकारस्स्वधाकारो इन्यकन्या
थुक सदा ॥ १९ ॥ कतः कथ यज्ञभंगर्त्वया धमपरायण्॥ बरह्मण्यस्त्वं महादेव कथं यज्ञहनो विभो ॥ १८ ॥ ब्राह्मणानां
गवां चैव धर्मस्य प्रतिपाटकः ॥ शरण्योसि सदानेत्यः सवेषां प्राणिनां प्रभो ॥ १६ ॥
भजापतियोके भी सृष्टा हो तुम्ही धाता प्रपितामह, तरिय॒णासा, निर्ण श्ररूति पुरुषे परे हो ॥ १२ ॥ नीककंठ, विधाता, परमात्मा
४ संस।र, संभारकं बीज, जगत्के आनंदके कारण भापको प्रणाम है ॥.१३ ॥ ॐकार, वषट्कार, सव आरंभ करनेवाठे हंतकार, स्वधाकार, सदा
हन्यकव्य अ्नकै भोक्ता तुमहो ॥ १४ ॥ हे धमेपरायण आपने यज्नका भंग कित कारणसे किया, हे विभो ! आप् ब्रहण्य महादेव हो आपने
यज्ञको कैत न्ट क्रिया ॥ १५॥ हे प्रमो आप तो बाह्मण गौ श्रणागतोके रक्षक, धमि पाठक सव भाणियोकी अनन्तगति तुमही हो ॥ ३६ ॥
८६
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हे रुद्र ! हे भास्कर ! है अभित तेजस्वी आपको प्रणाम है भवदेव रसाअम्बुमय आप्
आपको नमस्कार है रुर अभि स्वरूप महातेजस्वी आपको नमस्कार है ॥ १८ ॥ (
शूप आपको नमस्कार है ॥ १९ ॥ भीम व्योमहूप शब्दमात्रा महादेव चन्द्र ओर प्रवृतिरूप आपको नमस्कार है ॥ २० ॥ उक्त सूयदूप केम
योगी काठके काठ आपको नमस्कार है हे र ! आपके करोधको नमस्कार है ॥ २१ ॥ कल्याणह्प, भयेकर कमेकारी शंकर शिव उग्र सव
नमस्ते भगवन् दर भास्करामिततेजसे ॥ नमो भवाय देवाय रसायांब्ुमयाय ते ॥ ॥ १७ ॥ शर्वाय क्षितिषूपायसदा सुर
भिणे नमः ॥ शद्रायाभिस्वूपाय महातेजस्विने नमः ॥ १८ ॥ इशाय वायवे तुभ्यं संस्पशय नमोनमः ॥ पञ्यूनापतये |
तुभ्यं यजमाना वेधसे ॥ १९ ॥ भीमाय व्योमहपाय शब्दमाजाय ते नमः ॥ महादेवाय सोमाय प्रवृत्ताय नमोस्तु ते £
॥ २० ॥ उग्राय सूर्यहपाय नमस्ते कमयोगिने ॥ नमस्ते कालकालाय नमस्ते ङ्द मन्यवे ॥ २१ ॥ नमश्शिवाय भीमाय ट
शंकराय शिवाय ते ॥ उभोसि सवं श्रुतानां नियतां यच्छिवोसि नः ॥ २२ ॥ मयस्कराय विश्वाय ॥ व्रह्मणे द्यातिनाशि ¢
ने ॥ अम्बिकापतये तुभ्यशरुमायाः पतये नमः ॥ २३ ॥ शर्वाय सर्वहूपाय पुरूषाय परात्मने ॥ सदसद्वयक्तिरीनाय महतः ॥९॥ -
कारणाय ते ॥ २४ ॥ जाताय बहुधा रोके प्रभूताय नमोनमः ॥ नीलाय नीलक्द्राय कद्ुद्राय प्रचेतसे ॥ २५ ॥ मीदुष्ठ .
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को प्रणाम है ॥ १७ ॥ सवे परृथिवीषरूप सदा सुरभीषूप ्
ईश वायु स्वषप स्पशंरूप पशुपति यजमानप् विधाता ¢
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॥ १७६॥
माय देवाय शिपिविष्टाय ते नमः ॥ मदीयसे नमस्तुभ्यं हैमे देवारिणां सदा ॥ २६३ ॥
नियन्ता हमारे निमित्त मंगर करते हो ॥२२॥सुखकरनेवाठे विश्वरूप हमारे कटर करनेवाडे अम्बिकापति उमापति आपको नमस्कार
है ॥२३॥ जगतकै संहारकता, सवेषप सव शरीरम व्यापक परात्मा सत् असत् व्यक्ति हीन महान् कारण आपको प्रणाम है ॥ २४ ॥ लोकम
अनेकं भरकारसे होनेवाडे आपको प्रणाम है नीर नीरद कंदर भरचेतारूप आपको नमस्कार है॥ २५ ॥ भक्कोपर भनोरथोकी वर्षा करनेवाठे
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दिव्य॒रण शिपिविष्ट आपको नमस्कार है महायभाव देवशतरुओकि मारनेवारे आपको प्रणाम है ॥ २६ ॥ तारकमेत्र रूप सुतार तरण तेजस्वी
हरिकेश देवमहेश आपको नमस्कार है ॥ २७ ॥ आप देवताओंके कल्याणकारक विभु परमात्मा हो, प्रम काट्कंठरूप आपको नमस्कार है
॥ २८ ॥ सुवणेरूप परेश, सुवणंमय शरीर भीम भीमहप भीमकार्थमे तत्पर आपको भणाम है ॥२९॥ शरीरम भस्म ठगाये रुद्राक्ष
ताराय च स॒ताराय तरूणाय सुतेजसे ॥ इरिकेशाय देवाय मदेशाय नमोनमः ॥ २७ ॥ देवानां शंभवे त्यं विभवे परमा
तमने ॥ प्रमाय नमस्तुभ्य कारकंटाय ते नमः ॥२८॥ दिरण्याय परेशाय दिरण्यवदुषे नमः ॥ भीमाय भीमरूपाय भीम
कृमेरताय च ॥२९॥ भस्मदिग्धशरीराय रुद्राक्षाभरणाय च ॥ नमो हस्वाय दीर्घाय वामनाय नमोस्तु ते॥ ३० ॥ दूरे
धाय ते देवा भेवधाय नमोनमः ॥ धन्विन शखिनि तुभ्यं गदिने हलिने नमः॥३१॥ नानागु धधरायैव दैत्यदानवनाशिने ॥
सदयाय सब्रहपाय सद्योजाताय वे नमः ॥ ३२ ॥ वामाय वामहूपाय वामनेत्राय ते नमः ॥ अघोराय परेशाय विकटाय
नमोनमः ॥ २२॥ तत्पुरुषाय नाथाय पुराणपुरुषाय च ॥ पृर्षार्थपदानाय बतिने परमेष्ठिने ॥ ३९ ॥ ईशानाय नमस्तुभ्य
मीश्वराय नमोनमः ॥ ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय नमस्साक्षात्परात्मने॥३८॥उगरोसि सर्वदुष्टानां नियंतासि शिवोसि नः॥ कालक
शिने तुभ्यं देवादयवन कारिणे ॥३६॥ वीराय वीरभद्राय रक्षद्रीराय शुखिने
सय, तत्का रूपधारी स्योजात् आपको प्रणाम है ॥३२॥ वाम ८ सुन्दर ) वामप वा
तलपरुषनाथ एराणपरुष धरुषाथके देनेवाछि वती परमेष्ठी आपको नमस्कार है
॥ महादेवाय महते पशूनां पतये नसः ॥३७॥
धारण करनेवाठे हस्व दीथ ओर् वामनरूप धारण करनेवाठे आपको प्रणाम है ॥ ३० ॥ दूरस्थितको भी मारनेवाठे देव आगे चरतेक वध
करनेवाटे भदुष शू गदा हल्के धारण करनेवारे आपको प्रणाम है ॥ ३१ ॥ अनेक आयुध धारण करनेवाठे दैत्य दानवोंके नाश करनेवा
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॥ ३४ ॥ दशान ओर ईश्वरहप आपको नमस्कार है नहा बहप
साक्षात्परमात्माप आपो नमस्कार है ॥ ३५ ॥ उग्रहप, सब दुष्टोकै निय
( न्ता हमर कल्याण करनेवारे काटकूट पानकरनेवाछे देवताओंके
पाटन करनेवाठे ॥ ३६ ॥ वीर बीरभद्र वीरोके रक्षक शरधारी महादेव महार् पृशुओंके पति आपको प्रणाम है ॥ ३७ ॥
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मनेन अधर परेश विकटहप आपको प्रणाम है ॥३३॥ |
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वीरात्मा, भेष्ठ वियावाठे, श्रीकंठ, पिनाकधटुषधारी, अनन्त, सुक्ष्महप, मृत्यु कोधरूप आपको नमस्कार है ॥ ३८ ॥ 1
परे प्रे, परात्पर सर्वव्यापक विश्वमूर्ति आपको नमस्कार है ॥ ३९ ॥ विभ्णके कुटम्बरूप वा विष्णुको कठत्र माननेवाठे विं
भावष भैरव शरण देनेवाछे न्रिोचन विहारशीर आपको प्रणाम है ॥ ४० ॥ मृत्युके जीतनेवाठे शोकरूप सतर्जतम् त्रिशणात्मक
गुणोके आत्मा चन्र स्थ ओर आशि नेत्रवाठे सवके कारण ओर म्यादारूप आपको प्रणाम है ॥ ४१ ॥ आपनेही अपने तेजते सब
जगत् व्याप्त कर रकल है आप परह निविकारी चिदानेद पकाशवान् हो ॥ ४२ ॥ ब्रह्मा विष्ण इन्द्र॒ चन्द्र आदि सब देवता हे महेश्वर !
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वीरात्मने सविचाय श्रीकंठाय पिनाकिने ॥ नमोनंताय सृष्ष्माय नमस्ते मृत्युमन्यवे ॥३८॥ पराय परमेशाय परात्परतराय ४
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॥१७७॥
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ते॥ परात्पराय विभवे नमस्ते विश्वमूर्तये ॥३९॥ नमो विष्णुकलबाय विष्णुक्षवाय भानवे॥भेरवाय शरण्याय यंबकाय विहा
रिणे॥४०॥ मृत्युंजयाय शोकाय चणणाय गणात्मने॥ चन्द्रसर्याभिनेत्राय स्वकारणसेतवे ॥४१॥ भवता हि जगत्सर्वं भ्या
स्वेनेव तेजसा॥परत्रह्म निर्विकारी निदानंदः प्रकाशवान्॥७२।ब्रहर्विरण्वद्रचन्द्रादि प्रमुखास्सकलस्सुराः॥ पुनयशचापर त्वत्तस्सं
ग्रसूता महैश्वर॥४३॥यतो बिभषि सकलं विभज्य तव॒मष्टा॥अष्रमूर्तिरितीशश्च त्वमाधःकक्णामयः॥४४॥ त्वद्भयाद्राति वातो
यं दहत्यग्निभ॑यात्तव॥ सूर्यस्तपति ते भीत्या मृत्युर्धावति सर्वतः॥४५॥द्यासिन्धो महेशान प्रसीद परमेश्वर॥ रक्ष रक्ष सदैवा
स्मान् यस्मान्न्टान् पिंचेतसुः॥४६॥ रक्षिताः सततं नाथ त्वयैव कडणानिधे॥ नानापद्योवयं शंभो तथैवा प्रपाहि नः॥४७॥
ओर स्व अनीश्वर आपसे प्रगट है ॥ ४३॥ जो किं आप अपना आढ प्रकारका शरीर धारणकर् स्क पाटन करते हो आप करुणामय
आय अष्टमरति दशवर हो ॥ ४४ ॥ आपके भयसेही पवन चरती, आपके भयते अग्नि तपती है, आपके मयते चयं तपता है ओर सुर
ओरसे सृत्यु धावमान होती है ॥ ४५ ॥ हे दयासागर महेशान परमेश्वर ! आप प्रसन्न हो आप सदा हमारी रक्षा कतो कारण किं हम
नष्ट ओर विचेतन ह ॥ ४६ ॥ हे करुणानिधान कर्णासागर ! आप सदा हमारी रक्षा करो हे शंकर अनेक आप्तिपोतते आपको हमारी ॥>
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रक्षा करनी चाहिये ॥ ४७ ॥ हे नाथ ! कपाकरके शीघ्रही यज्ञका उद्धार कीजिये, हे दुरगेश प्रजापति दक्षे यज्ञकी समाति नहीं ३॥ ४८
भगदेैवताकी अचं भ्र होजांय, यजमान जीजाय, पूषाकै दांत फिर पराप्त होजांय, भृगकी ादी पवेवत् होजाय ॥ ४९ ॥ आपकै अनुपरहसे इन
सव देवताओंको आरोग्य हो, ओर वीरभद्रके आयुधे भभरगात्र हए इनके शरीर ठीक होजांय॥५०॥हे नाथ! इस अवरिष्ट अध्वरकर्मम आपको
भाग भ्ाप् होगा ह सद्र! इसमे सन्देह नहीं आपको भाग यज्ञम अवश्य मेगा ॥ ५१ ॥ इसप्रकार कहकर पृथिवीप्र दंडवत् करते हुए प्रजापति
ओर विष्णजीनि अपराध क्षमा कराया ॥५२॥ इति श्रीशिवमहाषराणभाषारीकायां र्रसंहितान्तमतद्वितीयसतीसण्डे एकचतवारिशोऽध्यायः ॥४१॥
यज्ञस्योद्धरणं नाथ कुर् रीभ्र प्रसादङ्ृत् ॥ असमाप्तस्य हेश दक्षस्य च प्रजापतेः ॥ ४८॥ भगोक्षिणी प्रपयेत यजमानश्च
जीवत॥ पूष्णो दंताश्च रोतु भृगोः रमश्रूणि पूर्ववत्॥४९॥ मवतावु्रदीतानां देवादीनां च सर्वशः॥ आरोग्यं भ्गा्राणां शंकर
त्वायुधाश्मभिः ॥ 4० ॥ पूर्णभागोस्तु ते नाथावशिष्टेऽप्वरकर्मणि ॥ रुदर भागेन यज्ञस्ते कल्पितो नान्यथा कचित् ॥ ५१ ॥
इत्या सभ्रजेशान रमेश कृतांजलिः ॥ ठंडवत्पतितो भमौ क्षमापयितसुयतः ॥ ५२ ॥ इति श्रीशिव महापुराणे द्वितीयायां
रद्रसंदितायां द्वितीये सतीखंड देवस्तुतिवर्णनं नामेकचत्वारिशोऽध्यायः ॥७१॥ ॥ ब्रहमोवाच॥ शरीबह्े शभजेेन सदेव शनिना
च वे ॥अनुनीतश्शथुरासीत्मसत्नः परमेश्वरः ॥ १ ॥ आश्वास्य देवान् विष्ण्वादीन् विस्य कश्णानिपिः॥ उवाच परमेशानः
छन् परमलयदम् ॥२॥ . श्रीमहादेव उवाच ॥ श्णुतं सावधानेन मम वाक्यं स॒रोत्तमौ ॥ यथां वच्मि वां तात वां कोषं
सवदासहम् ॥ ३॥ नाघं तनौ तु बालानां वणमेवालवितये ॥ मम् मायाभिभूतानां दंडस्तत्र धृतो मया ॥ ९ ॥
ब्ह्ाजी बोठे जब ब्रह्मा विष्ण प्रजापति सनि सिद्धोने इसभरकारसे शकरकी भराथना की तन परमेश्वर भरसन्न इए ॥१॥ करुणानिधिने हं्कर देवता
आदिको आश्वासन ( पीरज ) दिया ओर उनपर परम अजुर करते हृए शिबजी बो ॥ २ ॥ श्रीमहादेव बोठे-तम दोनो वता परम साव
धानीके साथ मेरे वचन सुनो हे तात । तुम्हारे कोपको सहता हआ भै यथार्थं ही कहता हूं ॥ ३ ॥ भेरी भाया पडेहुए इन बारकोंका मे
कुमी अपराध चिन्तन नहीं करता परन्तु सावधानीके निभित्त मेने देड दिया था ॥ £ ॥
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ने क्के यज्ञका भग नहीं किया पर जो द्रोप विरोध करती है उसके व्यि वैसा होता है ॥ ५॥ इते दूरीक हेश दका है
किती भकार भी न करना चाहिये जो दरो द्वेष॒ करता है उसके ्यि स्वयं वही बात उपस्थित होती है॥ &॥ दक्षही यज्तका शिर ||
है इसल्यि ख्य उसका शिर बकरेका होगा भग मिश्रके नेते देखने ठगेगा ओर देवताकै अग ठीक होकर यज्ञ कार्थं करगे ॥ ७ ॥ पूषाकै ¢
दाति हो जांयगे इस प्रकार यह मनकी पृष्ट करेगे यह सब अगोँसे पष्ट होकर यजनका कार्यं करगे यह मैने सत्य कहा हे॥ < ॥ भृय॒ ट
जो भरे विरोधी है उनके वकरेकी डादी ठगादी जायगी जिन्होनि बीरभद्रसे छेदन भेदन भरा किया है वे सब देवता सव अगेपि सम्पन्न ही ||
दक्षस्य यज्ञभगोयं न कृतश्च मया कचित्॥ परं द्रि परेषां यदातमनस्तद्धविष्यति॥८॥ परेषां छेदनं कमे न् कार्थ तत्कदाचन्॥
परं द्रेष्टि परेषां यदात्मनस्तद्भविष्यति ॥६॥ दक्षस्य यज्ञशीरष्णो दि भवत्वजशखं शिरः॥ मिघनेेण संपश्येयज्ञभागं भगस्सुरः |
॥ ७ ॥ प्रषाभिषस्सुरस्तातौ दद्धियकघसुपिष्टयुक्॥याजमनर्भरदेतस्सत्यमेतन्मयोदितम्॥८॥ बस्तश्मश्चभेवेदेव धृ्मेमविरोध
कृत्॥ देवाः प्रकृतिसर्वागा ये म उच्चेदनं ददुः॥९॥बाहृभ्यामभ्विनौ पूष्णो हस्ताभ्यां कृतवाहकौ। भवत्वध्व्यवश्चान्ये भवत्प्रीत्या ¢
मयोदितम् ॥१०॥ ब्रह्मोवाच इत्युक्ता परमेशानो विरराम दयान्वितः॥ चराचरषतिरदैवः सध्राट्षेदादुसारङृत् ॥११।तदा स्वे
सुरा्यास्ते थत्वा शंकरभाषितम्॥ साधु साध्वितिसपरोचुःपरित्ाःसविष्ण्वजाः॥१२॥ ततश्शंथुं ससामंत्य मया विष्णस्सरर्षिमिः॥ ट
भूयस्तदेवयजनं ययौ च परया भुदा॥१३॥एबं तेषां प्रार्थनया विष्णुपरभतिभिस्पुरेः॥ ययौ कनखलं शंभुज्ञवारं पजापतेः॥१७॥ ए
जांयगे ॥ ९ ॥ अश्विनीकुमाकी बाहु ओर पूषाके हाथो सव कायं होगा ओर भी सव॒ अध्यय भरसन हो जांयगे यह आपृकै परमस सव ¢
मेने किया ॥ १० ॥ ब्रह्माजी बोरे यह कहकर दयाट् परमेश्वर मौन हुए चराचरकै परति देव स्वयं विराजमान होनेवाठेने सव वैदो अच ||
सारही किया ॥ ११ ॥ तव वे सब देवता शकरके भाषणको सुनकर सतषट हो धन्य धन्य कहनेखगे ॥ १२ ॥ तव मने ओर विष्णभआदि सव |
|| देवताओंने शंकरको आरेत्रण किया ओर बह प्रमभरस्न्नतासे उस ॒देवयजनस्थानमे गये ॥ १२ ॥ इसप्रकार उन विष्णआदि देवताओंकी |
भाथनाते शिवजी कनखटमे भजापतिके यज्ञ स्थरे गये ॥१४॥ ओर जो कु वीरभद्रने किया था वह रुद्रने वहां जाकर सव देखा यज्ञका विध्वंस्
¢ ओर देवषिंयोका वहां विशेष अनिष्ट हभ था ॥ १५॥ स्वाहा स्वधा पूषा तुष्टि एति सरस्वति ओौर भी सब ऋषि पितर अभि ॥१६॥ ओर भी
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जो अनेक वह गन्धव यह राक्षस थे कोई भग्र कोई ठंचित ओर कोह मृतक हए पडे थे ॥ १७॥ इत प्रकार यज्ञकी दशा देख गणाधिप महाबरी
बीरमद्रको घुलाकर शिवजी हेसते हुए बोठे ॥१८॥ हे महाबाहो ! वीरभद्र आपने यह कया कम किया हे तात ] आपने महान दंड देवता ऋषियों
ए रुढस्तदा ददाथ वीरभद्रेण यत्कृतम् ॥ प्रध्वंसं तं क्रतोस्तञ देवर्षीणां विशेषतः ॥ १५॥ स्वहा स्वधा तथा पूषा तुष्िधृतिः
४ स॒रस्वती ॥ तथान्ये ऋषयस्सवें पितरश्चाश्रयस्तथा॥ १६॥ येऽन्ये च बहवस्तञ यक्षगंधरवराक्षसाः॥ बोरिता टचिताश्वैव भृताः
केविद्रणाजिरे ॥१७॥ यज्ञ तथाविधं दृष्टा समाहूय गणाधिपम् ॥ वीरभद्रं मदावीरषुवाच प्रहसन् प्रथुः ॥ १८ ॥ वीरभद्र
| महा बाहोकफि कृतं कमै ते प्विदम् ॥ महान् दंडो धृतस्तात देवर्यादिषु सत्वरम् ॥ १९ ॥ दक्षमानय शीभर त्वं येनेदं कृतमीद
&| शम् ॥यज्ञो विरक्षणस्तात यस्येदं फलमीदृशम् ॥२०॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवसुक्तश्शंकरेण वीरभदरस्त्वरान्वितः ॥ कबंधमानयि
# त्वाम तस्यशंभोरथाक्षिपत् ॥२१॥ विशिरस्कं च तं इष्टा शंकरो लोकशंकरः ॥ वीरभद्रषुवाचामे विहसन् अनिसत्तम ॥२२॥
शिरः इतरेति तेनोक्ते वीरभद्रोऽजवीत्पयुः ॥ मया शिरो इतं चागो तदानीमेव शंक२॥२३॥ इति थत्वा वचस्तस्य वीरभद्रस्य
|| शंकरः ॥ देवान् तथा्ञपतप्रीत्या यदुक्तं तत्पुरा प्रभुः ॥ २४॥
है| धारण किया ॥ ८ १९.॥ हुम शीघ्र दषको छाओ जितने यह किया, हे तात यह यज्ञ बडा विलक्षण था जिसका फठ रसा हभ ॥ २० ॥ बह्माजी
बोठे जव शिवजीने एसा कहा तव वीरभद्रने बहुत शीघ्रता द्षका कवेध लाकर शिवजीके आगे धरदिया ॥ २१ ॥ ठोकशकर शंकरे उसको
टै शिरहीन देखकर है खनिसत्तम हसते हुए वीरभद्रसे कहा ॥ २२ ॥ करं इका शि
¶ सा शिर कहा है तव पीरभ्रने कहा हे भमु उत्तको तो अभिरम हवन
| कर दिया ॥२३॥ तव शेकरने वीरभद्रके यह वचन सुनकर देवता्ओंको मेमसे अपने पहरे वाकयका स्मरण कराया ॥ २४ ॥
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जो भगवानुने कहा था उ सबको यथायोग्य सम्पादन करनेको कहा, पव म ओर विष्ण आदि सव देवता बहुत शीघ्र मृय॒ आदिक समीप गये ||
॥२.५॥ तवर भगवान शंकरने सवनकै पशुका शिर टेकर प्रजाप्रति दक्षै शिरपर जोड दिया ॥२६॥ जव वह शिर जोडा गया ओर शिवजीने ट
रुपात देखा तन प्रजापति ततकाठही भ्राणयुक्त होकर शीघही सोते हए कै पमान उढ बैठा ॥ २७ ॥ उठतेही अपने आगे करुणामय शकरको ह
|| देखा तव प्ररम प्रेमे भन्न होगया ॥ २८ ॥ पह तो महादेवे वडा द्वेष करता था इससे उसकी आत्मा पापी थी अव शंकरकै दशूनते शरद ठ
विधाय का्स्न्यैन च तद्यदाह भगवान् भवः ॥ मया विष्ण्वादयः सवै भृग्वादीनथ सत्वरम् ॥ २५ ॥ अथ प्रजापतैस्तस्य ट
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सनी यपशोश्शिरः॥बस्तस्य संदधुश्थंभोः कायेनारं खुशासनात् ॥ २६ ॥ संधीयमाने शिरसि शंथुसदष्िवीक्षितः॥सद्यस्सुप् टै
इवोत्तस्थौकन्धभ्राणः प्रजापतिः॥ २७ ॥ उत्थितश्वायतश्शंयं ददश ककश्णानिधिम् ॥ दक्षः ्रीतमतिः प्रीत्या संस्थितः सुरस र
त्रधीः ॥ २८ ॥ पराहर महादवेषकलिलात्माभवदधि सः ॥ शिवावलोक नात्सब्श्शरचन्द्रहवामलः॥२९॥ भरव स्तुतो मनाः सोथ
नाशक्रोदनुरागतः॥ उत्कंडाविकलठत्वा् संपरेतां स॒तां स्मरन् ॥३०॥१अय दक्षः प्रसन्नात्मा शिवं लनासमन्वितः॥ तुष्टाव प्रण
तोः भत्वा शंकरं लोक शंकरम् ॥ ३१ ॥ दक्ष उवाच ॥ नमामि देवं वरदं वरेण्यं महैश्वरं ज्ञाननिधि सनातनम् ॥ नमामि देवा .
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पिपतीश्वरं दरं सदाघुखादयं जगदेकमांधवम् ॥ ३२ ॥ नमामि विश्वेश्वर विशवह्पं पुरातनं ब्रह्मनिजात्मरूपम् ॥ नमामि शर्व
भव भावभावं परात्परं शंकरमानतोमि ॥ ३३ ॥
चन्द्रक समान निमंरु होगया ॥२९॥ शंकरकी स्तुति करनेकी इच्छा की प्र अवुरागसे स्तुति न कर सका ओर अपनी कन्याको मृतकं विचार
कर् बडा व्याकृ जा ॥ २० ॥ रर दक्ष प्रसन्न हो ठज्जासे सयुक्तहो नघ्रहो टोकशंकर शकरकी प्राना करने ठ्गा ॥ ३३ ॥ दक्ष कहने
रगा दवता वरेण्य वरदाय॒क महेश्वर ज्ञानक निभि सनातन देवताओंके अभिपति इश्वर हर सदा सुख देनेवाडे जगतके एक बधु शंकरको |
‰॥ भणाम करता हूं ॥३२॥ विश्वके ईश्वर विश्वहप ष्रातन बह निजहप आत्महप श्वं भवभाव ( शिबहूपता ) के देनेहारे परमे परे शंकरको प्रणाम |
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करता हूं ॥३३॥ है देवदेव ! महदेव अप कपा करो अप्को नम्र कर्ताहं हे छपानिप्रे शंकर ! आप् मेरे ऊप्र रपा करो ॥३४॥ हे
शकर ! दंडके बहाने अ(पने अवुप्रह किया मँ बडा खछ मूढबुदधि हं आपक। तच मने नहीं जाना ॥ ३५ ॥ आपको भने अब जाना की
आप् सत्रके ऊपर है अप विष्यभादि ब्रहम भादि सब देवताओंति सेव्य वेदोते वेष महेश्वर हो ॥ ३६ ॥ अप साधुओंको कल्पवृक्ष सदा दु्टौको
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देवदेव महादेव कृपां कुर नमोस्तु ते ॥ अपशधं क्षमस्वा्य मम शंभो
शकर ॥ ललोहं मूढधीदेव ज्ञातं तत्तमया न ते ॥ ३५ ॥ अथ ज्ञातं मय तत्त सर्वोपरि भवान्मतः ॥ विष्णुब्रह्नादिभिस्सेष्यो
वेदवेद्यो महेश्वरः ॥ ३६ ॥ साधूनां कट्पधृक्ष्त्वं दुष्टानां देउधृक् सदा ॥स्वतघः परमात्मा हि भक्ताभीष्टवरप्रदः ॥ २७ ॥
विद्यातपोनतध्रानसूजः प्रथम द्विजा ॥ आत्मतत्वं समवेतं सुखतः परमेश्वरः ॥ ३८॥ सर्वाद्यः पालयिता गोपतिस्त॒
पशूनिव ॥ गृहीतदडो दु्ास्तान् मर्याद।परिपालकः॥ ३९ ॥ मया दुरुक्तविशितैः परविदः परमेश्वरः ॥ अमरानतिदीनाशान्
मदनुनहकारकः ॥ ७० ॥ स भवान् भगवान् शंभो दीन्बेधो परात्परः ॥ स्वकृतेन महाण संतुष्टो भक्तवत्सल ॥ ४१ ॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्तुत्वा महेशाने शंकरं लोकशंकरम् ॥ प्रजापतिविनीतात्मा विरराम महाप्रभुम् ॥ ७२ ॥ अथ विष्णुः
प्रसत्रात्मा तुष्टाव वृषभध्वजम् ॥ वाष्पगद्रदया वाण्या सुप्रणभ्य कृतांजलिः ॥ ४३ ॥
हो जसे गोपाङ गायोंकी रक्षा करता है ओर दु्टके ऊपर दंड धारण कर आप मयौदाके पाठन करनेवारे
दुरुक्त कदीथी आपने दीनआशावाछे देषताओंके ओर भेरे ऊपर अलुग्रह किया ॥ ४० ॥ सो व
भक्तषेत्सर अपनेही कर्तव्ये आप प्रसन्न होते हो ॥ ४१ ॥ बह्लाजी बोडे
ग्रहो प्रजापति मौन हभ ॥ ४२॥ तब ॒प्रततन्ातमा विष्णजी हाथ
कृपानिधे ॥ ३४ ॥ अनुग्रहः कृतस्ते हि दंडग्याजेन
जोड गदगद्ाणीे पणामकर शेकरकी स्तुति करने छग ॥ ¢ ३॥
ड देनेवाठे स्वतंत्र परमात्मा ओर भक्तोको सदा अभीष्वर देनेवारे हो ॥ ३७ ॥ आप्नेही पह विथा तप वत धारण करने वाडे बाह्णोको
उत्यन्न किया था है परमेश्वर आत्मतन्वमै छानेके ठि भापने उनको सुखे सृजन किया ॥ ३८ ॥ आपही सब आपत्तियोमे पाटन करते
है ॥ ३९ ॥ न प्रमेश्वरको बहूत
ह आपि भगवान् शंभु दीनवधु परात्परहो आप्
इस भकार छोककै कल्याण करनेवाठे महाभभु शंकरकी स्तुति करके
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| नम्र हो शिर काय हाथ जोड विष्णने परमात्मा शकरकी स्तुति की ॥ ५२ तब इन््रादिक सब देवता ओर ठोकपाठ सावधान
विष्णजी बोठे हे महादेव ! महेशान हे ठोकोपर अलुश करनेवठे परब्रह्म परमात्मा दीनवन्धु दयाकै सागर ॥ ४४ ॥ सवव्यापी अपनी इच्छा
वतेनेवाठ वदोते जाननेयोम्य यशबाठे आपने हमारे ऊपर बडा अनुग्रह किया हमारा उद्धार करदिया ॥४५॥ यह दक्ष मेरा भक्त है जो सट तुम्हारी
निन्दा कर चुका है हे महेश ! सो आप कषमाकरो कारण कि आप् निर्विकार हो ॥ ४६ ॥ हे शकर मूढतासे ने आपका अपराध किया है जोर्मने
पक्षपाते आपके गण वीरद्रके साथ युद्ध किया ॥ ४७ ॥ आप परत्रह भरे स्वामी दीनवन्धु दयासागर हो हे सदाशिव ! मँ आपका दातं आपकी
॥ विष्णुवाच ॥ महादेव महेशान लोकायुम्रहकारक ॥परब्रह्म परात्मा त्वं दीनबधो दयानिधे ॥ ९५ सर्वभ्यापी स्वैरवर्ती
वेदवे्ययशाः प्रभोः ॥ अनुग्रहः कृतस्तेन ऊताश्वासङ्ृता वयम् ॥ ४९ ॥ दक्षोयं मम ॒भक्तस्त्वां यत्निनिद खलः पुरा ॥ तत्
्षतभ्यं महेशाय निविंकारो यतो भवान् ॥४६॥ कृतो मयापराधोपि तव शंकर म्रूढतः ॥ त्वद्रणेन कृतं युद्धं वीरभद्रेण पक्षतः
॥ ४७ ॥ त्वं मे स्वामी परतरह्न दासोहं ते सदाशिव ॥ पोष्यश्ापि सदाते हि सर्वंषां त्वं पिता यतः ॥ 8४८ ॥ ब्रह्मोवाच ॥
देवदेव महादेव करूणासागर प्रभो ॥ स्वतः परमात्मा त्वं परमेशो द्रयोग्ययः ॥४९॥ मम पु्रोपरि कृतो देवालुयह ई वर॥
स्वापमानमगणयन् दक्षयज्ञं समुद्धर ॥५०॥ प्रसन्नो भव देवेश सर्वेशापाधिराकुङ् ॥ सबोधः प्रेरकस्त्वं मे त्वमेवं विनिवारकः
॥ «१ ॥ इति स्तुत्वा महेशानं परमे च महाभरुने ॥ कृतांजलिपुटो भूत्वा विनग्रीकृतमस्तकः ॥ ५२ ॥ अथ शक्रादयो देवा
लोकपाल स्सुचेतसः ॥ त॒ष्टबुः शंकरं देवं प्रसन्नध्ुखपंकजम् ॥ ५३ ॥
पदा हमारा पाठन करना चाहिये कारण कि आप हमारे सबके पिता हो ॥४<८॥ ब्रह्माजी बो ह देवदेव महादेव करुणासागर हे प्रभो ! आप स्वं
परमात्मा परमेश्वर अद्वैत अषिनाशी हो ॥। ४९॥ हे ईश्वर ! हे देव ! आपने मेरे एप अवुगरह किया आप अपने अपमानको न गिनकर दक्ष
यज्ञका उद्धार करो ॥५०॥ ह देवेश ! प्रसन्न होकर सवका शाप दूर करो ज्ञानरूप आपही सवक प्रेरक ओर निषारकं हो ॥५३॥ हे महासने ।
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चित्तते रसन अखकमल्वाटे शंकरदेवकी स्तुतिं करने ठगे ॥ ५३ ॥ इसीभकार धरसन्नमनसे ओर भी सव देवता सिष्ध ऋषि भरजापति शंकरकी ए
सतुति करने ठगे ॥५४॥ ईइसीप्रकार उपदेषता, नाग, सदस्य, बाह्ण. परमभक्तिसे प्रणा कर पथक् पृथक् स्तुति करने रुगे ॥ ५५ ॥ इति £
भरीशिवमहाएराणमाषायां शु्रसंहितान्तगतद्वितीयस्षतीखण्डे दिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ बह्माजी बोरे जब इसभकारसे भने विष्णजी तथा सब
षरारयोने तथा दूसरे देवतानि स्तुति की तब महादेवजी प्रसन्न हुए ॥१॥ तब शिवजीने कपादृष्टिसे सब देवता, ऋषि, खनि ओर बह्मा विष्णको
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ततः प्रसन्नमनसः सवं देवास्तथा प्रे ॥ सिद्धषैयः प्रजेशा तुष्टुवुः शंकरं शुदा ॥५७॥ तथोपदेवनागाश्च सदस्या ब्राह्मणा
स्तथा ॥ प्रणम्य परया भक्तया तुष्टु प्रथक् पृथक्॥५५॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसंहितायां द्वितीये सतीखंड
दक्षदुःखनिराकेरणवणेनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्तुतो रमेशेन मया चैव सुरभिः ॥ तथान्यैश्च
महादेवः प्रसत्नस्सबभूव ह ॥१॥ अथ शंथुःकृषा दृष्टया सर्वान् ऋषिषुरादिकान् ॥ अश्षविष्ण् समाधाय दक्षमेतदुवाच ह ॥२॥
महादेव उवाच ॥ शृणु दक्ष प्रवक्ष्यामि प्रसत्नोस्मि प्रजापते॥भक्तापीनः सदाहं वै स्वतयोप्य खिङेनवरः ॥३॥ चतुर्विधा भजंते
मां जनाः सुृतिनस्सदा ॥ उत्तरोत्तरतश्रष्ठास्तेषां दक्षप्रजापते ॥ ९ ॥ आतो जिज्ञासरथाथी ज्ञानी चैष चतुर्थकः ॥ पूत जयश्च
सामान्या्चतर्थो हि विशिष्यते॥५॥तच ज्ञानी प्रियतरोमम रूपञ्च स स्पृतः॥ तस्मास्पियतरो नान्यः सत्थं सत्यं वदाभ्यहम्॥६॥
देलकर दक्षते इसभकार कहा ॥२॥ महादेवजी षोठे हे परजापते 1 दक्ष ! भै भतम हं जो कहता ह सो घनो ययपि में सनका ईश्वर स्वतंत्र हं
तथापि भक्तोके अधीन दं ॥३॥ पण्यात्माजन चरपरकारकं होकर सदा मेश भजन करते है. हे दक्ष भरजापति ! उन आर्तं जिज्ञासु कामनावाछे ४
ओर् ज्ञानियोम उत्रो्र श्रेष्ठ है ॥४॥ आते, जिज्ञासु अर्थार्थं भौर ज्ञानी इनमे प्रहे तीन सामान्य ह ओर चौथा ज्ञानी विशेष है ॥५॥
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यजः
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उने ज्ञानी सुद विशेष प्यारा है, कारण कि वह मेराही रपर है उप्ते से कोद विशेष प्यारा नहीं है यह नँ सत्य २ कहता हं ॥ ६ ॥
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मँ वेदान्त ओर श्रुतिोके पारगामियोमे ज्ञानगम्य ओर आत्माका जाननेवाठा हूं विज्ञानके सन्ने भाप करनेको अल्पबुद्धि यत्न करते हँ ॥ ७ ॥
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॥१८१॥ 6 पद यज दान तप यज्ञोते करम॑परायण मूढनर य्॒ञे यथाथ जाननेको समथ नहीं होते॥<॥तु केवर कमं करकेही संसारके तरनेकौ इच्छा कत्ता ९ ||
ट| इकारण मैने रुष्ट होकर तेरा यज्ञ विध्वंस किया ॥९॥ हे दश्च ! असे छेकर स॒ञ्चे परमेश्वर मानता हु बुद्धिते ज्ञानमे तत्पर ह सावधानी ४
¢ कम कर ॥१०॥ हें भजापते ! ओर भी सद्दे मेरे वचन सुन; मे इससमय सगुण होकर धमक कारण याह्य वचन तुञ्चसे कहता हूं ॥१३१॥ ¢
ज्ञानगम्योहमात्मज्ञो वेदांतशतिपारगेः॥ विना ज्ञानेन मां प्राप्तुं यतन्ते चाल्पब्ुद्धयः ॥७॥ न वेदैश्च न यज्ञश्च न दानेस्तपसा |¢
| कचित् ॥ न शक्वंति मां प्राप्तं मूढाः कर्मवशा नराः ॥८॥ केवलं कम्भणा त्वं स्म संसारं ततुमिच्छसि ॥ अत एवाव ॥
ह|| रुष्टो यज्ञविध्वंसकारकः ॥ ९ ॥ इतः मभृति भो दक्ष मत्वा मां परमेश्वरम् ॥ उद्या ज्ञानपरो भत्वा कुरु कमं समाहितः ्
||| ॥१०॥ अन्यच श्रृणु सद्बुद्धया वचनं मे प्रजापते ॥ वल्मि गद्यं धर्महेतोः सथुणत्त्ेप्यदं तव ॥११॥ अदं ब॒ह्ना च विष्णुश ट
|| जगतः कारणं परम् ॥ आत्मेश्वर उपद्रष्टा स्वर्थहगविशेषणः ॥ १२॥ आत्ममायां समाविश्य सोहं यणमयीं सुने ॥ सृजनक्ष ट
ए नहरन्विशवं दधे संज्ञाः क्रियोचिताः ॥ १३ ॥ अद्वितीये परे तस्मिन् ब्रह्मण्यात्मनि केवले ॥ अज्ञः पश्यति भेदेन भूतानि ¢
|| बह्मचेशवरमु ॥ १४ ॥ शिरः करादिस्वगिषु इर्ते न यथा पुमान् ॥ पारक्यशेुषीकापि भूतेष्वेवं दि मत्परः ॥ १५ ॥ ४
९.२ ||| ती विष्णं यह तरिदेव जगतकै कारण है पर मेही आत्मेश्वर सषब॒जगत्को विशेष रूपे देखनेवारा हं ॥१२॥ हे सने ! म राणमय अपनी ४
स.खं.२ । मायाम प्वेशकरके जगते उत्पत्ति पाठन ओर संहार करता हुआ क्रियके अनुसार नाम धारण करता हं वास्तवमे भ एकही हू ॥ १३॥ ||)
अ०४३ ||| उततपर ब्रह्न आत्मस्वरूप अद्वितीय भ अज्ञानीजन भेददृ्िसे पाणी बह ईश्वर पृथक् २ देखते है ॥ १४ ॥ जेते शिर हाथ पैर अपने अंगादिमे
2॥ मभ्य अन्य मति नहीं करता रसा भेरा परायण ज्ञानी देवादि भिन्नमति नहीं करता ॥ १५ ॥ त
पजि >+ 92 जे
९4 य९+ 924 # २24
सव भूतात्माओंको जो एक भाक्से नहीं देखता, है दक्ष ! जो तीनों देवताओंमं भेद नहीं देखता बही शांतिको प्राप्त होता है ॥ १९६ \\ जो
नराधम तीनों देवताओंम भेदबुद्धि करता है वह चन्द्रसुर्यकी स्थितिपयंन्त नरक लाता है ।॥ १७ ॥ बुद्धिमान् सद्म मन रगाये सब
देवताओंको पूजे तो उत ज्ञान भ्राप्त होता है जिसे निरन्तरकी अक्ति मिरती है ॥१८॥ विधाताकी भक्तिक विना विष्णकी ओर विष्णकी
भक्तिक विना भेरी भक्तिः किती भकार नहीं मिती ॥१९॥ सवके परमेश्वर शकर स्वामी रेसा कहकर सवके सुनते हुए फिर भी कहने कगे
सर्वभूतात्मनामेकभावनां यो न पश्यति ॥ तरिषुराणां भिदां दक्ष स शांतिमधिगच्छति ॥ १६ ॥ यः करोति भरिदेवेषु भेदबुदधि
नराधमः ॥ नरके स वसेन्नूनं यावदाचन्द्रतारकम् ॥१७॥ मत्परः पूजयेदेवान् सवांनपि विचक्षणः ॥ स ज्ञानं लभते येन सक्ति
भवति शाश्वती ॥१८॥ विधिभक्ति विना नैव भक्तिर्भवति वैष्णवी ॥ विष्णुभक्ति विना मे न भक्तिः कापि प्रजायते ॥१९॥
इत्युक्ता शंकरस्स्वामी सवेषां परमेश्वरः ॥ स्वेषां शृण्वतां तत्रोवाच वाणीं कृपाकरः ॥ २० ॥ हरिभक्तो हि मां निन्देत्तथा
शेवोभवे्यदि॥तयोः शापा भवेयुस्तेतत््वभ्रातिर्भवेत्न दि ॥ २१ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं महेशस्य वचनं सुखकारकम् ॥
जहषुस्सकलास्तच सुरखन्यादयो शुने ॥ २२ ॥ दक्षोभवन्मदाप्ीत्या शिवभक्तिरतस्तदा ॥ सङ्कटम्बस्स॒राययास्ते शिवं मत्वा
खिलेश्वरम् ॥ २३॥ यथा येन कृता शंभोः संस्तुतिः परमात्मनः ॥ तथा तस्मै वरो दत्तश्शंुना तष्टवेतसा ॥ २४ ॥
॥२०॥ जो हरिभक्त होकर भेरी निन्दा करे भेरा भक्तं होकर विष्की निन्दा करे तो हम दोनों देवताओके शापे उसको तस्वक्ी भाषि
नहीं होगी ॥ २१ ॥ बरह्ाजी बोठे इस भकार शंकरे सुखकारक वचन सुनकर हे नारदजी ! वहाके देवता खनि आदि सन प्रसन्न हुए
॥ २२ ॥ दक्ष भी महाभरेमसे शिवभक्तिं तत्पर हुआ कुट्म्बसषहित सब देवता शंकरको परमेश्वर मानकर भसन्न हुए ॥ २३ ॥ जिसने जसौ
परमात्मा शकरकी स्तुति की थी; भसन चित्त हो शंकरने उसके निमित्त वैसाही बर दिया ॥ २४ ॥
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सन्न दकष तत्काठही शिषका नाम॒ जपने छ्गा. हे छने ! शिवके अवुग्हसे उसने अपना यज्ञ पूणे किया ॥ २५ ॥ सब देवतारओंको
भाग दथा गया ओर शिवको पूणं भाग दिया ओर शिवजीका अलुप्रह प्ाप् कर ब्राहमणोको बहृतस्ता दान दिया ॥ २६ ॥ तब देव
शंकरकी कपा वह दक्ष भजापति बिभिपूक ऋतििजोक सहित यज्ञके उप्त महाकमेको पूरा करता हज ॥ २७ ॥ हे खनीश्वर ! इतप्रकाे
षह दक्षका यज्ञ पुणे हुआ प्रजहस्वहप शंकरकी भसन्नताहीसे यह सब हुआ ॥ २८ ॥ । उस समय सवे देवता ऋषि तथा दूसरे जन भी सुखी
ओर सनृ हो शंकरका यश करते हए परस्तात अपने २ स्थानोको गये ॥ २९ ॥ मँ ओौर विष्ण मी बडे परमते शंकरका यश गति हए
ज्ञः शिवेन दक्षःशिवभक्तः प्रसन्नधीः ॥ यज्ञे चकार संपूण शिवाठ्दतो सुने ॥ २५ ॥ ददौ भागान्पुरेभ्यो दि प्ूणैमागं
शिवाय सः ॥ दानं ददौ द्विजेभ्य पराप्तः शंभोरवयहः ॥२६॥ अथो देवस्य सुमहतत्कयै विधिपूर्वकम् ॥ दक्षःसमाप्य विधिव
त्सहत्विमिभिः प्रजापतिः ॥ २७॥ एवं दक्षमखः पर्णोभवत्तञ भुनीःश्वरः ॥ शंकरस्य प्रसादेन परव्रह्मस्वदूपिणः ॥ २८ ॥ अथ
देवषेयस्सवे शंसंतश्शांकरं यशः ॥ स्वधामानि यथुस्तु्टाः परेपि घुखतस्तदा ॥ २९ ॥ अहं विष्णुश सुप्रीतावपि स्वंस्वं पर
षदा ॥गायन्तो सुयशश्शंमोः सर्व्मगलदं सदा ॥ ३० ॥ दक्षसंमानितः प्रीत्या महदेवोपि सद्रतिः ॥ केलास स ययौ शलं
सुप्रीतस्सगणोनिजप् ॥३१॥ आगत्य स्वगिरिं शंभुस्सस्मार स्वप्रियां सतीम् ॥ गणेभ्यः कथयामास प्रधानिभ्य्च तत्कथाम्
॥ ३२ ॥ काटंनिनाय विज्ञानी बह तच्चरितं वदन् ॥ खौकिकीं गतिमाशित्य दशैयन् कामितां परुः ॥ ३३ ॥
ओर सव मंगल देनेवाढे उनके नामको उचारण करते हृए अपने २ स्थानोको गये ॥ ३० ॥ सत्छरपोंके गति महादेवजीने ममते दक्षका
सन्मान किया ओर प्रमे अपने गणो सुहित कैठासको गमन किया ॥ ३१ ॥ अपने पर्दते आकर शिवजीने अपनी भिया सषतीका
किया ओर भधान गणो उत्तकी कथा कहने ठगे ॥ ३२ ॥ वह विज्ञानी सतीका चरित कहते समय विताने कगे ओर टोकिकी
गतिका आश्रयकर प्रभुने कामियोंकी गति दिखाई ॥ ३३ ॥
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परत्र सत्छरूपोकी गति स्वामीने कमी अनीति नहीं की. हे सने ! वास्तवे उनको मोह शोक ओर विकार नहीं है ॥ ३४ ॥ म ओर विष्ण
भी तो उनके भेदको नहीं जान सकते, फिर खनि देवता ओर मदुष्य योगी तो क्या हैँ ॥३५॥ शकरकी महिमा अनत है मनीषी भी उसको
| जान सकते उनकी पाते श्रेष्ठ भक्तं सदक्तिके द्वारा विना भ्रम उनको जान सकते है ॥ ३६ ॥ शिवपरमात्मा एकही उनमें कोह विकार
नहीं है बह ठोकोको वैसी गति करके दिखाते हैँ ॥ ३७ ॥ हे सने ! जिस चरित्रको पदसुनकर सुधी मलुष्य दिव्य सद्रति ओौर उत्तम सुखको
नानीतिकारकः स्वामी परब्रह्म सतांगतिः ॥ तस्य मोहः क वा शोकः क्र विकारः परो शुने ॥ ३४ ॥ अहं विष्णुश्च जानीव
स्तद्धेदं न कदाचन ॥ के षरे मुनयो देवा मनुषाययाश्च योगिनः ॥ ३५ ॥ महिमा शांकरोनंतो दुर्विज्ञेयो मनीषिभिः ॥ भक्तन्ञा
तञ्च सद्भक्त्या तत्प्रसादाद्विना श्रमम् ॥ ३६ ॥ एकोपि न विकारो हि शिवस्य परमात्मनः ॥ संदशयति लोकेभ्यः कृत्वा
तां तादशं गतिम् ॥ ३७ ॥ यत्परित्वा च सश्चत्य सवैलोकधीने ॥ लभते सद्रति दिग्याभिहापि सखसुत्तमम् ॥ ३८ ॥
इत्थं दाक्षायणी दहित्वा निजदेहं सती पुनः ॥ जज्ञे हिमवतः पन्यां मेनायामिति विश्चतम् ॥ ३९ ॥ पुनः कृत्वा तपस्तत्र
शिवे कतरे पति च सा ॥ गौरी भ्वाद्धवामांगी लीलाशचकरेद्धताश्शिवा ॥ ४० ॥ इत्थं सतीचरिं ते.वणितंपरमाद्धतम् ॥
शुक्तियुक्तिपदं दिव्यं सवकामप्रदायकम् ॥ ४१ ॥ इदमाख्यानमनघं पवित्रं परपावनम् ॥ स्वर्ग्य यशस्यमायुष्यं पुत्र
पौ्रफलम्रदम् ॥ ४२ ॥ य इदं श्रणयाद्धक्त्या श्रावयेद्धक्तिमान्नरान् ॥ सर्वकर्मा रभेत्तात परतर परमां गतिम् ॥ ४३ ॥
भ्ाप्त हों ॥ ३८ ॥ इश प्रकारसे दक्षकन्या सती अपनी देहको व्यागकर फिर हिभाट्यके यह मेनाम जन्भ छती हुईं यह विख्यात है ॥ ३९ ॥
फिर महातप करक उपने शिवको पाया, ओर गौरी तथा अर्धवामांगी होकर अत लीला की ॥ ४० ॥ इतभकारते यह प्रमदि्य सव
कामना ओर मुक्तिक्तिका देनेवाा परम अद्भुत सतीषरितर तुमे वणन किया ॥ ४३ ॥ यह आख्यान पापराहित परमपविन्न दृसरोको प्रवि
> 49२ 43२ -आ3९+
करनेवाछा है, स्वगै यश आयु ओौर एत्र पौतके फलका देनेवाडा है ॥ ४२ ॥ जो इसे भक्तिते सुनता वा भक्तिमानोको सुनाता है हे तात ।
॥१८३ || पहं सव मनोरथको भ्त होकर अन्तम प्रमगतिको प्राप्न करता है ॥ ४३ ॥
||| यः पठेत्पाव्येदापि समाख्यानमिदं ज्चुभम् ॥ सोपि युक्तराखिलान् भोगानंते मोक्षमवाप्डुयात् ॥ ७९ ॥ इति श्रीशिवमद।
| पराणे द्वितीयायां सढसंितायां द्वितीये सतीलंड द्षय्ावसंधानवरणनं नाम तरिचत्ारिशोऽभ्यायः ॥ ४३ ॥ ॥ श्रीः ॥
¢ समाप्तोयं॒शदरसंहितान्तर्मतसतीखण्डो द्वितीयः ॥ २ ॥
¢ ॥ श्रीसांबसदाशिवापंणमस्तु ॥ 6
&||जो इ रेष्ठ आख्यानको पठता पढाता है यह सव भोगोंको पातत होकर अन्तम मोक्षको भाष होता है ॥४४॥ इति भरी शिवमहाऽराणे द्वितीय र
& सतीखण्डे पंडितज्वालापरस्तादमिश्रङतभाषारीकायां दक्षयज्ञाचसंधानवर्णनं नाम तिचतारिशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ ४
| दोदा-शिवा भवानी शारदा, शंकरदेव मनाय । सतीखंड माषा कियो, भक्तजननसुखदाय ॥ १ ॥ |@
ध ४ पाहि नाहे पावहि सुजन, नितन्रूतन अहलाद् । शंकरभक्तिंहिये धरहु, जन ज्वालापरसाद् ॥ २॥ ट
१५ ¢
|
दोहा-श्रीथङ् पदरज शीस धरि, पारवतीको ग्याह । खण्ड तीसरेमे छिखतः जेहि सुनि दोय उखा ॥ र
९ नारदजी बो जव देवी सीने पिताके यज्ञम अपना देह त्याग कर दिया हे ब्रहाजी ! पिर बह हिमाढयकी त्री कैते हृदे ॥ १॥ ओर बडी ४
उग्र तपस्या करके वहं शिवजीको कसे प्राप्त हूं मेरे पुछनेपर यह आप् विशेषरूपे मु्चसे कहं ॥२॥ वह्याजी बोछे हे सुनि श्रेष्ठ ! अ(दरसे आप्
उत्तम शिव चरित्रको स्॒से सुनिये जो पावन परमदिव्य ओर सब पापोका हस्नेवाडा तथा भ्रष्ठ है ॥३॥ जिस समय देवी सती आनंदसे शिवजीकै
| हिमाख्यपर क्रीडा करती थी, ओर वह परमेश्वरी अनक टीला करती थी ॥४॥ उस समय हिमाचटकी प्रिय मेना सब ऋद्धि सिद्धिसे संयुक्त
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ अथ तृतीयः पार्वतीखण्डः प्रारभ्यते ॥ ॥ नारद उवाच ॥ दाक्षायणी सती देवी त्यक्तदेहा
पितुमंखे ॥ कथं गिरिसता ब्रह्मन्बभूव जगदम्बिका ॥ १ ॥ कथं कृत्वा तपोऽत्युगरम्पतिमाप शिवं च सा ॥ एतन्मे पृच्छते
सम्यक्षथय त्वंविशेषतः ॥ २ ॥ व्रह्नोवाच ॥ शृणु त्वं सुनिशादटं शिवाचरितखुत्तमम् ॥ पावनं परमं दिव्यं स्वपादं
शभम् ॥ २॥ यदा दक्षायणी देवी दरेण सहिता सदा ॥ दिमाचरे सुचिक्रीड रीरया परमेश्वरी ॥ ४ ॥ मत्सुतेयमिति
ज्ञात्वा सिषेवे मातृवच॑सा ॥ दिमाचलप्रिया मेना ॒सूर्वद्धिभिरनिर्भरा ॥ 4 ॥ यदा दाक्षायणी ष्टा नादता स्वतवं जहौ ॥
पित्रा दक्षेण तघज्ञे संगता परमेश्वरी ॥ & ॥ तदेव मेनका तां सा हिमाचल्प्रिया सने ॥ शिवलोकंस्थितां देवीमारिराधयि
षुस्तदा ॥७]॥ तस्यामहं सता स्यामित्यवधायं सती इदा ॥ त्यक्तदेदा मनो दभरे भवितुं दिमवत्सुता ॥ ८ ॥ समयं प्राप्य ॥ट्
सा देवी सर्वदेवस्तुता पुनः ॥ सती त्यक्तः प्रीत्या मेनकातनयाभवत् ॥ ९ ॥ £
हो अपनी कन्या मानकर भगवतीकी सेवा करती थी ॥५॥ जब आदर न पानेमे रोष करके शिवभ्रियाने अपने शरीरको त्याग क्रिया ओर उस्न ट
यज्ञम पिता दक्षके सामनेही प्रछोकंको गई ॥ ६ ॥ हे सने ! उसरी समयं हिमाचल्की श्रिय मेना शिवटोकमें स्थित देवीकी आराधना करनेकै
निमित्त उद्यत थी ॥७॥ सतीने मनम यह विचार् करा कि मेँ हिमाचख्की कन्या वनं तत्का देह त्याग करते समय हिमार्यकी सुता होनेका ट
ध्यान किया ॥ < ॥ फिर वह देवी सब देवता ह सुत जिसके रेस भी समयको पराप्त होकर शुरीरत्याग परमते मेनाकी एनी हुईं ॥ ९ ॥ ठ
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पावती देवी नाम हभ वहां भी नारदे वचने प्रम दुष्कर तपस्या कर किर अपने परति शकरको परात्र हई ॥ १० ॥ नारदजी बोठे हे भगवन् ह
विधे ! ह महाभाज्ञ । हे बोरनेवाठोमे भ्रष्ठ ! मेनाकी उत्पत्ति ओर विवाह तथा चरित्र कहिये ॥ ११ ॥ मेनका देवी बडी धन्य है जिसके यहा
ततीपती कन्या भरगट हूं इसकारण बह पतिव्रता सबकी मान्य ओर धन्य है ॥१२॥ ब्हमाजी बोठे हे खने ! आप पाव॑तीकी माताकी उत्पत्ति तथा
विकाह ओर चरित सुनो बह परम पक्र ओर भक्तिका बढानेवाला है ॥ १३ ॥ उत्तर दिशामे देवता शरीरवारा हिमाढ्यनाम महापवैतराज है,
नाम्ना सा पार्वती देवी तपः कत्वा सुदुस्सदम्॥नारदस्योपदेशाद्र पतिभ्प्राप शिवं पुनः ॥ १० ॥ नारद उवाच॥ ब्रह्मन्विधे
मदापाज्ञ वद मे वदतां वर ॥ मेनकायास्समुत्पति विवादं चरितं तथा ॥ 9१ ॥ धन्या हि मेनका देवी यस्यांजाता स्ता
शि शयु ¢
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सती ॥ अतो मान्या च धन्या च सषा सा पतिवता ॥ १२ ॥ ब्ह्नोवाच॥शृणु त्वं नारद सुने पार्वतीमातङ्द्धनम् ॥ विवाहं |
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॥१८४॥
चरितं चैव पावनं भक्तिव्ैनम् ॥ १३ अस्त्युत्तरस्यां दिशि वै गिरीशो दिमवान्महान् ॥ पर्वतो दि ख॒निश्रेष्ठ महातेजास्समर
द्विभाश॥ 9१४ ॥ दरेडप्यं तस्य विख्बातं जगमस्थिरभेदतः ॥ वण॑यामि समासेन तस्य सूृष्ष्मस्वूपकम् ॥ १५ ॥ पूर्वापरौ
तोयनिधी सबिगाह्य स्थितोहि यः ॥ नानारत्नाकरो रम्यो मानदण्ड इव क्षितेः॥१६॥नानावृक्षसमाकीर्णो नानाशुंगसुचिभितः॥
सिहव्याघ्रादिपञ्यभिस्सेवितस्सुखिभिस्सदा ॥ १७ ॥ तुषारनिधिरत्युमो नानाशवयविचितितः ॥ देवषिसिद्धयुनिभिस्संथितः
शिवसंभरियः ॥ १८ ॥ तपःस्थानोऽतिप्रतात्मा पावनश्च महात्मनाम् ॥ तपस्सिद्धिपरदोत्यंतं नानाधात्वाकरः शुभः ॥ १९॥
खनिराज ! वह महातेजस्पी सशृद्धिशारी है ॥१४॥ स्थावर जेगमके भेदसे उक दो रूप है सक्षपसे उसका सुक्ष्म स्वहप कहता हू ॥ १५॥
बह पूवं पश्चिमके दोनो स्ागरोको अवगाहन करके स्थित होरहा है वह अनेक रत्नौकी खानि मानो भूमिका मान दण्ड हरहा है ॥ १६ ॥
अनेक वृक्षो व्याप्त ओर अनेक शरगोसेचित्र विवित्र है सिंह व्याघ्रादि पशु जहां सुखपूष॑क विचरते है ॥ १७ ॥ जिसके ऊप्र महान तुषार
पडती है अनेक आश्वयेि विचित्र, देवता, कषि, षिद्ध, खनि आदि शिवके मियोसे सदा युक्तं है ॥ १८ ॥ यही महात्मा पवित्र जनोके तप
रुण्सं-२.
पा.खं.३
अ०१
|
कृरनेका प्रित स्थान है यह अनेक भ्रकारकी तपस्याओंकी सिद्धि करनेवाठा अनेकं धातुओंकी खानि है ॥ १९ ॥ वही यहं दिव्यरूष्
ट परवीगसुन्दर है, यह शेकराज विकाररहित सत् प्रुषोका भिय है ॥ २० ॥ कुकी स्थिति ओर धर्म बठानेकै निमित्त तथा पितृदेवताओंकी
| ितेच्छतत परव॑तराजने अपने विवाह करनेकी इच्छा की ॥२१॥ उस समय सम्पूणं देवता अपने स्वा्थको विचारकर हे खनीश्वर ! दिव्य पितरोकि
ठ पास जाकर बोटे ॥२२॥ देवता बोटे सुपरसन्नमन हो सब पितर हमारे वचन सुनो, जो देवकायंकी इच्छावाडे हो तो शीघ्र करो ॥ २३ ॥ जो
¢| स॒ एव , दिम्यरूपो दि रम्यः सबानखन्द्रः त विष्ण्वशोऽविङ्ृतः शरूराजराजस्सताम्परियः ॥२०॥ करस्थित्ये च स गिरि
र धम्म॑वद्धेनहेतवे ॥ स्वविवाहं कततुमेच्छत्पित्देव ॥ २१॥ तस्मिन्नवसरे देवाः स्वा्थमाचिन्त्य कत्स्षश्चः ॥ उचुः
। पिवृन्समागत्य दिव्यान्प्रीत्या मुनीश्वर ॥२२॥ देवाउचुः॥ सँ शृणुत नो वाक्यं पितरः प्रीतमानसाः ॥ कर्तव्य तत्तथेवाञ्च
४ देवकार्ययेप्सवो यदि ॥ २३ ॥ मेना नाम सता या वो ज्येष्ठा मङ्गरक्पिणी ॥ ताभ्विवाह्म चसुप्रीत्या दिमाख्येन महीभता
|| ॥ २९ ॥ एवं सर्वमहालाभः सवेषां च भविष्यति ॥ युष्माकममराणां च दुःखहानिः पदे पदे ॥ २५ ॥बरह्मोवाच ॥ इत्या
कृण्यापरवचः पितरस्ते विमृश्य च ॥ स्मृत्वा शापं सुतानां च प्रोचुरोमिति तद्वचः ॥ २६ ॥ ददुभेनां सुविधिना हिमागाय
निजात्मजाम् ॥ समुत्वो महानासीत्तदविवाहे खमङ्गरे ॥ २७ ॥ दर्य्यादयोऽपि तै देवा भ्ुनयश्चापरोखिलाः ॥ आजग्बु
ह| स्तत्र संस्मृत्य वामदेवं भवं धिया ॥ २८ ॥
तेना नामकी तुम्हारी मंगलरूपिणी बढी भुता है उस सुत्रताका विवाह हिमाख्यनामक पर्व॑तराजसे कश दो ॥ २४ ॥ इससे सबका बडा लाभ
ह|| होगा तुम्हारी भौर देवतारओंकौ पद पदे, दुःखहानि होगी ॥ २५॥ ब्रह्माजी बोे इसभकार देवताओं वचन सुन वह सब पितर विचारकर
|| ताकि शाप्को स्मरणक्तर यह बात स्वीकार करते हए ॥ २६ ॥ ओर अपनी आत्मजाको हिभाल्यके निमित्त भदान किया, उस सुरमगल
2॥ विवाहे बडा उत्सव हभ ॥२७॥ हरिभादि सव देवता ओौर सव ऋषि वामदेवजीका स्मरणकर वहां सब आये ॥ २८ ॥
८९
ु | अनेक भकारके दान देकर बडा उतसव कराया, पितरगण ओर हिमाटयकी बडी भसा कौ ॥ २९ ॥ वह सब देवता ओर खनि महाभसन ए
॥१ ् ¢ ओर शषा शिवो स्मरण करते अपने २ स्थानोंको गये ॥ ३० ॥ बहत दहेजको प्रपि हो ओर उस श्रियाको विवाह कर गिरि अपने षर
आकर बडी भरसषनताको पराप्त हए ॥ ३१ ॥ बह्लाजी बोटे हे खनीश्वर ! यह मेनाका समागम ओर सुन्द्र विवाह आप कहा यह बडे सुखका
¢ देनेवाला है, अव तुम कया ओर सुनना चाहते हो ॥ ३२ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणमाषारीकायां रुद्रसंहितान्तगेततृतीयपावेतीखण्डे हिमाचढ
|| विवाह्वणेनं नाम भरथमोऽध्याय; ॥ १ ॥ नारदजी बोठे हे विधाता ! आप अम प्मते भनाकी उलत्ति सङ्गते कहि ओर शापकी कथा भी
|| रत्सवं कारयामास दानान्यनेकश॥ुपरशस्य पितृन्दिव्यान्प्रशशंसुदहिंमाचलम्॥२९।महामोदान्विता देवास्ते सँ सनी
श्वरा॥संजग्ुः स्वस्वधामानि संस्मरन्तः शिवाशिवौ॥३०॥कौतुकं बहु सम्प्राप्य सविव प्रियां च ताम्॥भजगाम् स्वभवनं
|| सुदमापर गिरीश्वरः ॥३१॥ बह्मोवाच॥मेनया हि दिमागस्य ०1 श्वर॥ प्रोक्तो मे सुखदः प्रीत्या किम्भूयः श्रोतुमिच्छ
ट| सि॥३२॥हति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां 1 तृतीये पावतीखंण्डे हिमाचरविवाहवर्णनं नाम प्रथमोध्यायः॥१॥
&|| नारद उवाच ॥ विषे श्रज्ञ वदेदानीं मेनोत्पत्ति समादरात् ॥ अपि शापं समाचक्ष्व कुङ् संदेदभंजनम्॥१। ब्रह्मोवाच ॥ शृणु
&|| नारद सुप्रीत्या मेनोत्पत्ति विवेकतः॥ुनिभिः सह वक्ष्येहं सुतवय्यं मृहाडुध् ॥२॥ दक्षनामा मम सृतो यः पुरा कथितो सुने॥
| तस्य जाताः खता, षष्िप्रमितास्॒िकारणाः ।॥ ३॥ तासां विवाहमकरोत्स व्रः कश्यपादिभिः ॥ विदितं ते स॒मस्तं तत्प्स्तुतं
शृणु नारद् ॥ £ ॥ तासां मध्ये स्वधानाम्नीं पितृभ्यो दत्तवान्सुताम् ॥ तिख्ोभवन्सुतास्तस्यास्सुभगा धर्ममूर्तयः ॥ « ॥
रसं. २ १ ६
11 ¢ कहकर संदेहका निराकरण करिये ॥ १ ॥ बहाजी बोठे नारदजी विवेकमपूवेक आप मेनाकी उत्पत्ति य॒नियोकि साथ सुनिये, हे महापण्डित |
श हे प्र । मे कहता हूं ॥ २॥ हे शुने ! जो भते पहठे अपने दक्षनामक एकी बात कही है उसकी सृष्ठिको भरगट करनेवाटी साठ कन्या हुई
अ०य् | | ॥ २ ॥ कश्यपादिके साथ उसने कन्याओंका विवाह किया, हे नारद ! बह तो तुमको सब विदित है अब उपयोगी कथाको हनो ॥ ४ ॥
॥ उनमे स्वधा नामवाटी कन्या पितरोंकी दी उश्के धमकी मूर्ति तीन कन्या हुईं ॥ ५ ॥
|| ह खनीश्रर ¡ उनके पवित्र नारमोको सुनो जो सदा विघ्र हरनेवाठे तथा महा्मगट नेवारे हं ॥ ६ ॥ भेना नाम्वाटी ज्येठकन्या) मध्या धन्या, ||
कृलावती स्षवसे छोटी थी यह सव पितरोकी मानसी कन्या हैँ ॥ ७ ॥ यह तीनों कन्या अयोनिजा, स्वधासे, भरगट रोकमं उसकी कन्या ठै
, कहलाती है इनक नाम उच्चारण करनेसे मयुष्य षव कामनाओंको भाप होते ई ॥ < ॥ यह ठोकमाता्ँ जगसूज्य ओर दूसरोको परम ठै
¢ आनद देनेवाटी ह यह योगिनी प्रम ज्ञानकी निधान त्रिके यात्रा करनेवाटी है ॥ ९ ॥ हे सनीश्वर ! एकं समय यह तीनों बहनें ह
६ शववद्वीपमे भगवानु विष्णका दर्शन करने गई ॥ १० ॥ वहां विष्णुको भ्रणामकर भक्तिपूर्वकं स्तुति की, ओर उनकी आज्ञासे वहां स्थित त
६ तासां नामानि श्रृणु मे पावनानि सुनीश्वर॥ सदा विघहराण्येव महामंगख्दानि च॥६॥मेनानाम्नी सुतां ज्येष्ठा मध्या धन्या ठ
ह|| कलावती॥ अन्त्यां एतास्सुतास्सर्वाः पित्रणाम्मानसोद्धवाः ॥७॥ अयोनिजाः स्वधायाञ्च लोकतस्तत्सता मताः॥आसाम्परोच्य $
£ सुनामानि सर्वान्कामा्नो लभेत् ॥ ८ ॥ जगद्र्याः सदा लोकमातरः परमोददाः ॥ योगिन्यः परमा ज्ञाननिधानास्ताश्चिलो ९
४ ¢
४
कगाः ॥९॥ एकस्मिन्समये तिस्रो भगिन्यस्ता सुनीश्वर ॥ श्वेतद्वीपं विष्णुलोकं जग्ुरदर्शनहेतपे॥१०॥ कत्वा परणामं विष्णोश्च
संस्तुतिभक्तिसंय॒ताः ॥ तस्थुस्तदाज्ञया तञ सुसमाजो महानभूत् ॥११॥ तदेव सनकायास्तु सिद्धा बरह्ता शने ॥ गतास्तत्र
दर नत्वा स्तुत्वा तस्धृस्तदाज्ञया ॥ १२॥ सनकायान्पुनीन्दक्ठत्तस्थुस्ते सकला दतम् ॥ तवस्थान्संस्थितात्नत्वा देवादयो
कृबन्दि तान् ॥ १२ ॥ तिस्रो भगिन्यस्तास्त नोत्तस्थु्मोदिता सुने ॥ मायया देवृषिवशाश्शङ्करस्य परात्मनः ॥ १७ ॥
मोहिनी सवं लोकानां शिवमाया गरीयसी ॥ तदधीनं जगत्सर्वं शिवेच्छा सा प्रकीर्यते ॥ १९ ॥
हुईं तथा वहां बडा समाज हआ ॥ ११ ॥ हे सने ] उसी समय सनकादिक सिदध बधत् वहां आये ओर भगवानुको भ्रणामकर उनकी स्तुति
की ओर बहां उनकी आज्ञासे स्थित हए ॥ १२ ॥ सनकादिक खनियोंको देखकर सव कोई सावधान हो उत्थित इए, वहां स्थानोपर स्थित
हौ ोकवंदित देवादिकोसे मुनि नमस्छत हए वेढे ॥ १३ ॥ हे ने ! शिबवकी
ह ५ | 2 वम भत मायासे मोहित होनेके कारण यह तीनों बहने वहां ही स्थित ट
रहीं खडी न हदं जब उगत प्रकार वह परमात्मा शकरकी मायात देववश मोहित
इई ॥ १४ ॥ जो सब छोकोंकी मोहनेवाटी शिवकी माया है ॥२५॥
शिण्पु | जितके अधीन सब जगत् ह वह शिषकी इच्छा कहतीहै॥ १ ५॥उसीको भार्य कहते है, उनके नामभी अनेक हँ वह शिवकी इच्छासेही पृ हती है
च
॥१८६॥ [|£ || इसमं सन्देहं नही ॥१६॥ उसी मायाके वशीभूत होकर उन्होने भणाम नहीं किया ओर विस्मित होकर केवर देखतीही रह गई ॥१७॥ सनकादिक 7
खनिजनोँने उनकी यह गति देखकर ज्ञानी होकरभी उनपर परम ऋध किंया॥ १८॥ शिवकी इच्छसे मोहित होकर कोधपुवक सनत्कुमार योगीश्वरने
उनको दण्डरूप शाप दिया॥१९॥ सनत्कुमार बोडे तुम पितृकन्या होकर भी श्रुतिका तत्व नहीं जानती हो,ओौर तुम तीनों मूढ हो॥२०॥ तुमने ट|,
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ठ् ट
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६ भारन्धं परोच्यते सैव तन्नामानि ह्यनेकशः ॥ शिवेच्छया भवत्येव ना कार्या विचारणा ॥१६॥ भूत्वा तद्वशगास्ता वै न चक्र ट
६ रपि तत्नतिम्॥ विस्मितास्सम्प्रदश्यैव संस्थितास्त् केवलम् ॥ १७ ॥ तादृशीं तदति दष्टा सनकावा शुनीश्वराः ॥ ज्ञानि ट्
| नोऽपि परं चछ्कः को दुर्विषहं च ते ॥ १८ ॥शिवेच्छामोदहितस्तञ् सक्रोधस्ता उवाच इ ॥ सनत्कुमारो योगीशश्शापन्दण्ड ९
६ करं ददन् ॥ १९ ॥ सनत्कुमार उवाच ॥ यूयं तिस्रो भगिन्यश्च मूढाः सद्वयुनोज्डिताः ॥ अज्ञातश्चुतितत्वा हि पित॒कन्यो ठ
|| अपि धुवम् ॥ २० ॥ अभ्युत्थानं कृतं नौ यत्रमस्कारोपि गर्वेतः ॥ मो्िता नरभावत्वात्स्वरगाददूरा भवन्तु हि ॥ २१ ॥ ¢
|| नर्ियः सम्भवन्तु तिसोऽपि ज्ञानमोहिताः ॥ स्वकर्मणः प्भणावे रभध्वं फलमीदृशम्॥ २२ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं ¢
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च साध्वस्तास्तिस्रोऽपि चकिता भरशम् ॥ पतित्वा पादयोस्तस्य समूचनेतमस्तकाः ॥ २३॥ पित्रतनया उरुः ॥ सुनिषरय
रुपं. २ दयासिन्धो प्रसत्नो भव चाधुना ॥ त्वत्प्रणामं वयं बूढाः कुह स्म न भावतः ॥ २४॥ |
पा.खं.३ ४
अ०२
१०,
हमारा अश्युत्थान न किया, गव॑से नमस्कार भी न किया, नरभाक्ते मोहित हो इस्तकारक तुम स्वगं दूर होवो ॥ २१ ॥ ओौर तीनोंही ज्ञानसे
मोहित होतेकै कारण मलुप्योकौ ली होषोगी) अपने कर्मके बते एता फठ प्राओगी ॥२२॥ बरह्लाजी बोरे यह वचन सुन वह तीनों कन्या बहूतही
>॥ चकित हूं ओर सनत्छृमारजीके चरमे पतित हो भणामकर बोटी॥ २३॥ पितृकन्या बोटीं हे सनिभेष्! दयासागर अब हमारे ऊपर छपा करो ॥>
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हमने जो मूढ होकर आपको प्रणाम न किया ॥ २४ ॥ हे विप्र ! उसका फल पाया हे खने ! आपका इसमे कुछ दोष नहीं आप अनुग्रह
| कीजिये जिससे हम फिर श्वगंको प्राप हों ॥२५॥ बह्माजी बोठे यह बचन सुन वह सनत्कुमार शिवकी मायासे परितो प्रसन्न होकर शापो
दारको कहने छगे ॥ २६ ॥ सनक्छरुमार बोठे तुम तीनों पितरोकी कन्या प्रस्न्नहोकर सुनो भेरा वचन शोक दूर करनेवाखा ओर तुमको
पदा सुख देनेवाठा है ॥ २७ ॥ विष्णका अशरूप जो हिमा्य पवेत है जो हिमका आधार है, यह ज्येष्ठा उसकी काभिनी होगी इसीकी
॥
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ट| ` प्रप्ते च तत्फलं विप्र न ते दोषो महाघने ॥ अलग ङुरुष्वाज कमेम स्वगीतिम्पुनः ॥२५॥ ब्रह्मोवाच ॥ त्वा तद्वचनं तात |£
(| ग्रोवाच स्निस्तदा ॥ शापोद्धारं प्रसन्नात्मा भरितः शिवमायया॥ २६ ॥ सनत्कुमार उवाच ॥ पितृ्णांतनयास्तिसः शरणत |£
| प्रीतमानसाः ॥ वचनं मम शोकघ्नं सुखदं सर्वदैव वः॥२७॥ विष्णोरंशस्य शलस्य हिमाधारस्य कामिनी॥ज्येष्ठा भवत तत्कन्या
भविष्यत्येव पार्वती ॥२८॥ धन्या प्रिया द्वितीया तु योगिनी जनकस्य च ॥ तस्याःकन्या महार््मीनांस्ना सीता भविष्यति ४
॥२९॥ वृषभानस्य वेश्यस्य कनिष्ठा च कलावती ॥ भविष्यति प्रिया राधा तत्सुता द्वापरान्ततः॥३०॥मेनका योगिनी पत्या है
पार्वत्याश्च वरेण च॥।तेन देहेन केलासे गमिष्यति परम्पदम्॥३१।घन्या च सीतया सीरध्वजो जनकवंशजः॥ जीवन्धक्तो महा त
योगीवेकुण्ठं च गमिष्यति॥३२॥ कलावती वृषभानस्य कौतुकात्कन्यया सह ॥ जीवन्युक्ता च गोलोकं गमिष्यतिन संशयः॥३३॥
कन्या पाती होगी ॥ २८ ॥ ओर यह दूसरी कन्या महायोगिनी जनककी ल्ली होगी जिसके यहां महाक्ष्मी सीता उत्पन्न ल्योगी ॥ २९ ॥ ४
कठावती वैश्य वृषभान की श्रिया होगी. हयापरके अन्तये उससे राधा प्रगट होगी ॥ ३० ॥ भेनका योनी पार्वतीजीसे आपने भेष्ठ व्रको पराप्त टै
होकर उसी देहे परमपद केठासको जायगी ॥ ३१ ॥ ओर धन्या सीताको उत्यन्नकर जनक्वंशोत्पन्न सीरष्वजको भप्त हो वैकुको चली ट
जायगी ॥ ३२ ॥ ओर कठावती वृषभानको भाप हो कौतुके राधाके साथ जीवन्धुक्त हो गोोकको जायगी इसमे सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥ |
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| / विना विपक्तिकि किकी कहां महिमा होती है सुकाभोंको दुःखके गतहेनेमे परमोत्छष्ट सुखही है ॥ ३४ ॥ तुम पितरो की कया
॥१८०॥| नािनी हो विष्के दशेन से तुम्हारा कर्मक्षय होगया ॥ ३५ ॥ खनीश्वर यह कहकर फिर भी बोठे तथा ज्ञान ओर युक्ति देनेवारे शिवका
ट स्मरण किया ॥ ३६ ॥ ओौर भी रमसे मेरा हुल दायक वचन हुनो ठम शिवे भक्ति करनेवाली षन्य हो निरन्तर मान्य ओर पूज्यो
¢ ॥ ३७ ॥ मेनाम जगदम्बिका पार्षती दैवी उतन्नहो परमडुष्कर तप करके शिवकी भिया होगी ॥ ३८ ॥ ओर _धन्याकी सुता सीता राम्
विना विपत्ति महिमा केषां कुचर भविष्यति ॥ कर्मिणां गते दुः ले प्रभवेद् इमं सुखम् ॥३९॥ यूयं पितृणां तनयास्सर्वारस्व
{|
गविलासिकाः ॥ कर्मक्षय युष्माकमभवद्विष्ण॒द्शनात् ॥ ३५ ॥ इत्युक्ता पुनरप्याह गतक्रोधो शुनीश्वरः ॥ शिवं संस्मृत्य ९
ट मनसा ज्ञानदं थुक्तिखक्तिदम् ॥३६॥ अपरं शण॒त प्रीत्या मद्रचस्पुखदं सदा ॥ धन्या यूयं शिवप्रीता मान्याः पूज्या ह्यभी ¢
। ह्णशः ॥ ३७ ॥ मेनायास्तनया देवी पावती जगदम्बिका ॥ भविष्यति प्रिया शम्भोस्तपः कत्वा सुदुस्सदम् ॥ ३८ ॥ धन्या
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ट
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कवासिनी ॥ यु्तस्नेहनिवद्धा सा कृष्णपत्नी भविष्यति ॥४०॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्थमाभाष्य स शुनिरभातभिस्सह संस्तुतः ॥ सन |©
त्छृमारो भगर्वस्त्रवान्तहिंतोऽभवत्॥४१॥ तिखो भगिन्यस्तास्तात पितणां मानसीः सुताः ॥ गतपापास्स॒खं प्राप्य स्वधाम |©
¢ सुता स्मरता सीता रामपत्नी भविष्यति॥ लौकिकाचारमाश्रित्य रामेण विहरिष्यति ॥३९॥ कलावतीसुता राधा साक्षाद्रोो ट
- ६ प्रययुहुतम्॥४२॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शरसंहितायां त॒तीये पार्वतीखंड पूरवेगतिवर्णन नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
रु. २ ¢ चन्द्रकी पत्नी होगी लोकिकाचारको आश्रयकर रामक साथ विहार करेगी ॥ ३९ ॥ कठावतीकी सुता राधा साक्षात गोटोककी निवास कर
पाखं.३ ¢ नेवाटी युत जेहमे निबद्ध हुईं रृष्णकी पतनी होगी ॥ ४० ॥ त्रहलाजी वोढे इतभकार खनिराज कथनकर अपने भायोंसहित वहीं अन्तर्हित
अ०२ होगये ॥ ४१ ॥ ओर पितरोकी मानसी सुता बह तीनो बहन पापरहित हो सुखको प्राप्त हो अपने २ धामोंको गई ॥४२॥ इति श्रीशिवम्
# || हाएराणमाष्रीकायां रुदसंहितान्तगत्रतीयपाक्तीसंड पूवंगतिवणंने नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ =
आये येय 9र
उर +^32 यर ५0०
नारदजी बोटे हे बह्माजी हे महापंडित हे बुद्धिमान बोढनेवारोमे शरेष्ठ हे विष्णसद्णरो ! इसकै पीछे फिर क्या चरित्र हज सो आप किये ॥१॥
यह आपने मेनाकी पूवंगतिकी अद्भुत कथा सुना ओर विवाह भी भटी भकार सुनाया, अव आप इसका प्रम चरित्र कहिये ॥ २ ॥ वह गिरि
भेनाको विवाहकर फिर कया करते हुए ओर उसमे जगदम्बिका पावती किस प्रकार उत्पन्न हृद ॥३॥ ओर किस भरकारसे दुःसह तप करके शंकरको
राप हृद यह शकरका यश् विस्तारपरवक सुक्षते कहिये ॥४॥ ब्रह्माजी बोठे हे सने ! तुम प्रेमे शकरका यश सुनो जिसको सुनकर बह्लहत्यारा भी
शुद्ध होकर सव कामनाओंको प्राप्त होता है ॥५॥ जब मेनाका विवाह करके गिरिराज अपने घर गये हे नारद ! उस समय तिलोकीम उत्सव
नारद उवाच ॥ विधे प्राज्ञ महाधीमन्वद मे वदतां बर ॥ ततः प्रं किमभवज्चरितं विष्णुसद्वरो ॥१॥ अद्धतेयं कथा परोक्ता मेना
परवेगतिः शुभा॥ विवादश्च शतस्सम्यक्परमे चरितं वद्॥२॥मेनां विवाह्य स गिरिः कृतवान्कि ततः परम् ॥ पार्वती कथ्त्प्ना
तस्थां वे जगद्म्बिका॥ २ तपस्सुदुस्सहं कृत्वा कथ प्राप पति हरम्॥ एतत्सव सूमाचक्ष्व विस्तराच्छंकरं यशः ॥४॥॥ ब्रह्मो
वाच ॥ सुने त्वं अण॒ स॒प्रीत्या शांकरं सयशः शम्॥ यच्छरत्वा ब्रह्महा शृ्धयेत्सवौन्कामानवाप्ठयात्॥५॥ यदा मेनाविवाहन्तु
कृत्वागच्छष्विरिगहम्॥ तदा सयुत्सवो जातिषु ककेषु नारद्॥ ६॥ दिमाचरोऽपिसुप्रीतश्चकार परमोत्सवम्॥ भूसरान्वंधुवरगोशच
परानानच सद्धिया ॥७॥ सवे द्विजाश्च सन्तुष्टा दत्त्वाशीरवचनं वरम् ॥ ययुस्तस्मे स्वस्वधाम वेधुवगस्तिथापरे ॥ ८ ॥
दिमाचलोऽपि सुप्रीतो मेनया सुखदे
गृहे ॥ रेमेऽन्यञ्च च सुस्थाने नन्दनादिवनेष्वपि ॥९॥ तस्मिन्नवसरे देवा छने विष्ण्वा
दयोऽखिलाः ॥ मुनयश्च महात्मानः प्रजग्मुभूधरान्तिके ॥ १० ॥
हभ ॥ ६ ॥ हिमाचछने भी प्रस्त होकर परम उत्सव किया, बाह्मण बन्धुजन तथा दृप्तरे जनोंको भी प्रम बुद्धितते उनका अर्थन किया
॥ ७ ॥ सब बाहर्णोने प्रस होकर आशीर्वाद दिया, ओर दूसरे बन
७ द दिय पुजन भी अपने अपने स्थानोंको गये ॥ < ॥ हिभाचर भी भन्न हो
अपने घरमे आनंद करने कगे ओर मेनाके संग मपने स्थान तथा न
न्दन वनम विहार करने ठ्गे ॥९॥ उस्न समय सपुर्णं देवता विष्ण
आदि तथा ओर महात्मा मुनि हिमाखयकै समीप गये ॥ १० ॥ २ |
९०
।
,
_ ठ उन देवताओंको आये हए देखकर गिरिराजने ` भरणाम किया, ओर अपने सुरुतकी मशंसा करते इए भक्ति बढा सत्कार किया (स ट
॥१८८॥ ||| हाथ नोढ शिर श्ुकाय भक्ति स्तिते भसन करते हृये गिरिराजके सए संड होगये ओर भमै आंख नत्ति पतित हुए ॥ १२ ॥ ह छने ! ||
ठ तब प्रसन्न होकर हिमालय प्रणामकर विष्ण आदि देवताओंते कहने ठे ॥१३॥ हिमाख्य बोठे आज भेरा सफ जन्म है आज मेरा त्फठ ट
¢| रष है आज मेरा ज्ञान ओर क्रिया सफ ह ॥१४॥ जाज मँ धन्य ओर मेरौ मूमि धन्य है, मेरा कुल दरा सवर धन्य है! इमं संदेह नही ||)
ह्ठा तानागतान्देवान्प्रणनाम् खदा गिरिः ॥ समानं कृतवान्भक्तया प्रशंसन्स्वविधि महान् ॥ 9१ ॥ साजखिनितशीरषो हि स ¢
ट तुष्ठाव सुभक्तितः ॥ रोमोद्रमो महानासीद्विरेः प्रेमाश्रवोऽपतन् ॥ १२ ॥ तत प्रणम्य सुप्रीतो हिमशेलः प्रसन्नधीः ॥ उवाच ॥५
६ प्रणतो भूत्वा युने विष्ण्वादिकान्सुरान् ॥१३॥ दिमाचर उवाच ॥ अदय मे सफलं जन्म सफल समहत्तपः ॥ अच मे सफट ट
ठ ज्ञानमय मे सफलाः क्रियाः ॥१४॥ धन्योऽहमद्य संजातो धन्या मे सकला क्षितिः ॥ धन्यं कुलं तथा दारास्सर्वं धन्यं न ट
ऊ संशयः ॥ १९ ॥ यतः समागता यूयं मिलित्वा स्वं एकदा ॥ मां निदेशयत प्रीत्योचितं मत्त्वा स्वसेवकम् ॥ १६ ॥ |£
|| ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति शृत्वा महीधरस्य वचनं ते सुरास्तदा ॥ उचुर्यादयः प्रीताः मिद्ध मत्वा स्वका्यैतः ॥ १७ ॥ देवा
६ ऊचुः ॥ हिमाचल महाप्राज्ञ शृण्वस्मद्वचनं हितम् ॥ यदर्थमागतास्सवं तद्न्रूमः प्रीतितो वयम् ॥१८॥ या पुरा जगदम्बोमा |£
६ दक्षकन्याऽभवद्विरे ॥ र्रपत्नी हि सा भूत्वा चिक्रीड सुचिरं वि ॥ १९॥ £
रु°स.2 ¢ ॥ १५ ॥ जिस कारण किं तुम सब मिलकर आये हो इसकारण भ्रीतिसे मुञ्चको अपना सेवक जानकर आज्ञा करो ॥ १६ ॥ बह्लाजी बे ट
पा.खं.३। || शस भकारसे वे देवता हिमाख्यके क्चन सुनकर प्रसन्न होकर अपने कायेकी सिद्धि मान बोटे ॥ १७॥ देवता बोटे हे हिमाख्य है ¢
म०३ || महाबुद्धिम्पन्न ! हमारे हितकारी षचन सुनो जिस्न॒ कारण हम यहां आये है बह प्रेमे कहते है ॥ १८ ॥ हे गिरे ! जिस समय जगत्की
॥ माता उमा दक्षकी कन्या होकर रु्रपत्नी हो भूमिमे बहुत काठतक कडा करती रही ॥ १९ ॥ =
शवात् पिताते अनादरको भात हो अपना भण स्मरणकर अपने शरीरको त्यागकर अभ्विका अपने पदको भात दुई ॥ २.० ॥ हे हिमालय \]|द
वह कथा कमे ओर तुमको भी विदित है र्ता होने देवता्ओंका महान् छाभ होगा ॥ २१ ॥ ओर शिवजीकै वशवतीं सब देवता भी
| वशीमूत होजायगे ॥ २२ ॥ बह्ाजी बे इस प्रकार हिमाटयने हरि आदिक वचन श्रवणकरं (दसाही होषै' रेस भसन्नमनसे कहा न
कि आद्र मात्रसे ही ॥ २३ ॥ तव सव देवता प्रम आदरमे उस्र विधिको गिरिसे कहकर शकर प्रिया उमाकी शरणको पराप्त हए ॥ २४ |
पित्रतोऽनादरं प्राप्य संस्मृत्य स्वपणं सती ॥ जगाम स्वपदं त्यक्त्वा तच्छरीरं तदाम्बिका ॥ २० ॥सा कथा विदिता रोके
तवापि दिमभूधर ॥ एवं सति महालाभो भवेदेवगणस्य रि ॥ २१ ॥ सर्वस्य भवतापि स्युस्ते वशास्घुराः ॥ २२. ॥ ठ
॥ ब्र्लोवाच ॥ इत्याकण्य वचस्तेषां दयादीनां गिरीश्वरः ॥ तथास्त्विति प्रसन्नात्मा प्रोवाच न च सादरम् ॥ २३ ॥ अथते
च समादिश्य तदिधिम्परमादरातव् ॥ स्वयं जम्मु शरणश्चमायाश्शंकर श्रियः ॥ २४ ॥ सुस्थले मनसास्थित्वा सस्म
र्जगदम्बिक्राम् ॥ प्रणम्य बहुशस्ततुष्टुबुः श्रद्धया खराः ॥ २५ ॥ देवाचुः ॥ देव्युमे जगतामस्ब शिवलोकनिवासि
नि ॥ सदाशिवग्रिये दुगे त्वां नमामो महैशवरि ॥ २६ ॥ श्रीशक्ति पावनां शान्तां पुष्ठिम्परमषावनीम् ॥ वयत्नमामहे भक्त्या
महदव्यक्तं रूपिणीम् ॥ २७ ॥ शिवां शिवकरं शुद्धां स्थूटां सूक्ष्मां परायणाम् ॥ अन्तर्विद्यासुवि्याभ्यां सुप्रीतांतवां नमामहे ४
॥ २८ ॥ त्वं अद्धा त्वं धृतिस्त्वं श्रीस्त्वमेव सर्वगोचरा ॥ त्वन्दीपितिस्सूर्ख्यगता स्वपरपञ्चप्रकाशिनी ॥ २९ ॥
अच्छे स्थले स्थित हो मनसे जगदम्बाका स्मरण करने ठे, ओर अनेक भ्रकारसे परणामकर शरद्धा करके स्तुति करने खगे ॥ २५ ॥ देवता
बोटे हे देवि ! उमे जगन्मात ! हे शिवटोकनिवासिनी हे सदा शिवभ्निये दुं महेश्वरि ! तुमको प्रणाम करते है ॥ २६ ॥ श्रीशक्ति पावनी शाता
ष्टि परम पावनी अव्यक्तरूपिणीको हदयस प्रणाम करते है ॥ २७ ॥ जो शिवा कल्याण कारिणी शुद्ध स्थूल सक्षम हपवाखी है अन्तर्विवा ह
एुषियाते प्रसन्न होनेषाटी तुमको हम प्रणाम करते है ॥ २८ ॥ तुमही शरद्धा तुषही धृति तुमही सवगोचर हो तुमही सूयी किरणहप तथा ||
ए
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शिण्पु |
॥१८९॥
स्वभपचकी प्रकाश करनेवाटी हो ॥ २९ ॥ जो ब्रह्माण्ड संस्था तथा अन्य समयमे जगत्के जीवको ओौर ब्रहमासे ठेकर तृण ५ ट
जो बाती है हमं उसको भ्राम करते है ॥ ३० ॥ ठुमही वेदमाता गायत्री सावित्री सरस्वती हो ठुमही स्व जगतको वाती आर ||
| वैद्यह वाटी हो ॥ ३१ ॥ सव॒ भाणिोम निद्रा ठमही हो क्षपा जौर् वृति ठुमही हो, तृष्णा, कान्ति, छवि, ति ओर ||
व आनंद कएनेषाटी तुम हो ॥ ३२ ॥ एण्य कटनेवाोमं तुम लक्ष्मी हौ पापिर्योको दण्ड देने तुमह ज्येष्ठा हो ठुम स्तव जगती ह
शांति धात्री ओर प्राण पोषिणी ल्ल ॥ ३३ ॥ प्राणियों तुम अन्तरूपिणी पाच त्वमे सारहप हो तुम नीतिवाछोमें नीतिरूप ट
या च बरह्माण्डसंस्थाने जगनीवेषु या जगत् ॥ आप्याययति ब्रह्मादितृणान्तं तां नमाम ॥ ३० ॥ गायत्री त्वं वेदमाता त्वं ट
सावि सरस्वती ॥ त्वं वातां सर्वजगतां त्वं अयीं धर्मङूपिणी ॥ ३१ ॥ निदा त्वं सर्वभूतेषु क्षुधा तृत्तिस्त्वमेव दि ॥ तृष्णा
कान्तिश्छविस्तुष्स्सर्वानन्दकरी सदा ॥३२॥ त्वं लक्ष्मीः पुण्यकतृणां त्वं ज्येष्ठा पापिनां सदा ॥ त्वं शान्तिः सर्वनगतां त्वं £
धायरी प्राणपोषिणी ॥३३॥ त्वन्तस्वरूपा भूतानां पञ्चानामपि सारकृत् ॥ त्वं हि नीतिभृतां नीतिव्य॑वसायस्वद्पिणी ॥३४॥ ध
गतिस्त्वं सामवेदस्य अन्थस्त्वं यषां हतिः ॥ ऋग्वेदस्य तथा माजाथर्वणस्य परा गतिः ॥ ३५ ॥ समस्तगीर्वाणगणस्य ॥६
शक्तिस्तमोमयी धातृशणेकदश्या ॥ रजः परपचाह्न भवैकहपा या न श्रुता भभ्यकरी स्तुतेह ॥ ३६ ॥ संसारसागरकरालम ॥2
वाङ्गदुःखनिस्तारकारितरणिश्च निवीतदहीना ॥ अश्ठद्गयोगपरिषालनकेखिदक्षां विन्ध्यागवासनिरतां प्रणमाम तां वै ॥३७॥ ॥
तथा उयकवत्ाय स्वरूपिणी हो ॥ ३४ ॥ सामवेदमे तुम गीतिंूप यजुदकी आहुति ओर प्रन्थिहूप हो ऋण्वेदकी मात्रा ओर अथर्वी ५
परागति हो ॥ ३५ ॥ सम्पूणं देवसमरहोकी शक्तिरप, तमःप्रधान धात्री गणोंकी एकही दश्यरूप, रजोशणके प्रपचमें एक भवहूपा हो जो |
हमने शाति घुनी है कल्याणकरी स्तुतिको पराप्त होती है ॥ ३६ ॥ करार संसारसागरे जो महान् दुःख है उनसे तुम निस्तारकरनेवाटी ||
निवीत ( नोकासंचारुक पाठनामका वञ्च ) रहित नौका हो, अष्टागयोगके प्राकनके घ्ि चतरा विन्ध्याचल पर्वतपर निवासत करनेबाटी |>
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रुभ्तं.१
पा.खं.३
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( हम भरणाम करते है ॥२७॥ जो प्रणियोके नासिका नेत्र भुल भुजा वक्षःस्थक मनोम ओर खलो धतिको धारण कराती है, जगतके ४
कल्याणक अर्थं उनमें निद्रा पसे प्रवृत्त होती है, वह संसारी स्थिति ओर पार्नाके निभि हमसे प्रसन्न हो ॥ ३८ ॥ ब्लाजी बोठे इस् ¢
भ्रकार जगदम्बा महेशानी उमाकी स्तुति कर सव देव प्रेमे उनके दशेनके निमित्त स्थित हुए ॥ ३९ ॥ इति श्रीशिवमहाष्राणभाषारीकायां
शद्रसंहितान्तग॑त-तृतीयपार्वतीखन्डे देवस्तुतिनौम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोरे जब इसप्रकार से देवताओंने बडे कष्ट दूर करनेवाटी £
दु्गीकी स्तुति की तब जगदम्बिका देवताओंके भागे प्रगट हुई ॥ १ ॥ प्रम अद्भुत रत्नोके दिव्य रथमे बेटी जिसमे शुदषण्टिका बेधी ट |
नासाक्िवक्वभुजवक्षसि मानसे च धृत्या सुखानि वितनोषि सदेव जन्तोः ॥ निद्रेति यातिसुभगा जगती भवानः सा नरसी ए
दतु भवस्थितिपालनाय ॥ ३८ ॥ ब्रनोवाच ॥ इति स्तुत्वा महेशानीं जगदम्बाघुमां , सतीम् ॥ सुप्रेयमनसः सवे तस्थुस्ते &
दशनेप्सवः ॥ ३९ ॥ इति < द्वितीयायां -स्रसंहितायां. तृतीये पावतीखंडे देवस्तुतिर्नाम तृतीयोऽध्यायः |£
॥ २ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्थं देवैः स्तुत् देवी इगां दुगार्तिनाशिनी ॥ आविश देवानां पुरतो जगदम्बिका ॥ १॥ रथे रतन ||
मये दिष्ये संस्थिता परमाद्भुते ॥ किकिणीजालसयुक्ते मृदुसंस्तरणे वरे ॥२॥ कोटिसूर्याधिकाभासरभ्यावयवभासिनी॥ स्वतेजो $
राशिमध्यस्था वरखूपा समच्छविः ॥३॥ अनरपमा महामाया सदाशिवविलासिनी ॥ अिशुणा निशंणा नित्या शिवखोकनिवा ¢
सिनी ॥ ९ ॥ ज्िदेव जननी चण्डी शिवा स॒वीतिनाशिनी॥ स्वमाता महानिद्रा स्वैस्वजनतारिणी ॥५॥ तेजोराशेः भरभावात्त ६
सा तु दक्वा सरेश्शिवा ॥ तुष्टुवुस्तां पनस्तेवे सुरा दशनकाक्षिणः ॥ & ॥ ¢
हुईं ओर मनोहर विदछोने षि थे ॥२॥ कोर्यके समान कान्तिमान् मनोहर अंग भत्यंगसे शोभायमान अपनी तेजोराशिके मध्यमे स्थित ||
वररपा समान छबिवाटी ॥३॥ उपमारहित् महामाया सदाशिवक साथ वास करनेवारी त्रिशणात्मिका नियैण नित्य शिवरोकमे निवास कर ||
नेवाढी ॥ ४ ॥ तीनों देवताओंको प्रगट करनेवाटी जननी चण्डिका, कल्याणदायिनी सव दुःखोको नाश करनेवाटी सबकी माता भहानिदया
सुव स्वजनोंको तारनेवाटी ॥५॥ उस तेजराशिके भभाक्ते देवताओंको शिवाकादशेन हुआ वे दशैनकी इच्छसे भगवतीकी फिर स्तुति करनेखगे॥६॥ |>
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॥१९०॥
| || तव विष्य आदि सव देवता भगवतीके द्शनकी इच्छासे पाको प्रात हो भगवतीके दशन करनेको समथ ह९।७॥त समय सम्पूण देवताओंको
बडा आनेद हु, बारंबार णाम कर भगवतीकी स्तुति करने कगे॥८॥ देवता बोटे है शिवे ॥ है शर्वाणि हि कल्याणको करने बाढी हे जगत्की
माता महेश्वरि तुम सब दुःखको वृर करनेवाली हो हम सब देवता तुमको प्रणाम करते है॥९॥हे देवी ! वेद शान्नभी तुम्हारी महिमाको स्षवंथा नही
जानसकते, तम्हारी महिमा ओर ध्यान हे शिवे ! बाणी ओर मनते प्रे ई॥१ ०॥उसको भटी प्रकार न जाननेसे निगम सदा चकित रहता है,
अथ देवगणास्सवे विष्ण्वाद्या दर्शनेप्सवः॥ ददशुजगदम्बां तां तत्कृपां पराप्य तदहि ॥७॥ बभुवानन्दसन्दोहस्सरवेषां ्रिदिषौक
साम्॥ पुनः पुनः प्रणेषुस्तां वष्टु विशेषतः ॥ ८ ॥ देवा उञः ॥ शिवे शर्वाणि कल्याणि जगद्म्ब मदैश्वरि॥ स्वां नता
स्सर्वथा देवा वयसर्वातिंनाशिनीम् ॥९॥ न हि जानन्ति देवेशि वेदश्शाच्लाणि कृत््शः ॥ अतीतो महिमा ध्यानं तव वाड्
मनसोशिशबे ॥ १० ॥ अतद्वयावृत्तितस्तां वै चकितं चकितं सदा ॥ अभिधत्ते छतिरपि परेषां का कथा मता ॥ ११ ॥
जानन्ति बहवो भक्तास्त्वत्कृपां प्राप्य भक्तितः ॥ शरणागतभक्तानां न कुञापि भयादिकम् ॥ १२ ॥ विज्ञतति श्रृणु सुप्रीता
यस्या दासास्सदाम्बिके ॥ तव देवि महादेवि दीनतो वर्णयामहे ॥१३॥ पुरा दक्षसुता भूत्वा संजाता इरवहभा ॥ ब्रह्मणश्च
परेषां वा नाशयत्वमकंमहत् ॥ १४ ॥ पित्रतोऽनाद्रं प्राप्यात्यजः पणवशात्तवुम् ॥ स्वलोकमगमस्त्वं वालभदुःखं
हरोऽपि दि ॥ १५ ॥ न दि जातम्परपूण तदेवका्य महेश्वरि ॥ व्याङ्कला सुनयो देवाश्शरणन्त्वां गता वयम् ॥ १६ ॥
₹०्.२ जव वैदकी यह दशा है तो दृत्रोकी कथा कया है॥३३१॥ हं तुम्हारी पाको प्राप्त होकर् कोड २ भक्तही तुम्हारी महिमाको जानते है शरणमे
पा.खं.३ आयेहुएको कहीं भी भय नहीं है॥१२॥ है जगदम्ब } अपने भक्ती प्रार्थना प्रमे सुनो देवि ! हम दास कया महिमा वर्णन करं जो कगे वह
अ०४. ||| द्ध होगी॥१ ३॥पहठे तुम दक्षकन्या होकर शिवकी भरिया हदं, बल्ञाका व दृप्तरोका गवं उप समय सर्वं हुआ ॥१४॥पितापे अनाद्रको प्राप्त
हो तुमने अपने प्राण व्याग किये, ओर अपने ठोकको चटी आई, इसमे शंकरको भी वडा दुःख हुआ ॥ १५॥ हे महेश्वरि ¡ उप्त समय भी
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। दवकार्थ पर्णं नही हआ, हम खनि देवता व्याङुढ होकर तुम्हारी शरणमे आये ई ॥१६॥ हे महेशानि ! आप देवताभेकि मनोरथ प्ण कीजिये,
ह शिषे ! जितत करसे सनतकुमारकैवचन सफठहं सो करो ॥१७॥ ह देवि! तुम फिर भी पृथ्वीम अवतार ठेकर शिवजीकी पनी बनो ओर यथा
¢ योग्य छीठा करो जिसे देवताओंको सुखहो॥१८॥ह देवि ! इसभकारते कैठा्ताचटभे स्थित शकर भी प्रषन्न होंगे सब सुखी हों ओर सब प्रकारे टै
दुःख नाश हजारे ॥१९॥ ब्रह्माजी बोठे इसपरकारसे विष्ण आदि प्रेमे युक्त हो भक्तिसे शिर छ्काये मौन हो खंडे रह गये ॥२०॥ शिवा भी
देवता्ओंकौ स्तृति सुनकर प्रसन्न दरदं ओर उस्र हेतुको विचार अपने प्रमु शंकरको स्मरण कर ॥२१॥ उस्र समय उमा देवी सब देवताओंको ¢
पूण छर महेशानि निज॑राणां मनोरथम् ॥ सनत्छुमारवचनं सफं स्याद्यथा शिव्॥ १७ ॥ अवतीय कषितौ देवि शूढपत्नी पुन
भेत्॥ लीलां कङ् यथायोग्यं प्राप्नुयुरनि
जरास्सुखम् ॥ १८ ॥ सुखी स्यादेवि शद्रोऽपि केकासाचलसंस्थितः ॥ सवे भवन्तु
सुखिनो दखं नश्यतु कृत्स्नशः ॥ १९ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति
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५ ् त. भोच्यामरास्सवें विष्ण्वाययाः परमसंङ्खाः ॥ मौनमास्थाय
%|| सतस्थुभक्तिनघ्रात्मयूतेयः ॥.२०॥ शिवापि सुप्रसत्नादाकर्ण्यामरसंस्तुतिम् ॥ आकलय्याथ तदेतु संस्मृत्य स्वप शिवस्
|| ॥ २० ॥ उवाचोमा तदा देवी सम्बोध्य विदुरा तान् ॥ विदरः
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( | य मापतिसुखान्सद्या भक्तवत्सला ॥ २२ ॥ उमोवाच ॥ हं
हरे दे विषे देवा युनयश्चगतव्यथाः ॥ सवे शणत मद्वाक्यं परसननाहं न संशयः ॥२३॥ चरितं मम सर्वच प्रैरोक्यस्य सुखाव
इम् ॥ कृतं मयव सकर दक्षमोदादिकं च तत् ॥ २९ ॥ अवतारं करिष्यामि क्षितौ परण न संशयः ॥ बहवो हेतवोऽप्यत्
तद्वदामि महादरात् ॥२९५॥ पुरा हिमाचलो देवा मेना चा
रा हिमा तिसुभक्तितः ॥ सेवां म चक्रतुस्तात जननीवरसतीतनोः॥ २३ ॥
सम्बोधनकर बोटी वह भक्तवत्सृठा हंसकर विष्णआदिे कहने ठगी ॥ २२ ॥ भगवती बोली
8 6 त है हरि! हे ब्रह्मा ! हे देव ! हे शुनियों ! तुम
दुःखरहितहो जाओ निःसन्देह मं भ्सन्न हूं तुम सव कोई मेरे वचन सुनो॥२३॥मेरा चरित्र बिलोकीको सुख दनेवाखा है दक्षको जो भोह हु
यह सब मेनेही किया है ॥२४॥ इसमे सन्देह नहीं किं मे पृथ्वीम अपना पणे अवतार करूगी इसमें बृहुतसे हेतु हसो आद्रे तुमसे कहती
भेरी सेवा की थी ॥ २६ ॥
हू ॥ २५ ॥ पटे हिमाचछ ओर उनकी श्लीने बड प्रेमे सतीशरीरसे माता पिताक समान
९१
इस समय भी भक्तिते भेरी सेवा करते है ओर विशेष कर एत्र मेना मेरी सेवा करती है, इसमे
सन्देह नहीं ॥२७॥ अव रुद्र तथा दूपे
देवता जावो भै हिमाठ्यके धर भगट हृगी उस समय उनके सब दुःख नाश हो जा्येगे॥२८॥अब तुम सब अपने अपनेस्थानोपर जाकर सुख
पाओ गे मेनाकी कन्या होकर उसको सुख दृगी.॥ २९ ॥ यह भेरा यपत मत है किं भ शिवकी पत्नी हूंगी, शिवकी टटा बही अदु हैजो
जञ नियोको भी मोहित करती है ॥३०॥ हे देवताओं ! जब कि ने दक्षकी कन्या होकर पितासे अनाद्र पाकर उत्क यज्ञमं जाकर अपने
इदानीं $रुतस्सेवां सुभक्त्या मम नित्यशः ॥ मेना विशेषतस्त स॒तात्वेना् संशयः ॥ २७ ॥ रूढो गच्छतु यूयं चाव
तारं दिमवद्हे ॥ अत्वावतरिष्यामि दुःखनाशो भविष्यति ॥ २८ ॥ सवे गच्छत धाम स्वं स्वं सुखे छभतां चिरम् ॥ अव
तीर्थं सुता भूत्वा मनाया दास्य उत्स॒खम् ॥ २९ ॥ हरपत्नी भविष्यामि सुप्ते मतमात्मनः ॥ अद्धृता शिवलीला दि ज्ञानि
नामपि मोहिनी ॥ ३० ॥ यावत्प्रभृति मे त्यक्ता स्वतवुदैक्षजा सुराः ॥ पितृतोऽनारदं दृटा स्वामिनस्तत्करतौ गता ॥ ३१ ॥
तदाप्रभृति स स्वामी रुदः कालाभ्िसंज्ञकः ॥ दिगम्बरो बभूवाञ्च मञ्चिन्तनपरायणः ॥ ३२ ॥ मम रोषं कतौ दृष्टा पितु
स्तञ्च गता सती ॥ अत्यजत्स्वतयं प्रीत्या धरसज्ञेति विचारतः॥ ॥ ३३ ॥ योग्यभूत्सदनं त्यक्ता कृत्वा वेषमरोकिकम् ॥
न सेहे विरहं सत्या मद्रूपाया महेश्वरः ॥ ३७ ॥ मम हेतोर्महादुःखी स बभूव कुवेषभत् ॥ अत्यजत्स तदारभ्य कामजं
सुखभरत्तमम् ॥ ३५॥ अन्यच्छरणुत हे विष्णो हे विषे श्ुनयः सराः ॥ महाप्रभोमेदेशस्य लीलां अुवनपालिनीम् ॥ २६ ॥
स्वामीके निमित्त अपना शरीर याग दिया ॥ ३१ ॥ उस्र समय वह हमारे स्वामी काटाभिरूप हो दिगम्बर रहते हुए मेरो चिन्ताही करते ह
॥२२॥ पिताक यज्ञम गई सतीने मेरे ऊपर रुष्ट दक्षके रोषे शरीर त्याग दिया इसे भेरी प्रीति है ओर धर्ज्ञताको विचार कर वे बडे दुःखी होते ई।३३॥
अपने योग्यस्थाको व्यागनकर अछोकिंक वेष किये सुज सतीरूपके वियोगको शिवजी योगी होकर भी नहीं सहस्षकते हँ ॥ ३४ ॥ मेरे निमित्तही
कुष धारणकर वह महा दुःखी हए उसी दिने उन्होने सब कामे उत्पन्न हए उत्तम सुखोको व्याग दिया है ॥३५॥ हे विष्ण ! हे विधाता ।
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है देवता ! खनियो ओर भी महामु महेशजीकी भुवनपाडिनी टीरा सुनो ॥ ३६ ॥ वह परमे मेरी अस्थियोके पवित माराको प्रेमसे गरेमे ठ
धारण किये भी कहीं शान्तिको नहीं भाप होते ओर निरन्तर जागृत रहते ई ॥ ॥ ३७ ॥ ओर अनीशके समान वह प्रमु इधर उधर ऊचे
स्वरसे रोदन करते ई योग्य अयोग्यके ज्ञाने रहित सर्वदा सरवर भ्रमते रहते है ॥ ३८ ॥ इतस प्रकार कामियोकी गति दिखाते हुए ठ
टीढा करते है, ओर विरहे व्याकुल हो कामियोंकी समान वाणी बोरे है ॥ ३९ ॥ वास्तवम प्रभु विकाररहित दीनतारहित अजित अवि ठ
नाशी परमेश्वर है वह परिषूणं स्वामी शिव मायाके अधीश्वर सवके अधिपति है ॥ ४० ॥ नही तो मोह ओर कामे उनको क्या प्रयोजन है ठ
विधाय मालं सुप्रीत्या ममास्थ्नां विरहाङुलः॥ न शान्ति प्राप ङचापि प्रबुद्धोऽप्येक एव सः॥३७॥इतस्ततो रूरोदोचैरनीश ठ
इव स प्रथुः ॥ योग्यायोग्यं न बुधे भ्रमन्सर्वतर स्वदा॥३८॥ इत्थ लीलां दरोऽकार्षीदर्शयन्कामिनां पुः ॥ उवे काञ्चकवद्वाणीं
विरहव्याङ्कलामिव।॥३९॥ वस्तुतोऽविकृतोऽदीनोऽस्त्यजितः परमेश्वरः॥ प्रिप्रणः शिवः स्वामी मायाधीशोऽखिटेश्वरः॥४०॥ ट
अन्यथा मोहतस्तस्य कि कामाच्च प्रयोजनम् ॥ विकरेणापि केनाशु मायाछित्तो नस प्रथुः॥४१॥ श्द्रोऽतीवेच्छति विभुस्स मे |९
कर्तं कर्रहम् ॥ अवतार॑क्षितौ मेनादिमाचलगरे सराः ॥ २ ॥ अतश्रावतरिष्यामिरुदरसन्तोषहेतवे ॥ हिमागपल्न्यां मेनाया ॥©
लौकिकीं गतिमाधिता ॥४३॥ भक्ता शृ्रप्रिया भूत्वा तपः कृत्वा सुदुस्सदम् ॥ देवकार्यं करिष्यामि सत्यं सत्यं न संशयः
॥४६॥ गच्छत स्वगरहं सवे भव भजत नित्यशः ॥ तक्करृपातोऽखिलं दुखं विनश्यति न संशयः ॥ ४९ ॥ ट्
किसी ककार ओर मायासे वह भमु छित नहीं है ॥ ४१ ॥ वह प्रभु दर मेरा पाणिग्रहण करनेकी इच्छा करते है, हे देवताओ मेँ हिमाचस्कै ट्
ट
धरम जाके अवतार हूंगी ॥ ४२ ॥ रुद्रके सन्तोष निमित भँ अवतार हरंगी, हिमाख्यकी पतनी भेनामे लौकिक गति दिखाऊंगी ॥ ४३ ॥
भक्तिते रद्रकी प्रिया होकर ओर महातपस्या करके देवताओंका कार्थं की इसमे सन्देह नहीं यह सत्य है ॥ ४४ ॥ तुम सब देवता अपने
रस्थार्नको जाओ ओर शकरका भजन करो उनकी पासे ही सव दुख दूर हो जार्थगे इसमें सन्देह नहीं ॥ ४९५ ॥
शि ०४० |||६|| उन छपाङ्की कपासे सदा मंगठ होगा मँ उनी जाया होकर तरिढोकीमे बंदिव ओर पूजित होजाऊगी ॥४६॥ एसा कहकर वह जगदम्बा देवता
॥१९२ || देखते देखते अन्तर्षान होकर अपने छोकको भप्त होगई॥ ४७॥ विष्ण आदि स्व देवता ओर सुनि मस हो उस दिशाको पणाम॒कर अपने रस्थार्नोको
गये ॥४८॥ हे खनीश्वर । इसभकार तुमसे दुर्गाका चरित्र वभेन किया जो मण्य सदा सुखदेनेवाढा तथा भक्ति क्तिका देनेवाठा १।५९॥ लो एष
नित्य सुनते वा भक्तिसे सुनाते है जो पढते वा पढाते है वे सब कामनाओंको परापत होते है॥५०॥इति शरीशिवमहाषराणभाषारीकायां ररसंहितारगेत तृतीय
|
भविष्यति कृषपालोस्त॒ कृपया मेगरं सदा ॥ वन्या पूज्या बरिरोकेऽदं तनायेति च हैत॒तः ॥४६॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता जग ¢
द्म्बा सा देवानां पश्यतान्तदा॥ अन्तद॑धे शिवा तात स्वं लोकम्प्राप वे ्रतम्॥९७। विष्ण्वादय् स्सुरास्सव सुनयश्च मुदान्विताः |£
¢| कत्वा तदिशि संनामे स्वस्वधामानि संययुः ॥४८॥ इत्थं दर्गासचरितं बणितं ते षनीशवर॥ सर्वदा खखदं नृणां युत्तिसक्तिम्रदा ||
¢| यकम् ॥४९॥ य इदं शरणुया्रित्य श्रावयेद्रासमादितः॥ पेद पाठयेद्वापि सर्वान्कामान बाप्तुयात् ॥५०॥ इति भरीशिवमहा ||
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| पुराणे द्वितीयायां श्दरसंहितायां तृतीये पावतीखंड देवसान्त्वनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥७॥ नारद् उवाच ॥ अन्तदितायान्देष्यां
त॒ दर्गायां स्वशेष च ॥ गतेष्वमरदृनदेषु किमभूत्तदनन्तरम्॥ 3 ॥ कथं मेनागिरीशौ चतेपाते परमन्तपः ॥ कथं सुताऽभव
¢| त्तस्य मेनायान्तात तद्वद् ॥ २॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ विप्रवर्य तश्र शरण तच्चरितं महत् ॥ प्रणम्य शंकरं भक्त्या वच्मि
रसं. २ भक्तिविवर्धनम् ॥ ३ ॥ उपदिश्य गते तात सुखधृन्दे गिरीश्वरः ॥ दर्यादौ मेनका चापि तेपाते परमन्तपः ॥ ४ ॥
४६
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पा.सं.३ || || पारवतीखंड देवसान्तवनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ नारदजी बो जन भगवती दुगा अन्तर्धान होकर अपने स्थानको गई ओर देवसमूह भी अपने २
५6|| स्यानको गया तव क्या हआ॥ १।भेना ओर हिमाखयने किंसभरकार प्रम तप किया ओर भगवती किततभकार उनकी सुता हृदं सो आप् हमसे किये
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९६|| ॥२।॥ बरह्ाजी बोछे हे ्रियवरयं ! हे श्रष्टपुत्र! इस चरित्रको सुनो मँ शिवजीको रणामकर उस भक्तिवद्धन चरित्रको कहताहूं ॥ २॥ जब देवता हिमाख्य
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ओर मैनाको उपदेश देकर चके गये तब हिमाख्य ओर मेना विष्णकी आज्ञासे महा. तप करने र्गी ॥४॥ दोनों शी परुष दिनरात शिबा 4
ध्यान् करते हुए भक्तियुक्तं चित्ते भटी प्रकार आराधना करने ठगे ॥५॥ गिरिंकी प्रिया बडी भसन्नतासे शिवजीके सहित भगवतीको पूजनकर
बाह्मणोके सन्तोषके निमित्त बराहणोंको दान देने ठगी ॥६॥ चेत्रमासकै आरभसे सत्तास वर्षतक पत्री होनेके निषित् बराबर शिवाकौ आराधना
कृरती रही ॥७॥ अष्टमीको उपवास करके नवमीकै दिन मोदक पिद्ी खीर गन्ध एष्पोमे भगवतीकोपूजा ॥८॥ गंगातटवतीं ओौषधिभरस्थपर शिव
अदनिंशं शिवां श
मु चिन्तयन्तौ च दम्पती ॥ सम्यगारेधतुनित्यं भक्तियुक्तेन चेतसा ॥ « ॥ गिरिपरेयातीवशरदानस देवीं
शिवेनसा॥दानन्ददौ
दिजेभ्यश्च सदा तत्तोषरेतवे॥६॥चेनमासं समारभ्य सपर्विंशतिवत्सरान् ॥ शिवां सम्पूजयामासापत्त्या
िन्यन्वहं रता॥७॥अष्म्याुपवासन्तु कृत्वादान्नवमीतिथौ। मोदकेषैरिपिषठेश्च पायसेर्गन्यपएष्पकैः ॥८॥ गङ्गायामौषधिभरस्थे
कृत्वा सूति मदीमयीम्॥उमायाः पूजयामास नानावस्पुसमपेणेः॥९॥ कदाचित्सा निरादारा कदाचित्सा धृतब्रता॥कदाचित्पव
नाहारा कदाचिनरधुर््यभरत् ॥१०॥ शिवाविन्यस्तचेतस्का सतुरविंशतिवत्सरान्॥ निनाय मेनका प्रीत्या परं सा श्रष्टवच॑सा
॥११।सत् विंशतिवर्षन्ते जगन्माता जगन्मयी॥ सप्रीताभवदत्यथ॑ष्ुमा शंकरकामिनी॥१२॥अलगरहाय मेनायाःपुरतःपरमेश्वरी
॥ आविर्बभूव सा देवी सन्तुष्ठा तत्सुभक्तितः।॥ १३ दिव्यावयवसंय॒क्ता तेजोमण्डलमध्यगा ॥उवाच विहसन्ती सा मेनां पत्यं
षतां गता ॥१७॥ देव्युवाच ॥ वर बरूहि महासाध्वि यत्ते मनसि वतते ॥ सुपरसप्ता च तपसा तवाहं गिरिकामिनि ॥१९॥
मुक्त भगवतीकी मृन्मयी मूतिं बनाकर अनेक वस्तुओंको समर्णकर भगवतीफी पूजा करने ठगी ॥९॥ कभी निराहार रहजाती कभी वत धारण
कृएती कमी प्वनके आहारसेरहनाती कमी जठमाजके आहारते रहती ॥१०॥ इसभकार शिवशिवारभे मन गाये पवात् अखंड सना वषं मनाते
निराहारही रहकर प्रमभक्िपूर्वक विता दिये ॥११॥ सत्ताईैल व्षके पीछे जगन्मयौ जगन्माता उमा शंकर भिया मेनाप्र मकनन हुड ॥१२॥ उ्षकी ठ
भक्तिसे सन्तुष्ट हो परमेश्वरी अनुधह करने निमित मेनाके आगे भगट हुईं ॥१३॥ दिभ्य अवयवे संयुक्त तेजोमण्डलके मध्यमं स्थित दती हृदं
भयकषहो मेनाते बोठी ॥१४॥ देवी बोटी हे महात्ताभ्वि! जो तुम्हारेमनर हो सो वर मांगो है गिरिकाभिनि। मँ तुम्हारी तपस्या भक्षं ॥१५॥
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शि०पु°
हे मेना तपोवत समाधिते जो तमने परार्थनाकीषहै जो जो तुमको वांछित होगा सो मँ तुमको सव दरंग ॥१६॥ तव मेनका देवी भगवतीको प्रत्यक्ष ध
॥१९२॥
देखकर भरणाम करके इस भकार कहने छगी ॥१७॥ मेना बोरी हे देवि मैने इस समय आपका रप प्रत्यक्ष देखा है भ तुम्हारी स्सुति करनकी
इच्छा करती हूं हे काठके ! तुम परसन्न हो ॥१८॥ ब्रह्माजी बोठे जब इस प्रकार मेनाने कहा तव सबको मोहनेवारी भगवती प्रसन्न हौकर
अपनी दोनों भुजाओं मेनाको आर्टिगन करती भं ॥१९॥ तब मेनका मृहाज्ञानको परा हौकर शिवाशक्तिको पक्ष देखकर प्रम् भक्तिसे ट
यत्प्रार्थितं त्वया मेन तपोवतसमाधिना ॥ दास्ये तेऽहं च तत्सर्वं॑वाच्छितं यद्यदा भवेत् ॥ १६ ॥ ततस्सा मेनका देवीं ¢
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मरत्यक्षां कालिकान्तदा ॥ दक्षा च प्रणनामाथ वचनं चेदमव्रवीत् ॥ १७ ॥ मेनोवाच ॥ देवि प्रत्यक्षतो रूपन्दषन्तव मया
ऽधुना ॥ त्वामहं स्तोत॒मिच्छामि प्रसन्ना भव कालिके ॥ १८ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथ सा मेनयेस्युक्ता कालिकासूर्वमोहि र
` नी ॥ बाहुभ्यां सुपरसत्रात्मा मेनकां परिषस्वजे ॥ १९ ॥ ततः प्राततमदाज्ञाना मेनका कालिकां शिवम् ॥ त्टाव वाग्भिर ॥९
मिर्भक्त्या प्रत्यक्षतां गताम् ॥ २० ॥ मेनोवाच ॥ महामायां जगद्धा्ीं चण्डिकां लोकधारिणीम् ॥ प्रणमामि महादेवीं |
सर्वकामा्थदायिनीम् ॥ २१ ॥ नित्यानन्दकरी मायां योगनिद्रां जगत्प्रसूम् ॥ प्रणमामि सदा सिद्धां ्ुभसारसमाखिनीम् ¢
॥ २२ ॥ मातामही सदानन्दां भक्त शोकविनाशिनीम् ॥ आकल्प वनितानां च प्राणिनां उुद्धिरूपिणीम् ॥ २३ ॥ सा स्वं |£
बंधच्छेद् हितुय॑तीनांकस्ते गेयो माहशीमिः प्रभावः ॥ हिंसाया वाथरवैवेदस्य सा त्वं नित्यं काम त्वं ममेष्ठं विधेहि ॥२४॥ £
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₹९०से.२
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भरसन्न करने ठगी ॥२०॥ मेना बोी महामाया जगद्धात्री चण्डिका टोककी धारण करनेवाटी महादेवि ! सव काम ओर अथकी देनेवाखीको
म भरणाम करती हं ॥२१ ॥ नित्य आनन्द करनेवाटी माया योगनिद्रा जगतकी उत्पन्न करनेवाटी सिदधस्वशप दिव्यकमलोकी मारा
वाठीको भणाम् करती ह ॥२२॥ माता तुमह सदा आनंदहूपिणी भ्छोके शोक दूर करनेवाटी कल्पपर्यन्त च्लीजनों तथा प्राणियोकी बुद्धि
रूपिणी हो॥२३॥ परी तुम यति्योके वधन छेदन करनेवाी हो स॒ज्ञ सरीखी कोन तुम्हारा भमाब जान सकती है हिसा वा अथवेदं नित्य स्थित
शुक्ति तुम सदा तित्यहपाहो, स॒मयपर आप योगयुक्त ओर समथ हो॥२५॥जगत्का कारणरूप ओर जगतको धारण करनेवाटी तुमही हो तुमही
परेश परे निव्प्रति हो जिन प्रकारसे तुम बहमहपको वशीभूत करती हो हे माता ! तुम निव्यहप हो भेर ऊपर प्रसन्न हो ॥ २६ ॥ तुमही
अश्रिमे उम शक्तित वतेमान ह तुमही दाहिका ओर सुरयकी किरणोकी उग्रशक्ति हो चन्द्रिका ( चांदिनी ) मृ आह्ादक शक्तिहो आप
हो मे तुमको रणाम करती हू ॥ २७ ॥ श्रियम सलिय। तुमहो ऊ्वरेतसोकी ध्यानगम्पा तुमहो सब जगतकी रवाछनीयहौ तुमही हस्किी
नित्यानित्थेभावदीनेः परास्तेस्तत्तनमरर्योज्यते भूतवगः ॥ तेषां शक्तिस्त्वं सदा नित्यश्पा काले योषा योगयुक्ता समर्था
॥२९॥ योनिर्धरिची जगतां त्वमेव त्वमेव नित्या प्रकृतिः परस्तात् ॥ यथा वशं करियते बरह्मपं सात्वं नित्या मे प्रसीदाय
मातः ॥२६।त्वं जातवेदोगतशक्तिस्मा त्वं दादिका सूर्यकरस्य शक्तिः ॥ आह्ादिका त्वं बहुचन्दिका या तान्त्वामहं स्तौमि
नमामि चण्डम् ॥ २७ ॥ योषाणां सत्पिया च त्वनित्या त्वं चोर््वरेतसाम्॥ वांछा त्वं सर्वजगतां धाया च त्वं यथा हरः
॥२८॥ या चेष्टरूपाणि विधाय देवी सृष्िस्थितानाशमयी चकं ॥ ब्रहमच्युतस्थाणशरीरदेतस्सा त्वं रसीदाय पुनर्नमस्ते
॥२९॥ ब्रह्मोवाच ॥ तत इत्थं स्तुता दुगां कालिका पुनरेव हि ॥ उवाच मेनकां देवीं वांछितं वरयेत्युत ॥३०॥ ॥ उमोवाच ॥
भाणाभ्रया मम त्वं हि दिमाचलविलासिनी ॥ यदिच्छसि धुवन्दास्ये नादेयं विद्यते मम ॥ ३१ ॥ इति त्वा महेशान्याः
पीयूषसदशं वचः ॥ उवाच परितुष्टा सा मेनका गिरिकामिनीं ॥ ३२ ॥ ¦
मायाहो ॥ २८ ॥ हे देवि ¡ आप इष्रपोको धारण करक सृष्टिकी स्थिति पान ओर संहार करती हो ओर बहा विष्य महेश्वरके
शरीर्ोका हेतु हो सो तुम मेरे ऊपर भरस्न हो तुमको वारेवार प्रणाम है ॥ २९ ॥ बह्लाजी बोरे जब भगवतीकाछिकाकी इत्भरकारसे स्ठति ठ
की तव भगवतीने मेनासे कहा तुम वर मागो ॥ ३० ॥ देवी बोटी ! हे हिमाचर्षिासिनि त्म सङ्ञे भागोके स्मान प्यारी हे जो इच्छा |©
करोगी वह अवश्य दुंगी तुम्हारे चयि सुक्षे कोई वस्तु भी अदेय नहीं है ॥ ३१ ॥ इसप्रकार भगवतीके अभृतके समान वचन सुनकर सुष्ट हे ||
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ठम मेरी कामना ओर इको बरिधान करो ॥२४॥ नित्य अनित्य भावहीनो परास्त उनउनकी मात्राओंसे प्राणिवर्गौको युक्तं करती हो उनकी \
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प्रसन्न हो बोटी ओर रसती हई मेनाका मनोरथ पणे करती बोटी ॥ ३७ ॥ देवी बोटी तुम्हारे सौ पत्र बडे विक्रमशाटी होंगे जिसमे एकं
आपकी जयहौ जोम
गिरिकाभिनी भगवतीकते बोटी ॥ ३२ ॥ भना बोरी हे शिषे ह महाचतुरे ! हे महेश्वरि ! ह जगदम्बिका भवानी ¡ आपव
बरके योग्य हं तो आपसे वर मांगती हू " ३३ ॥ हे जगदम्बिके एक वर तौ यहं है किंमेरे सौ एत्र बडी आयुवाे वीयवान् +
सक्त हो ॥ २४ ॥ पीछे एकं उतरी रूप यगसम्पन्न दोनों कुर्क आनेदकरनेवाटी त्रिलोकी पूजित हौ ॥ ३५ ॥ हे शिवे ! दवा
निमित्त तुम हय भेरी सुता हो हे अभ्विकै रुद्पत्नी होकर तुम रीढा विस्तार करो ॥ ३९६ ॥ ब्रह्माजी बोठे मेनाके यह वचन सुनकर दवी
मेनोवाच ॥ शिवे जयजय प्राज्ञे महेश्वरि भवाभ्बिके॥ वरयोग्यास्महं चेत्ते वृणे भूयो वरं वरम्॥३३॥ पथम शतपुत्रा मे भवन्तु
जगदम्बिके॥वहायुषो वीर्यवन्त ॐद्धिसिद्धिसमन्विताः ॥३४॥ पश्वात्तथेका तनयास्वहूपशणशाछ्नी ॥ कल्दरयानंदकरी थुवन
जयपूजिता ॥३९॥ सता भव मम शिवे देवकार्याथ॑मेव हि ॥ रूदपत्नी भव तथा लीलां र् भवाम्विके ॥३९॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥
तच्छत्वा मेनकोक्तं हि प्राह देवी प्रसन्नधीः ॥ स्मितपूै वचस्तस्याः पूरयन्ती मनोरथम् ॥३७॥ ॥ देच्छुवाच ॥ शतपुतरास्सं
भवन्तु भवत्या वीर्यसंथुताः॥ तवरको बलवान्युख्यः प्रथमे संभविष्यति ॥३८॥ सुताहं संभविष्यामि सन्तुष्टा तव भक्तितः ॥ देव
कार्यं करिष्यामि सेविता निखिलेस्सरेः ॥३९॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवदुक्त्वाजगद्धाजरी कालिका परमेश्वरी॥ पश्यन्त्या मेनकायास्तु
तवेवान्तरदपे शिवा ॥४०॥ मेनकापि वरं रुष्ध्वा महेशान्या अभीप्सितम् ॥ खुदं प्रापामितां तात तषःङेशोप्यनश्यत॥४१॥
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खख्य बडा बी पथम होगा ॥३८॥ तुम्हारी मक्त प्रसन्न हई यै तुम्हारी सुता हूंगी ओर देवताओंति सेवित होकर देवकायं करगी ॥३९॥
बहा बोरे कालिका प्रमेश्वरी जगद्धात्री यह वचन कहकर भेनकाके देखते देखते अन्तर्धान हो गई ॥ ४० ॥ मेना भी महेशानीसे इच्छित
व्रको भाप होकर बडे आनन्दको प्राप्त हृद ओर तप का हेश भी निदत्त होगया ॥ ४१ ॥
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वह सती प्रसन्न हो उस्न दिशाको नमस्कारकर जयशब्द उच्चारण करती अपने स्थानें आई ॥४२\॥ ओर अपने पतिसे बरकी बात अपने मुखकी प्रसन्न ठ
ताके चिहसे पहटेहौ कहीगडकफो एनः वचनोसे कहा ॥ ४३ ॥ एते भेनाके वचन सुनकर शेकराज बडे भस्तन्न हूए ओर शिवाम भक्षित
करनेवाली मेनाकी बडी प्रशंसा की ॥ ४४ ॥ हे सने ] फिर समयपर उन्हीके सुरत प्रवृत्त होनेसे मेनाके गभे रहा ओर प्रतिदिन बढने ४
ठ्गा ॥ ४५ ॥ समयपर् उ्तने नागवधूओंको भोगनेयोग्य पुत्रको उत्पन्न किंया जिस मेनाकं नामके एुत्रने सुद्रसे मित्रता की ॥ ४६ ॥ जि ¢
समय इन्दर परवतोंपर कुद हुए थेउपतसमयमी उस्ने इनदरके वजके घावोकी ठयथा नहीं जानी, हे नारद ! वजे ओरोके पक्ष कटि गये पर इक पष
दिशि तस्यां नमस्कृत्य सुप्रहष्टमनास्सती ॥ जयशब्दं परो्चरती स्वस्थानम्प्रविवेश् इ ॥४२॥ अथ तस्मे स्वपतये शशंस सुवरं ए
च तम् ॥ स्वचिहञुद्धमिव वे सुवाचा एनरुक्तया ॥ ४३ ॥ धत्वा रलपति्ठोऽभवन्मेनावचो र तत् ॥ प्रशशंस भियां ॥६
प्रीत्या शिवामक्तिरतां च ताम् ॥ ४४ ॥ कालक्रमेणाऽथ तयोः प्रवृत्ते सुरते शने ॥ गर्भो बभूव मेनाया वद्षे प्रत्यहं च |©
सः ॥ 8५ ॥ असूतसा नागवधूपभोग्यं स॒तसुत्तमम् ॥ समुद्रवदयसत्सख्यं मेनाकामिधमद्धतम् ॥ ७६ ॥ वरृजशथावपि कढे ||
वेदनार सपक्षकम् ॥ पविक्षतानां देवप पक्षच्छिदि. वराङ्गकम् ॥ ४७ ॥ प्रवरं शतपुत्राणां महाबलपराक्रमम् ॥ स्वोद्धवानां £
मदीध्राणां परवतन्द्रकधिष्ठितम् ॥ ४८ ॥ आसीन्महोत्सवस्तत्र दहिमाचलपुरेऽद्धतः ॥ दम्पत्योः प्र्ुदाधिक्यं बभूव हेशसंक्षयः ध
॥४९॥ दानन्ददौ द्विजातिभ्योऽन्येभ्यश्च परददौ धनम् ॥ शिवाशिवपददन्द्र सनेहोऽपरदधिकस्तयोः ॥५०॥ इति श्रीशिवमहा
पुराणे द्वितीयायां ₹° सं ° तृतीये पार्वतीखंडे मेनावरलाभवर्णनो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ ठ
वतमान ही है ॥ ४७ ॥ महाबली महापराकमी सौ प्रमे यही भेष् हभ ओौर पत्र हिमाटयके सब इसी प्रकार भरगट हुए ॥ ४८ ॥ उस्रस्षमय ६
हिमाठयके परमे बडा उत्सव. हुआ? दोनों ल्ली परुष आनेदित हए, क्रेशनाश हुआ ॥ ४९ ॥ ब्राहमणोंको दान ओर दूरे दविजोको अनेकं |
भकारते धन दिये ओर दोर्नोका शिव शिवाके चरणोमे बडा ज्ेह हआ ॥ ५० ॥ इति शीशिवमहाषराणे भाषाटीकायां रबरसंहितान्तगततृतीय ए
पावंतीखण्डे मेनावरराभवणेनो पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
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बहयाजी बोटे कुठ काठ बीतनेपर दोनों वीएरुषोने भक्तिसे जगदम्बिका स्मरण किया, कि वह देवका्यके निमित हमारे गर्हा 1
गट हों ॥ १ ॥ योगसे अपना शरीर त्याग कर सतीने मेनाके यहां प्रगट होनेकी इच्छा कौ ॥ २ ॥ “वह भकेननमरात सव कामना
देनेवारी है अपना वचन स्त्य करनेके निभितत पूणांशते दिमाठ्यके विततम महेश्वरीने प्रवेश किया ॥ २ ॥ अपू कान्तिसे उस. समय
मेनाकी भी शोभा इई, उत्त समय हिमाख्यका तेजभी अभरिके समान स्वको दुर्पे होगया ॥ ४ ॥ तव गिरिराजने वहं शिवाका पूणं अशा
समामिद्ारा सुसतमयते अपनी भिया मेनाम धारण किया ॥ ५ ॥ देवीकै प्रसादे हिमारयकी पत्नीने उसी समय गमं धारण किया, वह
॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथ संस्मरतर्भक्तया दम्पती तौ भवाम्बिकाम् ॥ प्रसूतिदैतवे त्न देवकार्यार्थमादशत् ॥१॥ ततस्सा चण्डिका
योगास्यक्तदेहा पुरा पितुः ॥ इहया भवित भ्यस्समच्छ्विरिदारतः ॥२॥ सत्यं विधातं स्ववचः प्रसन्नाखिलकामदा ॥ पूरणा
शाच्छेलचित्ते सा विवेशाथ महेश्वरी ॥ ३ ॥ विरराज ततस्सोतिप्रमदोपूर्वसुह्यतिः ॥ इताशन इवाधृष्यस्तेजोराशिमंहामनाः
॥ ४ ॥ ततो गिरिस्स्वप्रियायां परिपूर्णं शिवांशकम् ॥ समाधिमत्वा्समये समधत्त सुशंकरे ॥ ५ ॥ समधत्त गिरेः पत्नी
गर्भ देव्याः प्रसादतः ॥ चित्ते स्थितायाः करूणाकरायाः सुखदं गिरेः ॥ & ॥ गिरिप्रिया सर्वेजगत्िवासासंश्रयाधिकम् ॥
विरजे खतरां मेना तेजोमण्डल्गासदा ॥ ७ ॥ सुखोदयं स्वभतंश्च मेना दौहदलक्षणम् ॥ दधौ निदानन्देवानामानन्दस्ये
प्पितं ञ्चभम् ॥ ८ ॥ देह सादादसंपूर्णभरूषणा रोधसंसुखा ॥ स्वर्पभेन्दुक्षये काटं विचेष्यक्षा विभावरी ॥ ९ ॥
करुणामयी इस प्रकार पर्षतराजके चित्तम सब सुख देनेवारी स्थित हो हिमाटयकी पत्नीके हृदयमे प्राप्त हई ॥ £ ॥ तव वह गिरिषिया
सब जगत्की निवास भूताके प्राप्त होनेसे तेजोमण्डलके मध्य स्थित ॒होनेसे अधिक शोभायमान हदं ॥ ७ ॥ अपने स्वामीसे प्राप्त होने
योग्य मेनाने उस गभ॑लक्षणको जो सव देवताओंको आनन्द स्वप ओर ईप्सित जैसा था धारण किया ॥ ८ ॥ देहके दर्ग होजानेसे
उस्ने अपने बहूतसे आभुषण उतार धरे, टोधरकै समान उस्षका युखमण्डल श्वेत होगया जेसे भभात काठके समय रात्रिका चन्द्रमा श्वेत
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| होजाता हैओौर गिनने योग्य थोडे तारे हो जाते ह ॥ ९ ॥ मद्वीकी गंधिवाठे उसकै खखको एकातमे सैष कर गिरिराज तृत्तिको प्राप न् हुए, ]] ६
ओर बडे आनंदको पराप्त हए ॥ १० ॥ ओर बारंबार मेनाकी सखीसे गिरिराज पुछने ठगे किं मेनाकी किस वस्तुभ इच्छा है भेरी ठज्जासे ||
| कुछ नहीं बताती तुम पृष्ठो ॥ ११ ॥ इस प्रकार दोहदकै कष्टसे पार होकर जो -जो मेनाने इच्छा की मो सो भराप्त हआ देखा कारण कि ट
गिरराजको स्वगेमं भी कोटं वस्तु असाध्य नहीं थी ॥ १२ ॥ फिर पष्ट अवयववाटी वह गभव्यथासे पार हो मेना हरे प्तोमे युक्त बाठठताकै ट
समान शोभाय मान हदं ॥ १२ ॥ जिस्न भरकारसे ध्रणीकै भीतर रत्न रहते है वा जेसे शमीकै भीतर अभि रहती है इस प्रकार पर्वतराजने
तदानन मृत्सुरभि नायं त॒त्ति गिरीश्वरः ॥ सने रदस्युपा्राय प्रेमापिकृयं बभूव तत् ॥१० ॥ मेना स्पृहावती केष न मे ठ
शंसतिवस्तुषु ॥ किचि दिष्ठ ह्वियापृच्छदयुवेरं सखी गिरिः ॥ ११ ॥ उपे ।
श क य दौहदं शल्य यद्वतरेऽपश्यदाश्चु तत् ॥ आनीतं
नेष्टमस्याद्धा नासाध्यं तिदिवैऽपि दि ॥ १२॥ भ्रचीयमानावयवा निस्तीर्य दोहदग्यथामू ॥ रेजे मेना शल नद्धपजा
धिका यथा ॥१३॥ गिरिस्सगभा मदिषीमभस्त धरणीमिव ॥ निधानगर्भामभ्यन्तर्खीनवह्नि शमीमिव ॥१७॥ प्रियाप्रीते
मनसः स्वाजंतद्रविणस्य च ॥ समुन्नतेः अतेः पराज्ञः क्रियाश्चक्रे यथोचिताः ॥१५॥. ददर्शं कारे मेनां स प्रतीतः प्रसबोन्स॒
सखीम् ॥ अभितां च दिवं गभगृहे भिष्गधिषठिते ॥ १६ ॥ दष्ठा प्रियां्चभाद्गीं वै षमोदातिगिरीश्वरः ॥ गभेस्थजगदस्बां हि
महातेजोवतीन्तदा ॥१७॥ तस्मिन्नवसरे देवा खने विष्ण्वादयस्तथा ॥ सुनयश्च समागम्य गभंस्थां तुष्ट्बुश्शिवाम् ॥ १८॥
सगभी महिषीको रत्गमा माना ॥ १४ ॥ वह जेस्ञा श्रियाको प्यार करते थे ज्ञा उन्होने पन एकवित किया था जैसा शाश्च पडा था #
उसीने समस्त गभौधानादि क्रियाओको किया ॥ १५ ॥ फिर ्रसननतासे समयपर अपनी भियाको भररवोन्युली देखा जिस भकार मेधसहित
आकाश देखकर जख्वषण विचार छिया जाता है तथा वै्ोने भी गभं प्टिके अनेक उपचार किये थे ॥ १६॥ इस भरकार बुन्दर अगवाटी &
त्रियाको देख गिरिराज बहुत प्रसन्न हए जिसके गभ॑मं म
हा तेजवती जगम्बा विराजमान थी ॥ १७ ॥ उक्ती अवरम विष्ण आदि देवता &
ओर खुनिजन आकर गर्भे स्थित जगदम्बाकी स्तुति करने गे ॥ १८ ॥ ट
परक ------- 3 = ल
(नवव व ब > के > ३८ > 3
देवता बोडे हे दरगे ! ह भा्ञे ! हे जगदम्बे ! हे महेश्वरि ¡ आपकी जय हो हे सत्यव्रत 1 हे सत्यनारायण हे सत्य ! हे सत्यस्वरूपिणी ॥१९॥ ||ट
प । || ह सत्यमे स्थित ] हे सत्यम भेम करनेवाली ! हे सत्यरप कार्थकी कारणपवली सत्यहप सत्य नेन हम सब तुम्हारी शर्ण है॥ २० 0 | ट
|| शिवभिये ! हे महेशानि ! देवताओं दुःलक्षय करनेषाटी ! त्िोकी माता शिवभ्िया सर्वर व्यापक भकतवत्सछा ॥ २१ ॥ ह त्रिोकैशी ! टै
||| आप भगट होकर देवताओंका कायं करो हे महेश्वरि १ आपकी कपासे हम सव सनाथ होगे ॥ २२ ॥ तुमको ही सब सुखी हो उत्तम घुखकौ ठ
पाते है तम्हारे बिना तो त्रिढोकीमे कुछ मी शोभा नहीं होती ॥ २३ ॥ ब्रह्माजी बोरे ! इस प्रकार गभे स्थित महेशानीकी बहती स्तुति ठ
¢ देवा उचुः ॥ दुगे जय जय प्राज्ञे जगदम्ब मृदेश्वरि ॥ सत्यव्रते सत्यपरे विसत्ये सत्यकूपिणी ॥ १९ ॥ सत्यस्थे सत्यस्॒ |$
भीते सत्ययोने च सत्यतः ॥ सत्यसत्ये सत्यनत्रे प्रपन्नाः . शरणं च ते ॥ २० ॥ शिवभ्रिये मदेशानि देवदुःखक्षयैकरि ॥
४ तलोक्यमाता शर्वाणी व्यापिनी भक्तत्सला ॥२१॥ आविश्य त्रिकोकेशि देवकार्य रष्व इ ॥ सनाथाः कपया ते हि वथ
सवे महेश्वरि ॥२२॥ त्वत्तः सवं च सुखिनो लभन्ते सुखशत्तमम् ॥ त्वाभ्बिना न हि किंचिद्वै शोभते भ्रिभवेष्वपि ॥२३॥
अह्मोवाच् ॥ इत्थं कृत्वा महेशान्या गभस्थाया बुस्ततिम् ॥ प्रसन्नमनसो देवास्स्वं स्वं घाम ययुस्तदा ॥ २४ ॥ व्यतीते
|| नवमे मासे दशमे मासि प्रणतः ॥ गभस्थाया गतिन्दरभे कालिका जगदम्बिका ॥ २५ ॥ तदा सुसमयश्चासीच्छान्तभग्ह
ह|| तारकः ॥ नभः सदतां यातं अकाशस्सबदिश्च हि ॥ २९ ॥ मही मगलभूयिष्ठा सवनभ्ामसागरा ॥ सरस्छवन्तीवापी
$ परफुल्टुः पकजानि वे ॥२७॥ वञ्च विविधा वातास्सुखस्पशां शनीश्वर ॥ शरशदुस्साधवस्स्वैऽसतान्दुःखमभूद््ुतम् ॥२८॥ ट
¢ करक देवता भन्न मनते अपने अपने स्थानम गये ॥ २४ ॥ जब नौ हीने बीतकर दशवां महीना पूरणं हुमा उस्च समय जगदम्बाने ए
गभत बहिभूत होनेकी इच्छा की ॥ २५ ॥ उस्र समय स्वच्छ स्मय होगया नक्ष प्रह तारे शान्त होगये आकाश ¢
|| निर्भर होगया स्व दिशा भकाशित होगदं ॥ २६ ॥ वन भ्राम स्ागरके सहित प्रथिवी मंगलमय होगईं बावडी सरोवरोभं निर्भढ जट
‰॥ गये ओर उनम कमर सिर गये ॥ २७ ॥ हे स॒नीश्वरो ! सुसस्पशवाठी सुन्दर पवन उस्न समय चठने ठगी. महात्मा सव प्रसन्न हुए ओर ॥>
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अतलरुषोको दुःख हभ ॥२८॥ आकाशम आकर देवता दुन्दुभी बजाने ठगे एूलोकी वष हदं गन्धे गानेरगे 11 २९ \ आकाशम विया ६४
ध्रोकी श्चियै ओर अप्तरायं तत्य करने ठगी आकाश स्थल्मं देवताओंका बडा उत्सव हुआ ॥ ३० ॥ .उसती समय देवी भगवती शिवा सती %
अपनी पूणं शक्तिर मेनाके सन्यख अपने निजरूपसे परगट हृदं [ ग मायामय था ] ॥ ३१ ॥ वसन्त ऋतु चैका महीना नौमी तिथि ¢
मृगशिरा नक्षत्रम आधी रातके समय चन्द्रमंडठसे गंगाके समान भगक्ती भगर हुई ॥ ३२ ॥ उस्र समय अपने सवरुपसे भेनकाके जदरसे £
दुन्दुभीन्वादयामास॒नैभस्यागत्य निजराः ॥ पष्पवृष्ठिरभूत्तज जगगेन्धर्वसत्तमाः ॥ २९ ॥ विद्याधरश्चियो ग्योभ्नि ननृतुश ८
प्सरास्तथा ॥ तदोत्सवो महानासीदेवादीनां नभःस्थरे ॥३०॥ तस्मित्नवस? देवी पूर्वशक्तेश्शिवा सती ॥ आविबेभूव पुरतो |
मनाया निजपतः ॥३१॥ वसंततौँ मधो मासे नवम्यां मृगधिष्ण्यके ॥ अद्ैरातरे समुत्पन्ना गंगेव शशिमण्डलात् ॥३२॥ |©
समये तस्स्वह्पेण मेनकाजटराच्छिवा ॥ समुद्धूय समुत्पन्ना सा लक्ष्मी सागरात् ॥ ३२ ॥ ततस्तस्यां त॒ जातायां ||
्रस्नोऽभूत्तदा भवः ॥ अनुकरो ववो वायुगेम्भीरो गंधयुक्शभः ॥ ३९ ॥ वभूव. पुष्पवृष्टिश्च तोयवृष्टपुरस्सरम् ॥ ज्व ||
लुशवाग्रयः शान्ता जग्श्च तदा घनाः ॥३५॥ तस्यां तु जायमानायां सर्वस्वं समपद्यत ॥ हिमवन्नगरे तञ सवं इःखं ९
क्षय गतम् ॥ ३६ ॥ तस्मिन्नवसरे ततर षिष्ण्वायास्सकरास्सराः॥ आजग्मुः सुखिनः प्रीत्या ददञ्जुजैगदम्बिकाम् ॥ ३७ ॥ ||
तुष्ट्बुस्तां शिवामम्बां कालिकां शिवकामिनीम् ॥ दिग्याखूपां महामायां शिवरोकनिवासिनींम् ॥ ३८ ॥ |
भगवती सागरसे ठक्ष्मीके समान भरगट हृदं ॥ ३२३ ॥ उस समय उस्न भगवतीकै परगट होनेसे शकर प्रसन्न हृए उस समय पवन गभीर वेगे
अनुकूढ गषयुक्त शुभखचक गमन करने ठ्गा ॥ ३४ ॥ मन्द् मन्द वारिवृष्टि ओर पुष्पवृष्टि होने ख्गी शान्त हई अभि प्रज्वछ्िति हो उदी ४
ओर मेव गजेने कगे ॥ ३५ ॥ भगवतीके परगट होनेमे हिमाख्यके यहां सवरव होगया ओर उस्र नगरफ सब दुःख भिटगये ॥ ३६ ॥ उसी ||©
समय विष्ण आदि सब देवता सुखी हो भ्रमसे जगदम्बाका दशन करने आये ॥३७॥ ओर शिवा अम्बा कालिका शिवकामिनीकी स्तुति करने ट
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ठगे जो दिव्या महामाया शिवलोकम निवासन करनेवाटी है ॥ ३८ ॥ देवता बोछे हे जगदम्बे ! हे महादेवि ! हे सवके सिद्धिके विधान करने
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बाठी ! आपः देवताओंका कर्प करवाल हो हम आपको प्रणाम करते है ॥ ३९ ॥ दे. भक्तवलठे ! सर्वथा तुम ेवतााक ||
कल्पा करो भेनाका मनोरथ पूर्णं किया ब शकरका मी मनोरथ पू कतो ॥ ४० ॥ त्हाजी बोढे इ भकारे विष्ण आदि देवता ट
शिवाकी स्तुति ओर प्रणाम करके भगवतीकी परमगतिकी भशंसा करते करते अपने २ स्थानोको गये ॥ ४१ ॥ नीढकमच्क ||
पमान कान्तिमती उस भगवती श्यामाका दशन कर मेना बडी प्रसन्न हुईं ॥ ४२ ।॥ भगवतीका दिव्यरूप देखकर गिरिभ्रियने ह
॥ देवा उचुः ॥ जगदम्ब महादेवि सर्वसिद्धिविधायिनि ॥ देवकार्यकरी त्वं हि सदातस्त्वां नमामहे ॥ ३९ ॥ सर्वथा कुर् {
कल्याणं देवानां भक्तवतघे ॥ मेनामनोरथः पूर्णः कृतः रू हरस्य च ॥ ४० ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्थ स्तुत्वा शिवां देवा #
विष्ण्वाद्याः सुप्रणम्य ताम् ॥ स्वं स्वं धाम य्यः प्रीताश्शंसन्तस्तद्रतिं पराम् ॥ ४१ ॥ तान्तु दृष्टा तथा जातां नीलोत्पल ||#
दरुप्रभाम् ॥ श्यामा सा मेनका देवीं शदमापाति नारद् ॥ ४२ ॥ दिष्यष्पं विरोकषयाबु ज्ञानमाप गिरिप्रिया ॥ विज्ञाय ||¶
परमेशानीं तुष्टावातिप्रहिंता ॥ ४३ ॥ मेनोवाच ॥ जगदम्ब महेशानि कृतातिकङ्णा त्वया ॥ आविभता मम पुरो विर ६
सन्ती यदम्बिके ॥ ४९ ॥ त्वमाद्या सर्वशक्तीनां भरिलोकजननी शिवे ॥ शिवप्रिया सदा देवी सवदेवस्तुता परा ॥ ७५ ॥ ४
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कृपां कुरू मदेशानि मम ध्यानस्थिता भव ॥ एतद्रूपेण प्रत्यक्ष पं घेहि सुतासमम् ॥ ४६ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वच
स्तस्या मेनाया भ्रधरक्चियाः ॥ प्रत्युवाच शिवा देवी सुप्रसन्ना गिरिप्रेयाम् ॥ ५७ ॥
| भ्राप्त किया ओर उसको परभेशानी जानकर स्तुति करने ठगी ॥ ४३ ॥ येना बोी हे जगदम्बे महेशानि ! तुमने बडी कपा की
हे अग्निक 1 जो मेरे सामने आविभूत होकर तुम क्रीडा करती हो ॥ ४४ ॥ है शिवे! तुम त्रिोकं जननी सब शक्तियोंकी
आया हो? हे देवि ! तुम सदा शिवकी प्रिया सब देवता ओंम स्तुतिको प्रात हो ॥४५॥ हे महेशानि ! कपा करके भरे ध्यानमे स्थित हो, इस रूपसे
प्रत्यक्ष हदं तुम कन्याके समान रूप धारण करो ॥ ४६ ॥ ब्रह्नाजी बोटे इस प्रकार हिमाचट्की भरिया मेनाके वचन सुनकर प्रसन्न हो
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। | देरी बो ॥४७॥ देवी बोली हे मेना ! तुमने पहठेमेरी सेवा की है तुम्हारी भक्तिसे भँ भन्न होकर वर देनेको तुम्हारे समीप गै |
॥४८॥ ओर बर मागो रेते वचने तुमने यह र मागा हे महादेवि ! तुम भेरी कन्या होकर देवताओंका हित करो ॥४९॥ भदरते मं ते ||
वर देकर अपने स्थानको चटी गई हे गिरिकाभिनि ! अव समयको भाप होकर ब तुम्हारी कन्या हई हं ॥५०॥ यह दिव्यदप इस कारण ठ
धारण किया किं तुक्चको मेरा स्मरण हो जाय, अन्यथा मत्य॑भावसे सुञ्षम तुञ्चको मायुषीज्ञान होता ॥ ५१ ॥ तुम दोनोंही स्॒ञको पुत्रीभावसे ४
अथवा दिव्यभाव ध्यानकर ल्ह करोगे तो मेरी गतिको भप्त होगे ॥ ५२ ॥ पृथिवीम अदत रीराकर मै देवकार्यं करूगी शिवपत्नी होकर ठ
देव्युवाच ॥ हे मेने त्वं एुरा मां च सुसेवितवती रता ॥ त्वद्वक्तया सुप्रसन्नां वरन्दातं गतान्तिकम्॥१८॥ वरं ब्रूहीति मद्राणीं थत्वा ठं
ते तद्ररो वृतः॥ सता भव महादेवी सामे देवहितं कुर् ।॥(४९॥ तथा दत्त्वा वरं तेऽहं गता स्वम्पदमाद्रात्॥ समयं प्राप्य तनयाऽ ९ |
भवन्ते गिरिकामिनि ॥५०॥ दिव्यहूपं धृत मेय यत्ते मत्स्मरणं भवेत् ॥ अन्यथा मत्य॑भावेन तवाज्ञानं भवेन्मयि ॥९१॥ युवां ॥५६
मां पुत्चिभावेन दिग्यभावेन वासकृत् ॥ चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यातास्स्थो मद्रतिम्पराम्॥५२॥ देवकार्यं करिष्यामि लीलां कृत्वा ९
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यये
दवतां क्षितौ ॥ शम्भुपत्नी भविष्यामि तारयिष्यामि सननान्॥५३॥ ब्रह्मोवाच॥इत्यु्तासीच्छिवा तूष्णी मभ्बिका स्वात्ममायया॥
पश्यन्त्या मातारे प्रीत्या सयोऽऽभूत्तनया तनुः ॥५९॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शरसंहितायां ततीये पार्वेतीखण्डे
पूवेतीजन्मवणनं नाम षष्टोऽध्यायः ॥ & ॥ \ ब्रह्मोवाच ॥ ततो मना पुरस्सा वे सुता भूत्वा महाद्युतिः ॥ चकर रोदनं तजर
लौकिकीं गतिमाशिता ॥ ° ॥ अरिष्टशय्यां परितस्सद्विसारिसतेजसा ॥ निशीथदीपा विहतत्विषं आसत्नरं रुने ॥ २ ॥
सननोंको तारगी ॥ 4३ ॥ ब्रह्माजी बोरे इस भकारमे कहकर जगदम्बा शिवा मौन होगईं ओर अपनी मायासे माताको प्रीतिसे देखती हृ
तक्ताङ बाखिका होगदं ॥ ५४ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे भाषारीकायां रुद्रसेहितान्तगेततृतीयपार्वतीखण्डे पार्वतीजन्मवणेनं नाम षष्ठोऽध्यायः
॥ £ ॥ ब्रह्माजी बोटे ! तव वहं महाकान्तिमान् मेनाके सन्युख महाकान्तिमती कन्या होकर लौकिकी गतिको आश्रय कर रोदन करनेखमी
॥ १ ॥ सावैरकी श्यामं उसके सखके तेजसे अर्धरात्रिके दीपक निस्तेज विके समान रहगवे ॥ २ ॥ ।
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॥१९८॥ [|> || राजाको सुनाया, कि देवताओंको सुखदायक पार्॑तीका जन्म हभ दै ॥ ४ ॥ धीक जन्म सुनकर गिरिराजने शवेतच्छतरके सिवाय
| उसको समस्त मनोरथ देनेकी इच्छा की ॥ ५ ॥ रोहित बाह्णोके सहित गिरिराज वहां गे ओर अपनी कान्तिसे शोभायमान
शि०प० उतत मनोहर रोदनको सुनकर सब गृहकी विये चटी आ ओर प्रीतिपूर्वकं बडी पसन्द ॥ ३ ॥ शुदान्तःरचारीने यह माचार ६
4
कन्थाको वहां देला ॥ ६ ॥ जो नीलोखकदल्के समान श्यामवणे ग्ेष्युतिसे मनोहर एसी कन्याको देखकर गिरिराज बड भसन ४
¢ धत्वा तद्रोदनं रम्यं गृहस्थास्सर्वयोषितः॥ जडषुस्सम्भमात्तज्ागताः प्रीतिपुरस्सराः॥२।तच्छद्वान्तचरः शीघ्रं शशंस भूभते ट
| तदा ॥ पावतीजन्म खसदं देवकार्यकरं शभम् ॥९॥ तच्छुद्धान्तचराया् पुजीजन्म सुशंसते ॥ सितातपत्र नदेयमासीत्तस्य ¢
¢ महीभृतः ॥ 4 ॥ गतस्तत्र गिरिः प्रीत्या सपुरोहितसद्विजः ॥ ददश तनयां तान्तु शोभमानां स॒भाससा ॥ & ॥ नीलोत्परदल ९
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श्यामां सुति खमनोरमाम् ॥ दष्टा च तादृशीं कन्यां श्चमोदाति गिरीश्वरः ॥७॥ स्वँ च घुभुदुस्ततर पौराश्च पुरूषाः खयः ॥
तदोत्सवो महानासीतरदर्वाद्यानि भूरिशः ॥ ८ ॥ बभूव मंगरं गानं ननृतुर्वारयोषितः ॥ दानंददौ द्विजातिभ्यो जातक ट
| विधाय च ॥ ९॥ अथ द्वारं समागत्य चकार सुमहोतसवम् ॥ हिमाचलः प्रसन्नात्मा भिक्षुभ्यो द्रविणन्ददौ ॥ १० ॥ र
| अथो शुहृते सुमते हिमवान्सुनिभिः सह ॥ नामाऽकरोत्छुतायास्तु कालीत्यादि सुखप्रदम् ॥ ११ ॥ ट
हस्तं २ हृए ॥ ७ ॥ सब एरवाप्ी एरुष ओर ब्वियै प्रसन्न हुई वहां बडा उत्सव् हुआ ओर अनेक प्रकारके बाजे बजने ठगे ॥ < ॥ मंगठ ||©
पाख १ ||६|| गान होने ठगा वेश्या चय करने ठगी जातकमे करके बाहमणोको बडा दान दिया गया ॥ ९ ॥ किरि दरि आकर भौ ४
गिरिराजने बडा उत्सव किया, हिमाचछ्ने प्रसन्न हो भिश्वुकोको बडा धन दिया ॥ .१०॥ तव अच्छे मुहूतमं हिमाख्यने खनियोँके स्राथ सुताके
ह|| काटी इत्यादि सुखदायक नाम किये काटी तारा महाविया षोडशी भुवनेश्वरी भैरवी छिन्नमस्ता विया धूमावती बगठामखी सिद विधा ट
भ
# १ कालो तारा महाविद्या षोडशो भुवनेइवरो ।। भेरवौ छिन्नमस्ता च विद्या घूमावती तथा ॥ बगलामुखी सिद्धविद्या मातंगी कमलात्मिकेत्यादिपद्यप्रणीतं नामेत्यर्थः ।1 %
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मातंगी कमटास्मिका ॥ ११ ॥ उक्ष समय बाह्मणौँको आद्रे बडा दान दिया ओौर गानपुवैक बहुता उत्सव कराया ॥ १२॥ देवीको बारबार
देखतेहूए इकार बड़ा उत्सव कराया बहुत एत्रवाडे गिरिराजने पत्नीपतहित बडा सुख माना ॥ १२३ ॥ इसभरकार् गिरिराजकै घर शिवा बढने
् ठगी जेसे वषा समयमे गंगा वा शरद् तुको चांदनी ॥ १४ ॥ इसपरकारसे सुन्दर अगवाटी सुन्दर दशनवाटी काछिका देवी प्रतिदिन चद्ममक
¢ पमान सुन्दरताको बढाने ठगी ॥ १५॥ कुटोचित नाम पादती टेकर सब उच्चारण करने ठगे बन्धुश्िय बन्धुजन सुशीरता ओर गणोसे
9 युक्तं नाम ठेने छगे ॥ १६ ॥ जव माताने भगवतीको तपक ठिये निषेध किया हे सने ! तबसे वह सुखखी उमा नामस विख्यात इदं ॥ १७॥ सब
$| दानं ददौ तदा प्रीत्या द्विजेभ्यो बहुं साद्रम् ॥ उत्सवं कारयामास विविध गानपूष्वैकम् ॥ १२ ॥ इत्थ कृत्वोत्सवं भूरि
६| कालं पश्यन्धुदु्यहुः ॥ ठेमे सुदं सपत्नीको बहुपु्रोऽपि भूधरः ॥ १३॥ तर सा उवरृधे देवी गिरिराजगृहे शिवा ॥ गंगेव
६ व्षीसमये शरदीवाथ चन्द्रिका ॥ १९ ॥ एवं सा कालिका देवी चार्वङ्गी चारदर्शना ॥ दधे चादुदिनं रम्यां चन्द्रबिम्बक
|| लछामिव ॥ १५ ॥ कुलोचितेन नाम्ना तां पावेतीत्याजदावह ॥ बन्धुप्रियां बन्धुजनः सौशील्य्णसंयुताम् ॥ १६ ॥ उमेति
४ माजा तपसे निषिद्धा कालिका च सा ॥ पश्चादुमाख्यां घुश्चखीजगाम अुवने सुने ॥१७॥ दष्ठिः प्रवतोऽप्यद्रस्तस्तिस्त्ि
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जगाम न ॥ अपत्ये पावतीत्याख्ये सर्वसौभाग्य संयुते ॥ १८ ॥ मधोरनन्तपृष्पस्य इते हि अमरावलिः ॥ विशेषसंगा
भवति सहकारे मुनीश्वर ॥ १९ ॥ प्रतो विभूषितश्वापि स बभूव तया गिरिः ॥ संस्कारवत्येव गिरा सनीषीव हिमालयः
॥ २० ॥ प्रभामहत्या शिखयेव दीपो थुवनस्य च ॥ भिमार्गयेवं सन्भाग स्तद्रद्विरिजया गिरिः ॥ २१ ॥
सौभाग्ये युक्त पावंतीको देखते हु९ अनेक एत्र होनेपर भी पव॑तराज तृप्त नहीं होते थे ॥ १८ ॥ हे खनीश्वर ¡ जिसभकार वन्तमे अनन्त
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पष्पोके रस होनेप्र भी भूङ्गावङि आमक मौ रपर ही विशेषकर बैठती है ॥ १९ ॥ इसीधरकार मगवतीते पवैतराज पिव ओर भूषित हूए ज
( | पंडित व्याकरणादि स॑स्कारवारी वाणीते विभूषित ओर पवित्र होता है इसीभकार हिमालय हृए॥२०॥ जेते दीप्ककी बडी शिखाते दिर वेदत
|| यके मासे मागे शोभित होता है, इसप्रकार पवेतराज पावती शोभायमान हूए ॥ २१ ॥
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वह भगवती अपनी सखीजनंकि मध्यमे प्राप्त होकर गंगाके किंनारेकी भूमि्योमं बारम्बार कन्दुकोसे अथ च बनाकटी एत्रोपि ओर षरोसे
इत्यादिके रमण करने लगी ॥ २२ ॥ ह सने ! तदन्तर शिवा देवी उपदेशक समयम गुरसे मन छ्गाकर विया पढने ठगी ॥ २३ ॥
शरद ऋतु हंसाटी खण नदीको ओर रात्रिम भकाश ओौषभियोंको जेना पराप्त होता है दन्दीके समान भक्तन विया उसको प्राप्त ही
गृहं ॥ २४ ॥ इस प्रकार यह कुछ भगवतीकी छीठा आपसे कही है सने ! अब प्रसन्नता दूसरी रीरा पुनो ॥ २५ ॥ इति
शरीशिवमहाषराणभाषादीकायां रुद्रसंहितान्तगेततृतीयपार्वतीखण्डे पार्वतीवाल्यरीलावणनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ बह्लाजी बोठे एक
कन्दुकैः कृजिमेः पुतरेस्सखीमध्यगता च सा ॥ गंगासैकतवेदीभिर्बाल्ये रेमे युदहू्यः ॥२२॥ अथ देवी शिवा सा चोपदेशसमये
सने ॥ पपाठ विद्यात्घुप्रीत्या यतचित्ता च सद्रणरोः ॥२३॥ प्राक्तना जन्मविद्यास्तां शरदीव प्रपेदिरे ॥ हंसारिस्स्वणंदी नक्त
मात्मभासो महौषधिम् ॥ २४ ॥ इत्थं खवणिताटीला शिवायाःकाविदेव हि ॥ अन्यलीलाभ्प्रवक्ष्येऽहं श्रृण्वं प्रेमतो सुने
॥ २९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वतीबाल्यलीलावर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः
॥७॥ ब्रह्मोवाच ॥ एकदा तु शिवज्ञानी शिवलीकाविदां वरः ॥ हिमाचल प्रीत्यागमस्त्वं शिवप्ेरितः ॥१॥ दष्क सुने गिरी
शस्त्वां नत्वानचै स नारद् ॥ आहय च स्वतनयां त्वदङ्ध्योस्तामपातयत् ॥२॥ पुननत्वा सुनीश त्वायुवाचहिमभूधरः ॥
सालः स्वविधि मत्वा बहुसघ्रतमस्तकः ॥ ३ ॥ हिमाखय उवाच ॥ हे सुने नारद् ज्ञानिन्त्रह्मपु्रवर प्रभो ॥ सर्वज्ञस्त्वं सक
रणः परोपकरणे रतः ॥ ४ ॥ मत्सुताजातकं ब्रूहि गुणदोषसभरुद्धवम् ॥ कस्य भिया भाग्यवती भविष्यति सुता मम ॥५॥
समय तुम शिवज्ञानी शिवीला जाननेवाखोँमं॑चतुर शिक्से प्रित हो प्रेमसे हिमाठ्यके यहां गये ॥ १ ॥ हे ने ! गिरिराजने तुमको
देखते ही सत्कारकृर अपनी तनयाको हढाकर तुम्हारे चरणों गिराया ॥ २2 ॥ हे अनीश ! फिर आपको भरणाम कर हाथ जोड
अपने भाग्यको सराहते विधिपुवेक मस्तक श्काये हिमाख्यने कहा ॥ ३॥ हिमालय बोढे है नारद नि! हे ज्ञानी हे बहप !
हे भरभो ! तुम सवज्ञ करुणाही करके परोपकार करनेमे तत्पर हो ॥ ४॥ आप मेरी कन्याके यण दोष कहो मेरी कृन्याका परति
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। कौन होगा ओर कैक्ती भाग्यवती कन्या होगी ।॥ ५॥ ब्रह्माजी बोरे है खनिभ्रष्ठ ! जब दस्र प्रकारसे हिमाख्यने कहा तब नारदजी भवानीका है
हाथ ओर सल चरणादि अग देखकर ॥ ६ ॥ कौतुकपु्वैक बोठनेवाछोम चतुर तुम कहनेखुगे हे नारदजी तुम तो ज्ञानी ओर सब वृत्तान्त ह
जाननेवाठे हो ॥ ७॥ नारद बोे यह आपकी कन्या चनद्रकठाके समान बढती है हे मेने ! हे शेराज ! पह सब लक्षणसंयुक्तं आया ह
कटा है ॥ < ॥ अपने पतिको अत्यन्त सुखदायिनी ओर परतिकी कीतिं बढानेवाटी होगी महापतिवता सबं नारियोमे होगी ओर सबको ह
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॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तो शुनिवर्यं त्वं गिरीशेन हिमाद्विणा ॥ विलोक्य कालिकादस्तं सर्वागं च विशेषतः ॥&॥ अवोचस्त्ं
गिरिं तात कौतुकी वागिशारदः ` ॥ ज्ञानी विदितवृत्तान्तो नारदः प्रीतमानसः ॥ ७ ॥ नारद् उवाच ॥ एषा ते तनया मेने
सुधां शोखि वद्धिता ॥ आद्या कला शेखराज सर्वलक्षणशाकिनी ॥८॥ स्वपतेस्सुखदात्यन्ते पित्रोः कीर्तिविवर्िनी ॥ महा
साध्वी च सवासु महानन्दकरी सदा ॥ ९॥ खलक्षणानि सर्वाणि त्वत्छ॒तायाः करे गिरे ॥ एका विलक्षणा रेखा तत्फठं शण
तत्त्वतः ॥ १० ॥ योगी नग्नोऽगुणोऽकामी मातृतातविवजितः ॥ अमानोऽशिववेषथ पतिरस्याः किरेटशः ॥ १३१ ॥ ट
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्ते हि सत्यं मत्वा च दम्पती ॥ मेना दिमाचरुश्वापि दुःखितौ तौ बभुवतुः ॥ १२ ॥ ट
शिवाकरण्यवचस्ते हि तादशं जगदम्बिका ॥ लक्षणेस्तं शिवं मत्त्वा जदषांति रुने हदि ॥ १३ ॥ न भृषा नारदवेचस्त्विति ए
संचिन्त्य सा शिवा ॥ स्नेहं शिवपददरन्द्रं चकाराति इदा तदा ॥ १९ ॥ ट
महा आनन्द करनेवाटी होगी ॥९॥ हे पवैतराज ! तुम्हारी सुताके हाथमे सम्युणं सरक्षण है ओौर एक रेखा बडी विठक्षण ३ उसका फठ घनो टै
॥ १० ॥ योगी नेगा युणरहित अकाम मातापितासे रहित अरमंगख्वेश देता स्वाभी इको मिरेगा ॥ ११ ॥ बह्लाजी गोखे इस भरकार तुम्हारे
( (4 हुन यह दोनों बी परुष स्त्य मानकर मेना ओर हिमाचल दोनों दुःखी हृद ।। १२ ॥ जगदम्बिका शिवा इष प्रकारक वचन सुनकर
7४1 शिवजीमे यह ठक्षण विचारकर मनम बडी परतन हु । १ ३॥ भगवतीने विचार किया किं नारदजीके वचन अपत्य नहीं होगे हदयते शिवजीक
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चरणो बडा भेम किया।१४॥तब हे नारद ! दुःसी होकर पर्वतराज तुमत कहने रगे हे सने ५
हे खने ! यह वचन सुनकर महाकौतुकी तुम हिमाछ्यको शुभ वचनो प्रसन्न करते हए बोडे॥१६॥ नारद् बोखे हे गिरे ! लहे मेरा वचन सुन £
ट त कमा उपाय कह सुञ्चे तो बडा दुःख है ॥१५॥ £
ट जो कभी मिथ्या नहीं होता, कररेला तथा जह्याकी छिपि कभी मिथ्या नहीं होती॥१७॥ हे शे ! पति तो इसका वैसाही मेगा इसमे सन्देह नही ¢
शि०यु
॥२००॥
|| अब मो यह उपाय करो जिसके करते सुख मिरे ॥१८॥ इतभकारके ठक्षण ठीटारूपधारी शेकरमे पाये जाति ह जितने कुरक्षण ह शकरमं वह ॥
उवाच दुःखितः शेकस्त्वान्तदा हदि नारद ॥ कमुपायं सुने इयांमतिदुःखमभ्रदिति ॥ १५ ॥ तच्छत्वा त्वं मुने प्रात्थ
4
¢ महाकौतुक कारकः ॥ हिमाचल डभेवाक्यैरै्षयन्वागिशारदः॥ १६ ॥ नारद उवाच ॥ स्नेदाच्छणु गिरे वाक्यं मम सत्यं मृषा न ४
हि ॥ कररेखा ब्रह्मलिपिन मृषा भवति धुवम् ॥ १७ ॥ तादशोऽस्याः पतिः शेर भविष्यति न संशयः ॥ तत्रोपायं चण ||
४ ्रीत्या यं कृत्वा रष्स्यसे सुखम् ॥ १८ ॥ तादशोऽस्ति वरः शम्भुलीलाहूपधरः प्रभुः ॥ लक्षणानि सवांणि तच तुल्यानि £
सद्रणेः ॥ १९ ॥ प्रभौ दोषो न दुःखाय दुःखदोऽत्यप्रमौ हि सः ॥ रविपावकगेगानां तञ ज्ञेया निदशना॥ २० ॥ तस्मा ह
| च्छाय कन्यां स्वां शिवां देहि विवेकतः ॥ शिवस्सवैन्वरस्सेष्योऽविकारी परथुरम्ययः ॥ २१ ॥ शीबभसादः स ¢
शिवस्तां अदीष्यत्यसंशयम् ॥ तपःसाध्यो विशेषेण यदि कर्याच्छवा तपः ॥ २२ ॥ सर्वथा सुसमर्थो हि स ॒शिवस्स
ट| कलेश्वरः ॥ ङुल्पिरपि विध्वंसी ब्रह्माधीनस्त्वकप्रदः ॥ २३ ॥ ४
₹ ०.२ ||| सब षुरक्षणही है १९॥१रमुओंमे दोष भी दुःखके निमित नहीं ह्येते कारण किं वह दुःख दूर करनेमे समथ है रविपावक ओौर गंगाम अशुभ वस्तु
पा.लं.३ ||| १उनेते जैसे बह कु दोष नहीं होता है ॥२०॥ इस कारण ज्ञानपक इस अपनी कन्याको शिवजीके निमित्त भदान करो शिवही पर्वेषररे्य ||
अ०<८ ||| अविकारी अविनाशी ह ॥२१॥ शीर भरसञाद करनेवाडे शिवजी शिवाको अवश्य हण करेगे सो शंकर तपते सिदध हो सकते है यदि तुम्हारी ||
२५ छत्री तपस्या करे ॥२२॥ तौ सकटेश्वर शिवजी दाही समथे हँ वह वजका भी विध्वंस कर सकते हँ ब्रह्मा उनके आधीन है तथा शुभगति ||
। | है ॥ २३ ॥ बह्लाजी बोढे कौतुकी बहमवित तुम इस प्रकार हिमाचठसे ककर सुन्दर वचने शेखराजको भ्रसन्न करते फिर बोले ठ
६ ॥२४॥ यह तो शिव्कीही भाविनी दयिता है शिवजीमे सदा सायुकूढ है कारण किं यह महासाध्वी सुव्रता माता पिताकै सुखके बढनेवारी है
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॥ २५ ॥ यह् शिवजीका चित्त अपने वशम करेगी इस्ष तपस्िनीके सिवाय शिवजी अन्यको नहीं विवाहंगे ॥ २६ ॥ इन शिवाशिवक प्रेमके :
पमान किप्तीकात्रम न होगा न है न किपतीक दुभा ॥ २७॥ यहो दोनों देवतोके नष्ट हुए कार्यको करेगे हे श्रेष्ठ! जो जो कायं हँ वह वहं सव किये
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता त्वं पुनस्तात कौतुकी ब्रह्मविन्मुने॥ शेलराजमवोचो हि हषयन्वचनेश्शुभेः॥ २४ ॥ माविनी दयिता ठ
शंम्भोस्सानुकूला सदा हरे ॥ महासाध्वी सुत्रता च पितोस्सुखविवद्धिनी ॥ २ ॥ शम्भोधित्त वशे चेषा करिष्यति तप र
स्विनी ॥ स चाप्येनामृते योषां न ह्यन्यासुद्रहिष्यति ॥२६॥ एतयोस्सदशं प्रेम न कस्याष्येव तादृशम् ॥ भूतं वा भविता त
वापि नाधुना च परवतते ॥ २७ ॥ अनयोस्सुरकार्य्याणि कर्तव्यानि मृतानि च ॥ यानि यानि नगश्रेष्ठ जीवितानि पुनः पुनः ॥¢
२८ ॥ अनया कन्यया तेऽद्रे अधनारीश्वरो इरः ॥ भविष्यति तथा इर्षदिनयोमिलितम्पुनः ॥ २९ ॥ शरीरा हरस्यैषा ट
दरिष्यति सृता तव ॥ तपः प्रभावाप्सतोष्य महेशं सकलेश्वरम् ॥३०॥ स्वर्णगौरी सणीभा तपसा तोष्य तं इरम् ॥ विधयुदरौ ट
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रतमा चेय तव पुरी भविष्यति ॥ ३१ ॥ गौरीति नाम्ना कन्या तु स्यातिमेषा गमिष्यति ॥ सर्वदेषगणेः पूज्या हरित्रह्मा ॥९
दिभिस्तथा ॥ ३२ ॥ नान्यस्मै त्वमिमां दातुमिहारईसि नगोत्तम ॥ इदं चोपा देवानां न प्रकाश्यं कदाचन ॥ ३३ ॥
|| जाये ॥२८॥ हे प्वतराज।! इस तुम्हारी कन्पासे शिवजी अर्धनारीश्वर काग इनका यह मेढ प्राथमिक नहींहै षन्ख है ॥२९॥ यहं तुम्हारी सुता
|| शिवजीका आधा शरीर हरण करेगी तपके भभावसे सकटेश्वर शिवको संतुष्ट करेगी ॥ ३० ॥ यह स्वण गौरी सुवर्णकी कांतिवाी तपते शिबजीको
4 संतुष्ट कर बिजटीके समान गौरवणवाटी तुम्हारी उतरी होगौ ॥३३॥ गौरी नाम्न तुम्हारी कन्या विख्यात होगी हरि बह्लादिसब देवताति तुम्हारी
न्ा पूज्य होगी ॥३२॥ हे पव॑तराज ! इते तुम ओरको नहीं दे्कते यह देवता ओक समीप भी भकाशित नहीं करना ॥ ३३ ॥ ६
~ + ध 5 न = 1 न
शि०यु° बल्ाजी बोठे हे देवापिं नारदजी ! तुम्हारे यह बचन सुनकर बोठनेवालोंम चुर हिमाख्य कहन गे ॥ ३४ ॥ हिमालय बोटे इह खन ¦ €||£
॥२०१॥ ||| नारदजी ! हे पण्डित वर ! मेरी यह विज्ञ है म जो प्रमे विज्ञपि करता हं उततको तुम प्रेमे सुनो ॥ ३५ ॥ एतत सुना जाता है कि महादेव ¢
संगरहित यतात्मा ई, बह देवता ओंको अगोचर नित्य तपस्य! करते हँ ॥ ३६ ॥ वह ध्यानमागंम स्थित परत्रह्य अपने पमं मन खगाय कित् ¢
प्रकार संप्ारी कायं करेगे यह स्ने बडा संदेह है ॥ २७ ॥ परत्रह्न अक्षर प्रदीप कटिकाके समान है वह सदाशिवाछा उनका निजदूप निर्विकार ¢
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति तस्य वचः शरुत्वा देवं तव नारद्॥उवाच हिमवान्वाक्यं स्ने त्वाम्बागिशारद्ः ॥३९॥ हिमालय उवाच॥ ¢
हे सुने नारद प्राज्ञ विज्ञप्ति कंचिदेव हि ॥ करोमि तां शृणु भ्रीत्या तस्त्वं प्रष्ुदमावह ॥३५॥ श्रयते त्यक्तसंगस्स महादेवो यता ¢
ट्
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त्मवान् ॥ तपरति सनित्यं देवानामप्यगोचरः॥३६॥ स कथध्यान मागैस्थः परब्रह्मापिंतं मनः॥ भ्रंशयिष्यति देवष ततर मे $
संशयो महान्॥३७॥ अक्षरं परम ब्रह्म प्रदीपकलिकोपमम् ॥ सदाशिवाख्यं स्वं रपं निविकारमजापरम्। ३८॥ निशुंणं सगुणं |५
तच्च निर्विशेषं निरीहकम्॥ अतः पश्यति सवत्र न तु बाह्यं निरीक्षते॥ ३९ ॥ इति स श्रूयते नित्य किनराणां युखान्युने ॥ इदा ॥4
गतानां स्ीत्या किन्तन्मिथ्या वचो धुवम् ॥ ४० ॥ विशेषतः श्रयते ससाकषत्ना्ना तथा हरः ॥ समयं कृतवान्पूष्वं तन्मया |
गदि तं शृण ॥ ४१ ॥ न त्वाभरतेऽन्यां वरथे दाक्षायणि श्रिये सती ॥ मा्ां्थं न ग्रहीष्यामि सत्यमेतद्रवीमि ते ॥?
॥ ४२॥ इति सत्यसमं तेन पुरैव समयः कृतः ॥ तस्यां मृतायां स कृथ स्वयमन्यां अरहीष्यति ॥ ४३ ॥ ४
अजन्मा ओर पद है ॥३८॥ वह नियुण सुण निर्विशेष निरीह दै बह सर्वत्र देखते है बाह्य विषयोंको मने नहीं देखते ३ ॥ ३९ ॥ हे मुने ! यह ४
बात यहां आये हृष किनरोके सुखे प्रीतिसे कही नित्य सुनी जाती है वह भिथ्या कैप हो स्रकंती है ॥ ४० ॥ विशेषकर साक्षात् नामस महेश्वर
हर सुने जति है उन्होने जो प्रहे परिज्ञा कौ है उपतको सुकते सुनो ॥ ४१ ॥ हे भिये ! दाक्षायणी दुमहारे प्तिवाय दप्तरीको मै नहीं वंगा ||
भायौकै निमित्त भँ तुम्हे ही प्रहण करगा यह मेरा वचन सत्य है ॥ ४२॥ यह सतीके साथ उन्होने पहटेही. परतिज्ञा कर ठी है उसके मरने प्र ॥%
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वह ओरको कैसे ग्रहण करेगे ॥४३॥ यह कहकर गिरिराज उनके आगे मौन होगये यह सुनकर नारद तुम इसप्रकार तस्वसे कहने कभे॥ ४४)
नारदजी बोडे हें महामते गिरिराज ! यह चिन्ता नहीं करनी चाहिये यहं तुम्हारी सुता काटी प्रहे दक्षकन्या हो चुकी है ॥ ४५॥ इसका
नाम सती था ओर यह सब मंगरकी देनेवाटी थी यह सती दक्षकी कन्या रुदरकी भरिया हं ॥४६॥ पिताके यज्ञम शेकरके अनाद्रको प्राप्त
होकर कोपको प्राप्त हो सतीने देह त्यागकर दिया ॥४७॥ वही अम्बिका शिवा फिर तुम्हारे घरमे प्रगट हृं यह पार्वती शेकरकी पत्नी होगी
इसमे सन्देह नहीं है ॥ ४८ ॥ हे मुने ! यह सज बात तुमने विंस्तारसे पर्व॑तराजे कही थी जो पाकतीका पूरवंहप ओर चरित्र |
॥ बुह्मोवाच ॥ इत्युक्ता स गिरिस्तरष्णीमास तस्य पुरस्तव ॥ तदाकरण्याथ देवष त्वं प्रावोचस्स॒तत््वतः ॥४४॥ नारद उवाच. ॥
न वे कार्यां त्वया चिता गिरिराज महामते ॥ एषा तव सुता काली दक्षजा ह्यभवत्पुरा ॥४५॥ सतीनामाभवत्तस्यास्सर्वमंग
दं सदा ॥ सती सा वें दक्षकन्या भूत्वा शरप्रियाभवत् ॥४६॥ पितुयंज्ञे तथा प्राप्यानाद्रं शंकरस्य च ॥ तंदष्टा कोपमा
घायात्याक्षीदेदं च सा सती ॥ ७ ॥ पुनस्सेव समुत्पन्ना तव गेदेऽम्बिका शिवा ॥ पार्वती हरपत्नीयं भविष्यति न सशयः `
॥ ४८ ॥ एतत्सव विस्तरात्तवं पोक्तवान्भूथृते सुने ॥ पूर्वरूपं चरिजं च पार्वत्याः प्रीतिवर्धनम् ॥ ४९ ॥ तं सर्व पूरववरत्तान्तं
कार्या सुनिसुखाद्िरिः॥ त्वा सपुत्रदारः स तदा निः संशयोऽभवत् ॥५०॥ ततः काली कथां त्वा नारदस्य शुखात्तदा ॥
कनुयाधोष्खी श्रूत्वा स्मितविस्तारितानना ॥५१॥ करेण तां त॒ संस्पृश्य त्वा तच्चरितं गिरिः॥ सुधि शश्वत्तथाघाय स्वास
नान्ते न्यवेशयत् ॥ ५२ ॥ ततस्त्वं तां नर ्टाऽवोचस्तञ स्थितां सुने ॥ दर्षयन् गिरिराजं च मेनकान्तनयैः संह ॥५३॥
बदनेवाछा था ॥ ४९ ॥ तुम्हारे सुखे काटीके उस सम्पूण पूरवबृ्ान्तको सुनकर पर्वतराज एन्चीके सहित सन्देह रहित होगये ॥ ५० ॥
तब काटी नारदजीकै खसे यह सव कथा, सुनकर र्नासे सुल नीचा करक कुठेक हास्यखली हो गई ॥ ५१ ॥ गिरिराज यह सब चरि
छन ओर हायते उसतको स्पशंकर तथा शिर दैवकर अपने आक्षनके समीप बेठाते हए ॥ ५२ ॥ तव तुम हे सनि ! वहां भगवतीको स्थित
हुए देखकर पत्रोसहित गिरिराज ओर मेनाको प्रसन्न करते हए बोडे ॥ ५३ ॥
टि
होगी ॥ ५४ ॥ तुम्हारी तनया रत्नसिंहाप्तनपर भी (4
है राज ! इसके बेठनेका उत्तम सिंहासतनषप आसन तो सदाशिषजीकी जंघ। म उदार
शिवजीकी उद्हीको आस्न पराप्त करेगी जापर किंप्तका मन ओौर दृष्टि नहीं जायगी ॥ ५५ ॥ त्रह्माजी बटे नारद् „ इसका तु 4
वचन कहकर गिरिराजसे भिदाहो स्वको गये ओर भसन होकर गिरिराज भी सब सम्पत्ति उदार् सुद्ध अपने धरम भवि दए ॥ ६
इति श्रीशिवमहाएराणभाषारीकायां रुदरसतहितान्तगततृतीयपावतीखण्डे नारदहिमाख्यसेवादवणनं नामाश्मोऽध्यायः ॥ € ॥ नारदजी बोरे
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शि पु ९
है विपे | हे तात ! हे शेववर ! तुमने शिवजीकी बडी अद्भुत कथा सुनाई आपने जौ करुणाकर कथा मुक्षसे कही दसस मेरे मनमे बहुत (
॥२०२॥
सिहासनन्तु किन्तस्याश्यौरराज भवेदतः ॥ शम्भोकूरौ सदैतस्या आसनं तु विष्यति॥५९॥दरोख्वासनम्पराप्य तनया तव
सन्ततम् ॥ न यर कस्याचिदषटि्मानसं वा गमिष्यति ॥५९॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति वचनुदारं नारद् त्वं गिरीशं त्िदिवमगम
उकतवा ततक्षणादेवप्ीत्या ॥ गिरिपतिरपि चित्ते चाश्संमोदयुक्तरस्वगदमग मदेवं सर्वसपर्समृद्धम् ॥५६॥ इति श्रीशिवमहा 6
पुराणे द्वितीयायां रूढसंहितायां ठतीये पवैतीखंडे नारददिमाल्यस॒म्बाद्वर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥<॥ नारदं उवाच्॥ विधे ¢
तात स्वया शेववर मरज्ञाद्धताकथा ॥ वार्भेता कर्णां कृत्वा भरीतिमे वा्देताधिकृम्॥१॥ विधे गते स्वकं धाम मय वैदिष्यद् ||
शने ॥ ततः किमभवत्तात कृपया तद्वदाधुना ॥२॥ ॥ ब्रह्लोवाच ॥ गतेत्वयि शुने स्वगे कियत्काठे गते सति ॥ मेना प्राप्ये ||@
कदा शैलनिकटं प्रणनाम् सा ॥३॥ स्थित्वा सविनयम्प्राह स्वनाथं गिरिकामिनी॥ त शेकाधिनाथ सा प्राणप्रिया सती ||&
॥ ४ ॥ मेनोवाच ॥ इुनिवाक्यं न बुद्धं मे सम्यङ् नारीस्वभावतः ॥ विवाहं दुर कन्यायास्सुन्द्रेण वरेण इ ॥ « ॥ £
रीति बही ॥१॥ ह विधे ! जब्र मै अपने स्थानको चछा गया ओौर दिव्यदशन हिमवान् भी अपने स्थानको गया हे तात ! तब क्या ।
दुभा छपा कके सुहषते आप यह सब कष्िये ॥ २ ॥ बह्माजी बोठे है सने ! तुम्हारे स्वगं जानेप्र कुछ काठके बीतनेमं एकं स्षमय मेना ४
गिरिराजकै निकट आय प्रणामकर बोटी ॥ ३ ॥ वह गिरिकिामिनी प्राणसदृश प्रिय है एत्री जिप्रको देरी सती षिनयपूरवक अपने नाथ 9
शेनाथते बोटी 1 ४ ॥ मेना बोटी हे स्वामी ! नारीके स्वभावे मैने खछनिराजके वचन भटीपभरकार नहीं समञ्च कन्याका विवाह तौ सन्दर ||4
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( - न नरक य न ~ - ----------- ----- - = ¬
् | साथ होना चाहिये ॥ ५॥ कारण किं अपुवं सुखका देनेवाछा विवाह सरवंदाही सुखदायक होता है इससे शिरिराजको सुलक्षण ओर
£ कुटीन वर मिढना चाहिये ॥ & ॥ हे प्रिय ! जिस्षभ्रकार मेरी प्राणप्रिया कन्या अच्छा वर् भ्रात होकर सुखी हो सो करो तुमको भरणाम है ||
¢ ॥ ७ ॥ ब्रह्माजी बोठे यह कह आंखोमिं आंस मरकर मेना पतिक चरणोँमं गिरी चतुर गिरिराज उ्षको उठाकर कहने रगे ॥<॥ हिमाल्य
बोठे । हे मेनकादेविं म यथाथ कहता हूं तुम तच्वसे घनो तुम भमका त्याग करो स॒निकै वचन कभी असत्य नहीं होते है ॥ ९ ॥ यदि
द| ऽतीपर तुम्हारा भेम है तो आदरसे जाकर उसको शिक्षा दो किं वह भक्तिगूर्वक स्थिरचित्तसे शिवजीका तप करे ॥ १० ॥ हे भेना ! यदि
ह सर्वथा हि भवेत्तवोद्रादोऽपूर्वसुखावहः ॥.वरश्च गिरिजायास्तु सुलक्षणङुलोद्धवः॥६॥ प्राणप्रिया सुतामे दहि सुखिता स्याययथा ट
4 प्रिय ॥ सद्वर प्रप्य सुप्रीता तथा कुर् नमोऽस्तु ते॥७॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता मुखी मेना पत्यं्रयोः पतिता तदा ॥ ता्त्थाप्य |£
गिरिः प्राह यथावत्प्रज्ञसृत्तमः॥८॥ दिमाख्य उवाच ॥ श्रृणु त्वं मेनके देवि यथाथ वच्मि तत्वतः॥भमं त्यज खुनेरवाक्यं वितथं ||
ठ न कदाचन ॥९॥ यदि स्नेहः सुतायास्ते स॒तां शिक्षय सादरम् ॥ तपः कुर्याच्छकरस्य सा भक्त्या स्थिरचेतसा॥१०॥ चेतप्रसत्रः ट
|| शिवः कास्याः पाणि गृह्णाति मेनके ॥ सर्वं भूयाच्छुभं नशयेत्नारदोक्तममगलम्॥११॥अमगखानि सर्वाणि मंगलानि सदाशिव ॥ ट
&|| तस्मात्सतां शिवप्राप्ये तपसे शिक्षय इतम् ॥ १२ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं शिरररवाक्ये मेना भ्रीततराऽभवत् ॥ खुतोपकंठ ठ
मगमदुपदेष्टं तदोरुचिम् ॥ १३ ॥ सुताङ्ग सुकुमारं हि दष्टातीवाथ मेनका ॥ विव्यथे नेनयुग्मे चाशपूणैऽभवतां इतम् ॥
॥ १४ ॥ सुतां सुपदेष्टुं तन्न शशाक गिरिग्रिया ॥ बुबुधे पार्वती तद्रे जननीद्धितमाक्ञु सा ॥ १५ ॥ ट
भसन होकर शिवजी काटीका पाणिग्रहण करं तो सव शुभ॒होजायगा ओर नारद्जीका कहा अगर दूर होजायगा ॥ ११ ॥ सपू अमं
ट| गर सदाशिव मंगठ होजाते है इसकारण शिवकी भरापिकै छथि सुतारो तप करनेकं छवि शिक्षा दो ॥ १२ ॥ बह्लाजी बोडे प॑तराजके ||
|| यह वचन् सुन मेना बहत भरषन्न हदं ओर तप॒ करनेकी रिक्षा देनके निमित्त घुताकै समीप गइ ॥ १३ ॥ मेनका सुताके अग॒ अत्यन्त ह
२५॥ सुकुमार देखकर व्याकर इ ओर तत्काठ दसकै दोनों नेमे जठ भर आया ॥ १४ ॥ गिरिभरिया घुताको उपदेश दैनेम समथ न इद, ॥>
शिण्ुर ६ परन्तु पा॑तीने माताकी समस्त चेश समङ्ञटी ॥ १५ ॥ तब सर्वज्ञा परमेश्वरी कालिका देवी जननी माताको वारंवार समञ्ञाती इदं (त
॥२०३॥ ॥ १६ ॥ पर्वती बोरी हे मैया ! हे महाचरे ! आज रातरिके बाह्म मैने एक स्वप्न देखा है, कहतीहं पाकर पुनो ॥१७॥ एकं ११
&|| ब्राहमण सञचको दया ओर भीतिके सहित शिबजीक उदेश्यते तप करनेकै छथि कहता है ॥ १८ ॥ ब्रह्ाजी बोठे यह सुनते ही मेनाने शीघ्र
ह परतिको बुलार सुताका देसा हुआ बह स्वप्न सुनाया ॥ १९ ॥ गिरिराज मेनाक लके सुताका देखा स्वप्न सुनकर परम रतन हो अपनी
|| अथ सा कालिका देवी सर्वज्ञा परमेश्वरी ॥ उवाच जननीं सद्यः समाश्वास्य पुनः पुनः॥३९॥पावत्युवाच॥ मातरु महाप्रज्ञे
¢ दतनेऽजधुद्ैतंके॥।राज्ौ दृष्टो मया स्वप्नस्तं वदामि कृपां इर्॥१७॥ विप्रश्चव तपस्वी मां सदयः प्रीतिपूरवैकम्॥उपादिदेश सुतपः
ट कृतु मातश्शिवस्य वै ॥१८॥ ब्रह्मोवाच ॥ तच्छत्वा मेनका शी पतिमाहूय तत्र च॥तत्स्वप्नं कथयामास खता द्टमशेषतः ॥
|| ॥१९॥ सुतास्वप्नमथाकण्यं मेनकातो गिरीश्वरः ॥ उवाच परमभरीतः प्रियां सम्बोधयन्मिरा ॥२०॥ ॥ गिरीश्वर उवाच ॥ दे
भियेऽपररात्रान्तेस्वप्नो दृष्टो मयापि हि ॥ तं शण त्वं महाप्रीत्या वर्यं तं समादृरात्॥२१॥एकस्तपस्वी परमो नारदीोक्तरा
ट गधृक् ॥ पुरोपकं सुप्रीत्या तपः कर्तु समागतः ॥२२॥ गरदीत्वा स्वसुतां तजागमं प्रीततरोप्यहम् ॥ मयाज्ञातस्स वे शम्भुनारदो
ट| क्तवरः प्रथुः ॥ २३ ॥ सेवा तस्य तनया्ुपदिश्य तपस्विनः ॥ तं वै प्राथितवांस्तस्यां न तदांमीचकार सः ॥ २४ ॥
प्रियास बोडे ॥ २० ॥ गिरिराज बोले हे भिये ! रात्रि ब्रीततेमे मने भी खवप्न देखा है ऽस्तको तुम सुनो मै आदरसे कहता हूं ॥२१॥ एक
ट| परम उत्तम तपस्वी नारदके कहे वर अगको धारण किये भरे परकै समीपम तपस्या करनेको आया ॥ २२ ॥ भँ बहत प्रसन्न हो अपनी
£ || सुताको टेकर उक्तकै समीप गया, ओर भने जाना कि नारदके कहे वर शिवजी है ॥ २३ ॥ उन तपस्वीकी सेवाके ख्य अपनी तन
& | सुमर्पण करके मने सेवके दिये प्रार्थना की प्र उन्होनिं कन्याद्वारा सेवा स्वीकार न की ॥ २४ ॥
2
4
+ 42 4 4 4 > 4
१ ब्राह्मभूह.तं \ २ ेवायाम् ।
उत स्मय सांख्य ओर वेदान्त सम्मत बहुत विवाद हुभा तव उनकी आज्ञासे सेवाके निमित्त भेरी ता स्थित हद ॥२५॥ हदयमे उनकी इच्छकं ||
४ धारण कर मेरी कन्या भक्तिपुक उनकी सेवा करने ठगी हे वरानने ! यही स्वप्न भने देखा था सो तुमको सुना दिया ॥ २६॥ हे रि! सो ४
¢ कुछ समय तकृ इस वातकी पतीक्षा करो जो योग्य समञ्ञो तो मेरी सम्मति स्वीकार करो॥ २७॥बह्ञाजी बोछे जब गिरिराजने रेसा कहा तब | ¢
ओर गिरिराज शुद्ध चित्ते कुड काठतक इस वातकी परतिज्ञा करते रहे ॥२८॥ क8 समय जव इस प्रकार बीता तब वह परमेश सत्रुषोकी गति
४ सतीके विरहे सवत्र भ्रमण करते हए ॥ २९ ॥ भ्रमु अपने कुक गण साथमे ठि सतीकै प्रेमे विरहाकुढ मनते तप करनेके निमित्त वहां आपे ट
4 अभूद्धिवादस्समहान्सांख्यवेदान्तसमतः ॥ ततस्तदाज्ञया तञ संस्थितासीत्सुता मम ॥२५॥ निधाय हदि तं कामं सिषेवे भक्ति ९
त सा ॥ इति दष्ट मया स्वप्नं भोक्तर्वास्ते वरानने ॥२६॥ ततो मेने कियत्कालं परीक््यं तत्फलं पिये ॥ योग्यमस्तीदमेवेह ||
|| इध्यस्व त्वं मम धुवम् ॥२७॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता गिरिराजश्चमेनका वे षुनीश्वर् ॥ सन्तस्थतुः परीक्षन्तौ तत्फलं शद्धे ठ
©| तसौ ॥२८॥ इत्थर्ब्यतीतिऽरपदिने परमेशः सतां गतिः ॥ सतीविरहसुव्ययो धमन्सरवव सूतिकृत् ॥ २९ ॥ तथाजगाम सुप्र त
द| त्या किद्रणयृतः पथु: ॥ तपः कर्त सतीप्रेमविरहाकुलमानसः॥ २० ॥ तपश्चकार स्वं त पार्वती सेवने रता ॥ सखीभ्यां ¢
¢ सदिता नित्यप्रसन्नारथमभृत्तदा ॥ ३१ ॥ विद्धोऽपि मागेणेश्शम्ुविक्ृति नाप स प्रथुः ॥ प्रेषितेन सुरेस्स्वात्ममोहना् स्मरेण |
१॥ २२ ॥ दुग्ध्वा स्मरं च तयैव स्ववद्विनयनेनसः ॥ स्मृत्वा मम वचः ढो मद्यमन्तदधे ततः॥३३॥ ततः कारेन कियता
विनाश्य गिरिजामदम् ॥ प्रसादितस्स॒तपसा पसन्नोऽभून्महेवरः ॥ ३४ ॥ &
‡ ॥ ३० ॥ ओर वहां तप करने ठगे ओर पार्वती उनकी सेवा करने ठगी ससियोक सहित नित्य उनको प्रसन्न करने ठगी ॥ ३१ ॥ काम ४
¢ बाणसे विदध होकर भी शंकर विकारको परापर न हूए, देवताओंनि उनके मोहनेके निमित्त कामदेवको भजा ॥ ३२ ॥ तब शेकरने अपनी
>
नेवरात्रिसे कामदेवो भस्म कर दिया -ओौर मेरे वचन स्मरणकर आपृ अन्तर्धान होगे ॥ ३३ ॥ फिर कितना एक समयक पीठे गि
मद दूर करके महातप किया; जिससे शिवजी प्रसन्न हए ॥ ३४ ॥ १8 ६
` ~-- ~---~
शि०्पु० लौकिक आचारको मानकर विष्णने शंकरको भतन किया शिवजीने पावतीके साथ विवाह का उस अवक्षरमे वडा १ दुभा ॥ ९“
॥२०४ 7 है तात ! इस भकार पेक्षेपते यह शिषजीका चरित्र आपतते कहा यह शंकरा परम दिव्य चरित्र है अव क्या सुननेकौ इच्छा ह ॥ र &
ह इति श्रीशिषमहाएराणभाषाटीकायां रुद्रसहितान्तततृतीयपावतीखण्डे स्वप्नवणनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ नारदजी बोटठे हं विष्ण रिष्य त
ह & महामाग ! हे विधे ! हे भो ! शैवभरे्ठ ! माप इत शिवटीठाको विस्तासूरवक क्षसे किये ॥ 9 ॥ सके विरहको भा हुए शिवजी
ठ लौकिकाचारमा्चित्य श्रो विष्णुप्रसादितः ॥ कालीं विवादयामास व) ॥ २५ ॥ इत्येतत्कथितं तात् समा
|# साच्रितं विभोः ॥ शंकरस्य परदिव्य किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ३६॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शुदरसंहितारथा
तृतीये पार्वतीखण्डे स्वप्नवणण्णनपू ° संक्षेपशिवचरितव्णन नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ नारदं उवाच हि विष्णुरिष्य महाभाग
६ विधे ववर प्रभो ॥ शिवलीखामिमां व्यासात्प्रीत्या मे वक्तमर्हसि ॥ १ ॥ सतीविरहयुकंशंम्थुः किं चक्रे चरितन्तथा ॥
4 तपः कर्तुं कदायातो हिमवत्पस्थयुत्तमम् ॥ २ ॥ शिवाशिवशिवादो ऽभूत्कथ कामक्षयशच मे ॥ तपः कृत्वा कथम्प्राप शिवं
| शम्भु च पार्वती ॥ ३॥ तत्सर्वमपरं चापि शिवसच्चरितं परम् ॥ वक्तम हंसि मे ब्रह्मन्भदानन्दकरं जुभम्॥ ४ ॥ सूत उवाच ॥
| इति अत्वा नारदस्य प्रश्रं छोकाधिपोत्तमः॥ विधिः प्रोवाच सुप्रीत्या स्परृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥ ५ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ देवष
, ||| शैववर्या तद्यशः शृण चादशत् ॥ पावनं मङ्गलकरं भक्तिवर्धनइुत्तमम् ॥ ६ ॥
ह "||| फिर कया किया वह हिमाठय पवक उप्र किस समय तपस्या करे आये ॥ २॥ शिवा शिव्का विवाद किस पभरकार हु
पा.सं-२ [||| कामक्षय किप प्रकार हुआ, पावंतीने तप॒ करके शिवजीको किंत भ्रकार प्राप्त किया ॥ ३ ॥ यह सव तथा ओर दृक्रा
अ०१० ||| भी शिवजीका चरित्र हे बहन् ! महान् आनन्दका करनेवाटा खुङ्षसे किये ॥ ४ ॥ सतजी बोटे इस प्रकारमे नारदजीके
|| बचन सुनकर शिवजीके चरण कमठोके स्मरण कर विधाता प्रसनन हो बोढे ॥ ५॥ ब्रह्माजी बो हे देवर्षे नारदजी ! हे शेवगरष्ठ ! आद्रे
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४ शिवजीका यश श्ुनो जो परम पवित्र मंग करनेवाछा ओर उत्तम भक्तिका बढनेवाा है ॥ ६ ॥ भ्रियाके बिरहमे कातर शिवजी अपने पवतम त
आकर अपनी भ्राणप्यारी सती देवीको हदये स्मरण कएने ठ्गे ॥ .७ ॥ शोचते हए गणो सतीके प्रम बटानेवारे शण कने कगे ओर
| छोकिककी गतिको स्मरण करते हए पुरातन गाथा कहने ठगे ॥<॥ फिर गृहस्थकौ सद्रतिको छोड शंकर दिगम्बर रहने लगे ओर सब ¢
ठीछाओंमं विशारद सबरोकोम भ्रमण करने ठगे ॥ ९ ॥ सतीके विरहे दुःखी हए कहीं उस्तके दशेनको पराप्त न होकर फिरभी कल्याण
कारी शकर भक्तं गिर स्थानपर आये ॥ १० ॥ फिर यत्ने मनको सावधानकर इुःखनाशिनी समाधिको ठगाकर अपना अविनाशीरूप ट
आगत्य स्वगिरिं शम्भुः प्रियाविरईकातरः॥ सस्मार स्वप्रियां देवीं सतीं प्राणाधिकां हदा ॥७॥ गणानाभाष्य शोच॑स्तां तद ¢
णान्प्रमवधेनान् ॥ वर्णयामास सुप्रीत्या दश्य्टौकिकीं गतिम् ॥८॥ दिगम्बरो बभूवाथ त्यक्ता गारस्थ्यसद्रतिम् ॥ पुन्भाम
लोकान्वै स्ीहटीराविशारद्ः ॥९॥ दशनम्ध्ाप्य कु्ापि सतीषिरहददुःखितः॥ एनश्च गिरिमायातश्शंकंरो भक्तशेकरः ॥१०॥ ||@
समााय मनो यत्नारसमाषिन्दुःखनाशिनम् ॥ चकार च ददशासौ स्व्पं निजमन्ययम् ॥ 99 ॥ इत्थं चिरतरं स्थाणस्तस्थौ ||
ध्वस्तगुणत्रयः॥ निर्विकारी परम्ब्रह्म मायाधीशस्स्वयम्भरभुः ॥ १२ ॥ ततस्तमाधिन्तत्याज व्यतीय द्यभितास्समाः ॥ यदा ||#
तद् बभूवाशु चरितं तद्वदामि वः ॥१२॥ प्रभोरुलाटदेशात्त यत्पृषच्छमसंभवम् ॥ पपात धरणौ तञ स बभूव शिष्ष्ठतम् र
॥ 9४ ॥ चतुुजोऽरणा कारो रमणीयङ्ृतिशने ॥ अलौकिकट्यतिः श्रीमोस्तेजस्वी परदुस्सहः ॥ १९4 ॥ रूरोद स शिश
स्तस्य पुरो दि परमेशितुः ॥ प्राकृतात्मजवत्तत् भवाचाररतस्य हि ॥ १६ ॥
देखन रगे ॥ ११ ॥ इसप्रकार तरियणोँमे परे शकर बहुत समयतक अपने परषतपर स्थित रह वह निर्विकार परवह्ञा मायाधीश स्वयम्पभु हे ॥३२॥ २
फिर बहुत दिनोके बीतजानेपर शंकरने समाधि त्यागकौ उ्तसतमय जो जो चरित रंभा वह वह तँ सव कहता हू ॥ ३३॥ तप करते समय भुके ट
ह
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ठटाटस्थान से जो पसीना गिरा उत्ते एक नाककभगर हज ॥ १४॥ चर॒मूजा अरुण आकार मनोहर आकृति अलौकिकं श्रीमान् तेजसी शत्रभोंको |
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दुःसह था ॥ १५ ॥ वहं बाठक परमेश्वर शकर्जीके समीप रोने गाजे कोई साधारण एत रोता हो इसभकरार वह भवाचाररत भिवजीका एत्र
। | | हुम ॥ १६॥ फिर बुद्धिस विचारकर पृथिवी देवी स्वयं च्लीका शरीर धारणकर शकरसे भयमान भगट हदं ॥ १७ _॥ ओौर उक् वाख्कको
॥२०५॥ || उढाकर खिढाने ठगी तथा अपना दूध पिछाने ठगी ॥ १८ ॥ है्कर प्मसते उसका खख चमने ठगी ओर सत्यभावे बाठकके रमते १,
ठ प्रमेशका हितकरने गी ॥ १९ ॥ कौतुकी शंकर कती इत प्रकारके चरित्रको देखकर अन्त्यगमी ईते दूए पृथिवी बोठे ॥ २० ॥ हे भूमि । ट
तुम धन्य हो प्रमे इस मेरे बाठकको पाठो मेरे भमके जरते यह तुम्हारेमे उत्पन्न हुआ महातेजस्वी भ्रष्ठ होगा तुम इसमे अदधुत परेम करो ॥ २१ ॥ ट
ए तदा विचार्य सुधिया धृत्वा स॒ख्ीतवक्षितिः ॥ आविर्बभूव तत्रैव मयमानीय शंकरात्॥१७।तम्बालं द्रुतशुत्थाप्यक्रोडयांनिदधे ठ
ट वरम् ॥ स्तन्यं सापाययत्परीत्या दुग्धे स्वोपरिसम्भवम्॥ १८ चुचुम्ब तन्पुखं स्नेदात्स्मित्वा करीडयदात्मजम्॥ सत्यभावात्स्वये ¢
दर| माता परमेशदितावहा॥१९॥ तष्टा चरितं शम्भुः कौतुकी सुतिकरत्कृती ॥ अन्तयामी विदस्याथोवाच ज्ञात्वा रसां इरः॥२०॥
£ धन्या त्वं धरणि प्रीत्या पाल्येत खतं मम ॥ त्वय्युदधतंश्रमजलान्महातेजस्विनो वरम् ॥२१॥ मम श्रमकभूर्वालो यद्यपि पिय ६
ट
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कृत्क्षते ॥ त्वत्नाम्ना स्याद्ववेल्यातशचितापरहितस्सदा ॥२२॥ असौ बाकः दाता हि भविष्यति गुणी तव ॥ ममापि सुख
दाता हि गृहाणेनं यथारूचि ॥२३॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्त्वाविररामाथ किंचिद्विरहश्क्तधीः खोकाचारकरो ॥ श्रो निविकारी
रुस.२
पा.खं.३ ह
अ०१० ठ
ॐ
| यह बालकं प्रथिवीमे मेरा प्रियकारी होगा तो भी हे भूमि ! तेरे नामसे यहं विख्यात होकर सदा तीनो तापे रहित होगा ॥ २२. ॥ यह
बालक भूमिदानी बडा गुणी होगा ओर यह सञ्च भी सुखका देनेवाखा होगा यथारुचि तुम इसको प्रहण करो ॥ २३ ॥ बज्ञाजी बोटे यह कहकर
कुक वियोगसे बुद्धिको हटाकर शकर विरामको पराप्त हुए ग्रह शकर भगवान निर्विकारी है परन्तु सत्परुषोंकी भ्रियताके कारण छोकाचार करते
सताम्प्ियः ॥ २७ ॥ अपि क्षितिर्ज॑गामाञ्चु शिवाज्ञामधिगम्य सा ॥ स्वस्थानं सुता प्राप सुखमात्यतिकं च वै ॥ २९ ॥ |©
है ॥ २४ ॥ तब पृथिवी शिवजीकौी आज्ञा पाकर ची गई ओर सुतक्षहित अपने स्थानको भाप्र होकर बडा सुख माना ॥ २५ ॥ वह बाठ्क ||
£
स बालो भौम इत्याख्यां प्राप्य भूत्वा युवा दतम् ॥ तस्यां काश्यां चिरं काट सिषेवे शंकरम्प्रथुम् ॥ २६ ॥ ट
&
£
¢
भोभनामको धराप्त होकर तत्काठ ही युवा हो गया ओर काशी चिरकारतकं भगवा शंकरकी सेवा करता रहा ॥ २६ ॥ वह भूमिषत्र शिव र
¢ जीकी रूपात प्रहत्वको भ्राप्त होकर शुक्कटोकमसे भी आगे दिव्यरोकको प्राप्त हआ ॥ २७ ॥ यह सतीकै विरहकै समयका शिवजीका चरित्र
|| एमसे कहा हे खने ! अव आदरे शिवजीकी तपस्याका वणेन सुनो ॥ २८ ॥ इति शरीशिवमहाऽराणभाषादीकायां रदरसंहितान्तगंततृतीये पावती |
¢ खण्डे मोमोत््तिवणनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ब्रह्माजी वोटे जिक्र समय वह ोकपुजित हिमाठ्यकी एत्री साक्षात् शक्तिहपते हिमाल ¢
|| यके धर बढने गी ओर हिमायकै घरमे आढ वकी स॒ती हई ॥ १ ॥ तव केठासपति पाव॑तीका जन्म जानकर विरहे कातर हो गये,
£ विश्वेश्वरप्रसादेन अरहत्वं भराप्य भूमिजः॥ दिव्यं लोकं जगामा शुक्रलो कात्पर व्रम्॥२७॥ इत्य्॒तं शम्भुचरितं सतीविरदसयु ¢ ।
#|| तम्॥तपस्याचरणं शम्भोश्शणु चाद्रतो सुने ॥२८॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायाुढसंहि तायां तीये पार्वतीखण्डे भौमो ‰
¢ त्पत्तिशिवरीखावृर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ वद्ेमाना गिरेः पुरी साशक्ति छोँकपूजिता॥ अष्टवर्षा यदा
जाता हिमाखयगृहे सती ॥ 9 ॥ तजन्म गिरिशो ज्ञात्वा सतीविरहकातरः॥ कृत्वा तामद्धतामन्तस॑मोदातीव नारद ॥ २॥ ¢
४ तस्मित्नवान्तरे शम्भुर्लोकिकीं गतिमाश्रितः॥ समाधातुं मनस्सम्यकंतपः कर्तुं समेच्छत ॥३॥ कांधिद्रणवराज्छान्तात्तयादीनव ट
गृह्य च ॥ गङ्गावतारमगमद्धिमवत्प्रस्थसत्तमम् ॥ 8 ॥ यन्न॒ गेगा निपतिता परा बह्मपुरात्छता ॥ सर्वाधौषविनाशाय पावनी ॥©
परमा सने ॥ ५ ॥ तपःपरारम्भमरकरोत्स्थ्वा त॒ वशी हरः ॥ एकाथ चिंतयामास स्वमात्मानमतन्द्ितः ॥ ६ ॥
ट
ओर हे नारदजी ! उपतको जानकर मनम बडे भ्रसतनन हूए ॥ २ ॥ शिवजी उसी समय लौकिकी गतिका आश्य कर मन सावधान करनेकी
इच्छात तपस्या मन ठगानेकी इच्छा करने ठगे ॥ ३ ॥ कुछ एक नन्दी आदि शान
॥ | त ओर श्रष्गणोको साथ ठेकर हिमाख्यके शिखरके
| समीप गेगाइतरण स्थानम आये ॥ ४ ॥ जहां बह्ञाजीकफे कमण्डठुपे गंगाजी निपतित इह है, हे सने ! जो समस्त पाप दूर् करने वाङ प्रम
|| पाविनी ह ॥ ५ ॥ वहां शिवजी मनकै निग्रह पूर्वक. तपस्या करने कगे ओर आरुस्य |
९९
रहित हो एकाथ चित्ते अपनी आत्मको चिंतन करने
म ० न्द + कै | श्रय पर ९
ठे ॥ ६ ॥ जो सथका चैतन्य करने वाठा जानते परगट नित्य ज्योतिखरूप निरामय जगत व्याप चिदानंद द्ैतहीन किती आ
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शिर तैर नन्दी आदि गण तथा मृगी ¢
॥२०६ रहने वारे नहीं है ॥ ७ ॥ जि समय भगवान् धकर अपने आत्माका ध्यान करने ठगे उस्न समय प्रमथ अं ॥
आदि गण भी ध्यानम तत्पर ॒हो गये ॥ ८॥ ओर कोई कोई गण परात्मा शंकरकी सेवा करने लगे ओर कोई मौन हौ कुछ ५
न बोले केवल द्वारपाठता करने खगे ॥ ° ॥ उती समय वहां हिमाठ्य आये उस ओषधी वाटे शिखरमं शंकरका आगमन सुन ट
कर आदरसे ॥ ३० ॥ पूर्बतराज अपने सवक वगोके सहित प्रमुको रणाम करने आये ओर गणो सहित उनकी पूजा कर हाथ जोड भणामं ट
चेतो ज्ञानभवं नित्यं ज्योतीह्पं निरामयम्॥ जगन्मय चिदानन्दं द्वेतदीने निराश्रयम्॥७॥ इरे ध्यानपर तस्मिन्प्रमथा ध्यानत ¢
ट
त्पराः॥अभवन्फेचिदपरे नन्दिभग्यादयो गणाः॥८॥ सेवां चङघस्तदा केचिहरूणाः शम्भोः परात्मनः।नेवाकूजस्तु मौना हिद्वारपाः ¢
केचनाभवन्॥९॥एतस्मन्नन्तरे तज जगाम हिमभूधरः॥ शङ्करस्योषधिपरस्थे अत्वागमनमादरात्॥१०। प्रणनाम प्रथु शरं सगणो
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भरधरेश्वरः ॥ समान्चं च सुप्रीतस्तुष्टाव स कृता्रलिः॥११।दहिमालय उवाच ॥ देवदेव महादेव कपदिज्छकर् प्रभो ॥ त्वयेव
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लोकनाथेन पालितं भुवनभ्रयम् ॥१२॥ नमस्ते देवदेवेश योगिह्पधराय च ॥ निथणाय नमस्तुभ्यं सगणाय विदारिणे ॥१३॥
कैलासवासिने शम्भो सर्वलोकाटनाय च ॥ नमस्ते परमेशाय लीलाकाराय श्ुलिनि।9९ ॥परिपरणयुणाधानविकाररदितायते ॥ |£
नमोऽनीहाय वीहाय धीरायपरमात्मने॥१९॥अबहिर्भोगकाराय जनवत्सलते नमः॥ बिशुणाघीश मायेश ब्रह्मणे परमात्ममे॥१६॥ ४
|
कृर स्ति करने छ्गे ॥ ११॥ हिमाल्य बोे हे देवं देव ! महादेव कपर्दिंग हे प्रभो ! हे शकर ! आप्ही टोकनाथने तीनों मुवनोकी
पारना की है ॥ १२॥ हे देवदेवेश ! योगीहूपधारी आपको प्रणाम है निंण भी सगुणपसे विहार करनेवारे आपको प्रणाम है ॥ १३॥
आप कैछास वासी शिव सब छोकमे विचरनेवाडे परमेश्वर टीठा करनेवारे शूढधारी हो आपको नमस्कार है॥१४॥ आप् परिपूणं यणोंके आकर
विकाररहित है स्वयं इच्छारहित भी भक्तोके अर्थं इच्छावाठे हो इसमे धीर ओर परमात्मा आप्ही जाने जाते हो ॥१५॥ बाहरके भोग नकरनेवारे ||
रु°स.2
पासं.
अ०११
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भक्तकि उप्र छपा करनेवाठे आपको नमस्कार है तीनों यणोके अधीश्वर मायके पति परमात्मा बह्म आपको नमस्कार है ॥ १६ ॥ बहला त
विष्ण आदि आपका पेवन करते है तुम ब्रह्मा ओर विष्णके स्वरूपहो तुम ब्रह्मा विष्णको सव कुछ देते हो भक्तोके प्यारे हो तुमको नमस्कार ट
है ॥ १७॥ आप् तपस्या रत तपस्याके स्थान अच्छे तपका फल देनेवाठे है, तपको प्यार करनेवाे शान्त बहप आपको प्रणाम है ॥१८ ठै
आप् व्यवहार ओर ठोकाचार भी करते है, सय॒णपरेश प्रमात्महूप आपको भरणाम है ॥ १९ ॥ हे परेशान ! आपकी लीलछाको कोह नही ठै
जानता है पकी छीठा सधुभको सुख देनेवाी है तुम भक्तोके अधीन स्वरूपवाछे हो आप भक्तोके वशीभूत होकर कर्मं करते हो ॥२०॥ त
विष्णुत्रह्मादिसेभ्यायविष्णुब्रह्मस्वरूपिणे ॥ विष्णु्रह्मकदारे ते भक्तप्रिय नमोऽस्तु ते ॥ १७॥ तपोरत तपःस्थानङ्तपःफल |¢
दायिनि ॥ तपःप्रियाय शान्ताय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे ॥१८॥ भ्यवहारकरायैव लोकाचारकराय ते ॥ सथ॒णाय परेशाय नमोस्त॒ |€
परमात्मने ॥ ॥ १९ ॥ रीलातव महेशानवे्या साधुस॒खप्रदा ॥ भक्ताधीनस्वरूपोऽसि भक्तवश्यो हि कर्मकृत् ॥२०॥ मम ए
भाग्योदयादच त्वमागत इह प्रभो ॥ सनाथं कृतवान्मां त्वं वणितो दीनवत्सलः ॥२१॥ अय मे सफलं जन्म सफलं जीवनं ट
मम ॥ अद्य मे सफलं सर्वं यद्र त्वं समागतः ॥२२॥ ज्ञात्वा मां दासममग्यग्रमाज्ञान्देदि भरेश्वर ॥ त्वत्सेवां च महाप्रीत्या ६
कु्यामहमनन्यधीः ॥२३॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकषण्य वचस्तस्य गिरीशस्य महेश्वरः ॥ रकिचिढन्मीस्य नेते च ददशं सगणं ॥£
गिरिम् ॥ २४ ॥ सगणं तन्तथा दृष्ट्रा गिरिराजं वृषध्वजः ॥ उवाच ध्यानयोगस्थःस्मयश्चिव जगत्पतिः ॥ २५ ॥ ट
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ए
हे भो 1 मेरे भाग्योद्यकै कारणे ही तुम यहां अये हो है दीनवत्सढ ! आपने श्ञे सनाथ कर दिया है ॥ २१ ॥ आज मेरा जीवन ओर ह
जन्म् सफर है आज मेरा स्वह सफठ है जो फि आपका यहां आगमन हुआ है ॥२२॥ हे महेश्वर ! अप्रना जानकर सत्ते आप निस्सकोच आज्ञा ट्
दीजिये मे अनन्य बुद्धि होकर पमे आपकी सेवा करेगा ॥ २३ ॥ व्र्माजी बोठे महे्र भिरीशके यह वचन सुन केक नेत्र खोककर गणों्हित ४
गिरीशको देखने ठगे॥ २४।ृषभध्वजने इष भकार गणो सहित गिरिराजको देखा ओर कुछ हेषते हृए जगत्पति ध्यानयोगमे स्थित होकर बोडे ॥२५॥ ४ |
शि ७चु०
॥२०५७॥
व , "वड महात्मा तपके
शंकरजी बोे मै एकान्तमे आपके स्थानम तपस्या करने भया ह आप दसा कीजिये किं कोई मेरे समीप न आपे ॥ २६ ॥ तुम बड महासा
म ब्राह्मण क्षत्रिय १९य
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स्थान हो तपोधन सनि सदा तुम्हारे आभित रहते है देवता राक्षस तथा दृप्रे महात्माओकिं आश्रय हौ ॥ २७॥ सदा तुम्हारे र #
¢ निवास करते है प्रम पि गंगा सदा तुम्हारे शिखरप्र वहन करती है तुम सवम भ्रष्ठ परोपकारी हो गिरियोको अधिपति प्रभुही ७ र्
ठ इस गेगावतारमे तपस्या कैगा हे गिरिराज ! तुम इन्दियनिग्रहमे परायण हो गैं पेमसे तुम्हारे आश्रित रहंगा ॥२९॥ हे गिरिश्रेष्ठ 1 जित कार् ||
¢ महेश्वर उवाच ॥ तव पृष्ठे तपस्तप्तुं रदस्यमहमागतः ॥ यथा न कोपि निकटं समायातु तथा कुश् ॥ २६ ॥ त्वं महात्मा ९ |
¢ तपोधामा सनीनां च सदाश्रयः ॥ देवानां राक्षसानां च परेषां च महात्मनाम् ॥ २७ ॥ रूदा वासो द्विजादीनां गंगाप्ूतच ह
नित्यदा ॥ परोपकारी स्वेषां गिरीणामपिपः प्रथः ॥२८॥ अहं तपञ्वराम्यत्र गंगावतरणे स्थरे ॥ आश्रितस्तव सुप्रीतो ४
९ गिरिराज यतात्मवान् ॥ २९॥ निर्विन्र मे तपश्चा् हेतुना येन शेलप ॥ सर्वथा हि गिरिश्रेष्ठ सुयलनं कुर् साम्प्रतम् य
ए ॥ ३० ॥ ममेदमेव प्रमं सेवनं पर्वतोत्तम ॥ स्वगं गच्छ सत्प्रीत्या तत्संपादय यन्तः ॥ ३१ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्त्वा ४
| जगतां नाथस्तुष्णीमास स सूतिशृत् ॥ गिरिराजस्तदा शम्थुं प्रणयादिदमवबवीत् ॥ ३२ ॥ ॥ दिमाल्य उवाच पूजितोऽसि
| जगन्नाथ मया त्वम्परमेश्वर ॥ स्वागतेना् विषये स्थितं त्वाम्पार्थयामि किम् ॥ ३३ ॥ महता तपसा त्वं हि देवैर्यत्नपरा ए
&|| भितैः ॥ न प्राप्यसे मदेशान स त्वं स्वयघुपस्थितः ॥ ३९ ॥ ट्
४ णे मेरी तपस्या निरवि्र हो इस प्रकारसे यतन आपको करना चाहिये ॥ ३० ॥ हे पव॑त भ्ेष्ठ ! मेरी यही परम सेवन है कि आप घर जाकर प्रेमे ४
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रसं २
पा.खं.३
अ०११
| निर्वि तपश्वया होनेका यत्न करिये ॥२१॥ ब्रहाजी बोटे जगते स्वामी भगवान् इस प्रकारकी आज्ञा देकर मौन हए ओर गिरिराज
बहुत नय्र हो इस प्रकारक वचन शिवजीसे बौठे ॥३२॥ दिमा्य बोडे हे जगत्पति ! हे नाथ ! भने आपकी पूजा की है आपका स्रागत हो 2
यहां आप् स्थित होये ओर मँ आपकी क्या भराथना कं ॥ ३३॥ हे महेशान ! देवताओंके वडे बडे यतन ओर तपस्यात्ते भी आप प्राप्त नही ||
हो ्षकते सो आप स्वयंही मेरे स्थानपर पधार ॥ ३४ ॥ मेरे समान भाग्यवान् बडाईके योग्य कोह दूस्षरा नहीमेरे पृष्टपरजो आप् तप ६
४ । आये यह मेरा बडा भाग्यहै ॥ ३५ ॥ हे परमेश्वर ! पतो अपनेको देवेन्द्रभादिसे भी विशेष मानता हं आपने गणोँसहित यहा पधार ¢
्ै|कए भक्षे अनुग्रहका भाजन बना दिया है ॥३६॥ हे देव ! आप यहां स्वतंत्रता निर्व्र तपस्या कीजिये मेँ आपकी सेवा करूगा हे प्रभो ! र
¢ मे भापका सदाका दास हूं ॥ ३७ ॥ ब्रह्माजी बोटे गिरिराज रेस्ा कहकर शीघतासे अपने स्थानको आये भौर आदरसे अपनी भरिया सब ¢
¢ वृत्तान्त कहा ॥ ३८ ॥ हे नारदजी ! उस समय हिमाख्यने अपने परिवारकै सव सेवकोको बुछाकर यह ब चन कहे ॥ ३९ ॥ हिमालय बोे ¢
/ मततोप्यन्यतमो नास्ति न मत्तोऽन्योऽस्ति १ मत्पषठे तपसेसमुपस्थितः॥ ३५।देवेन्द्रादधिकम्मन्ये स्वात्मा ¢
५ नम्परमेश्वर॥सगणेन त्वयागत्य कृतोऽनुग्रहभागदम्॥ २६॥[नातघ कुर् देवेशस्वतन्वः परमन्तपः॥करिष्येऽहन्तथा सेवांदासोऽ $
|| इन्ते सदा प्रभो॥ ३७ ब्रह्मोवाच इत्युक्ता गिरिराजोऽसौ स्वं वेश्म इुतमागतः॥ वृत्तांतं तं समाचख्यौ भरियायै च समादरात्॥३८॥
«|| नीयमानान्परीवारान्स्वगणानपि नारद्॥समाहूयाखिलाञ्छरुषतिः प्रोवाच तत्त्वतः॥ २९॥ दिमाख्य उवाच ॥ अदय प्रभृतिनो यातु ६
द| कोपि गगावतारणम्॥मच्छासनेन मत्स्थं सत्यमेतदरवीम्यडम्॥४०॥ गमिष्यति जनः कश्चित चतं महाखलम्॥ दण्डयिष्ये - ||
विशेषेण सत्यमेतन्मयोदितम्॥७१॥ इतितान्स नियम्या स्वगणाप्निखिखान्छुने ॥ सुयत्नं कृतवान्छैरस्तं शरण त्वं वदामि ते |©
४ ॥४२॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दरसंहितायान्तरतीये पारवतीखण्डे शिवशेरसमागमवर्णनंनायैकादशोऽध्यायः॥११॥ |£
आजे ठेकर कोद भी गेगावतरण स्थानकी ओर मत जाना मेरी यह आज्ञा है इसको सव मानना यहं नै सत्य कहता हं ॥ ४० ॥ ओर यदि |£
|| कोई वहां जायगा तो भ॑ उस दुष्क अवश्य दण्ड दंगा यहं भँ सत्यही कहता हं ॥ ४१ ॥ हे खन ! इस भरकार अने सव सेवकवरगोको समना #
ह| कर शेकराजने जो यतन क्रिया था सो नो वह भ तुमसे कहता हूं ॥ ४२ ॥ इति भीशिवमहाषराणभाषाीकायां स्रसंदितान्तरगततृतीय ¢
>| पार्वतीखण्डे शिवशेकसमागमवणेनं नामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ $
शि ७पु
॥२०८॥
रु०्स्.
पा.खं.
अ०१
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षान ब न्न्न्न्~ ` ओ ठ
बाजी बोे तव हिमाठय प्रसन्न हो अच्छे धुप ओर फठोको ठेकर अपनी एत्रीके सहित शिषजीकै समीप गये ॥ १ ॥ वा
ध्यानम तत्पर त्रिलोकी नाथो भणामकर काटी नामकी अपनी अदत कन्याका शकरजीको अर्पण किया ॥ २॥ ओर उन सुव् ष्पफठा। दया
शंकरजीके आगे रखकर ओर हुताको आगे करक इस प्रकारके वचन कहे ॥३॥ हिमाखयने कहा ! है भगवनु ! यह मेरी कन्या आपक्।
सेवा करनेको उत्सुकं है इस कारण इते मँ आपके समीप छाया हू ॥ ४ ॥ सखियोके सहित यह नित्य आपकी सेवा करेगी इस कारण यदि
आपकी मेरे ऊपर छपा है तो आप अवश्य इते सेवामें स्वीकार करनेकी आज्ञा दीजिये ॥ ५ ॥ बह्माजी बोरे भगवान् शकरनं उस कन्याको
॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ अथ शलपतिरहषटः सत्पुष्पफलसं चयम् ॥ समादाय स्वतनयासहितोऽगादरुरांतिकम् ॥१॥ स गत्वा्िजगत्राथं
प्रणम्य ध्यानतत्परम्॥अर्थयामाप्त तनयां कारं तस्मे इदाद्ुताम्॥२॥ फलपुष्पादिकं स्व तत्तदगर निधाय सः॥ अभ्रे कुत्वा
सुतां शम्भुमिदमाह च शेलराद्॥२॥ हिमगिरिश्वाच।भगववंस्तनयामे त्वां सेवितं चन्द्रशेखरम् ॥ समुत्सुका समानीता त्वदा
राधनकांक्षया ॥४॥ सखीभ्यां सह नित्यं त्वां सेवतामेव शंकरय्॥ अन॒जानीदहि तां नाथ मयिते यद्यचुरहः ॥५॥ ब्रह्मोवाच ॥
अथ तां शंकरोऽपश्यत््मरथमारूढयोवनाम् ॥ फएषटेन्दीवरपाभां प्रण॑चन्द्रनिभाननाम् ॥ & ॥ समस्तलीलासंस्थानश्ुभवेषवि
जम्भिकाम्॥ कम्बुग्रीवा विशालाक्षीं चार्कर्णगुगोज्ज्वलाम् ॥७॥ भृणालायतपर्य्यन्तबाहुयुग्ममनोदराम्॥राजीवकुडमलप्रख्यौ
घनपीनौदटौस्तनौ ॥ ८ ॥ बिभ्रतीं क्षीणमध्यां च िवखीमध्यराजिताम् ॥ स्थलपद्यप्रतीकाशपादथुग्मविराजिताम् ॥ ९ ॥
ध्यानपंजरनिर्वदधशुनिमानसमप्यलम् ॥ दर्शनाद्धंशने शक्तां योषिद्रणशिरोमणिम् ॥ १० ॥
यौवनकी भ्रथमावस्थामे देखा जो एडे नीठे कमलके समान कांतिवाटी पृणंचन्द्रके समान सखवाटी थी ॥ ६ ॥ सम्पूणं लीलाओंका स्थान
सुन्दर वैशसे भरकाशित शंखके समान गरदन विशालनेत्र सुन्दर दोनों कानके कणेभूषणोंमे उज्ज्वल ॥ ७ ॥ मृणाठके स्मान चिकनी
ठम्बायमान भुजा कमर कीके समान घने ठ दोनों स्तन ॥ < ॥ धारण किये पती कमर त्रिव्ी युक्त मध्य॒ भागसे
शोभायमान स्थर्पन्नक समान दोनों चरणो विराजमान ॥ ९ ॥ जो ध्यानमे निमग्न मनकै वशीभूत करनेवाटे खनियोके भी मनको दशेन मात्स
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हरणकरनमे समथं चिर्योकी शिरोमणि थी ॥ १० ॥ हे नारदजी इस प्रकार ध्यानियोकै मनको भी हरण करनेवाटी तन्त्रमन्जोँको बढानेवाडी ४
कामरूपिणी उस कन्याको देखकर ॥ ११ ॥ रेते उत्तमटपके दशनकर शिवजीने अपने नेत्र मीच घ्य कारण किं आपही परत्व महायोगी ४ |
ट ्रिश॒णपते परे अधिनाशी है ॥ १२॥ इस भकार सवक इश्वर सवेव्यापक तपम तत्पर नेर मूंदे जटाजूट धारे चनद्रकलाका भूषणधारे वेदान्तसे |
ट| जानने योग्य परमासने स्थित शंकरको देखकर ॥ १३ ॥ संशयपूरवक शंकरके चर्णोमं हिमाख्यने रणाम किंया ओर वाक्य बोखनेवारछोमे ठ
है| ते गिरीश जगतके एक मातर बंधु शकरजीे फिर बोरे ॥ १४॥ हिमाठ्य बोट । हे देवदेव महादेव ! हे करुणाकर ! हे शकर ! हे विभो! नेत्र
|| दृष्टा तां तादृशीं तात ध्यानिनां च मनोहराम् ॥ विग्रहे तन्घमन्ाणां वद्धिनीं कामरूपिणीम् ॥१३१॥ न्यमीरयदशौ शीर
६ दध्यौ स्वं हूपसुक्तमम् ॥ परतत्वं महायोगी तरशणार्परमव्ययम्॥१२॥ दष्टा तदानीं सकेश्वरं विधं तपोजषाणं विनिमीलि
|| तेक्षणम् ॥ कपर्दिनं चन्द्रकलाविभरषणं वेदान्तवेद्यं परमासने स्थितम् ॥ १३ ॥ ववन्द् शीष्णां च पुनहिमाचलः स॒ संशयं
| राप ददीनसततवः ॥ उवाच वायं जगदेकन्धुं गिरीश्वरो . वाक्यतिदां वरिष्ठः ॥ १९ ॥ हिमाचक उवाच ॥ देवदेव महा
र देव करणाक्र शंकर ॥ प्श्य मां शरणम्प्रा्तमुन्मील्य नयने विभो ॥ १५॥ शिव शवं मदेशान जगदानन्दङ्त्प्रमो ॥ त्वां
नतोऽहं महादेव सर्वापद्विनिवर्तकम् ॥ १६ ॥ न त्वां जानंति देवेश बेदाश्शाच्चाणि कृत्स्षशः॥अतीतो सदहिमाध्वानं तव बाङ््
|| मनसोः सदा ॥ १७॥ अतद्रया्त्तितस्त्ां वै चकितं चकितं सदा ॥ अभिधत्ते अतिः सर्वां परेषां का कथा मता ॥१८॥
| जानति बहवो भक्तास्त्वत्कृषां प्राप्य भक्तितः ॥ शरणागतभक्तानां न छापि भमादिकस् ॥ १९ ॥
# सोककर देखो भ आपकी शरणमे प्रा हुआ हं ॥ १५ ॥ हे शिव ! स्वं महेशान जगते आनंद करने बाछे हे महादेव ! षव आपक्तिके दूर
ट
|
करने वाटे भ भापको प्रणाम करता हूं ॥ १६ ॥ हे देवेश ! सम्पूणं वेद शाज्ञादिभी आपको नहीं जानक्तकते वाणी ओर भनसे तुम्हारी महिमा
षदा परे है ॥ १७ ॥ तुम्हारे पास न पहुंच कर भी शाच्च सदा. चकित् रहता है जब शरतिकी यह दशा है तब दृरोकी तो क्या कथा है
॥ १८ ॥ भक्ते आपकी महिमाको कुछ आपै भक्तं जानते है शरणमे आये भक्तोको कहीं भी भ्रमादिक नहीं है ॥ १९ ॥
९७
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॥२०९॥
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पा.खं.३
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< व छ वर्ण || २० ॥ हे शंकर.|
इत समय परमपूरवक आप अपन इत दासक विज्ञमिको सुन हे देव ! आपकी आज्ञस्े भ इत समय कुछ वणन करता ह ॥ * ॥ हश
हे महादेव ! आपे पादपे भ बडा माग्यवार् हूं अपना दास जानकर आप मेरे ऊपर कपा करं हे नाथ ! आपको भणाम है ॥२१॥ इरी,
आपकर द्शीनके निमित मै भतिदिन आया कलंगा ओर इ सुताके साथ आऊंगा यह आप् आज्ञा दं ॥ २२॥ ब्रह्माजी बोढे यहं वचन गिरिराजके
सुनकर महेश्वर अपने दोनों नेच सोखकर ध्यानको छोड विचार कर देवदेव यह वचन बटे ॥ २२ ॥ महेश्वरजी बोठे हे हिमा ! आप नित्य
विज्ञति शृण मल्पीत्या स्वदासस्य ममाधुना ॥ तव देवाज्ञया तात दीनत्वाद्र्णयामि हि ॥ २० ॥ सभाग्योहं महादेव प्रसा
दात्तव शंकर ॥ मत्वा स्वदासं मां नाथ कृषां कुरू नमोऽस्तु ते ॥ २१ ॥ प्रत्यहं चागमिष्यामिदरशनाथ तव प्रभो ॥ अनया
सुतया स्वामिषिदेशं दातमर्हसि ॥ २२॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकर्ण्यं वचस्तस्योन्मीर्य नते महेश्वरः ॥ त्यक्तध्यानः परामृश्य
देवदेवोऽीद्चः ॥ २३ ॥ ॥ महेश्वर उवाच ॥ आगतभ्यं त्वया नित्यं दर्शनाय ममाचल॥ कुमारीं सुदने स्थाप्य नान्यथा
मम दर्शनम् ॥ २४ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ महेशवचनं धत्वा शिवातातस्तथाविधम् ॥ अचलः प्रत्युवाचेदं गिरिशं नतकंधरः
॥ २६ ॥ हिमाचल उवाच ॥ कस्मान्मयानया सार्द्ध नाग॑तव्य तदुच्यताम् ॥ सेवने किमयोग्येय नाहं वेदय कारणम्
॥ २६ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ततोऽत्रवीद्विरं शंभुः प्रहसन्वृषभध्वजः ॥ लोकाचारं विशेषेण दशंयन्हि कुयोगिनाम् ॥ २७॥
शंभुश्वाच ॥ इयं मारी सुश्रोणी तन्वी चन्द्रानना ज्ुभा ॥ ननेतव्या मत्समीपे वारयामि पुनःपुनः ॥ २८ ॥
मेरा दर्शन करने आसकते है परंतु इस अपनी कन्याको घरही रसिये नहीं तो मेरा दर्शन न होगा॥२४॥ बह्लाजी बे पावंतीकै पिता शिवजीकै यह
वचन सुनकर शिर श्चुकाय शंकरजीे बोठे ॥ २५॥ भगवन् आप यह तो कह कि मेँ दर्शनके निमित्त इस कन्याको क्यों छोड आऊ कया यह आपकी
ह|| मेवा करनेके अयोग्यहै मँ इमं कोईकारण नहीं देखता हं ॥ २६ ॥ बह्ाजी बोटे तब हंसते हए भगवान् शंकर हिमाछ्यसे बोरे विरषकरकुयोगियोक।
छोकाचार दिखाने कगे ॥ २७॥ शिवजी बोे सुन्दर नितम्बवाटी क्षीण मध्यभागवाटी श्रेष्ठ चन्दरमाके समान खखवाटी इस कुमारीको तुम मेरे समीप
|
(> 44 2 4243
~
८4 +> 49९4634
८
विघ्र करनेवाटी होती है ॥२९॥ मे तपस्वी योगी मायापे सदा पृथक् हूं हे भूधर ! युवती प्पे मेरा प्रयोजनही कया है ॥ ३०॥ हे तपस्वियोकै
वैराग्य ओर श्रष्ठ तप नष्ट होजाता है ॥३२॥ हे शेटराज! इसकारण तपस्ियोंको योक संग न करना चाहिये, यह महाविषयका मूढ ज्ञान
मायाह्पा स्मृता नारी विद्रद्धिविदपारगेः॥ युवतीं तु विशेषेण विश्रकर्जी तपस्विनाम्॥२९॥ अहं तपस्वी योगी च निरितो मायया
सदा॥ प्रयोजनेन युक्त्या वै च्या किं मस्ति भरषर।॥३०॥एवं पुननै वक्तव्यं तपस्विवरसंश्रित ॥ वेदधर्भप्रवीणस्त्वं यतो ज्ञानि
वरोब्ुधः॥३१॥ भवत्यचर ततसंगाद्विषयोत्पत्तिराश्चु वे ॥ विनश्यति च वैराग्यं ततो भश्यति सत्तपः॥२२॥अतस्तपस्विना शेक
न कायौ खरु संगतिः॥ मदाविषयमूरं सा ज्ञानवैराग्यनाशिनी॥ ३३।¶्र्नोवाच॥ इत्याद्यकंत्वा बहुतरं महायोगी महेश्वरः॥ विर
राम गिरीशं तं महायोगिवरः प्रभुः ॥३६॥ एतच्छत्वा वचनं तस्य शंभोनिंरामय निस्पृहं निष्टुरं च॥ काटीतातश्चकिंतोऽभतघुरवं
तद्रत्किचि्याङ्लश्चास तृष्णीम्॥ ३५॥ तपस्विनोक्तं वचनं निशम्य तथा गिरीशं चक्रितं विचार्य्य ॥ अतः मणस्यैव शिवं भवानी
जगाद वक्यं विशदन्तदानीम्॥२६॥इतिश्रीशिवमहापएराणे द्वितीयायां शद्रसंहितायांतृतीयेपार्वतीखण्डे शिवहिमाचलसम्बाद्व्णं
न नाम द्वादशोऽध्यायः॥१२॥भवान्युवाचकिुक्तंगिरिराजायत्वयायोनिस्तपस्विना। तदुत्तररणतिभो म्तोज्ञानिविशारद॥१॥
वैराग्यका नाश करनेवाला होताटै ॥३३॥ ब्रह्माजी बोरे महायोगी महेश्वर इस भति गिरीशसे बहत कुछ कहकर योगेश्वर मौन हए ॥३४॥
इसप्रकार शिवजीके स्पृहाहीन काटातीत निष्डुर वचन सुनकर हिमाख्य बडे विस्मित दूए, हे नारदजी ! व्याकु होकर कुछ देर मौन हुए ॥३५॥ इस
भकार तपम तत्पर शिवजीकै वचन सुन ओर गिरिराजको चकित विचारकर स्वयं भवानी शिवजी
५ त रकर ` कौ भणाम कर उस्न समय उज्ज्वङ वचन बोटी
॥ ३६ ॥ इति श्रीशिवमहाषराणभाषारीकायां रुदरसंहितान्तगेततृतीयपार्वतीसंडे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ मवानी बोटी हे योगिन ¡ तपस्वी होकर
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भत ठाना इस्त विषयमे मे तुमको वारंवार निषेध करता हं ॥२८॥ वेदपारगामी बाह्मणोनि स्लीको मायारूपिणी कहा है विशेषकर युवती तपसवियोको ठ
आश्रित्। इसत प्रकारसे फिर तुम न कहना तुम वेदधमकै ज्ञाता ज्ञानियोमे भ्ठ हो ॥३१॥ हे पव॑तराज ! ब्रियोके संगते शीघरही विषयोत्पत्ति होती है उससे ठै
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आपने जो मेरे पिताते कहा, ह ज्ञानियोमे विशारद 1 हे विभो ! इसका उत्तर भाप शष सुनिये ॥ १ ॥ हे शिव ! तपकी शक्तित पृ क
ही आप महातपस्या करते हो सो आप महात्माकी भी तपस्या करनेमे बुद्धि ठगी ॥ २॥ वह सवके कर्मोकी शक्ति भ्रति कहटढाती है उही
सकी उत्पत्ति पाठन ओर संहार होता है ॥ ३ ॥ हे भगवन् ! आप कौन है भौर वह सुक्ष्म भ्रकति कौन है इसका विचार कीजिये भ्रकतिक
विना रिगर्ूपौ महेश्वर किस भरकार होस्कते हँ ॥ ४ ॥ कतिक कारणही प्राणी आपका सदा अ्षैन वंदन ओर ध्यान करते है हदये यह
तपश्शत्तयान्वितश्शम्भो करोषि विपुलं तपः ॥ तव बुद्धिरियं जाता तपस्तप्तं महात्मनः ॥ २॥ सा शक्तिः प्रकृतिर्या
स्वेषामपि कर्मणाम् ॥ तया विरच्यते सर्वं पाल्यते च विनाश्यते ॥ ३ ॥ कस्त्वं का प्रकृतिस्सूष्ष्मा भगवंस्तद्विमृश्यताम् ॥
विना प्रकृत्या च कथं छिगष्पी महेश्वरः ॥ ४ ॥ अर्चनीयोऽसि वंद्योऽसि ध्येयोऽसि प्राणिनां सदा ॥ प्रकृत्या च विचा
येति इदा सर्वं तदुच्यताम् ॥ & ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ पर्वत्यास्तद्रचः त्वा महोतिकरणे रतः ॥ सुविहस्य प्रसन्नात्मा महेशो
वाक्यमन्रवीत् ॥ & ॥ ॥ महेरवर उवाच ॥ तपसा परमेणेव प्रकृति नाशयाम्यदम्॥ प्रकृत्या रदितश्शम्भुरह तिष्ठामि तत्वतः
॥ ७ ॥ तस्माच्च प्रकृतेस्सद्धिनं कार्यस्संयहः कचित् ॥ स्थातम्यं निर्विकारश्च रोकाचार विवजितेः ॥ ८ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥
इत्युक्ता शम्भुना तात ॒लौकिकव्यवहारतः ॥ सुविहस्य इदा काटी जगाद मधुरं वचः ॥ ९ ॥ ॥ काल्युवाच ॥ यदुक्तं `
भवता योगिन्वचनं शंकर प्रभो ॥ सा च कि प्रकृतिनं स्यादतीतस्तां भवान्कथम् ॥ १० ॥
ब्रात धारण कर आप विचार करं ॥ “५ ॥ ब्रह्माजी बो पावतीके यह वचन सुनकर उग्र तपस्याभे निरत प्रसन्नतात्मा शकरजी र्कर वोठे
॥ & ॥ महेश्वर बोरे मेँ प्रम तपस्यापेही भरकतिका नाश करदेता हूं भै शकर प्रकृति रहित होकर नित्य स्थित रहता हं ओर तेते स्थित
एहता ह ॥७॥ इसकारण सपपुरुषोको प्रकतिका संग्रह नहीं करना चाहिये ओर टोका चारसे रहित निर्विकार स्थित रहना चाहिये ॥<८॥ ब्रह्माजी
बोठे हे तात्! जब ठोकव्यवहारसे शिवजीने रस्ता कहा तब काटीजी हदयमं हकर शकरसे मधुर वचन बोटी ॥ ९ ॥ काटी बोली हे भमो
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( || शंकर ! हे योगिराज ! आपने जो वचन कहे है सो यह कया भ्रकति नही है फिर आप भरकतिसे प्रे कैसे है ॥ १० ॥ यह विचारक र ||
यथायोग्य काहिये यह सब कुछ ही भकतिसे निरन्तर बद्ध हरहा है ॥ ११ ॥ इस कारण आपको यह नहीं कहना चाहिये किं इससे कुछ कायं ४
| है संपूणं वचन ओर रचना भकतिसे ही है, यह आप जानिये ॥१२॥ जो आप सुनते खाते देखते ओर करते हो यह सब भ्रकतिका ही ४
कायं है मिध्यावाद निरथेक है ॥१३॥ यदि आप भ्कतिते प्रे हो तो तपस्या क्यों करते हो हे पभो शंकर ! यदि रेता ही है तो यहा एका ९
एतद्विचार्य वक्तभ्यं तत्वतो हि यथातथम् ॥ परकृत्या सर्वमेत बद्धमस्ति निरंतरम् ॥११॥ तस्मात्वया न वक्तव्यं न कार्य
किंचिदेव दि॥ वचने रचनं सवै प्रकृतं विद्धि चेतसा ॥१२॥ यच्छृणोषियदश्नासि यत्पश्यसि करोषि यत् ॥ तत्सर्व शरकृतेः ४
काय मिथ्यावादो निरर्थकः ॥१३॥ प्रकृतेः परमञ्च किमर्थ तप्यसे तपः॥ त्वया शंभोऽधुना ब्मस्मिन्गिरौ हिमवति प्रभो $
॥ १९ ॥ ्रकृत्या गिलितोऽसि त्व न_जानासि निजं दर ॥ निजं जानासि चेदीश किमथ तप्यसे तपः ॥१५॥ वाग्वादेन च ९
कि क्यु मम योिस्त्वया सह प्रत्यक्षे ह्यठमानस्य न प्रमाणं विदुबैषाः ॥१६॥ इद्वियाणां गोचरत्वं यावद्भवति देहिनाम् ॥ $
तावत्सर्वं विम॑तव्यं प्रकृतं ज्ञानिभिधिया ॥१७॥ फं बदहुक्तेन योगीश शरणु मद्वचनं परम् ॥ सा चाहं पर्षोऽसि त्वं सत्यं |
सत्थं नसंशयः ॥ १८ ॥ मद्नु्दतस्तवं दि सणुणो रूपवान्मतः ॥ मां विना खं निरीहोऽसि न किचित्कर्तम्सि ॥१९॥ |©
न्त पकी आवश्यकता क्या हे ॥ १४ ॥ हे हर ! प्रृतिते गछत होकर ही तो आप निजको नहीं जानते यदि हे ईश ! आप निजकी |©
नहीं जानते तो तप क्यों करते हौ ॥ १५ ॥ हे योगिन ! आपके साथ सज्ञे विवादे क्या भ्रयोजन है प्यक्च होने पर पंडित अलुमानका ठ
|| णाम नहीं करते ॥ १६ ॥ जब तक देहधारियोके इन्दियगोचर हुमा जाता है, तवरतक बुद्धिस ज्ञानिथोको सम भ्रङुतिका काय॑ जानना |£
|| द है ॥ १७॥ र योगी ¡बहुत केकया है भाप भेर वन हे बह हति हि आप पुरुष है यह स्य है इसमे कु सन्देह ्
५५। नहीं है ॥ १८ ॥ मेरे अजु ही आप स्यण बहपवाठे हूए द, भरे बिना आप निरीह हो ओर कुक भी करनेको समथ नहीं हो ॥१९॥ ॥*
शि०्पु° || जाप वशी होकर भी अनेक कम करनेवारे हो आप निविकारी कैसे हो सश्चते केते छितर नहीं हौ ॥ २० ॥ यदि आप ५ हो र £
॥२११॥ ||| यह आपके वचन सत्य है तो हे शंकर ! भरे समीप रहनेसे आपको भय करना न चाहिये ॥ २१ ॥ बरह्ाजी बोट इस भरकर जी स्प ||
ठ शाल्चके समस्त पार्वतीके वचन सुनकर वेदान्तमतकै आभित हो पार्वती बोढे ॥ २२ श्रीशिवजी बोठे हे गिरजा | इ भकारसे यदि तुम् >
६ सांस्यके अनुसार वचन कहती हो हे सुभाषिणी ! तो दुम भतिदिन मेरी सेवा करो भे इम तुमको निषेध नहीं करता ॥ २३ ॥ जन् कि 7
ए पराधीनस्सदा त्वं हि नानाकम्मंकरो वशी ॥ निर्विकारी कथं त्वं हि न रित मया कथम् ॥२०॥ प्रकृतेः परमोऽसि त्वं ष
¢ यदि सत्यं वचस्तव ॥ तरह त्वया न भेतव्यं समीपे मम शंकर ॥२१॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्याः सांख्यशाघ्चो +
दितं शिवः ॥ वेदांतमतसंस्थो दि वाक्यभे शिवां प्रति ॥ २२ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ इत्येवं त्वं यदि ब्रूषे गिरिज सांख्यधा द
द| रिणी ॥ प्रत्यहं र मे सेवामनिषिदधां सुभाषिणि ॥२३॥ यद्यहं बरह्म निरितो मायया परमेश्वरः ॥ वेदातवे्यो मायशस्त्वं ||
|| करिष्यसि कं तदा ॥ २४ ॥ ॥ अन्नोवाच ॥ हत्येवुक्त्वा गिरिजां वाक्यमूचे गिरि प्रभुः ॥ भक्तानुरंजनकरो भक्तावुग्रहका ||
ह| रकः ॥ २६ ॥ शिव उवाच ॥ अ्रैव सोऽहं त॒पसा परेण निरे तव ्रस्थवरेऽतिरभ्ये ॥ चरामि 1 प्रमाथभावस्वरूपमा |©
|| नंदमय सुलोचयच् ॥ २९ ॥ तपस्तप्तुमलज्ञा म दातव्या पवताधिप ॥ अव्ञया विना फिचित्तपः कठ न शक्यते ॥ २७॥ ||
¢ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एत च्छत्वा वचस्तस्य देवदेवस्य श्ूलिनिः॥ प्रणम्य हिमवाज्छंभुमिदं वचनमव्रवीत् ॥ २८ ॥
ब्रह्म मायाति निर्टिप् परमेश्वर वेदान्ते जानने योग्य हूं तब तुम भेरा क्या कर सकती हो ॥ २४ ॥ ब्रह्माजी बोढे भगवान् शंकर पावती
रुन्स.र् ट ठेसा कहकर फिर गिरिराजपे बोटे जो भगवान् भक्तके ऊपर अलुप्रह करने वाढे ओर उनको प्रसन्न करनेवाठे है ॥ २५ ॥ हे गिरिराज ! 9
पाख ३ ©| भ यहां तम्हारे मनोहर पर्वतम परम तपस्या करता हुआ परमार्थं भावे अपना स्वरूप विचारता हआ विचरण कषगा ॥ २६ ॥ हे परव॑तराज ! ||
अ०१३ ह|| अब तुमको तप करनेकी अनुज्ञा सज्ञे देनी चाहिये अलज्ञाके विना किसी भकारका तप नहीं हो सकता ॥ २७ ॥ ब्रह्ाजी बोे देवदेव शूढ £
>| धारीकै यह वचन सुनकर हिमालय शिवजीको प्रणाम करक यह वचन गौरे ॥ २८ ॥ >
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हिमाछयने कडा देवता अहुर मल्योके सहित यह सब जगत आप्हीका है हे महादेवजी ! भर तुच्छ आपते क्या कहूं ॥ २९॥ बह्ञाजी वोटे जब
¢ ठोककल्याणकारी शकरसे हिमाछ्यने एसा कहा तब ॒शिवजीने हकर ` गिरिराज सै कहा कि आप सादर घर जाश्ये ॥ ३०॥ शिवजीकै यह बचन ह
सुन हिमाछ्य पारवतीकै सहित आनन्दे अपने घर गये ओर प्रतिदिन दर्शनको जने छग ॥ ३१ ॥ पार्वती पिताक बिना भी नित्य अपनी ४
पृसीजनोक साथ भक्तिमें तत्पर हो शेकरकी सेवाकै दिये सदा गमन करती ॥ ३२ ॥ नन्दीश्वर आदि गण कोई भी पावतीको निषेध नही
ट करते कारण किं शिबजीको रेसी ही आज्ञा थी ओर वह पवित्र उनके आज्ञाकारी घे ॥३३॥ सांख्य ओर वेदान्तके मतको ठेकर शिवाशिवका |©
ध हिमवानुवाच ॥ त्वदीयं हि जगत्सर्वं सदेवासुरमालषम् ॥ किमप्यहं महादेव तुच्छो भूत्वा वदामिते ॥२९॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एव ॥
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सक्तो हिमवता शंकृरो लोकशंकरः ॥ विहस्य गिरिराजं तं भराई यादीति सादरम्॥२०॥ शंकरेणाभ्यवु्ञातस्स्वगृहं हिमवायन्यौ॥
सद्धं गिरिजया वै स प्रत्य दर्शने स्थितः ॥३१ ॥ पि्राविनापि सा कालीसखीभ्यां सह नित्यशः ॥ जगाम शंकराभ्याशं
सेवय भक्तितत्परा ॥ ३२॥ निषिषेध न तां कोऽपि गणो नदीन्वरादिकः ॥ मरेशशासनात्तात तच्छासनकरशश्चुचिः ॥२३॥
सास्यवेदांतमतयोश्शिवयोश्िवदस्सदा ॥ सवादः सुखकृचोक्तोऽभित्रयोस्सुविचारतः ॥ ३४ ॥ गिरिराजस्य वचनात्तनयां
तस्य् शंकरः ॥ पाश्वं समीपे जग्राह गौरवादपि गोपरः ॥ ३५ ॥ उवाचेदं वचः कालीं सखीभ्यां सह गोपतिः ॥ नित्यं
मां सेवतां यात निर्भीता दयन तिष्ठतु ॥२६॥ एवमुक्त्वा त॒ तां देवीं सेवयेजग्रहे हरः ॥ निर्विकारो महायोगी नानाङीला
|| करः प्रभुः ॥ ३७ ॥ इद्मेवमददधय्यं धीराणां सुतपस्विनाम् ॥ विघ्रवन्त्यपि संप्राप्य यद्िष्नैनं विहन्यते ॥ ३८ ॥
संवाद सुखकारी होगया, वास्तवमं दोनो अभिन्नही हँ ॥ ३४ ॥ इन्दियोंमे परे होकर भी भगृव्ान् शंकरने गिरिराजके बचनगौरवसे पार्वतीको
|| अपनी सेवामे ग्रहण किया ॥ ३५॥ ओर वशी भगवान् शंकरने सखियोके सहित पराव॑तीपते यह बचन कहै कि तुम नित्य मेरी सेवा करने
ह || आओ ओर निर्भय हयेकर स्थित हो ॥ ३६॥ इत् प्रकार कहकर शिवजीने देवीको सेवा श्ण किया जो भमु निर्विकार महायोगी अनेक रीरा
‰॥ करनेवाछे हँ ॥ ३७ ॥ धीर तपस्वियोका यही मायेयं है जो वि्घनको राप होकर भी वित्ते विचरित नहीं हेते ॥ ३८ ॥
९८
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त मनम बहुत भ्रसन्न दए ॥ ३९ ॥ ओर
शि ०४० ||| जब गिरिराज परिचारकोके साथ अपने स्थानको आये हे खनीश्वर ! तब बह अपने ्रियजनोक सहि ६ ¢
ए उस समय भगवान शंकर ध्यानयोगसे अपने वपत निर्वि मनते विचारने ठगे ॥ ४० ॥ ओौर काटी अपनी ससि साथ नित्य
भति शिवजीकी सेवा करती हई यमनागमन स्थित हदं ॥ ४१ ॥ शिवजीके चरण धकर उनका चरणा छया, पहिशौच वहत उक
अगोका माजन किया ॥४२॥ षोडशोपचारे विधिपु्वक शकरका पूजन करके बारंबार प्रणाम करके फिर अपने पितताके समीप जाती ॥४३॥
हे सनिभेष्ट ! इस भकारे पररवतीको शिवजीकी सेवा करते करते बहुत समय व्यतीत होगया ॥ ४४ ॥ किंपी समय पार्वती अपनी सखि्योके
ततः स्वपुरमायातो गिरिराद् परिचारकैः॥ खमोदातीव मनसि सप्रियस्स खनीश्वर ॥ २९॥ दरश्च ध्यानयोगेन प्रमार्मानमा
दरात् ॥ नि्विष्नेन स्वमनसा त्वासीचितयितं स्थितः॥४०॥ काली सखीभ्यां सहिता प्रत्यहं चरशेखरम् ॥ सेवमाना महा
९ || देव गमनागमने स्थिता ॥ ४१ ॥ प्रक्षाल्य चरणौ शंभोः पपौ तञ्चरणोदकम् ॥ वद्धिशौचेन वन्चेण चक्रे तदाजमाजंनम् ॥४२॥
ठ पोडशेनोपचारेण संपूज्य विधिवद्धरम् ॥ पुनःपुनः सुप्रणम्य ययौ नित्यं पितुगैहम् ॥ ४३॥ एवं संसेवमानायां शंकरं ध्यान:
तत्परम् ॥ व्यतीयाय महान्कारश्शिवाया शुनिसत्तम ॥ ४९ ॥ कदा चित्सदहिता काली सखीभ्यां शंकृराश्रमे ॥ वितेने सुंदरं
गानं सुतां स्मरवर्ध॑नम् ॥ ७५ ॥ कदाचित्छुशपुष्पाणि समिधंनयति स्वयम् ॥ सखीभ्यां स्थानसस्कारं ङ्व॑ती न्यावस
तदा ॥४६॥कंदाचित्रियता गेहे स्थिता चन्द्रभतो भृशम् ॥ वीक्षती विस्मयामास सकामा चन्द्रशेखरम् ॥ ९७ ॥ ततस्तप्तेन
भूतेशस्तां निस्सगां परिस्थताम् ॥ सोऽचितयत्तदा वीक्ष्य भूतदेहे स्थितेति च ॥ ४८ ॥
ताथ शकरके आश्रमम मधुर स्वरसे कंदपोदीपक गान करने रगती ॥४५ ॥ कमी कुश एष्य ओर समिधाओंको स्वयं ठे आती ओर कर ¢
तसियोके साथ स्थानका संस्कार करती ॥४६॥ कभी नियतकाठतक शंकरक समीप रहती ओर कभी सकाम होकर विंस्मयसे चन्द्रशेखरको देखने
ह|| गती ॥ ४७॥ तब सब प्राणिजनोंके अधिपति करने उसको तप करते हए देखा किं निस्संग होकर सेवा करती है भौर भगवतीको देखकर
|| विचारने कगे कि यह पंचभूत देहम स्थित है ॥ ४८ ॥
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ययपि यह खनियोकै मनको मोहित करने वाटी महासुन्दरी शकरकै नित्य समीप रहती थीं तो भी शकरने इसको भायौरूपसे ब्रहण नही ह
= किया ॥४९॥ महादेवजीने जब भगवतीको इस भ्रकार इन्द्रिय सयममे तत्पर देखा किं निरन्तर मेरी सेवामे तत्पर है.तब दया करक विचारने
¢ लगे ॥ ५० ॥ किं जिस्न समय यह काटी महातपश्या करेगी त्र ग्वका बीज रहित होनेसे मे इसको ब्रहण करेगा ॥ ५१ ॥ जक्षाजी बोे ठ
र भूतेश्वर यह. बात मनमे विचारकर ध्यानम तत्पर होगये कारण किं महाटीटा करनेवाठे प्रभु महा योगीश्वर है ॥ ५२ ॥ जिस समप
¢ ना्रीद्विरिशः कालीं मायुथिं निकटे स्थिताम् ॥ महालावण्यनिचयां मुनीनामपि मोहिनीम् ॥४९॥ महादेवः पुनदृष्टा तथा
¢ तां सयतेद्वियाम् ॥ स्वसेवने रतां निर्यं सदयस्समचितयत् ॥९०॥ यदेवेषा तपश्वर्याव्रतं कालीं करिष्यति ॥ तदा च॑ ता
४ ग्रदीष्यामि गर्वीजविवजिताम् ॥ ५१ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति संचिन्त्य भूतेशो तं ध्यानसमाश्चितः ॥ महयोगीश्वरोऽभूदर
मडालीलाकर्ः प्रधः ॥९२॥ ध्यानासक्तस्य तस्याथ शिवस्य परमात्मनः ॥ हदि नासीन्घुने काचिदन्या चिता व्यवस्थिता
४ ॥५२॥ काटी त्वज॒दिनं शंथं सद्क्त्या समसेवत ॥ विचितयती संततं तस्य रूपं महात्मनः ॥५४॥ हसे ध्यानपरः कालीं
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नित्यं भक्षत सुस्थितम्॥ विस्मृत्य पूर्वचितां तां पश्यत्रपि न पश्यति॥५५॥एतस्मित्नतरे देवाश्शकायाञ्चनयच ते ॥ ब्रह्माज्ञया ॥©
स्मरं त प्रेषयामासुरादरात् ॥५६॥ तेन कारयितुं योगं काल्या श्दरेण कामतः ॥ महावीैणासुरेण तारकेण प्रपीडिताः॥ «७॥ \
शकर ध्यानम स्थित हए हे खन ! उप्त समय भी उनके मनम को दूसरी चिन्ता उद्य नहीं हुई ॥ ५३ ॥ भगवती काटी भगवान् शकरका
हप निरन्तर विचरती हदं सद्क्तिसे निरन्तर शकरकी सेवा करने ठगी ॥ ५४ ॥ शिवजी भी नित्य ध्यानम तत्पर होकर पार्वतीकी स्थिति |©
४ विचार ठेते ओर पूष चिन्ताको भुढाकर देखते हए भी मानो भगवतीको नहीं देते थे ॥ ५५ ॥ इसी अवरम इन्द्ादिक देवता ओर खनि |
{ योनि ब्रहनाजीकी आज्ञासे आदर पूवक वहां कामको भेजा ॥ ५६ ॥ कारण किं वे सवं देवता महाबली तारकासुरसे बडे पीडित होगये थे भौर
शिवकै त्रस उस अघुरकी मृत्यु थी इसे देवताओंने शिवपार्वतीका योग कराना चाहा ॥ ५७ ॥
शि०४० || || हां जाकर कामदेवे अपना पूरा पराक्रम किया प्र शिषजी उससे कुछ मी क्षुभित न हुए किन्तु उसे मस्मीभूत कर दिया ॥ ५८ ॥ € ५
॥२१३॥ द्जी । पावती भी गर्वैरहित होकर बराबर तपस्या करती रही ओौर फिर महातपस्या कक सतीन शिबरजीको पाया ॥ ५९ ॥. तब १९
# ओर परमेश्वर बडे भरसन्न हुए ओर परोपकारे रत होकर देवकायेमे तत्पर हए ॥ ६० ॥ इति श्रीशिवमहाषराणभाषाटीकायां रद्र हता न
तृतीय पार्वतीखण्डे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ नारदजी बोठे ! हे विष्णशिष्य महाशैव ! हे बहमाजी ! आपने उत्तम वात् कदी शिवा ओर
ट| गत्वा त स्मरस्सर्बघुपायमकरोग्रिजम् ॥ उश्षुभे न हरः किचित्तं च भस्मीचकार् इ ॥५८॥ प्वत्य॒पि विगवाभन्धुने तस्य
|| निदेशतः ॥ ततस्तपो महत्कृत्वा शिवं प्राप पति सती ॥ ५९ ॥ बभूवतुस्तौ सुप्रीतौ पार्वतीपरमेश्वरौ ॥ चक्रतु्दवकाय्य हि
८ परोपकरणे रतो ॥ ६० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शुदरसहितायां ततीय पाष॑तीखंडे पाव॑तीपरमेश्वरसुवाद्वणनं
है| नामयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ ॥ नारद उवाच ॥ विष्णुशिष्य महाशेव सम्ययुक्तं त्वया विधे ॥ चरितं परमं द्येतच्छ्वा
ठ याओ्चशिवस्य च ॥१॥ कस्तारकाुरो वरहमन्येन देवाः भपीडिताः ॥ कस्य पस्य वे ब्रूहि तत्कथां च शिवाश्रयाम्॥ २ ॥
¢ भस्मीचकार स कथं शंकर स्मरं वशी ॥ तदपि ब्रहि स॒प्रीत्याद्त् तच्चरितं विभोः ॥ ३॥ कथं शिवा तपोऽल्युभ्रं चकार
>~
सुखहेतवे ॥ कथं प्राप पति शंयुमादिशक्तिजंगत्परा ॥ 8 ॥ एतत्सर्वमशेषेण विशेषेण महाङ्ुध ॥ ब्रूहि मे श्रहधानाय स्वषु
जय शिवात्मने ॥ < ॥ ब्रह्मोवाच ॥ प्रवय॑ महाप्राज्ञ सर शंसितव्रतः ॥ वच्म्यदं शंकरं स्मृत्वा सर्वं तच्चरितं शृणु ॥६॥
रर २ ||| शिवजीका चरित्र परम उत्तम् है ॥ १॥ हे भगवन् ! यह तारकासुर कौन है जिसने देवताओंको पीडित किया, वह किंस्का एत्र था वह
५ | शिक्सम्बन्धी कथा आप मुञ्पे कहं ॥२॥ ओर वशी शकरने कामदेषको किंस प्रकारे मस्म किया था यह चरित्र बडा अद्भुत है, आप इसको
१ा.स. र ||| विस्तारसे किये ॥ ३ ॥ पारवतीने सुखके निमित्त किस प्रकारसे अद्भुत तप किया, वह आदि शक्तिं जगत्परायण किंम् प्रकारे शिवजीकेो प्राप्त
५०१४ ||| हई ॥ ४ ॥ हे महापंडित ! यह् सब चरित्र विशेषरूपे वणेन कीजिये भँ िवोपासक श्रदधावाठा तुम्हारा एत्र हूं ॥ ५ ॥ ब्रह्ाजी बोे ह एत्र
|| बयं ! हे महापंडित देवि ! इन्द्रिय संयमे तत्पर शकरको प्रणाम कर मेँ सव उनका चरित्र कहता हं सो आप सुनिये ॥ ६ ॥
+> +~ +> ९४ >९ +> 6 २ 42 9९4 > + >^ 4-3९-3 >.
हे नारदजी ! पठे तारकासुरका चरित्र सुनिये जिक्षके बधके निमित्त शंकरकै आशित हो देवताओंने बडा यल किंयाथा 1७1 मेरा पुत्र
मरीचि हआ उक्षका पुत्र कश्यप हुआ उस्न कश्यपक तेरह स्ली थीं यह दक्षकन्या थीं ॥ < ॥ उनकी बडी श्वी दित्िकै दो एत्र हए बडा हिरण्य
कशिष छोरा हिरण्याक्ष ॥ ९ ॥ भगवानु विष्णने इन दोनोँको वृरिंह ओर वाराहृपसे मारडाठा इन दुःख देनेवाठेके मरजानेसे ।
निभ॑य हो ससी हृए ॥ १० ॥ तव दिति बडी दुःखी हो कश्यपजीकी शरणमे गई ओर फिर उनकी सेवा कर उत्त सुव्ताने ग्भ धारण
किया ॥ ११ ॥ महा उद्यमी दन्द्रको जब यह समाचार मिटा तव छिद्र देखने ठ्गा ओौर दितिको अशुद्ध जानते ही वज लेकर उस॒कै
परथमं तारकस्येव भवं सश्ण॒नारद॥यद्वधा्थ महा यत्नः कृतो देवैश्शिवाश्रयैः॥७॥मम पुरो मरीचिर्यः कश्यपस्तस्य चात्मजः॥
जयोदशमितास्तस्यच्ियो दक्षसुताञ्च याः॥८॥ दितिज्येष्ठा च तत्घ्री हि सुषवे सा स॒तद्रयम्॥ दिरण्यकशिषज्ये्ठो दिरण्याक्षोऽ
छजस्ततः ॥९॥ तो इतो विष्णुना दैत्यौ नृरसिदक्रोडरूपतः ॥ सुदुःखदौ ततो देवाः सुखमापुश्च निर्मेयाः ॥१०॥ दितिश्च दुःखि
तासीत्सा कश्यपं शरणं गता॥ पुनस्संसे
ठ
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ग्य तं भक्त्या गभेमाधत्त सुव्रता ॥११॥ तद्विज्ञाय महेदोऽपि कब्धच्छिदो महोयमी ॥ |
तद्वर्म व्यच्छिनत्तत् प्रविश्य पविना मुहुः ॥ १२ $
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2 + ८3२ आ
काये
॥ तद्रतस्य प्रभावेण न तदर्मौ ममार ह ॥ स्वपत्या दैवयोगेन सत्त सत्ता
वन्सुताः ॥१३॥ देवाआसन्सुतास्ते च नामतोभरूतोऽखिलाः ॥ स्वर्ग
ः र प युस्तदेन्दरेण देवराजात्मसात्छृताः ॥१४॥ वुनरदिंतिः
पति भेजेऽचतततानिजकमेतः ॥ चकार सुप्रतर त सुनि परमसेवया ॥ ३५ ॥ ॥ कश्यप उवाच ॥ तपः दुर श्चिभरत्वा
ब्रह्मणश्चायुतं समाः ॥ चेद्भविष्यति तत्पूवं भविता ते सुतस्तदा ॥ १६ ॥
उदूरमे पवेश कर गया ओर गभके इकडे २ कर ढाठे ॥ १२.॥ प्र उत्त तक्रे भभावसे वह गर्भं नहीं मरा ओर दैवयोगकते उस्र सोती हक
गभकै टकडे ४९ पुत्र होकर निकटे ॥ १.३ ॥ वह वृ एत्र मरुत् नामवाठे देवता हो गये, ओर इन्द्रको अपना भराता मानकर इनके साथ
© = (य
स्वगको चठे गये ॥ १४ ॥ फिर भी दिति अपने कमपे अवुतप्त हो पतिकी सेवा करने ठगी भौर
५१ | परम सेवासे उक्त खनिराजको प्रसन्न कर्
ठ्वा ॥ १५ ॥ कश्यपफ्जी बो पवित्र होकर ब्रहमाजीके दश. सहस वषेतक तपस्या करे तो तेरे महापराक्रमी एरका जन्म होगा ॥ १६ ॥
गमको पराप्त होकर वैसाही त्र उत्पन्न किया ॥ १ ॥ वह ८ ट
पत्र देवताओंके समान वजाङ्ग नाम हभ, नामसमानही उप्का शरीर बडा वीर अपने प्रतापे बडा बी था ॥ १८ ॥ माताकी आचि, #॥
प्रने बल पूर्वक इन्द्रको निग्रह करके दण्ड दिया ओर देवता्ओंको भी इसी भरकारत दण्ड दिया ॥ १९ ॥ इन्द्रादि दवताओंकी दरा
हितकरनेमं तत्पर मं कश्य
हे खने ! तब दितिने परम श्रदधासे तपस्या आरंभ की, तब पति
8 देवकर दितिको परम हष हुआ, ओर इन्द्रादि देवता अपने कमेसे दुःखको पराप्त हृष् ॥ २० ॥ तन देवताओंकै सदा
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शिण्पुण
॥२१४॥
प्राप्य ग सुषुवे तादशं सुतम् ॥१७॥ व्नांगनामा सोऽभू दितिषपुत्रोऽ £
तथा दित्या कृतं पूर्णं तत्तपश्द्या सने॥ततः पत्युः प्र ॥१७॥ वन ी
॥ जननीशासनात्सबस्स सुतो निजराधिषम् ॥ बटादत्वा ददौ दंड
पजीके पास गया ओर वहां जाकर मैने देवताओंको छडाया ॥ २१ ॥ देवताओंको छोडकर वजाज्गने आदरपूरवक कहा जो शुद्धात्मा शिव ४
मरोपमः ॥ नामतर्यतद्वीरस्सुप्रताप्युद्वाद्रली ॥ १८ 6
4
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ॐ०१४
विविधं निर्जरानपि ॥१९॥ दितिस्सुखमतीवाप दृष्ठ शकादिडुर्दशाम्॥अमरा अपि शक्राया जग्पुदःखं स्वकर्मतः ॥२०॥ त
ए द्[हं कश्यपेनाञ्च त्ागस्य खसामगीः॥देवानत्याजवस्तस्मात्सदा देवहिते रतः॥२१।देवान्धुकत्वा स व्॑ांगस्ततः प्रोवाच साद् ट
४ रम् ॥ शिवभक्तोऽतिशद्धामा निविंकारः प्रसन्नधीः ॥२२॥ ॥ वर्राग उवाच। इदो दष्टः प्रजाघाती मातुमे स्वाथंसाधकः ॥ स् ठ
|| फे प्रा्तान् स्वराज्यं हि करोतु सः ॥ २२॥ मातुराज्ञावशाद्रहन्कृतमेतन्मयाखिलम् ॥ न मे भोगाभिलापो वे कस्यचि ट
॥& दवनस्य दि ॥ २४ ॥ तत्वसारं विधे ब्रूहि महं वेदविदाम्बर ॥ येन स्यां सुसुखी नित्य निविकारः प्रसन्नधीः ॥ २५॥ ||
र₹०स.२||९॥|| मक्त निविकार भ्रप्नुद्धिवाठा था ॥ २२ ॥ वजाङ्ग बोला यह इन्द्र बडा स्वार्थं साधन करनेवाला बडा दष्ट है, मेरी माताकी सन्तानका |©
पा-.३ नट करनेवाला है इते उस॒कर्मका फठ पाया, अब अपना राज्य पाठन करे ॥ २३ ॥ हे बाजी ! यह स्व॒ कुठ मने अपनी माताकौ ||
|| आज्नसे किया है, ञ्चे किती भुवनके भी भोगनेकी अभिलाषा नहीं है ॥ २४ ॥ हे वेद जाननेदाोमे भ्र ब्रह्माजी ! आप् मुञ्षसे तच्वंका सार | ट
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कंहिये जिसके जाननेसे मँ निर्विकार भरसननखख नित्प आनन्दपे रहू ॥ २५ ॥
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है खने यह सुनकर मेने कहा यह वचन साखिक भावके है, सो यैं प्रसन्नतासे तत्वकी सार एक स्रीको निमीण करता हू ॥ २६॥ उस् वरांगी
नाम वाटी श्चीको उस दितिषुत्रके टिि देकर मेँ प्रसन्न हो कश्यप सहित अपने स्थानको गया ॥ २७ ॥ तब वह देव्य व॒जञांग साचिविकं भावेको
प्राप्त होकर आसुर भाव छोड सबसे निर्वैर होकर सुखी हभ ॥ २८ ॥ वह वरांगी अपने हृदयम सात्तिकं भाव धारण किये बडी भरद्ासे
सकामा हो परतिकी सेवा करने ठगी ॥ २९ ॥ तब उसकी सेवासे वजांग महापरमु संतुष्ट होगये ओर इस प्रकारसे बोठे ॥ ३० ॥ वजांगने ं
प्रिये } तेरी क्या इच्छा है सो तू कह तेरे मनम कया वर्तता है यह सुनकर वह बडी नप्रतासे अपना मनोरथ कहने ठगी ॥ ३१ ॥ वरांगी
तच्छरत्वादं सुनेऽवोचं सात्विको भाव उच्यते ॥ तत्त्वसार् इति प्रीत्या सृजाम्येकां वरां श्ियम् ॥२६॥ वरांगी नाम तां दत्वा
तस्म दितिसुताय वै ॥ अयां स्वधाम सुप्रीतः कश्यपस्तत्पितापि च॥२७॥ ततो दैत्यस्य वचांगस्सात्विकं भावमाश्रितः आसुरं
भावुत्सृज्य निर्वरस्संखमाप्तवान्॥२८॥न बभूव वरांग्या हि डदि भावोथ सात्विकः॥ सकामा स्वपति भेजे श्रद्धया विविधं सती
॥२९॥ अथ तत्सेवनादाञ्चु संतुशटोऽशरन्मदाम्रथुः ॥ स व्रांगः पतिस्तस्या उवाच वचनं तद्ा॥३०॥ वंग उवाच॥ किमिच्छसि
प्रिय बरहि किं ते मनसि तेते ॥ तच्छत्वानम्य तं प्राह सा पतिं स्वमनोरथम् ॥३१॥ वरांग्युवाच ॥ चेत् प्रसन्नोऽभवस्तवं प
सुतं मे देहि सत्पते ॥ महाबु अिरोकस्य् जेतारं इरिदुःखदम् ॥३२॥ ब्रह्लोवाच ॥ इति अस्वा भियावाक्यं विस्मितोऽत्स
आकुलः॥उवाच हदि स ज्ञानी सात्विक वैरवजितः ॥३३॥ प्रियेच्छति विरोधं वै सुरेभं न हि रोचते ॥ किं क्या हि क्र गच्छेयं
कथं नश्येन मे पणः ॥३४॥ प्रियामनोरथश्चैव पूर्णस्स्यात्रिजगद्धवेत् ॥ करेशयुङनितरं भूयो देवाश्च सुनयस्तथा ॥ ३५ ॥
बोखी जो तुम प्रसन्न हो तो स्च एत्र दो जो महाबटी त्रिरोकीका जीतनेवाला तथा इन्द्रको दुःख देनेवाखा हो ॥ ३२॥ बह्ञाजी बोठे भियाके
यह वचन सुनकर बह. बडा विस्मित ओर व्याकुल हआ ओौर साचििकभाव्े वैररहित हो वह ज्ञानी कहने खगा ॥ ३२॥ हे भिये ! तम वैरकी
इच्छा करती हो प्र देवताओं वैर करना स्ने अच्छा नहीं ठ्गता, मँ क्या कहे कहां जाऊं किसी भकारे भेरी भतिज्ञा न्ट न हो ॥ ३४॥
ओर भरियाका मनोरथ पूरा किया जाय, तो त्रिढोकीके देवता ओर सनियोंको महाकष्ट होगा ॥ ३५ ॥ |
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इस प्रकार धमक
। ओर भ्रियाके बचन न पूरणं होनेसे स्च नरक होगा दोनों भकारसेही ध्हानि है यह भ जानता हूं ॥ ३६ ॥ हे खनं । त
५ [|@ || पकर वजञांग बिचछित होने गा ओर अपनी बुद्धे उक्ते ब अवल दोनों बार्तोका व्रिचारकर ॥ ३७ ॥ है ने शिवकरी इच्छास <
ए || खीकाही वचन माननेकी इच्छा की ओर उत्त दैतयपतिने अपनी भियासे कहा एेसाही होगा ॥ ३८ ॥ तव इसकै निमित्त उत्तन ष क
तपस्या की ओर जितेन्द्रिय ह्य उने मेरे उदेशसे बहुत काठतक तप किया ॥ ३९ ॥ तत्र उसका महातप देख भ॑ उप्तकै समीप बर् देको
गया ओर भरसन्न हो उससे जाकर बोढा जो इच्छा हो सो बर मांगो ॥ ४० ॥ तव वरजांगने भन्न चित सञ्च विभुको आकाशम स्थित देख
न प्ूणसस्यास्पियाकामस्तदा मे नरको भवेत् ॥ द्विधापि धरमहानिवें भवतीत्यवुज््चवान् ॥३६॥ व्चांग् इत्थ बध्राम स सुन
धम संकरे ॥ बलाबलं द्रयोस्ततर विचिचित च बुद्धितः ॥ ३७ ॥ शिवेच्छा स हि सुने वाक्यं मेन श्ियो बुधः ॥ तथास्त्वि
ति वचः प्राह प्रियां प्रति स दैत्यराट् ॥३८॥ तदर्थमकरोत्तीवे तपोन्यददुष्करं स तु ॥ मां सखदिश्य सुप्रीत्या बहुव्ष जितं
द्वियः॥ ३९ ॥ वरं दातुमगां तस्मै दष्टाहं तत्तपो महत् ॥ वरं ब्रूहि ह्यवोचं तं सुप्रसन्नेन चेतसा ॥ ४० ॥ वर्बांगस्तु तदा
प्रीतं मां दृष्ट्वा खेस्थितं विधुम् ॥ सुप्रणम्य बहस्तुत्वा वरं वतर प्रियादितम् ॥ ७१ ॥ वाग् उवाच ॥ सुतं देहि स्वमा
तुमे महादितकरं प्रभो ॥ महावर सुप्रतापं स॒समथ तपोनिधिम् ॥ ४२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं च तद्वाक्यं तथास्त्वत्य
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रवं मुने ॥ अयां स्वधाम तदत्वा विमनास्संस्मरच्छिवम् ॥ ४३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्रसंहितायां तृतीये
¢ पार्वतीखण्डे तारकोत्पत्तौ वज्ांगोत्पत्तित पोवर्णनं नाम चतुदंरोऽध्यायः ॥ १४ ॥
रत. २ कृर प्रणामकर् बहुत स्तुतिकर अपनी प्रियाका हितकारी वर मांगा ॥ ४१ ॥ वाग वोढा हे भगवन् ! आप सुज्ञे इस भरकारका वर दीजिये
पा.सं.३ जिमसे हमारा बहुत हितकरने वाका महाबली महाप्रतापी समं ओर तपोनिधि एत्रहो ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोछे हे सने ! इस प्रकार उक
वचन सुनकर सेने तथास्तु कहा ओर शिवजीको स्मरण कर वरिमनहो अपने स्थानको चला आया ॥ ४३ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणभाषारीका्या
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। शद्रसेहितान्तगेततृतीय पावंतीखंडे चतुदंशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
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ब्रह्माजी बोटे तथ उस्त वरांगीने आदरे गर्भधारण किया ओौर बहुत वषौतक अपने तेजसे भीतरसेही वह गभे बढता रहा ॥१॥ तब सुमयकैपुणे
होनेप्र वरां गीने पुत्र उतपन्न किया,वहवडे शरीरवाछा महाबटी दशो दिशाओका भरकाश करने वाडा था ॥ २॥ उस समय दुःखकै प्रकाश करनेवाटे
। उत्पात हए जिस समय बह देवताओंका दुःख देनेवाढा एत्र वरांगीके उतपन्न हुआ था ॥ ३ ॥ स्वगे भूमि ओर अन्तरिक्षम सब ठोकोक
भयदायक तीन भरकारकै उत्पात हए उन अनर्थं चुचकोंका मँ वणेन करता ह ॥४॥ महाशब्द करते हुए भयंकर उल्कापात होने खगे, दुःखदाई केतुओक
४ जहां तहां उदग्र होगया ॥ ५ ॥ पर्व॑तोंके सहित पृथिवी चठायमान होने ठगी, सब दिशं प्रज्वछित हो उदी, सव्र नदि क्षुभित हो गई, विशेषकर
ह ब्रह्मोवाच ॥ अथ सा गभमाधत्तवरांगी तत्पुरादरात्॥ स ववद्धीभ्य॑तरे हि बहुवर्षः सुतेजसा १॥ततः सा समये पणें वरांगी सुषुवे
सुतम्॥ महाकायं मदावीर्य प्रज्वलंतं दिशो दश॥२॥ तदैव च महोत्पाता बभूबुदःखहैतवः॥ जायमाने स॒ते तस्मिन्वरांग्यास्सुरदुःख
६ दे ॥२॥ दिवि युव्यंतरिकषे च सर्वलोकभयंकराः ॥ अनर्थसरूचकास्तात भरिविधास्तान््रवीम्यंहम् ॥४॥ सोल्काश्चाशनयः पेतुरमहा
शब्दा भयकराः ॥ उदयं चछ्ुर्त्कृष्टाः कंतवो दुःखदायकाः॥4॥ चचाल वसुधा साद्रिजंज्वटस्सकला दिशः ॥ च्चुभुस्सरित
स्सवाः सागराश्च विशेषतः ॥&॥ दूत्करानीरयन्धीरान्खरस्पर्शो मर्द्रवौ॥उन्मूरयन्महावृक्षान्वात्यानीकोरजोध्वजः ॥७॥ सराह
समूर्ख्यविध्वोस्तुसुहुःपरिधयोऽभवन्॥महाभयस्य विग्रनद् मूचकास्स॒खदारकः॥८॥ मदीधविवरेभ्यश्च निर्घाता भयस्रुचकाः॥ रथ
४ नि्ीदतुस्याश्च जज्ञिरेऽवसरे ततः॥९॥घगालोक्कटंकरिवेमन्त्यो श्चखतोऽनलम् ॥ अंतर््रामिषु विकटं प्रणेदुरशिवाश्शिवाः॥१०॥
समुद्र चायमान होगे ॥ ६ ॥ मोम हूत्कार शब्द होने ठगा, तीक्ष्ण स्पश वायु चने ठगी, वडे बडे वृक्षोको उखाडती हई पनकरी सेना मानो
है| (जोषप कैतुवाी वहन करने ठगी ॥ ७॥ सूर्य चन्द्रक ऊपर राकी वारंवार परे होने गी हे राजेन्द्र ! इसकै कारण महाभय सुखके हरनेवाटा
{ हुआ ॥ < ॥ पवेतोके विवरे भयसचक शब्द होने कगे, रथकी नेभिके समान उस समय घर वर शग्द
< 9 ६ ५ ॥ होने ठगा॥ ९ ॥ श्रगाठ ओर उक
टकार शब्दे मुखे अश्रि उगलछने ठगे ओर भ्रामोंके भीतरही भयंकर हपसे गीदडी बोलने समी ॥ १ ५
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॥२१६॥
रुपं. २
पा.खं.३
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इधर उधर से ्रामरसिंह अपनी गरदन उढाकृर संगीत ओर रोदनकै समान अनेक प्रकारके शब्द् करने ठगे ॥११॥ गा होकर १
ह अथरभागसे परथिवीकी खोदने खगे हे तात ! इधर उधर उनके दन्डकेडुन्ड विचरने रगे॥१ २॥पक्षी अपने घसति उढनं लगे गदभगण
¢ होगये ओर व्याकुक होकर शब्द करने ठगे कहीं उनको शान्ति भा न हद ॥ १२ ॥ पशुसमूहं अपनी गोडमे वारंवार मू करन छम ब
पशुमी व्याकृ होगये ताडित हृएकै समान इर उधर घूमने ठगे कहीं मी उनको शाति धराप्त न हुं ॥१४॥ गायो थनोत रुधिर निकठने
ए ठगा उनके नेत्र भयते व्याकुठ होगये मेषभी उस समय रादरूप दुर्गषकी वष करनेक कारण भयदाई हए ॥ १५ ॥ देवताओंकी प्रतिमा रौन
ए यतस्ततो भामरसिंहा उन्नमय्य शिरोधराम् ॥ संगीतवदरोदनवद्रय्ंचन्विविधात्रवान् ॥११॥ खाकोररभसा मत्ताः खुरेशरतो रसां
६|| खराः ॥ वूथशस्तदा तात पर्यधावत्रितस्ततः ॥१२॥ खगा उदपतत्नीडादासभव्रस्तमानसः ॥ कोशंतो ग्यप्रचित्ताश्च स्थित
£ मापुनङघचित् ॥ १३॥ शक्ृन्मूजमकाषुथ गोष्ठेऽरण्ये भयाकुलः ॥ बभ्रुः स्थितिमापुनौ पशवस्ताडिता इव ॥ १९ ॥
‰| गावोऽवसत्न्ग्दोहा बाष्पनेत्रा याकुलाः ॥ तोयदा अभ॑स्त्र भयदाः पूयवर्षिणः ॥१५॥ व्यक्दन्प्रतिमास्तच देवानाुत्प
¢| तिष्णवः ॥ विनाऽनिलं दमाः पेतुरहयुद्धं बभूव से ॥ १६ ॥ इत्यादिकाबहूत्पाता जक्ञिरे भुनिसत्तम ॥ अज्ञानिनो जनास्त
£| मेनिरे विश्वसपएुवम् ॥ १७॥ अथ प्रजापतिर्नामाकरोत्तस्यास्रस्य वे ॥ तारकेति विचाय्यैव कश्यपो हि महौजसः ॥ १८ ॥
महावीरस्स सष्टसा ्यज्यमानात्मपौरूषः ॥ ववृधेत्यश्मसारेण कायेनाद्विपतिर्यथा ॥ १९॥
¢ ओर गिरने ठगी, विनाही आंधीके वृक्ष गिरने कगे ओर आकाशम अ्हयुद्ध होने ठगा ॥ १६ ॥ हे स॒निभेष्ठ ! इस भकारे बहते उत्पात
|| होने गे, ओर अज्ञानौजन उस्न समय भ्य मानने गे ॥ १७ ॥ तव प्रजापति कश्यपे बहुत वपिचारकर उस॒बाखकका नाम तारकं
६ कारण किं यह असुर महापराक्रमी था ॥ १८ ॥ वह महाबली सहसा अपने परुषाथेको प्रगट करता हभ पत्थरके समान इढतादं
%॥ बारी कायासे पवैतराजकरे समान बने खगा ॥ १९ ॥
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|| तव महाबली पराक्रमी उस्न मनस्वी तारकनामा देत्यने अपनी मातासे तपस्या करनेके लिये आज्ञा पांगी ॥ २० ॥ वह महाभायावारा भायि
योकोभी मोहित करनेवाला सब देवता्ओकि जीतनेको तपस्या करनेमं मन ठगाता हुआ ॥ २१ ॥ वह गुरुकी आज्ञाका पाठन |
। मधुबन आकर विधाताके प्रसन्न करनेको विधिपूवंक महातपस्या करने र्गा ॥ २२ ॥ एक पावते खडा हो ऊपरको भुजा किये नेत्रे
सौ वषे उसी प्रकारसे वितादिये, इस ॒भ्रकारसे वह असुरोंका राजा इढतासे सौ वषतक तप करता रहा ॥ २४॥ सौ वर्ष॑तकं जलमान्न
श
घुयको देखता हआ दृढ चित्त ओर दढ वतसे बराबर सौ वषेतकं तपस्या करता रहा ॥ २३ ॥ अगते परथिवीको स्पशे करके उसने
अथो स॒ तारको दैत्यो महाबलपराक्रमः॥तणः कर्त जनन्याश्ाज्ञां ययाचे महामनाः॥२ ०॥प्राप्ताज्ञः स महामायी मायिनामपि
मोहकः ॥ सर्वदेवजयं कर्तृ तपोथं मन आदधे ॥२१॥ मधोर्वनञ्ुपागम्य गुर्वाज्ञाप्रतिपालकः॥ विधिश्दिश्य विधिवत्तपस्तेषे ए
सुदाश्णम्॥२२।उर्द्॑बाइेकपादो रथिं पर्यन्स चक्षुषा ॥ शतवर्षं तपश्चक्रे टटचित्तो ट्ट्तः॥२३॥अगषन युवं स्पृ्ठा शत |$
¢| वर्ष च तादृशः ॥तेषे तपो दृढात्मा स॒ तारकोऽघरराट् प्रुः॥२४॥शतवर्ं जं प्राश्नञ्च्छतवर्ष् च वाथुञु्॥ शतवष जे तिष्ठ ठ
¢ ञ्च्छतं च स्थंडिलेऽतपत्॥ २९] ।शतवषं तथा चाग्नौ शतवर्षमधोष्ठखः॥ शतवष तु हस्तस्य तलेन च युते स्थितः॥२६॥ शतवर्षं ए
त क्षस्य शखामारत्य वे सुने॥ पादाभ्यां शुचिधूमं हि पितेश्वाधोमुखस्तथा॥२७॥एवं कष्टतरं तेषे सुतपस्स तु दैत्यद्॥ कामश ट
दिश्य विधिषच्छरण्वतामपि दुस्सदम्॥२८॥ तरेव तपतस्तस्य महत्तेजो विनिस्सृतम्॥शिरसस्सवसंसपि महोपदवङन्सुने॥२९॥ |©
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|| पिया, सौ वर्तक वायु मात भक्षण करक रहा, सौ वतक जठ ओर सौ वर्तक मैदान नैठकर तपस्या करता रहा ॥ २५ ॥ सौ व्षतक
¢ अभिताप, सौ वपं नीचेको खल उप्रको पैर किये रहा, सौ वर्ष हाथो पृथिवीकौ स्यशकर सब शरीर उढाये रहा ॥ २६ ॥ हे खने ।
सौ वतक पेरोप वृक्षकी शाखाको पकंडकर नीचेको सुख कये अिहोतरका पवित्र धरम संता रहा ॥ २७ ॥ इत भकारे षुनने वारको
>| भी दुःसह .उस दैत्यराजने विधिूैक महाकठिन तपस्या की ॥ २८ ॥ तब तपस्या करतै२ उक्षके शरीरस महातेज निकलने छमा हे खने ! वहं
(य
| शिरसे निकला तेज सबको स्पशकर महा उपद्रव करने बाढा था ॥ २१ ॥ उम तेजमे प्रायः देवताओंके टोक दग्ध होने छे, हं खन ।
|| सव देवता ओर ऋषि चारों ओरमे दुःख पाने ठे ॥ ३० ॥ समे देवेश्वर इन्द्रो बडा भय हुआ जो इस समय तप कर रहा है यह अवश्य
८ मेरा िंहास्तन छीन ठेगा ॥ ३१ ॥ अथवा प्रभु विनाही समय पभ्रकय करना चाहते है इम ॒सन्देहफे प्रात होनेमं क्रिमी प्रकारका निश्वय
न हुआ ॥ ३२॥ ततर वै सब दर्ता ओर ऋषि परस्पर सम्मति करे भीत ओर दीन हो सव मेरे स्थानपर आये ॥ ३३॥ वे सव
शि 6पु
॥२१७॥
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प्रणाम करक मेरी सृति करे ठे, ओर व्याकृ हो हाथ जोडकर सुज्ञमे मब वृत्तान्त निवेदन किया " ३४ ॥ भने बुदिपवैक उ सव
तेनेव देवकोकास्ते द्ग्धप्राया बभूविरे ॥ अभितो दुःखमापत्नास्सवं देवषयो सुने ॥ ३० ॥ इद्र भय॒मापेदेऽधिकं देवेश्वरस्त
दा ॥ तपस्यत्य्य कञचिद्रे मत्पदं धर्षयिष्यति ॥.३१॥ अकाडे चैव ब्रह्माण्डं संदरिष्त्ययं प्रभु॥ इति सुशयमापत्ना निश्चयं
|| नोपलेभिरे ॥ ३२ ॥ ततस्सवं ससंमन््य मिथस्ते निर्जरषेयः ॥ मह्छोकमगमन्भीता दीना मां समुपस्थिताः ॥३३॥ मां
||| प्रणम्य स॒ंस्तूयसवे ते छ्ि्टचेतसः ॥ कृतस्वंजकयो मदं वृत्तं सर्व न्यवेदयन् ॥ ३४ ॥ अईं सर्व सुनिच्ित्य कारणं तस्य॒
¢ सद्धिया ॥ वरं दतुं गतस्तत्र यत्र तप्यति सोऽसुरः ॥ ३५ ॥ अ्रोचं वचनं तं वै वरं ब्रूरीत्यहं सुने ॥ तपस्ततं त्वया तीं
¢ नदियं विद्यते तव ॥ ३६ ॥ इत्येवं मद्रचः त्वा तारकस्स महासुरः॥ मां प्रणम्य सुसंस्तूप वरं ववेऽतिदारणम्॥ २७। तारक
| उवाच् ॥ त्वयि प्रसन्ने वरदे किमसाध्यं भवेन्मम ॥ अतो याचे वरं त्वत्तः शृणु तन्मे पितामह ॥ ३८ ॥ यदि प्रसत्नो देवेश
¢ यदि देयो वरो मम ॥ देयं वरद्रयं मद्यं कृपां कृत्वा ममोपरि ॥ ३९ ॥ ।
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रु. २ || || कारणको निश्वयकर वहां वरदेनेको गया जहां वह ९ तपस्था करता था ॥३५॥ हेसने ! वहां जाकर भने उसे वर॒ मौगनेको
पा.सं.२ ||८|| कहा किं तुमने बडी तपस्या की है कोर पस्तु सक्च तुम्हे अदेय नहीं है ॥ ३६ ॥ वह॒ महाअघुर तारक इस भरकार मेरे वचन सुनकर सङ्घे
अ०१५ ||| भ्णाम् कर स्तुति पूर्वक बडा दारुण वर मांगने ठगा ॥ ३७॥ तारकने स जब वरके देनेवाटे आप उपस्थित है तब म्ञे कोहं वस्तु अघताध्य
नहीं है, इस कारण हे पितामह ! मँ आपसे वर मागता ह, सो आप पुनं ॥ ३८ ॥ हे देवेश ! यदि आप् प्रसन्न है यदि आप सचे वर
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दते है तो मेरे ऊपर छृपाकरकै सक्चे दो वरदान दीजिये ॥ ३९॥ हे भगवन् ! जहातक आपके बनाये छोक है उनमे मेरे समान रवान् कोई नहो 1४०॥
| जिस समय शिवके वीरयते सेनापति एत्र उत्पन्न हो, ओर मेरे ऊपर शच्च चरावे तो बेरा मरण हो ॥ ४१॥ हे मुनीश्वर ! जब उस देत्यराजने दस प्रकार
मञ्पे वचन कहे त म उसको वैसाही बर देकर अपने स्थानको आया ॥ ४२ ॥ वह दैत्येश्वर भी अपने मनके अदुप्ार उत्तम् वरको पाकर | |
रसन हो शोणित एरको गया॥ ४३॥ वहां देत्यगारु शुक्रा चार्थनेउसका असुरोक साथ त्रिटोकीके आधिपत्ये अभिषेकं किया ओर उनको यह आज्ञा
त्वया चिते रोके सकलेऽस्मिन्महाप्रभो ॥ मचुट्यो बल्वान्नूनं न भेत्कोऽपि वै पुमान्॥४ ०॥शिववीर्यसमुत्पत्नःपतरस्सेना
पतिरथदा ॥ भूत्वा शचं क्षिपेन्मद्यं तदा मे मरणं भवेत् ॥ ४१ ॥ इत्युक्तोऽथ तदा तेन देत्येनाहं सुनीश्वर॥ वरं च तादशं दत्वा
स्वलोकमगम द्रतम्॥४२॥ देत्योऽपि स॒ वरं लयृश्वा मनसेप्सितसुत्तमम्॥ सुप्रसन्नोतरो भूत्वा शोणिताख्यपुरं गतः॥४३॥ अभिषि
क्तस्तदा राज्ये चेखोक्यस्यासुरेस्सद्॥ शुक्रेण देत्यगुरूणाज्ञया मे स महासुरः ॥४४॥ ततस्तु स महादेत्योऽभवस्चेलोक्यनायकः ॥ ॥*
सवाज्ञां भवतैयामास पीडयन्सचराचरम्॥४५॥राज्यं चकार् विधिवधिकोकस्य स तारकः॥ प्रजा पाख्यामास परीडयत्रि्नरादि |५
ट| का्॥४६॥ततस्स तारको देत्यस्तेषां रल्नान्युपाददे ॥ इद्रादिलोकपालानां स्वतो दत्तानितद्धयात् ॥७॥ इदेणेरावतस्तस्य भया ॥९
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तमे समपितः ॥ कुबेरेण तदा दत्ता निधयो नवसंख्यका ॥४८॥ वरुणेनहयाः शभा ऋषिभिः कामञ्ृत्तथा॥ सूथैणोशरश्भवा
दिव्यो भयात्तस्मे समर्पितः ॥४९॥ यज यञ शुभ वस्तु दृष्ट तेनासुरेण हि॥ तत्तद गदीतं तरसा निस्सारश्विभवोऽभवत्॥५०॥ ||
मेही दीथी॥ ४४॥ त बह महाय त्रिोकीका नायक हआ उसने चर अचरकौ पीडित कर स्त्र अपनी आज्ञा भचार की॥ ४५॥ विभिपूरवक ||
वह तारकं त्रिलोकीका राज्य करने ठ्गा ओर देवता आदिको पीडित करके प्रजाकी पाठना करने ठगा॥ ४६॥ तब दैतयेश्वरनेउन इन्द्रादि देवताओं &
| जो जिसके यहां रन् थे मागि ओर उन्होने उसके भयस स्वयं देदिये ॥ ४७ ॥ इन्द्रे डके मारे उपे देरावत देदिया कुबेरने नौओं निधिम उसको ¢
देदीं ॥ ४८ ॥ वर्णने त वर्णके घोडे, कपियोने कामधेल सने दिव्य उचैः्वाधोडा भयते उसको अर्पण कर दिया ॥ ४९ ॥ उप्त अरे
0 1098
१ यहांपर सुध स्थानम जव इन्द्र एेसा पाठ है तब इन्द्रने एसा अर्थं करना ।
१००
ु ह|| जहाजहां उत्तम वस्तु देखी वह वह बरुते रहण करटी बहुत क्या त्रिढोकी निस्तार हो गईं ॥ ॥ ८
ह रत्नप्रदान कि पृथिवी विनाजोते बीज बरहणकर फठ देनेटगी, सव॒ प्रजा उससे कामना अनुसार वस्तु दुहने ठगी ॥ ५१. ॥ खय उतना । |||
तपता जितनेमे किसीको दुःख न हो, चन्द्रमा अपनी कान्ति सहित देखता, ओर वायु निरन्तर अनुकूल चछ्ता ॥ २ ॥ देवता ओर परित
आदिका जौ द्भ्य था उप्त दुरात्मा अष्ुरने वह सव ग्रहण कर छिया ॥ ५३ ॥ त्रिोकीको वशम करके वृह स्वयं इन्दर हुआ वह अदत स्वामी
समुद्राश्च तथा रत्नान्यदुस्तस्मे भयान्मुने॥अकृष्टपच्यासीत्पृरथ्वी प्रनाःकामदुघाः खिलाः ॥ ५१ ॥ सूर्यश्च तपते तद्वतददुःखं +
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न यथा मवेत् ॥ चद्स्त परभया द्यो वाधुस्सरवानुकल्वान् ॥५२॥ देवानां चेव यद्भयं पितृणां च परस्य च ॥ तत्सर्वं सयु
‰|| ॥५8॥ निस्सायं सकलान्देवान्दैत्यानस्थापयत्ततः ॥ स्वयं नियोजयामास देवयोनिर्स्वकमंणि ॥ ५॥ अथ तद्वाधिता देवा
&|| स्स्व शक्रपरोगमाः॥॒ने मां शरणं जग्युरनाथा अतिविहलाः ॥ 4६ ॥ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां स्रसंहितायां
^
५० ॥ हे सने ! भयके मारे समुदोनि उत्कं |©
भना ओर उसने अद्वितीय राज्य किया ॥ ५४ ॥ सतव स्थानोंते देवताओंको निकार कर उक्षन वहां दैत्योको स्थापित किया ओर् देव ¢
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तृतीये पर्वतीखण्डे तारकास्ुरतपोराज्यवर्णननाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ ॥ व्रह्नोवाच ॥ अथ ते निज॑रास्सवे सुप्रणभ्य £
भरजेश्वरम् ॥ तुष्टवुः पश्या भत्त्यातारकेण प्रपीडिताः ॥१॥ अहं अत्वामरनुति यथार्थो हदयगमाम्॥ सुप्रसन्नतरो भूत्वा प्रत्य
वोचं दीवौकसः ॥ २ ॥ स्वागतं स्वाधिकार वै निर्विधाः संति वस्सुराः ॥ किमर्थमागता यूयम सवे वदंतु मे ॥ ३॥ |
योनियोको उन उनके कर्मोमिं उस्लने स्वयं स्थापन किया ॥ ५५ ॥ हे सने ! तव॒ सब इन्द्रादि देवता उससे बाधित होकर अनाथ भौर
अतिविहल हो भेरी शरण आये ॥ ५६ ॥ इति श्रीशिवमहाषएराणभाषारीकायां रद्रसंहितान्तरगततृतीयपार्व॑तीखंडे प॑चदशोध्यायः ॥ १५ ॥ ©
भाजी बोटे तब बे सब देवता भरजापतिको भणाम कर तारकासुर पीडित हए परम भक्ति प्रणाम करने ओर सुति करे ठगे ॥ १ ॥ ||&
तब भ यथाथ ओर हदयको प्यारी ठगने वाटी उस देवस्तुतिको सुनकर अयन्त प्रसन्न होकर देवताओं बोढा ॥ २ ॥ ह देवताओ 1 2
| | स्वागत हो तुम अपने अधिकारपर प्रसन्न हो तुम्हारे कोई वित्र तो नहीं है तुम किंस निभित्त यहा आये हो सो सब खसे कंिये॥३॥ ]|2
यह मेरे वचन सुनकर पे सब देवता सज्ञे प्रणाम करके तारकाघुरसे भीत होकर दीनहो मस्तक रकाय मुञ्चते कहने कगे ॥४॥ देवता बोरे हे ||
रोकेश ! तारकनामा दैत्य आपके वरदानसे अभिमानी होकर हमको हमारे स्थाने निकाठकर हमारे अधिकारोको हमसे रहण कर रहा ह ¢
॥ ५॥ जो हमको दुःख उपस्थित हभ है आप क्या उको नहीं जानते वह दुःख आप शीध नाश कीजिये, हम आपकी शरणमे प्राप्त है ह
४||॥ ६॥ जहां कहीं हम स्थित होते हँ इह रात् दिन हमको पीडित करता है जहां कहीं हम भागकर जाते है, वहां असुरही हमको दिखाई ¢
इति श्वा वचो मे ते नत्वा सवे दिवौकसः ॥ मामूचुनतका दीनास्तारकेण प्रपीडिताः ॥४॥ देवा उचुः ॥ छोकेश तारको दैत्यो |£
वरेण तव द्पितः ॥ निरस्यास्मान्दत्स्थानान्यग्ररीत्नो बलात्स्वयम्॥५॥ भवतः कि न ज्ञातं दुःखं यन्न उपस्थितम् ॥ तहःखं |£
नाशय क्षिप्रं वयं ते शरणं गताः॥६॥अहनिंशं बाधतेस्मान्य ततास्थितान्स वे ॥ पलायमानाः पश्यामो यच तापि तारकम् |©
॥७॥ तारकान्नश्च यदुःखं संभूतं सकलेश्वर ॥ तेन सवे वयं तात पीडिता विकला अति ॥८॥ अथिर्थमोथ वरूणो निति
`युरेव च ॥ ॥ अन्ये दिक्पतयश्चापि सवे यद्वशगामिनः॥९। सवै मनष्यधर्माणस्स्वः परिकरर्थेताः॥ सेवंते तं महाहित्यं न स्वतंबाः
ध कदाचन ॥ १० ॥ एवं तेनादिंता देवा वशगास्तस्य सर्वदा ॥ तदिच्छाकाय्यैनिरतास्सवें तस्यात॒जीविनः ॥ 9१ ॥
४ || :
# ४
देता है ॥ ७ ॥ हे सकटेश्वर । हमको तारक असुरसे जो दुःख प्राप्त हभ है सो कहा नहीं जाता हे तात ! हमं बडे विकर ओर पीडित है
॥ ८ ॥ अग्नि यम् वरुण निति वायु ओर दूरे दिक्पा भी सव उप्तकी शरण है ॥ ९ ॥ सबही मयुष्य धर्मवाठे ओर सबही उसकी परि
कपे युक्त है, सवही उप महादैत्यकी सेवा करते है, ओौर कोई भी खतं नहीं है ॥ १० ॥ उस भकार देवता भी उत व्याकु होकर
उक वशीभूत हुए है उस्तकी इच्छसे कायम निरत होकर सबही उसके अनुजीवी है ॥ ११ ॥
शिण्पु
॥२१९॥
रुभ्स२
पा.ख.३
अ०१६
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न्न
जितनी सुन्दरी धियं ओर जितनी अप्सरा है उस महाबटी तारक असुरने उन स्वको प्रहण कर सिया है ॥ १२ ॥ न यजञही कि
हैः न तपस्वी तपस्याही करते है लोकम कोद दान भरमीदिक नहीं भदत्त होता है ॥ १२३ ॥ करौच नामक एक महादानव उततका सेनापति है
वह पातालम भी जाकर वहांकी भजाओंको निरन्तर पीडित करता है ॥ १४ ॥ है जगत्पति! उस्र कंरुणारहित पापी तारके यह सब तिनगत्
हसते अपने वशम कर॒ छिया है ॥ १५॥ हम् सभी वही जार्थेगे हमारे व्यि आप जो स्थान नियत करद हे छोकनाथ ! उप्त दैत्यप
महापीडित हुए हम स्वस्थ होकर कहां रह सकेगे ॥ १६ ॥ आपही हमारी गति हमारे शासक पोषक ओर् विधाता हो, हम सव तारक
यावत्यो वनितास्सवां ये चाप्यप्॒रसां गणाः॥ सर्वास्तानगरदीरैत्यस्तारकोऽसौ महाबी॥१२॥ न यज्ञास्सं प्रवर्तते न तपस्यति
तापसाः ॥ दानधर्मादिकं किंचिन्न लोकषु प्रवततेते ॥ १३ ॥ तस्य सेनापतिः कौचो महापाप्यस्ति दानवः ॥ स पातालतलं
गत्वा बाधते त्वनिशं प्रजाः ॥ १४ ॥ तेन नस्तारकेणेद सकटंञुवनयम् ॥ इतं हठानगद्धातः पापेनाकरूणात्मना ॥ १५ ॥
वयं च ततर यास्यामो यत्स्थानं त्वं विनिदिंशेः ॥ स्वस्थास्तद्रारितास्तेन रछोकनाथसुरारिणा ॥ १६ ॥ त्व नो गतिश्च शास्ता
च धाता आता त्वमेव हि ॥ वयं सवे तारकाख्यवह्नौ द्ग्धास्सुविहलाः ॥ १७ ॥ तेन करूरा उपाय नः स॒वं हइतबलाः कृताः॥
विकारे सांनिपाते बा वीयर्वत्यौषधानि च ॥१८॥ यास्माकं जयाशा हि दरिचकरे सुदशंने ॥ उत्कुठितमभूत्तस्य कंडे पुष्प
मिवापितम् ॥ १९॥ ब्रन्नोवाच ॥ इत्येतद्वचनं श्रत्वा निर्जराणामहं घुने ॥ प्रत्यवोचं सुरान्सर्वास्तत्काटस॒दृशं वचः ॥२०॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥ ममेव वचसा देत्यस्तारकाख्यस्समेधितः ॥ न मत्तस्तस्य हननं युज्यते हि दिवौकसः ॥ २१॥
नामक अग्रि व्याकुल होकर दग्ध हो रहे है ॥ १७ ॥ उत्तने कूरताके उपायोसे हम सबको हतबल कर दिया है विकार वा सन्निपाते
यवान् ओषभिये ही काम देती है ॥ १८ ॥ जितत नारायणकै पुदशैन चक्रम हमको जयकी आशा थी वह मी उतके कण्ठे
ष्पकै समान लगकर कुण्ठित हो गया ॥ १९ ॥ ब्राजी बोठे हे सनिराज ! इस्त प्रकारते मै देवताओके वचन सुनकर
उस कारकै समान सब देवताओं यह वचन बोला ॥ २० ॥ ब्रह्माजी बोटे मेरे ही वचने बह तारक नाम दैत्य व्द्धिको पा इआ है
(०५4 ९4 > 49 46 3२ आ > -+
नज 0 क + +> 3९ +
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हे देवताओ ! भरे हारा उस्षका मरण ठीक नहीं है ॥ २१ ॥ जिसे जो बहाया जाय वह उससे मारनेके योग्य नहीं होता विषवृक्ष भी ठगाकर प
को$ छेदनकी इच्छा नहीं करता ॥२२॥ हां शिवजी तुम्हारे सम्पुणे कायं कर सकते है परन्तु विना प्ररणाके वह कुछ काय नहीं करगे ॥२३॥ ४
यह तारक नामवाठा दैत्य अपने पापे स्वयं ही नाश हो जायगा, जैत यह कार्यं पिद होगा वैसा मै तुमको उपदेश करता दं ॥ २४ ॥भ||(|
| नदर वा को ओर दूसरे देवता तारक असुरको नहीं मार सकते, यह भेरा वर सत्य है ॥ २५ ॥ हे देवताओं ! यदि शिवजीके वीयसे
तृतो नैव वधो योग्यो यतो बृद्धषुपागतः ॥ विषद्रक्षोऽपि संवर्ध्य स्वय छे्मसांप्रतम् ॥२२॥ युष्माकं चाखिलं कार्य क्त
योग्यो हि शंकरः ॥ किन्तु स्वय न शक्तो हि भरतिकतं प्रचोदितः ॥ २२ ॥ तारकख्यस्तु पापेन् स्वयमेष्यति संक्षयम् ॥
यथा यूयं संबिदध्व्रुपदेशकरस्त्वहम् ॥ २४ ॥ न मया तारको वध्यो हरिणापि हरेण च ॥ नान्येनापि सुरेरवापि मद्रात्स
त्युच्यते ॥ २५ ॥ शिववीय्य॑ससुत्पन्नो य॒दि स्यात्तनयस्सुराः ॥ स एव तारकाख्यस्य हता दैत्यस्य नापरः ॥२६॥ यस्ुपा
यपदं वच्मि त ङरष्वं सुरोत्तमाः ॥ महादेवप्रसादेन सिद्धिमेष्यति स धुवम् ॥ २७ ॥ सती दाक्षायिणी पूर्व त्यक्तदेदा त
याभवत् ॥ सोत्पन्ना मेनकागभात्सा कथा विदिता हि वः ॥ २८ ॥ तस्या अवश्यं गिरिशः करिष्यति करयहम् ॥ तत्कुर्
ध्वूमुपायं च तथापि अिदिवौकसः ॥ २९ ॥ तथा विदध्वं खतरा तस्यां त प्रियत्तः ॥ पर्वत्यां मेनकाजायां रेतःपरतिनिपा
तने ॥ ३० ॥ तमूद्ष्वैरेतसं शंभुं सेव प्रच्युतरेतसम् ॥ कतु समर्थां नान्यास्ति तथा काप्यबला बलात् ॥ ३१ ॥
महादेवके भरसादसे सव सिद्धि होगी ॥ २७ ॥ पहटे जो दक्षकी कन्या सतीन अपना देह त्याग किया था वही मेनकाके गर्भे उत्पन्न
हुईं है, यह कथा आप जानतेही ह ॥ २८ ॥ शिवजी अवश्य उस्षका कर॒धरहण करेगे, हे देवताओ तो भी तुम उक लवि उपाय करे
॥ २९ ॥ हे देवताओ 1 अब दस प्रकार तुम उपाय करो किं पावंतीकै साथ शिवजीका विवाह हो ॥ ३
आकषण करने वही समर्थ है दूसरी अवखा कुछ नहीं कर सकती ॥ ३१ ॥
ई त्र उत्न्न हो वही तारक नामकं देत्यको मार सकता है दूसरा नहीं ॥ २६ ॥ हे भेष देवताओं ! जो उपाय तुमसे भँ कहूं सो तुम करो ठ
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° ॥ कारण कि ऊ्वैरेता शभक वीर
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॥२२०॥
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पा.खं.
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वह गिरिराजकी छता इष समय युबा हो गई है हिमाछयमे तपस्या करते हुए शकरकी निलय सेवा करती है ॥ ३२ ॥ वहं पावती अपू
पिताके वचनते हतक अपनी ससिोके साथ ध्यानम स्थित परमश्वरकी नित्य सेवा करती है ॥ ३२ ॥ ययपि बह त्रिठोक छुन्दरी पर
मश्वरके आगे नित्य रहती ओर पूजा करती है पर ध्यानम मन ठगाये शिवजी कभी मनसे भी तो नहीं विच्युत होते ॥ ३४ ॥
जिपतभरकार चन्द्रशेखर कटीको अपनौ भायां जानं हे देवताओ ! यत्नपूरवक तुम बहुत शी वैसा विधान करो ॥ ३५॥ अर
भी उस्र तारक दैत्यके स्थानम जाकर उसे उस बुरी हसे निवारण करता हू इससे तुम अपने स्थानम जाओ ॥ ३६ ॥ देवताओंसे _यह
सा सुता गिरिराजस्य साप्त परौढयौवना ॥ तपस्य॑तंहिमगिरौ नित्यं संसेवते हरम् ॥ ३२ ॥ वाक्याद्धिमवतः कालीं स्वपि
तुरठत श्शिवा ॥ सखीभ्यां सेवते साद्ध ध्यानस्थं परमेश्वरम् ॥ २३ ॥ तामथ्रतोऽचेमानां वे चैलोक्ये वरवणिनीम् ॥ ध्यान
सक्तो महेशो हि मनसापि न दीयते ॥२७॥ भार्या समीहेत यथ्ा स कालीं चन्द्रशेखरः ॥ तथा विधध्वं दशा न चिरा
हेव यत्नतः ॥३५॥ स्थानं गत्वाथ दैत्यस्य तमहं तारकं ततः ॥.निवारयिष्ये कुहटात्स्वस्थानं गच्छतामराः ॥३६॥ इत्युक्ताहं
सुरान्शीध्रं तारकाख्या्रस्य वै ॥ उपसंगम्य सुप्रीत्या ससाभाष्येदमन्रवम् ॥ ३७ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तेजोसारमिदं स्वर्ग
राज्यं त्वं परिपासि नः ॥ यदथ सुतपस्तपतं वाञ्छसि त्वं ततोऽधिकम् .॥ ३८ ॥व्र्ाप्यवरो दत्तो न मया स्वगेराज्यता ॥
तस्मात्स्वर्गं परित्यज्य क्षितौ राज्यं समाचर ॥ ३९ ॥ देवयोग्यानि तत्रैव कार्याणि निखिलान्यपि ॥ भविष्यंत्यरसुरश्रषठ
नात्र का्ण्यां विचारणां ॥४७०॥ इत्युक्राहं च संबोध्यासुरं तं सकरेरवरः ॥ स्मृत्वा शिवं च सशिवं त्रातर्धानमागतः ॥४१॥
कहकर मै तारकके समीप गया, ओर प्ेमसे बातचीत करके उससे इ रकार कहा ॥ ४७ ॥ बह्लाजी . बोटे यह स्वगे तेजोंका सार है,
सो तुम हमारे राज्यको पाटन करते हो, जिस्न कारण तुमने तप किया था सो तु उससे अधिककी इच्छा करता है ॥ ३८॥ मने दूसरी भका
रका व्र दिया है स्वगेकै राज्यका बर नहीं दिया है इससे स्वगेको त्यागकर भूमण्डलका राज्य करो ॥ ३९॥ है सुरोत्तम ! वहां देवताओं
केही योग्य संपूण काये है इमे सदेह नहीं ॥ ४० ॥ सकटेश्वर मे इस भरकारसे उसे सब बातं समञ्चाकर शिवाशिवको स्मरणकर उक
पथय 94 9९9९9992.
आगेसे अन्तर्धान ह्ञोगया ॥ ४१ ॥ तारकभी स्वगेको त्यागकर भूमिपर आगया ओर शोणितपएरमं आकर अपना राज्य करने र्गा ॥ ४२. ॥ #
उधर सब देवता मेरे वचन सुनकर सुज्ञ प्रणाम कर प्रस् हो इन्रके साथ इन्द्रके स्थानम चरे गये ॥४३॥ वहां जाय मिकर ओर परस्पर विचर ¦
करके वे सब मरुत् आदि प्रसन्न होकर इन्द्रस कहने कगे ॥ ४४ ॥ देवता बोढे जिस भकार कामनापू्क शिवजीको पार्व॑तीमं रुचि होजाय, हे
इनदर ! बह्माजीके बताये उपायके अनुप्षार वह कायं तुमको शीघ करना चाहिये ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोटे इसप्रकारसे सब देवता सुरेश्वरसे यहं उपाय
तारकोऽपि परित्यज्य स्वग क्षितिमथाभ्यगात् ॥ शोणिताख्यपुरे स्थित्वा सर्वराज्यं चकार सः ॥ ४२ ॥ देवार्सवंऽपि
तच्छत्वा मद्वाक्य सुप्रणम्य माम् ॥ शक्रस्थानं ययुः प्रीत्या शक्रेण सुसमाहिताः ॥४३॥ तञ गत्वा मिखित्वा च विचाय्यं
च परस्परम् ॥ ते सवं मरूतः प्रीत्या मघवतं वचोऽब्रुवन् ॥ ७७ ॥ ॥ देवाखचुः ॥ ॥ शम्भो्य्थथा शिवाथां वै श्चिजायेत
कामतः ॥ मधघवंस्ते प्रकतग्य ब्रहनोक्तं सर्वमेव तत् ॥ ०५ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवं सर्ववृत्तांतं विनिवेयं सुरेश्वरम् ॥ जग्ुस्ते
सर्वतो देवाः स्पं स्वं स्थानशरुदान्विताः ॥ ४६ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसंहितायां ततीये वार्वतीखण्डे देव
सात्वनवणेनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ गतेषु तेषु देवेषु शकः सस्मार वै स्मरम् ॥ पीडितस्तारकेना
तिदैत्येन च दुरात्मना ॥ १ ॥ आगतस्तत्क्षणात्कामस्सवसंतो रतिप्रियः ॥ सावलेपो यतो रत्या चैलोक्यविजयी प्रभुः
॥ २॥ प्रणामं च ततः कृत्वा स्थित्वा तत्पुरतस्स्मरः ॥ महोत्रतमना स्तात सांजलिश्शकरमग्रवीत् ॥ ३ ॥
निवेदन करकं भसन हो अपने अपने स्थानम चरे गये ॥ ४६ ॥ इति शरीशिवमहाएराणभापाटीकायां सरसंहितान्तर्गततरतीयपार्वतीसेडे ठ
पोडशोऽध्पायः ॥ १६ ॥ ब्रह जी बोठे देवताओंकै चठेजनिष्र इन्द कमदेवृक्ो स्मरण किया, कारण कि उस समय इन्दरभी दुरात्मा तारके ©
बहुत पीडित होगये थे ॥१॥ उक्ती समय रतिश्रिय कामदेव वसन्तके षाथ उपस्थित हुआ, यह तरिटोकीका जीतनेवाछा भमु रतिके सहित साभिमान ठ
उपस्थित हुआ ॥ २ ॥ प्रमाण करक कामदेव इन्द्रके आगे उपस्थित हुआ ओर बडे उन्नत मनते महेन्द्रजीसे बोखा ॥ ३ ॥
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१०१
आपका कया कार्य उत्पन्न हुभा है, तुमने किस कारण स्ने स्मरण किया है,
बह्लाजी बोठे यह कामदेषकै वचन सुनकर इन्द्र परमभसन हो उसकी बडाई कर
है, जो मेरा काथ उपस्थित हृभा है, हे मकरध्वज ! ठुम जो उसकै करनेको उपस्थित हृए हो इससे तुम षन |
महार आगे कहता हं, जो भेरा कायं है वह तुम्हारा भी है इसमें अन्यथा नहीं है ॥ ७ ॥ मेरे बहुतसे महाचभाव मित्र है, पर
काम उवाच ॥ #ि कार्य्य ते सञ्त्पत्नं स्मृतोऽहं केन हेतुना ॥ ततत्वं कथय देवेश तत्कर्तुं सञ्चपागतः ॥४॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥
शिण्पुर
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|| तच्छ्रत्वा वचनं तस्य कदस्य सुरेश्वरः ॥ उवाच वचनं रीत्या युक्त युक्तमिति स्तुवन् ॥५॥ ॥ शक्र उवाच॥तव साघु समा |©
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॥२२१॥
हे देवेश ! शीघ्र किये बह सब गँ करनेको उपस्थित हूं ॥ ४ ॥ ५
ते हुए यह वचन बोरे ॥ ५ ॥ इन््रने कहा ुम्हारा आस्न उत्तम |©
न्य हो ॥ ६ ॥ अब मेरे बचन सुनो. म ||
न्तु हे काम ! तेरे
रम्भो यन्मे कार्य्यघुपस्थितम् ॥ तत्कर््चयतोऽपि त्वं धन्योऽसि मकरध्वज ॥६॥ भरस्तुतं श्ण मद्वाक्यं कथयामि तवाभ्रतः॥
मदीयं चैव यत्कार्यं त्वदीयं तन्न चान्यथा ॥७॥ मित्राणि मम संत्येव बहूनि सुमहांति चपर त स्मर सन्मित्रं त्वत्तर्यं न हि
-^
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कुज चित् ॥ ८ ॥ जयां मे दयं तात निमितं वशत् ॥ वन्नं च निष्फलं स्याद्र त्वं तु नैव कदाचन ॥ ९ ॥ य॒तो हितं ||
प्रजायेतततः को ठ भियः परः॥ तस्मान्मित्रवरस्त्वं हि सत्कार्यं कतुमरईसि ॥१०॥ मम दुःखं समुत्पन्नमसाथ्यं चापि काल ||
‰|| जम्॥केनापि नैव तच्छक्यं दूरीक त्वया विना॥११।दातुः परीक्षा दुर्भिक्षे रणे शरस्य जायते॥आपत्काले त॒ मितरस्याशक्तौ ट
ङ्त, २ घ्रीणां ङस्य हि ^ १२॥ विनये संकरे प्रात्तेऽवितथस्य परोक्षतः ॥ सुस्नेहस्य तथा तात नान्यथा सत्यमीरितम् ॥१२॥ ४
व || समान मेरा कोई मित्र नहीं है ॥ ८ ॥ मेरे जयके दयि हे तात ! एक तुम ओर एक षज यही दो उत्तम वस्तु है वज तो कभी निष्फठ भी होजाता
-ख. ` || || है परन्तु तुम कभी निष्फठ नहीं हो सकते ॥ ९ ॥ जिससे अपना हित हो उससे प्यारा कौन है इस कारण हे भितवर तुम मेरे इस कायं करनेकै ट्
< ६ योग्य हो ॥ १० ॥ सञ्च जो दुःख उत्पन्न हुमा है यह असाध्य ओर काठसे उत्यन्न तुम्हारे सिवाय उसे दूर करनेको कोई भी समथं नहीं|
>॥ ३ ॥ ११ ॥ दुर्भिक्षमे दाताकी युद्धम शूरकी आपत्ति भित्रकी अस्षमथ होनेपर ज्ञीकुठकी परीक्षा होती है ॥ १२॥ हे तात । विनयमे संकटकी ध
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भ्राम परीक्षा जो सत्यता वही सत्यता कही गई है इस दशाम सत्यका रखना कठिन होता है तैसे इन्दं स्थरलोम हक! रखना भी कठिन
है इनही स्थम रहने बाढी सत्यताको जसे सत्यता कहते ह तेमे इनहीं स्थरोमे रहने वाटे ज्ेहकोही केह कहते हँ यहीं शेषठ सत्यता तथा श्रेष्ठ
लञेहका ठक्षण कहा गया है यह अन्यथा नहीं है भ सत्य कहता हूं ॥ १३ ॥ जो कि दूरके निवारण करके अयोग्य सुङ्ञपर विपत्ति प्रात्तहै,
तभी हे भित्रवयं । इस विपत्तिहीमे आज तुम्हारी परीक्षा भ्रा हई ॥१४॥ यह केवर मेरेही सुखका काये नहीं है, किन्तु यह सव देवताओंका
कायं है इसमे सन्देह नहीं ॥१५॥ ब्रह्ाजी बोरे कामदेव इस भकारसे इन्द्रके वचन सुनकर हसते हूए गंभीरतासे यहं वचनं बोढा ॥१६॥ कामने
प्राततायां वै ममापत्ताववायायां परेण दि॥ परीक्षा च त्वदीयाऽ् मिज्रवये भविष्यति॥१४॥ न केवरं मदीयं च काय्यैमस्ति
सुखावहम्॥ कि तु सवसरादीनां काय्यैमेतन्न संशयः ॥१५॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येतन्मघवद्राक्यं त्वा तु मकरध्वजाः ॥ उवाच
प्रेमगंभीरं वाक्यं सुरिमतपूर्वकम् ॥ १६ ॥ ॥ काम उवाच ॥ करिमर्थमित्थं वदसि नोत्तरं वच्म्यदं तवं ॥ उपञृत्कृभिमं लोके
हश्यते कथ्यते न च ॥१७॥ सङ्कटे बहु यो ब्रूते स किं कार्य करिष्यति ॥ तथापि च महाराज कथयामि शृणु प्रभो ॥१<८॥
पदे ते कषितं यो वे तपस्तपति दारूणम् ॥ पातयिष्याम्यहं तं च शङ ते मि सर्वथा ॥१९॥ क्षणेन भंशयिष्यामि कटाक्षेण
वरछ्ियाः॥ देवषिंदानवादींश्च नराणां गणना न मे ॥२०॥ वन्नं तिष्ठतु दूरे वे शचराण्यन्यान्यनेकशः ॥ किं ते कार्यं करिष्यंति
मयि भिञ्र उपस्थिते॥२१॥ ब्रह्माणं वा हरि वापि अष कुर्यान संशयः ॥ अन्येषां गणना नास्ति पातये हरं त्वपि ॥२२॥
कहा इतना आप क्यों कहते ह भ आपके कथन पर उत्तर नहीं देता उपकारी ओर रुत्रिम कम दीखे जाते है कहनेका कया भयोजन है॥१७॥
संकटम जो बहुत बोकता है, वह क्या कायं करेगा है महाराज! तो भी नँ जो कहता ह सो आप सुन ॥१८॥ जो आपका पद रहण केकी
इच्छसे कोई तप् करता हे भे उत आपै शत्ुको अवश्य गिरा दगा कारण कि आप भेरे भित ह ॥ १९ ॥ वर सियोके कटाक्षे क्षणमाजमे
नष्ट कर दगा चाहे देवि वा दानव क्यो न हो ओर मप्योकी तो इमे गणनाही नहीं है ॥२०॥ वज ओर दूसरे अच्च शख वूरही रहै खज
मित्रके वियमान होते वै मेरा कया कर सकते हँ ॥ २१ ॥ भ॑ बहा ओर हरिको भी तपसे चायमान फर सकता ह ओरोकी गणना तो कया
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है, शंकरको भी समाधिे चायमान कर सकता हूं ॥ २२ ॥ मेरे एलो
पह ओर भ्रमरोके य॑जारहूपी ज्या सुन्दरी जलीही बर ओर वर्तका ्सखापन है ॥ २२३ ॥ मै पांच बठका देवता हूं चन्दमा भरा भि
५२४॥ श्रगारसेनापति ओर हावभावसेनाके ठोग ई हे इन्द्र ! हमारे येसब मृदुरूप है भौर मै भी उसी प्रकारका हूं ॥ २५॥ जिससे जो काय पूणं ही उदधि
मानूउप्तको उसी कार्थमे गावे, भेर योग्य जो कार्य होउ आप सन्ने नियुक्त कीजिये ॥ २६॥ ब्रह्माजी बोडे यह वचन सुनकर इन्द्र बडे भरसन्न हए अर
पंचैव मृदवो बाणास्ते च पुष्पमया मम ॥ चापश्चिधा पुष्पमयर्शिजिनी भ्रमरालिता ॥ बलं सुदयिता मे हि वसंत्ः सचिव
स्स्मृतः ॥ २३ ॥ अहं पञ्चबरोदेवा मिं मम सुधानिधिः ॥२४॥ सेनाधिप शृंगारो हावभावाश्च सेनिकाः॥ स्वे मे मृदवः
शक्र अहं चापि तथाविधः ॥२५॥ ययन पूर्यते कार्य्यं धीमांस्तत्तेन योजयेत्॥मम योग्यं तु यत्काय्यं सर्वे तन्मे नियोजय
॥२६॥ ॥ ब्रह्मोदाच ॥ इत्येवं तु वचस्तस्य धुत्वा शक्रस्सहषितः ॥ उवाच प्रणमन्वाचा कामं कांतासुखार्वहम् ॥२७॥ शक्र
उवाच॥ यत्कार्य्यं मनसोदिष्ट मया तात मनोभव ॥ कर्तु तत्वं समर्थोऽसि नान्यस्मात्तस्यसम्भवः॥२८॥ श्रृणु काम प्रवक्ष्यामि
यथार्थं मित्रसत्तम ॥ यदथ च स्पृहा जाता तव चाद्य मनोभव ॥२९॥ तारकाख्यो महादेत्यो ब्रह्मणो वरमद्धतम् ॥ अभूदजेय
स्संप्राप्य स्वेषामपि दुःखदः ॥ ३० ॥ तेन संपीडयते लोको नष्ठा धमां ह्यनेकशः ॥ दुःखिता निजंरास्सवं ऋषयश्च ।
तथाखिलाः ॥ ३१॥ देवैश्च सकलेस्तेन कृतं युद्धं यथाबलम् ॥ सर्वेषां चायुधान्यय विफलान्यभवन्पुरा ॥ ३२ ॥ |
भरसन्नताके वचन कांताओक सुखदायक कामके भरति कहे ॥ २७॥ इन्दरने कहा हे तात कामदेव ! जो कां भने मनम विचारा है तुम वह करनेमे
पमथे हो ओरसे उस्चका सम्भव नहीं है ॥ ॥२८॥ हे काम ! हे यथाथ मित्र । सुन मै कार्यं तञ्षसे कहता हू, हे मनोभव ! जित निमित्त स॒ञ्चको
सहा हृदं है ॥ २९ ॥ तारक नामक महादेतय बहमाजीके ` अद्टृत वरदाने सबसे अजेय होगया है ओर प्षबको दुभ देता है ॥ ३० ॥
बह छोकोंको बडी पीडा देता है, अनेक धमं नष्ट हो गये है, देवता ओर सब ऋषि महादुःखी हो रहे है ॥ ३१ ॥ देवताओंनि उससे अपने
के यह पाच कोमल बाण ओौर पुष्पौकी तीन स्थानो शुकी द
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बलके समान युद्ध किया, परन्तु सबके आयुध उसके सामने निष्फल हो गये ॥ ३२ ॥ वरुणकी पाश (फांसी) उनके कण्ठे पडकर टट गई
ओर कण्ठदेशे मारा नारायणका पुद्न चक्र दृतेही कुण्ठित होगया ॥ ३३ ॥ इक दुरात्माका भरण प्रजापरतिने महायोगीश्वर शिवजीके
वीरयते उत्यन् एवते निर्धारित किया है ॥ ३४ ॥ यह कायं तुमको यल्नपूवक करना चाहिये, हे भितवयं ! तव॒ देवतार्ओको प्रम एखकी ||
| हो सकती ३ ॥ ३५॥ मैने यह सव ठोकोको आनन्दकारी कमं विचारा है हृदयमे मित्रधरभेका स्मरण करके इस समय कायं कीजिये ठै
॥३६॥ शिवजी महाराज पर्वतराज दिमाटयपर परम तपस्या कर रहे हँ उन प्रमुको कामना नहीं है कारण किं वह स्वतंत्र परमेश्वर है ॥ ३७॥ £
भ्रः पाशो जलेशस्य हरिचक्रं सुदर्शनम् ॥ तत्कुण्ठितिमभूत्तस्य कण्डे क्षिप्तं च विष्णुना ॥३३॥ एतस्य मरणं प्रोक्तं प्रजेशेन ¢
दुरात्मनः ॥ शम्भोर्वीरयोद्ववाद्वालान्महायोगीश्वरस्य दि ॥२९॥ एतत्कार्यं त्वया साधु कर्तव्य सुप्रयत्नतः॥ततस्स्यान्मि् ठ
वर्य्याति देवानां नः परं सुखम् ॥३५॥ ममापि विहितं तस्मात्सर्वरोकसखावहम् ॥ मिचधर्म हदि स्परत्वा कर्व॑म्॑सि सांप्रतम् ¢
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¢ पावती स्वसखीयुता॥ सेवमाना तिष्ठतीति पिताजञता मया अतम्॥३८॥यथा तस्यां रचिस्तस्थ शिवस्य नियतात्मनः॥जायते
नितरां मार तथा काय त्वया धुवम्॥ ३९॥इति कृत्वा कृती स्यास्त्वं सवे दुःखं विनेक्ष्यति॥ रोके स्थायी प्रतापरस्ते भविष्यति
द| न चान्यथा ॥४०॥ ब्रह्मोवाच इतयुततस्स त॒ कामो दि प्रफखषखपंकजः ॥ मम्णोवाचेति देवेशं करिष्यामि न संशयः ॥४१॥
|| ओर मैने यह सुना है उनके समीप प्तसियोहित पाषैती उनको पति करनेके घ्य पिताकी आज्ञासे सेवा करती हृदं उपस्थित रहती है
। ॥ ३८ ॥ हे काम ! जिप्र भरकारते शकरकी रुचि अवश्यही पावतीमे हो जाय वह बात तुमको अवश्य करनी चाहिये ॥ ३९॥ यह करनेहीसे
ट् तुम छताथे हो जाओगे, पुम्हारे सव दुःख नाश हो जारयेगे इसमें सन्देह नहीं सारम तुम्हारा प्रताप चिरस्थायी हो जागा ॥४०॥ बह
२४ बोठे यह कहने पर कामदेवका स॒लकम खि गया ओर भरम पृक इन्द्रे कहा किं मै तुम्हारा यह कार्य अवश्य कंगा ॥ ४१ ॥
॥३६॥ शंथुस्स गिरिराज हि तपः परममास्थितः ॥ स प्रभुरनापि कामेन स्वतंतः परमेश्वरः ॥ २७ ॥ तत्समीपे च देवार्थ
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यह वचन कहनेप्र ॐम् अर्थात एसाही हो यह कहकर वचन स्वीकार किया शिवकी मायात मोहित होकर कामने यह् बाप स्वीकार क ||
6 ॥ ४२ ॥ जहां साक्षात् योगीश्वर परम तेप करते थे वहां भरसन्न होकर ली ओर वसन्तकै सहित कामदेव गया ॥ ४३॥ इति श्रीशिवमहापरा
गेभाषादीकायां रुदसंहितान्तर्ततृतीयपार्वतीसण्डे सपरदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ ब्रह्माजी बोठे वहां यह अभिमानी शिवजीकी मायासे महित
ट होकर मधुके साथमे अपना मोहनेवाढा धर्मं विस्तार करने ठगा ॥ १ ॥ जो वसन्तका धर्म है वह सर्वत्र फक गया, हे खनीश्वर ! उस्न ओषधि
|| यके स्थानमे जहां महेश्वर तप करते थे सर्वत्र वस्न्तकी महिमा दिखाई दी ॥ २ ॥ है खनीश्वर ! उस कामके भभावसे उस् वनकै सव वृक्ष एठ
|| इत्युक्त्वा वचनं तस्मे तथेत्योमिति तद्वचः ॥ अग्रहीत्तरसा कामः शिवमायाविमोहितः ॥ ७२ ॥ य॒ योगीश्वरस्साक्षातत
||| प्यते परम॑तपः ॥ जगाम तञ सभ्ीतस्सदारस्सवसंतकः ॥४२॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शद्रसंहितायां तरतीये पावती
ठ खण्डे शक्र कामसंवादवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तत्र गत्वा स्मरो गवी शिवमायाविमोदितः ॥
| मोहकस्स मधोश्वादौ धर्म विस्तारयन्स्थितः ॥ 9 ॥ वसतस्य च यो म्यः प्रतसारससर्वतः ॥ तपःस्थाने महेशस्योषधि
स्थे घुनीश्वर ॥ २ ॥ वनानि च प्रूणुानि पादपानां महासने ॥ आसन्विशेषतस्त तत्पभावान्पुनीश्वर ॥ ३ ॥ पुष्पाणि
४ सहकाराणामशोकवनिकासु वै ॥ विरेचस्सुस्मरोदीपकराणि सुरभीण्यपि ॥ ॥ कैरवाणि च पुष्पाणि भ्रमराकलितानि च ॥
बधूबुम॑दनवेशकराणि च विशेषतः ॥ « ॥ सुकामोदीपनकरं कोकिराकलकूजितम् ॥ आकीदति सुरम्यं हि मनोदरमतिपरि
यम् ॥ & ॥ भ्रमराणां तथा शब्दा विविधा अभवन्धुने ॥ मनोहराश्च स्वेषां कामोदीपकरा अपि ॥ ७॥
गये ओर बहुतरी बातोमर विशेषता होने छगी ॥ ३ ॥ आमं मौर भकाशित होने रगे अशोकवारिका खिर उदी इनकी सुगेष कामकी उदरी
|| पन करनेवारी बहन ठगी ॥ ४ ॥ कैरवके एक भ्रमरोके गजारसे शोभायमान होने रगे इन सवे कामका वेग बढने ठगा ॥ ५ ॥ कोकि
ह|| छाका शब्द काभका बढाने वाखा बहने ठगा यह बडा मनोहर ओर बडा प्यारा ठगने ठ्गा ॥ ६ ॥ हे खने ! इसी प्रकारमे भोका शब्द
#॥ अनेक भकारे होने खगा यह सबको मनोहर ओौर कामदेवका बढाने वाखा हुआ ॥ ७ ॥ |
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चारों ओर चन्द्रमाकी निर्मल्कांति छिटकने र्गी, यह कामिन्यो ओर कामीजनोको दूतिकाके समान हदं ॥ < ॥ उस समग्र काठदीपिका |
प्रानी ओर मानिनियोंको विहारके उत्तम॒समयकी बतठनेवाटी ओर प्रेरण करनेवाली हदं तथा विरही जनोंको अश्रिय सुन्दर पवन वहने
ठ्गी॥९॥ इस प्रकारसे उस वनम ख॒निजनोको दुःसह कामके बढानेवाठे वस्न्तका विस्तार बनवारी ओर खनिजनोंको दुःसह हो
उढा ॥ १० ॥ हे मने ! उस्न समय अचेतनोंको भी कामकी आसक्ति होगदं भर सचेतन जीवोकी कथा तो क्या कही जाय ॥ ११ ॥
इस भकार वन्ते अपना दुःसह प्रभाव फेटाया, इससे सव जीरवोमे कामोदीपन होगया ॥ १२॥ हे तात ! इस प्रकारसे शंकर अकाटमे
चद्रस्य् विशदा कांतिर्विकीणां हि समंततः ॥ कामिनां कामिनीनां च दूतिका इव॒ साभवत् ॥ ८ ॥ मानिनां प्रेरणायासी
तत्काले काठदीपिका ॥ मार्तश्च सुखः साधो ववौ विरदिणोऽप्रियः ॥ ९ ॥ एवं वसंतविस्तारो मदनावेशकारकः ॥ वनौ
कां तद् तञ शुनीनां दुस्सहोऽत्यभूत् ॥ १० ॥ अचेतसामपि तदा कामासक्तिरभरन्यने ॥ सचेतसां हि जीवानां सेति किं
वर्ण्यते कृथा ॥ ११ ॥ एवं चकार स मधुस्स्वप्रभावं सुदुस्सदम् ॥ सवषां चैव जीवानां कामोदीपनकारकः ॥ १२ ॥ अका
लनिर्मितं तात मधोर्वीक्ष्य हरस्तदा ॥ आश्चर्ययं परमे मेने स्वलीलात्ततवुः प्रथुः ॥ १३ ॥ अथ लीलाकरस्तत्र तपः प्रम
दुष्करम् ॥ तताप स वशीशो हि दरो दुःखहरः प्रभुः ॥ १४ ॥ वसंते प्रसते तरकासो रतिसमन्वितः ॥ चतं बाणं समा
कष्य स्थितस्तद्रामपाश्व॑तः ॥ १८ ॥ स्वप्रभावं वितस्तार मोदयन्सकलाञ्चनान् ॥ रत्यायुक्तं तदा कामं दष्टा कोवान
मोदितः ॥ १६ ॥ एवं परवृत्तसुरतौ शंगारोऽपि गणेस्सह ॥ हावभावयुतस्तत् प्रविवेश तिक् ॥ १७ ॥
बसन्तका भ्रमाव देखकर परम आश्चयं करने गे कारण कि परमुने ढीठाके निभि शरीर धारण किया है ॥ १३ ॥ तब दुःख हरनेवाठे
भभु ठीटापूक परम वशी दुष्कर् तपस्या करने ठगे ॥ १४ ॥ जव इस प्रकार व्षन्तका भभाव बह गया तब कामदेव रतिके सहित
आम्रमजरीका चाण चदयाकर उनके वामपाश्व॑म स्थित हज ॥ १५ ॥ सव॒ जनको मोहित करता हभ अपना भभाव विस्तार करे र्गा
उतत रतिसहित कामदेषको देखकर कौन मोहित न हुआ ॥ १६ ॥ जव इप्॒भरकारते रति भवृत्त हृदे तत्र॒ शगार भी गणोके साथ
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हावभाषके साथ शिवजीके समीप भविषट हुआ ॥ १७ ॥ वहां कामदेव प्रगट हुआ बह यथपि मनोज है तथापि चित्के बाहर ही स्थित
रहा वहां उत्तने शकर कोई छिद्र नहीं पाया जिसके द्वारा हदयमे प्रवेश करे ५ १८ ॥ जव कामदेवने उक्त योगिराजक हदयम् विकार
उत्पन्न करनेका अवकाश नहीं पाया तव स्मर महादेवजीसे महान् देव होकर भी भयभीत हो मोहित होगया ॥ १९ ॥ जिंक मस्तकका
नेन महाभज्दित अभ्रक समान प्रकाशित होरहाथा, ध्यानम स्थित शंकरको अपने अधीन करनेको किकी साम्यं है ॥ २० ॥ इसी
समय पार्वती मी अपनी सखियोके साथ बहुतसे एप्प स्यि शंकरकी पूजा करने आई ॥ २१ ॥ पृथिवीम जितनी सुन्दरताईं का वणन
मदनः प्रकटस्तत न्यवसचित्तगो बहिः ॥ न दष्टवास्तदा शंभोशिछद्ं येन प्रविश्यते ॥१८॥ यदा चाप्राप्त विवरस्तस्मिन्योगि
वरेस्मरः ॥ महादेवस्तदा सोऽभरन्महाभयविमोरहितः ॥ १९ ॥ ज्वलज्ज्वाखा्िसंकाशभालनेचसमन्वितम् ॥ ध्यानस्थं शंकरं
को वा समासादयितुं क्षमः ॥ २० ॥ एतस्मिघरेतरे त्र सखीभ्यां संयुता शिवा ॥ जगाम शिवपूजार्थं नीत्वा पुष्पाण्यनेकशः
॥ २१ ॥ प्रथिन्यां यादशं ोकैस्सौँदथं वर्ण्येते महत् ॥ तत्सर्वमधिकं तस्यां पार्वत्यामस्ति निशितम् ॥ २२ ॥ आं
वाणि सुपुष्पाणि धृतानि च तया यदा ॥ तत्सौँदर्यं कथं वरण्यमपि वर्षशतैरपि ॥ २३ ॥ यदा शिवस्मीपे तु गता सा पर्व॑ता
त्मजा ॥ तदेव शंके ध्यानं त्यक्ता क्षणमवस्थितः ॥ २४ ॥ तच्छं प्राप्य मदनः प्रथमं दषणेन तु ॥ बाणेन दृरषयामास
पाश्वस्थ चन्द्रशेखरम् ॥२५॥ शृगारैश्च तदा भवेस्सदहिता पार्वती हरम् ॥ जगाम कामसादाय्ये सुने सुरभिणा सद ॥२६॥
होता है उससे भी अधिक जहांतक सुन्दरताईंकी सम्भावना पादं जाती ३ै बह सब उन पाव॑ती जीम थी ॥ २२ ॥ जिससमय वह ऋतुसम्बन्धी
पुष्प धारण करके चटी वह सुन्दरता तो सेकडों वषम भी उत्तम वणन करनेवालोकरकैभी वणन नहीं हो स्षकती ॥ २३ ॥ जिसही समय
पावती शिवजीक समीप गई उसी समय शिवजी ध्यान छोडकर समाधिम क्षण भरकर स्यि जागेथे ॥ २४ ॥ व्च कामदेव यही छिद्र पाया
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बृडा प्रसन्न होकर पाश्वं स्थित हो शिवजीको अपने बाणसे पसनन करने ठगा ॥ २५ ॥ हे सने ! उस्न समय श्रंगार ओर भावोके सहित पर्वती ||
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| कामदेवकी सहायताके चिवेही घुन्द्र सुगन्ध वायुके साथ शिवजीके समीप आई ॥ २६ ॥ उसी समय शूधरकी पावेतीजीके निरीक्षणादि ]| £
ठ्यापारोमं रुचि बढानेके छ्यि धलुष चाकर बडी सावधानीसे कामदेवने शंकरके ऊपर पुष्पबाणका प्रहार किया ॥ २७ ॥ जिस् भकारे नित्य
भरति पार्वती शिवजीके समीप आकर भ्रणाम पूजन सामने स्तुति करती उती प्रकारसे प्रणाम ओर पूजादिकं करके स्तुति करनेके अथं शकरजीकै
सन्स स्थित हृद ॥ २८ ॥ जिस समय भ्रमु शंकरजीने पाव॑तीको देखा शिवजीको उसी दिन विशेष देखते जबही जाना किं वहु छना
ब्ीस्वमावसे अपने अगोंको संकुचित करने लगीं ॥ २९ ॥ प्रमु शिवजी उसको वह वर जो विधाताने दिया था स्मरणकर पाव॑तीकै अरगोकी
तदैवाङृष्य तच्ापं रुच्यथ शुरधारिणः ॥ इतं पृष्पशरं तस्मे स्मरोऽचत्षुसंयतः॥२७॥ यथा निरंतरं नित्यमागच्छति तथा
शिवम् ॥ तत्नमस्कृत्य तत्पूजां कृत्वा तत्पुरतः स्थिता ॥२८॥ सा दृष्टा पार्वती तञ प्रभुणा गिरिशेन हि ॥ विध्रण्वती तदागानिं
ल्रीस्वभावात्खुलनया ॥ २९ ॥ सुसंस्मृत्य वरं तस्या विधिदत्तं पुरा प्रभुः ॥ शिवोपि वर्णयामास तदगानि खदा घने ॥३०॥
शिव उवाच् ॥ कि सुखं कि शशांकञ्च किं नेषेचोत्पटे च किम् ॥ भुकुरयौ धनुषी चैते कंदषैस्य महात्मनः॥२१॥ अधरःकिं च
बिव कि किं नासा यका ॥ र स्वरः कोकिलालापः किं मध्यं चाथ वेदिका॥ ३२ ॥ किं गतिरवरण्यते ह्यस्याः किं हषं |£
वण्यते सहः ॥ पुष्पाणि किं च वर्ण्यते वच्चाणि च तथा पुन॥ ३३॥ लाटि्यं चार यत्सृ्टौ तदेकच विनिर्भितम्॥ सर्वथारमणी ट
यानि सर्वागानि न संशयः ॥३४॥।अहो धन्यतरा चेयं पार्वत्यद्धतङूपिणी ॥ एतत्समा न बेलोक्ये नारी कापि सुद्पिणी॥२३५॥ ठै
बडाई करने कगे॥३०॥ शिवजी बोटे क्या यह खख है वा चन्द्रमा क्या यह नेव वा कमर कया यह दोनों मृकुदी है यह महात्मा कामदेषका ु
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धुष है ॥ ३१ ॥ यह नीचेका अधरहैवा विबाफठ नाक्षिकाहैवा तोतेकी चच कया स्वर है अथवा कोकिंराका आछराप कया मध्यभाग ह
अथवा वेदी ॥३२॥ अनूदी इसकी गतिका वणन किया जाय वा अनूढे रूपका वणन किया जाय वा अनष्ट इसके एष्पके गहने वा वश्चोका वणेन
किया जाय ॥३३॥ सुम जो छाछित्य है वह मानो विधाताने इसमे ही एकत्र निभीण किया है इसमे सन्देह नहीं इसके सर्वग सर्वथा मनोहर ्
ॐ॥ है ॥ ३४ ॥ अहो अद्भुत हपवाढी पावतीको धन्य है इसके समान ठोकमे कोई स्वहप्वाखी ल्ली नहीं ह ॥ ३५ ॥ तै
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शि०्पु | यह छावण्यकी निधान अद्भत अशोको धारण करती है नि्योको मोहनेवाटी ओौर महासुखको बहानेवाी है॥३६॥ बह्लाजी बोटे इस ४
ह शिवजी वारथार पावती अगोका वणन करके विधाताके दिये वरदानके अध्या्तते विरामको प्राह हए ॥ ३७ ॥ ओर ज्योँ ही शकर
ठ हाथ चछानेके स्थानम अपना हाथ व्चान्तर शरीर वञ्के मध्यकी ओर जवतक चावे किं रेते शिवजीको जान प्रथमही ची स्वभावे ४
ठ जित हो पार्वती दूर स्थित होगई ॥ ३८ ॥ ओौर बारंबार शरीर शिवजीकी ओर कटाक्ष करके देखती हद अपने अगोंको प्रकाशित करतीं ९
सस्तकराने ठगी, हे उने ! उनके एेसे चरित्रके महा आनन्दे पार्वतीको कुछ खस्कान होगई ॥ ३९ ॥ इस भ्रकार पावेतीकी चेष्टा देखकर शकरजीको ६
¢ सलावण्यानिधिश्चेयमदधतांगानि बिभ्रती ॥ विमोहिनी नीनां च महाुखविवरद्धिनी ॥३६॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवं वर्णयित्वा
तु तदंगानि भैः ॥ विधिदत्तवराध्यासाद्रस्तु विरराम इ ॥३७॥ दस्तं वां ते यावदचाख्यत शंकरः ॥ स्रीस्वभावाच्च सा
| तत्र लनजिता दूरतो गता ॥३८॥ विव्रृण्वती निजांगानि पश्यती च शुदुखहः॥ सवीक्षणेम॑हामोदात्स॒स्मिताभूच्छिवा सुने ॥३९॥
ॐ
-॥२२५॥
एवं चेष्टां तदा दृष्टा शंभुरमोदषुपागतः॥उवाच वचनं चेवं महाखीरो महैश्वरः॥४०॥अस्या दशनमतरेण महानदो भवत्यलम् ॥
यदा ठ्गनमेतस्याः ऊर्य्या किन्तु ततस्सुखम् ॥ ९१ ॥ क्षणमात्रं विचाय्येत्थं संपूज्य गिरिजां ततः ॥ प्रबुद्धस्स महायोगी
सुमिरक्तो जगाविति ॥४२॥ किं जातं चरितं चिरं किमहं मोहमागतः ॥ कामेन विकृतश्चा् भूत्वापि प्रभुरीश्वरः ॥ ४३ ॥
इश्वरं यदीच्छेयं परांगस्पशीनं खट ॥ तहिं कोऽन्योऽक्षमः श्ुदरः किं किं नैव करिष्यति ॥ ७४ ॥
मोह होगया ओर महाठीठा करनेवारे महेश्वर कहने ठगे ॥ ४० ॥ जब कि इत पार्व॑तीके द्रीनमाजरते महाआनन्द होता है, फिर जव |
इसका आगन करं तो उप्त सुखकी सीमा कव ह सकती है ॥ ४१ ॥ क्षणमात्रमेही एसा विचार करते ओर गिरिजाकी बडाई करते
ज्यों ही वह योगी चैतन्य हृए कि त्योंही विरक्त होकर यों बोठे ॥ ४२॥ यह क्या विचित्र चाश् हुआ सक्षे किमप्रकारसे मौह हुआ प्रमु
इश्वर होकर भी कामन स्॒ञे किस्त भकारते किकूत किया ॥ ४२ ॥ जव मँ समर्थं होकर दृसरके अगस्पशकी इच्छा कर तो अन्य अतम
क्षुद्र परुष क्या क्या न करेगे ॥ ४४ ॥ ।
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पा.खं.३ ठ
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| प्रकार वैराग्यको पराप्त होकर उस पाती पर्थक आसादनको शंकरने निवारण किया, कया सवीत्मा परेश कीं पतित् हो सकते ह ॥४.५॥ ४
इति श्रीशिवमहाएराणभाषायां रु्रसहितान्तर्भततृतीयपार्वतीखण्डे कामकतविकारवर्णनं नामाष्टादशोऽ्यायः ॥ १८ ॥ नारदजी बोठे ! हे ब्रह्मन् । £
हे महाभाग । इसके पीछे फिर क्या हआ आप छपा करके इस पापनाशिनी कथाका वणन कीजिये ॥ १ ॥ कऋह्लाजी बोडे हे तात ! इसके
पीठे जो हुआ सो नो त्हार लेहे भं शिवटीटाका वणेन करता हू ॥ २ ॥ महायोगी महेशवरने अपनी धीरतामे विच देखकर बडे विरमित
होकर विचार किया ओर इस बातमे बडा आश्वयै माना ॥ ३ ॥ शिवजी बोटे उत्तम तपस्या करते हुए यह क्या विघ्र उत्पन्न हुए है किंस ट
एवं वैराग्यमासायपूरय्यकासादनंच् तत्॥वारयामास सर्वात्मा परेशः किं पतेदिह ॥४५॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ट
शुद्रसंहितान्तगीतततीये पवैतीखण्डे कामकृतविकारवर्णनं नामा्टादशोऽध्यायः॥१८॥ ॥ नारद उवाच॥ ब्रह्मन् विधे महाभाग कं |£
जातं तदनेतरम्॥कथय त्वं भूसादेन तां कथां पापनाशिनीम् ॥१॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ श्चेय॒तां सा कथा तात यनातं तदनंतरम् ॥ ॥|&
तव स्नेदात्परवक्ष्यामि शिवलीलां खुदा वहाम्॥ २ ॥ धेयंस्य भ्यसनं दृष्टा महायोगी महेश्वरः ॥ विचितितं मनस्येवं विस्मितोऽ |©
तितत: परम् ॥३॥ ॥ शिवउवाच् ॥ किमु विघ्नाः समुत्पन्नाः कुर्व॑तस्तप उत्तमम् ॥ केन मे विशत चित्तं कृतमङ्कमिणा॥९॥ ¢
कुवणेनं मया प्रीत्या परख्युपरि वै कृतम् ॥ जातो धर्मविरोधोऽत्र अतिसीमा विरंधिता ॥५॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ विचित्येत्थं महा ठ
योगी परमेशस्स॒तां गतिः ॥ दिशो विलोकयामास परितश्शंकितस्तदा॥द॥ वामभागे स्थितं कामे ददुर्शाङ्ष्टबाणकृस् ॥ स्वशरं
कषप्तुकामं दि गर्वितं मूटचेतसम्॥७॥तं दृष्ठा तादृशं काम गिरीशस्य परात्मनः ॥ संजातः कोधसंसदस्ततक्षणादपि नारद् ॥८॥ ॥4
कुकमीने मेरे चित्तम यह विकार भ्रगट किया ॥ ४ ॥ मेने प्रमसे अन्य च्लीका वणेन किया यह वडा धर्मस विरोध हुआ, ओर शाश्चकी मर्यादा ४
उद्वन की ॥ ५ ॥ ब्रह्ाजी बो परमेश सर्तागति महायोगी इस भकार विचार करफे शंकित हो सब दिशाओंका अवरोकन कसते लगे ||&
॥ & ॥ तब देखा किं वाम ओर धडष चढपे हृए कामदेव विमान है ओर बाण छोडनेकी इच्छासे वह सूढ महा गर्वित हो रहा है ॥ ७ ॥ |©
इस प्रकारसे कामदेवको देख परमात्मा गिरीशको उस समय बहाक्रोध उतन्न हो गथा ॥ < ॥ #
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सने ! उसी समय कामदेवे भयते षन्वावाण छोडकर अन्तरिक्षम स्थिति करी थी कि भनि दुर्निवार अमोघ अञ्च शंकरजीके उप्र चलाया
॥ १० ॥ शिवकै ऊपर अश्वक
ह प ष
है ॥ ९ ॥ वह अमोष अञ्च उन परमात्मा मोघ निष्फठही शान्त हो गया अनन्तर परमेश्वरके क्रोध करनेमे
मोष होनें कामदेवको भय भाप हु, ओर मृत्युन परमुको देखकर बह कम्पित होगया ॥ ११ ॥ तव भये व्याकृ हयो कामदेव न त
देवताओंका स्मरण किया, हे खनिभष्ठ ! जब ॒कामदेवका भयास निरर्थक हुआ ॥ १२॥ हे मुनीश्वर ! जव ॒कामदेवने उन इन्द्रा
देवताओंका स्मरण किया तब वे सब देवता आकर ओर प्रणाम कर शिवजीकी स्तुति करने ठगे ॥१३॥ जिस समय यह देवता शिवजीकी
कामः स्थितोऽन्तरिक्षे स धृत्वा तत्सशरं धवः ॥ चिक्षेपाघ्चं दुनिवारममोध शंकरे घुने ॥ « ॥ बधूवामोघमञ्चं त॒ मोघं तत्पर #
मात्मनि ॥ समशाम्यत्ततस्तस्मिन्संकुदे परमेश्वरे ॥ १० ॥ मोधीभरूते शिवे स्वेश्चे भयमापाश्च मन्मथः ॥ चरके च पुरः
स्थित्वा दृ मृ्युनयं प्रथुम् ॥ ११ ॥ सस्मार ध्िदशान्सर्वान्शक्रादीन्भयविहृलः ॥ स स्मरो सनिशाद्ंल स्वप्रयासे निरर्थके ट
॥ 9२ ॥ कामेन स॒स्यता देवाश्शकांदयास्ते खुनीश्वर ॥ आययुः सकलास्ते हि शंघुं नत्वा च तुष्टवुः ॥ १३ ॥ स्तृति ठ
&|| अर्वत्सु देवेष ङदस्याति रस्य हि ॥ ठतीयात्तस्य नेजाद्वै निस्ससार ततो महान् ॥ १४ ॥ कलार मध्यगात्तस्मात्सवह्व्ै || .
|| तसम्भवः ॥ जज्वालोदध्वशिखो दीपः पलयाभरिसमप्रभः ॥ १९. ॥ उत्पत्य गगने तृणं निष्पत्य धरणी तठे ॥ भम्॑ामं |©
|| स्वपरितः पपात मेदनीं प्रि ॥ 98 ॥ भरमसातकृतवान्साधो मदनं ताबदेव् हि ॥ यावज्म्तां वाच क्षम्यतां क्षम्यतामिति
¢ ॥ १७ ॥ इते तस्मिन्स्मरे वीरे देव दुःखश्ुपागताः ॥ श्रदुर्विहलाश्वातिकोशंतः किमभूदिति ॥ १८॥ ५
५ स्तुति कर रहे थे उस समय कुद हुए शिवजीके तीसरे नेते महान् ॥ १४॥ ठटाटकै मध्यमे अध्चिका पुज प्रगट हो गया, ओर वह भर्याभिके $
||| समान ऊष्वं शिसासे रदी हो जल उदा ॥ १५॥ तत्का आकाशकी ओर धावमान होकर ओर किर भूमिकी ओर धावमान होकर ¢
अ०१९ ||| अपने चारों ओर धावमान होती हुई अधिको देख कामदेव पधवी प्र गिर पडा ॥ १६॥ जव तक देवता यह कर रहे धे कि |
‰॥ क्षमा करो क्षमा करो तब तक उस अभरने कामदेवको मरम कर दिया ॥ १७ ॥ उस्न वीर कामदेवे न्ट होनेमे देवताओंको बडा दुःख हआ॥>
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ह ओर व्याकुल ह्यो रोने ठे कि यह क्या हज ॥१८॥ उसी समय भवसे श्वेतांग ( पौप्तनेवारी ) विङूतात्मा हृदं गिरिराजकी एत्री भी |
ठ ससियोंको साथ ट्य अपने मंदिरमं गदं ॥१५॥ क्षणम तरफ निमित तो रति उत्त समय संज्ञाहीन हो गई ओौर स्वामीकी मृत्य दुःखसे पतित ४
£ हो गृतकके समान हो गईं ॥२०॥ रज्ञाको प्राप्त हो रति दुःखे व्थाक्रुक हो विाप करती अनेक प्रकारके दचन बोठने ठगी ॥२१॥ रति ¢
ट बोटी क्या करू कहां जाऊ यह देवतोने क्या किया मेरे स्वामीको यहां मेजकर नाश कर दिया ॥२२॥ हाहा नाथ ! हे स्मर ! हे स्वामी ! ॥&
ह| हा मेर प्यारे भराणनाथ ! सुखक देनेवाटे हे प्रिय ! हाय यह कया हुम! ॥२३॥ बह्माजी नोे इस भ्रकारसे वाप करती अनेकं भकार के वचन ||
ह|| वेतांगा विङृतात्मा च गिरिराजसुता तदा ॥ जगाम मंदिर स्व च समादाय सखीजनम् ॥१९॥ क्षणमायरं रतिस्तत्र विसंज्ञा ॥£
ह| साभवत्तदा॥ म्ैभृत्यजदःखेन पतिता सा सृता इव ॥२०॥ जातायां चैव् सज्ञायां रतिरत्य॑तविह्वका॥ विललाप तदा तथोचरंती ट
|| विविधं वचः ॥२१॥ ॥ रतिर्वाच ॥ किं करोमि क़ गच्छामि किं कृतं दैवतैरिह ॥ मत्स्वामिन समाहूय नाशयामासुरूढतम् ||
| ॥ २९॥ हा हा नाय स्मर स्वामिन्पराणप्रिय संखभरद् ॥ इदं तु किमभूद्र हा हा प्रिय प्रियेति च ॥ २३ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ¢
ह|| इत्थं विक्पती सा तु बरद॑ती बहुधा वचः ॥ दृस्तौ पादौ तदास्फार्य केशानयोय्यत्तदा ॥२४॥ तद्विकापं तदा अत्वा तत से
¢ वनेचराः ॥ अभवन्दुःखितास्सवं स्थावरा 10 नारद् ॥२५॥ एतस्मि्नतरे तञ देवाश्शक्रादयोऽखिलाः॥ रतिमृस्समाश्वास्य ¢
संस्मरतो महेश्वरम् ॥२६॥ ॥ देवा उचुः ॥ किंचिद्धस्म गृहीत्वा तु रक्ष यलनाद्भयं त्यज॥जीवयिष्यति स स्वामी लप्स्यसे त्वं
४ पुनः प्रियम् ॥ २७ ॥ सुखदाता न कोप्यसिति दुःखदाता न कश्चन ॥ सर्वोऽपि स्वकृतं क्ते देवाञ्शोचसि वै ब्रथा ॥ २८ ॥ |£
बोठने ठगी, हाथ पैर. परकने ओर केशोंको नोंचने ठगी ॥२४॥ उस विंलापको नकर सरव वनकै चर अचर दुःखी ह्यो गये ॥ २५॥ हे
नारद ¡ उप्त समय इन्द्रादि सथ देवता महेश्वरका स्मरण करते रतिके समीप आकर पूछने ङे ॥ २६ ॥ देवता बके हे रति! कामक थोडी ||
ह| भस्म ठेकर त यतने उसकी रक्षाकर तेरा स्वामी फिर जीतरित होगा, ओर तू उसको फिर भाप होगी ॥ २७ ॥ सुख इुःखका देनेवाङा @
किंसीको कोद नहीं है सव अपना कमं भोगते ह तु ब्रथाही देवताओंको पतिक नशे हेतु विचारती है ॥ २८ ॥
१०३
च
नहाजी बोले इस भकार रतिसे कहकर सब देवता शिवजी पास गये ओर मक्तिते शिवजीको परसन् कर यह् वच
& || ह भभो शंकर ! है शरणागत वत्सक ! हे महेशान ! आप हमारे ऊपर छपा करके हमारे वचन सुनिये ॥३०॥ हे शकर !
&|| भ्यको आप् विचारं कामदेवने यह जो कुछ किया है हे महेश्वर ! अपने सवार्थके ख्य नहीं किया है ॥ ३१॥ हे पभो ! जब कि दुष्ट तारकाय |£
शव देवत।ओंको पीडित कर रकस है तव हमनेही यह कमं कामदेवे कराया है'हे शकर ! इत अन्यथा नहीं है ॥२२॥ हे देव ! यह इक एवि ट
॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याश्वास्य रति देवस्स शिवघुपागताः॥ सुप्रसाद शिवं भक्तया वचनं चेदमखवन् ॥२९॥ ॥ देवा उचुः ॥
ह
ई
बोडे ॥२९॥ देवता बोठ
्ीतिसे कामदेवके ह
शि ७यु
॥२२५७॥
भगवञ्रयतामेतद्वचनं नश्युभ प्भो। कृपां कृत्वा महेशान शरणागतवत्सल ।३०॥ सुविचारय् सुप्रीत्या कृति कामस्य शंकर॥
कामेनैतत्कृतं यज न स्वाथ तन्मदेश्वर ॥२३॥ दुन पीडितैदैवैस्तारकेणाऽसिलैर्विभो ॥ कम तत्कारितं नाथ नान्यथा विद्धि
# शंकर ॥३२॥ रतिरेकाकिनी देव विलापं दुःखितासती ॥ करोति गिरिश त्वं च तामाश्वास्य सर्वदा ॥३३॥ संहारं कत॑कामोऽ
¢ सि कोधेनानेन शंकर ॥ दैवतेस्सह सवेषां हतवांस्तं यदि स्मरम्॥३४॥ दुःखं तस्या रतेष्ठा नषप्रायाश्च देवताः॥ तस्मात्वया च
ट्
कर्तव्यं रत्याशोकापनोदनम् ॥३५॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तेषां प्रसन्नो भगवाञ्छिवः ॥ देवानां सकलानां च वचनं ए
ए चेदमब्रवीत् ॥ ३६ ॥ ॥ शिव उवाच ॥ ॥ देवाश्च ऋषयस्सवें मद्रचश्शृणतादराव ॥ मत्कोपेन च यातं तत्तथा नान्यथा ह
भवेत् ॥ ३७ ॥ अनंगस्तावदेव स्यात्कामो रतिपतिः प्रथः ॥ यावच्चावतरेक्कृष्णो धरण्यां ङ्किमिणीप्तिः ॥ ३८ ॥ ९
₹०स.२||&|| विंलापकरके महादुःखी रोरही हैहे गिरीश ! आप इसको तो आश्वासनं दे ॥ ३३॥ हे शकर! यदि कोधे कामको नष्ट कएनेकी इच्छाकी तो सबदेवताओंं ठ
पा.दं.३||९६|| कोह मानों आपने मार दिया ॥३४॥ रतिका दुःख देखकर सव देवता पृगप्राय हो रहे है इसते आपको रतिका शोक दूर करना चाहिये ॥३५॥ |©
नञल | | बोरे यह उनके वचन सुनकर भगवानु शंकर सब देवताओं भसन होकर इस भकारके वचन बोठे ॥ ३६ ॥ शिवजी बोठे देवता भौर ऋषि ||
‰॥ पब कोई आदरसे मेरे वचन सुने मेरे कोधसे जो कुछ हो गया है बह अन्यथा नहीं हो सकता ॥ ३७॥ रतिपति काम अनंगरूपतते रहेगा, जबतक |
४
रङ्िमणीपति कष्णका संसारम अवतार होगा ॥ ३८ ॥ जव द्वारका स्थित होकर ङष्णं पत्रोको उत्पन्न करेगे तब वह रकिमणीमे कामको
भी उत्पन्न करेगे ॥ ३९ ॥ इसमे सन्देह नहीं उकषका नाम प्रुघ्र होगा, उसके उत्पन्न होतेही शबर उस्षको हरकर ठेजायगा ॥ ४० ॥ वह
दानवोत्तम शबर उसको हरण कर समुद्रम डाक देगा ओर उस्तको मृतकं जानकर वह मूढ अपने घरमे चला जागा ॥ ४१ ॥ तबतक रतिको ¢
&
उसके नगरमे सुखपूवक रहना चाहिये वहीं इसको इसके पति प्रयुस्रकी प्राभि अकश्य होगी ॥ ४२ ॥ हे देवताओ ! वह काम उसे
¢ मिठ्कर संग्राममे शबरको मारकर अपनी कामिनीको प्राकर सुखी होगा ॥ ४३ ॥ हे देवताओ ! उत्का सब द्य ठेकर रतिक साथ
द्वारकायां यदा स्थत्वा पु्रानुत्पाद्यिष्यति।तदा कृष्णस्तु रुकरिमण्यां कामसुत्पादयिष्यति ॥३९॥ प्रदुभ्ननाम तस्यैव भविं
ट| ष्यति न संशयः ॥ जातमा्र त॒ तं पुतं शंबरस्संहरिष्यति ॥४०॥ इत्वा प्रास्य समुद्रे त शंबरो दानवोत्तमः ॥ मृतं ज्ञात्वा
# वृथा सृढो नगरं स्वे गमिष्यति ।॥४१॥ तावच नगरं तस्य रते स्थेयं यथाघुखम् ॥ तत्रैव स्वपतेः प्राप्तिः म्र्यभ्नस्य भविष्यति
॥ ४२.॥ तच् कामो मिलित्वा तंदत्वा शम्बरमाछखे ॥ भविष्यति सुखी देवाः प्रम्नाख्यस्स्वकामिनीम्॥ ३ ॥ तदीयं चेव
ट
ठ
यद्रव्यं नीत्वा स (4 पुनः ॥ गमिष्यति तया सा देवास्सत्यं वचो मम ॥४७॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति धत्वा वचश्शंभोदैवा उचुः 6
। परणम्य तम् ॥ किंचिदुच्छसिताशचितते करौ बद्धा नतांगकाः ॥७५॥ देवा उचुः ॥ देवदेव महादेव कर्णासागर प्रभो ॥ शीतर ं
४ जीवय कामं त्वं रकषप्राणान् रतेदर ॥९६॥ ब्रह्मोवाच इत्याकरण्यामरवचः प्रसन्नः प्रमेश्वरः॥ पुनर्बभाषे करूणासागरस्सकेन्वरः ॥#
॥ 8७॥ शिव उवाच ॥ हे देवस्सुभरसघ्नोऽरिम जीवयिष्यामि चांतरे ॥ कामः समद्रणो भूत्वा विहरिष्यति नित्यशः ॥ ४८॥ ||
४ वह द्वारका एरीम जायगा, यह् मेरा वचन सत्य है ॥ ४४ ॥ बह्लाजी बोके शिवजीके यह पचन छन देवता शंकरको प्रणाभकर कुठेक
दुःखे निश्वास ठेकर हाथ जोढकर स्थित हूए ॥ ४५ ॥ देवता बे ! देवदेवं ! है महादेवं ! हे करुणासागर हे ! भभो ! आप कामको
4 शीघ्र जीवदान देकेर रतिके प्राणोकी रक्षा कीजिये ॥ ४६ ॥ बह्माजी बोरे इस भकार देवताभोक् वचन सुनकर परमेश्वर भ्रस॒न्न हुए, ओर
करुणाप्तागर सकटेश्वरने फिर कहा ॥ ४७ ॥ शिवजी बोछे हे देवताभ ! मै पतन्नहू, इस अवधिके मध्यमे भी काम कोम जीवित {
करगा वह काम मेरा गण होकर नित्य विहार करेगा ॥ ४८ ॥ हे देवताओं ] तुम ^ ॥
जाओ भँ तुम्हारे सव दुःख नाश करंगा ॥ ४९ ॥ बह्ञाजी बोटे यह वचन सुन देवता ज्यों ही स्ति करने ठगे कि शिवजी अन्तर्धान होगये,
ओर सव देवता दुःख चछूटजानेसे विस्मयरहित होगये ॥ ५० ॥ ओर रततिको समज्ञाकर रद्रके वचनम स्थित हूए, ओर रतिकौ शंकरे वचन
षुनाय अपने अपने स्थानोको गये ॥ ५१ ॥ हे मुने ! रतिभी शम्बरे स्थानको ग़ हे मुनीश्वर ! वहां वह शिवजीके तार्थ काठक
भरतीक्षा करने ठगी ॥ ५२ ॥ इति शीशिवमहाराणभाषारीकायां रुदरसंहितान्तमततृतीयपावतीखडे कामनाशवणनं नामेकोनविंशोध्यायः ॥१९॥
नाख्येयमिदमाख्यानं कस्य चित्पुरतस्सशः ॥ गच्छत स्वस्थं दुखं नाशयिष्यामि सर्वतः ॥ ४९ ॥ ब्मोवाच ॥ इत्युक्तांत्दधे
रुदो देवानां स्तुवतां तदा॥ सवे देवास्पुपरस्सत्ना बभरूवु्गेतविस्मयाः ॥५०॥ ततस्तां च समाश्वास्य रुद्रस्य वचने स्थिताः ॥
उक्ता वचस्तदीयं च स्वं स्वं धाम ययुसने ॥५१॥ कामपत्नी समादिष्टं नगरं सा गता तदा ॥ प्रतीक्षमाणा तं कालं रदािषठं
मुनीश्वर ॥ ५२ ॥ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शुद्रसंरितायां ततीये पार्वतीखण्डे कामनाशव्णनं नामेकोनविशोऽ
ध्यायः ॥ 9९॥ नारद् उवाच ॥ ॥ विधे नेजसयुद्धतवह्धिज्वालखा हरस्य सा ॥ गता कु वद् त्वं त्रिभं शशिमौलिनः
॥ १ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ यदा भस्म चकराराद्यु_तृतीयनयनानलः ॥ शम्भोः कामं प्रज्वा सव॑तोविफटस्तदा ॥ २ ॥
हाहाकारे महा नासीत्रेकोकष्ये सचराचरे ॥ स्वेदेव्षयस्तात शरणं मां यथुद्रतम् ॥ ३ ॥ सवं निवेदयामासुस्तहुखं मह्यमा
कुलाः ॥ सुप्रणम्य सुसंस्तू करो बद्ध्वा नताननाः ॥ ४ ॥
नारदजी बोटे हे बह्लाजी ! वह शिवजीके नेत्त निकटी हदं अभिकी ज्वाला कहां गई यह शिवजीका चरित्र हमसे कहिये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी
बोरे जव तीसरे नेत्रको अभिने कामदेवको भस्म करदिया तब वह अचि विना प्रयोजनही सब ओरकौ धावमान इं ॥ २॥ तव चर
अचर त्रिलोकीमे सव ओरसे हाहाकार मच गया हेतात ! उस समय सब देवता ओर कषि मेरी शरणमे आये ॥३॥ ओर ॒व्याकुढ हो सबने
मुक्ते दुःख निवेदन किया, ओर प्रणामकर हाथ जोड खड रहगये, ओर शिर सुकाछिपा ॥ ४ ॥
व दृप्त आख्यानको किरीम मत कहना अपने स्थान को
॥२२८॥
रुपं २ |
पा.खं.३
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| ह भं दुलकर शिवजीक भणामकर उत्का हे विचारक तरिोकीकी र्षा छवि जहां ह अभिथौ उप स्थानपर् गया ॥ ५ ॥ वह कामके
जठानेवाढी अग्नि ज्वाङा माठासे बहत भरचण्ड हो रही थी मेने शिवजीकी कपासे उस महाप्रदीप्र तेजको स्तंभित कर दिया ॥ ६ ॥ जब बह
2.
कोधमयी अभर त्रिढोकीको चानेक इच्छा कटने ठगी हे ने ! हे सौम्य ! तव उत्त वाडव जवाटाखसी अधिको मैने आकर्षण कर ॥ ७
शिवकी इच्छासे सब वाडव शरीरधारी अभ्रिको ठेकर म जगत्क रक्षा करनेवाला छोककै उपकारक ख्ये उसे सागरम ठे गया ॥ < ॥ है ने
तच्छरतवाहं शिवं स्मृत्वा तदेतं सविमरश्य च ॥ गतस्तत्र विनीतात्मा भिोकावनहेते ॥4॥ संदगधुकामः स हुचिर्ज्खालामा
¢ लातिदीपितः ॥ स्तंभितोऽरं मया शंयुभरसादाप्तसतेजसा ॥६॥ अथ कोधमयं वह दगधुकामं जगत्रयम् ॥ वाड्वांतकमार्प च
सोम्यज्वालाषखं सने ॥७॥ तं बाडवतनुमहं समादाय शिवेच्छया ॥ सागरं समगां रोकटिताय जगतां प्रतिः ॥ ८ ॥ आगतं
मां समारोक्य सागरस्सांजलिने ॥ धृत्वा च पौरष रूपमागतस्संनिधि मम ॥ ९ ॥ स॒प्रणम्याथ मां सिधुस्संत्ूय च यथां
निधि ॥ स माखुवाच सुभीत्या सू्वरोकपितामहम्॥१०॥ सागर उवाच ॥ किमर्थमागतोऽसि त्वं ब्रहमत्रासिलाधिष ॥ ततन
देशय सुभीत्या मत्वा मां च स्वसेनकम् ॥ 93 ॥ अथा सागरवचश्यत्वा भीतिपुरस्सरम् ॥ भावोचं शंकरं स्परस्वा रोकं
दितमावहन् ॥ १२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ श्रण॒तात महाधीमन्सर्वछोकडितावई ॥ वच्म्यहं॑प्रीतितस्सिधो शिवच्छाप्ेरितो हदा
॥ १२॥ अय क्रोधो महेशस्य वाडवतत्मा महाप्रभुः ॥ दग्ध्वा कामं इतं सर्व दग्धुकामोऽभवत्ततः ॥ १९ ॥
य॒के आता हआ देखकर समुद्र हाथ जोडकर एरुपकरा रूप धारण कर भरे समीप आया ॥ ९॥ वह सघ सञ्च भणाम कर यथा विभि स्तुतिकर
सव टोककै पितामह मुञ्जे भरमपूक कहने खगा ॥१० ॥ सद्रने कहा हे बहन ! हे सब जगते प्रति ! आप यहां फते आये हो सङ्ग अपना
|| सेवक मानकर मते आप कहियो ॥११॥ तब भे सके यह वचन सुन परेभूर्क शिवजीक स्मरण करता टोकोंका हित चाहता इ
| ट ॥ १२॥ ब्रह्माजी बोटे हे तात ! हे महाद्धिमानू ! सथ छोकोके हितकारी ! आप हनिये हे सागर ! शिवकी इच्छते मरित होकर तै तुमसे
४॥ कहता हूं ॥ १२ ॥ यह वाडवरूप मह्ाअ्रि शिवजीका महाक्रोध है कमदेवकौ भस्पकर अव यह सवके दग्प करनेकी इच्छा करती है ॥१४॥
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शि° ट शकरकी इच्छसे पीडित हुए सव देवताओंकी भार्थनासे मेने शीघ्र वहां जाकर इस अभ्रिको स्तंभित किया ॥ १ ५॥ इस प्रकार वाडवह्प धारण
॥२२०॥ || || करके इततको ठेकर यहां जया दं मँ तुमको इसके जले रहनेका निदेश करता हूं हे सागर ! तुम करुणाकर हो इसको रहण करो ॥१६॥ यह ||
महेश्वरके कोधकी अभि वाढवाहप धारण करके ज्वारा्चसपे स्थित है इसको तुम भरखयपर्थन्त धारण किये रहो ॥१७॥ हे नदि्योकै पति ! जब किमे ¢
यहां आकर निवास करँगा तव ख्यक यह शंकरकी कोधामि त्याग देनी होगी ॥ १८ ॥ यह नित्य तुम्हारे जछ्का भोजन करता रहेगा इक)
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¢| मरायंतोऽई सुरेश्शीब पीडितैश्शंकरेच्छया ॥ तचागत्य दतं तंत तात स्त॑भितवाज्छ्युचिम्॥१५॥ वाडवं हपमाधत्त तमादायाग
|| तोच ह ॥ निदिंशामि जलाधार त्वामहं करुणाकरः ॥ १६॥ अर्यं कोधी महेशस्य वाडवं ङूपमाधितः ॥ ज्वाराश्चुलस्त्वया
| धार्यो यावदाभरतसंषवम् ॥१७॥ यदाताहं समागम्य वत्स्यामि सरितां पते॥ तदा त्वया परित्याज्यः कोधोऽथ शाकरोऽदधतः
|| ॥१८॥ भोजनं तोयमेतस्य तव नित्यं भविष्यति ॥ यत्नादेवावधार्योऽयं यथा नोपैति चांतरम् ॥१९॥ बरह्नोवाच ॥ इत्युक्तो
¢ हि मयासिधुरंगीचके तदा धुवम् ॥ अ्ररीतुं वाडवं वहि रौद्रं चाशक्यमन्यतः ॥ २० ॥ ततः प्रविष्टो जलधौ स वाडवतवुः
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शुचिः ॥ वार्योघान्सुदहस्तस्य ज्वालामाकामिदीपितः ॥ २१॥ ततस्ततुष्टचेतस्कस्स्वं धामाहं गतो सुने ॥ अतर्धानमगात्सि
धुदिंब्यहूपः प्रणम्य माम् ॥ २२ ॥ ४
| यतनसे धारण करना जिससे कुछ अन्तर न पडे ॥१९॥ बह्ञाजी बोठे भरे दसा कहने प्र सखु्रने मेरी बात स्वीकार की कारण कि यह ढक कोपकी ४
महाभयानक अभि रदकैक्षिवाय कोई ग्रहण करनको स्मथे नहीं था॥ २० ॥ तब वह वडवाभि सघ भवेशकर गहं ओौर उसकी ज्वाामाछातते दीप होकर @
जलकै समूहं भस्मीभूत होने ठे ॥ २१ ॥ हे सुने ! तब मै संतुष्ट चित्त होकर अपने स्थानम आया ओर दिव्य सागर भी श॒न्ञे भणामृकर ||# |
हस. २
पा.ख.३
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|| अन्त्षान् होगवा ॥ २२ ॥ जव यह भय पय गया त सव जगत् स्वस्थ हौगया हे सने 1 देवता ओर सुनि सब महा सुखी हुए ॥ २.३ ॥ प
इति श्रीशिवम ° भा० टी° रद्र° तृतीय पाव॑तीखण्डे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ नारदजी बोले हे तात बह्माजी ! हे महापंडित ! विष्णजीकै शिष्य । ॥
त्रिछोकीकै रचनेवाठे यह महात्मा शंककी आपने बडी अदत कथा कही है ॥ १ ॥ जब कामदेव शकर तीसरे ने्रकी अभ्रिसे भस्म क
ओर वह अमन सागरे भवि होगर्ई तव कया हुआ ॥ २॥ हिमाख्यकी उतरी देवी पारदतीने तब कया किया वह स्रसियों सहित कहा गई ||&
हे दयानिधे ! सो आप किये ॥ ९ ३ ॥ बरहमाजी बोरे हे तात ! हे महाभाग्य ! आप॒ शकरके चरित्र सुनिये वह मेरे स्वामी कर्तव्य करते रै ठ
४ स्वास्थ्य प्राप जगत्सवं निक्तं तद्धवाद्भयात् ॥ देवा ब ष खखिनो खनयश्च महाने ॥२२॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ||&'
४ ^ 4 4 0 नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ५ य उवाच ॥ विधे तात महाप्रज्ञ विष्णु |©
ष्य् चिलोककृत् ॥ अद्धतेयं कथा प्रोक्ता शंकरस्य् महात्मनः॥ १ ॥ भस्मीभूते स्मरे शंथुतृतीयनयनाथिना ॥ तस्मिन्प्रवि्ै
¢ जलधौ वद त्वं किमभत्ततः ॥२॥ किं चकार ततो देवी पावती कुधरात्मजः ॥ गता कुत सतया सा तद्वदाद्य दयानिधे || ¢
¢| ॥ ब्रह्मोवाच ॥ श्रृणु तात महाप्रज्ञ चरितं शशिमौलिनः॥ मरोतिकारकस्येव् स्वामिनो मम चादरात्॥४॥ यदादच्छंभुनेधोद्धवो
¢ दि मदनं शचः ॥ महाशब्दोऽद्धतोऽभूदरे येनाकाशः प्रपूरितः ॥५॥ तेन शब्देन महता कां दग्धं समीक्ष्य च॥ सखीभ्यां सह र
भीता सा ययौ स्वगृहमाङ्कला॥ ६ ॥ तेन शब्देन हिमवान्परिवारसमन्वितः॥ विस्मितोऽभ्रदतिञ्धिटस्सतां स्थत्वा गतां ततः |£
॥ ७ ॥ जगाम शोकं शटेशो सुतां दष्टातिविहलाम् ॥ < ॥ श्दंतीं शंभुविरदहादाससादाचरेश्वरः ॥ ९ ॥
& || आदरे उनके चरित्र सुनो ॥४॥ जिस समय शकरकौ नेना कामदव भस्म हागया उत्तस्मय् एक एसा भर्यकर शब्द हु निक्षे आकाश पूर्ण
& होगया ॥५॥ महाशब्दसे कामदेवको दग्ध हा विचारकर पावती व्याकुर हो सखियोके साथ अपने स्थानको
४ दहिमाटय भी अपने परिवारकै सहित बडे विस्मित हो अपनी एुत्रीको स्मरणकर वहं गये ॥७॥ सुताको विहृङ देख
|| इमा ॥ < ॥ कि शिवजीकै विरहे व्याकुल थी उसती समय वहां पर्वतराज आकर पाप हृष ॥ ° ॥
ण
गई ॥६॥ ओौर उस शब्दे
कर शरूराज को बडा कष |
॥
ट
त
०॥ अचेश्वर
| ओर वहां पहचकर पार्वतीके नेनोके आंस अपने हाथो पोठे हे शिवे ! मत रो मत रो देस ककर उत्ते ग्रहण किया ॥ 1 ति
हिमाठ्यने शीघही उक्तको अपनी गोदीमें बैढाया ओर उसे घवराई हुदंको समञ्चाते हुए अपने स्थानम ठेगये॥११॥ कामदेवको भस्म करक शिवज।
॥२३०॥ व
॑ अन्तरान् होगवे तव पावती उनके वरह महाव्याङुछ हृदं ओर किकी भकार कहीं उसको शान्ति न मी ॥१२॥ तब पावती पिताक षर जाक
ठ मातासे भि उत प्र्वतीने मानो अपृनको फिर नवीन जन्म माना ॥१३॥ ओर अपने रूपकी निन्दा करती हं हा म मरी दसा कने ठगी सखि (
- आसाद्य पाणिना तस्या माजँयन्नयनद्रयम् ॥ मा बिभीदि शिवेऽरोदीरित्युकतवा तां तदा्रदीत्॥१०॥कोडकृत्वा सुतां शीरं हिम ¢
६ वानचटेश्वरः ॥ स्वमाल्यमथानिन्येसांत्वयत्नतिविह्वराम्॥११॥ अंतर्हिते स्मरं दग्ध्वा इरेतद्विरदाच्छिवा॥ विकटाभद् भृशं ६
|| सा वै लेमे शमं न ङु्चित्॥१२॥ पिुहंतदा गत्वा मिित्वा मातरंशिवा ॥ पनजातं तदा मेन स्वात्मानं मा धरात्मज ॥ ||
ट| ॥१३॥ निर्निद च स्वप सा हा हतास्मीत्यथात्वीत् ॥ सखीमिर्वोधिता चापि न बुबोध गिरीन्द॒जा॥१४॥ स्वपती च पती ||
६ च सा क्ञाती गच्छती शिवा॥ तिष्ठती च सखीमध्ये न किचित्सुखमाप ह ॥१५॥ पिषस्वह्पं मदीयं च तथा जन्म च कम्मं च ॥ |£
ति वंत सततं स्मरती हरचेष्टितम् ॥१६॥ एवं सा पार्वती शंथुविरहोर्छिष्टमानसा ॥ सुखं न टेभे किंविद्वाऽत्रवीच्छिवशिवेति ||
च ॥ १७ ॥ निवसंती पितरह पिनाकिगतचेतना ॥ शयुशोचाथ शिवा तात समोह च ुहृहुः ॥ १८ ॥ शेकाधिराजोप्यय ||
||| _मेनकापि मेनाकसख्यास्तनयाशच सवे ॥ तां सांछ्रयामाश्वरदीनसत्वा हरं विसस्मार तथापि नो सा ॥ १९ ॥ ट
₹०६.२ || योक समञ्चानेपर भी पावती छ न समञ्ञी ॥ १४ ॥ सोते पीते चान करते जाते हृए तथा सखिजनोकं मध्यमे बेठते हए उसको कहीं कु सुख न ¢
1 मिला ॥१५॥ मेरे स्वप ओर जन्म कमक धिद्कार है इस भकार कहती हुईं निरन्तर हरकी चेष्टा स्मरण करने ठगी ॥ १६ ॥ इ प्रकार पार्वती ठ
| रिवजीके विरह व्याकु होकर कहीं छुखको भातत न हौ शिव शिव कहने छग ॥ १७ ॥ पिताक घर् निवासन करती शंकरमेही मन छ्गाये रही ठ
|| ओर हे तात ! पात्ेती शोच करती बारंबार मोहको प्राप्त होग्ई ॥ १८ ॥ शेकराज उनकी छी मेना ओर मैनाकको आदि ठेकर उनके सव एत्र
वव 49 94 उ
= न्द, ¢
पावतीको बहुत भकारे समञ्चाने गे पर वह वडे पैयैवाटी तव भी शंकरजीको किसी भकार न विसषारती भ ॥ १९ ॥ हे नारदजी ! तव ह
इनद्ने बुद्धिमान् हिमाङयके स्थानपर तुमको नियुक्तं किया ओर विचरते तुम वहां पहुचे ॥ २० ॥ तव तुम्हारी महात्मा भूध्रने पुजा
ओर पश्चात् अठ आस्नपर बैढकर उनसे कुश तुमने पूी ॥ २१ ॥ तब हिमार्यने पर्वतीकी सेवाका चरित्र ओर शिवजीके दवारा कामदहन ¢
वणेन किया ॥ २२ ॥ यह सुनकर सनिराजने कहा कि तुम शेश शिवका भजन करो ओर उनका आमन्त्रण करै मनसे शकरका भजन ¢
कर तुम उढकर चे ॥ २३ ॥ फिर छोकोपकारी शेकरजीके प्यारे परमज्ञानी उन्हं छोडकर तुम गये एकान्तम पार्वतीजीके समीप शीघतासे ए
अथ देवने पीमन्दिमवत्मरस्तरेतदा॥ नियोजित बलभिदागमस्त्वं कामचारतः ॥२०॥ ततस्त्वं पूजितस्तेन भूधरेण महात्मना॥ $
शल पृष्टवांस्तं बे तदाविष्ठो वरासने ॥२१॥ ततःप्रोवाच शरेशः कन्याचरितमादितः ॥ हरसेवान्वितं कामदहनं च दरेण हइ ॥५
॥२२॥ श्ुत्वावोचो सुने त्वं तु तं शेरेशंशिवं भज॥ तमामे्योदतिष्ठस्त्वं संस्मृत्य मनसा शिवम् ॥२३॥ तं सत्सृज्यरदसि ट
कालीं तामगम॑स्त्वरा छोकोपकारको ज्ञानी त्वं घुने शिववछमः॥२४॥ आसादय कालीं सबोध्य तद्धिते स्थित आद्रात्॥अवो ट
चर्त्वं वचस्तथ्यं सवेषां ज्ञानिनां वरः ॥२५॥ नारद् उवाच ॥ शृणु कालि वचो मेदि सत्यं वच्मि दयारतः॥ सर्वथा ते हितकरं |©
निर्विकारं सुकामदम् ॥२६॥ सेवित महादेवस्त्वयेह तपसा विना ॥ गर्ववत्या यद्ध्वंसीदीनान्॒हकारकः ॥२७॥ विरक्त ॥©
स ते स्वामी महायोगी महेश्वरः ॥ विसृष्टवान्स्मरं दधवा त्वां शिवे भक्तवत्सलः ॥ २८ ॥ ठ
कहा ॥ २४ ॥ तन तुम कारके समीप आकर ओर आद्रसे उनके हितक निमित्त सम्बोधन करके षब ्ञानियोँभे भ्ठ तुम रेष्ठ वचन बोे
॥ २५॥ नारद्जी बोठे ह काटी ¡ मेरे कचन सुनो मँ दयामे तत्पर होकर वचन कहता हं जो सर्वथा आपके हितकारी निषिकार कामनाके ४
देनेवाठे है ॥ २६ ॥ तुमने तपस्याके विना महादेवजीकी सेवा की ओर गरवे साथ सेवा की ओर पे दीन अनुग्रह करनेवाठे है उन्होने
ठमहारा गवं नष्ट कर दिया ॥ २७ ॥ महायोगी महेश्वर वहं तुम्हारे स्वामी विरक्त है ह शिवे । भक्तेवत्सरताकै कारण ही तो कामदेवको नष्ट ६
0 ।
करके तुमको छोड दिया ॥ २८ ॥ इस कारण तुम बहुत कार्तक तपस्या करके महादेवजीकी आराधना करो तपसे संस्कारको भरात्त
गहण नहीं करोगी ॥ ३० ॥ बरह्ाजी बो इस भकार पावती नारदजीकै वचन सुनकर केक ऊची श्वास ठेकर हाथ जोड़कर तुम
॥ ३१ ॥ पाद॑ती बोटी हे नारदजी ! आप तो सब जगतकै उपकार करनेवाछे हो रुकी आराधना करनेके निमित्त आप सञ्च मन्त्र दीजि
॥ ३२॥ सदृगारुके विना किंपीकी कोई क्रिया भी मिद्ध नहीं होती यह मैने सुन रक्खा है यह सनातनी श्रुति है ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी
तस्माच्च सुतपोधुक्ता चिरमाराधयेश्वरम॥ तपसा संस्कृतां शुदरस्स द्वितीयां करिष्यति॥२९॥ त्वं चापि शंकरं शम्धुन त्यक्ष्यसि
कदाचन ॥ नान्यं पति हठादेव अ्रदीष्यसि शिवाहते ॥३०॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ इत्याकरण्यवचस्ते हि सुने सा भूधरात्मजा ॥
, किंबिदुच्छवसिता काटी प्राह त्वां सांजखिशचंदा ॥३१॥ शिवोवाच॥ त्वं तु सर्वज्ञ जगतायुपकारकर प्रभो ॥ इद्रस्याराधनार्थाय
म्र देहि ने दि मे ॥२२॥ न सिद्धयति क्रिया कापि स्वेषां सद्भरं विना ॥ मया अता पुरा सत्यं छतिरेषास्नातनी॥३२॥
ब्रह्मोवाच ॥ इति भत्ता वचस्तस्याः पार्वत्या श्चनिसत्तमः॥ पैचाक्षरं शम्धुमन्तं विधिषूरवञुपादिशः ॥३४॥ अवोचश्च वचस्तां
त्व श्रद्धघत्पादयन्धुने ॥ प्रभावं मन्बराजस्य् तस्य सवाधिकं घने ॥३५॥ नारद उवाच ॥ शृणु देवि मनोरस्य प्रभावं परमा
दतम् ॥ यस्य अवणमाभरेण शंकरस्सुप्रसीदति ॥३६॥ मेघो सवमत्राणामधिराज कामदः॥ युक्तिखक्तिप्रदोऽत्येतं शंकरस्य
महापरियः ॥ ३७ ॥
बे हे सुनिराज ५ भकारे तुमने पावेतीके वचन हुनकर विधिपूषक् उस्षको शिवजीके पंचाक्षर मन््रका उपदेश दिया ॥ ३४॥ है सने !
शरद्धाको उतपन्न करते हए तमन् उस मन्त्राजका भाव ससे शरेष्ठ वणेन करते हृए कहा ॥ ३५ ॥ नारदजी बोठे हे देवि | इ मन्तका
प्रम अद्भुत भरभाव सुनो जिसके भ्रवणमात्रसे भगवान् शंकर प्रसन्न हो जाते है ॥ ३६ ॥ यह मन्न सब मन्वा महाराजा है कामना
ओर मुक्ति स॒क्तिका देनेवाला शकरको परम भिय है ॥ ३७ ॥
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तुमको भगवान् स्वीकार करेगे ॥ २९ ॥ तुमभी कभी शंकरको त्याग नहीं करोगी हे देवी ! शंकरक सिवाय तुमभी दुसरे पतिको ध,
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छुमगे ! जव विधिपूषंक दुम इसको जपोगे तो तुम्हारी आराधने वह भ्रमु शीघही भतयक्ष हो जार्थेगे, इसमे सन्देह नहीं ॥ २८ ॥ नियमे ४
ठ स्थित होकर उन्हीका रूप विचारती हृदं पंचाक्षर मंत्रका जप करो ह शिवे ! इस ॒भं्रफै जपनेसे शिवजी तुम्हारे ऊपर शीघ्र प्रसन्न हो जार्यगे ४
र ॥ ३९ ॥ हे साध्वि ! इस् प्रकारके तुम तप करो महेश्वर तपतेही साध्य होस्षकते है सब तपस्याहीसे फर प्राप करते है इसमे अन्यथा नहीं ¢
है ॥ ४० ॥ ब्रह्माजी बोठे हे शिवश्रिय नारदजी ! तुम इस प्रकारसे काटीसे कहकर देवताओंके हितम भीति करते हुए अपनी इच्छे स्व
ह|| सैको चरे गये ॥ ४१ ॥ हे नारदजी ! तब पार्वती उक समय तुम्हारे वचन सुनकर पंचाक्षर भंत्रको भ्राप्त होकर बहुत प्रसन्न हृं ॥ ४२ ४
||| सुभगे येन जपेन विधिना सोऽचिराद् दुतम्॥आराधितस्ते प्रत्यक्षो भविष्यति शिवो धुवम्॥३८॥ चितयंती च तद्रूपं नियमस्था
| क्षराक्षरम् ॥ जप मन्ध शिवे त्वं हि संतुष्यति शिवो इतम् ॥ ३९ ॥ एवं ङुङ् तपसाधिवि तपस्साध्यो महेश्वरः ॥ तपस्येव
&|| फलं सवैः पराप्यते नान्यथा कचित् ॥७०॥॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवा तदा कालीं नारद त्वं शिवप्रियः॥याहच्छिकोऽगमस्त्वं त॒
ह|| स्वभ देवदिते रतः ॥७१॥ पार्वती च तदा त्वा वचनं तव् नारद ॥ सप्रसन्नातदा प्राप प॑चाक्षरमनत्तमम् ॥ ४२ ॥ ॥ इति
श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां दरसंहितायां तृतीये पावैतीखण्डे नारदोप्देशो नामेकर्विशोऽध्यायः॥ २१ ॥ भह्मोवाच ॥ त्वयि
¢ देवसुने याते पार्वती इ्टमानसा॥ तपरस्साध्यं हरं मेने तपोर्थं मन आदधे ॥१॥ ततः सख्यौ समादाय जयां च विजयां तथा॥
मातरं पितरं चेव सखीभ्यां पयंपृच्छत ॥२॥ प्रथमं पितरं गत्वा हिमवन्तं नगेश्वरम्॥ पर्यप्च्छत्सुप्रणम्य विनयेन समन्विता
४ ॥ ३॥ सख्याब्रूचतुः ॥ . हिमवच्च्चरूयतां जीचनं कथ्यतेऽधुना ॥ सा स्वयं चैव देहस्य हपस्यापि तथा पुनः ॥ ४ ॥
इति श्रीशिव ° भा० दी ° रु्रसंहितान्तगेततृतीयपावंतीसंडे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ बल्यानी गोटे हे खनिराज ! आपके जानेप्र पार्वती
ह|| बहुत भसन हदं शिवजीको तपसे साध्य मानकर पारवतीने तपम ही मन छ्गाया॥ १ ॥ तन अपनी जया ओर विजयानामकं सखीको छेजाकर
है| माता पिता ओर सखीजनो पूछा ॥ २ ॥ पटे पवेतराज हिमाख्य अपने पिता बडी नघ्रता ओर भक्तिसे भणाभं कर पा ॥ ३ ॥ दोनों
-2|| ससियें बोरी हे राजन् ! पारवेती जो वचन कहती है उसको सनिये, बह अपने देह ओर हपकफो सफ करने ॥ ४ ॥
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तथा आपके कुलको सफ़र करनेकी इच्छा करती है यह शंकर तपते ही सिद्ध हो सकते हँ अ
इस्त कारण हे गिरिराज ! इस्त समय आपको यह आज्ञा देनी चाहिये फिं पावती वनम जाकर तपस्या करे ॥ & ॥ ब्रह्माजी बोटे जब् इत्
भकार पाव॑तीकी ससियोनि पूछा तब सचारकर गिरिराज इस प्रकारके वचन बोठे ॥ ७ ॥ गिरिराजन् कहा युन्षे तो यहं बात भच्छी
ख्गती ही है पर पाव॑तीकी माता तो पृषना चाहिये जो ए हो जाय तो उततसे उत्तम ओर बात क्या है ॥ < ॥ इमे हमारा कक निश्चय
धन्य हो जायगा यदि मेनाको भी यह बात रुचे तो उससे उत्तम ओौर कया है ॥ ९ ॥ बरह्लाजी बोरे इस प्रकार वे दोनों सखी पावेतीके
भवतो हि कुरस्यास्य साफल्यं कर्तुमिच्छति ॥ तपसा साधनीयोऽसौ नान्यथा दृश्यतां बजेत् ॥५॥ तस्माच् पवतर देयाज्ञा
भवाधुना ॥ तपः करोतु गिरिजा वनं गत्वेति सादरम् ॥६॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवं च् तदा पृष्टस्सखीभ्यां ॒निसत्तम॥ पावेत्या
सुविचार्यांथ गिरिराजोऽत्रवीदिदम् ॥ ७ ॥ हिमालय उवाच ॥ म्यं च रोचतेऽत्यर मनाय र्च्यतां एनः ॥ यथेदं भवितव्यं
च किमतः प्र्ुत्तमम् ॥ ८ ॥ साफल्यं तु मदीयस्य कुलस्य चन संशयः॥ मरेतु श्च्यते द्रे ततः जुभतरं च किम्॥९॥
ब्रह्मोवाच इत्येवं वचनं पिता भ्रोक्तं त्वा तु ते तद् ॥ जग्मतुर्मातरं सख्यौ तदाज्ञमे तया सह ॥ १० ॥ गत्व तु मातर
तस्याः पावैत्यास्ते च नारद ॥ स॒भ्रणम्य करो बध्वोचतुर्वचनमाद्रात् ॥११॥ सख्यावृचतुः ॥ प्रातस्त्वं वचनं पु्रयाः श्रृणु
देवि नमोऽस्तु ते॥ सुप्रसन्नतया तद्व त्वा कलैमिडार्सि॥१२।तप्त॒कामा त॒ते पुत्री शिवार्थं परम् तपः॥पराप्तायज्ञा पितुश्चैव
| तुभ्यं च परिप्रच्छति ॥१३॥ इयं स्वरूपसाफल्य कतैकामा पतिव्रते ॥ त्वदाज्ञया यदि जायेत तप्यते च तथा तप्ः ॥ १४ ॥
₹०स.२||& || पिताके वचन सुनकर पावतीकी माता इस वातकी अनुमति छेनेको गई ॥ १०; हि नारद् ! वे पार्वतीकी भाताके पाक्ष जाकर
पासं ३। | हाथ बांधकर आद्रसे बोटीं ॥ ११ ॥ सखी बोटी हे मेष्या ! तुम आदरसे पार्वतीकं वचन सुनो तुमको प्रणाम है सुनकर भरसन्तासे
मः २९|| उस् बातके करनेको तुम योग्य हो । १२ ॥ तुम्हारी पत्री शिवजीकी पराप्िके निभित्त परम तपस्या करनेकी इच्छा करती है पितासे आज्ञा
‰९॥ प्राप्त हुई वह अब तुमसे पती ह ॥ १३ ॥ हे पतिव्रते ! पर्वती इस रूपके सफ़ठ करनेकी इच्छा करती है मो तुम्हारी आज्ञा हो जाय
2. न्यथा किसी दृष्टिगोचर नहीं हो सकते ॥ ५ ॥
॥२२२॥
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वह प्रम तपस्या करे ॥ १४ ॥ हे स॒नीश्वर ! इस प्रकार कहकर बे सखये मौन हुईं पर मेनाने व्याकुरुताके कारण उत्त पावतीके व्चनको ४
स्वीकार न किया ॥ १५ ॥ तव पतने स्वयंही माता कहा दोनों हाथ जोड़कर विनये शिवजीके चरण कमल स्मरण करती ह बोरी #
॥ १६ ॥ पार्वती बोी हे मातः ! भ महेश्वरके पराप्त होनेके निभित्त प्रभातही तपोवनमं तपस्या करने जाउगी, हे मातः ! इस समय सुज्ञ
तुपोवनमें जानेकी आज्ञा दीजिये ॥ १७ ॥ ब्रह्माजी बोटे पुत्रीके यह वचन सुनकर मेनाको बडा दुःख हुआ) विकर होकर् ए्नीको
बैठी हई बोी ॥ १८ ॥ मेना बोटी हे शिवे पत्रि ! यदि तू दुःखी है ओर तप करनेकीही यदि तेरी इच्छाहैतो तू घरमंही तपस्या कर
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता च ततस्सख्यौ तुष्णीमास्तां ख॒नीश्वर ॥ नांगीचकार मेना सा तद्वाक्य खिन्नमानसा ॥१५॥ ततस्सा
पावती प्राह स्वयमेवाथ मातरम्॥ करौ बद्ध्वा विनीतात्मा स्मृत्वा शिवपदांबुजम् ॥१६॥ पार्वत्युवाच ॥ मातस्तप्तं गमिष्यामि
प्रातः प्राप्तं महेश्वरम् ॥ अन॒जानीदि मां गतं तपसेऽद्य तपोवनम् ॥१७॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचः पुञ्या मेना दुःख
सुपागता ॥ सोपाहरूय तदा पुतरीषुवाच विकला सती ॥ १८ ॥ मेनोवाच ॥ दुःखितासि शिवे पुजी तपस्तप्तं परा यदि ॥
तपश्चर गृदेऽ्य त्वं न बहिर्गच्छ पार्वति ॥१९॥ कु यासि तपः कर्त देवास्संति ग्रहे मम ॥ तीर्थानि च समस्तानि क्षे्ाणि
विविधानि च ॥२०॥ कतव्यो न हठः पु गंतव्यं न बहिः कचित् ॥ साधितं किं त्वया पूर्वं पुनः किं साधयिष्यसि ॥२१॥
शरीरं कोमलं वत्से तपस्तु कठिनं महत् ॥ एवस्मात्तु त्वया कार्थं तपोऽ न बहिर्बज ॥ २२ ॥ श्रीणां तपोवनगतिनं अता
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कामनाथिनी ॥ तस्मात्वं पुति मा कार्षीस्तपोथ गमनं प्रति ॥ २३ ॥
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बाहर मत जाय ॥ १९ ॥ तप करने कहां जाती है मेरे घरमे देवता विमान है समस्त तीथ ओर अनेकं क्षेत्र यहां विमान है ॥ २० ॥ हे
पुत्चि ! इसमं हठ मत करो तप करने बाहर मत् जाभौ पहठे तुमने क्या साधा ओर अव क्या साधेगी ॥ २१ ॥ हे वत्से ! तेरा शरीर बडा
कोमठ है ओर ठप करना बडा कठिन है इसमे तुम यहीं तपस्या करो बाहर मत जाओ ॥ २२ ॥ हे कामनाकी इच्छावाटी ! धियोंकी
तपोवनमे गति नहीं सुनी है इस कारण तपस्याके छियि वनम गमन मत करे ॥ २३ ॥ ट
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बानी बोढे इस भकारते भेनाने बहत भकारे ऽतीको निवारण किया पर उतने शेकएकी आराधनाके वाय किं भकारे ख र त
॥ २४ ॥ मेनाने जो वावार तपस्याकी जानिके निमित्त पा्वतीते निषेध किया इस कारणसे शिवाका नाम उमा पडा ॥ २५॥ ह ख
मेनाने शेखकी प्यारी उत्त शिवाको दुःखी जानकर पार्वतीको तप करनेकै निमित्त आज्ञा दे दी ॥ २६ ॥ हे सुनिश्रष् | उस सुव्रतान १
आज्ञाको भराप्त होकर शंकरको. स्मरण करते हृए अपने मनम बडा सुख माना ॥ २७ ॥ वह शिवा भरसन्नतापू्वक. माता पिताको प्रणाम क
॥ बह्मोवाच ॥ इत्येवं बहुधा पुरी तन्माजा विनवारिता॥ संवेदे न सुखं किंचिद्विनाराध्य महेश्वरम् ॥२४॥ तपोनिषिद्धातपते
वनं गंतुं च मेनया ॥ हेतुना तेन सोमेति नाम प्रा पशिवा तदा ॥२५॥ अथ तां दुखितां ज्ञात्वा मेना शेरभरिया शिवाम् ॥ निदेशं
सा ददौ तस्याः पार्वत्यास्तपसे सुने ॥२९॥ मातुराज्ञां च संभाष्य सुत्रता श्ुनिसत्तम ॥ ततः स्वाते सुखं रेभे पारवैती स्मृतशंकरा
॥२७॥ मातरं पितरं साथ प्रणिपत्य शुदा शिवा ॥ सखीभ्यां च शिव स्मृत्वा तपस्तप्तुं सशरुद्रता ॥२८॥ हित्वा मतान्यनेकानि
वद्लाणि विविधानि च॥ वल्कलानि धृतान्याद्य मौजीं बदध्वा तु शोभनाम् ॥२९॥ हित्वा हारं तथा च्म भगस्य परमं धृतम् ॥
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॥२२३॥
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जगाम तपसे ततर गंगावतरणं प्रति॥ ३० ॥ शुना ङव॑ता ध्याने यन् दग्धो मनोभवः ॥ गंगावतरणो नाम प्रस्थो दिमवतस्स
|| च ॥ ३१ ॥ हरञचन्योऽथ ददृशे स प्रस्थो दिमधरभृतः ॥ काल्या तत्रत्य भोस्तात पार्वत्या जगद्म्बया ॥ ३२ ॥
एप. २ ||| शिवको स्मरणकर दो ससियोको स्थ ठेकर तप करनेको गद ॥ २८ ॥ अनेक भ्रकारकै मत भौर अनेक भकार वर्को छोडकर पारवतीन
पा.सं.३ ||| सुन्दर मौजी कमरम बांधकर वल्कठ वञ्च धारण किये ॥ २९ ॥ हारको छोडकर सृगचर्म धारण किया ओर गंगोत्तरीके समीप तपस्या
अ०ञ२ ||
करनेको गहै ॥ ३० ॥ जहां शिवजीने समाधि ठगाई थी जहां कामदेव भस्म हुआ था वही गंगावतरण नामक हिमाठ्यका पर्थ है ||
॥ ३१ 1 हे तात ! उस्र समय वह स्थान शिवजीसे रहित था काटी जगदम्बा पावती पहठे उसरी स्थानम गहं ॥ ३२ ॥
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२४२॥
| | प्रथम शिवजीने दुष्कर तप किया धा वहां क्षणमात्र स्थित होकर पार्वती विरहसे बहुत व्याकुल दईं ॥ ३३ ॥ हा शंकर ! दस॒प्रकार कहकर
पार्वती रोने ठगी, बडे दुःख ओर चिन्ता शोके व्याकुढ होकर रोने र्गी ॥३४॥ फिर बहुत समय पीछे पावती धेयंसे मोहको स्तेभित करके
# दीक्षित होकर तपस्याकै निमित्त नियम धारण करती हृं ॥ ३५ ॥ तब उस महा उत्तम शंगितीर्थम तपस्या करनेरगी इसी कारण उस स्थानम
तपस्या करनेसे उस स्थानका नाम गौरीशिखर हुआ ॥३६॥ हे सने ! शिवाके वहां पधारनेपे वृक्षादि हरे होगये, जो पावंतीने तपकी परीक्षाकै द्यि
¢ यर स्थित्वा पुरा शंधुस्तत्तवान्दुस्तरं तपः ॥ तत्र क्षणं तु सा स्थित्वा बभूव विरहादिंता ॥ ३३ ॥ हा हरेति शिवा तञ
# रुदन्ती सा गिरेस्छता ॥ विलापातिदुःखाताचिन्ताशोकंसमन्विता ॥३९॥ ततचिरेण सा मोहं घेर्यात्संस्तभ्य् पावती ॥
¢ नियमायाऽभवत्तच दीक्षिता हिमवत्सुता ॥ ३५ ॥ तपश्चकार सा तवर शृंगितीथं महोत्तमे ॥ गौरीशिखरनामासीत्तत्तपःकर
णाद्धि तत् ॥ ३६ ॥ सुंदराश्च द्मास्तञर पवि्राश्शिवया मुने ॥ आरोपिताः परीक्षार्थं तपसः फरभागिनः ॥ ३७ ॥ भूमि
| शुद्धि ततः कृत्वा वेदीं निमय सुंदरी ॥ तथा तपस्समारब्धं मुनीनामपि दुष्करम् ॥ ३८ ॥ विगृह्य मनसा सर्वाणींद्वियाणि
सदारु सा ॥ सञुषस्थानिके ततर चकार परमं तपः ॥ ३९ । ग्रीष्मे च परितो वहनि भ्रज्वलुतं दिवानिशम् ॥ कृत्वा तस्थौ
च तन्मध्ये सततं जपती मनम् ॥ ४० ॥ सतते चैव वर्षास॒ स्थंडिले सुस्थिरासना ॥ शिलापृष्ठे च संसिक्ता बभूव
ट| जलधारा ॥ ४१ ॥ शीते जलांतरे शश्वततस्थौ सा भक्तितत्परा॥ अनाहारातपत्तज नीहारम निशास च ॥ ७२ ॥
४ गाये थे कि तपस्याका फट किस प्रकारसे होगा ॥३७॥ तब सुन्दरीने भूमिशुद्धि करके ओर उस्र स्थानमें वेदी निर्माण करके सनियोको भी
दुष्कर तपस्या आरभ की ॥ ३८॥ मनकै साथ शीधही सम्पूणं इन्ड्योको रोककर वहां स्थितहो प्रम तपस्या करने ठगी ॥२९॥ थीप्मकालमे
४ दिनरात अपने चारों भर् अश्रि मजित करके स्थित रही ओौर उसके मध्यम स्थित होकर मंज जपने ङ्गी ॥ ४० ॥ ओर वर्षाके समय
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मैदानमे आस्न ठगाकर बैठी, शिठापृषठपर स्थित हो अपने ऊप्र जख्की धाराको सहन करने कमी ॥४१॥ शीत कालम शकरकी भक्ते तत्र
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होकर विना आहार कि शीत काठकी कठिन रा्ियोंमे जठ्के भीतर स्थित रही ॥ ४२॥ इसप्रकार त्पर्षा करती पंचाक्षरका जप् |
ओर सब काम फले देनेवारे शिवजीका ध्यान करने ठगी॥४३॥ अपने ठगाये हए वृक्षोको सखीजनो सिचित कराती तथा अवकृर
आपी सीचती ओर अतिथिसत्कार भी करती ॥४४॥ वात तथा शीतकाठक्ो अनेक प्रकारक वर्षा ओर गरमीकी दुःसहं धृपकोमी सावधान
चिन्से सहने ठगी ॥४५॥ ओर भी अनेक प्रकारके दुःख आये प्र उपने एक भी न माना हे खन ! वह केवर शिवजी मन ठगाकर स्थित
हुई ॥४६॥ पृहठे वर्षम फभोजन दूसरे वर्षम प्णाहार करते हए तपस्यासे देवीको करमसे बहुत वषं बीत गये ॥४७॥ तब वह हिमवतघुता शिवा
एवं तपः प्रक्र्बाणा पंचाक्षरजपे रता ॥ दध्यौ शिवं शिवा ततर सर्वकामफलप्रदम् ॥ ४२३ ॥ स्वारोपिताच्छुभान्वृक्षान्सखीभिस्सि
चतीञदा॥ परत्यहंसावकाशे सा तातिथ्यमकल्पयत्॥४४॥ वातश्चेव तथ शीतवृष्िश्च विविधा तथा॥ दुस्सहोऽपि तथा धम्म
स्तया सेहे सचित्तया॥०९॥ दुःख च विविधं त गणितं न तयागतम् ॥ केवलं मन आधाय शिवे सासीरस्थता सुने ॥४६॥
परथमं फलभोगेन द्वितीयं पणंभोजनेः॥ तपः प्रकर्वती देवी कमासनिन्येऽमिताः समाः ॥४७॥ तत्ः पणान्यपि शिवा निरस्य हिम
वत्सुता॥ निराहाराभवदेवी तपश्वरणसंरता॥४८॥ आहारे त्यक्तपर्णाभूदयस्मद्धिमवतः सुतः ॥ तेन देवैरप्णेति कथिता नामतः शिवा
॥४९॥एकापादस्थिता सामीच्छिवं संस्मृत्य पावती॥ पंचाक्षरं जपंती च सं तेपे तपो महत्॥५०॥ चीरवल्करवीता जासघा
तधारिणी॥ शिवचितनसंसक्ता जिगाय तपत] नीम् ॥ 4१ ॥ एवं तस्यास्तपस्यन्त्या चित्त्या महेश्वरम् ॥ त्रीणि वर्षं सह
सराणि जम्बुः काल्यास्तपोवने ॥५२॥ षष्िवर्षसदस्लाणि यञ तेपे तपो हरः ॥ तच क्षणमथोषित्वा चितयामास सा शिवा ॥५३॥
ं पणे भोजन भी छोडकर निराहार होकर तपस्या करने ठगी ॥४८॥ जब कि शिवाने पण भोजनतक त्याग दिया तब देवताओंने शिवाका
नाम अपण उच्चारण किया ॥४९॥ पावती तब एकं चरणमे स्थित हो शिवजीको स्मरणकर पंचाक्षर मंत्र जपती महातपस्या करने ठगी॥ ५०॥
चीर वल्फढ पहरे जराजटधारी शिवकोही चितनकरते पावंतीने तपसे खनियोंको जीत छया ॥ ५१ ॥ इस भकार तपर्या करते ओर महेष्वरको
चिन्ता करते पावेतीको तपोवनमें तीन सह वषं बीत गये ॥ ५२ ॥ जहां शकरने साठ सहस्च वर्षतक तपस्या की थी वहां श्षणमात्रको स्थित
लगी ।
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हे पार्वती विचार करने ठगी ॥ ५३ ॥ क्या महादेव यह नहीं जानते किं यह मेरे निमित्त तपस्या निरत है जिससे किं इतने समयत ठै
| करते हए भौ उन्होने मेरी हुभि न टी ॥ ५४ ॥ ठोक वैद तथा सुनिजनोमं यह बात भरद है कि शकर सवन है सात्मा ओर सवे ||
ट दशी है ॥ ५५ ॥ वह देव सब रश्वय देनेवाठे सब भावे अनुभावित ई निरन्तर भक्तोके मनोरथ पूणे करनेवाठे तथा सब शोक
£ कृरनेवाटे है ॥ ५६ ॥ यदि मेँ सव कामनाओंको त्यागकर शकरमं अनुरक्त हृ हूं तो वह शंकर खु अुरागिनीपर भरसन्न होंगे ॥५७॥ यदि त
नारद तंत्रका कहा हआ पंचाक्षर मन्त्र भक्ति ओर विधिसे मने नित्य जपा है तो शिवजी मेरे ऊपर प्रसन्न हँ ॥ ५८ ॥ यदि भक्तिसे भने ¢
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नियमस्थां महादेवि मां जानासि नाधुना ॥ येनाहं सुचिरं तेन नाजयाता तपोरता ॥ ५8 ॥ रोके वेदे च गिरिशो खनिभिगीं
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४| यते सदा ॥ शंकरस्स दि सर्व्ञस्सर्वात्मा स्वेदशनः॥५॥ सवैभूतिप्रदो देवस्सवैभावाज॒भावनः ॥ भक्ताभीष्टप्रदो नित्यं स्वङ्धेश
2 निवारणः॥ ५६ ॥ सवैकामान्परित्यज्य यदि चाहं वृषध्वजे ॥ अनुरक्ता तदा सोत संप्रसीदतु शंकरः ॥ «७ ॥ यदि नारद
तेोक्तमंजोजत्तश्शराक्षरः ॥ सुभक्त्या विधिना नित्यं संपरसीदतु शंकरः ॥५८॥ यदि भक्त्या शिवस्याहं निर्विकारा यथो |©
दितम् ॥ सर्वेश्वरस्य चाल्यते संप्रसीदतु शंकरः ॥ «९ ॥ एवं चितयती नित्यं तेषे सा खचिरं तपः ॥ अधो निर्विकारा ||
|| जटा वल्कलधारिणी ॥ ९० ॥ तथा तया तपस्त सुनीनामपि दुष्करम् ॥ स्मरत्वाच पुरूषास्तच परमं विस्मयं गताः ॥ &१ ॥ र
तत्तपोद्शनाथ हि समाजग्मुश्च तेऽखिलाः ॥ धन्यात्निजान्मन्यमाना जगडुःेति सम्मताः ॥ ६२ ॥ सहतां धम्मबृद्धेषुगमनं ५
श्रय उच्यते ॥ प्रमाणं तपसो नास्ति मान्यो धम्मंस्सदा बुधैः ॥ ६३ ॥ ह
निरषिकार शंकरको यथायोग्प आराधना कौ है तो वह सर्वेश्वर शंकर मेरे ऊपर प्रसन्न होगे ॥ ५९ ॥ इस भरकार महाता करती वह महा ठ
तपस्या करने ठगी वह निर्विकार जटम्ण्इढ धीरे नीचेको खख किये ॥ ६० ॥ इक प्रकार तप् करे खग जो खनियोको भी बडा दुष्कर ||?
था उसको स्मरणकर् सव॒ कोई परम विस्मयको भरप्त हए ॥ ६१ ॥ उस तप्तो सुनकर बहृतसे ऋषि खनि देखनेको आये ओर अपनैको
धन्य मानकर पादेतीकी बडाई करने ठगे तथा बडे विस्मयको भप्त हुए ॥ ६२ ॥ महान् एर्षोका धर्वृदधँमं गमन प्रम कल्याणकारी ह
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शिण्डु°
॥२३५॥
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तपको माण नहीं है पण्डितोको सदा धको मान्य करना ही चाहिये ॥६३॥ इसका तप देख ओर हुनकर फिर दूरे कवा तप करते हं श
तप होना चाहिये जैसा कि श्रीशिवजीका है इसमे विशेष तप ठोकमे न किपतीका हुभा है न होगा ॥६४॥ इस भकार वै सव ठोग कहते ह
पर्वतीके भरता करते अपने अपने स्थानोंको भसन्न होकर चे गये, ययपि वे कठिन अगवा थे ॥ ६५ ॥ हे महर्षे! ओर भी तुम तप
स्याका भभाव सुनो जो जो जगदम्बा पारवतीका परम अद्भुत चरित्र है ॥६६॥ स्वभाक्ते परस्पर विरोध करनेवाञे जो कोई उस आभरमरमे जाते
वे भी पार्वतीके प्रभाक्ते विरोधरहित हो जाते है ॥ ६७॥ सिंह ओर गाय परस्पर रागादि दोषसे संयुक्त है पावंतीकी महिमासे परस्पर किमीने
शत्वा दृष्टा तपोऽस्यास्तु किमन्यैः क्रियते तपः ॥ अस्मात्तपोऽधिकं रोके न भूतं न भविष्यति ॥६४॥ जल्पैत इति ते सवे
सुप्रशस्य शिवातपः ॥ जग्घुः स्वं धाम श्ुदिताः कठिनांगाश्च ये द्यपि ॥ &« ॥ अन्यच्छणु महं त्वं प्रभावं त॒पसोऽधुना ॥
पार्वत्या जगदम्बायाः पराश्व्यकरं महत् ।॥ && ॥ तदाश्रमगता ये च स्वभवेन विरोधिनः ॥ तेप्यासंस्तत्प्रभावेण विरोधरहि
तास्तदा ॥&७॥ सिंहा गावश्च सततं रागादिदोषसंयुताः ॥ तन्मरिम्ना च ते तञ नावार्धत परस्परम् ॥६८॥ अथान्ये च सुनि
श्रेष्ठ मार्जारा मूषकादयः॥ निसरगद्रिरिणो य विक्रियते स्म न कचित् ॥६९॥ वृक्षाश्च सफलास्तत्र तरणानि विविधानि च ॥
पुष्पाणि च विचित्राणि तत्ासन्धुनिसत्तम ॥७०॥ तदनं च तदा सव कैलासेनोपमान्वितम् ॥ जातं च तपसस्तस्यास्सिदधि
हूपमभूत्तदा ॥७१॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां दरस ° तृतीये पावती पार्वतीतपो व° नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥२२॥
किीको बाधा नहीं दी ॥ ६८ ॥ हे निक्ष ! ओर मी जो माजर मूषक आदि है जो स्वाभाविक वैर करनेवाठे है वे किती प्रकारसे भी
विकार नहीं करते थे ॥ ६९ ॥ वृक्ष ओर तृण यह सब फल्वाठे हो गये, हे सनिभरेष्ठ ! उक समय पष्पभी बडे विचित्र ठग गये ॥ ७० |
उस समय वह सम्पुणे वन कैासके समान उपमावाढा होगया यह सब पार्व॑तीके तपका प्रभाव था इस प्रकारसे बह सिंदष्टप हो गहं ॥ ७१ ॥
इति श्रीशिवमहाप्राणभाषाटीकायां शद्रसंहितान्तगततृतीयपावतीखंडे दारविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
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बाजी बोले हे नारदजी ! इसत भकार पार्वतीको तप॒ करते करते जब बहुत समय बीत गया ओर शिवदश॑नकी ाठसा करते कस्ते उसको
शिवकी पराति न हुई ॥१॥ तब निश्वयवाढी पार्वतीके निकट गिरिराज हिमाख्य अपनी ज्ञी एत्र ओर मंत्रियों सहित प्राप्त हूए ओर ओर परमेश्वरीरे
| ॥ २॥ हे महाभागे ! हे पा्ैती ! इस तपसे तू सेदित मत होना, हे वारे ! तृ्चको रुदर दिखाई नहीं देते इसमे सन्देद नहीं वह विरक्तं ह
॥ ३॥ तु सक्षम शरीरवारी सुकुमार अङ्गोवाी तपसे मोहित होगई है, इमे सन्देह नहीं यह मेँ तुञञसे सत्य सत्यही कहता हूं ॥ ४ ॥ ह
ट व्रवणि नी ! इस कारण उठो ओौर अपने घरको आओ, उन रुद्रसे तुम्हारा क्या काम चलेगा जिन्होने प्रथमही कामदेवको भस्म कर दिया ॥ ५
॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं तपत्यां पावत्यां शिवगप्राप्तौ सनीश्वर॥ चिरकारो व्यतीयाय प्रादुभूतो हरो न हि ॥१॥ हिमालयस्तदागत्य
पार्वतीं कृतनिश्वयाम्॥सभार्यस्सस॒तामात्य उवाच परमेश्वरीम्॥२॥ हिमालय उवाच॥ मा खि्यतां महाभागे तपसानेन पार्वती ॥
रुद्रो न दश्यते बलेविरक्तो ना सशयः॥ २॥ त्वं तन्वी सुकुमारांगी तपसा च विमोहिता ॥ भविष्यसि न संदेदस्सत्यं सत्यं
वदामि ते ॥४॥ तसमादुत्तिष्ठ चेदि त्वं स्वगृहं व्रवणिनि ॥ कतेन तव् रुद्रेण येन दग्धः पुरा स्मरः ॥ « ॥ अतो हि निविंकार
त्वात्वामादातु वरां हराः ॥ नागमिष्यति देवेशि तं कृथं प्रार्थयिष्यसि॥ & ॥ गगनस्थो यथा चंद्रो थदीतं न हि शक्यते ॥
तथेव दुगीम् शयु जानीदि त्वमिहानघे॥ ७ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तथैव मेनया चोक्ता तथा सश्चाद्विणा सती ॥ मेरूणा मंदेरेणेव
मेनाकेन तथेव सा ॥ ८ ॥ एवमन्यैः क्षितिभरेश्च कौँचादिभिरनात॒रा ॥ तथेव गिरिजा परोक्ता नानावादविधायिभिः ॥ ९ ॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं प्रोक्ता यदा तन्वी सा सवस्तपसि स्थिता ॥ उवाच प्रहसंत्येव हिमवेतं शुचिस्मिता ॥ १० ॥
इस कारणसे निविकार होनेसे शिवजी तुमहं ग्रहण करनेको नहीं आवेगे हे देवेशि ! तुम उनकी क्यों पाथना करती हो ॥६॥ जेसी किं आकाशम
स्थित चन्द्रमाको को प्रहण नहीं कृर सकता इसी भकार हे पापरहिते ! ठम शिवजीको दुगम जानो ॥ ७ ॥ ब्हलाजी बोरे इसी भकार भेना
सतीन भी पावतीको सम्ञाया. स्य मेरु मन्द्र ओर मेनाकने भी समज्ञाया ॥<॥ तथा दूरे क चादिपर्वतोने भी आतुरतारहित पार्वतीको समज्ञाया,
ओर अनेक हेतु दिखाये ॥ ९॥ इस भकारे जव सबने तपस्यामे स्थित पावंतीको समञ्ञाया तव हसती इद पचित हास्यवारी देवी हिमवानूसे
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नोठी ॥१०॥ पार्वती बोटी हे तात ! हे मातः ! यन पे जो कहा था क्या इस समय दुमने मुढा दिया इस समय बन्धुनन भरा द
तुनो ॥ ११ ॥ निश्वयही महादेव विरक्त है जिन्होने क्रोधते कामदेवका भस्म किया उन भक्त वत्सर शकरको भे तपह्याते सन्तु ॐ
॥ ३२ ॥ तुम सव भसन्नतासे अपने अपने स्थानको जाओ इभं सन्देह नहीं है शंकर मेरे ऊपर प्रसन्न शंगे ॥ १३ ॥ जिन्न कामदेवकौ
भस्म किया जितने गिरिका बन दग्ध किया भँ उसे केवल तपस्याके भभावसे यहां बा ठगी ॥ १४ ॥ हे महाभागो ! मेँ सत्य सत्यही कहती
पार्ट्युवाच॥पुरा परोक्तं मया तात मातः किं विस्मृतं त्वया॥अधुनापि प्रतिज्ञां च शृणुध्वं मम बांधवाः॥११॥विरक्तोसौ महा
देवो येन दग्धो र्षा स्मरः ॥ तं तोषयामि तपसा शंकरं भक्तवत्सलम् ॥१२॥ स्वे मवेतो गच्छतु स्वं स्वं धाम प्रहर्षिताः ॥
भविष्यत्येव त्॒टोऽसौ ना कार्यां विचारणा ॥१३॥ दग्धो दि मदनो येन येन दग्धं गिरेवैनम् ॥ तमानयिष्ये चाजरैव तपसा
केवलेन हि ॥१४॥ तपोबलेन महता सुसेग्यो हि सदाशिवः ॥ जानीध्वं हि महाभागास्सत्यं सत्यं वदामि वः ॥ १५ ॥
आभाष्य चैवं गिरिजा च मेनकां मैनाकं पितरं दिमाल्यम् ॥ तूष्णीं बभूवा सुभाषिणी शिवा समंदरं पर्वतराजबालिका
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॥ १६ ॥ जग्युस्तथोक्ताः शिवया हि पर्वता यथागतेनापि विचक्षणास्ते ॥ प्रशंसमाना गिरिजा षुडु्हस्युविस्मिता हेमनगेश्च
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रायाः ॥ १७॥ गतेषु तेषु सवेषु सखीभिः परिवारिता ॥ तपस्तेपे तदधिकं परमार्थसुनिश्वया ॥ १८ ॥ तपसा महता तेन
तप्तमासीचचराचरम् ॥ ञेलोकयं हि अुनिश्रष्ठ सदेवासुरमादुषम् ॥ १९ ॥
ह महाभाग शंकर कवर महान् तपस्याके बरुसेही सेवित हो सकते हँ सो जानो ॥१५॥ बरह्ञाजी बोखे पवतराजकी त्री शिवा गिरिजा
मेनका भ्राता मेनाक तथा पिता हिमाटयते इस भकार कहकर तथा मन्द्रको भी समञ्ाकर वह सुभाषिणी मौन होगई ॥ १६ ॥ पावंतीके रसा कहनेप्र
र विचक्षण पवैतराज आदि तथा सुमेरु आदि वारंवार पाव॑तीकी प्रसंसा करक जहे आये थे विस्मित हो वहां चे गये ॥१७ ॥ जवसे सब चछे
गये तवसे पावती अपनी ससि्योके साथ परमाथके निश्वयसे सहातपस्या करने ठगी ॥ १८॥ तब उसकी अहातपस्यासे चर अचर सतप होगये,
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पा.खं.३
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निभे ¡ जिलोकी ओर देवता असुर सब कोई सन्तप्त होगये ॥ १९ ॥ त् सुर असुर यक्ष किन्नर चारण सिद्ध साध्य खनि विद्याधर
महोरग ॥ २० ॥ भरजापति ओर ग्यक बडे कषटको प्राप्त हुए ओर इतक कारणको किसने न जाना ॥ २१ ॥ इन्द्रादि सवं देवता मिलकर
बरहस्पतिसे सम्मतिकर बडे व्याकुठ हुए, ओर सुमेरु स्वागते तप्त हो सव विधाताकी शरणमे गये ॥ २२ ॥ वहां जाकर सक्ष प्रणाम आओ
विहर होनेसे सबकी कांति नष्ट होगदं थी वे षय एक पदे भेरी स्तुपि करते हए कहने ठगे ॥ २३ ॥ देवता बोरे ! हे देव ! यह चराचर
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जगत् आपका निर्माण किंथां हुआ है सो यह कि कारणसे संतप्त हो रहाहैहे विभो ! इसका कदं कारण हम नहीं जानते ॥ २४ ॥
तदा सुरायाः सवं यक्षकिन्नरचारणाः ॥ सिद्धास्साध्याश्च मुनयो विद्याधरमहोरगाः॥२०॥ सप्रजापतयश्चेव गुह्यकाश्च तथाप
२॥ कष्टात् कष्ठतरं प्राप्ताः कारणं न विदुः स्म तत् ॥२१॥ सवं मिखित्वा शक्राद्या गुरूमामेञ्य विहलाः ॥ स॒मेरौ तप्तसर्वागा
विधि मां शरण ययुः ॥ २२ ॥ तत्र गत्वा प्रणम्याज्जु विहला नष्टसत्िषः ॥ उचुस्सवं च संस्तूय द्येकपयेन मां हि ते ॥२३॥
देवा ऊचुः ॥ त्वया सृष्टमिदं सर्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ संतप्तमति कस्माद्रे न ज्ञातं कारणं विभो ॥२४॥ तदहि कारणं बह्मनज्ञा
तुमहसि नः प्रभो ॥ द्ग्धभूततनून्देवान् त्वत्तो नान्योऽस्ति रक्षकः ॥२५॥॥ ब्रह्मोवाच्॥ इत्याकण्यं वचस्तेषामहं स्त्वा शिवं
दा ॥ विचायं मनसा सर्वं गिरिजायास्तपः फलम् ॥२६॥ दग्धं विश्वमिति ज्ञात्वा तैः स्वैरिह सादरात् ॥ दरये तत्कथयितं
क्षीराव्धिमगमे द्रुतम् ॥२७॥ तत गत्वा हरि दृष्टा विलसंतं सुखासने ॥ सुप्रणम्य सुसंस्तूय प्रावोचं सांजकिः सुरे: ॥२८॥
हे विभो ! हे र्न् ¦ सो आप् इसका कारण किये सव ॒देवताओंके शरीर दण्धं है तुमसे अभिक कोहं रक्षक नहीं है ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी
बोठे उनके यह वचन सुनकर मेँ हदयसे शिवजीको स्मरणकर मनम विचारता हआ किं यह सब परर्वतीकै तपका फ है ॥ २६ ॥ दस
भकारे उन सबने विश्वको दग्ध जानकर क्षीरभ्षागरमं जाकर यह स्व वात नारायणे कही ॥ २७ ॥ वहां जाकर नारायणको सुखके आसन
पर वेढा हुआ देखकर वे सव देवता प्रणामकर हाथ जोड स्तुति करते हृए गोटे ॥ २८ ॥
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हे नारायण ! तेजते व्याकुढ हो हम आपकी शरणमे आये है आप हमारी रक्षा करं हम पावंतीकी प्रम उग्र तपस्यासे संतत होये ह ॥ न
इस भकार हम सव देवताओकि वचन बुनकर वे रमेश्वर भगवान् रोषासनपर बे हुए हम सव देवताओसि बोठे ॥ ३० ॥ भगवानु वि क
बोठे पाव॑तीकी तपस्याका सव कारण हमने जानछिया आप टोकोकि सहित मेँ परमेश्वरे स्थानको चता दं ॥ ३१॥ हम गिरिजा व
पाणिग्रहणके निमित्त शिवजीकी प्रार्थना करगे हे देवताओ ! इस पाणिग्रहणसे छोकोंका कल्याण होगा ॥ ३२ ॥ वह देवदेव पिनाकाय
पावंतीको वर देनेके निमित्त जितत भकार वहां जार्यगे हम सब वही बात करगे ॥ ३३ ॥ इस कारण जहां वह महामभु प्रम उग्र
आहि वाहि महाविष्णो त्ता्रश्शरणागतान्॥ तपसोभेण पावैत्यास्तपंत्याः परमेण दि ॥२९॥ इत्याकण्य॑वचस्तेषामृस्मदादि दिवौ
कसाम्॥ शेषासने समाविष्ठोऽस्माचवाच रमेशवूरः ॥ ३० ॥ ॥ विष्णुकूवाच॥ ज्ञातं सर्वे निदानं मे पा्वतीतपसोद्य वे ॥ युष्माभि
स्सहितस्त्वदय ब्रजामि परमेश्वरम् ॥३१॥ मदादेवं प्रार्थयामो गिरिजाप्रापणाय तम् ॥ पाणि्रहा्थमधुना लोकानां स्वस्तयेऽमराः
॥३२॥ वरं दातुं शिवाये हि देवदेवः पिनाकधृक् ॥ यथा चेष्यति तैव करिष्यामोऽशुना हि तत् ॥३३॥ तस्मद्वयं गमिष्यामो
यत्र शुरो महाप्रथुः ॥ तपसोग्रेण संयुक्तोऽदयास्ते परममंगलः ॥ ३ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ विष्णोस्तद्र चनं श्॒त्वा सर्व उचुस्सुरा
दयः ॥ महाभीता इगत् ऊद्धादग्धुकामात् लयंकरात् ॥ ३५ ॥ दवा उचुः ॥ महाभ्यकरं कुदं कोलानलसमप्रभम् ॥ न या
स्यामो वयं सवं विषूपाक्ष महाप्रभम् ॥ ३६ ॥ यथा दग्धः पुरा तेन मदनो दुरतिक्रमः ॥ तथेव् क्रोधयुक्तो नः स् धक्ष्यति न
संशयः ॥३७॥ ब्रह्मोवाच ॥ तदाकरण्यं वचस्तेषां शक्रादीनां रमे श्वरः ॥ सांत्वय॑स्तान्सुरान्सवन्प्रोवाच स हरिन ॥ ३८ ॥
| परम मंगर सम्पन्न हो तप करते है हम वहीं जार्थेगे ॥ ३४ ॥ वह्लाजी बोले विष्णजीके यह वचन सुनकर स्तव देवता
बोटे हम उन शेकरसे महाभीत हँ जो भरल्यकं करनेवाठे ह जिन्होने हृठसे कामदेवो नषट्कर दिया ॥ ३५॥ देवता बोरे महाभयंकर
करोधको भराप्र काठानठके समान कान्तिवाठे विहपाक्ष महाप्रभावे शंकरके समीप हम नहीं जार्थेगे ॥ ३६ ॥ जिस्न भरकारसे महादुःस्सह
कामदेवको उन्होने दग्ध किया, इसी प्रकारसे कोधयुक्त वह हमको भस्म करदेगे, इसमे सन्देह नही ॥ ३७ ॥ बह्लाजी बोढे इस्त पकार
स 4५4 4 +
| उन इन्द्रादिक वचन सुनकर सब देवताओंको सत्वना करते हुए वह हारे कहने रगे ॥ १८ ॥ हारे बोढे हे देवताओं मेरे वचन् तुम
आद्रसे सुनो, देवताओके भय नाश फरनेवाे स्वामी तुमको दग्ध नहीं करेगे ॥.३९ ॥ इस कारण तुम सव हमारे साथ आओ शिवजी शुभ
करनेवाले ह ओर उस्न शुम करने वारीकी शरणमे जाओ ॥ ४० ॥ शिव कल्याणकारी परुष अधीश्वर वरेण्यरूप परेम प्रे तप्का सेवन करने
बाले परमात्महप है हम उनकी शरण जाते है ॥ ४१ ॥ ब्रह्माजी बोटे जब समर्थं विष्ने इस प्रकारसे कहा तव सब शंकरके देखनेकी
इच्छासे चरे ॥ ४२ ॥ प्रथम शेटुत्रीका आश्रम ओौर तपस्या देखी, मागम आनेके कारण विष्य आदि देवताओंने यह भगवतीका आश्रम
॥ इरिरुवाच ॥ हे सरा मद्वचः प्रीत्या. शृणतादरतोऽखिलाः ॥ न वो धक्ष्यति स स्वामी देवानां भयनाशनः ॥ ३९ ॥
तस्माद्भव द्विर्गतव्यं मया सादं विचक्षणेः ॥ शुं ञ्चभकरं मत्वा शरण तस्य सप्रभोः ॥ ४० ॥ शिवं पुराणं पुरूषमधीशं
वरेण्यरूपं हि प्ररं पुराणम् ॥ तपोजषाणां परमात्मरूपं परात्परं तं शरण व्रजामः ॥ ४१ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवशक्तास्तदा
देवा विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ जग्घुसवें तेन सह द्रष्टुकामाः पिनाकिनम् ॥४२॥ प्रथमं शेलएुत्यास्तत्तपो इष्टं तदाश्रमम् ॥
जग्बुमागवशात्सवं विष्ण्वायास्सङतूहकाः ॥ ४३ ॥ पार्वत्यास्सुतपो दृष्टा तेजसा ग्याप्रतास्तद्ा ॥ प्रणेशरुस्तां जगद्धाभीं
तेजोषूपां तपः स्थिताम् ॥ ७४ ॥ प्रशंसुंतस्तपस्तस्यास्साक्षात्सिद्धितनोस्स॒राः ॥ जग्धुस्तच तदा ते च यास्ते वृषभध्वजः
॥ ४५ ॥ तच गत्वा च ते देवास्त्वां सुने भरषय॑स्तदा ॥ पश्यतो दूरतस्तस्थुः कामभस्मङृतो हरात् ॥४६॥ नारद् त्वं शिवस्थाने
तदा गत्वाऽभयस्सदा ॥ शिवभक्तो विशेषेण प्रसन्नं दृष्टवान् प्रथुम् ॥ ७७॥
देखा ॥ ४२ ॥ तव पावेतीका तप देखा किं तेजसे व्याप्त हो रहा है तब उन जगतकी धात्रीको पणाम किया जो तपके तेजहपसे स्थित थी
॥ ४४ ॥ तप करते हुए देखकर सब देवता प्रशंसा करने रगे मानो सक्षात् सिदिका शरीर है तब वे सव देवता शंकरके समीप चरे ॥४५॥
है सने । वहां आकर सव देवताओंने तुमको करके समीप भेजा ओर काम भरम करने वाठे शकरको दूरसे देखकर स्थित हए ॥ ४६ ॥ हे
नारदजी ! उस्न समय तुम अभय होकर शिवकै स्थानको गये, विशेष करके तुमने भभु शकरको प्रसन्न देखा ॥ १७ ॥
सर्द देवता गये ॥ ४८ ॥ तव विष्णु
|| फिर तुम आकर यत्नसे देवताओंको बुलाकर शकरके स्थानको छे गये, हे खनं ! तब विष्ण आदि
आदि सव देवता भभु शवक स्थानम जाकर सुससे बैठे हुए भसन्नमन उन मक्तवत्सकको देखने ठगे ॥ ४९ ॥ उप् क्षमप् शक योगासनप्र
बैठे हुए थे, गण उनको वेरं रहे थे, वह परम्वररूप उस समय तपस्याका खूप _ धारण कियिहूये थे ॥ ५० ॥ तव॒ विष्णु ओर
सुर सिद खनीश्वर भगवानूको प्रणाम कर वैद ओर उपनिपदोके स्तोमे स्हुति करने रगे ॥ ५१ ॥ इति भीशिवमहाराणभाषाटीका
पुनरागत्य यत्नेन देवानाहूय तांस्ततः ॥ निनाय शंकरस्थान तदा विष्ण्वादिकान्षुने ॥४८॥ अथ विष्ण्वाद्यस्सवं तच गत्वा
शिवं धुम् ॥ ददद्यरस॒खमासीनं प्रसत्रं भक्तवत्सलम् ॥४९॥ योगपटस्थितं शंथुं गणश्च परिवारितम् ॥ तपोष्पं दधानं च् प्रमं
शरषूपिणम्॥ ९० ॥ ततो विष्णुरमयान्ये च सुरसिद्धखनीश्वराः॥प्रणम्य तुष्टुबुस्सुक्तवदोपनिषद्न्वितेः ॥ «१ ॥ इति श्रीशिव
महापुराणे द्वितीयायां सुरसंहितायां ठतीयेषावेतीखंड पार्वतीसांत्वनशिवदेवद्शेनवर्णैने नाम अयोविशोऽध्यायः॥ २३ ॥ देवा
उचुः ॥ नमो श्द्राय देवाय मदनांतकराय च।स्तुत्यायभूरिभासाय भिने्राय नमौनमः॥9 ॥शिपिषिष्ठाय भीमाय भीमाक्षाय
नमोनमः॥ महादेवाय प्रभवे भिविष्टपतये नमः ॥ २॥ त्वं नाथः सर्वलोकानां पिता माता त्वमीश्वरः ॥ शंमुरीशश्शंकरोसि
दयाटुस्त्वं विशेषतः ॥ २ ॥ त्वं धाता सर्वजगतां आतुमहैसि नः प्रभो ॥ त्वां विना कस्समर्थोस्ति इःखनाशे महेन्वर ॥
॥ ९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकर्ण्यं वचस्तेषां सुराणां नन्दिकेश्वरः ॥ कृपया परया युक्तो विज्ञप्तुं शंयुमारभत् ॥ « ॥
सद्संहितान्तगततृतीयपारवतीखण्डे तयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ देवता बोटे रुद्रदेव कामदेवके अन्त करने वाटे स्तुतिके योग्य अयन्त
कातिवठे तीन नेजरधारी शंकरके निमित्त नमस्कार है ॥ १ ॥ शिपिविष्ट भीम भीमाक्ष आपके निमित्त नमस्कार है महादेव जगतके ||
उत्पादक स्वके परतिके निमित्त नमस्कार है ॥ २॥ आप् सव ठोकके नाथ पिता माता ओर ईश्वर हो, शभु हस्त शंकर ओर दयाढु ©
हो ॥ ३ ॥ आप्षब जगतके विधाता हमारी रक्षा कीजिये हे महेश्वर ! आपके विना दुःख नाश करनेमे कोड भी समथ नहीं है ॥ ४॥ ब्रह्माजी १
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| इत भरकारपे देवताओंके वचन सुनकर नन्दिकेश्वर प्रम छपाते युक्तं होकर शिवजीपे विज्ञि करने र्ग् ॥ ५ ॥ नन्दिकेश्वर बोठे हे भगवन्
ट शकर ! विष्णुम्े आदि ठेकर सब देवता युनि सिद्ध आपके देखनेके निमित्त आये ह, हे सुरवय ! देत्योँमे व्याकर हो उनसे ताडित ओर
तिरस्कत होकर आपकी शरणमे सब आये हँ ॥ ६ ॥ हे सवश ! इस कारण आपको खनि देवताओंकी रक्षा करनी चाहिये हे दीनबन्धु !
ए विशेषकर आप भक्तवत्सल कहाते है ॥ ७ ॥ ब्रप्राजी बोटे जब इस प्रकार नदीने दयावले शिवजीसे प्राथना की तव ध्यानसे शनेः
|| नागकर शिवजीने नेत्र खोढे ॥ < ॥ उस समय परम कोविद् शकर शनेः शनेः उपरामको प्राप्त हो वह परमात्मा समाधी जागृकर सब
||| ॥ नैदिकेश्वर उवाच ॥ विष्ण्वादयस्सुरगणा सुनिसिद्धसंवास्त्वां द्रष्टुमेव सुरव्यं॑विशेषयंति ॥ कार्याधिनोऽपरवरैः परि
|| भत्स्यं मानास्सम्यक् पराभवपदं परमं प्रपन्नाः ॥ ६ ॥ तस्मात््वया हि सवश आतभ्या सुनयस्सुराः ॥ दीनबधुर्विंशेषेण त्वशक्तो
ठै भक्तवत्सलः ॥७॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं द्यावता शंुरवज्ञपो नंदिना भशम् ॥ शनेश्शनेरूपरमद्धयानाइन्मीस्य चाक्षिणी ॥८॥
| ईशोऽथोप रतरश्शंधुस्तदा परमकंविदः ॥ समाधेः परमात्मासौ सुरान्सर्वादवाच् इ ॥ ९ ॥ श्युक्ूवाच ॥ कस्माच
समायाता मत्समीपं सुरेश्वरः ॥ दरित्रश्माद्यस्सवे ब्रूत कारणमाश्च तत् ॥ १० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति शत्व वचश्शम्भोस्सरव देवा
ठ मुदाऽन्विताः ॥ विष्णो विलोकयामासुसखं विज्ञपिदेतवे ॥११॥ अथ विष्णुर्महाभक्तो देवानां हितकारकः ॥ सदीरितश्चुवाचेदं
सरका्य मदत्तरम् ॥ १२ ॥ तारकेण कृतं शंभो देवानां परमाद्धतम् ॥ कष्टात्कष्ठतरं देवा विक्ञप्तुं सव आगताः ॥ १३ ॥ ह शंभो
४ तव पुतरेणौरसेन हि भविष्यति ॥ निहतस्तारको दत्योनान्यथा मम भाषितम् ॥ १७ ॥
देवताओं बोठे ॥ ^ ॥ शकर बोडे हे देवताओ ! तुम हमरे समीप क्यों आये हो हरि ब्रह्मादि तुभ सम॒ अपने आनेका कारण हमसे
ह|| कहो ॥ १० ॥ ब्रहाजी बोठे शिवृजीके यह वचन सुन व देवता डे पन्न हए ओर विजञभिके निमित भगवान् विष्यका सुख देखने
ट| खगे ॥ ११ ॥ सव ॒देवताओक हितकारी विष्यजी इस देवताओोके महतकारथके ववि शंकरप मोठे ॥ १२ ॥ है शकर ! तारक असुरे
ह देवता
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देवताओंको महान् कष्ट आकर पराप्त हुआ है इस कारण सब देवता आपसे विज्ञपि करने आये ह ॥ १३ ॥ हे भगवनु ! जब कोई आपके
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ऊपर कपा करो आपको प्रणाम है हे स्वामिन् ! तारकासुरसे महाकष्ट भ्रा हुआ
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ओर एन होगा उतसेही तारक दैत्य मारा जायगा यह मेरा कथन अन्यथा नहीं है ॥ १४ ॥ हे महादेव ! इत भकारसे विचारक त
है उससे उद्धार कीजिये ॥ १५ ॥ हे शंकर | इस क
देना चाहते है, आप उसको स्वीकार
दक्षिण हाथते आपको गिरिजाका पाणिग्रहण करना चाहिये उस महाभाग्याको गिरिराज जापको ५ ति
करं ॥ १६ ॥ विम्के यह वचन सुनकर शिषजी भसन होकर ओर योगम तर सव देवतार्ओंको समीचीन व्यवहारो ग
दिखाते हृए यह वचन बोखे ॥ १७॥ शिवजी बोटे जिस समय सवं सुन्दरी गिरिजा देवी ख्॒ञसे स्वरत होगी? उस समय सव सुरेन्द्र ऋषि
विचा््येत्थं महादेव कृपां रू नमोऽस्तु ते ॥ देवान्सशुद्धर स्वामिन् कष्टात्तारकनिरमितात् ॥ १५ ॥ तस्माच्वया गिरिजा
देव शंभो अहीतभ्या पाणिना दक्षिणेन ॥ पाणिब्हेणेव महालुभावां दत्तां गिरीद्रेण च तां इर्ष्व ॥ 9६ ॥ विष्णोस्तद्वचनं
धुत्वा प्रसन्नो ह्य्रवीच्छिवः ॥ दशयन् सद्रति तेषां सर्वेषां योगतत्परः ॥ १७ ॥ शिव उवाच ॥ यदा भ स्वीकृता देवी
गिरिजा सर्वसंदरी ॥ तदा सवे सुरेदाश्च शुनयो ऋषयस्तदा ॥ १८॥ सकामाश्च भविष्यतिनक्षमाश्च परे पथि ॥ जीवयिष्यति
र्गा सा पराणिग्रहणतस्स्मरम् ॥ १९ ॥ मदनो हि मया दग्धस्स्षां काय्यसिदधये ॥ ब्रह्मणो वचनाद्ष्णो ना कार
विचारणा ॥ २० ॥ एवं विमृश्य मनसा कार्याकार्यग्यवस्थितौ ॥ सधीः ध सर्वश्च देवद्र हठं नो कतमहंसि ॥ २१ ॥ दग्धे
कामे मया विष्णो सुरकार्यं महत् कृतम् ॥ सवं तिष्ठतु निष्कामा मया सह सुनिथितस् ॥ २२ ॥ ।
ओर खनि ॥ १८ ॥ सबं सकाम होजर्थेगे, ओर परममागेमे समथ न होगे, भौर पाणिग्रहण होनेसे दुर्गां मृतकं हए कामदेवको किर
जीवित कंरावेगी ॥ १९ ॥ सबकी कारय॑सिद्धिके निमित्त मेने कामदेवको दग्ध किया, यह ब्रह्ाकही वचनत हे विष्ण ! किया गया है, ||
इसमे सन्देह नहीं ॥ २० ॥ इस भरकार काये अकायेकी उ्यवर्था मनसे विचारकर सब देवताओके साथ हे बुदधिवाठे ! देवेन आप हठ न
करं ॥ २१ ॥ हे पिष्णो ! कामके दग्ध होने प्र मैने देवताओं का महत् कायं किया है, भेरे सहित निश्वय स्व देवता कामनारहित हो स्थित
हों ॥२२॥ हे देवताओं ! जिस भ्रकोरसे मेँ तपस्या करता हं, इ प्रकारसे तुम स्र दुष्कर तपस्या करो ॥२३॥ हे देवताओं ! तुम समाधि
| उत कामके विना परमानन्द्पूवक वि्नरहित हो तपस्या करो ॥ २४ ॥ हे विधाता । है रिष्णजी महेन सुनि ओर् देवता यदि तुमने काम
¢ देवकी पुरातन बात मृ दी हो तो सब उप्ती पुरातन बातको विचारो ॥ २५1॥ हे देवताओ ! उस्न महाधनुधर कामदेवने महन्द्र सुनि ओर
देवताओंकी जो दशा की है आप सब उसको विचारं उसने प्रथम स॒वहीका ध्यान नष्ट कर दिया है ॥ २६ ॥ कामही नरकंका ् ¢
¢ है इसीसे क्रोध उत्पन्न होता है, कोधे मोह ओर मोहे स्मृतिमे श्रम ओौर भ्रमसे तपस्या नष्ट हो जाती है ॥ २७ ॥ है देवताओ ! आप्
यथाऽहं च सुरास्सवं तथा यूयमयत्नतः ॥ तपः प्रमसंयुक्ताः करिष्यध्वं सुदुष्करम् ॥. २३॥ यूथं समाधिना तेन मदनेन
ट| विना सुराः ॥ प्रमानदसंयुक्ता नितिकारा भवंतु वे ॥ २४ ॥ पुरावृत्तं समरतं विस्मृतं यद् विधे हरे ॥ महेन्द्र नयो देवा
ठ यत्त विमृश्यताम् ॥ २५ ॥ महाधवुधरेणेव मदनेन हटात्सुराः ॥ सर्वषां .ध्यानवि््वंसः कृतस्तेन पुराएुरा ॥ २६ ॥
| कामो हि नरकायेव तस्मात् करोधोभिजायते ॥ कोधाद्गवति संमोहो मोहाच्च भंशते तपः ॥ २७ ॥ कामकोधौ परित्याज्यौ
ह| मवद्धिस्सुरसत्तमेः ॥ सर्वैरेव च मंतव्यं मद्वाक्यं नान्यथा कचित् ॥ २८ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं विश्राव्य भगवान् महादेवो
वृषध्वजः ॥ सुरान् परवाचयामास विधिविष्णूतथा सुनीम् ॥ २९ ॥ तूष्णीभूतोऽभवच्छंयुर््यानमाित्य वै पुनः ॥ आस्ते पुरा
ह| -यथा स्थाणुगणेश्चपरिवारितः ॥ ३० ॥ स्वात्मानमात्मना शंयुरात्मन्येव व्यचितयत् ॥ निरंजनं निराभासं निविकारं
निरामयम् ॥ ३१ ॥ पराप्परतरं नित्य निममं निरवग्रहम् ॥ शब्दातीतं निशंणं च ज्ञानगम्यं परात्परम् ॥ ३२ ॥
¢ काम ओर कोधका त्याग कर देवे, ओर तुम सवको भेर वचन मानने चाहिये, इसमे अन्यथा नहीं है ॥ २८ ॥ बह्याजी बोे महादेव वृषभ
ध्वज सबको इस भरकारते प्ुनाकर विधाता विष्ण सुनि भौर सव देवताओं उत्तर॒सुननेकी इच्छा करने ठे ॥ २९ ॥ जत्र शिवजी ध्यान
ह|| स्गाकर फिर मौन हृए ओर गणेति परिवारित हो स्थाके समान अचछ हुए ॥ ३० ॥ ओर आत्मासेही अपनी आत्माका ध्यान के
{ ठ्गे जो निरंजन निराभास निर्विकार निरामय है ॥ ३१ ॥ पेते अत्य॑त प्रे निरपस्वरूप भमतारहित निरग्रह शब्दे परे निर्ण ज्ञानगम्य
ओर प्रेस परे है ॥ ३२ ॥ इतत प्रम रवरूपको चिन्तन करते हुए परम ध्यानम स्थित हए ओौर अनेक प्रकार जगत्की घाट करनेवाठे
परमानन्द म हो गये ॥ ३३ ॥ सव देवता शंकरको ध्यानम स्थित देखकर तव इन्द्र ओर दिष्जी नन्दिकि्वरमे बौठे ॥ २४ ॥ व
बोरे अव हम कया कहे शकरजी तो रक्त हो ध्यानम मग्र हो रहे है ओर आप शिवके परमस्तला सवज्ञ प्रमपवित्र सेवकं ह ॥ २.५॥ €
गणाधिप ! किंञ्च उपायत शिवजी भसन्न हो सकते है वह उपाय आप किये, हम. सब आपकी शरण ह ॥ ३६ ॥ हं खने,
जव देवताओंने भसन्नतासे इस भकार स्तुति कौ तव॒ शिवकरे भिय नन्दीने इस भकार सव देवताओंतसे कहा ॥ २७ ॥ नन्दीश्वरत कहा, ह
एवं स्वप परमं चितयन् ध्यानमास्थितः ॥ परमानेदसंमग्नो बभूव बहुसूतिकृत् ॥. ३३ ॥ ध्यानस्थितं च सर्वेशं दक्वा सव
दिवौकसः ॥ हरिशकादयस्सवें नदिनं भ्ोञरानताः ॥ ३७ ॥ ॥ देवा उचुः ॥ किं वयं करवामाद्य विरक्तो ध्यानमास्थितः ॥
शंथुस्तवं शंकरसखस्सरवजञः श॒चिसेवकः ॥ ३५ ॥ केनोपायेन गिरिशःश्रसन्नःस्थाद्रणाधिप॥ तदुपायं समाचक्ष्व वयं त्वच्छरणां
गताः ॥ ॥३६॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति विज्ञापितो देवने दर्षादिभिस्तदा ॥ प्रत्युवाच सुरास्तान्स नंदी शंयुप्रियो गणः ॥३७॥
नेदीश्वर उवाच ॥ हे हरे हे विधे शकनिर्जरायुनयस्तथा ॥ शृणुध्वं वचनं मेदि शिवसुंतोषकारकम्॥३८॥ यदि बो इठ एवाद्य
शिवदारपसियिहे ॥ अतिदीनतया सवे वति रूतादरात् ॥ ३९ ॥ भक्तवश्यो महादेवो न साधारणतस्सराः ॥ अकार्यमपि
सद्धत्तया करोति परमेश्वरः ॥७०॥ एवं कुत सव हि विधिविष्णुशुखाः सुराः ॥ यथागतेन मागेणान्यथा गच्छत मा चिरम्
॥ ४१ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकरण्यं वचस्तस्य घुने विष्ण्वादयस्मुराः ॥ तथेति मत्वा सुप्रीत्या शंकरं तष्ट्डुदिं ते ॥ ४२ ॥
विष्णजी ! हे बह्लाजी ! हे इन्द्रादि देदताओ ! हे खनियो ! शिवजीको सेतोष करनेवाछा मेरा वचन सुनो ॥ ३८ ॥ यदि शिवे दार
। करने तुमको बडाही हठ है तो सव दीनतासे शंकरकी स्तुति करो ॥ ३९ ॥ टे देवताओ ! शिवजी भक्तिके वशीभूत होते ह 9
साधारण रूपसे नहीं, वह॒ प्रमेश्वर भक्तिके वश होकर अकायेको भी कर सकते हँ ॥ ४० ॥ इस भकारसे नहा विष्ण भादि सव
देवता करं नहीं तो आप शीघ्र जहासि आये है वही पधार ॥ ४१॥ बह्लाजी बोटे विष्ण आदिं इसन भकारस उनके वचन सुन बहत अच्छा एसा
शि०पु°
॥२४०॥
रुप. २
पा.खं.३
अ०२४
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ण न्यनननव---य
३
| शकरकी स्मृति करने ठे ॥ ४२ ॥ हे देवदेव ! महादेव हे करुणासागर ! हे प्रभो ! महाङ्केशमे हमारा उद्धार करो शरण आये ह
हुओंकी रक्षा करो ॥ ४३ ॥ बह्ाजी बोरे इस प्रकार बडी दीनतासे देवताओनि शंकरकी स्तुति की ओर प्रेमे व्याकुठ मनसे सब रोने रुगे है
॥ ४९ ॥ मने ओर हरिने बड़ी दीनतासे विज्ञति की ओर परम भक्तिसे मन ठ्गाकर शकरको स्मरण किया ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बो टै
जव इस भकारे भने हरिने ओौर सव देवताओंने मनसे शंकरका स्मरण किया तो भक्तवत्सकताके कारण शिवजी ध्यानते उपरामको भाप हुए
॥ ४६ ॥ ओर शिवजी प्रसन्न होकर विष्ण आदिक प्रसन्न करते हुए बोटे ओर भक्तवत्सङ शकरने सबको करुणा दृष्टिसे देखा ॥ ४७ ॥ ट
देवदेव महादेव करूणासाग्र प्रभो ॥ समुद्धर महाषेशाव्रारि नश्शरणागतान्॥४३॥ब्रघ्नोवा च ॥ इत्येवं बहुदीनोक्त्या तुष्ट्बुश्शं
करं सुराः॥ररुदुस्सुस्वरं सवे प्रेमव्याकुलमानसः ॥७४॥ दरि्मयासदीनोक्स्या उविज्ञपतं चकार इ ॥ संस्मरन्मनसा शं भक्त्या
परमयान्वितः ॥४५॥ ब्रह्मोवाच ॥ सुरैरेवं स्त॒तश्शंयुर्हरिणा च मया भृशम्॥ मक्तवात्सल्यतो ध्यानाद्विरतोभन्महेश्वरः ॥४६॥ ||
उवाच सुप्रसत्रात्मा हयादीन्दरषयन्दरः ॥ विलोक्य करूणादष्टया शंकरो भक्तवत्सलः॥४७॥ शंकर उवाच ॥ हेरे है विधे देवा |&
श्शक्राद्या युगपत्समे॥ किमर्थमागता यूयं सत्यं ब्रूत ममाग्रतः ॥४८॥ दरिश्वाच ॥ सर्वज्ञस्त्वं महेशान त्वंतर्याम्यखिलेश्वरः ॥ ट
किन जानासि चित्तस्थ तथा वच्म्यपि शासनात् ॥४९॥ तारकासुरतो दःखं संभूतं विविधं मृड ॥ सर्वेषां नस्तदथं हि भरसन्नोऽ ह
कारि वे सरैः ॥ ५० ॥ शिवा सा जनिता शैलच्छदर्थं दि दिमाख्यात्॥ तस्यात्वद्द्धवात्पुवात्तस्य मृत्यन चान्यथा ॥५१॥ त
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शिवजी बोठे हे हरे ! हे विधाता !. हे इन्ादि देवताभो ! तुम सब कटो सत्य कहो कित निभि तुम्हारा आगमन है ॥ ४८ ॥ हरि बोरे
हे महेशान 1 आप सवज्ञ सवके अन्तरकी बात जाननेवाछे अखिेशवर है तो क्या आप हमारे मनकी नहीं जानते एतो भी आपके शासनते ||५
कहता हूं ॥ ४९ ॥ हे शिव ! तारकासुरसे हमको बडा दुःख पराप्त हआ है, इम कारण सव देवता आपको प्रसन्न करनेकं निमित्त आये है
॥ ५० ॥ बह पार्वती हिमाङ्पके यहां आपहीकै निमित्त उलन्न हुईं है उप्त तारक अश्री पारवती उतपन्न हृए एते ही मृत्य है इसमे | $
अन्यथा नहीं है ॥ ५१ ॥ ४ ॐ र
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इत भकारका ब्रहाजीने उस दैत्यको वर दिया ३, इते ओरे लु न होनेके करण यह सब जगत् को बाधा देता है ॥ ५२॥ नारद्जीकै
उपदेशे पार्षती कठिन तपस्या कररही ह उनके तेजसे तरिटोकी चराचर सव॒ व्याप्त होगये ई ॥ ५३ ॥ हे पसेश्वर ! आप पा
पर देनेके निभित्त वहां गमन करं हे स्वामिन् ! आप देवताओं दुःख दूरकर हमको भन्न कीजिये ॥ ५४ ॥ हे शकर | देवतांके ओर
हमारे मनम यह उत्साह है, कि आपका विवाह देस सो उचित हो तो आप इते स्वीकार करे ॥५५॥हे परात्पर ! जो आपने रतिकौ वर दिया है उसका ॥
इति दत्तो ब्रह्मणा हिस दैत्याय युद्ररः॥ तदन्यस्मादृतयस्स बाधते निखिलं जगत् ॥५२॥ नारद्स्य निदशात्सा करोति
किनं तपः ॥ तत्तेनसालिं व्यातं बैलोक्यं सचराचरम्॥ ५३ ॥ वरं दातु शिवाये हिं गच्छ त्वं परमेश्वर ॥ देवदुःखं जदि
स्वामिन्स्माकं सुखमावह ॥ ५४ ॥ देवानां मे महोत्साहो हदये चास्ति शंकर ॥ विवाहं तव संद्रष्टुं तत्वं $ङ यथोचितम्
॥ ५९ ॥ रत्ये यद्भवता दत्तो वरस्तस्य परात्पर ॥ प्राप्तोऽवसर एवा सफटं स्वपणं ङर्॥ 48 ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तवा तं
भरणम्यैव विष्णुदवा महृषयः॥ संस्तूय विविधेस्तेेस्स॑तस्थुस्ततपरोऽखिटाः ॥५७॥ भक्ताधीनः शंकरोऽपि त्वा देववचस्तदा ॥
विहस्य भरत्य॒वाचाश् वेदमंर्यादरक्षकः ॥ «८ ॥ ॥ शंकर उवाच ॥ हे हरे हे विषे देवाश्शृणतादरतोऽखिकाः ॥ यथोचित
वच्मि सविशेषं विवेकतः ॥ ५९ ॥ नोचितं हि विधानं वै विवाहकरणं नृणाम् ॥ महानिगडसन्ञो हि विवाहो दटबन्धनः
॥ &° ॥ कुसंगा बहवो रोके ष्वीसंगस्तत्रचाधिकः ॥ उद्धरेत्सकल्बधनं श्चीसंगात्प्रघुच्यते ॥ ६83 ॥
भी अवसर आ पहुंचा है सो उते आप सफल्करं ॥ ५६ ॥ बह्लाजी बोठे इस भफारते विष्ण ओर महिं तथा दूरे देवता कहकर ओर भणामकर अनेक
स्तोत्रे स्तुतिकर सव शकरके आगे स्थित हूए ॥५७॥ भक्ताधीन शंकरभी देवता ओंकै वचन सुनकर वह वैदकी भयदा पाठन् करने वाछे हसते हुए
तत्काल बोठे ॥५८'' शिवजी बोठे हे हरे ! हे विधाता ! हे सब देवताओ ! हमारे वचन सुनो भँ ज्ञाने यथोदित विशेषतापुव॑क कहता हं ॥५९॥
जहा तकं बने मलुष्योंतकको विवाह बंधन उचित नहीं है यह दृढबंधन विवाह महानिगठबंधन है ॥६०॥ ठोगोको ससारमे बहुतसे कुर्ग ह उनमें च्ी्ंग
१ पुस्त्वमाषम् वेदं सोम्नोऽभिरक्षक इति बा पाठः 1
शि०षु°
॥२४१॥
|
रुस.२
पाख.
अ०२४
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मृहा हानिकारक है, सब बंधनोतति उद्धार हो सकता है, परन्तु च्ीबंधनसे छुटकारा नहीं होता ॥ ६१ ॥ रोहिकी तथा दारूमय पाशके
वेधा हु भी परुष छुटकारा पा सकता है परन्तु ्ञीसंगके पाशे बंधा हआ कमी द्ुटकारा नहीं पासषकता ॥ ६२ ॥ इससे महा्धनके करने
| विषय निरन्तर बढते ह जब मनये विषय बढगये तो स्वप्नमे भी मोक्ष दुम है ॥ ६३ ॥ यदि बुद्धिमान् सुख चाहे तो मिथिपुवक विषयों
को त्याग दे यह बिषय् बिषकेही समान है, जिन विषयों यह भ्ाणी मारा जाता है ॥ ६४ ॥ परुष विषयी परुषोके संग वार्तामात्रसेही क्षणमे
पतित हो जाता है, ओर् हे इन्द्र ! आचार्याने विषयको मिश्रे चुपरी हृदं वारुणी कहा है ॥ ६५ ॥ यथपि भँ इस बातको जानता हं विशे
| लोददारमयैः पटं बदधोऽपि शुच्यते ॥ ख्यादिपाशससंबद्धो सुच्यते न कदाचन ॥ ६२ ॥ वर्धते विषयाश्शश्वन्महावंधन
| कारिणः ॥ निषयाकांतमनसस्स्वषने मोक्षोऽपि दुरंभः ॥ ६२ ॥ सुसमिच्छतुचेत्याज्ञो विधिवद्विपरथोसत्यजेत् ॥ विषषद्िषया
|| नाइविंषयेधीनदन्यते ॥ ६९ ॥ जनो विषयिणा साकं वार्तातः पतति क्षणात् ॥ विषयं प्राहुराचार्यास्सितालितेदरवारूणीम्
॥ &< ॥ यद्यप्येव् हि.जानामि सवे ज्ञानं विशेषतः ॥ तथाप्यं करिष्यामि प्रार्थनां सफलां च वः ॥६६॥ भक्ताधीनोऽहमे
वास्मि तद्रशात्स्वेकायं कृत् ॥ अयथोचितकतां हि प्रसिद्धो थुवनव्रये ॥ ६७ ॥ कामषूपाधिपस्थैव पणश्च सफलः कृतः ॥
ठ सुदक्षिणस्य भूपस्य भेमबंधगतस्य दि ॥ ६८ ॥ गौतमङ्केशकतादिं अयबकात्मा सखावहः ॥ तत्कष्टप्रदद्ष्टानां शापदायी
विशेषतः ॥ ६९ ॥ विषं पीतं सुरार्थ हि भक्तवत्सलभावधृक्छ ॥ देवकष्ट हतं यत्नात्सर्वदेव मया सुराः ॥ ७० ॥
पक्र सु्ञे सव ज्ञान है, तो भी भे तुम्हारी प्राथनाको सफठ करंगा ॥ ६९ ॥ म भक्तोके अधीन होकर उनकी भार्धनाते सव काथ करता हं
ओर तीनों भुवनो बडे समर्थेति न होसे एेसा.जो अशक्य अनुचित ह उ्तका भी करनेवाला "अदुचितकर्ता' नामे भै भरि हू ॥ ६७ ॥
कामरूपदेशके राजाकी भिज्ञ भने सफल की, भेम बंधने परा हए सुदक्षिण राजाका प्रण पूरा कर् दिया ॥६८॥ गौतमको ने हेश दिषा,
मे -यम्बकात्मा सुखका भातत करनेवाला हूः जो भक्तौको दुःख दते हं उन दु्टोको वैँ विशेषकर कष्ट ओर शाप देता हं ॥ ६९ ॥ भक्तवत्सरभाव
दिखाते हए देवताओं निमित्ती भने विष पान किया था. हे देवताओं ! तुम्हारा कृष तो मैने सदाही यत्ने दूर किया है ॥ ७० ॥
१०८
४
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भक्तोके निमित्त मेने बहुतवार उढाये है ओर गृहपति होकर विश्वानर मुनिके दुःख दूर किये ५ ७१ ॥ ह हार ह नि
बहुत कहनेसे क्या है पै व च 6 तुम ष सत्व से जानो ॥ ७२ ॥ जव कभी किती भकार भक्तको विपति होती है
उती २ समयमे उत्को सव भ्रकारसे दूर करता हं ॥७३॥ तारके जो तृम सबको दुःख उपस्थित हआ है बहू म सव जानता हूं, वह दुःख भ
हरण करगा यह सत्य है इसमे कुछ सन्देह नहीं ॥ ७४ ॥ ययपि सक्च विहार करनेकौ कुछ भी ५ नही ह, तथापि एनोपादनके निमित
गिरिजाको विवाहंगा ॥ ७५ ॥ हे सतव देवताओ ! अव तुम निर्भय होकर अपने षरोको जाओ, मे तुम्हारा कायं िद्ध करगा, इसर्म विशेष
भक्तर्थमसहं कष्टं बहुशो बहुयत्नतः ॥ विश्वानर सुनेदुःखं तं गृहपतिभेवन् ॥७१॥ किं बहूक्तेन च दरे विधे सत्यं तरषीम्यदम् ॥
मत्पणोऽस्तीति यूयं वसवे जानीथ तत्वतः ॥७२॥ यदा यद्] विपत्तिं भक्तानां भवति क्वचित् ॥ तदातदा दरभ्याञ्चु तत्क्षणा
त्सर्वशस्सदा ॥ ७३ ॥ जानेऽहं तारकाइःखं सर्वेषां वस्ससत्थितम् ॥ असुरात्तद्धरिष्यामि सत्यंसत्यं वदाम्यहम् ॥७४॥ नास्ति
यद्युपि मेकाचिद्धिहारकरणे रुचिः ॥ विवाहयिष्ये गिरिजा पुोत्पाद्नहेतवे ॥७८॥ गच्छत स्वगृहाण्येव निर्भयास्सकलाःसुराः॥
कार्य वस्साधयिष्यामि नात्र कार्यां विचारणा॥७६॥॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तवा मौनमास्थाय समीधिस्थोऽभवद्धर्ः ॥ सवे विष्णव्
दयो देवास्स्वधामानि ययुर्युने॥७७॥इतिश्रीशिवमहापुराणे द्वितीया्याश्रसंहितायां तृतीये पावतीखंण्ड पार्वतीविवाहस्वीकारो
नाम चतुर्विशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ ॥नारद् उवाच॥ गतेषु तेषु देवेषु विधिविषण्वादिकेु च ॥ सवेषु सुनिषु प्रीत्या किं बभुव
ततः परम् ॥ १ ॥ कि कृतं शुना तातवरं दातुं समागतः ॥ कियत्कालेन ॥ च कथं तद्वद् प्रीतिमावहन् ॥ २ ॥
विचारकौ आवश्यकता नहीं है ॥ ७६ ॥ रेता कहकर शिवजी मौन हो स्षमाधिमे स्थित हूए, हे सने ! स्रव विष्ण आदि देवता अपने $ |
थानोंको गये ॥ ७७ ॥ इति भ्रीरिवमहाएराणभाषारीकायां सरसंहितान्तर्गततृतीयपारव॑तीखण्डे चतुर्विशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ नारदजी बोरे जव |£
विधाता ओर विष्ण आदि सब देवता चे गये तथा भ्रमसे सब खनियोने गमन किया तब क्या हुआ ॥ १॥ हे तात ! शिवजीने क्या
किया कैसे बर देनेको आये कितने समयपर कैसा वर दिया, सो आप म्मे कहिये ॥ २ ॥
शि०पु°
॥२४२॥
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पा.खं.३
०२५
नव्य
नव्य
बह्माजी बटे जब ब्रह्मादि देवता अपने आश्रमम गये, तव पावंतीकी तपस्याकी परीक्षाके निभित्त शिवजी समाधिमे स्थित हए ॥२॥ अपनी ||
आत्मासेही आत्माको विचारने कगे, जो त्व प्रेमे परे मायारहित स्वतंत्र निरवग्रह है ॥ ४ ॥ वस्तुतः भगवानु इश्वर वृषभध्वज विज्ञातगति
ट जगतूकै उत्पादकं परमेश्वर विचारने लगे ॥ ५॥ ब्रह्लाजी बौठे हे तात ! उस्र समय पादंतीने भी परम तपस्या आरंभ की उस तपते शकर भी
प्रम विस्मयको प्रात हुए ॥६॥ ओर बात नहीं भक्ताप्रीन होनेसेही शंकरकी समाधि चछायमान हदं ओर जगत्कती हरने वशिष्ठादि सप्त खनि
पोका स्मरण किया ॥७॥ वे सातो ऋषि स्मरण करतेही वहां आकर प्राप्त हुए, ओर सत्र प्रसन्न सखे विभेकी बहुत ` बडाई करते हुए आये
॥ ब्रह्मोवाच ॥ गतेषु तेषु देवेषु ब्रह्मादिषु निजाश्रमम् ॥ तत्तपस्सुपरीक्षाभर समापिस्थोऽभवद्गवः ॥ ३ ॥ स्वात्मानमात्मना
कृत्वा स्वात्मन्येव व्यचितयत् ॥ परात्परतरं स्वस्थ निमाय निरवग्रहम् ॥९॥ तद्रस्तुभूतो भगवानीश्वरो वृषभध्वजः॥अविज्ञा
तगतिर्सूतिस्स हरः परमेश्वरः ॥५॥ ब्रह्मोवाच ॥ गिरिजा हि तदा तात तताप परमे तपः॥ तपसा तेन श्दरोऽपि परं विस्मय
मागतः ॥8॥ समाधेश्रक्ितस्सोऽभद्रकताधीनोऽपि नान्यथा ॥ वसिष्ठादीन्मुनीन्सतत सस्मारसूतिकृदधरः ॥७॥सप्तापि घुनयश्शी
्रमाययु्स्मृति माजतः ॥ प्रसन्नवदना सत वर्णतो विपि बहु ॥<॥प्रणम्य तं महेशानं तुषबुहषनिर्भरः ॥ वाण्या गद्रदया
बद्धकरां विनतकेधराः ॥९॥ ॥ सप्तषय उचुः ॥ देवदेव महादेव करूणासागर प्रभो ॥ जाता वर्यं धन्या हि त्वया यदधुना स्थर
ताः ॥ १० ॥ किमथ सुस्मृता वाथ शासनं देहि तद्धि नः॥ स्वदाससदशीस्वामिन्छृषां कङ् नमोऽस्तु ते ॥ ११॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं नीनां तु विज्ञप्ति करूणानिधिः ॥ प्रोवाच विहसन्प्रीत्या प्रोत्छुलनयनाम्बुञः ॥ १२ ॥
॥८॥ ओर प्रसन्न तासे महे्वरको प्रणाम कर स्तुति करने लगे, वाणी गद्गद हो हाथ जोडा शिर सुका किया ॥९॥ सपं गोठे हे देवदेव !
महादेव करुणासागर हे प्रभो हम बडे धन्य है, जो आज आपने हमको स्मरण किया ॥१०॥ हे नाथ ! हमको किंस निभित् स्मरण किया
है, सो आज्ञा दीजिये हे स्वामिन् ! अपने दासक सदश कपा कीजिये आपको भणाम है।॥११॥करुगानिभि सुनि्योकी इस प्रकारते विज्ञमिको
सुनकर रक्फृट् नेत्रे प्रीति दिखाते हए हंस्कर शिवजी बोठे ॥ १२ ॥ ।
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हमारे हित करमेवाछे हो ॥ १२ ॥ गौरीशिखर नार
शंकरजी बोटे हे सप्त खुनियो ! हे तात ! तुम मेरे वचन सुनो, सव ज्ञानम चतुर ठम १
पवतमे देवेशी प ५५॥ ध मनसे वा कर रही है ॥१४॥ हे कषियो ! सखियोपि सेवित हृद वह स॒श्चे पति बनानेकी इच्छा करती
है सब कामको छोडकर स॒ञमेही वह परम निश्वय कयि है ॥ १५ ॥ हे खनिभरष् । मरे शासनसे तुम वहां जाओ, ओौर प्रम चित्सं उसकी
हढताकी परीक्षा छो ॥ १६ ॥ सर्वथा छठ वा वंचनाके वचन बोकर परीक्षा ठेनी, हे सुव्रतो ! शासनसे संशय न करना ॥ १७ ॥ ब्रह्माजी
॥ महेन्वर उवाच ॥ हे सपतयुनयस्ताताश्छणतारं वचो मम॥अस्मद्धितकरा यूयं सर्वजञानविचक्षणाः ॥१२॥ तपश्वरति देवेशी
पार्वती गिरिजाऽ्वना ॥ गौरीशिखरसंज्ञे रि पावते हटमानसा ॥ १४ ॥ मां पति प्राप्तुकामा हि सा सखीसेविता द्विजाः ॥
सर्वान्कामा निविहायान्यान्परं निश्चयमागता ॥ १९ ॥ ततर गच्छत यूथ मच्छास्नान्सुनिसत्तमाः ॥ परीक्षां दृटताय स्तत्ुरत
्रेमचेतसः॥१६॥ सर्वथा छलसंयुक्त वचनीयं वचश्च वः ॥ न संशयः प्रकरतन्यश्शासनान्मम सुव्रताः ॥१७॥ ब्रह्मोवाच ॥
इत्याज्ञप्ाशच भनयो जग्बुस्तच दरुतं दि ते ॥यत्र राजति सा दीप्ता जगन्माता नगात्मजा॥१८॥तच दृष्ठ शिवा साक्षात्तपःसि
द्विरिवापरा ॥ भूतां परमतेजस्का विलसती सुतेजसा ॥१९॥ इदा प्रणम्य तां ते तु षयत्सप्त सुत्रताः॥ सन्नता वचनं प्रोचुः
पूजिता विशेषतः ॥२०॥ ॥ ऋषय उचुः ॥ृणु शलसुते देवी किमर्थं तप्यते तपः ॥ इच्छसि त्वं सुरं कं च किं फलं तद्र
दाना ॥२१॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता सा शिवा देवी गिशींदतनया द्विजः ॥ प्रत्युवाच वचस्सत्यं सुगूढमपि तत्पुरः ॥ २२ ॥
बोठे इस भ्रकार मेरे वचनसे शीघही छनि वहां गये जहां वह जन्माता पर्वतराजत्री विराजमान थी ॥ १८ ॥ वहां जाकर उन्होने शिवाको
देखा किं मानो दूसरी तपकी सिद्धि है प्रम तेजोमयी मूर्िस्े मानो विराजमान होरही है ॥ १९॥ पै सुव्रत सातो ऋषि हदये
मगवतीको प्रणामकर पूजित हृए एकत्र हो वचन बोडे ॥ २० ॥ ऋषि बोठे हे शेरएत्री देवि ! हमारे वचन घुनी दुम कि
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शिण्पु°
॥२४३२॥
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पा.खं.३
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निभित्त तपस्या करती हो तुम किसी देवता या किसी फर्को चाहती हो, सो अव किये ॥ २१ ॥ ब्रह्लाजी बोले जब उन सप्त ऋषियों
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इस भकार पार्वती देवीपे कहा तव पावती. उनके आगे परम गूढ सत्य वचन बोटी ॥२२॥ पार्वती बोटी हे शुनियो! परमस तुम मेरे वचन् सुनो; मे
अपने विचायोको तुमसे कहती ह जो मेने अपने मनम विचार किया है ॥२३॥ तुम मेरे असभव वचनोको सुन कर मेरा परिहाप्त करोगे हे विभो
तँ कया करं इसकै वणेन करनेमे सन्ने संकोच होता है ॥ २४ ॥ यह भेरा मन दढतासे परवश होगया है यह जछोकै ऊपर महाङची भीत बनाना
चाहता है॥ २५ ॥ नारदजीकी आज्ञासे मेँ कठिन तपस्या कररही हू शकर मेरे पति होर्जोय मेरे मनम यही दढ मनोरथ है ॥ २६ ॥ बिना पंखोके
मेरा मनहूपी पक्षी हठसे आकाशम उडता है उस आशाको करूणानिधि स्वामी शेकरही पूणं करेगे ॥ २७ ॥ बज्नाजी बो इस भकार पावंतीके वचन
॥ पार्वत्युवाच ॥ भनीश्वरास्सेश्ृण॒त मद्धाकृयं प्रीतितो हदा ॥ ब्रवीमि स्वविचारं वै चितितो यो धिया स्वया॥२३॥ करिष्यथ
प्रहासं मे त्वा वाचो द्मसंभवाः ॥ संकोचो व्णनाद्धिभा भवत्येव करोमि किमू ॥२४॥ इदं मनो हि सदटमवशं परकर्मज्ृत् ॥
जलोपरि महामित्ति चिकीषति महोघ्नताम् ॥ २५ ॥ सुरषंश्शासनं पराप्य करोमि सुट तपः ॥ शद्रः पतिर्भवेन्मे हि विधायेति
मनोरथम् ॥ २६ ॥ अपक्षो मन्मनःपक्षी व्योम्नि उड्धीयतेदठात् ॥ तदाशां शंकरस्वामी पिपत कङ्णानिधिः ॥२७॥ ॥ ब्रह्मो `
वाच ॥ इत्याकृण्यं वचस्तस्या विहस्य नयश्च ते ॥ संमान्य गिरिजां प्रीत्या पोञुश्छल्वचो सृषा॥२८॥ ऋषय उचुः ॥ न
ज्ञातं तस्य चरितं वृथापण्डितमानिनः ॥ देवषैः कूरमनसः सज्ञा भरत्वाप्यगात्मजे ॥२९॥ नारदःकूटवादी च परचित्तपमंथकृः ॥
तस्य वात्ताश्रवणतो हानिर्भवति सर्वथा ॥३०॥ तत् त्वं णु सदूबुध्या चेतिहासं सुशोभितम् ॥ कमात्वां बोधयंतो हि परीत्या
तसुपधारय ॥ ३१ ॥ ब्रह्मपुत्रो हि यो दक्षस्सुषुवे पितुराज्ञया ॥ स्वपन्यामयुतं पुञानयुक्त तपसि भियान् ॥ ३२ ॥
एन वै सुनि हैसकर गिरिजाको सन्मान देते हए छसे बोले ॥ २८ ॥ ऋषि बोढे हे देवि ! वृथा पंडितमानी उन शंकरका चरित्रे तुम नही
जानती हे पावती ! तुमने बिचारवती होकर भौ करूर मनवाठे नारदजीका अभिपाय न जाना ॥२९॥ यहं नारदजी बडे कूटवादी दूरोका चित्त
मथन कृरनेवाठे ई उनकी वात् एनेसे सर्वथा मद्योकी हानि होतीहै ॥३०॥ सो त॒म भेदे इस सुन्दर इतिहा्फो सुनो हम तुमको कमते
समक्षाते ई परमते उप्तको मने धारण करो ॥ ३१ ॥ ब्रहमाजीकै त दक्षजीने पिताकी आज्ञासे दस सहश्च एर उतन्नकर उनको तप करने
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॥२४४॥
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नियुक्तं किया ॥३२॥ वे एत्र पथ्विम दिशा नारायण सरोवरमे तपके निमित्त गये,
कूट उपदेश सुनाकर विरक्तकर दिया जिससे बे छौट्कर फिर पिताकै घर
ओर सहश्च पुत्र उतपन्नकर उनको तपके निमित्त भेजा ॥ ३५॥ पिताकी आज्ञ
उनको वहीं वैराग्यका उपदेश दिया ॥ ३६ ॥ जब उनको उपदेश दिया तव वे
ते सुताः पञ्चिमादिशि नारायणसरो गताः ॥ तपोय ते प्रतिज्ञाय नारदस्तत्र वै ययौ ॥ ३३ ॥ कूटोपदेशमाश्राग्य तच
तात्नारदो सनिः ॥ तदाज्ञया च ते सवे पितुने एदमाययुः ॥ ३४ ॥ तच्छ्रत्वा पितो दक्षः पिराश्चासितमानसः ॥ उत्पाद्य
पुतान्प्रागुंक्त सहसप्रमितांस्ततः ॥ ३५ ॥ तेऽपि तत गताः पुजास्तपो् पितुराज्ञया॥ नारदोऽपि ययौ त्र पुनस्तत्स्वो पदे
शङ्खत् ॥ ३६ ॥ ददौ तदुपदेशं ते तेभ्यो भ्ातृपथं ययुः ॥ आययुनं पितुर्गेहं मिश्षुवृत्तिरताश्च ते ॥३७॥ इत्थ नारद सदवृत्ति
विंथ्॒ता शैलकन्यके ॥ अन्यां शृणु हि तद्वृत्ति वैराग्यकरणीं तरृणाम् ॥ ३८ ॥ विद्याधरश्चि्रकेतुर्यो बभूव पुराकरोत् ॥
स्वोपदेशमयं दत्वा तस्मै शुन्यं च तदहम् ॥ ३९ ॥ प्रहादाय स्वोपदेशान्दिरण्यकशिपोः परम् ॥ दत्त्वा दुखं ददौ चायं
परुद्धिममेदकः ॥ ४० ॥ पनिना निजविद्या यच्छाविता कर्णरोचना ॥ स॒स्वगेहं॑विदायाशु सिक्षां चरति प्रायशः
॥ ४१ ॥ नारदो मलिनात्मा हि सर्वदो ज्ज्वलदेहवान् ॥ जानीमस्तं विशेषेण व्यं तत्सहवासिनः ॥ ४२ ॥
फिर पिताके स्थानको न आये॥ ३७॥हे पार्वती! इ पकारे नारदजीकी सदत्तियै वियात है ओर भी उनका चरित्र मद्योको वैराग्यका करनेवाला
तुम सुनो ॥३८॥ चित्रकैतुनामक वियाधर जो पहे रहा उस्तको अपना उपदेश देकर नारदजीनि उक्तका घर शून्य कर दिया ॥२९॥ प्रह्लादक
उपदेश देकर हिरण्यकश्यपते उसे प्रम दुःख दिवाया बहुधा यह दूसरोकी बुद्धि्योमे भेद उठ्वा देते हँ ॥ ४ ° ॥ इस खनिने जिस्तको अपनी विया
सुनाई वही अपना धर छोडकर भिक्षावृ्नि करने खगा ॥ ४१ ॥ यह ॒नारदजी बडे मिनात्मा ह देखनेहीमं सदा उज्ज्वर देहषाटे
उती चमय वहां नारदजी पह ॥२३॥ नारदजीने इनको
न गये ॥३४॥ यह सुनकर दक्षजी बडे व्याकु हुए ओर कोधभी कंथा
से तपके निभित्त वे एत्र भी वहीं गये, नारदजीनेभी दहा जाकर
भी भ्राताओकि मारको पराप्त हुए, ओर भिक्षावरृ्तिकरकै रहे पर
ष
| | साफ़ नहीं है हम् उनको विशेषरूपे जानते ह ॥ ४२ ॥ जेते बगठेको देहे स्वच्छ ओर उसकी पहटेकी क्रियाको देखकर कभी ||
देखनेवाठे उसको साधु कहते है कि यह मच्छी नहीं खाता प्र वह सर्वथा मच्छी खाता है सहवासी ही सहवाि्योँका चरित्र जानता ह
॥ ४३ ॥ रेत बुद्धिमती होकर तुमभी उनका उपदेश मान गहं तुम वृधाही मूख होकर दुश्चर तपस्या करती हो ॥ ४५॥ हा बा!
& | जिसके निमित्त तुम रेसा तप करती हो, वह उदातीन निर्विकार कामदेवकं भस्म करने वाके है इसमे संदेह नहीं ॥ ४५ ॥ अमंगर वेषुधारण
(८ करनेवाठे निज अकुलीन वरसे रहित ॒कुवेषवाे भूत परेतादिका संग करने बाढे नर शरूखधारी शिव है ॥ ४६ ॥ नारदजीने धूतेताकर्
बकं साधुं व्यति न मत्स्या नत्तिसर्बथा ॥ सहवासी विजानीयाच्चशिं सहवासिनाम् ॥४३ ॥ रन्ध्वा तदडुपदेशं हि त्वमपि
प्राज्ञसमता ॥ वृथेव मूर्खीभरूता तु तपश्वरसि दुष्करम् ॥ ७४ ॥ यदुर्थमीदृशं बारे करोषि विपुलं तपः ॥ सदोदासी निविकारो
मदनारिनसंशयः ॥ ४९ ॥ अमगल्वपुर्घारी निरंनोऽसदनोऽङुटी ॥ दवेषी प्रेतभूतादिसंगी नथौ हि लभत ॥४६॥ स धूतं
स्तव विज्ञानं विनाश्य निजमायया ॥ मोहयामास सद्युत्तंया कारयामास वै तपः ॥ ४७ ॥ ईदृशं हि वरं छ्ध्वा कि सुखं
संभविष्यति॥ विचारं रुदेवेशि त्वमेष गिरिजात्मजे ॥ ४८ ॥ प्रथम दक्षजां साध्वी विवाह्य सखधिया सतीम् ॥ निवहं कृतवा
न्नैव मूढः किचिदहिनानि हि ॥ ४९॥ तां तथेव स वे दोषं दत्वात्याक्षीत्स्वयं प्रभुः ॥ ध्यायन्स्वषप मकलमशोकम॑रमत्युखी
॥ ५० ॥ एकलः परनिर्वांणोद्यसंगोऽद्रय एव च ॥ तेन नार्याः कथ देवि निर्वाहः संभविष्यति ॥ «3 ॥
अपनी मायासे तुम्हारा ज्ञान नष्ट करके सयुक्ति मोहित करकं तुमसे तपस्या कराई ॥ ५७ ॥ इस प्रकारक रको प्राप्त होकर तुमको ट्
कया एुख मिटेगा हे देवेशि ! तृमही इस विषयमे विचार करो ॥ ४८ ॥ पहठे मूढतासे इन्हे दक्षके यहां उतपन्न हु साध्वी सतीको विवाह
करके कुछ दिन भी उनने निवह नहीं किया ॥ ४९ ॥ ओर सतीकोही दोष रगाकर उन्होने व्याग कर दिया वह निरुपम इपका ध्यान
करते हृ अशोक हो रमण करते है ॥ ५० ॥ वह अद्वितीय परं निर्वोणस्वहप अंग ओर अदत ह, हे देवि ! उने सियोंका
१ परस्मंपदमा्धषम् । -------
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| ( निर्वाह किप भकार हो सकता है ॥ ५१ ॥ अव मौ हमार बात मानकर हुम॒धरको नाभो हमरि कहने दुतिको त्यागो ह महामा । ¢
॥२४५॥ तुम्हारा मगर होगा ॥ ५२ ॥ > योग्य तो सब ॒सद्यणोि सम्पन्न विष्ण ही हि, वह वैकुंठवासी लक्ष्मीपति अनेक क्रीडाओंमं र +
¢ ॥ ५३ ॥ उनके साथ तुम्हारा सब सुखदायक विवाह कृरावेगे इस ॒प्रकारकी हठको छोड हं पार्वती ! तू एल हो ॥ 4४ ॥ बहाजी ब् & ह
इसत प्रकारके वचन सुनकर जगदम्बिका पावती हसती हई ज्ञानविशारद खनियोसे बोटी ॥ "५4 ॥ पावती बोटी हं मुनियोँ ! आप् ट
अपने ज्ञानसे सत्य ही कहा है हे बाह्मणो ! उस्षपर भी मेरी हठ नहीं जाती ॥ ५& ॥ पवेतसे उत्पन्न होनेकै कारण यह भेरा शरीर >
4 || अद्यापि शासनं माप्य गृदमायाहि दुमेतिम्॥ त्यजास्माकं महाभागे भविष्यति च शं तव ॥ ५२॥ त्वद्योग्यो हि वरो ||
विष्णुस्स वंसद्णवान्प्रथुः ॥ वैृण्ठवासी लक्ष्मीशो नानाक्रीडाषिशारदः ॥ ५३॥ तेन ते कारयिष्यामो विवाहं स्वस्य
दम् ॥ इतीदं त्यज इटं सुखिता भव पार्वति ॥ ५९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येदं वचनं त्वा पाती जगदम्बिका ॥ विहस्य च ट
पनःभराह अनीज्ज्ञान विशारदान् ॥ 44 ॥ पार्वत्युवाच ॥ सत्यं भवद्धिः कथितं स्वज्ञानेन भुनीश्वराः॥ परंतु मे इटो नेव युक्तो ट
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सुरष्वचनं पथ्य त्यक्ष्ये नैव कदाचन ॥ शङ्णां वचनं पथ्यमिति वेदविदो विदुः ॥५८॥ गुणां वचनं सत्यमिति येषा दा
& मतिः ॥ तेषामिहायु्र खख प्रमं .नाइख क्रचित् ॥ ५९ ॥ शुूणा वचनं सत्यमिति यद्धुद्ये न धीः ॥ इदाय्ुजापि तेषां दिं
रुपे. २ ¢ दुखं न च ससं कचित् ॥६०॥ सर्वथा न परित्याज्यं गुरूणां वचनं द्विजाः॥ गृहै वसेद्रा शून्यं स्यान्मे दटस्सुखदस्सदा॥६१॥
.च.३ ||| च कठिन है अपनी बुद्धि ५ भकार विचार करक अब सञ्े निषेध यत् करो ॥ ५७ ॥ नारदजीके वचनही पथ्य है भे उनको कभी
अ, ं नहीं करूगी वेदविद कहते ह कि युर ओंकै वचन सव॑दा माननेके योग्य है ॥ ५८ ॥ जिनके र्ती इह मति है किं गुरुओंके वचन्
६ सत्य होते है उनको यहां वहां दोनों रोक सुख होता है, कमी असुख नहीं होता ॥ ५९ ॥ ुरूओंके वचन सत्य होते ह इस प्रकारकी
ट
भवतिं है द्विजाः ॥५६॥ स्वतनोः शैलजातत्वात्काटिन्यं सहजं स्थितम्॥ इत्थं विचायं सुधिया मां निषेद्धुं न चाथ ॥५७॥ ||
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जिनके मनम धृति नहीं है, उनको दोनो लोकही दुख है कभी सुख नहीं है ॥ ६० ॥ हे द्विजो ! किसी प्रकार भी गरुभकि वचन त्यागन ||
पवन य्य
|
उचित नहीं है षर उजडो या वस्तो पर भेरी हठ नहीं जायगी ॥ ६१ ॥ हे ्निभरेष्ठो ! जो वचन आपने कहे है उनसे विपरीत जो तात्पये
है संक्षेपे उसका विवेक वर्णन करती हं ॥ ६२ ॥ विष्ण॒जी सत्यही युणोके स्थान विहार करनेवे है सदाशिव अगुण है इसमे एक कारण है
४ ॥ ६२ ॥ शिव ब्रह है निर्विकार है गेहादिक न होनेसे यदि विकार युक्तं दीसे तो एसा जानो उन्होने भक्तहेतु शरीर धारण किया है बह ||
¢ ससारकी भ्रमुता दिखानेकी इच्छा नहीं करते है ॥ ६४ ॥ इस कारण वह शिवजी अवधूत स्वरूपे प्रमानन्दमें मग्र परम हंसोकी गति धारण £
¢ किये है ॥ ६५ ॥ भूषणादि रुचि यह मायकी बात है, वह बह कु उस्न मायामे अवरम नहीं है यह प्रभु निंण अज मायारहित ९
¢ यद्भवद्धिस्सुभणितं वचनं सुनिसत्तमाः ॥ तदन्यथा तद्विवेकं वर्णयामि समासतः ॥ ६२॥ गणालयो विहारी च विष्णुस्सत्यं ठ
४ भ्रकीतितः ॥ सदाशिवोऽग्णः प्रोक्तस्तत्र कारणञुच्यते॥ ६२ ॥ शिवो बरह्नाविकारः स भक्तहेतोषैताक्ृतिः ॥ भ्रतां लौकिकीं ट
र नेव संद्शयितुमिच्छति॥ ६४॥ अतः परमरंसानां धार्यये सुप्रिया गतिः॥ अवधूतस्वह्पेण प्रानंदेन शंभुना॥ &« ॥ भूषणादिं ट
4 रुचिमायारितानां ब्रह्मणो न च॥ स प्रभुनिं्ंणोऽजो निर्मायोऽलक्ष्यगतिर्विरार् ॥ 8६ ॥ ध्मजात्यादिभिश्शम्धुनानुशह्नाति वे
&|| द्विजाः ॥ यरोरलमहेगेवशिवं जानामि तत्वतः ॥ ६७ ॥ चेच्छिवस्स हिमे षिप्रा विवाहंन करिष्यति ॥ अविवाहा सदाहं स्यां ६
सत्यं सत्यं वदूम्य॒हम् ॥ &८ ॥ उदयति यदि भावुः पश्चिमे दिग्वभागे प्रचरति यदि मेकश्शीततां याति वद्धिः ॥ षिकसति
ठ यदि पद्यं पर्वताग्रे शिलायां न हि चरति हठो मे सत्यमेतद्रवीमि ॥ ६९ ॥
अठक्ष्यगति विराट् है ॥ ६६ ॥ हे बाह्मणो ! शंकरजी धर्मं जाति आदि मात्स अवुप्रह॒ नहीं करते इसी कुलादि रहित दीखते ह केवङ
४ शुके अनुग्रहे ही शिवजी अजुग्रह करते है तस्ते भ देता जानती हूं ॥ ६७ ॥ हे बाहणो ! जो शकर भेर साथ मिवा
|| नहीं करगे तो मेँ सदा विवाह रहित ही रहगी यह मै सत्य सत्य कहती हं ॥ ६< ॥ चाहे स्यं पथिम ओर उद्य हो, चाहे
> || सुमेरु पवेत चायमान होजाय, चाहे अभि शीतल हो जाय, चाहे पर्वतकी शिखाओंपर कषर खिल जार्थे, तो भी भेरी हढ नहीं जायगी यह तँ ॥2
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1. । त्वहो कहती हूं ॥ ६५ ॥ बरहाजी बो इत भकार पवतातमना उन खनो पणाम करके शिवको स्मरणकर निकार चिते मौन ||
॥२४६॥ ||| होगहं ॥ ७० ॥ ऋषि्योने भी इस भ्रकार गिरिजाका निश्वयं जानकर जय शब्द उद्चारणकर उत्तम अशीस दी ॥ ७१ ॥ तव वै छनि उक्ष >
ठ देवीको भन्न मनसे पणाम कर परीक्षा केकर हे खने ! शीपरतासे शिवजीके समीपम गये ॥ ७२ ॥ वहां जाय शिवजीको प्रणामकर् सन् वृता त ¢
ठ निवेदन करके ओर उनकी आज्ञा ठेकर आदरसे अपने छोकको गये ॥ ७३ ॥ इति शरीशिवमहाछराणभा ०दी ° रुसंहितान्तगततृतीयपाती लण्ड ||
ठं ॥ बन्नोवाच॥इत्यक्ा तान्म्णम्या् खुनीन्सा पर्वतात्मजा ॥ विरराम शिवं स्मृत्वा निर्विकारेण चेतसा ॥७०॥ ऋषयोऽपीत्य ठ
¢| माज्ञाय गिरिजायास्सुनिश्वयम्॥ परोचजय गिरं ततर ददुधाशिषशत्तमाम्॥७१।अय प्रणम्य तां देवीं घुनयो दष्टमानसाः ॥शिव
है| स्थानं दुतं जग्बस्तत्परीक्षाकरा ुने॥७२॥ तत्र गत्वा शिवं नत्वा वृत्ता विनिवेद्य तम् ॥ तदाज्ञां समनुप्राप्य स्वरं जग्मुराद् ४
¢ रात् ॥७३॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दरसंहितायां ततीय पार्वतीखंडे सप्त्षिकृतपरीक्षावणनो नाम पचविशोऽध्यायः ¢
8 ॥ २५ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ गतेषठुतेषु सुनिषु स्वं लोकं शंकरः स्वयप् ॥ परीक्षितुं तपो देभ्या एेच्छत्सूतिकरः प्रभुः ॥१॥ परीक्षा ५
ह|| छडमना शुषं ता तष्टमानसः॥जारिलंङूपमास्थाय ॥ स ययौ पार्वतीवनम्॥२॥ अतीव स्थविरो विग्रदेहथारी स्वतेजसा ॥ ४
ट| प्रन्वलन्मनसा दष्टो दंडी छरी बभूव सः ॥ ३ ॥ ततरापश्यत्स्थतां देवी सखीभिः परिवारिताम्॥ वेदिकोपरि शां तां शिवा |
2 ट| (1 कलाम् ॥ 8 ॥ श्थुनिरीक्षय तां देवीं ब्रह्मचारिस्वहूपवाच् ॥ उपकंटं ययौ प्रीत्या तदाऽसौ भक्तवत्सलः ॥ 4 ॥ | ठ
-१. ` ||ह || पचर्विंशोऽध्यायः ॥ २५॥ ब्रह्माजी बोले जव सप्तमि अपने स्थानको गे तव॒ शकर जगत्तिने पार्वतीकी स्वयं परीक्षा ठेनकी इच्छा ट्
प.खं-३ || (की ॥ १॥ भरस्न मनते शिवजी परीक्षके बहाने ( च्छ ) से ब्रह्मचारीका वेश बनाकर पार्वतीके देखनेको उनके तपो
०२६ ||| वनम गये ॥ २ ॥ बहत वदे ब्राह्णका वेष बनाये अपने तेजसे भकाशित् मनसे प्रसन्न हृष्टमन दण्ड छत्र धारण किये ॥ ३॥
१॥ जाकर देखा किं देवीकी सेवा ससियं कर रही है वेदीकै ऊपर रत्ती बेदी है मानो चन्द्रमाकी कठा हो ॥ ४॥ बरह्मचारी, स्वहूपधारी
१९८८-4 |>
शिवजीने जन ॒देवीफो देखा तव भक्तवत्सल उस देवीके समीपम गये ॥ ५ ॥ उस तेजस्वी अद्भुत बाह्णको आयाहुभा देखकर देवीने ५
| सब पुजाकी सामग्रीसे पजन किया ॥ ६ ॥ परम सत्कारकी अनेक सराभभ्रियोसे शिवाने पूजन किया, ओर पराव॑तीनि आदरसे बाह्मणकी
| || कुश पुखी ॥ ७ ॥ पार्वती बोटी आप बहमचारीस्वटपसे कोन हो कासे आये हो जो इस वनको प्रकाशित करते हो हे वेदविदांवर ! |
आप किये ॥ < ॥ बाह्मणने कहा मेरी जहां इच्छा. होती वहांभैजाता हं मे कििवृद्ध हू शरीर निर्बङु है तपस्वी दूसरोको
सुख देनेवाला परोपकारी ह, इसमे सन्देह नहीं है ॥ ९॥ तुम कोन हो किस्तकी कन्या हो निजन वनम किप कारणसे तप करती हो,
आगतं तं तदा द्वाब्राह्मणंतेजसाद्धुतम्॥ अपूजयच्छिवा देवी सर्वप्ूजोपहारकैः ॥६॥ सुसत्कृतं सषिधामिः पूजितं परया खदा ॥
पार्वती कुशलं प्रीत्या पप्रच्छ द्विजमादरात् ॥७॥ ॥ पार्वत्युवाच ॥ ब्रह्मचारिस्वश्पेण कस्त्वं हि कुत आगतः ॥ इदं वनं भासयसे
वद् वेदविदां वर ॥८॥ ॥ विप्र उवाच ॥ अहमिच्छभिगामी च बद्धो विभ्रतस्सुषीः ॥ तपस्वी सुखदोऽन्येषाष्पकारी न संशयः
॥९॥ का त्वं कस्यासि तनया किमर्थं विजने वने ॥ तपश्चरसि दुर्धर्ष मुनिभिः प्रपदैरपि ॥१०॥ न वाला न च बृद्धासि तकूणी
भासि शोभना ॥ कथं पति विना तीक्ष्णं तपश्चरसि वे वने॥११॥ किं त्वं तपस्विनी मदे कस्यवित्सहचारिणी ॥ तपस्वी स न
पुष्णाति देवित्वं च गतोऽन्यतः ॥ १२ ॥ वद् कस्य कुरे जाता कः पिता तव का विधा ॥ सहासौभाग्यजपा त्वं वृथा तव
तपोरतिः ॥ १३ ॥ क त्वं वेद्रसूरुक्ष्मीः किं सुहूपा सरस्वती ॥ एतास मध्ये का वा त्वं नाहं तरकितुभुत्से ॥ १४ ॥
जो खनिजनोंका प्रम दुभ है ॥ १० ॥ तुम बाढा ओर वृद्धा नहीं हो सर्वथा तरुणी दिखाई देती हो पतिक विना षने कि भकारसे
तीक्ष्ण तपस्या करती हो ॥ १३ ॥ हें तपस्विनी ! भद्रे तुम किंस्तकी सहचारिणी हो हे देवि ! वह तपस्वी कया तुम्हारा पोषण नहीं करता।
कहीं अन्यत्र गया है ॥ १२॥ बताओ तुम कि कुलम उतपन्न हदं हो तुम्हारे पिताका क्या नाम ओौर् तुम्हारा क्या नाम है
2४|| हुम महासौभाग्य रूपवाटी हो तुम वृथा तपस्या क्यों करती हो ॥ १३ ॥ श्या तुम वेदभस सावित्री हौ वा ठक्ष्मी हो अथवा कया सुन्दर
>|
हपवाटी सरस्वती हो इनके मध्यमे तुम कौन हो इस बातकी त्कना करनेको भ उत्साह नहीं करता ॥१४॥ पार्दतीजी बोडी है विमि ! न तौ ४
शि०ए० वे
मँ वेदरूप सावित्री न क्षमी ओर न सरस्वती ह हिमाख्यकी कन्या हं इस समय मेरा नाम पारवती है ॥ १५॥ पटे जन्पमं मँ दक्षकन्या ||
॥२४७॥ ए
ट थी मेरा नाम सती था जब भेरे पिताने मेरे पतिकी निन्दा की तब योगमार्गे ने शरीर याग दिया ॥ १६॥ इस जन्यमं भी शंकर
ए भराप्त हुए थे परार्ध वशसे अ॒ञ्चे छोड़ कामदेवको भस्म कर वह अन्त्धीन होगये ॥ १७ ॥ शकरकं चङे जानेमे सञ्च बडा उद्वेग हभ,
ह हे बाह्षण ! तब भँ गगाके किनारे पिताक षरसे चकर तप करने चरी आदं ॥ १८ ॥ भने भाणवहभकी भािके ल्यि महाकडिन
६| ॥ पार्वत्युवाच ॥ नाहं वेदग्रसूविप्र न लक्ष्मीश्च सरस्वती ॥ अहं हिमाचरस॒ता साप्रतं नाम पावती ॥ १९ ॥ पुरा दक्षसुता ९
| जाता सत्ती नामान्यजन्मनि ॥ योगेन त्यक्तदेहाऽहं यत्पित्रा निन्दितः पतिः ॥ १६ ॥ अप्र जन्मनि संप्रा्तश्शिवोऽपि
| विषितभवात् ॥ मां त्यक्ता भस्मसात्कृत्य मन्मथ स जगाम ह ॥ १७ ॥ प्रयाते शंकरे तापोद्विजिताहं पितुहात् ॥ आगता ट
तपसे विग्र सुदृढा स्वर्णदीतटे ॥ १८ ॥ कृत्वा तपः कठोरं चसुचिरं प्राणवह्भम् ॥ न प्राप्याभौ विविक्षन्ती त्वं दृष्ठ संस्थिता
रस. ४
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क्षणम् ॥१९॥ गच्छ त्वं प्रविशाम्यश्ौ शिवेनांगीकृता न दि ॥ यञ्च यत्र जवरुप्स्ये वरिष्यामि शिं वरम् ॥ २० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ठ
इत्युकत्वा पार्वती वह्नौ तत्पुरः प्रविवेश सा ॥ निषिध्यमाना पुरतो ब्राह्मणेन पुनः एुनः ॥ २१ ॥ वहिभवेशं इवत्याः पार्वत्या £
स्तत्परभावतः॥ बधव तत्क्षणं सयो वहिवंदनपंकवत् ॥ २२ ॥ ¢
तपस्या की है परन्तु उनकी भाति न हदं इस कारण अशे भरवेश करती ह तुमको देखकर क्षण मारके निमित्त िठम्ब करती हू ||
पा.खं.३ ॥ १९ ॥ आप पधार सञ्चे शिवजीने अंगीकार नहीं किया इस कारण अभिम भरवेश करती हं, जहां कहीं जन्म होगा प्रति होगे तो ||&
अ०२६ || शकरही होगे ॥ २० ॥ ब्ह्ाजी बोरे रेता कहकर पावती उत बहचारीके वारंवार निषेध करनेपर भी अशम पवेश कर गई ॥ २१ ॥ जिन्न ||
$ ॥ समय पावतीने अभिमे वेश किया उस समय उन बाह्लणरूप शिवजीके भरभावसे उ समय अभ्नि चन्दनके समान शीतल होगईं ॥ २२ ॥ ||
न, न
क्षणं तदंतरे स्थित्वा द्युत्पतंतीं दिवं द्विजः॥ पुनः पप्रच्छ सहसा विदसन्छतनं शिवः ॥२३॥ द्विज उवाच ॥ अहो तपस्ते किं
भद्रे न बुद्धं किंचिदेव हि ॥ न दग्धो वद्धिना देहो न च प्राप्त मनीषितम् ॥ २४ ॥ अतस्सत्यं निकामं वे वद् देवि मनोरथम् ॥
ममामे विप्रवर्य॑स्य सर्वानदप्रदस्य दि ॥ २५ ॥ यथाविधि त्वया देवि कीर््यतां सर्वथात्मना ॥ तस्मान्मे्ी च संजाता कार्य्य
गोप्यं त्वया नहि ॥ २६ ॥ किमिच्छसि वरं देवि प्रष्ट्मिच्छाम्यतःपरम् ॥ त्वय्येव तदसौ देवि फलं सर्वं प्रहश्यते ॥ २७ ॥
परां च तपश्द्र तिष्ठतु तप एव तत् ॥ रत्नं दस्ते समादाय रित्वा काचस्तु संचितः॥२८॥ ईशं तव सौद कथ व्यर्थीकृतं
स्वया ॥ हित्वा वश्चाण्यनेकानि चर्मादि च धृतं त्वया ॥२९॥ तत्सर्वं कारणं ब्रूहि तपसस्तस्य सत्यतः ॥ तच्छ्रत्वा विप्रवर्योऽहं
यथा इषमावाप्नुयाम्॥३०॥ ब्रह्मोवाच ।इति प्रष्ठा तदातेन सखीं प्रेरयताभ्बिका ॥ तन्धुखेनेव तत्सर्व कथयामास सुब्ता ॥३१॥
कि सम्पूणे फक तुमं ही दिखाई देता है ॥ २७ ॥ यदि दूसरेके निमित्त तपस्या है तो तप करो पर तुम्हे कया यह तो रेसषा ह कि हाथका
रत्न छोडकर मानो काच धारण करना है ॥ २८ ॥ इस्त भ्रकार अपनी सुन्दरताको तुमने व्यथं क्यों कर दिया है अनेकं प्रकार व्च छोडकर
तुमने मृगचमौदि धारण किये है ॥२९॥ स कारण इश तपस्या करनेका सत्य रकारण किये जिस्षको सुनकर भ प्रसनताको पराप्त कर॥३०॥
जब इस भकारे ब्राह्मणने पा तब अभ्बिकाने इस विषयमे अपनी सखीको प्रणा की ओर उक्तके सुखसे ही सव उक्त सुवताने कहाया ॥३१॥
११०
क्षणमात्रे उस अभ्िमे स्थित हो उसे शीतल जान जब पावती स्वयं शुलोकको गमन करने ठगी तब शिवजी अपने शरीरकी निन्दा करते हुए
हैसकर उसे गोटे ॥ २३ ॥ बाह्णने कहा अहो भद्रे ! तुम्हारी तपस्यासे कया होगा तुमने कभी न जाना अश्चिने तुम्हारी देह न जलाई न
तुम्हारा मनोरथ पूरा हुआ ॥ २४ ॥ इस कारण निश्वयकर दीक तुम अपना मनोरथ कहो मँ बाह्मण शरेष्ठ सबको आनंद देनेवाठा हूं सुञ्षसे
सत्य कहो ॥२५॥ हे देवि ! सर्वथा तुमको अपना वृत्तान्त कहना चाहिये कारण किभेरी तुम्हारी अन मित्रता हो गई है, इस कारण तुमको इस
कायेके छिपानेकी आवश्यकता नहीं ॥ २६ ॥ हे देवि ! इसके उपरान्त तुम किंञ्च वरकी इच्छा करती हो यह भेरी सुननकी इच्छा है |
५
५
ठ
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शि०पु°
॥२४८।
रुभ्सं.2
पा.खं.३
अ०२६
इस भकारते जब पार्वतीने विजयानाभरक सलीसिपेरणा की तब वह पार्वतीकी प्राणप्रिया सुच्रत्ञा ससी जटाधारी ब्राह्मणे बौटी
॥ ३२ ॥ ससी बोली हे साधो ! सनो भँ पावतीका प्रमचरित्र कहती हू तपका कारणमी स्व कहती हूं जो तुम्हारे सुननेकी इच्छा है ॥३३॥
यह हमारी ससी गिरिराज हिमाठयकी स्ता ह यह पार्वती ओर काटी नामसे माता मेनका करके विख्यात हई है ॥ ३४ ॥ अभीतक इत्तका
विवाह नहीं हआ ओर शिवजीक सिवाय यह किकी इच्छा नहीं करती इसको तप करते ही तीन सह॑ वृषं बीत गये ॥ ३५ ॥ उन्हीकि
निभित्त हमारी सखीन इस भरकारका तप आरंभ क्रिया है सो हें ब्राह्मण ! मेँ इसमे कारण कहती हं आप सुनिये ॥ ३६ ॥ इन्द्र आदि देवता
तया च वैरिता ततर पार्वत्या विजयाभिधा ॥ प्राणप्रिया सुत्रतज्ञा सखी जटिलमव्रवीत् ॥ ३२ ॥ सख्युवाच ॥ शृणु साधो
प्रवक्ष्यामि पार्वतीचरितं परम् ॥ हतं च तपसस्सर्व यदि त्वं ्रोतुमिच्छसि ॥ ३३ ॥ सखी मे गिरिराजस्य सुतेयं हिमभूभृतः ॥
ख्याता वै पारवती नाम्ना सा कालीति च मेनका ॥ ३७ ॥ उटेय न चकेनापि न वाञ्छति शिवात्परम् ॥ ओणि वषसदखाणि
तपश्चरणसाधिनी ॥ ३५ ॥ तदथ मेऽनया सख्या प्रारब्धं तप इईंदशम् ॥ तदच कारणं वक्ष्ये शृणु साधो द्विजोत्तम ॥ ३६ ॥
रितवेन्द्रभयुखान्देवान् हरि ब्रह्माणमेव च ॥ पति पिनाकपाणि वे प्रप्ठमिच्छति पार्वेती॥ ३७ ॥ इय सखी मदीया वे वृक्षानारोष
यत्पुरा ॥ तेष्ठ॒सवेषु संजातं फलपुष्पादिकं द्विज ॥ ३८ ॥ हपसार्थाय जनकंकुलालंकरणाय च ॥ समुदिश्य महेशानं
कामस्यानुग्रहाय च ॥ ३९ ॥ मत्सखी नारदोपदेशात्तपस्तपति दाङ्णस् ॥ मनोरथः कुतस्तस्या न फ्िष्यति तापस ॥ ४० ॥
ओंको छोडकर, तथा हारि ओर ब्रह्माजीको छोडकर पावती पिनाकपाणि शकरकै प्राप्त करनेकी इच्छा करती है ॥ ३७ ॥ इ मेरी सखीने
पहे जिन वृक्षोका आरोपण क्रिया थाह द्विज ! देखो उन बरक्षोभं एल फ अनेकवार आचुके है ॥ ३८ ॥ रूपके सार्थत्वके यि |
पिताके वंशको शोभित करनेके ठि महेश के उदेश्यसे तथा काके अनुग्रहकै टय ॥ ३९ ॥ भेरी सखी नारदके उपदेशपे दारुण तपस्य।
करती है हे तपस्वी ! इसका मनोरथ क्यों नहीं सफ होगा ?॥ ४० ॥
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क्क क
। द्विजभेष्ठ ! जो तुमने मेरी ससीका मनोरथ पा वह मैने प्रमे वर्णन किया अब कया सुनने की इच्छा है ॥ ४१ ॥ बह्माजी बो इस |
रकार यथारथपते विजयाकँ वचन सुनकर हे सने ! वह जट्ठि श्र हकर वचन कहने ₹गे ॥ ४२ ॥ जटिर बडे यहं जो कुछ सीन ६
ट कहा है यह परिहास तकित होता है यदि यह बात यथाथहौ तो देवी अपने मुखसे इसे भ्रतिपादन करे ॥ ४३ ॥ ब्रह्माजी बोरे जब ४
दविजन्मा बहमचारीने इस भकार कहा तब पावती देवी अपने सखे उस सखीके कहे हुए दृततान्तको बाह्मणसे बोटी ॥ ४४ ॥ इति श्रीशिव ट
यत्ते पृष्ठं द्विजश्रेष्ठ मत्सख्या मनसीप्सितम् ॥ मया स्यातं च तत्प्रीत्या किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥४१॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवं ||
वचनं श्रुत्वा विजयाया यथार्थतः ॥ सुने स जटिो श्दरो विहसन्वाक्यमब्रवीत् ॥ ४२ ॥ जटिल उवाच ॥ सख्येदं कथितं ठ
तत परिहासोनमीयते॥ यथार्थं चेत्तदा देवी स्वमुखानामिभापताम्॥४३॥ ॥ब्रह्मोवा च ॥ इत्युक्ते च तद् तेन जटिखेन द्विजन्मना ट
॥ उवाच पार्वती देवी स्वसुखेनेव तं द्विजम् ॥ ७९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शढसंहितायां ठतीये पार्वतीखण्डे टै
शिवाजटिलसंवादो नाम षडविशोध्यायः ॥ २६ ॥ पार्वत्युवाच ॥ शृणु द्विजेन्द्र जटिल मदत्तं निखिटं खट ॥ सख्युक्तं ९
मेऽद्य यत्सत्यं तत्तथेव न चान्यथा ॥ १ ॥ मनसा वचसा साक्षात्क्मणा पतिभावतः ॥ सत्यं ब्रवीमि नोऽसत्यं वेतो वै
शंकरोमया ॥ २ ॥ जानामि दुछंभं वस्तु कथम्प्राप्यं मया भवेत् ॥ तथापि मन ओत्सुक्यात्तप्यतेऽय तपो मया ॥ ३ ॥ ट
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता वचनन्तस्मे स्थिता सा गिरिजा तदा ॥ उवाच ब्राह्मणस्तञ तच्छत्वा पार्व॑तीवचः ॥ ४ ॥ ट
2 || महाएराणभा ° री° रद्रसहितान्तगेततृतीयपावतीखण्डे षटूविंशोऽध्यांथः ॥ २६ ॥ पार्वती बोटी हे बाह्मण ¡ यह सब तुम मेरा दृततान्त सुनो
ट| जो कछ मेरी सखीनि कहा है वह सव सत्य है इसमे अन्यथा नहीं है ॥ १ ॥ ने मन वचन कर्मसे प्रतिभाव ही शकरका आराधन करिया ¦
|| है म सत्य कहती हं अस्तस्य नही है भने शंकरका ही वरण क्या है ॥ 2 ॥ मै भी जानती हूं कि दुभ वस्तु भ कैसे पा पकती हू तो
भी मनक उत्कंठा मेँ तप् करती हूं ॥ ३ ॥ बह्माजी बोरे जव इस भकारके वचन कहकर पार्वती स्थित हृद तो यह पारवतीके वचन सुनकर ॥/?
शिण्पु°
॥२४९॥
नाहमणने कहा ॥ ४ ॥ बाह्मण बोढा इतने समयतक सु यह बडी इच्छा थी कि यह देवी कि वस्तुकौ इच्छा करती है जो रेता
ह|| तप करती है ॥ ५॥ हे देवि ! सो अब वह बात तुम्हारे खलसे सव ॒घुनकर भ यहि जाता हूं जौ तम्हारौ इच्छा हो सो ठम करना ||
|| ॥ & ॥ यदि तुम स्खते नहीं कहती तो यह भिवत निष्फलता होती है, जसा कायै ओर जसी होनहार हौ वहं सुखपूर्वक कनी चाहिये ¢
¢ बरज्नण उवाच ॥ एतावत्कालपर््यन्तम्ममेच्छा महती ह्यधत् ॥ कं वस्तु काक्षी देवी कुर्ते ष॒महत्तप्ः ॥ ५ ॥ तज्ज्ञात्वा ४
¢ निखिं देवि अत्वा त्वन्ध॒सपकजात् ॥ इतो गच्छाम्यहं स्थानायथेच्छसि तथा कर् ॥ ६ ॥ न कथ्यते त्वया मह्यं मित्वं ¢
|| निष्फल म्भवेत् ॥ यथो कायं तथा भावि कथनीयं सुखेन च ॥ ७ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्य्॒छा वचनं तस्थ यावद्न्तुमियेष ¢
| सः ॥ तावच्च पावती देवी प्रणम्योवाच तं द्विजम् ॥ ८ ॥ ॥ पर्वत्युवाच ॥ किं गमिष्यसि विप्रेन्द्र स्थितो भव हितं वद् ॥ ¢
| त तमात स्थित्वोवाच स दण्डधृक् ॥ ९ ॥ द्विज उवाच ॥ यदि श्रोतुमना देवि मां स्थापयसि भक्तितः ॥ वदा
¢ मि तत्त्वं तत्सवं येन ते वथुनम्भवेत् ॥ १० ॥ जानाग्यहं महादेवं सर्वथा गुरूधम्मंतः ॥ प्रवदामि यथार्थ हि सावधानतया ४
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श्ण ॥ ११ ॥ वृषध्वजो महादेवो भस्मदिग्धो जटाधरः ॥ व्याघरचम्माबरधरः संवीतो गजकरत्तिना ॥ १२ ॥ कपाकधारी
हणं २ ||| सपाधस्सर्गाभेषु वेष्टितः ॥ विषदिग्धोऽभक्ष्यभक्षो विहपाक्षो विभीषणः ॥ १३॥ 8
1 ट् | भरणाम करके बोढी ॥ < ॥ पावती बोटी हं विप्रेन्द्र ! तुम क्यों जाते हो ठहरो ओर हितकी बात कहो तब पार्वतीने एका कृहा तब वह दंड
५4 धारी बाह्मण स्थित होकर बोा ॥ ९ ॥ बाह्मण बोला हे देवि ! यदि भक्ते से बैठाकर तुम कुछ सुननेकी इच्छा करती हो तो भँ बह सब तत्व ©
५०१७ ||| कहता हू जिसे तुम्हारा कल्याण हो ॥१०॥ भ महादेवको जानता ह वह सर्वथा धर्मे गर है म यथाथ कहता हुम सावधान होकर सुनो ॥११४
>॥ वृषभध्वज महादेव भस्म जराथारे व्याघचरभके वह्ञधारे हाथीका चम॑ ओढते ह ॥ १२ ॥ वह कपारधारी सपक समह शरीरम ठपैद रहते है |
+
तुमने कुछ न कहा ॥ ७ ॥ बह्लाजी बोडे यह उससे वचन कहकर जव तक वह बराह्मण जनेकी इच्छा करने ठगा तबतक पावती देवी उस ब्रा ||
षको धारण किये अभण भक्षम करते तीननेतर धारे देखनेमं भर्यकर ई ॥ १३ ॥ उनके जन्भकी ही किंसीको खबर नहीं है वह गहस्थोक
य
गमे रहित है बह दिगम्बर दशमुजावाछे भूत परेतोमे सदा युक्तं रहते है ॥ १४ ॥ तुम किस कारणसे एसे स्वामीकी इच्छा करती हो
देवि ! तुम्हारा ज्ञान करा गया सो आप पिचारसे इस समय कहँ ॥ १५ ॥ भने प्हेही उनका भयंकर वत सुना है जो तुम्हारे सुननेकी ठ
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एचि है तो सुनो भँ कहता हं ॥१६॥ पहे साध्वी दक्षकी शरुताने शिवजीको वरण किया था वृषभवाहनका उसे कत्ता संभोग हु वहं तुमने ¢
सुना होगा ॥ १७ ॥ कपाटीकी घ्वी है रेखा जानकर दक्षने अपनी कन्याको छोड दिया ओर यज्ञम शिवजीको भी भाग नहीं दिया ॥ १८॥
ते श्रवणे रुचिः॥१६॥ दक्षस्य दुहिता साध्वी सती वृषभवादनम्॥ ति पुरा देवात्तत्संभोगः परितः ॥ १७ ॥ कपाणिजा
येति सती दक्षेण परिवजिता ॥ यज्ञे भागप्रदानाय शंथुश्चापि विवाजतः ॥ १८॥ सा तंथवापमानेन भशं कोषाङ्कखा सती ॥
तत्याजासून्प्रियांस्त्र तया त्यक्तश्च शंकरः ॥ १९ ॥ त्वं श्नीरलनं तव पिता राजा निखिलश्रभताम् ॥ तथाविधं पति कस्मा ४
--
अब्यक्तजन्मां सततं शरहभोगविवाजतः ॥ दिगगबरो दशशुजो भ्रतप्रतान्वितस्सदा ॥ १४ ॥ केन वा कारणेन त्वं तं भतरं समी ¢
हसे ॥ क्व ज्ञानं ते गतं देवि तद्रदाद्य विचारतः ॥ १५ ॥ पूर्वं श्रतम्मया चैव बरतन्तस्य भयकरम् ॥ शृणतेनिगदाम्यय यदि ¢
८
दुमेण् तपसेहसे ॥ २० ॥ दत्तवा सुवणैयुद्रा च ग्रहीतुं काचमिच्छसि॥ हित्वा च चंदनं शुभ कर्दमं रेप्तुभिच्छसि ॥ २१ ॥
सूर्यतेजः परित्यज्य खद्योतद्तिमिच्छसि ॥ चीनांशुकं विहायैव चभ्माबरमिदेच्छसि ॥ २२ ॥
दस अपमानते शरतीको महाकोप हुआ उसने अपने भ्राणोको पिताक यज्ञम त्याग दिया एसे शिव सती करक छोडेही गये ॥ १९ ॥ तुम चियोमे ©
रत्न हो तुम्हारे पिता भी तो सब पव॑तोंके राजा ह तब एसे परतिको रेसरी कठिन तपस्यासे कैसे इच्छा करती हो ॥ २० ॥ सुवर्णकी स्रा ह
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( अशफ ) अथवा अगढीरूप तपस्याके बदलेमं तुम काच रहण करने अथवा पहिननंकी कैसे इच्छा करती हो सदर चन्दनको छोडकर कर्दम
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लगनिकी क्यों इच्छा करती हौ ॥ २१ ॥ सयका तेन छोडकर खयोत (जुयुन् ) प्रबीजने की कांतिकी इच्छा करती हो रेशमी चीन देशक
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वन्न छोडकर चरम प्लोकी इच्छा करती हो ॥ २२ ॥ घरका वास त्यागकर वनवासी इच्छा करती हो हे देवेशि | शेवधि ( कल्याणनिधि ) ९
को त्यागकर तुम छोहेकी इच्छा करती हो ॥ २३ ॥ त॒म इन्द्रादि टोकपाोको छोडकर शिवम अलरक्त हृदं हो म इसको अच्छा नहीं ॥
सता यह बात ठोकसे भी विरुद है ॥ २४ ॥ कहां तुम कमललोचना ओर कहां पे त्रिलोचन कहा तुम चन्द्रखखी कहां वे जो पचमुखी कहं है
जाते है ॥ २५ ॥ तुम्हारे शिरपर सर्पिणीके समान दिव्य वेणी है ओर मस्तकप्र जटा प्रसिद्ध शिवजीहीका है ॥ २६ ॥ तुम्हारे अगम ह
चन्दन है ओर शिवकै अंगम चिता मस्म है कहां तुम्हारा दु कू वन्न ओर कहां कहां शिवजीका गज चमं ॥ २७ ॥ कहा तुम्हारे दिव्य भूषण 7
हवासम्परित्यज्य वनवासं समीहसे लोदमिच्छसि देवेश त्यक्ता शेवधिुत्तमम् ॥२२॥ इन््रादिरोकपाला अ ित्वा शिवम् ||
व्रता ॥ नेतत्सुक्तं हि ोकेशठु विशदं दश्यतेऽधुना ॥२४॥ क त्वं कमरपवाक्षी कासौ वे भिविरोचनः॥ शशांकवदना त्वं च पंच ¢
वक्रः शिवस्स्मृतः ॥ २५ ॥ वेणी शिरसि ते दिभ्या सार्षणीव विभासिता॥ जटाजूटं शिवस्येव प्रसिद्धम्परिचक्षते ॥ २६ ॥ र
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चंदनं च त्वदीयांगे चिताभस्म शिवस्य च ॥ कर दुकूलं त्वदीयं वे शांकरं क्र गजाजिनम् ॥ २७ ॥ भूषणानि दिभ्यानि क ||
सर्पाश्शंकरस्य च ॥ क चरा देवतास्सवांः क्ष चभूतवरिप्रियः ॥ २८ ॥ क्व वा सृदंगवादश्च क्व च तडमर्स्तथा ॥ क्व च
मेरीकलाप्क्व च शूंगरवोऽश्युभः ॥२९॥ क्व च ठक्कामयः शब्दो गलनादः क्व॒ चाछ्ुभः ॥ भवत्याश्च शिवस्यैव न युक्त
रूप सत्तमम् ॥ ३० ॥ यदि दरव्यं भवेत्तस्य कथं स्यात्स दिगम्बरः ॥ वाहनं च बलीवर्दस््ामभ्री कापि तस्य न ॥ ३१ ॥
ओर कहां शेकरका सर्प कहां तुम्हारे अनुचर देवता ओर कहां शकर भूतोके भिय तथा बटिभिय ॥ २८ ॥ कां इधर् मृदगोका नाद कहा
उधर उनका डमरू, कहां भेरीका शब्द कहां उनका शृङ्गी नाद् ॥ २९ ॥ कहां दङ्कानामक बाजेका शब्द् कहां उनका गख्नाद जो अशुभ है।/©
ह | तुम्हारे ओर शिवके रूपकी कोई समता नहं है ॥ ३० ॥ यदि उनके पास द्व्य ह्येता तो वे दिगम्बर कयो होते, उनका बाहन बीर |
तात्पयं यह कि उनके पास कोई सामग्री नहीं है ॥ ३१ ॥ | ह
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चिर्योको जो सुखदायक यण वरोमे होने चाहिये उनके बीचमे शंकरम एकं यण भी नही है॥३२॥ काम तो तुमको भी प्यारा होगा ।
भी शकरने भस्म कर दिया, यह भी तुहारा अनादरं किया जो तुमको छोडकर अन्यत्र चरे गये ॥ ३३ ॥ उनकी जाति बिया ज्ञान कु
विदित नहीं होता, पिशाच उनके सहायक ओर कंटम विष रहता है ॥ ३४ ॥ सद्] इकठे ही रहते ओर विशेष कर रागी है इस्त कारण
तुम शकरमं मन मत ठगाओ ॥ ३५ ॥ कहा तुम्हारे हदयका हार कहां म॒ण्डोकी माला, कहां तुम्हारे शरीरका अंगराग ओर कहां उनके
शरौरकी चिता भस्म् ॥ ३६ ॥ हे देवि ! तुम्हारे ओौर शंकरके पादि सव विरुद है मु्े यह बात नहीं सची जो तुम्हारी इच्छाम आबे सो
वरेषु ये गुणाः प्रोक्ता नारीणां सुखदायक्राः ॥ तन्मध्ये हि विह्पाक्षे एकोपि न गुणः स्पत: ॥३२॥ तवापि कामो दयितो दग्ध
सतेन हरेण च् ॥ अनाद्रस्तदा ष्टो हित्वा त्वामन्यतो गतः ॥२२॥ जातिनै दृश्यते तस्य तिदाज्ञानं तथेव च ॥ सहायाश्च पिशाचा
हि विषं कण्ठे हि द्यते ॥ २४ ॥ एकाकी च सद् नित्यं तरिरागी च विेषृतः॥ तस्मात्तं हि देनैव मनो योक्त त॒. चासि
॥ २९ ॥ क च हारस्त्वदीयो वै क च तन्षुण्डमाछिका ॥ अंगरागः कते दिभ्यः चिताभस्म क्र तत्तनौ ॥ ३६ ॥ स॒र्वे विशं
रूपादि तव देवि हरस्य च ॥ मद्यं न रोचते द्येतयदिच्छसितथा कुरु ॥३७॥ असद्रस्त॒ च यत्किचित् तत्सर्व स्वयमीरसे ॥
नितं मनस्तरमन्नोचेदिच्छसि तत्कुरु ॥ २८ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येव वचनं श्रत्वा तस्य विप्रस्य पावती ॥ उवाच ऊुद्धूमनसा
शिवनिन्दापरं द्विजम्॥३९। ।इति श्रीशिवमहापुराणेद्ितीयायां रुद्रसंहितायां ततीये पावतीखंड बरह्नचारिप्रतारणवाक्यवर्णनं नाम
सप्तविशोऽध्यायः॥२७॥ पार्वत्युवाच ॥ एतावद्धि मया ज्ञात कथिदन्योयमागतः॥ इदानीं सकल ज्ञातमवध्यस्त्वम्विशेषतः ॥१॥
करो ॥ ३७ ॥ जो असदरस्तु है स्वयं उसकी इच्छा करती हो शंकरसे मन हटाछो आगे जो मनम आते सो करो ॥ ३८ ॥ जह्लाजी बोरे
उस ब्राह्णकै यह वचन सुनकर पावती कोधकर शिवनिन्दक बाह्मणतसे बोटी ॥ ३
यपावतीसण्डे सप्रविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ पार्वती बोटी भने इतना जाना था कि यह कोई अ
स्या कं कोष तो बहत है पर ब्रहचारी, अवध्य होते है ॥ १ ॥ हे देव ! जो कुछ तुमने
१११
३९ ॥ इति शीशिवम ° भाषारीकायां रुदसंहितान्तर्गततृती
न्य है प्र इस समय तुम्हारी सब बात जानी
कहा वहे व ही भिथ्या है जो तुमने कहा किं
हम उनको जानते है यह सब तुम्हारा कहना मिथ्या है यदि तुम जानते होते तो एसे वचन कभी न कहते ॥ २॥ कभीः वेमे वेषधारी भी
महेश्वर दिखा देते है, उन ` पर्हने अपनी ठीठासे ही शरीर धारण किया है ॥ ३ ॥ तुम ॒ब्रहमचारीके स्वरूपे युञ्चे छठनेको उयत हुए
् ५ € = =, 9
हो, ओर आकर कुुकतिनते छलके भरे वचन कहते हो ॥४॥ शकरके स्वरूपको विशेषकर मै जानती हं यथाधतापे विचारकर शवतस रँ कहती हू
तुमं घनो ॥५॥ यथाथ वह निथैण बहम है, कारणवश सयुण हो जाते है निरयण यणात्माकी जाति किम परकारसे हो सकती है ॥६॥ वह सदाशिव
¢ त्वयोक्तं विदितं देव तदलीकं न चान्यथा ॥ यदि त्वयोदितं स्याद्र विश्दरं नोच्यते त्वया॥२॥ कदाचिदश्यते तादक् वेषधारी
६ महेश्वरः ॥ स्वलीरया परब्रह्म स्वरागोपात्तविग्रहः ॥३॥ ब्रह्मचारिस्वङ्पेण प्रतारयितुश्यतः॥ आगतश्छलसंयुक्तं व चोवादीः
¢ छयुक्तितः ॥ ४ ॥ शंकरस्य स्वखूपं तु जानामि स॒विशेषतः ॥ शिवतत््वमतो वच्मि सुविचार्य यथाईेतः ॥ ५ ॥ वस्तुतो
निैणो ब्रह्म सयुणः कारणेन सः ॥ कतो जातिर्भवेत्तस्य निथैणस्य शणात्मनः ॥६॥ स सर्वासां हि विद्यानामधिष्ठान सदा
# शिवः ॥ किं तस्य विद्यया काय्यै पू्णैस्यपरभात्मनः॥ ७ ॥ वेदा उच्छवासह्पेण पुरा दत्ताश्च विष्णवे ॥ शंभुना तेन कलपादौ
¢ तत्समः कोऽस्ति सुप्रभः ॥ ८ ॥ स्वेषामादिभूतस्य वयोमानं तस्ततः ॥ प्रकृतिस्तु ततो जाता किं शक्तेस्तस्य कारणम्
॥ ९ ॥ ये भजंति च तं प्रीत्या शक्तीशं शंकरं सदा ॥ तस्मै शक्ति्ियं शंभुः स ददाति सदान्ययम् ॥ १० ॥
| विघाओकै अधिष्ठान है उ पूणे परमात्माको साधारण वियाति कया कामहै ॥७॥ जिन्होने उच्छवास रूपे विष्णजीको रथम वेद दिपे ेयह कल्पके
?
आदिमं शिवजीने किया था; उनके समान प्रभु कौन है ॥ ८॥ जो सवके आदिकारण है उनकी अवस्थाका मान क्या होस्कता है उनके पशात् प्रकति भरगर
दह शक्ति कया शिवजीके भरति कारण हो सकती है ॥९॥ जो परमते शक्तिकेईश्वर करका सद्! भजन करते है, शिवजी उनको सदैवरहनेवालीरे्ी ॥
अयज ज जज 9र जरस ्ञये
|
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तीनशक्तियोंका ्रदान करते ह ॥ १०॥ उन्हीके भजनसे यह जीव निर्भय होकर मत्युको जीतता है इस कारण त्रिलोकी वह मृल्यंजय ु
परसिद्ध है ॥ ११ ॥ उन्हीके पक्षपातसे विष्ण दिष्णपनेको पराप्त होते हँ बह्ाजी ब्रहमतको ओर देवता देवत्वको प्राप्त होते है ॥ १२ ॥ | &
आदिमे शिवजीकै द्शनके छि देवराज जाते है शिवानन्य शिक्कै द्वारा भूतादि गमन करतेही रंहते है ॥ १३ ॥ कभी कभी उन गणोँके त
दंडोक भ्हारते उनका मुकुट चमकीटा होगया है बहृत पक्ष छेनेसे क्या है वह स्वयंही महाप्रमु है ॥ १४ ॥ `उन कल्याणषपी सेवा करने
यहां क्या नहीं हो सकता, उन देवके पाक्त कमी किस वातकी है जो वह सदाशिव मेरी इच्छा करे ॥ १५ ॥ जो शंकरका सेवन न करे वह
तस्येव भजनानीवो मत्युं जयति निभ्रयः ॥ तस्मान्मृत्युजयत्नाम परसिदधम्धुवनघये ॥११॥ तस्येव पक्षपातेन विष्णिष्णुत्व
माप्ठुयात् ॥ ब्रह्मत्वं च यथा ब्रह्मा देवा देवत्वमेव च ॥१२॥ दर्शनार्थं शिवस्यादौ यथा गच्छति देवराट् ॥ भूतादथस्तत्परस्य 6
द्वारपालाश्शिवस्य तु ॥१३॥ दण्डे सुकुटं विदध मृष भवति सर्वतः ॥ किं तस्य बहुपक्षेण स्वयमेव महाप्रभुः ॥ १४ ॥ कल्या ट
णरूपिणस्तस्य् सेवयेह न किं भवत्॥ कि न्यूनं तस्य देवस्य मामिच्छति सदाशिवः ॥१५॥ सत्तजन्मदरिढः स्यात्तवेनो यदि
शंकरम् ॥ तस्येतततेवनाछ्छोको लक्ष्मीः स्यादनपायिनी॥ १६ ॥ यदग्रे सिद्धयोष्ठौ च नित्यं त्रत्यंति तोषितम्॥अवाङ्धुखास्सदा
तव तद्धितं इभं ङतः॥१७॥यदस्य मगालानीह
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४
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सेवते शंकरस्य न॥यथापि मंगलन्तस्य स्मरणादेव जायते ॥ १८ ॥ यस्यं
पूजाप्रभावेण कामास्सिद्धयन्ति सर्वशः ॥ कुतो विकारस्तस्यास्ति निविकारस्य सर्वदा ॥ १९॥
सात जन्मतक ददर होता है, उन्हीकी सेवासे टोकमे अनपावनी रकष्मी प्रप्त होती है १६ ॥ जिनके आभे उन्हर संतुष्ट करनेकी नियही
भां सिद्धये सृत्य करती रहती है सदा नीचा्चख किये रहती है, उनको दुरमही क्या है ॥ १७ ॥ यथपि इन
शंकरकी मंगर सेवा नहीं
स्मरण करने मगर होता है ॥ १८ ॥ जिन
करते अथात् वह मंगख्वेश धारण नहीं करते, तो भी उनके कौ पूजाके पभावे निरन्तर काम
सिदध होजाति हँ उन सदा निविकार रहने वाठ शकसमें विकार कहां हो सकता है ॥ १९ ॥
चः
शि ०४० ||| जिसके खससे शिव एषा मगछ नाम निरन्तर निकठ्ता है उसकेही दशनते दृसरे भाणी भी सदा पवित्र होजाते € ॥ २० ॥ ५ १
॥२५२॥ || || चिताकी भरम अपवित्र होती है तो वहं उनके अगकी भसम देवता निरन्तर क्यों धारण करते है ॥ २१ ॥ जो देव जगते ध ८) ट
¢ || रहार करने वाठे है तथा योते संयुक्त है जो निर्ण होते हए भी शिव ह उनको कोई किस मकार जान सकता ह १ म ॥
शिवका बह्प निर्म है तुम सरीसे उनसे विखख उस पको कैसे जान सकते है ॥ २३ ॥ जो दुराचारी पापी वेद ओर देवतासे विल ह ९
ट वै अशुणषूपी शिवका तत्वे नहीं जान सकते ॥ २४ ॥ जो पुरुष तरवको न जानकर शिवजीकौ निन्दा करता है, उसका जन्मभरका किया
|| शिवेति मगल्राम खुले यस्य निरन्तरम् ॥ तस्यैष दशेनादन्ये परित्ास्सति सर्व ता ॥२०॥ यथयप्रतम्भवेदधस्म् चितायाश्चत्वयो ||
£ दितम् ॥ नित्यमस्यांगगं देषैश्शिरोमिद्धा्यते कथम् ॥२१॥ यो देवो जगतां कतां भतां इतां गुणान्वितः ॥ निशणश्शिवसन्ञश्च ट
स विज्ञेयः कथम्भवेत् ॥ २२ ॥ अगुणं ब्रह्मणो रूपं शिवस्य प्रमात्मनः ॥ तत्कथं हि विजानन्ति त्वादशास्तद्वदिषुखाः ट
॥ २३॥ दुराचाराश्च पापाश्च देवेभ्यस्ते विनिगैताः ॥ तत्त्व ते नैव जानन्ति शिवस्यागुणङूपिणः ॥ २ ॥ शिवनिन्दां ||
|| करोतीह तच््वमज्ञाय यः पुमान् ॥ आजन्मसंचितं पुण्यं भस्मीभवति त ॥ २५ ॥ त्वया निदा कृता याच् हरस्यामित ४
ट तेजसः ॥ त्वत्पूजा च कृता यन्मे तस्मात्पापम्भजाम्यहम् ॥.२६ ॥ शिवविद्रपिणं दृष्टा सचै स्नानमाचरेत् ॥ शिवदिद्वेषिणं ४
| ष्ठ प्रायश्चितं समाचरेत् ॥२७॥ रे रे दुष्ट त्वया वचोक्तमहं जानामि शंकरम् ॥ निश्चयेन् न् विज्ञातरश्शिव एव सनातनः |$
॥ २८ ॥ यथा तथा मवेदुद्रो यथा वा बहुषूपवान् ॥ ममाभीष्टतमो नित्यं निर्विकारी सतां प्रियः ॥ २९ ॥ ट
४ हुभा धण्य भस्म होजाता है ॥ २५ ॥ तुमने जो यहां महातेजत्वी शिवजीकी निन्दा की है ओर भेन जो तुम्हारी पूजा की है इससे सज्ञे पाप ||
ठ्गा है ॥ २६ ॥ शिबद्रोहीको देखकर वसित ज्ञान करना चाहिये शिक्रोहीको देखनेसे भ्रायभ्रित करना चाहिये ॥ २७ ॥ अरे दृष्ट ! ||
ह|| तुमने जो कहा मै शंकरो जानता हं सो तुमने सनातन शिवको निश्वयसे कुठ भी न जाना ॥ २८ ॥ ओर बहुत कया वह चाह जसे भी हों ्
‰॥ वह निविकारी सत्परुषोके प्रिय मेरे नित्य मनोरथ पूरे करने वाठे है वह चाहं जेसे रूपवान् वा अरूपवान् हो ॥ २९ ॥ `
रुमे. २
पा.ख.३
०२८
।
वन
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उन महात्माकी विष्ण ओर ब्ह्ाजी भी समता नही कर शकते ई, फिर दूरे देवताओंकी तो कौन कहे वे तो सदा काठके अधीन |
॥ २० ॥ इस् भकार अपने सत्य ओर् बुद्धि विचार कर शिषके छथि वनभ आकर यँ बडी तपस्या करती हं. ॥३१॥ वही परमेशान |£
सर्वेश भक्तवत्सर है इस समय भेरी उनमें यह अभिलाषा है कि वे दीनोपर अनुग्रह करे ई ॥ ३२॥ बह्माजी बोरे हे सने ! इस प्रकार ठ
वह गिरिराजसुता गिरिजा कहकर निर्विकार चित्ते मौन धारणकर विरामको भ्रात हदं ॥ ३३ ॥ ्र्चारी बाण इस प्रकार पार्वतीके ठै
वचन सुनकर जवही कुछ कहनेको इच्छा करने ठगे किं ॥ ३४ ॥ उसरी समय शिवम मन गाये शिवनिन्दाकै सुननेकी इच्छा न करनेवारी ठ
विष्ण्रवनापि न समस्तस्य कापि महात्मनः ॥ कुतोऽन्ये निजरायाश्च कालाधीनास्सदैवतम् ॥३०॥ इति बुध्या समारोकषय
स्वयासत्या सृतत्वतः ॥ शिवाय वनमागत्य करोमि विपुर तपः ॥३१॥ स एव परमेशानस्सकेंशो भक्तवत्सलः ॥ संप्राप्तम्मे ट
ऽभिलाषो हि दीनान॒मरहकारकम् ॥ ३२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता गिरिजा सा दि गिरीश्वरसुता सुने ॥ विरराम शिष॑ दध्यो ||@
निविंकरेणचेतसा ॥ ३३ ॥ तदाकण्यं वचो देव्या ब्रह्मचारी स वै द्विजः ॥ पुनर्वचनमाख्यातं यावदेव प्रचक्रमे ॥३४॥ उवाच ।
गिरिजा तावत्स्वसखी विजयां तम् ॥ शिव् सक्तमनोव्रत्तिशिशवनिदाप ङ्घुखी॥ ३५ ॥ गिरिजोवाच ॥ वारणीयः प्रयत्नेन
सख्यय दि द्विजाधमः ॥ पुनव मनाव शिवनिंदा करिष्यति ॥३६॥ न केवलम्भवेत्पपं निन्दां कर्तश्शिवस्य हि ॥ यो वै ¢
श्णोति तमिन्दांपापभाकृ स भवेदिह ॥ ३७ ॥ शिवनिन्दाकसे वध्यस्सर्वभा शिवर्किकरेः॥बराह्मणशेत्स वै त्याज्यो गन्तव्यं
तत्स्वलादद्रतम् ॥२३८॥अय दुष्टः पुननिन्दां करिष्यति शिवस्य हि ॥ ब्रह्नणत्वादवध्यचत्याज्योऽदश्यश्च सर्वथा ॥ ३९ ॥
ठ
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पर्वतीने अपनी ससी वरिजयाते शीप्रतापूर्वक कहा ॥ ३५॥ परवती बोटी हे ससि ! यहं द्विजाधम फिर कुछ शिषी निन्दा करनेकी
ष
इच्छा करता है इक द्विजाधमको यत्ने निवारण करना चाये ॥ ३६ ॥ केवट शिवकी निन्दा करने ही पाप नहीं होता जो उस
ई || निन्दाको सुनता है वह भी पपभागी होता है ॥ ३७ ॥ शिव निन्द। करनेवाढा शिवे किंकरो सदा वध्य है यदि वह ब्रह्मणहोतो
उप्तको व्याग देना चाह्यि ओर उत्त स्थठपते शीर चठाजाय ॥ ३८ ॥ जर यहं दु फिर शिवजीकी निन्दा करेगा प्र यहं बराह्मण होनेसे
अवध्य है वा अज्ञात हो तो पर्वा त्पाग देना चाहिये ॥ ३९ ॥ इस स्थानको छोडकर रम अभी दरे स्थानको चठती हं जित इ
|| प्रमे साथ भेरा फिर संभाषण न हो ॥ ४० ॥ बहाजी बोठे देस कहकर ज्यौही पावतीने जानेके निमित्त पग उदया) त्प इ |
|| बहचारीूप साक्षात् शिवने अपने हाते प्रियाका हण , किया ॥ ४१॥ जसा पावती पान कर रही धी वाही स्प धरण
ठ प्व॑तीको दशन दिया, ओर ठनाते नीवेको सुख कयि पावती शिवजी वोठे ॥ ४२ ॥ शिष्रजी बोडे अव शज्ञे छोडकर कहां जायगी भ॑
के नहीं छो भे भन्न ह बर मांग तेरे ल्मे सक्े कछ भी अदेय नही है ॥ ४३ ॥ भाजते तुमने अपने तपते सङञे मोक ठे छया है, भ
|| इितवैततस्यल्मेव यास्यामोऽन्यु् भा चिरम् ॥ यथा सभाषणं न स्याद्नेनाऽविडुषा पुनः ॥ ४० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता ४
|| चो मया यावत्पादघुल्किप्यते सुने ॥ असौ तावच्छिवस्साक्षादालबे प्रियया स्वयम् ॥४१॥ कृत्वा स्व्पं सुभगं शिवाध्यानं
|| यथा तथा ॥ दयिता शिवाये ताशुवाचावाङ्छलीं शिवः ॥ ४२ ॥ शिव उवाच ॥ छव यास्यसि मां दित्वा न त्व स्वा ||
|| ज्या मया पुनः ॥ प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि नादेयम्वियते तव ॥॥ ४३ ॥ अद्यप्रभूति ते व कीत एव ते ॥ करीतोऽ ||
स्मि तव सन्दयातसणमेकं खगाय ते ॥ ४४ ॥ त्यज्यत च त्वया लला मम पत्नी सनातनी ॥ मिरिजे त्वं हि सदभ्या ||
#
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शिश्पु
॥२५३॥
विचारय _ महेश्वरि ॥ ९५ ॥ मया परीक्षितासि त्वं बहुधा दटभानसे ॥ ततक्षमस्वाषराधम्मे लोकलीलानुसारिणः ॥ ६ ॥
न त्वाहशीम्प्रणयिनीं पश्यामि च. भिरोकके ॥ सर्वथाहं तवाधीनस्स्वकासः पू््य॑तां शिवे ॥ 2७ ॥ एटि प्रिये मत्सकाशं
पत्नी त्वं मे वरस्तव ॥ त्वया साकं दरुतं यास्ये स्वशृहसम्प्वत्तोत्तमम् ॥ ४८ ॥
| दातत हू तेरी घुन्दरताते मे शिक गया हू, तेरे विना एकक्षण भी युगके समान बीतता है ॥ ४४॥ तुम छाज त्याग दो, भेरी
सनातनी पत्नी हौ हे महेश्वरि ! गिरिजा तुमही हो सुडिति विचार करो ॥ ४५ ॥ हे हढमनवारी ! मैने तुमको बहुत भकारसे परीक्षा
कुर देखा सो परीक्षणादि छोकलीढा अचुक्रणह्प मेरा अपराध तुम क्षमा करो ॥४६॥ भिछोकोमे तुम्हारे समानं ङ्च कोई प्यारी नहीं है
ष सवथा तेरे अधीन हं हे शिवे ! तुम अपनी कामना पृण करो ॥४७॥ हे शरिये ! तुम मेरे समीप आओ हुम मेरी पतनी ओर मेँ ुम्हारा दर हं
रुप. २
पा.खे.३
अ०२८
अब तेरे साथ मेँ अपने पर्वतोत्तम परमे गमन कहग ॥ ४८ ॥ ब्रह्माजी बोरे ! देवदेदके यह कहतेही पार्दतीको बडा आनन्द (॥ ् |
जो कष्टा था उसी समय वह एरातन कष्ट दूर हो गया ॥ ४९ ॥ हे अनिसत्तस ! सतीका बह भम सब जाता रहा कारण कि ह
फठ्के उत्पन्न हेनेमे प्राणीका पहला भम न्ट होजाता है ॥ ५०॥ इति श्रीशिवमहाऽराणभाषारीकायां सदसे" पा» अषटाविंशोऽध्यायः॥२.८॥
नारदजी बोटे ! हे बहान् ! हे विधे ! हे महाभाग ! इसके उपरान्त फिर क्या हुआ पह सब भरे षुननेकी इच्छा है आप शिवजीका यश ¢
सचसे कहिये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोे हे देवे ! सुनिये मँ इस कथाको भरसन्नतासे कहता हं जो यह कथा महापापकी नाशक ओौर शिवभक्तिकी
मोवाच ॥ इत्युक्त देवदेवेन पूरयती शुदमाप सा ॥ तपोजातं तु यत्कषटं तनह च पुरातनम् ॥४९॥ सर्वः श्रमो मिनष्टोभूत्स ||&
त्यास्तु ख॒निसत्तम ॥ फरे जते श्रसः पूवो जन्तोनांशमवाप्व॒यात् ॥५०॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दरसंहिता्यां
तृतीय पार्वतीसंड पावैत्याश्शिवहूपदशंने नामाष्टाविशोऽध्यायः ॥२८॥ नारद् उवाच ॥ह्मन् विपे महाभाग किं जातं तदन
न्तरम्॥॥सत्सरव श्रोतुमिच्छामि कथय त्वं शिवायशः॥१॥ बह्नोवाच॥ देवे श्यतां सभ्यक् कथयामि कथांसुदा। तां मदापापसंदर्नी |©
शिवभक्तिविवद्धिनीम् ॥२॥ पार्वती वचने शत्व हरस्स परमात्मनः॥दष्टानन्दकरं पं जदर्षातीष च द्विज ॥ ३॥परत्युवाच हा
साध्वी स्वोपकण्टस्थितं विभुम् ॥ अतीव सुखिता देवी श्रतयुत्फ्ानना शिवा ॥ ४ ॥ पार्वत्युवाच ॥ त्वं नाथो सम देवेश
त्वया क विस्मृतमपूरा ॥ दक्षयज्ञषिनाशं दि यदं कृतवान्दगात् ॥५॥ख त्वं साहं सशुतयत्ना भनायां काय्यसिद्धये॥ देवानां
दव देवेश तारकाताऽसुखात्मनाम् ॥६॥यदि प्रसन्नो देवेश करोषि च कृपां यदि॥पतिभंवममेशान मम वाक्यं कुर् प्रभो ॥७॥
बढाने वाठी है ॥ २ ॥ इ प्रकार पावती महात्मा शिवजीके वचन घुनकर हे खनि 1 उक्त आनन्दकारी रपको देखकर परभ प्रषन्न हदं ॥ ३॥ ४
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बह महासाध्वी अपने समीपमे स्थित हए शकरसे महा भ्रसन्नतासे नेत्र लिङ जाने गृहा खी हो गोटी ॥ ४ ॥ पर्वती गोरी ह देवेश ! आप
तो भेरे नाथ ह क्या आपने यह बात मुढा दी जिस निमित्त प्हरे आपने दक्षके यज्ञका विनाश कियाथा॥५॥ आप वही हई
ओर भे कार्यपिद्धिके निमित्त मेनाम उन्न हुईं हू, हे देवेश ! देवता तारकं अहुर बडे त हो रहे है ॥ ६ ॥ हे देवेश ! यदि आप रन्न
११२ ^
ही यदि आप छपा करते होतो हेः महेशान ! मेरे बचन मानकर आप मेरे परति हृजिये ॥ ७॥ मँ पकौ आना | ८
पिताक घर जाती हं बह आपका विशु यश ( विवादरूप ) परपद किया जाय ॥ ८ ॥ हे नाथ! आपको मेरे पिताक समीप ||
जाना चाहिये आप तो अनेक ठीराओंमं विशारद है आपको मेरे पिता सश्च मांगना चाये ॥९॥ है भगवन् टकम अपना £
यश विस्तार करते हए आपको इस प्रकारसे करना चाये जिससे मेरे पिताका गृहाश्रम सुफल हौ ॥१०॥ ऋषियों द्वार भ्रम
शोषित दभा अपने बंधुजनोते परिवारित मेरा पिता आपके वाक्ये. सन्देह न करेगा ॥ ११ ॥ जव भँ दक्षकन्या शी तव मेरे पिताने
पितुर्गेहे मया सम्यग्गम्यते त्वदनज्ञया ॥ प्रसिद्धं क्रियतां तद्रे विशुद्धं परम यशः ॥८॥ गन्तव्यं भवता नाथ हिमवत्पाश्व॑तः
प्रभो ॥ याचस्व मां ततो भिश्भृत्वा टीलाविशारदः ॥९॥ तथा त्वया प्रकर्तव्यं लोके ख्यापयता यशः ॥ पितु सफलं सर्व
डरुष्वेवं गृहाश्रमम् ॥१०॥ ऋषिमिरवोधितः प्रीत्या स्ववन्धुपरिवारितः ॥करिष्यति न संदेदस्तव वाक्यं पिता मम ॥११॥
दक्षकन्या पुरां वे पित्रा दत्ता य॒दा तव ॥ यथोक्तविधिना त विवाहे न कृतस्त्वया ॥१२॥ न अ्रहाः प्ूनितास्तेन दक्षेण
हाणां, विषयस्तेन सच्छिदरोयं मदानभरत् ॥ १३ ॥ .तस्माच्यथोक्तविधिना कतमरईसि मे प्रभो ॥ विवाहं घं
तथा धुवम् ॥ जानातु हिमवान् सम्यक कृतं
॥ प्रोवाच वचनं प्रीत्या गिरिजां प्रहसस्निव
6 सुमाद्गल्यमविकारि तथा कुक् ॥ १७॥
| दिया था उत्त समय यथा योग्य विधे आपने विवाह नहीं किया था ॥ १२॥ मेरे पिता दक्षजीने उस समय ग्रहोंका पूजन नहीं किया
देवाताओंकी का्यिद्धिके च्ि तुम यथोक्त बिधि मेरे
शि° पु
॥२५४॥
॥
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६
|| जनकन मे ॥ ग्रहाणां , बिषय्
|| महादेव देवानां काय्यसिद्धये ॥ १8 ॥ विवाहस्य यथा रीतिः कर्त्या सा
पुञ्या शभ तपः ॥ १< ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवं वचनं अुत्वा सुपरसद्चस्सदाशिवः
॥ १६ ॥ शिव उवाच ॥ शृणु देवि महेशानि परमं वचनं मम ॥ यथोचितं
स ननन न्
₹०स.३ ट
पा.खं.३ ट| उन गरहोके कारणही उस विवाहम छिद्र दोष् रहा ॥१३॥ हे महादेव ! हे महाप्रभो ! इस कारण
अ०२९ ह| साय विवाह करो ॥ १४ ॥ विवाहकी जो रीति है उपे अवश्य करना चाहिये जिते हिमाख्य यह बात जान जाय किं इसने महातपस्या की
| है ॥ १५ ॥ बह्लाजी बोठे यह वचन सुनकर सदाशिव बहुत भसनन हुए ओर हंसते हए परमे पारतीते बोढे ॥ १६ ॥ हे महेशानि ¡ देवि
मेरा वचन नौ यथोचित ओर मंगलकारी जैना उचित जानो वैसा करो ॥ १७॥ हे भामिनी ! ब्र्मासे आदि ठेकर जितने स्थावर |
दिसाई देते ईं, सव नश्वर जानो ॥ १८ ॥ यह एक ही अनेकत्वको परा हुआ है यह निर्शुण ही णोति ुक्तं है यह अपनेही परकाशते प्रका
| शित हे दृ्ररेकी ज्योति इसमे नहीं है ॥ १९ ॥ हे देवि ! मै सदा स्वतन्त हं पर तुमने परतेत्र कर दिया हे सबकी -करनेवाली प्रकति महामाया
ठमही हो ॥ २० ॥ यह सम्पूणं जगत् मायामय ही किया है मुञ्च सर्वात्माने परम बुद्धे इसको धारण किया हे, अपने परमात्मभाव ओर
सवौत्माङूति से इसको रचकर तथा सेवनकर गणो परिवेश्तकर दिया है ॥ २१ ॥ तेरे सिवाय कौन ऋतु तथा प्रह हे हे देवि ! इसन समय तुम
ब्ह्यादिकानि भूतानि त्वनित्यानि वरानने ॥ दृष यत
यत्सर्वमेतचच नश्वरं विद्धि भामिनि ॥ १८ ॥ एकोनेकत्वमापत्नो निर्य॑णो
दि.गुणान्वितः॥स्वज्योरस्नया यो विभाति परज्योतघ्नान्वितोऽभवत् ॥ 9९ ॥ स्वतन्यः परतन्व्रशच त्वया देति कृतो ह्यहम् ॥
सकती च भकृति्महामाया त्वमे ३॥२०॥ मायामयं कृतमिदं च जगत्सम्भ् सर्वात्मना हि विधृतं परया स्वदया ॥ सर्वा
त्मभिस्सुङ्ृतिभिः परमात्म भवैस्संसिक्तमात्मनि गणः परिवेषटितञ्च ॥२१॥ के गहाः कँ ऋतुगणाः के वान्येपि त्वया अरहाः ॥
किशक्तं चाघुनादेवि शिवार्थं वखणिनि ॥२२॥ गुणकार्य्यप्रमेदेना वाभ्यां प्रादुभेवः कृतः ॥ भक्तरेतोजगत्यस्मिन्भक्तवतस
` भावतः ॥२२॥ त्वं दि वे र्ृतिस्सक्ष्मा रजस्सत््वतमोम्यी ॥ व्यापारदक्षा सततं सशणानिर्गणापिच ॥ २४ ॥ सवेषामिह
भूतानामहमात्मासमध्यमे ॥ निविकारी निरीह न गच्छेयं जनकं तव शेलने ॥
विका च॒ भक्तेच्छोपात्तविग्रहः ॥ २५॥ दि मालयं
ततस्त्वां भिक्षुको भत्वा न याचेयं कथचन ॥ २६ ॥
शिवकरे निमित क्या कहती हो ॥ २२ ॥ ग॒ण कारथके मेदरेही हमारा ादरभाव है भक्तवत्सताके भावके भक्तोक निमित्त सव कार्यं करता
॥ २२ ॥ रजस्छतमोमयी तुम सक्षम प्ररूति हो निरन्तर व्यापारमे दश्च सगण ओर निर्भृण ्पहो॥ २४ ॥ इन सब भूतोका मं आल्मा
हे सुमध्यमे ! निर्विकारी निरीह होकर भी मँ भक्ते निमित्त शरीर
€
= ५ ५ हू
6 ९ पारण करता ह ॥ २५ ॥ हे शेरत ! मेँ तुम्हारे पिता हिमाख्यके
भस नहीं जागा ओर किसी प्रकारते भी मिश्ुक होकर यँ तुम्हारे पितासत तमको नहीं मागुंगा ॥ २६ ॥
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ययय
& || बाहे कोई बड योम गरिष् महात्मा केता भी क्यों न हो हे गिरीनद्जे ! दो एेसा कहतेही यह शष र्युताको प्राप्त हजाता है क ५
|| कल्याणी यह बात जानकर तुम सवते एषा कयो कहती हो, हे भदे ! ओर कायं तुम्हारे कहने स्र होता है, अव् इतस्मं जसौ उचत
¢ वैसा करो ॥ २८ ॥ बाजी बोरे वह कमललोचनी साध्वी शिवजीकै रेषा कहनेपर शकरको वारंवार भक्तिते प्रणाम कृ
ठगी ॥ २९ ॥ पार्वती बोरी इमे कोई विचारकी बात नहीं है कि हुम आत्मा हौ ओर् म भकति हूं हम दोनों स्वतन्व ओर निधुण
| होकर भी भक्तोके वशीमूत हो सगण होते ह ॥ ३० ॥ हे प्रभो शंकर ! आपको तो भ्रयत्नपुवेक मेरे वचन करने चाहिये हे शंकर । आप्
महारणेगरिषठोपि महात्मापि गिरीन्द्रे ॥ देदीतिवचनात्सदयः पुरूषो याति लाघवम् ॥२७॥ इत्थं ज्ञात्वा तु कल्याणि किमस्माकं
वदस्यथ ॥ कार्यं त्वदाज्ञया भद्रे यथेच्छसि तथाङुङू ॥ २८ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तेनोक्तापि महादेवी सा साध्वी कमलेक्षणा ॥
। जगाद शंकरं भक्तया सप्रणम्य पनः एुनः॥२९॥पावेत्युवाच ॥ त्वमात्मा प्रकृतिश्चादं नाज काया विचारणा ॥ स्वतन्त्रो भक्तवश
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गौ निणौ सयणावपि ॥ ३० ॥ प्रयत्नेन त्वया शम्भो कायं वाक्यं मम प्रभो ॥ याचस्व मां हिभरिरेस्सौभाग्यं देहि शङ्कर ¢
॥२५य॥
॥ ३१ १ कृपां डर महेशान तव भक्तास्म नित्यशः ॥ त् पत्नी सदा नाय दहं जन्मनि जन्मनि ॥३२॥ सिं ब्रह्म परमात्मा
हि निशुंणः प्रकृतेः परः ॥ निविंकारी निरीहश्च स्वतन्ः परमेश्वरः ॥ ३३ ॥ तथापि सथुणोपीह भक्तोद्धारपरायणः ॥ विहारी
स्वात्मनिरतो नानालीलाविशारद्ः ॥ ३९ ॥ सर्वथा त्वामहं जाने महादेव महेभ्वर ॥ किञ्चुक्तेन च सर्वज्ञ बहुना हि द्यां
कर् ॥ ३५ ॥ विस्तारय यशो कोके कृत्वा लीलां महाद्भुताम् ॥ यत्सुगीय जना नाथांजसोत्तीर्णां भवाम्बुघेः ॥ ३६ ॥
हिमाठ्यसे याचना करके शुङ्ञे सौभाग्य दीजिये ॥ ३१ ॥ हे महेशान ! आप् छपा करो म तुम्हारी नित्य भक्त हहे नाथ! मतो
जन्मजन्मान्तरमं सदा आपकी पतनी ह ॥ ३२ ॥ तुम॒बहन परमात्मा निर्युण धकतिसे प्रे हो, विकार रहित इच्छा रहित स्वतन्ब प्रमे
शवर हो ॥ ३३ ॥ तथापि भक्तेकि उद्धारके निभित्त आप सुण भी हो तुम॒विहार करनेवाञे आत्मामे रत अनेक ठीढा करने चतुर हो
॥ ३९ ॥ म सदा आपको महादेव महेश्वर जानती हं हे सर्वज्ञ आप युक्तस्वरूप हो दया करो ॥ ३५ ॥ अद्धुत टीढा करके आप ठोक्
शुभ्रं 2
पा.खे.३
अ०२९
, अनुभ ॥ जौ अपने प्वेतको चठे गये तव सरव संगढा पार्वतीन
क्या किया; बह कहां गहं हे महामते ! सो यह सव वात आप सचते कहि. ॥ २ ॥
अपना यश. विस्तार करो, हे नाथ जिस्च छीटाको गा गा कर आपके भक्त संसार सागरसे पार हो जारयँ ॥ ३९६ ॥ यह कह कर
शकरको वारंवार भणाम करके हाथ जोडे शिर शलुकाये भराथना कर मौन हई ॥ ३७ ॥ जव पाव॑तीने रेस कहा तब महासा ठोकके विडम्ब
नके निमित्त हसते हुए महा भतन हो उस्न कायं कनेक इच्छते बोठे एसा ही होगा ॥ ३८ ॥ पथात् प्रसन्न होकर शिवजी अन्तान
होगये ओर काटीके विरहे आङृष्ट चित्त होकर शिवजी कै
. सको गये ॥ ३९ ॥ वहां जाकर शिवजीने नन्दि आदिते यह वृतान्त प्रम
आनंदं भरकर सुनाया ॥ ४० ॥ वह भेर आदि सम्पूणं गण य
हं वृत्तान्त सुनकर परम घुखी हो उत्सव मनाने ठगे ॥ ४१ ॥ हे द्विज
ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवञुक्त्वा गिरिजा सुपरणम्य पुनः पुनः ॥ विरराम महेशानं नतस्कन्धा कृतांजछिः ॥ ३७ ॥ इत्येवभुक्तस्स
तया महात्मा महेश्वरो रोकविडम्बनाय् ॥ तथेति म्वा प्रहसन् बधूव घदान्वितः कतैमनास्तदेव ॥ ३८ ॥ ततो ह्यन्तहिंत
शशम्धुरबभ्ृव सुप्रदर्ितः ॥ कैलासं प्रययौ काल्या विरिदाङ््टमानसः॥ .३९ ॥ तत गत्वा महेशानो नन्यादिभ्यस्स ऊचिवान् ॥
तात सकलं तम्बैपरमानन्दनिरभरः ॥ ७० ॥ व] शरुत्वा गणास्सवें | स्व॑शः ॥ १ विदधुः
प्रमोत्सवम् ॥ ७१॥ सुमंगलं तच द्विज ब॒भूवाताव नारद् ॥ सवेषां दुःखनाशोभ्रदुदः प्राषा प संघुदभ् ॥ ४२ ॥ इति
श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पावतीखण्डे शिवाशिवसम्वादवर्णनं नाभेकानर्धिशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
॥ नारदं उवाच् ॥ विधे तात महाभाग धन्यस्त्वं परमार्थदक ॥ अद्धुतेय॑ कथाश्ावि त्वदूलयहतो मया ॥ १॥ गते हरे
स्वशले हि पारवती सवमेगला ॥ किं चकार गता छरुत तन्मे वदमहामते ॥ २ ॥
भष्ठ ! उस्न समय परम उत्सव हुआ सवका दुःख नाश हुआ ओर शिवजीको पर परसन्नता प्राप्त
कायां र्द्रसंहितान्तगेततृतीयपावतीखण्डे एकोनव्रिशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ नारदी बो हे विधे! हे
हदं ॥ ४२॥ इति श्रीशिवष० भाषारी
आप धृन्य हौ भापनें अनुग्रह करकं यह मुञ्चे अद्ुत कथा सुनाई ॥ १ ॥ जब शि
तात 1 हे महाभाग | परमार्थे देखनेवाछे !
व
ब्रहमाजी बो हे तात ! भरमपूवैकं सुनो जो बात इसके परे हृदं शिवको स्मरण करके शिवके निजस्थानः जानेका चरित्र कहता हूं ॥ ₹ ॥
पार्वतीने अपना छप सार्थक करके (महादेवः शब्द् उचारण करके अपने पिताक घर गमन किया ॥ ४ ॥ परवितीका आगमन हुनकर मना
ओर हिमाट्य दिव्य यानम चढकर हर्षम विह होकर. चठे ॥ “ ॥ एरोहित पुरवासी ओर भी अनेक सखिये तथा दूपे सम्बन्धी वै सव
ही इस्त स्थानपर आये ॥ £ ॥ ओर मैनाक आदि सव भाई भी उस स्थानपर आये यह सव महाभसन्न हो जय शब्द बोढते चटे ॥ ७ ॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥ श्रृणु शप्रीतितस्तात यजातं तदनन्तरम् ॥ हरे गते निजस्थाने तद्वदामि शिवं स्मरन् ॥ ३ ॥ पवत्यपि सखी
शि पु
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¢ युक्ता खूपं कृत्वा त॒ सार्थकम् ॥ जगाम स्वपितर्गेहं महादेवेति वादिनी ॥ ॥ पा्वत्यागमनं चत्वा मेना च स॒ हिमाचलः ॥
४
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॥ २५६॥
दिव्यं यानं समार्य प्रययौ दर्षविहकः ॥ 4 ॥ पुरोहित पौराश्च सख्यश्चवाप्यनेकशः ॥ सम्बन्थिनस्तथान्ये च सवे ते
च समा यथ्ुः ॥ 8 ॥ अ्रातरः सकला जग्मुरमेनकमप्रधुखास्तदा ॥ जयशब्दं प्रब्ुवन्तो महादर्षसमन्विताः ॥ ७ ॥ संस्थाप्य
मंगलघरं राज वत्त्मनि राजिते॥ चन्दनागक्ूकस्तूरीफख्शाखासमस्विते ॥ ८ ॥ सपुरोधोव्राह्मणेश्च मुनिभित्रह्मवादिभिः ॥
नारीमिरनर्तकीभिश् गजेन्द्राद्िर्शोभितैः ॥९॥ परितः परितो रंभास्तम्भवृन्दसमन्विते ॥ पतिपु्रवतीयोषिः्समूरैरदीपदस्तकैः
ट ॥ १० ॥ द्विजब्रन्दे्च सुयुकते कुर्वद्धिमंद्गलध्वनिम् ॥ नानाप्रकारा्येश्च शंखध्वनिभिरन्विते ॥ १३ ॥ एतस्मिन्नन्तरे दगा
¢| जगाम स्वपुरान्तिकम् ॥ विर्शती नगरं देवी ददश पितरे पुनः ॥ १२. ॥
राजमागेमे शोभायमान मंगर बरकी स्थापना करके ओर उस मगल वरम चेदन अगर कस्तूरी उस्तकी फल शाखाओंमे ठगाया ॥ < ॥ परो
हित् बाह्ञण तथा ब्रह्मवादी सुनि, नारी, नतेक तथा गनेन्द्रादिते शोभायमान ॥ ९ ॥ नगरे सब ओर कैठेके स्तम्भ ठगाये परति एत्रवाटी
५ चय् दीपक हाथमे लिगि खडी हो गई ॥ १० ॥ ब्राहमणोंके समूह मगरुध्वनि करने कगे, अनक प्रकारके बाजे ओर शंख ध्वनि उस समय
४॥ होने ख्गीं ॥ ११ ॥ इसी समय दुग अपने नगरके समीपम आई नगरमे प्रवेश करते हूए देवीने अपने पिता माताका दर्शन किया ॥१२॥ |
रुण्म.२
पा.खं.३
०३०
|
न 40 + 4
जो देखतेही हषे विह्वट मन हो प्रन होकर दौड पडे ओर पावंतीने माता पिताको देखतेही सखियों सहित दोनोको प्रणाम क्रिया ॥१३॥
माता पिताने आशीबौद् दे काटीको अपनी गोदीमे लिया. हे वसे ! ठेसा उचारण कर प्रमत्ते विह हो रोने ठगे ॥ १४ ॥ तत्र इरी अपनी
ओर भी सम्बन्धकी धिय तथा भ्राताओंकी च्वि प्ीतिक्े दढ आगन करने ठ्गीं ॥ १५ \ ओर बोटीं तुमने अपने कुर्क तारनेका कायं
भठीरमातिसे साधन किया, तुम्हारे सदाचरणसे हम सव कोई पवित्र होगई ॥ १६ ॥ इत प्रकार सव कोई गिरजाको बडाई कर प्रेमे प्रणाम
करने छे ओर ष्प तथा चन्दनसे पूजनकर पावतीको प्रसन्नता प्रणाम करने ठगे ॥ १७ ॥ उसरी समय देवता भी आकाशे विमाने स्थित
सुप्रसन्न प्रधावन्त इषविह्लमानसौ॥ दृष्टा काटी स॒प्रहष्टा स्वाछिभिः प्रणनाम तौ ॥१३॥ तौ सम्पूणाशिषं दत्वा चक्रतस्तौ
स्ववक्षसि ॥ हे वत्से त्वेतम॒चार्यश्दन्तौ प्रमबिहरौ ॥१४॥ ततस्स्वकीया अप्यस्या अन्या नार्यापि संदा ॥ रात्ियोपि
सुप्रीत्या दटाखिगनमादघुः ॥ १९५ ॥ साधितं हि त्वया सम्यक् सुकार्थ ङलतारणम्॥ त्वत्सदाचरणेनापि पाविताः स्माखिला
वयम् ॥ १६ ॥ इति सवे स॒प्रशंस्य ता प्रहर्षिताः ॥ चन्दनैः सुप्र्ुनैश्च समानदुश्शिवां खदा ॥ १७ ॥ तस्मिन्नवसरे
देवा विमानस्था सुदाम्बरे ॥ पुष्पवृष्टि छमा चकरनत्वा तां तष्ट्बुः स्तवैः ॥ १८॥ तदा तां च रथे स्थाप्य स शोभान्विते
व्रे ॥ पुरं पवेशयामासुस्सवे विग्रादयो सुदा ॥१ ९॥ अथ विप्राः पुरोधाश्च सख्योन्याशच लियः शिवाम् ॥ द परवशय।मासु
बहुमानपुरस्सरम् ॥ २० ॥ ख्यो निमेच्छनं चकुर्विभ्ायुयुचशिपः ॥ हिमवान्मेनका माता खमोदाति शनीश्वर ॥ २१ ॥
स्वाश्रम सफलं मेने कुपुतरारपुतरिका वरा ॥ हिमवात्नारदं त्वाञ्च संस्तुवन् साधुसाध्विति ॥ २२ ॥
होकर शूरटोकी वषं करक श्र सतम स्तुति करने गे ॥ १८ ॥ उस समय सव बाहमणादि बडी भसन्नतासे पार्वतीको रथे मैगकर प भवेश
कराते ए ॥ १९ ॥ त बाह्णण परोहित् ली तथा च्ियोँने पाव॑तीको बडे मानक सहित धरम प्रवेश कराया ॥ २० ॥ श्िय म॑गलाचार
कृरने ठगी ओर ब्रह्मण आशीर्वाद देने कगे, हे यनीश्वर ! हिमाटय ओौर मेनका
ठ ख्य ओर् पावतीकी माता बडी भन्न हुई ॥ २१ ॥ उन्होने अपृते
आभमको सफढ माना कि कुरते तो एत्री ही अच्छी होती है, हिमाख्यने नारदजी तुमको धन्य धन्य कहकर स्तुति की ॥ २२ ॥
११३
० ८44
किया ॥ २३ ॥ हे शने इस प्रकारसे पिता
6. ९ ब्दी ध ५ त्स
शिणश्ु पवेतराजने ब्राह्मण ओर बंदीजनोको धन दिया ओर बाहमणो्रारा मंगछ पाठ कराकर महोत्सव
माता ओर भ्राता तथा भगिनि पार्वती सहित आंगनमे वैं ॥ २४ ॥ हे तात ! उत्त समय हिमाठय बडी भसन्नताको पाप होकर सबको
॥२५०॥ || || प्मसे सन्मान कर गंगामे जञानकरनेको गये ॥ २५ ॥ उसी समय छीठाकरनेमे तत्पर भक्तत्र भगवाचू शकर नचानेवाटे नटका रूप धारण
करके मेनकाके समीप गये ॥ २६ ॥ वाये हाथमं श्रगी ओर दाहिने हाथमे मह पीटप्र यदडी धारे ठा वज्ञ पहनें च्य ओर गानमं
चुर ॥ २७ ॥ इस प्रकारका रूप धारणकर मेनकाके दवारे बडी प्रसन्नतासे अनेक प्रकारका तत्य ओर भनोहर गान करने ठगे ॥ २८ ॥
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¢ ब्राह्मणेभ्यश्च बंदिभ्यः परवतेन्दरो धनं ददौ ॥ मङ्गलं पाठयामास सं द्विजेभ्यो महोत्सवम्॥२३॥ एवं स्वकन्यया इष्टौ पितरौ ४
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त्रातरस्तथा ॥ जामय महाप्रीत्या सभूषुः प्रांगणे शुने ॥२७॥ ततस्स हिमवान् तात सुप्र प्रसन्नधीः ॥ साम्मान्य सक्
लान्प्ीत्या क्नातु गंगां जगाम ह ॥ २५ ॥ एतस्मिन्नतरे शंभुस्खुलीलो भक्तवत्सरः ॥ सुनतंकनटो धत्वा मेनकासंनिधि ययौ
॥ २६ ॥ शरंगं वमे करे धृत्वा दक्षिणे मङ् तथा ॥ पृ कंथां रक्तवासा तृत्यगानविशारदः ॥ २७ ॥ ततस्सुनटङ्वोसौ
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‰|| मेनकाया गणे शुदा ॥ चक्रे सुदृत्यं विविधं गाने चातिमनोहरम्॥ २८ ॥ शगु च डमरं तञ वादयामास घष्वनिम् ॥ महतीं
& || विव्रिधां त्र स चकार मनोहराम् ॥ २९ ॥ तां दष्टं नागरास्सवं पुरुषाश्च च्ियस्तथा ॥ आजग्बुस्सहसा त बाला वृद्धा
¢ अपि धुवम् ॥३०॥ शत्वा सुगीतं तदृष्टा सुवरत्यं च मनोहरम् ॥ सहसा भुखहृस्सवे मेनापि च तदा शने ॥ ३१ ॥ मूर्छा
रसं. २ £ संप्राप्य सा दुगा बुहद्वा हदि शंकरम् ॥ अिश्चलादिकचिह्नानि बिभ्रतं चातिञुन्दरम् ॥ ३२ ॥
पास. || शृंगी ओर इमहको बडी ध्वनिक साथ शिवजीने बजाया, ओर भी विषिध भकारकी मनोरथ बीणादि वजानेकी ऋीडाकी ॥ २९ ॥ तव
०३० ||) ^ ६ बी ग र ५९ बृढे सव कों देखनेकी इच्छा्े आये ॥ ३० ॥ वह गीत ओर मनोहर तत्य देखकर ॥
हे सने ! मेना ओर दूसरे छोग सब मोहित होगथे ॥ ३१ ॥ शंकरका यह शप हदयमं विचारकर परावती मूत होई उ पार्वतीको
् शिशू आदि चिह धारण किये अति सुन्दर दिखाई दिये ॥ ३२ ॥ ॥ १, ( |
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विभूति ठगाथे अयन्त मनोहर अस्थिमाठाते शोभायमान तीन नेग्रोसे उज्ज्वल ख, नारगोका यज्ञोपवित प्हरे ॥ ३ २॥ गौरबणे ।
दयासागर सवेथा मनोहर गौरणं महेश्वर वर भांग इत्र भकार कहते हूए ॥ ३४ ॥ इस रकार हदयमे स्थित शंकरको देखकर पार्वती उनको
४ भणाम् किया मौर मनम ही वरर्मागा कि तुम भरे पति हो ॥ २५॥ इस भकारमे हदयमे ही -शिवजी पावैतीको वर देकर अन्तर्षान हो
फिर भिश्ुकरपसे तत्य करने ठगे ॥ ३६ ॥ तव मेना उनसे बहुत प्रसन्न हो सुवणके पात्रे बहुतसे रत्न रखकर प्रेमे उनके निभित्त देने
¢ गदं ॥३७॥ नर्तैकने यह स्वीकार न किये ओर भिक्षामे शिवाको मांगा ओर किर कौतुके चरत्य तथा गान करने गे ॥ ३८ ॥ मेना
विभरूतिविभरूषितं रम्यमस्थिमालासमन्वितम् ॥ तिरोचनोज्ज्वलद्वक्रं नागायज्ञोपवीतकम् ॥ ३२ ॥ वरं बृण्विल्युक्तवन्तं
६| गौरवर्ण महेश्वरम् ॥ दीनबन्धु दयासिन्धु सर्वथ। सुमनोहरम् ॥ ३४ ॥ हृदयस्थं हरं टष्टेदशं सा प्रणनाम तस् ॥ वरं कते
&|| मानसं हि पतिम त्वं भवेति च ॥ ३५ ॥ वरं दत्त्वा शिवं चाथ तादृशं प्रीतितो इदा ॥ अन्तर्धाय पुनस्तत्र सुननत्तं स
| मिश्चुकः ॥३६॥ ततो मेना सुरत्नानि स्वर्णपा्रस्थितानि च ॥ तस्मै दातं ययौ प्रीत्या तद्धृतिप्रीतमानसः ॥ ३७ ॥ तानि
न स्वीचकारासौ भिक्षाया शिवां च ताम् ॥ पुनस्सुतृत्यं गान कौतुकात्कतैषयत्ः ॥ ३८ ॥ मेना तद्वचनं थत्वा व
पाति सूविस्मिता ॥ भशं भत्तयामास बहष्कतैमियेष सा ॥ ३९ ॥ एतस्मिन्नन्तरे तत गंगातो गिरिराययौ ॥ ददशं
४० ॥ अत्वा मनाशुखादृततं तत्सव सुचकोष सः ॥ आज्ञा चकाराबुचरान्बहिष्कर्तञ्च
तं नम् ॥४१॥ महाभ्रिमिव दुःस्पशं पज्ज्वलन्तं सतेजसम् ॥ न शशाक बहिष्कतु कोपि तं स॒निसत्तम ॥ २ ॥
उसके वचन सुन विस्मयपुषंक बडी करोधित हुई ओर भिशषुकको षुडककर बाहर निकारनेकी इच्छा की ॥ ३९ ॥ इसी समय हिभाख्य भी
॥ च आंगन नराकार उस भिकषुकको देखा. ॥ ४० ॥ मेनके सुलसे यह शान्त सुनकर दिमाख्यको बडा कोष इभा,
९ भपने सेवको नयको बाहर निकाठनेकौ आक्ञा दी ॥ ४१ ॥ जो भहा अभिक समान नेक अयोग्य तेजते दःसह थे,
उनको बाहर निकाठनेकी किपतीको भी समर्यं न हुईं ॥ ४२ ॥ 5 भोग्य तेजते दुःसह थे, हे नि्तम
+न
~ 49 09 1949
पुरतो भिक्षु परंगणस्थं नराकृतिम् ॥
2
शि०्पु°
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रुप. २
पा.ख.३
अ०३०
च्छ ् ९
हे नारदजी ¡ उतत समय अनेकं ठीछा करम चतुर वह भिश्वक परवतराजफ़ निमित्त अपना अत्यन्त भभाव दिखाने णे ॥ ४२ ॥ ८
|| जने देखा कि उनका अहत वि्यहप हो गया ह, किरीट ककर कुण्डलं धारे पीत वज्ञ ओर चार भुजा ह ॥ ४४ ॥ पूजक समय ।¶णध
|| जीको हिमाख्यने जो दष्प पूजा दी थी बह हिमाखयने भिश्ुक शरीर तथा शिरपर देखी ॥ ४५ ॥ फिर थोडी देर ही उनको हिमालय
ट| यने जगत्के सरष्टा बरह्ाजीके रूपमे चारख॒लकाछा देखा किं ठाल्व्णं है ओर वेदोके सक्त उचारण कर रहे हँ ॥ ४६ ॥ फिर उनको जग
ट तके नेर खयके स्वरूपम देखा गिरिराजने देखा किक्षण क्षणम नर अनेक को तुक क्ते है ॥४७॥ है तात 1 फिर हिमाटयने उनका महा अदत
ट ततस्सभिशचकस्तात नानालीलातिशारदः॥ दशयामास ेलायस्वप्रभावमनन्तकम् ॥ ४३ ॥ शलो ददृशतं त विष्णङूपधरं
ट| दतम् ॥ किरीटिनं कुण्डलिनं पीतवघ्ठ चतुजम् ॥ ४४ ॥ यद्यरपुष्पादिकं दत्तं पूजाकाले गदाभते ॥ गात्रे शिरसि तत्सर्व भिक्षु
| कस्य ददशं ह॥४५॥ ततो ददर्शं जगतां सष्टारंस चतु्ुखम् ॥ रक्तवणि पठन्तश्च तिसृक्तं गिरीश्वरः ॥ ४६ ॥ ततस्पूर््यस्वह
| पथ जगचशषुरस्वरूपकम् ॥ ददशं गिरिराजस्स क्षणं कौतककारिणाम् ॥ ४७ ॥ ततो दद्शं तं तात श््रह्पं महाद्धतम् ॥ पार्वती
|| सहितं रम्यं विहसन्तं सतेजपम्॥४८॥ ततस्तेजुस्यरूपञ्च निराकारं निरंजनम् ॥ निश्पा्धि निरीह महाद्धतमरूपकम् ॥४९॥
ठ एवं बहूनि रूपाणि तस्य तत्र ददश सः ॥ सुविस्मितो बशरवाञ्च परमनन्दसंयुतः ॥९०॥ अथासौ भिश्वुवर््यौ हि तस्मात्तस्या
ट सतिङृत्॥ भिक्षां ययाचे दुगान्तां नान्यनग्र ह क्थन् ॥५१॥ न स्वीचकार शेटेन्द्रौ मोहितश्शिवमायया ॥ भिश्ः किंचित्र जमाई
ततरैवान्तद॑घे ततः ॥ ९२ ॥ तदा वधरव सुज्ञानं मेनशेलेशयोरिति ॥ आवां शिवो वञ्चयित्वा स्वस्थानं गतवान्प्रधुः ॥ ५३ ॥
ट | देखा, जो क पाव॑तीके सहित परम मनोहर अपने तेजते भरकाशित हौ रह थे ॥ ४८ ॥ फिर उनका स्वहटप निराकार ओर निरंजन
|| उपाधि रहित निरीहं महा दुत एता देखा ॥४९॥ इस प्रकारसे उनके बहूुतसे रपस हिमाल्यने देखे ओर परम आनंद संयुक्तं होकर वह बडे
ह|| विस्मयको भाप हुए ॥ 4० ॥ तवर सृष्टिके उत्पन्न करनेवाठे भिश्ुकने फिर दुर्गाकही याचना की, ओर कुछ नहीं मांगा ॥ ५ १॥ शिवकी माया
॥ मोहितहोनेके कारण हिमाख्यने यह बात स्वीकार नहीं की तव भिश्षुकने कुछ भी रहण न किया ओर अन्तर्धान हो गये ॥ ५२ ॥ तव मेना ओौर
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हिमाठयको यह ज्ञान हृ कि भमु शंकर हम दोनोको वचित कर अपने स्थानको गये ॥५१॥ जव उन्होने इस बातका विचार किया ्
तृतीयपावेतीलण्डे तंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ ब्रह्माजी वो हे नारद ! इस प्रकारे उन दोनोकी शिवजीमे अव्यभिचारिणी भक्ति जानकर
सच इन्द्रादि देवता विचारं करने ठगे ॥ १ ॥ देवता बोछे यदि हिमाछय अनन्य भक्ति करेगे, ओर शेकरको अपनी कन्या दंगे तो भारतमे
तयोतिचिन्त्य तञेवं शिते भक्तिरभूत्परा ॥ महाभोक्षकरी दिम्या सर्वानन्दग्रदायिनी ॥५४॥ इति श्रीशिवमहाएराणे द्वितीयायां
ज्ञात्वा प्रामन्याभिचारणीम्॥ सव शक्रादयो देवाश्चिचिन्तुरितिनारद ॥१॥ देव उचुः॥ एकान्तभक्त्या शलश्रेत्कन्यां तस्मै
मदास्यति ॥ धरं नर्वाणता सद्यस्स प्राप्स्यति च भारते ॥२॥ अनन्तरत्नाधारश्चत्थ्वीं त्यकत्वा भरयास्यति ॥ रल्गभामिधा
भूमिमिथ्येव भविताधुवम्॥३॥ स्थावरत्वं परित्यज्य दिष्यक्पं विधाय सः॥ कन्यां शुलभरते दत्वा शिवलोकं गमिष्यति॥४॥
महादेवस्य सदप्यं लप्स्यते नात्र संशयः॥ तञ थुक्तावशन्भोगास्ततो मोक्षमवाप्स्यति ॥ ५ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्यालोच्य सुश
सस कृत्वा चामन््णं मिथः ॥ ्रस्थापयितुमेच्छस्ते युर तञ सुविस्मिताः॥६॥ ततः शक्रादयो देवास्सवे गुङ्निकेतनम्॥ जग्सुः
पीत्या सविनयानारद स्वार्थसाधकाः॥७॥ गत्वा तत्र गुरं नत्वा स देवास्सवासवाः॥ चछुनिवेदनं तस्मे गुरवे वृत्तमादरात्॥८॥ ए
मिश्या नामराढी होगी ॥ ३ ॥ स्थावर रूपको छोडकर वह दिव्य रपृ धरारणकर शिवजीको अपनी कन्या देकर शिवलोकम जारयेगे ॥ ४ ॥ ६
दमे सन्देह नहीं वह ॒महादेवजीके साप्यको परात्र होगे वहां अनेक भोग भोगकर अन्त मोक्षको प्रान होगे ॥ ५॥ बहाजी बोरे इस |©
रकारसे सतर देवता आढोचना कर परस्पर सम्मति करके विस्मित हो य॒र्को उ स्थानें भेजनेकी इच्छा करने ठगे ॥ ६ ॥ तव सब इन्द्र |
दिकं देवता शरु बृहस्पतिजीकै स्थानको प्रीति ओौर नप्रतासे स्वाथ साधनके निभि गयै ॥ ७ ॥ हे नारदजी ! वे सब देवता इन्द्रादिके साथ
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महा मोक्ष करनेवाटी परम दिव्य स्व आनन्दकी देनेवाठी भक्ति शिवजीमे हदं ॥ ५४ ॥ इति भरीशिवमहा्राणभाषाटीकायां रुदसंहितान्तत
चहं शीघ्र ही निंश्वय निवीण पदको भातत होगे ॥ २ ॥ जो अनन्त रलोकी आधार प्रृथिवीको त्याग करके जार्ेगे तो यह रलगमा भूभि त
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शद्रसंदितायां तृतीये पार्वतीखंडे पार्वतीप्रत्यागमनमहोत्सववर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तयोर्भक्ति शिते ¢
ह
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शिण्पुर
॥ २५९
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पा.खं.३
अ०३१
भिलकर यरुजीको भणामकर आदरे सव इनान्त निमेदन करने कगे ॥ < ॥ देकता कोठे हे यरो ! हमरे काकी सिदचिके निमित्त ू
हिमाठयके घर गमन कीजिये, वहां जकर यत्ते शिवजीकी निंदा करो ॥ ९ ॥ शिषजीके विना पावती दृत्तरा वर हण नहीं करेगी
विना इच्छाकै सुताको देकर शीघ फ न भिडेगा ॥ १० ॥ है यरो ! समयाचार इस समय हिमाठ्य मूलोकमे स्थिति करे उत॒ अनक
रत्नोके आधारको तुम भूलोके स्थापना करो नहीं तो भक्तिसे विवाह करते ही उनको षोक्ष हौजायगी ॥ ११॥ ब्रह्माजी बोट यह दवता
ओ वचन सुनकर गुरु बृहस्पतिने कानोंपर हाथ रक्ते ओर शिवका नाम स्मरण करते हुए इस बातको स्वीकार न किंया ॥ १२ ॥ ओर
॥ देवा उचुः ॥ शुरो दिमाख्यगृहं गच्छस्मत्काय्यैसिद्धये॥ तत गत्वा प्रयत्नेन इह निन्दाचश्चुल्िनः ॥९॥ पिनाकिना विना
दुगां वरं नान्यं वरिष्यति॥ अनिच्छया सुतां दत्वा फं तूर्ण ंभिष्यति ॥१०॥ कालेनैवाधुना शं इदानीं थुवि तिष्ठतु ॥ अने
करत्नाधारं तं स्थापय त्वं क्षितौ शरौ ॥११॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति देववचः शत्व प्रददौ कर्ण॑योः करम् ॥ न स्वीचकार स॒
गुह स्स्मशत्राम शिवेति च ॥ १२॥ अथ स्त्वा महादेवं बृदस्पतिर्दारधीः ॥ उवाच देववर्याश्च धिक्कृत्वा च पुनः पुनः
॥ १३ ॥ बुहस्पतिङवाच ॥ सवे देवास्स्वार्थपराः परारथष्वंसकारकाः ॥ कृत्वा शंकरनिदां हि यास्यामि नरकं धुवम् ॥ १४ ॥
कञिन्मध्ये च युष्माकं गच्छेच्छैलान्तिकं सुराः ॥ संषादयेत्स्वाभिमतं शेलेन्द॑ प्रतिबोध्य च ॥ १५॥ अनिच्छया सुतां दत्वा
सुखं तिष्ठतु भारते ॥ तस्मे भक्त्या सुतां दत्वा मोक्ष भराप्स्यति निशितम् ॥ १६ ॥
देवता स्वाथ साधनम तत्पर हो पराया अथे ध्वे करनेदाठे हो शंकर की निंदा कलते सजञे अवश्य नरक होगा ॥ १४ ॥ हे देवताभो कोहं
तुम्हारे मध्यमं ठसाहौजो हिमार्यकै समीप जाय ओर हिमाखयको समज्ञाकर पहठे अपना प्रयोजन स्िड कर ठे ॥१५॥ अनिच्छासे वह
अपनी कन्याको देकर भारतम घुखसे निवास करे ओर भक्तिपु्वक शंकरको कन्या देकर निश्वय भोक्षकी भाषि होगी ॥ १६ ॥
९ इडन्राषंः 1
न
उदार इद्धिवाठे ब्हस्पतिजी महादेवो र्भरणकर उन देवताओंो वारंवार धिक्कार देकर कहने छ्गे ॥ १३ ॥ बृहस्पतिजी बोढे तुभ सव |
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पीठे स्व सातो ऋषि प्वंतराजको समञञा्वेगे कि शिवजीके शिवाय पारवती दूसरेको वर नहीं करेमी ॥ १७ ॥ अथवा हे देदताओ ! तुम क्षब
इन्द्के सहित बहटोकको जाओ ओर अपना श्व बृ्तान्त सुनाओ तो वह तुम्हारा श्षब कायं करगे ॥ १८ ॥ बह्लाजी बोरे यह ददन सुन
विचार कर वे सव देवता भेरी समाम आगे ओर भरणा कर आदरसे सबन उस बृत्तान्तको वणन किया ॥ ३९ ॥ देवताओं |
सम्बन्धी वचनोको सुनकर हे सुने ! वेदवक्ता होकर भी दुःखी होकर मँ उने कहने खगा ॥ २० ॥ बह्ाजी बोले हे वत्सो ! भरँ दुःसह शिव
निन्दा करने समथ नहीं हूं शिवकी निन्दा सेपत्तिकी विनाश करने वारी ओर विपत्तिकी बीजहप है ॥ २१ ॥ हे देवताओ ! तुम कैलाश
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¢ पात्सप्पयस्सवे बोधयिष्यन्ति प्तम् ॥ पिनाकिना बिना दुगा वरं नान्यं वरिष्यति ॥१७॥ अथवा गच्छत सुरा बह्नरोकं
सवासवाः ॥ वृत्ते कथयत स्वं तत्स वः कार्य करिष्यति ॥ १८ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तच्छत्वा ते समारोच्याजग्धुमैम सभां सराः॥
सते निवेदयां चुनैत्वा तद्रतमादरातू ॥ १९ ॥ देवानां तद्वचः थत्वा शिवनिन्दाकरं तदा ॥ वेदवक्ता विकूप्याहं तानवोचं सरा
न्युनं ॥ २० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ नाहं कते क्षमो वत्साः शिव॒निन्दां सुदुस्सहाम्॥ संपद्विनाश हषाञ विपदां बीजकूपिणीम् ॥२१॥
सरा गच्छत कैलासं सन्तोषयत शंकरम् ॥ भस्थापयत तं शीभं दिमारयगृहं भरति ॥२२॥ स गच्छेदुपररेशमात्मनिन्दां करोतु
|| ३. ॥ प्रनिन्दाविनाशाय स्वनिन्दा यशसे मता ॥२३॥ ब्रह्मोवाच ॥ त्वेति मद्वचो देवा मा भणस्ययुदा च ते ॥ कैरासं भयथुः
¢ शीरं शखानामधिप् गिरिम्॥२४॥तञ गत्वा शिवं दषा प्रणम्य नतमस्तकाः ॥ सुङ्ताजलयस्सवं तृषटबुसतं खरा हरम् ॥ २९५॥
॥ देवा उचुः ॥ देवदेव महादेव करूणाकर शंकर ॥ वयं त्वां शरणापत्नाः कृपां ङ् नमोऽस्तु ते ॥ २६ ॥
जाकर शिव्रजीको सन्तुष्ट करो ओर शीघही उनको हिमाठ्यकै घर भिजवाभो ॥ २२ ॥ वही स्वयं हिमाठ्यके यहा जाकर अपनी निन्दा
&|| कर -पराई निन्दा नाशकै निमित्त ओर पनी निन्दा सदा यशकै निमित्त होती है ॥ २३ ॥ बहलाजी बोछे वे देवता इस भरकारसे मेरे षृचन
¢ पुन प्रमे सुञ्चको प्रणाम करके शीघरही कैडासपरति शेकरकै समीप गये ॥ २४ ॥ वहां जाय शिवो देख गर्दन काक संडे इए
पू
ओर स देवता हाथ जोडकर -शंकरकी स्ति करने ठगे ॥ २५ ॥ देवता बो हे देवदेव महादेवं ! हे करुणाकर ! हे शंकर ! हम आपै
११४
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् शेकराजके यहां गये ॥ ३१ ॥ जिस समय रोठराज अपने ब
ठटकाये, भक्तिसे नारायणका नाम जपते हृए साधु वेषधारी साक्षात् बा
शरण ह आप ङपा कीजिये आप्रको श्रणाम है ॥ २६ ॥ हे स्वामिन् ! आप भक्तवत्सर सदा देवताओंके कायं करते रहते ५ र
उद्धार करने वे रूपासिन्धु भक्तोकी आपत्ति दूर् करने वाटे है ॥ २७ ॥ ब्रह्माजी बे इस प्रकार इन्द्रादि सव देवताओंने शवजीक
सृति कर आदरसे वह सत्र वृत्तान्त निवेदन किया ॥ २८ ॥ देवताओंके यह वचन सुन शिवजीने यह बात स्वीकार कर छी |
हैसकर तथा समज्ञाकर उन सव देवताओंको बिदा कर दिया ॥ २९ ॥ देवता बडे प्रसन्न होकर शीघ्रही अपने स्थानोको चे
गये अपने कार्थकौ सिद्धि मानकर सदाशिवकी प्रशंसा करने गे ॥ ३० ॥ तब मायापरति विकार रहित भक्तवत्सछ भगवानु
त्व भक्तवत्सलः स्तामिन्भक्तकायैक्रस्सदा ॥ दीनोद्धरः कपासिन्धुर्क्तापद्विनिमोचकः ॥ २७॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्तुत्वा
महेशानं सवे देवास्सवासवाः ॥ सर्व निवेद्याच्स्तदत्तं तत आदरात् ॥ २८ ॥ तच्छ्रत्वा देववचनं स्वीचकार महेश्वरः ॥
देवान् याप्या मास तानाश्वास्य विहस्य सः ॥२९॥ देवा शशुदिरे स्वँ शी गत्वा स्वमेदिरम् ॥ सिदध मत्वा स्वकां हि
प्रशंसन्तस्सदाशिव॒म् ॥ ३० ॥ ततः सभगवाज्छम्भुमेदेशो भक्तवत्सलः ॥ प्रययौ ैटभूषञ्च मायेशो निर्विकारवान् ॥२१॥
यदा शेरस्सभामध्ये सुवास दान्वितः ॥ बन्धुवंः षरिवेतः पारव॑तीसहितस्स्वयम् ॥ ३२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे त द्याजगाम
सदाशिवः }; दण्डी छी दिव्यवासा बिभत्तिलकशुज्ज्वलम् ॥ ३३॥ करे स्फटिकमालाञ्च शाल्यामं गरे दधत् ॥ जपन्नाम
इरभक्तया साधवेषधरो द्विजः ॥२९॥ तं च दष्टा सशुत्तस्थौ सगणोऽपि हिमालयः ॥ ननाम ॒दण्डवद्धूमौ भ्तयातिथिम
पूरकम् ॥ ३९ ॥ ननाम पावती भक्त्या प्राणेशं विभररूपिणम् ॥ ज्ञात्वा तं मनसा देवी तुष्ठाव परया शुदा ॥ ३६ ॥
र ३ न्धुवगोके साथ तथा पावती सहित सभाम विराजमान ये ॥ ३२ ॥ उसी
समय वहां दण्ड छत्र दिव्य वद्ञ ओर तिङ्क धारण किये सदाशिव आकर भन हुए ॥ ३३ ॥ हाथमं स्फरिककी माटा, गमं शादिग्राम
हण ॥३४॥ इस प्रकार उनको देखकर हिमाट्य बन्धु बाधिवों सहित उढ खडे
हुए ओर अपू अतिथिको देखकर भक्तमूरक पृथ्वीम दंडवत् भणाम किया ॥ ३५॥ ओर पार्थतीने मी प्रम भक्तिते विषरूपी भाणेशको अणाम
|
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किया ओर उनका स्वरूप जानकर देवने उनको मनसे रणाम कर स्तुति की ॥ ३६ ॥ बराह्मण रूपधारी शंकरने सबको भ्रमते
दिया, हे तात ! विशेषकर पावंतीको मनसे आशीर्वाद दिया ॥ ३७ ॥ बाह्णने प्रेमे मधुपकीदिक सव सामा प्रहण की जो शेङाधिएज
( हिमाख्यने बहत आद्रे दिया ॥ ३८ ॥ हे जने ! पैत्रे हिमाख्यने बहुत प्रीति उस्न बा्णणकी पूजा करके इस ब्ह्माणकी कुशठ
पूढी ॥ ३९ ॥ ओर किर पर्वतराजने पूछा कि आप कौन है तब वह बाह्मण शीघ ही हिमाठयते आदयपूर्वक कहने कगे ॥ ४० ॥
¢ नालणनरष्ठने कहा हें पवेतराज ! हे बुद्धिमान अष्ट ! भै बाह्मण हूं घटिकी ( ज्योतिषको ) दृ्तिका आश्य करके मै पृथिवीम क्चिरण
¢ आशिषं युयुजे विप्स्सवषा प्रीतितश्शिवः।॥ शिवाया अधिकं तातमनोभिलषितं हदा ॥ २७॥ म॒धुपकादिकं सवै जमाह ब्राह्मणो
# युदा ॥ दत्ते शलाधिराजेन हिमांगेन महादरात् ॥ २८ ॥ पप्रच्छ कुशलं चास्य हिमाद्रि पर्वतोत्तमः ॥ तं द्विजेन्द्रं महप्रीत्या
सम्पूज्य विधिवन्मुने ॥ ३९ ॥ पुनः पप्रच्छ शेखेशस्तं ततः कोभवानिति ॥ उवाच शीषं कपिन्द्रो गिरीं सादरं वचः ॥ ७० ॥
ए विपरन्द्र उवाच ॥ ब्राह्मणोऽहं गिरिश्रेष्ठ वेष्णवो बुधसत्तमः ॥ घटिकीं वृतिमाधित्य भमामि धरणीतरे॥ ७१॥ मनोयायी सर्व
/ गामी सवज्ञोे शरोबलात् ॥ परोपकारी शुद्धात्मा दयासिन्धुविकारहा ॥ ४२॥ मया ज्ञातं हराय त्वं स्वसुतां दातुमिच्छसि ॥
इमां पद्यसमां दिभ्यां वरखूपां सुलक्षणाम्॥ ४३ ॥ निराश्रयायासंगाय कुदपायाशणायं च ॥ श्मशानव।सिनेव्यालथाहिषपाय
ह| योगिने ॥ ४७ ॥ दिग्वाससेकगाजाय व्यालभूषणधारिणे ॥ अज्ञातदुलनाम्ने च कुशीटखायाविहारिणे ॥ ४९५ ॥
करता हूं ॥ ४१ ॥ मे अपने गुरुके आशीवीदरूप वरते मनके समान वैगवाछा सव च्थानमे पटुचनेकी सामध्यवाला तथा सर्वज्ञ हूं, प्राया
उपकार करनेवाला शुद्धात्मा दयामय ओर विकारोका हरनेवाठा हूं ॥ ४२ ॥ सुह यह विदित हआ है कि तुम शिवजीको अपनी कन्या
4 देेकी इच्छा करते हो यह पुम्हारी कन्या कमलके समान दिष्य रूप ओर भे ठक्षणोपे सम्पन्न है ॥ ४३ ॥ इसे तुम आश्चयरहित, अरतेग,
कुरूपः यणहीनः श्मशानवासी, सर्पधारी, योगी ॥ ४४ ॥ नभ, मटीनशरीर, सर्पौ भूषण धारण करनेवाठे, कुठ नामे अज्ञात, कुशीरं
चच त्
अ त
वि = ठे देनेवाटे
विहार हीन ॥ ४५॥ शरीरम भरम मर्नेवाठे, करोषी, अज्ञानी, अज्ञात आवा सदा विकट जटाधारी ॥ 9 ५ ४ सबके १ ा
॥२६१॥ सदा भ्रमण करनेवाठे नागोके हार धारण करनेवाठे भिश्चुक कृमागंमे निरत हठसे वैदमागेको त्यागनेवाटेके निमित्त देना चाह न
हे हिमालय ! यह आपकी बधि नि्वयही मंगर्की देनेवाट नही ह, ह ज्ञानियोमे भष | नारायणकै कुठे उलन तुम इत वातकी स
॥ ४८ ॥ पाषतीका दान् जिस पात्रे तुमने करना विचारा है वह पत्रक अनरूप नहीं है, , यह बात सुनते ही सव बहे रोग तुम्हार
हसी करगे ॥ ४९ ॥ हे शेटेराज ! इप्त बातका तो तुम विचार करो कि उनके कोहं वधु नहीं ह हारे यहां रनोकि देर है ओर उनको
विभरतिदिग्धदेहाय संकृद्धायाविवेकिने॥ अज्ञातवयसेऽतीव् जटाधारिण सदा ॥७६॥ स्ांश्रयाय ध्रमिणे नागहाराय भिक्षवे
इमागेनिरतायाथ वेदाऽध्वत्यागिने हठात्॥ ४७ ॥ इयं तेबुद्धिस्चर न ि्मगल्दा खट ॥ विबोध ज्ञानिनां श्रेष्ठ नारायणङ्क
लोद्धव ॥ 8८॥ न ते पाजावहूपश्च पाव॑तीदानकमंणि ॥ महाजनः स्मेरणखः अतमा्ाद्विष्यति ॥ ४९ ॥ पश्य शाधि
त्वं चन तस्येकोस्ति बान्धवः ॥ महारत्नाकरस्त्वश्चतस्य किञ्चिद्धनं न हि ॥ ५० ॥ बान्धवान्मेनकां कभपते शीघ्रं सतां
स्तथा ॥ सर्वान्पच्छ प्रयत्नेन पण्डितान्पावैतीं विना ॥ 49 ॥ रोगिणो नौषधं श॒श्वदरोचते गिरिसत्तम ॥ कुषथ्यं रोचतेऽभीक्ष्ण
महादोषकरं सदा ॥५२॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्यक्त बराह्मणः शीभं स वे क्त्वा स॒दान्वितः ॥ जगाम स्वालयं शान्तो नानालीलाकर
श्शिवः ॥९३॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसंहितायां ततीयेषावैतीखण्डे शिवमायावर्णनं नयेक्थिशोऽध्यायः ॥३१॥
किचित् भी धन नहीं है ॥ ५० ॥ हे शेकराज ! आप अपने वधुजनोते पेनकासे तथा दूरे पंडितो बहत कया पार्वतीकै सिवाय सवते #
छो ॥ ५१॥ हे भिरि्तम । रोगीको ओषधी अच्छी नही ठगती उत्ते तो महादौष करनेवाडा कुपथ्य ही निश्वय अच्छा ठगता है ||
५२ ॥ बरह्ाजी बोडे यह कहकर इह बाह्मण गिरिराजकैे दिये पदार्थोको शीघतासे भोजन र प्रसन्नता ओर शान्ति दिखाते हए
टीठा करने वाटे शंकर अपने स्थानको गये ॥ ५३ ॥ इति श्रीशिदषहाषराणे भा० दीका° शदरसंहितान्तगंततृतीय पाषतीखण्डे एकं
त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
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बलाजी बोके नाहमणके वचन सुनकर भेनाके हदयमं बडा दुःख हुभा उनके नेत्रम शोक छागया हदयमें दुःखी हो हिमार्यसे बोी ॥ १
शेखेनद्र ! प्रिणाममे सुख देनेवाठे मेरे वचनको आप सुने, जो कुछ बात इश बाहणने कही ३ यह बात आप सब गेवोपे निश्वय करं ॥२॥ ४||
इस वैष्णव नाहञणने शिवजीकी निन्दा की है, हे नगेश्वर ] उत्ते सुनकर भेरा मन बहुत व्याकु हुआ ॥ ३ ॥ है शेश ! जोशू्रर्सेहैतो त
मं उनको अपनी कन्या नहीं दगी इस सुखक्षणी घुताको कृषूपशाटी शकरको कैसे देसकती ह ॥ ४ ॥ यदि तुम मेरे वचन नहीं मानोगे तोम
अपने प्राण देदूगी, म यह षर छोड दूगी व विष खाहंगी ॥ ५ ॥ गर्म रस्सीते अम्बिकाको बाधकर वनम चटी जाऊंगी, महासागरं दूब ¢
॥ ब्रह्मोवाच ॥ ब्रह्मणस्य वचः शरुत्वा मेनोवाच दिमाख्यमू्॥ शोकेनासाधुनयनाडदयेन विदूयता ॥ 9 ॥ मेनोवाच ॥ शुणु ¢
शलेनद्र मद्वाक्यं परिणामे सुखावहम् ॥ पृच्छ शववरान्सर्वान्किुक्तं ब्राह्मणेन इ ॥ २ ॥ निन्दानेन कृता शम्भोक्षष्णवेन द्विज ¢
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न्मन[ ॥ शचत्वा तां मे मनोऽतीव निर्विण्ण हि नगेश्वर ॥३॥ तस्मे रदाय शेकेश न दास्यामि स॒तामहम्॥ इुहूपशीरनम्मे हि
सुक्षणयुतां निजाम् ॥ ॥ न मन्यसे वचो चेन्मे मरिष्यामि न संशयः॥ त्यक्ष्यामि च गृहं सयो भक्षयिष्यामि वा विषम्
॥५॥ गक बदूध्वांबिकां रज्ज्वा यास्यामि गहनं वनम् ॥ महाम्बुधो मनयिष्ये तस्मै दास्यामिनो खताम् ॥६॥ इत्युक्काञ्च तथा
गत्वा मेना कोपाख्यं शचा ॥ त्यक्त्वा हारं रुदन्ती सा चकार शयनं ुवि ॥७॥ एतसिम्नन्तरेतातशम्थना सतत एवं ते ॥
सस्मरृता ऋषयस्सद्यो विरहव्याङात्मना ॥८॥ ऋषयश्चवते स्व शम्भुना संस्टृता यदा ॥ तदाऽऽजग्बुः स्वयं सयः कल्पक्षा
इवापरे ॥ ९ ॥ अरुन्धती तथाऽऽयाता साक्षात्सिद्धिरिवापरा ॥ तान्दक्षा सूर्यसकाशान्विजहौ स्वजपं हरः ॥*१० ॥ ¢
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जाऊगी, परन्तु शंकरको अपनी श्रुता नहीं ईृगी ॥ & ॥ यह कहकर शोककै भारे मेना शीघही कोप भवनको चटी गई हार भूषण स्ागकर
रोती हदं पृथिवीम रोने ठगी ॥ ७ ॥ हे तात ! सती समय विरहे उयाकङ होकर शिवजीने उन सातो ऋषिको स्मरण किया ॥ ८ ॥
जयोही शिवृजीने _ उन सातो ऋषियोंको स्मरण किया वे दूसरे कल्पदक्षोके समान तत्का वहां आकर भरा हए ॥ ९ ॥ अरुन्धती तथा
दूसरी उनकी च्ियं साक्षात् सिद्धिकै समान आकर पराप् हुदं॑सर्यके समान उन ऋषिोंको देख शिवजीने जपते विराम किया ॥ १०॥ ह
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ट् ओर जिनको आप स्मरण करो उनके प्ण्यकी कथा तो कौन वणन कर सकता हे ॥ ३६ ॥ हे सदाशिव ! आपके स्मरण करनेमे हम सवस
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पा.खं.र ||| उक्छृषट हो गये, तुम साक्षात् तो कौन कहे किसके मनोरथम भी नहीं आते हो ॥ १७ ॥ जेते बोनेको फल, अन्धेको नेत्र, गृगेको वाणी, ||
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छने ! बे तपस्वी ऋषि शिवजीकै आगे स्थित हो भणामकर स्तुतिकर अपने 14.294. (9
नमस्कार कर स्थित हो लोकसे नमस्कारको भाप शकरसे हाथ जौढडकर कहने रगे ॥ १२ ॥ ऋषिं बोे.हे समं श्रेष्ठ हे महाराज ! ह दव
ताओक्े चक्रमे बरडामणि स्रा ! हम इस समय अपने सवेभेष्ठ भाग्य वणन करते है ॥ १३ ॥ जो हमने पूरका तीन भरकारका तप किया
है, उत्तम वेदाध्ययन किया है, अभ्रम आहूति दी है, अनेक ती किये 8 ॥ १४॥ मन वचन कमपे जो तीन प्रकारका पण्य व
वह आज आपके स्मरण ओर अचुग्हसे सफठ हुआ है ॥ १५ ॥ जो मद्य नित्य आपका भजन करता है वह _रतरूत्य हो जाता ह,
स्थित्वा ऋषयः भरघ्ं नत्वा स्त॒त्वा शिवं शुने ॥ मेनिरे च तदात्मानं कृताथ तेतपस्विनः ॥ 39 ॥ ततो विस्मयमापन्ना नम
स्कृत्य स्थिताः पुनः ॥ भ्ोञः पा्ञखयस्ते वे शिवं लोकनमस्कृतम् ॥ १२ ॥ कषय उः ॥ सर्वौत्कृष्ठं महाराजं सावभोम
दिवौकसाम् ॥ स्वभाग्यं वण्यंतेऽस्माभिः किं पुनस्सकलोत्तमम् ॥१३॥ तपस्तपे त्रिधा पूरवे वेदाध्ययनघुत्तमम् ॥अश्नयश्च हताः
पर्व तीर्थानि विविधानि च॥१४॥ वाङ्मनःकायजं किचित्पुण्यं स्मरणसस्भवम् ॥ तत्सवं सगत चाद्य स्मरणानुभ्रहात्तव ॥१९॥
यो वै मजति नित्यं तां करृतक्रव्यो भवेन्नरः ॥ कि पुण्यं वण्यते तेषां येषां चस्मरणं तव ॥१६॥ सर्वौत्करष्ठा वथ जाताः स्मरणात्ति
सदाशिव ॥ मनोरथपथनेव गच्छसि त्वं कथंचन ॥ १७ ॥ वामनस्य फलं यद्रनन्भान्धस्य दशौ यथा ॥ वाचाखत्वञ्च मूकस्य
रंकस्य निधिदर्शनम् ॥ १८ ॥ पङ्घोगिरिवशकान्तिर्षन्ध्यायः प्रसवस्तथा ॥ दशनं भवतस्तद्वनाते नो दुर्टमं प्रभो ॥ १९॥
आपको छता मानने ठगे ॥ ११ ॥ फिर विस्मयको प्राप्त हौ
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ओर कगाटको निधिका दशन हो जाय ।॥ १८ ॥ टला पर्वतोंपर चढने ठगे, बन्ध्याके पुत्र होजोय, हे प्रभो ! इसी प्रकार आपका दुकेभ ||
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दशन् हमको भ्राप्त हभ है ॥ १९ ॥ =
आजक्े छेकर् हम अनीश्वर छोकोमे मान्य ओर पूज्य हुए,
आपृ सर्वेश्वरके दशंनसेही हम सर्वथा मान्यताको प्राप्त
हमारे उपर परम छपा है, तो आपको से
उनकै वचन भ्रवण कर ठो किक आचारके आशित हो उनसे मनोहर वचन कहे ॥ २३ ॥ शिवजी बोे ऋषि
उनमें विशेष रूपे पूज्य हो, हे बाह्णो ! एक विशेष कारणे भन तुम्हारा स्मरण क्रिया है ॥ २४॥
अद्यमरभृति लोकेषु मान्याः पूज्या खुनीन्वराः॥ जातास्ते दशनादेव स्वैः पदमाधिताः॥ २० ॥
था मान्यतां गताः ॥ दशनात् देवेश सर्वदेवेश्वरस्य दि॥२१॥ पूर्णानां किथचकर्तम्यभस्ति चेत्परमा
तु देयं काय त्वया ज्ुभम् ॥ २२
ग ॥ ॥ बरह्नोवाच॥ इत्येवं वचनं श्रत्वा तेषां शम्धु्मेश्वरः॥ लोकिकाचारमाभित्य रम्य वा
क्यसुपाददे ॥ २३ ॥ शिवं उवाच
॥ ऋषयश सदा पज्या भवन्त विशेषतः ॥ युष्माकं कारणाद्धि
॥ २8 ॥ ममातस्था भवद्धिश्ज्ञायते ्यपकारिका॥ साधनीया विशेषेण लोकानां सिद्धिहेतवे ॥
रकात्सद्रात्मनः ॥ ब्रह्मणा च वरो दत्तः किं करोमि दुरासदः ॥२६॥ सूर्तयोऽक्षौ च याःपोक्ता
पर मर्पिभिः ॥ २८ ॥ तस्ये पर फट देयमभीष्टं तद्धितावहम् ॥
भवस्था उपकारी है, छोक सिके निमित्त विशेष रपस उते साधनी चाहिये ॥ २५ ॥ दुरात्मा तारक
दुःख. भातत भा है, म क्या कर बहाने उत्को बडा विकट वरदान दिया है ॥ २६ ॥ हे शृहवियो
मूतियं कही जाती ह वह सव उपकारकही निमित्त है स्वा्थके निमित्त नहीं यह बात स्पष्ट
है ॥ २७.॥ इती निमि भँ शिवाके
तग विवाह करकी इच्छा कता ह, परमायोको मी क्न ऽतने भेरे निमित्त तपस्या कौ ३ ॥२८॥ उसके मनोरथ ओर हितका करनेवाखा
११५
पाः स्मरणं च मया कृतम्
२९ ॥ देवानां दुःखघुत्पन्नं ता
ए ॥ मदीयाः परमयः ॥ तास्वा
उपकाराय न ठ स्वाथाय तत्सम् ॥ २७ ॥ तथा च कठकामोहं विवा शिवया स व
6 ॥ तया व सखतपस्तपतं दुष्करं
एतादृशः पणो मे हि भेक्तानन्द््रदः स्फुटम् ॥ २९ ॥
है दैव ! आपै दशनसे इम् उच पदको हम् धरा हए है ॥ २० ॥ हे देवदेवेश |
हए है इसे बहुत कहनेते अया है ॥ २१ ॥ पूर्णौको कया करना चाहिये यदि आपकी
व्कोप्र कपा करके अब आज्ञा देनी चाहिये ॥ २२ ॥ बरह्ाजी बोठे महेश्वर शंकरे इस भकार
^
लोग सदा पूज्य है, ओर तुम
तुम जानतेही हो कि हमारी ||
अञ किं बहुनोक्तेन सर्व॑ ||
कृपा ॥ सदशं सेवकानां
अद्रे देवताओंको बहुत
। जो मेरी आढ प्रकारकी
उसको फ देना चाहिये न्द् देनेवारी मेरी भविज्ञा सर्व॑ भगट है ॥ २९ ॥ भैं पावतीके वचनसे भिश्वुक रूप धारण कृरके
नि द 0 वा रैन काठीको मांगा ॥ ३० ॥ तब दोनों जी र्षोने यसे परबह् जानकर परम्||
भक्तिते वेद रीति पूर्वक अपनी वा से देनेकी इच्छा की ॥ ३१ ॥ तब देवताओंकी भरणासे भने अप्रनीं निंदा दोनोको बुनाई ओर ©
वैष्णव रूपे ने उनकी बह भक्ति दूर करनेकी चेष्टा की ॥ ३२ ॥ यह मेरे वचन सुनकर वह दोनों खी पर्ष व्याकुल हो उत भक्ते ठ
हीन हए है, हे खनियो 1 अब वह भ॒ अपनी कन्या देनेकी इच्छा नहीं करते ॥ ३३ ॥ इस कारण तुम अदश्यही हिभारुयके षर जाओ,
पाव॑तीवचनाद्धिश्ुूपो यातो गिरेगैहम्॥ अहं पावितवान्कालींयतो खीलाविशारदः ॥ ३० ॥ मांज्ञात्वा तौ परं ब्रह्म दम्पती #
परभक्तितः ॥ दातुकामावभूतां च स्वतां वेदरीतितः ॥३१॥ देवग्रेरणयाहं वे कृतवानस्मि निन्दनम् ॥ तदा स्वस्य च तद्धक्ति ¢
विहन्तु वैष्ण्णवात्मना ॥ ३२ ॥ तच्छत्वा तौ सुनिविण्णो तद्धीनौ संबभूवतुः॥ स्वकन्यां नेच्छतो दातु मह्यं हि अुनयोऽधुना £
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॥२६२॥
॥ ३३ ॥ तस्माद्भवन्तो गच्छन्तु हिमाचलगशृहं भुवम् ॥ त्र गत्वा गिरिवरं तत्पत्नीञ्च प्रबोधथ ॥३७॥ कथनी प्रयत्नेन वचनं
वेदसम्मितम् ॥ सर्वथा करणीयन्तद्यथा स्यात्कार्य्थघुत्तमम् ॥३५॥ उद्वाहं कतैमिच्छामि तत्पुत्या सह सत्तमाः ॥ स्वीकृतस्त
द्विवाहो मे वरो दत्तश्च तादृशः ॥ ३६ ॥ अर किं बहुनोक्तेन बोधनीयो हिमाख्यः ॥ तथा मेना च बोद्धव्या देवानां स्याद्धितं
यथा ॥ ३७ ॥ भवद्धिः करसिपितो यो वे विधिस्स्यादधिकस्ततः ॥ भवताञ्चैव कार्य्यं तु भवन्तः कारय्यभागिनः ॥ ३८ ॥
| जाकर हिमालय ओर मेनाको समज्ञा ॥ ३४ ॥ यतनपूैकं उनसे वेद सम्मत वचन कहो सब भरकारसे वही करना जिससे कार्यिदधि
हो ॥ ३५ ॥ हे महावुभाव हियं ! भ उप्त हिभाख्यकी त्रीके संग विवाह करनेकी इच्छा करता हूं मैने उस्र विवाहको स्वीकार कर
| पाव्तीको वैसा बर दिया है ॥ ३६ ॥ इसमे बहुत कहनेसे क्या है तुषो हिमायको समञ्ञाना चाहिये ओर देवताओंकी कायं सिद्िके
निमित्त मेनाको भी समज्ञाना चाहिये ॥३७॥ जो आपने कल्पना की है उससे अधिक दिधि होगी यह आप्हीका कार्थं है ओर आपृही इस्
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कारयके भागी हँ ॥ ३८ ॥ बह्माजी बोठे इस भकार शिवजीके वचन सुनकर वे नि्ठ मनवाठे महिं शिवजी अलुभरहको भाप हो बंड
| भाप हए ॥ ३९ ॥ ओर बोठे हम आज धन्य ओर कतछत्य हुए हम सबके वदनीय आर पूजनीय विशेष रूप हृए ॥ ४० त
जिसको ब्रह्ा ओर विष्णु नमस्कार करते है जो सवके अर्थतिद्ध करनेवाडे है वह हमको टोकके सुखदायक भियकारथभे भरणा करते ह
है ॥ ४१ ॥ यह जगते स्वामी पिता ई, ओौर वह जगतकी स्वामिनी भाता है यह जगतका कल्याणकारक सम्बन्ध सदा चन्द्रमाके समान #
वृद्धिको भराप्र होता रहे ॥ ४२ ॥ ब्ह्ाजी बोरे इस भरकारसे वह दिव्यं सदाशिवको भणाम करके हिमाठ्यके नगरको आकाश मां #
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवं वचनं थत्वा शुनयस्तेऽमलाशयाः॥ आनन्दं लेभिरे सवे प्र्णावु्रदीकृताः ॥३२॥ वयं धन्या अभूव ¢
कृतकृत्याश्च सर्वथा ॥ वेद्या याताश्च सर्वेषां पूजनीया विशेषतः॥०॥ ब्रह्मणा विष्णुना यो वे वन्यस्स्वार्थसाधकः॥सोस्मान्पेषयते ठ
्रष्यान्कोयै रोकसुखावहे ॥४१॥ अयं वै जगतां स्वामी पितासाजननी मता॥अयं युक्त सम्बन्धो वदतां चन्द्रवत्सदा ॥४२॥ ठ
बर्मोवाच।॥इत्यु्ता हयूषयो दिव्या नमस्कृत्य शिवं तदा ॥ गता आकाशमार्गेण यत्रास्ति हिमवत्पुरम्॥४३॥दक्षातां चपुरं दिव्या &
मृषयस्तेऽतिविस्मिताः ॥ वर्णयन्त-अ स्वं पुण्यमब्रुवन्वे परस्परम् ॥ ४४ ॥ ॥ ऋषय उचुः ॥ पुण्यवन्तो वथ धन्या दषैतद्धिभव
पुरम् ॥ यस्मादेव विधे कार्य शिवेनैव नियोजिताः॥४५॥ अलकायाश्च स्वर्गाच्च भोगवत्यास्तथा पुनः ॥ विशेषेणामरावत्या श्यं ¢
ते पुरमुत्तमम् ॥ ४६ ॥ सुग्रहाणि सुरम्याणि स्फदिकैविविधेर्ैरेः ॥ मणिभिर्वा विचित्राणि रचितान्यङ्गणानि च ॥ ४७ ॥
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होकर गये ॥ ४२ ॥ उस दिष्य रको देखकर वे ऋषि बडे विस्मित हए ओौर अपना ण्य वणेन करते इए परस्पर कहने गे ॥४४॥ ऋषि
मो हम बडे पुण्यवान् ओर धन्य है जो आज हिभाठ्यका नगर देखते है धन्य है हम जो शिवजीने इस कारयन हमको नियुक्तं किया है
॥ ४५ ॥ यह हिमाख्यकी उरी अलकारीसे स्वर्गते सर्पौकी भोगवती परीते तथा अमरावती भी विशेष दिखाई देती है ॥ ४६ ॥ स्फरिक्
भणिकै इ एन्द्र सुन्दर अनेक षर है, इमे मणियोके बडे विचित्र आंगन बने है ॥ ४७ ॥
नन्या 2
शि०घ° || || सर्यकान्त ओर चन्द्रकान्त मणि षर रमे है इसी भकार षर मँ स्वके दृक्ष दिसाईं देते हं ॥ ४८ ॥ तोरण जंदनवार ओर 2६ ई ट
॥२६४ घर धरम दिखाई देती है अनेक ५. म विचित्र तोते ओर हंस बोकते हँ ॥ ४९ ॥ विचित्र वितान है वित्र कपडकं बनं €, त
उनमें बंदनवारं बंध रही है अनेक जलाशय है ओर अनेक घरमे बावडी है ॥ ५० ॥ अनेक भकारकं विचित्र उयान मनोहर बने हए ह ठ
मनुष्य सव देवता है ओर क्वि अप्सरायं है ॥ ५१ ॥ कर्मभूमि याक्िक ओर स्वग॑की कामनासे एरातन छोग जौ यज्नायु्ठान करते हैव
इस हिमाख्यके रफ सामने बृथा ही है ॥ ५२ ॥ जवतकं हिमार्यका नगर नहीं देखा है तभीतक _ मनुष्य स्वगेक कामना करते हँ ह |
सू्ैकान्ताश्च मणयशचन्द्रकान्तास्तथैव् च ॥ गृहे एहे विचिता बृक्ास्स्वगैसञद्भवाः ॥ ४८ ॥ तौरणानां तथा लक््मीरश्यते च ठ
गृहेगृहे ॥ विषिधामिविचित्राणि श्चकहसैविंमानकेः ॥ ४९ ॥ वितानानि विचित्राणि चैलवत्तरणेस्सई ॥ जलाशयान्यनेकानि |£
दीधिका विविधाः स्थिताः ॥ ५० ॥ उद्यानानि विचित्राणि भसत: पूजितान्यथ् ॥ नराश्च दैवतास्सवे धियश्चाप्सरसस्तथा ||
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गता हैमाल्यं सवं गृहं सर्वसमृद्धिमत् ॥ 48 ॥ तान्दष्ठा शूय्य॑संकाशान् हिमवान्विस्मितोऽत्रवीत् ॥ दूरादाकाशमागस्था
न्भुनीन्सत्त सुतेजसः ॥ ५९ ॥ ॥ हिमवाठुवाच ॥ सतते सूय्य॑संकाशाः समायाति मदन्तिके ॥ पूजा काय्यांगप्रयत्नेन भुनीनां
च मयाधुना ॥ ५8 ॥ वयं धन्या गृहस्थाश्च सवषां सुखदायिनः येषां शरदे समायान्ति महात्मानो यदीदशाः ॥ 4७ ॥
बाह्मणो ! जव इसको देख छिया तवं स्वगमे कया प्रयोजन है ॥ ५३ ॥ ब्हाजी बोरे हे ऋषिभरेष्ठ ! इतत प्रकारसे विचारते ओर उस एरका
वर्णन करते सब समृद्धिवाले हिमारयके घर गये ॥ ५४ ॥ उन देवताओके समान ऋषि्योको देखकर हिमालय विधित होकर देखने ठे कि ¢
मृहातेजस्वी सात पुरुष दूर आकाश मागमे आति है उन्दँ देखकर वोठे ॥५५॥ हिाठ्य बोढे जो सात पूष सर्यके समान हमारे समीप आते ||
है इन खनियोकी विशेष रूपमे अब सुज्ञे पूजा करनी चाहिये ॥ ५६ ॥ हम गृहस्थी लोग धन्य है जिनके यहां सवको सुख नेवारे आपकी |
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॥ ५१ ॥ कर्मभूमौ याज्ञिकाश्च पौराणास्स्वगेकाम्यया ॥ कुर्वन्ति ते वृथा सवं विहाय हिमवत्पुरम् ॥ «२ ॥ यावन्न दष्टमेतच ||^
# तावत्स्वर्गपरा नराः॥ दृष्टमेतयदा विप्राः कि स्वगे प्रयोजनम् ॥५३॥॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवमृषिवर्ग्यास्ते वर्णयन्तः पुरञ्च तत्॥ ||*
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समान महातमा आते ६।५७॥ हाजी मोठे इसी अवतर आकाशे प्रथिवी आकर स्थित हए उन ऋषियोंको अदङाकनकर हिमाढय
उनके ठेनेको गये॥५८॥ शिर श्चकाय हाथ जोड उन सप्त ऋषियोंको णाम करे बडेमानके माथ हिमारयने उनकी पूजा का ॥५९॥ बे सातो ऋषिं
हिमाङ्यकर हितकारिणी उस पूजाको ग्रहण करके पसन ससे हिमालयसे वचन बोढे ॥६०॥ हिमाङ्यने यथायोग्य उनका सत्कार करे कहा भेरा
गरह्थाभम धन्य ह पता कह आसन ठाकर मक्तिमूरवक दिया॥६१॥जब ऋषि आसनोपर वै घै तब दिमाछ उनकी आज्ञपि स्वयं भी आसननपर बै,
ब्रहनोवाच॥ एतस्मिन्नन्तरे चैवाकाशादेत्य थुवि स्थितान्॥ सन्मुखे हिमवान्दक्षा ययौ मानपुरस्सरम्॥५८॥ कृतांजसिरनतस्कन्धः
सपरषीन्सुप्रणम्य सः ॥ पूजां चकारतेषां वे बहमानपुरस्सरम्॥५९॥हितास्सतत्यस्त च दिमवन्तत्रगेश्वरम्॥ एृदीत्वोजुःप्रसत्नास्या
वचनं मङ्गलाख्यम् ॥ ६३० ॥ यथाग्रतश्च तान्कृत्वा चन्या मम गृहाश्रमः॥ इत्युक्त्वाकस्षनमानीय ददौ भक्तिषुरस्सरम् ॥ &9 ॥
आसनेपरपविष्ेषु तदाज्ञपस्स्वयं स्थितः ॥ उवाच हिमर्वोस्ततर ख॒नीञ्ज्योतिमंयांस्तदा॥६२॥ हिमालय उवाच ॥ धन्यो हि कृतङ्ख
त्यां सफलं जीवितं मम ॥ लोकेषु दशनीयो बहुतीर्थसमो मतः ॥६२॥ यरमाद्भवन्तो मदरेहमागता विष्णुूपिणः ॥ पूर्णानां
भत काय पणानां गदेषु किम्॥६९॥ तथापि किचचित्काय्यै च सदशं सेवकस्य मे॥ कथनीयं सदयया सफलं स्थानम
॥६९॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शुदरसंदितायान्ततीये पा्वतीखण्डे सतु्यागमनवर्णनं नाम दरार्थिशोऽध्यायः ॥३२॥
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करके करिये जिसे मेरा जन्म सफल होय
शौऽध्यायः ॥३२॥ ऋषि बोरे शिवजी जगत्के पिता कहे
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१ हस्तमिति शेषः ।
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जाते है, शिवा जगन्माता कही जाती है इस कारण हात्मा शंकरके निमित तुम अपनी कन्या देदो ॥ १ ॥ हे हिमाट्य 1 एता करलेष्र
आपके जन्म् सफढ हो जायगा, इसमे सन्देह नहीं ठुम जगद्थस्के गरूहो जाओगे ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बौटे हे खनीश्वर् इस भकारे सप ऋषियोके
वचन सुनकर भणाम कर हाथ जोड इस भकारे गिरिराज बोडे ॥ ३ ॥ हिमाट्य बोले हे सप्तऋषयो ! हे महा भाग्यवानो ! जो कछ आपने
कहा है वह शिवजीकी इच्छासे भने पहेही स्वीकार किया है ॥ ४ ॥ अभी थोडा समय हुआ किं एक वैष्णव बाह्णने प्रमे शिवको लक्ष्य कर
कुछ वचन कहे, जिसमे शकरकी निंदा थी ॥५॥ उक्ती समयसे पावतीकी माता ज्ञानश्रष्ट होगहं, ओर योगी श्रे अपनी कन्याका विवाह करना
एवं कृत्वा हिमगिरेसार्थकं ते भवेननुः॥ जगद्वरोहस्त्वं हि भविष्यसि न संशयः ॥ २॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं वचनमाकर्ण्य
सप्तषीणां शुनीव ॥ प्रणम्य तान्करौ बद्ध्वा गिरिराजोऽत्रवीदिदम् ॥३॥ हिमालय उवाच॥ सप्तर्षयो महाभागा भवद्धिर्थदुदी
शि ^|
॥ २६५]
सुतप्ता मलिनाम्बरा ॥ कत्वा सहाहटं विप्रा बोध्यमानापिऽनाद्ुधत् ॥७॥ अहं चज्ञानविभ्रष्टो जातोहं सत्यमीर्यते ॥ दातं सुतां
महेशाय नेच्छामिभिश्वुङूषिणे॥८॥ ॥ अह्मोवाच ॥ इत्युक्त्वा शेरराजस्तु शिवभायाविमोहितः ॥ तृष्णीं बभूव तजस्थो अुनीनां
मध्यतो ुने॥ ९ ॥ सवे सप्तषैयस्ते हि शिवमायां प्रशस्य वै ॥ ग्रेषयामाघुरथ तां मेनकां प्रत्यरन्धतीस् ॥ १० ॥
नहीं चाहती ॥ ६॥ बहुत कोधकर मीन वज्ञ धारणकर वह कोप भवनम चरी गईं, ओर हे बाणो ! उत्को एेसी हठ हुईं है कि समज्ञायेते
नहीं मानती ॥७॥; मे भी ज्ञानते शर्ट होगया हूं, आपे सत्य कहता हूं भिशुहपधारी शकरको अव अपनी कन्या देनेकी भुजे इच्छा नहीं है
॥८॥ हे सुने ! शेकराज इस भकारसे कहकर शिवकी मायासे मोहित होकर उन खनि मध्यमे मौन होकर स्थित हए ॥९॥ तब बै सातो
ऋषि शिक्की मायाकी भसा करके भेनकाके समीप अरन्धतीको भजते हए ॥ १० ॥
रूस. २
पाखं.३
अ०३३
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ए | रितम्॥तत्परमाणीक्ृतं मे हि पुरेव गिरिशेच्छया ॥४॥ हदानीयेक आगत्य विप्रो वेैष्णवधर्म॑वान् ॥ शिवशुदिश्य सुप्रीत्या विपरीतं ६
¢ वचोऽ्रवीत्॥५॥ तदारभ्य शिवामाता ज्ञानभ्रष्ा बभूव ह ॥ सुताविवाहं श्द्रेण योगिना तेन नेच्छति ॥६॥ कोपागारमगात्सा हि ट
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र् ज्ञानकी देनेवारी अरुन्धती प्रतिकी आज्ञा पाकर शीघवासे धेना ओर पार्दतीके समीप गईं ॥ ११॥ जाकर देखा कि भेना ,
च्छित हदं पदी है, पतिबताने बढी लावरधानीते उरते भनोहर उ्चन कहे ॥ १२॥ अरन्धती बो हे पतिते ¡ बना उठो तो त |
तुम्हारे षर आई ह ओर दयाङु सातो खनि भी आये है ॥ १३ ॥ बल्लाजी वोठे अरन्धतीका बो सुनते ही मेना बडी शोधतात उ ५
ओर तेजसे लक्मीकै समान प्रकाशमान उसको देखकर शिर ज्चकाय .्रणामकर बोटी ॥ १४ ॥ मेना बोरी अहो आज हम जीबधारियोका
अथ पत्युस्समादाय निदेशं ज्ञानदा हि सा॥ जगामाहन्धती तूर्णे यतर मेना च पार्वती ॥११॥ ग॒त्वा ददश मेना तां शयानां
शोकमच्छिताम्॥उवाच मधुरं साध्वी सावधाना हितं वचः ॥ १२ ॥ अरुन्धत्युवाच ॥ उत्तिष्ठ मेनके स।धिव् त्वदृशृहेऽहम्
थती ॥ आगता नयश्चापि सतायाताः कृषारुत्ः॥ १२ ॥ बरह्ोमाच ॥ अर्न्धतीस्वरं त्वा शीभसुत्थाय मेनका ॥ उवाच
शिरसा नत्वा त्[ प्ामिव तेजसा ॥ १४ ॥ मेनोवाच ॥ अहो किमिदं पुण्यमस्माकं पुण्यजन्मनाम् ॥ वधूर्जगद्विधेः पत्नी
भसिषस्यागतेह वै ॥ १५ ॥ किमर्थमागता देवि तनमे रूह वरिशेषतः॥ अह दासीसमा त ह ससुता करूणा इर ॥ १६ ॥
बहलोवाच ॥ इत्युक्ता मेनकां साध्वी बोधयित्वा चतां बहु ॥ तथागता च सभरीत्या सास्ते यचर्षेयोऽपि ते ॥ १७ ॥ अथ
शेटेश्वरं ते च बोधयामासरादरात ॥ स्मृत्वा व सवे वाक्यविशारदाः ॥ १८ ॥ षय उः ॥ शेखेनद्
श्रयतां वाक्यमस्माकं जुभकारणम् ॥ शिवाय पार्वतीं देहि संहः नवरो भव ॥ १२ ॥
अत कहो ¶ कारो दी सामान ह भरे डर छमा करो, अपनी त्र रे नानो ॥ १६॥ बूहाजी बोले जब इतत धकार उतने कहा
तो साध्वी अरुन्धतीने भेनाको बहुत समञ्ञाया ओौर फिर परमते वह उत्त स्थान गयी जहा पे सपर ऋषि थे ॥ १७ ॥ तव वै शैकराजको आदं
रते समञ्ञाने कगे, वे सब बोठनेमे चतुर थे, शिवजीके चरणोको स्मरणकर समज्ञाने रगे ॥ १८ ॥ ऋषि बोरे हे शेरराज ! हरे शभ वृवन
| नौ, आप शिवको पार्वती देकर उन संहारकताक श्वशुर हूजिये ॥ १९ ॥ शु
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बह सवेश किते कुछ याचना नहीं करते, तो भी तारक अघुरके दधके निमित बह्लाजीने इस सम्बन्धे बहुत भा्थनाकी है॥ २० ॥ योगि
योम भष्ठ शिवजी यपि दारसंहमे उत्तुक नहीं ई, पर वह देव विधाताकी पा्थनासे तुम्हारी कन्याको बरहण करेगे ॥ २१ ॥ तुम्हारी कन्याने
भी उनकी भापिके यि तप क्रिया है, जिसके ठिये उन्होनि वर दिया है, इन्हीं दौ कारणे वहं तुम्हारी कन्याको ग्रहण करगे ॥ २२ ॥
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बह्माजी बोढे कषियोके वचन सुनकर हिमाल्य सगय, ओर फिर कु भीत होकर विनय पूर्वक बोठे ॥ २३ ॥ हिमाख्यने कहा मेँ शकरकै ४
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॥ २६६॥
प्प्न कोई भी राजत्नामयी नही देखता ह कोई रशवर्थका आश्रय वा स्वजन बन्धुं उनके नही हँ ॥ २४ ॥ एसे कहीं छि न होनेवाडे योगीको
अथाचितारं सेशं प्रार्थयामास यत्नतः॥ तारकस्य विनाशाय ब्रह्मासम्बेधकम्मणि॥२०॥ नोत्स॒को दारसंयोगे शंकरो योगिनां
धेः प्राथनया देवस्तव कन्यां अहीष्यति॥२१॥ दुदितुस्ते तपस्तप प्रतिज्ञानं चकार सः ॥ हेतुद्रयेन योगीन्द्रो विवाहं च
वरः॥ विषे ५
करिष्यति ॥२२॥ ब्रह्मोवाच ॥ ऋषीणां वचनं त्वा प्रहस्य स हिमालयः ॥ उवाचकिशिद्धीतस्त परं विनयपूर्वकम् ॥ २३ ॥
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हिमालयउवाच ॥ शिवस्य राजसामग्री न दि पश्यामि काञ्चन ॥ कृञचिदाश्रयमे वयं कं वा स्वजनबान्धवम् ॥ २४॥ नेच्छाम्यति ||
विनिपतयोगिने स्वखितामहम् ॥ यूयं वेदविधातुशवपुत्ा वदतनि्चितम् ॥२५॥ वरायानवुरूपाय पिता कन्यां ददाति चेत् ॥ ठ
कामान्मोहाद्भवाह्णोभातस नष्टो नरकं बजेत्॥२.६॥ न हि दास्याम्यहं कन्यामिच्छया शूलपाणये ॥ यद्विधानं भते्योग्यमृषयस्त ¢
द्विधीयताम्॥२७॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य हिमागस्य शनीश्वर ॥ प्रत्युवाच वसिष्ठस्तं तेषां वाक्यविशारद ॥२८॥
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मँ अपनी कन्या देनेकी इच्छा नहीं करता हूं तुम भी तो वेद् विधान कतां विधाताके एत्र हो, इसमे निध्वय कर कहो ॥ २५॥ जो पिता
भतिकूक वरके निभित्त कन्याको काम भोह भय वा छोमसे देता है बह नष्ट होकर नरके जाता है ॥ २६ ॥ मै अपनी इच्छे तो शंकरे
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निमित्त अपनी कन्या नहीं दगा, परन्तु जो योग्य बर हो आप लोग उहका कवार कर ॥ २७ ॥ बह्ाजी बोटे हे नारदजी ¡ हिमाख्यके
पा.खं.३
अ०३३
यह वचन सुनकर बोलने वामे भ्रष्ठ वशिष्ठजी हिमाख्यसे कहने रगे ॥ २८ ॥
१ दातुमिति शोषः
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& || पशिषटनी कोठे हे शेरे ¡ जो नैं सर्वथा तुम्हारे हितकाही वचन कहता ह उनको सुनो यह वचन धर्मक अनुक ओर दोनों छोकं ं ्
४ करने वाछे हँ ॥ २९ ॥ है शेक ! ठोक ओर वेदे तीन प्रकारके वचन होते है शा्लका जानने बाला निर्भट ज्ञान दृ्िसे उन सबको जानता |
४ है ॥ ३० ॥ सुननेमे अच्छे ठे, परन्तु असत्य हों ओर पीछे अनहित करने वे हों वह वचन शत्रु॒ही कहते है, वे किसी प्रकार &
ह हितकारी नहीं ह ॥ ३१ ॥ आदिम सुनने कठोर गे, परन्तु परिणामे सुखकारी हों इस प्रकारके वचन दयाठु धर्मशील बंधृजन बोठते है ठ
ठ ॥ २२ ॥ परन्तु जो सुननेमं भी अगृतकै स्मान हो ओर सव कासमे सुखदायक हो सत्यका सार ओर हितकारी वचन श्रेष्ठ कहा है ॥ ३३ ॥ त
# वसिष्ठ उवाच ॥ शृण शेरेश मद्वाक्यं सर्वैथा ते हितावदम् ॥ धममांविरुढं सत्यञ्च परतर ुदावहम् ॥ २९ ॥ वचनं विविधं ठ
शेर छोकिंके वेदिकेऽपि च ॥ सर्व जानाति शाघ्चज्ञो निमैलन्ञानचक्षपा ॥ ३० ॥ असत्यमरहितं प्चात्साप्रतं अतिसुन्दरम् ॥ ||५
4 सुबुद्ध्क्ति शिं हितं नैव कदाचन ॥ ३१ ॥ आदावप्रीतिजनकं परिणामे सुखावहम् ॥ दयाटधमशीलो हि बोधयत्येव ॥&
बांधवः ॥ ३२ ॥ श्रुतिमाव्रात्सुधातुर्यं सर्वकालश्चखावदम् ॥ सत्यसारंहितकरं वचनं श्रष्ठमीप्सितम् ॥ ३३ ॥ एवञ्च भिविधं ५
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४ शेर नीतिशाञचोदितं वचः ॥ कथ्यतां रिष मध्य किव वाकयं त्वदीप्सितम्॥ ३४ ॥ ब्राहमम्पद्विरीनथ शंकरलचिदशश्वरः
तत्वज्ञानसखदरेषु सप्निमभकमानसः ॥ २९ ॥ ज्ञानानन्दस्यश्वरस्य ब्राहमवसतुषु का सहा ॥ गृही ददाति स्वसुता राज्यसभ्प
त्िशालिने ॥ ३९६ ॥ कन्यकां दुःखिन द्वा कन्याघाती भवेत्पिता॥ को वेद शंकरो इुःखी कुबेरो यस्य किंकरः ॥ ३७ ॥
हे शेक यह तीन प्रकारके वचन नीतिशा्चमे के ह कहो तो इन तीनो मे कोने वचन कहे जाये ॥ ३४ ॥ देवताओं सवामी शंकर
ह|| रजोखणी सम्पतनिसे तो हीन है परतच्ञानके सश्र उनका मन सदा निम्र रहता है ॥ ३५ ॥ जो ज्ञानानन्द्का अधिपति है, उक्षको
ह|| रजोखणी वस्तुभोमिं क्या इच्छा हो सकती है गृहस्थी अपनी कन्याको राजघसम्पन्नि वारको देते हँ ॥ ३६ ॥ दुःसीको कन्या देने पिता
ॐ2॥ कन्याघाती होता है, शंकरको दुःखी दरिद्री कोन कह सकता है जिनके कुबेर दास है ॥ ३७ ॥
च्व
समथ हे वह निर्थुग परमातमा परेश प्रकृतित परे है ॥ ३८ 0
शि ००||) || जो केवठ अपनी मक सिक न॒ ओर संहार करनेको
के विलास मात्रसे सृष्टिके सूजन पाठन अ।र सहार क ५
। जिनकी ्िके कां करनेमे तीन भकारकी सूतिं जहा विष्ण हर॒ नामवाी उत्ति पान ओर संहार करती है॥ ३९ ॥ बहा न ४
| ओर विष्ण क्षीरसागर वासर करते है हर ॒कैठासे वास करते है यह सब रिवजीकौ _ विभूति है ॥ ४० ॥ शिवसे उतन्न हकर १७।० ||
| तीन भकारके प धारण करती है, यथपि उ्तकी बहुत कटा है थापि टीा्ष्टिमं अशि अनेक अवतार छेती है ॥ ४१.॥ बह्याके मुखस ¢
उत्यनन होकर वाणीकी अपिष्ठात्री देवता होकर वह सरस्वती हृदे है वक्षस्थरते उतनन होनेसे लक्ष्मी सब सम्पतकी रूपवाली
|
्रमद्कलीलया सृष्टि सृष्टं ह्व क्षमो हि सः ॥ निशैणः परमात्मा च परेशः ्कृतेः परः ॥ ३८॥ यस्य च् भिषिधा सृतिर्विधा ट
तस्सषटिकर्मणि ॥ सरषटिसियत्यन्तजननी ब्रहमविष्णुहराभिधा ॥ ३९ ॥ ब्रह्मा च बरह्मरोकस्थो विष्णुः क्षीरोदवासक्ृत् ॥ हरः £
कैलासनिलयः सर्वाः शिवविभूतयः ॥ ९० ॥ धत्ते च भिविधा तीः प्रकृतिः शिवसुभ्भवा ॥ अंशेन लीलया सृष्टौ कलया
||| बहषा अपि ॥ ४१ ॥ सुखोद्धवा स्वयं वाणी वागयिष्ठातदेवत् ॥ वक्षःस्थलोद्भवा रक्ष्मीस्सर्वसम्परस्वहूपिणी॥ ७२॥ शिवा ||
| तेनस्स॒ देवानामावि्भवे चकार सा ॥ निहत्य दनवान्सरवान्देवेभ्यश्च शरियं ददौ ॥ ३ ॥ भाप कपान्त्रे जन्म जरे दक्ष त
ए
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योषितः ॥ नाम्ना सती हरं प्राप दक्षस्तस्मे ददौ च ताम् ॥ ७६ ॥ देहं व योगेन श्रत्वा सा मतैनिन्दनम् ॥ साद्य ¢
¢ तव्स्तु मेनायां जज्ञे जरतश्शिवा ॥ ४५ ॥ शिवा शिवस्य पत्नीयं शर जन्मनिजन्मनि ॥ कयेकपे बुद्धिहपा ज्ञानिनां ¢
₹०स.२ || जननी परा ॥४६॥ जायते स्म सदा सिद्धा सिद्धिदा सिद्धिहूपिणी ॥ सत्या अरिथ चिताभस्म भक्तया धत्ते हरस्स्वयम् ॥७७॥
- ह ४२॥ देवताओके तेजते शिवाका भादुमौव हुभा है, उस्ने सव दानवोंको मारकर देवताओंके निभित्त रक्ष्मी दी है ॥ ४३ ॥
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नाः व मरे € म ०१ न ५
खं ©| कल्पान्तरमे दक्षकी श्जीकै जठरे जन्म ठेकर् सती नामवाटी यही हृदं थी वहां दकषने ते शुकरहीको दिया ॥ ४४ ॥ वर्ह पिताक
गमे सतीने अपने स्वामी शंकरकी निन्दा सुनकर योगसे देह त्याग दिया, वही शिवा इत समय मेनके जटरमं परगट हहं ॥ ४५ ॥ है|
शेक \ जन्म जन्मे शिवा शिवकी पत्नी रही है कल्प कल्पमं यही ज्ञानिर्योकी भाता बद्धिरूपिणी गष्ठ है ॥ ४६ ॥ यह सदा तिदोकी
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सिदधिरूपिणी होकर प्रगट होती है, सतीकी अस्थि चिताकी भस्म भक्ते शिवजी दा धारण करते है ॥ ४७ ॥ इस कारण तुम अपनी
ठै | ही इस कल्याणी कन्याको शंकरके निमित्त दो अथवा तुम्हारे न देनेसे बह स्वयं अपने स्वामीके पास ची जायगी ॥ ४८ ॥
8 शने प्रतिज्ञा करके जब देखा किं तुम्हारी सताने तप करके अरंख्य श पाये तब वह बाह्मणका प धारण करके उस स्थानपर गये
¢ ॥ ४९ ॥ उसे आश्वासनकर वर दे अपने स्थानको गये, हे गिरिराज उसीकी भरा्थनासे शिवजी शिवाको तुमसे मांगते है ॥ ५० ॥ शिवकी
र भक्तिमं तत्पर तुम दोनोँने तपकी बात स्वीकार करटी थी, हे गिरीश्वर! कहो तो भब तुम्हारी विपरीत बुद्धि कि भ्रकारसे हुई
अतस्त्वं स्वेच्छया कन्यां देहि भां हराय च ॥ अथवा सा स्वयं कान्तस्थाने यास्यत्यदास्यसि ॥४८॥ कृत्वा प्रतिज्ञां देवेशो
९ दृष्ठ क्केशमसंख्यकम् ॥ दुहितुस्ते तपःस्थानमाजगाम द्विजात्मकः ॥ ४९ ॥ तामाश्वास्य वरं दत्वा जगाम निजमन्दिरम् ॥
४ तत्प्राथनावशाच्छम्धुर्ययाचे त्वां शिवां गिरे ॥ «° ॥ अंगीकृतं युवाभ्यां तच्छिवभक्तिरतात्मना ॥ षिषरीतमतिर्जाता वद्
कस्मा्विरीश्वर ॥५१॥ तद्रत्वा प्रभुणा देव प्राथितेन त्वदन्तिकम् ॥ प्रस्थापिता वयं शीरं इयषयस्साप्यश्न्धती ॥५२॥ शिक्ष
यामो वय त्वादि दत्त्वा श्द्राय पार्वतीम् ॥ एवंकृते महानन्दो भविष्यति गिरे तव ॥५३॥ शिवां शिवाय शैलेन्द्र स्वेच्छया
चेत्र दास्यसि ॥ भविता तद्विवाहोऽ् भवितव्यबरेन हि ॥५७॥ व्रं ददौ शिवाय सतपन्त्ये तात शंकरः ॥ नदीशवरप्रतिज्ञातं
विपरीताय कंटपते ॥५५॥ अहो प्रतिज्ञा इरष्या साधूनामीशवतिनाम् ॥ स्वेषां जगतां मध्ये किमीशस्य पुनभिरे ॥९६॥
|| ॥ ५१ ॥ है गिरिराज ! वहासि . जाकर प्भूने हमको भाथना करनेके छ्य भेजा है, ओर अरुन्धती भी इसी निमित्त मैनाके सभीपृ गई है
|| ॥ ५२ ॥ हम् मी ठ्मको शिक्षा देते है कि तुम रुके निभि पातको ३े दो हे शेर । देसा करते ठुमको महाआनन्दकी भातत होगी
& || ॥ ५१॥ ह शरराज यदिं तुम अपनी इच्छा से पावती शिवको न दोभे तो भवितव्य वरुते यह विवाह शंकेरसे ही होगा ॥५४॥ हे तात ।
‰॥ पाव॑तीके तप करनेते शिवजीने उसे बर दिया ह ईश्की भतिज्ञा की इदं निष्फठ नहीं होती ॥ ५५ ॥ ईश्व वशवर्ती महालाओकी
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॥ २६८ ॥
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पा.खं.३
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ह्वरकी प्रतिज्ञा विपरीत कौन कर सकता है ॥ ५६ ॥ एक् अहेन््रने खीरासे
परतिज्ञा ही जब विफठ नहीं होती तब सब जगतके अधिपति ^ ४
७. व ह श्ुग भभग कर दिया ॥ ५७॥ ह टेश ! एकके भ्रयोजनसे सब सम्पत्ति नष्ट
तकि पंख काट डरे थे ओर पावैतीने रीठासे भेरुका रः
५ त है ॥ ५८ ॥ अनरण्य राजाने अपनी कन्याको बाह्लणके निर्भित्त
करना नहीं, कुक निमित्त एकको त्याग कर दे, यह सनातनी श्रुतिं £
देकर व अपनी सव सम्पतिकी रक्षा की ॥ ५९ ॥ बाह्णके शापे भीत उस्र राजाको यर् ओर ज्ञातिकै नीति शाश्चके जाननेवाठे
ठोगोनि बहुत भकारे समज्ञाया था ॥ ६० ॥ हे शेकराज इसी प्रकार तुम मी अपनी
नी कन्या शिवजीके निमित्त देखकर सव बंधुवर्गोकी
एको महेन्द्रश्यीलानां पक्षांिच्छेद ल्ीखया॥ पार्वती टीख्या मेरोश्शङ्गभङ्ग चकार ॥५७॥ एकार्थ नहि शेकेश नाश्यास्सवां
हि सम्पदः॥एकं त्यजेत्कुलस्यायै श्रुतिरेषा सनातनी ॥५८॥ दत्त्वा विप्राय स्वसुतामनरण्यौ नृपेवरः॥ब्र। ५ | गमापत्नो ररक्च
द्लविदो जनाः ॥ ब्रह्मशापाद्वि भीताश्च गरवो ज्ञातिसत्तमाः ॥&०॥ शैलराज
निजसम्पदम् ॥५९॥ तमाशु बोधयामासरनीतिशाञ्चविदो
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स्य च॥ पप्रच्छ तृपवात्ता च दयेन विदूयता ॥६२॥ हिमालय उवाच्॥कस्य वंशोद्धवो ब्रहमरनरण्यो वृपश्स्ः॥ स॒तां दत्ता
स च कथं ररक्षाखिकसम्पदः॥६३॥बह्मोवाच॥।इति त्वा वसिष्ठस्तु शेख्वाक्यं प्रसत्तधीः। भरौवाच गिरये ६ नृपवात्तासुखा
वहाम्॥६४॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसंदितायां तृतीये पार्वतीखण्डे गिरिसांत्वनो नाम त्रयद्धिशोऽध्यायः॥३२॥
रक्षा करक देवताओंको अपने वशम करो ॥ ६१ ॥ ब्रह्माजी बोटे यह वचन वशिष्ठजीकै भवण कर ॒हिमाठ्य हंसकर दुःखी चितसे उस
राजाका चरित्र पूछने रगे ॥ ६२ ॥ हिमाङयने कहा हे. बहन् ! बह अनरण्य राजा. किततके वंशम उत्पन्न हुआ था, ओर अपनी सुताको
कर उसने किस प्रकारसे सब सम्पर्तिरयोकी रक्षा की थी ॥६३॥ बाजी बोटे वशिष्ठजी इस प्रकारसे हिमाठयके वचन सुनकर प्रसन्न हो सुख
दायक उस राजाका वृत्तान्त कहने गे ॥६४॥ इति श्रीशिवमरहापएराणभा ० टीका ° रद्रसंहितान्तगंततृतीयपावंतीखण्डे त्रयद्खिंशोऽध्यायः ॥३३॥
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(६ | बो इन्दरस्ावणिं नामवाठे चौदहवं मयुकै वंशम एक अनरण्य राजाने जन्म छिया ॥१॥ वह् नृपनरष्ठ सात द्रीपका राजा हुमा, बह ]| ¢
मगठारण्यका एत्र महाबली विशेषकर शिवजीका भक्त था ॥२॥ भृगुजीको पुरोहित बनाकर उसने सौ यज्ञ॒ किये, देवता उत्तको इन्द्रपद देते
८ थे परन्तु उसने यह बात स्वीकार न की ॥३॥ हे हिमाट्य ! उस राजाके सौ एत्र हुए ओर सुन्दरी नामकी एक कन्या क्ष्मीके समान | ४
| ॥ ४ ॥ उसका प्रेम सौ एतरोंकी अपेक्षा कन्याम विशेष था, हे राजनु ! ओौर कन्या भी पिताको बडा प्यार करती थी ॥ ५॥ ओौर सब ठ
%|| वयै भी भाणोकि समान प्यारी थी सब सौमाग्यसे युक्त उस राजाके पांच रानियं थीं ॥ ६ ॥ वह कन्या जब अपने पिताके घरमे युवा हुई,
॥ वसिष्ठ उवाच ॥मनोर्वशोद्भवो राजा सोऽनरण्यो वृषेश्वरः ॥ इन्द्रसावणिषंज्ञस्य चतुर्दशमितस्य दि॥१॥अनरण्यो नृपशरेष्ठस्स
पद्रीपमहीपतिः ॥ शम्धुभक्तो विशेषेण मङ्गलारण्यजो बली॥२॥ धूं पुरोधसं कृत्वा शतं यज्ञा्कार सः॥ न स्वीचकार शक्रत्वं
दीयमानं सुरेरपि ॥३॥ बभुवश्शतपुत्ाश्च राज्ञस्तस्यदिमाल्य ॥ कन्यका सुन्दरी नाम्ना पद्यापद्यारुयासमा ॥ 9 ॥ यर्स्मेहः
पुजरशतके कन्याया ततोऽधिकः ॥ वृषस्य तस्य तस्यां हि बभूव नगसत्तम॥५॥ प्राणाधिकाः प्रियतमा महिभ्यस्सर्वयोषितः ॥
नृपस्य पत्न्यः पञासन्सवांस्सोभाग्यसंयुता ॥ & ॥ साकन्या यौवनस्था च बुधूव स्वपितुगैहे ॥ पनं स्थापयामास सुवरान
यनायसः ॥ ७ ॥ एकद्[पिप्पलाद्रषिगन्तं स्वाश्रममुत्घुकः॥ तपःस्थाने निर्जने च गन्धव स ददश इ ॥<॥ छरीुतं मथ्चचित्त
च शृङ्गारे रससागरे ॥ विदरन्तं महापरम्णा कामश् ख्लविशारदम्॥ ९॥ दष्टा तं शुनिशादैखः सकामः संबभूव सः ॥ तपस्स्वदत्त
चित्तश्ाचितयदारसंग्रहम्॥ १० ॥ एवंव्रतस्य तस्येव पिप्पादस्य सन्षुनेः॥ कियत्कारो गतस्तञर कामोन्भयितचेतस्षः॥११॥
<| तब उस्ने अपने वरको खोजनेके ख्ये पत्र भेजा ॥७॥ एक समय पिप्पङाद् ऋषि अपने स्थानको जाते थे, कि उस निर्जन तपक स्थानम
५८|| उन्होने एक गन्धवंको देखा ॥ ८ ॥ किं वह चियोके साथ दै, शरंगारके रस सदरभ उसका चित्त मघ हो रहा है वह कामशाज्ञमे विशारद
|| महा प्रेमे विहार कर रहा है ॥ ९ ॥ सुनिभेष्ठ उपक देखकर कामके वशीभूत हौ भये ओर तपरे चिच हटाकर दार संब्रहकी इच्छा करे
रगे ॥ १० ॥ इस प्रकार कामसे व्याकुरु मनबाठे भेष्ठ ऋषि पिप्परादको किंतना एकं सभय बीत गया ॥ ११ ॥
११७
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शिश्पुर
॥>६९॥
रुप. २
पा.खं.३
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१ 9९33
| ठु > घनिने ||
एकं समय वह स॒नीश्वर नदीमे स्नान करमेको गये वहां उन्होनि मनोहर ठक्ष्मीकै समान छु द्री पा दता ॥ 1, 1 यो ¢ |
उन समीपे ल सकी कन्या है, शापके डरे व्याङल हो उसके आदमियोनि उसका प्रिचय दिया ॥ १२ ॥ मभक ||
ता ५ न गुणवती सुमुखीकी अनेक राजा भराथना करते हं ॥ १४ ॥ ||
कहा यह पन्नानाम कन्या ठकष्मीके समान बुन्दरी अनरण्यकी कन्या है इस गुणवती सुख १ =|
बह्माजी बो इस भकार बह सत्यवादी आदमिर्योके सत्य वचन नकर मनमे बडे श्ुमित हए ओर उक ठेनेकी इच्छा की ॥ १५॥ ह ९
गिरिराज ! तब यनि स्नान कर ओौर अपने इषटदेव शंकरको विधिपूरक पूजनकर कामक वशीमूत हौ कन्याकौ भानिकं लिये राजा अनरण्यकं। || +
एकदा पुष्पभद्रायां कात गच्छन्धुनीश्वरः ॥ ददश पद्यां युवतीं पद्चामिव मनोरमाम्॥१२॥ कर्व कन्येति पप्रच्छ समीप्स्थाजना ४
नभुनिः ॥ जना निवेद्यांचज्कनेत्वा शापनियन्तिताः ॥१३॥ जना ऊचुः ॥ अनरण्यसुतेयं वे पद्यानाम रमापरा॥ वरारोहा प्रा्यं ध |
मानानृपश्रष्े्ैणाखया ॥ १७ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तच्छ्रत्वा सशुनिवां क्यं जनानां तथ्यवादिनाम् ॥ चुक्षोभातीव मनसि तद्टिष्छुर ॥/८
भवच्च सः ॥ १९ ॥ सनिः स्नात्वाभीष्टदेवं सम्पूज्य विधिवच्छिवम्॥जगाम कामी भिक्षाथमनरऽ्यसभां गिरे ॥. १३ ॥ राजा ||
शीघ्रं मुनि दृषा प्रणनाम भयाङ्कलः ॥ मधुपरकादिकं दत्त्वा प्ूजयामास् भक्तितः॥१७॥ कामात्सवे गृहात्वा च ययाच कन्यक ट
सनिः ॥ सौनं बभूव वृपतिः किशिनिरवक्तुमक्षमः॥ १८ ॥ सनिर्ययाचे कन्यां स तां देहीति वृषेश्वर ॥ अन्यथा भस्मसात्सदं |©
करिष्यामि क्षणेन च ॥ १९॥ सवं बभूवुराच्छन्ना गणास्तत्तेजसा घुने ॥ रुरोद राजा सगणो दृष्टा विप्र जरातुरम् ¢
॥ २० ॥ महिष्यो र्श्दुस्सर्वा इतिकर्तव्यताक्षमाः ॥ सृच्छीमाप महाराज्ञी कन्यामाता श्ुचाङछा ॥ २१॥
सभाम गये ॥ १६ ॥ राजाने खनिको देखतेही भयते पणा किया ओर मधुपरकदि देकर भक्तिपे पूजा कौ ॥ १७ ॥ निने सव पूजाको ए
ग्रहणकर राजास कन्याको मागा, राजा सुनतेही अवार् हो गया, ओौर कछ भी करनेको समर्थं न हआ ॥ १८ ॥ खनिने ¢
कहा हे राजन् ! अपनी कन्या तुम हमको दो नहीं तो क्षणम सव भस्म कर दंगा ॥ १९ ॥ हे सने | सनिकै तेजसे. सव (
सेवकगण व्याप्त हो गये, ओर उस्र समय राजा कन्पाके स्वि रोने कगे कि ब्रामण तो बहूतही जराप व्याकु हो रहे ई ॥ २० ॥ रानियं भी
|
करववयमूढ होकर रोने ठगी ओर कन्याकी माता महाराज्ञी शोके व्याकु होकर रोने र्गी ॥ २१ ॥ ओर राजाके सव इत्र शो ह
उ्याकुढ मनवाछे होगये, है शेठराज ! जितने राजाके सम्बन्धी थे सब शोके व्याक होगये ॥ २२ ॥ इरी समय बहापंडित राजाका ६
रोहित ओर बुद्धिमान् युर राजक समीप आकर प्राप्त दए ॥ २३ ॥ राजने प्रणामकर पुरोहितजीका सत्कार किया ओर उनके आगे
रोकर सब वृत्तान्त निषेदन किया, ओर पूछने ठे फि अब कर्तव्य शीघतासे बताश्ये ॥ २४ ॥ तब राजाका युर विप ओर रोहित ट
ट
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| बभूबुस्तनयास्सवै शोकाकुरितमानसाः ॥ सर्व शोकाङ्कलं जातं नृषसम्बन्धि शैरप ॥ २२ ॥ एतस्मिनन्तरे प्रज्ञो द्विजो
६ शर्रयत्तमः ॥ पुरोहितश्च मतिमानागतो बृषसत्निधिम् ॥ २३ ॥ राजा प्रणम्य सम्पूज्य श्रोद च तयोः पुरः ॥ सर्वे निवेद
६ यांचक्रे पप्रच्छोचितमाश्ु तत् ॥ २९ ॥ अथराज्ञो श्विप्रः पण्डितश्च परोहितः ॥ अपि द्रौ शाघ्चनीतिज्ञौ बोधयामास
६ तुरैपम् ॥ २५ ॥ शोकाङलाश्च मदिषीरपबारो- कन्यकाम् ॥ उत्तमा नीतिमादत्य सर्वेषां हितकारिणीम् ॥ २६ ॥ गुश्पुरो
। धसावूचतुः॥ शण राजन्महाप्राज्ञ वचो नौ सद्धितावहम् ॥ मा शुचः सपरीवारश्शाश्चे इकू मति सतीम् ॥ २७॥ अय वान्द्
|| दिनान्ते वा दातव्याकन्यका तूप ॥ पात्राय विप्रायान्यस्प कस्मेचिद्रा विशेषतः ॥ २८ ॥ सत्पा्ं बाह्मणाद्न्यत् पश्यावो
ह| जगच्रये ॥ सुतां दत्वा च शुनये रक स्वां सवसम्पदम् ॥ २९ ॥
पंडित दोनों शान्च ओर नीतिके जाननेवाे राजाको समञ्ञाने खगे ॥ २५ ॥ रानिये शोकसे व्याक्ृक हो रहीं थीं ओर हपकी बाढा
कन्या भी व्याकुर हो रही थी एरोहितजी उत्तम नीतिको आश्रयकर सवके हितकारी बचन बोडे ॥ २६ ॥ गुर ओर एरोहित बोरे है
राजनू ! हम दोनोके हितकारी वषन सुनो परिवार सहित शोच सत करो शाक्म घुन्दर भति करो ॥ २७ ॥ आजः वा वृषं॑दिन्े एक
दिन तो तुमको कन्यादान करनाही होगा, किसी पात्र वा दूसरे किसीको अवश्य दोगे ॥ २८ ॥ ब्राह्मणको छोडकर हभ जिरोकीमें
निः
शि०४० ||| || दूरा कोई स्यात्न नहीं देलते है खनिको अपनी कन्या देकर अपनी सव सम्प
|| निमित्ते सन सम्पत्ति नाश होजायगी उसको देकर सकी रता करना ।
& वरिष्टनी बोर राजा उन दोनोके वचन सुन वास्वार विलाप करके कन्थाको भूषण वल्ञ पहराय ऋषिको दान करता भया ॥ २१
¢ हे गिरिराज ! बह ऋषि उत मनोहर कन्याको पाय विधि पूर्वकं विवाह करके पाके समान उपमावाली उस प्नाको ठेकर अपने दिरकौ
£ गये ॥ ३२ ॥ राजाने जब बरदधको इस भकारसे कन्था दी तब इस ग्लानिसे सब राजपर छोड पोको राज्य दे वनम तप॒ करने चला गया ह
८ राजत्रेकनिमित्तेन सर्वसंपद्विनश्यति॥ सर्व रक्षति तं त्यक्त्वा विना तं शरणागतम् ॥ २० ॥ वसिष्ठ उवाच् ॥ राजा (६. टै
८ त्वा विकष्यच सुदुः ॥ कन्यां साल्कृतां कृत्वा ञुनीन्द्राय ददौ किल ॥३१॥ कान्तां गृहीत्वास् सनिर्विवाद्य विधिवद्विरे ॥ >
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तकी रक्षा करो ॥ २९ ॥ हे राजन् ! नहीं तो एकके
रेष्ठ है. शरणागतके सिवाय दस्रा उपाय नहीं है ॥ ३० ॥
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पद्यां प्योपमां तां वै दितस्स्वालय ययौ ॥ ३२ ॥ राजा सर्वान्परित्यज्य दत्वा बद्धाय चात्मजाम् ॥ ग्लानि चित्ते समाधाय
| जगाम तपसे वनम् ॥३२॥ तद्ध््यापि वनं याते प्राणनाथे तदा गिरे॥ भर दुहितुश्शोकात्प्राणांस्तत्याज सुन्दरी ॥ ३९ ॥
फ पूज्याः पुत्राश्च भृत्याश्च मूरच्छामापुवैपं षिन ॥ श्चुः “वाससंयुक्त ज्ञात्वा सर्वैपरे जनाः॥ ३५॥ अनरण्यो वनं गत्वा तपस्तघ्वाति
शंकरम् ॥ समाराध्य ययौ भक्तया शिवलोकमनामयस् ॥३६॥ वृषस्य कीतिंयात्राभ्ना ज्येष्पुत्रोथ धामिंकः॥ पु्रवत्पालयामास |
प्रजा राज्यं चकार इ ॥३७॥ इति ते कथितं शेरानरण्यचरितं शुभम् ॥ कन्यां दत्त्वा यथारकषद्रशं चाप्यखिलं धनम् ॥ ३८॥
३३ ॥ हे गिरिराज ! जब प्राणपति वनको गये तब राजाकी भार्या सुन्दरीने भता ओर अपनी कन्याकैे शोकसे प्राण त्याग दिये ५
॥ ३४ ॥ पूज्य एत्र ओर मृत्य राजाके विना मूच्छीको भराप् हुए ओर दूसरे परुष भी श्वास ठेकर इस बातका शोच करने खमे ॥ ३५॥ ४
अनरण्य भी वनम जाकर शंकरकै निभित्त दुष्कर तपस्या करके ओर भक्तिसे उनका आराधन कर उत्तम शिवलोकम चटा गया ॥ २३६ ॥ ॥
राजाका भष्ठपएत्र प्रम धमीत्मा कीर्तिमान् नामबाला त्रके समान भ्रजाको पाठन कर राज्य करने ठ्गा ॥ ३७ ॥ हे शेढराज ! इस भकार
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रूस. २ ¢
पा.खं.३ ८
अ०३४ ||
आपतते यह शरेष्ठ अनरण्यका चरित वणंन किया जसे उसने कन्या देकर अपना सष वैश ओर धन बचाया ॥ ३८ ॥ हे शेरराज ! तुम भी ||
अपनी कन्या शिवजीको देकर अपने सब कुठकी रक्षा कर सब देवताओंको अपने वशीभूत करो ॥३९॥ इति
(| अनरण्यचरित्रवणेनो नाम॒ चतुविंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ नारदजी बोढे हे पिताजी ! एत्रीदानसम्बन्धी अनर तै
ण्यका चरित्र सुनकर गिरिराजने क्या किया उसको आप किये ॥ 3 ॥ ब्रह्माजी बोे हे तात ! कन्यादान सम्बन्धी अनरण्यके चरित्र न त
कर फिर शेकेश हाथ जोडकर वशिष्ठजीसे कहने लगे ॥ २ ॥ गिरिने कहा हे वशिष्ट ! हे खनिराज ! हे बहमएु्र ! हे कपानिपे ! आपने 8
शेलराज त्वमप्येवं सुतां दत्त्वा शिवाय च॥रक्ष सर्वकुटं सर्वान् वशान् कुर् सुरानपि।॥३९॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शद ट
संहितायां तृतीये पावेतीखण्डेऽनरण्यचरितवर्णनं नाम चतुश्िशोऽध्यायः॥३४॥ नारद् उवाच॥अनरण्यस्य चरितं ख॒तादानसम ठ
न्वितम् ॥ त्वा गिरिवरस्तात किं चकार च तद्वद॥१॥ ब्रह्मोवाच ॥ अनरण्यस्य चरितं कन्यादानसमन्वितम्॥ त्वा षपरच्छ त
शेकेशो वसिष्ठं साज्जछिः पुनः॥२॥शेकेश उवाच॥ वसिष्ठ सुनिशारल ब्रह्मपुत्र कृपानिषे॥अनरण्यचरिवन्ते कथितं परप्रादधुतम् ¢
॥३॥अनरण्यसुता यस्मात् पिप्पलाद जनि पतिम्॥ सम्प्राप्य किमकार्षीतसा तच्चखिं ख॒दावहम्॥७॥वसि ०॥ पिप्पलादो श्ुनिवरो ट
वयसा जजंरोधिकृः॥ गत्वा निजाश्रमं नार्याऽनरण्यसुतयातया॥५॥ उवास तत्र सुप्रीत्या तपस्वी नातिलम्पटः॥तवारण्ये गिखिर ए
स नित्यं निजधर्मङृत् ॥६॥ अथानरण्यकन्या सा सिषेवे भक्तितो ुनिम्॥ कमैणा मनसा वाचा लक्ष्मीर्नारायणं यथा ॥७॥ ॥©
परम अद्भुत अनरण्यका चरित्र कहा ॥ ३ ॥ अनरण्यकी सुताने पिप्पछादनामक पतिको प्राप्त कर कया क्रिया यहं सुखदायक चरित्र कहिये ||
॥४॥ वशिष्ट बोले खनिश्रेष्ठ पिप्पलाद तो जराते व्याकुढ थे जव उस अनरण्यकी सुताकँ साथ वे अपने आश्रमको गये ॥ ५॥ तब ३ तपस्वी |£
परम पीतिस वहां निवास करने ठगे बहुत ठम्परताभी न कौ हे गिरिराज ! उस बने वह नित्य अपना धर्मं॑करते धे ॥ ६ ॥ ओर वह |©
भनरण्यकी कन्याभी भक्तिसे छनिकी सेवा करने ठगी मन वचन कर्मे जेते उक्ष्मी नारायणकी सेवा करती है वैसे करने ठगी ॥ ७ ॥ |
शि०इ° ट| एक समय बह . मिष्टमाषिणी सुरनदी ज्ञान करन
॥२७१॥ रथथाजो अनेक अठंकार धारण के थे वहु न न्
पञ्नाको देखकर कहने कगे ओर उस स॒निकन्याके भावके जाननकी
को गई ओर मायासे भनुष्यूपधारी धर्मराज मागम भिडे ॥ ८ ॥ जिनका रतनोसि खचित ट
वीन यौवनवाछे भीमान् कामदेवके समान कातिवारे थे ॥ ९ ॥ बह भमु धम् उर न्द्री |
परीक्षा करने कगे ॥१०॥ धर्ेराज बोरे हे सुन्दरि क्ष्म 1 राज्यके योग्य
प्रम मनोहर अति यौवनम स्थित हे कामिनि ! स्थिर योवनवाढी ॥११॥ तुम इत जरसे आतुर पिप्पाद् मुनिकै समीप शोभाको नहीं भाष ¢
† निरत धृणा रहित मरणकै समीप हो रहे है, उनको छोडकर सुने ४
हं
ट
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ट होती हे तन्वंगि ! मँ यह सय कहता हं ॥ १२ ॥ वह बाह्मण केवठ तपस्या
पकृदा सवर्ण सनात गच्छन्ती स्मतां च ताम् ॥ ददश पथि धर्मैश्च मायया वृपर्पधृ ॥८॥ चाङएनरथस्थशच नानार |
१ कारभूषितः ॥ नवौनयौवनशश्रीमान्कामदेवसमप्रभः ॥ ९ ॥ इष्टा तां खन्दरीं पञ्चघुवाच स वृषो विधुः ॥ विज्ञात भावम्
| न्तःस्थं तस्याश्च सुनियोषितः ॥ १० ॥ ॥ धर्म उाच ॥ अयि इन्द्रि. लक्ष्मीव राजयोग्य मनोहरे ॥ अतीव . योवनस्थे ||?
८ च कामिनि स्थिरयौवने ॥ ११ ॥ जरातुरस्य बद्धस्य पिप्पलादस्य वै शनेः ॥ सत्यं वदामि तन्वंगि समीपे नैव राजसे ट
पुण्यत्सौन्दर््ं पूर्वजन्मनः ॥ सफलं तद्गवेत्स्वं रसिकारगनेन च ॥ १९॥ सदसघ॒न्दरीकान्तं कामशाशाघ्चविशारदम् ॥
४ किंकरं कुर् मां कान्ते सम्परित्यज्य तं पतिम् ॥१५॥ निजने कानने रम्ये शेरे ररे नदीतटे ॥ विहरस्व मया साद्धं जन्मेदं
सफलं कङ् ॥१६॥ ॥ वसिष्ठ उवाच ॥ इत्येवशुक्तवन्तं सा स्वरथादव्द्य च ॥ धदीतुशत्सुकं इस्ते तश्ुवाच पतिव्रता ॥१७॥
ह|| देखो जो म रतिशूर ओर कामस ्याकुर हो रहा हूं ॥१३॥ हे न्द्रि ! पुवेजन्धके कर्थम सुन्दरता प्राप्त होती है रसिकके आर्टिंगनसषे वह
|| सब सफुक होता है ॥ १४ ॥ भै सहस दियोका पति कामशाजभं चतर हं हे इन्दरि । उतत वूढ पतिको त्यागन करके तुम शे अपना पति ||
|| बनाबो ॥१५॥ निर्जन मनोहर बने पर्वत ओर नदीके किंनारोमं मेरे सेग॒विहार करके इस जन्भको सषक करो ॥ १६ ॥ वशिष्ठजी बोटे ¢
#|| जब रेसा कहकर धमै रथे उतरकर उसका हाथ पकडनेको हृए किं इसी समप प्रतिवत। बोली ॥ १७ ॥ । ्
॥ १२ ॥ विप्रं तपस्सु निरतं निषंणं मरणोन्धुखम् ॥ त्वक्ता मां पश्य राजेन्द्रं रतिश्च स्मरातुरम् ॥१३॥ प्राप्नोति सुन्दरी
रु०स्ञ,२
पा.खं.दे
अ०३५
हे नराधिप ! तुम पापी हो दूर हो यदि काषना सहित शरज्ञे देखोगे तो शीघ ही नष्ट हौ जाओगे ॥१८॥ तपसे पवित्र शरीरबाङे पिप्परादं
उनिभेष्ठको त्यागकर रतिटम्पर ब्वीजित तुमको कैते स्वीकार कर सकती हं ॥ १९ ॥ श्ीजितकै स्पशेभा्रसे प्राणिर्योका सब एण्य नाश हो
जाता है जलीजित ओर दूसरेको निमित्त पाप करनेवाटे इनका दशेन पापकारी होता है ॥ २० ॥ जो रुष श्वियोे जीता हआ है, बह टै
स॒त्किय होकर भी नित्य अपवित्र है, पितर देवता ओर मदुष्य सब उसकी निन्दा करते है ॥ २१ ॥ उसके ज्ञान, तप, जप, होम, पुजन,
विया ओर दानसे कया है जिसका मन चचिरयोने हरणकर च्या है ॥ २२ ॥ मँ तेरी भाताकै समान हूं स्म जो तू स्लीभावसे यह वचनं #
पद्मोवाच॥ गच्छ दूरं गच्छ दूरं पापि्ठ्त्वं नराधिप॥ मां चेत्पश्यसि कामेन सद्यो नष्टो भविष्यसि ॥१८॥ पिप्पलादं सनि |||
ष्टं तपसा पूतविभरदम् ॥ त्यक्ता कथ भजेय त्वां श्रीनितं रतिलम्पटम् ॥१९॥ श्लीजितस्पर्शमाेण सर्व पुण्यं प्रणश्यति ॥ ||
ख्लीजितः परपापी च तदशनमघावदय्॥२०॥ सत्कियो ह्य्चिनित्यं स पुमान् यः शिया जितः॥ निन्दन्ति पितरो देवा मान |©
वास्सकलाश्चतम्॥२१॥ तस्य किं ज्ञानसुतपोजपहोमगप्रपूजनेः ॥ विद्यया दानतः किम्वा श्ीभिर्थस्य सनो इतस् ॥२२॥ अआतरं
मां लियो भावं कृत्वा येन ब्रवीषि ह्॥भविष्यति क्षयस्तेन कालेन मम शापत्ः॥२३॥ वसिष्ट उवाच ॥ भत्वा धर्मस्सतीशापं तृष ¢
सूतिं विहाय च ॥ धृत्वा स्वमूर्तिं देवेशः कम्पमान उवाच सः ॥२४॥ धर्मं उवाच ॥ मातजानीहि मां धर्म ज्ञानिनाञ्च शुरो ट
गरम् ॥ परस्रीमातबुद्धिच कव्वन्तं सततं सति ॥२५॥ अहं तवान्तरं ज्ञातुमागतस्तव सत्निधिम्॥तवाइशच मनो जाने तथापि
विधिनोदितः ॥२६॥ कृतं मे दमनं साध्वि न विशदं यथोचितम् ॥ शास्तिः सशुत्पथस्थानामीश्वरेण विनिपिता ॥ २७ ॥ |
कहता है इसमे समयपर तू मेरे शापते क्षयको भराप्त होगा ॥ २३ " वरशिष्ठजी बोष्ेः जब धषराजने सतीका श।ष सुना तब अपनी राजसूति
छोढकर् देवमरतिं धारण कर वह देवेश कंपते हुए बोढे ॥ २४ ॥ धं षोठे हे पातः । यै ध्म हूं ज्ञानियोके रुओंका भी गज ह, हे सति ।
म पराई बियो सदा मातूषुदधि करता हूं ॥ २५ ॥ भँ तुम्हारे मनका भाव जाननेक निभित्त ही तुम्हारे समीप आया था तन तुम्हारा भन &
जानता ह तो भी विधि प्रेरित होकर ॥ २६ ॥ ह साध्वि ! तुमने भेरा दमनं किथा है, यहं उचित ही है, उन्भार्गगाभिथोको वह शासन (|
११८
7 (न
है ॥ २७ ॥ जो सथको घुल दुःख स्वयं देते है, तथा इनके दूर करनेमं भी सम ई जो सम्पद
रि०ु है| करता हौ है, यह हैश्वर द्वाराही निभ
ॐ] ह्। [नामत क र नेमे ध टि
1 (६ विषद कमान देते है उन शिवे निमि नमस्कार है ॥ २८ ॥ जो शत्र मित्र भीति ओर देश विं ५ करनेमे समथ है तथा सुषटिके
संहार ओर सजनम समर्थ है उन शिवके निमित्त नमस्कार है ॥ २९ ॥ जिसने दधको श्वेत किया जछ्पं शीतठता न ५ १
णकी जपन
शक्ति दी उन शिवजीको नमस्कार है ॥ ३० ॥ प्रकुति जिसने निमीण की है जिसने महते आदि केकर तपकर नि ४
बहला विष्ण महेशादि निर्माण कषे है उस्र शिक्के निमित्त भरणाम है ॥ ३१ ॥ ब्रह्माजी बोरे रा कहकर वृह जगदयुर धमं उसके ९
स्वय प्रदाता स्वेभ्यः सुखडुःखवरान्क्षमः॥ सम्पदं विपदं यो हि नमस्तस्मे शिवाय दहि ॥२८॥ श मिं सम्विधातु प्रीति ४
|
£
कलं क्षमः ॥ सृष्टं नष्टं च यस्पृष्टि नमस्तस्मे शिवाय दि॥२९॥येन शु्धीकृतं क्षीरं जले शैत्यं कृतम्पुरा॥दादीक्ृतो इता
शश्च नमस्तस्मै शिवाय ि॥३०॥पक्ृतिनिमिता येन तप्त्वाति महदादितः॥बह्मषिष्णुमदेशाया नमस्तस्मे शिवाय हि ॥३१॥ ५
ब्रह्मोताचः॥ इत्युक्ता बुरतस्तस्यास्तस्थौ धर्मो जगद्भरूः॥किथिप्रोवा च चकितस्तत्पातित्रत्यतोषितः।॥२२॥ पद्य पि नृपकन्यासा ||
पिप्पलाद्प्रिया तदा॥साध्वी तं धर्ममाज्ञाय विरिमितोवाच पर्वत॥३३॥पद्मोवाच॥ त्वमेव ध्म सर्वेषां साक्षी निखिलकमंणाम्॥ ४
कथं मनो मे विज्ञातं विडम्बयसि मां विभो ॥३९॥ यत्तत्स् कृतं बह्नन् नाप्राधो बभूव मे॥ त्वथ शपो मयाज्ञानाल््ीस्वभा
वादथा वृष ॥३५॥ का प्य॒वस्था भवेत्तस्य चिन्तयामीति साम्प्रतम् ॥ चित्ते स्फुरत् सा बुद्धिर्यया शं संछमामि वे ॥३६॥
आगे स्थित हृए ओर उ्तके पतिते संतुष्ट होकर कुछ भी न बोढे ॥ ३२ ॥ हे तृपति ! वह वृपकन्या पञ्मा पिप्यलाद्की भिया साध्वी
ध्मको जानकर विस्मित हो बोटी ॥ ३३ ॥ पन्ना बोढीहे तरप ! तुम ही सब कर्मके साक्षी हो फिर मेरे मन जाननेके ल्यि तुमने ¢
एसा किया थाहे प्रमो ! एसा कहनेमे तुम मुञ्चे क्यों वंचित करते हो ॥ ३४ ॥ है बहमन् ! यह जो कुछ भी हुआ है इसमे भेरा ¢
अप्राथ नही है मने अज्ञानसे तुमको शाप दिया, हे धर्मं ! ची स्वमाक्से बृथा ही भने मको शाप दिया ॥ ३५ ॥ इस शापकी क्षया |
श
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पा.खं.३
अ०३५
अ+ न्द
(९५4349८0 94
व्यवस्था होगी मँ यह चिन्ता करती हं मेरे चित्तम वह बुद्धि स्फुरायमान हो जिसमे सज्ञे शान्ति हो ॥ ३६ ॥ आकाश सव दिशा ओर वायु
आदि भी क्षम चाहे नाश हो जाये परन्तु पतिव्रताका शाप कभी नष्ट नहीं होता ॥३७॥ हे देवराज ! सतयुगम चों चरणोसे पुणे पूणेमासके
चनद्रमाके समान सब कारमं दिनरात आप विराजमान होते है ॥ ३८ ॥ यदि तुम्हारा नाश होजाय तो सम्पूणं खृष्टिही नाश ८
एसी कतव्यतासे मूढ होकर भ वृथाही बोरुती हं ॥ ३९ ॥ हे सुरोत्तम ! ञेतायुगमे तुम्हारा एक पाद् क्षय हो जायगा द्वापरमे दूसरा
ओर कलिं तीसरा पाद क्षय हो जायगा ॥ ४० ॥ कल्कि शेषम तुम्हारे चारो चरण क्षीण हो जारयँगे फिर सतयुग आने तुम पणे हो
आकाशोसौ दिशस्सवां यदि नश्यन्तु वायवः ॥ तथापि साध्वीशापस्तु न नश्यति कदाचन॥२७॥सत्ये पृणंश्तष्पादः पौण
मास्यां यथा शशी॥विराजसे देवराज सर्वकाटं दिवानिशम्॥३८॥त्व् नष्टो भवसि चेत्छृ्टिनाशो भवेत्तदा॥ इतिकर्तम्यतामूढा
वृथापि च वदाम्यहम्॥३९॥ पादक्षयश्च भविता तायां च सुरोत्तम ॥ पादोपरे द्वापरे च तृतीयोऽपि कलौ विभो॥४०॥कखिशे
वेऽविलाश्छिन्ना भविष्यन्ति तवांभरयः॥पुनस्सत्ये समायाते प्रिपरणो भविष्यसि॥४१।सत्ये सर्वन्यापकस्त्वं तदन्येषठ च कु
जचित् ॥ युगग्यवस्थया स त्वं भविष्यसि तथा तथा॥४२॥इत्येवं वचनं सत्यं ममास्तु सुखदं तव॥ याम्यहं पतिसेवा गच्छ
त्वं स्वगृह विभो ॥४२॥ ॥ ब्रह्नोवाच॥इत्याकण्यं वचस्तस्यास्सन्तष्टोभृदवृषस्स वे ॥ तदेवंवादिनीं साध्वीशुवाच विधिनन्दन
॥४४॥ धमे उवाच ॥ धन्यासि पतिभक्तासि स्वस्ति तेस्तु॒॒पतिरते ॥ वरं गृहाण त्वस्स्वामी सत्परिाणकारणात् ॥४९॥
जाओगे इसम सन्देह नहीं ॥ ४१ ॥ सतयुगमे तुम ॒सवभ्यापक होगे, दूसरे युगोमं कहीं कहीं व्यापक होगे, युगकी व्यवस्था तम् उस
उस भकारके हो जाओगे ॥ ४२॥ इस भरकारसे यह मेरे सत्य वचन तुमको सुखदायक होगे हे बिभो ! म पतिसेवा
निमित्त जाती हूं तू अपने षर जाओ ॥ ४३॥ बहलाज बोे पमे यह वचन सुन ध्ेराञ बडे प्रसन्न हूए हे नारदजी ! ओर इत भकारे
उतत साध्वीकौ कहने ठगे ॥४४॥ परमे बोठे हे पतिव्रते! तुम धन्य ओर पतिकी भक्त हो, हे पतिवते तुम्हारा मंगल हो अपने स्वामीकी रक्षके
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शि०्पुर निमित्त वर लेषो ॥ ४५॥ भै वरदेता हूं तुम्हारे स्वा
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निरन्तर उनमे यौवनकी स्थिति रहेगी ॥ ४९६ ॥ हे शुभे ! वह
इनद्रसे अधिक हो ॥ ४७ ॥ हरिके समान शिवके भक्त सिद्धि
विधाता होगे ॥४८<॥ तुम जीवन पर्यन्त स्वामीके सौभाग्यसे संयुक्त हीगं
॥४९॥ तू यणी ओर चिरंजीवी दशघत्रोकी माता होगी तेरे स्वामीसे विशेष यण पत्ति
युवा भवतु ते भता रतिश्रश्च धामिकः ॥ रूपवान् शुणवान्वाग्मी संततस्थिरयौवनः ॥ ४६ ॥ चिरञीवी स भवतु माकण्डे
यात्प रुभे ॥ ङुवेरादनो जैव शकरादेश्व्य्यवानपि ॥४७॥ शिवभक्तो हरिसमस्सिद्धस्त॒ कपिलात्परः ॥ बुद्धया इहस्पतिस
मस्समल्वेन विधेस्समः ॥ ४८ ॥ स्वामिसौमाम्यसंयुक्ता भव त्वं जीवनावधि ॥ तथा च सुभगे देवि त्वं भव स्थिरयौवना
॥४९॥ माता त्वं दशपुत्राणां गुणिनां चिरजीविनाम् ॥ स्वभच्॑रधिकानां च भविष्यसि न संशयः ॥ ५० ॥ गृहा भवन्तु ते
साध्वि सर्वसम्पत्समन्विताः ॥ भकाशमन्तस्सततं इमेरभवनाधिकाः ॥ ५१ ॥ ॥ वसिष्ठ उवाच ॥ इत्येवशक्ता सन्तस्थौ
धरमस्स गिरिसत्तम ॥ सा तं प्रदक्षिणीछृत्य प्रणभ्य स्वगृह. यथौ ॥ ५२ ॥ धम॑स्तथाशिषो दत्वा जगाम निजमन्दिरम् ॥
प्रशशंस च तां प्रात्या पद्यां संसदि संसदि ॥ ५३ ॥ सा रेमे स्वामिना साद्व यूना रहसि सन्ततम् ॥ पादूभूवुस्सत्पुत्रास्त
दरतैरधिका शणेः ॥ ५९ ॥ बभूव सकला सम्पदम्पत्थोः सुखवद्धिनी ॥ सवानन्दबृद्धिकरी परतेह च शमंणे ॥ ५५ ॥
युक्त होगे, ओर निरंतर रकाशवाले कुवेरके भवनसे बरे होगे ॥ ५१ ॥ पशिष्टजी बोरे हे गिरिसत्तम ! एता कहकर परमेराज स्थित
होगये ओर पन्ना उनकी दक्षिणा कर अपने घर गह ॥ ५२ ॥ ओर धम भी उसे आशीश देकर अपने स्थानको गये ओर भर्येक
स॒मागमोमं पाकी पशसा करते रहे ॥*५३॥ ओर फिर अपने युवा स्वामीकै साथ वह निरंतर रमण करने गी पीछे यणोँमं उसके स्वामीसे
भी विशेष उसके यत्र हए ॥ ५४ ॥ दोनों श्ल एरूषोको सुख बढानेवाखी सब सम्पत्ति उनके हरं ओर दोनों ठोकोमं कल्याण करनेवाली
होकर रतिम शूर ओर परम धार्थिक हों रूपवान् णी वक्ता हग ओौर
् ग भी विरोष चिरंजीव रहैगे कुबेरसे विशेष धनवान् ओर देश्वयमं
मे कपिर देवजीते भी विशेष बुद्धिम ब्रहस्पतिके समान ओौर समता दूसर।
होगी, ओर हे पुभगे ! इसी भकार तुम भी स्थिर यौवनवाटी होगी
गुणी विज्ञात एत्र होगे ॥*५०॥ हे साध्वि ! तुम्हारे घर षब सम्पत्ति
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व आनंद ओर वृद्धि करनेवाठी हृदं ॥ ५५ ॥ हे शेडेन्द्र ! तुषसे यह सव पुराना इतिहास वणन क्या, सो दोनों श्रीपुरुषोका यह |
¢ तुमने प्रम आदरसे सुना ॥ ५६ ॥ इस तत्वको जानकर अपनी सुता दश्वरको भदान करो हे शेकराज | अपनी श्ञी मेनाकै सहित
¢ कुवासनाको त्याग दो ॥ ५७ ॥ एक सपाह बीतने प्र एक दुरुभ योग है का स्वामी ट्म स्थित है ओर चन्द्रमा बुधकै साथ स्थित
होगा ॥ ५८ ॥ ओर रोहिणीसे युक्तं होगा चन्द्रतारागर्णोका योग विशुद्ध होगा, भार्गशीष महीना स्व दोष रहित चनद्रदार ॥ ५९ ॥
€ म॒ब शरेष्ठ अ्रहोके योगसे युक्त, असदूगरहौसे रहित, शरेष्ठ सन्तान देनेवाडे ब्ृहस्पतिके प्राप्त होनिपर जो सब सौभाग्य देनेवाले है॥ ६० ॥
शेटेन्द्र कथितं सर्वमितिहासु शातनम् ॥ दम्पत्यो्चतयोः प्रीत्या अतं ते परमाद्रात्॥4९॥ बुद्ध्वा तत्वं सतां देहि पार्वतीमी
श्वराय च ॥ करूषं त्यज शलेन्द्र मेनया स्व्िया सद ॥५७॥ सप्ताहे समतीते त॒ दुरुभेति शभे क्षणे ॥ लग्राधिपे च लग्रसथे
चन्द्रस्वतनयान्विते॥५८॥ सुदिते रोदिणीयुकते विशदे चन्द्रतारके ॥ मागीमासे चन्द्रवारे सवदोषविवर्जिते ॥५९॥ सर्वसद्रयदसंस
छेऽसद्अददृष्टिवजिते॥ सदपत्यप्रदे जीवे पतिसौभाग्यदायिनि॥६०॥जगदम्बां जगत्पते सूरप्रकृतिमीश्वरीम्॥ कन्यां प्रदाय
गिरिजां कृती त्वं भव पूर्वत ॥६१॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता शनिशादृलो वसिष्ठोज्ञानिसत्तमः ॥ विरयम शिवं स्मृत्वा नानाली
राक्रं प्रधुम् ॥६२॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्ढसंहितायां तृतीये षावतीखण्ड पद्यापिप्पलादचरितवर्णनं नाम पञ्च
तनिशोऽध्यायः ॥२५॥ ब्रह्मोवाच ॥ वसिष्ठस्य वचः त्वा सगणोपि हिमालयः ॥ विस्मितो भाय्थ॑या शैलानुवाच स गिरीइवरः
॥१॥ हिमाख्य उवाच ॥ हे मेरो गिरिराट् सद्य गन्धमादन मन्द्र ॥ भैनाकं विन्ध्य शैलेन्द्रास्सवे शृणुत सद्चः ॥ २ ॥
एते समयमे मूढ भ्रकतिकी रुपवाखी दश्वरी जगदम्बा कन्याको शंकरकै निमित्त षदान् कर हे गिरिराज | आप कतकार्य हूजिये ॥ ६१ ॥
बह्लाजी बोठे खनिशादूठ ज्ञानियोमे शर वशिष्टजी एसा कहकर नाना टीला करनेवारे महाभभु शिष्रको स्मरण कर मौन हूए ॥ ६२ ॥
¢६|| इति श्रीशिवम्० भा० टीका° ब्रसंहितान्तगेततृतीयपावतीलंडे पंचत्रिशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ बहाजी बोट हिमाख्य परिष्टजीकै वचन
४६॥ पुनकर अपने गणों्हित विस्मित हो भार्याके सहित आशवयको प्राप हो गिरीश्वर बोरे ॥ १ ॥ हिभाख्य बोरे है भेरो, है गिरिराज,
हि 3 १
| सर हमजा ३ पिय, हरेक मर बसन सुनो ॥ २ ॥ जव कि वरिटनी पा क ६
4 ¢ कार्यं है एसा विचार तं है 4 सत विचारकर निणेय करो ॥ ३ ॥ बह्याजी बोठे हिमाख्यकरे वचन सुनकर वे समर आदि
गिरि परस्पर निणय करके प्रमे कहने रगे ॥ ४ ॥ शेक बोठे हे महाभाग ¡ अव बहत विचारसे क्या काय तो हाही गया है, ह
महाभाग ! यह तो देवकार्ये निम्न उत्पनही हदं है ॥ ५ ॥ इतका अवतार शिवं निमित हृभा ह इत कारण षह गि
निमिनही देनी चाहे इनेही शकरकी आराधना की है, रूर वह स्वीकत हो चुकी है ॥ ६ ॥ बह्याजी बटे हिमा्य मेर् आदिक यह
वसिष्ठो हि वदत्येवं फि मे काय्यै विचार्यते ॥ यथा तथा च शंसध्वं निर्णीय मनसाखिलम् ॥ ३ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ त
त्वा वचनं तस्य सुमेरुभरसखाश्च ते ॥ परोचदिमाल्यं श्रीत्या खनिर्णीय महीधराः ॥ ४॥ शेखा उचः ॥ अधुना किं विमशन
कृतं कार्य तथेव हि ॥ उत्प्रे महाभाग देवकार्यारथमेव दि ॥ ५ ॥ प्रदातव्या शिवायेति शिवस्यार्थेवतारिणी ॥ अनया ||
|| राधितो श्रो शुरण यदि भाषिता ॥ & ॥ ्रहनोवाच ॥ एतच्छत्वा वचस्तेषाम्नेवादीनां हिमाचलः ॥ 4 जहास ||
ट ॥ _नानावाक्य॒समूहेनेतिहासेवविंविधरपि ॥ < ॥ अथ |©
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गिरिजा इदि ॥ ७ ॥ अङ्न्धती च तां मेनां बोधयामास कारणात् | .।
| सा मेनका शलपत्नी इद्ध्वा प्रसन्नधीः ॥ घुनीनरन्धतीं शलं भोजयित्वा बुभोज च ॥ ९ ॥ अथ -शेलतरो ज्ञानी ¢
ट सुसंसेव्य सुनी ताम् ॥ उवाच साञ्चकिः परीत्या प्रसत्रात्मागतभमः ॥ १० ॥ हिमाचल उवाच ॥ सप्तषयो महाभागा ४
वचःशृणुत मामकम् ॥ विस्मयो मे गतस्सवंश्शिवयोश्वरितं शतम् ॥ ११॥ ¢
ट| वचन सुनकर बहुत परणनन हए, ओर गिरिजा मनमे षने ठगी ॥ ७ ॥ इधर अशुषन्तीने मेनाको कारण हपसे बोधन किया अनेक ट
पा.खं.३ ||९ | प्रकारके वाक्य ओर अनेक इतिहास सुनाये ॥ ८ ॥ तव् शेटपत्नी उपे समज्ञकर असन्न हद ओर खनि अरुन्धती ओर् शेरराजको भोजन ¢
कराकर उसने स्वये भोजन किया ॥ ९ ॥ तव ज्ञानी शेकराजने उन खनिग्रष्ठंकी भटी भ्रकारमे सेवा करक हाथ जोड प्रसन्नता ५.
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वचन कहे ॥ १० ॥ हिमार्य बोे हे महाभागवाठे सपकरषियो तुम मेरे वचन सुनो मैने शिवाशिवका चरित्र सुना अब मेरा सव विस्मय
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जाता रहा ॥ ११ ॥ मेरा शरीर, पत्नी मेना, पुत्री ऋद्धि सिद्धि ओर जो कुछ भी है सब शिवकाही है इसमे सन्देह नहीं ॥ १२ ॥ बह्याजी
बोठे हिमायने इसत भकारके वचन कह आदरपूंक उस त्रीको देख मूषण वन्न सजाकर ऋषिकी गोदीमे बेढा दिया ॥१३॥ ओर प्रसन्न
होकर शेकराजने ऋषियोसे कहा यह भाग भ शंकरको अवश्य दंगा यह मने निश्वय कर छिया है ॥ १४ ॥ ऋषि बटे शंकर तो ¦
ओर आप दाता है पार्वती देवी भिक्षा है इससे अधिक उत्तमता ओर क्या होगी ॥ १५ ॥ हे हिमाटय ! जो आपके शिखरोंकी जिस |©
निमित्त देसी गति है इस कारण तुम धन्य हो सव गेखोके अधिपति सरवे हो ॥ १६ ॥ बह्लाजी बोरे रेस्ञा कहकर पे निर्भङ हदयवाठे ||
मदीयं च शरीरम्बे पतनी मेना सुतास्पता॥ऋदधिस्सिद्धिश्च चान्ये शिवस्यैव न चान्यथा ॥१२॥ ॥ ब्रू्नोवाच॥ इत्युक्ता स
तद् पुजीं ह्वा तत्सादुरं च ताम्॥ भूषयित्वा तदङ्गानि ऊष्युरकग न्यवेशयेत्।१२॥ उवाच् च पुनः प्रीत्या शेकशज ऋषींस्तदा॥
अय् भागो मया तस्मे दातव्य इति निञ्चितम्॥१४॥ ॥ ऋषय उचुः शंकरो भिश्चुकस्तेथ स्वयं दाता भवान् गिरे ॥ भक्ष्य
रे
पार्वती देवी किमतः परसुत्तमम्॥ १५॥हिमवन् शिखराणान्ते यद्धेतोस्सहृशी गतिः॥ धन्यस्त्वं स्॑शेलानामधिषस्सर्वतो वरः
॥१६॥ ॥ ब्रह्मोवाच॥एवसुक्ता तु कन्याये
१६॥ | ए सुनयो विमलाशयाः ॥ आशिषं दत्तवन्तस्ते शिवाय सुखदा भव ॥१७॥ स्पृक्ठा
करेण तां तन कटयाणं ते भविष्यति। पक्षे यथा चन्द्रो वद्धन्तां त्वदथणास्तथा॥ १८॥हत्युक्ता ुनयस्सुवं दत्वा ते गिरये
मुदा॥ पुष्पाणि फलयक्तानि प्रत्ययं॑चक्रिरे तदा ॥१९॥ अङन्धती तदा ततर मेनां सा सुबु शुदा ॥ गणेश लोभयामास
शिवस्य परमा सती ॥२०॥ दरिद्राकुकमेश्शेरश्मश्रणि प्रत्यमाजंयत् ॥ लौकिकाचारमाधाय मंगलायनश्त्तमम् ॥ २१ ॥
ऋषि कन्याको आशीवीद् देने रगे किं तू शिवकै निमित्त सुखदायक हो ॥ १७ ॥ ओर हाथते स्पश करके कहा किं तुम्हारा कल्याण
होगा शु पक्षम चनद्रमाके समान दुम अपने गुणेति वृद्धिको भ्रा हो ॥ १८ ॥ यह कहकर ऋषियोने गिरिराजको पष्पफठ देकर विश्वास
दिवाया.॥ १९ ॥ उस्र ओर खली अरुन्धतीने प्रसते शिवके यणोते साध्वी मेनाको छुभाया ॥ २० ॥ हरिद्रा ओर कुभकुमते शेखकी
डादी मूषे माजित कीं लौकिक आचार पूर्वक सब मंगर किथे ॥ २१ ॥ |
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फिर प चौय दिनकी उत्तम ठर निश्वय कर परस्पर सनु हो शिवजीफै समीप गये ॥ २२ ॥ वहां आय शिवजीको णाम ध 8
अनेक स्तोते सततिकर थह सव बरिष्ठादि ऋषि परमेश्वरे कहने ठगे ॥ २३ ॥ ऋषि बो ह देवदेव महादेव । हे परमे 1 दे महाभा ।
॥ २४ ॥ हे महेशान ! हमने गिरिराज ओर मेनाको बडे बडे इतिहास कहकर
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॥२७५
हमारे वचन प्रेमसे सुनो जो कुछ आपके सेवकोने किया है ५ शा
बडे उपायो समज्ञाया है इते सन्देह नही अव वह समञ्च गये ई ॥ २५ ॥ गिरीन्दरने वाणीते आपको पावती ददी इतमं॑सन्दहं नह
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{ ततश्च ते चतुथे संघाय्यं लग्रश्त्तमम्॥ परस्परं च सन्तुष्य संजग्ुश्शिवसत्निधिम्॥ २२॥तअ गत्वा शिवं नत्वा स्तुत्वा विवि
¢ धसूक्तिभिः॥ उचुः सव वसिष्ठाय सुनयः परमेन्वरम्॥२२॥ऋषय उचुः॥ देवदेव महादेव परमेश महाप्रभो ॥ शृण्वस्मद्वचनं ४
ठ रीत्या यत्कृतं सेवकैस्तव्॥२४॥ बोधितो गिरिराज मेना विविघशूक्तिभिः॥ सेतिहासं महेशान ्बद्ोसौ न संशयः॥२५॥
¢| क्यदत्ता गिरीनद्ेण पावती ते हि नान्यथा॥उद्वाहाय मगच्छ तव गणेदैवेश संयुतः॥२६॥गच्छ शीध्रं महादेव दिमाचलगरह ४
$ परभो॥ विवाह्य यथा रीतिः पावैतीमातेमजन्मने ॥२७॥ ॥ ब्रह्मोवाच॥ तच्छ्रत्वा वचनं तेषां रौकिकाचारतत्परः।प्रहश्ठात्मा £
¢ महेशानः प्रहस्येदसुवाच सः ॥२८॥ महेश उवाच्॥ विवाहो हि महाभागा न दृष्टोन शतो मया ॥ यथा परा भवद्धिस्तद्विधिः
प्रोच्यो विशेषतः ॥२९॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तवाकण्य महेशस्य लौकिकं वचनं ज्ुभम्॥ र्चः परहसन्तस्ते देवदेवं सदाशिवम् ए
ध ॥ ३० ॥ ऋषय उचुः ॥ विष्णुमाहूय वे शीघ्रं ससमाजं विशेदतः ॥ ब्रह्माणं ससुतं प्रीत्या तथा देवं शतक्रतुम् ॥ ३१ ॥ ४
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स्प. २
पासं भव आप् देवता ओर गणोंके सहित व्याह करने चटिय ॥ २६ ॥ हे महादेव ! हे प्रभो ! आप शीघ्र हिमाठ्यकै षर चटिये यथा रीतिसे
अ०३६ |$ || भप पार्वतीका प्याह कीजिये ॥ २७ ॥ ब्रह्माजी बोरे यह वचन सुनकर शिवजी प्रसन्न हृए ओर छौकिंकाचारमे तत्पर होकर हसते हुए इस 6
| | प्रकार बोढे ॥ २८ ॥ शिवजी बोढे हे महाभाग ! हमने तो विवाह न देखा न सुना जेसी पूर्वम आपने विधि कही है वह करो ॥२९॥ ब्रह्माजी ४
‰॥ बोटे शिवजीके इस् भ्रकारसे सुन्दर वचन सुनकर हसते हुए देवदेव सदाशिक्से कहने रगे ॥३०॥ ऋषि बोडे समाज सहित शीधतासे विष्णजीको >
बुलाये, प्रमसे प्रोंसहित बह्चाजीको तथा देवताओंसहित इन्द्रको बुराशये ॥ ३१ ॥ ओौर फिर सब ऋषिगण यक्ष गन्धव किन्नर सिद्ध वियाधर
ओर अप्सरागणोको वादये ॥ २२॥ हे पभो ! इनके वाय दूरे महादमावोको यथायोग्य बुलाये यह सव आपका काय साध ठंग इमे
सन्देह नही ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी बोटे सप्त ऋषि इस्त भकारक वचन कह भसन्नतासे शिवजीक आज्ञाको भाप ह शिवजीकी महिमा वणेन करते हुए
अपने २ स्थानको गये ॥ ३४ ॥ इतिश्री शिवमहाएराणभाषाटी ° रुद्रर॑हित।न्तग॑ततृतीयपारवतीखण्डे सपरषिवचनं नाम षटरत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
नारदजी बोछे हे तात ] जबर अर्न्धतीसहित सप्तमं अपने स्थानोको चे गये तब पीछे हिमाख्यने जो किया सो कहो ॥ १ ॥ बह्लाजी बोे
तुथा ऋषिगणान्सर्वान् यक्षगन्धवेकिन्नरान्॥ सिद्धान् िद्याधरांञिव तथा चैवाप्सरोगणान् ॥३२॥ एतांश्ान्यान्प्रभोस्वानानय
स्वेह साद्रम्॥ सर्वं ससाधयिष्यन्ति त्वत्कार्यं ते न संशयः ॥३३॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता सप्त ऋषयस्तदाज्ञां पराप्य ते घदा॥
स्वधाम प्रययुस्सवं शंसन्तः शङ्करीं गतिम्॥३९॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दरसहितायां ततीय पार्वतीखंडे सप्त
पिवचनं नाम षटूत्िरोऽध्यायः॥३६॥ नारद् उवाच॥ तात प्राज्ञ वदेदानीं सप्तर्षिषु गतेषु च॥किमकार्षीद्धिमगिरिस्तन्मे कृत्वा
कृपां प्रमो ॥१॥ ॥ ब्रह्मोवाच॥ गतेषु तेषु सुनिष सप्तस्वपि भुनीश्वर॥सारुन्धतीषु हिमवान् यदकार्षीद्रवीमि ते ॥ २ ॥ तत
आमन्त्य स्वभरातन् मेवादीन स्त्प्रियः॥महामनास्स सुमुदे दिमवान् पर्वतेश्वरः ॥३॥ तदा्ञपस्ततः परीत्या दिमवान् ल
पत्रिकाम्॥रेखयामास सुप्रया गगण स्वपुरोधसा॥७॥अथ प्रस्थापयामास तां शिवाय स पत्चिकाम्॥नानाविधास्त॒ सामग्यः
स्वजनेखदितात्मभिः ॥ ^ ॥ ते जनास्तत्र गत्वा च कैलासे शिवसत्निधिम्॥दइश्शिवाय तत्पत्रं तिरं सम्विधाय च ॥&॥
अरुषतीके सहित जब सपऋषि चठे गये तब हिमवान् जो कुछ करता भया सो सुनो ॥ २॥ तव वह अपने भाई भेर आदिको एत्रादि सहित
आरम॑त्रण देकर हिमवान् पवतेश्वर बहृत प्रपन्न हुए ॥ ३ ॥ उनकी अज्ञ स बहुत परष्न होकर अपने ग्गोको बुखाय गर्भे अपने परोहितते
ठग्र टिखाई ॥ ४ ॥ तब उप पत्रिकाको शिवजी समीप भेजा ओर प्रत्न होकर अपने जनहित नाना पकारकी समधी मेज दीं॥ ५॥
उन जनने केठामे शिबजीके समीप जाकर शिवजीको वह पत्र ओर पिरक दिथा ॥ ६ ॥
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विशेषकर भ्रमुने उनका बडा सन्भान किथा, ओर वह समर परषनन होकर शकणजक समीप गे ॥ ७ ॥ शिवजीने आये हर जनका विशेष ट |
त्कार किया था उनको देखकर शेरराज बडे प्रत्न हृए ॥ ८ ॥ ओर फिर आनन्दे अपने वंधजनोंको निर्म्रण किया जो अनक शो |
स्थित थे, ओर सब सम्पतियोके अधिकारी थे ॥ ९ ॥ तव आदरे गिरिराजने अल्नगरह कराया ओर विवाह करणके उपयोगी अनेक
भरकारकी सामी एकत्रित की ॥ १० ॥ बहुतते चादर ओौर पृथुक ( च्यूरा ) गड, शकरा, उण ॥ ११ ॥ दृध) षी, दही (र
सन्मानिता विशेषेण प्रणा च यथोचितम् ॥ सवे ते प्रीतिमनस आजग्धुश्शैकपत्निधिभ् ॥ ७ ॥ सन्मानितानि
मदैशेना गताज्जनान् ॥ दष्टा सुहषिताज्च्छैको श्ुमोदातीव चेतसि ॥ ८ ॥ ततो निमन्बणं चके स्वबन्धूनां प्रमोदितः ॥
नानादेशस्थिता नाञ्च निखिलानां सुखास्पदम् ॥ ९ ॥ ततस्स कारयामास स्वर्णसब्रहमादशत् ॥ नानाविधा सामग्रीविंवाह
करणोचिताः ॥१०॥ तण्डुलानां बहूज्छैलान् पृथुकानां तथेव च ॥ शुडानां शर्कराणाञ्च रुवणानां तथेव च ॥११॥ क्षीराणां
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। च् घृतानाञ्च दध्नां वाषीश्चकार सः यवादिधान्यपिष्ठानां ड्डकानां तथेव च ॥१२॥ शष्ुटीनां स्वस्तिकानां शरकराणां
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॥२.७६॥
तथेव च ॥ अमृतेक्ुरसानां च ततर वपीशचकार सः ॥ 9१३ ॥ बह्रीरैयंगवानाच श्चासवानां तथेव च ॥ नाना पक्घात्रसंघां ध
महास्वादुरसस्तथा ॥१४॥ नाना ग्यञ्जनवस्तूनि गणदेवहितानि च ॥ असरूल्यनानावश्चाणि वदहिशौचानि यानि च ॥१५॥
मणिरत्नप्रकाराणि सव्णरजतानि च ॥ द्भ्याण्येतानि चान्यानि संशृद्य॒विधिषूर्वकष् ॥ १६ ॥
ढेर यवादि भौर पीसे हृए धान्य ओर दूद् ॥ १२ ॥ पूरी, स्वस्तिका ८ पिके पदार्थ, ) शकरा, अभृत, इश्वुरसर इनकी बावडीकी बाढी
कृर डाी ॥ १३ ॥ बहुतस्ती मक्खनके तथा आसवोंकै देर तथा अनेक पक्रान महास्वादवारे रोके देरकै ढेर ॥ १४ ॥ नाना व्य॑जनकी
बस्तु गण ओर देवताओंके हितकी करनेवाटी तथा दूसरे अमूल्य वन्न जो धूपमात्रके ठगनेमे पवित्र गिने जाते ह ॥ १५ ॥ भणि रत्नक
प्रकार सुवण चां दीके गहने यह तथा दूसरे भी विधिूर्वक रहण करके ॥ १६ ॥ ।
रु.सं. २
पा.खं.३
अ०३७
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भूषित होकर वे परसत्नतासे मंगलाचार करने लगीं षर ओर बाहर्णोकी चयं भसन्न हो टोकाचार करने ठगी ॥ १८ ॥ वह, भंग पूर्वक |
उत्सव होने ख्गा? हिमाल्यने भी भ्रसन्न हो मंगलाचार किया ॥ १९ ॥ बह सव भकारसे प्रसन्न हुआ ओर बधुवगोकि आगमने उत्सुक हुआ ठ
इसी अवसरमं निमेत्रित हुए वह सव बांधव ॥ २० ॥ अपनी ल्ली एत्रादिके साथ बडी प्रसन्नतासे आये, हे देवष ! उन पर्वतका आगमन त
आदरे सुनो ॥ २१ ॥ मेँ शिव धीति बनके निमित्त संक्षेपे वणन कएता हूं दिव्यरूप धारण किये देवारूय गिरि ॥ २२ ॥ अनेकं ¢
मगर कतुमारेभे गिरि्मगलक्ृदिने॥ संस्कारं कारयामासुः पार्वत्याः पर्वतच्चियः॥१७॥।ता मंगलं खुदा चज्खर्भृषिता भूषणैः स्व
यम् पुरद्विजल्ियो ष्ठा लोकाचारं प्रचक्रिरे॥१८॥सोत्सवं विविधं ततर सुमंगरपुरस्सरम्॥हिमारख्योऽपि इष्ठात्मा त्वाचारं
सुमंगलम् ॥१९॥ संभवेन सुप्रीतो _बन्धुवर्गागमोत्सुकः॥ एतस्मिन्नन्तरे तस्य बान्धवाश्च निमन्तिताः ॥२०॥ आजग्मुस्स
ट| शयो दशास्सखतास्सपरिच्छदाः॥ तदेव ण॒ देवर्षे गि्य्यागमनमाहतः॥२१।वर्णयामि समासेन शिवप्ीतिविबृद्धे॥देवाख्य ||
||| गिरि्या दि दिव्यरूपधरो महान्॥२२॥नानारत्नपरिभाजत्समाजस्सपरिच्छदः ॥ नानामणिमहारत्नसारमादाय यत्नतः॥२३॥ ट
(त सुवेषालंकृतः श्रीमान जगाम स दिमालयम्॥मन्दरस्सवशोभाव्वस्सनारीतनयो गिरिः॥२४॥घुपायनानि संशृल्ल जगाम विवि
शीमानू हिमाखयके षर आये इसी भकार सब शोभाकी खान ची एत्र सहित पर्वतराज बंदर ॥ २४ ॥ अनेकं भैटकी वस्तु लेकर हिमाल्यके |
|¢ स्थाने आये, इसी भकार दिव्य शरीरधरी अस्ताचक भी अनेक सामग्री सहित प्राप हभ ॥ २५ ॥ इती भकार बहुतसी शोभा ओर सामी ६
‰॥ सहित अनेकं र्न ओर मणि रेकृर उदपाचरु आया ॥ २६ ॥ मरयाचर पूत अपे बडे परिारके सहित महासुख पूवक आया ॥ २७॥ ॥>
मंगलदायक दिने गिरिराजने यह सव म॑ंगलाचार आरम्भ किया, प्वतकी सिय पाव॑तीका संस्कार करने गीं ॥ १७ ॥ ओर भूषणेति ।
धानि च ॥ अस्ताचलोपि दिव्यात्मा सोपायन उदारधीः॥२९॥ बहुशोभासमायुक्त आजगाम शुदान्वितः॥उदयाचर आदाय
सद्रत्नानि मणीनपि ॥ २६ ॥ अत्युत्कृष्टपरीवार आजगाम महाभ्चखी ॥ मल्योगिरिराजो हि सपरीवार आहतः ॥ २७ ॥
एको धारे अपने समाज ओर कुटुम्बक साथ आये, उनके साथे अनेक मणि ओर रत्नोक सार ये ॥ २३ ॥ एुवेषधारे अङुकारधारे वह
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ष {4 यं थे ॥ २८ ॥ यह्
०४० ||| सह्य ओर दर नामषाला पर्वत बडे प्रिवारयुक्त दिव्य रचनाके सहित अये ओर तासे साथमे अपनी विय भी टां
क | भ र की प्रकार निषध पर्वत मी कुडम्ब सहित आया ॥२९॥ यह अपने एत्र ओर ब्ञी सहित भन्न
सब बडी शोभसे युक्त हिमाख्यके षर अयि ५
^ | ¢ हो हिमाठयके घर गये इसी प्रकार महाभागं गन्धमादन पर्वत आय। ॥ ३० ॥ इती भकार महाेश्वयक्रे सहित करवीर पवेत आया इती धकार
पर्वत अष्ट महेन्द्र भी हिमाखयके यहां आया ॥ ३१ ॥ यह अपने गण ओर श्ञीको साथ ठे शोमाके सहित आया पारियात्र नामक महात्मा
ट
|| पर्वत मणी ओौर रत्नोके हेर छेकर आय। ॥ ३२ ॥ यह अपने गण ओर परिवारको छेक हिभाठयकै षर आये इसी भकार पर्वतराज क्रौँच
सुदिभ्यरचनायुक्त आययौ बहुसद्रलः ॥ सयो द्दैरनाम। च अुदितस्सकटत्रकः ॥२८॥ बहुशोभान्वितस्तातः ययौ हिमगिरे
गृहम् ॥ निषदोपि प्रह्टात्मा सपारेच्छद आययौ ॥ २९ ॥ ससुतद्लीगणः परीत्या ययौ हिमगिरेषृदम् ॥ आजगाम महामा
ग्य भ्रूषरोगन्धमादनः ॥ ३० ॥ करवीरस्तथेवापि महाविभवक्षयुतः ॥ महेन्द्रः पव॑तश्रष्ठ आजगाम दिभार्यम् ॥ ३१ ॥
सगणस्ससुतघ्ीको बहुशोभासमन्वितः ॥ पारियात्रो हि इष्टात्मा मणिरल्नारकरस्सयुत् ॥ ३२ ॥ सगणस्सपरीवार आययौ
ठ दिमभूषरम् ॥ कौञ्चः पर्वतराजो हि महाबरुपरिच्छदः ॥ आजगाम गिरिभ्रष्ठस्सघुपायन आदतः ॥३३॥ पुरूषोत्तमशेरोपि
¢ सपरिच्छदं आहतः ॥ महोपायनमादायाजगाम रिमभूधरम् ॥३७॥ नीलः सलीरस्स सुतस्सच्लीको व्यसेयुतः ॥ आजगाम
दिमागस्य गृहमानन्दसंयुतः ॥ ३५ ॥ श्िकृटञित्रकूटोपि वेंकट: श्रीगिरिस्तथा ॥ गोकाश्चखी नारदश्च हिमगेश्चपागमत्
| ॥ ३६ ॥ विन्ध्यश्पवतत्रेष्ठो नानासम्पत्समन्वितः ॥ आजगाम ग्रह्टात्मा सदारतनयश्जुभः ॥ ३७ ॥
रुतं. २ || महावर ओर सामग्रीके साथ भट ठेकर गिरिशरेष्ठके यहां आये ॥ ३३ ॥ पुरूषोत्तम पव॑त भी अपनी समाज सहित आद्रसे बडी स्रामभ्र
पा.सं.३ || || ठेकर हिमारयके समीप आया ॥ ३४ ॥ नीर नीर पर्वत भी अपनी ल्ली एत ओर द्ध्य सहित हिमाङयके धर आनंदपूरवक आया ॥३५॥
£ || जिकूट, चित्रकूट वेकर. श्रीगिरि गोकाशुसी ओर नारद यह हिमायके घर आये ॥ ३६ ॥ विन्ध्व नामक पवेत भेष अनेक सम्पत्तियोके
> || सहित खी एर्बोसदित बढी भसन्नतासे हिमाख्यके घर आया ॥ ३७॥
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अ०३.७
कािजर बडी प्रस्ष्नतासे अपने गण ओर धनी सहित हिमाख्यके घर आया ॥ ३८ ॥ कैठास्षनाम् महाशमी बडी भरसन्नताके सहित बडी ४
पाकर हिमाखयके गेह पथारे यह सव पवतोके अधिष्ठात्री देवता थे॥३९॥ हे नारदजी! जो दूसरे दीपो दूसरे पर्वत थे तथा ओर जो भारत वर्षके
पवत देव थे वे सब हिमाठयके धर आये॥४०। सने! उसने पहके सव पव॑तोका पमे निमं्ण किया था वे सब परमस शिवाशिवका विवाह देखने ् च
॥४१॥ उस समय शोणमद्रादिक नद सभी आये ओर सवने महाभसन्ता प्राप्त की किं शिवाशिवका षिवा है॥४२॥ अनेक अटंकारोते संयुक्तं सब ठ
कालंजरो महाशरो बहुदषंसमन्वितः ॥ बहुभस्सगण् भरीत्याजगामदिमभूषरम्॥३८॥कैलासस्तु महाशैलो महादर्षसमन्वितः
आजगाम कृषा कृत्वा सवोंपरि टसत्परथुः ॥३९॥ अन्येपि भूभृतो येहि द्ीपेष्वन्येष्वपि द्विज ॥ इहापि येऽचलास्सवें आयुस्ते 6
दिमाख्यम् ॥ ४० ॥ निमन्विता नगास्त तेन पूर्व दा सुने॥आययुनिंखिलाः प्रीत्या विवाहश्शिवयोरिति॥४१॥ तदा सवं
समायाताश्शोणभद्रादय,खलु॥ बह्वशोभा महाप्रीत्याविवाहश्शिवयोरि ति॥४२॥नद्यस्सर्वास्समायातानानालंकारसंथुताः॥ दिष्य ¢
रूपधराः गीत्या विवादश्शिवयोरिति ॥४३॥ गोदावरी च यज्ना बरहमललीविणिका तथा॥ आययौ हिमशेरम्बे विवाहश्शिवयोरिति ॥९
॥७७॥ गंगा तु सुमहाग्रीत्या नानारंकारसंयुता ॥ दिग्यङ्पा ययौ प्रीत्या विवादरिशवयोरिति॥४८॥ नभदा त॒ महामोदा शद ||
कन्या सदद्ररा ॥ महा ्ीत्याजगामाश् विवादश्िशवयोरिति॥४६॥आगतेरतैस्ततः॥ सवस्र्तो हिमभूधरभ्॥संङ्कलसीत्री |©
दिव्या सरवशोभासमन्विता॥४७॥मरोत्सवा लसत्केतध्वजातोरणकाथिका ॥ वितानविनिःत्ताका तथा नानारसत्मा ॥ ४८॥
नदिय आई यह सव दिव्यरूप धारणकर प्रमसे शिवजी का विवाह देखने आये॥४ ३॥ गोदावरी, यना, बहमएव, तरिषेणी यह सब शिवाशिवका विवाह |
देलनेको हिमार्यकै यहां आये॥४४॥ गंगा तो महाभस्म हो अनेक प्रकारके भूषण धारण कर पेम दिव्यहप धारण कर हिभारयके सहां आ६।४५॥ ट
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नदा महामोदा सरिद्वरा रुदकन्या यह सन यहापेमसे शिवाशिवक्ा विवाह देने आई ॥ ४६ ॥ जिस समय यह चारोभोसते सव आगये उक समय
सव शोभते यकत हिमार्यकी दिव्य इनते व्यप हग ॥ ४७ ॥ ष्वजातोरणोति भहारत्सव उस समय होने गा, वितान ताने गये जिन धूप |
१२०
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शि०पु० निवृत्त हो जाती है तथा अनेक ओरभी शोभा होरहीहै॥ ४८ ॥ हिमाल्यनें भी भ्म 8
॥२७८ किया ॥ ४९ ॥ सबको प्रथक् प्रथक् अच्छे स्थानों बढाया, ओर अनेक सामग्री सवको सेतु किया ॥ ५० ॥ इति श्रीशिवमहा
षराणभा ° रशुद्रसंडितान्तगततृतीयपाती सण्डे सप्िंशोऽध्यायः ॥. ३७ ॥ बह्माजी बोटे हे नार्दजी ! तच ॒पप्न्न होकर हिमाट्यनं
अपने शरभ विचित्र प्रम उत्व करनेकी आज्ञा दी ॥ १ ॥ मागं सव भ्रकारसे छिकवा दिये गये प्रम ऋषिस षब शोभित कर
हिमाल्योपि सुप्रीत्यादरेण विविघेन च ॥ तेषां चकारसन्मानं तासां चैव यथायथम्॥४९॥ स्वाच्चिवासयामास सुस्थानेषु पृथक
पथक् ॥ सामग्रीभिरनेकाभिस्तोषयामास कृत्स्नशः॥९०॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
लगमपवसंप्रषणसामगरीसंग्रहशेलागमनवर्णनं नाम सप्त्िशोऽध्यायः॥ ३७ ॥ ॥ बरह्नोवाच ॥ अथ शैटेश्वरः प्रीतो हिमवान्सुनि
| सत्तम॥ स्वपुरं रचयामास विचिवरं परमोत्सवभू ॥१॥ सिक्तमार्ग सस्कृतं च शोभितं परमद्धिभिः ॥द्ारिद्रारि च रम्भादि मङ्गलं ¢
दव्यसंयुतम् ॥२॥ प्रांगणं रचयामास रम्भास्तंभसमन्वितम्॥ पट सूेस्संनिवद्धरसाल्पछ्वान्वितम्॥ ३ ॥भालतीमात्यसंयक्तं |£
लसत्तोरणसुप्रभम् ॥ शोभितस्मं गलदरव्येशतुदिंश्ष स्थितेश््ुभेः॥ 9 ॥ तथैव सर्व परय। खुदान्वितश्चकरे गिरीन्द्रस्स्वसुतार्थमेव॥ |
ग्गम्पुरस्कृत्य महाप्रभावं प्रस्तावयोग्यं च सुमंगलं हि ॥५॥ आहूय विश्वकर्माणं कारयामास सादरम् ॥ मण्डपं च सुविस्तीर्णं
वेदिकादिमनोहरम् ॥ & ॥ अयुतेन सुरे तयोजनानां च विस्तृतम् ॥ अनेकलक्षणोपेतं नानाश्ा््यंसमन्वितम् ॥ ७ ॥ ¢
दिये गये प्रत्येक द्वारपर कटे ओर मंगखदरव्यः सम्पादन किये गये ॥ २॥ आंगनमें केठेके सेभ॒ठगाये गये ओर रेशमकी डरीम
आमक पत्ते बांधकर बंदनवारं ठगाई ॥ ३ ॥ माङतीमारासे संयुक्त तोरण बंधी यह चारो ओर भंगखद्रव्य्े संयुक्त होकर ठ्गाई गई &
॥ ४ ॥ इसी भकारे सब बाते पवेतराजने परम आनेदते अपनी पत्रीकी प्रसन्नताके निमित्त की, महाभमाववाञे गर्थनीको आगे करके स्व &
सामयी भरस्तुत को ॥ ५ ॥ विश्वकमीको बुकाकर आद्रसे मण्डप ओर मनोहर वेदिकाकी रचना कराई ॥ £ ॥ हे नारदजी ¡ वह वितान ्
रुण्स.२
पा.खं.३
अ०३८
22123 न 2 यत्य तगत
१०००० योजनकै विस्तारमें था जो अनेक लक्षणोँवाला अनेकं आश्व्योमे युक्त था ॥ ७ ॥ स्थावर जंगम सबको ही रचनासे मनोहर | ह
। ही अद्ुतषूप था नानावस्तु ओसि चमत्छत ॥८॥ बहांकी स्थावर रचनाने जंगभके विशेष रपसे जीत छिया था, ओर जंगमने स्थावरको
जय कर छिया था ॥ ९ ॥ जङकी रचनाने स्थठ भूमिको जीत या था तात्पयै यह कि जल कौनसा स्थर कौनस्षा यह चतुर जन भी नहीं ¢
जान सकते थे ॥१०॥ कहीं रुतरिम सिंह ओर कहीं सारसकौ प॑क्तिय निर्माण की गई थीं ओर कहीं कत्रिम मोर बनाये गये थे ॥११॥ कहीं
नोहर छत्रिम श्चियं एरुषोके साथ नृत्य करती थी, वह त्रम होकर भी देखने वालके मन मोहित करती थीं ॥१२॥ इसी प्रकार हाथमे ट
स्थावरं जगम सर्वं सदशन्तेमनोदरम् ॥ सर्वतोऽद्धतसरवस्वं नानावस्तुचमत्कृतम् ॥ ८ ॥ जगम विजितन्ततर स्थावरेण विशे |£
घतः ॥ जंगमेन च त्॒रासीजितं स्थावरमेवं 1 ॥९॥ पयसा च जिता तञ स्थलभरूमिनं चान्यथा ॥ जलं कि हि स्थलं किं |©
दिन विदुः केऽपि कोविदाः ॥ १० ॥ कचित्सिहाः कत्िमाश्च कचित्सारसपक्तयः ॥ कषिच्छिखण्डिनस्तत्र छरत्रिमाश्च |©
मनोहराः ॥ 9१ ॥ कचितिञ्यः कृत्रिमा वृत्यन्त्यः पुरुपस्सट ॥ मोहयन्त्यो जनान्सरवान्पश्यन्त्यः कतिमास्तथा ॥१२॥ ||
तथा तेनेव विधिना द्वारपाला मनोहराः ॥ दस्तेरषचूषि चोद्रत्य स्थावरा जंगमोषमाः ॥ १३ ॥ द्वारि स्थिता महालक्ष्मीः ठ
कृत्रिमा रचिताद्धता.॥ सवेलशक्षणसंयुक्ता गताः साक्षत्पयोण॑वात् ॥ १४ ॥ गजाश्ाटङ्कृताद्यासन्करामिमा अङतोपमाः ॥ ष
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तथाश्वाःनसादिभिश्चैव गजाश्च गज॒सादिभिः ॥ १५ ॥ रथा रथिभिराङ्ृष्ठा महश्र्यसमन्विताः ॥ वाहनानि तथान्यानि
पत्तयः कृतरिमास्तथा ॥ १६ ॥ एव विमोह नारथन्तु कृत वें विश्वकर्मणा ॥ देवानां च घुनीनां च तेन प्रीतात्मना सुने ॥१७॥
धूलुष ल्य मनोहर द्वारपाल बनाये गये, वे स्थावर होकर भी सचे भाणधारी विदित होते थे ॥ १३ ॥ द्वारे बनाई हृदं महालक्ष्मी परम अद्भत थी
बह सब ठक्षणसे सम्प साक्षात् क्षीर सागरसे आई विदित होती थी ॥ १४ ॥ इती भ्रकार छन्नम हाथी भी असली हाथी दिखाई हते ये इसी
भकार अश्व अश्वारोहियोसे, हाथी हाथीपर चदनेवाछोसि प्रसन्न हो रहे थे ॥१५॥ यहाआशवरषसे संयुक्तं रथ रथी चलाते घे, तथा दूसरे बाहनोको
पद चलाते थे यह सव छत्रिम थे ॥ १६ ॥ इस प्रकार सबके मोहनेको विश्वक्ाने रचना की, है खे | इस कौशे देवता ओर खनि सव
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प्रसन्न हुए ॥ १७ नन्दी बनाकर स्थित किया (
॥ १ ८। इ 1 १; भूषित ध छन्दर पव ओर चामरे शोभायमान विराजमान था॥ १९॥ बाहं ओरदौ शा
शुद्ध काश्मीर देशके चार चार दांतवाछे साठ वर्षके महाकान्तिवाहे स्थित थे ॥ २० ॥ इसी भकार स्के समान कान्तिवाे दो अश निमाण
किये जो च॑वरोपे अकत दिव्य अलंकारो भूषित थे ॥-२१ ॥ इसी प्रकार श्रेष्टरत्नोकषि यु
देवता यथा्थहपते बनाये ॥ २२ ॥ इसी प्रकार भृख आदि सव तपोधन दूसरे सिद्ध ओर देवता सब छत्रिम बनाये ॥२३॥ इधर विष्जीकौ
भहाद्वारि स्थितौ नन्दी छत्रिमश्च कृतो शने ॥ शद्धस्फटिकसंकाशो यथा नन्दी तथेव सः ॥ १८ ॥ तस्योपरि मदादिष्यभ्पु
ष्पकं रत्नभुषितम् ॥ राजितं पलवेश्छुभैश्ामरे सुशोभितम् ॥ १९ ॥ वामपाश्वं गजौ द्रौ च श्ुदकाश्मीरसत्निभौ ॥ चतु
दन्तौ षष्टिवषौँ मेदमानौ सहाभरभौ ॥ २० ॥ तथेवाकनिभौ तेन कृतौ चाश्वौ महापूभौ ॥ चामराटकृतो दिव्यौ दिष्याङ्कर
भूषितौ ॥ २१ ॥ दंशिता वररत्नादया ोकणलास्तथेव च ॥ सवे देवा यथाथ वै कृता वै विश्वकर्मणा ॥ २२ ॥ तथाहि
ऋषयस भवाय तपोपनाः ॥ अन्ये हयगास्तदत्सिद्ाान्येऽि वै इताः ॥ २३ ॥ विष पापेस्स्ेगर्डाखय
स्समन्वितः ॥ छृिमो नि्ितस्तद्रत्परमाश्वयंहूपवान् ॥ २४ ॥ तथेवाहं सुतेवदैश्सदधेथ परिवारितः ॥ छृभिमो निमितस्त
रत्पठनसुक्तानि नारद ॥२५॥ एेरावतगजाङ्टश्शक्रस्स्वदरसंयुतः ॥ कृतिम निित स्तद्रत्परिपूणेन्दुसंनिभः ॥ २६ ॥ कि
बहूक्तेन देवषं स्वो वै विश्वकमैणा ॥ हिमागपरेरितेनाश्च क्ठपतस्सुरसमाजकः ॥ २७ ॥
बह शुद्ध स्फटिक मणिके समान कान्तिमान् मानो साक्षात् नन्दी ही धा ्
से युक्त टोकपार बनाये, इस प्रकारसे विश्वकमने सब ।
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पाषद ओर गरुडे सहित निर्भा किया इनका हप प्रम आधवयेका बनाया ॥ २४ ॥ इसी भरकारते त्र वैद ओर कुड सहित भेरा हप
नाया, है नारद ! एसा विदित होता था भानो यह सक्त पढ रहं है ॥ २५ ॥ ठेरावतपर चे हूए अपने गणोसषहित इन्द्रो नि्ांण किया,
यह सूति पृणचन्द्रमाकै समान भरकाशमान॒ थी । २६. ॥ हे देवष ¡ बहुत कनेते क्या है दिश्वकर्मानि सम्पूणं रचना हिभालयके कथना- ¦
नुसार की 1 २७ ॥
इस भकारसे दिष्यहूप मण्डप अनेक आश्व्यसे संयुक्त निमाीण कया जो देवताओंको भी मोहित करता था ॥ २८ ॥ त् महामति %
विश्वकर्माने हिमाख्यकी आज्ञा पाकर देवताओंके निवासषके खि उनके रोके सभान स्थान बनाये ॥ २९॥ इसी भकार परम
द्रुत महाेच, चौकी बनाई विश्वक्माने ओर भी बहुत दिव्य रचना की ॥ ३ ° ॥ इसी भकार सातोक क्षणमात्रमं प्रम अद्ुत |
जो प्रम दीपिसे स्वयभूके निवासके निभिच बनाये गये ॥ ३१ ॥ इसी भकार विष्णकै टिये वैकुण्ठ नामक स्थान बनाया यह क्षणमा ट
एवंभूतः कृतस्तेन मण्डपो दिष्यपवान् ॥ अनेकाश्वय॑सम्भूतो महान्देवविमोहनः ॥ २८॥ अथाज्ञप्ो गिरीशेन विश्वकमां ¢
महा मतिः ॥ निवासा शरादीनां तत्त्ोकाम् हि यत्नतः ॥ २९ ॥ ततैव च महामज्चाः सुपरमाः प्रमाद्वताः॥ रचितास्ख॒ ठ
खदा दिव्य स्तेषां वे विशवकरंणा ॥०॥ तथातसपतलोकंवै दरे क्षणतोऽदतम् ॥ दीप्या परमया उत निवासा स्वयम्भुवः ||
॥ ३१ ॥ तथेव विष्णोस्त्वपरं वेङण्ठाख्यं महोज्ज्वलम् ॥ विरेचे क्षणतो दिव्यं नानाश्वर्यसमन्वितम् ॥३२॥ अमरेशशहान्दिव्यं ¢
तथेवाद्भतसुत्तमम् ॥ विरेचे विश्वक्मासौ सर्वैश्व्यसमन्वितम्॥३३॥गृहाणि लोकपालानां विरेचे खन्दराणि च ॥ तद्वत्स प्रीतितो
(व १ ॥ ३७ ॥ १५ च 1 सदनानि विचिबाणि रचितानि च तेन वै ||
य पूजितम् ॥ गिरीशचिहं १ सुशोभितं 1 चकार ॥ ३७ ॥ 9 ¢
चम अनेक आश्वयंसे संयुक्त बनाया ॥३२॥ इसी ्रकारसे इन्द्रका प्रम अद्भुत षर निर्माण किया, इस भकार न {
गृह नि्माण किये ॥ ३३ ॥ इसी भकार टोकपाटोकै घुन्द्रगरह निमौण किये ओौर प्रणमरेभसे यह सव प 0
तव ऋते ओर भी सव देवता षर उसने बडे विचि निमाण किये ॥ ३५ ॥ महादिमान् दि्कमने शिवजीते बर भाप होने कारण
कषणमा्रमे शिबजीके सन्तोषके निमित्त स्थान निर्माण किये ॥ ३६ ॥ उसी भकारसे प्रम उञ्ज्वर विचित्र महा पभावशाटी देवताति ॥\
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पूजित, गिरीशके चिहवाडा शिवटोकमे स्थित शंकरका गृह निर्माण किया ॥ ३७ ॥ इस प्रकारक उ विशवकमान रचना कौ जो बड
विषितर प्रम आश्वर्यं करनेवाली प्रम उज्ज्वठ थी जो शिवजीके संतोषाथ थी ॥ २८ ॥ इस भ्रकारसे यह् सव रोकिकि व कके चह
हिमाखय बडे प्रेमे शिवजीके आगमनकी प्रतीक्षा करने ठगे ॥ ३९ । है नारदजी ! इसत प्रकार आपत यहं महाजानन्द् देनेवाटे हिमा
र्यके यहांका सम वृत्तान्त कहा अव हुम कया सुननेकी इच्छा करते हो ॥ ४० ॥ इति श्रीशिवमहाएराणभा ° सद्रसंहितान्तगेततृतीयपावंती
लण्डे अष्टतिंशोश्यायः ॥ ३८ ॥ नारदजी बोरे हे विधे ! हे तात! है महाभाग 1 हे विष्णशिष्य ! आपको प्रणाम है हे ङपानिषे !
एवम्भृता कृता तेन रचना विन्वक्णा॥ विचिताशिवतष्टवरथ पशाश्वया महोज्ज्वला ॥३८॥ एवंकृत्वाखिकं चेदं व्यवहारं चौ
किकम् ॥ पय्येक्िष् अदा शम्भ्वागमनं स हिमाचलः॥२९॥ इति प्रक्तमरोषेणवृत्तान्तम्पघुद्वइम् ॥ दिमाल यस्य देवष किम्भूयः
श्रोतमिच्छसि ॥४०॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शढसंहितायां ततीये पवतीखण्डे मण्डपादिरचनाव्णनं नामाष्टचिशोऽ
ध्यायः ॥३८॥ नारद उवाच ॥ ॥ विषे तात महाप्राज्ञ विष्णुशिष्य नमोऽस्तु ते ॥ अद्धतेयं कथाश्रावि त्वत्तोऽस्मामिः कृपानिधे
॥ १ ॥ इदानीं श्रोतुमिच्छामि चरितं शशिमौलिनः ॥ वैवारिकंघठमाङ्गस्यं स्वाघौचविनाशनम्॥२॥ किं चकार महादेवः पराप्य
मङ्खलपत्रिकाप् ॥ तां श्रावय कथान्दिव्यां शङ्करस्सपरात्मनः ॥३॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ शृणु वत्स महाप्राज्ञ शाङ्करम्परमं यशः ॥
यच्चकार महादेवः प्राप्य मद्गलपत्रिकाम् ॥ ४ ॥ अथशम्भुगहीत्वा तां शुदा मेगर्पत्रिकाम् ॥ विजशस प्रृष्टात्मामानन्तेषां
व्ययाद्विभुः ॥५॥ वाचयित्वा च तां सम्यग्स्वीचकार विधानतः ॥ तननान्यापयामास बहुसम्मान्य चाहतः ॥ & ॥
आपने यह हमको अद्भूत कथा सुनाई ॥ १ ॥ इस समय मै शिवजीके चरित्रको सुनना चाहता हं जो सव पापका नाश करनेवाला
शिवके विवाह मंगल सम्बन्धी है ॥ २॥ मेगर पिका पाकर महादेवजीने क्या किया उन परमात्मा शकरकी दिव्य कथा आप हमको
सुना्ये ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोडे हे महाभाग ! हे वत्स ! तुम शिवजीका परम यश सुनो महादेवजीने मंगठ्पत्रिका पाकर जो किया ॥ ४ ॥
शिवजीने भरसन्नतासे उस मंगरूपत्रिकाको पाकर हसते हए उन मेगल्पत्रिकावालोंका परम सन्मान किया ॥ ५॥ उस्न ठश्चपत्िकाको वांचकर
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िधिपूर्वक स्वीकार किया बहुत सन्मानते उन परुषोका सन्मान किया ॥ ६ ॥ ओर उन शनि यह कहा कि आपने अच्छा काय
किया, मेरे विवाहम आप आव मैने विवाह स्वीकार किया है ॥ ७ ॥ शिषजीके यह वचन सुनकर वे बड प्रसन्न हुए ओर शिवजीको | ¢
कर उनकी प्रशंसा करते हुए परिक्रमा कर अपने स्थानको गये ॥८॥ तव देवेश्वर शिवजी महारीला करने वारे भभु देवताओकै सहित टौकिंक £
आचारको आश्रय करके हे सुने ! तुमको स्मरण करते हुए ॥ ९॥ हे सने ! उस समय तुम परम परीतिम षिधिकी भरशंसा करते हए वहां ||
आये ओर नश्र हो शिर श्ुफाय हाथ जोड तुमने प्रणाम किया ॥ १० ॥ जय शब्दको वारंवार उचारण कर् तुमने स्तुति की ©
उवाच _सुनिवगास्तान्का््यं सम्यक् कृतं शुभम् ॥ आगन्तभ्यं विवादे मे विवाहरस्वीकृतो मया ॥ ७ ॥ इत्याकण्यं वचश्श॒||@
म्भोप्रहष्टास्ते प्रणम्य तम्॥परिकिम्य ययुधांम शंसन्तः स्वं विधिम्परम् ॥८॥ अथ देवेश्वरश्शम्धुस्सामरस्त्वां शने इतम् ॥ र
लोकिकाचारमध्रित्य महालीलाकरः प्रभुः ॥९॥ त्वमागतः प्रप्रीत्या प्रशंसंस्त्वं विधिम्परम् ॥ भरणमेश्च नतस्कन्धो विनी ‰
तात्मा कृताजरिः ॥ १० ॥ अस्तौस्स॒जयशब्दान्दि समचा अुहभहः॥ निरदैशं परा्थयंस्तस्य परशंसंस्तवं विधिम्धुने॥ 9 ॥ ठ
ततरशम्धुःअरहषटात्मा दशर्यौकिकीं गतिम् ॥ उवाच शुनिवरय त्वां प्रीणयज्छभया गिरा ॥ १२ ॥ शिव उवाच ॥ प्रीत्या ||6
शृण सुनिश्रषठ द्यत्मत्तोऽय वदामि ते ॥ छे त्वा. प्रियो मे यद्धक्तराजशिरोमणिः ॥ १३ ॥ तं महत्तपो देव्या पार्वत्या ¢
तव शासनात् ॥ तस्ये वरो मया दत्तः पतित्वे तोषितेन वै ॥ १४ ॥ करिष्येऽहं विवाहं च तस्या वश्यो हि भक्तितः ॥
सप्तषिभिस्साधितच्च तद््ंशोधितं च तैः ॥ १५ ॥
हे खन ! ओर बडी पररीसा प्राथना करके तुमने शिवजीसे आज्ञाकी भरना की ॥ ११ ॥ तब परस्नमन हो छो किकी गपिको दिखाते
हुए शिवजीने शुभ वचनो भरसन्न करते हुए तुमसे कहा ॥ १२ ॥ श्रीशिवजी बोठे हे धुनि भेष्ठ ! जो नँ तेमते कहता हूं बह तुम हनो हे भक्त त
जरिरोमणि ! जो मेरा रिय है वह भे तुमे कहता ह ॥ १२३ ॥ तुम्हारे शासनसे पार॑तीने जो महातपस्या की थी यैन संत होकर ठ
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पतिवरण्े उनको षर दे दिया है ॥ १४॥ मे मक्तिकै वशीभूत होकर पातीत विवाह करंगा, सपार्ियोने यह बात साषन कौ ओर उन्होनेही
^ १२१
शि०३० ||| रप्र शोधी ह ॥ १५॥ हे नारदी ! आजत सात दिन बह विवाह मँ लौकिकी गतिकौ आयकर परिणयका महास्सव ११
॥२८१॥ ॥ १६॥ ब्रह्माजी बोले इस भकार परात्मा शंकरके वचन सुनकर हे तात ! तुम ॒प्रसन्ञमन हौ भमुकौ भणाम क इस मकार नह
बोछे ॥ १७ ॥ नारदजी बोछे हे भरभो ! मक्तोंकी आधीनता तो आपका ब्तही है पावेतीके मनकी _ अभिलाषा पूरी करनका
आपने उचित भवन्ध किया है ॥१८॥ हे विभो! अब्र जो मेरे योग्य का्थंहो आप उ्तको कहं, ञ्चे अपना सेवक मानकृर
आप भरे ऊपर छपरा करं आपको भरणाम है ॥ १९ ॥ ब्ह्ाजी बोरे जब तुमने इस भकारसे कहा तव भक्तवत्सल शंकरने पसनन हौ आदरपूर्वकं
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¢| अबतस्स्तमे चाह्नि तद्भविष्यति नारद्॥ महोत्सवं करिष्यामि लोकिकं गतिमाश्रितः॥१६॥रह्मोवाच॥इति त्वा वचस्तस्य ¢
¢| शंकरस्य प्रात्मनः॥परसन्नधीः परुं नत्वा तात त्वं वाक्यमव्रवीः ॥१७॥ नारद् उवाच॥ भवतस्तु ब्रतमिदम्भक्तवश्यो भवान्मतः॥ |
४ सम्यक् कृतं च भवता पार्वतीमानसेप्सितम्॥ १८॥काय मत्सदशं किञचित्कथनीयन्त्वया विभो॥मत्वा स्वसेवकं मां दि कृपां ९
& || कर नमोऽस्तु ते॥१९॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तस्तु त्वया शम्धुश्शंकरो भक्तवत्सरः॥ प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा सादरं त्वां मुनीश्वर ्
&|| ॥२०॥ शिव उवाच॥विष्णुप्रभृतिदेवांशच ख॒नीन्सिद्धानपि धुवम् ॥ त्वभ्निमन्वय मद्वाण्या षुनेऽन्यानपि स्वतः॥२१॥ सवं आया ट
न्तु सोत्साहास्सर्वशोभासमन्विताः ॥ स्चीडतगणाः श्रीत्या मम शासनगौरवात्॥२२॥ नागमिष्यन्ति ये त्वत्र मद्विवाहोत्सवे |©
¢| खन ॥ ते सलकीया न मन्तन्या मया देवादयः स ॥२३॥ ब्रह्मोवाच॥इतीशज्ञां ततो धृत्वा भवाज्छङ्करवछमः॥सवात्निमन्ब
र. २ ||| यामास तं तं गता त सुने॥२४॥शम्धूपकण्डमागत्य हुतं निवरो भवान्॥तददूत्यात्ततर सन्तस्थौ तदाज्ञाम्पराप्य नारद्॥२५॥
पासं ३ || || दमे कहा ॥ २० ॥ शिवजी बो हे सने । विष्णु आदिं सब देवता खनि भौर सिद तथा दृ महात्माओंको भी भेरी ओरते निर्भत्रण दे भाओ त
-स.२ ||| ॥ २१ ॥ सब त्साह ओर सब शोभाके सहित आवे, पेरी आज्ञासे अपनी बली एत्र गणोके सहित सव आवे ॥ २२ ॥ हे मने ¡ जो कोह इस मेरे
अ०३९ ||@ || विवाहोत्सवमे नहीं आवेगे भँ निश्वयही उन देवताओंको अपना नहीं मागा ॥ २३ ॥ बह्लाजी बोढे हे खने ! जब इस भरकारसे शिवजीने कहा तव ॥
‰॥ शकरकै भिय आपने बह आज्ञा शिरपर धारणकर बडी शीघ्रतासे जाकर स्वको निर्मज्रण दिया ॥ २४ ॥ हे नारदजी फिर आप्॥^
| बहुत ॒शीघ्रतासे स्वको नि््रण दे ओर उनकी आज्ञासे वहां स्थित होकर काये किया ॥ २५ ॥ उनके आगनकी छाठसासे ||
| शिवजी वहां स्थित हए उनके गण परम उत्सवसे उस समय सव॒ ओरसे चत्य करने लगे ॥ २६ ॥ इसी समय विष्णने अपना वेष रचकर ।
¢ गणोको साथ ठे पाषंदो सहित कैटासको गमन किया ॥ २७ ॥ स॒द्क्तिते श्ची ओर अपने दलोंसहित शिवजीको भरणाम कर ओर प्रसन्नमनसे ©
¢ उनकी आज्ञा भातत कर स्थित हए ॥ २८ ॥ ओर मै भी अपने गणोकि साथ कैटास पर्वतको गया ओौर अपने गणोके सहित आनंदित ठ
# होकर वहा स्थित हुआ ॥ २९ ॥ उसी समय दन्द्रादिक छोकपाठभी अपने कुटम्ब ओर सेवक वरगेकि सहित उपस्थित हुए, उसरी भकारे द
शिवोऽपि तस्थौ सोत्कण्ठस्तदागमनलालसः॥ स्वगणेस्सोत्सवैस्सवैतैत्यद्धस्सर्वतोदिशम्॥२६॥ एतस्मिन्नेव काले त॒ रचयित्वा ठ
ए स्ववेषकम्॥आजगामाच्युतश्शीषं कैलासं सपरिच्छदः॥२७॥शिवम्प्रणम्य सद्रत्तया सदारस्सदलो शुदा॥तदाज्ञाभ्पाप्य सन्तस्थौ ठै
ट सुस्थाने म्रीतमानसः॥ २८ ॥ तथाईं स्वगणराश्ु कैरासमगमं सुदा ॥ भधुम्परणम्यातिष्ठ वै सानन्दस्स्वगणान्वितः ॥ २९ ॥ ¢
|| इन्द्रादयो ोकपाला आययुस्सपरिच्छदाः॥ तथेवाल्कृतास्सवं सोतसवास्सकर्बकाः॥३०॥ तथेव श्ुनयो नागास्सिद्धा उप्र
स्तथा ॥ आययुश्वापरेऽपीह सोत्सवास्सुनिमन्विताः ॥ ३१ ॥ महेश्वरस्तदा त्ागतानां च पृथक् पृथक् ॥ स्वैषाममरायानां
|| सत्कारं व्यदधान्ुदा ॥ ३२ ॥ अथोतघवो महानासीत्कैलासे परमोद्धतः ॥ तृत्यादिकन्तदा चछुय॑थायोग्यं सुरश्चियः ४
ह|| ॥ ३३ ॥ एतस्मिन्समये देवा विष््वाया ये समागताः ॥ यावं कारयितुं शम्भोस्तमोषुस्तेऽखिला घने ॥ ३४॥ `
सब अलंकार धारण किये परम उत्सवकै साथ आये ॥ ३० ॥ इसी प्रकार श्नि नाग सिद्ध तथा दूसरे देवताओंके समान सन्भान
४ पानेवाठे तथा दूरे छोगभी नि्न्नित होकर वहं आये ॥ ३१ ॥ महेश्वरे नि्॑त्ित होकर आये हए उन सब देषताओंका पृथक् पृथक्
|| भ्नवाते सत्कार किया ॥ ३२ ॥ उस्न स्मय कैला उन सवके आनेका परम उत्सव आरंभ हुआ देवताओंकी दिय यथायोग्य नृत्य करने ||
| छी ॥ ३२ ॥ हे सुने ! उत्त तमय जो विष्ट आदि देवता उस स्थाने आये थे हे छने ! वह सव॒ शिवजीको यात्रा करानेकै रिय स्थित ||
0
शि०घ हुए ॥ ३४ ॥ तब वे सव शिक आज्ञा पाकर ओर मेरे द्रा भरे
५२८२॥ |© करने ठगे ॥ ३५ ॥ सातो म्।तायं उस्र समय शिवजी दूह वेष
उनका स्वाभाविकं वेषही अत्यन्त शोभायमान था परन्तु जब उनका
जाकर कि यह सब शिवजीका कार्यं है रसा विचार कर ॒शिवृजीका सेवन ||
भेम्षे यथायोग्य सजाने ठगी, ओौर परम परसन हृद ॥ २६ ॥ ||
वैष सजाया गया, हे खनिभ्रष्ट ! उस्र परमेश्वरकी इच्छापे यह सव कुछ ¢ |
ओर तीसरा नेत्र मानो तिलकषूपसे शोभायमान हज ॥ ३< ॥ उनकं ||
|
ए हुआ ॥ ३७ ॥ चन्दने खकरुटके स्थानम समीपता स्वीकार कौ
ए करभूषण मानो दोनों सरपं स्थित किये गये, ओर नाना रत्नो युक्तं उनके दोनों कुण्ड शोभायमान हए ॥ ३९ ॥ ओर भी जो ¢
&| शिवाज्ञतास्तदा सवे मदीयमिति यन्विताः ॥ शिवकार्यमिदं सर्व चक्गिरे शिवसेवनम्॥२५॥ मातरस्सपत तस्तु शिवभूषाविधि
द| स्प्रम् ॥ चक्रिरे च खदा युक्ता यथायोग्यन्तथा पुनः ॥३६॥ तस्य स्वाभाविको वेषो भूषाविविरभृत्तदा॥ तस्येच्छया खनिश्रष् ४
|| परमेशस्य सुभरभोः ॥२७॥ चन्दश्च सुकटस्थाने साशिप्यमकरोत्तदा ॥ लोचनं सन्दर द्यासीतृतीयन्तिलकं शमम् ॥ ३< ॥ ||
8 क्णाभरणङूपौ च यौ हि सर्पौ भरकी्तितौ ॥ ङुण्डलेऽभवतान्तस्य नानारत्नान्विते इनं ॥ ३९ ॥ अन्यागसीस्थतास्सपास्त |©
है| दंगामरणानि च ॥ बधूवुरतिरम्थाणि नानारत्नमयानि च् ॥ ४० ॥ विभ्रतिरंगरागोऽधूचन्दनादिसयुद्धवः ॥ तइङलमधदिन्यं ||
2 गजचर्मादि स॒न्द्रम्॥ ९१ ॥इदशं सुन्दरं रूपं जातं व्णातिदुष्करम्॥ ईश्वरोऽपि व साक्षार्शवय ब्धवान्स्वतः ॥७२॥ ||
¢ ततश्च सवे सुरपक्षदानवा नागापतंगाप्परसो महर्षयः ॥ समेत्य सवं शिषसक्निधि तदा मरीत्सवाः प्रोजुरहो खदान्विताः | ¢
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॥ ३ ॥ सर्वं उचुः ॥ गच्छ गच्छ महदेव विषाहार्थं महेश्वर ॥ शिरिजाया महादेग्याः सहास्माभिः कृषां कुर् ॥ ०४ ॥
उनके अगे सपं स्थित धे वे सवृही अनेक रत्नो जटिति बडे मनोहर रत्न होगये ॥ ४० ॥ वह विभूति चन्दनादि उतपन्न एक |
भरकारका उक्तम अगराग होगया ओर वह गजचमं वडा सुन्दर दुकू होगया ॥ ४१ ॥ इस प्रकारका शेकरका वह सुन्दरहष होगया जो ॥
रुप. २
पा.खं.३
अ०३९
बरणौ नहीं जाता साक्षात् दैश्वरने उस समय रेश्व्थं धारण किया ॥ ४२ ॥ उस्न समय देवताओकि पक्षके दानव नाग पतंग अप्सरा महर्षिं यह
मव उस समय शिवजीके समीप आकर प्रसन्नतासे महोत्सवको कथन करने ठगे ॥ ४३ ॥ सव बोले हे महेश्वर आप विवाहके निमित्त गमन ॥>
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कीजिये आप महादेवी गिरिजा ओौर हमारे ऊप्र कपा करो ॥ ४४ ॥ तब विष्णुने परस्तावके समान यह वचन प्रेभसे शकरको भरणाम कर्
कहे ॥ ४५ ॥ विष्यजी बोरे हे देवदेव महादेव ! है शरणागतवत्सर ! आप॒ अपने भक्तोके कायं करनेवाले है इन मक्तोंकी प्राथना सुनिषे
| ४६ ॥ हे शंकर ! आप गृ्यत्रकी विधिम गिरीशहुताके संग अपने सब. विवाहकमं करनेको योग्य हो ॥ ४७ ॥ हे हर ! जब आप् इस
प्रकारसे विवाह विधि करेगे तब वह रीति सर्वत्र विख्यात हो जायगी ॥ ४८ ॥ मण्डपका स्थापन, नान्दीमुख भाद, यह कुलषर्भके अनु्ार #
करना चाहिये हे नाथ ! सब ठोकमं अपना स्थापन करते हए आप् यह सब कीजिये ॥४९॥ बह्माजी बोटे जब विष्णजीने प्रभेश्वर शृकरसे
ततो विष्णु्वाचेदं परस्तावसदशं वचः॥ प्रणम्य शंकरं भक्तया विज्ञानप्रीतमानसः ॥ ४५ ॥ ॥ विष्णुकूवाच॥ देव देव महादेव ¢
शरणागतवत्सल्॥ कार्थकत्तौ स्वभक्तानां विज्ञति शमे प्रभो ॥४६॥ गृद्योक्त विधिना शम्भो स्वविवाहस्य शंकर॥ गिरीशश॒तया
न्या कम कतुमिहाहंसि॥४७॥ त्वया च क्रियमाणे तु विवाहस्य विधौ .हर॥ स एव हितथा रोकेसर्वस्प॒ख्यातिमाप्ठयात् ||
॥ ४८ ॥ मण्डपस्थापनन्नान्दीषुखन्ततकरुधर्मेतः ॥ कारय् प्रीतितो नाथ ोके स्वं ख्यापयन् यशः ॥ ४९ ॥ बह्मोवाच ॥ एवस
कस्तदा शम्भुविष्णुना परमेश्वरः ॥ लोकिकाचारनिरतो विधिना तच्चकारसः ॥ ५०॥ अह ह्यधिक्कतस्तेन स्वैमभ्युदयोचितम् ॥
अकुव सुनिभिः रीत्या ततर तत्कृम चादरात् ॥ ५9 ॥ कश्यपोऽभरर्वशिष्ठश्च गौतमो मायुरि्ङ्ः ॥ कण्वो बदश्पतिश्शक्तिजमद
भनि: पराशरः ॥ .५4२ ॥ मार्कण्डयश्शिलापाकोऽरूणपारोऽकृतश्रमः ॥. अगस्त्यश्चवनो गर्गश्शिकादोऽथ महाने ॥ ५३ ॥
दधीचि रूपमन्यु-प भरद्वाजोऽकृतव्रणः ॥ पिपपलादोऽथ कुशिकः कौत्सो व्यासः सशिष्यकः ॥ ५९ ॥
एला कहा तब छोकिंक आचार विधिर शंकरने यह सव किया ॥ ५० ॥ सुन्चे सन अष्युदथके कारथमे शंकरने अधिकार दिया ओर दूसरे
्रनि्योनि भीति वह कार्यं किया ॥ ५१ ॥ कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, गौतम, भारि, बृहस्पति, कण्व, जमदि, पराशर ॥ ५२ ॥ मार्कण्डेय,
शिछापाक, अरूणपाठ अकतश्म, अगस्त्य, च्यवन, गगे, शिकाद, ॥ ५३ ॥ दधीचि, उपमन्यु, भरद्वाज. अरूत्ण, पिप्पलाद, कुशिक
कौत्स, शिष्योंसहित व्याजी ॥ ५४ ॥ ॥ ९
इनके सिवाय ओर भी बहते मुष्य खजञसे परित होकर
कौतुकं मंगल्पवेकं शंकरी रक्षा करते कगे ॥५६॥ कक् यजु
शिवजीके समीप आकर सत्कायं करने रगे ॥ ५५॥ वेदवैदांगकै प्रारगामी वे सव
जु ओर सामके सक्तेति तथा अनेक भकारकै स्तो्रोते तथा ओर भी अनेकं प्रकारक
भुयसे कषियेनि भरहोका पूजन कराया तथा विशांतिकै निमत्ति मण्डङ् स्थित सव
मंगर कऋषिजन करने ठे ॥५७॥ ओौर शिवजीसे तथा सज्ञ ५६
ये करके तथा लो किंक वैदिक कायं कर बाह्मणोको भ्रणाम
शि° |
¢ देवताओंका पूजन कराया ॥ ५८ ॥ तब शिवजीने सन्तुष्ट होकर सब यथोचित काये
ट
ट
॥२८२॥
एते चान्ये च बहव आगताश्शिवसम्निधिम् ॥ मया सुनोदितास्ततर चङकस्तेविधिवत्कियाम्॥५८॥ वेदोक्तविधिना सव वेदेदं ¢
4
गपारगाः ॥ रक्षां चछ्ुमैहेशस्य त्वा कौतुक्मगलम् ॥५६॥ ऋम्यजस्सामसुकतसतु तथा नानाविधे'परः ॥ मंगलानि च भूरीणि ¢
चज्रुः प्रीत्यर्षयोऽखिलाः॥५७॥ ब्रहाणां पूजनं भीत्या चङ्घस्ते शम्धुना मया ॥ मण्डकस्थसुराणां च सर्वेषां विशान्तये ॥९९८॥
ततश्शिवस्सुसन्तुष्टः त्वा सर्व यथोचितम्॥ लौकिकं वैदिकं कमं ननाम चशचुद् द्विजान् ॥५९॥ अथ सर्वेश्वरो विप्रान्देवान्कृत्वा £
|
पुरस्सरान्॥ निस्षसार॒दा तस्मात्कैकासात्प्वतोत्तमात्॥& ०॥ बहिः केखासङधराच्छम्युस्तस्थौ शुदान्वितः। । देवैस्सह द्विजनशेव
नानास्वीकारकः प्रधुः ॥ 8१ ॥ तदोत्सवो महानासीत्त्देवादिभिः कृतः ॥ सन्तुष्टयथं सदेशस्य गानवादयसुतवृत्यकः ॥ ६२ ॥
इतिश्रीशिवमहापुराणेद्वितीयायांशढसहितायां तृतीये पाव॑तीखण्डे
यः ॥ ३९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथ शम्थुः समाहूय नन्यादीन् खकलान्गणान्॥ आज्ञापयामास शुदा गन्तुं स्वेन् च तच वे ॥१॥
किया ॥ ५९॥ तब वह सरवैश्वर देवता बाह्णोको आगे करके भसन्नता पूर्वकं उस पव॑तोत्तम केराप्न पर्वते चके ॥ ६० ॥
भ्रस्ता पूवक शिवजी कैढासके बहिभाग्े स्थित हए उन रीटा करनेदाठे भुके साथ देवता ओर बाह्मण भी स्थित हुए ॥ ६१ ॥ ट
देवग ओने उस्र समय महेश्वरके सन्तोषके निभि गाने ब जानेका दत्यसम्बन्धी महान् उत्सव फिया ॥ ६२ ॥ इति भरीशिवम° भा० री ° र ¢
& || तृतीये पा० एकोनचलतवारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ ब्ञाजी बोठे तन शिवजीने नन्दी आदि सब ग्णोको बुडाकर अपने साथ चटनेके निभित्त
&
शण्सु.२
पा.खं.३
अ०४०
| कहा ॥ १ ॥ शिवजी बौठे तुम सव॒ हमारे साथ हिभार्यके नगरको चो कुछ गृण यहां रह, शेष सब॒महोत्सवपुवेक चरं ॥ २
बह्माजी बके गणराज यह बात श्ुनकर प्रसन्नतासे अपनी अपनी रोरी ठेकर जेते चरे, तँ वह कुछ वर्णन करता हं ॥ ३ ॥ गणेश्वर शंखकणं
एक कोरिगण लेकर शिवके साथ हिमाख्यके एरको चला ॥ ४ ॥ केकराक्च गणराज दशकोटि गण लेकर महाउत्साहसे चखा, आढठकोरि सेना
ठेकर गणराज विरत चखा ॥ ५ ॥ गणनायक विशाख चारकोदी गण केकर चछा पारिजातगण नौ कोरिगण छेकर चला ॥ £ ॥ श्रीमान्
॥ शिव उवाच ॥ अपि यूयं सह मया संगच्छध्वं गिरेः पुरम्॥ कियद्रणानिहास्थाप्य महोत्सवपुरस्सरम् ॥ २ ॥ ब्रह्मोवाच ॥
अथ ते समनुङ्ञप्ता गणेशा निर्थयुञंदा ॥ स्वंस्वं बलषुषादाय तान् कथंचिद्रदाम्यहम् ॥ ३ ॥ अभ्यगाच्छखकर्णश्च गणकोरया
गणेभ्वरः ॥ शिवेन साधे संगन्तुं हिमाचलुरम्परति ॥ ४॥ दशकोरया केकराक्षो गणानां समहोत्सवः ॥ अष्टकोरया च
विङ्ृतो गणानां गणनायकः ॥ ५ .॥ चतुष्कोटया विशाखश्च गणानां गणनायकः ॥ पारिजातश्च नवभिः कोटिभिर्गणपंगवः
॥ & ॥ षष्टिस्सवोन्तकः श्रीमान्तथेव विकृताननः ॥ गणानान्दुन्दुभोष्टाभिः कोरिकोटिभिर्गणनायकः॥ ७ ॥ पञ्चभिश्च
कपालाख्यो गणेशः कोटिमि स्तथा ॥ षडभिस्सन्दारको वीरो गणानां कोटिभिशवुने ॥ ८ ॥ कोटिकोटिभिरेवेह कन्दुकः
ङण्डकस्तथा ॥ विष्टम्भो गणपोऽष्टाभिगणानां कोटिभिस्तथा ॥९॥ सहसकोटयागणपः पिप्पलो सुदितो ययौ ॥ तथ। सनादको
वीरो गणेशो युनिसुत्तम ॥१०॥ आवे शनस्तथाष्टाभिः कोरिमिगेणनायकः ॥ महाकेशस्सदेण कौटीनां गणपो ययौ ॥ ११ ॥
सवौन्तक तथा विकूतानन साठ साठ कोरिठेकर चला, दन्दुभ नाम गणनायक आढ कोरि ठेकर चरा ॥७॥ कपा नाभ॑कं गगेश्वर पांच कोरि
गण छ्ेकर चछा, सन्दारकवीर गणेश्वर छःकोटि ठेकर चला ॥ < ॥ कन्दुकं ओर कुण्डक एकं एकं कोरि ठेकर चछा, विष्टम्भ गणराज
भढ कौटि गण छेकर चठा ॥ ९ ॥ गणेश्वर पिप्पठ एक सहल्ञ कोटि ठेकर चछा" शती भकार सनादकं गणेश्वर वीर चला ॥ १० ॥ आरव
शननामकं गणनायक आढ कोटि सेना ठेकर चटा, महाकेश गणाधीश सहक् कोरि छेकर चखा ॥ ११ ॥
१२२
व... यय 2 94 अ
शि०यु० || || हे सुने ! इसी प्रकार कुण्ड ओर पर्वतक बारह कोटि दल ठेकर चछ)
॥२८४।
वीर च॑द्रतापन आढ कोरि केकर चछा ॥ ^ ॥ व व
गण टि ठे ॥ १३ ॥ अभिञ्चुल गणनायक एक कोरि टेकर चटा आदिव्यमूधां अ।र वनावहं
र ५ ८ 1 त गणराज अमोघ ओर कोकिल सौ सो कोटि धृट €कर चरे ॥ १५ ॥ गणनायक मत
एक कोटि काकयादोद्र ओर सन्तानक साठ कोरि ठेकर चटा ॥ १६ ॥ महाब नौ कोरि, मधुपिग, कोकिल, नीढ ओर पूर्णभद्र न्वै 4
कुण्डो द्वादशकोरया दि तथा पर्वतकोसुने॥ अष्टाभिः कोटिभिर्वीरस्समगाज्चन्द्रतापनः॥ १२ ॥ काठ काटकञचव् महाकाट
शतेन वै ॥ कोटीनां गणनाथो हि तैवाभ्निकनामकः ॥ १३ ॥ कोव्यत्चिश्चख एवागाद् गणानां गणनायकः ॥ आदित्यमद्धा >
कोला च तथा चैव घनावहः ॥ १४ ॥ सत्राहश्शतकोव्या हि मुदो गणपस्तथा ॥ अमोघः कोकिलश्रैव शतकोव्या |£
गणाधिपः ॥१९॥ स॒मन्वः कोटिकोलया च गणानां गणानायकंः ॥ काकपादोदरः कोटिषष्टया सन्तानकस्तथा ॥ १६॥ ||
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महाबलश्च नवमिरम॑शुषिगश्चकोकिलः ॥ नीको नवत्या कोटीनां प्ू्णभद्रस्तथेव च ॥ १७ ॥ सप्तकोव्या चतुर्वक्रः कृरणो |
४
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विशको टिभिः ॥ ययौ नवतिकोवया तु गणेशानोदिरोमकः ॥ १८ ॥ यज्वाशश्शतमन्युश्च मेवमन्यु श नारद् ॥ तावत्कोखा
ययुस गणेशा दि पृथक्पृथक् ॥ १९ ॥ काष्ठाङ्गुष्ठश्तुष्षष्ठया कोटीनां गणनायकः ॥ विषटप्षस्सुकेशश्च वृषाभश्च
सनातनः ।. २० ॥ तालकेतुः षडास्यश्च चजञ्च्वास्यश्च सनातनः ॥ सम्वर्तकस्तथा चेतरो रकुीशस्स्वयम्प्रसुः ॥ २३१ ॥
लोकान्तकशच दीप्रात्मा तथा दैत्यान्तको शुने ॥ देवो भृगिरिटिन्श्रीमान्दैवदेवप्रियस्तथा ॥ २२ ॥ | ¢
कोटि टेकर आया ॥ ३७ ॥ चतुरवक्र सातकोरि, करण वीस कोरि, ओर रोमकनामक गणेश्वर नघ्वेकोरि ठेकर आया ॥ १८ ॥ हे नारद्
यज्वाक्ष, शतमन्यु, मेघमन्यु यह सब न्वै २ कोटि छेकर सव चे ॥ १९ ॥ केष्ठगुष्ठ॒ गणनायक . चठ कोरि ठेकर चरे, विपक्ष
सुकेश सनातन वृषभ भी चटे ॥ २० ॥ ताख्केतु, षण्मुख, चंचुखख, सनातन, सम्बतंक, वेन, ठकुटीश, स्वयम्भु ॥ २१ ॥ है सने ।
लोकान्तक, दीप्ात्मा, देत्यान्तक, देव भृगिरिरि, श्रीमान् देवदेवभ्रिय ॥ २२ ॥ ५
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पाखं.३
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| भालुकं, चस हजार गणेश्वर बडे उत्सहसे शिवजीके विवाहोत्सव चठे ॥ २३ ॥ एक सहसत कोटि भूत तीन कोटि प्रथम वीरभद्र ||
चोसढ कोरि, रोमज तीन कोटि चडे ॥ २४ ॥ यह सब कोटि कोरि सहस्र ओर वीस सहस्र कोटियो युक्त होकर चले, इस प्रकारसे नन्दि
आदि गण शंकरके उत्सव चडे ॥ २५ ॥ कषे्रपाटी ओौर भेख कोरि कोरि गणो व्याप्त होकर शिवजीके विवाह महोत्सवभें बडे परमस
चे ॥ २६ ॥ दम॒ भ्रकारमे ओर भी असंख्यात महाबटी गणेश्वर महार तिते शंकरके उत्वमे गये ॥ २७ ॥ अनेकं सहस्रो इाथवाठे जा
अशनिभौनुकश्चव चतुष्षश्ठया सदशः ॥ ययुश्शिवविवाहा्थ शिवेन सहसोत्सवाः ॥ २३ ॥ भूतकोरिसदस्चेण प्रमथाः
कोरटिभिच्धिमिः ॥ वीरभद्रश्चतुषष्टया रोमजानान्तिकोटिभिः ॥ २४ ॥ कोरिकोटिसदस्राणां शतेर्विशतिभिवृताः ॥ तत्र
जग्मुश्च नन्दाद्या गणपाश्शंकरोत्सवे ॥ २५ ॥ क्षेत्रपालो भेर कोरिकोरिगणेधतः ॥ उद्राहश्शंकरस्येत्याययौ प्रीत्या
महोत्सवः ॥ २६ ॥ एते चान्ये च गणपा असङ्ख्याता महाबलाः ॥ तत्र जग्धुमेहापरीत्या सोत्साहाश्शंकरोत्सवे ॥ २७ ॥
सवं सदखदस्ता् जटामुङकट धारिणः ॥ चन्द्ररेखावतंसाश्च नीलकण्ठाश्िलोचनाः ॥ २८ ॥ शद्राक्षामरणास्सवे तथा सुद्धस्म
चारिणः ॥ हारक्ण्डलकेयूरसुकुटाये रलंकृताः ॥ २९ ॥ ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसकाशा अणिमादिगरणेयुताः ॥ सूर््यकोरिप्रती
काशास्त रेजगेणे“वराः ॥२०॥ प्रथिवीचारिणः केचित् केचित्पातालचारिणः ॥ केचिग्योमचराः केचित्सतस्वर्गचरा मुने
॥ ३१ ॥किम्बहूक्तेन देवं सर्वरोकनिवासिनः ॥ आय युस्स्वगणाश्शम्भोः प्रीत्या वै शङ्खरोत्सवे ॥ ३२ ॥
छकुटधारी माथेपर चन्द्ररेखाधारे नीठकेठ तीन नेत्र ॥ २८ ॥ सब ही रदराक्च धारण करनेवाले सद्वस्मको धारण किये हार, कुंडल, केयूर
छकरुट आदिते अट्कत ॥ २९ ॥ बरह्षा विष्ण इन्द्रे समान अणिमादि गुणोँे अरङ्त कोरि सूर्थके समान भकाशवाछे गेश्वर शोभित
हूए ॥ ३० ॥ के एृथिवीप्र ओर कोह पातारं विचरनेवाठे कोई आकाशचारी ओर को सात सवर्गम विचरनेवाठे थे ॥ ३१ ॥ हे स
ऋषि ! बहुत कनेसे स्या है सभ ठोकके रहनेवाठे गण बड प्रेमे शकरफे व्याहका महोत्सव देखने आये ॥ ३२ ॥
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शिण्पु°
॥ २८ ५॥
शुभ्र
पा.ख.३
अ०४०
स 2 न 2222
= विवाहे भ [र (| वह् सर्वेश
3 अपने विवाहके निभित्त हिमाख्यके रमं गये ॥ ३२ ॥ हे नारदजी । जिस सम
इस भकार भमु शकर अन्य देवताओंके सहित. अपने विवाह सो हुनो ॥ २४ ॥ चण्डी भी बडे उत्सवके सहित शद्रकी भगिनी
4
दे कै रने गये उस समय जो वृत्तान्त हज कि भषणो ट
ध ४ 6. रमते वहां आई ॥ ३५ ॥ परतके आसनपर स्थित सपौके भूषणो भूषित शिरपर महकन ¢
एवर्णके कठशको खयि ॥ ३६ ॥ अपने परिवारे संयुक्त दीप्खल ओर दीपिमान् छोचनवाठी कुतहर करती हई भरस् खस महान्ड। ¢
॥ ३७ ॥ मगृबती आई, हे सने ! ओर मी कोटियो दिव्यमूत तथा अनेकों विरुपाक्ष नाना_भकारकै बहृतते वहां शोभित हीने छग ठ
इत्थ देवे्गणेशवान्यस्सदितश्शङ्करः परुः ॥ ययौ दिमगिरिपुर रिवाहाय निजस्य ३।२२॥यद] जगाम सर्वेशो विवाहा सुरादिभिः॥
तदा त ह्यभृदत्तं तच्छरण त्वं सुनीशवर॥३०॥ रुद्रस्य भगिनी धूत्वा चण्डी सृत्सवसंयुता॥ तत्राजगाम सुप्रीत्या परेषां संभयावदा ४
॥ ३५ ॥ मतासनसमाषूढा सपाभरणभरषिता ॥ पर्णं कटशमादायहैमं मूध्नि महाप्रभम् ॥ २६ ॥ स्वपरीवारसंयुक्ता दीत्तास्या |©
दीप्तलोचना॥ कतदलम्प्कु्न्ती जातहषां महाबला ॥ ३७ ॥ त धूतगणा दिव्या विहूपः कोटिशो घने ॥ विराजन्ते स्म बहुश ||&
स्तथा नानाविधास्तदा॥ ३८ ॥ तैस्समेतामतश्चण्डी जगाम विकृतानना ॥ छत्रूदलान्विता प्रीता प्रत्युपदरवकारिणी ॥ २९ ॥ ¢
चण्ब्या सवे शूदरगणाः पृष्ठतश्च कृतास्तदा॥ कोव्येकादशसख्याका गोदशदरभरियाश्ते॥ ४०॥ तद् उमक्निघृषिर्याप्तमांसीनगत्र >
यम् ॥ भरीञ्ंकारशब्देन शंखानां निनदेन च ॥ ४१॥ तथा इुन्दुभिनिघोषिश्शब्दः कोलाहलोऽभवत् ॥ कु्वजगन्मगलं चनाश | +
येन्भगलेतरत् ॥ ४२ ॥ गणानां पृष्ठतो भूत्वा सवे देवास्ससुत्छकाः ॥ अन्वयुस्सर्वसिद्धाच टोकषालादिका शुने ॥ ०३॥ ह
॥ ३८ ॥ उन सबके समेत विकटसुख चण्डी वहां आकर पराप्त हुई, यह. बडे प्रेमे प्रीतिके उपद्रव करनेवाटी वहां आह ॥ ३९ ॥ ¢
चण्डीने सम्पूण रूदगणोंको अपने पीछे कर दिया वहं सव शुढकै गण रुदरकै भिय संख्याम ग्यारह कोटि थे ॥ ४० ॥ उस्न समय उमह्कै
शब्दोपि त्रिलोकी व्याकुड हो गै भेरीका कार ओर शंखोको शब्द होने ठगा ॥ ४१ ॥ इती भकार दन्दुभीके निषे कोाहल |||
होने रगा जिससे सम्पुणणं अमंगल दूर हो, ओौर सब जगत् भंगररूप हो जाय ॥ ४२ ॥ उन गणोके पीछे सव देवता उत्कंढासषहित चटे |>)
सने ! उनके परे सरव सिद्धि ओर ठोकपारादि चे ॥ ४३ ॥ सवके मध्यमे गरूडास्षनप्र स्थित हो वैकरुण्ठनाथ् चले, हे सुने ! उनके
ऊपर बडा छत्र शोभायमान हो रहा था ॥ ४४ ॥ चमरसे वीज्यमान होकर अपने गोसे युक्तं तथा पाष॑दोँमे शोभायमान होते हुए / ¢
| शोभित धे ॥ ४५ ॥ इसी भकार मागे जाता हुआ मँ भी शोभायमान था ओर मूत्तिं धारण किये वेद शाद्च ओर एराण मेरे सेग त
६
# भकार देरावत हाथीपर चदे देवराज अपनी सेनाम शोभायमान धे ओर अनेक प्रकारके गहने पहरे इन्द्रे मार्गम जाते बडी शोभा हई त
¢ मध्ये व्रजन् रमेशोऽथ ग्डासनमाध्रितः।॥ शुभे धियमाणेन क्षत्रेण महता शुने ॥४४॥ चामररवीन्यमानोऽसौ स्वगणेः परिारितः॥
पाषेदेविंलसद्धि स्वभूषाधिधिभूषितः॥४५॥तथाऽहमप्यशोभम्बै बजन्मागेँ विराजितः॥ वेदेमतिंधरैश्ाश्चः पुराणेरागमैस्तथा॥ ¢
¢ ॥४६॥ सनकादिमहासिद्धेस्सप्रनापतिभिस्स॒तेः ॥ परिवरस्संयुतो हि शिवसेवनतत्परः ॥४७॥ स्वसैन्यमध्यगश्शक्रदेरावतगज
स्थितः ॥ नानाविभूषितोऽत्यन्तं रजन् रेजे सुरेश्वरः॥४८॥तदा तु बजमानास्ते ऋषयो बहवते॥ विरेजरतिसोत्कण्ठ श्शिवस्यो ॥&
४ द्वादनम्परति ॥४९॥ शाकिन्यो यातुधानाश्च वेतालात्रह्मराक्षसाः॥भरतप्रेतपिशाचा तथान्येपरमथादयः॥५०॥तुम्बुरूनरिदो हाहा #
ददुशचत्यादयो वराः॥ गन्धर्वाः किन्नरा जग्धुर्वा्यानाध्माय दर्षिताः॥५१॥ जगतो मातरस्सवां देवकन्याश्सर्वशः॥ गायथीचैव सा
¢ विर रक्ष्मीरन्यास्मुरश्ियः॥५२॥एताान्याश्चदेवानां पत्नयो भवमातरः॥द्रादश्शंकरस्येति जग्धुस्सर्वा श्चदान्विताः॥५३॥
॥ ४८ ॥ इस भकार वे बहते ऋषि मागमे जति हुए शिवके विवाह देखने उत्कण्ठा सहित बडी शोभाको प्राप्त हए ॥ ४९ ॥ शाकिनी) ||
याठुषानी, बेतार, बहरा, भूत, पेत, पिशाच ओर भी भमथ आदि ॥ ५० ॥ तुम्बुरु, नारद, हाहा, हह, भेष्ठ गन्ध, कि्रगण बडी £
भसन्नतासे खलकै ओर हाथके बाजे बजाते चठे ॥ ५१ ॥ म्यं जगत्की माता तथा सन देवकन्या, गायत्री, सावित्री, ठक्ष्मी तथा दूरी ||
2 देवताओंकी लिये ॥ ५२ ॥ यह तथा द्री देवताओं किय तथा जगतकौ भाता यह सव॒ शिवजी विवाहे भजता पूव ||
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चली ॥ ५३ ॥ शुद्धस्फटिकं मणिके समान सब प्रकारसे सुन्दर वृषम जिसका गाह्य सिद्ध ओर् महधिरयोनि धमे कहा ९
परमवत्सछ महादेव उस्र वरृषभपर आरूढ हूए, हे देवि ! वह सयक सहित जाते हए भव्यन्त शोभाको पराप्त हए ॥ ५५ ॥ इस भरकार् इन
ओर सब महषियोके सहित जाते हृए महेश्वर अलंङूत हो बडी शोभाको प्रात इए ओर संब देखने रगे कि, आज शकृर पावती
पाणिग्रहणके निमित्त हिमाखयके स्थानम जाते है ॥ ५६ ॥ इस प्रकारसे यह शिवजीकै गमनका परम सुन्द्र चरित कहा, ह नारदजी !
अव हिमाठयके पुरका भे वृत्तान्त सुनिये ॥ ५७ ॥ इति भ्रीशिवमहाए्राणभा० रद्रसंहितान्तगेततृतीयपावेतीखण्डं चतवारिंशोऽ्यायः ॥४०॥
डुद्धस्फरिकसकाशो वृषभस्स्ववुन्दरः॥ यो धरम उच्यतेवेदेश्शाचेरिसद्धमहर्भिमिः॥५8 ॥तमाहूढो महादेवो वृषम् धमवत्सलः॥
सुदचभेतीव देवषिंसेवितस्सकटेर््रनन् ॥ ५५ ॥ एभिस्समेतैस्सफलटेमहषिभिबभौ महेशोबहुशौीत्यलदछृतः ॥ दिमाटयाहस्य
धरस्य सवजन् पाणिग्रह सदनं शिवायाः ॥५६॥ इत्युक्तं शम्भुचरितं गमनम्परमोत्सवम् ॥ दिमालयपुरोद्तं सङ्त्त श्ण
नारद ॥५७॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे या्ावणैनं नाम चत्वारिशोऽध्यायः ॥१०॥
ब्रह्ोवाच॥ ततस्सम्मन्त्य च मिथःश्राप्याज्ञां शांकरीं हरिः ॥ खने त्वाम्प्रेषयामास प्रथम् कुषराख्यम् ॥ 9 ॥ अथ प्रणम्य
सवैशं गतस्त्वं नारदा्तः ॥ हरिणा नोदितः प्रीत्या दिमाचलगृहम्परति ॥ २ ॥ त्वं सुनेऽपश्य आत्मानं गत्वा तद्वीडया
न्वितम् ॥ कृरिम रचितं त विस्मितो विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥ श्रान्तस्त्वपमात्मना तेन् कृत्रिमेण महामुने ॥ अवलोकपरस्सोऽ
भूचरितं विश्वकर्मणः ॥४॥ प्रविष्टो मण्डपस्तस्य हिमाद्रे रत्नचित्रित् ॥ सुवणकलशष्ट रम्भादिबहुशोभितम् ॥ < ॥
ब्रह्माजी बोटे है नारदजी ! तब परल्पर सम्भति कर ओौर फिर शकरकी आज्ञा पाकर हरिने तुमको हिमाट्यके यहां भेजा ॥ १॥ हे नारदजी ।
तब सर्वे्रको प्रणामकर तुम आगे चे ओौर भ्रमसे विष्णजी बोरे, तुम हिमाखयके घर जाओ ॥२॥ हे खने ! तमने वहां जाकर विश्वकमाकी ठ
| बनाई अपनी कत्रिम मूतं ठजायुक्त देखी. उसे देखकर तुम बडे विस्मित हृए ॥ ३ ॥ हे खने | जिस समय तुमने विश्वकमीका वहं चरित्र (
देखा तुम उसी समय शान्त हो गये ओर अपनी कत्चिम स्रूतिको देखकर परम विस्मय माना ॥ ४ ॥ फिर तुमने हिमाठ्यके रचे हुए
| शिण्पुर
॥२८६। |
८८२,
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पाख.
अ०५१
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वगन्न्ननलल
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| चित्रित सुबणकर्शेति शोभायफान कैठेके वृक्षि युक्त बण्डपफो देखा ॥ ५ ॥ यह सहस्र स्तम्भसे संयुक्त विचि प्रम अदत |
उस्न वेदिकाको देखकर तुम बडे विस्मयको प्राप हए ॥ ६ ॥ हे नारद ¡ प्शवात् तुमने नरेशवरसे यह बात कही उस समय तुम्हारे मनम बडा
विस्मय था जिससे तुम्हारी बद्ध ओर ज्ञान नष्ट होगया था॥ ७ ॥ तुम सोचने कगे कि, क्या इस स्थले विष्य आदि देवता सब
महि, सिद .ओौर उपदेवता पहछेही .आगये ॥ ८ ॥
६
हे पर्वतराज ! श्वेत वषपर आढ अपने गणोको साथ ये हए कया विवाह कै निमित (4
महादेवजी पधार चुके ई ? यह आप सत्य किये ॥ ९ ॥ बहाजी बोरे विस्मययुक्त चित्तवाठे तुम्हारे यह वचन सुनकर वहं ¢
सुहसस्तम्भसंयक्त विचिच्म्परमाद्धतम् ॥ वेदिकां च तथा दृष्ठ विस्मयं त्वं सुने ह्या ॥ ६ ॥ तदावोचश्च स शुने नारद
त्वं नगेश्वरम् ॥ विस्मितोऽतीव मनसिनजञानो विमूढधीः ॥ ७ ॥ आगतास्ते किमधुना देवा विष्णुपुरोगमाः ॥ तथा |
महषयस्सवें सिद्धा उपसुरास्तथा ॥८॥ महादेवो वृषारूढो गणेश्च परिवारितः ॥ आगतः किं विवाहा वद् तथ्यं नगेश्वर
॥ ९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येव वचनं शत्व तव विस्मितचेतसः ॥ उवाच त्वां शने तथ्यं वाक्यं स हिमवान् गिरिः ॥ १० ॥
हिमवानुवाच ॥ ह नारद मदाप्रज्ञागतो नैवाधुना शिवः ॥ विवाहा च पार्व॑त्यास्सगणस्सवरातकः ॥ ११ ॥ विश्वकर्मकृतं
चिच्रं विदिः नारद सद्धिया ॥ विस्मयन्त्यज देवं स्व
रित्वा स्थो भव शिवं स्मर ॥ १२ ॥ युक्ता, विश्रम्य सुप्रीतः कषां कृत्वा
ममोपरि ॥ भेनाकादिषरेस्साद्
॥ मनाः गच्छ त्वं शकरान्तिकय् ॥ १३ ॥ एमिस्समेतो गिरिभिमंहामते संप्रा्यं शीं शिवम
चानय ॥ देवस्समत च महापसघस्सुरासुरराचतपाद्पवम् ॥ १४ ॥
हिमाख्य तुमे श्रेष्ठ ओर सत्य वचन बोे ॥ १० ॥ हिमाख्य बे, हे महापण्डित नारदजी ! अभी शिवजी नही आये हँ अभी गणको
ओर बरातिर्योको लेकर नहीं पधार है ॥ ११ ॥ हे नारदजी ! आप बुद्धि कगाकर देखिये किं, यह विश्वक्माजीकी कारीगरी है, ह
देवे ! आप् विर्मयको त्यागकर स्वस्य हजिये ॥ १२ ॥ आप मेरे ऊपर कपाकर भोजनकर विधाम कर ओर फिर मेनाकं आदि एोके
साथ भाप् शीकरे समीप जाइये ॥ १३॥ हे महामते ! इन सवके साथ जाकर तुष धाना कर शिबजीको यहां ठाओ सब देवता, महषिसमूह, सुर,
बोले हे सने ! जब हिमाख्यने रेता कहा, तो तुष शीघ्रही
अघुरोपे पूजित चरणकमल्वाठे शकरको यहां खाओ ॥ १४ ॥ बह्माजी | ८
हिमाखयके एत्रोसहित जाकर वर्हाके सव ङत्योको करके भोजनक बडी प्रसन्नतासे शिवजीके समीप आये ॥ १५ ॥ वहा वुमन
देवताओं भिरे हए महादेवजीको देखा, तमने ओर पवतराजके तने बडे रमसे तथा भक्ते मणाम् किया ॥ १६ ॥ तव विष्ण ओर
इन्द्रको आदि ठेकर सब देवता तथा रुद्रके अनुचर यह सब तुमसे पूष्ने छगे ॥ ३७ ॥ ह नारदजी ! तुमको ओर प्वेतके संतानगणको
ह सुब अनेक अछेकार धारण किये थे, इनको देखं॑देवता
शिण्पुण ध
विस्मित देखकर सव विस्मयसे व्याड होगे, मेनाक, सह्य, भेर आदि य ॥
देमिश्च ॥ तघत्यक्ृत्यं सुविधाय शक्ता मदहामनास्त्व |
॥२८७॥
्रहनोवाच ॥ तथेति चोक्त्वागम आश्चु॒दि त्वं सदेव तैशशेरसताति यं सुविः
शिवसत्निधानम् ॥ १५ ॥ तर दष्टो महादेवो देवादिषरिवारितः ॥ नमस्छृतस्त्वया दी्तश्शेैस्तेभेक्तितश्च वे ॥ १६ ॥ तदा
मया विष्णुना च सवं देवास्सवासवाः ॥ पम्रच्छुस्तवां शुने सवे इद्रस्याचरास्तथा ॥ १७ ॥ विस्मिताः पर्वतान्दरष्टा सन्देहा
कुलमानसाः ॥ मैना कसद्यमेर्वाययात्नानारकारसंयतान् ॥ १८ ॥ देवा उचुः ॥ हे नारद महाप्राज्ञं विस्मितस्त्वं दि दश्यसे ॥
सत्करतोऽसि दिमागेन किं न वा वद् विस्तरात् ॥ १९ ॥ एते कस्मात्समायाताः पवता इह सत्तमाः ॥ मेनाकसद्यमेवीययास्सु
परतापास्स्वलकृताः ॥.२० ॥ कन्यां दास्यति शकोऽसौ स भवे वा न नारदं ॥ हिमाख्यग्रदे तात किं भवत्यद्य तद्वद्
॥ २१ ॥ इति सन्दिश्धमनसामस्माकं च दिवौकसाम् ॥ वद त्वं पृच्छमानानां सन्देहं हर् सुवत ॥ २२ ॥
बोके ॥ १८ ॥ देवता कहने लगे, हे नारदजी ! हे महापंडित तुम इस सभय विस्मित दिखाई देते हो क्या हिमाठ्यने तुम्हारा सत्कार
नहीं किया, यह बात आप् विस्तारसे कहो ॥ १९ ॥ ओर यह भष पव॑त यहां किक कारणसे अये ह, यह मेनाक, सद्य, मेरु, आदि अपने
प्रतापे अरत ह ॥ २० ॥ हे नारदजी ! यह हिमाठय शंकरको अपनी कन्या दंगे या नहीं १. हे तात ! इस समय हिमाठयके यहां क्याहो
रहा है सो आप् किये ॥ २१ ॥ हे सुबरत । तम्हारे इस प्रकारके आचरणसे हम सब देवताओंको सन्देह हो रहा है, तुम भी सन्दिग्ध हो इत
रुमे. २
पाखं.३.
अ०४१
(ययय ज ज यययटजथ स य्सय
| हम पछनेवाठोंका सन्देह दूर करो ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोले, इस भरकारसे उन रिष्ण आदि देवताओंके वचन सुनकर
मायात मोहित हए तुम कहने ठ्गे ॥ २३ ॥ हे छने ! तव तुम स॒ङ्षे ओौर विष्णजीको एकान्तम ठे जाकर इसन प्रकारके वचन कहने ठगे
तथा सब देवताओंके अधिपति शचीपति पर्व॑तोके पख छेदन करनेवाछे इन्द्रको भी बाकर बे # २४ ॥ नारदजी बटे विश्वकर्मानि एसी
विचित्र रचना की है, जिसे देखकर सब देवता मोहित हो जार्येगे वह प्रेम ओर युक्तित सव देवताओंके मोहित करनेकी इच्छा कर रहै
है ॥ २५॥ हे शचीपति इन्दर ! पे भी उसने तुमको मोहित कर दिया है सो कया तुमने भुला दिया है इ कारण अन भी वह तुम्हारे
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तेषां विष्ण्वादीनान्दिवौकसाम् ॥ अवोचस्तान्युने त्वं हि विस्मितस्त्वा्मायया ॥ २३ ॥
एकान्तमाश्चित्य च मां हि विष्णुमभाषथा वाक्यमिदं सने त्वम् ॥ शची पति सर्वसुरेश्वरं वे पक्षाच्छिदं पूर्वरिपुन्धरा
णाम् ॥ २४ ॥ नारद् उवाच ॥ त्वश् कतन्तद्विकृतं विचि विमोहनं सर्वदिवौकसां हि ॥ येनैव सर्वान्स विमोहितं
सुरान्समिच्छति प्रेमत एव् युक्तया ॥ २९ ॥ पुरा कृतन्तस्य विमोदनन्त्वया सुविस्प्रतन्तत् सकलं शचीपते ॥ तस्मा
दसौ त्वां विजिगीषुरेव गृहे थुवन्तस्य गिरे्महात्मनः ॥ २६॥ अहं विमोहितस्तेन प्रतिह्पेणं भास्वता ॥ तथा विष्णुः
कृतस्तेन बह्मा शक्रोऽपि तादृशः ॥ २७ ॥ किम्बहूक्तेन देवेश सर्वदेवगणाः कृताः ॥ कतिमाशि्रह्पेण नर्किचिदव
शेषितम्॥२८॥ विमोहनाथ सवषां देवानां च विशेषतः ॥ कृतामाया चि्रमयी परिहासविकारिणी ॥ २९ ॥ ॥ बन्नोवाच ॥
तच्छत्वा वचनन्तस्य द्वेन्द्रो वाक्यमत्रवीत् ॥ विष्णुम्परति तदा शीं मयाङ्कलतवुररिम् ॥ ३० ॥
जीतनेकी इच्छा करता है, ओर महात्मा हिमाठयके यहा विश्वकमां वियमान है ॥ २६ ॥ नै अपने कतनिम हपको वहां देखकर मोहित
होगया दसी प्रकार ब्रह्मा. विष्णु ओर इन्द्रको भी निर्माण किया है ॥ २७ ॥ हे देवेश ! बहुत कहनेषे क्या है उन्होने किम तथा चित्र |€
रपस इस पभरकार देवताओंको निमौण किया है किं कुछ भी अन्तर दिखाई नहीं देता ॥ २८ ॥ विशेषकर सब देवताओंकै मोहित करनेकै &
निमित उतने परिहास करनेवारी चित्ररूपी माया की है ॥ २९ ॥ ब्हलाजी बोडे, इत भकारसे नारदजीक वचन सुनकर भयसे ठयाकुरशरीर ॥>
99९25924 2 गार
ननन 2
न
हो विष्यजीकी ओर देखकर इन््रने शीध्रतासे कहा ॥ ३० ॥ देवेन
मुकञसे दोह करता है, बह इसी बहाने सके मार देगा ॥ ३१ ॥ बहला
समञ्ञाते हृए हसकर इस भरकारसे कह
वैर करनेवारे दान्वोने महावियाके बरसे तुमको मोहित किया ॥ ३
पश्च तुमने मेरी आज्ञासे छेदन कर दिये ॥ ३४ ॥ इस कारण यहं पृक्त
`
बोरे, हे देवदेव ! हे रमानाथ ! बह तष्टा ऽत्र शोके व्याकुढ होकर
ली बोठे देवदेव जनादन इन्द्रके इश भकारते वचन सुनकर इन्द्रको व
ने खगे ॥३२॥ दिष्णजी बोठे हे इन्द्र ! पटे निवातकवचोने तुमको मोहित किंया था धुः
३ ॥ इसी भकार इ पवैतराज हिमाख्यके तथा दूरे सब पवंतोके
त उस मायाको देख सुनकर जो तुमको जीतना चाहते है बह
॥ देवेन्द्र उवाच ॥ देवदेव रमानाथ त्वष्टा मां निहनिष्यति॥ पु्रशोकेन तप्तोऽसतौ व्याजेनानेन नान्यथा॥३१॥ ब्रह्मोवाच ॥ तस्य
तद्वचनं श्रत्वा देवदेवो जनार्दनः उवाच प्रहसन् वाक्यं शक्रमाश्चासयंस्तदा॥३२॥ विष्णूवाच। निवात कवचैः पूर्व मोहितोऽसि
शचीपते॥महाविदयाबलेनेव दानवैः पूर्ववेरिभिः॥३२॥ पवतो हिमवानेष तथान्यऽखिरपवताः॥ विपक्षाहिकृतास्सवं मम वाक्याच्च
वासव ॥३७॥ तेवस्मृरत्या तु वै दृष्टा मायया गिरयो ह्यमी॥ जेतुमिच्छन्तु ये भरूढा न मेतम्यमरावपि॥ ३५॥ दश्वरो नो हि सवेषां
शंकरो भक्तवत्सलः ॥ सर्वथा कुशलं शक्र करिष्यति न संशयः ॥ ३६ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं संवदमानन्तं शक्रं विकृतमानसम् ॥
हरिणोक्तश्च गिरिशो छोकिकीं गतिमाध्चितः ॥३७॥ ईश्वर उवाच ॥ ह हरे हे सुरेशान किम्डरूथोऽद् प्रस्परम् ॥ इत्युक्रा तौ महै
शानो सने ताम्धत्युवाच सः ॥ ३८ ॥ किलु वक्ति महाशरो यथाथ वद् नारद् ॥ ¶ृत्तान्तं सकलभ्बरूहि न गोप्य कतैमरंसि ॥२९॥
मूखं ई, तुषको शते भय करना न चाहिये ॥ ३५॥ हे इन्दर ! इसमें कोई मी सन्देह नहीं षह भक्तवत्सल भगवान् शंकर सवथा हमारां
मगर करेगे ॥ ३६ ॥ बरह्ाजी बोठे इस भरकारसे ठ्याकुकमन इन्द्रको देखकर भगवा जब रि्युजीने समञ्ञाया तब छौ किकी गतिको आश्रय कर
भगवान् शकर बोखे ॥ ३७ ॥ ईश्वर बो हे हरे ! हे सुरपति ! तुम परर्पर कया विचार कर रहे हो, हे सने ! महेश्वरने उन दोनो एेस्ञा कहकर
फिर तमसे कहा ॥ ३८ ॥ हे नारद्! शराजने क्या कहा ह, वह तुम यथाथरूपसे कहो सब वृत्तान्त कहो यप रखनेकी आवश्य
सि
कता नहीं ॥ ३९ ॥ तुभ शीघ्र कह दौ शेखको कन्यादान की इच्छा है वा नही हे तात ! तुभने वहां जाकर कणा देखा ओर क्या किया
हे तात ! प्ेमसे बह सब बात हमसे कहिये ॥ ४० ॥ बह्माजी बोरे, हे सने ! जब देवदशैन तुमसे शिवजीने एसा कहा तब तुमने जो कुछ
मण्डपे देखा था वह सव रहस्य कहा ॥ ४१ ॥ नारदजी बोरे हे देवदेव ! आप भरे शुभ॒ वचन सुनो, हे नाथ ¡ इस विवाहम तो किसी
प्रकारका विन्न वा भय नहीं है॥ ४२॥ हिमालय अवश्य ही आपको कन्या देगे, हे देव ! इसमे सन्देह नहीं, यह सब शेक आपको ठेनेके
निभित्तही आये है ॥ ४३ ॥ हे सर्वज्ञ ! परन्तु देवताओंके मोहनेको वहां एक माया रची गई है, जो बडी अदत ओर सनको कौतुहढ
ददाति वा नैव ददाति शेरस्स॒तां स्वकीयां वद तच् शीघम् ॥ किन्ते दं, फं कृतन्तञ्न गत्वा प्रीत्या सर्वं तद्वदाश्वद्य
तात ॥ ४० ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्यक्तश्शम्भुना त ने त्वन्देवदशनः ॥ सवं रहस्यवोचो वै यदृ्टन्तञ मण्डपे ॥ ४१ ॥ ॥
नारद उवाच ॥ देवदेव महादेव शरण मद्वचनं शभम् ॥ नास्ति. विन्नभयं नाथ विवाहि किंचिदेव हि ॥ ६२ ॥ अवश्यमेव
शखेशस्तुभ्यं दास्यति कन्यकाम् ॥ त्वामानयितुमायाता इमे शका न संशयः ॥ ४३ ॥ किन्तु ह्यमरमोहार्थे माया विरचिता
दधता ॥ ऊतुह लाथ सवंज्ञ न कञ्चिद्धिष्नसम्भवः ॥ ४४ ॥ विचिरम्मण्डपं गेहेऽकार्षपीत्तस्य तदाज्ञया ॥ विश्वकर्मां महामायी
नानाश्चयैमयं विभो ॥ ४५ ॥ सर्वदेवस॒माज कृतस्तत्र विमोहनः ॥ तन्द्वा विस्मयं प्राप्तोहं तन्मायाविमोदितः ॥ ४६ ॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥ तच्छत्वा तद्रचस्तात् खोकाचारकरः प्रथुः ॥ इरषादीन्हसनज्छम्भुक्ूवाच सकलान्सुराय्॥४७॥ ईश्वर उवाच ॥
कन्यां दास्यति चेन्मह्यं पवतो हि हिमाचलः ॥ मायया मम कं कार्थं वद विष्णो यथातथम् ॥ ४८ ॥
भकट , करनेवाठी है दूसरा कों विघ्र नहीं है ॥ ४४ ॥ हे विभो ! महामाया करनेवारे विश्वकमाने हिमाख्यकी आज्ञा उनके यहां महा
आश्वययक्त मण्डपकी रचना की है ॥ ४५ ॥ ओर सव देवताओकि समाजको पोहित करनेवाछा वह षडप निर्माण किया है उसकी भायात
मोहित होकर थं बहे दिरमयको भाष हुआ हूं ॥ ४९॥ ब्रमाजी बो हे तात ! उनके यह वचन सुनकर कोकाचार करगेवाडे भभु शिवजी हरि
भदिका हास्य करते हए सब देवताओं बोरे ॥४७॥ ईश्वर बोठे यदि हिभाखय पर्वत शे कन्या दंगे. ह विप्जी ! तब आप् कहिये किभायसे ||>
म
हमारा कया प्रयोजन है ॥४८॥ हे बहला, इन्द्र, खनि, देवताओं ! आप यथा किये जो गिरि कन्या देते ह तो माया मेरा कया कार्यं है ॥ ९ &
न्यायके जाननेवाछे एडितोँने कहा है जैसे बने पैसे किसी उपाये फठसिद्धि करे, इस कारण सव ही कार्यकी इच्छासे विष्णजीको आदि ठेकर् &
शीघ ही चो ॥ ५० ॥ बहमाजी बोडे जव शंकरने सब देवताओं ए कहा तव भारत जनोकि समान स देशक वशीभूत १४
दव शिवजीकी आ ्ाे ३ सब मिम्यभादि देवता तथा ऋषिजन मो तथा भ्रमरे रहित भौर भर ह् ॥५२॥ ह छे । वे सव देवतादिक दुमका
हे बरह्मज्छकर सुनयस्सुरा ब्रत यथार्थतः ॥ मायया मम फ काय कन्यां दास्यति चेहवरिः ॥ ४९ ॥ केनाप्युपायेन फलं हि
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॥ २८९
साध्यमित्युच्यते पण्डितैरन्यायविद्धिः ॥ तस्मात्सवेगेभ्यतां शीघ्रमेव कार्याधिमि्विष्णुषुरोगमे्च ॥ ५० ॥ ब्रह्लोवाच ॥
एवं सवदमानोऽसौ देवैश्शमधुरथूत्तदा ॥ कृतः स्मरेणेव वशी वशं वा प्राकृतो नरः॥५३॥ अथ शग्भ्वज्ञया सवं विष्ण्वाद्या
निर्जरास्तदा ॥ ऋषयश्च महात्मानो ययरमोदभमापदम् ॥५२॥ पुरस्कृत्य शने त्वां च पवरतास्तान्सविस्मयाः॥ हिमाद्ेशच तदा ||
जग्ुमन्दिरम्परमाद्धतम् ॥५३॥ अथ विष्ण्वादिरसंयुक्तो सुदितैस्स्वबेयैतः॥ आजगामोपृहैमागपुरपरषुदितो हरः॥ ५९ ॥ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दरसंहितायां तृतीये पार्बतीखण्डे मण्डपरचनावर्णेनं नामेकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ 8१ ॥ ॥ ट
ब्रह्मोवाच ॥ अथाकरण्यं गिरीश निजपृय्युपकण्डतः ॥ प्रा्तमीशं सर्वगं वै घुश्ुदेति हिमालयः ॥ १ ॥ अथ सम्भृतसम्भार
स्सम्भाषां कर्तुमीश्वरम् ॥ शेलान्प्रस्थापयामास ब्राह्मणानपि सर्वेशः ॥ २ ॥ | #
ओर उन पर्वतोको आगे करके हिमारूय परम अदधत मंदिर गये ॥ ५३ ॥ तव विष्ण आदिके सहित ओर अपने प्रिवारसहित शिवजी हिमाल ¢
यके नगक समीप प्राप्त हए ॥ इति भ्रीशिवष ०्भा०ङ्० तृतीये पारव॑तीखड एकचत्वारिंशोऽध्याथः ॥ ४१ ॥ बह्लाजी बोटे दधुर् गिरि
जने जब यह॒बात सुनी किं, सव॒ वरात शिवजीके सहित नगरकै समीप आगडं है तब वहः बडा भरसन्न हओ ॥ १ ॥ तव सव सम्भार ॥%
रुभ्सृ.२
पा.खं.३
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जाकर ईैश्वरकी अगौनी करने निमित्त बहते बाह्णण ओर पवै्तोको वहां भेजा ॥ २॥ ओर प्राण्रिय ईश्वर अवलोकन करनेको सद्ध |
| किते स्वयं भी गमन किया शेके मनये भक्ति बढ गहै वह अपने भाग्यकी बडाई करने रगे ॥ ३ ॥ उस समय देवताओं सेनाको | ठ
> हिमाख्य कंडे विस्मयको प्राप्त हए ओर अपनेको धन्य मानते हुए उनके सम्मुख गये ॥४॥ देवताभी हिमाख्यके सदायको देखकर प्रम विस्म
& || यको भ्ाप्त हए, इस प्रकार देवता ओर परवतोको बडा आनंद हआ ॥ ५॥ हे सने ! वह देवता ओर परवतोकी महासेना मिरकर पूवं पथिमके ¢
|| सागरके समान शोभायमान हृदे ॥ ६ ॥ वह देवता ओर पर्वत परस्पर मिरुकर परम प्रसन्नतासे अपनेको कतकत्य मानने ठे ॥ ७ ॥ तब
|| स्वयं जगाम सद्क्त्या प्राणेष्मुन्द्रष्टुमीश्वरम् ॥ भक्त्युदरुतमनाश्शेलः प्रशंसन् स्वविधिम्युदा॥ २॥ देवसेनां तदा दृष्टा दिमवान्वि ४
ह|| स्मर्यगतः॥ जगाम सम्मुखस्तज धन्योऽहमिति चिन्तयन् ॥४॥ देवा दि तद्वरं ष् विस्मयम्परमं गताः॥ आनन्दभ्परमम्प्राुद ||
६ वाश्च गिरयस्तथा ॥५॥ पवैतानां महासेना देवानां च तथा ने ॥ मित्वा विरराजेव पूव॑पथिमसागरौ ॥६॥ परस्परं मिलित्वा ||
| ते देवाश्च पवैतास्तथा ॥ कृतकृत्यन्तथात्मानम्मेनिरे परया खुदा॥७॥अथेश्वरम्पुरो दृष्टा भरणनाम हिमालयः ॥ सवे मणेषुिसयो |£
ब्राह्मणाश्च सद्शिवम्॥ ८॥ वृषभस्थम्पसत्रास्यन्नानाभरणभूषितम्॥ दिन्यावयवलखावण्यप्रकाशितदिगन्तरम् ॥ ९ ॥ सुसृक्ष्माह ॥#
। तसत्पट्व्लशोभितविभ्रहम्॥ सद्रत्नविलसन्मौरि विदसन्तं शचिग्रभम्॥ १ ०॥भूषाभूतादिथुक्तांगमद्धतावयवपभम् ॥ दिव्यति
¢ सुरेशश्च सेवितं करचामरः॥११॥वामस्थिताच्युतन्दक्षभागस्थितविथम्परथुम्॥ पृष्ठस्थितहरिं पृष्ठपा्वस्थितसुरादिकम् ॥१२॥
हिमाख्यने दैश्ववरको सन्छख देखकर भणाम किया, सब परवत ओर बाहमणोनिभी करको भणाम किया ॥ < ॥ बैरक ऊप्र चट, भसननघस
ट| अनेक अठंकारोते शोभायमान, दिव्य शरीरकी शोभासे दिगन्तरोको अकाश करनेवाछे ॥ ९ ॥ स्म बारीक रशी वञ्लोसे जिनका शरीर
शोभायमान हो रहा है, शिरपर श्रेष्ठ रल्नोका खकुट, शुभकान्तसे हसते हए ॥ १० ॥ गहनो शोभित शरीर, शरीरके अवयवोंकी अद्भुत #
कान्ति, दिव्यं कान्ति, हाथमे चमर लिये देवताओं शोभित ॥ ११ ॥ वामं ओर दक्षके भाग्यकी स्थिति, ठयापक भुके पीठे इनदर स्थित
|| उनके पीछे ओर पाश्च भागम देवता स्थित है ॥ १२ ॥ 4
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उन लोकके कताक देवतागण अनेक भरकारते स्तुति कर रहे थे, उन बहाने अपने कारणे शरीर धारण किया है ओर बह सव १
देवा है ॥१३॥ वह सण निग दोनों भकारे भक्तोके अधीन हो कपा करनेवाछे ई, बह भक्ति परूषसेभी परे सतु चित् आनद हवा
है ॥ १४ ॥ प्रभु दक्षिण भाग अच्युत हारि पिराजमान थे जो गरुडपर चहे अनेक गहनो भूषित थे ॥ १५ ॥ हे सुने ! भगुके वामृभाग
उन्हेने श्च देखा यँ चतुणैल महाशोभा धारण किये अपने परिवारे संयुक्त था ॥ १६ ॥ सदाशिवजीकै प्यारे इन दोनों षुरेश्वरोको देखकर
नानाविधिषुराचेश्च संस्तुतं लोकशंकरम्॥ स्वरेत्वात्ततनुम्ब्रह् सवेशंवरदायकम्॥ १ ३॥सशणं निणं चापि भक्ताधीनं कृपाकरम्॥
्रकृतेः पुरुषस्यापि परं सच्चित्सुखात्मकम् ॥ १९ ॥ प्रभोर्दक्षिणभागे तु ददश हरिमच्युतम् ॥ विनतातनयाषूटं नानाभरूषणभू
पितम् ॥ ॥ १५ ॥ प्रभोश्च वामभागे तु ने मां सन्ददशं ह ॥ चतुरं महाशोभ स्वपरीवारसंयुतम्॥ १६ ॥ एतौ सुरेश्वरौ
दृषा शिवस्याति प्रियौ सदा ॥ प्रणनाम गिरीशश्च सपरीवार आदरात् ॥१७॥ तथा शिवस्य पृष्ठे च पाश्वयोस्सुविराजितान् ॥
देवादीन्प्रणनाभासौ दष्ठा गिरिवरेश्वरः ॥ १८ ॥ शिवाज्ञया पुरो भूत्वा जगाम स्वपुरं गिरिः ॥ शेषहर्यात्मभूश्शीच्र युनिमि
निर्जरादिभिः ॥ १९ ॥ सवे यनिसुराद्याश्च गच्छन्तः प्रथुणा सह ॥ गिरेः पुरं सशुदिताः शशंघ्बेहु नारद् ॥ २० ॥
गिरीशने परिवार सहित आदरे इनको प्रणाम किया ॥ १७ ॥ इसी भकार शिवकेषृष्टमागमे तथा पराश्वभागमे विराजमान देवताओको देख
क्र गिरीशने प्रणाम किया ॥ १८ ॥ शिवकी आज्ञासते आगे होकर होकर हिमाटय अपने परमं भरविष्ट इए. तथा शेष, हरि, नह्ाजी ओर
देवता भी ॥ १९ ॥ हे नारदजी ! सब सनि ओर देवता प्रभुके संग जाते हए प्रसन्नतासे हिमाठयके नगरकी भशंसा करने ठे ॥ २० ॥
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। | एक प्रम मनोहर शिखरमे स्थापन करकं हिमाठ्य वहां गये जहां विधिवेदिका स्थापित थी ॥ २१ ॥ तोरणोसि विेषरूप ||
बह स्थान चौकोन कराया गया था, वहां ज्ञान, दान करके परीक्षा छी ॥ २२ ॥ ओर उस समय शिवजीके समीपम अपने पत्ोको भजा ठै
शेखराज हिमायने विष्ण आदि सबको परिवार सहित बकाया ॥ २३ ॥ बहाउत्सवके सहित वरकै आचार करनेकी इच्छा की ओर शेक
राजने महाहषसहित सब बन्धुजनोंको बाया ॥ २४ ॥ तब उन पव॑तुत्रोनि अपने समूहसहित पिष्णदिकै पास जाकर शरेश्वरके वचन
¢ सुनाये ओर उनसे भराथना की ॥ २५॥ तव बे शैरुत्र उनकी आशज्ञासे अपने स्थानोंको आये भौर शेकराजने जाकर कहा सन देवता ¢
रचिते शिखरे रम्ये संस्थाप्य देवतादिकम् ॥ जगाम हिमर्ँस्ततच यत्रास्ति विधिवेदिका ॥ २१ ॥ कारधित्वा विशेषेण
चतुष्कन्तो र्णेशतम् ॥ क्ञानदानादिकं कृत्वा परीक्षामकरोत्तदा ॥ २२॥ स्वपुतान्मेषयामास शिवस्य निकटे तथा ॥ हिमो
विष्ण्वादिसम्प्ण वगैयुक्तस्य शलराट् ॥ २२ ॥ कतमेच्छद्रराचारं महोत्सवपुरस्सरम् ॥ महाहर्षयुतस्सर्वबन्धुयुग्विमशेकराट्
॥२७॥ अथ ते गिरिषुतराश्च तञ गत्वा प्रणम्य तम् ॥ सस्ववर्ग प्रार्थनान्ताम्रचुशशेरेश्वरस्य वे ॥ २९ ॥ ततस्ते स्वालयं
जग्षुश्शलपुास्तदाज्ञया ॥ शलराजाय संचख्युस्तेचायान्तीति हर्षिताः ॥२६॥ अथ देवाः भरार्थनान्तां गिरेः अत्वातिहषिताः ॥
षने विष्ण्वादयस्सवे सेश्वरा सुसुदुभेशम् ॥२७॥ कृत्वा सुवेषं सवेपि निर्जरा शरनयो गणाः ॥ गमन चज्करन्येषि प्रभुणा गिरिरा
इगृहम् ॥ २८ ॥ तस्मिन्नवसरे मेना दरष्टकामाभवच्छिव॒म् ॥ ्रभोराह्वाययामास शुने त्वां स॒निसत्तमम् ॥२९॥ अगमस्त्वं
, शुने तच प्रणा प्ररितस्तदा॥मनसा शिबहद्ेतं प्रण कर्त तमिच्छता ॥ ३० ॥
्रसन्न हो रहे हँ ॥ २६ ॥ तब सव देवता गिरिको पाथना सुनकर बडे प्रसन्न हए हे नारदजी ! इसी भकार शैश्वरसहित स्तब विष्यआदि
देवता प्रसन्न हए ॥ ध ॥ तब श देवता १ श व सुन्दर वेष धारण करके शंकरफे सेग परस्ता हिमाटयके घर गये ॥२८॥
हे शने ! उस्र समय मेनाने तुम्हारे देखनेकी इच्छा की ओर तुम अनिभरष्ठको शभे बुलाया ॥ २९ ॥ हे सने प
४ तुम वहां गये ओर शिवकी इच्छे शिवके हदयकी अभिटाषा पूणं करनेकी इच्छा की ॥ ३० || ' ९ चा 4
शि०° ¢ है सने ! तुमको भणाम कर मेना विस्मित हो मदहरनेवाठे शंकरका ₹ू१ देखनेकी इच्छासे
॥२९१॥ ||| तान्तगेततृतीये पावतीखण्डे देवगिरिसमागमवणेनं नाम द्विचत्वारिशोऽध्यायः ॥४२॥ मेन
इच्छा करती ह जिनके निमित्त एतरीने उत्तम तप किया है उनका कैसा हप हे॥ १॥ बह्माजी बोरे इस भकार अज्ञान
च्छासे तुम्हारे स।थ चन्द्रशाछामे आई॥ २॥ शिवजीने भी उसके मनका अहंकार जानकर अद्भुत ठीटा कृरनेकी इर
।
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|| त्वाम्भणम्य सुने मेना प्राह विस्मितमानसा ॥ द्रष्टुकामा प्रभो रूपं शंकरस्य मदूपहम् ॥ ३१ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे ४
&|| द्वितीयायां श्द्रसंहितायान्ततीये पार्वतीखण्डे देवगिरिमेलवर्णनं नाम द्विचत्वाररिंशोऽध्यायः ॥ २ ॥ मेनोवाच ॥ निरीक्षि ||
ह| ष्यामि प्रथमं शुने तं गिरिजापतिम् ॥ कीदशं शिवदहपं हि यदथ तप उत्तमम् ॥ 9 ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इ्यज्ञानपर सा च |¢
|| दशनाथ शिवस्य च ॥ त्वया शुने सम सद्यश्चन्दरशालां समागता ॥ २ ॥ शिवोऽपि च तदा तस्यां ज्ञात्वाहंकारमात्मनः॥ |¢
| प्रा विष्णुं च मान्तात ीलांक्ृतवादधताम्पघुः ॥ ३ ॥ शिव उवाच ॥ मदाज्ञया युवान्तातौ सदेवौ च पृथकपृथक् ॥
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से बोरी ॥३१॥ इति श्रीशिव ० महा भा० ी° खद्र्हि
] बी ह नारदजी ! पह मँ उन गिरिजापतिक देखनेकी
मर तत्पर हो बह शिवजीकै देखनेकी
छासे भमुने सक्षम ओर बह्माजीसे
गच्छतं हि गिरिद्रारं वयं पशवाद्रजेमहि ॥ 9 ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं हरिस्सर्वानाहूयोवाच तन्मया: ॥ सुरास्सं तथेव
गमनं च्ुरुत्सुकाः ॥ « ॥ स्थितां शिरोगृहे मेनां शुने विश्वेव त्वया ॥ तथेव् दशयामास इद्विभंशो यथा भवेत् ॥ ६ ॥
एतस्मिन् समये मेना सेनां च परमां ञ्चुभाम् ॥ निरीक्षन्ती शने दृष्टा सामान्यं हिताऽभवत् ॥ ७ ॥
कहा ॥३॥ हे तात ! मेरी आज्ञासे तुम दोनों देवताओं सहित गिरिके द्वार प्र जावो ओर हम पीछे जोयगे ॥ ४ ॥ बह्लाजी बोरे हरिने यह वचन
सुन सब देवता ओंको बुराकर कहा ओर सब देवता उसी प्रकार गमन करने ठगे ॥ ५॥ हे सने ! तव तुमको प्राथ ठे मेना महखके शिखरपर ची
तुम इस भकारसे दिखाने रुगे. जिससे हदय विदीणे हो ॥६॥ हे खने ! उस्र समय मेना परम शोभायमान देवता ओंकी सेनाको देखकर सामान्यषूपते
रुण्स.य्
पाखं.३
अ०४३
||६ | हई ॥ ७ ॥ सबसे पहठे सुंदर शोभायमान व्च धारण किये अनेक अकार् धारण कयि गेधवेगण आये ॥ < ॥ अनेक बाहनोप्र चदे
| अनेकं वाजे बजानेम तत्पर विचित्र पताका ओर अप््रागणोसे संयुक्त आये ॥ ९ ॥ तव ॒भेना उनकै परमपति भमु वसुको देखकर
||&|| न्न हदं ओर बोटी क्या यही शिव है ॥ १० ॥ ह कपिभेष्ठ ! तब तुमने भेनासे कहा यह ॒शिवजीकै गण है शिवाकै पति शंकर
` |¢ नहीं है ॥ ११ ॥ तब मेना यह वचन् सुनकर भरमम पड गईं जो इनसे भी अधिक है वह केसा होगा ॥ १२॥ उक्ती समय मेनाने
# प्रथमे चैव गन्धर्वास्स॒न्द्रास्सुभगास्तदा ५ आयाताश्ुभवन्लाटया नानारंकारधूषिताः ॥८॥ नानावाहनसंयुक्ता नानावायपरा
यणाः ॥ पताकाभिविंचित्राभिरप्सरोगणसंयुताः ॥ ९॥ अथ दष्टा वसुं ततर तत्पति परमगप्रभुम् ॥ मेना प्रहर्षिता द्यासीच्छिवो
ए यमिति चाव्रवीत् ॥१०॥ शिवस्य गणका एते न शिवोयं शिवापतिः ॥ इत्येवं त्वं ततस्तां वे अवोच ऋषिसत्तम ॥११॥ एवं
¢ श्रुत्वा तदा मेना विचारे तत्पराऽभवत् ॥ इतश्ाभ्यधिको यो वै स च कीरग्भविष्यति ॥१२॥ एतस्मिन्नन्तरे यक्षा मणिभ्रीवा
दयश्च ये ॥ तेषां सेना तया दष्ठा शोभादिद्विशणीकृता ॥१३॥ तत्पति च मणि्रीवं दृष्टा शोभान्वितं हि सा ॥ अयं श्द्रश्शिवा
स्वामी मेना प्राहेति इषिता ॥१४॥ नाय शद्रश्शिवास्वामी सेवको शिवस्य वै ॥ इत्यवोचोगपल्न्यै त्वं तावद्रह्विस्स आगतः
४
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॥ १५.॥ ततोऽपि द्विगुणां शोभां दष्ठा तस्य च सात्रवीत्॥ श्दरोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्तमजरवीः ॥ १६ ॥ तावद्य
मस्समायातस्ततोऽपि द्विणप्रभः ॥ ते दष्ा प्राह सा मेना श्द्रोऽयभिति हर्षिता ॥ १७ ॥
मणिवीरादि पक्षोकी सेना देखी जिनकी शोभा दूनी थी ॥ १३ ॥ ओर उनकै पति भणिथीषकी शोभा देखकर वह यही शिवाके खामी
दर है एसा जानकर ब॑डी प्रसन्न हदं ॥ १४ ॥ हे नारद् ! तब तुमने कहा यह ॒ शिवजी नहीं किंतु यहं शिवजीकै सेवक है जब तुमने
ठेसा कहा इसी अवरम अभिकी सेना देखी ॥ १५ ॥ पूर्वसे दूनी शोभा उनकी देखकर यह कहा क्या थही गिरिजापति रुदर ३ !
तुमने कहा नहीं ॥ १६ ॥ तबतक उससे दुयणी कांति धारण कंरेवारे यमराज आये उनको देखकर भन्न हो भेनाने कहा क्या यह
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ऋ
रुद्र है ! ॥ १७ ॥ तुमने कहा नहीं इसी अवसरे निक्ेति आये यह भमु पण्यजन
देखकर भेनाने प्रसन्न हो कहा क्या यह रुढ है ! तुमने कहा नहीं. तवतक वरुण
न उनते भी दूनी शोभा धारण क्य थे ॥ १८ ॥ उनको
जी आये ॥ १९ ॥ उनकी भी दूनी शोभा व
कृहा कया यही गिरिजापति रुद है ! हमने कहा नहीं ॥ २० ॥ तवतक उनसे भी दूनी कान्ति धारण किये वायु देवता आय उनकं
देखकर मेनाने कहा कया यह रुदर है १ ॥ २१ ॥ तुमने कहा नहीं तबतक कुबेर आये यहं गह्यकपति कवेर उनसे दूनी शोभा धाश्ण
नेति त्वमन्रवीस्तां वै तावत्नि्रतिरागतः ॥ बिभ्राणो द्विशणां शोभां ञ्चुः पुण्यजनप्रथुः ॥ १८ ॥ तं दष्टा प्राह सा ॥
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रूढोऽयमिति हर्षिता ॥ नेति त्वमनरवीस्तां वै तावद्वकूण आगतः ॥१९॥ ततोऽपि द्वियणां शोभां दक्वा तस्य च सात्रवीत् ॥ |
॥२९.२।
&|/ श्दरोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमन्रवीः ॥२०॥ तावद्वायुस्समायातस्ततोऽपि द्वियणप्रभः ॥ तं दृष्टा प्राह सा मेना शोय
# मिति हिता ॥ २१ ॥ नेति त्वमव्रवीस्तां वै तावदनद् आगतः ॥ ततोऽपि द्वियणां शोभां बिभ्राणो युद्यकाधिपः ॥ २२ ॥
तं ष्ठा प्राह सा मेना श्दरोऽयमिति हिता ॥ नेति त्वमब्रवीस्तां वे तावदीशान आगतः ॥ २३ ॥ ततोऽपि द्वि्णां शोभां दष्टा
४ तस्य च सा्रवीत् ॥ श्द्रोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमव्रवीः ॥ २8 ॥ तावदिन्द्रस्समायातस्ततोऽपि द्वियुणप्रभः ॥ स्वा
मरवरो नानादिव्यभश्चिदिवेश्वरः ॥ २५ ॥ तं दृष्ठ शंकरस्सोऽयमिति सा ग्राह मेनका ॥ शक्रस्सुरपतिश्वायं नेति त्वं तदात्रवीः
४ ॥ २६ ॥ तावज्न्द्रस्समायातश्शोभां तद्धिगुणां दधत ॥ इृष्ठा तं प्राह श्द्रोऽयं तां तु नेति त्वमत्रवीः ॥ २७.॥
क्यिथे॥ २२॥ उनको देखकर प्रसन्न हो भेनाने कहा यही रर है ? तुषने कहा नहीं. तवतक ईशान आये ॥ २३ ॥ उनकी भी
दूनी शौभा देखकर मेना बोली क्या गिरिजापति रद्र यही हैँ ? तुमने कहा नहीं ॥ २४ ॥ तव उनसे भी दूनी कान्तिवारे इन्द्र॒ अये,
जो सब देवताओं शष्ठ ओर अनेक अठकार धारण किये सबके अधिपति थे ॥ २५ ॥ उनको देखकर मेनाने कहा यही शंकर ह ¡
|| तुमने कहा नहीं यह तो देवराज इन्द्र॒ है ॥ २६ ॥ तबतकं उनसे दूनी शोभा धारण किये चन्द्रमा आये उसे देखकर कहा यह रर हैँ ?
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पा.खं.३
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| | कहा नहीं ॥ २७ ॥ तबतक उनसे दूनी शोभा धारण किये श्यं आये, उनको दसकर भेनाने कहा यह रुद्र हँ ! तुमने कहा नहीं
॥२८॥ तबतक भूय॒ आदि सनीश्वर आकर प्राप्त हए, यह अपने शिष्यो सहित महातेजकी राशि धारण किये थे ॥२९॥ उनके बीचमं वागीश
ट हस्पतिको देखकर भेनाने कहा कया यही गिरिजा स्वामी दर है ! तुमने कहा नहीं ॥ ३० ॥ तबतक तेजोंकी उत्तम राशि महाश्रष्ठ ब्रह्माजी
|| ऋषि ओर नकि सहित धर्म इजके समान आये ॥ ३१ ॥ हे ने ! के देखकर मेना बडी पसनन हृदं कहा यही शिव है तुमने कहा
©| नहीं ॥ ३२ ॥ इसी समयमे सव ॒शोभाओंसे युक्त श्रीमान् मेघके समान श्याम वरण, चतुर्भुन, विष्णजी देवताओंके सहित दिखाई दिये
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| तावत्सुस्समायातश्शोभां तदविखणां दधत्॥ दृषा तं भाई सा सोय॒न्तां त॒ नेति त्वमत्रवीः॥२८॥तावत्समागतास्तञ भग्वाचाश्च ध
| खनीश्वराः॥ तेजसो राशयस्सवे स्वशिष्यगणसंयुताः॥२९॥ तन्मध्ये 6 दष्टा सा श्राह मेनका ॥ श्द्रोऽय गिरिजास्वामी 4
|| तदा नेति त्वमन्रवीः ॥३०॥ तावद्भञ्ञा समायातस्तेजसां राशिरत्तमः ॥ स्साक्षादभे पंज इवस्त॒त्ः ॥३१॥ दष्ामा तं |¢
ह|| तदा मेना महाहरषवती सने ॥ सोऽयं शिवापतिः भाद तां ठ नेति त्वमनवीः॥३२॥ एतस्मिन्नन्तरे त विष्णुदेवस्समागतः॥ सर्वशो ||
४ मान्वितःश्रीमान्मेषुश्यामश्चतुयैजः॥२२॥कोटिकन्दप्पावण्यःपीताम्बरधरस्स्वराट्॥ राजीवलोचन श्शान्तःपक्ीनद्रवरवाहन्ः॥ ||
¢ ॥३8॥ शंखादिलक्षणेयुक्त सुकुटादिविभरषित्ः॥ श्रीवत्सवक्षारक्ष्मीशेोद्यूमेयरभान्वितः॥ ३५॥ तंष्टाचकिता््यासीन्महाहरषेण
सात्रवीत्॥ सोऽयं शिवापतिः साक्षाच्छिवो वे नात्र संशयः॥३९॥अय् त्वं मेनकावाक्यमाकरण्योताच उतिकृत्॥ नायं शिवापतिरयं
४ किन्त्वयं केशवो हरिः॥२७॥ शंकराखिरकाय्यंस्य छ्यधिकारी च तत्थियः॥ अतोऽधिको वरो ज्ञेयस्स शिवः पार्वतीपतिः ॥३८॥
॥ ३३ ॥ कोटि कामदेवके समान शोभायमान पीताम्बर धारण किये अपने तेजक्षे भकाशित कभ रोचन शान्त॒चित्त गरुढप्र चदे
४||॥ ३४ ॥ शंखादि क्षणेति युक्त सकट आदिसे शोभायमान वक्षस्थर्मं शोभायमान शीवत्सचिह्न लक्ष्मीपति अप्रमेय प्रभावा ॥ ३५ ॥
4 विभ्णको देखकर महाप्रस्नतासे मेना चकित होगई ओर इसमें सन्देह नहीं यही साक्षात् भिरिजाके पति है ॥ ३६ ॥ तव कौतुकं करनेवाछे
तुमने मेनाकै, चन सुनकर कहा किं यह भी शिव नहीं किन्तु यह केशव हरि ई ॥३७॥ पह शिषजीके सम्पूणं कायंके अधिकारी ओर उनके ||
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देखे हँ वही बडी कान्तिवाठे है जो इनके भी स्वामी
= व > गं # प नहीं है, वही
भ्रिय है इने शकर है ॥ ३८ ॥ हे मेना ! उनकी शोभा वणेन केकी स॒श्चमं सामथ्यं
1 छे नारदजीके यह वचन. सुनकर मेनाने अपनी कन्याको महाधना भाग्यवती
कहा ओर अपने भाग्यकी वारंवार बडाई की ॥ ४१॥
से भँ पन्य हूं ॥ ४२॥. जो जो नायक देवता मने
है दह भेरी पत्रे पति होंगे अहोभाग्य ॥ ४३ ॥ सौ वतक भी मेरी भत्रीका भाग्य
सव बह्मण्डोके अधिपति सर्वेश्वर स्वराट् है ॥ २९ ॥ बह्ञाजी बटे
तीनों कुकी सुखदायक जाना ॥ ४० ॥ ओर प्रीति युक्त चित्त भरसन्न होकर कह
मेनाबोटी पा्तीके जन्मते जँ सर्वथा धन्य हुईं गिरीश्वर भी धन्य ओर सव प्रकार
तच्छोभां वणितं मेने मया नैव हि शक्यते ॥ स एवाखिबह्ाण्डपतिस्सरश्वरः स्वराट् ॥ ३९ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्य
वचस्तस्य मेना मेने चतां शुभाम् ॥ महाधनां भाग्यवती इल््यसुखावृहामू ॥४०॥ उवाच च परसन्नास्या ्रीतिथुक्तेन चेतसा ॥
स्वभाग्यमधिकं चापि व्णयन्ती अुहुरहुः॥४१॥ मेनोवाच ॥ धन्यां सव॑था जाता पार्वत्या जन्मनाधुना ॥ धन्यौ गिरीश्वरोप्यद्य
सर्वै धन्यतम मम॥ ४२॥ येये दृष्वा मया देवानायकास्सुप्रभान्विताः ॥ एतेषां यः पतिस्सोऽञ् पतिरस्या भविष्यति ॥ ४३॥
अस्याः किं वण्यते भाग्यमपि वर्षशतैरपि॥ वणितं शक्यते नैव तत्परधुपाप्िदर्शनात्॥७९॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्यवादीञ्च सा मेना
प्रमनिर्भरमानस्ता॥ तावत्समागतो शदरोऽद्वतोतिकारकः प्रथुः॥४५॥ अद्धताल्मागणास्तात मेनागरवापदारकाः॥ आत्मानं दशयन्
मायानिरि्तं निर्विकारकम् ॥४६॥ तमागतमभिप्रेत्य नारद त्वंन तदा॥मेनामवोचः सुप्रीत्या दशंयंस्तं शिवापतिम् ॥४७॥
॥ नारद् उवाच ॥ अयं स शंकरस्साक्षादश्यतां सुन्दरि त्वया ॥ यदर्थं शिवया तप्तं तपोऽति विपिने महत् ॥ ४८ ॥
वणन नहीं हो सकता, उसको भरभुकी प्राति होगी तब उसके दशनसे महाफल होगा ॥ ४४ ॥ बह्माजी बोले जब प्रेमसे निभेर मन होकर
मनाने एेस्ा कहा तवतकं अद्भुत रूप धारण कयि प्रभु रजी. आये ॥ ४५ ॥ मेनके गवं हरनेवाटे अद्भुत ही उनके प्राथ गणथे
उन्होने अनेको मायासे प्रथक् निर्विकार दिखाया ॥ ४६ ॥ हे. नारदजी ! शकरको आया इभा _ देखकर परम परमते मने
शिबापति शिको दिखाते हुए कहा ॥ ४७ ॥ नारदजी बोके हे सुन्दरी ! देखो यही साक्षात शंकर ह जिनके निमित्त वनम जाकर
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पार्वतीने कठिन तपस्या की थी ॥४८॥ बऋ्लाजी बोटे यह वचन सुनकर भेना बहुत भसन होकर अद्भूत अकारवाठे अद्भूत गणोँबाटे शकरको
देखने ठगी ॥ ४९ ॥ उमी समय महाअदृत शद्रकी सेना आकर भरा हदं जो प्रतादिते संयुक्त अनेक गणोके साथ थी ॥ ५० ॥ कोद ६
वायुका रूप धारे पताकके समान मेर शब्दवाठे वक्रतुण्ड ओर कोई
विहपाक्च थे ॥ ५१ ॥ किन्हींकी षिकराङ डादी मू कोई संज को
नेत्रहीन कोई दण्ड पाश ओर कोई मुद्रर हाथो स्यि थे ॥ ५२ ॥ कोई २ विरुद्ध गाहनोपर चढे श्रगीनाद करनेवाठे कोई डमरू बजाते ं
कोई २ खसे शब्द करते थे ॥५३॥ कोई खलरदित कोई विकट्छल कों गण बहुत गुखवाठे थे कईं हाथ रहित कोड विकट हाथवाठे ओर
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता हषिता मेना तं ददशं खदा प्रभुम्॥ अद्धताकृतिमीशानमद्धतानुगमद्धतम् ॥ ४९ ॥ तावदेव समायाता
श्द्रसेना महाद्धता ॥ भूतप्रतादिसंयुक्ता नानागणसमन्विता ॥ &° ॥ वात्याहूपधराः केचित्पताकामममरस्वनाः॥ वक्रतुंडास्तच
केचिद्विरूपाश्चापरे तथा ॥ ५१ ॥ करालाः श्मशचलाः केचित्केचित्वजा द्यलोचनाः ॥ दण्डपाशधराः केचित्केचिन्युद्ररपाणयः
॥ «२ ॥ विर्दवाहनाः केचिच्छंगनादविवादिनः ॥ डमरोर्वादिनः केचित्केचिद्रोश्चखवादिनः ॥ ५३ ॥ असुखाविसुखाः केचि
त्केचिद्रइखखा गणाः ॥ अकरा विकराः केचित्केचिद्रूहुकरा गणाः ॥५९॥ अनेता बहुनेवाश विशिरा: इशिरास्तथा ॥ अकणा
बडुकभौ अ नानावेषधरा गणाः ॥ ५4 ॥ . इत्यादिविङृताकाु अनेके प्रबखा गणाः ॥ असंख्यातास्तथ। तात महावीरा
भयृकराः ॥ ५8६ ॥ अंगुल्या दरशर्यस्त्वं॑तां ने श्द्रगर्णोस्तितः ॥ हरस्य सेवकान्पश्य हरं चापि वरानने ॥ ५७ ॥
असंख्यातान् गणान् द्वा भूतप्रेतादिकान् सुने ॥ ततक्षणादभवत्सा वै मेनका आससंङ्खला ॥ ५८ ॥
कोई बहुत हाथोंवाठे थे " ५४ ॥ नेत्रहीन बहुत नेत्रवाठे शिरसे हीन बुरे शिरवारे कानरहित बहुत कानवा इस प्रकार नाना वेषधारी गण
थे ॥ ५५ ॥ इस प्रकारे विरत आकारवाङे अनेक भ्रवरु गण थे, हे तात ! वह अरसंख्यात महावीर बंडे भर्य॑कर थे ॥ ५६ ॥ हे नारद ।
जब तुमने अटी रगणोको दिखाया ओर कहा हे वरानने ! तुष शंकर ओर शंकरके सेवकोंको भी देखो ॥ ५७ ॥ हे सुने ! मेना असतख्य
गण ओर भूत प्रतादिको देखकर उसी समय बडा शोच करने ठगी ॥ ५८ ॥
९ | सनदी ¦ ‹
& श व निशण सयगलप शंकरको बरृषपर चढे पायल तीन नेत्र विभूतिसे भूषित देखा ॥ ५९ ॥ जो जटाजूट बधि माथेपर चन्द्रा ||&
¢ पा्व॑तीकी पार व्याम ओहि हाथ पनाक पदप थि ॥ ६० ॥ शल लाप निकट वया गनचम जोट करकी देलक
अंसे व बडी व्याल हदं ॥ ६१ ॥ उसको चकित, कापती इदे, व्याकर ओौर बुद्धे भ्रम पाये हृए देखकर हे नारदजी 1 तुमने #
६ तनवे त कि यही शिव है ॥ ६२ ॥ तुम्हरे यह वचन सुनकर वह सती भना बहत दुः हौ तते गिरी हई वेीके समान
& शंकरं चैष निथैणं यणवत्तरम् ॥ इृषभस्थं पञ्चवक्रं चनेतर भूतिभूषितम् ॥५९॥ कपर्दिनं चन्द्रमौखि दशदस्ते कपाटि
ठ नम् ॥ व्यात्रचमोत्तरीयञ्च पिनाकवरषाणिनम् ॥ ६० ; विष्टपा ५
तरसे शिवाप्रसुः॥ &१ ॥ चकितां कम्पसंयुक्ता विदलं ॥ ्लपु्तं विरूपाक्षं विकृताकारमाङ्कलम् ॥ गजचमं वसानं हि वीक्ष्य ठ |
£| त्वदीयं तद्चःश्चतवा वाताहतरता तो ५ ॥ शिवोऽयमिति चार्या दश्थसता तवमन्रवीः ॥ ६२॥ ©
४ इ ॥ ती मरूच्छिता तत्र मेनका + त 3 1) च ४
मना गिरीश्वरपरिया तदा ॥ ६५ ॥ इति श्रीशिव णे चिं म ९
६ महाएराणे द्वितीयायां शरसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवाद्भतलीलावर्णनं
ट गीं ~ ४३॥ ॥ बर्मोवाच॥ संज्ञा लब्धा ततस्सा च मेनाशेटभ्रिया सती॥ विलापातिसंुन्धा तिर
॥ 9. ॥ तत्र तावत्स्वपूर्वोशच निनिन्द खलित खडः ॥ पथम सा ततः पुज यः ४
परथिदीप्र मिर पडी ॥ ६३ ॥ प इस विंकपिको देलकर कसी वचित लोग पुवं कथयामास दुर्वचः ॥ २॥ ।
देखकर कैसी वंचित होगदं यह कैसे दुराथहकी बात है रेता कहकर भे क|
होई ॥ ६४ ॥ तब सखि्योने अनेक कारक भरयतन किं हकर मेन क्षणमावमेमृष्छित ||
ठ|| मा ₹° वृतीयपावतीसणड 1 प, तव बडी कषिता गरीभ्की भिया संहो भात इं ॥६५॥ इति भीरिव” ||
0 को ध नोठे जव रकभिया तती मेनाको चैतन्य भप्त हुईं तब बडे क्षोभसे विठाप् ||“
१ कुः अपने पत्ोंकी निदा करने लगी ओर फिर अपनी एीको दर्बचन कहे ॥ २ ॥॥/>
| वोढी हे ने ! ठुमने ही यह बात पहर कही थी कि पार्वती शिबजीको वरण करेगी तवही हिमाख्यने उसको शिवजीकी पूजाम नियुक्त ]|
| किया ॥३॥ सो यह उसका बडा अनर्थकारी विपरीत एक उपस्थित हआ है हे खने ! हे दुद हे अधम ! तुभने सव पकारे त ठग ल्वा ||
ट|! ४॥ मेरी तरीन रसा कठिन तप किया जिसे खनि भी नहीं कर सकते उसका यह दुःखदायक फल उपस्थित हआ सो देखो ॥ ५
ठ व क्या कर कहां जाड मेरे दुःखकरो कौन दूर करेगा भेरा कुरादिक ओर जीवन न्ट होगया ॥६॥ बे दिव्य ऋषि कहां शये जो मेँ उनकी &
& || ॥ मेनोवाच ॥ युन पुरात्वया भोक्त वरिष्यति शिवा शिवम् ॥ पश्चाद्धिमवतः छृत्यं पूजार्थं विनिवेशितम् ॥ ३ ॥ ततो
|| परं सत्यं निपरीतमनरथकम् ॥ सुनेऽधमाहं इदे स्था विता त्वया॥७॥ पुनस्तया तपस्त दष्करं निभि यत् ॥ तस्य
|| र्ध फलं द्यतत्पश्यतां दुःखदायकम् ॥ ५॥ कि करोमिक्र गच्छामि को मे दुःखं व्यपोहताम्॥ कलादिकं विनषठं मे विहितं
जीवितं मम ॥ ३ ॥ क गता ऋषयो दिष्याः श्मश्रणि्रोरयाम्यहम् ॥ तपस्विनी च या पतनी सा धूता स्वयमागता ॥ ७ ॥ 6
केषाञैवापराधेन सर्व नटं ममाधुना ॥ इत्यु वीक्ष्य च सतासुवाच वचनं कट ॥८॥ क छतं ते सते इ्टेकसं दुःखकरं मम ॥ ||
हेम दत्त्वा त्वयानीतः काचो वै दुष्टया स्वयम् ॥९॥ रित्वा तु चन्दनं भूयो रेषितःकर्द॑भस्त्वया ॥ हंसशुडीय काको वै शीतो
इ्तपशरे ॥ 9० ॥ हित्वा जमन द्र पीतं कषोवकं त्वा ॥ सुवं रिस त खयोतो शीतो यतनतस्तया ॥ 99 ॥ ||
तण्डुलश्च तथा हित्वा कतं वै तषभक्षणम् ॥ भ्क्िप्याञ्यं तथा तेरु कारण्डं भुक्तमादरात् ॥ १२ ॥ ह
डी भूछ उखाड दं वह तपस्विनी अरुंधती वशिष्ठकी पत्नी बडी पूतौ निकली ॥ ७ ॥ किसके अपराधसे भेरा तो क्षबही नष्ट हो गया, यह कहकर
अपनी कन्याको देख कड्वचन कहने गी ॥८॥ हे दु ! यह तुमने कया किया, भेरा कथे फूट गया, हे भूं ! तुमने सवणे गभाकर स्वयं कांच
४ || रहण किया ॥९॥ चंदनको छोडकर तुमने कीच ग्रहण की तुषने हंस उडाकर हाथके पिंजरेभ को भा भहन किया॥ १ ०॥तुषने बह्मनरु दूर बहाकर
‰|| पका जर ग्रहण किया, सयंको छोडकर तुमने यत्नसे खदोत श्रहण फिया ॥११॥ चावलोको छोडकर तुषने भूमि शरहण की, तुमने घत ओर > |
शि०पु° तको फंककर करण्डको खाया ओर आदर किया ॥१२॥ शेरकी सेवा छोडकर तुमने श्वगाकी सेवा कं, ब्रहमवियाको छोडकर तन कृल्सिव | ¢
॥२९५॥ ||| नी ॥१३॥ हे ऽति ! तुमने षरकी मांगछिक यज्ञविभूति दूर करके अभंगठ चिताभरम अ्रहण की॥१४॥ विष्ण आदि परमेश्वर सव भ्ठ देवताओंको ¢
अहण न करके तमने कुलुदधिसे शिवके निमि इस भकारका तप॒ किया॥१५। तेरी बुदि तेरे रप तेरे चरित्रको तुष तेरे उपदेश कती ओर तेरी सखियों ट
| को षिवा है ।१६॥ ह इत्र हम तैर माता पिताक भी धिह्ार है जो तेर जनम देनवारे है हे नारद । तेरी ओर सपिोंकी बद्धिको भिर ह ¢
# सिंहसेवां तथा थु्ा शृगारस्सेवितस्त्वया ॥ ब्रह्मविद्यां तथा युक्ता गाथा च अता त्वया ॥ १३ ॥ गृहे यज्ञविभूतिं हि ठ
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दूरीकृत्य खमंगखाम् ॥ ग्रदीतञ्च चिताभस्म त्वया पु्िद्यमंगलम् ॥ १९ ॥ सर्वान् देववरास्त्यक्त्वा विष्ण्वादीन्परमेश्वरान् ॥ £
कृतं स्वया बुद्धया वै शिवार्थं तप ईशम् ॥ १५ ॥ धिक्त्वां च तव बुद्धिश्च धिगूषं चरितं तव ॥ धिक् चोपदेशकन्तौरं 4
पिक्सख्यावपि ते तथा॥ १६ ॥ आवां च धिक्तथा पुरी यौ ते जन्मप्रवतकौ ॥ धिक्ते नारद बुद्धिश्च सतपर्षीश्च सुबुद्धिदान् ४
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॥ १७ ॥ पिक्ुलं धिक्क्रियादाक््ये सर्वधिग्यत्कृतं त्वया ॥ शन्तु धुक्षितं त्वेतन्भरणं तु ममेव हि ॥ १८ ॥ पाव॑तानामयं |९
राजा नायातु निकटे मम ॥ सप्तषयस्स्वयं नैव दशयन्तु श्ुखम्मम ॥ १९ ॥ साधितं कि सर्वैस्तु मिरित्वा घातितं कुलम् ॥
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वन्ध्याहं न कर्थं जाता गर्भो न गलितः कथम् ॥ २० ॥ अथो न वा शता चाहं पुिका न घृता कथम् ॥ रक्षसाद्य कथ नो वा
५६ भक्षिता गगने पुनः ॥२१॥ छेदयामि शिरस्तेऽथरकि करोमि कलठेवरेः॥ त्यक्त्वा त्वां चतो यायां हाहा मे जीवितं हतम् ॥२२॥ ||
पा.खं.३ ठ
अ०४४
॥१७॥ कुठ क्रियाकौ दक्षता ओर जो कुछ तुमने किया सबको धिकार है, ठुषने मेरा घर न कर दिया अब मेरा मरणही होगा॥१८॥यह् पव॑तोका ||
राजा मेरे समीप क्यों नहीं आता वह सप्तामि आकर स्वयं भेर खुलको क्यों नहीं देखते ॥१९॥ अथवा कया सवने मिलकर यह बात साधी है भेरा कुक &
| नष्ट क्र दिया रँ वन्ध्या क्यों न हुई भेरा गभ॑ क्यों नहीं शिर गया॥२०॥ अथवा भँ या यह एत्रीही क्यों न मरगदं अथवा हमको आकाशे &
गक्षसोने श्योंनखा लिया॥ २१ ॥ भँ अभीतेरा शिर छेदन कर दृगी, कठेवरसे क्या कगी, तुश्च छोडकर मँ कहां जाऊँ सेद
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॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युकत्वापतिता सा च मेना भूमौ विमिता ॥ व्याला शोकरोषाचेनं गता भतैसत्निधौ ॥ २३ ॥ हाहाकारो
महानात्तसीस्मिन्काठे खुनी~वर ॥ सवं समा गतास्तज कमात्तत्सत्निधौ सुराः ॥.२४ ॥ पुरादेवशने चाहमागतस्तु स्वयं
तदा ॥ मां दश्वा त्वं वचस्ता वे प्रावोच ऋषिसत्तम ॥ २५ ॥ नारद उवाच ॥ यथार्थ संद्र शूपं ना ज्ञातं ते शिवस्य वै ॥
रीख्येदं धृतं रूपं न यथाथ शिवेन च ॥ २६ ॥ तस्मात्क्रोधम्परित्यञ्य स्वस्था भव पतित्रते ॥ काय्यं रू इटं त्यक्त्वा
शिवां देहि शिवाय च ॥ २७ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तदाकण्यं वचस्ते सा मेना त्वां वाक्यमब्रवीत् ॥ उत्तिषठेतो गच्छ दूरं दुष्टा
धमवरो भवान् ॥ २८॥ इत्युक्ते तु तया देव इन्द्रायाः सकलाःकरमात् ॥ समागत्य च दिक्पाखा वचनं चेदमश्ुवन् ॥ २९ ॥
॥ देवा उचुः ॥ हे मेने पित्रकन्ये दि श्रण्वस्मद्रचनस्युदा ॥ अय वें परमः साक्षाच्छिवः परस्ुखावहः ॥ ३० ॥ कृपया च
भवत्पुत्यास्तपो दष्ठातिदुस्सहम् ॥ दशनं दत्तवाञ्छम्युर्वरंसद्धक्तवत्सरः ॥ ३१॥
॥ २७ ॥ ब्रह्लाजी बोरे यह वचन सुनकर मेना तुमसे कहने ठगी तुम बडे दृष्ट ओर अधम हो यासे उठकर इर चरे जाओ ॥ २८ ॥ जवं
उस्ने दसा कहा तव कमसे दंद्रादिक सव देवता तथा दिक्पाङ भी आकृर इस पकारके वचन बो ॥ २९ ॥ देवता बो हे मेना ! हे पितृ
कन्था तुम हमारे वचन चुनो, यह् साक्षात् परम शिब दूसरोको सुख देनेवाठे है ॥ ३० ॥ तुम्हारी ऽत्रीका दुष्कर तप देखकर वह सदभकत
वत्सर परम कृपासे उसको वर देते हए ॥ २३१ ॥
१२९६
कि, भेरा जीवन नष्ट होगया ॥ २२ ॥ ब्ह्याजी बोे एसा कहकर भेना सूच्छित हो पृथ्वीम गिर पडी ओर शोक रोषसे व्याकुल हो अपने
स्वामीके समीप भीन गह ॥ २३॥ हे उनीश्वर ! उस समय बडा हाहाकार भच गया ओौर फिर रमसे सब देवता उसके समीप / ह
२४ ॥ हे सने ! पहठे मेँ स्वयंही उसके समीप गया हे ऋषिश्रेष्ठ ! क्षे देखकर तुम उससे इस भ्रकारके वचन बोरे ॥ २५ ॥ नारदजी ट
बोठे हे मेना ! तुमने शिवजीका यथाथ सुन्दर रूप नहीं देखा है यह इन्होने रीलाके निमित्त रष धारण किया है, यथाथमे शंकरका |
हप नहीं है ॥ २६ ॥ हे पतिवते ! इस कारण कोधको छोडकर सावधान हो हढको छोडकर कायं करो, ओौर पार्वती शंकरको प्रदान करो ट
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॥२९६॥
र्सु.
पा.सं.३
अ०४४
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ब्रह्माजी बोठे तब मेना वारंवार विाप करती हुईं देवता ओसि
कारण तुम सब देवता मिलकर भरपंच करके इस भेरी त्रीके रूपको
कहा तब वे सव वशिष्ठ आदि ऋषि आकर मेनासे कहने ठ
हम यहां कायं साधन करनेको प्राप्त हुए है इस अथे हम किं
परम लाभ है जो तुमको शकरका दशन हुआ ओर वह दानप
॥ बह्मोवाच् ॥ अथोवाच सरान्मेना विलम्याति खहुहः ॥ न देया तु मया कन्या गिरिशायोग्हपिणे ॥ ३२ ॥ किमधन्त
मवन्तश्च सवे देवाः प्रपिता ॥ रूपमस्याः परत्राम म्यथींकतै स्तः ॥.३३॥ इत्युक्ते च तया त्न ऋषयस्सप एव हि ॥
उचुस्ते वच आगत्य वसिष्ठा्ा खनीशवर ॥ ३४ ॥ सपतयः चः ॥ काय्यं साध्यितुम्ध्ाप्ताः पितकन्ये गिरिप्रिय ॥ विरु
चा उक्तां कथम्मन्यामहे वयम् ॥ ३९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अयं वे परमो लाभो दशनं शंकरस्य यत् ॥ द्नपा्न स ते भूत्वा
गतस्तव च मंदिरम् ॥ ३६ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्त्वा तेस्ततो मेना निवाक्यं शृषाकरोत् ॥ प्रत्युवाच च रुष्टा सा
तानृषीज्ज्ञानदुवला ॥ ३७ ॥ मेनोवाच ॥ शब्लयैघौतयिःष्येहं न हास्ये शंकरायताय् ॥ दूरं गच्छत सर्वेहि नागन्तन्य
मदन्तिके ॥ ३८॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्त्वा विररामा्चु सा बिर्प्यातिविह्वला ॥ हाहाकारो. महानासीत्त्र तद्वृतततो छने
॥ ३९ ॥ ततो हिमा्यस्तजाजगामातिसमाङुरः ॥ ताञ्च बोधयितुं प्रीत्या प्राह तत्त्वञ्च दशयन् ॥ ४० ॥
सुनकर भी मेनाने ऋषियोके वचनोको व्यथं कर दिया ओर वह उषु ज्ञानवारी रुष्ट होकर उन कषियोि कहने ठगी ॥ ३७ ॥ मेना
है बौरी म शच्लादिसे घात कर दामी परन्तु शंकरके निभित्त पार्ैतीको न दूगी तुम सव द्र हो जाओ आजे कभी मेरे समीप न
आना ॥ ३८ ॥ ब्रह्माजी बोरे इस प्रकार कहकर षेना व्याकुल हो भौन रह गहं, हे सने ! उस्र समय इत वृत्तांतसे वहां महा हाहाकार
मच गया ॥ ३९ ॥ तब इस वृ्तातको सुनकर भेनाको सज्ञान के निमि स्वयं हिमाख्य आये ओौर श्रीतिसे तत्व दिखाते हए बोटे
कोटी, उगरहपी शीकरे निमित्त मँ अपनी कन्या नहीं दूगी ॥ २२॥ कि
को उं करनेको उदयत हए. हो ॥ ३३ ॥ हे स॒नीश्वर ¡ जब मेनानं ठेसरा
गे ॥ ३४ ॥ सप्तिं बोरे हे पितृकन्ये ! है गिरिराजकी प्यारी !
सी पभ्रकार विरुद्ध नहीं भान सकते ॥ ३५॥ ब्रह्माजी बटे यही
त्र होकर स्वयं तुम्हारे मंदिरे आये ॥ ३६ ॥ बह्लाजी बोटे यह
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४० ॥ हिमाख्य बोठे, भेना ! तू मेरे वचन सुन, किस कारसे तू व्याकुठ है घरमे कौन २ आये है, तुम उनकी निदा क्यों करती हो ||
४१॥ तू शकरको नही जानती, उनका रप देलकरही व्याकुढ होगई है उनके विकट रप इ कारण जानती ह कि वह अनेकं
हप धारण करते है ॥ ४२॥ सवके पाठन करनेवारे शंकरको म जानता हूं, यह पज्योके भी पूज्य सवके कतां निग्रह ओर ¦
समथ है ॥ ४३॥ हे पापरदहित प्राणप्रिये ! हढ मत कर दुःखको त्यागो, उढो ओर शीघतासे कायं करो, हे सुन्दर वतवाटी.! ॥ ४४ ॥ ¢
हिमालय उवाच ॥ शृणु मेने वचो मेऽद्य विकलाऽसि कथम्प्रिये ॥ के के समागता गेहं कथं चैतान्विनिन्दसि ॥ ४१ ॥
शंकरं त्वं च जानासि शूप दृष्टासि विहला ॥ विकटं तस्य शंभोस्तु नानाङूपाभिधस्य दि ॥ ४२ ॥ स शंकरो मया ज्ञात 4
स्सवषा प्रतिपाकः ॥ पूज्यानां पूज्य एवासौ कतवुग्रहनिग्रंहान् ॥ ४३ ॥ हठं न रू मुञ्च त्वं दुःखं प्राणप्रियेऽनघे ॥ ¢
उत्तिषठारं तथा कार्यं करमर्हसि सुत्रते ॥ ४४ ॥ यद्रे द्वारगतश्शंथुः पुरा विकटरूपधृक् ॥ नानालीलाञ् कृतवाञचेतयामि |¢
च तामिमाम् ॥ ५ ॥ तन्माहात्म्यं षरं दृष्टा कन्यां दातु त्वया मया .॥ अंगीकृत तदा देवि तत्पामणं करू प्रिये ॥ ७६ ॥ |
ब्रह्मोवाच॥इत्युक्का सोऽद्वि नाथो हि विरराम ततो ञुने ॥ तदाकण्यं शिवामाता मेनोवाच हिमाख्यम् ॥ ७७ ॥ मेनोवाच ॥ ट
मद्वचः श्रूयतां नाथ तथा करती त्वमसि ॥ गृदीत्वा तच॒जां चैनां बद्ध्वा कण्ठे तु पार्वतीम् ॥ ७८ ॥ ¢
जो शिवजी विकटशूप धारण कर दवार पर आये है तो उन्होने नाना लीला कौ ई, कि भँ मेनाकी खिजाऊं ॥ ४५ ॥ उनका परम माहात्म्य ||
देखकर तेने ओर मेने कन्यादान करना अगीकार किया, हे श्रिये ! उसको भ्णाम करो ॥ ४६ ॥ ब्रह्माजी नटे रेता कहकर हिमाख्य मौन ¢
हुए, यह सुनकर पाकी माता मेना हिमाल्यसे बोी ॥ ४७॥ ह नाथ तुम भरे बचन घनो ओर वैशाही करनेको तुम योग्य हो इस
अपनी कन्या पारव॑तीको टेकर ओर उसके कंठमे बांधकर ॥ ४८ ॥
१ तुल्नन्सत्वन्नलोकेति निषेधः । <
न~~ ~
शि०घु° || || निश्टौक होकर नीचे गिरादो म शंकरके निमित पार्वती नहीं दूगी अथवा हे नाथ! इस कन्पाको ठ जाकर सणम॥४९॥दयारहित होकर इवा द | £
॥ || इती हो, ओर यदि दुम पिकट्खलवाठे शंकर निभि पार्वती दो तो ह स्वामिन् ! भं निभ्ययहौ कलवर त्याग कर दूगी॥५०॥बहाजी १४
| &||8्स भकारे भेनाने हते वचन के तव स्वयं आकर पार्वती मनोहर बचन कहने रूगी॥५१॥ पावती बोरी हे माताजी! तुम्हारी शोमन इदि इ
¢| विपरीत कत होगई म धमकी सत्न रोमाली पर्क कते त्यागन करती हो॥५२।यह द्र परमम स्षात सबक दशर ओर समं ह, ठ
¢ अधः पातय निभ्शैकं दास्ये तांन हराय हि ॥ तथेनामथवा नाथ गत्वा वें सागरे सताम् ॥ ७९ ॥ निमनय दर्यांत्य ¢
|| क्त्वा ततोऽद्रीश सखी भव ॥ यदि दास्यसि पुरत्वं श्राय विकटात्मने ॥ तहिं त्यक्ष्याम्यहं स्वामित्निश्येन कलेबरम् ठ
४ ॥ ५० ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ते च तदा तज वचने मेनया दठात् ॥ उवाच वचन रम्य पावती स्वयमागता ॥५१॥ पाव्य ¢
वाच ॥ २.;तस्ते विपरीता हि बुद्धिजांताऽञ्चुभावहा ॥ धमांवलम्बनाच्त्वं दि कथन्धमं जहासि वै॥ ५२॥ अयं शद्रोऽपर ¢
| स्साक्षात्सर्वप्रभव ईश्वरः ॥ शभ्भुस्सुखूपस्सुखदस्सर्व्चुतिषु वर्णितः ॥ ५२३ ॥ महेशश्शं कराय सवेदेवप्रभुस्स्वरार् ॥ नाना ए
ट हपाभिधो मातदरिबक्नादिसेवितः॥ ५४ ॥ अधिष्ठानं च सवषां कतौ हतां च स श्रथुः ॥ निविंकारी वरिदेवेशो ह्यविनाशी ||
|| सनातनः ॥ ५५ ॥ यदथ देवतास्स्वां आयाता किकरीकृताः ॥ द्वारि ते सोत्सवाश्चा्य किमतोऽन्यत्परं सुखम् ॥ ५६ ॥ ||
&|| उन्तिषठातः प्रयत्नेन जीवितं सफलं कङ् ॥ देहि मां त्वं शिवायास्मे स्वाश्रमं कर सार्थकम् ॥ ५७ ॥ |
४ शिवजीका सुखदायक रूप सब शारभं वणन किया गया है ॥५३॥ यह महेश्वर शंकर सवके प्रु स्वराट् है हे माता! यह हरि ओर बह्म सेवित ||
अनेक भकारे रूप धारण करनेवाठे हँ ॥ ५४ ॥ यही सबके हतां कतां ओर अधिष्ठान है, बह निविंकारी त्रिदेवताओके ईश्वर सनातन आवि ||
है | नाशी है ॥ ५५॥ जिनके निमित्त सब देवता दासरूप होकर भ्रा हुए ह ओर तुम्हारे दारपर इतत समय सवका उत्सव है इतसे विरोष ओर कया ||
‰॥ एल होगा ॥ ५६ ॥ इससे भ्रयतन् पूर्वक उदो ओर अपने जीकनको सफठ करो ओर सुज्ञे शंकरको देकर अपना गृहस्थाश्रम सफ़र करो ॥ ५७ ॥
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मातः ¡ तुम शका छोडकर सञ्ञे परमेशके निमित्त दीजिये हे मातः] जो म कहती हूं इक्ष विनतको तुम स्वीकार करो ॥ ५८ ॥ |
| स्षे न दोगी तो मै दृषतरोको वरण नहीं करूंगी सिंहके भागको परवंचक शगार कैसे प्राप्त कर सकता है ॥ ५९ ॥ हे मातः ! मेँ
मन वचन करमसे शकरको इृटतासे वरण कर चुकी हू, अव जो तुम्हारी इच्छाहो सो करो ॥ ६० ॥ बरक्लाजी बोे शेश्वर भरिया |
इस प्रकारसे शिवाके वचन सुनकर बहुत विलाप कर महा कद्ध हो पार्व॑तीको अरहणकर ॥ ६१ ॥ यही पहुचोषे एत्रीको ताडन करने ठगी
देहि मां परमेशाय शंकराय जनन्यो ॥ स्वीङ्ुर् त्वमिमं मातविनयस्मे त्रवीमि ते ॥ ५८ ॥ चेत्र दास्यसि तस्मे मां न वृणेऽ
न्यमहं वरम् ॥ भागं लमेत्कथं सेहे श्रगारः परवंचकः ॥ ५९ ॥ मनसा वचसा मातः कर्णणा च हरस्स्वयम् ॥ मया
वृतो वृतश्चेव यदिच्छसि तथा ङुङ् ॥ &० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकर्ण्यं शिवावाक्यं मेना शेलेश्वरभरिया ॥ खविरूप्य महा
कुद्धा गरदीत्वा तत्करेवरम् ॥ ६१ ॥ प॒ष्टिभिःकर्रेथेव दन्तान्पर्षयती च सा ॥ ताडयामास तां पुत्रीं विहटखातिशूषान्विता
॥६२॥ ये तर ऋषयस्तात त्वदाय्याश्चापरे घुने ॥ तद्धस्तात्ताम्परिच्छिय निन्युदरतरं ततः ॥ ६३ ॥ तान्वै तथा विधा
दुष्टां मदवतीं शिवाम् ॥ _दास्याम्यस्ये गरन्तीनर कूपे क्प्स्यामि वा धुवम् ॥ &५॥ छेत्स्यामि कालीमथवा शब्रा
रिखण्डशः ॥ निमनयिष्ये वा सिन्धौ स्वस॒ताम्पावैतीं खलु ॥ && ॥
ओर व्याकु तथा रोषकर दति ताडन करने ठगी ॥ &२॥ है तात ! है खने ! तुमको आदि ठेकर जो दूसरे ऋषि वहां वियमान थे
उस मेनके हाथसे त्रीको छीनकर दूर ठे गये ॥ ६३ ॥ इस भरकार उन ऋषि्योको देखकर बारंबार फटकारती ओर उनसे बारंबार दुर्वचन
कहने ठगी ॥ ६४ ॥ मेना बोढी म भब क्या करं इस दुष्ट आगरह्वाटी शिधाको यातो भे कूपे डर दगी या विष दे दूगी ॥ ६५ ॥
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¢ न्दष्टा भत्संयित्वा पुनः पुनः ॥ उवाचश्रावयन्ती सा दुवंचोनिखिलान्पुनः॥ &४ ॥ मेनोवाच ॥ कि मेना हि करिष्येऽहं
अथवा बडे शश्च अञ्चि इसको खण्डसण्ड कर डह्गी अथवा इस अपनी कन्या पार्वतीको सषुद्रमे डर दगी ॥ ६६ ॥
शि०५०|,,, अथवा पै निष्वय अपना शरीर त्याग कर दृमी पर विकटहपी शकरको अपनी कन्या नही दूगी ॥ ६७॥ इस दुटाे कैसे भयेकर बरकी 4
॥२९.८॥ ४ किया है, मेरा गिरिराजका ओर इस लका उपहस्त कराया ॥६८॥ इन शंकरे माता पिता भाई बन्ध गोत्र रूप् चातुस्य वा पर कुष्ट भी 7 ट
ह ॥ ६९ ॥ वज्ञ टकार बा सहायक इनके कोई भी नहीं है न सुन्दर सवारी न कु 4 ही है ॥ ७: ॥ इनमे पवित्रता विया कृ म। नहीं ६ |©
॥ ब्रह्माजी बोले हे खने ! मेना इस पकारे कक^ ||!
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|
शरीर सेखनेते मी कैसा दुभ होता है मै कया देखकर सुमगरी ऽतर इनको दे सकती ट ॥७१। ह गस्
अथवा स्वशरीरं हि त्यक्ष्याम्याश्वन्यथा धुवम् ॥ न _दास्ये शम्भवे कन्यां दुर्गो विकटशूपिणे ॥ &७ ॥ वरोऽयं कीदशो
मीमोऽनया लब्धश्च दुष्टया ॥ कारितश्ोपहासो मे गिरेशवापि कटस्य हि॥६८॥न माता न पिता ्रातान बन्धु्गौ
अजोऽपि हि ॥ नो सुप न चातुय्यै न गुहं वास्य किंचन ॥ ६९ ॥ न व्ल न प
वाहनं न इभ द्यस्य न वयो न धनन्तथा ॥ ७० ॥ न पाविन्य न विद्या च कीदशः काय आतिदः ॥ 1 विलोक्य मया
वी देयास्मै स्यात्सुमेगखा ॥ ७१ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्यादि खविरुप्याथ् बहुशो मेनका तदा ॥ रूरोदोबेषने सा हि
दुःखशोकपरिष्टुता ॥ ७२ ॥ अथाहन्द्रुतमागत्याकथयम्मेनकां च ताम्॥ शिवतत्त्वं च परमे ङक्ञानदरसुत्तमम् ॥ ७२ ॥
ब्रह्मोवाच ॥ श्रोतव्यम्प्रीतितो मेने सदीयं वचनं शुभम् ॥ यस्य श्रवणतः प्रीत्या कुडुद्धिस्ते विनश्यति ॥ ७९ ॥ शङ्करो
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1प्यलङ्लारास्षहायाः केऽपि तस्य न ॥ #
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†{ भता हर्ता तथे न त्वं जानासि तदरूपं कथन्दुःखं समीहसे ॥ ७५ ॥ अनेकूपनामा च नाना लीटलाकरः ४
जगतः कतां भतां हता तथव च ॥
+
९०१: ||| प्रथुः ॥ सू्वस्वामी स्वतन्बश्च मायाधीशोऽविकलपकः ॥ ७६ ॥
पा.स.8 बडे ऊचे स्वरसे रोने छी ओर विलाप करने रगी ॥ ७२॥ तव मेने शीघरतासे जाकर मेनाते अज्नानका हरनेवाटा परम शिवतत्व आकर वर्णन
अ०४५ किया ॥ ७३ ॥ ब्रह्माजी बो हे मेना ! मेरे सुन्दर वचन रेमे सुनो जिनके भ्रवण कृरनेसे तेरी कुबुद्धि नष्ट हो जायगी ॥ ७१ ॥ यह शंकर
हो ॥७५॥ यह प्रभु अनेक ठीठा करनेवाठे ||
त
जगतके कतपे हती ओर विधादाता है तुम इनके हपको न जानकर ही इस प्रकारसे विराप करती
| देदो ओर सब कार्यके नाश करने वाे इस् कुठ ओर अनज्ञानको त्यागन करो ॥ ७७॥ ब्रह्माजी बोठे हे सुने ! जब भने |
कृहा तो मेना वारंवार विढाप करती हई शनैः शनैः छज्जाको त्याग करक मुञ्षसे कहने ठगी ॥ ७८ ॥ मेना बोडी हे भगवनु ! किम
निमित्त आप इस मे एत्रीके महाश्रष्ठ शूपको व्यथे करते हो यदि पेष्ठाही है तो इस्तको मार क्यों नहीं डाकते ॥ ७९ ॥ यह तो आप
कहो ही मत कि शिबकै निमित्त कन्या दे दो, अपनी पराणप्यारी सरुताको म शकरके निमित्त नहीं दंगी ॥ <° ॥ बह्लाजी बोटे हे
इति विज्ञाय मेने त्वं शिवान्देहि शिवाय वें ॥ कुहटन्त्यज ङुज्ञानं सर्वकार्यविनाशनम् ॥ ७७ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता
| ` अनेकं रूप ओर नामवाटे हैँ सबके स्वामी स्वतंत्र मायके अधीश्वर विकल्परहित है ॥ ७६ ॥ हे मेना ! एसा जानकर तुम शंकरकै निभित्त
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|| सा मया मेना विलपन्ती सुहु्डुः ॥ ललनां किंचिच्छनेस्त्यकत्वा घने मां वाक्यमव्रवीतन ॥ ७८ ॥ मेनोवाच ॥ किमर्थन्तु ||
£| मवान्त्रहम रूपमस्य महावरम् ॥ व्यर्थीकरोति किमियं हन्यतां न स्वयं शिवा ॥ ७९॥ न: वक्तव्यं च भवता शिवाय प्रतिदी |£
ं यताम् ॥ न दास्येऽहं शिवायेनां स्वसुताम्भ्राणवछभाम् ॥ ८० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ते तु तदा सिद्धाः सनकाया सहाशने ॥ ठ
समागत्य महाप्रीत्या वचनं दीद्म्वन् ॥ ८१ ॥ सिद्धा उचुः ॥ अयम्बै परमस्साक्षाच्छिवः प्रसखावदः ॥ कृषया च
¢ भवतपुत्ये दशेनन्द्तवान्प्रथुः ॥ ८२ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथोवाच तु तान्मेना विरुप्य च शह ॥ न देया तु मया ६
सम्यग्गिरिशायोग्ररूपिण ॥ ८२ ॥ किमर्थन्तु भवन्तश्च सरवे सिद्धाः प्रपञिनः ॥ हपमस्याः परं नाम व्यर्थीकर्त सश्रुयताः ॥५
¢ ॥ ८४ ॥ इत्युक्तं च तया तन्न सुनेऽदं चकिंतोऽभवम् ॥ सवें विस्मयमापन्ना देवंसिद्धाषिंमानवाः ॥ ८५ ॥ &
महासने ! दस भकार कहने पर भनकादि सिद्धजन आकर महा भरीतिसे इस भ्रकारकै वचन कहने कगे ॥ ८१ ॥ सिद्ध नोडे यह दूसरोके शख £
& || देनेवाङे भगवान् शकर प्रम शिव है तुम्हारी पत्रीपर रूपा करके इन पभुने दशन दिया है ॥ <२ ॥ बह्लाजी बोरे तन मेनाने बारवार &
|| विापकर उनसे भी यही कहा कि भ उग्रहपवाठे शंकृरको अपनी कन्या नही दंगी ॥ <३ ॥ तुम सव सिदध पंच करके क्यों भेरी ५
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तरीके रूपको व्यथ करनेको उयत हुए हो ॥ ८४ ॥ हे सने ! जब उसने दसा कहा तब भँ चकित हो गया ओर देव सिद ऋषिं तथा
१२७
~ ५२५
शि ७यु6
॥२९९॥
रुसं. २
पा.खं.३
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मनुष्य सबही विस्मयको प्राप हुए ॥ ८५ ॥ इसी समय मेनाकी इढ महान् ह
बहकुठ है ॥ ८७ ॥ वैतेही तुम्हारे सहायकं है खोकमे त॒म धन्य हो इसमे विशेष यँ क्या कहूं तुम धमकी आधार होकर
त्याग करती हो ॥ <£ ॥ देवता कषि बह्लाजी तथा मे यह सब
एतस्मिन्समये तस्या इं त्वा दं महत् ॥ दतं शिवप्रियो विष्णुस्समागत्याऽ्वीदिदम् ॥ ८8 ॥ विष्णुरवाच ॥ पितृणां
च प्रिया पुरी मानसी णसंयुता॥ पत्नी हिमवतस्षाक्षाद्रह्मण्ः कख्य॒त्तममू ॥८७॥ सहायास्ताद्शा लोके धन्या हयसि वदामि
किम् ॥ धू्म्याधारभूतासिकथं धर्म जहासि हि ॥८८॥ देवैश्च ऋषिभि बरह्मणा वा मया त॒था ॥ विर्ं कथ्यतेरि च
त्वयैव सुप्रिचाय॑ताम् ॥ ८९ ॥ शिवत्वं न च जानासि नियैणस्यगुणस्स हि ॥ विह्पस्स सुरूपो हि सर्वसेव्यश्सतां गतिः
॥ ९० ॥ तेनैव निर्मिता देवी मूरभकृतिरीश्वरी ॥ तत्पाश्वै च तदा तेन निितः पुरूषोत्तमः ॥ ९१ ध ॥ ताभ्यां चाहं तथा ब्रह्मा
ततः युणपतः ॥ अवतीय स्वयं रुद्रो लोकानां हितकारकः ॥ ९२ ॥ ततो वेदास्तथा देवा यत्किचिदश्यते जगत् ॥ स्था
तुरं जंगमंचैव तत्सर्व शंकरादभत् ॥ ९३ ॥ तद्रूपम्वणितं केन ज्ञायते केन वा पुनः ॥ मया च ब्रह्मणा यस्य द्यतो ठन्धश्च
नेव हि ॥ ९४ ॥ आत्रह्मस्तम्बपर्थतं यतिकििदश्यते जगत् ॥ तत्सवं च शिवं विद्धि नार कायां विचारणा ॥ ९५ ॥
# वरी यह देशी इन्होने ही निर्माण की है उहीके पार्श्वम इन्होने परुषोत्तसको निर्माण किया है ॥ ९१ ॥ उन्हीं भक्ति परुषे मँ तथा ब्रह्माजी
¢ हुए है, ओर ठोकोपर हित करनेकी इच्छासे सराणरूपसे सदर स्वयं भरगट हए हँ ॥ ९२ ॥ इनके उपशान्त वेद तथा देवता स्थावर जंगम
गह जो कुछ जगत् दीखता है सब शकरसे हुभआ ३ ॥ ९३ ॥ उनका रूप कौन वर्णन कर प्तकता ओर जान सकता है, मेँ ओर बह्मातक
जिसको नहीं जान सक्ते ॥ ९४ ॥ ब्रह्मासे ङेकर स्तम्बपर्मन्त जो कुछ जगत् दीखता है वह सबही शिवहूप जानो, इसमें विचारकी ॥2
सुनकर शिवके मय विष्ण॒जी वहां आकर इत प्रकारके
न > उत्तम
6 विष्यजी बो पिलगणो नसी पुत्री अनेक यणोसे युक्त हो साक्षात् हिमाचखकी पत्नी हो तुम्हारा <.
वचन बोडे ॥ ८६ ॥ विष्णजी बोडे पितृगणोंकी तुम प्यारी मानसी ९ किस प्रकार धको
किरु ही कहते है भला तुम इतना तो विचारो ॥ ८९ ॥
दम निरयण यण प शिवतसको नहीं जानती हो यह स्रुषोकी गति विप भौर सुरूप होकर भी सवके सेवनीय है ॥ ५० ॥ मूढ भरति
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आवश्यकता नहीं ॥१५॥ वही इस प्रकारक स्वहपमे अपनी ठीठासे उत्पन्न हए है, पावैतीके तप प्रभावसेही तुम्हारे द्वारपर आये ह ॥९६॥
हिमाख्यकी पत्नी! इस कारण तुम इुःखको छोडकर शिवजीका भजन करो रेका करनेसे महाआनंद होगा ओर शका भी नाश होगा॥९७॥बह्लाजी
\ बोठे हे सने! जब विष्णुजीने इस भरकारसे मेनाको समञ्ञाया तब मेनाका चित्त कुठेकं कोमल हुआ ॥९८॥ परंतु शिवको कन्या न देनेकी हठ उसे न्
छोडी, कारण किं वह उत्त समय शिक्की मायासे मोहित होरही थी॥९९॥ गिरिप्रिया, पाैतीकी माता मेना विष्णजीके मनोहर वचन सुनकर कुक
¢ स एवेदक्सुहूपेणावतीर्णो निजटीख्या॥ शिवातपः प्रभावाद्धि तव द्वारि समागतः ॥९६॥ तस्मात्वं हिमवत्पतिन दुःखं यु शिव
#|| म्भज ॥ भविष्यति महानन्दः शो यास्यति संक्यम्॥९७॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवम्भवोधितायास्तु मेनकाया अथेनघुने ॥ तस्यास्तु
£ कोमलं किचिन्मनो विष्णुपर्ोधितम्॥ ९८ ॥ परं हट न तत्याज कन्यान्दातुं इरायन ॥ स्वीचकारतदा मेना शिवमायातिमोहि
/ ता ॥९९॥ उवाच च हरिं मेना किञ्चिदबुदधा गिरिप्रिया ॥ श॒त्वा विष्णुवचो रम्यं गिरिजाजननी हि सा॥१. ०॥ यदि रम्यतय॒स्स
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स्यात्तदा देया मया खता ॥ नान्यथा कोटिशो यत्ैर्वरिमि सत्यन्टदटं वचः॥१०१॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता वचनं मेना तूष्णीमास
दटत्रता ॥ शिबेच्छाप्रेरिता धन्या तथा याखिरमोहिनी ॥१०२॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुदरसंहितायां त॒तीये पार्वती
खण्डे मेनाप्रबोधवर्णनो नाम चतुश्वत्व रिशोऽध्यायः ॥४७॥ ब्रह्मोवाच ॥ एतस्मिन्नन्तरे त्वं हि विष्णुनापेरितो दतम् ॥ अनुकूल
यितु शंभुमयास्तत्निकटे ने॥१॥ ततर गत्वा स वै श्रो भवता सुप्रगोधितः।॥ स्तोतर्नानाविधेस्स्तुत्वा देवकायंचिकीर्षया ॥२॥
रोषसे बोटी॥१० ०॥यदि शकरका शरीर मनोहर होजाथ तो भँ अपनी कन्या शकरको दे सकती हं नहीं तो कोटि यल करो भँ कन्या शंकरको नही
गी यह भरा सत्य ओर दृद वचन है॥१०१। हाजी बोठे इ भ्कारसे धन्य् ओर ृढबत्वाटी भेना शिवकी जगत् मोहनेषाटी मायात भरित हो यह
वचन कह मौन हृदं ॥१०२॥ इति श्रीशिवराणमाषाटीकायां श्रसंहितान्तगेततृतीये पाव॑तीखण्डे भेनाप्रबोधो नाम चतुतरारिशोऽध्यायः ॥ ४४॥
बहलाजी बो इसी अव्तरमे तुम विष्णजीपे परित हो शीघतासे शिदजीके प्रसन्न करनेको उनकै समीप गये ॥१॥ वहां जाकर आपने रको समञ्ञाया
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॥३००॥
मी अधिक सुन्दर
आये जहां मेना स्थित थी ॥ ५ ॥ हे खने ! तुम प्रसन्नता जाकर , मैनाक] |
अत्वा त्वद्वचनं प्रीत्या शुना धृतमद्धतम्॥ स्वरूपशत्तमन्दिव्यं कृषात्वं चदाशतम्॥ ३॥तदृष्ा सुन्दरं शम्धुं स्वह्पम्मन्मथा
धिकम्॥ अत्यृष्यो सुने त्वं हि लावण्यपरमायनम् ॥ ९ ॥ स्तोतरनानाविधेस्स्तुत्वा परमानन्द सयुतः॥ आगच्छत इत तत
य॒त मेना स्थिताखिलैः ॥ ५ ॥ तत्रागत्य सुप्रसन्नो शनेऽतिप्रमसंकुलः ॥ हर्षयंस्तां शेकपत्नीं मेनान्त्वं वाक्यमव्रवीः ॥ & ॥
नारद उवाच ॥ मेने पश्य विशालाक्षि शिवदहूपमुत्तमम् ॥ कृता शिवेन तेनैव सुकृषा कर्णात्मना॥ ७ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ श्रुत्वा
सा तद्वचो मेना विस्मिता शेककामिनी ॥ ददशं शिवशूपन्तत्परमानन्ददायकस्॥ < ॥ कोटिसूर्यपरतीकाशं सर्वावयवसुन्दरम् ॥
विचि्वसनं चाज नानाभूषणभूषितम् ॥ ९॥ सुमत खास च्चलावण्यं मनोहेरम्॥ गौराभ हुतिसंग्तं चन्दररखाविभेषितम्
॥ १०॥ सवैदैवगणैः प्रीत्या विष्ण्वायैस्सेवितं तथा ॥ सूर्येण च्छतितं मूध्नि चन्द्रेण च विशोमितम् ॥ ११ ॥
इस प्रकारसे बोरे ॥ ६ ॥ नारदजी बोडे; हे मेना ! हे विशाक नेत्रवाटी ! # तुम शिवजीका अद्भुत रूप देखो जो करुणामय शंकरने
तुमपर बडी कपाकर धारण किया है ॥ ७ ॥ ब्रह्माजी बोठे शैखकाभिनी मेना यह वचन सुनते ही विस्मित होकर परम आनन्द देनेवाठे
उन शिवजीके पको देखने ठगी ॥ ८ ॥ कोटि सूर्यके समान कांतिमान् सम्पूण अवयवोते धन्द्र ॒विचित्र वज्ञ ओर अनेक भकारके
भूषण धारण किये ॥ ९ ॥ सुन्दर भ्सननतासे युक्त खावण्यतासे मनोहर गौरषकांति, चनद्रशेखरते विभूषित ॥ १० ॥ विष्णभादि पव देवता
१ विज्ञा नेत्रवालो कहनेका भाव यह् किः आज जञंकरका दजन करके इनक। विशालता सार्थक हुई ।
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ओर देवा करनेकी इच्छात अनक भकारके स्तोत्रस स्तुति की ॥ २ ॥ दहरे यहं वचन नकर उषा ता दिखा श (1
बडा दिव्य ओर अद्धतरूप. दिखाया ॥ ३ ॥ इस भकारे कामदेव शिवजीका हप देखकर तथा दृत्षरकि मान चर
करनेवाडा लावण्य देख कर तुम बडे भसन्न हए ॥ ४ ॥ परमानन्दते संयुक्त हौकर अन
नेक प्रकारके स्तोरोसि स्तुति करके हे सने ! तुम वहां
ओर प्रेमे वहां जाकर ओौर गिरिराजपत्नी भेनाको भसन्न करते हृए
|
ं होनेसे मनोहर थे, ओर वाहनकी जो शोभा थी वह किसे वणेन् नहीं हो सकती ॥ १२ ॥ गंगा ओर यञ्ुनाने उस समय उनपर
चमर धारण किये है, आं भिदि उनके आगे नृत्य कर रही ह ॥ १३ ॥ मेँ विष्यजी तथा इन्द्रादि सब देवता अपने अपने सुन्द्र वेष
सजाकर गिरीशके आचारसे संयुक्तं दै ॥ १४ ॥ ओौर शिवजीके गण उस्र सभय जय जय उचारण कर रहे है, ओर अनेकं प्रकारके गहने
पहरे बडे आनन्दसे गिरीशके आगे चर रहे है ॥ १५ ॥ सिद्ध उपदेवता तथा खनि महामंगरपे तथा दूरे जन भी बडे प्रेमसे शिवजीकै
सर्वथारमणीय च भूषितस्य ति वाहनस्य महाशोभा वणितं नैव शक्यते ॥ १२॥ गंगा च युना चैव विधत्तः स्म ए
सुचामरे ॥ सिद्धयोऽ्ौ पुरस्तस्य कुर्वन्ति स्म सुनर्तनम् ॥ १३ ॥ मया चैव तदा विष्णुरिनद्राया ह्यमरास्तथा ॥ स्वं स्वं वेषं ट
सुसम्भूष्य गिरिशेनाचरन्य॒ताः॥ १४ ॥ तथा जयेति भाषन्तो नानारूपा गणास्तदा ॥ स्वलद्ङृतमहामोदा गिरीशपुरतोऽचरब् |£
॥ १९५ ॥ सिद्धाश्वोपसुरास्सवें ुनयअ ` मदासखाः ॥ यथुश्शिवेन सुप्रीतास्सकराश्चापरे तथा ॥ १६ ॥ एवन्देवादयस्सवं |©
कुतूदलसमन्विताः ॥ परं ब्रह्म॒ शृणन्तस्ते स्वपत्नीभिरलंछृताः॥ १७ ॥ विश्वावसुखुखास्तच श्यप्सरोगणसंयताः ॥ गाय ||@
न्तोप्यमर तस्तस्य परमं शाङ्करं यशः ॥ १८ ॥ इत्थं मरोत्सवस्तच बभ्रव मुनिसत्तम ॥ नानाविधो सहैशे रि शल्द्रारि ठ
च गच्छति ॥ १९ ॥ तररिमश्च समये तत्र सुषमा या परात्मनः ॥ वणितं तां विशेषेण कश्शक्रोति शनीश्वर ॥ २० ॥
तथाविधं च तन्टष्ा मेनाचित्रगता इव ॥ क्षणमासीत्ततः प्रीत्या पोवाच वचन शुने ॥ २१ ॥
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मसे जिनकी सेवा कर रहे शिरफे ऊपर सुन्दर छत्र ओौर चन्द्रमा विशेष हसे शोभायमान हो रहा है ॥ ११ ॥ सब प्रकार गहने (
आगे २ चु रहे है ॥ १६ ॥ इश भकारे सब देवता महाकोतूहलको प्राप होकर अपनी अपनी च्ियोको साथ दिये परनह्मकी स्तुति करते
है ॥ १७ ॥ विभ्वावसुको आदिङेकर समस्त गन्धवं सम्पूणं अप्तराओके समूहो साथ स्थि आगे आगे शेकरका प्रम यश गाते हृए
जा रहे है ॥.१८ ॥ हे खनिभरेष्ठ ! इत भकारे वहां परम महोत्सव हओ जिस समय भगवानु शकर शेकराजकै स्थानको चङे ॥ १९ ॥
उस समय जेसी परमात्मा शंकरकी शोभा थी) हे उनीश्वर ! विशेष रपे उसे कौन वणन कर सकता है ॥ २० ॥ इस प्रकारे
गन्ना ~ >>
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` उनको देखकर मेना चि्रछिखितके समान हो गई, हे एने ! क्षणमात्र स्थित होकर फिर वचन बोटी ॥ २ १ ॥ मेरी वी धन्य है जिसने
इस भकारकी तपस्या की है, हे महेशान ! जिसके प्रतापे तुम सचे पराप्त हए हो मेरे षर आये ॥ २२ ॥ भने जो पह शिवृजीकी महा
निन्दा की थ हे स्वामिन् ! उप्तको आप क्षमा करके अब भन्न हो जाये ॥ २३ ॥ बरहाजी बोठे वह् मेना इष॒ भकारते कहकर
ओर चन््रमौछिकी स्तुति करके हाथ जोढकर शेकमिया प्रम कनात युक्त हो गदे, ॥ २४ ॥ उतनेहमै अपने २ काको छोडकर अनक
विये भकर भार हई, वह बहुत्ी उरवासिनी शिवदशनकी लारुस्ासे आई ॥ २५ ॥ कोई मन्नन कर रही थी वह एक हाथमे चरणं ल्यि
मेनोवाच ॥ धन्या पुत्री मदीया च यया तप्तं महत्तपः ॥ यत्प्रभावान्मदेशान त्वं पराप्त इह मदशहे ॥२२॥ मया कृता रा या वै
शिवनिन्दा दुरत्यया ॥ तां क्षमस्व शिवास्वामिन्सुप्रसन्नो भवाधुना ॥ २३ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्थं सम्भाष्य सा भना संस्तूयेन्दु
ललाटकम् ॥ साभि प्रणता शैर्प्रिया लनापराऽभवत् ॥ २४ ॥ तावरिन्लयस्समाजग्बुषिंत्वा कामाननेकशः ॥ बह्यस्ताः
पुरवासिन्यश्शिवदर्शनलालसाः॥ २५ ॥ मननं कुर्वती काचित्तच्चरू्ण॑सदिता ययौ ॥ द्रष्टं कुतूहलाढया च शङ्करं गिरिजावरम्
॥ २६ ॥ काचितत स्वामिनस्सेवां सखीयुक्ता विहाय च ॥ सुचामरकरा प्रीत्यागच्छम्भोरदर्शनाय वै ॥ २७ ॥ काचित बारकं
हित्वा पिबन्तं स्तन्यमादरात्॥ अतप्त शङ्करन्द्रष्टं ययौ दशनलालसा॥२८॥ रशनां बधरती काचित्तयेव सहिता ययौ ॥ वक्षनंविप
रीतंवे धृत्वा काचिद्ययौ ततः॥२९॥ मोजनार्थ स्थितं कान्तं हित्वा काचिययौ प्रिया॥ ष्टुं शिवावरं्रीत्यासतष्णा सङतुहला३०॥
हुए ही कुतूहर्ते गिरिजावर शकरको देखनेके खयि चरीं ॥ २६ ॥ कोहं सशी सहित अपने स्वामीकी सेवा कर रही थी उने छोडकर हाथमं
चैदर लियिही पमे करके देखने चरी गईं ॥ २७ ॥ कोई आद्रसे स्तन पीते हुए अपने बाखकको छोडकर उसकी तृप्िका ध्यान न करके
दशेनकी लारुसासे शंकरके देखनेको गदं ॥ २८ ॥ कोई कौधनी बाध रही थी सो वैसेही उठकर चटी गदं, कोषं विपरीत वश्च धारण
शिण०पु०
॥३०१॥
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` पाखं.३
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क्ियिही चली गहे ॥ २९ ॥ कईं अपने स्वाभीफो भोजन करता हभ छोडकर चली गृहं शिव दू हके देखनेको उनकी तृष्णा ओर
^
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00 अ+ जय य+ 294
कतूहक बहुत वड गया था ॥ ३० ॥ कोई सी आंखे सुरमा गा रही थी एक . हाथमे सुरभेकी साद ल्म ही दूसरे नेमे विना /
¢ छगाये पार्वैतीके वरको देखनेकी इच्छसे चरी ॥ ३१ ॥ कोई शी परमे महावर ठगा. रही थी वहं बरातका शब्द सुनकर उस
छोडकर उठ दौडी ॥ ३२ ॥ इस प्रकारसे अपने बहुतसे घरके कामकाज छोडकर धिये चटीं ओर शिवजीके रूपको देखकर सब कोई भोहको
ए प्राप्त होगदईं ।॥ ३३ ॥ तब वे सव प्रेमे व्याकुर हो शिवदर्शनफ़ी इच्छा कर उनकी मूर्ति हृदयम धारण कर यह वचन बोरी ॥ ३४ ॥
४ ष्रवासिनी बोरी हिमार्यकै नगरम रहने वाठोकि ने सफल हूए जिस जिसने यह शंकरका रूप देखा उस उसका जन्म सफठ
# काचिद्धस्ते शाकां च ध्वांजनकरा प्रिया ॥ असित्वेकाक्षि सन्द्रष्टुं ययौ शलसुतावरम् ॥२१॥ काचिच्च कामिनी पादौ रज
यन्ती ह्यलक्तकैः ॥ त्वा घोषं च तदित्वा दशेनाथसुपागता ॥ ३२ ॥ इत्यादि विविध काय हित्वा वासं श्ियो यथुः॥ दष्टा
तु शांकर रूपं मोहं प्राप्तास्तदाऽभवन् ॥ ३६ ॥ ततस्ताः प्रेमसंविद्राश्शिवदशेनक्षिंताः ॥ निधाय इदि तन्मूतिं वचनं चेद
मह्वन् ॥ ३७.॥ पुरवासिन्य उचुः॥ नेजाणि सफलान्यासन्हिमवत्पुरवासिनाम् ॥ यो योऽपश्यद्दो रूपं तस्य वै सार्थकं जनुः
|| ॥३५॥ तस्यैव सफलं जन्म तस्येव सफलाः क्रियाः ॥ येन द्शशिवस्साकषत्सर्वपापभरणाशकः ॥३६॥ पात्या साधितं स
शिवार्थं यत्तपः कृतम् ॥ धन्येयं कृतकृत्येयं शिवा प्राप्य शिवम्पतिम् ॥ ३७ ॥ यदीदं युगलं ब्रह्मा न युंज्याच्छिवथोश्चुदा॥
ए तदा च सकलोऽप्यस्य श्रमो निष्फक तामियात् ॥ ३< ॥ सम्यक् कृतं तथा चाञ्र योजितं युग्मसुत्तमम् ॥ सवषां सार्थता
जाता स्वकार्थसखुद्धवा॥२९॥ विना तु तपसा शम्भोदैशैनं दुटमन्तृणाम्॥ दशनाच्छंकरस्यैव सवै याताः कृतार्थताम् ॥ ४० ॥
& || हो गया ॥ ३५ ॥ उसीका सफ जन्म ओर उसतीकी क्रिया कफ है जिसने सव पापके नाश करने वाछे साक्षात् शंकरका दशन किथा
||॥ ३६ ॥ पावेतीने ही यह सब वात् साधी जिने शिजीकै निमित्त तपत्या की, यह पार्वती धन्य ओर रुतरूतय है, जिसने
|| शिवजीको पति पाया है ॥ ३७ ॥ यदि बरह्मा यह शिवा शिवकी जोडी न् बनाता तो जगते नि्माणका इस्तका सव ही भम बृथा हो जाता
‰॥ ॥ २८ ॥ यह उसने बहुतही उत्तम किया जो यह जोडा मिलाया, सव काकी ओर सवी साधकता होगईं ॥३९॥ विना तपस्याके भनुष्योको
१२८ र
(8 दन दुर्भ है. शंकरे दर्शने सबही कताथ ५
याथा पेतेहौ यह पार्वती देवी शिवजीको पराप्त होकर शोभायमान & ९. | ५
ब्रहमाजीको 1 था! कहो यह पारवती देवी न हाकर शोभायमान हं है ॥ ४२ ॥ हम सव बी ओौर परुष धन्य है जो सवेश
गिरजापति शंकरका दर्शन करते है ॥ ४३ ॥ बहाजी बोठे यह वचन कह कर् योने चन्दन अक्षतसे शंकरकी पूजा की ओर उन ऊपर
लीरे वराई ॥ ४४ ॥ वहां सब चवय मेनकाके काथ उत्कंडासदित स्थित हद ओर मेना तथा ।हेमाढ्यका महाभाग्य वणन क ठगी
छक्ष्मीनारायणं रेमे यथा वैस्वामिनम्पुरा॥ तथासौपार्ैती देवी इरम्भ्राप्य सुभूषिता॥४१॥बह्नाण च यचा लेभे स्वामिनंवे सर
स्वती ॥ तथासौ पार्वती देवी इरम्पाप्यसुभूषिता॥४२॥ वयन्धन्याः चियस्सवाः पुरपास्सकलां वराः ॥ ये ये पश्यन्ति सवंशं
शंकरं गिरिजापतिम् ॥४३॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्थसुक्ता तु वचनं चन्दनैाक्षतेरपि ॥ शिवं समचयामाञ्चलाजान्व॒बरषुरादरात्॥४९॥
ट ताको भाप हए ॥ ४० ॥ जेस रषं काठ उकष्मीने नारायणो भा
ट
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|| तस्थुस्त शियः सवा मेनया सहं सूत्सुकाः ॥वर्णयन्त्योऽधिकस्भाग्यस्मेनायाश्च गिरेरपि ॥४५॥ कथास्तथाविधाश्रण्वस्तद्रामा
ह
शि०पु० रायणः
॥ ४१ ॥ पहटे जिस प्रकार सरस्वतीनं अपन स्वामी
॥२०२॥
~----__
वर्णिताश्छुभाः ॥ प्रहष्टोऽभूतप्युः सर्वेखन त 0 व ६॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्ढसंहितायातृतीये पर्व
तीखण्डे शिवसन्दरस्वहूपपुखास्युत्सववर्णनं नाम पञ्चचत्वारिशोऽष्यायः ॥ ७९ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथ शंयुः ्स्रात्मा सदतं
स्वगणेस्सुरैः ॥ स्ैरन्यैरिरेदाम जगाम सङुतूहलम् ॥ १ ॥ मेनापि श्वीगणेस्तेश्च हिमाचखवरप्रिया ॥ तत उत्थाय स्वग्रहा
भ्यंतरं सा जगाम ह ॥ २॥ नीराजनां शम्भोश्च दीपपा्करा सती ॥ सर्वविद्लीगणेस्साकमगच्छद्ारमादरात् ॥ ३ ॥
॥ ४५ ॥ उन दवियोकी कही हई अनेक पभ्रकारकी वात सुनते विष्ण आदि देव ओर सुनियोक्े साथ भगवान् शकर भ्रव हुए ॥ ४६ ॥
इति श्रीशिवम० भा० रु° तृ^ पारवतीखण्डे पचचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोटे तव॒ शिवजी महाराज भन्न ही अपने
गण दूत ओर देवताओके साथ तथा ओर स्वको ठे कुतूहरसे हिमाटयके यहां चे ॥ १॥ हिमाचठकी शष्ठ भिया मेना भी
% | सब द्ियोके साथ उढकर अपने घरके भीतर गई ॥ २॥ वह सती शिवजीके निराजनके निभि हाथमे दीपक ठे सव चि्योको साथ ठेकर बढ
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आद्र द्वारपर आई॥ ३॥ वहां जाकर मनाने सब देवताओं सेवित महेशान गिरिजापति शंकरको बड प्रेमे देखा॥ ४।जो सुन्दर चैपेके वर्णेके
कांतिवाटे पंचुख तीन नेर कुेक हास्यसे भसन्नञचख रतन ओर सुवणीदिसे भूषित॥५॥ माठतीकी माखा पहुरे अच्छे रत्नोका उज्ज्वल सुकर प्रे =
४ हुन्दर केठका भूषण धारण किये कंगन ओर बाज्बदोति शोभायमान ॥६॥ अतिषक्ष्म मनोहर विभूति लगाये अमूल्य शोभायमान वच्च धारण किये ॥७॥ ठ
चदन अगर कस्तूरी ओर कुंकुमपते भूषित, रत्न दर्पण हाथमं शोभित ओर नेम सुन्दर काजर गाये ॥<८॥ सब ओौर अपने कांति व्याप अत्यन्त ठ
# तजरागतं महेशानं शंकरं गिरिजावरम् ॥ ददश प्रीतितो मेना सेवितं सकलेस्सुरेः ॥ ९ ॥ चार्चंपकवर्णाभं चैकवक्रं खो त
¢ चनम्॥ ईषद्वास्यप्रसत्रास्यं रत्नस्वणोदिभूषितम्॥५॥ मारतीमाकयायुक्तं सद्रत्नशुकरोज्ज्वलम्॥ सत्कंडाभरणं चाशूवल्यांग 1
दभूषितम् ॥६॥ वद्धिशौचेनातलेन त्वतिसृक्ष्मेण चारूण। ॥ अमूल्यवच्रयुग्मेन विचितरिणातिराजितम्॥७॥ चन्दनागङ्कस्तूरी |
ट चाङ्ककुम भूषितम् ॥ रत्नदर्पणदस्तं च कजंरोज्ज्वललोचनम् ॥ ८ ॥ सर्वस्वप्रभयाच्छन्रमतीव सुमनोहरम् ॥ अतीव तूणं ¢
|| रम्य भूषितागेशच भूषितम् ॥९॥ कामिनीकांतमम्यग् कोटिचन्द्राननांब्जम् ॥ कोटिस्मराधिकतवच्छ्विं सर्वागसंदरम् ॥१०॥ ट
ठ
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गिरिजां भूधरं इलम् ॥ मेने कृतार्थमात्मानं जहषं च पुनः पुनः ॥ १२ ॥ नीराजनं चकारासौ भफुखषदनासती ॥ अवलोक
परा त मेनाजामातरं खदा ॥ १२ ॥ गिरिजोक्तमचस्मृत्य मेना विस्मयमागता ॥ मनसे इद्यवाचेदं दर्षङुलाननाभ्बुजा ॥१४॥
मनोहर बहृतही तरुण शोभायमान, गहनेवाढे अगि भूषित॥॥९॥ कामिनिरयोक्रो मनोहर वय्तारहित कोटिचदमाके समान मकाशमान सुखकमल, कोरि
कामदेवसे अधिक शरीरकी छबि, सर्वागघुन्दर॥१०॥इस प्रकारके देव जामाता प्रभुको अपने आगे स्थित देखकर मेनाने सव शोक भुला दिया, ओर
म होने ठगी॥१२॥
बहुत भन्न हृदं ॥११॥ ओर अपने भाग्य तथा भूषरके कुटकी भशसा करने गी, ओर अप्नेको कताथ मानकर वारंवार प्रस्
केर मेना विस्मयको भ्राप्त
| ईहग्विधं सुदेवे तं स्थितं स्वपुरतः प्रभुम् ॥ दृष्ठा जामातरं मेना जहौ शोकम्मुदाऽन्विता ॥ १३१ ॥ प्रशशंस स्वभाग्यं सा
भौर भ्रसन्नवदनसे इतने नीराजन किया, ओर प्रसन्नता मेना जमाईको देखती रहगई ॥१३॥ गिरिजाकी कही बातको स्मरण क
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हहं ओर प्रसननतासे युख नेत्रे भ्रसन्नवा प्रगट करती मनँ ही कहने ठर्ग
भरसन्नता देखती हं ॥ १५॥ महेशका स्वरूप इस समय वणन नहीं हा सकता ई त
युवतिये भशंसा करने छगीं किं गिरिराजसुता धन्य है धन्य है कोई कहने ठगी किं यह दुग
दर्शन नहीं किया गिरिजा देवी धन्य है इस भकार कोई कन्या कहने रुगीं ॥ १८ ॥ एत पदे
यदे पुरोक्तं च तया पार्वत्या ममतत्न च ॥ ततोधिकं प्रपश्यामि सौन्दय्यै परमेशितुः॥१५॥ महेशस्य स॒लावण्यमनि्वाच्यं च
संप्रति॥ एवं विस्मयमापन्ना मेना स्वश्हमाययौ ॥१६॥ प्रशशंसु्युवतयो धन्या धन्या गिरेः सुता॥ दुगां भगवतीत्येवमूञुःकाश्चन
कन्यकाः॥१७॥न दष्टो वर इत्येवमस्मामिदानगोचरः॥ धन्या हि गिरिजादेवीमूचुः कोन कन्यकाः ॥१८॥ जयुगन्धन्तमरतरा
ननृतुशवाप्सरोगणाः ॥ दष्टा शंकरङ्पं च प्रहष्टास्स्वदेवताः॥१ ९॥नानापरकारवादयानि वादका सधुराक्षरम् ॥ नानाप्रकारशिहपेन
वादयामासुरादरात्॥२०॥हिमाचरोऽपि श्ुदितो द्वाराचारमथाकरोत् ॥ मेनापि सर्वनारीभिर्महोत्सवपुरस्सरम् ॥२१॥ परपुच्छां
चकारासौ शुदितास्वश्ं ययौ ॥ शिवो निवेदितं स्थानं जगाम गणनिजेरे,॥२२ ॥एतस्मत्ननतरे दुर्गा शेखान्तःपुरचारिका ॥ बहि
जंगघुस्पमादाय पूजितुं इृरदेवताम्॥ २३ ॥ तर तां ददुवा निमेषरहिता श्दा॥ सुनीलांजनवर्णाभां स्वागेश्च प्रतिशरुषिताम्
॥ २९ ॥ तरिनेताहतनेर्ातामन्यवारितलोचनाम् ॥ ईषद्धास्यप्रसत्नास्यां सकटाक्षं मनोहरम् ॥ २५ ॥
देवता प्रसन्न हूए ॥ १९॥ बजानेवाडे अनेकं भकारके बाजे बजाकर मीढ स्वरो गाने तथा अनेक कौशठपे आदरपुव॑क बाजे बजाने रगे ॥२०॥
हिमाख्यने भी भसन्न होकर द्वारचार किया ओर भेनाने भी सब नारियोकि सहित महोत्सव किया ॥ ९१॥ परछन करके प्रसन्न होकर अपने घर गईं ओर
शिवजी भी अपने गोहित बताये हृए स्थानो गये ॥२२॥ इसी समय शेठराजके अन्तःघरचारी दुगामगतीको कुठदेवताके पूजन करनेको बाहर ठे
चठे ॥२३॥ वहो जाकर देखा कि देवता निमेषरहित है यह नीक अंजन प्व॑तके वणवाटी अपने अंगो मूषित है ॥२४॥ जिनके नेत्र भगवानु शकरसे
# ॥ १४॥ जो कुछ पार्वती सदसे कहा था इन परमेश्वरम त्रै उनसे अधिक
स प्रकार विस्मयको प्राप्त हो मेना मन्दिरकै भीतर गहं ॥ १६ ॥ उधर
भगवती ह ॥ १७ ॥ हमने तो इस प्रकारके वरका कहीं
भष्ठ गन्धर्व गाने कगे अप्सरायै नाचने ठगी शंकरका रप देख सब
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| | किये गये है दू्रोसे जो निवारण क्रिये गये हँ कुेक हास्यसे पसनन सुख कराक्षोति मनोहर ॥ २५॥ हुन्दर कबरी ( केशपाश ) के
¢ भारते व्याप्त, सुन्दर पत्ररचनासे शोभायमान, कस्तूरीकी बिन्दी रगाये सिन्दुरके विन्दुसे शोभायमान ॥ २६॥ वक्षस्य पर रतेन सारहार
र शोभायमान हो रहा है रत्न बाजूबंद ओर रत्नोके कंकण॑से मंडित ॥ २७ ॥ अच्छे रतनोके जडे कुण्डल पहरे शरन्दर कपोोसे शोभायमान
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मणि ओर रत्नोकी कांतिसे दांतोंकी पंक्ति विराजमान हो रही ॥ २८ ॥ निम्बफठके समान रक्त वणक मधुर होढ रतनं ओौर महावरसे ६
शोभायमान, हाथमे रत्नोंका दर्पेण छियि कीडाके कमठे शोभायमान ॥ २९ ॥ चन्दन अगर कस्तूरी ओौर कुंकुमसै चित चरणोभ म॑जीर ४
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| सुचाशकबरीभारां चाक्पत्रकशोभिताम्॥ कस्तूरीविन्दुभिस्साद सिन्दूरबिन्दुशोमिताम् ॥२६॥ रलेन्द्रसारहारेण वक्षसा खविरा
जिताम् ॥ रत्नकेयूरवलूयां रत्नकङ्णमंडिताम् ॥ २७ ॥ सद्रत्नङुण्डलाभ्यां च चारूगण्डस्थलोज्ज्वराम् ॥ मणिरत्नपरभा
सुशटिदन्तराजिविराजिताम् ॥ २८ ॥ मधुषिम्बाधरोष्ठां च रल्नयावकसंयुताम् ॥ रत्नदप्प॑णहस्तां च कीडापञ्यविभूषिताम्
है| ॥ २९ ॥ चन्दनार्कस्तूरीकुंकृमेनातिचिताम् ॥ कणन्म॑जीरपादां च रक्ताभितकराजिताम् ॥ २०.॥ भरणसुशिशरसा देवीं
है भक्तियुक्ता" समेनकाम्॥ सवं सुरादयो दष्टा जगदादां जगत्परषूस् ॥ ३१ ॥ भिने्ो नेवकोणेन तां ददश शुदान्वितः ॥ शिवः
# सृत्याङ्ृति दक्षा विजहौ विरहञ्वरम् ॥ ३२ ॥ शिवस्स्वं विसस्मार शिवासंन्यस्तरोचनः ॥ पुरुकांचितसवाँङ्गो इषौद्रौरीवि
रोचनः ॥ ३३ ॥ अथ कारीवबहिः पूर््या गत्वा पूज्य कराम्बिकाम् ॥ पिवेश भवनं रम्यं स्वपितुस्सद्विजाङ्गना ॥ ३७ ॥
४ शब्द् कर रहे चरण तलोंकी खाली शोभायमान हो रही ॥ ३० ॥ भेनकास्लहित सब किसीने भक्तिपूर्वकं देवीको प्रणामं किया, ओर सब देवं
तादि जगतकी भगट कले वाटी आया भवानीका दशन किया ॥ ३१ ॥ निने शंकरने नेनकै नेसे भगवतीको देखकर भसनत प्राप
|| की, शिवजीने इस ५. सतीकी आकृति शिबाको देखकर विरहव्यथा त्याग दी ॥ ३२॥ शिवाको अवटोकन करते ही शिवजी अन्य
है| समस्त भूल गये सवौङ्ग हषे पककिंत हौ गया गोरीको देखने गे ॥ ३३ ॥ तव काटी इरीके बाहर जाय कुख्देवीको पूजनक्र दविजाग
# || नाओके सहित अपने पिताक भवनम पधारी ॥ ३४ ॥
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स्थानम परसन्नातासे आये ॥ ३५ ॥ वहां रव एसपूवक निवास करकं
शिवजी विष्ण बह्मा आदि देवताओंकि सहित हिमाचरके दिखाये हुए पि
अनेकं प्रकारे शिवजीका ष करने ठगे ओर हिमाल्यने भी ह भरकारकी सम्पत्तियोसे उनका सत्कार किया ॥ ३६ ॥ इति आओरिवम्
हाराणे भाषारीकायां स्दसंहितान्तैततृतीयपार्वतीखण्डे बरागमादिवर्णने नाम॒बट्चतवारिशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ ब्रह्लाजी बोरे तब शछराजन
ीपिपर्वक वेदमतरोति उत्साहपरवक दु्गीका जनेऊ करायः ॥ <९ ॥ तब विष्ण आदि देवता ओर खनि कृतूहलपूष॑क हिमाढयकी भाथनाते रके
अन्तर प्रविष्ट हूए ॥ २ ॥ वेद ओर संसारकी रीति यथा योग्य करके शिवकी ओरकै दिये हुए भूषणो पावतीकौ लंक किया॥३॥
शङ्करोपि सरस्सादद हरिणा ब्रह्मणा तथा ॥ दिमाचलसमुदिषट स्वस्थानमगमन्धुदा ॥३५॥ तञ सवं सुखं तस्थुस्सेवन्तशशङ्करं
यथा ॥ सम्मानिता गिरीशेन नानाविधसुसम्पदा ॥ ३द ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रूढसंदितारया ठतीये पारवती
खण्डे वरागमादिवर्णनं नाम षट्चत्वारिंशोऽभ्यायः ॥ ७६ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ततः शेकवरः सोपि परीत्या दुगोपवीतकम् ॥ कार
यामास सोत्साहं वेदमन्त्ेश्शिवस्य् च ॥ १ ॥ अथ विष्ण्वादयो देवा शुनयस्सङ्तरूहलम् ॥ हिमाचरपार्थनया विवेशान्तगं
गिरेः ॥२॥ श्त्याचारं मवाचारं विधाय च यथार्थतः ॥ शिवामल्कृतां चङ्कश्शिवदत्तविभूषणेः ॥ ३ ॥ पथमं स्षापयित्वा तां
भूषयित्वाथ सर्वशः ॥ नीराजिता सखीमिश्च विग्रषत्नीभिरेव च ॥ ४॥ अदताम्बरयुग्मेन शोभिता वरवणिनी ॥ विरराज
महाशेखददिता शङ्करपरिया ॥ ९ ॥ कंचुकी परमा दिव्या नानारत्नान्विताद्वता ॥ विधृता. च तया देव्या विरसन्त्याधिकं
सुने ॥६॥ सा बभार तथा हारं दिम्यरत्नसमन्वितम् ॥ वलयानि महार्हाणि श्चुद्धचामीकराणि च ॥ ७॥
पहरे उनको ज्ञान कराय आओौर सब परकारसे भूषित कराय सखी ओर बाह्णोकी श्वि्योँने नीराजन किया ॥ ४ ॥ सदा निर्मढ रहने वाटे
वदते वह सुमुखी शोभायमान हृदं ओर शेठसयुता शंकरकी प्रिया बही शोभाकेो प्रप्त हदं ॥ ५ ॥ परम दिव्य कंचुकी जो अनेक _ रत्नोपि
शोभायमान थी देवीने बह प्रम अद्भुत धारण की, जिसे दूवीकी बडी शोभा हुं ॥ ६ ॥ ओौर दिव्य रल्नोका बडा न्दर हार उतने श
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| । किया, ओर बडे मोक शुद्ध सुवणेके हार भी धारण किये ॥ ७ ॥
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| सुभगा भेन शिवजीका ध्यान करती हई पहीं स्थित हूं त्रिजगत्की गट करने वाटी शेककन्या बडी शोभाको भा ष ॥ ८ ॥ दोनों
। ओरका आनन्द करने वाढा बडा महोत्सव उस समय हुआ, ओर बाह्मणोंको अनेक प्रकारते दान दिया गया! ॥ ९ ॥ ओर दूरे |
लोको भी बडा दान दिया गया, गीत बाजे ओौर विनोदसे बडा उत्सव मनाया गया ॥ १० ॥ तव् विष्णजी. मै, बहला, इन्र ओर दरे सब
देवता ओर मुनिजन भी महोत्साहसे महाउत्सव करने रुगे ॥ ११ ॥ भक्तिसे शिवको भणामकर ओर शिवजीके पदकमठ स्मरण कर गिरि
£ आज्ञा पाय सब अपने २ स्थानम बेढ गये ॥ १२ ॥ इसी समयम ज्योतिश्शा्मे पण्डित गर्गाचा्यजी हिमाठयते इस भरकारके वचन कहने
स्थिता ततैव सुभगाध्यायन्ती मनसा शिवम् ॥ शुदयमेति महाशेलकन्यका बिजगत्परसूः॥८॥ तदोतसवो महानासी इभयत् उदा
वहः ॥ दानं बभूव विविधं ब्राह्मणेभ्यो विवणितम्॥९॥ अन्येषां द्रव्यदानं च बभुव विविधम्मइत् ॥ गीतवाद्यविनोदश्च तओोत्सवपु
रस्सरम्॥ १० ॥ अथ् विष्णुरहं घाता शक्राया अमरास्तथा ॥ ञुनयचमहाप्रीत्या निखिखास्सोत्सवा खदा॥ ११ ॥ सुप्रणम्य
शिवां भक्तया स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥ सम्प्राप्य हिमगिय्यां्ञं स्वंस्वं स्थान समाश्रिताः ॥१२॥ एतस्मिन्नन्तरे तचज्योतिःशाघ्
विशारदः॥ हिमवन्तं गिरीन्द्र तं ग्गो वाक्यमभाषत ॥१३॥ ॥ गग उवाच॥ हिमाचल धराधीश स्वामिन् कालीपतिः भभो ॥
पाणिग्रहा्थं शंभु चानय त्वं निजमंदिरम् ॥१४॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथ तं समयं ज्ञात्वा कन्यादानोनितं गिरिः ॥ निवेदितं च
गेण सुसुदेऽतीव चेतसि ॥ १५ ॥ मदीधरान्द्रिजाशवैव परानपि तद् गिरिः ॥ प्रेषयामास सुप्रीत्या शिवानयनकाम्यया
॥ १६ ॥ ते षवता द्विजाश्चैव सर्वमंगर्पाणयः ॥ संजग्ुस्सोत्सवाः प्रीत्या यत्रदेवो सेवः ॥ १७॥
लगे ॥ १३ ॥ गगेजी बोडे हे हिमाचरु ! हे धराधीश ! हे स्वाभिच् ! हे पभो ! हे कारीकै पिता ! पाणिग्रहणके निमित्त शिवजीको अपने
|| मंदिरे छे जाओ ॥ १४ ॥ बहाजी बढ़े तब गिरिराज कन्यादानका उचित सभय जानकर् गथेका मथन सुन मनम बडे भसून्न हूए ॥१५॥
तब गिरिराज प्रसन्न होकर महीधर ओर दूसरे बह्मणादिको शिवजीकै आगमनकी इच्छसे भेजते हुए ॥ १६ ॥ वै पर्वत ओौर द्विज भंगर
हाथमे छिये सब मिठकर भहाउत्सव ओर पेमसे शिवजीकै समीप गये ॥ १७ ॥
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उस सभय बाजोंका शब्द ओर वैदोका शब्द होने छगा ओर गीत नृय आ
उनके बाजोके श सुनकर शिवजी देवता ऋषिगणोक सहित वै एक प्तायटी पा £
कहने ठगे हिमालय यहां शिवजीके बुक नेकी इच्छासे आति है ॥ २० ॥ इ समय यहं पाणिब्रहणका ६ समय प्राप्त हुआ है इ समय हम ९
सवका बडा भाग्य है यह हम मानते है ॥ २३ ॥ शिवा शिवका विवाह देखेगे इससे हम विशेषकर धन्य है यह व्याह जगत्का मंगठश्वरूप है ९
॥ २२ \ बाजी बे इस भरकारसे जब आदरपर्वक उनका संवाद् हभ उसी समय हिमाठ्यके सब मंत्री सहित आकर प्राप्त हुए ॥ २३ ॥ ¢
© दिसते महामहोत्सव होने खगा गीत ओर बत्य होने ठगा ॥ १८ ॥ ||
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# तद। वादित्रघोषेण ब्ह्मघोवेण भूयसा ॥ मशोत्साहोऽभवत्तच गीत्वृत्यान्वितेन हि॥ १८। श्रुत्वा वादिजनिर्वोषं सवे शंकरसेवकाः ॥ ¢
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उढ खड हए ॥ १९ ॥ ओर ह्मे निर मन होकर प्रसर ||
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उत्थितास्तैकप्येन सदेवर्षिगणा शुदा ॥१९॥ परस्परं समूचस्ते हषैनिर्भरमानसाः ॥ अनागच्छति गिरयश्िशिवानय॒नकाम्यया
॥२०॥ प्(णिग्रहणकाला दि नूनं सचस्समागतः ॥ महद्वनं हि सर्वेषां संमा्तमदि मन्मड॥२३॥ धन्या वरय विशेषेण विवाह ||&
शिवर्योश्ैवम् ॥ द्रक्ष्यामः परमप्रीत्या जगतां मगलङ्यम् ॥२२॥ बरन्मोवाच ॥ एवं यावदभत्तेवां संवादस्तत्र चादंशत् ॥ तावत्स ||
||| समायाताः पत्रस्य यंत्रिणः ॥२३॥ ते गत्वाभर्थयां चकुशशवं विष्ण्वादिकान्पि॥ कन्यादानोचितः काटो वतते गम्यतामि ||
| ति ॥२७॥ ते तच्छत्वा सुरास्तं घुने विष्णवादयोऽखिलाः ॥ शुुदुश्ेतसातीव जयेत्युचुगिरि इतम्॥२९५। शिवोऽपि सुुदेऽतीव ¢
| कालीप्रापणल[लसः॥ यतं चकार त्वहं मनस्येवाद्ुताकृतिः ॥२६॥ अथ लानं कृतन्तेन मद्गलद्रन्यसंुत्म् ॥ शुखिनसुप्रसत्रेन ¢
र्र,२ |¢ रोकानुप्रहकारिगा॥ २७॥ स्र तस्छुवासमा युक्स्स्ैस्तेः परििारितः॥ आरोपितो दृषस्कंन्धे कोकपलिस्सुसेवितः ॥ २८ ॥
८ उन्होने रिष्यजीमे ओर शिवजी भाथना की किं यह कन्यादानका उपयोगी स्मय आगया है, आप चटिये ॥ २४ ॥ वे सव देवता ओर||६
पा.सं.३ ||| सव विष्णओदिक मनमे प्रसन्न होकर जयजयकार करने ठगे ॥२५॥ ओर काटीकै प्राप होनेकी काठततासे शिषजीभी बड प्रसन्न होगये, ओर मनम &
अ०४७ | अदत आति थी प्र उस प्मके चिह्धको यपत रकला ॥ २६॥ फिर मेगल द्वये सहित शंकरने ज्ञान किया, छोकके अद्ह करनेवाठे शिवजी 2
|| बडे प्रसन्न हए ॥ २७ ॥ उन सवके सदित शिवजीने ज्ञान किया, ओर सव तेवकोने छोकपराठोने शिवजीको व्रषभके स्कन्धपर >
चटाया ॥ २८ ॥ उक्त समय प्रमुको आगेकर स्र को$ हिमायके घर गये, सव वाजे बजाते ओर कुतुहढ करते चरे ॥ २९ ॥ हिमाटयके
भेजे हृए विप्र ओर वे दिव्यदेहधारी पर्व॑त कृतूहढ करते दए, शिष्रजीके आगे २ चे ॥ ३० ॥ शिवजीके ऊपर शोभायमान छत्र
| ओर दूसरे सेवकं ॒महैश्वर पर चम्र करने ठ्गे ॥ ३१ ॥ भै, विष्णु, इन्द्र॒ ओर सब लोकपाट परम ठक्ष्मीकै सहित अब्यथरतासे
शोभायमान हूए ॥ ३२ ॥ उसी समय शंख, भेरी, पटह, आनक, गोमुख आदि बाजे उस्न महोत्सवमं वारषार बजय जाने ठगे ॥ ३३ ॥
पुरस्कृत्य प्रभुं सवे जग्मुहिमगिरेगेदम् ॥ वाद्यानि वाद्यन्तशच कृतवन्तः कुतुहलम् ॥ २९ ॥ हिमागप्रेषिता विप्रास्तथा ते पव॑
तोत्तमाः ॥ शम्भोरग्रचरा ह्यासन्कुतूदलसमन्विताः ॥३०॥ बभौ च्त्रेण महता भियमाणो हि मूर्ढनि॥ चामेवीज्यमानोऽसौ
सवितानो महेश्वरः ॥ ३१ ॥ अहं विष्णुस्तथा चेन्द्रो छोकपाटास्तथैव च ॥ अथरगाः स्मातिशोभन्ते भिथा परमया भरिताः
॥ ३२ ॥ ततश्शङ्खा-अ भेयं पटहानकगोमुखाः ॥ पुनः पुनरवायन्त वादित्राणि महोत्सवे ॥३३॥ तथैव गायकास्सवें नयः
प्रममङ्गलम्॥ नर्तक्यो ननृतुस्सवां नानाताकसमन्विताः ॥ ३४ ॥ एभमिस्समेतो जगदेकबन्धुर्ययौ तदानीं परमेशवर्चसा ॥
सुसेष्यमानस्सकटेस्सरेश्वरे्विकीयंमाणः कुसुमे दषितेः ॥ ३९ ॥ सम्पूनितस्तदा शम्भुः प्रविष्टो यज्ञमण्डपम्॥ संस्तूयमानो
बह्ीभिः स्ततिभिः परमेश्वरः ॥ ३६ ॥ ृषादुत्तारयामासुर्मदेशम्पर्वतोत्तमाः ॥ निन्यु्यहान्तरम्परीत्या मरोत्सवपुरस्सरम्
॥ २७ ॥ हिमाल्योऽपि सम्प्राप्ते सदेवगणमीभ्वरम् ॥ प्रणम्य विधिवद्भक्त्या नीराजनमथाकेत् ॥ ३८ ॥ |
इसी प्रकार सव गानेवाठे परम मंगठते गाने ठगे ओर नाचनेवाटी अनेक ताठ्से गाने लगीं ॥ ३४ ॥ इस प्रकार इन सबके सहित
जगतके एक बन्धु परमेशकी कान्ति धारण करनेवारे सब देववरो सेवित हृए शवियोके वर्षीये एकक वर्पाको ग्रहण करते हुए गये
॥ ३५ ॥ इस प्रकारसे पूजित हो शिवजी यज्ञमंडपमे विश हुए उस्र समय प्रमेश्वरकी अनेक प्रकारसे स्तुतिं होने ठगी ॥ ३६ ॥
पवंतोत्तमने महेशवरको -बृषपरसे उतारा ओर महोत्सवपूक मसे रके भीतर छे गये ॥ ३७ ॥ ओर देवता ओर गोहित शंकरको आया
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7 - षद्
रि०४० ||| हूभा देसकर हिमाडयने परम परमते नीराजन किया ॥ ३८ ॥ श महोतसवसहित सब य (८; स |
इ विधित भरंसापूर्वक उन स्का सन्मान किया ॥ ३९ ॥ इस भकारते पवेतराज भगवानु शक, व यन त
॥२०६॥ ¢ ताथ को रतनोक्ि सिंहासनपर बढाया विशेषकर विष्ण, शिव ओर दूर
देकर अपने घरमे खिविठेगये ॥ ४० ॥ ओौर आंगन उन सव ५. (५
देवताओंका सत्कार किया ॥ ४१ ॥ मेनाने अपनी सलीजनों तथा बाह्णोकी ख्लीजनों्हित तथा अन्य गि च्ियोँ सहित भम
परकीदि सब कत्य किंया ॥ ४३ ॥ तव परोहिंतजीने बड
विधिम्ुदा ॥ ३९ ॥ सोऽगस्साच्युतमीशानं
ङ्गणे स्थापयामास रत्नर्सिदासनेषु तान् ॥
नीराजन किया ॥ ४२ ॥ कसयके जाननेवाठे परोहितने महात्मा शंङरका मधु
सरवान्सुरान्युनीनन्यान्प्रणम्य समहोत्सवः ॥ सम्मानमकरोत्तेषां भ्रशंसन्स्व
सुषा्याध्यं पुरस्सरम् ॥ सदेवश्चख्यव्ग च निनाय स्वाख्यान्तरम्, ॥ ० ॥ धरा ॥
ब्रह्मणल्लीभिरेव च ॥ अन्याभिच्र पुरन्धी
¢
¢
¢ सर्वान्विष्णं च मामीशं विशिष्टा विशेषतः ॥ 8१ ॥ ससीभिमनया प्रीत्या ण
| मिशचक्े नीराजनम्बुदा ॥४२॥ पुरोधसा छृत्यविदा शंकराय महात्मने ४ मपकाक यद्यत तत्कृतं खुदा ॥ ४३ ॥
|| मया स नोदितस्तत्र पुरोधाः कृतवस्तदा ॥ सु्मगरं च यत्कम्भ भस्तावसदश्छुन ॥ = ॥ अन्त्यां महाप्रीत्या सम्प्र
विश्य हिमाद्रिणा ॥ यत्र सा पावती कन्या सर्वाभरणभूषिता ॥ ४९ ॥ वेदिकोपरि तन्वंगी संस्थिता सुविराजिता ॥ त
¢ नीतो महादेवो विष्णुना च मया सह ॥ 9६ ॥ लग्रतनिरीक्षमाणास्ते वाचस्पतिषुरोगमाः ॥ कन्यादानोचितन्त बभूवुः
५
परमोत्सवाः ॥ ७७ ॥ तञओपविष्टो गगश्वच यत्रास्ति चटिकारुयम्॥ यावच्छेषा घटी तावत्छृतस्प्रणवभाषणम् ॥ ४८ ॥
ङ्स. # (~ ७ [= =. (व ५ पार्वती देवी
पा.-ख8 प्रभे भञ्ज परित होकर जितना भंगक्का कं है बह सव भरस्तावके सथान किया ॥ ४४ ॥ हे शने 1 जहां वह परावती देवी सव आभरणो
य भूषित हई स्थित थी, वहां हिमाख्य बडे परमस गये ॥ ४५ ॥ वहां बह सक्ष्मांगी वेदिकाके ऊपर विराजमान थी, वहां हिमाठ्यके साथ ¢
म०४७ शंकर विष्ण ओर चैने भरवेश किया ॥ ४६ ॥ ` बृहस्पति आदि वह सव देवता ठको देखकर वहां कन्यादानका प्रम उत्सव करने
रभे ॥ ४७ ॥ वहां गर्गेजी भी विराजमान थे, उन्होने उस्च समय षडीका समय विचारः, जबतकं एक, घडी शेष थी तबतक प्रणव भाषण
~~
किया ॥ ४८ ॥ गगने पण्याहवाचन करके चादलोकी अञ्जलि धारण की, ओर पार्वतीको दी ओर बह भगवतीने शिदजीके ऊपर धारण कौ
४९ ॥ पर्वतीने दधि अक्षत कुशा ओर जकोसे परषमोद ओौर रुचिते शंकरकी पूजा की ॥ ५० ॥ ओर शुषि भरे शलसे शिवजीको
¢ || देख विचारने र्गी किं जिनके निमित भने परम भीतिते महातपस्या की धी, वही. शंकर यं विराजमान है ॥ ५१ ॥ हे उने ! पावेतीके
65|| दसा विचार करनेपर तब ने गगौदिसे कहा ओर उनकी अजुषतिस्ते शिवजीने कौकिंक आचारके साथ पराव॑तीका पूजन किया ॥ ५२ ह
¢ पुण्याहम्परवदन्गर्गस्समाभरेऽजरिम्ुदा ॥ पा्व्वत्यक्ष॑तपूणं च ववृषे च शिवोपरि ॥ ४९ ॥ तया सम्पूजितो शद्रो दध्यक्षतङ्शाम्बु
¢ भिः॥ परमोदाठयया तञ षावेत्या रुचिरास्यया ॥ ९० ॥ विरोकयन्तीतंशम्थुं यस्यां परमन्तपः ॥ कृतस्पुरा महाप्रीत्या
८ विरराज शिवाति सा ॥ ५१ ॥ मया शुने तदोक्तस्तु गगादिश्चनिमिश्च सः ॥ समानचं शिवां शम्भुर्लोकिकाचारसंरतः॥ ५२ ॥ ट
&|| ए परसपर तौ वे पार्व्वेतीपरमेश्वरोौ ॥ अर्चयन्तो तदानीञ शुशुभाते जगन्मयौ ॥ ५३ ॥ वैलोक्यलक्ष्म्या संवीतौ निरीक्षन्तौ ठ
¢ परस्परम् ॥ तदा नीराजितौ रक्ष्म्यादिमिस्घ्लीभिर्विंशेषतः ॥ ५४ ॥ तथा परा वें द्विजयोषितश्च नीराजयामास्ुरथो ठै
पुरश्ियः ॥ शिवाञ्च शम्भुञ् विरोकयन्त्योऽवापुम्षुदन्तास्सकखा मशोत्सवस् ॥ ५५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां
# रुद्रसंहितायां तरतीये पार्वतीखण्डे शिव दिमगिरिगहाभ्यन्तरगमनोत्सववर्णनं नाम सक्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
¢ इस भरकारसे पावती परमेश्वर एक दूसरेका परस्पर सतकार करते हुए, वह जगन्मय उस्च सभय प्रम शोभाको भातत हुए ॥ ५३ ॥ परस्पर एक ट
दूसरेको देखते हुए त्रिटोकीकी छष्ष्मीसे शोभायमान हए तब ठक्ष्मी आदि श्चियोनिं विशेषरूपे नीराजन किंथा ॥ ५४ ॥ पीछे बह्माणोंकी ४
¢ चिर्योने फिर परकी च्िर्योने उनका नीराजन किया, शिवा ओर शम्भु परस्पर एक दूसरेको अवछोकन करते हृद बी धसन्नताको भा हुए त
¢ ॥ ५५ ॥ इति भरीशिवम ° भा० रुद्रसंहितान्तगेततृतीयपावंतीखण्डे सप्तवत्वारिंशोऽध्याथः ॥ ४७ ॥
१ असिद्धत्वाभाव अवं
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म =. ©
बहमाजी नोठे उक्ती अवसर गर्गाचार्यं॑पेरित होकर हिमा्य मेनाके साथ कन्यादान करनेकी इच्छा करने लगे ॥ १॥ हुवणका कटश
॥३० | ट ठेकर मेना हिमाख्यके वामांगमे स्थित हदं महाभाग्यवाटी मेना उस समय वश्च ओौर अकार धारण किये थी ॥ २ ॥ तव हिमाठयने प्रसन्न ¢
होकर अपने प्रोहितके ` सहित अ्यपाय देकर तथा वञ्च चन्दन
देकर वरका वरण किया ॥ ३॥ तव हिमाट्पने बाह्णणोका तिथ्यादि ^
कीर्तनमें नियुक्त किया किं अव समय आगया है अब तिथि आदिका भरयोग किया जाय ॥ ४ ॥ यह वात सुनते ही समयके जाननेवाटे वै
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रेष्ठ बाह्मण प्रम शान्ति ओर प्रीतिस्ते तिथि आदिका कीर्तन करने ठगे ॥ ५॥ तब हिमाख्यने परम भरसनतासे हृदयम शिवजीमे प्रेरित ४
॥ ब्रह्मोवाच ॥ एतस्मित्नेतरे त गर्गाचार्य्यप्रणोदितः ॥ हिमवान्मेनया सारद कन्या दातु प्रचक्रमे ॥ १ ॥ हैमं कलशमादाय ४
मेना चार्ढागमाश्िता॥ हिमादेश्च महाभागा वल्लाभरणभ्रूषिता॥२॥पाद्यादिभिस्ततः शलः प्रष्ठः स्वपुरोहितः॥ तं वरंवरयामास ¢
वञ्लचंदनभूषणेः॥३॥ ततो हिमाद्रिणा प्रोक्ता द्विजास्तिथ्यादिकीर्तने॥ प्रयोगो भण्यतां तावदस्मिन्समय आगते॥४॥ तथेति चोक्ता ्
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४ ते सवे कालज्ञा द्विजसत्तमाः ॥ तिथ्यादिकीर्तनं चछ्कः प्रीत्या एरमनिैताः॥५॥ ततो हिमाचलः प्रीत्या शंभुना प्रेरितो इदा ॥
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सूती कृतः परेशेन विडसनञ्शंथुमन्रवीत्॥६॥ स्वगोत्र कथ्यतां शम्भो प्रवर कृं तथा॥ नाम वेदं तथा शाखां माकार्षीससमया / |
त्ययम् ॥७॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य हिम द्वश्शंकरस्तदा॥ घुखाविष्चुखःस्योऽप्यशोच्यःशोच्यतां गतः॥८॥ एवंवि
४ धस्मसुरवरेषैनिभिस्तदानीं गंधर्वयक्षगणसिद्धगणेस्तथेव॥ दृष्टोनिशत्तरमुखो भगवान्महेशोऽकार्षीस्सुदहास्यमथतत्र सनारदत्वम्॥९॥ ¢
स्स. हो हसते हूए उन सृषकितां शिवजीसे कहा ॥ ६ ॥ है शंकर ! आप अपना गोत्र प्रवर ओर कुठ करिये, तथा अपना नाम अपना वैद
पा.खं.३ ओर अपनी शाखा बताये समयका व्यतीत करना ठीक नहीं ॥ ७ ॥ ब्ह्ाजी बोे भगवानु शकर इस भकार हिमाठयके वचन पुनकर
अ०४८ ||| वत्कार ही सोचने ठे यद्यपि आप शोचरहित हतो भी सुखे विल न होनेवारे विचारने गे ॥ < ॥ जब इस भ्रकारसे 2)
उसु समय ष्ठ देवता, खनि, गेषवं, यक्ष, सिद्धगर्णोनि शिवजीको निरुत्तर देखा तब हे नारदजी ! तुमने इस॒भरकारसे उस्र समय उनकी |
सहायताकी ॥ ९ ॥ हे नारदजी ! तुम उस समय बहमतत्वकै जानने वाटे षन शिवजी प्रेरित हो वीणा बजाने रगे ॥ १० ॥ हे |
| समय हृठपे हिमालय, विष्ण, देवता ओर सव खनियोनि तुमको निवारण .किंया ॥ ११ ॥ जिस समय शंकरकी इच्छासे तुम निध्रंत्त न हुए
तब फिर हिमाख्यने तुमसे कहा हे नारदजी ! तुम अव वीणा मत बजाओ ॥ १२ ॥ हे पण्डित ! हे देवँ ! जब हठे तुमको उन्होने निवृत
किया तब तुम महेश्वरको स्मरण कर गिरीशसे कहने कगे ॥ १३ ॥ नारदजी बोखे तुम बडे मूढ हो इस विषयमे तुम कु भी नहीं जानते हो
जो मंहेश्वरके विषयमे रेस पुते हो तुम बडे विखख हो ॥ १४ ॥ तुमने जो साक्षात् शंकरसे गोत्रके विषयमे प्रशन किया है, यह इस्त समय
वीणामवाद्यस्त्वं हि बह्मविज्ञोऽथ नारद्॥ शवेन पेरितस्ततर मनसा शंथुमानसः ॥ १० ॥ तदा निवारितो धीमान्परवतेदरेण वै
टात् ॥ विष्णुना च मया देवैुनिमिश्ाखिलेस्तथा ॥११॥ न निवृत्तोऽभवस्त्वं हि स यद् शंकरेच्छया ॥ इति भोक्तोऽद्विणा
तहिं वीणां मा वादयाघुना ॥ १२ ॥ सुनिषिद्धो दटात्तेन ९.५ यदा बुध् ॥ अरत्यवोचो गिरीशं तं खसंस्मत्य महेश्वरम्
॥१३॥ नारद् उवाच ॥ त्व हि मूढत्वमापन्नो न जानासि च किंचन ॥ वाच्ये महेशविषयेऽतीवासि त्वं बहिर्थुखः ॥ १७ ॥
त्वया पृष्ठो हरस्साक्षातस्वगोचकथनं भ्रति ॥ समयेऽस्मिस्तदत्यतयुपहासकरं वच्: ॥ १५॥ _अस्य गो ककं नाम नैव
जानंतिपर्वत ॥ विष्णुब्रह्मादयोऽपीदपरेषांका कथा स्मृता ॥ १६ ॥ यस्थेकदिवसे शल ब्रहमकोटिलयं गता ॥ स एव शंकर
स्त्य दृष्टः . कारीतपोबलात् ॥ १७ ॥ अह्पोऽयं परब्रह्म निशणः प्रकृतेः परः ॥ निराकारो निर्विकारो मायाधीशः
परात्परः ॥१८॥ अगोद्कलनामा दि स्वतंओ भक्तवत्सलः ॥ तदिच्छया हि सय॒णस्सुतलुर्बवहुनामभृतव् ॥ १९॥ `
दम्हारा वचन मृहा उपदा्रका करने वाढा है ॥ १९ ॥ हे पव॑तराज ! इनका गोत्र कुढ जाननेको बरह्मा विष्की भी सामर्थ्य नहीं है, दूसरेकी
तो क्या कथा है ॥ १६॥ हे शेक ! जिनके एक दिनम कोटि बहा छ्य हो जाते है उन शंकरका तुमने कालीके तपोबङ्ते दशन किया
है ॥ १७ ॥ यह अल्प प्रत्रह्न निथण भ्रकतिसे परे है यह निराकार निर्विकार भायाधीश परेसे प्रे है ॥ १८ ॥ यह स्वत॑ज भक्तवत्सल कुल
गो ओर नामे रहित है यह उसकी इच्छासेही सयुण शरीर धारी ओं बहत नामबाडे हुए है ॥ १९ ॥ |
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नभी है, वह इस समय निःसंदेह पावेतीकै तपते तुम्हारे जामाता
है इसमे सन्देह नहीं ॥ २० ॥ उस ठीठा विहारोने चराचरको मोहित कर छया है हे गिरिसचम ¡ कोई महा पण्डित भी यथाथ रपे शकरको
देख पाया विष्ण पाताठतकं गये ओर अन्त न पाकर विस्मित हए
जिनके स्मान कितीका गष गोर नहीं जो गोरहीन कुर हीन ओर् कुटी ४
नहीं जान सकता ॥ २१ ॥ छिगाकार महेशका मस्तक आजतक कोई न दे ¢
बदी दुस्तर है उनके आधीन तीनों छोक तथा, हरि बह्लादि भी है ५
॥ २२ ॥ हे पव॑तराज ! बहत कहनेसे क्या है शिव्की भाया ब 1 ह्
॥ २३ ॥ हे पार्वतीके पिता ! इस कारण आपको इस प्रकारके वरे कुढ भी विचार न करना चाहिेः ओर प्रयतनसञे कन्या दान करना
सगो्री गोहीनश्च दीनः कलीनकः ॥ पावंतीतपसा सोऽद्य जामाता ते न संशयः ॥२०॥ लीलाविहारिणा तेन मोहितं च
किगाङ्ते्हेशस्य केन दष्ट न मस्तकम् ॥ विष्णुगत्वा हि
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¢ चराचरम् ॥ नो जानाति शिवं कोऽपि प्राज्ञोऽपि गिरिसत्तम ॥२१॥
| पातालं तदेनं नाप विस्मितः ॥२२॥ किंबहृक्तया नगश्रेष्ठ शिवमाया दुरत्यया ॥ तदधीनाञ्चयो रोका इरिब्रह्नादयोपि च ॥२२॥
तस्मात्चया शिवातात सुविचार्य प्रयत्नतः ॥ न कर्तभ्यो विमर्शोऽञ त्वेषंविधवरे मनाक् ॥२४॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता त्वं सुने ज्ञानी ।
¢ शिवेच्छाकार्थकारकः ॥ प्रत्यवोचः पुनस्तं वै रेदं हर्षयन् गिरा ॥ २५॥ नारद उवाच ॥ शृणु . तात महाशेक शिवाजनक
मदरचः ॥ तच्छत्वा तनयां देवीं देहि त्वं शंकराय हि ॥ २६ ॥ सगुणस्य महेशस्य लीखया हपधारिणः ॥ गों कटं विजा ४
\ नीहि नादमेव हि केवलम् ॥ २७ ॥ शिवो नादयः सत्त्यं नादश्शिवसयस्तथा ॥ उभयोरंतरं नास्ति नादस्य च शिवस्य
|| च ॥ २८ ॥ सृष्ठौ प्रथमरजत्वाद्ि लीलासयणदपिणः ॥ शिबाघ्नादस्य शद सर्वोत्करृष्टस्ततस्स हि ॥ २९ ॥
ट चाहिये ॥ २४ ॥ बह्लाजी बोढे हे ज्ञानी खनि ! शिवकी इच्छसे कार्य करने वारे तुम इस ॒भ्रकारसे कहकर शिवजीकी पररणासे शेडेन््रको
४ | सन्न करते हूए बोरे ॥ २५॥ नारदजी बोे हे तात ! हे शैकराज ! आप शुनिये हे पावंतीके पिता मेरे कचन षुनकर ठम ||
< ||| शकरके निभित्त अपनी कन्या धरदान् कीजिये ॥ २६ ॥ यह सगण महेश रीासे अनेक हप धारण करते है इनका गोत्र ओर कु केवर नाद &
~ ॥ ही है २७ ॥ सत्यही शिब नादमय ह ओर नाद शिबमथ है नाद ओौर शिव इन दोनोमिं भेद नहीं है ॥ २८ ॥ सृषटिमं प्रथम उत्यन्न होने. |
। बचन सुने तब मनसे उनका विर्भय जाता रहा, ओर बहुत सन्तुष्ट हुए ॥ ३१ ॥ तब सब देवता ओर सुनि विस्मय रहित हो धन्य
धन्य कहने ठे ॥ ३२ ॥ इस भरकारसे सब चतुर शिवजीका गांभीयं जानकर विस्मित हो महामोदपे परस्पर कहने ठगे ॥ ३३ ॥
आज्ञासे यह विशाख जगत् पगर हुआ है जो परस परे भी निज बोधरूप है जो जगतके संहारकती स्वतंत्र गति करनेवाटे परमभावसे जानने योग्य है यह
अतो हि वादिता वीणाप्ेरितेन मयाद्य वै ॥ सवश्वरेण मनसा शंकरेण दिमालय् ॥ ३० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एतच्छत्वा तव सुन वच
स्तच् गिरिश्व्रः॥ दिमाद्विस्तोषमापत्नो गतविस्मयमानसः ॥ ३१ ॥ अथ विष्णुप्रथृतयस्सुराश्च सुनयस्तथा ॥ साधुसाध्विति
ते सवे रोच विंगतविस्मयाः ॥ ३२ ॥ महेश्वरस्य गांभीर्य ज्ञात्वा सवे विचक्षणाः ॥ सविस्मया महामोदान्विताः प्रोचुः
परस्परम् ॥ ३२ ॥ यस्याज्ञया जगदिदं च विशालमेव जातं प्राटपरत्रो निजबोधरूपः ॥ शर्वः स्वतं्रगतिकृत्प्रभावगम्य
स्सोऽसौ िलोकपतिरदयय च न स्ुरष्टः ॥ ३९ ॥ अथ ते पर्वतश्रेष्ठा मेवा जातसंभ्रमाः ॥ ऊचुःस्ते चैकपयेन हिमर्वेतं
नगेश्वरम् ॥३५॥ पवैता उचुः ॥ कन्यादाने स्थीयतां चाद्यशेलनाथोक्त्या किं कार्यनाशस्तवैव ॥ सत्यं ब्रूमो नार कार्यो
विमशंस्तस्माकल्न्या दीयतामीश्वराय ॥३६॥ ब्रह्मोवाच ॥ तच्छत्वा वचनं तेषां सुहृदां स हिमाख्यः ॥ स्वकृन्यादानमकरो
च्छिवाय विधिनोदितः ॥ ३७ ॥ इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर ॥ भायां परिगृह्णीष्व प्रसीद सकटेश्वर ॥ ३८॥
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त्रिखोकयति आज _ हमने देखे हमरे बडे भाग्य है ॥ ३४ ॥ तब वै प्वतभे्ठ मेरु आदि संभमसे एक साथ ही पर्वतश्रेष्ठ
हिमाख्यसे कहने रगे ॥ ३५ ॥ परवत बोठे हे शखराज ! इस समय कन्यादानं आप् स्थित हूजिये, देर करनेसे कायं नाश होता है हम
{ सत्य कहते ह अव विचारकी आवश्यकता नही, इक कारण इश्वरको अपनी कन्या दीजिये ॥ ३६ ॥ ब्रह्माजी ` बोरे त हिमार्यने इस
लीठढाके सयण हप धारण करने पटे शिवजी ही नादकी महिमा भरगट हद है, इसीसे इसको सबसे भ्ठ कहा है ॥ २९ ॥ हे हिमार्य । ४
इससे नने मनमे सर्वशवर शकरसे भरित होकर यह वीणा बजाई थी ॥ ३० ॥ नह्याजी बोठे हे स॒न् ! इ भकारसे गिरीश्वर हिंमाठयने जब ।
प्रकार अपने सुहदोके वचन सुनकर विधिपूर्वकं अपनी कन्थाका दान किया ॥ ३७ ॥ हे परमेश्वर ! भै ॑तुमको इस कन्ाका ¢
शि०० दान करता हूं हे सवके हेश्वर आप इसको अपनी भार्यारूप्मे शरहण कीजिये ॥ ३८ ॥ तब. त्रिजगतकी उत्पन्न करने वाटी अपृनी
॥३०९ || कन्याको हिमाख्यने मन्वपुवक शकरकै निमित्त दान कर दिया ॥ ३९ ॥ इस प्रकारसे पावतीकाः ९ रिबजीके हाथ १
¢ कोई स्के पार हो जाय इस प्रकार मनम वडा प्रसन्न हुजा ॥ ४० ॥ जब ५. क व ।
८ करौ तव॒ सन्न हो शंकरने पार्वतीका हाथ बरहण किया ॥ ४१॥ है सुने ! फिर प्रथिवीको स्पशकर । कोदात् कस्मादात् ` इस
८ मन्वकठो छोकिकी गति दिखाते हए शिवजीने प्रमसे ढा ॥ ४२ ॥ उस्न समय आनन्दका देनेवाढा सव्रही महोत्सव हुआ, दिवि भूमि ओर
¢ तस्मे रुद्राय महते मंत्रेणानेन दत्तवान् ॥ हिमाचरो निजां कन्यां पावती भिजगपरघम् ॥ २९॥ इत्थं शिवाकरं शेखं शिव
¢ दस्तेनिधाय च ॥ खमोदातीव मनसि तीर्णकाममहाणवः ॥४०॥ वेद््रेण गिरिशो गिरिजाकरपङ्कजम् ॥ जगाहस्वकरेणाशच
( मसुघनःपरमेश्वरः ॥४१॥ क्षिति संस्परश्य कामस्य कोदादिति मतै घने॥ पपाठ शंकरः प्रीत्या दरशरयेोकिंकीं गतिम् ॥ ४२ ॥
महोत्सवो महानासीत्सर्वज परषदावहः ॥ बभूव जयसंरावो दिवि ^| भूम्यंतरिक्षके ॥ & २३ ॥ साश्युशब्द् नमः शब्द् चज्रुस्सवेऽति
¢| ठषिताः॥ गससिनय भीत्या ननृतभा्सरोगणाः ॥ ९8 ॥ हिमाचरस्य पौरा हि ुषदु्ाति चेहसि ॥ मंगलं महदासी
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¢| महोत्सवषुरससरम् ॥ ४५.॥ अहं विष्णुश्च शकश निर्जरा ुनयोऽसिलाः ॥ हर्षिता द्यमकंश्ातिप्रहवदनाम्डुजाः ॥ ४६ ॥
¢| अथ शेलवरस्सोदात्सुप्रसत्नो हिमाचरः ॥ शिवाय कन्यादानस्य सागतां सुयथोचिताम् ॥ ४७ ॥ ्
₹°ं.२ ९६|| अन्तरिक्ष सरव्॑रही जय शब्द होने ठ्गा ॥ ४३ ॥ सव कोद प्रसन्न हो ताध शब्द ओर न॑मःशम्द उचारण करने ठगे प्रमे गधवं गाने ओर
अप्रा कत्य करने ठगी ॥ ४४ ॥ हिमाठ्यके परवा भौ मनमे बडे भन्न हए उत्त समय महोत्सषपर्वक बडा मेगल हुआ ॥४५॥ मेँ विष्य,
होगे खख कमठ उनके प्रफृदितः होगये ॥ ४६ ॥ तव हिमोख्यतते कन्या
६ १ परस्मेषदभार्षम् 1
पा.खं.३ ||°८
अ०८
। सांगता भन्न होकर शिवजीकै निमित्त यथो चित्त प्रदान की ॥ ४७ ॥ तब उनक बंधुजन भक्तिसे पावंतीका पुजन करके |
निमिन्त अनेक विधि विधानत रष द्रव्य देते हुए ॥४८॥ ओर हिमार्यने भी प्रसन्न होकर पारवती ओर शिवजीकी प्रसन्नताकै निमित्त अनेक |
| द्रव्य दिये ॥४९॥ है ख॒नीश्वर! दहेज अनेक प्रकारक रत्न रत्नजटित पात्र तथा अनेकं प्रकारके रत्नपा् प्रदान किये ॥५०॥ एक टाख ¢
गौ, ओर सजेसजाये सौ घोडे, पावंतीमे प्रम करनेवाटी अष्ट रत्नो विभूषित एक ठक्ष दासी ॥ ५१ ॥ एक कोरी हाथी, ओर इतनेही रथ, ठ
जो सुवणके जडे ओर रत्नोके सारसे निर्भित थे ॥५२॥ इस भकारे हिमाटयने अपनी पत्री गिरिजा शिवा परमेश शिवजीको विभिपूरवक देकर $
ततो बन्धुजनास्तस्य शिवां सम्पूज्य भक्तितः ॥ ददुश्शिवाय सद्रग्यं नानाविधिविधानतः ॥४८॥ हिमाख्यस्तुष्टमनाः पाव॑तीशि
वप्रीतये ॥ नानाविधानि दव्याणि ददौ तच खुनीश्वर ॥४९॥ कौतुकानि ददौ तस्मे रत्नानि विविधानि च ॥ चारूरत्नविकाराणि
पात्राणि विविधानि च ॥ «° ॥ गवां लक्षं हयानां च सनितानां शतं तथा ॥ दासीनामबरक्तानां लक्ष सदग्यभूषितम्
॥९५१॥ नागानां शतलक्षं हि रथानां च तथा घुने ॥ सुवणेजटितानां च रत्नसारविनिमितम् ॥ ५२ ॥ इत्थं हिमालयो
दत्वा स्वसुतां गिरिजां शिवाम् ॥ शिवाय परमेशाय विधिनाऽऽप कृतार्थताम् ॥ ५३ ॥ अथ रौरखवरो माध्यंदिनोक्तस्तो
चरतो खदा ॥ तुष्टाव परमेशानं सद्विरा सुकृ ताजछिः ॥५४॥ ततो वेदविदा तेनाज्ञप्ता शनिगणास्तदा ॥ शिरोऽभिषेकं चज्कस्ते
शिवायाः परमोत्सवाः॥५५॥ देवामिधानसुच्ाय्यं परयक्षणविधि व्यश्ः ॥ महोत्सवस्तदा चासीन्महानन्दकरो शुने॥ ५६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां ततीये पावतीखण्डे कन्यादानवर्णनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ७८ ॥ |
ङ्ताथता प्राप्तकी ॥*५३॥ तब हिमा्यने यजुवद माध्यन्दिन शाखाके स्तोत्रे परमेशान शंकरको हाथ जोड भ्रषएठवाणीसे भसन्न किया॥५४॥ ||
तब वेदकं जाननेवाछे उसने आज्ञाको ठेक्र वे परमउत्सवसे शिवाका अभिषेकं करने रगे ॥ ५९५ ॥ देव अभिधान उच्चारण करके फिर उन्होंने ह
पप्यषण विधिका विधान किया? है खन 1 उस्न समय बडे आनन्दका करनेवाला उत्सव हआ ॥ ५६ ॥ इति भरीशिवमहाएराणभाषारीकायां टै
ुदरसंहितान्तगेततृतीयपोवंतीखंडे कन्यादानवणेनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
ब्रह्माजी बोरे तब हश्वरने भेरी आज्ञासे ब्राहमणोद्वारा अधिको स्थापन कर पर्वतीको अंके ठेकर होम किया॥१॥कक्, यजु ओर सामवेदकै मति 4
लिदी॥२॥ हे! तात तब छोकाचारका विधान करके शिव ओर पावंतीनं ¢
अभि शिवने आहूति दी ओर काठीके भाता मेनाकने छाजांज तात त ९
विधिपूर्वकं अभिक प्रदक्षिणा की ॥ ३ ॥ हे खने ! उस समय गिरिजापति शकने एक अदधत चरित्र किया वह घनो ५ तुम्हारे ट
परमके कारण उपे वर्णन करता हूं ॥ ४ ॥ उसी समये शिवजीकी भायास्े मोहित होकर मने देवीके मनोहर नखचन्दरका दशन किया
॥ ५॥ हे खने | दशन मात्ते हीमं श्षुभित होगया ओर कामे भेरा मन
शि०ु
॥३१०॥
क्षोभको प्राप्त होगया ॥ ६ ॥ वारंवार मोहित होकर मे
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॥ ब्हलोवाच ॥ अथो ममाज्ञया विभरससस्थाप्यानलमीशवरः ॥ होमे चकार तत्ैवमङ्क संस्थाप्य पार्वतीम् ॥१॥ ऋग्यजस्सामम ४
&|| न्तैशवाहति वह्नौ ददौ शिवः ॥ लाजाजरि ददौ कालीभाता मेनाकरस्ञकः ॥२॥ अथ काली शिवञरोभौ चक्रतु्विधिवन्षुदा॥
बह्िपदक्षिणां तात लोकाचारं विधाय च॥३ ॥तचाद्धतमलकरे चरितं गिरिजापतिः ॥ तदेव शृणु दव तवस्नेदाद्रूवीम्यहम् ॥४॥ |£
तस्मिन्नवसरे चाहं शिवमायाविमोहितः॥ अपश्यञचरणे देव्या नखेन्दु मनोदरम्॥५॥दशंनात्तस्य च तदाऽभूर्वदेवसुने द्यदम् ॥ ||&
| मदनेन समाविष्ठोऽतीव क्षुभितमानसः॥६॥ खहु्हुरपश्यं वं तदग स्मरमोहितः ॥ ततस्तदर्शनात्सदयो वीय मे भ्रच्युतद्धवि ॥७॥ ¢
¢ रेतसा क्षरता तेन थ हं क ॥ सुने व्यम तच्छिश्च चरणाभ्यां हि गोपयन् ॥८॥ तज्ज्ञात्वा च महदिवश्चकोपातीव
नारद ॥ हन्तुमैच्छन्तदा शीघ्र वं विधि काममोहितम् ॥९॥ हाहाकारो महानासीत्तच सर्वर नारद् ॥ जनाश्चकम्पिरे सर्वँ भय 4
ह| मायाति विश्वभृत् ॥१०॥ ततस्त॑न्तषुश्शम्धु विष्ण्वाद्यानिजंरा शने ॥ सकोपम्भज्वलन्तन्तन्तेजसा इन्तुयुद्यतम् ॥ ११॥ ट
|| देवीके नखचन्द्रको देखने ठ्गा ओर उसीकै दशनसे भेरा रेत पृथिवीम पतित हुआ ( अर्थात् सषि रचनाका अहंकार् पतित हआ ) प
# ॥ ७ ॥ उत्त रेतकर पात होनेसे भ बडा ङित हूभा ओर चरणोमे उसको छिपाते हए 'युांगको मर्दित किया ॥ < ॥ हे नारदजी यह ¢
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देखकर महादेवजीको बडा को दुआ ओर काममोहित सञ्चको शीघही मारनेकी इच्छा कौ ॥ ९ ॥ हे नारदजी ! उस समय सरव ||
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ग्रहान् हाहाकार होने गा, सब मलुष्य कांप गये ससार भयभीत हौगया ॥ १० ॥ हे शने ! तब विष्ण आदिं देवता शिषजीकी स्तुति
करने गे उस समय उनके कोपका तेज मानो मार डा ही चाहता था ॥ ११ ॥ देवता बोठे हे देवदेव ! हे जगते व्यापक ! हे परमेश
६ सदाशिष ! जगत्पति जगन्नाथ हे जगन्मय ! आप प्रसन्न हो ॥ १२॥ हे दैव ! सत भारवोके आप् आत्मा हेतु ओर ह्वर हो निविंकार
अविनाशी नित्य निविकल्य अक्षर ओर सवते परे हो ॥ १३ ॥ आपका आदि अन्त मध्य॒ यह सव कुछ नही है बाहर भीतर सबसे आप ¢
परे हो यह जो कुछ है सो आप नहीं हो आप सत्य स्वह्प बह ओर चिद्रूप हो ॥ ३४ ॥ यक्तिकी कामनावारे इढवत सुनिजन आपहीके
चरणोको सब संग छोडकर उपासना करते है ॥ १५ ॥ आप पू्णंब्ह् अमृत स्वरूप शोकरहित नियैण ओर परम हो, आनन्द ॒मात्र ्यथ्रता
देवा उचुः ॥ देवदेव जगब्यापिन्परमेश सदाशिव ॥ जगदीश जगन्नाथ सम्प्रसीद जगन्मय ॥ १२ ॥ स्वेषामपि भावा
, नान्त्वमात्मा हेतुरीश्वरः ॥ निविकारोऽभ्ययो नित्यो निविकल्पोऽस्षरः परः ॥ १३॥ आद्यन्तावस्य यन्मध्यमिदमन्य
दहम्बहिः ॥ यतोऽव्ययः सनैतानि तत्सत्यम्ब्रह्म चिद्भवान् ॥ १४ ॥ तवैव चरणाम्भोजम्युक्तिकामा दढत्रताः ॥ विसृज्यो
भयतस्संगं सुनयस्समुपासते ॥ १५ ॥ त्वम्ब्रह्म परणममृतं विशोकं नियंणम्परम् ॥ आनेदमाजमव्य्रमविकारमनात्मकम्
॥ १६ ॥ विश्वस्य हेतु रूदयस्थितिसंयमनस्य हि ॥ तदपेक्षतयात्मेशोऽनपेक्षस्सव॑दा विथुः ॥ १७ ॥ एकस्त्वमेव सदसद्र
यमद्भयमेव च ॥ सवण कृताकृतमिव वस्तुभेदो न चैव हि ॥ १८ ॥ अज्ञानतस्त्वयि जनै्विकल्षो विदितो यतः ॥ तस्माद़मम
तीकारो निरूपाघेनं हि स्वतः ॥१९॥ धन्या वय महेशान तव दशंनमात्रतः॥ दटथक्तजनानन्दप्रदश्शम्भ दयां ङ् ॥ २० ॥
रहित विकार रहित आत्मासे भी प्रे हो ॥ १६ ॥ संसारके उत्पत्ति, पान ओर भख्यके तुम ही हेतु हो हे विभु ¡ हे आत्मके ईश्वर ।
आपको कुछ अपेक्षा नहीं ओर दूरे आपरकी अपेक्षा करते है ॥ १७ ॥ आप् एक ही सतु अस्त दैत, अद्वैत हो, जैसे सुवणकी वस्तुओमिं
सुवणेसे कुछ भेद नहीं है ॥१८॥ अज्ञानसे परूषोने आपमं विकल्पका आरोप किया है इससे उपाधिमे रम है, निरुपाधि भका भरतीकार
हो जाता है॥ १९ ॥ हे महेशान ! हम धन्य ह जो आपके दशन मारे इम भक्तजनोको इढ आनंद मिखा है, हे भक्तवत्सछ ! अब,
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द्या कीजिये ॥ ३० ॥ तुम ही आदि अनादि भरकतिसे परे परुष ह, तुम विश्वेश्वर जगन्नाथ निर्विकार परेसे परेहो ॥ २ १॥ यहं पिता
मह ब्रह जी रजोधगकी विवि है ओर आपके भदे रूपोत्म विष्यं सलयुणक सतिं है ॥ २२ ॥ काभ रद् ` परमातमा तम् |
यणोपि परे है वह आप सदाशिप महेशान सर्वपाप महिश्वर ह ॥ २३.॥ व्यक्त, महत्तस पैचमहाभूव तन्मात्रा भर इन्दिय हे १ । ह
विश्वकी मूत्तिं ! यहं सव॒ आप्ते ही अधिष्ठान किमि हए है ॥ २४ ॥ `हे महादेव 1 हे परेश ! है करुणामय ! हे शकर ! हे देवदेषेश इरूषो
त्वमादिस्त्वमनादिशच परकृतस्त्वं परः पुमान् ॥ विश्वेश्वरो. जगन्नाथो निर्विकारः षरात्परः ॥.२१॥ योऽयं ब्रह्मास्ति,रजसा
विश्यूतिः पितामहः ॥ त्वत्मसादात्मभो विष्णस्सत्तवेन पुर्षोत्तमः ॥ २२॥ कारोभिर्ढस्तमसा परमात्मा णेः परः॥ सदा
शिवो महेशानस्सर्वन्यापी महेशवरः॥२३॥व्यक्तं महच्च धूतादिस्तंत्मा्राणीन्द्रियाणि च॥त्वयेवांधिष्ठितान्येव विश्वमूतें महेवर
॥ २४ ॥ महादेव परेशान कुणाकर शंकर ॥ धसी देवदेवेश भरसीद पुरषोत्तम ॥ २९ ॥ वासांसि. सागरास्सपत दिशश्चैव
महाथुजाः ॥ बयां ते विभोनांभिः खं वायुनासिका ततः॥ ददै ॥ चश्चष्यभ्री रविस्सोमः केशा मेषस्तव भ्रभो ॥ नक्षता
रकाद्य।त्रहाश्चिव विभूषणम् ॥ २७ ॥ कथ स्तोष्यामि देवेश त्वां विभो परमेश्वर ॥ वाचामगोचरोऽसिं त्वं मनसा चापि
शंकर ॥ २८ ॥ पञ्चास्याय च हद्रायपञ्चाशत्कोरिभूर्तये ॥ उयधिपाय वरिष्ठायै विद्यातत्त्वाय ते नमः ॥ २९ ॥
तम ! अब्र अप प्रसन्न हजिपे ॥ २५॥ प्रातो घुर आपके व्व, दशो दिशा आपकी दृशमुजा, हे विभो ! यलोक आपका शिर, आकाश
नाभि ओौर वायु तुम्हारी नासिका है ॥ २६ ॥ अश्रिं रक्षि ओर सोम तुम्हारे नेव है) ह, विभो ! मेष. तुम्हारे कैश है नक्षत्र , तारे ओर प्रह
यह तुम्हारे भूषण ह ॥२७॥ हे उयापक् परमेश्वर ! हे देवेश 1 मेँ किष प्रकार तुम्हारी स्मृति कर सकता हू है शंकर आप म॒न वचने तो परे हो
॥२८॥ आप प॑चय॒ल शुद्र पचास कोटि मूर्तिवाडे हो, तीन छोकके अधिपति सवश वियातत्छकै अधिपति आपक्तो प्रणाम है ॥ २९ ॥ |
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ज ००००००००.
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१ अन्त्भावितष्य्थः 1
-
| कृहनेमे नहीं आते, नित्य स्वप वियुत ज्वालाके रुपवाटे हो अभ्रिवणै देव शकरके निमित्त हम प्रणाम करते है ॥ ३० ॥ कोटि | |
ठीके समान प्रकाशमान् आठकोन मनोहरहप 'धारण कर आप इत्र लोकम स्थित ह आपको प्रणाम है॥ ३१॥ ब्रह्माजी बोे ठ
उनके यह वचन सुनकर परमेश्वर प्रसन्न हए ओर यञ्च नक्षाजीके निभित्त भक्तवत्सठने शीघरही अभय दिया ॥ ३२॥ उसी ¢
समय विष्णु आदि सब देवता ओौर खनि कुठेक सुस्काकर प्रम उत्सव करने ठगे ॥ ३३ ॥ हे तात! मेरे उस्र रेतकै वारंवार
मदित होनेसे बहुतसे परम उजञ्ज्यरु कनके होगये ॥ ३४ ॥ जिससे सहस्रां बाठखिल्य कमि प्रग ` हए,. ओर वे बीर्के कनकोपि ||६
अनिर्दैश्याय नित्याय विदयुज्ज्वाङाय रूपिणे ॥ अग्निवर्णाय देवाय शंकराय नमोनमः॥ ३० ॥ वित्कोरिभरतीकाशमष्टकोणं |©
सुशोभनम्॥ रूपमास्थाय लोकरेऽस्मिन्संस्थिताय नमो नमः॥३१। ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तेषां पसत्तः परमेनवरः॥ ब्रह्मणो |£
मे ददौ शी्रमभय् भक्तवत्सलः ॥३२॥ अथ सवे सुरास्तत्र विष्ण्वाधा सुनयस्तथा॥ अभवन्स॒रिमतास्तात चङकश्च परमोत्सवम् |£
॥ ३२ ॥ मम तद्रेतसा तात मदितेन स॒हुहुः ॥ अभवन्कणकास्तच भूरिशः परमोज्ज्वलाः ॥ ३४ ॥ ऋषयो बहवो जाता ६
वार्खिर्यास्सदस्रशः ॥ कणकेस्तैश्च वीर्यस्य प्रज्वलद्भिः स्वतेजसा ॥ ३५ ॥ अथ ते द्षयस्सवे उपतस्थुस्तदा सुने ॥ |
ममान्तिकंपरप्रीत्या तात तातेति चाह्ुवन् ॥ ३६॥ ईन्वरेच्छप्रयक्तेन प्रोक्तास्ते नारदेन हि॥ बाखखिल्यास्त ते तच कोपयुक्तेन 4 1
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` चेतसा ॥ ३७ ॥ ॥ नारद उवाच ॥ गच्छध्वं संगता युयं पर्वतं गन्धमादनम ॥ न स्थातन्यम्भवद्धिश्च न हि वऽ प्रयोजनम्
॥ २८ ॥ तञ तप्त्वा तपश्वाति भवितारो स॒नीभ्वराः॥ सूय्यंशिष्याश्शिवस्थेवाज्ञया मे कृथितन्त्विदप्र् ॥ ३९॥
भ्रगट हए अपने तेजसे प्रज्वछिति होने ठ्गे ॥ ३५ ॥ हे सुने ! तव वे सव कऋश्रि मेरे समीप स्थित होकर परभ प्रीतिसे
पिता पिता कहने -छगे ॥ ३६ ॥ तब ईश्वरकी इच्छसे नारदजीने चित्तं कूोषकेर उन बारसिल्य ऋषिस कहा ` ॥ ३७ ॥ मारदजी
बोले तुम सव एक साथही गंधमादन पवेतको जाओ तुम यहां स्थित मत् हो तुम्हारा द प नन गही ह ॥.१९ ॥ वहो कम श प्रयोजन नहीं है ॥ ३९ ॥ वहां तुम॒बहुतसा
१ आत्मनेपदमार्षम् ।
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शि०्पुर 2
॥३१२॥ ¢
रु.म. २
पा.खं.३
अ०४९
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त॒ शिवजीकी आज्ञासे कही है ॥ ३९ ॥ बहमाजी बोटे यह वचनं
तप करके मुनीश्वर हो जाओगे ओौर सूर्यके शिष्य हो भने यह ब =
सा र चरे गये ॥ ४०॥ हे अनीश्वर ! विष्य आदिने भी
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हुने ही वे सम्पूण ऋषि भगवान् शकरको भरणाम कर बहुत शी गेधमादन परव॑तको श्वर ! विष्ण ४
उस समय सचे समन्ञाया ओर महात्माओकी प्रेरणासे मँ निभेय हुआ ॥ ४१ ॥ _ उत्त समयमे भक्तवत्सलं सव कायेके करनेवाठे तथा दुक #
गर्व हरनेवाछे करको स्ति करने ठ्गा ॥ ४२ ॥ हे देवदेव 1 महादेव ! है कर्णासागर ¡ हे भमो । तमही सबके कती मता ओर
सवथा हरता हो ॥ ४३ ॥ आपकर इच्छति हौ यह चराचर स्थित हो रहा है, जे नाथते बेड नथ होते है, इस प्रकार आपसे यह स्व नथ ४
॥ ब्रह्नोवाच ॥ इत्युक्तास्ते तदा सव बारखिस्याश्च पर्वतम्॥ सत्वरम्प्रययुर्नत्वा शंकरं गन्धमादनम्॥४ ०॥विष्ण्वादिमिस्तदाभवं ¢
न्वासितोह छनीश्वर ॥ निर्भयः परमेशानपेरितैसतमहात्मभिः ॥४१॥ अस्तवश्चापि सरवैशं शंकरम्भकतवत्सलम् ॥ सर्वकार्यकरं
जञात्वा द्टगर्वापदारकम्॥४२॥ देवदेव महादेव कक्णासागर प्रभो ॥ त्वमेव कृतां स्वस्य भता हत्तां च सर्वथा ॥४२॥ त्वदिच्छया ए
हि सकलं स्थितं हि सचरचरम्॥तन्त्यां यथा बलीषदां मया ज्ञातं विशेषतः ॥४४॥ इत्येवशुक्ता सोहं वे प्रणामे चकृताजलिः ॥ ६
अन्येऽपि तुष्टवुस्सवे विष्ण्वायास्तं महेश्वरम् ॥ ४५ ॥ अथाकण्यं लति शुद्धां मम दीनतया तदा ॥ विष्ण्वादीना्च सर्वेषां ||९
परसन्नोऽभून्महेश्वरः ॥ ४६ ॥ ददौ सोतिवरं म्मभयं प्रीतमानसः ॥ सवं सुखभतीवापुरत्यमोदमहं शुने ॥ ४७ ॥ इति |
श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शरसंदितायां तृतीये वार्वतीखण्डे विधिमोहवणैनं नाम नवचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ £
रहा है ॥ ४४ ॥ यह कहकर भने हाथ जोड प्रणाम किया, ओर विष्ण आदिने भी महेश्वरकी स्तुतिकर् उनको भरसन्न किया ॥ ४५॥||¢
सबकी शुद्ध स्तुति सुन ओर मेरी दीनता देखकर हेश्वर, विष्ण आदि सबं पर प्रसन्न हए ॥ ४६ ॥ ओर अभय करकं भरति युक्त मनते ||
स्च सृष्टि करनेका वर दिया, हे मुने ! उस समय सवनेही शख ओर आनंद माना ॥ ४७ ॥ इति श्रीरिवमहाराणे भाषाटीकायांस्ब्ंहिता ||
न्तगेततृतीयपावंतीखण्डे एकोनपञाशोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ ४,
|
बह्लाजी बोठे हे उने ! तब मैने शिवजीकी आ्ञासे ख॒निगणोके साथ परभ धीतिंते पावती ओर शिवके शेष कत्यको सम्पादन किया ॥ १
नारदजी 1 तब उन दोनेक्रै शिरपर अभिषेक किया गया; ओर ब्राहमणोनि आदरसे शिका दशन कराया ॥ २ ॥ इनके उपरांत हदय
स्पशका कायं कराया गया हे विरद बडे महोत्सवपरवक स्वस्तिवाचन हुआ ।३॥ फिर शिवजीने बाहणोकी आज्ञासे पारवती शिरमे सिन्वूर
छगाया, उस समय पार्वतीकी शोभा अद्भुत ओर वणेनयोग्य हो गदं ॥४॥ फिर बाहर्णोकी आज्ञासे शिवा शिव दोनों एक आस्षनपर विराजे
| ओर भक्तौके चित्तम आनन्द उपजानेवाखी प्रम शोभाको प्राप्त हृए ॥ ५ ॥ फिर अपने स्थानपर आकर अद्भुत कीला करनेवाठे उन दोनोनि
।
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॥ ब्रह्मोवाच ॥ ततश्वादं सुनिगणेश्शेषकृत्यं शिवाज्ञया ॥ अकार्ष नारद प्रीत्या शिवाशिषविवाहतः॥ १।तयोशशरोऽभिषेकश्च बभूवा
द्रतस्ततः ॥ धुवस्य दशंनं विप्राःकारयामासुरादरात्॥२॥हदयालम्भनं कमे बभूव तदनन्तरम् ॥ स्वस्तिषाठथ विप्रेन्द्र महोत्सव
पुरस्सरः ॥ ३ ॥ शिवाशिरसि सिन्द्रर ददौ शम्धुर्िजाज्ञया॥ तदानीं गिरिजाभिख्याद्तावण्यौ बभूवह ॥४॥ ततो विप्ाज्ञया तौ
द्वावेकासनसमास्थितौ ॥ केभति परमां शोभां भक्तचित्तयुदावहाम्॥५॥ ततः स्वंस्थानमागत्य संखवग्राशनं शुदा ॥ चक्रतुस्तौ निदे
शान्मेऽद्धतलीलाकरौ सुने ॥8॥ इत्थं निवृत्ते विधिवदयाज्ञेवैवादिके शिवः ॥ बरह्मणे पूर्णपाचं मे ददौ लोककृते मचः ॥ ७॥ गोदानं
| विधिवच्छम्धुराचायाय ददौ ततः ॥ महादानानि च भ्रीत्या यानि मङ्गलदानि वे ॥८॥ ततश्शतस्ुवर्णं च विमेभ्यस्स ददौ पृथक्
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बहुभ्यो रत्नकोटीनानाद्रब्याण्यनेकशः॥९॥तदानीममरास्सवे परे जीवाशराचराः॥ुषुडुभतसातीव बभूवाति जयध्वनिः॥१०॥
भतिज्ञपूषंक मिष्ट भाशन किया ॥ ६ ॥ जब इसपकारसे विवाहका कत्य परा हो चुका तो शिदरजीने लोकटीकाके अलुक्षार य॒ज्ञ बह्माको
पूण पात्र दिया ॥ ७ ॥ किर शिवजीने आचायेके निभित्त विधिपरवक गोदान किया, दूसरे जो भगङ देनेवाटे महादान है वह भी परम
£ || मेमते किये ८ ॥ किर पृथक् पृथक् बाहमणोके निमित्त शत शत सुवणं खुदा दीं तथा अनेकों रतकोटी ओर अनेक भरकारके द्रव्य दिये
|| ॥ ९ ॥ उस समय सव देवता ओर चराचर दृक्तरे जीव बडे भरसन्न होकर जयजयकार करने ठे ॥ १० ॥
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ओर सब भकारे चारों ओर मंगर गान होने गा ओर सब आनन्दकी देनेवाटी बार्जोकी ध्वनि होने ठगी ॥ ११ ॥ विष्णजी म तथा
दूसरे देवता कषि खनि गिरीकी आज्ञासे 4 सन्न हो अपने २ ठहरनेके स्थारनोको गये ॥ १२ ॥ उस समय हिंमाङयके नगरकी द्विया
शिक्रको लेकर ठहकोरके स्थानम गई ॥ १३ ॥ ओर पे च्चये परम आद्रसे लौकिकाचार करने लगी, ओर स्व॒ ओरसे आनन्द्का
करनेवाठा महोत्साह हआ ॥ १४ ॥ तब बे शिवा शिवको छवा ठे जाकर महा दिव्यवाक्नाख्यमे ठे जाकर टोकिंक आचार् करती हइ
॥ १५ ॥ इस प्रकार गिरिराजकै नगरकी च्विय समीप आय मंगर क्से निदत्त होकर दोनों ल्ली इर्षोंको षरं भप्त करती हदं ॥ १६ ॥
मङ्गलध्वनिगानञ भरव बहु स्वेतः ॥ वाद्ध्वनिरभूद्रम्यो सर्वनन्दभरवृ्दनः ॥ ११ ॥ इरिर्मयाथ देवाश्चसुनयश्चापुरेऽखिलाः ॥
गिरिमामन्ञ्य सुप्रीत्या स्वस्थानम्पययुद्धुतम्॥ १२ ॥ तदानीं शरनगरे किय दिता वरम् ॥ शिवाशिवौ समानीय ययुः कुह
वराल्यम् ॥ १३ ॥ लोकिकाचारमाजहस्ताः ्ियस्तच चाहताः॥ महोत्साहो बश्वाथ सर्वतः श्रधुदावदः ॥१४॥ अथ तास्तौ
शि° पु9 ।
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समानीय स्पती जनशंकरौ ॥ वासाल्यम्महादिव्यं भवाचारं व्यधु्दा॥१५॥ अथो समीपमागत्य शङेन्द्रनगरश्ियः ॥ नित्य
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॥३१३। |
मङ्गलं कर्म भाप्यन्दस्पती एहम्॥ १६॥कृत्वा जयध्वनि चकुभन्थिनिमोचनादिकम्॥ सस्मितास्सकटाक्षाच पुलकाशचितविग्रहाः
॥ १७ ॥ वासगेदं सम्पविश्य धुः कामिनीवराः ॥ प्रसंशन्त्यस्स्वभाग्यानि पश्यन्तः रमेश्वरम् ॥१८॥ महाघुषूपवेषश्च सरव
लावण्यसंयृतम् ॥ नवीनयौवनस्थच कामिनीचित्तमोदनम्॥१९॥हषद्धास्यत्रसत्नास्यं सकटाक्षं सुसुन्दरम्॥ सुसुकष्मवासो बिभ्राणं
नानारत्न विभ्रूषितस् ॥ २० ॥ तदानीन्दिग्यनार् षोडशारं समायुः ॥ तौ दम्पती च संद्रष्टुं महाद्रषुरस्सरम् ॥ २१ ॥
ओर जय ध्वनि करके भ्रेथि खोखने ठगीं इस समय हास्य ओर कराक्षौते उनके शरीर उटकायमान होगये ॥ १७ ॥ वे गरेष्ठ चये
सघरमे भरविष्ट हो पावती परभेश्वरको देखकर अपने भाग्यकी बडाई करने रुगीं ॥ १८ ॥ वह महास्वरप वाका पेष सम्पूणं मनोहरतासे युक्त
तथा नदीन यौवनम स्थित कामिनि्योका चित्त मोहित करनेवाला था ॥ १९ ॥ कुेक हास्यसे भसन्न ल कटाक्षो बन्दर, बारीक
व्च धारण किये हष अनेक रत्नोसे विभूषित ॥ २० ॥ उस्र सभय उन दो्नोकै दशन करनेकी परभ भ्रीति भौर आदरे षोडश .
रुण्स.ये
पाखं.३
अ००
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तुम्हारे समीप प्राप्त हृदे, हे काञक ! अब इनका मुखचन्द्र देखकर विरहका दुःख त्याग करो ॥२६॥ हे काठके अधिपति ¡ आप् इस
सरस्वती च लक्ष्मीश्च सावित्री जाह्नवी तथा ॥ अदितिश्च शची चैव लोपाघुदराप्यरन्धती ॥ २२ ॥ अहल्या तुलसी स्वाहा
रोदिणी च वसुन्धरा ॥ शतरूपा च सज्ञा च रतिरेतास्पुरक्ियः ॥ २३ ॥ देवकन्या नागकृन्यु सुनिकन्या मनोहराः ॥
त या याः स्थितास्तासां सङ्ख्यां कत च कः क्षमः ॥ २४ ॥ ताभी रत्नासने दत्ते तओोवास शिवो खदा ॥ तशः कमतो
देग्यस्सुहासं मधुरं वचः ॥ २५ ॥ सरस्वत्युवाच ॥ प्राप्ता सती महादेवाधुना प्राणाधिका सुदा ॥ दष्टा मियास्यञन्दरा्भ
सन्तापन्त्यज कामुक ॥ २६ ॥ कारं गमय कारश सतीसरेषपु्वकम्॥ विशेषस्ते न भविता सर्वकारं समाधिता ॥ २७ ॥
लक्ष्मीरुवाच ॥ लनां विहाय देवेश सतीं कृत्वा स्ववक्षसि ॥ तिष्ठ ताम्परति का लज्जा प्रणा यान्ति यया विना ॥ २८॥
साविच्छवाच ॥ भोजयित्वा सती शम्भो शीर त्वं युक्षव मा खिदः ॥ तदाचम्य सकषूरन्ताूलं देहि सादरम् ॥ २९ ॥
जाह्वव्युवाच ॥ स्वणणकांतिकरां धृत्वा केशान्माजंय योषितः ॥ कामिन्यास्स्वाभिसौभाग्यसुखं नातः परं भवेत्॥ ३० ॥
भार्टिगन पूवक अपना समय बिताशये ओर भेर आभमसे किती समय भी तुम्हारा वियोग न हो॥२७॥ढक्ष्मी बो ह देवेश ! अव रुननाको
छोडकर सतीको अपनी गोदी रो, ओर जिसके बिना भाण जाते ये, अब उत्क पति क्या र्ना है ॥ २८ ॥ साविनी बोरी है शिवजी !
रमसे सतीको भोजनकरा कर ठम शीघ्र मोजन करो, किसी नातका खद् भत भानो, आचभनकर सतीको कूर भिभित ताम्बूढ दीजिपे॥२९॥
नाही बोरी आप सुवणेकी कान्तिवाटी कंवीको हाथमे ले प्यारीके केशोको माजन करो स्वामीके सौ मागयवाठी चियोको इसे अधिक
१३२
प
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| (कषीया) दिव्यनारिये वहां आकर भाष हई ॥२१॥ सरस्वती, ठष्ष्मी, सावित्री, गंगा, अदिति, शची-इन्दराणी, रोषाञदरा, अरुन्धती |
अहल्या. तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, वसुन्धरा, शतदूपा ओर सज्ञा तथा रति यह देवताओंकी सिये आई ॥२३॥ देवकन्या, नागकन्या, मनोहर
परुनिकन्या इत्यादि जो वहां आदं थीं उनकी संख्या करनेमे कौन समथ है ॥ २४ ॥ उनको भी रलोके आसन दिये गे वे िवके समीप
वेठीं ओर वह कमसे मधुर परिहासके मधुर वचन बोटीं ॥ २५ ॥ सरस्वती बोी हे महादेव | इस समय भराणोति अधिक प्यारी सती देवी
34०4
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|
न 22 रत्य
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ओर सुख नहीं है ॥ ३० ॥ अदिति बोरी हे शकर ! भोजन कर चुकने प्रर आप सुल शुदधिकै निमित्त आचमन करानकौ पारवतीकौ श £
दीजिये पे दम्पतिका मम दुम है ॥ ३१ ॥ इन्द्राणी बोरी जिसके निमित इतने विप किये थे तथा जिस निमित महस भ्रमत ||
फिरेथे उसको गोदीमे टेनेसे तुमको अब कया लना है ॥ ६२ ॥ रोपाखु्रा बोली हे शकर ! यहं व्यवहार है वासगृहे भोजन करके शिव
ताम्बूक देकर शयन कीजिये यही श्वियों का उ्यवहार है ॥ ३३ ॥ अरुन्धती बोली मेना तुमको शिवा नहीं देना चाहती थी मँनेही अनेक
रकार से समञ्चा कर राजी किया था, अब इनके संग सुरति करो ॥ ३४ ॥ अहल्या बौली, आप वृद्धा अवस्थाको छोडकर तरुण हौ जाइये
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अदितिरवाच ॥ भोजनान्ते शिवः शम्यं खुखंश्ुदधयर्थमादरात्॥ जलं देहि महाप्रीत्या दभ्पतित्रेम दुकुमम् ॥३१॥ शच्युवाच ॥
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हारोऽस्ति च श्रीणां भुक्ता वासगृहे शिव ॥ दत्वा शिवायै ताम्बूरं शयनं कर्मरईसि॥३३॥अशन्धत्युवाच ॥ मया दत्तां स॒तीमेनां £
तुभ्यन्दातुमनीप्सिताम्॥ विविधं बोधयित्वेमां सुरतिकर्तुमर्दसि॥३४॥ अहल्योवाच ॥ वृद्धावस्थाम्परित्यञ्य ह्यतीव तरणो भव्॥
येन मेनामन्येत त्वां सुतार्पितमानसा॥३५॥ तुरस्थुवाच॥ सती त्वया परित्यक्ता कामो दग्धः पुरा कृतः॥ कथन्तदा वसि्ठश्च
प्रभो प्रस्थापितोऽधुना॥३६।स्वाहोवाच ॥ स्थिरो भव महादेव श्लीणांवचसि साम्प्रतम्॥ विवाहे व्यवहारोऽस्ति पुरन्धीणां प्रग
भता ॥३७॥ रोदिण्युवाच ॥ कामम्पूरय पार्वत्याः कामशाञ्चविशारद् ॥ इङ् पारंस्वयं कामी कामिनीकामसागरम् ॥ ३८ ॥
जिससे मेना एत्रीदान करके तुमको माने ॥ ३५ ॥ तुरुसी बोटी प्रहे तुमने स्षती को त्यागा किर कामदेवो जछाया फिर
|| पार्वतीके निभित्त तुमने वशिष्ठको कैसे भजा ॥ ३६ ॥ स्वाहा बोखी हे महादेव ! स्थिर होकर इस समय श्वियोके वचन शुनो विवाहम यह &
व्यवहार होता है किं विय प्रगल्भ हो जाती है ॥ ३७ ॥ रोणी बोली हे कामशाद्भे पंडित आप पव॑तीकी कामना पूणं कीजिये हं ¢
कामी ! आप स्वयं कामिनी हप काम सागरको पार कीजिये ॥ ३८ ॥ =
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कृत्वा विलापं यद्धेतोः शिवां कृत्वा च वक्षसि ॥ यो बभामानिशं मोहात् का जा ते प्रियाम्परति॥३२॥छोपायुदरोवाच ॥ व्यव ४
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| बोटी हे भाक्कै ज्ञाता ! आप काषसे आतं हदं वियोके भावको जानते हो हे शंकर ! अपने वामी दश्वरको कोन नहीं निरन्तर
करता है ॥ ३९ ॥ शतहपा बौटी भूखा रूष दिव्य भोगके भोगे विना संतुष्ट नहीं होता है शंकर जित परकारसे तष्टहो वह वि्योक
करना उचित है ॥ ४० ॥ संज्ञा बोटी हे सखीजनो ! रत्नका दीपक बाखकर ओर ताम्बूल रखकर प्रम भरीतिसे एकान्तम परग
उसषपर शीघही पावती ओर शंकरको स्थापन कर दो ॥ ४१ ॥ बरह्लाजी बोे सियोंके यहं वचन सुन स्वयं शिवजी उनसे कहने ठ्गे जो
भगवान् निर्विकार ओर योगीन्द्रोके स्के गुरू ई ॥ ४२ ॥ शक बोरे हे देवयो ! इ प्रकारके वचन हमारे समीप मत कहो तुम साध्वी
॥ वसुन्धरोवाच॥ जानासि भावं भावज्ञ कामार्तानां च योषिताम् ॥ न च स्वं स्वामिनं शम्भो ईश्वरं पाति सन्ततम्॥ ३९॥ शतश
पोवाच ॥ भोगं दिभ्य विना भुक्त्वा न हि तुष्येक्षुधातुरः ॥ येन तुष्टि भवेच्छभो तत्कर्त॑ुचितं क्ियाः ॥४०॥ ॥ संज्ञोवाच ॥
तूर्णं प्रस्थापय प्रीत्या पार्वत्या सद शङ्करम् ॥ रत्नप्रदीपन्ताम्बूलं तत्पं निर्माय निजने ॥ ४१ ॥ ॥ बह्लोवाच ॥ श्रीणान्तद्चनं
त्वा ता उवाच शिवः स्वयम् ॥ निविकार्च भगवान्योगीन्द्राणां रोगैः ॥४२॥ शंकर उवाच ॥ दैव्यो न व्रत वचनयेरवेभूतं
ममान्तिकम् ॥ जगतां मातरः साध्व्यः पुत्रे चपलता कथम् ॥४३॥ ब्रह्मोवाच ॥ शङ्करस्य वचः त्वा खुजितास्खुरयोषितः ॥ `
बभूवुः सम्भरमाततष्णीं चिजपत्तठिका यथा ॥४४॥ भुक्त्वा मिष्ठान्नमाचम्य महेशो ष्टमानसः ॥ सकूरं च ताब्मलं बुभुजे भार्य
या सह॥४५॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शद्रसंहितायां ततीय पार्वतीखण्ड परिहासवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥५०॥
जगत्की माता हो अपने पतरम चपठ्ता क्रिस प्रकार करती हो ॥ ४३ ॥ ब्रतलाजी बोठे शिवजीके यह वचन सुनकर सब देवताओंकी चवियं
छञ्जित होगदं ओर सम्भ्रमे मौन हो चित्र एतकीके समान छिसी रह गई ॥ ४४ ॥ फिर पिष्टान्न भोजन कर तथा आचमन कर शिवजी
बहे प्रसन्न हुए तथा भायौसहित कपूरयुक्त ताम्बूखक्रा सेवन क्रिया ॥ ४५ ॥ इति श्रौशिवमहाएराण भाषारीकायां रुदसंहितान्तर्ततृतीय
'पावंतीखण्डे परिहास्वणनं नाम पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
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॥२१५९॥ १
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जलाजी बोट उस समय रति अयु समय जानकर सन्न हो भक्तवत्सल
त्सङ दीनानाथ शंकरसे बोखी ॥ १ ॥ रति बोटी आपको
पने किच निमित्त भस्म किया ॥ २॥ आत्मा कामव्यापार होनेसे मेर
पावंतीने अतिदुम सौभाग्य भाप किया है, मेरे भ्राणनाथको आ ॥ =
ध ३ ॥ इस आपके विवाहोत्सवमं सभी मलुष्य प्रसन्न है हे
परतिकी जीवयात्रा सम्पादन करो, ओर भेरे वियोगका सन्ताप आप दूर कीजिये ॥ # 1
महेशान ¡ इकटी जँ ही अपने पतिक विना दुःसिनी हूं हे॥४॥ हे देवं शकर ! प्रसन्न होकर आप् सज्ञे सनाथ कीजिये, हे दीनबन्धु । हं प्रम
मु ! जो जो आपने कहा है, उत्ते सत्य कीजिये ॥५॥ इसत चराचर त्रिकोकीमे आपके बिना कौन मेरा दुःख नाश करनेको समथं है, एसा
॥ ब्रह्नोवाच ॥ तस्मित्रवसरेज्ञात्वाचकूलं समयं रतिः ॥ सुप्रसन्ना च तम्प्राह शङ्करंदीनवत्सलम् ॥ १ ॥ रतिरूवाच ॥ गृदीत्वा `
पार्वतीं प्राप्तं सौभाग्यमतिदुभम् ॥ किमर्थ प्राणनाथो मे निस्स्वार्थं भस्मसात्कृतः ॥ २ ॥ जीवयाजा पति मे हि कामव्या
पारमात्मनि ॥ करु दरं च सन्तापं समविश्लेषहेतुकम्॥ ३॥ विवाहोत्सव एतष्मिन् सुखिनो निखिखा जनाः ॥ अदमेका मदेशान
दुःखिनी स्वपतिम्विना ॥४॥ सनाथां कुङ् मान्देव प्रसन्नो भव शङ्कर ॥ स्वोक्तं सत्यस्विधेहि त्वं दीनबन्धो पर प्रभो ॥ ५ ॥
त्वाम्विना कस्समर्थोतर त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ नाशने मम इःखस्य ज्ञात्वेति कर्णां ₹्॥६॥ सोत्सवे स्वविवाहिऽस्मिन्सर्वानन्द्
प्रदायिनी ॥ सोत्सवामपि मां नाथ र् दीनकृपाकर॥७॥ जीविते मम नाथं हि पार्वत्या प्रियया सह ॥ सुविहारः प्रपूर्णश्
भविष्यति न संशयः ॥ ८ ॥ सवं कतुं समर्थोसि यतस्त्वं प्रमेश्वरः ॥ किम्बहूक्त्या् सवश जीवयाञ्यु पतिं मम ॥ ९ ॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥ तदित्युक्का कामभस्म ददौ समन्थिबन्धनम् ॥ श्रो पुरतश्शंस्भोनथं नाथेत्युदीर्यं च ॥ १० ॥
जानकर आप मेरे उप्र छपा करं॥ ६ ॥ स्वके आनंद देनेवाठे आपके दस विवाहोत्सयमें सब आनंदी ह हे नाथ ! हे कपास्चागर !
है दीनरक्षक ! भेरा मनोरथ पूरा कर सक्ष भी उस्सववाटी कीज्ि ॥७॥ इसमे संदेह नहीं कि मैरे खामीके जीवित होते ही
पावतीकै सहित आपका विहार पूण होगा ॥ ८ ॥ आप परमेश्वर हो इते सव कुछ पूण करने समर्थ हो हे सवके इश्वर । बहू
कृहनेसे क्या है आप भरे पतिको जीवित कीजिये ॥ ९ ॥ बज्ञाजी बोठे यह कहकर वह गामे बंधी हई कामकी भस्म ॒शंकरके
आगे रखकर सन्छख हा नाथ! हा नाथ ! कहकर रुदन करने ठगी ॥ १० ॥ रतिका रोना सुनकर ओौर भी देवताओंकी ्
रोने रुगीं ओर वै सब बड दीन वचन बोलने छ्गीं ॥ ११ ॥ देवी बोटीं आप भक्तत्र नामवाछे दीनवेधु दयास्नागर हो आप कामको
|
जिवाकर रतिको भी प्रसन्न कीजिये आपको प्रणाम है ॥ १२ ॥ ब्रह्माजी बोरे इस प्रकार उनके वचन सुन महेश्वर प्रसन्न हए, ओर | #
सागर भुन तत्का रूपा दृष्टि की ॥ १३ ॥ शिवजीकी अमृतमयी दृष्टिसे उस भस्म्मेते कामदेव वैसेही रूप वेष चिह्न आत्मासे अद्भत $
| सुन्दर ओर मतिमान् होकर निकठ खडा हुआ ॥ १४ ॥ वही रप वही आकार वही हास्य उक्त धलुष बाण हाथमे टये परतिको देखकर
रतिरोदनमाकण्यं सरस्वत्यादयः श्रियः ॥ श्रुदुस्सकटा देभ्यः प्रोचुरदीनतरं वचः॥१ १।॥ देग्य उचुः ॥ भक्तवत्सलनामा त्वं
दीनबन्धुदंयानिधिः॥ काम जीवय सोत्साहं रति कर नमोऽस्तु त॥१२॥बह्मोवाच ॥ इति तद्वचनं त्वा प्रसतनोऽभून्महेश्वरः
कृपा चकाराञ्च
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¶ श करूणासागरः प्रभुः ॥ १३ ॥ सुधाद्टया शूको भस्मतो नितः स्मरः ॥ तद्रपवेषचिह्वात्मा सुन्दरो ¢ [
द्ुतमूतिमान्॥१
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९।॥तद्रूषञ्चतदाकारसंस्मितं सघनुश्शरम् ॥ दष्ठा पतिं रतिस्तं च प्रणनाम महेश्वरम् ॥१९॥ कृतार्थाभृच्छिवं देवं
तुष्टाव च कृताजशिः ॥ प्राणनाथग्रदं पत्या जीवितेन
९ पुनःपुनः॥१६॥कामस्य स्तुति माकण्यं सनारीकस्य शङ्करः ॥ श्रसन्नोऽभवद्
त्वतयुवाच करणाद्रंधौः ॥१७॥ शङ्कर उवाच ॥ प्रसन्नो तव स्तुत्या सनारीकस्य चित्तज॥ स्वयमभव वरभ्बरूहि वाच्छितं तद्
दामिते ॥ १८ ॥ ब्र्नोवाच ॥ इति शम्भुवचः थत्वा महानन्द्स्स्मरस्ततः ॥ उवाच साजैकिनंभ्रो गद्गदाक्षरया गिरा ॥ १९ ॥
रतिने महेश्बरको प्रणाम किया ॥ १५ ॥ ओर प्राणनाथ परतिको ५
० को जीवित देखकर कताथ होगे हाथ जोढकर देव शंकरको पणाम करते
ठगी ॥ १६ ॥ श्चीक सहित कामदे स्तुति भुन शंकर करुणामय उन दोनों चली परुषो कहने ठगे ॥ १७ ॥ शंकर बोरे हे काम !
सी सहित तुम्हारी स्तृति सुनकर भें प्रसं हुआ हूं हे स्वयेभव ! वर मागो भै तुमको
भरन शीघं ब्र देना चाहता हूं ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी
॥ बोटे शिवजीके यह वचन सुन कामदेव बंडे आनन्दको प्रात हभ ओर नघ्रतासे हाथ जोड £
ननन
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गद्रद बाणीसे कहने लगा ॥ १९ ॥
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न, न [3 = म [व + १ 4 ५ = ॥ २ ठ ॥ ह
काम बोढा हे देवदेव ! है महादेव हे ! करुणसागर ! हे भमो ! हे सर्वेश ! यदि आप प्रन हतो शकष आनंदित कीजिये (५
उ रेज त अपने जनम परम प्रीति ओर अपने. चरर्णोकी भक्ति आप् य॒ञ्चैदी
शिण्पु० ¢
प्रभो ! ठे धको जये
८ जो पहर हुआ है उक्त मेरे अपराधकी आप क्षमा की ओर हसते हये करुणासागरने कहा कि देसाही होगा ॥ २२ ॥
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॥ ३ १६॥
॥ २१ ॥ ब््याजी बोटे काम देवके यह वचनं सुन परमेश्वर भरसन्न इए । ॥
ष्णके समीप जाकर बाहर स्थित हो ॥ २३ ॥ ब्रह्लाज।
ईश्वरे कहा ह काम ! हे महामते ! भ भसन्न ह तुम भय व्याग करो अब तुम विष्ये 4
बोे शिवजी भरभृके रेस वचन सुन काम् देवने स्तुति ओर परिक्रमाकर बाहर जाय हार आ।द देवताओंको प्रणाम कर स्थितिकी ॥ २४ ॥
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४ ॥ काम उवाच ॥ देवदेव महादेव कणासागर प्रभो ॥ यदि प्रसत्तस्सवैशः म॒मानन्दकरो भव ॥ २० ॥ क्षमस्व मेऽपराधं दि ४
&|| यत्कृत पुरा प्रभो ॥ स्वजनेषु पराम्प्रीति भक्तिन्देदि स्वपादयोः ॥२१॥ ब्रह्मोवाच ॥ ईत्याकण्य स्मरवचः म्रसन्नः परमचरः
उधमिलयु्तऽ्रवीतं वै विहसन्करूणानिधिः ॥ २२ ॥ ॥ ईश्वरउवाच ॥ हे कामां प्रसत्नोऽस्मि मयन्त्यज् महामते ॥ गच्छ ||
विष्णसमीपञ्च बरिस्थाने स्थितो मव ॥ २३ ॥॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ तच्छत्वा शिरसा नत्वा परिकम्य स्तुवन्विभुम् ॥ बरहगत्वा ||
हरिन्देवान्प्रणभ्यसयुपास्त सः॥ २७ ॥ कामं सम्भाष्य देवाश्च ददुस्तस्मे श्युभाशिषम् ॥ विष्ण्व।द्यः प्रसन्नास्ते प्रोचुः स्मृत्वा ¢
शिवं डदि ॥ २५ ॥ ॥ देवा उचुः ॥ धन्यस्त्वं स्मर सन्दग्धः शिषैनानुग्रहीकृतः ॥ जीवयामास _ सत्तवाशङपाद्टया ¢
विरेश्वरः ॥ २६ ॥ सुखदुःखदो न चान्योऽस्तियतस्स्वकृतभ्क् पुमाय् ॥ काले रक्षा विवाह निषेकः केन वार्यते ॥ २७ ॥
॥ ब्रह्नोवाच ॥ इ्युक्का ते च सम्मान्य तं सुखेनामशस्तदा ॥ सन्तस्थुस्तर विष्ण्वा्यास्सवें लन्धमनोरथाः ॥ २८ ॥ , ह
देवताओंने कामसे सम्भाषण कर उत्ते शुभ आशीीद दिया ओर शिवजीको हृदयम स्मरण कर वे विष्ण आदि देवता भतन होकर बोठे
॥ २५ ॥ देवता बोरे हे काम ! तुम॒धन्यहो जो शिवे द्ध होकर फिर जिये, स्वके ईैश्वरने स्वांश छपा इषिते तुमको जिबाया
£ है॥ २६ ॥ कोई सुख दुःखका देनेवाला नहीं है परुष अपना सुख दुःख भोगता है स्मय प्रही रक्षा ओर विवाह होता है यह
निषेक ( होनहार ) कौन निवारण कर सकता है ॥ २७ ॥ बह्माजी बोटे देवताओंने इस भकारते कह छखपूर्वक उप्तका सम्मान किया ओर ||
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रु०्त॒.२
पा.खं.डे
उ०९५१ |
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| भराप्त होकर विष्णु आदि सव देवता वहां स्थित हए ॥ २८ ॥ ओर कामदेवे भी शिवजीकी आज्ञासे वहां निवास किया |
¢ समय जय शब्द नमस्कार शब्द ओर साधु शब्द होने र्गा ॥ २९ ॥ उस समय शिवजीने निवास घरमे पा्व॑तीको बाई ओर बेढाकर उन्हें ¢
# मिष्टान्न मोजन कराया ओर पाव॑तीने प्रसन्न हो शकरको मिष्टान्न भोजन कराया ॥ ३० ॥ तव शिषजीने वहां सम्पूणं टोकाचार करके मेना
ओर शेखराजपे पूचछकर जनवातिमे गमन किया ॥ ३१ ॥ हे खन ! उत्त समय बडा महोत्सव ओर वेदध्वनि हई भौर वहांफे ठोग चार 4
प्रकारके बाजे बजाने ठगे ॥ ३२ ॥ शिवजीने अपने स्थानम आकर सनियोंको प्रणाम किया, ययपि सब देवता उनको भणाम करते है, ¢
सोपि प्रमुदितस्ततर सुवास शिवाज्ञया ॥ जयशब्दो नमश्शब्दस्साधुशब्दो बभूव इ ॥२९॥ ततश्शम्भुर्वासगेहे वामे संस्थाप्य
पार्वतीम् ॥ मिष्टा भोजयामास तं च सा च शुदान्विता ॥ ३० ॥ अथ शम्युभवाचारी तच कृत्यम्विधायतत् ॥ मेनामामंञ्य
शरं च जनवासं जगाम सः॥३१॥महोतसवस्तदा चासीद्रदध्वनिरभून्ुने ॥ वायानि वादयामासु्जनाश्चतर्बिधानि च ॥ ३२ ॥
| शम्भुरागत्य स्वस्थानं ववन्दे च सुनींस्तदा ॥ हरिं च मां भवाचाराद्न्दितोऽभरत्सुरादिभिः ॥ ३३ ॥ जयशब्दो बभूवाथ नम
श्शब्दस्तथव च ॥ वेदध्वनिश्च शुभदः सर्वविघ्रविदारणः ॥ ३९ ॥ अथ विष्णुरहं शकरस्सवें देवाश्च सर्षयः ॥ सिद्धा उपसुरा
नागास्तुष्टबुस्तेपृथकपृथक॥ ३५ ॥ देवा उचुः ॥ जय शम्भोऽखिाधार जय नाम सदैश्वर ॥ जयं शद महादेव जय विश्व
६|| म्भर प्रभो ॥ ३६ ॥ जय् कालीपते स्वामिन्जयानन्दपव्धक ॥ जय उयम्बक सवैश जय मायापते विभो ॥ ३७ ॥
तथापि ठोकिंक आचारते श््ञे ओर विष्णजीको भरणाम किया ॥ ३३ ॥ उप्त समय जयशब्द ओर नमस्कार शम्द उचारण होने ठ्गा,
ओर सब विर्भोकी दूर करनेवाछो घु्दर वेदध्वनि होने ठगी ॥ ३४ ॥ उस्न स्यथ विन्णजी मँ इन्द्र सव देवता सुर ऋषि कषद उपदेवत'
ओर नाग पृथङ् पृथक् शिवजीक स्तुति करने गे ॥ २५॥ देवता बो हे शंकर ! हे वके आधार ! हे जयनामवारे ! आपकी जय ६
हो, हे महादेव ¡ विश्वके पाठन कएनवाले प्रभो ! अपक जय हो ॥३६॥ हे काङीपते ! हे स्वामिन् ! हे जय ओर आनन्द्के बढानेवाछे ।
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शिण्पुण
॥२१७॥
रुस.२
पा.ख.३
अ०५२,
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¢ आपकी जय हो, हे ज्यम्बक ८ त्रिलोचन ) सवके पति मायाके पति हं
दयाप्क ! आपकी जय हो ॥ ३७ ॥ हे निरयण !
हे कारणते परे ! हे सर्षगामी ! हे सव ीकाके आधार अनेक रूपधारी ! आपको प्रणाम है ॥ ३८ ॥ अपने भक्तौकी कामना अह
उती स्थलमं प्रग होनेवाङे करुणामय आपकी जय हो, हे आनन्दमय सष्रप् मापा गुणोंकी आकतिवले अपकी जय हौ ॥ ३० ५
पवक सुखदायक, सवके अत्मा, दीनं, दयामय, विकार रहित, मायापति, वाणी मने परे विग्रह्वाडे आपकी जय हौ ॥ ४० ॥ र
बोठे इस प्रकार गिरिजपति भ्रमु महेशानकी स्तुतिकर विष्ण आदि देवता परम प्रीतिसे शिवजीकी सेवा करने स ॥ ४१ । हं
जय नि निष्काम कारणातीत सर्वग ॥ जय लीलाखिलाधार धृतरूप नमोऽस्तु ते ॥ ३८ ॥ जय स्वभक्तसत्कामपरदश
कर्णाकृर ॥ जय सानन्दसद्रूप जय मायागुणाकृते ॥ ३९ ॥ जयोम् मड सवात्मन् दीनबन्धो दयानिधे ॥ जयािकार मायेश
वाङ्भनोतीतविमह ॥ ४० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्तुत्वा महेशानं गिरिजानायकसप्रुम् ॥ सिषेविरे परप्रीत्या विष्ण्वायस्त
यथोचितम् ॥ ४१ ॥ अथ शम्ुभहेशानो खीलात्ततवुरीश्वरः ॥ ददौ मानवरन्तेषां सवेषान्तज नारद् ॥ ४२ ॥ विष्ण्वाय्या
स्तेऽखिलास्तातप्राप्याज्ञाम्परमेशितुः॥ अतिदष्टाः परषत्रास्याः स्वस्थानजग्धुरादताः ॥ ४२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे ब्रह्मना
रदसम्बादे द्वितीयायां श्द्रसंहितायां ठतीये षार्वतीखण्डे कामसंजीवनवर्णनं ,नमेकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ 4.3 ॥ ब्रह्मोवाच ॥
अथ शेलवरस्तात हिमवान्भूग्यसत्तमः ॥ प्राङ्गणं रचयामास भोजनाथ विचक्षणः ॥ 9 ॥ मार्जनं लेपनं सम्थक्का
यामास तस्य सः ॥ स सुगन्धेररश्चके नानावस्तुभिरादरात् ॥.२ ॥ ५४
नारदजी ! तब लीलास शरीर धारण करनेवाे महेशान शंकर उन सव देवताओंका अधिक सन्मान करते हए ॥ ४२ ॥ हे तात ! किर वै
सब विष्ण आदि देवता उन महेश्वरकी परम आज्ञाको प्राप होकर बहत सुख ओर प्रसन्नतासे साद्र अपने अपने जनबा्तके स्थानको
गये ॥ ४३ ॥ इति श्रीशिविम० भा० रुद्रसहितान्तगततृतीयपार्वतीसण्डे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ ब्रह्नाजी बटे हे तात ।
तव् भाग्यवान् हिमाछ्यने सवके भोजन करनेके निमित्त अपने आंगन समारोह किया ॥ १॥ उत आंगनकौ भी भकार भरुक
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। ओौर अनेकं प्रकारकी सुगंधित वस्तुओं उसको अटेकृत किया ॥ २ ॥ तब हिमाखयने सब देवता तथा दूसरे बहत |
अपने त्रो तथा दस्र शेों द्वारा बुलवाया ॥ ३ ॥ हे सुने ! हिमाठ्यके बुकावेको सुनकर शकर विष्णु तथा ओर स्तब देवता प्रम प्रसन्न ©
तासे भोजन करनेकै निमित्त चरे ॥ ४ ॥ दिमाख्यने भ्रमु ओर सब देवताओंको यथाविधि सत्कार करके अपने घरमे प्रसन्नता पूरक शेष ¢
आसनोंपर बेढाया ॥ ५ ॥ फिर भोजन करनेकी अनेक वस्तुओंको परोस्कर हाथ जोढकर सवे भोजनके निमित्त भराथना की ठ |
॥६॥ तथ वे विष्ण आदि सब देवता भरसननन हो सम्मानित होकर सदाशिवको आगे कर भोजन करने गे ॥ ७ ॥. तव वे सव॒ मकर
अथ शटस्घुरान्सवौनन्यानपि च सेश्वरान् ॥ भोजनायाह्यामास पुतैश्शेलैः परैरपि॥ ३॥शैलाहानमथाकर्ण्य स प्रथुस्साच्युतो ठै
सुने ॥ स्वैस्सुरादिभिस्तच्र भोजनाय ययौ खदा॥४॥ गिरिः प्रभं च सर्वास्तान्स॒सत्कृत्य यथाविधि ॥ शुदोपवेशयामास सत्पीय्षु
गृदान्तरे॥५॥नानासभोज्यवस्तूनि परिविष्य च तत्पुनः ॥ सा्चलिर्भोजनायाज्ञां चक्र विज्ञप्िमानतः॥६॥अथ सम्मानितास्तत 6
विंहसन्तः पृथक्पथक्॥ ८ नन्दिभगिवीरभद्रवीरमद्रगणाः पृथक््॥ बुथुजस्ते महाभागाः कुत्रूहलसमन्विताः॥९॥ देवास्सेन्द्रा लोकं
पाटा नानाशोभासमन्विताः॥ बुथुजस्ते महाभागा नानाहास्यस्मेस्सद॥१ ०॥ सवे च शुनयो विभा भृमा्या षयस्तथा॥ बुधल
प्ीतितस्सव पृथक पक्तिगतास्तदा॥११।तथा चण्डीगणास्सवे बुभुचःकृतभाजनाः॥ ुतृदलं प्रङर्वन्तो नानाहास्यकरा शुदा॥१२॥
एक साथ पंक्ति बांधकर हास्य करते हुए पथक् प्रथक् भोजन करने कगे ॥ < ॥ नन्दि भगी वीरभद्र तथा वीरभद्रके गण यह सव महाभाग कुतूहल
पित पृथक् प्रथक् भोजन करने ठगे ॥ ९ ॥ इन्द्रक सहित सब देवता ओर ठोकपाङ अनेक शोभाकै सहित महा भाग्यताके कारण
अनेक रोके सहित भोजन कएने छगे ॥ १० ॥ सब सुनि विप्र मृण आदि ऋषि प॑क्तिम बैठकर बडे आनन्दसे प्रथक् पृथक् भोजन करने
गे ॥ ११॥ इष प्रकार सब चण्डीकै गण आनन्दसे भोजन करने उगे ओर भरसन्नतामे महाहासं परिहास करते कुतहर करने ¢
भे
६
| देवा विष्णुपुरोगमाः॥सदाशिवं पुरस्कृत्य बुथुजस्सकलाश्च ते॥७॥तदा सवे हि मिलिता एेकपयेन सर्वशः ॥ पंक्तिभूताश्च बुथुजः
४
४
छगे ॥ १२ ॥ इस भकार सवने आनन्दूते भोजन कर॒ आचमन किया ओर पिर विम्य आदि देवता आनन्दे अपने २ निषासस्थानको
गये ॥ १३ ॥ मेनाकी आज्ञाते सव यं शिवजीते भक्तिमूैक प्राथेना करके उनको निवासकै घमं ठहराती हदे ॥ १४ ८ मेनाकै विये
हूए परम मनोहर रत्नोके सिंहासनपर शिवजी वे ओर परसननतासे उस वाक्ष मंदिरको रखा ॥ १.५ ॥ जहा॒स रलनोकि दीपक
्रकाशित हो रहे थे जो रत्नोक पा ओर रत्नो शोभायमान था तथा मोती ओर मणिर्योसे विराजमान था ॥ १६॥ रत्नोकि
दर्पणे शोभायमान भरेत चामरोसे मंडित खक्तामणिकी माढाओंति वेष्टित प्रम ऋद्धिवाखा ॥ १७ ॥ अलुपम महादिव्य परम्
एवन्ते भुक्तवन्तश्चाचम्य स्वे खुदान्ताः ॥ विश्रामार्थं गताः परीत्या विष्ण्वायाश्सवस्वमाश्रमम् ॥ १३ ॥ मनाज्ञया च्य
स्साध्व्य शिशव सम्भरा्यं भक्तितः ॥ गेहे निवासयामासुवी साख्ये परमोत्सवे ॥ १४ ॥ रत्नसिंहासने शम्युमेनादत्ते मनोहरे॥
सप्रिधाय दा य॒क्तो दशे वासमन्दिरम् ॥ १९५ ॥ रत्नप्रदीपशतकै्वलद्विज्व॑लितं श्रिया ॥ रत्नपा्रषकीण शक्तामणि
विराजितम्॥१६॥रत्न दप्पेणशोभाढय मण्डितं वेतचामरः॥ शुक्त मणिषुमालामिवषितं परमर्द्धिमत् ॥ १७ ॥ अनरूपमम्महा
दिव्यं विचित्रं खुमनोदरम् ॥ चित्ताहादकरं नानारचनारचितस्थलम् ॥ १८ ॥ शिवदत्तवरस्यैव प्रभावमतुलम्परम् ॥ दशंयन्तं
सञुद्छासि शिवलोकाभिधानकम् ॥ १९ ॥ नानासुगन्धसदूदव्येर्वासितं सुप्रकाशकम् ॥ चन्दनागुरुसंयुक्त पुष्पशग्यासम
न्वितम् ॥ २० ॥ नानाचिघ्रविचिज्ाटयं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ रत्नेन्द्रसाररचितेराचितं हारकेवेरेः ॥ २१॥ कुथचित्सु
रनिमीणं वैकुण्ठं सुमनोहरम् ॥ कु्रचिच ब्रह्मरोकं रोकपारपुरं कचित् ॥ २२ ॥ ू
विचित्र ओर मनोहर चित्तका प्रसन्न करने वाटा था अनेक रचना उस्न स्थख्म की गहं थीं ॥ १८ ॥ शिवके वरदानसे उसका महाभभाव हो
रहा था तथा शिवलोकके समान उसकी कान्ति हो रहीथी॥ १९ ॥ अनेकं प्रकारके सुगन्धित द्रह्योे वह स्थान हरुवासित
जिस्म बडा प्रकाश था चन्दन अगरसे संयुक्त ओौर एूर्लोकी शम्या युक्त ॥२०॥ अनेक प्रकारके चित्र विचित्र पदार्थोसे युक्तं रत्नोके सारो ।
रचित श्रेष्ठ हारसे युक्त विश्वकमीद्रारा निमीण किया गया ॥ २१ ॥ कहीं देवताओंके निभित्त निर्माण किया हुआ मनोहर वैकुण्ठ कीं
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बहारोक ओर कहीं टोकपार्लोका लोक था ॥ २२ ॥ कहीं मनोहर कैठास कहीं इन्द्रका भंदिर कहीं सबके ऊपर विराजमान शिवछोक ॥ २३ #
महेश्वर इस प्रकारके घर ओर आश्वयेको देखकर पर्वतराज हिमाख्यकी प्रशसा करते हए बडे प्रसन्न हुए ॥ २४ ॥ वहां अतिरमणीय रलनोकै उत्तम ¢
पठंगमे ठीलापूवेक भसन्नतासे वह परमेश्वर स्थित हृए ॥२५५॥ इधर हिमाटयने अपने सव भाईयोको आनेद सहित भोजन कराया ओर पेम दृक्ष
ठोगोका भी सत्कार करकै उसने शेष क्त्य पुणे किया ॥२६॥ दस् प्रकार शेलेशकै सब कायं करने ओौर शकरके सो रहनेपर सारी रात बीत गई भभातकाठ
हुआ ॥२७॥ भ्रभातकार होनेप्र धैयं ओर उत्साहम भरकर वजन्दरी ठोग अनेक प्रकारके बाजे बजाने कगे ॥२८ ॥ विष्णजीको आदि ठेकर
कैरासंकुचचिद्रम्यं ऊचिच्छक्रमन्दिरम् ॥ कुजचिच्छिवरोकं च सर्वोपरि विराजितम् ॥ २३ ॥ एतारशणृदं सर्वदष्टाशर््य
महेश्वरः ॥ प्रशंसन् हिमशेरेशं परितुष्टो बभूव ह ॥ २४ ॥ तजातिरमणीये च रत्नपर्य्यक उत्तमे ॥ अशयिष्ट खुदा युक्तो
रीखया परमेश्वरः ॥ २५ ॥ हिमाचलश्च् स्वघरावृन्भोजयामास कृत्स्नशः ॥ सर्वानन्यांश्च सुप्रीत्या शेषकृत्यं चकार इ
॥ २६ ॥ एवे कुर्वति रोकेरो स्वपति प्रष्ठ ईश्वरे ॥ व्यतीता रजनी सर्वां प्रातःकालो बभूव ह ॥ २७ ॥ अथ प्रभातकाठे च
पृत्युतेसादपरायणाः ॥ नानाप्रकाराद्यानि बादया्चक्रिरे जनाः ॥ २८ ॥ सवं सुरास्स्तस्थर्विष्ण्वायास्स्ुदान्विताः ॥
स्वे संस्मृत्य देवेशं सजिभूतास्ससंभ्रमाः ॥ २९ ॥ स्ववाहनानि सनानि कैासद्धन्पुमुत्सुकाः ॥ कृत्वा सम्प्रेषयामास ठ
शिवसमीपतः ॥ २० ॥ वासगेदमथागत्य धर्मो नारायणाज्ञया ॥ उवाच शंकरं योगी योगीशं समयोषितम् ॥ ३१ ॥
॥ धमं उवाच ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रन्ते भव नः प्रमथाधिषं ॥ जनावासं समागच्छ कृतार्थं छर् तञ तान् ॥ ३२ ॥ र
सव देवता वहां उपस्थित इए ओौर अपने इष्टदेव शकरको स्मरणकर सब सज गये ॥ २९ ॥ अपने अपने वाहन सजाकर पव कैटासमे ||
जानेको उत्कंटित हए, ओर यह सब करक पूर्मको शिवजीकै समीप मेजा ॥ ३० ॥ नारायणकी आक्ञासे धमं शिवजीके निवास घरमे ठ
जाकर वहं योगी योगेश्वर शंकरसे समयोचित वचन कहने कगे ॥ ३१ ॥ धभने कहा है शंकर ! हे भव ! आपका कल्याणहो आप् उवियि
हे प्रम्थोके अधिपति ! जनवापेमं चकर अपने भक्तोको कताथ कीजिये ॥ ३२ ॥ |
शति देखा ओर पंडगपरते उद बैठे ॥ ३३ ॥ ओर रसते हए धमते कहा तुम
०१० || || बह्लाजी बोडे धर्मेराजके यह वचन सुन हसकर शंकरने कपा ६ ५
ध आगे चठो नँ शीषही निरन्देह पी आताहूं ॥ ३४ ॥ बाजी बोठे शकरके इ भकारसे कहनेपर वह जनवति गय आओौर पीठे भगवान्
५ शकएने भी वहां जानेकी इच्छा की ॥ ३५॥ यह वात देल शंकरके पदकमलोका दशन करके श्ीजनोने मंग गान ओर महोत्सव
किया ॥ ३६ ॥ तब शिवजी ठोकाचारके निमित्त भ्रातः क्रिया सम्पादन करके मेना ओर् हिमायस पृछकर जनवामे गये ॥ ३७ ॥ है
सने ! उस्न समय बडा महोत्सव ओर वेदकी ध्वनि हुई ओर मदु्योने चार भरकारकं बाज बजाय ॥ ३२८ ॥ रिवजीनि जनवेम अपने
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति धर्मवचः त्वा विजदास मदेश्वरः ॥ ददशं कृपया दृष्टया तल्पशु्श्चा्चकार इ ॥ ३३ ॥ उवाच विदसनु
धम त्वमत्रेगच्छ ततर इ॥अहमप्यागमिष्यामि द्ुतमेव न संशयः ॥२७॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तश्शंकरेणाथ जनावासं जगाम सः॥
स्वयङ्गन्त॒मना आसीत्त्र शम्धुरपि प्रथुः॥ ३५ तज्ज्ञात्वा ख्रीगणस्सोसौ तत्रागच्छन्महोत्सवः ॥ चक्र मंगलगानं दि पश्यन् शम्धु
पदद्वयम् ॥३६॥ अथ शंम्धुभेवाचारीप्रातःकृत्यं विधाय् च ॥ मेनामामन्त्य कुं च जनावासं जगाम सः॥२७॥ महोत्सवस्तदा
चासीदरिदष्वनिरभृन्छने॥ वाचानि वादयामाखुजंनाश्वातुविंधानि च॥३८॥शब्धुरागत्य स्वस्थानं ववन्दे च ुनींस्तदा ॥ हरिं च ।
मां मवाचारात्वन्दितोऽधतघुरादिभिः ॥२९॥ जयशब्दौ बभूवाथ नमृरशब्दुस्तथेव च ॥ वेदध्वनिश्व ्ुभदौ महाकोलादलोऽभवत्
॥४०॥ इति श्रौशिवमहापुरणे द्वितीयायां ह्संहितायां ततीये वर्वतीखण्डे वरवगैभोजनशिवशयनव्णनं नाम् दिषञचाशत्तमोऽ
रुन्स.२ ध्यायः ॥ ५२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथ विष्णादयो देवा मुनयश तपोधनाः ॥ कृत्वावश्यककर्माणि यां सन्तेनिरे गिरेः ॥१॥
रा खं ३ ||६ || स्थानपर जाकर ॒निर्योको प्रणम् किया तथा ोकाचारसे हरिते ओर सञ्चपे पणा किया सब देवताओंने उनको प्रणाम किया ॥ ३९ ॥
॥ उस समय जयशब्द नमःशब्द् होने ठगा ओर सुखदायक वेदध्यनिसे महाकोाह होने ठगा ॥ ४० ॥ इति भ्रीशिमहाषएराणभाषारीकोयां
अ०५३ ||| र्रसेहितान्तरगततृतीयपार्वती खण्डे बरवभोजन शिवशयनवणनं नाम दविपंचाशतमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ बह्लाजी बोठे हे नारदजी तव विष्ण आदि |
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स॒ब देवता खनि तपोधन आवश्यक कमं करके गिरिसे विदाके ख्य कहते हुए ॥ १ ॥
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| | हिमाछ्य श्चन करके ओर यत्नसे अपने इष्ट बरगको पूजन करके एरके भन्धुजनोको बुाकर प्रमसे जनवासेको चे ॥ २ ॥ .
शंकरकी पूजा करके प्रमसे भरथना की कु दिनतक सवके सहित मेरे स्थानपर रहिये ॥ ३ ॥ हे शम्भो ! मै आपके दर्शनसे ही तार्थ
हो गया हूं इसमे सन्देह नहीं भेरा षर धन्य है जो आप् देवतोंसहित मेरे घर पधार है ॥ ४ ॥ बहमाजी बोरे शेरराजने इस भरकारसे बहत
कुछ कहकर दोनों हाथ जोड प्रणाम करके विष्णु आदिदेवताओकि साथ प्रभुका निमंत्रण किया ॥ ५॥ तत वे शिकके सहित आदर मनसे
वहां भ्रात होकर खनि ओर देवता विष्ण आदिक सहित बोठे ॥ ६ ॥ हे गिरिराज ! आपको धन्य है आपकी कीतिं महान् है तुम्हार
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ततो गिरिवरः स्नात्वा स्वेष्टं सम्पूज्य यत्नतः ॥ पौरबन्धून्समाहूय जनवासं ययौ खुदा ॥ २ ॥ तञ प्रभुम्परपूज्याथ चके
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सम्प्राथनां खदा ॥ कियदिनानि सन्तिष्ठ॒मदेहे सकठेस्सद ॥ २ ॥ विलोकनेन ते शम्भो कृतार्थं न संशयः ॥ धन्यश्च
यस्य मद्वेद आयातोऽसि सुरेस्सद ॥ ४ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता बहु शेरेशः करौ बदध्वा परणम्य च ॥ प्रभुत्निमन्यामास
सह 4. ॥५॥ अथ ते मनसा गत्वाशिव सयुतमादरात् ॥ भत्यूचुुनयो देवा इष्टा विष्णुसरादिभिः ॥६॥॥ देवा
। ऊचुः ॥ धन्यस्त्वं गिरिशादंख तव कीरतिंमंदीयसी॥ त्वत्समो न बरिरोकेष्च कोपि पुण्यतमोजनः॥ ७ ॥ यस्यं द्वारि महेशानः
¢| पन्न सतां थ ॥ समागतस्सदासंश्च कृपया भक्तवत्सलः ॥८॥ जनावासोतिरभ्यश्च सम्मानो विविधः कृतः ॥ भोजनानि
त्वपूवाणि न वण्यानि गिरीश्वर ॥ ९ ॥ चिचन्न खल. तत्रास्ति य देवी शिवाभ्बिका ॥ परिपूर्णमशेषञ्च यवं धन्या यदा
4 गताः ॥ १० ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्थम्परस्परन्तच प्रशंसाभवदुत्तमा ॥ उत्सवो विविधो जातो वेदसाश्जयष्वनिः ॥ ११ ॥
समान त्रिोकीमं कोद धण्यात्मा नही है ॥ ७ ॥ जिनके द्वारेपर परब सत्रुषोको गति भक्तवत्सल भगवान् शकर अपने भक्तोंसहित
छुपाकर पधारे ॥ < ॥, आपने परम मनोहर जनवसत देकर हमारा बडा स्मान किया है हे गिरीश्वर ! एते अपूर्वं भोजन आपने हमको
दिये जिनका हम. वणन नहीं कर सकते ॥ ९ ॥ यह बात वहां कछ आशवयकी नहीं है जहां साक्षात् अम्बिका देवी निवासत करती है
सबही बात परिपू है ओर हम भी आनेवाठे धन्य हँ ॥१०॥ इत भकारते परस्पर एकने दूरी भशंसा की, वैद साधू ओौर जयध्वनिपूर्वक वहां
१३४ ॥
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॥२२०॥||©
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परस्पर बडा उत्सव हुआ ॥ ११ ॥ मंगठ गान होने र्गा अप्सरा गण् चत्य
दिया ॥ १२॥ इस्त भकार देवेशका. आमंत्रण कर गिरिराज अपने घर आय् अर् ¬
॥ १३ ॥ ओर भोजन करानेको परम प्रीतिते भ्रभुको ठे आये बडे कुतूहल पूवक शकर सव बर
आदरे शंकरके विष्णजीके तथा भेरे चरणोको धोकर पीछे सव देवता ओर खनियोकै चरण धौये ॥ १ #
दूसरे आये हुए अपने बन्धुजनोंको भी मेमपरवक बुलाया ॥ १६ ॥ उन सबको बडे रसतीठे स्वादिष्ट अन्नो गिरिराजने वृत्त किया ओर
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अभून्मद्गलगानञच ननर्ताप्सरसांगणः ॥ नुतिञ्चङ्र्मागधाद्या दन्यदानसभूद्रह ॥१२॥ तत आमन्त्य देवेशं स्वगेदमगमद्विरिः ॥
भोजनोत्सवमारेभे नानाविधिविधानतः॥ १३ ॥ भोजनार्थ प्रथुम्प्रीत्यानयामास यथोचतम् ॥ प्रिवारसमेतं च सकुतूहलमीश्च
रम् ॥ 9४ ॥ प्रक्षाल्य चरणौ शम्भोविष्णो्मम वराद्रात् ॥ सर्वेषाममराणाचुनीनाच य॒थारथ॑तः॥ १५ ॥ परेषाञ्चगतानाच
गिरीशो मण्डपान्तरे ॥ आसयामास सुश्ीत्या तांस्तान्बन्धुमिरन्वितः॥ १६॥सुरसेविंविधाघ्रश्च तप्पयामास तान्गिरिः ॥ बथु
निंखिलास्ते वे शम्भुना विष्णुना मया॥१७॥तदानीम्पुरनायैश गालीदानम्ब्यधुश्वदा॥ षृदुवाण्या हसन्त्यश्च पश्यन्त्यो यत्नतश्च
तान् ॥१८॥ ते युच्ाचस्य विधिवद्विरिमासन्च्य नारद् ॥ स्वस्थानस्प्रयशुस्सवं सुदितास्तपिमागताः ॥१९ ॥ इत्थन्तृतीये घस्चेऽपि
मानितास्तेऽभवन्धुने ॥ गिरीश्वरेण विधिवदानमानाद्रादिमिः॥२ ०॥ चतुथं दिवसे प्रतत चहाड ॥ बभूव रिधिवयेन
विना खण्डित एव सः ॥ २१ ॥ उत्सवो विषिधश्वासीत्साघुवादजयष्वनिः ॥ बहुदानं सुगानश्च नर्तनम्विविधन्तथा ॥ २२ ॥
शंकर विष्ण तथा भेरे सहित सब देवता भोजन करने ठगे ॥ १७ ॥ उस्न समय प्रकी श्ये भरमसे गारी गाने कगीं ओर ६ वाणीते हती
हई यत्नसे देवताओंको देखने ठगी ॥ १८ ॥ हे नारदजी ! वे सब विधिपुवंक भोजनक उपरान्त आचमन करके खदित ओर तृप्त
सब अपने स्थानोको गये ॥१९॥ हे सुने ! इस प्रकार तीसरे दिन भी सबका सन्धान हुआ गिरीशने विधिपूर्वकं दान मान ओर आदर किया
॥ २.० ॥ चौथा दिन धापन होनेपर शुद्धतापू्वक अखण्डित चतुर्थीं कर्मं विषिूर्वक किया ॥ २१ ॥ उस समय सषाधुवाद ओौर जयध्वनिपूरैक
कृरने ठगीं मागध स्तुति पाठ करने कगे ओर बहुतक्षा द्रव्य दान
पे ओर अनेक विधिविधानसे भोजनके उत्सवका आरम्भ |
तियोसहित आये ॥ १४ ॥ तब हिमाख्यने
५॥ तब गिरिराजने उस मण्डप
६
।
।
।
|
| उत्सव हआ बहुता दान गान ओर तरत्यविधि हृं ॥ २२ ॥ पांचवां दिन प्राप्त होनेमे भरसन्न होकर सब देवता अति भ्रमसे
से बिदाकं निमित्त कहने गे ॥ २३ ॥ यह सुनकर गिरिराज हाथ जोडकर देवताओं बोटे हे देवताओं मेरे ऊपर कृपा करकं आप् |
दिन ओर रहं ॥ २४ ॥ रेस प्राना करके नेहसे शंकरको विष्णजीको सज्ञे ओर सव देवताओंको कितने ही दिनोंतकं आदरे रिकाया
॥ २५ ॥ इतत भकार वहां निवास्ष करते बहुतसे दिन बीत गये, तब देवता ओंने हिमार्यके समीप सप्त्िंयोंको भेज, ॥ २६ ॥ उन्होने गिरि
राज ओर मेनाको समयोचित वातं कहकर समञ्ञाया ओौर विंधिर्वक. मरेमसे प्रशंसा करते हुए शिवतत्व कहा ॥ २७ ॥ हे ने ! उनके समज्ञा
पञ्चमे दिवसे प्राते सवे देवा सुदान्विताः ॥ विज्ञप्तिञक्रिरे शेलं याजार्थमतिप्रेमतः॥ २३ ॥ तदाकर्ण्य गिरीशश्ोवाच देवान् कता.
अलिः ॥ कियदिनानि तिष्ठन्तु कृषाङ्ङवन्तु मां सुराः॥२४॥ इत्युक्त्वा स्रदतरस्तोश प्रथुभ्विष्णुञच माम्परान्॥ वासयाभास दिव
सान् बहृत्रित्यं समादरात्॥२५॥ इत्थम्ग्यतीयुदिंवसा बहवो वसतां चतत्॥ सत्तर्षीन्प्रेषयामासुिरीशान्ते ततस्खराः ॥ २६ ॥
ते तं सम्बोधयामासुमेनाञ्च समयोचितम्॥ शिवतच्वम्परम्प्रोञुः प्रशंसन्विधिवन्युदा ॥ २७ ॥ अङ्गीकृतं परेशेन तत्तद्रोधनतो `
सने ॥ याचाथमगमच्छम्भुश्शेलेशं सामरादिकः ॥ २८ ॥ याताङ्कुर्वति देवेशे स्वशेलं सामरे शिवे ॥ उच्चै श्रोद सा मेना
तस्ुवाच कृपानिधिम् ॥ २९ ॥ मेनोवाच ॥ कृपानिधे कृषाङ्कृत्वा शिवां सम्पालयिष्यसि॥ सदक्तदोषं पार्वत्या आ्युतोषा
क्षमिष्यसि ॥ ३० ॥ त्वत्पादाम्बुजभक्ता च मद्रतसा जन्मजन्मनि ॥ स्व्ेज्ञाने स्मृतिर्नास्ति महादेवं प्रभुम्विना ॥ ३९.॥
नेसे हिमा्यने विदा स्वीकारकी ओर शिवजी देवताओं सहित विदा होनेको हिमाख्यकै घर गये ॥ २८ ॥ जव देवेश अपने कैटास्को देव
ताओं सहित चठनेको उचुक्त हुए उस समय मेना ऊचे स्वरसे रोकर छपासागर शंकरसे बोटी ॥ २९ ॥ मेना बोली है क्पासागर ! छपा
करके आप मेरी एत्रीका पाटन करो, आप आशुतोष है, पारव॑तीकै सहस दोषोको भी आपने क्षमा करना ॥ ३० ॥ यह भेरी कन्या जन्भ
आपकर चरणकमट्की भक्त है महादेव भ्मुकै बिना सोते जागतेभे दूसरेका इते स्मरण नहीं है ॥ ३१ ॥ । ।
शिश्पु°
|
रुण्स २
पा.ख.३
अ०५४
| , ब से यह मौन मृतककै
हर्षके > {चि है हे मूः श त
तुम्हारी भक्तिके सनते ही इसके नेनोमे हष॑के आंस आति ओर तच रोमांचित हो जाती है हे मूत्युय ! तुम्हारी निन्दासे यहं म गं
समान हो जाती ह | व ॥ बह्ाजी बोरे दसा कहकर भेना उस समय शौकरो अपनी तरी सोपकर बहत ऊचे स्वरसे रोदनकृर उन दोनो
भगे गिर पृही ॥ ३३ ॥ वब शंकएने मेनाको समज्ञाया ओर हिमार्यको आर्म्णकर महोतसवक्े सहित देवताओोकि साथ याना की ॥१४॥
तब वे सव देवता १ बडाई करते शकर ओर अपने गर्णोके सहित मौन हो वहसि चे ॥ २५ ॥ रके बाहर हिमाट्यकं एक्
उपवने भन्न होकर सव देव विष्डजीके सहित शिषके आगमनकी इच्छा करते हृए ठहर ॥ ३६ ॥ हे स॒नीश्र ! इस भकारे देवताओं
त्वद्क्तिथ॒तिमा्रेण दर्षाथुपुलकान्विता ॥ त्वच्िन्दया भतेन्मोौना घृत्युंजय घत्ाईइव ॥ २३२॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्यु्छा मनका तस्म
समर्य स्वसुतान्तदा ॥ अत्यते रोदनदधकृत्वामृच्छमाप तयोः पुरः॥३२॥अथमेनाम्बोधयित्वा तामामन्ञ्य गिरिस्तथा ॥ चकार
यावान्देकैश्च महोत्सवपुरस्सरम्॥३९॥ अथ ते निज॑रास्सवे प्रथुणा स्वगणेस्स॒ह ॥ याराम्परचङ्किरे तूष्णीं गिरिम्प्रति शिवं दधुः ॥
॥२९॥ हिमाचकपुरीबाह्मोपवने हषितास्सराः॥ सेश्वरास्सोत्सवास्तस्थुः पर्थैषन्त शिवागमम्॥२६। इत्युक्ता शिवसया्] देवेस्स
ह सुनीश्वर॥ आकर्णय शिवयाजां विरहोत्सवसंयुताम् ॥ ३७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शदरसंदिता्यात्तीये पार्वती
खण्डे शिवया्ावर्णनं नाम भिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ अथ सत्तषयस्ते च प्रोचुहिंमगिरीश्वरम् ॥ कारय
स्वात्मजादेव्या या्रामयोचितां गिरे॥ १॥ इति थत्वा गिरीशो हि इद्ध्वा तुद्विरहम्परम् ॥ विषण्णोभून्महात्रम्णा कियत्कालं
सनीशवर ॥ २ ॥ कियत्कालेन सम्प्राप्य चेतनां शलराद् ततः ॥ तथास्त्विति गिराशक्ता मेनां सन्देशमग्रवीत् ॥ ३ ॥
सहित शिवजीके विदा होनेका वृत्तान्त कहा शिवजीकी यात्रा सुनकर सब कोई विरह ओर उत्सवसे आकु होगये ॥ ३७ ॥ इति
भ्रीशिवमहाएराणमाषारीका्यां रद्रसहितान्तगेततृतीगपावंतीखण्डे शिवयात्ावर्णनं नाम॒ ज्िपंचाशत्तमोऽभ्यायः ॥ ५३ ॥ ` ब्रह्माजी बोटे |
तब सपतषिर्योने जाकर हिमाठ्यमषे कहा हे गिरे ! आज अच्छा दिन है अव् अपनी पृत्रीकी यात्रा कीजिये ॥१॥ हे सनीश्वर ! यह
वचन् सुनकर हिमाठय भी पावंतीकै महावियोगसे कुछ काठतक. तो प्याकुर होगये ॥ २ ॥ किर पर्वतराजने कठ कालम चेतनाको भप्त
(ण +य
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होकर रेत्ताही होगा यह कहकर मेनाको सन्देशा भेजा ॥ ३ ॥ हे सने ! पतिका सन्देशा सुनकर मेनाने हषं शोके संयुक्तं पीके ,
करनेकी सामग्री एकत्रित की ॥ ॥ हे खने ! वेद ओर कका आचार विधिपूक किया ओर हिमाटयकी पत्नीने सब उत्सवविधि सम्पादन
की ॥ ५॥ पा्व॑तीको अनेक रत्नोके गहनोसे तथा भ्रष्ठ वश्चोसे भूषित किया, बारह आभरणोँसे युक्त राजस्षम्मत श्ंगार किया ॥ ६
मेनाकी मनकी बात जानकर एक बाह्मणकी पतिवता खी गिरिजाको पतित्रत् धर्मकी शिक्षा देने गी ॥ ७ ॥ द्विजपल्नी बोरी हे पावती
। धरमके बढानिवाठे वचन पमे सुनो जो दोनों छोकमं आनन्द करनेवाठे ओर सुननेवारोंको सुखदायक हैँ ॥ < ॥ पतिवता च्रीही धन्य
शैलसन्देशमाकण्यं हषेशोकवशा सने॥ मेना संयापयामास कचचमासीत्सञ्चयता॥९॥ शतिस्षकुलजाचारं चचार विधिवन्सुने ॥
उत्सवम्विविधन्तत सा मेनाक्षितिभत्परिया॥५॥ गिरिजाम्भूषयामास नानारत्नांशुकैरवरः ॥ द्वादशाभरणेशेव शगारेपसम्मितेैः
॥ & ॥ मेनामनोगतिम्बुदध्वा साध्व्येका द्विजकामिनी ॥ गिरिजां शिक्षयामास पातित्रत्यत्रतम्परम्॥७॥ ॥ द्विजपतन्युवाच ॥
गिरिजे श्ण सुप्रीत्या मद्वचो धर्मेवद्धनम् ॥ इहाथ्जानन्दकरं श्रृण्वतां च सुखप्रदम् ॥ ८ ॥ धन्या पतित्रता नारी नान्या पूज्या
विशेषतः ॥ पावनी सर्वरोकानां सर्वपापौघनाशिनी ॥ ९॥ सेवते या पतिम्प्रम्णा परमे्वरवच्छिवे ॥ इदथुक्ताखिलाम्भोगान
न्ते पत्या शिवां गतिम् ॥ १० ॥ पतिव्रता च साविची लोपाुद्रा द्यङन्धती ॥ शाण्डिल्या शतङ्पानुश्षया लश्ष्मीस्स्वधा
सती ॥ ११॥ संज्ञा च खमतिश्शरद्धा मेना स्वाहा तथेव च ॥ अन्या बह्लयोऽपि साध्म्यो हि नोक्ता विस्तरजा
द्वयात् ॥ १२॥ पाति व्रत्यवृषेणेव ता गतास्सवंपूज्यताम् ॥ ब्रह्मविष्णुहरेश्ापि मान्या जाता भनीःवरैः ॥ १३ ॥
है उसके सिवाय चि्योम अन्य कोड पुज्य नहीं है, वह सब छोकोकी पवित्र करनेवाखी तथा सब पापोकी दूर करनेवारी है
॥ ९ ॥ जो अपने स्वामीको प्रेमसे परभेश्वरके समान सेवन करती है, हे रिषे ! वह यहां अनेक भोगोको भोग कर अन्तमं पतिरो
कको भाप होती है ॥ १० ॥ सावित्री, छोपाथद्रा, अरन्धती, शांडिल्या, शतश्चया, अलुखया, ठक्ष्मी स्वधा, सती यह परतित्रता है ॥ ११ ॥ 4
संञा, सुमति, द्धा, मेना, स्वाहा ओौर भी बहुत पतित्रता ह जिनको भै दित्ता भयते मही कहती ॥ १२॥ पतिवता धर्मके भभावतेही यह
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शि०घ० [|© || जगते मान्य ओर पूज्य हं तथा बहा विष्ड ओर महेश तथा अन्य घनीश्वरोनि भी _उनका सम्मान किया है॥ १३॥ इत व ्
॥३२२॥ || || ठुम अपने पति शंकरी सेवा करती रहना यह सत्र्षोके गतिदाता दीर्नोप्र कषा करनेवाटे सनसे सेवित ह ॥१४॥ पतिवताओंका महान्धय
&|| शति स्मृतिं टिखा हभ है जसा ऽनमे ब्ेष्ठतासे छिखा गया है वैसा अन्यत्र नहीं है यहं निश्वय् है ॥१५। जव स्वामी भोजन कर च
तब पृरतिकी भक्तिं परायण होकर स्वयं भोजन करे इस भरकारसे करनेसे ची सदा आनन्दम रहती है ॥ १६ ॥ उस्कै सो जानेपर आप सोदे
ओर स्वामीति भथम जागे, ओर छठरदहित होकर स्वामी प्यारी होकर उनका हित करे॥ १७॥ ओर कभी अपनेको विना अकारक स्वामीकौ
सेष्यस्त्वया पतिस्तस्मात्सरवदा शङ्करः प्रथुः ॥ दीनाजुमहक्ता च सर्वसेव्यस्सतां गतिः ॥ १४ ॥ महान्पतिव्रताधम्मश्थ
¢ तिस्मृतिष नोदितः ॥ यथेष वर्ण्यते श्रष्ठो न तथान्योऽस्ति निितम् ॥ १५ ॥ भुंज्याद्धुक्ते भिये वत्यौ पातित्रत्यपराथणा ॥
~~
तिष्ठेत्तस्मिन्छिविनारी सर्वथा सति तिष्ठति ॥ १६ ॥ स्वप्यात्स्रपिति सा नित्यं बुध्येत्त प्रथम सुधीः ॥ सर्वदा तद्धितं
कर्यादकैतवगतिः प्रिया ॥ १७॥ अनलंज्ृतमात्मानन्दरशयेत्न कचिच्छिवि ॥ का्यार्थम्प्रोषिते तस्मिन्भवेन्मण्डनवार्जिता
॥ १८ ॥ पल्यर्नाम न गृह्णीयात् कदाचन पतिव्रता ॥ आङुष्टापिन चाकरोशेत्प्रसीदेत्ताडितापि च ॥ हन्यतामिति च घ्या
त्स्वामि्िति ङपां कङ् ॥ १९ ॥ आहूता शृहकार्याणि त्यक्ता गच्छेत्तदन्तिकम् ॥ सत्वरं साञ्जलिः प्रीत्यां सुप्रणम्य
वदेदिति ॥ २० ॥ किमथ भ्याहता नाथ स प्रसादो विधीयताम् ॥ तदोदिष्टा चरेत्कभ सुप्रसन्नेन चेतसा ॥ २१॥
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पाख 3 ॥६|| दिखावे ओर जव स्वामी प्रदेशमे हो तो'कमी श्रगार न करे ॥ १८ ॥ प्रतिबरता पतिका नाम कभी न ग्रहण करे, स्वामी इरे वचन कहं
लाय तोभी आप बुरे वचन कहे, ताडन करनेपर भी प्रसन्न रहे मारनेपर भी यही कहे हे स्वामिन् ! आपर्पाकरो ॥ १९॥ स्वामीकं
जुङानेपर सब कायं छोडकर उनके समीप जाय ओर शीघ हाथ जोढकर प्रणाम कर उससे कहे ॥ २० ॥ हे स्वामिनु ! किंञ्च निमित्त आप्
|
।
।
बुकाते ह ङपाकर कदिये जो वह आज्ञा दे भ्रसन्नचिन्तसे वह सब कायं करे ॥ २१ ॥
४
न
् बहुत काठतक स्थिति न करे दृसरेकै घरोमे न जाय जो-कुछ बात सुने उसे दृ्रोे काश न करे ॥२२। पूजाकौ साम्नी विना कहं |
सम्पादन करे ओर यथास्मय हितकारी समयका अवसर देखती रहे ॥ २३.॥ परतिकी आज्ञा विना कभी तीथेयात्नाको न जाय समाज ओर
उत्सवे जानेकी कुछ भी आवश्यकता नहीं ॥ २४॥ जिस श्जीको तीथ दशेनकी बही अभिङाषा हो वह अपने स्वा मीके चरणागृतको ठे इसमे
पतिका दिया हज महाप्रसाद जानकर पतिता भोजन करे ॥२६॥ देवता पितर अतिथियोको बिना समर्पण कयि न साय, तथा सेवकवगे गौ
चिरन्तिष्ेन्न न च द्वरे गच्छेत्ैव परालये ॥ आदाय तत्त्वं यत्किचित्कस्मे चिन्नापियेत्क्वचित् ॥ २२ ॥ पूजोपकरणं सर्वमलुक्ता
साधयेत्स्वयम् ॥ पतीक्षमाणावसरं 1 ॥ २२॥ न गच्छेत्तीथया्ां वै पत्याज्ञां न विना क्षनित् ॥ दूरतो
वजंयेतसा हि समाजोत्सवदशेनम् ॥ १ ॥ ती त॒ या नारी पतिपादोदकम्पिबेत् ॥ तस्मिन्सर्वाणि तीर्थानि क्षेाणि
चन संशयः ॥ २५९ ॥ थुज्यात्सा मन्नादिकं चे यत्॥ महाप्रसाद इत्युक्ता पतिदत्तस्प तित्रता ॥२६॥ अविभज्य
नचा सा ििषकपि ॥ परिचारकवगेषु गोषुभि्ुङकटेषु च ॥ २७ ॥ संयतोपस्करा दक्षा डष्टा म्ययपराडखसी ॥
भवेत्सा सर्वदा देवी पतित्रत् धा ॥ २८ ॥ ऊर्यात्पत्यनवज्ञाता नोपवासबूतादिकम् ॥ अन्यथा तत्फं नास्ति प्रत नर-
कम्ब्रजत् ॥ २८ ॥ सुखध्रन सुखासीन रममाणं यदच्छया ॥ आन्तरेष्पपि कायषु पतिं नोत्थापयेत्व्वचित् ॥ ३०॥ कीबम्बा
, दुरवस्थम्बा व्यापितं वृद्धमेव च ॥ सुखितं दुःखितं वापि पतिमेकं न रंषयेत् ॥ ३१ ॥
भिक्षुक इनको भी देना चाहिये ॥ २७ ॥ सव सामी एकन्नित करने चतुर रहे सनन रहे बहुत खच न करे .इस् भकारसे देवी सदा परतिवत
घमेमे परायण रहे ॥ २८ ॥ पतिकी आज्ञाक, बिना उपवास वतादिक न करे अन्यथा उत्ते कुछ फर नहीं होता ओर प्रटोकेमे
नरककी भाति होती है ॥ २९ ॥ सुख पूषैक बेटे ए अपनी इच्छासे रमण करते ए प्रतिको कार्यान्तर यँ न उट ॥ ३० ॥ नुक,
वयाभिभस्त, दुरदस्थाक भात, बद्ध, सुस दुली, केत्ाभी पति हो उसकी ज्ञाका उषवन न करे ॥ ३१ ॥
१३५ 1
जव मापिक धर्म हो तन् तीन रात अपना खख न दिसापे जवतक लान. नहो (= ५ न
अपने स्वामीकाही यख देसे बरसरेका नहीं अथवा पति समीप न हो तो पतिका ध्यान 7 १ नो
काही यु र न धारण करे ॥ ३४ ॥ कैशोंका संस्कार करे केशपाश संभार हाथ ओर का
धोबन, वन्धकी [ व्यभिचारिणी, ] भव
कृज्जठ कूपास्तक ( चोटी ) ताम्बूल मंगल सम्बन्धी भूषण धार् ९
भूषण धारण करे, मर्ताकी आयु बदानेकी इच्छा करती इई पतिव्रता दूर न् रहे ॥ ३५॥ धावन् 0 ा
ज्वी अपने पतिमे द्वेष करती हो उससे बात भी न करे न कहीं इकटी र
शुध्यति॥२।सस्नाता मरतवदनमीकषेतान्यस्य
( संन्यासिनी ) ओर दुरभागिनीसे मित्रता न करे ॥ ३६ ॥ जो
ह्लीध्मिणी भिरा च स्वसुखं नेव दशयेत्॥ स्ववाक्यं श्रावयेत्रापि यावत्स्नानाति
न कचित्॥ अथवा मनसि ध्यात्वा पतिम्भावम्विलोकयेत्॥३२।॥दरिवराङ़ दमं चव सिन्द कनलादिकम्॥ कूपासकच ताम्बूलं
मांगस्याभरणादिकम् ॥२४॥ केशसंस्कारकबरीकरकणादिभूषणम्॥ मतरायुष्यमिच्छन्ती दरयेत पतित्रता॥ २८५॥ न् रजक्या न
बन्धक्या तथा ्वणया न च ॥ न च दुभगया क्वापि सखित्वं कारयेत्कचित्॥२६॥पतिविद्रेषिणीं नारी न सा संभाषयेत्कचित्॥
नैकाकिनी कवितिषठ्मा स्नायान्न च कचित् ॥२७॥ नोलखले न ससल न वद्ुनयां दषद्यपि॥ न युजके न देहल्यां सती च प्रवसे-
त्कचित् ॥३८॥ विना म्यवायसमये प्रागरभ् नाचरेत्कचित्॥ य॒ज यर रुचिभतुस्तय प्रेमवती भवेत् ॥३९॥ इष्टा विषण्णा
स्याद्रिपण्णास्थे भिये भरिया॥ पतिता भवेदेवी सदा पतितितैषिणी॥४०॥एकरूपा भवेतपुण्या संपत्सु च विपत्सु च॥ िकृतिस्वा-
त्मनः कापि न कयौदध्यधारिणी॥४१॥ सपिलवणतेलादिक्षयेपि च पतिव्रता ॥ पति नास्तीति न ब्रयादायासेषु न योजयेत्॥४२॥
4: न कभी नेमी होकर ज्ञान करे ॥ ३७ ॥ ओखटी मूठ बुहार पाषाण यत्र ओर देहठीमे सती स्ली कभी. निवासन क्रे अथात् इन
पा.खं. ३ ||| स्थानों पर न सोवे ॥ ३८ ॥ विना उपयुक्तं समयक प्रगल्भता न करे जिस्ञ-जिसमं स्वामीकी रुचि हो उस-उसमे भेम करे ॥ ३९ ॥ जो वह
अ० ५४ || ||विषण्ण हो तो आप भी दुःखमाने जो भसन हो तो आप् भसन हो रियम प्रिय आचरण करे इ प्रकारे देवी पतिवता सबकी हितकारिणी
हो ॥ ४० ॥ संपत् विपतमे एकरूप पण्यप रहे पै्यं॑धारण कर सदा पतिकी हितकारिणी रहे ॥ ४१ ॥ परतित्रता घृत छ्वण वेक
शिश्पु°
॥३२३॥
1
व.
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(जज यजप 3223
2 2222222 4
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न होने परभी "नहीं है' रे्ा पतिसे न कहे उसको परिभममे न युक्त करे ॥ ४२ ॥ ब्रह्मा विष्ण ओर शिवे भी पति विशेष |
। है । हे देवेशि ! पतिव्रताको अपना पतति ही शिवरूप जानना चाहिये ॥४३॥ जो परतिको उद्टवन कर बत उपवास ओर नियम करती है
£ बह स्वामीकी आयुको हरण करती है ओर मरकर नरकम जाती है ॥ ४४ ॥ जो नारी कोधमें तत्पर होकर अपने स्वामी भत्ुत्तर करती है
वहं ्रामकी कुतिया ओर निजन वनम गीदद् होती है ॥ ४५॥ पतिसे ऊंचे स्थान प्रर न वेढे दु्ोके समीप न जाय ओर पतिते कभी कातर
वाक्य न कहे ॥ ४६ ॥ न पतिकी निन्दा करे कठेशको तो दूरसेही त्याग दे, गारुजनोंकी स्थितम जोरसे न बे, न ऊंचे स्वरसे हसे ॥४७॥
विधे्विष्णोदैरादरापि पतिरेकोधिको मतः ॥ पतिताया देवेशि स्वपतिरिशिव एव च ॥ ४३ ॥ वृतोपवासनियमम्पतिशुटष्य
| या चरेत् ॥ आयुष्यं हरते भत्ता निरयमृच्छति ॥ ४४ ॥ उक्ता अरत्युत्तरन्दव्या्या नारी कोधतत्परा ॥ सरमा जायते
है| भामे शृगली निजने वने ॥ ४५ ॥ उच्चासने न सेवेत न वनेहष्टसनिधौ ॥ न च कातरवाक्यानि वदेतनारी पतिं कचित्
|| ॥ ९६ ॥ अपादं न च ब्रूयात्कलदं दूरतस्त्यजेत् ॥ गुरूणां स््रिधौ कापि नेैत्रैयात्न वै इसेत् ॥ ४७॥ बाद्यादायान्त-
¢ मालोक्य त्वरितात्रनलाशनैः ॥ ताम्बूलेवसनेश्चापि पादसम्बाहनादिभिः ॥४८॥ तथेव चाटवचनेः स्वेदसन्नोदनैः परैः ॥ या
प्रियं परीणयेत्मरीता तरिरोकीं भ्णता तया ॥ ४९ ॥ मितन्ददाति जनको भितं भ्राता मित खतः ॥ अमितस्य हि दातारं
ट भतारम्पूजयत्सदा ॥ ५० ॥ भर्ता देवो युर्भतां धर्म॑तीर्थवतानि च ॥ तस्मात्सर्व्परित्यज्य प्रतिभेकं समर्चयेत् ॥ ५१ ॥
४ पतिको बाहरसे आया हभ देखतेही शीघ्रही अन्न जढ भोजन ताम्बर वनन ओर चरण धोने आदिसे पतिका सत्कार करे ॥ ४८ ॥ इसी
भकार मनोहर वचन तथा पसीना सुखानेको पंखा करक जो अपने स्वामीको भरसन्न करती है उक्ते जानो तलोक जीत टी ॥ ४९ ॥ भाता
४ पिता पत्र भाई परिमित सुख देते है, परनत॒ पति अभित सुख देता है इस कारण उमे सदा पूजे ॥ ५०. ॥ भरताही देवता, भर्तही यर धर
५ तीथं व्रत सव कुछ स्वामीही है, इस कारण) सब कुछ छोडकर एक पतिकी ही पुजा करे ॥ ५१ ॥ ।
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पास जाती है ह वृक्षकी सखोदटमं रहनेवाटी उदकी होती है॥ ५२ ॥ जो
व्याध्री ओर बृषदंशिका होती है ओर जो स्वामीको कुटिक आंखे दखती ह
वामीको छोडकर केवर आपी. भिषशटन्न खाती है वह भरामकी सुअरिया
बरा वल्य (छागी) अपनी विष्ठा सानेवाटी होती है ॥ ५४ ॥ जो अपने स्वामीको तू कहकर बोती है वह म्रकी होती
ओर जो अपनी सतते हमेशा र्मा करती है वह बारंबार दुर्भगा होती है ॥ ५५ ॥ जो स्वामीपे इष्टि चुराकर किमी अन्यक
या भर्तारम्परित्यज्य रश्चरति दुर्मतिः ॥ उलूकी जायते क्रा वृक्षकोटरशायिनी ॥५२॥ ताडिता ताडिनु चेच्छेत्सा व्य्री
वृषदंशिका ॥ कटाक्षयति यान्यम्बै केकराक्षी तु सा भवेत् ॥ ५३॥ या भरतारम्परित्यज्य मिष्टमश्नाति केवलम् ॥ भामे वा
सूकरी भूयाद्ल्यर्वापि स्वविड्थुजा ॥ 48 ॥ या तुकृत्य प्रियम्बरयान्धूका सा जायते खल ॥ या सपत्नी सदेष्यत भगा सा
पुनः पनः ॥५५॥ दृषटिम्विटुप्य भ्या कञ्चिदन्यं समीक्षते ॥ काणा च विखुखी चापि ुङूषापि च जायते ॥५६॥ जीवहीनो
यथा देहः क्षणादशुचिताम्ब्रनेत्॥ मृरीना तथा योषित्सुस्नाताप्यहचिस्सदा ॥५७॥ सा धन्या जननी रोके स धन्यौ जनकः
पिता ॥ धन्यस्स च पति्स्य शृेदेवी पतिव्रता ॥५८॥ पितवश्याः मात््वश्याः पतिवेश्याञ्लयश्चयंः ॥ पतिव्रतायाः पुण्येन स्वग
सौख्यानि जते ॥ ॥ ५९ ॥ शीरभङ्खेन दत्ताः पातयन्ति कख्यय् ॥ पितुर्मातुस्तथा पत्युरिदहाश्चचापि दुःखिताः ॥६०॥ .
| है, वह कानी कुसी ओर विपा होती है ॥ ५६ ॥ जेसे जीवक विना देह क्षणमात्रम अपवित्र हो जाता है इसी भकार अपने
स्वामीके विना स्नान करनेपर भी न्वी सदा अपवित्र रहती है ॥ ५७ ॥ उसके माता पिता जगते धन्य है उनका परति भी धन्य है जितकै
चरमे पतिता स्वी दियमान है ॥ ५८ ॥ पिता माता ओर परततिके वंशकै तीन-तीन परुष पतिवताके पण्यसे स्वगंमे सुख भोगते हँ ॥ ५९ ॥
ओर शीखके भंग करनेसे तीन कुरु नरक जाते है वह पिता माता ओर पिके तीन कुठ नरकरम ङती ओर यहां भी वहां भी दुःखी
शि ७पु9
॥३२४॥
जो दुमति च्ची अपने स्वामीको छोड़कर एकान्तम वूसरेके
स्वामीके मारनेपर उसे मारनेको दौडती है वह दूसरे जन्मे
वह केकराक्षी [ नीची ऊची आसं वारी ] होती है ॥ ५३ ॥ जो २
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| ॥ ६० ॥ पतिवताकै. चरण जहां-जहां पृथिवीपर पडते है वहीं-वहीं वह पापहरनेवाटी पवित्र होती है ॥ ६१ ॥ वह प्यापक |
सोम ओर पवन अपनी पवित्रताके छ्य पतिवताको स्पशं करते है इसमे सन्देह नहीं ॥ ६२ ॥ पतिवताके स्परीकी जठ सदा वांछा करते ई
| आज तुम्हारे स्पशेसे हमारी जइताका नाश हआ ॥ ६३ ॥ भार्याही गृहस्थ ओर सुखका मूढ है, धर्मफठ्की भामि ओर सन्तान बृधिके
च्ि मायांही है ॥ ६४ ॥ क्या रूप ओर सुन्दरतासे युक्त अनेक धरो बविर्यो नहीं है, पर पतिता ज्लीकोही शंकरी गति ओर भक्ति
। भप्त होती है ॥ ६५ ॥ भार्या ही दोनों टोकोका शल जय किया जाता है, देवता, पितर, अतिथि, यज्ञकं विना भार्या नहीं होते ॥६६॥
पतित्रतायाश्चरणो यतर य स्पृशेदधवम् ॥ तञ तञ भवेत्सा हि पापहन्तरी सृपावनी ॥ ६१॥ विधुः परतित्ततास्पशं ङरुते भानु-
मानपि ॥ सोमो गन्धवहश्चापि स्वपावित्याय नान्यथा ॥६२॥ आपः पतिवरतास्पशमभिरष्यन्ति सर्वदा ॥ अब जाड्यवि-
. ||| नाशो नो जातस्त्वद्यान्यपावनाः॥६३॥ भार्या मूं गृदस्थास्य भार्या मूकं सुखस्य च ॥ भार्या धर्मफलावाप्त्यै भार्या सन्ता-
9 नार्य्यो रूपलावण्यगविताः॥ परम्विश्वेशभक्तयेव लभ्यते शची पतिवता ॥६९॥ परलोकस्त्वयं
नद्य ।॥६९॥ गृहे गृहे न कि न क ह
लोक जीयते भाया द्वयम् ॥ देवपित्रतिथीज्यादि नाभार्यः कम चाईैति ॥ ६६ ॥ गृहस्थस्स हि विज्ञेयो यस्य गेहे पतिव्रता ॥
मस्यतेऽन्यान्प्रतिदिनराक्षस्या जरया यथा ॥ &७ ॥ यथा गगावगाडेन शरीरं पावनं भवेत ॥ त॒था पतिवतां षा सकलम्पा-
वन भवेत् ॥६८ ॥ न गङ्गाया तया भेदो या नारी पतिदेवता ॥ उपाशिवसमौ साक्षात्तस्मात्तौ परूजयेदुधः ॥ ६९ ॥ तारः
पतिशथतिनोरी क्षमा सा स स्वयन्तपः ॥ फटम्पतिः सत्किया सा धन्यौ तौ दम्पती शिवे ॥ ७० ॥
उसको गृहस्थ जानो जिसके घरमे पतिव्रता चली है, ओर तो दिन रात जरा ाक्षसीकै समान आस्न करती है ॥ ६७ ॥ जेसे गंगा स्नानस
शरीर पवित्र हो जाता है, एसेही पतिवताको देखकर सव पवित्र होजाते है ॥ ६< ॥ पतिवता ओर मंग इन दोनोभे कोह भेद नहीं है शिव
ओर पावतीकै समान वे दोनों चली परुष है इस कारण विदवानूको उनका निरन्तर ¶जन_ करना चाहिये ॥ ६९ ॥ पति ॐकार है, जी
वेदशरुति है, बरी क्षमा है तो पति तप दै, पति फल है, बी प्त्किया है, पे दोनों ल्ली परुष हे पार्वती ! धन्य हैजो रेते है॥ ७० ॥
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हे पार्वती ! इस भकारे भने तुमसे पतिवताओंका धं वणेन किया, अब ५८ ओर सावधानी पतिब्ताके भेदोंको सुनो ॥ ७१ ॥ पतित्रता
उत्तमादिके भेदे चार प्रकारकी होती है जो स्मरण करनेसे पाप हरनेवाटी ह ॥ ७२ ॥ उत्तम मध्यम् जनम् अति. निकष अव दूनकै लक्षण
कहती हँ यह सावधान होकर सुनो ॥ ७२ ॥स्वप्नमे भी जिसका मन अपृने -पतिकोही देसता है, कभी परपरतिम नहीं जाता वहं उत्तमा
है ॥७४॥ जो दूसरोके पतियोंको पिता आता ओर जके सुमान देखती है, हे पावती ! वह पतिवता मध्यम कोटिक कही ग हं ॥७५॥
जो शची मनम अपना धर्म सम्चकर व्यभिचार नहीं करती है हे पार्वती ! वह भी सचरित्रवाटी ह्ली निकृष्ट ( अपम ) कही हं ॥ ७६ ॥
एवम्पतिवताधो बणितस्ते गिरीन्द्रजे ॥ तदधेदाञ् शृण सुप्रीत्या सावधानतयाऽच मे ॥ ७१ ॥ चतुविधास्ताः कथिता नार्यो
देवि पतिव्रताः ॥ उत्तमादिविभेदेन स्मरतां पापहारिकाः ॥ ७२ ॥ उत्तमा मध्या चव निकृष्टातिनिकृष्टिका ॥ ब्रुवं तासा
लक्षणानि सावधानतया शृणु ॥ ७३ ॥ स्वप्नेपि यन्मनो नित्यं स्वपति पश्यति भुवम् ॥ नान्यम्परपति भद्रे उत्तमा सा प्रकी-
तिता ॥ ७४ ॥ यापितृभरात॒सतवत् परस्पश्यति सद्धिया ॥ मध्यमा सा दि कथिता शेलजेवे पतिव्रता ॥ ७८ ॥ इद्धा स्वधर्म
मनसा व्यभिचारं करोति न ॥ निङृष्ठा कथिता सा हि सुचरिरा च पार्वति ॥७६॥ पत्युः कुलस्य च भयाद्वयभिचारं करोति
न ॥ पतित्रताऽथमा सा हि कथिता पूर्वसूरिभिः ॥ ७७॥ चतुरविंधा अपि शिवे पापहन्त्यः पतिव्रताः ॥ पावनास्सवंखोकाना-
मिहासुत्ापि , इषितः ॥ ७८॥ पातित्रत्यभ्रमावेणाञिच्िया चिखराथनात् ॥ जीवितो विप्र एको हि मृतो वारादशापतः
॥ ७९ ॥ एवं ज्ञात्वा शिवे नित्यं कर्तव्यस्पतिसेवनम् ॥ त्वया शेखात्मजे प्रीत्या स्वकामप्रदं सदा ॥ ८० ॥
जो मनम इच्छा करनेपर भी पति ओर कुठके भयसे व्यभिचार नहीं कृरती उस्षको एुरातन पंडितोने अति निकृष्ट कहा है ॥७७॥ हे शि
यह चार भरकारकी पतिवता पाप हरनेवारी है ओर दोनों छोकोको पवित्र करनेवाटी कही गह है ॥७८॥ पतिवतधमके प्रभाक्से अत्रक्रषीकी
हीने तीन देवताओंकी प्राथनासे बाराहके शापसे मरे हए एक बाह्मणको जिला दिया था ॥ ७९ ॥ हे शिवे ! एसा जानकर नित्य पतिका
सेवन् करना चाहिये ह शेरणी ! रसा करनेसे तुमको सब कामनाओंकी प्राति होगी ॥ <° ॥ ु |
शिणपु°
॥ ३२५
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रु.सं.२
पा.खं. ३
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| जगत्की याता महेशी हो, साक्षात् शिवजी तुम्हारे पति है तुम्हारे नामस्मरण कर श्िये पतिव्रता होंगी ॥ ८१ ॥ हे देवि ! तुम्हारे ्
विशेष कहनेका प्रयोजन क्या है तो भी हे कल्याणि | जगतके आचारके निमित्त ने एसा कहा है ॥ <२ ॥ ब्रह्माजी बोठे रसा कह वह बाह्मण
की ल्ली भगवतीको प्रणामकर मौन हदं ओर शंकरकी भरिया पारवती मी बडे आनंदको भप्त हृद ॥ ८३ ॥ इति श्रीशिवमहाऽराणभाषारीकायां
रद्रसंहितान्तगंततृतीयपावेतीखण्डे पति्रताधभेवणैन नाम चतुःपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५४॥ बह्लाजी बोठे इस प्रकार उस बाह्मणी देवीने भगवतीको
जगदम्बा महेशी त्वं शिवस्साक्षात्पतिस्तव ॥ तव स्मरणतो नार्यो भवन्ति हि पतित्रताः ॥ ८१ ॥ त्वद कथनेनानेन किं
देवि भ्रयोजनम् ॥ तथापि कथित मेऽद्य जगदाचारतःशिवे ॥ ८२ ॥ ॥ अस्नोवाच ॥ इत्युक्ता विररामासौ द्विजघ्ली सुपरणम्य
¢| ताम् ॥ शिवाश्ुदमतिप्राप पावती शङ्करप्रिया ॥ ८३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दरसंहितायां ततीये पावैतीखण्डं
प्तिव्रताधमे वर्णनं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ अल्नोवाच ॥ अथ् सा बराह्मणी देव्यै शिक्षयित्वा वतञ्च त त् ॥
भरोवाच मेनाम मन्त्य या्रामस्याश्च कारय ॥ १ ॥ तथास्त्विति च सम्पोच्य प्रेमवश्या बभूव सा ॥ धृतिन्धृत्वाहूय कालीं
विश्केषविरहा इला ॥ २ ॥ अन्यु रोदनं चकर संरिकष्य च पुनः पुनः ॥ पार्वत्यपि रूरोदोचेश्चरन्ती कृपावचः ॥ ३ ॥
शलभ्रिया शिवा चापि मूच्छामाप श॒चार्दिता॥ ूच्छम्पराुदेवपरन्यः पार्वत्या रोदनेन च ॥ 9 ॥ सर्वाश्च शरुदना्यस्स्
मासीदचेतनम् ॥ स्वयं रुरोद योगीशो गच्छन्कोन्य परः प्रथः ॥ ५ ॥
पतित्रत धर्मकी शिक्षा देकर मेनासे कहा अब इनकी यात्रा करा ॥ १ ॥ बहत अच्छा रेता कहकर भना पेमकै वशीभूत होगं ओर धीरज धर
पावंतीको खाकर विरहसे व्याकु हो ॥ २ ॥ वारंवार आर्गिनकर ऊवे स्वरे रोने ख्गी, ओर दीन वचन कहकर पार्वती भी ऊवे स्वरसे
रोने ठगी ॥ ३॥ ओर शोके व्याक होकर मेना ओर पार्व॑ी दोनों सूच्छित होगई, ओर पार्वतीके रोनेरे देवपत्नयै भी मूच्छित होग्ईं ॥४॥
सब ही रोने ठगी मौर सबही अचेतन होगई ओौरकौ तो क्या कहे, बिदाकै सभय योगीश्वर पर परभु भी स्वयं रोने र्गे ॥ ५॥
|
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शि०इ० || || इसी समय शीघधतासे हिमाखय आये उत्के साथमे उनके सब पत्र ओर भ्रट बाह्मण थे ॥ ६ ॥
३२६ || जाती ह,इस भकार वारंवार शब्द करने छगे॥७॥तब उञ समथ श्र ब्रर्णोके सा
रु.
पा.खं.३
| अञ ५
पार्वतीको गोदमं केकर मोहे स्वयं रोने ठे, कहां
थ उनका पुरोहित ज्ञानम शष्ट रूपा कंरके सवको आध्यात्मवियार्ष
किया ओर छोकाचारसे महामाया रोने ठगी ॥ ९ ॥ पावंतीका
रोदन देखकर ओर भी सब खयां रोने गीं परन्तु पारदतीकी माता मेना भगिनी ओर भाई बडे व्याकुङ हुए॥१ ०५ वारंवार मेना तथा भगिनी ओर
एतस्मिन्नन्तरे शी्रमाजगाम हिमालयः ॥ ससवंतनयस्तत्र सचिवैश्च दविज परैः ॥ & ॥स्वयं क्रोदं मोदेन वत्सां त्वा स्वव
्षसि ॥ कयासीत्येवषुजचायै श्न्यं कृत्वा सुहषहः॥७॥ततःघरोदितो वितेरध्यात्मविद्यया खखम् ॥ सवान्धरबोधयामास कृपया
ज्ञानवत्तरः॥८॥ ननाम पार्वती भक्त्या मातरम्पितरं य्॒म्॥ महामाया भवाचारादुरोदचेशंहृशंडः ॥९॥ पा वत्या रोदनेनैव शरद्
सप्व॑योषितः।॥ नितरां जननी मेना यामयो भ्रातरस्तथा ॥१०॥पुनः पुनः शिषामाता यामयोऽन्याश्च योषितः॥ तरो जनकः
प्रेम्णा श्श्दुबद्सौहदाः॥११।तदा विप्राः समागत्य बोधयामासुरादरात्॥ ख्य्िवेदयामासर्या्रायास्सुखदम्परम्॥१२॥ ततो
तै || समञ्चाता हुमा ॥८॥ पावैतीने परमभक्तिते अपने माता पिता ओर युरुको भाम्
दिमाल्यो मेनां पृत्वा धेय्य॑स्विवे कत्ः॥शिबिकामानयामास शिवारोदणहेतवे॥ १३॥शिवामारोहयामासुस्ततर विप्ाङ्गनाश्चताम्॥
४
व्य च्-व=न--न----------चच्व््््व्यस्
आशिषम्प्रददुस्सर्वाः पिता माता द्विजास्तथा ॥१४॥ महाराह्युपचाराँ श्च ददौ मेना गिरिस्तथा ॥ नानाद्रन्यसमूदं च परेषा
न्दुलभज्भम् ॥१५॥ शिवा नत्वा शुख्न्सर्वाख जनकं जननीन्तथा ॥ द्विजान्पुरोहितं यामीश्चीस्तथाम्या ययौ शुने ॥१६॥
द्री चयं भ्राता ओर पिता प्रेमे बद्ध होकर रोने छगे ॥ ११ ॥ तव बराहर्णोने आकर आदरसे सरको समक्षाया ओर कहा यात्राकी सुख
देनेवाटी लर ट्टी जाती है देर सत करो ॥ १२॥ तवं हिभार्यने धीरज धर भेनाको समज्ञाय पार्वतीके चढनेके निमित्त पराठकी मंगवाहं ॥
॥ १३॥ ओर ब्राहमणोंकी च्ियोने पार्वतीको पाठकीपर चडढाया, पिता भाता ओौर गाह्मण सबने आशीर्वाद दिये ॥ १४॥ मेना ओर हिमाठ्य
ने महाराजोके जेसे उपचार दिषे, ओर भी अनेक कारकै द्रव्य समूह जो दूसरोको परमदुभ थे दिये गये ॥ १५ ॥ पावती सरन य॒रुजन
| पिता बाह्मण पुरोहित भगिनी तथा अन्य ्ली ज्नोको भ्रणाषकर् चटी ॥ १६ ॥ बुद्धिमान् हिमालय भी परमकै बशीभूत हो संग २ ,
ओर वहां प्राप हुए, जहां सब देवता ठहरे हृए थे ॥ १७ ॥ ओर भीति सव कोई उत्सव करने कगे ओर प्रशसा करते हुए भक्तिसे प्रमुको
प्रणाम करने गे ओर वहांसे विदाहो अपने परमं भविष्ट हुए ॥ १८ ॥ इस ओर शिवजी पावती सहित अपने स्थान पर पहुंचकर बोठे है
देवेशि ! तुमको भै जातिस्मरण कराता हूं, जिसको तुम लीरा स्मरण करती हो उसे प्ाणोके समान प्यारी हो ॥ १९ ॥ ब्षाजी
बोटे इस भकार अपने स्वामी महेशके वचन शकरकी प्रिया सती पार्वती सुनकर कुक हसती हृईं बी ॥ २० ॥ पावती बोटी हे देव | भै
दिमाचलोऽपि ससुतोऽगच्छतस्नेहवशी बुधः ॥ प्राप्तस्तत्र प्रथर्यज सामरः प्रीतिमावहन्॥ १७॥ प्रीत्याभिरेभिरे सवे महोत्सवपुर
स्सरम् ॥ प्रभुम्पणेमुस्ते भक्तया प्रशंसन्तोऽविशन्पुरीम्॥१८॥जातिस्मरां स्मारयामि नित्यं स्मरसि बेद्रद॥ लीलया त्वाञ्च देवेशि
सदा प्राणप्रिया भम ॥१९॥ ब्रह्मोवाच ॥इत्याकण्यं महेशस्य स्व॒नाथस्याथ पार्वती॥ शङ्करस्य प्रिया नित्यं सस्मितोवाच सा
सती ॥२०॥ पार्वत्युवाच ॥ सवं स्मरामि प्राणेश मौनी भ्रूतो भवेति च ॥रस्तावोचितमदयाज्च काथ छ् नमोऽस्तु ते ॥२१॥
ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं प्रियावाक्यं सुधाधाराशतोपमम्॥ घुधुदेऽतीव विश्वेशो खौकिकाचारतत्परः॥२२॥ शिवः सम्भृतसम्भारो
नानावस्तुमनोदरम्॥ भोजयामास देवश्च नारायणपुरोगमान् ॥२३॥ तथान्या्निखिलान्प्ीत्या स्वविवाहसमागतान्॥भोजयामाष
सुरखमत्नम्बहुविध्ध्रषुः॥२९। ततो सक्ता च ते देवा नानारत्न विभूषिताः ॥ सच्रीकास्गणास्सवे परणेषुशवदरशेखरम् ॥२५॥
सब स्मरण करती ह मँ मौन हूं आपको प्रणाम करती हू, भ्रस्तावके उचित कां हो सो आप् कर ॥ २; ॥ ब्रह्माजी बोरे इस भकार अभृतके
समान पावेतीकै वचन सुनकर ठौकिक आचार दिखाते हृए शिवजी बहत भरसन्ञ हए ॥ २२ ॥ शिवजीने अनेक ॒वस्तुओंका सम्भार
सजाया ओर विष्ण आदि देवताओंको भोजन कराया ॥ २३ ॥ तथा अपने विवाहम आये हए ओर सब देवताओंको यथा योग्य बहुत
भकारे मोजन कराया ॥ २४ ॥ तव वै सव देवता भोजन करक अनेक रत्नो भूषित हो अपनी २ दविोके सहित भवानीपति शकरको
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भणाम कर ॥ २५ ॥ तथा चुन्दर बाणियोसि सतुति कर ओौर परमते परिक्रमा कर विवाहक! बडाई करते अपने २ स्थानोंको गये ॥ २६
है नारदजी ! सञञे ओर विष्णजीको शिवजीने स्वयं प्रणाम किया, जैसे छोकाचारको भाप होकर विष्णजी कश्यपको रणाम करते ई ॥ २७॥
मैने आछिगन करके उनको आशीर्वाद दिया ओर फिर शकरके आगे स्थित हो उनको परब जानकर समवि का भौर
दिष्टी हाथ जोडकर शिवा शिषको भणामकर विवाहकी पशसा करते हए अपने स्थानोको गये ॥ २९ ॥ शिवजी भी कैटासमं स्थित हौ
पार्तीके साथ विहार करने लगे ओर सब गण आनन्दको भा हो भमत शिवजीका भजन करने छे ॥ ३० ॥ द तात । इस् भकार शिव
स्तुत्य वाग्भिरिष्टाभिः परिकम्य शदान्विता॥ शंसन्तो भिवादञच स्वधामानि यथृस्ततः॥२६॥नारायणं इन मां चप्रणनाम्
शिवस्स्वयम्॥कौकिकाचारमाधित्य यथा विष्णुश्च कश्यपम् ॥२७॥ मयारिलष्याशिषन्दत्त्वा शिवस्य पुनरग्रतः॥ मत्वा व
` तं परं रह्म चक्रे च स्तुतिशत्तमा ॥२८॥ तमामृन्ञ्य मया विष्णस्साजटिश्िशवयोधदा ॥ प्रशंसस्तद्विवाहश्च जगाम सवाल
यम्परम् ॥ २९॥ शिवोऽपि स्वगिरौ तस्थौ वा्वस्या विहरन्धुदा॥ सवं गणस्युखं प्रापुरतीव स्वभजच्छिवौ ॥३०॥ इत्येवङ्क
यितस्तात शिवोद्वाहस्स॒मंगलः ॥ शोकध्नो इरषैजनक आयुष्यो धनवद्धंनः॥३१॥य इमे शृणुयान्नित्यं छ्ुचिस्तद्रतमानस्ः ॥ .
श्रावयेद्राथ नियमाच्छिवलोकमवाप्लुयात् ॥ ३२ ॥ इदमाख्यानमाख्यातमद्धतं मंगलायनम् ॥ सवविध्प्रशमनं सर्वव्याधिवि
नाशनम् ॥ ३३ ॥ यशस्यं स्वरग्यमाथुष्यं पुजपौजकरम्परस् ॥ सर्वकामप्रदं चेह भुक्तिदं शक्तिं सदा ॥ ३७ ॥
ओर पार्वतीका मंगरूदायक विवाह वणेन किया है, यह शोकका दूर करनेवाठा, आनन्दका बढानेवाठा, ओर आयुका बढानेवाढा है ॥३१॥
जो पवित्र हो शिवजी भन रूगाकर नित्य इस कथाको सुनते है वा जो नियमसे सुनते है प शिवल्ोकको भ्रात होते है ॥ ३२ ॥ यह
आख्यान बडा अद्रुत ओर भगल्का करनेवाटा है सब वि्नौका शान्त करनेवाछा ओर सष व्याधिर्योका नाश करनेवाला है ॥ ३३ ॥ यह
आरूयान् य॒शका देनेवाखा, स्वर्गं ओर आयुका देनेवाा, एत्र पौरका बढानेवाठा, सव कामना ओर मुक्ति सक्तिका सदा देनेवाढा है ॥३४॥
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दूर करनेवाडा तथा महाशान्ति ओर शुभका करनेवाठा है, दुःस्वप्नकी शान्ति करनेवाला, ओर बुद्धि ज्ञानका देनेवारा है ॥३ ।
| शिवजीके सम्पूणं उत्सवोँमं पाठ करना चाहिये, शिकके प्रसन्न करनेकी इच्छावाटोंको तथा शिवजीका सन्तोष करनेवार्छोक्ो यह
8 योग्य ३ ॥ ३६ ॥ विरेषकर इसको देवता आदिकी भ्रतिष्ठाके समय पदा जाय तथा शिव सम्बधी समस्त कार्थके आरभ्भमं पडा जाय तो
|| अपमृत्युप्रशमनं महाशान्तिकरं शुभम् ॥ स्वदुस्स्वप्रशमनं बुदधिप्ज्ञादिसाधनम् ॥ ३९ ॥ शिवोत्सवेषु सवेषु परितव्यम्प
है| यलतः ॥ भेप्सुभिज॑नेःप्रीत्याशिवसन्तोषकारणम् ॥३६॥ परेत्पतिष्ठाकाठे त॒ देवादीनां विशेषतः ॥ शिस्य स्वकार्यस्य
ठ प्रारम्भे च सुप्रीतितः ॥ ३७ ॥ शृणुयाद्वा श्ुचिभूत्वा चरितं शिवयोश्शिवम् ॥ सिध्यन्ति सर्वकायांणि सत्यं सत्य न
|| सशयः ॥ २८ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे ब्रह्मनारदसंवादे द्वितीयायां शदरसंहितायां ततीय पार्वतीखण्डे शिवकैलासगमनवर्ण
4 ने नाम पञ्चपञ्ाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५९५ ॥
शिव भरसन्न होते है ॥ ३७ ॥ ओर पित्र होकर शिवा शिवके जो चरित्र पठते है उनकै सव क्य क्षि होते है, यहं सत्य सत्य है, इसे
सन्देह नहीं ॥ ३८ ॥ इति भरीशिवमहाप्रणे बह्नारदसवादे श््रसंहितान्तगेततृतीयपार्वतीखण्डे पंडित-ज्वाठाषसादभिथकतभाषारीका्थां शिक
छासषगमनवणेनं नाम पंचपश्चाशतमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
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समाप्तोऽयं त्रतीय-पार्वतीखण्डः ॥ ३ ॥
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इति रिवमहापुशणे भाषाटीकाषमेते तृतीयः
पाव॑तीखण्डः समाघ्ठः ॥
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जो नमस्कार करनेसे भसन हो जाते है जिनका मन बडा निर्म है जो प्रेमभ्रिय ओर प्ेमकै देनेवारे है जो पूणं स्वप भक्तोके मनोरथ ९
कएनवाटे सब भकारपे पूण सममूणं देशवयके एक स्थान सत्यस्वरूप सत्य सत्यमय तीनों कारे सत्य रेशव्बारे सत्यके भिय सत्यक दैनबाडे |©
विष्ण ओर बह्लासे स्तुतिको प्राप्त अपनी कपासे शरीर धारण करनेवाठे काल्याणकारी शंकरको प्रणाम करता हूं ॥ १॥ नारदजी बोढे हे ६
बहान् 1 रोक कल्याणकारी शकरने पाव॑तीके साथ विवाह करके जव अपने कैठाश प्ैतको गमन किया, तव वहां कया किया सो किये ||
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ श्रीगौरीशंकराभ्यां नमः॥अथ श्ढसहितातर्गतश्वतुर्थः कुमारखण्डः
समति भ्रमप्रिय प्रेमदं प्रण पूर्णकरं परपूणनिखिलेनवयेकवासं शिवम्॥ सत्यं सत्यमय धिसत्य॒वि
प्रारभ्यते ॥ वन्दे नन्दनतुष्ठमान |
तं स्वकीयुकृपयोपात्ताङृति शंकरम् ॥१॥ ॥ नारद उवाच ॥ विवाहयित्वा! गिरिजां शंकरो
भवं सत्यभ्रियं सत्यदं विष्णुब्रह्मवु
| दोहा-श्रीय्चरण सरोज रज, ग्म सरित दिय लाय । भाषाटीका सुखद अति, कुमारखंडकी गाय ॥ १ ॥
ठ
ट
|
/ रोकशंकरः॥गत्वा स्वपर्वतं बह्मन्
किमकाषिंदधि तद्वद् ॥२॥ कथं हि तनयो जज्ञे शिवस्य परमात्मनः॥ यदर्थमात्मारामोऽपि सुव
पं १५ ू ह शिवां परभुः ॥ ३ ॥ तारकस्य
कथं बह्मन् वधथोऽभरदेवशकरः ॥ एतत्सर्वमशेषेण वद कृत्वा दयां मयि॥ ९ ॥ घ्रूत उवाच ॥ इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य नारदस्य प्रजा
ट
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| पतिः॥सुभसन्नमनाः समृत्वा शकरं र्युधाचद ॥५॥ ब्रह्मोवाच ॥ चरितं शृण वक्ष्यामि शशिमौरेसतु नारद् ॥ ग॒हजन्मकर्या ||
दि्यां तारकासरसदरषम्॥ ६ शरतां कथयाम्यद्य कथां पापश्रणाशिनीम्॥यां अत्वा सर्वपापेभ्यो सुच्यते मानवो धुषम् ॥७॥ ||
¢ ॥ २ ॥ परमात्मा शिवकै किंस भरकारसे एत्र हभ, जिसके निभित्त आत्माराम भभु शकरने शिवासे विवाह किया ॥ ३ ॥ हे बहस ! देवसुख £
|| कारी तारकासुरका वभ किप प्रकारमे हुआ, भरे ऊपर दयाकर यह सव विस्तारके साथ किये ॥ ४ ॥ घतजी बोढे इस प्रकार भजापति ट
ह|| नारदजीकै वचन घुनकर शकरको स्मरण कर प्रसन्न मनम कहने ख्ये ॥ ५ ॥ ब्रहाजी बोे हे नारदजी ! शिवजीके चरित्र सुनो गुहके
¢ जन्मकी दिव्य कथा ओर तारकासुरका वध कहताहूं ॥६॥ घनो यँ इस समय पापनाशिनी कथाको कहता हूं जिसको नकर मलुष्य निश्चय
|| सब पापोपि छूट जाता है ॥ ७ ॥
१२३७
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(1 & || यह आख्यान प्रापरहित रहस्यरूपर गोपनीय ओर प्रम अद्भुते पाप संताप ओर
॥३२९॥ ||| साररूप सब श्रुतियोम मनोहर छख ओर मोक्षका देनेवाला तथा कर्ममूलका नाश करनेव
शिवजी भी बडी शोभाको भाप हए, ओर देवता ओकि छत्यका विचार करने ठगे तथा सवता
९ भगान् शिव जव कैठा्मे आये, सब गण प्रसन्न होकर अनेक भकारके. सुख मनाने ठगे ॥११॥
करनेवाढा है ॥ ९ ॥ शिवाका विवाह कर कैठा्म आक ||
ओंकी पीडाका भी विचार किया ॥१०॥ सक्षात् ||
शिवके कैठाश आनम बडा महोत्सव हभ, देवता ||
इदमाख्यानमनघं रदस्य परमाद्धतम् ॥ पापसंतापहरणं सर्वविश्रविनाशनम् ॥ ८ ॥ स्ैमंगल्दं सारं सवेश्चुतिमनोहरम् ॥
खद मोक्षबीजे च करममूलनिकृतनम् ॥ ९॥ कैकासमागत्य शिवां विवाह्य शोभां भ्षेदे नितरां शिवोऽपि ॥ विचारयामास
च देवङ्ृत्यं पीडां जनस्यापि च देवृत्ये ॥१०॥ शिवस्स भगवान् साक्षा्केखास गमदा ॥ सौख्य च विविधं चक्कं
णास्सवे सहषिताः ॥ ॥ 9१ ॥ महोत्सवो महानासीच्छिवे कैरासमागते ॥ देवास्स्वविषय भराता इैनिभरमानसाः॥ १२ ॥ ॥
अथ शंयुर्म॑हादेवो शृहीत्वा गिरिजां शिवाम् ॥ जगाम निर्जनं स्थानं महादिव्य् मनोहरम्॥१३॥ शय्यां रतिकरीं कृत्वा पुष्प ¢
चन्द्नचविताम् ॥ अदधतां ततर परमां मोगवस्त्वन्वितां शुभाम् ॥ १ ॥ स रेमे तत्र भगवाञ्शभुभिरिजया सह ॥ सहस्व ¢
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सब विर्नोका नाश करनेवाठा है ॥ ८ ॥ सब मंग देनवाढा ||
पर्य्यन्तं देवमानेन मानदः ॥ १५ ॥ दुर्गागस्पशमात्रेण लीलया भ्रूच्छितः शिवः ॥ भूच्छिता सा शिवस्पशादुबुधे न दिवा
निशम् ॥ १६ ॥ हरे मोगप्रवृतते त॒ लोकधमै प्रवतिनि ॥ सहान् कारो व्यतीयाय तयोः क्षण इवानघ ॥ १७ ॥ {
रस. २
बडे प्रसन्न हो अपने स्थानम आये ॥१२॥ तब महादेव शंकर शिवा गिरिजाको विवाह करक महा दिभ्य मनोहर एकान्त स्थानम गये ॥१३॥ शृष्प
कु.खं.४
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. पाती सहित उस स्थाने रमण करने ठगे ओर वह मानक देनेवारे देवताओंके सहल वषैतक विहार करते रहे ॥ १५ ॥ दुगकै अग १
| मासे ीखासेदी शिव सूच्छित हो गये ओौर भगवतीभी शिवके अंगस्प्रीसे सूच्छित होगे ओर दिनरात कुछ नहीं जाना ॥१६॥ जि समय
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चदनसे चित रतिकी बहानेवाटी सेज बनाकर जो बढी अदत थी ओौर जि सम्पूणं भोगकी वस्तुं विमान थीं ॥१४॥ भगवान शिवजी
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| भोगम पदृतत हुए त्र उनको बहुत समय भी क्षणमात्रके समान बीत गया ॥१७॥ तब सव देवता एकस्ममय इकटे होकर इन््रादिकै साथ ,
|| करने खगे ओर सत्र एकतर दृए॥१८॥ देवता बोठे ईश्वर शंकरने हमारे निभित् विवाह किया, यह योगीश्वर निविकार स्वात्माराम निरंजन है॥ १९।
¢ सो इनक अबतक कोहं ऽत्र उतपन्न नहीं हुआ है इसमे हम कारण नहीं जानते, देवेश्वर इसमे यों विरम्ब कर रहे है ॥२०। उसरी समय देवता नारदे
ह देवद्शेन उन दोनोके रमण करनेके समयको अपरिमित जानकर ॥२१॥ उनका. भोग बहुत समयका जानकर वे देवता चिन्ता करने ठगे स
8 अथ सर्व सुरास्तात एकीभूय चैकदा ॥ मंजयांचङ्करागत्य मेरोशक्रषरोगमाः ॥ १८ ॥ सुरा उचुः ॥ विषाहं कृतवाज्छयुर
४ स्मरकाया्थमीश्वरः॥ योगीश्वरी निविकारो स्वात्मारामो निरंजनः ॥ १९ ॥ नोत्पन्नस्तनयस्तस्य न जानामोऽत् कारणम् ॥
विर्बः क्रियते तेन कथं
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देवेश्वरेण इ॥ २० ॥ एतसिमिन्नतरे देवा नारदादेवदशनात्॥ बुुधुस्तन्मितं भोगं तयोश्च रममाणयोः
॥ २१ ॥ चिरज्ञत्वा तयोर्भोगं चितामापुस्ुराश्च ते ॥ ब्रह्माणं मां पुरस्कृत्य यथुर्नारायणांतिकस् ॥२२॥ तंनत्वा कथितं सर्व
मयाव्ृत्तातमीप्सितम् ॥ सन्तस्थिरे सर्वदेवा चित पुत्तलिका यथा॥२३॥ ब्रह्मोवाच ॥ सदस्षवषं पर्यन्तं देवमानेन शंकरः ॥
रतौ रत निश्रेष्टो योगी विरमते न दि ॥ २९ ॥ ॥ भगवानुवाच ॥ चिन्ता नास्ति जगद्ध।तस्सव भद भविष्यति ॥ शरणं
ब्रज देवेश शंकरस्य महाप्रभोः ॥ २९ ॥ मदेशशरणापन्ना ये जना मनसा सद्ा ॥ तेषां परजेशभक्तानां न कृतिद्धयं कचित्
॥ २६ ॥ शृंगारभगस्समये भविता नाधुना विधे ॥ काल्प्रयुक्तं कार्य च सिद्धि पराप्नोति नान्यथा ॥ २७ ॥
न्त सुनाया ओर सब देवता चित्र छी उतटीके समान ||
योगी होकर विराभको भाप्र नहीं होते॥२४॥ श्रीभगवान् ||
तुम महाप्रभु शकरकी शरणमे जाओ ॥२५॥ जो म॒ुष्य
नहीं है ॥२६॥ हे विधाता ! प्र यह समय श्रगारके
ब्रह्माको आगे करक वे नारायणकै समीप गये ॥२२॥ नारायणको प्रणाम कर ने सन रचा
. [2 || होगये॥२२॥ ब्षाजी बोठे शिवजी देवताओं सह व पर्न्त रतिम रत हूए हँ षह निभ
। बोढे हे जगतके विधाता ! चिन्ता करनेकी को बात नहीं सव कल्याण होगा हे देवेश !
मनते सदा महेशकी शरण जाते है हे भरजापति ! उन शंकरके भक्तोको हीते ङक भय
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देवाह होते है, अन्यथा नहं ॥ २७ ॥ शकरका संभोग मग करनेकौ कौन |
। जो परुष किसी उपाये च्ञी परुषका वियोग करा देता है जन्भजन्म
# विते नष्ट होकर लक्ष्मीम हीन हो जन्म छेताहै ओर किर वहं
महानि दु्वास्ाने वियुक्त किया था, इस कारण उनकै
¢ भी ज्ञीका भेद हुआ ॥ ३१ ॥ किर दूरी ज्ञीको पराप्त हो शुभपाणिग्रहणको पराप ह दित्य सहस वषे रमण करके वियोगका दुःख मिरया॥
शम्भोस्सम्भोगमिष्ठं को मदं करतमिन्वरः ॥ पूणे वषसहसे च स्वेच्छया हि विरेस्यति ॥ २८॥ श्ीपसोरतिविच्छेदृषुपायेन
|| करोति यः ॥ तस्य ह्ीएु्रयोभदो भवेनन्मनि जन्मनि ॥ २९ ॥ ्रषज्ञानो न्टकीततिरलक्ष्मीको भवेदिह ॥ प्रयात्य॑ते काक
ह| सतर वरषलक्ष स पातकी ॥३०॥ रंभायुक्तं शक्रमिमं चकार विरतं रतौ ॥ महाशनीन्द्ो इरवासास्ततश्लीभेदो बभूव इ ॥ ३१ ॥
४ पुनरन्यां स संप्राप्य विव्य श्ुभपाणिकास् ॥ दिष्यं व्षसहस्ं च विजदौ विरडज्वरम् ॥ ३२ ॥ धृरताच्या सह संरिल्चं कामं
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मग करनेका नहीं है, समयपर किये भरयोग सिद्धिक दे
होसक्ता है, सहस्र वषं पूणं होनेमे अपनी इच्छासे ही विराम करेगे ॥२८॥
उसके स्ली प्रका मेद होता है ॥ २९ ॥ फिर इस ठोकमे ज्ञानसे र्ट की
पातकी छाख वर्षतक काठसत्र नाम नरके पडता ह ॥ ३० ॥ रंभासे युक्त इन्दरको
शिश्पु°
॥३३०।
वारिति वान् गुरूः ॥ षण्मासाभ्यंतरे चन्द्रस्तस्य पत्नीं जहार इ ॥३३॥ पुनश्शिवं समाराध्य कृत्वा तारामयं रणम् ॥ तारां
। सगर्भां संप्राप्य विजहौ विरदज्वरम् ॥ ३० ॥ मोदिनीसहितं चन्द्रं चकार विरतं रतौ ॥ महिगोंतमस्तस्य ब्लीविच्छेदौ
रमं. २ बभूव ह ॥ २५॥ हरि अन्दरो हाटकं च वृषल्यासह संयतम् ॥ चारयामास निशं निजनं तत्फलं शृणु ॥ ३६ ॥
ङु तं.४ ३२॥ प्ताचीके संग भिकते हुए कामको बरृहस्पतिने निवारण किया था छः महिनेकै भीतर ही चन्द्रमाने उनकी पत्नीको हरण किया॥३३॥
५ मोहिनीके साथ पिरते हु९ चन्द्रमाका वियोग किया था, इस कारण उनका शीसे वियोग हुआ ॥ ३५ ॥ हरिशधन्द्रने हालिकको वृषटीके
साथ निजनमे भिख्ते हए निवारण कर निशवष्ट किया था उस्षका फर सुनो ॥. ३६ ॥
फिर शिवजीकी अराधना करके ओर ताराके निमित्त साम करके सगभी ताराको श्राप होकर विरहव्यथा मिटाहं ॥ ३४ ॥ महर्षिं गौतमने
। दह विश्वामित्रे ताडित हो श्ञी एत्र ओर राज्ये भी अष्ट हुभआ तव शिवजीकी आराधना करके पापे खक हुआ ॥ ३७ ॥ द्विजभरेष् | |
¢ मिङ बृषरीका संग करता था, हे देवताओ ! भयके कारण उसे किसने भी निवारण नहीं किया ॥ ३८ ॥ सबही निषेक साध्य है, हे
¢ विधाता ! निषेक बख्वान् है, यह कमं ही फक देता है इस करभेफठ्को कौन निवारण कर सकता है ॥ ३९ ॥ यह शंकरक संभोगका कम
दिष्य सह वषतक है हे देवताओ ! जब सहस्र वषे पुणे होजांय तब वहां जाकर ॥ ४० ॥ वह प्रकार करना जिससे शंकरका वीयं भूमिम
ए पतित होजाय, उस वीयसे स्कन्दनामवाखा परभुका एकं एत्र होगा ॥ ४१ ॥ हे विधाता ! इ समय देवताओं साथ अपने स्थानको जाओ
| अष्टः ्ीएरज्येभयो बिश्वाभतरेण ताडितः ॥ ततस्शिवं समाराध्य सक्तो भूतो हि कश्मलात् ॥ ३७ ॥ अजामि दविजश्रेष्ठं
| वृषल्या सुह संयुतम् ॥ न भिया वारयामासस्सुरास्तां चापि केचन॥३८॥ सर्व निषेकसाध्यं च निषेको बरवात् विधे ॥ निषे
ठै वै स॒ निषेकः केन वाय्यैते ॥ ३९ ॥ दिव्यं वर्षसहखं च शंभोः संभोगकमं तत् ॥ पूर्णे वर्षसहस्रे च गत्वा तञ सुरे
&|| “वराः ॥४०॥ येन वीर्यं पतेद्धूमौ तत् करिष्यथ निश्चितम् ॥ त वीय्यं च भविता स्कन्दनामा प्रभोस्स॒तः ॥ ७१ ॥ अधुना
|| स्वग गच्छ विधे सरगणेस्सह ॥ करोत् शथुस्संभोगं पार्वत्या सह निर्जने ॥ ४२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता कमलाकान्तः शीघं
£| स्वन्तः पुरं ययौ ॥ स्वायं भरययुद॑वा मया सह सुनीश्वर ॥ ४३ ॥ शक्तिशक्तिमतोश्वाऽथ विहारेणाऽति च क्षितिः ॥ भारा
कांता चकंपे सा सशेषाऽपिसकच्छप्ां ॥४७॥ कच्छपस्य हि भारेण सु्बाधारस्समीरणः ॥ स्तंभितोऽथ भरिरोकाच बधुबुैय
¢ विह्खाः ॥ ९५ ॥ अथ सवे मया देवा दरे शरणं यथः ॥ सर्वं निवेदयांचक्कस्तद्घत्तं दीनमानसाः ॥ ४६ ॥ |
शिवजीको पादतीके साथ निजैनमे आद् करने दो ॥ ४२ ॥ बहयाजी बोटे रक्ष्मीपति यह कहकर शीघही अन्तरम चङे गये, ह
|| खनीश्वर ! भेर सहित सब देवता अपने स्थानको गये ॥ ४३ ॥ पठे शक्ति ओर शक्तिमानूके विहारे यह पृथिवी भारसे व्याकर
|| हो शेष ओर कच्छपजीके सराय काप उदी ॥ ४४ ॥ तव कच्छपे भारसे सवका आधार पवन स्तंभित हो गया ओर
‰॥ त्रिछोकी मये व्याकुल हो गदं ॥ ४५ ॥ तर सब देवता व्याकुढ हो सु्च्षदित नारायणकी शरणमे गये ओर दीन मनते वृह सव वृत्तान्त
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शि०षु०||; | निवेदन किया ॥ ४६ ॥ देवता बोरे हे देवदेव रमानाथ ! हे सवकी रक्षा करनेवछे भमो ! हम भय व्याकु मनसे आपकी शरण आये
॥३३१ | आप हमारी सबकी रक्षा करं ॥ ४७ ॥ न जानि कित कारणसे त्रिढोकीके प्राण स्तंभित हए है, खनि ओर देवताओं १६ ्रिोकी
वयाकृठ हो गईं है ॥ ४८ ॥ ब्हाजी बोठे हे सुनीधर ! खश्च सहित जव सव देवताओनि रता कहा ओर दीन तथा मौन हो दुःखते विष्णु
के आगे स्थित हृ ॥ ४९ ॥ तव हमारी सव देवताओं वाणी सुनकर नारायण शिवकै भिय कैठास पवतको गये ॥ ५० ॥ वह सुरवहभ
नारायण मेरे ओर देवताओके साथ वहां जा शिवजीके स्थानम उनके देखनेकी इच्छासे गये ॥ ५१ ॥ वहां विष्णजीने शिवजीको न देखकर
देवाज्चुः॥ देवदेव रमानाथ सर्वाऽवनकर प्रभोः ॥ रक्ष नः शरणापत्नान् भयम्याङ्कलमानसान् ॥४७॥ स्तंभितच्िजगतप्राणोन
जाने केन हेतुना ॥ ष्याङकलं निभि्ेसेश्चैरोक्यं सचराचरम्॥४८॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्यु का सकरा देवा मया सह युनीश्वर ॥
दीनास्तस्थुः पुरो विष्णोमनीशतास्सुदुःखिताः॥४९॥तदाकण्यं समादाय सुरान्न सकलान् हरिः ॥ जगाम पवैतं शीभरकैलासं
शिववहभम् ॥५०॥ ततर गत्वा हरिदैवेमेया च सुरछभः ॥ ययौ शिवृवरस्थान शंकरं दष्ट्काम्यया ॥ «१ ॥ त दक्षा शिवं
विष्णुनंसुरतिंस्मितोऽभवत् ॥ त्स्थिताज्ञ शिवृगणान् पच्छ विनयान्वितः ॥५२॥ विष्णुङ्वाच ॥ हे शंकराः शिवः कुतगत
ससर्वभधु्गणाः ॥ निवेदयतनः प्रीत्यादुःखितान्वैृपालवः॥५३।भ्रहमोवाच् ॥ इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य सामरस्य इरेगुंगाः ॥ प्रोचुः
परीत्या गणास्ते हि शंकरस्य रमापतिभ्॥५७॥ शिवगणा उचुः हरे शृणु शिवप्रीत्या यथार्थ ब्रूमहे वयम् ॥ ब्रह्मणा निजैरेस्सादं
वृत्तान्तमखिलं च यत्॥५८५॥ सर्वेश्वरो महादेवो जगाम गिरिजाख्यम् ॥ संस्थाप्य नोऽत्र सुप्रीत्या रानालीलाविशारदः ॥५९॥
देवतों सहित बडा विस्मय माना ओर वहां स्थित हुए गणोे विनय पूवक पा ॥ ५२ ॥ विष्ण॒जी बे हे गणो 1 है शिवकै सेवको .! वह
तुम्हारे भमु शंकर कहां है तुम कपा करनेवछे हो हम दुःसियोके समाचार उनसे कहो ॥ ५३ ॥ बह्लाजी बोठे इस भरकारसे देवताओंसहित
नारायणके वचन सुनकर वे शिविजीके गण भीतिपु्वक भगवानूसे शंकरका बृक्तान्त कहने ठे ॥ ५४ ॥ शिवगण कोठे हे नारायण !
भ्रमसे सुनो हम यथाथ कहते है, ब्रह्मा ओर सव देवता इस शंकर कै उत्तान्तको सुनें ॥ ५५ ॥ अनेक टीला करनेमे चतुर भगवाव
चच रत
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| हम सबको यहां स्थापित करके वे सर्वशवर पावतीके मन्दिरमे गयेहै॥५६॥सो महेश्वर शंकर घरकं भीतर क्या करतेहै सो हम नही जानते ह
रमानाथ ! यहां हमको बहुत वषं बीतगये ॥५७॥ बह्माजी बोडे विष्छजीने देवता ओर मेरे सहित यह वचन सुनकर हे खनिभष्! बडे विमित
होकर शंकरकेदवारपर गमन किया ॥५८॥ देवताओंके प्यारे वह हरि वहां मेरे साथ जाकर ॐची आं वाणी शब्द सुनाने के॥५९ | देवताओकि
ओर मरे साथ भगवान् विष्णु शिवकी स्तुति करने कगे ओर हे सनिभरेष्ठ1वहीं स्थित होकर सव देवता ओके भिय शंकरकी स्तुति की॥६,०॥ विष्णजी
बोटे हे महादेव ! हे परमेश्वर ! आप मन्दिरके भीतर कया करते हो, तारक असुरसे भीत होकर सव देवता आपकी शरणमे आये है, हमारी रक्षा
तद्गहाभ्यन्तरे शंथुः किं करोति महैश्वरः॥न जानीमो रमानाथ म्यतीयु्बहवस्समाः॥५७॥॥ ब्रह्मोवाच त्वेति वचनं तेषांस
विष्णुस्सामरो मया ॥ विस्मितोऽति खनिश्रष्ठ शिवद्वारं जगाम इ॥५८॥ तत्र गत्वा मयां देवस्स दसिदिववछभः॥ आर्तवाण्या सुने
भच तारस्वरतया तदा ॥५९॥ शृुमस्तौन्महाप्ीत्या सामरो दि मया दरिः ॥ तच स्थितो खनि स्व॑लोकप्रथुं हरम् ॥६०॥
॥ विष्णुक्वाच ॥.किं करोषि मदादेवाऽभ्यन्तरे परमेश्वर तारकार्ता
॥ न्स॒रान्सर्वान् पाहि नः शरणागतान्॥& १॥इत्यादि संस्तुवज्ञ
रघ बहुधा सोम्रेमया ॥ ररोदाति इरिस्तच तारकार्तषैनी्वर॥६२॥दुःसखकोखाहलस्तञ बथव तरिदिवौकसाम् ॥ मिधितश्शिव
सस्तुत्याऽसुरात्तानां शुनीडवर ॥ ६३ ॥ इति -श्रीशिवमहाएुराणे
ू ॥ इत् रदरसंदितायां ऊमारखण्ड शिवृिहारवर्णनं नाम प्रथमोऽ
ध्यायः ॥ १ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तदाकण्यं महादेवो योगज्ञानविशारदः॥ त्यक्तकामो न तत्याज संभोगं पादतीभयात् ॥ १ ॥
करो ॥६१॥ इस प्रकार मेरे देवताओकि सहित विष्णने बहुत भकारसे स्तुति की, हे खनीश्वर ! तारकासुरकी विपत्ति कहते २ नारायणके नेत्रो जल
निकलने ठगा ॥ ६२ ॥ वहां देवताओं
का दुःखसे कोटाहट होने छ्गा हे ख॒नीश्वर ! जिसमे देवताओंकी आततं वाणी. ओर शिवी स्तुति
भिटी हदं थी ॥ ६३ ॥ इति भीशिवमहाएराणभाषाटीकार्या च० कु°
॥ शिवविहारवणेनं नाम भरथभोऽध्यायः ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोठे योगज्ञानमे
विशारद महादेव ! यह वचन सुनकर त्यक्तकाम होकर भी पावतीके भयसे संमोगको न त्यागते हए ॥ १ ॥ 4
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घरके द्वारे देवताओंके निकट शिवजी आये, भक्तवत्सर शंकर
देखा ओर सब कोई उन भक्तवत्सटको देखकर बडे भसन इए ॥३२॥
उधर देवता महाममसे भणाम कर मस्तक शुकाय मेरे ओर नारायणके सहि
करुणा सागर ! हे भभो! आप सबके अन्तर्यामी ओौर सबके जानने वे हौ ॥६॥
आजगाम गृहद्वारि सुराणां निकटं शिवः ॥ दैत्येन पीडितानां च शंकरो भक्तवत्सलः ॥ २॥ दवास्सव प्रं षा हरिणा च
मया शिवम् ॥ बभूवुस्सखिनश्वाति तदा वै भक्तवत्सलम् ॥३॥ इत्याकण्यं वचस्तेषां खराणां भगवान्भवः ॥ प्रत्युवाच विषण्णां
त्मा दूय मानेन चेतसा ॥४॥ प्रणम्य सुमहापरीत्या नतस्कंधाश्च निज॑गः ॥ तुष्टवुः शंकर सवे मया च हारणा खन् ॥ < ॥
देवा उुः ॥ देवदेव महादेव करूणासागर प्रमो ॥ अन्तयांमी हि सवषां सतं जानासि शंकर ॥६॥ देवकायं क् विभो रक्ष
देवान् महेश्वर ॥ जदि दैत्यान् कृपां कृत्वा तारकादीन् महाप्रभूच् ॥ ७ ॥ ॥ शिव उवाच ॥ है विष्णो ३ विधे देवास्सर्वेषा
वो मनोगतिः ॥ यद्भावि तद्भषत्येव कोऽपि नौ त्निवारकः ॥ ८ ॥ यजतं तनातमेव प्रस्तुतं श्ृणताऽमराः ॥ शिरस्तस्ख
लितं वीर्यं को अरीष्यति मेऽधुना ॥ ९॥ स गृद्वीयादिति प्रोच्य पातयामास तद्भुवि ॥ अभ्िभूत्वा कपोतो हि प्ररि
स्सर्वनिरेः ॥ १० ॥ अभक्षच्छाभवं वीरय चंच्वा तु निखिं तदा ॥ एतस्मि्न॑तरे तत्राऽऽजगाम गिरिजा शने ॥ ११ ॥
क्रो हे प्रमु ! छपा करके तारकादि महादेत्योंका नाश करो ॥ ७ ॥ शिवजी बोठे हे दिष्णो ! हे विधाता ! तुम हम सबके मनको जाननेषाटे
हो, जो कुछ होता है वह नहीं मिदता कोई उसका निवारण करनेबाछा नहीं है ॥ < ॥ जो हुभा है वह होना ही था, अब इस समय
जो भ्स्तुत है सो सुनो शिरसे स्छङित हए मेरे वीयेको कौन अहण कर सकता है ॥ ९ ॥ वह कौन रहण करेगा एसा कहकर उसे पृथिवीपर
गिरा दिया,तब सव देवताओं अधिको भरणा की कि, तुम कपोतरूपसे इस वी्यंको ग्रहण करो ॥ १ ° ॥ वह चों चे शिवजीका समस्व
ने उनको दैत्ये पीडित देल ॥२॥ सब देवताओने मैने ओर विष्ण भगवाचने ¦
भगवान् शंकर देवताओकि वचन सुनकर कुछ दुःखी चित्ते देवता ओि बौटे॥४॥
त मगवान शंकरकी स्तुति करने कगे ॥ ५॥ देवता बोठे देवदेव महादेव
हे विभो! देवताओंका कायं करो हे महेश्वर ! देवताओंकी रक्षा
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| भक्षण कर गथा हे सने ! उक्ती स्मय वहां प्रावेती आग ॥ ११ ॥ वह इस कारण भाई कि शिवजीकै आगमनमे विम्ब हुज, |
यहां यह सव वृत्तान्त देखकर महा कोपित हृद ॥ १२ ॥ ओर् हरि आदि स्तब देवताओंको देखकर बोरी \ १३ ॥ देवी बोटी अरे
देवताओ ! तुम सब बडे दुष्ट हो, तुम स्वार्थं साधन करनेवले हो, ओर दूसरोको दुःख देते हो ॥ १४॥ स्वाथके निभित्त परम भमु शिवकी
आराधना करके भेरा विहार भग किया, इस कारण मेँ बन्ध्या हई ॥ १५ ॥ सुक्षपे विरोध करके किसी भी देवताको सुख नहीं भिटेगा
दस कारण तुम दृष्ट देवताओंको महादुःख भिकेगा ॥ १६ ॥ ब्रह्लाजी बे रेस्ा कहकर भगवतीने विष्ण आदि सब देवत[ओंको शाप दिया
शिवागमविलबे च ददश सुरुंगवान ॥॥ ज्ञात्वा तद्वत्तमखिलं महाकोधयता शिवा ॥१२॥ उवाच त्रिदशान् स्वान् हरिपभ
तिकास्तदा ॥१३॥ देव्युवाच ॥ ररे सुरगणास्सवे युय दुष्ठा विशेषतः ॥ स्वार्थसंसाधका नित्य तद परदुःखदाः ॥ १४ ॥
स्वा्थदेतोमेदेशानमाराध्य प्रमे प्रथुम् ॥ नघ चम॑ द्विहारं व॑ध्याऽभवमहं सराः ॥ १५ ॥ मां विरोध्य सुखं नैव केषांचिदपि
निजराः ॥ तस्माइःखं भवेद्रो दि दुष्टानां त्रिदिवौकसाम् ॥१६॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता विष्णुभर्चखान् सुरान्शर्वाज् शशाप
सा ॥ भरज्वरुती मरकोपेन शेखराजसुता शिवा ॥१७॥ ॥ पार्वत्युवाच ॥ अयप्रभृतिदेवानां वंध्या भार्यां भवन्त्विति ॥ देवाश्च
दुःखितास्संतु निखिखा मद्विरोधिनः ॥१८॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ इति शष्वाखिलान्देवान् विष्ण्वा्यान्सकलेश्वरी॥ उवाच पावक
दधा भक्षकं शिवरेतसः ॥ ५९ ॥ पार्वत्युवाच ॥ सर्वभक्षी भव ञ्चे पीडितात्मेति नित्यशः ॥ शिवतत्वं नजानासि सूरखोऽसि
सुरकायङ्रत् ॥ २० ॥ रेरे शठ महादुष्ट दुष्टानां दुष्टबोधवान् ॥ अभक्षश्शिववीर्य यत्न
---^--~
कार्षीरचितं हि तत् ॥ २१ ॥
उस समय पावती कोषे मज्वछित हो उदी ॥ १७ ॥ परावेती बोठी आजे सब देवताओंकी चिं वांच हो जायेगी ओर भरे विरोधी सन
देवता दुःख पावं ॥ १८ ॥ सबकी दश्वरीने इस्त भकार विष्ण आदि देवताओंको शाप देकर अधित कोधकर कहा, तुमने शिवजीका
होकर सदा पीडित होगे तुम शिका तत्व नहीं जानोगे,
दष्ट ! दुष्टोका बौध करनेवाङे ! जो कि तुमने शिवजीका वीर्य
वीये भक्षण किया है ॥ १९॥ पावती बोी हे अभि ! तुम आजत स्भक्षी
देवताओंकैही कायेसनाधक रहे इससे मूं हुए ॥ २० ॥ रे रे धृतं ! महा
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शि ७पु9),=
॥३३२॥ |
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भक्षण किया, यह बहत रा फिया ॥ २१ ॥ ब्रहाजी बोठे जव इस प्रकार कोषसे पावतीने अश्चिको शाप दिया) हे ख । व 1
होकर अपने स्थांनको चटी गई ॥ २२ ॥ तन पार्तीके पार जाकर शिवजञीने उन्हं बहुत समज्ञाया है खनीश्वर ! फिर पावतीकं गणश
नामकं एत्र उत्पन्न हुए ॥ २३ ॥ हे सनिराज ! वह दृत्ान्त आगे वणेन करगे, इस समय भमत आप। गुहकी उत्पत्ति सुनो ॥ २.४ ॥ दवता
अभिक दवाराही अलोका भोग ठ्गाते है यह वेदवाणी है इसे सव देवता सगं होते है॥ 01 वीयेको न सहनेकै
कारण सव देवता परीडित हूए विष्य आदि सब देवताओंकी यहो दशा इद. शिवकी इच्छा उनकी बदधिये नष्ट हग ॥ २६ ॥ तव विप्ण
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति श्वा शिवा वह्नि सहेरोन नगात्मजा ॥ जगाम स्वालयं श्ी्मसंतु्टा ततो सुने ॥ २२ ॥ गत्वा शिवा शिवं
सम्यक् बोधयामास यततः ॥ अजीजनत्परं पुत्र गणेशाख्यं सुनीश्व२॥२३॥तद्वृत्तांतमशेषं च वृणयिष्ये सुनेऽग्रतः॥ इदानीं शृणु
सुप्रीत्या ्॒ोत्पत्ति वदाम्यहम् ॥२४॥ पावकादितमन्नादिथुजते निज॑राः खड ॥ वेदवाण्येति सवं ते सगमा अभवन्सुराः ॥२५॥
ततोऽसदतस्तद्वीयं पीडिता ह्यभवन् खराः ॥ विष्ण्वाया निखिलाश्वाति शिवाऽऽज्ञानष्टडदयः॥२६।अथ विष्णुप्रभृतिकास्सवं
देवा विमोहिताः ॥ दह्यमाना ययुः शीघ्रं शरणं पार्वतीपतेः॥२७॥शिवाल्यस्य ते द्वारि गत्वा सवं विनश्रकाः ॥ तुष्टुबुस्सशिवं
शंथु प्रीत्या सांजल्यस्सुराः. ॥ २८ ॥ ॥ देवा उचुः ॥ देवदेव. महादेव गिरिजेश महाप्रभो" ॥ फं जातमधुना नाथ .
तव मायदुरत्यया ॥ २९ ॥ सगर्भा वयं जाता दह्यमाना . रेतसा ॥ तव शंभो ढह कृषं निवारय दशामिमाम्
॥ ३० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकरण्याऽमरलति परमेशश््शिवापतिः ॥ आजगाम दरुतं द्वारि यत्र देवाः स्थिता भने ॥ ३१ ॥
आदि सब देवता मोहित होकर वीयकी अश्वि दद्यमान होकर भगवान् शंकरकी शरणमे गये ॥ २७ ॥ वर सब देवतां; शिव मंदिरके द्वारे
जाकर नप्र हो हाथ जोड बडी प्रीतिसे भगवान शेकरकी स्तुति करने ठगे ॥.२<८ ॥..देवता बोरे हे देवदेव महादे ! हे गिरिजाएति !
हे महाप्रभो ! हे नाथ ! अब क्या हुआ हम सब आपके वीयेकी अश्रित व्याकु है तुम्हारी माया बडी दुरत्यय है ॥ २९ ॥ हम स्व सगं
ॐ है आपके वीर्यसे सब दग्ध होति है, हे शंकर ! छपा करके हमारी यह दशा निवारण ' कौजिये ॥ ३० ॥ ब्रह्माजी बोढे परमेश शिवापति
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इस प्रकार देवताओंकी स्तुतिको सुनकर हे ने ! जहां देवता धे शीघरतासे ` हवारे आये ॥ ३१ ॥ जब शंकर द्वारेपर आये तव सव |
भगवानूकै सहित उन भक्तवत्सर शकरको प्रणाम करके शिर श्लुकाया स्तुति करने टगे ॥ ३ देवता बोे हे शंभो शिव ! हे महेशान !
हम सन् विशेषकर आपकी स्तुति करते हँ आपके वीयसे हम दग्ध हो रहे है शरणमे आये हृए हमारी आप रक्षा करं ॥ ३३ ॥ हे हर! आप्
हमारे दस दुःखको हरण कीजिये, हम मृतक हो रहे है देवताओके दुःख निवारणमे आपके विना कौन समर्थं है ॥ ३४ ॥ ब्रह्माजी | |
देवताओकि अधिपति शकर देवताओकिं यह दीनतर वचन सुनकर वह भक्तवत्सल हसते हृए सब देवताओं बो ॥ ३५ ॥ शिवजी बोे
आगतं शंकरं द्वारि सवं देवाश्च साच्युताः ॥ प्रणम्य तुष्टुबुः प्रीत्या नर्तका भक्तवत्सलम् ॥३२॥ ॥ देवा उचुः ॥ शंभो शिव
महेशानत्वां नतास्स्म विशेषतः॥ रक्ष नरशरणापत्रान् दह्यमानांश्च रेतसा ॥२२॥ इदं दुःखं हरं हर भवामो हि मृता धुवम् ॥
त्वांविना कस्समर्थोऽय्य देवदुःखनिवा रणे ॥३९॥ ॥ ब्रह्नोवाच॥ इति दीनतरं वाक्यमाकर्ण्य सुरराट् परभुः ॥ प्रत्युवाच विह
स्याऽथ स सुरान् भक्तवत्सलः ॥ ३« ॥ ॥ शिव उवाच ॥ ३ दरे हे विषे देवास्सवे णत मद्वचः ॥ भविष्यति सुखं वोऽ
सावधाना भवन्तु दि ॥ ३६ ॥ एतद्वमत मद्री दरतमेवाऽखिकास्सुराः ॥ सुखिनस्तद्विशेषेण शासनान्मम सुप्रभो ॥३७॥ ॥
ब्रह्मोवाच ॥ इत्याज्ञां शिरसाऽधाय विष्ण्वायास्सकलास्स॒राः ॥ अका्वंमनं शीं स्मरंतश्शिवमभ्ययम् ॥ ३८ ॥ तच्छुरेत
स्स्वणौम पवेताकारमद्धतम् ॥ अभवत्पतितं भ्रूमौ स्पृशद यामेव सुप्रभम् ॥ ३९ ॥
हे विष्णजी ! हे बरह्माजी ! हे सब देवताओं हमारे वचन सुनो तुमको सुख होगा तुम सव सावधान हो जाओ ॥ ३६ ॥ हे देवताओ ! तुम
बहुत शीघ इस हमारे रेतको वमन कर दो, हे देव ! मेरे शासनसे तुम शीध॒शुखी होगे ॥ ३७ ॥ बाजी बोरे विष्णआदि सब देवताओनि
इस भकार शकरकी आज्ञाको शिरप्र धारणकर अविनाशी शंकृरका स्मरण करते हए उस वीर्यको वमन कर दिया ॥ ३८ ॥ पृथिवीप्र
गिरते हए ही वह शेकरका वीयं स्वणके समान चमकता हुआ पर्वताकार होकर स्वरगको स्पशं करने ठगा ॥ ३९ ॥
१ एकटेरशब्दस्य शिवेत्यर्थः । दवितीयहरदाब्दस्थ नाशयेत्य्थं:
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| ~ ध । पर अभि प्रप्तत्न
से ॥ हे सने ! तब वह ~
न हआ उसे शकरकी परम आक्ञा दी थी ॥ ४१॥ € ख देव ! हे महादेव ! पै आपका सेवकं बडा मूड हूं मेरा अपराध क्षमा
सतुति करता हुआ यह वचन बोढा ॥ ४२ ॥ अभिने कहा हे देवदेव । द 4
करकं मेरा दाह निवारण करो ॥ ४३ ॥ हे स्वामिन् ! तुम दीन वत्सल परमेश्वर ही सुख ओौर कल्याण करनेवाठे हो जव इस
रकार भरसन्न चिते अभरन परमेश्वरकी स्तुति की तव वह बोठे ॥ ४४ ॥ ब्हाजी बोडे १0 = त 14
न्सुखिनस्सवे सुरास्सवैऽच्युतादयः॥ अस्तुवन् परमेशानं शंकरं भक्तवत्सलम् ॥९ ०॥। पविविरतत भवनत ला ८
1 परमेश्वरः॥ १॥ततस्स वहिविकटस्सांजलिनतकौ सुन ॥ अस्तौच्छिवं सखी नात्मा वचनं चदमनर
वीत् ॥ ४२ ॥ ॥ अभ्निशूवाच ॥ ॥ देवदेव महेशान मूढोऽहं तब सेवकः ॥ क्षमस्व मेऽपरधदहि मम दाहं निवारय ॥४३॥ त्वं
दीनवत्सल स्वामिन्शंकरः परमेश्वरः ॥ प्रत्युवाच पसत्रात्मा पावको दीनवत्सलम् ॥४४॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं शुचेवाणी
स शंभुः परमेश्वरः ॥ प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पावक दीनवत्सलः॥४८॥शिवउवाच॥ कृतं त्वतुचितं कमं मद्रेतो भक्षितंहि यत्॥
अतोऽनिवृततस्ते दाहः पापाधिक्यान्मदाज्ञया॥४६॥इदानीं त्वं सखी नाम शुचे मच्छग्णागतः ॥ अतः प्रसन्नो जातोऽहं स्व
दुःखं विनश्यति ॥४७॥ कस्याशित्सुश्ियां योनौ ुदरतस्त्यज यत्नतः ॥ भविष्यति सुखी तवं हि निदूहित्मा विशेषतः ॥ ४८ ॥
॥ ब्रसनोवाच ॥ शंयुवाक्यं निशम्येति प्रत्युवाच शनेःशुचिः ॥ सांजलिनंतकः प्रीत्या शंकरं भक्तशंकरम् ॥ ४९ ॥
कर वह दीन वत्सर भसन्न हो अभरिसे कहने ठे ॥ ४५ ॥ तुमने यह बडा अनुचित क्षै किया था, जो मेरा वीयं भक्षण किया, इस कारण
भेरी आज्ञासे तेरा दाह निधत्त न हुआ कारण कि तुमने विशेष पाप किया था॥ ४६ ॥ हस समय तू शुचिहो सुखके निमित्त मेरी
७ £ न © ही
शरण हभ है, इससे मे प्रसन्न हुआ हू अव तेरा स्तब दुम नाशहो जायगा ॥ ४७॥ तुम यत्नपुवक इस मेरे वीयको किसी ५
| योनिमे त्यागन करो तब तुम्हारा दाह मिट जायगा ओर तु सुखी होगा ॥ ४८ ॥ ब्रह्लाजी बोटे शिकजीकै यह वचन सुन शनेः
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| | अभि हाथ जोड शिर शुकाय भक्तोकै कल्याण करनेवारे शंकरसे बोला ॥ ४९ ॥ हे महेश्वर ! हे नाथ ! आपका. यह्
| कठिन है. तीन ोकमं शक्तिके विना इसे अपनी योनिम धारण केकी किसतीमे सामथ्यं नहीं है ॥५०॥ हे मुनिराज ! जिस समय अश्रिदेवता
|| यह वचन कह रहे थे उस समय तुम शंकरकी प्रेरणासे वहां पराप्त हृए ओर अधिके उपकारके निभित्त बोठे ॥५१॥ नारदजी बोढे हे अभि !
# तुम मेरे बचन् सुनो जिनसे तुम्हारा दाह दूर होगा जो वचन परम आनंद देनेवाछे रमणीय ओर सब् कर्के दूर करनेदाटे हे ॥५२॥ हे अभि ।
# दसम मेरे कहे उपायको करके तुम सुखी हो हे तात ! शिवकी इच्छसे ही भने इसको तुक्षसे कहनेको इच्छा की है ॥ ५३ ॥ है अभि!
दुरासद॑मिदं तेजस्तव नाथ महेश्वर ॥ काचित्नास्ति विना शक्त्या र्त योनौ जगत्रये ॥५०॥ इत्थं यदाऽनवीद्रहिस्तदा त्वं
छनिसत्तम ॥ शंकरग्रितः प्रात्थ इदाभरिखुपकारकः ॥५१॥ ॥ नारद उवाच ॥ श्ण मद्वचनं द्वे तव दाइदरं श्चुभम्॥ परमानंददं
रभ्य सवेकष्नितारकम् ॥५२॥ कृत्वोपायमिमं वहं सुखी भव विदादकः॥ शिवेच्छया मया सम्यगुक्तं तातेदमादरात् ॥ ५३॥
तपोमासस्नानकर्व्यस्ञ्ियो यास्स्युः प्रगे ज्ुचे॥ तदेषु स्थापय त्वं शिवरेतस्त्विदं महत् ॥५४॥ ब्रह्मोवाच ॥ तस्मित्रवक्षरे त्रा
¢ ऽगतास्सप्तसुनिश्ियः ॥ तपोमासि स्ञानकामाः प्रातस्सत्नियमा अने ॥५५॥ नानं छृत्वा श्ियस्ता हि महाशीताहिताश्च षट ॥
ग॑तुकामा सुने याता वह्विञ्वालासमीपतः ॥ ५8 ॥ विमोदिताश्च ता दष्टाशन्धती गिरिशाज्ञया॥ निषिषेध विशेषेण सुचरिजा
|| सबोधिनी ॥ ५७ ॥ ताः षड् सुनिश्ियो मोहाद्धटात्तज गता सुने ॥ स्वशीतविनिवृत्यथ मोहिताःशिवमायया ॥ ५८ ॥
© || माघके महीनेमं जो चरी भयागमे ज्ञान करनेकै निमित्त गमन करं उनकी देहे तुमं इस हत् वीर्थको स्थापन करदो ॥५४॥ बह्लाजी बोे इसी समय
£ || वहां सातो स॒निर्योकी जिय आकर भाप हद हे सने ! माघके महीनेमे वे सबेरेही जानक निमित्त आई॥५५॥ स्नान करके उनमें छः च्वियै शीतते भहा
ठ्याकुर हुई हे सने ! बे शीघरतासे अशिकी ज्वाराके समीप आई ॥ ५६ ॥ उनको भोहि देखकर सरिता पतिवता अरुन्धतीने शिवकी आज्ञासे
उनको पिष हपते निषेध किया ॥ ५७ ॥ हे सुने ! वे छः जिय मोह ओर हसे उक्ष स्थानम शिवकी भायासषे भोहित हो अपना शीव निवारण
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करनेके निमित्त वहां गई ॥ ५८ ॥ हे खने ! अभिक तापतेही शिववीयकै कणं उ
निदत्त होगया ॥ ५९ ॥ उसी समय अभर वहांसे अ्तान होकर ज्वाठारप हौ शिव
वह छहों लियं सगभ होकर दाहे पीडित क्ोगई ओर अपने २ स्थानोको गई अरुन्धतीने उनको
उन नियोन उन क्वियोको इस भकार गरभयुक्त देखकर करोधसे व्याकु हौ उनको त्याग दिया ॥ ६२ ॥ षे छह च्धिय इस प्रकारं अपना
नके शरीरम स्येके दवारा प्रवेश कर गये, जिससे अभ्रिका दाह ||
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तदरेतःकणिकास्सथयस्तदेदान् विविदयु्ने ॥ रोमद्ाराऽखिला वद्ठिरभृदाहविवजितः ॥५९९॥ अंतधौय दुतं वहिज्ालारूपो जगम |
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जीको स्मरण करता हुआ अपने छोकको चछा गया ॥&०॥
दस प्रकार अश्रिसे दुःखी देखा ॥ ६१ ॥
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॥२३५॥
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&|| ह ॥ सुखी स्वलोकं मनसा स्मरस्त्वां शंकरं च तम् ॥६०॥ सगर्भास्ताः क्चियस्साधोऽभवन् दाश्रपीडिताः ॥ जग्भुस्स्वभवन
& तातार्धती दु खिताऽभिना ॥६&६१॥ ट्ठ स्वश्चीगति तातनाथा क्रोधाङ्ला दरतम्॥ तत्यजस्ता खियस्तात सुसंमंञ्य परस्प
रम् ॥ ६२ ॥ अथ ताः षट् श्ियस्सवां इष्टा स्वभ्यभिचारकष् ॥ महादुःखान्वितस्ताताऽभवन्राककलमानसाः ॥ &३॥ तत्य
¢ जश्शिव रेतस्तद्र्भरूपं खनिश्चियः ॥ ता हिमाचरपृष्ेऽथाभवन् दाहविवर्जिताः ॥ &७ ॥ असहञ्शिवरेतस्तंदिमाद्वि"कंपयुद्र
|| इन् ॥ गृगायां पाकषपतूरणमसहं दाहपीडितः ॥ ९५ ॥ गंगयाऽपि च तदीयं दुस्सदं परमात्मनः ॥ निकषितं दि शरस्तंबे
ह| तस्म स्वेशुनीश्वर ॥&६॥ पतितं ततर तद्रेतो दुतं बाखो बधूव इ ॥ सुन्द्रस्मुभगः श्रीमांस्तेजस्वी प्रीतिवद्वनः ॥ &७ ॥
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व्यभिचार देख कर महादुःखमे उ्याकुक होगदं ॥ ६३ ॥ उन खनियोंकी च्वियोनि गभंहप उस शिववीयको त्याग दिया हिमाख्यके पृष्ठे 1
कु.ख.४
गभेको व्यागकर वे सुखी हृदं ॥ ६४ ॥ उस वीयेको प्तहनेकी सामथ्यं न रखनेकै कारण हिमालय कंपित होने ठगा उत्त दाहको न सह
स॒कनेके कारण उसने उक्ष वीयेको गंगाजीमें डा दिया ॥ ६५ ॥ श्रीगंगाजी भी शंकरके वी्यंको न सह सकी ओर पीडित हयो अपनी
गोसे उस वीयको शरकण्डेकै बनमें त्याग कर दिया ॥६६॥ वहां वह वीयं पतित होतेही तत्कार बालकं होगया जो सुन्दर सुभग भ्रीमान्
| | | रीतिका बढानेवाडा था ॥ ६७ ॥ हे खनीश्वर ! मागंशीर्ष शुक्छा षष्ठीके दिन मूतर शिवएत्रका परादुभौव हुआ ॥ ६८ ॥
नारदजी ! उक्त समय अकस्मात् हिमाख्य पर्व॑तकी प्री ओर शिव पे दोनों प्रसन्न हुए ॥ ६९ ॥ पावंतीकै स्तनोंसे आनन्दका दृध चते
गा, हे सुने ! वहां जाकर सबने विशेष सुख माना ॥ ७० ॥ हे तात त्रिरोकीको सुख देनेवाला भंग विशेष पसे हुआ, खर ओर
दत्योको विरेष रूपसे विद्र हुआ ॥ ७१ ॥ आकाशसे अकस्मात् देवदुदुभीका शब्द होने लगा हे नारद ! बाठकके ऊपर आकाशते
ठ मागीमासे सिते पक्षे तिथौ षष्ठयां सुनीश्वर ॥ प्रादुभावोऽभवत्तस्य शिवपुत्रस्य भूतले॥ ६८ ॥ तस्मिन्नवसरे बह्मतकस्माद्धिम
| शेलजा ॥ अभूतां सुखिनौ तञ स्वगिरौ गिरिशोऽपि च ॥६९॥ शिवाङ्कचाभ्यां सुश्चाव पय आनन्दसंभवम् ॥ त गत्वा च
सर्वेषां सुखमासीन्धुनेऽधिकम्॥ ७० ॥ मंगलं चाऽभवत्तात तिरोक्यां सुखदं सताम्॥ खलानामभवद्वि्ो दैत्यानां च विशेषतः
॥ ७१ ॥ अकस्मादभवद्रयोभ्नि परमो दुदुंभिध्वनिः ॥ पुष्पवृष्टिः पपाताऽश्चु बालकोपरि नारद् ॥ ७२ ॥ विष्ण्वादीनां समं
स्तानां देवानां सुनि सत्तम ॥ अभूदकस्मात्परम आनन्दः परमोत्सवः ॥७३॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसंहितायां
चतुर्थ कमारखंड शिवपु्रजननवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ नारद उवाच॥ देवदेव प्रजानाथ बरह्मन श्ष्टिकर प्रभो ॥
|| ततः किमभवत्तत्र तद्रदाऽय्य कृषां कुङ् ॥१॥ ब्रह्मोवाच ॥ तस्मित्रवक्षरे तात विश्वामित्रः प्रतापवान् ॥ पेरितो बिधिना तत्ाग
च्छत्परीतो यदच्छया ॥ २ ॥ स दष्ठाऽरौकिकं घाम तत्तस्य सुतेजसः ॥ अभवत्पूर्णकामस्तु सुप्रसन्नो ननाम च ॥ ३ ॥ |
ट एछोकी वषा होने ठगी ॥ ७२ ॥ हे सनिशरष्ठ ! विण्ण॒ आदि समस्त देवताओंको अकस्मात् परम आनन्दका उत्सवं हभ ॥ ७३ ॥
ट इति श्रीशिवमहाण्राणे भाषारीकार्यां द्वितीयायां रद्रसंहितयां च० कु ° शिवण्त्रजन्मवर्णनं नाम॒ द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ नारदजी बे &
ठ हे देवदेव प्रजानाथ ! हे ब्रह्मन् ! हे सृष्टि करनेवाले ! हे पभो ! इसके पीठे क्या हुआ सो कपाकर हमसे किये ॥ १ ॥ बह्लाजी बोले हे #
ह|| तात ! इसी अवसरमे भरतापवान विश्वामित्रजी विधाता भरित हो वहां अपनी इच्छसे आधे ॥ २ ॥ उस तेजस्वी बाठ्कका अलौकिक तेज
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देखकर प नन चिते उस बाकककी स्तुति करने छगे, भतापकै जाननेवाठे विशा
तक पकम भोर भरन होकर नमसकार किया ॥ ३ ॥ ओर हआ ओर बहुत भसन्न होकर विश्वामित्रजीसे कहन
-आगये ही, हे तात ! आप यथोक्त मेरा वेदसतम्मत
रोहित हए ओर इस सन्देह नहीं तुम सबक पूज्य होंगे ॥ ७ ॥
विक्षित हो ऊँचे स्वरसे बालके कहने ठगे ॥ < ॥ विश्वामित्रजी
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मित्रजी विधिकी भरित बाणियोमि स्तुति करने कगे ॥ ४ ॥ तन् वह बाखकं बहुत भतन
ठ्गा ॥ ५॥ शिवके पत्रने कहा हे महाज्ञानी ! शिवकी इच्छासे आप अकर्मत् यहा अ
संस्कार कीजिये ॥ £ ॥ ओर आजे तुम सज्ञे प्रसन्न करनेवाठे मेरे एर
बह्माजी बोट बाटकके यह वचन सुन विश्वाभित्रजी प्रसन्न हुए ओर वि
अकरोत्सुवतिं तस्य सुभरसत्नेन चेतसा ॥ विधिप्ररितवाग्मिश्च विश्वामित्रः प्रमाववित्॥४॥ततस्सोऽभत्युतस्तच सुप्रसन्नो महोति
कृत् ॥ सुपरहस्याद्धतमहो विश्वामि्ङवाच च ॥ ५ ॥ शिवसुत उवाच॥ शिवेच्छया महाज्ञानिन्नकस्मात्वमिहगतः ॥ संस्कार
करु मे तात यथावद्वदसंमितम् ॥६॥ अद्यारभ्य बुरोधास्त्वं भव मे प्ीतिमावहन्॥ भविष्यसि सदा पूज्यस्सवषां ना संशयः
॥ ७ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य सुप्रसन्नो हि गाधिजः ॥ तथुवाचावदाततेन स्वरेण च सुविस्मितः ॥ ८ ॥
विशवामिञ् उवाच ॥ शृणु तात न विप्रोऽहं गाधिक्षतरियबाखकः ॥ विश्वामित्रेति विख्यातः क्षत्रियो विप्रसेवकः ॥ ९ ॥ इति
स्वचरितं ख्यातं मया ते वरबालक ॥ कस्त्वं स्वचरितं ब्रूहि विस्मितायाखिलं हि मे ॥ १० ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वच
स्तस्य तत्स्वषृत्तं जगादह ॥ ततश्ोवाच सुप्रीत्या गाधिजं तं महोतिष्ृत् ॥ ११ ॥ ॥ शिवसुत उवाच ॥ विश्वामित्र वरान्मे
त्वं ब्रह्मषिर्नाऽ संशयः ॥ वशिष्ठायाशच नित्ये त्वां व्रशंसिष्यंति चादरात् ॥ १२ ॥
बोरे दे तात् ! सुनो मँ बाह्मण नहीं ह गाधि क्षत्रियं कुमार हूं भँ कषत्रिय बाहनणतेवकविश्वामित्र नामत विख्यात हू ॥ ९ ॥ हे अष्ट बाठक ।
इस भकार भने तुञचघे अपना चरित्र कहा तू कौन है अपना चरित्र कह, सन्ञे तेरी बातसे बडा आश्चयं हो रहा है ॥ १० ॥ ब्रह्ाजी बोटे
जब यह वचन् सुनकर वह बाक प्रसन्न हो उन दिश्वाभित्रजीसे अपना चरित्र कहने रगे ॥ ११ ॥ शिव पुत्रने कहा हे विश्वामित्रजी ! मेरे
ब्रसे तुम ब्रह्मि होगे, इसमे सन्देह नहीं वशिष्ठ आदि आदरसे निय तुम्हारी प्रशंसा करेगे ॥ १२ ॥
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च--- - ण
| कारण मेरी आज्ञासे तुम मेरे संस्कार करो. ओर यह शप्त रहस्य तुमको किसे कहना नहीं चाहिये ॥ १३ ॥ तब उसने हे ्
बडे परेमसे शिवपुत्रके संस्कार वेदायुस्ार किये ॥ १४ ॥ तब शवक पत्रे महा उपकार करके विश्वामित्र ऋषिक निभि प्रसन्न होकर
दिव्य ज्ञान दिया ॥ १५ ॥ ओर इन अश्िषत्रने विश्वामित्रजीको पुरोहित किया, उसी दिने अनेक चरित्र करनेमे पण्डित वह
ब्ाह्णभरेष्ठ एरोहित हुए ॥ १६ ॥ हे खनि ! इस प्रकार जो बाल्कने छीठा की सो मने कही हे तात ! अब प्रेमपे दृस्ररो लीढा छनो
अतस्त्वमाज्ञया मे दि संस्कारं कत॑मरैसि॥ इदं स्व सुगोप्यते कथनीयं न फुचचित्॥१३॥ ब्रह्मोवाच ॥ ततोकार्षीत्स संस्कारं
तस्य प्रीत्याऽखिलं यथा ॥ शिवबालस्य देवष वेदोक्तविधिना परम् ॥१४॥ शिवबालोपि सखप्रीतो दिष्यज्ञानमदात्परम् ॥ विशा
भि्राय सनये महोतिकारकः प्रभुः ॥ १९ ॥ पुरोदितं चकारासौ विश्वामित्र श्चुचेस्सखत ॥ तदारभ्य द्विजवरो नानाखीलाविशा
रदः ॥ 9& ॥ इत्थं लीला कृता तेन कथिता सा मया षने ॥ तल्टीखामपरां तात णु प्रीत्या वदाम्यहम् ॥ १७॥ तस्मि
त्रवसरे तात श्वेतनामा च संप्रति ॥ ततराऽपश्यत्घुतं दिग्यं निजं परमपावनम् ॥ १८ ॥ ततस्तं पावको गत्वा द्ार्ग्य चुचुम्ब
च ॥ पुत्रेति चोक्ता तस्मे स श्रं शक्तिन्ददौ च सः॥ १९ ॥ गुहस्तां शक्तिमादाय तच्छंगं चाङ्रोद इ ॥ तं जघान तया
शक्त्या रगो भुवि पपात सः ॥ २० ॥ दशपद्ममिता वीरा राक्षसाः पूर्वमागताः ॥ तद्वधाय द्रुतं नष्टा बभूवुस्तत्पहारतः
॥ २१॥ हाहाकारो महानासीचकंपे साचला मदी ॥ अलोक्यं च॑ सुरेशानस्सदेवस्तत्र चागमत् ॥ २२ ॥
कहता हूं ॥ १७ ॥ हे तात ! उस्न स्मय शवेतनामक एकं ॒यहात्माने उक्ष दिव्य प्रमं पावन वाख्ककौ देखा ॥ १८ ॥ ओर अचिते
जातेही ` उसको आर्िगन कर चमा, ओर एत्र ! इस भकार कहकर उसको शक्ति ओर अद्न दिया ॥ ३९ ॥ गुह उप्त शक्तिको छेकर
कर च पवैतकै शिखरपर चढ गये, ओौर उस शक्तित पवेत शरंगपर भरहार कंथा, जिससे बह शिखर प्रथिवी गिरपडा ॥ २० ॥ यह
देखकर दश पसम वीर राक्षस उनके मारनेको आये ओर कुमारक परहारसे सब नष्ट हो गये ॥ २१ ॥ उक्त समय महा हाहाकार मच गया,
ऋ र.
शिण्पु ओर सव एथिवी कोपने ठगी, उप्त मय त्रिलोकी भ्या इ तव इन््ादि देवता वहां आकर भात हए ॥ २२॥ उन | ¢ |
॥३२७॥ ||| पश्वे इन्दने वजका भहार किया, उस समय शास नामक एक महावली परप प्रगट हुआ ॥ २२ ॥ किर इन्दरने उप्ते वाम पाश्वे प्रहार ¢
& | किया, तब उतत वजञके ठगनेते विशाख नामक एक दूरा परुष महावठी उत्पन्न इजा ॥५२४ ॥ तथ ईधन उत वाढककै हदये वजका
| हार किया, तव वहासि नैगम नामक एक मह्ावछो परुष उसनन हुमा ॥ २५ ॥. तव बह कन्दा चारों महाबली महावीर इन््क ४
ठ मारनेकी शीघतासे चठे, सो यह उनकी शरणमे गया ॥ २६ ॥ तव इन्द्र देवताओं सहित महाभयकीो प्राप्त होकर ` चकित हौ अपने ¢
|| दक्षिणे तस्य पाश्वं च वज्रेण स जघान च ॥ शाखनामा ततो जातः पुमांथेको मदाबल॥२३॥पुनश्शको जघानाऽु वामपा
¢| श्वं हि तंतदा ॥ कत्ेणाऽन्यः ुमाजातो बिशासाख्योऽपरो बली॥२.९।ततस्तद्दय् शक्रो जभान पिना तदा ॥ परोऽभतरेगमो $
|| पारयः पमास्तद्वन्महाबलः ॥ २५ ॥ तदास्कंदादिचत्वारो महावीरा महाबलः ॥ इन्द हतं दतं जग्घुस्सोयं तच्छरणं य्चौ ं
॥ २६ ॥ शक्स्ससामरगणो भयं पाप्य गृहात्ततः ॥ यथौ स्वरोकं चकितो न भेदं ज्ञातवान्भुने॥ २७ ॥ स बालकस्तु तवैव ||&
तस्थाऽऽवानंदसंयुतः ॥ ू्व्निभयस्तात नानालीराकरः भ्युः ॥ २८ ॥ तस्मिन्नवसरे त कृततिकाख्या् षद् लियः ॥ स्नातं |©
समागता बार ददशस्तं महाप्रधुम् ॥ २९॥ भरहीतु तं मनशुस्सवास्ता कृत्तिकाः चयः ॥ वादो बभूव तासां तद्यहणे ||
४ छापर शने ॥ ३० ॥ तद्रादशमनार्थ स षण्षुखानि चकार इ ॥ दौ दुग्धं च सर्वासां तष्टास्ता अभवन्घुने ॥ ३१ ॥ , ¦
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कु.खं.४ टोकको चछा गया हे सने 1 उसने कुछ भेद नहीं जाना ॥ २७ ॥ ओर वह बाठक आनंद पृक वही स्थित हआ हे तात! वह
ध अनेक रीखा करनेवाङे भभु पूषकै समान _निभेय रहे ॥ २८ ॥ उप्त समय रुतिका नामक छः विये वहां स्नानके निमित्त आई ऽन्होनि
` | बारकको वहां देखा जो बडी कान्तिवारा थाः ॥ २९ ॥ उन कत्तिकादि छौ सियोने न॑ वालकके ब्हण करनेकी इच्छा की ह
| ४॥ सने \ बालकै बरहण करनेकी इच्छासे उनम विवाद होने खगा ॥ ३० ॥ उनकृ विवाद देखकर छभ्चल , धारणक्र यि, ओर सबका
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| पिया हे शने ! इस कारण वे सव भरसन्न हई ॥ ३१ ॥ उस्र वाखककै मनकी गति जानकर वह छहं छृत्तिका उस् बालको लेकर |
हो अपने लोकको गई ॥ ३ ब् ॥ उन शिवजीकै भचर खये अधिक कांतिवाठे दूष परीनेकी इच्छा करनेवाठे कुमारको वे छहों अपना |
पिलाकर बढाने रुगीं ॥ ३३ ॥ वे किसी समय भी बालकको अपनी आंखोकी ओट न करती, भौर भाणो भी अधिक उस प्रेमपाज कुमारको
६ 6 कारण किं उह सब उनकी पोषक थीं ॥ ३४ ॥ जो जो वच्च ओौर अष्ठ भूषण त्रिरोकीमें दुम है वे प्रेमपूरवक उस बालकको छाकर
ए देती ॥ ३५ ॥ महा कांतिवाले उस बाक्कको वे दिन दिन श्ट करती जाती थीं, विशेषकर भशंसित ओौर स्वादु अन्न भोजन करातीं ॥२६॥
तन्मनोगतिमाज्ञाय सवौस्ताः कृत्तिकास्तदा॥ तमादाय ययुर स्वकीय दिता खने ॥२॥ तं बालकं कुमाराख्यं स्तनं दत्त्वा
स्तनार्थिने ॥ वद्धेयामासुरीशस्य सुतं सू्याधिकप्रभम्॥३२॥न चुर्बालकं या लोचनानामगो चरम् ॥ प्राणेभ्योपि भेम॒पानचं यः
| पोष्टा तस्य पुज्कं ॥३४॥ यानि यानि च वच्लाणियरोक्ये दुलंभानि च ॥ स्मे च ताः मेस्ण् भरषणानि वराणि वे ॥२५॥
|| दिनेदिने ताः पुषुषुर्बाख्कं तं महाभरथुम् ॥ भ्रसंसितानिस्वादूनि भोजयित्वा विशेषतः ॥ २६ ॥ अथेकस्मिन् दिने तात स बालः
कृततिकात्मजः ॥ गत्वा देवसभां दिव्यां सुचरि्े चकार ६।३७॥स्वमहो दशयामास देवेभ्यो हि महाद्धतम्॥ सविष्णुभ्योऽखिे
भ्यश्च महोतिकरबाख्कः ॥ ३८ ॥ तदृष्टा सकृलास्ते वे साच्युतास्सर्षयस्सुरः॥ विस्मयं परापुरत्यन्त पपच्छस्तं च बालकम्
॥ ३९ ॥ को भवानिति तच्छ्रत्वा न कंचित्स _ जगाद ह ॥ स्वालयं स जगामाऽ्चु यकषस्तस्थौ हि पूर्ववत् ॥ ० ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसंहितायां चतुथे कुमारखण्डे कातिंकेयलीलावर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
¢ हे तात । एक समय् रुत्तिकाका एत्र बह बालक देवसभाभे जाकर एकं घरुन्दर चरित्र केरता हुआ ॥ ३७ ॥ वह भहा उन्नति करनेवाखा बाट्क
4 देवसमा विष्ण ओर सव देवताओंको अपनी महिमा दिखाने रगा ॥ ३८ ॥ उस करव्यको देखकर वे विष्ण आदि देवता ओर ऋषि सहा
विस्मयको भाप हो उस बाठकते पठने खे ॥ ३९ ॥ आप् कौन हो ! यह वचन सुनकर उस॒बाखकने कु न कहा ओर अपने स्थाने
‰४|| भाकर पूववत् यप रहना स्वीकार किया ॥ ४० ॥ इति शीशिवमहाशराणभाषायां ₹० च० कुमारखण्डे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
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नारदजी बोरे हे देवदेव ! हे भरजानाथ ! इसके पीठे किर छया हआ कपा करके शिषटीठासे युक्त इस बातको आप 4 ¢
ब्रह्माजी बोठे हे सने ? जिस स्मय उस्र शिवजीक पुत्रको कत्निकाओंने ब्रहणकर ख्या कुछ समय चीत गया प्र् पावतीको यहं समाचार £
न भिला ॥२॥ उतत. समय हते हृए खसकमल्मे दुर्गानि देवेश्वर पमु अपने स्वामी शकरसे ईस भकारमे वचन कहं ॥ ३ ॥
पार्वती बोटी है देवदेव महादेव ! आप मेरे शुभ वचन सुने हे ईश्वर ! पूवं जन्मके पण्यके ५ ही आप सके प्राप हए ई
॥ ४ ॥ है योगि्योम अष्ट! आप कपा करके जब विहारे तत्पर ह्ये थे उस समय देवताओंनं भेरी रति भगकरदीथी॥ ५॥
नारद् उवाच ॥ देवदेव प्रजानाथ ततः किमभवद्विषे ॥ वदेदानीं कृषातस्तु शिवलीलासमन्वित्म् ॥१॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ कृत्तिका
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॥३३८।
भिरदीते वै तस्मिञ्शंधुसते घुने॥ कित्काकोभ्यतीयाय बुबुधे न हिमाद्रिजा ॥२॥ तस्मिन्नवसरे दुगां स्मेराननसरोरदा॥ उवाच
स्वामिनं शयं देवदेवेश्वरं प्रथुम् ॥ ३ ॥ ॥ पार्वत्युवाच ॥ देवदेव महादेव शृणु मेवचनं शुभम् ॥ पूरवपुण्यातिभारेण त्वे मया
प्राप्त ई~वर ॥९॥ कृपया योगिष श्रेष्ठो विहारैस्तत्परोऽभवः ॥ रतिभंगः कृतो देवैस्तत् मे भवता भव ॥५॥ भूमौ निपतितं वीर्य
नोदरे मम ते विभो ॥ इ यातं च तदेव केन् दैवेन निहतम् ॥ & ॥ कथ मल्स्वाभिनो वीयैममोधे ते महेश्वर ॥ मोधे यातं च
किं किंवा शिङ्युजीतश्च कुचचित् ॥ ७ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ पार्वतीवचनं अुत्वा प्रहस्य जगदीश्वरः ॥ उवाच देवानाहूय सुनींश्चापि
मुनीश्वर ॥ ८ ॥ ॥ सरैश्वर उवाच ॥ देवाः शृणुतं सद्वाक्यं पार्वतीवचनं अतम् ॥ अमोघं कुर मे वीर्यं यातं केन च
, निहतम् ॥ ९ ॥ ॥ सभ्य नापतत्कपरं स चेदंडं न चार्हति ॥ शक्तौ राजा न शास्ता यः प्रजावाध्य्च भक्षकः ॥ १० ॥.
हे विभो ! आपका वीयं भूमिभे गिरा मेरे उदम नहीं गिरा हे देव ! वह वीय कहां गया कि देवतान उत्ते छिपा छिया ॥ ६ ॥ हे महेश्वर !
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स्वामिन् वह आपका अमोष वीयं क्यु मोष होगया या कहीं उसे को वाल्क परगट दुआ ॥ ७ ॥ ब्रह्माजी बोढे परर्वतीके वचन
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सुनकर जगदीश्वर हैसते हुए देवताओं शनिर्योको बुखाकर बोखे ॥ < ॥ महेश्वर बोठे हे देवताओ ! मेरे वचन सुनो तुमने पार्वतीके वचन
सुने भेरा अमोघ वीये कहां है, उसको किसने छिपाया ॥ ९ ॥ कया भयते शीधतासे उसे को नही भराप्र होगा, जो शीघ कहेगा तो दंडके
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| न होगा, जो शक्तिसम्पन्न होनेपर राजा अच्छा शासक नहो तौ वह परजाको वाधा होने रक्षकं नहीं भक्षक कहाता है ॥ १० |
| यह वचन सुनकर सब देवता व्याकुढ होगये, ओर परस्पर सम्मति करके करमसे सब बोरे ॥ ११ ॥ विष्ण॒जी बोठे जिसने यहं ¢
गुरुका वीर्य छिपाया है बह मिथ्यावादी हो वहं मारतम गुरुदारा ओर शुरु निन्दाके पापको प्राप हौ ॥ १२ ॥ बहला बोठे एण्यकष्र भारतमे
जिसने यह पवित्र वीयं चुराया है, वह आपकी सेवा पूजाम युक्त नही ॥ १३॥ ठछोकपाठ बोटे जिस पापीने पतित होनेकै भ्रमसे उश
वीयेको छिपाया है बह उस पापको भाप होगा दुःख पावेगा ओर निरन्तर उसके कमोसि उसको ताप होगा ॥ ३४ ॥ देवता बटे जो मसं
शंभोस्तद्वचनं थत्वा समालोच्य परस्परम् ॥ उचुस्सवं कमेणेव चस्तास्तु पुरतः प्रभोः॥११॥ विष्णुरवाच ॥ ते मिथ्यावादिनस्सं
तु भारते गरुदारिकाः ॥ गुरुनिन्दारताश्शश्वत््वद्रीर्ययेश्च निहतम्॥१२। ब्रह्मोवाच ॥ त्वद्वय निहतं येन पुण्यक्षेत्रे च भारते ॥
स॒ नाऽन्वितो भवेत्त सेवने प्रजने तव ॥ १३ ॥ रोकपाला उचुः ॥ त्वद्रीर्य निहतं येन पापिना पतितथमात् ॥ भाजनं तस्य
सोत्यन्तं तत्तपं कम संततिम् ॥१४॥ देवा उलुः ॥ कृत्वा प्रतिज्ञां यो मृढोनाऽऽपादयति पूर्णताम् ॥ भाजनं तस्य पापस्य त्वद्रीथ |||
येन निहतम् ॥ १५ ॥ देवपतन्य उचुः ॥ या निंदति स्वतां परं गच्छति परुषम् ॥ माठ्बन्धुविहीना च त्वद्वीर्यं निहते
यया ॥ १६॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ देवानां वचनं आत्वा देवदेवेश्वरो दरः ॥ कर्मणां साक्षिणश्चाह धर्मादीन्सभयं वचः |||
॥ १७ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ देवनं निहतं केन तद्वीर्यं निहतं भुवम् ॥ तदमोघं भगवतो भहेशस्य मम प्रभोः ॥ १८ ॥
भलिज्ञा करके उसको पूणे नही करता, वही उस पापका भागी हो जिसने वह वीये ध्या हो ॥ १५॥ देव पत्नी बोटीं जो ज्ञी अपने
स्वामीकी निन्दा करकं दूरे परुषके पास जाती है वे माता ओर बन्धुओते हीन होकर जिन्न पापको भाप होती है, शिवजीकं वीर्यं त
चुरानेफा वही पाप ठगे ॥ १६ ॥ बल्लाजी बे देवदेव महादेव महेश्वर देवताओंकै वचन सुनकर ध्मादिक कर्मके साक्षी देवताओं बोरे
॥ १७ ॥ श्रीशिवजी बटे किसी देवताने वीरको नहीं छिपायो है, यज्ञ समथ महेश्रका वीयं मोष कैसे हभ ॥ १८ ॥ 4
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हे विशवेदेवताओ ! तुम सब कर्मके साक्षी हो क्या तुमको कहीं उस
तो कहो ॥ १९ ॥ ब्रह्माजी बोटे दैश्वरके वचन सुनकर सव सभा
बोठे ॥ २० ॥ बह्माजी बोठे रतिम वीयं स्थित रहा सो पृथिवी गिरा बह शकर ^
होगा ॥ २१ ॥ पृथिवी बोट, भँ वह वीर्यं सहने असमर्थं धी, सो ने अभ्रिको सोपदिया हे बहन् ! मुज्ञे उसे उढानेको सामभ्य नहीं थी
4 सो आप शत्च अवलाको क्षमा करनको योग्य है ॥ २२ ॥ अभि बोढा. हे शंकर म भी ठुम्हारा वीयं सहन कएनेको असमथ हुमा था
त वीरथके रखनेकी सुध है, आप् उत्क जाननेके योग्य हो, कहीं विदित हौ
के ठोग कम्पित होगये, ओर परस्पर एक दूसरेको, देख क्रमसे प्रभुक आगे
के प्रकोपे अपोध रहा पृथिवी को समाचार विदित
¢ यूयं च साक्षिणो विश्वे सततं सर्वकर्मणाम् ॥ युष्माकं नितं किम्वा. कि ज्ञ वक्कुमरथ ॥ १९ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ईश्वरस्य
वचः त्वा सभायां केपिताश्च ते ॥ परस्परं समालोक्य कमेणोचुः पुराः प्रभोः॥२०॥ ब्रह्मोवाच ॥ रते तु तिष्ठतो वीय पपात
ट वसुधा तङे ॥ मया ज्ञातममोधं तच्छंकरस्य प्रकोपतः ॥ २१ ॥ ॥ क्षितिङ्वाच ॥ वीरय सोढमशक्ताहं तद्वहो न्यक्षिपं पुरा ॥
| अतोऽन र्वं ब्मत्रनलांकषतुमहसि ॥ २२ ॥ वदह्िरवाच ॥ वीरय सोद़मशक्तहं तव शंकर पवते ॥ केलासे न्यक्षिषं स्यः कपो
‰|| तात्मा इ दुस्सहम् ॥ २३॥ ॥ गिरिश्वाच ॥ वीर्यं सोड़मशक्तोऽदं तव शंकर ोकष ॥ गंगायां पराक्षिपं सयो दुस्सहं पर
&|| मेश्वर ॥ २७ ॥ ॥ गंगोवाच ॥ वीय॑सोदुभशक्ताहं तवशंकर रोकप ॥ व्याकुलखाऽति प्रभो नाथ न्यक्षिपं शरकानने
|| ॥ २५ ॥ ॥ वागुवाच ॥ शरेषु पतितं वीर्यं स्यो बारो बभूव ह ॥ अतीव सुन्दरश्शम्भो स्वर्मद्याः पावने तटे ॥ २६ ॥
४ कपोतरूपसे उसे कैलास ही त्यागन कर दिया ॥ २३ ॥ गिरिराज बो हे शंकर ! हे छोकप ! भै भी आपका वीर्यं सहन करने भ
असमथ हं हे परमेश्वर ! दुःसह होनेते भने उस बीयेको गंगाजीमे डाट दिया ॥ २४ ॥ गगाजी बोटी हे शकर ठोकपति ! मँ भी आपका
६ वीयं सहन करने अशक्तं दई हे भभो ! तब भने व्याकु होकर उत शरकंडेके वनम डाक दिया ॥ २५ ॥ वायु बे शरम पतित हुभा
वह वीये तत्कारु बारक होगया हे शिवजी ! स्व्मदीके पवित्र तटमं वह बडा सुन्दर बाक जन्मा है ॥ २६ ॥
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६ | बोखे हे भमो ! बाछकको रोता हुभा देखकर मँ अस्ताचठको चा गया, कार चक्रे प्रित होकर मे ठहरेको अस्तमं हुआ ॥२७
। चन्दरमाने कहा, रोते हए बाटकको देखकर रत्तिकायं उसे ठेकर स्वच्छन्दतासे वद्विकाभ्रमकी ओर अपने स्थानोको ठे गईं ॥ २८ ॥
९ जलने कहा हे प्रभो ! उ रोते हुए बारकको ठेकर उन रत्तिकाओंने अपने स्तनपानसे उसको बहाया है हे रश ! बह तुम्हारा एत्र सर्यके
$ || समान कांतिवाढा है ॥२९॥ सध्या बोट ! इस समय वह छत्तिकाय वनमे उस्र एत्रको पाठन करके कौतुके उस बाठकका नाम फारतिंकेय ४
| रख चुकी ह ॥ ३० ॥ रातिने कहा बै कभी बाठककौ _आर्खोकी ओट नहीं करती उत्े भाणे भी अधिक भ्रीतिमात्र माना है वह उसको
८ सूयं उवाच ॥ श्द॑तं बारकं दष्टागममस्ताचरं प्रभो ॥ प्रेरितः कालचक्रेण निशायां स्थातुमक्षमः ॥ २७ ॥ चन्द्र उवाच ॥ 4
रुदंतं बारुकं प्राप्य गहीत्वा कृत्तिकागणः ॥ जगाम स्वाख्यं शंभो गच्छन्बद्रिकाश्रमम्॥२८॥जलघुवाच ॥ अघं श्दंतमानीय
स्तन्यपानेन ताः प्रभो ॥ वद्धेयामासुरीशस्य् सुतं तव रविप्रभम्॥ २९ ॥ ॥ संध्योवाच ॥ अधुना कृत्तिकानां च वनं तम्पोष्य
पु्नकम् ॥ तन्नाम् चछ्ुस्ताः भ्रम्णा कात्तिकश्वेति कोत॒कात् ॥३०॥ राभिरूवाच ॥ न चङर्बाकं ताश्च खोचनानामगोचरमू ॥ .
भ्रणिभ्योपि भ्रीतिपा्ै यः पोष्टा तस्य पुत्रकः ॥ ३१ ॥ दिनशुवाच वाच ॥ यानि यानि च वल्ञाणि भूषणानि वराणि च ॥ प्रशं
सितानि स्वादूनि भोजयामासुरेव त् ॥ ३२ ॥ जघ्नोवाच ॥ तेषां तद्वचनं शचत्वा संतुष्टः परसूदनः ॥ शुदं प्राप्य ददौ भीत्या
कतरभ्यो बहुदक्षिणाम् ॥३३॥ पस्य वार्ता संप्राप्य पावती इष्टमानसा ॥ कोटिरत्नानि विप्रभ्यो ददौ बहुधनानि च
॥ ३९ ॥ लक्ष्मी सरस्वती मेना सावित्री सवेयोषितः ॥ विष्णुस्सवं च देवा ब्राह्मणेभ्यो ददुधनस् ॥ ३५ ॥
ट| भटी भकार पोषण करती है ॥ ३१ ॥ दिनने का प्रथिवी जितने भेष भूषण ओर पद है दह पहराती है तथा जिवने स्वादिष्ट भाजन
|| ई कह दम्हारे ऽत्रको वे कराती है ॥ २२ ॥ उनके यह वचन घुनकर शिवजी परम॒ भसन्न हुए, ओर आनन्दपूर्वक नाहर्णोको
4 बहुतसौ दक्षिणा दी ॥ २२ ॥ तके यह समाचार सुनकर पाती बहुत भतन हदे, बाहमणोको कोटि कोटि रल ओर बहती दक्षिणायै
दीं ॥ ३४ ॥ लक्ष्मी सरस्यती मेना सावित्री आदि सव च्रियोँने तथा विष्य आदि देवताओंने बीह्ञणोके निमित बहुतश्ना धन
` च
रि०इ° दिया ॥ २५॥ बह भमु देवता खनि ओरं पवतो भेरि
३४० ॥ विंशाराक्ष, शकुकण, कराक्रम, नन्दीश्वर, महाकाल, वजदेष्, महो
त होकर अपने गणो ओर दरतोको एत्रके समीप भजते हए ॥ ३६ ॥ वीरभद्र
न्मद ॥ ३७ ॥ गोकणास्य, दधिखख् जौ भरज्वृछिति अभिके स्षमान
खखवाला था, उत्ते तथा राख क्षेत्रपाठ ओर तीन ठाख भूत ॥३८॥ शिवके तुल्य पराक्रमवाठे रुद्र॒ ओर भेर्वोको ओरमभी अर्ष्य् विक्त
आकारवाठे अरतेख्य॒ग्णोको भेजा ॥ ३९ ॥ वे सत्र शिवजीके दूत अनेक भरकारकं अद्ध शच्च ग्रहण करके छतिकाओंके भवनोको वेर ठेते
हुए ॥ ४० ॥ उन सवो देखकर कत्तिका मयपे व्या होगर्द बह्म तेजते भरक।शमान कात्तिकेयसे कहती हुईं ॥ ४१ ॥ र्तिका बट
म्ररितस्स प्रथुदैवेधंनिभिः पर्वतैरथ ॥ दूतान् प्रस्थापयामास स्वपो यत तान गणान् ॥३६॥ वीरभद्रं विशालाक्ष शंककेणकरा
|| ऊमम् ॥ नन्दीश्वरं महाकारं वजदंमहोन्मदम्॥३७॥ गोकर्णास्यं दधिश्चखं ज्वलद्चिशिखोपमम् ॥ लक्ष चक्ष्रपालानां भूतानां
। च तरिलक्षकम् ॥३८॥ रुद्रां भेरशिव शिवतुलयषराकमान् ॥ अन्यांश्च विङ्ृताकारानसंख्यानपि नारद ॥३९॥ ते सवं शिव
| इतश्च नानाशब्नाञ्चपाणयः ॥ कृत्तिकानां च भवनं वेष्टयामाघुरुदतः ॥९०॥ इष्टता कृत्तिकास भयविह्वलमानसाः ॥
|| कातकं कथयामाघुन्व॑तं ब्हमतेजसा ॥ 8१ ॥ ॥ कृत्तिका उचुः ॥ वत्स सेन्यान्यसंख्यानि वे्टयामाखररयम्॥ किं कर्तषय
|| क गत्य महाभयशुपस्थितम् ॥४२॥ कातिंकेय उवाच ॥ भय त्यजत् कट्याण्यो भयं किंवा मयि स्थिते ॥ दुरनिवार्योऽस्मि
| 4) न केन वारय॑ते॥४३॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एतस्मिन्नतरे त सैन्येनद्रो नन्द्किश्वरः॥ पुरतः कार्िकेयस्योपविष्टस्सञ्चवाच
‰
न 253
यायो
3९49
ह ॥४७॥ नन्दीश्वर उवाच ॥ भरातः प्रवर्ति श्ण मे मातरश्च शुभावहाम् ॥्ररितोऽदं महेशेन संदजा शंकरेण च ॥.४५ ॥
कु.खं,£ ||६ || हे वत्स ! असंख्य सेनाओंने हमारे भवनको धेर छिया है अव कया करं कहां जांय महा भय उपस्थित हुभआ है ॥ ४२ ॥ कार्तिकेय बोरे, |
अ४ . ||| हे कंल्याणियो ! भय याग करो, मेरे होते भयका कोड कारण नहीं है, हे मात ! मँ बाख होकर भी दुर्निवार हूं सञ्च कौन निवारण क
सकता है ॥ ४२ ॥ उसी समय सेनापति नन्दिकेश्वर कार्तिकेय आगे स्थित होकर इस भकारे कहने गा ॥ ४४ ॥ हे भ्रातः ! मेरी शरदत्ति
| || सुनो, ओर माताएं भी शुभ समाचार सुनो जगते संहता महेशने सञ्चे भेजा है ॥ ४५ ॥ |
रुम. २
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| | भूमिमे गिरा ॥ ५० ॥ भूमिने उमे अधमे ओौर अभ्रिने परव॑तमं ओर गिरिराजने उसे गंगाभें भक्ेप किया, पीठे गंगाजीने |
केठासमे बल्ला, विष्ण. रुदर, आदि विद्यमान है हे तात ! उस्र महा उत्सव ंगकी सभायै सब स्थित थे ॥ ४६ ॥ उस्र सभाम पार्वतीने
| कल्याणक शेकरको सम्बोधन दे तुम्हे सखोजनेके निमित्त कहा ॥ ४७ ॥ कमसे शंकरने स्र देवताओं तुम्हारी भ्रापतिकै निभित्त
पूछा उनमें प्रत्येकने यथोचित उत्तर दिया ॥ ४८ ॥ पीछे सब ॒धमीदिकने ओर कर्मके साक्षी देवताओंनि ईश्वरसे तुमको इन ऊत्तिकाओंके
स्थानम बताया है ॥ ४९ ॥ प्रथम शिव पावती बहुत काठतक विहार होता रहा, उसको देवताओंने अवटोकन किया, ओर शंकरका
कैलासे सर्वदेवा ब्रह्मविष्णुशिवादयः॥ सभायां संस्थितास्तात महत्युत्स॒वमं गले ॥ ७६ ॥ तदा शिव् सभायां वै शंकरं सवं
शंकरम् ॥ सम्बोध्य कथयामास तवान्वेषणहेतुकम् ॥ ४७ ॥ पप्रच्छ ताञ्शिवो देवान् कमात्वत्पाप्निहेतवे ॥ प्रत्युत्तरं ददुस्ते
तु प्रत्येकं च यथोचितम् ॥ ४८ ॥ त्वामर कृत्तिकास्थाने कथयामासुरीश्वरम् ॥ सवे धर्मादयो धर्माधर्मस्य कर्मसाक्षिणः
॥ ७९ ॥ प्रबभूव रहः कीडा पा्वेतीशिवयोः एरा ॥ दृष्टस्य च सुरेश्शंभोरवरयं भ्रूमौ पपात इ ॥ «० ॥ भूमिस्तदक्षिषद्रहरौ
वह्धि्ाद्रौ स भूधरः ॥ गंगायां सोऽ्षिपदरेगात् तरगेश्शरकानने ॥ «9 ॥ ततर बारोऽभवृस्त्वं हि देवकार्यृति परधुः ॥
तञ र्धः कृत्तिकाभिस्त्वं भूमि गच्छ सांप्रतम् ॥ ५२ ॥ तवाभिषेकं शंमुस्तु करिष्यति सुरेर्सह ॥ र्प्स्यसे सर्वशच्चाणि
तारकाख्यं इनिष्यसि ॥ ५३ ॥ पुचस्त्वं विश्वसंहरैसत्वां प्राप्त्॒चाऽक्षमा इसा ॥ नार्थ गोप्तुं यथा शक्तश्यष्कृक्षसस्व
कोटरे ॥ ५8 ॥ दीप्तवांस्त्वं च विश्वेषु नासां गेहेषु शोभसे ॥ यथा पतन्महाक्रूपे द्विजराजो न राजते ॥ ५५ ॥
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शरकंडोके वनम भरक्षेप किया ॥ ५१ ॥ वहां देवता ओंका कायं करनेमे मथ तुम्हारा जन्म हुआ, वहां तुमको छल्तिकाओने भाप किया, सो |
तुम इस समय भूमिम चछो ॥ ५२ ॥ शिवजी देवताओकि स्राथ तुम्हारा अभिषेकं करगे वहां तुषको सम्पूणं शच्च भाप होगे, जिसे तम ||@
|| तारक अश्षुरको मारोगे ॥ ५३ ॥ तुम विश्वके संहतके पत्र हो, तुमको भार करनेको यह असमर्थं है जिस प्रकार सूखा वृक्ष अधिको
६॥ अपनी खखोडखमे रसनेको समथ नहीं होता ॥ ५४ ॥ तुम ससार भरे भरकाशित हो इनके घरमे शोभाको प्राप नहीं हो सकते, जसे ||
महाकूपं पतित हुआ गिरिराज शोभाको नही शरत होता ॥ ५५ ॥ जिस परकाशते हमारे तेजसे नहीं आच्छन्न हुए तुम धकाश करते (५
वैसे => न ओं
नैते खथ कासे आच्छादित होकर मद्पोको भकाश देताही है ॥ ५६ ॥. १ पुम जगत व्यापी साक्षात् विष्ण हो, हे शिवत्र |
0 तुम हो ॥ ५७ ॥ योगीन्द्र होकर तुम अनुटिप्त नहीं होते
नहीं हो, जते किसी दूसरेते व्याप्त न होकर आकाशही सवत्र व्यापकं है रसे
प्र ण्ट करनेमे भागी हो, जिस भकार आत्मा जीवधारियोक कर्भ॑योगसे ङक नहीं होता ॥ ५८ ॥ रेसेही इन ईशसे सव कुछ हेता
है प्र उनकी स्थिति छिपता किते नहीं हौ तो वा एतम भी उनकी स्थिति नहीं है जिस भकार योगिर्योको यण ओर तेजकी राशिवाे
करोषि च यथाऽलोकं नाऽऽच्छननोऽस्मासु तेजसा ॥ यथा सूर्य॑ः कलाछन्नो न भवेन्मानवस्य च ॥५६॥ विष्णुस्त्वं जगतां म्यापी
नान्यो जातोसि शांभव ॥ यथान केषां व्याप्यं च तत्सर्वं म्यापकं नभः ॥५७॥ योगीन्द्रो नाऽविप्तशच आनी चेतपरिषोषणे ॥
जैव छिपनो यथात्मा च कर्मयोगेषु जीविनाभ् ॥ ५८ ॥ विश्वारंभस्त्वमीशशचनासु ते संभवेत् स्थितिः ॥ गणानां तेजसां राशि
्थथात्मानं च योगिनः ॥ ५९ ॥ भात त्वां न जानंति ते नरा हतबुद्धयः ॥ नादवियन्ते यथा भकास्त्वेकवासाश्च पकृजाय्
॥ ६० ॥ का्तकेय उवाच ॥ ॥ भातस्सवं विजानासि ज्ञानभेकाछिकं च यत्॥ ज्ञान तवं का प्रशंसा ते यतो ृत्युजयाधितः
॥ ६३ ॥ कणां जन्म येषां वा याघ् यास योनिषु ॥ तास ते निति भातः ाष्ठरवतीह सारम् ॥ २ ॥ कत्तिका.
ज्ञानवत्यश्च योगिन्यः कृतेः कलाः ॥ स्तन्येनासां वद्धितोऽइश्ुषकारेण संततम् ॥ ६३ ॥
शि ७्यचु6
॥३४१॥
व
५
+ |
६
इव
¢
|
हं
६
हप. > ||(& || रशवम अभिाषा नही होती ॥ ५९ ॥ हे भाई ! जो तुमको नहीं जानते है षे हत बुद्धि हैवेरसे है जसे भक ॒कमटोंको नहीं जानते
क सं.४ || || कारण कि बह एकही स्थान स्थित है तो भी उनके यण नहीं जानते, देसेही भदप्य हमको नही जानते ॥ ६० ॥ कातिंकेय बोठे हे
अ०४ ६ ! तुम सब जानते हो, जो जकारिकिज्ञान है तुम ज्ञानी हो ठुम्हारी क्या परशं की जाय, कारण कि तुम साक्षात शकरके आश्रित हौ |
‰||॥ ६१ ॥ जिन जिन योगियोमे कर्मवस यह भराणी है हे भ्रातः उनम वे खी होते है ॥ ६२ ॥ यह कत्तिका ज्ञानवाटी
यः
| योगिनी प्रकतिकै कटा है, उनके उपकार ओर दुग्ध पान करके वद्धिकी प्राप्त हआ हूं ॥ ६३ ॥ मँ इनका पोष्य एत्र हं ओर यह विय
| अशवाटी है उन प्रकतिकै अंश उस उस् स्वामीके वीर्ये होते ह ॥ ६४ ॥ नन्दिकेश्वर शखेन््रकन्यासे मेरा प्रादुभीव नहीं है वह ् ठ
धूमे माता है जेते यह सब कत्तिका है ॥ ६५ ॥ जो शिबजीने सुज्ञे अपना एत॒ मानकर तुमको भेजा. है, तो तुम्हारे साथ चलकर त
देवसमूहोंको देगा ॥ ६६ ॥ यह कहकर ओर शीघतासे क्तिकाओंको बकाय उनसे पृछा ओर शिवके पाषदोकै साथ कुमारने गमन किया
॥ &७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे रुद्रसंहितायां च्° कुमारखण्ड भाषायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ बह्लाजी बोरे उसी समय एक बडा सुन्दर ¢
आसामहं पोष्यपुत्रो मदंशा योषितस्त्विमाः ॥ तस्याश्च प्रकृतेरंशास्ततस्तत्स्वामिवीयंजः ॥६४॥ न मद्धंगो हे शैखेन्द्रकन्यया ६
नन्दिकेश्वर ॥ सा च मे घरमतो माता यथेमास्सवंसमताः ॥६५॥ शम्धुना प्रषितस्त्वं च शंभोः पुत्रसमो महान्॥ आगच्छामि ट
त्वया साद द्रक्ष्यामि देवताकुलम्॥६६॥ इत्येवषुक्ता तं रीर संबोध्य कृत्तिकागणम ॥ कार्तिकेयः प्रतस्थे हि साद शंकरपा्षदेः ||
दे
॥ &७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रबरसंहितायां चतुथं कुमारखण्ड का्तिकेयान्वेषणनन्दिसंवादवर्णनं नाम चतुर्थोऽ
ध्यायः ॥8॥ ब्रह्मोवाच ॥ एतस्मिन्नतरे तञ ददशरथत्तमम्
मविर्निं ० 9 |
य् ॥ अद्धतं शोभितं शश्वद्विश्वकम॑पिनि्ितम्॥१॥ शत् चक्रं खि ||
स्तीण मनोयायि मनोहरम् ॥ थस्थापितं च पार्वत्या वेष्टितं पार्षदेषैरः॥२॥समारोहत्ततोऽनंतो दयेन विदूयता ॥ कार्तिकः परम ठ
ज्ञानी परमेशानवीयेजः॥२॥ तदेव कृत्तिकाः भाय सुक्तकेश्यरचाऽऽतुराः ॥ उन्मत्ता इव तेव वक्छमारेभिरे वचः ॥४॥ कत्तिका
ऊचुः ॥ विदायाऽस्मान् कृपासिन्धो गच्छसि त्वं हि निदैयः ॥ नायं धर्मो मातरवर्गाच् पारितो यत् सुतस्त्यजेत् ॥ « ॥ ट
रथ दिखाद्ं दिया, जो विश्वकमीका बनाया अद्भत शोभायमान था ॥ १॥ जो स्रौ पहियोके ठगनेसे बड विश्तारवाखा मनक समान
वेगवान् बडा मनोहर जो पावंतीने भेजा था, ओर शेष पार्षद् जिसको वेष्टित
ट
कर रहे थे ॥ २ ॥ उत्षप्र परमज्ञानी कार्तिकेयजी शिवजीके ||
वीयते सम्भूत अनन्त पराक्रमी कुछ दुःखी हदयसे सवार हुए ॥ ३ ॥ उती 4
४1
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( ॥ उत्त सरमय शोके व्याक बाक सोठे कत्तिकापं वहां आकर प्राप्त |£
इई, ओर आकर उन्मत्तक समान वचन कहने ठगीं ॥ ४ ॥ कतनिकायं बोरी हे रूपसिन्धो ! हसे छोडकर तुम निर्दयी हुए जाते हो, |:
पोका यह धमं नहीं है जो माता पाठन् कर उन्हँ छोडकर चढा जाय ।
अव हम क्या करं कहां जांय ओर क्या कर्तव्य करं ॥ ६ ॥ यह कहकर सव ₹।
तत्का ही मृच्छित होगई ॥ ७ ॥ कमारने उनको ज्ञानक वचनो समज्ञाया, हं खन । ओर उनकै साथ ही रथके ऊपर कुमार चे ॥ < ॥
बहुत भकारे सुखदायक मंगछ देख ओौर सुनकर कुमार पाषंदोंके साथ पिताक मंदिरे चे ॥ ९ ॥ साथमे नन्दिकिश्वर मनक समान
। ५ ॥ हमने तुमको ज्ञहसे बढाया है, ठम हमारे धर्मस एर हो, ||
वेगवान् रथप्र चढे, कुमार, न्योष ओर अक्षयमूलमरक्षवारे कैकास पर्वतपर पहुचे ॥ १० ॥ वहां कत्तिका ओर पाषंदोके साथ स्थित ४
त्तिकापएं कुमारको हदये लगाकर पत्र वियोगकै कारण
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स्नेहेन वद्धितोऽस्माभिः पुत्रोऽस्माकं च धर्मेतः॥ किं कुर्मः क च यास्यामो वयं कि करवाम इ ॥६॥ इत्युत कृत्तिकास्सर्वाः
कृत्वा वक्षसि कात्तिकम्॥ दुतं मूच्छांमवापुस्तास्सुतविच्छेदकारणात्॥७॥ताः ङुमारा बोधयित्वा अध्यात्मवचनेन वे ॥ ताभिश्च
पाषेदेस्साद्ंमारूरोह रथं सुन ॥८॥ दृष्ठ चत्वा मंगलानि बहून सखदानि वे ॥ कुमारः पषैदेस्साद्धं जगाम् पितमन्दिरम् ॥९॥
दक्षेण नदियुक्तथ मनोयायिरथेन च॥ कुमारः प्राप कैलासं न्यत्रोधाऽक्षयभूकुके ॥१०॥ तञ तस्थौ कृत्तिकाभिः पारषदप्रवरेः सद ॥
कमारश्शाकरिः प्रीतो नानालीराविशारदः॥११।तदा सवे सुरगणा ऋषयः सिद्धचारणाः॥ विष्णुना ब्रह्मणा साद समाचख्युस्तदा
गमम्॥१२॥तदा ष्ठा च गगियं ययौ प्रुदितश्शिवः॥ अन्येस्समेतो इरिणा ब्ह्रणा च सुरपिभिः॥१३॥शखाअ बहवो नेदुभरी |©
ूरयाण्यनेकशः॥ उत्सवस्सुमहानासीदेवानां तुष्टचेतसाम् ॥१४॥ तदानीमेव तं सवं वीरभद्रादयो गणाः॥ इर्वन्तः स छि |
नानातारुधग्स्वराः॥ १५ ॥ स्तावकाः स्तूयमानाश्च चक्रस्ते युणकीत्तनम् ॥ जयशब्दं नमश्शब्दं कुर्वाणाः प्रीतमानसाः॥ १६ ॥ ¢
हुए, अनेक टीलाओंमं चतुर कुमार शंकरी भीतिे वहां ठहरे ॥ ११ ॥ तव सब देवता ऋषि सिदध चारण ब्रह्मा ओर विष्णजीने शिव ए
जीसे गहका आगमन कहा ॥ १२॥ तव॒ गेगासे परगट कुमारके देखनेको सदाशिव चटे ओर संगमं विष्ण आदि देवता तथा दूसरे र
म्हि थे ॥ १३ ॥ उस समय शख भेरी आदि बाजे बजने ठ्गे ओर संतुष्ट चित्तवाटे देवता्ओंका परम उत्सव हभ ॥ १४ ॥ ठ
उस समय वीरभद्र आदि सब गण अनेकं तार ओर ठ्यसे शब्द करते हए स्पुति करने लगे ॥ १५ ॥ स्तुति पढनेवाछे |
| करने ठगे ओर प्रसन्न मनसे जय शब्द ओर नमः शब्द करने रुगे ॥ १६ ॥ ओर शिवजीके भरेष्ठ एत्र शरकंदोमिं भग |
देखनेको सब चे ॥ १७ ॥ पावंतीने उस्न समय बहुत मंगर मनाया, राजमागं मनोहर किया गया, ओर पद्मरागादि भणियोसे सव ओरसे
फुर सजाया गया ॥ १८ ॥ पति एत्रवाी सहागने तथा लक्ष्मी आदि तीस देवि्योको आगे करके पार्वती चटीं ॥ १९ ॥ रम्भा आदि
दिव्य अप्राय सुन्द्र वेष धारण किये शिवजीकी आज्ञा गाने ओर नृत्य करने लगीं ॥ २० ॥ जिन्होने गंगाके पत्र शंकरके समान
तेजस्वौका दशन किया उन्होने देखा कि तीनों जगतम कुमारका तेज व्याप्त हो रहा है ॥ २१ ॥ उस्न तेजते व्याप्त होकर यह बाठक तपापे
द्रष्टं ययुस्तं शरजं शिवात्मजमनुत्तमम् ॥ १७ ॥ पारवती मंगरं चके राजमार्ग मनोहरम् ॥ पद्यरागादिमणिभिस्संस्कृत
परितःपुरम् ॥ १८ ॥ पतिपु्रवतीभिश्च साध्वीभिः स्रीभिरन्विता ॥ लश््यादिर्धिशदेवीश्च पुरः कृत्वा समाययौ ॥ १९ ॥
रम्भादयप्सरसो दिव्यास्सस्मिता वेषसंयुताः ॥ _ संगीतनतंनपरा बभूवुश्वशिवाज्ञया ॥ २० ॥ ये तं समीक्षयामासु्गागियं शंकरो
पमम् ॥ ददृशुस्ते महत्तेजो व्याप्तमासीनगत्रये ॥ २१ ॥ तत्तेनसा वरतं वारं तप्तचामीकरपभम् ॥ ववंदिरे दवतं सवे कमारं
सूयवचसम् ॥ २२ ॥ जहुषुविनतस्कंधा नमश्शब्दरतास्तदा ॥ प्रिवार्योपतस्थुस्ते वामदक्षिणमागताः॥२३॥ अहं विष्ण
शुकश्च तथा देवादयोऽखिखाः ॥ दण्डवत्पतिता भूमौ परिवाभ्यै मारकम् ॥ २९ ॥ एतस्मिन्नन्तरे शंधुभिरिजा च मुदा
न्विता ॥ महोत्सवं समागम्य ददशे तनयं खदा ॥ २५ ॥ पुं निरीक्ष्य _च तदा जगदेकर्धुः ्रीत्यान्वितः परमया परया
भवान्या ॥ स्नेहान्वितोथुजगभोगयुतो दि सक्षात्स्वेश्वरःपरिषृतःप्रमथेः परेशः ॥ २६ ॥
हए सुव्णके समान भ्रदीप्र होगया ओर सुरयके समान तेजस्वी कुमारकौ सबने वंदना की ॥ २२ ॥ सब कोर शिर स्ुकराकर नमस्कार करने
ठगे, ओर बो दहिनी ओरसे कुमारको ेरकर सब कोई खड होगये ॥ २२ ॥ भ विष्ण इन्द्र तथा दूसरे सव देवता कुमारकै चारोंओर
स्थित हो पृथिवीम दंडवत् करे ठगे ॥ २९४ हे सुने ! इसी समय अपनी सखि्ोके सहित
॥ मू ] आकर गिरिजाने वह महोत्सव देखा, ओर
बडी प्रम हदं ॥ २५ ॥ वह जगतक एक मात्र बन्धुं अपने एत्रको देखकर भवानी सहित बडी प्रसन्नताको भाप हए, सर्पराजको धारण
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शि०्पु° ह किषे, परेश, साक्षात् सशर अपने गणोके साथ बे परमम गदगद
॥३९४३॥ र रथे शीघ्र उतरकर शिरसे भणाम करते हुए ॥ २७ ॥ शिवजीने भ
सनेहके. कारण बडे प्रसन्न हए ॥ २८ ॥ ओौर पार्वती एत्रको हदय
गद्गद् होगये ॥ २६ ॥ तव शक्तिधारी स्कन्द्जी पावती ओर शिवको देखकर
मते कुमारको हदयसे छगाय शिर रघ छया, ओर परमेशान त्रम ओर
से ठगाकर बडे संभ्रपको भप्त हुईं ओर स्नेहसे व्याप्त होकर एत्रको दृध
|| पिढाने लगीं ॥ २९ ॥ तव च्व सहित देवताओंने कुमारका नीराजन किया, भौर जय, शब्दे उस समय आकाश ज उदा ॥ ३० ॥
£| ऋषि वेदधोष करने ठे गानेवाके गीत गाने ठे, ओर बहुतसे बाजे कुमारकौ अश्यथनामे बजने ठगे ॥ २१ ॥ तब प्रकाशे दीततिमाय
| अथ शक्तिधरः स्कन्दो दृष्टा तौ पार्वतीशिवौ ॥ अवर्ह्य रथात्तूर्णं शिरसा प्रणनाम ह ॥२७ ॥ उपगुह्य शिवः रीत्या कुमारं
& सूरि शंकरः ॥ जघ्रौ प्रेम्णा परमेशानः प्रसन्नः स्नेहकतंकः ॥ २८ ॥ उपणुद्य यु तन पावती जातसंभ्रमा ॥ प्रस्तुतं पाययामास
ठ स्तनं स्नेहपरिष्ठता ॥ २९ ॥ तदा नीराजितो देवेस्कत्रुदान्वितंः ॥ जयशब्देन महता व्याप्तमासीत्रभस्तलम् ॥ ३० ॥
ऋषयो ब्रह्मघोषेण गतेनैव च गायकाः ॥ वायैश्च बहवस्तञनोपतस्थुश्च मारकम् ॥ ३१ ॥ स्वर्मकमारोप्य तवा महेशः
५ ` कुमारकं तं परभया सशरुञ्ज्वल् ॥ बभौ मवानीपतिरेव् साक्षाच्दियाऽन्वितः पुत्रवतां वरिष्ठः ॥ ३२ ॥ कमारःस्वगणेः साद
माजगाम रशिवाख्यम् ॥ शिवाज्ञया महोत्सादैस्सह देवर्महा्सी ॥ ३३ ॥ दंपती तौ तदा ततरैकपद्येन विरेजतुः ॥ विवय
४ मानावृषिभिराघृतौ सुरसत्तमैः ॥ ३७ ॥ कुमारः कोडयामासं शिवोत्संगे शदान्वितः ॥ वासुकिं शिवकंटस्थं पाणिभ्यां सम
पीडयत् ॥ ३९ ॥ प्रहस्य भगवाजशंयुश्शशंसमिरिजां तदा ॥ निरीक्ष्य कृषया दृष्टया कृषाटुर्टीख्याृतिम् ॥ ३६ ॥
९.१. ९ || | कुमारको महादेवजी अपनी गोदीमे बेढाकर उस्न समय भवानीपति महा शोभा भाप हौ सब एववार्ोमं शष्ठ हूए ॥ ३२ ॥ अपने गणोके
क .सं.४ || || साथ शिवजीके मेदिरमं गये, शिवकी आज्ञासे देवतादि सने ही महोत्सव किये ॥ ३३ ॥ शिवा ओर शिव दोनोँही उस समय
+ प्रमशोभाको प्राप्त हूए, ओर देवता ओर मेष्ठ ऋषिं उस समय शिवा शिषको पेरकर उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३४ ॥ कुमार प्रेमे
अ 6 भ क क क भ्त म किक भ
५ शिवजीकी गोदीमं खेठने कगे, शिवके कंठमे टिपर हए वासुकी नागको अपने हाथसे पीडित करने ल्गे ॥ ३५ ॥ यह बात देखकर छपाटु
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| अनेकं टीठाके स्थान देव कपादष्टिसे देख हंसकर पावती कुमारकी यह बात कहने खगे ॥ ३६. ॥ उप्र समय _ भगवान् शक्रन |
मुस्काते हए गिरिजासमेत प्रम आनन्द भाना ओर वह जगत्के एक बंधु प्ेमसे गदगदकंड होकर आनंदसे कुछ न बोटे वह सव सवं उयापक
सब भुवनोके एक ही स्वामी है, भरण पोषण करती है ॥ ३७॥ तब जगतपति भगवान् शंकरने टौकिक छीङाकै निमित्त मनोहर रत्नोके |
सनम कुमारको बढाया ॥३८॥ सव तीथं आये हए जरोको वेदमेत्रोसे पवित्र करके सौ रत्नोकि धटोते कारतंकेयको स्ञान कराया ओर बडी
भसनत मानी ॥ ३९॥ अच्छे सार रत्नो निर्भित किरीट ओर सकुट तथा बाजबंद, वैजयन्तीमाला ओर अपना चक्र हरिने कुमारको दिया
मंद्स्मितेन च तदा भगवान्महेशः प्रापो सरी च प्रमां गिरिजासमेतः ब्
वनेकभत्ता॥ २७ ॥ अथ शथुजंगन्नाथो डौ लोकिकवृत्तवान्॥ रत्नसिंहासने रम्य वासयामास का्तिकम्॥२ <॥वेदमंजाभिपू
तेश्च सवेतीर्थोदपूणकेः ॥ सदरनकुंभशतकेःस्ञापयामास तं खदा ॥ ३९॥ सद्रत्नसाररवितकिरौटश्ङरांगदम्॥ वैजयन्तीं स्व
मालां च तस्मे चकं पदौ हरिः ॥४०॥ शरं पिनाकं परशं शक्ति पाडपत शरम् ॥ संहाराश्चं च परमां विद्यां तस्मे ददौ शिवः
॥९३॥ अदामहं यज्सूच वेदा वेदमातरम् ॥ कमण्डलं च बर्मा विया चैवाऽरिमदिनीम् ॥ ४२॥ गजेन्द्रं चैव व्रं च द्दौ
तस्मे सुरेश्वरः ॥ श्वेतच्छनं रत्नमाला ददौ वस्तुं जलेश्वरः॥४३॥मनोयायिरथ सू्यस्सत्नाहे च महाचयम् ॥ यमदंड यमभैव
खषाङ्कभं स॒धानिधिः ॥४४॥ हुताशनो ददौ प्रीत्या महाशक्ति स्वसूनवे ॥ ददौ ₹
श्चं निक्रतिर्वायभ्यान्चं समीरणः ॥ ४८ ॥
॥ ४० ॥ शूक) पिनाकं, फरशा, शक्ति, पाशुपत, बाण संहाराञ्च ओौर प्रभ विषा शंकरने कुमारको
वेदमाता गायत्री, कमठ, बहयाच्च ओर शृत
दी ॥ ४१ ॥ भने यज्ञोपवीत, बेद ओर
वुनाशिनी किया भदान कौ ॥४२॥ इन्द्रे कुमारक निमिनवज ओौर गजेन्द्र दिया, स्वेतछच रत्नमाला
ओर दूसरी वसतुएं वरुणजीने दी ॥४३॥ स॒यने मनक समान वेगगामी एक रथ ओर एक बरूतर दिया यमने यमदंड ओर घुधानिभि सखे
भगूृतका घट दिया ॥ ४१ ॥ अशरिे भसन होकर अपने प्रको महाशक्ति दान की, निकतिने अपना शक्च ओौर प्वनने वाय्याञ्च दिया ॥४५॥
१४२
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॥ परम्णास् गद्रदगिरो जगदेकेधु्नोवा च किंचन विभ
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कुबेरे गदा ओर हशने भसन्न हो शूक दिया, इसी भरकर दूसरे देवतोओंने अनेक शच ओर भेरेदी ॥५६॥ भरन हो कामदेवने कामाच्च दिया, ट
अनर दिये, हिमाख्यने भी दिव्यभूषण ओर वद्ध दिये ॥
गदा तथा अपनी विया परम प्रसन्न होकर दी ॥४७॥ क्षीरसागरने अमूल्य रत्न तथा रत्नोके भूषण अरव
॥ ४ ८॥ गरुडने चित्रवहंण नामवाला अपना एत्र दिया. अरुणने ताग्रच्रूड नामवाला दी बट्वान् चरणा युध दिया ॥४९॥ पावतीने परम देश्वयं युक्तं
अपने पुत्रको देखा, ओौर महामरमसेउस्षको चिरंजीवित्व दिया ॥५०॥ लक्ष्मीने दिष्य सम्पत् ओर मनोहर महाहार दिया, ओर सावित्रीने परमते ठ
ट
¢ गदां ददौ वेर श्ुलमीशो ददौ खदा ॥ नानाशब्चाण्युपायांश्च स्वे देवा दद्दा ॥ ४६ ॥ कामां कामदेवोऽथ ददौ तस्मे ||
|| सुदान्वितः ॥ गदां ददौ स्वविद्याश्च तस्मे च परया खदा ॥ ४७॥ क्षीरोदोऽमूर्यरत्नानि विशिष्टं रत्ननूपुरम्॥ हिमालयो हि ्
ट
ह
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शिर पुण है
॥२४४।
|
॥ ७९ ॥ पार्वतीं सस्मिता इष्टा प्रमेश्वरयश्ुत्तमम् ॥ ददौ तस्मे अहा प्रीत्या चिरेजीवित्वमेव च ॥ ५० ॥ रश्ष्मीश्च सपदं
दिन्यां महाहारं मनोहरम् ॥ साविभी सिद्धविद्यां च समस्तां परददौ शुदा ॥ ५१ ॥ अन्याश्चापि ञुने देव्यो यायास्तत्र समा
गताः ॥ स्वात्मवत्सुददुस्तस्वे तथव शिष्ुषाछिकाः ॥ ५२ ॥ महामहोत्सवस्तच बभूव ुनिसत्तम ॥ सवे प्रसन्नतां याता ।
दिव्यानि भूषणान्य॑ज्चुकानि च ॥ ७८ ॥ चिघबररेणनामानं स्वपुरं गङ्डो ददौ ॥ अश्णस्ता्रचडाख्यं बलिनं चरणायुधम्
५
ट विशेषाच शिवाशिवौ॥ ५३ ॥ एतस्म्ेतरे काटे प्रोवाच प्रहसन् शरदा ॥ शुने ब्रह्मादिकान् देवान् रुद्रो भगैः परतापान्
रु०्स.२ ६|| ॥५४॥ शिव उवाच ॥ ३ दरे हे विषे देवास्सवें श्रृणुत सद्रचः ॥ ॥ सर्वथाहं प्रसन्नोस्मि वरान्वृणुत टेच्छिकान् ॥ 4 ॥ ¢
कु.खं४ ८ म्पुणे सिद्धिविया प्रदानकी ॥५१ । हे सने ! ओर प्री जो देविये धीतिसे वहां आई थी, बाठककी पानके निमित्त यथा शक्ति सवने दिया ५
अ ||| ॥ ५२ ॥ हे नि ष्ठ ! उस समय वहां महामहोत्सव हभ, ओर सव भसन हृए विशेषकर शिव पार्वती भन्न इई ॥ ५३॥ हे छने ! ||
| & || उसी सम महाभतापी रद्र परमस हते दए नह्ादि सन देवताओं कहने कये ॥५४॥ शिवजी नटे ह हरे ¡ हे विधातः ! सव देवताओ भेरा |
४
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सुनो मेँ सर्वथा भसन्न हं तुम मन इच्छित वर मांगो ॥ ५५ ॥ ब्रह्माजी बोरे शिवजी यह वचन सुनकर सव विष्ण आदिं |
सब कोई भसनन होकर पशुपतिते बोठे ॥ ५६ ॥ हे भमो ! तारकासुरको यह कुमार वध करं उसी निमित्त यह चरित्र हुभा है ॥ ५७ ॥
इस कारण उसी समय हम तारकासुरके वेधके निमित्त गमन करेगे, आप कुमारको आज्ञा दे किं यह उस्तको मारकर हमारा मग
कर ॥ ५८ ॥ ब्रह्माजी बे देवताओंके यह वचन सुनकर विभुने परम कूपासे देवता ओंकी प्रीतिके निमित्त कुमारको तारकासुरके वधक
निमित्त आज्ञा दी ॥ ५२ ॥ शिवकी आज्ञासे तहा, विष्ण आदि सव देवता कुमारको आगे करके पर्वते सब चरे ॥ ६० ॥ कैलासे
॥ ब्रह्मोवाच ॥ तच्छत्वा वचनं शंभो्नेषिष्ण्वादयस्सुराः ॥ सवे रोः प्रसन्नास्या देवं पडुपति प्रथम् ॥ 48 ॥ $मारेण हतो
द्यष तारको भविता प्रभो ॥ तदर्थमेव सजातमिदं चरितसुत्तमम् ॥ «७ ॥ तस्मादुद्ैव यास्यामस्तारकं दन्तुभुयताः.॥ आज्ञां
दि कुमाराय स तं रतं सुखाय नः ॥ ५८ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तथेति मत्वा स बिथुदैत्तवांस्तनयं तदा ॥ देवेभ्यस्तारकं दत
कृपया परिभावितः ॥ ५९ ॥ शिवाज्ञया सुरास्सवें ब्रह्मविष्णुसुखास्तदा ॥ पुरस्कृत्य गुह सयो निजंगमिंलिता गिरेः ॥६०॥
वहिनिंस्सृत्य केलासात््वष्टा शासनतो हरेः ॥ विरेचे नगरं रम्यमद्धतं निकटे गिरेः ॥ &१ ॥ तत्र रम्यं गहं दिव्यमद्ुतं परमो
ञ्ञ्वलम् ॥ शहा निम् त्वष्टा त्र सिदासनं वरम् ॥६२॥ तदा हरिस्षुधीक्त्या कारयामास भेगलस् ॥ का्तिकस्यामिषकं
ं
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प हि सर्वैती्थजलेस्सुरेः ॥ ६३ ॥ सर्वथा समटकृत्य वासयामास संब्रहम् ॥ कात्तिकस्य विधि प्रीत्या कारयामास ¢
ह चोत्सवम् ॥ &४ ॥ ॥ ब्राह्मांडाधिपतित्वं हि ददौ तस्म खुदा दरिः ॥ चकार तिखकं तस्य समानर्च सुरस्सह ॥ &« ॥ &
ह बाहर होकर व्ष्टाने विष्णकी आज्ञासे पर्वतके निकटही एक बहुत भनोहर नगर रचा ॥ ६१ ॥ उसमे एक बडा मनोहर अत्यन्त रमणीक ४
ट प्रम अद्भुत अधिकं निर्म महर कुमारके निभित्त बनाया ओर उस्म एकं प्रम अद्भुत सिंहासन भी विछाया ॥ ६२ ॥ तब बुद्धिमान्
ट हरिने परम प्रमे उसमे मंगर करवाये ओर देवताओकै सहित सब तीर्थोकै जरते वहां कुमारका अभिषेक किया ॥ ६३ ॥ ओर सव प्रकार ६
^.-9॥ ते अकृत कर वहां उनको निवासत कराया ओर कारतिंककी विधिसे भमपुवेक उत्सव कराया ॥ ६४ ॥ ओर हरिन परमस उनको बह्ाण्डका ।
शः.
अधिपतित्व दिया, ओर तिक करक देवताओं सहित उनकी पूजा की ॥ ६५ ॥ पीछे सव देवता ऋषिर्योकै सहित भमत कुमार्
कर उन सनातन शिवहपको अनेक स्तो्ोपे पसनन किया ॥ ६६ ॥ ओष्ठ सिंहासन पर स्थित हो कार्तिकेय बडे शोभित हए, ओर ब्रहम
ण्डके पाठकरपमे स्वाभिभावको प्राप्त हुए ॥ ६७ ॥ इति श्रीशिवमहाषराणभाषायां ₹° च° कुमारोभिषेकवणेनो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५॥
ब्रह्माजी गोले, है नारदजी ! तब कार्तिकेयने वहां सतिकाको दिखाया उक्ष भक्तिदायिनी कथाको आप प्रेमे सुनो ॥ १ ॥ उसी समय
एकं नारद नामक बाह्मण वहां आया, वह यज्ञका करनेवाला था श्रीमान् कुमारकी शरण आकर प्राप्त हुमा ॥ २ ॥ वह प्रस्न्नमन ब्राह्मण
प्रणम्य कार्तिकं प्रीत्या सर्वदेवर्षिमिस्सइ ॥ तष्टाय विविधस्स्तोतरैः शिवरूपं सनातनम्॥६६॥व्रसिहासनस्थो रि शुद्भेऽतीव
को प्रणाम ||
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कात्तिकः ॥ स्वामिभावं समापन्नो ब्रह्मांडस्यासि पारकः॥ ६७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसंहितायां चतुथं ४
ध
४
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शि ७पुऽ
॥३४५।
#1
कुमारखण्डे कुमाराभिषेकवर्णनं नाम पंचमोऽध्यायः ॥५॥ ॥ ब्रह्लोवाच ॥ अथ त्र स गाँगेयो दशयामास सुतिकाम् ॥ तामेव
शृण सुप्रीत्या नारद त्वं स्वभक्तिदाम् ॥१॥ द्विज एको नारदाख्य आजगाम तदैवं हि ॥ तवाध्वरकरः श्रीमान्शरणाथ गुहस्य
वे ॥ २॥ स॒ विप्रः प्राप्य निकटं काततिकस्य प्रसत्रधीः॥ स्वामिधराय समाचख्यौ सुप्रणम्य शुभः स्तवैः ॥ ३॥ ॥ विग्र उवाच
॥ श्रृणु स्वामिन्वचो मेध् कष्टं मे विनिवारय ॥ सरव्ह्मांडनाथस्त्वमतस्ते शरणं गतः॥४॥अजमेधाध्वरेकतमारंभं कृतवानहम्
सौऽजो गतो गृहान्मे हिओोटयित्वा स्वबधनभ्॥ ५ ॥ न जाने स गतः कत्राऽन्वेषणं तत्कृतं बह ॥ न प्रा्तोऽतस्स बलान् भगो
भवति मे कतोः ॥ & ॥ त्वयि नाथे सतिविभो यज्ञ्भगः कथ भवेत् ॥ विचार््थैवाऽखिरेशान काम परण कु्ष् मे ॥ ७॥
कातिकैयके निकट पराप्त होकर प्रणामकर सुन्दर स्तोोति स्तुतिकर अपना अभिप्रायः कहने ठगा ॥ ३ ॥ ब्राह्मण बोढा हं स्वामिन ! मेरे +
वचन् सुनकर मेरा कष्ट निवारण करो, तुम सब बरह्ाण्डके स्वामी हो, इस कारण मै तुम्हारी शरण हूं ॥ ४ ॥ मेने अजमेधं यज्ञका आरंभ
|| किया है बह अज् वधन तोडकर भरे रसे चला गया ॥ ५॥ न जाने वह कां -गया भने उत्ते बहुत खोजा परन्तु वह वलवान् न मिला इस १
कारण भेरा यज्ञ भग होताहै॥ ६ ॥ ह विभो ! आप स्वामीकै रहते मेरा यज्ञ किस प्रकार भेग हो सकता है हे सवके अधिपति । यह ¢ |
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| मेरी कामना पूरणं करो ॥ ७ ॥ हे प्रभो ! ह शिबषुत्र ! आपको छोडकर मेँ किसकी शरण जाऊ आप् सव ब्रह्माण्डके स्वामी |
| देवता तुम्हारी सेवा करते है॥ ८ ॥ हे दीनवंधु ! हे दयासिन्धु ! हे भक्तवत्सल ! आप तो सब प्रकार सेवक योग्य है हे परमेश्वर !
आपकी तो हरि ब्रह्मादि देवता स्तुति करते है ॥ ९ ॥ आप पावती नन्दन स्कन्द परम एक ओर परम तप हो आप परमात्मा आतज्ञानकै
देनेवाठे स्वामी शरणागतरक्षक हो ॥ १० ॥ हे दीनानाथ ! हे महेश ! है हे शंकरके एत्र ! हे तरिटोकीनाथ ! प्रभो मायाके अधिपति ! हे
। प्रिय । मै आपकी शरण आया हूं, आप मेरी रक्षा कीजिये, तुम सवके स्वामी हो, सब बह्मादि देवता तुमको प्रणाम ओर स्तुति करते है
¢ त्वां विहाय शरण्य कं यायांशिवसुत प्रभो ॥ सर्वब्रह्मांडनाथ दिस ्वामरसुसेवितम्॥ ८॥दीनंघुर्दयासिन्धुस्सुसेव्या भक्तवत्सलः॥
दरिव्रह्मादिदेवेश्च सुस्तुतः परमेश्वरः ॥९॥ पावेतीनन्दनर्स्कन्दः परमेकः परंतपः॥ परमात्माऽत्मदस्स्वामी सतां च शरणाथिनाम्
॥ १० ॥ दीनानाथ महेश शंकरस॒ुत अेरोक्यनाथ प्रभो मायाधीश समागतोऽस्मि शरणं मां पाहि विप्रपिय ॥ त्वं सर्वपरथुभियः
खिरविदय्रह्मादिदेवेस्त॒तस्त्वं मायाकृतिरात्मभक्तसुखदो रक्षापरो मायिकः॥११॥ भक्तप्राणशणाकरक्िशणतो भिन्नोसि शंभुप्रियः
शंभुःशंथुस॒तःप्रसन्नखुखदस्सञित्स्वरूपोमहान्॥ सर्वज्ञन्रिषरष्नशंकरसुतः सत्मेमवश्यस्सदाषडवक्रःभियसाधुरानतमियस्स्ैश्वर
श्शंकरः ॥ साधुद्रोदकरष्न शंकरश॒रो बरह्मांडनाथो परथुः सवंषाममरादिसेवितषदो भां पाहि सेवाभ्रियं ॥ १२ ॥ वैरिभ्यकर शंकर
जनशरणस्य वन्दे तव पदप सुखकरणस्य ॥ विज्ञपि मम कणं स्कन्द निधेहि निजभक्तिं जनचेतसि सदा विधेहि ॥ १३ ॥
तुम मायासे अवतार ठेते अपने मक्तोको सुख देते रक्षाम तत्पर तथा मायावाडे हो ॥ ११ ॥ आप भक्तोके पराण ग॒णोके आगर तीनों
यणि भिन्न शिबजीकै प्यारे कल्याण मय शिवजीके उच भसन सुखदायक सत् चित्प महानु हो, सर्वज्ञ तिषुरघाती शंकरके एव हो, सदा
|| सलेमके वशम हो, षण्डलवाे साधुओक प्यारे भणतोके पाठक, सर्वेश्वर, कल्याणकारी, साधुओसे दोह करनेवाठेको मारनेवाछे शंकर आपके
गुरु है, बरहमण्डके नाथ प्रभु आपके चरणोंकी सब देवता सेवा करते है हे सेवाभिय ! भेरी रक्षा करो ॥ १२ ॥ वैरिोको भय देने वाटे
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शि०० ||>४|| मक्तोके कल्याण करने वारे शरणसुखद सुखकारी आपके चरणकमलोको भै णाम करता हूं ह सकन्द ! भेरी भाथनाप्र आप् कान करो म
& विततम सदा अपनी भक्ति दो ॥ १३ ॥ बी शतु उका क्या कर सकते है वहं ॒दक्ष होकर भी दोनों पाश्वं ( ओर ) से रक्षित हौ सकता
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॥३४६॥ || > 1
एः ¢ है तक्षकवा आमिष भक्षी उक्तका कया कर सकते ई चपुरोति माननीय आप जिसके रक है ॥ १४॥ ह देव ! दवयुर बृहस्पति भी आपका |©
् सतुति करणम समर्थं नहीं है, सो कहिये मेँ मंदुद्धि आपकी क्या स्तुति कलं बडाई ¶ूजा के पवित्र अपक्ति अनाय जा कुछ भी ह, ६ ||
६ स्कन्द् ! आपके चरणकममख्के परागकी प्रार्थना करता हूं ॥ १५ ॥ हे सवके इश्वर ! हं भक्तोके ऊपर छपा करनेवाठे 1 है दयासिन्धु ! म् 7
¢ करोति किं तस्य बली विपक्षोदक्षोऽपि पक्षोभयापारश्वश्तः ॥ किन्तक्षकोप्यामिषभक्षको वा त्वं रक्षका चस्य सदक्षमानः ¢
॥ १४ ॥ विद्ुषशूरपि त्वां स्तोतुमीशो न हि स्यात्कथय कथमदं स्यां भदडद्धर्वाच्यः॥ शुचिरशुचिरनार्या याहशस्तादशो ८
वा पद्कमल परागं स्कन्द ते प्राथयामि ॥ १५॥ हे सवे्वर भक्तेवत्सङ कषासिन्धो त्वदीयोऽस्म्यहं भत्यस्सस्य न सेव ||
कस्य गणपूस्याऽऽ गश्शतं सत्रमो ॥ भर्ति कापि कृतां मनागपि विभो जानासि भृत्यातिंहा सत्तो नास्त्यपरोऽविता न |
| मेगवन् मत्तो नरः पामरः ॥ १६ ॥ कल्याणकत्ता कृणिकिल्मषध्नः कुबेरबन्धुः करणादचित्तः ॥ त्रिष्टूकनेओ रसवक्रशोभी ||
¢| यज्ञ पपी कर मे श त्वम् ॥ 3७ ॥ रक्षक्तवं त्रिकस्य शरणागतवत्सलः ॥ यज्ञकततौ यज्ञभन्तौ हरसे विध्नकारिणाम् ||
¢ ॥ १८ ॥ विष्नवारण साधूनां सगं कारण सर्वतः ॥ परण कुक् समरेशानसुत यज्ञ नमोस्तु ते ॥ १९ ॥ त
सन.२ ||) म्हारा दास् ह हे प्रभो ! 4 गणोकि प्रति हो अपने सेवकके अपृराध मत मिनो हे भृतक दुःख दूर करनेवारे ! आप जानते हो किं ¢
ङव.४ || मैने कभी आपकी भक्ति नहीं की, हे भगवन् ! आपके बराबर तो कोई रक्षक नहीं है, ओर मेरे बरावर कोई पामर नही है ॥ १६ ॥ #
# आप कल्याणक करनेवाछे किक पाप नाश करनेवाठे कुबेरके बन्धु, दयामय चित्रवारे अढारह ने्रवाठे छःखखवाटे हो, `हे देव ! आप ॥4
१९०९६ | ६ मेरा सक्ञ पूणं कीजिये ॥ १७ ॥ ह शरणागतवत्सक | आप त्रिलोकीकै रक्षक हो आप यज्ञै कत्त यज्ञके भक्तां विध्रके करनेवाठोको |
| हनेवाछे हो ॥ १८ ॥ आप साधुजनके विघ्र निवारण करनेवाठे हो, सवी सृष्िके करनेवाटे हो, हे महेशान ¡ आप मेरा यज्ञ पूरण ||६॥
| आपको नमस्कार है ॥ १९ ॥ है सबके रक्षक स्कन्द् ! तुम सवके ज्ञाता हो आप सबके ईश्वर ईशःन सबके रक्षक हो ॥ २० ॥ ्
संगीतके जाननेवाठे वेदके ज्ञाता प्रम भ्रमु हो, आप् सबकी स्थिति ओौर विधान करनेवाठे देवदेव सत्परुषोकी गति हो ॥२१॥ भवानीनन्दन
शिवजीके पुत्र वयुन ( प्रज्ञानघन ) स्वराट् अपने तेजसे आपही विराजमान हो आपहौ ध्यान करनेवाठे आपही ध्यानयोग्य, पितरोके पिता
सदात्मा महात्माओंके कारण हो ॥ २२॥ ब्रह्ाजी बोटे हे देवसम्रार् शिव नीके ए इस भ्रकारसे बाह्मणके वचन सुनकर वीरबाहू नामक
अपने गणको इसके निमित्त भेजा ॥ २३ ॥ उनको आज्ञासे वीरबाहू उस्तकी खोजके निभित्त इच्छा करकं स्वामीको भ्रणाम कर
सवेजाता स्कन्द् दि त्वं सर्वज्ञाता त्वमेव् दि॥ सवश्वरस्त्वमीशानो निवेशसकलाऽवनः ॥ २० ॥ सगीतज्ञस्त्वमेवासि वेदविज्ञः
परः प्रथुः ॥ सवेस्थाता विधाता त्वं देवदेवस्सतां गतिः ॥ २१ ॥ भवानीनन्दनश्शंमुतनयो वयुनः स्वराट् ॥ ध्याता ध्येयः
पिनृणां हि पिता योनिः सदात्मनाम्॥ २२ ॥ ॥ शरह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य देवसभ्राट शिवात्मजः ॥ स्वगणं वीरबा
हार्य प्रेषयामास तत्कृते ॥ २३॥ तदाज्ञया वीरबाहुस्तदन्वेषणदेतवे ॥ प्रणम्य स्वामिने भक्त्या महावीरो दवतं ययौ
॥ २७ ॥ अन्वेषणं चकारासौ सर्त्रह्माण्डगोखके ॥ न भराप तमजं ऊच शश्राव तदुपद्रवम् ॥ २५ ॥ जगामाऽथ स वैङठं
तजाऽजं पददशं तम् ॥ उपद्रवे प्रवन्त गखयूपं महाबलम् ॥ २६ ॥ धृत्वा तं -शृंगयोर्वीयो धर्षयित्वातिवगतः ॥ आनिनाय
स्वामिपुरो विद्धेते रवं बहु ॥२७॥ दृष्टा तं॑कातिकस्सोऽरमारूरोह स तं भ्रुः ॥ धत्रह्माण्डगरिमा महासूतिकरो गुहः
॥ २८ ॥ सुहूतंमाजतस्सोऽजो ब्रह्मांडं सकलं छने ॥ बभ्राम श्रम एवाञ्चु पुनस्तत्स्थानमागतः ॥ २९ ॥
वह महावीर शीधरतासे चछा ॥ २४ ॥ उस्ने सव बह्ाण्ड भरे उसकी खोज कौ परन्तु उस अजको कहीं भी नहीं प्राया प्र उका
उपद्रव पुना ॥ २५ ॥ तव वैकुण्डपे जाकर उस्र अजको देखा जहां गर्यूष
उसको देखा किं उसके सींगोको पकडकर बडे वेगसे शञ्द करते हुए उसे अपने स्वा
कार्तिकेय जगत्पाखकं बज्ञाण्डका बोञ्च टेकर उसके ऊपर च वेढे ॥ २८ ।
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महावर उपद्रवे करते थे ॥ २६ ॥ उस्र ॒बीरने ज्योँही
मीके पास छे आया ॥ २७ ॥ उरे देखतेही भगवानु
गः । वहं अज सुहूतंमात्रमे सव बल्याण्डमे परमण कर भषको
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॥३४.७॥
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भप्त हो फिर उसी स्थानम आकर भ्रा हुभा ॥ २९ ॥ तव् वह स्वामी
हे नारद ! तुमने उससे कहा ॥ ३० ॥ नारदजी बोछे हे देवदेवेश 1 आ ॥
करेगे, आप हमसे सखाभाव करिये ॥ ३१ ॥ कारिक बोठे हे विप्र ! यहं अज वधकं
तुम्हारा यज्ञ पुणे होगा, मँ भरस्नतासे यह वर देता हं ॥
अपने स्थानको चला गया ॥ ३३ ॥ इति भीशिवमहाएराणे रुद्र्षंहितान त
तत उत्तीयं स स्वामी सश्वास स्वमासनम्॥ सोऽजः स्थितस्तु तत्रैव स नारदं उवाच् तस् ॥३०॥ ॥ नारदं उवाच् ॥ नमस्त द्व्
देवेश देहि मेऽजं कृषानिघे॥कुर्यामध्वरमानन्दात्सखायं कुङ् मामहो॥३१॥॥ कात्तिक उवाच ॥ वधयोग्यो न विप्राऽजःस्वगं
गच्छ नारद ॥ पूर्णोऽस्तु तेऽध्वरस्सवः प्रसादादेव मे कृतः॥३२॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण््ं द्विजस्स्वामी वचनं प्रीतमानसः॥जगाम
स्वाखयं दृत्त्वा तस्मा आशिषशुत्तमाम्॥३३॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसंहितायां चतुथ कमार कुमाराऽद्भुतचरि
तवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ हर््यादयस्सुरास्ते च दष्ा त्रितं विभोः ॥ सुप्रसत्नाबभूबुहिं विश्वासासक्तमा
नसाः ॥१॥ वल्गतः कुर्वतो नादं भाविताश्शिवतेजसा ॥ कुमारन्ते पुरस्कृत्य तारकं इंतुमायगुः ॥ २ ॥ देवानारुद्यमं धत्वा तार
कोऽपि महाबलः सैन्येन महता स्यो ययौ योद्धु सुरान् भरति ॥२॥ देवा ष्ठा समायातं तारकस्य महाबलम्॥बलेन बहुकु्वन्तः
पिहनादं विसिस्मियुः ॥९॥ तदा नभोऽऽद्गना वाणीं जगादोपरि सत्वरम् ॥ शङ्करपेरिता सद्यो हयांदीनखिलान् सुरान् ॥५॥
बोढे षे हरि आदि देवता उन विके इत भकार चरि देखकर विश्वासभे मन ॒ठगनेकै कारण बडे प्रसृ्न हए ॥ १ ॥ ताछ ठोककर
अ०७ सिंहनाद करने छगे शिवजीके प्रम॒तेजते भावित हो कुमारको आगे कर तारक अशुरके भारनेको चटे ॥ २ ॥ महाबली तारकासुर
| | भी देवताओंका उयोग सुनकर बडी सेना ठेकर देवताओंसे युद्ध करनेके निमित्त गमन किया ॥ ३॥ जव. देवताओं तारक अ्ुरकी
‰१॥ महासेनाको आता हुआ देखा तव बलम बड़ा सिंहनादकर दैत्योंको विस्मित कर दिया ॥ ४ ॥ तब उस्च समग्र आकाशवाणी हई वह शिवजीकी
उसत्े उतरकर अपने आसन प्र वेढे वह अज वहीं स्थित रहा
पको प्रणाम है, हे कपानिषे ! यह सञ्च दीजिये, हम आनन्दे यज्ञ
योग्य नहीं है, हे नारदजी | आप अपने घर जाये
३२ ॥ बह्लाजी बोटे यह वचन सुन वह द्विज स्वामी परमते आशीवीद् देकर
त्त चतुं° कुमारखण्डे भाषारीकायां षष्ठोऽध्यायः ॥ £ ॥ बह्लाजी
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| हरि आदिं सव देवता्ओंको कहने र्गी ॥ ५ ॥ आकाशवाणी बोी हे देवताओ ! इस कुमारको आगे करके तुम सब संग्राम | |
दैत्योको जीतकर विजयी होगे ॥ ६ ॥ बह्माजी बोठे सरव देवता आकाशवाणी सुन बडी उत्ंढासे वीरशब्द करते हृए निभंय हो गये ॥ ७ ॥ ||
वेगको भाप्त हो वे सब देवता कुमारको आगे करके युद्धकी इच्छसे पृथिवी स्लागरके संगमे युद्धकी इच्छासे स्थित हए ॥<॥ उसी समय बडी भारी ठ
देत्योंकी सेना साथमे ठेकर वह तारक अभर वहां पराप्त हुआ जहां अन्य सब देवता थे ॥ ९ ॥ १० ॥ तारक दैत्यके साथ सब असुर गजँ उधर देवता ठ
॥ व्योमवाण्युवाच ॥ कुमारं च पुरस्कृत्य सुरा यूयं सञ्यताः ॥ दैत्यान् विजित्य संगमे जयिनोऽथं भविष्यथ ॥ & ॥ ठ
॥ ब्रह्मोवाच ॥ वाचं तु खेचरी त्वा देवास्सवें सघुत्स॒काः ॥ वीरशब्दान् प्रकुर्वतो निर्भया द्यभवंस्तदा ॥ ७ ॥ कमार च ठ
पुरस्कृत्य सवे ते जात साध्वसाः ॥ योद्धुकामास्सरा जग्बुर्मदीसागरसगमम् ॥ ८ ॥ आजगाम दंत तजन यज देवास्स
तारकः ॥ सेन्येन महता साद सुरे बहभिराबृतः ॥ ९ ॥ रणदुदुभयो नेदुः प्रल्यांडुदनिस्स्वनाः ॥ ककशानि च वायानि ट
पराणि च तदागमे ॥१०॥ गजमानास्तदा दैत्यास्तारकेणसुरेणह ॥ कंपयन्तो युवं पाद्क्रमर्वस्युनकारकाः ॥ ११॥ तच्छत्वा ५
रवमत्यु्र सवं देवा विनिभयाः ॥ एेकपयेन चो त्त्थुरयोद्धुकामा्च तारकम् ॥ १२॥ गजमारोप्य देवेन्द्रः कभारं द्यमतोऽ ||&
भवत् ॥ सुरसेन्येन महता रोकपाटेस्समावृतः ॥ १३॥ तदाडुदुभयो नेदुर्भरीतूर्ाण्यनेकशः ॥ वीणावेणरदंगानि तथा 6
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गंधर्वनिस्स्वनाः ॥ १४ ॥ गजं दत्त्वा महेन्द्राय कमारो यानमाक् हत् ॥ अनेकाश्वर्यसंभूतं नानारत्नसमन्वितम् ॥ १५ ॥
भी गजेने कगे, ओर चरणोकि निक्षेप तथा जंघादिके ताडने प्ृरथिवीको कंपित करने कगे ॥ ११ ॥ वह शञ्द सुनकर भी सत्र देवता निर्भय रहे,
ओर एक साथही तारक असुरे युद्ध करनेको सन्न होगये ॥ १२ ॥ स्वयं इन्द्र कुमारको हाथीपर चढाकर आभे आगे इए, उस समय उनके
साथ महान् देवताओंकी सेना तथा छोकपा थे ॥ १३ ॥ उस समय अनेक भकारसे दुदुभी तथा भरी वीणा वैण मृदंग बजने रगे ओर गंधर्व
ई गाने छ्गे ॥ १४ ॥ तब कुमार वह हाथी इनद्रको देकर आप अनेक आश्वं देनेवाडे नाना रतो जटित दूरे यानपर सवार हुए ॥ १५॥
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॥३४८॥
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तब वह महायशसती विमानके ऊपर चदकर शिवजीके सव याणे युक्त होकर परम लकषमीसे वह महानु परण शोभाको प्रात होकर महाकान्तिवाठ ||
चामरोके दोरनेसे शोभाको भात होते हये ॥१६॥ प्रचेता सम्बन्धी छत्र बडी कान्तिवाटा अनेक रल्नोसे विराजमान था, जिसमे चन्द्रमासम्बन्धी
अनन्त किरणे निकृ रही थीं बह कुमारक मस्तकपर धारण किया गया ॥१७॥ तव वे इन्द्र आदि सव देवता मिठकर अपनी अपनी सेनाके ४
सहित महावठते ुदधकी कामना करते हृए ॥१८॥ इस भकार देवता ओर दैत्य बडी भारी सेना छेकर महावर युद्ध करनेकी इच्छसे पृथिवीमे 2
विमानमारुह्य तदा महायशास्स शांकरिस्सर्वगणैूपेतः॥ श्रिया समेतः परया बभौ महान् संवीज्यमानअमरेमंदाथभेः॥ १६॥ ¢
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प्राचेतसं छत्रमतीवसुप्रभं रतनरूपेतं विविधेविंराजितम् ॥ धतं तदा तच्च कमारमूधिं वै द्यनन्तचान्द्रः किरणेमंहाप्रभेः ॥ १७ ॥ ¢
मिक्ितास्ते तदा सवे देवाश्शक्रषुरोगमा ॥ स्वैःस्वेवरेः परिवृतायुद्धकामा महाबलाः ॥ १८ ॥ एवं देवाश्च दैत्या योद्धु ||
कामाः स्थिता थुषि ॥ सेन्येन महता तेन व्यहं कृत्वा पृथक् पृथक् ॥ १९ ॥ ते सेने सुरदेत्यानां शुञ्चभाते परस्परम् ॥ ट्
हंतुकामे तदान्योन्यं स्तूयमाने च बन्दिभिः ॥ २० ॥ उमे सेने तदा तेषामगजैतां वनोषमे ॥ भर्यकरेऽत्यवीराणामितरेषां ४ |
+|
घुखावहे ॥ २१ ॥ एतस्मिन्नन्तरे तज बलोन्मत्ताः परस्परम् ॥ दैत्या देवा महावीरा युयुधुः कोधविह्खः ॥ २२॥ आसी ¦
त्सुतुशं युद्धं देवदेत्यसमाङुलम् ॥ शण्डुडांकितं सर्व क्षणेन समपद्यत ॥ २३ ॥ ¢
स्थित हृए ॥ १९ ॥ वह देवता ओर दैत्य दोनोकी सनाय परस्पर बडी शोभाको प्राप्त हू, उस समय बेदीजन स्तुति करने ठे, सेना |
एक दूसरेकै मारनेका उयोग करने ठगी ॥ २० ॥ उश्च समय वह दोनों गर्जने ठगी, जो शब्द कायरोको भयंकर ओर दूसरोको सुखदायक
या ॥ २१ ॥ इसी समय देवता ओर दैत्य दोनोंही प्र्पर कोधित हुए बठमे उन्मत्त हो कोधमे अधीर हो युद्ध करने ठ्गे ॥ २२ ॥ वह
देवता दैत्योका बडा भ्ेकर युद्ध आरम्भ हुआ, क्षणमात्रमे पृथिवी रुढ खंडोसे व्याप्त हो गहं ॥ २३ ॥ । ट
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९ आत्मनेपदमाषंम 1
| बडे बडे योधा क्षणमात्रे सेकडों हजारों पृथिवीप्र गिर गये, ओर महाश्लौके ठगनेसे उनके अंग छिन्न भिन्नं हो गये ॥ २४ |
दारुण खड्गप्रहारसे किंसीकी भुजा छिन्न भिन्न हो गद, किन्हीं मानी वीरोकी उस युद्धम उरु छिन्न भिन्न हो गये ॥ २५ ॥ किन्हीके गदा |
ओर खररोसे सौग छि भिन्न हो गये, किन्हीके पाश ओौर भाते हदय विदीण हो गये, जिससे कह निपतित हृए ॥ २६ ॥ बरक्ियोसे
किन्हीकै पृष्ठभाग विदीणं कर दिये गये कदं ऋषि ओर अंकुश घायल हुए, किन्हीके शिर कटकर पृथिवीम गिर गये ॥ २७ ॥ सेकडों
कवंध जेवा ताडन करते हाथमं शच्च उठाये समर भूमिम वत्य करने कगे ॥ २८ ॥ उस्र प्षमय मसि तथा रुधिरकी नदिये उस्र स्थानम बहने
भूमौ निपतितास्तज शतशोऽथ सदसरशः ॥ निकृत्तांगा मदाशन्चरनिहता वीरसंमताः ॥२९॥ केषांचिद्वाहवश्न्ना खद्ग पतेस्ष॒दा
रुणः ॥ केषाचिद्रूरवशिछन्ना वीराणां मानिनां मृघे॥२८॥केचिन्मयितसवागा गदाभिररेस्तथा ॥ केचितिर्भत्रहदयाः पाशं
छश्च पातिताः ॥२६॥ केचिद्विदारिताः पृष्ठे कंतेकरषटिमिरङशः ॥ चित्नान्यपिशिरास्येव पतितानि च भरते ॥२७॥ बहूनि च
कवधानिनृत्यमानानि तत्वे ॥ वर्गमानानि शतशो उद्यताञ्कराणि च॥२८॥ नद्यः प्रवर्तितास्त शतशोऽ्षङ्षहास्तदा । भ
तादयस्तज शतशओ्च समागताः॥२९॥गोमायवर्शवातच्र भक्षयन्तः पठं बह ॥ तथा गृधवटाश्येना वायसा मांसभक्षकाः॥बुभुलः
पतितानां चपलानि सुबहूनि े।३०॥एतस्मन्नन्तरेतज तारकाख्यो महाबरः॥सेन्येनमहता सयो ययौ योद खरान् प्रति॥३१॥
देवा दृष्टा समायान्तं तारकं युद्धदुमदम् ॥ योद्धुकामं तदासदयो यथुश्शक्रादयस्तदा ॥ बभूवाथ महोत्रादस्सेनयोकूभयोरपि ॥३२॥
ठगी भूत प्रतादिक भी वहां सेकं आगये.॥ २९ ॥ गीदड ओौर गीदड़ी अनेक प्रकारसे भां भक्षण करती हृद, इसी प्रकार ृध पिशाच
श्येन तथा कोए मास॒ भक्षण करनेको वहां आगे, गृतक हूए शरीरो का बहृत्षा भास क्षण करते कगे ॥ ३० ॥ इसी समय महाबी तारक
दैस्यने बडी सेना ठेकर् देवताओंति युद्ध करनेको गमन किया ॥ ३१ ॥ युद
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ाः दुमद तारक देत्यको देवताओंने आया देखा तो इन्द्रादिकं
बता भी उसमे युद्ध करनेको चरे उस समय दोनों सेनाओंभं बडा उष्ठास हम ॥
३२ ॥
१ परस्मेपदमार्षम ॥
शिण्पु° उस समय देवता तथा दैत्योंका नाश करनेवाला वडा युद्ध हुआ, जिसको देखकर वीर् भतन ओर कायर भयभीत हृषु ॥ २२ ॥ |
॥ ३४९ तारक इन्दसे स्रामं करने ठ्गा, अभित सहाद ओर जंभसे स्वयं यमराजका युद्ध होने गा ॥ ३४ ॥ महाभभुका नन्तयकं साथ, | ¢
६ बके साथ, हुवीरका वायुके साथ पवमानका -कुवेरके प्राथ युद्ध आरभ हुआ ॥ ३५ ॥ ईशानकं साथ रणकुशर शंभुका युद्ध होने छ्गा ५
ए शंभका शेषसे, ओर कुम् दानवका चनद्रके साथ संम होने ठगा ॥ ३६ ॥ महाबटी पराक्रमी कुजरका मिहिरके साथ सप्राम होने ठ्गा, ¢
(|| यह हब अनेक युदधोमे विशारद प्रम अच लेकर युद्ध करने कगे ॥ ३७ ॥ इत भकार वे घुर असुर महान् दद्म निथवयपूक सभाम &
६ अथिना सह संह्रादो जंमेनेव यमः स्वयम् ॥ २७॥ मदाप्रभुनैतेन पाशी सह् बखेन च् ॥ सुवीरो वायुना सार्ध पवमानेन गद्य £
६ राट् ॥३५॥ ईशानेन समं शंथुययुधे रणवित्तमः ॥ डुभश्शेषेण युयुधे कुंभश्चन्द्रेण दानवः ॥ ३६ ॥ कुर्बरो भिदिरेणाजौ महाबल ¢
ट| पराक्रमः ॥ युयुध परमा्ञञ्च नानायुद्धविशारदः॥३७॥ एवं द्रन्द्रेन गद्धेन महता च सराराः ॥ सगरे युगुधुस्सवं बलेन कृतनि &
अयाः ॥३८ अन्योन्यं स्पद्धमानास्तेऽमरा देत्या महाबलाः॥ तसिमन्देवासरे शुद्धे द्या अभवन्युने ॥ ३९॥ तदा च तेषां सुर ¢
£ दानानां वधन इलं जयभिणम् ॥ खलाबहंवीरमनसिवनं वै भयावहं चष तथेतरपम् ॥४०॥ मही महारो्तरा ||
विनषटके स्प॒रासुरवे पतितैरनेकशः ॥ तस्मिननगम्यातिभयानका तदा जाता मदासौर्यवहा मनस्विनाम् ॥ ४१ ॥
रु.सं.२ ४ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्रसंहिता्यां चतुर्थे ङुमारखण्डे युद्धपारभव्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥ ट
कु.स.४ || || करने ठगे ॥ ३८ ॥ इस भकार महावृटी देवता ओर दत्य परस्पर स्पध करते हृए, उस देवता अघुरोके युद्धम सर्वथा दैत्य दुर्जर इए |
०७ ||९|| ॥ ३९ ॥ तव उस समय देवता भौर दैयोका महागुड जयके निमित हृभा, जो बीर मनलिियोको शुलदायक ओर कायरोकषो मयदायक हुमा ||
|| ॥ ४० ॥ जव इस् भकारसे अनेक सुर अभर पतित हृष ओर उनके नष्ट होने संामभूमि महामयंकर होई तथा कायरोको बडी भयंकर ||
‰॥ ओर बवीरजनेको महा भसन्न करनेवाटी हू ॥ ४१ ॥ इति श्रीशिवमहाऽराण ₹० च० कु माषाटीकायां सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ ||.
| नारदजी ¡ इस प्रकार आपतते देवता ओर दान्वोकी सेनाका धोर संग्राम वणेन किया अब उनकी उन्नति सुनो ॥१॥ दस प्रकार |
क्षयकारक उस तुर युद्धमं देवेन्द्रको तारकने परम शक्तिसे ताडन किया ॥ २ ॥ इन्द्र शक्तिसे धाय हो तत्का रेरावतसे नीचे परथिवीपर
गिरपडे, ओर वजधारी सुरेश्वरको बडी व्याकुकता आकर भाप हई ॥ ३ ॥ इसी भकार बख्वानु अमुरोने सब ॒ठोकपाठोको महायुद्धकी
कोशरताके कारण परास्त करदिया ॥ ४ ॥ ओर दूसरे देवताभी देत्योे युदधकर पराजित हए, ओौर उनका तेज न सहकर भागने ठगे॥५॥
जयी होकर अमुर गजने रगे ओर सिंहनाद करतेहए कोटाहर करनेटगे ॥ ६ ॥ इसी समय वीरभद्रने महाक्रोधकर वीरगणोे वैष्ित हो
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति ते वणितस्तात देवदानवसेनयोः ॥ संभ्रामस्तुखलोऽतीव तत्परभ्बौ शण॒नारद् ॥ १ ॥ एवं युद्धेऽतितुले
देवदानवसंक्षये ॥ तारकेणेव देवेनद्रश्शक्त्या परमया सह॥२॥सदयः पपात् नागाश्च धरण्यां सृच्छितोऽभवत्॥ परंकक्मलमापेदे
वज्रधारी सुरेश्वरः॥३॥ तथैव लोकपास्सवैऽसरेश्च बख्वत्तरेः ॥ पराजितारणे तात महारणविशारदैः ॥ 9 ॥ अन्येऽपि निर्जरा
दैत्ये्ुद्धयमानाः पराजिताः ॥ असहंतो हि तत्तेजः परायनपरायणाः॥ ५ ॥ जगजैरसरास्त जयिनस्मुकृतोयमाः ॥ ससिंहनादं
थ््वन्तः कोादलपरायणाः ॥६॥ एतस्मिन्नंतरे त विरभदो शूषान्वितः॥ आससाद गणेरवीरिस्तारकं वीरमानिनभ्॥७॥ निजं
रान् पृष्ठतः कृत्वा शिवकोपोद्धवो बरी ॥ तत्सम्युखो मो गृणा्रणीः ॥८॥ तदा ते प्रमथास्सवे दैत्याश्च पर
मोत्सवा : ॥ युयुधुस्संयुगेऽन्योन्यं प्रसक्ताश्च महारणे॥९ ॥बिद्ूलेष्टिभिः पाशः खङ्खः परश्चुपटिशेः ॥ निजव्युस्समरेऽन्योन्यं
रणे रणविशा्दाः ॥ १० ॥ तारको वीरमद्रेण स त्रिश्चलाइतो शशम् ॥ पपात सहसा भूमौ क्षणं मूर्छापरिप्डतः ॥ 9१ ॥
तारक असुरके समीप गमन किया ॥७॥ यह बी शिवके कोपे उत्यन्न होनेकै कारण महारोषको भाप्र हो युद्धकी इच्छासे सन गणो आगे
हो युद्धकी इच्छते तारक असुरके सन्मुख हुआ ॥<॥ तब वे सव भरथम ओर दैत्य परम उत्सवे महारणम अदत्त हो परस्पर युदध॒करनेखगे
॥ ° ॥ तरिश ऋष्टि पाश खद्ध परे पिश वे रणकरनेमे कुशल परस्पर एक दूसरेषर प्रहार करने ठगे ॥ १० ॥ वीरभद्रने त्रिशूक मारकर
तारककौ अत्यन्त ताडित किया, ओर क्षण मात्र मूको भाप होकर प्रथिवीपर सूच्छौ खाकर गिरषडा ॥ ११ ॥
१४४
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चत --------
शि०४० फिर दैत्ये तारक ॒क्षणमाजमे उढकर चैतन्य हो बडे बठते वीरभद्रपर॒शक्तिका भ्हार करता हआ ॥ १२ ॥ तव् महातेजश्वी | र
॥ ३५० ए भी बडे तीक्ष्ण घोर निशित २ १३ ॥ तारकने भी समरमें वीरभद्रको शक्तिसे परहार किया, देत्योमिं अधीश्वर तारक्र बडा ¢
ए भवर ओर सम्मत था ॥ १४ ॥ इत भकार युदधकरते हूए वे परस्पर एक दृमरेको महार करने ठगे, व रणविचाभे विशारद दोनों युद्धम, नाना ¢
ट| अनन छोढने गे ॥ १५ ॥ उक्ञ समय उन दोनों महात्माओंका द्वद युद्ध होने ठगा उस म्यंकर ओर् रो ्रहषेण युको सव कोई देखने कगे ¢
| ॥ १६ ॥ उतत समय भेरी शृदंग पटह आनक गोल बजाने ठंगे जिसको हुनकर वीर प्रसन्न ओर ‹ कायर व्याकृढ होने ठगे ॥ १७ ॥ ट
|| उत्थाय स हते वीरस्तारको दैत्यसत्तमः ॥ लन्धसंज्ञो बलाच्छक्तया वीरभद्रं जवान इ ॥ १२ ॥ वीरभद्रस्तथा वीरो महा ¢
ट| तेजा. हि तारकम् ॥ जघान त्िशिखेनाश्च घोरेण निशितेन तम् ॥ १३ ॥ सोपि शक्त्या वीरभद्रं जघान समरे ततः ॥ ||
| तारको दितिजाधीशः प्रबलो वीरसंमतः ॥ १४ ॥ एवं संगुद्धयमानौ तौ जच्तुभ्रतरेतरम् ॥ नानाञ्चशब्चस्समरे रणविा |¢
&| विशारदौ ॥ 9१९4 ॥ तयोरभदात्मनोस्त्न न्द्रयुदमभृत्तदा ॥ सवेषां पश्यतामेव तुरं रोमहर्षणम् ॥ १६ ॥ ततो भेरी. |
मृदंगाश्च पटदानकगोभुखाः ॥ विनेदुर्विहता वीरेश्शृण्वतां सभयानकाः ॥ १७ ॥. अुयुधातेतिसत्रद्धौ प्रहरेजजंरीृतौ ॥ ¢
४ अन्योन्यमतिसंरब्धौ तो इुधांगारकाविव ॥ १८ ॥ एवं दृष्टा तदा युद्धं वीरभद्रस्यतेन च ॥ तञ गत्वा वीरभद्रमवोचस्त्वं
शिवप्रियः ॥ १९ ॥ नारद् उवाच ॥ वीरभद्र महावीर गणानासग्रणी भवान् ॥ निवर्तस्व रणादस्माद्रोचते न वधस्त्वया ६
रु०्स.२ ४ ॥ २० ॥ एवं निशम्य त्वद्राक्यं वीरम गणा्रणीः ॥ अवदत क्षाविष्स्त्वां तदा तु कृतांजलिः ॥ २१ ॥ टं
कु.खं.४ प्रहारसे जजेरीमूत होकर वै दोनों युद्ध करने लगे ओर बुध भगल्करै समान परस्पर दोनोंही डे वेगसे युद्ध॒करनेकगे ॥ १८ ॥ उस्न £
क ह|| भकार उनके संग वीरमद्रका युद्ध देखकर शिकै परिय तुम वीरभद्रसे जाकर कहने ठे ॥ १९ ॥ नारद्जी बोले हे वीरभद्र ! है महावीर ! ||
|| तम गणो अग्रणीय हो इस युद्धसे निवृत्त हो इसका वध तुमको शोभा नहीं देता ॥ २० ॥ गणो अग्रगामी वीरभद्र नारदजीके यह वचन &
३॥ सुन रोषमं भरकर हाथ जोड उस समय तुमसे कहने रगा ॥ २१ ॥ नै
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बोला हे उनिभेष्ठ ! हे महाभाग ! मेरे परभ वचन सुनो मै तारक अघुरको भारता हू, इस समय तुम मेरा पराक्रम देखो ॥ २२ |
जो वीर स्वामीको रणकषे्रमे ठे आति है ३ पापी महा नपसक रणकषत्रमे नष्ट हो जाते है ॥ २३ ॥ ओर बे असद्रतिको प्राप्त होते ह उनको
नरककी भाषि अवश्य. होती ह वीरभद्रसे इस प्रकारके वचन फिर न कहना ॥ २४ ॥ जो श्च अलो भिन्न शरीर होकर निभेय हो युद्ध
करते है, वह दोनों टोकमे सम्पत्ति ओर उत्तम सुख पाति है ॥ २५ ॥ विष्ये आदि छेकर सव देवता मेरे वचन सुने आज भँ इस पृथिवीकौ
वीरभद्र उवाच ॥ मुनिवरं महाप्राज्ञ शृणु मे परमं वचः ॥ तारकं च वधिष्यामि पश्य मेऽ पराक्रमम् ॥२२॥ आनयति च ये
वीरार्स्वामिनं रणसंसदि ॥ ते पापिनो महाङ्गीवा विनश्यन्ति रण गताः॥ २३ ॥ असद्रति प्राप्ठवन्ति तेषां च निरयो धुवम् ॥
वीरभद्रो दि विज्ञेयो न वाच्यस्ते कदाचन॥२०॥ शच्राख्चेभिन्नगाता ये रणं कुर्वति निर्भयाः ॥ इदाश्चुच प्रशंस्यास्ते रभन्ते सख
मद्धतम् ॥ २५ ॥ शृण्वन्तु मम वाक्यानि देवा हरिपुरोगमाः॥ अतारकां महीमय करिष्ये स्वामिवजिताम्॥२६॥इत्यु्ता प्रम
थेस्साद्ध वीरभद्रो हि शूरृधृक ॥ विचित्य मनसा शंथुं युयुघे तारकेण हि ॥ २७ ॥ ब्रृषारूटेरनेकेश्च जिश्चुल्वरधारिभिः ॥
मदावीरेखिनेतरेच स रेजे रणसंगतः ॥ २८ ॥ कोलाहल प्रकुर्वतो निभेयांश्शतशो गणाः ॥ वीरभद्रं पुरस्कृत्य युयुधु
दनवेस्सद ॥ २९ ॥ असुरास्तेऽपि युयुधुस्तारकासुरजीषिनः ॥ बरोत्कटा महावीरा मर्दयन्तो गणान् र्षा ॥ ३० ॥
देत्योकि स्वामी तारकंसे हीन कर दंगा ॥ २६ ॥ इस प्रकार कह प्रमथगरणोके साथ शूक धारण किये हुए वीरभ मनमे शिवजीको स्मरण
कर तारकके साथ युद्ध करने ठगा ॥ २७ ॥ ओौर भी ष्ठ त्रिश धारण किये इृषभपर चे बडे वीर॒ तीन ने्रवाोसे वह युक्त होकर
रणकषे्रमे शोभित हुभा ॥ २८ ॥ सेको गण निर्भय हो कोलाहल करते हूए वीरभष्को आगेकर युद्ध॒करने रगे ॥ २९ ॥ ओर तारकके
आधीनके सब दैत्य भी युद्ध करने ठगे, वे बम उत्कर महावीर कोधसे गणोको सर्दन करने खगे ॥ ३० ॥
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देत्यवयं द् विकट संग्राम होने खगा ओौर परम अञ्च चठानेमे पण्डितगण प्रसन्न होकर जयं जय करने कगे ॥ ३१ ॥ परब
न (५ रगत 4 हो गये, ठयथित ओर व्यग्रमन होकर फर परास्त होगये ॥ ३२ ॥ इस भकार् अपनी सेनाको ्
ठयथित देखकर उसका पाठक असुर तारक वडा कोधकर देवताओंके मारनेको चछा ॥ २३ ॥ वहं दश सर भजा करकं बड वेगसे सिंह ¢
परर चढ़कर उन देवता ओर दैत्योको रणस्थल्म गिराने छ्गा ॥ ३४ ॥ गणोमे अव्रणी वीरभद्रने उसका यह कमं देखकर उन महावटीने
उसके मारनेके निमित्त बडा कोप किया ॥ ३५ ॥ शिवजीके चरणकमल्को स्मरण कर उस्ने त्रिशिल् अ्वको ग्रहण किया उक्षकै तेजसे ६
पुनः पुनश्चैव बभूव संगरो मदोत्कटो दैत्यवरैगणानाम् ॥ प्रहषमाणाः परमाश्चकोविदास्तदा गणास्ते जयिनो बभ्रूः ॥३१॥ गणे
जितास्ते भबरसुरा विश्चखारणे॥ पलायनपरा जाता व्यथिता व्य्रमानसाः॥३२॥ एवं अर स्वसैन्यं तदष्वा तत्प्लकोऽसुरः॥ ट्
तारको हि श्षाविष्ठो हंत देवगणान् ययौ ॥ ३३ ॥ युजानामथुतं कृत्वा सिहमार्द्य वेगतः ॥ पातयामास तान्देवान् गणांश ट
रणमूर्धनि ॥ ३९ ॥ स दृषा तस्यं तत्कमे वीरभद्रो गणाअ्णीः ॥ चकार सुमहत्कोपं तद्वधाय महाबली ॥ ३९ ॥ स्मृत्वा ||
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शिवपदांभोज जग्राह त्रिशिखं परम् ॥ जन्वटुस्तेजसा तस्य दिशः सवां नभस्तथा ॥ ३६॥ एतस्मिन्नन्तरे स्वामी
वारयामास तं रणम् ॥ वीरबाहृषखान्सयो महाकौतुकदशकः ॥ ॥ 2७ ॥ तदाज्ञया वीरभद्रो निवृत्तोऽदणात्तदा ॥ ||
कोपं चक्रे महावीरस्तारकोऽसुरनायकः ॥ ३८ ॥ चकार बाणवृष्टिं च सुशोपारे तदाऽघुरः ॥ तप्तोऽहासीत्सुरान्सवो ॥९
नानाञ्चरणकोविदः ॥ ३९ ॥ एवं कृत्वा मत्कं तारकोऽसुरपाल्कः ॥ सवेषामपि देवानामशक्यो बलिनां वेरः ॥ ४० ॥
पव दिशा ओर आकाश् प्रज्वछित हो उठ। ॥ ३६ ॥ तव इस अवसरमे बीरवाह स्वामीने कौतुक दिखानेकी इच्छासे उ्तको गुदधसे निवारण ¢
किया ॥ ३७ ॥ उनकी आज्ञा वीरवाहं वीरभद्र रणते निवृत्त हए ओर उती समय अघुरनायक तारकने महाक्रोध किया ॥ ३८ ॥
तव॒ वह असुर देवताओंपर बाण वृष्टि करने ठगा, ओर अनेक अश शच्च छोडकर देवताओंको तप्त करने ठ्गा कारण किं यह रणकर्ममं |
बडा चतुर था ॥ ३.० ॥ इस भकार असुरोंकी पाना करनेवाङा तारक दैत्य महा कमं करके शोभित हुभा उत्त बठ्वालोे भरेष्ठके यह
| देवताओको भी अशक्य थे ॥ ४० ॥ इत प्रकारते देवताओंको भयसे व्याकुक ओर धात हते हूए देखकर महा कोधकर यदध करनेके
निमित्त विष्णजी उथत हुए ॥ ४१ ॥ सुदशन चक्र शारंगधलुष ओर आयुध ठेकर उतत महादेत्यके मारनेकै ठिये हरिं चटे ॥ ४२ ॥ | |
समय हरि ओर तारक असुरका महायुद्ध हआ हे सुने ! इस छोमहर्षण युद्धको सव देखने छगे ॥ ४३ ॥ हरिन गदा उटाकर बडे वेगसे ॑
दैत्यको मारी महाबली त्रिशिख बाणसे उसतकै दो खण्ड करदिये ॥ ४४ ॥ तब देवताओंको अभय देनेवाठे भगवान् कृद हुए शार ठै
| धनुष पर बाण चदाकर उस असुरनायकको ॥ ४५ ॥ वह भी महाबटी तारक शत्रुओंके बीरोको मारनेवाङा अपने धनुष पर चढाये ¢
६९|| णवं निहन्यमानांस्तान् दृषा देवान् भयाकखान् ॥ कोपं कृत्वा रणायाञ्चु संनद्धोऽभवदच्य॒तः ॥ ७१ ॥ चकं सदर्थनं शाङ्ग 6
ठ धनुरादाय. सायुधः ॥ अभ्युद्ययौ महादेत्यं रणाय भगवान् हरिः ॥ ४२ ॥ ततस्समभवयुद्धे दरितारकयोर्महत् ॥ छोमहरषेण
मत्युं स्वेषां पश्यतां घने ॥ ७३॥ गदामुदयम्य स हरिजघानाखरमोजसा ॥ द्विधा चकार तां दैत्यश्चिशिखेन महाबी |
॥ 8९ ॥ ततस्ष कुद्धो भगवान्देवानामभयंकरः ॥ शाङ्धच्युतेश्शरब्यूदेजेघानास्ुरनायकम् ॥ ५ ॥ सोऽपि दैत्यो महावीर
स्तारकः परवीरहा ॥ चिच्छेद सकलान्बाणान्स्वशरेनिंशितेहैतम् ॥ ४६॥ अथ शक्तया जघानाञ्च रारि तारका्चरः ॥
भूमौ पपात स हरिस्तत्परदारेण मूच्छितः ॥ ७७ ॥ जगराह.स रषा चक्रषुत्थितः क्षणतोऽच्छुतः ॥ सिंहनादं महत्कृत्वा
ज्वरज्जञ्वालासमाङुलम् ॥ ४८ ॥ तेन तञ्च जघानासौ _ दैत्यानामधिपं हरिः ॥ तत्प्रहारेण सहता भ्यथितो न्यपतद्धवि
॥ ४९ ॥ पुन्चोत्थाय देत्येन्द्रस्तारकोऽसुरनायकः ॥ चिच्छेद त्वरितं चक्रं स्वशक्त्यातिबरान्वितः ॥ «० ॥ `.
बाणोपि हरिके षाण छेदन् करने छगां ॥ ४६ ॥ किर तारक असुरने शक्तिम शरारी पर आधात किया, उस्र भरहारक्ञे भूषित हो विष्जी
पृथिवीपर पतित हुए ॥ ४७ ॥ ओर क्षण माज उठकर विष्णजीने सुदशेनचक्र अरहण किया, ओर वह चक्र अधिके समान भज्वङित हो
उढा, विष्णजी सिंहनाद करने ठगे ॥ ४८ ॥ उस चक्रमे हरिने उसपर परहार किया, ओर उस प्रहारसे व्याकुक हो दैत्य पृथिवीम गिर पडा
॥ ४९ ॥ किर भी वह असुरनायक . तारक उढकर बडे बरु अपनी शक्ति चलाकर चक्रको छेदन करता इभा ॥ ५० ॥
|
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ओर फिर महाशक्तिते क केर अच्य॒तने नन्दन नामक गदासे उस्चको ताडन किया ॥ ५१ ॥ षस प्रकारपं धिष्णज
ओर वह दैव 4 स | किसी प्रकार भी उनका बर क्षत न हुम ॥ ५२ ॥ इति शीशिवमहापरागे
रुदरसंहितान्तगतचतुर्थकुमारखण्डे भाषारीकायां युवं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ बह्लाजी बोटे ! देवदेव हे यहं ! ह स्वामिन् ! हे शंकरथत्र !
हे पार्वती ! विष्ण ओर तारकका साम आपको शोभा नहं देता ॥ १ ॥ वह बट्वानू तारक विष्णसे नहीं म्रेगा, कारण किं उनस
वह वध्य नहीं ह भने उसको रेसनाही वर दिया है, यह मै सत्य सत्यही कहता हूं ॥ २॥ हे पावती एत्र! तुम्हारे बिना इक्क कोई
पुनस्तया महाशक्तया जघानामरवहमम् ॥ अच्युतोऽपि महावीरा नन्दकेन . जघान तमू ॥ «१ ॥ एवमन्योन्यमसुरो विष्णुश्च
बलवानुभौ ॥ युयुधाते रणे भूरि तवाक्षतबलौ सने ॥ ५२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ्रसंदितायां चतुथं मार
खण्डे देव दैत्यसामान्ययुद्धवणनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ देवदेव ह स्वाभिञ्शांकरे पावेतीसुत ॥ न शोभते
रणो विष्णु तारका्चरयो्रेथा ॥ 9 ॥ विष्णुनान दि वध्योऽसौ तारको बर्वानति ॥ मयां दत्तवरस्तस्मात्सत्यं सत्यं वदाम्य
हम् ॥ २ ॥ नान्यो हतस्य पापस्यु त्वां विना पाव॑तीषुत ॥ तस्मात्वया हि कतव्य वचन् मे महाप्रभो ॥२ ॥ सुत्रद्ो भव
दैत्यस्य वधायाञ्चु परंतप ॥ तद्धा सशत्पत्नः शंकरात्वं शिवाश्चुत ॥ £ ॥ रक्ष रक्ष महावीर बिदशान्ग्यथितात्रणे॥ न बाल
स्त्वं युवा नेव किं तु सर्वेश्वरः प्रथः ॥ ५ ॥ शक्र पश्य तथा विष्णु व्याकुलं च सुराब् गणान् ॥ एवं जहि महादैत्यं ्ेखो
|| क्यं खसिनंङर् ॥ ६ ॥ अनेन विजितश्रनद्रौ लोकपः पुरा सद ॥ विष्णुश्वापि महावीरो तजितस्तपसोबटात्॥ ७ ॥
मारनेवाछा नहीं है, हे प्रमो ] इस कारण तुमको हमारे वचन मानने चाहिये ॥ ३ ॥ आप इस दैत्यके मारने शीघ्र तत्पर हजिषे, हे परंतप ।
र हे शिवाएत्र ! इसकै मारवेके निभिचही तुम उत्पन्न हए हो ॥ ४ ॥ हे ृहावीर ! व्याकुढ हए देवताओंकी आप रक्षा कीजिये, आप बालक
६ युवा नहीं किन्तु सर्वेश्वर प्रमु हो ॥ ५ ॥ आप देखिये इन्दर दिष्य ओौर सब देवताओंके गणको व्याकु देखकर इस महादेत्यको मारकर ल |
सबको सुखी करो ॥ & ॥ इसने ोकपारोके सहित प्रहे इन्द्रको जीता था, ओर महावीर विष्णको तपके कारणे जीत छिया था ॥ ७॥
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| दुरात्मा असुरने त्रिोकीम सब जीत लिया है इस समय आपके निकट भी फिर ,देवताओनि युद्ध किया है ॥ < ॥ इस कारण इस |
तारकको तुम्हे मारना चाहिये हे शंकरात्मज ! मेरे बरके कारण यह ओौरसे वध्य नहीं है ॥ ९ ॥ ब्रह्माजी बोरे वह शंकरात्मज कुमार मेरे
वचन सुनकर प्रसन्न होकर हसे ओर रसा ही होगा यह कहा ॥ १० ॥ वह महाभभु शंकरके ए अघुरका वध निश्वय् करके विमाने
उतरकर पेद्र हए ॥ ११ ॥ तब यह शिवजीके एत्र विमानसे उतरकर पैदल चते हृए बडी शोभाको पराप हुए ओर कमारने महा उल्काके
समान् महा भकाशमान् शुक्ति अपने हाथमे धारण की ॥ १२ ॥ उञ अत्यन्त भरचण्ड व्याकुकता रहित अपरमेय षण्युखको देख देवताओंको
अलोकये निजितं सर्वमसुरेण दुरारंमना ॥ इदानीं तव सात्निध्यात्पुनयदधं कृतं च तैः ॥ ८ ॥ तस्मास्वया निदतन्यस्तारकः पापपू
रुषः॥ अन्यवध्यो न चैवायं मदवराच्छकरात्मज ॥ ९ ॥ ॥ न्मोवाच ॥ इति थत्वा मम वचः कुमारःशंकरात्मजः ॥ विजदास
भरन्ना्मा तथास्त्विति वचोऽब्रवीत् ॥ १०॥ विनिश्रित्यासुरवधं शांकरिस्समहाप्रधुः ॥ विमानादवतीर्यांथ पदातिरभवत्तदा
॥११॥ षञ्यां तदासौ परिधावमानो रेजेऽतिवीरः शिवजः कमारः॥ करे समादाय महाप्रभां तां शक्ति महोल्कामिव दी्तिदीपताम्
॥१२॥ द्वा तमायांतमतिप्रचडमभ्यारं बण्युखमप्रमेयम्॥ दैत्यो बभाषे सखरसत्तमान्स कुमार एष द्विषतां परह॑ता ॥ १३ ॥
अने नसाकं द्यहमेकवीरो योत्स्ये चसवानहमेव वीरान्॥ गणांश्च स्वानपि घातयामि सरोकपालान्दरिनायकां च ॥ 9४ ॥ इत्येव
सक्त्वा ख तदा महाबलः कुमारस॒दिश्य ययौ च योदरध्ुम् ॥ जग्राद शक्ति प्रमाद्धुतां च स॒ तारको देववरान्बभाषे ॥ १९ ॥
॥ तारक उवाच ॥ कुमारो मेऽग्रतश्चाद्य भवद्भिश्च कथ कृतः ॥ यूर्ये गत्वा देवा विशेषाच्छकरतेः्वरौ ॥ १६ ॥
मारनेवाठे दैत्ये कहा शवुर्मोप्र परहार करनेवाढा वह कुमार यही है ॥ १३ ॥ यै एकवीर हय इ कुमारक तथा सव दूसरे वीरोके साथ युद्ध
करके सम्पुण गण छोकपाङ ओर हरिनायकोंको धात कर सकता हं ॥ १४ ॥ तव यह कट्कर वहं महाबी कुमारको देखकर युद करनेको
चढा ओर परम अद्भुत शक्तिको प्रहणकरं वह तारक सन देष बरसे कहने खगा ॥ १५ ॥ तारकेने कृहा हे देवताओ ! तुमने कुमारको भेरे
आगे केसे कर दिया है हे देवताभो ! तुम कनाहीन होगये, विशेषकर इन्दर ओर विष्य छजाहीन हँ ॥ १६ ॥
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हे भी इनोति वेदमार्ते विरद कम किया ३, वह म सव हमत बर्न करता है नो ॥ १७ ॥ इनमे विष्णनी बडे दोषी छली
अविवेकी है जिन्होने पाप ओर छठ करके पे राजा बठको ठा था ॥ १< ॥ .उन्हनिही पहटे यले. व हिन
धूता वेदम, बाहर होकर् शिरहीन कर दिया ॥ १९ ॥ किर जव देवता ओर दत्य अशरृतपान करने बेटे, तव इनन मोहिनीषहूप
धारण कर पंक्ति भद्र वेदमार्गे रहित हो देवताओंको अमृत पिया ॥ २० ॥ इन्होने रामरूप होकर ताटका नारीको मारा, -वाढीको
मारा फिर विभवाके एत्र ब्राह्मणको वेदमार्मते रहित होकर इन्ोने मारा ॥ २१ ॥ फिर निना अपराधकै पापम रत होकर इनहोनि अपनी
पुरेताभ्याकितं कमे विरुद बेदमागैतः ॥ तच्छृण्य मय परोक्तं वर्णयामि तिश्ेषतः॥१९॥तञ विष्णुश्छली दोषी दयविवेकी विशे
घतः ॥ बल्यिन पुरा बद्वश्छलमाश्रित्य पापतः॥१८। तेनैव यत्नतः ू्वमसुरौ मधुकैटभौ ॥ शिरौदीनौ कृतौ धौत्यद्विदमार्गो विव
नितः॥१९॥ मोहिनीषूपतोऽनेन पंक्तिभेदः कृतो दि वै ॥ देवासुरसुधापाने वेदमार्गं विगर्हितः॥ २० ॥ रामो भूत्वा इता नारी वाली
विध्वंसितो हिसः ॥ पनवश्रवणो विप्रौ हतो नीतिदैता छतेः॥२१॥ पापं बिना स्वकीया च्च त्यक्ता पापरतेन यत्॥ तवापि ति
माश ध्वंसितस्स्वारथेते॥२२॥स्वजनन्याश्शिरग्छन्नमवतारिरसाख्यके॥ युहपुत्रापमान् कृतोऽनेन दुरात्मना ॥२३॥ कृष्णो
भूत्वान्यनारय॑शच दूषिताः कुलधमेतः ॥ श्ुतिमार्ग परित्यज्य स्वविवाहाः कृतास्तथा ॥२8॥ पुन वेदम हि निदितो नवम भवे॥
स्थापितं नास्तिकमतंवेदमार्गविरोधकृत्॥२५॥ एव येन कृतं पापं वेदमार्गं विसृज्य वै ॥ स कथं विजयेददे भवेद्धम वतां वरः ॥२६॥
ब्ीको त्याग दिया, अपने सवाक निमित्त इसमे भी वेदमार्को ध्वंस केर दिया ॥ २२ ॥ फिर परशुराम अव्रतारमं इन्होंने अपनी माताका
शिर छेदन किया इन्हीं दुरात्माने यरुषएत्रका अपमान किया ॥ २३ ॥ कष्ण होकर इन्होँने कुठधरमसे अनेक नारियोंको दूषित कर दिया
ओर वेदभागैको छोडकर इन्होने अपने विवाह किये ॥ २४ ॥ फिर वनमे बुद्ध अवतार इन्होने वेदमार्गकरी निन्दा की ओर वेदमार्गे
विरोध कर नास्तिकमत स्थापन किया ॥ २५ ॥ दस प्रकार वेदमारको त्याग करके जिन्होँने पाप किये है बह युद्धे किस्त प्रकार विजय
१९ आमने :जमार्षन् 1
| है ॥ २७॥ इन्द्रने अपने स्वार्के निमित्त दितिका गर्म खण्डन किया, गौतमी खीको
बराह्मण विश्वरूप जो इसके गुरुका भानजा था उसके शिर काटकर इ>
करके अपने वीयं ओर तेजको नष्ट कर दिया है ॥३०॥
भ्राता ज्येष्ठश्च यस्तस्य शक्रः पापी महान्मतः॥ तेन
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र जः ॥ २८ ॥ विश्वरूपद्विजातेवें भागिनेयस्य यद्वरोः ॥ निकृत्तानि च
शीषाणि तदध्वाध्वंसितशतेः ॥ २९ ॥ कृत्वा बहूनि पापानि दरिश्शक्रः पुनःपुनः ॥ तेजोभिर्िहतकिव नष्टवीर्यो विशेषतः
॥३०॥ तयोबेलेन नो यं संग्रामे जथमाप्स्यथ ॥ किम मूढतां प्राप्यप्राणांस्त्यक्तमिहागताः ॥ ३१ ॥ जानन्तौ धर्ममेतौ
न स्वार्थरपटमानसौ ॥ धरम विनाऽमराः क्त्ये निष्फलं सकलं भवेत् ॥३२॥ महाधृष्टाविमौ मेय कृतवंतौ पुरश्शिश्चुम् ॥ अहं बाख
वधिष्यामि तयोस्सोऽपि भविष्यति ॥ ३३ ॥ किं बाल इतो यायादषरंप्ाणपरीप्सया॥ इत्युक्तोदिश्य च देरी वीरमद्रस्ुवाच
सः ॥ २४ ॥ पुरा हतारत्तया विग्र दक्षयज्ञे यनेकृशः ॥ तत्कर्मणः फलं चा् द्रयिष्यामि तेऽनघ ॥ ३८ ॥ बह्मोवाच ॥ इत्ये
वुक्त्वा तु विप्रूय पुण्यं निजं स तच्रिद्नकर्मणवे ॥ जथा शक्ति परमाद्धुतां च सं तारको युद्धतां वरिष्ठः ॥ ३६ ॥
नेको कैसे आगये हो ॥३१॥ यह दोनों तो स्वाथेते ठम्परमन होकर धमो नही जानत हे देवताओं ! धर्मक विना जाने सव कल निष्फृङ होता
है ॥ ३२ ॥ यह दोनों महा टीठ है जो इस बाठ्कको इन्होनि भरे समाने कंर दिया है मे बाल्कको मागा तो इन दोनोंको वह भी पाप
ख्गेगा ॥ ३३ ॥ किन्तु हे बाखक ! तुम॒प्राणकी इच्छसे इस स्थानत दूर हौ, यह कहकर इन्द्र॒ ओर विष्णुके उदेश्यसे वीरभद्रसे बोा
॥ ३४ ॥ प्हठे तुमने भी दक्षके यज्ञम बहृतसे बाह्मणोका वध क्रिया था, हे निष्पाप! आज उक् कमंका फर भँ तुमको दिखाङगा
१ पापीीयुानितिशेषः र शृरषिषपू इति भावः। =-=
न
-----~-~--~
ओर धर्मं जाननेवाोमंशष् हो सकते है ॥२६॥ इसी प्रकार इनके ज्येष्ठ भराता इन्द्र भी महापापी ह, इन्होने मी अपने छ्ि अनेक |
धित कर बाह्मणङ्कमार वत्रको मारा ॥ २८ ॥
होने वेदमागेको नष्ट किया ॥ २९ ॥ इन हरि ओर शक्रने वारंवार पाप
इन दोनोकै बसे तो तुम संग्राममे जय नही पास्रकते सो तुम मूढताको पराप्त हो प्राण त्याग
् ् ६ पापान्यनेकानि कृतानि निजहेतुतः॥ २७॥ निक्घत्तो हि दितगरभस्स्वार्थ
हेतोविशेषतः. ॥ धर्षिता गोतमी वै हतो व्रश्च विप्र
शि०पु०
॥३५४॥
र्म २
कु.खं.४
अ०९,
॥ ३५ ॥ बह्माजी बोे इस प्रकार विष्य ओर इन्द्रकी निन्द
करनेवाठोमे श्रेष्ठ तारकने परमअदधुत शक्तिको ब्रहण किया
कुमारक आगे होकर इन्द्रने वजसे ताडन किया ॥ ३७ ॥ उस वज
ठ ॥ | कृरके उस निन्दासे उसने अपना समस्त पुण्य नष्ट करके युद्ध
त
# होकर वह सहसा प्रथिवीपर गिर गया ॥ ३८ ॥ गिरनेकै पीठे फ
॥ ३६ ॥ बडे वये कुमारकैे धावमान होते हुए तारकाश्ुरको
कै प्रहारे तारक अशुर जजर हो गया, ओर निन्दा करनेसे हतबठ
र उठकर बडे वेगसे इन्द्रपर शक्तिका प्रहार किया ओर हाथीपर
देवता्ओकी सेनाम महा हाहाकार मच गयां ओर देवताओंनि
चे इन्दरको प्रथिवीपरः भिरादिया ॥ ३९ ॥ इनद्रके पतित होनेमं ध 8 दव
गुदपुरस्सरः ॥ ६७॥ तेन वन्नप्रहारेण तारको जजरीकरतः
तं बालान्तिकमायातं तारकाञ्रमोजसा॥ आजघान च वत्रेण शक्रो ॥ 34114.
ठ भ्रमो पपात सहसा िदादतबलः क्षणम् ॥३८॥ पतितोऽपि सत्याय शक्त्या तं ्रादरकषा ॥ पुरंदरं गजस्थं हि पातयामास
2 भूतले ॥३९॥ हाहाकारो महानासीत्पतिते च रंद्रे॥ सेनायां निजंराणां हि तष्टा छश आविशत् ॥४०॥ तारंकेणाऽपि ततव
द यत्कृतं क्म दुःखदम् ॥ स्वनाशकारणं घमंविश््धं तत्निबोधमे॥७१ ॥पतिते च पदक्रम्यदहस्ताद्रज्ं प्रगृह्य वे ॥ पुनर्द्रजघातन शक्र
ठै मा ताडयदभरशम्॥४२॥ एवं तिरस्कृतं दष्टाशक्गं विष्णुःपरतापवान्॥ चक्रश्चुयस्य भगवांस्तारकं स जघान इ॥९३॥ चक्रप्रहारामि
‡ तो निपपात क्षितौ हि सः ॥ पुनरुत्थाय दैतयेन्द्रःशक्तया विष्णुं जघान तम्॥४४॥तेन शक्तिपरदारेण पतितो भुवि चाच्युतः॥ हाहा
करोमहानासीच्ुङ्घङ्श्वाऽतिनिजंराः॥४५। निमेषेणपुनर्विषणुर्यावदुत्तिष्ठतेस्वयम्॥ तावत्सवीरभदरो हि तत्क्षणादागतोऽघुरम्॥४३॥
| बडा क्टेश माना ॥ ४० ॥ हे नारदजी ! उस समय तारकनेभी जो धर्म विरुड दुःखदायकं कमं अपने नाशके निमित्त किया सो आप
|
मसे सुने ॥ ४१ ॥ भिरे हए इन्द्रके ऊपर पेर॒ रखकर ओर उसके हाथसे वज टेकर इन्द्रको उस्ने बडे वेगसे ताडन किया ॥ ४२॥
प्रतापवान् भगवान् विष्णजीने इन्द्रको इस प्रकारसे तिरस्कत देखकर अपना चक्र उठाकर तारकं प्र रहार करिया ॥ ४३॥ चक्रके
द| खगनेसे वपाकुक हो तारक अषुर॒भूमिपर गिर पडा ओर फिर उढकर उस दैत्य नाय॒कने शक्तित विम्थको ताडन किया ॥ ४४ ॥ उ
5) ॥ शक्तिके रगनेसे भगवान् पृथिवीपर गिर पडे उस समय देवता हाहाकार कर चिल्लाने ठगे ॥ ४५ ॥ ज्योही एकं निमेषमात्रं जबतक
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| ; | उढ तबतक वीरभद्र क्षणमात्रमे उस्र असुरके समीप आगये ॥ ४६ ॥ भतापी बली बीरभद्रने अपना त्रिश उठाकर बडे वेगसे | |
देत्यपति तारकके मारा ॥ ४७ ॥ उ त्रिशूलकं ठगनेसे महाबी तारक पृथिवीपर गिरपडा ओौर वह महा तेजस्वी क्षणमात्रमे फिर उठ ठै
बेडा ॥ ४८ ॥ किर सव अरोक सेनानायक उस बीरने महाक्रोध कर एक प ' छातीमं मारी ॥ ४९ ॥ उसकी महाकोधसे ट
मारी हुई शक्ति जब छाती ठगी तब उसके आधात क्षणमात्रको वीरभद्र पृथिवीम गिर गया ॥ ५० ॥ तब देवता, गंधर्व, उरग, राक्षत
भपनें अपने गणोकै सहित महा हाहाकार करक वारंवार चिह्ठाने रगे ॥ ५१ ॥ फिर एक निमेषमात्रं बह महा पराक्रमी शत्रुनाशक वीरभद्र
चश्चलं च समुद्यम्य वीरभद्रः प्रतापवान् ॥ तारकं दितिजाधीशं जघानं प्रसभं बली .॥ ४७ ॥ तत्रिश्चुलप्रहारेण स प्रपात
क्षितौ तदा ॥ पतितोऽपि मदातेजास्तारकः पुनर्त्थितः ॥ ७८ ॥ कृत्वा कोषं महावीरस्सकलासुरनायकेः॥ जघान परया
शक्त्या वीरभद्र तदोरसि ॥ ४९ ॥ वीरभद्रोऽपिपतितो भूतेः सूछितः क्षणम् ॥ तच्छकृत्या परया कोधात्निहतो वक्षसि
धुवम् ॥ ५० ॥ सगणश्चैव देवास्ते गंधर्वोरगराक्षसाः ॥ हाहाकारेण महता चुङ्क्यु् घहयहुः ॥ ५१ ॥ निमेषमायात्सहसा ©
महाजास्सीरभद द्विषतां निहता ॥ भिद्युषयम्य तङित्प्रकाशं जाज्वल्यमानं प्रभया विरेजे ॥ «२ ॥ स्वरोचिषा भासि ||
तदिग्वितानं सूर्थन्दुमिम्बाभ्रिसमानमंडलम् ॥ महाप्रभं वीरभयावदं परं कालाख्यमत्यंतकृरं महोज्ज्वलम् ॥ 4३ ॥ याव्चि
शुखेन तदा दतुकामो महाबलः ॥ वीरभद्रोऽषुरं _यावत्मारेण निवारितः ॥ ५७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां
शुद्रम॑हितायां चतुथं इमारखंडे तारकवाक्यशकरविष्णवीरमद्रयुद्धवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ 84
विजटीके समान भकाशमान् त्रिरूरु हाथमे ठेकर अपनी कान्तिसे विराजमान दुभ ॥ ५२ ॥ उ्की कान्तिसे दिशा भकाशभान हो गई ट
घय चन्द्रमा ओर अभिके समान मंडल प्रकाशमान होने ठ्गा, महाभरमावाढा वीरको भयदायक मानों दुसरा हाकार महाउज्ज्वरु था ¢
| ॥ ५३ ॥ इतत भकार महाबली वीरभद्र जब त्रिशूढ ठेकर अलुरको मारने चछा तवतक उ्तको कुमारम निवारण किया ॥ ५४ ॥ इति |
श्रीशिवमहाएराण भाषाटीकायां रुद्रसंहितान्त्ग॑तचतुं ुमारखण्डे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
2४
|
बह्माजी बटे इस प्रकार शरुवीरनाशी वीरभद्रको
॥ १ ॥ तंन महाबली महातेजस्वी कात्तिकेयने बडा क्रो
गणोसहित जय जयकार करने ठगे ओर देवता ऋषि शरेष्ठ वाणीसे स्त १
बडा दुस्सह महाघोर सव भूर्तोको भय उपजानेवाठा वोर संग्राम होने ठ्गा ॥ ४ ॥ वह दोन गँ वीर शक्ति हाथमे लेकर परस्पर युद्ध करने
ठगे, हे खने ! उस समय सब देवता देखकर आश्व करने छगे ॥ ५ ॥ महा युद्ध करते हृए दोनोंका देह शक्तिम भिन्न होगया ओर
ब्रह्मोवाच ॥ निवार्य वीरभद्रं तं कुमारः परवीरहा॥समेच्छतारकवध स्मृत्वा शिवपदाम्बजौ ॥१॥ जगजौथ महातेजाः कार्तिकेयो
महाबलः॥ सत्रदः सोऽभवत्छुदध सैन्येन महता दतः ॥२॥ तदा जयजयेत्युकतंसर्वैदवेगणेस्तथा॥ संस्त॒तो वाभिरिष्टाभिस्तदेव
ह निवारण करके शिवजीके चरण कमलको स्मरण कर तारकके वधृकी इच्छा कते हए
४ च सुरविभिः ॥३॥ तारकस्य कुमारस्य संममोऽतीव दुस्सहः॥जातस्तदा महाघोरस्सर्वधूतभर्यकरः॥ ९ ॥ शक्तिदस्तौ चं तौ
ध किया, ओर करोधकर बडी सेना ठेकर चछा ॥ २ ॥ उक्त समय सव देवता अपने
ति करने ठे ॥ ३ ॥ तव उक्त समय तारक असुर ओर कुमारका
शिणपु°
॥३५५]]
वीर युयुधाते परस्परम्॥ स्वेषां पश्यतां त महाश्वय॑वतां घने ॥ ५. ॥ शक्तिनिर्मित्रदेहौ तौ महासाधनसयुतौ॥ परस्परं वंचयेतो
सिंहाविव महाबलो ॥६॥ वैतार्कं समाधित्य तथा खेचरकं मतम् ॥ षापं तं च समाश्रित्य शक्तया शक्ति विजघ्नतुः ॥ ७॥
एमि्वैमंहवीरौ चकरतुयुदधमद्धतम् ॥ अन्योन्यं साधकौ भूत्वा महाबलपरकमौ॥८॥महाबलं ्रवतौ परस्परवधेषिणौ॥जघ्रतु
४ (१ रणे रणविशारदौ ॥९॥ धि कंठे तथाचो्वोर्जान्वोभरैव कटीतटे॥ वक्षस्युरसि पृष्ठे च चिच्छिदुश्च परस्परम् ॥१०॥
१०६.१ ||! || महाबली दो होक समान परल्पर दूसरे पर रहार करने छ्गे ॥ ६ ॥ वैतालिक ओर खेचर भतके युद्ध शाक्चका आश्रयं करके तथा
कृ.ख.४ ह| पापका आश्रय करक शक्तित परस्पर दूररेको भहार करने ठगे ॥ ७ ॥ इत रकार मंसे वे दोनों बीर परस्पर युद्ध करने छगे, ओर
अ०4० 1 एक दूसरेके साधक होकर अद्भुत युद्ध करने कगे ॥ < ॥ परस्पर एक दरूसरेके वधकी इच्छसे महावरपराक्रम करने छगे,
९ ओर युद्धम विशारद शक्तिथारासे परस्पर एक दूसरेको भारने रगे ॥ ९ ॥ शिर, कंठ, उरु, जाद, कटितट, छाती, हदय, पृष्ठम प्ररस्पर शहर
वमस्य
= ¶ र
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| गे ॥ १० ॥ उस समय् महाबली एक दूसरेकै मारनेकी इच्छसे युद्ध करते युद्धम अनेक भरकारकी चतुराई करते, वीरशब्दसे शब्द ।
| ॥ ११ ॥ सव देवता ओौर गेधवं परस्पर इत संधामको देखने ठगे ओर परस्पर कहने गे इतत युद्धमे किसकी जय होगी ॥ १२ ॥ उस
|| समय देवताओंको समञ्ञातिहुए आकाशवाणी इर कि,
यह कुमारही इस ॒तारकासुरको भारेगा ॥ १३ ॥ हे देवताओं ! तुम शोच मत करो,
सुखमे स्थित हो तुम्हारे निमित्त शिवजी प्रपते स्थित हृए ह ॥ १४ ॥ उस समय आकाशे उच्चारण की हुईं इक्त सुन्दर बाणीको सुनकर
अपने ग्णोकि सहित कुमार प्रसन्न हए ओर सुखपूरवक तारक अघुरके मारनेकी इच्छा की ॥ १५ ॥ ओर उन महाबाहूने तारककी छातीमे
तदा तौ युध्यमानौ च हन्तुकामो महाबलौ ॥ वरगन्तौ वीरशब्दै- नानायुद्धविशारदौ॥9 १॥ अभवन्तेक्षकास्सवे देवा गंधर्वकि
राः ॥ उचुः परस्परं तज कोरिमिन्युद्धे विजेष्यते ॥१२॥ तदा नभोगता वाणी जगौ देवां सात्वयन् ॥ असुरं तारकं चा
कुमारोऽयं दनिष्यति ॥१३॥ मा शोच्यतां सुरैः सवै सखेन स्थीयतामि ति॥युष्मदर्थ शृकरो हि पुत्ररूपेण संस्थितः॥ १४॥अत्वा
तदा तां गगने समीरितां वाचं शुभां सप्रमयेस्समावृतः ॥ निरदतुकामः सुखितः कुमारको दैत्या्विषं तारकमावभुत्तदा ॥ १९॥
शक्त्या तया महाबाहुराजघानस्तनांतरे ॥ कुमारः स्म रूषाविष्टस्तारकासुरमोजसा ॥ १६ ॥ तं प्रहारमनारत्य तारको देत्यपुं
गवः ॥ ऊमारं चापि संछद्स्स्वशक्त्या 1 सः ॥ १७॥ तेन शक्तिपहारेण शांकरिशच्छि तोऽभवत् ॥ शूतचितनां
भ्राप स्तूयमानो महपिभिः ॥ १८ ॥ यथा सिंहो मदोन्मत्तो दंतकामस्तथास्रम् ॥ कुमारस्तारकं शक्त्या स॒ जघान
प्रतापवान् ॥ १९ ॥ एवं परस्परं तौ हि कमारश्ापि तारकः ॥ युयुधातेऽतिसंरन्धौ शक्तियुद्धविशारदौ ॥ २० ॥
शक्ति मारी, ओर बडे क्रोधे पराक्रमके साथ उपे प्रहार किया ॥ १६ ॥ दैत्य तारकने उस भरहारका तिरस्कार करकं महाक्रोधकर अपनी
शक्तिको कुमारपर ्रहारकिया ॥ १७ ॥ उस शक्तिके परहारसे शिवजीके एव भूत होगये, ओर हर्षियोमे स्तुतिको प्राप्त हो क्षणभातमे उह
वेदे ॥ १८ ॥ जित भकार मदोन्मत्त होकर सिंह चरता है इसी भकार भरता
ह उ ताप्वात कुमारने उत्त असुरको शक्तिसे परहार किया ॥ १९ ॥ इस
रकार वह कुमार ओर तारक अग्रुर बडे वेगसे युद्धम चतुर घोर सथाम करने कगे ॥ २० ॥
१४६
उज्ज
२ व 1
०
79
ओर अश्यासकै कारण परस्पर जीतनेकी इच्छासे घोर
अनेक भ्रकारके बढते परस्पर एक दूसरेको प्रहार करने ठग,
शि दध करने लगे दौनोही पैदल युद्ध करनेवाले चितरहप बडे वेगवान् थे ॥ २१ ॥ ||&
8९ ओर अनेक मासि चरते हृए बडे पराक्रमसे गजने ठगे ॥ २२ ॥ दव गन्धव ||
ओर कुछ भी न बोटे ॥ २३ ॥ उस समय पवनका चलना
न होगदं ॥ २४ ॥ इमी अवेसरमै हिमाठ्यको आदि ठ
कै पुत्रने उन सबको आया हुमा देखकर उन स्वको
ओर किन्नर सन खडे होकर देखने ठगे, ओौर परस्पर परं विस्मयको प्राप्त हए
४ बन्द होगया, सरथं कान्तिहीन होगये पवेत बनकाननके सहित सब परथिवी चटायमा ¢
जघतुः ॥ नानामागानपरहर्बन्तौ गजंतौ सुपराकमौ॥२२॥अवरोकपरास्सवे .देवगंधर्वक्ननिराः॥ विस्म परमं जग्भुनोचः किचन
तत्र ते॥२२॥न ववौ पवमानश्च निष्परभोऽभुदिवाकरः ॥ चचाल वसुधा सवा सराट्वनकनना॥२४ ॥एतस्मिन्नेतरे त्र दिमाल ||&
¢ यसुखा धराः॥सनहार्दितास्तदा जगुः कुमारं च परीप्सवः॥२५॥ततस्स् दका तान्सरवान्भय भीतां शांकरिः॥पव॑तान्गिरिजापु्ो |
बभाषे परिबोधयन्॥२६॥छमार उवाच ॥ मा िद्यतां महाभागा मा चितां कतां नगाः॥घातयाम्यदच पापिष्ठं स्ेषांवः प्रप्य ||
ताम्॥२७॥एवं समाश्वास्य तद् पर्वतान् निर्जरान् गणान्॥ प्रणम्य गिरिजां शंभुमाददे शक्तिषुत्प्रभम्॥२८॥ तं तारकं हंतुमनाः ¢
|| करस्य कोकङकेशकरं च तम्॥३०॥पपात सद्यस्पदसा विशीर्णागोऽसुरः कषितौ॥तारकारम्यो महावीरस्सर्ाघरगणापधिपः॥३१॥ ६
ठ समञ्चाते हृए कहा ॥ २६ ॥ कुमार बोडे महाभागो ! तुम खेद ओौर चिन्ता मत करो तुम सबके देखतेही मे इस पापिष्ठका वध कर्गा
र)
| ॥ २७ ॥ इस प्रकार पर्वत देवगण गिरिजा ओर शकरको प्रणाम करके उन्होने प्रमावाटी शक्तिको श्रहण किया ॥ २८ ॥ वह
ठेकर पर्वत स्नेहे व्याकु होकर कुमारक समीप आये ॥ २५ ॥ तव॒ शकर =
८ अभ्यासपरमावास्तामन्योन्यं विजिगीषया॥पदातिनौ युध्यमाघ्नौ चिचपौ तररिवनौ॥२१॥विविधरवातपुज॑स्तावन्योन्यं विनि ¢
करशक्तिमेहाप्रुः ॥ षिरराज महावीरः कुमारश्शंषुवालकः॥२९॥ शक्त्या तया जघानाथ कुमारस्तारकासुरम् ॥ तेजसाव्यशशं
रभ्स.२ ||
कु.खं.४
अ०१० ४
महाभमु हाथमे शक्ति ठेकर तारकके मारनेकी इच्छासे बह शिवजीके नाक महावीर बडी शोभाको प्राप्त हए ॥ २९ ॥ तव ||
तेजसे भरे हए कुमारने लोकके हेश करनेवाठे उस तारकासुरपर श्रहार किया ॥ ३० ॥ उरस्षी समय वह तारक नामक महाबीर सव
| गणो ओर अरोका अधिपति सब अङ्गे विशीणे होकर तत्काल पृथिवीपर भिर पडा ॥ ३३ ॥ हे मुने ! ज्र इस पकारसे |
तारक अश्षुरको कमारने मारा, तब वह सवके देखते देखते नष्ट शिगया ॥ ३२ ॥ इत प्रकारसे बख्वान् तारकको मरा हुआ देखकर बरीरने गत
प्राण जानकर किर उस्र पर प्रहार न किया ॥ ३३ ॥ उस्र महाबछी तारक देत्यके नष्ट॒होजाने पर देवताओंने बहते अुरोका नाश कर
दिया ॥ ३४ ॥ कों तो उस॒ युद्धम रकर हाथ जोडने ठे, कोई छिन्न भिन्न होकर सहसो भर गये ॥३५॥ कोई व्याकुल होकर कुमारकी
शरणमे गये ओर हाथ जोडकर रक्षा करो रक्षा करो रेस्रा कहने रगे \३६॥ कितनेही तो भारे गये, ओर कितनेही भाग गये, ओौर पठायन
कुमारेण हतस्सोतिवीरस्स खलु तारकः ॥ ख्यं ययौ च तत्रैव सर्वेषां पश्यतां सुने॥ ३२॥ तथा तं पतितं दृष्टा तारकं बलवत्तरम् ॥
न जघान पुनर्वीरस्स गत्वा व्यसुमादवे॥३३॥ हते तस्मिन्महादेत्ये तारकाख्ये महाबरे॥ क्षय प्रणीता बहवोऽसरा देवगणेस्तदा
॥२३४॥केचिद्धीताः प्रांजख्यो बभूवुस्तज चाहवे ॥ छिन्नभित्नांगकाः केचिन्मृता देत्यास्सदस्रशः॥३५॥केचिनाताः मारस्य शरणं
श्रणाथिनः।।वदन्तः पाहि पादीति दैत्याः सांजलयस्तदा॥२६॥ कियंत हतास्तत्र किय॑तथ पलायिताः॥पलायमानाग्यथिता
स्ताडिता निजेगेणेः॥३७॥खहखशः प्रविष्टास्ते पातारे चजिजीषवः॥ पलायमानास्ते सव माथा दैन्यमागताः॥३८॥ एवं सर्व `
दैस्यसेन्य भ्रष्ठ जाते मुनीश्वर॥न केचित्तच संतस्थुर्गणदेवभयात्तदा॥३९॥आसीतनिष्कंटकं सर्व इते तस्मिन्दुरात्मनि ॥ ते देवाः
सुखमापत्रास्सवे शक्रादयस्तदा॥०॥एवं विजयमापत्नं कुमारं निखिलास्सराः॥बधुबुरयगपदष्ठाक्िलोकाश्च महासुखाः॥७१॥
होते हुए व्यथित ए ओर देवताओं ताडित हए ॥ ३७ ॥ ओर उने सेकडो अपने जीवनकी रक्षके निमित्त पातालम भवि हुए ओर भागते
हुए उन दैत्योकी सम्पूण आशाय भग्न होगरई ॥ ३८ ॥ हे शनीश्वर ! इस भाकर सव दत्यो सेना न्ट होगई देवताओंके भयसे कोई भी
ह|| वहां स्थिति करनेको समथ न हुए ॥ ३९ ॥ उस दुरात्माके मरनेसे सब निष्कंटकता होगई ओर सब इन्दरादिकं देवता बडे सुखको भाप हृष
॥ ४० ॥ इस भ्रकारसे विजयको भराप्त होकर सब देवता एक साथही प्रसन्न होगये, ओर त्रिटोकीमे महा आनंद छागया ॥ ४१॥ `
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(2.
यायसः
2९9८9२4
कर वहां गये ॥ ४२॥ उर्यंके ।
उस समय शिवजी भी अपने कुमारकी विजयको प्रप्त होकर अपने गण ओर भ्रियाकै सहित प्रसन्न हो य
प॒मय अपने ए्रोके सहित हिमाठ्यभी
कांतिवारे कुमारको अपनी गोदी छेकर सहसे व्याप्त होकर पावती लाड करने ठगी ॥ ४३ ॥ उती घ
वहां आये ओर अपने बंधुओ सहित शंकर पार्वती कुमारको प्रशेसासे भसन करने ठगे ॥ ४४॥ उस समय सव देवता गण मुनि, सिद,
चारण, शिव, शिवा ओर कुमारकौ स्तुतिकर उनको प्रसन्न करने ठगे ॥ ४५ ॥ उपदेवा शूोकी बडी वर्षां करने ठगे गधरदपति गाने
!
&|| . तदा शिवोऽपि तं ज्ञात्वा विजयं कार्तिकस्य च ॥ तथाजगाम स दा सगणः प्रियया. सह ॥४२॥ स्वात्मजं स्वाकमारोप्य
| ॐमारं सूरयवचैसम् ॥ लालयामास सुप्रीत्या शिवा च स्नेहसंइा ॥४३॥ हिमालयस्तदागत्य स्वपुत्रः परिारितिः ॥ सब
६ धुस्सावगश्शंुं तुष्टाव च शिवां गुहम् ॥४४॥ ततो देवगणास्सवे शुनयस्सिद्धचारणाः॥ तुष्टुबुश्शांकरिं शंथु गिरिजां तुषितां
शि०्पुर &
भृशम् ॥ ९५ ॥ पुष्पवृष्टि समहतीं चकरुोपसुरार्तदा ॥ जयुगधवपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ४६ ॥ वादिाणि तथा ||&
ह
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ट
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॥३५.॥
नेदु स्तदानीं च विशेषतः ॥ जयशब्दो नमः शब्दो बधूवोेशुहु्हः ॥ ४७ ॥ ततो मयाच्युतश्ापि संतुष्टोभूद्विशेषतः ॥
शिवे शिवां मारं च संतुष्टाव समादरात् ॥ ७८ ॥ कुमारमतः कृत्वा हरिकेन्द्रशुखास्॒राः ॥ च्घनीराजनं प्रीत्या
युनयश्वापरे तथा ॥ ४९॥ गीतवादि्रघोषेण ब्रह्मघोषेण भूयसा ॥ तदोत्वो महानासीत्कीर्तनं च विशेषतः ॥ ५० ॥
कगे ओर अप्सरा चृत्य करने रगं ॥ ४६ ॥ उप्त समय विशेषहपते बाजे बजाने कगे, जय शब्द ओर नमः शब्द वारंवार ऊंचे स्वरसे होति
ठगा ॥ ४७ ॥ तब भं ओर अच्युत भगवानू भी विशेष पसे सन्तुष्ट हए, ओर आदरसे शिव शिवा भौर कुमारकी बडी बडाई की ॥ ४८ ॥
ठै तब हरि बरहम इन्द्रादिक देवता कुमारको आगे करके सुनियोंसहित उनकी आरती करने ठगे ॥ ४९ ॥ गीत बाजे ओौर वेदध्वनिते तथा
‰ | कीतेन करनेसे बह उत्सव महानु होगया ॥ ५० ॥
रुस्.
कु.खे.४
|
ं । संनि ! गीत बाजे ओर अजटी वांधनेसे तथा सब देवताओं जगतूपति शंकर स्तुतिको भाप हो बडे भरसन्न हुए ॥ ५१ ॥ त
ट| ख सव देवताओं स्तुतिको प्राप्त हो जगदम्बा ओर अपने गणो सहित कैठास् पर्वतको गये ॥५२॥ इति श्रीशिवमहाएराणे भाषारीका्या
£| ० च० क" तारकासुरवधो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ बरहमाजी बोठे हे नारदजी ! उसरी समय करौ चनामक पर्वत बाण नामक दैत्ये
पीडित हो कुमारकौ शरणमे आया ॥ १ ॥ वह बाण अमुर कुमारका तेज न सह॒ सकनेके कारण युद्धे भाग गया था उप्तम दश सहश्च
गीतवायेस्सुपरसत्ेस्तथा साजकिभि्ुने॥ स्तूयमानो जगत्राथस्सवदषरगणेरभूत्॥५१॥ ततस्स भगवाघद्रो भवान्या जगदंबया ॥
सर्वः स्तुतो जगामाथ स्वगिरिं स्वगणे्वृतः॥५२॥इति श्री शिवमहापुराणे द्वितीयायां शद्रसंहितायां चतुर्थं मारखण्डे तारका
सुरवधदेवोत्सववर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥ ब्रह्मोवाच ॥ एतस्मिन्नंतरे तज कौचनामाचलो शुने ॥ आजगाम कुमारस्य
श्रणं बाणपीडित ॥१॥ पलायमानो यो युद्धादसोढा तेज रेश्वरम्॥ त॒तोदातीव स कौञ्चं कोरयांयुतबलान्वितः॥२॥परणिष
त्य मारस्य स भक्त्या चरणाम्बुजम् ॥ प्रेमनिर्भरया वाचा तुष्टाव ग॒हमाद्रात् ॥ २ ॥ कंच उवाच ॥ कमार स्कंद देवेश
तारका सुरनाशक ॥ पाहि मां शरणापत्रं बाणासुरनिपीडितम् ॥४७॥ सगरात्ते महासेन सञच्छिन्नः पलायितः ॥ न्यपीडयज्च
मागत्य हा नाथ कर्णाकर ॥५॥ तत्पीडितस्ते शरणमागतोऽहं सुदुःखितः ॥ पलायमानो देवेश शरजन्मन्दयां ङ् ॥६॥
कोटी बछ था यह कोँचको बडा कष्ट देता था ॥ २ ॥ क्रौंच प्रभ भकिततते कुमारक दोनों चरणोको पकडकर परेमभरी वाणी बडे आद्रसे
बोढा ॥२॥ कंच बोढादे कुमार! हे स्कन्ध ! हे देवेश ! हे तारक असुरके नाशक ! मँ बाण दैत्ये बडा पीडित हं भेरी रक्षा करो
£ ॥ ४ ॥ हे महासेन ! बह आपके युद्धे व्याकुठ होकर भाग गया है हे नाथ ! हे करुणाकर ! अव बह शच परीडित करता है ॥ ५॥ उस
बाण असुरे पीडित होकर भँ आपकी शरण आया ह हे शरजन्मा ! हे देवेश ! उस भागनेवाङेते भेरी रक्षा करो ॥ & ॥
मिय ~~~
>>
> १ बीधं आरवः
शि०पुण
॥ २.८ ॥
शिवजीको स्मरण किया ॥ ८ ॥ ओर बाणके उश्यते शकरकै आत्मजने
हे विभो ! उश्च बाण नामक दैत्वको मारकर शने षु
॥ ७॥ नाजी बोटे जव इस भ्रकारसे करौ चने कुमारकी स्तुति
ली करो, आप विशेषकर दैत्योक मारनेवाडे देवताओके रक्षक अपने तैजसे भकाशित हौ
की तवं वह भक्तवत्स भ्रसन्न ईए ओर शकितको हथामे धारणकर मन्त
उस्र शक्ितिको छोडा, उस समय महाशब्द हौ उढा, ओर दशो
मियो सहित बह शक्रित भस्म करके शीघही कुमारकं समीप छोट
आई ॥ १० ॥ तब भ्रमु कुमारने परवतभेष्ठ॒करौचसे कहा अथ तुम॒निभेय अपने घरको जाओ, बह दैत्य नष्ट होगया ओर उसके अनुचरभी
दैत्यं तं नाशय विभो बाणाह्न मां सुखीडुर् ॥ दैत्यघ्नस्त्व विशेषेण देवावनकरस्स्वराट् ॥७॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति क चस्तुत
रस्कन्दः प्रसन्नो भक्तपारकः ॥ गृहीत्वा शक्तिमतलां स्वां सस्मार शिवो धिया ॥८॥ चिक्षप ता समुद्दिश्य स बाणं शंकरा
त्मजः ॥ महाशब्दो बभूवाथ जज्वलुश्च दिशो नभः ॥ ९ ॥ सबलं भस्मसात्कृत्वासुरं ते क्षण मानतः ॥ गुहोपकंठं शक्तिस्सा
जगाम परमां सने ॥ १० ॥ ततः कुमार प्रोवाच क्रौचं गिरिवरं परस: ॥ निर्भयस्स्वगृहं गच्छ नष्टस्स सबलोऽसुर्ः ॥ ११ ॥
तच्छत्वा स्वामिवचनं दितो गिरिराट् तदा ॥ स्तुत्वा गुह तदाराति स्वधाम भ्यपद्यत ॥ ३२ ॥ ततः स्कन्दो महेशस्य
मदा स्थापितवान्धने ॥ ओणि छिगानि तत्रैव पाप्रानि विधानतः ॥ १३॥ परतिज्ञश्वरनामादौ कपटेश्वरमादरात् ॥ ङमा
रेश्वसमेवाथ स्वसिद्धिषदं अयम् ॥१४॥ पनस्सवेशवरस्त्र जयस्तं मसमीपत्ः ॥ स्त॑मेश्वरामि्धं छग गुहः स्थापितवान्बुदां
॥ १९ ॥ ततस्सवे सुगस्तञ विष्णुप्रभृतयो शुदा शिगं स्थापित्वंतस्ते देवदेवस्य शूलिनः ॥ १६ ॥
मारे गये ॥ १३ 1 स्वामीके वचन सुनकर क्रौंच बडा भ्रसन्न दुभा, ओर कुभारकी स्तुतिकर अपने धामको गया ॥ १२ ॥ तब वहां प्रसन्न
होकर कमारने पापक दर करनेवाठे शिवजीके तीन टिगोको स्थापित किया ॥ १२ ॥ तीनोंके नाम परतिज्ेश्वर. कपाटेश्वर ओर कुमा
श्वर हृए यह तीनोंही सब सिदध देनेवारे है ॥ १४ ॥ ओर उस जयस्तंभके समीप सेश्वर छग स्थापन किया ओर एकं हिंग स्तभेश्वर
नामसे उसके समीपम स्थापन किया ॥ १५ ॥ फिर सव विष्णओआदि देवताओने देवदेव शकरका डिग वहां स्थापन किया ॥ १६ ॥
दिशा भ्रज्वकित हो उदं ॥ ९ ॥ क्षणमात्रम उस्र अघुरको उसके अनुगा
| | सम्पूणं ठि्गोकी अदत महिमा हदं जो सव कामना देनेवाठे तथा भक्तिकरनेवार्टोको सक्ति देनेवाठे थे ॥ १७ ॥ तव् विष्णु आदि | |
ठ देवताओंने बडे प्ेमसे एत्रको आगे करके पवतभष्ठ कैठासमे जनेकी इच्छा की ॥ १८ ॥ उसी समय कुखद नापकं शेषजीका पजर दैत्ये
& पीडित हुआ कुमारकी शरणमे आया ॥ १९ ॥ इस युद्धम जो प्रठम्बासुर नामक देत्य परायान होगया था वह तारकासुरका अगामी टै ॑
४ वहां जाकर उपद्रव करने खगा ॥ २० ॥ वह शेषजीका एत्र कुद महामति था, गिरिजाषुत्र कुम।रकी शरणमे आकर उनकी स्तुति करने त
र सर्वेषां िवणिगानां मरहिमभृत्तदाद्धतः॥स्वेकामप्रदश्चपि शक्तिदो भक्तिकारिणाम् ॥१७॥ ततस्सवं सरा विष्ण॒प्रखाःपरीतमा
९ नसाः ॥ देच्छन्गिरिवरं गंतु पुरस्कृत्य गुहे खदा ॥ १८ ॥ तस्मिन्नवसरे शेषपुत्ः कषुदनामकः ॥ आजगाम मारस्य शरणं
४ देत्यपीडित्ः ॥१९॥ प्ररुबाख्योऽसुरो यो हि रणादस्मात्पलायितः ॥ स तत्रोपद्रवं चके प्रबरस्तारकालुगः ॥ २० ॥ सोऽथ
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शेषस्य तनुयः छखुदोऽदिपतेमेहान् ॥ कुमारशरणं प्राप्तस्तुष्टाव गिरिजात्मजम् ॥ २१ ॥ कुसुदउवाच ॥ देवदेव महा देववर
तात महा प्रभो॥ पीडितोऽईं भ्रखबेन त्वादं शरणमागतः ॥ २२ ॥ पाहि मां शरणापत्नं परवा खुरपीडितम् ॥ कुमार स्कन्द
देवेश तारकारे महाप्रभो ॥२३॥ त्वं दीनबंधुः करूणासिन्धुरानतवत्सरः ॥ खखनिहकर्तां हिशरण्य् सतां गतिः ॥२४॥
कुषुदेन स्तुतशत्थं विक्ञप्तस्तद्रधाय हि ॥ स्वाञ्च शक्ति स जमाह स्पृत्वा शिवपदां्ुजौ ॥ २५ ॥
ख्गा ॥ २१ ॥ कुद बोला हे देषदेव महादेवके एत्र ! हे महाप्रभो ! मै प्रङम्ब अद्षुरसे पीडित होकर आपकी शरणमे आया हूं ॥ २२ ॥
हे कुमार ! हे स्कन्द ! देवेश ! हे तारकके शतु ! हे महापभो ! परटम्बासुरसे पीडित भेरी आप रक्षा करो ॥ २३ ॥ आप दीन्वधु करूणा
सागर भक्तवत्सङ हँ आप दुषटोके निग्रहकती शरणागतवस््षङ सत्रुषोके गति है ॥ २४ ॥ जब कुदने इस भकार स्तुतिकर देत्यके वधक
निभित्त कहा तब महाप्रभुने शंकरके चरण कमलोको स्मरणकर शक्तिको अहण किया ॥ २५ ॥
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१९ वादान्तशान्तेत.उभ।वः ।
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शि०्यु० ओर गिरिजाए्रने उस प्रटम्बके वध उदेश्यसे उस शक्तिको छोडा, उस् समय महाशष्द् होकर आकाश ओर दिशाय भ्ज्ख्वि हौ उटी
॥३५९ ॥ २६ ॥ १०००० बऊ बली अघुरको वह शक्ति अलचरोसहित भस्म करके अभतिहत गतिते कुमारके समीप आग, यह उसका |
= अनुचरो [^ €
त विचित्र कमं हुभा ॥ २७ ॥ तन कमारने शेषजीके एत्र कुखदसे कहा वह अद्र अपनं अनुचरो सहित भारा गया अव तुम निभेय अपने
घरको जाओ ॥ २८ ॥ तव रोषजीका एत्र कमारफे यह वचन सुन निर्भय हो कुमारकी स्तुतिकर भरणामकर पाताढको गया ॥ २९ ॥
हे सनीश्वर ! इस प्रकार यह आप्ते कुमारको विजय वणन की, यह तारकवधका चरित्र परम आश्वय॑का करनेवाखा है ॥ ३० ॥ यह सव
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‰|| चिक्षेप तां सघुदिश्य भ्रल्बं गिरिजाुतः ॥ महाशब्दो बभूवाथ जन्वटुश्च दिशो नभः॥२३।तं सायुतबलं शक्तित कत्वा च
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नष्टस्स सबरोऽघरः ॥२८॥ तच्छत्वा गहवाक्यं स कुधदोदिपतेस्स॒तः॥ स्तुत्वा मारं नत्वा च पातालं खुदितो ययौ ॥२९॥
एवं कुमारविजयं वर्णितं ते खनी वर ॥ चरितं तारकवधं प्रमाश्वयंकारकम् ॥३०॥ सर्वपापहरं दिव्यं सर्वकामप्रदं नृणाम् ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं युक्तिषुक्तिश्रदं सताम् ॥ ३१॥ ये कीतयति सुयशोऽभितभाग्यगुता नराः ॥ कुमारचरितं दिष्यं शिव
लोकं प्रयांति ते ॥ ३२ ॥ श्रोष्यति ये च तत्कीतिं भक्त्या श्रदधान्विता जनाः ॥ शुक्ति प्राप्स्यन्ति ते दिभ्यामिह युक्ता पर
सुखम् ॥२३॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसंहितायां चतुथं कुमारखंड बाणप्रलंबवधडमार विजयतवर्णनं नामेकाद
शोऽध्यायः ॥११॥ ब्न्नोवाच ॥ निहतं तारकं दक्षा देवा विष्णुषुरोगपाः॥ तुष्टुबुश्शां करि भक्त्या सर्वेऽन्ये श्ुदिताननाः ॥१॥
पापका हरनेवाखा प्रम॒दिव्य बलुरष्योको सब काम देनेवाठा है, यह परम धन्य यश आयु ओर भुक्ति युक्तिका देनेवाढा है ॥ ३१ ॥
जो मनुष्य इसका कीतेन करेगे, उनको बडे भाग्यकी प्राप्ति होगी, इश्च दिव्य कुमार चरित्रके सुननेसे शिवटोककी प्राप्ति होगी
॥ ३२॥ जो मनुष्य शद्धा भक्तिसे उनकी कीति सुनगे, बह यहां परम सुख भ्रोगकर अन्तमं दिव्य मुक्तिको प्राप्त होंगे ॥ .३३ ॥
| इति श्रीशिवमहाएराण भाषारीकायां ₹° च० ° एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ ब्ह्ाजी बोले तारक दैत्यको भ्रा हुआ देखकर विष्णः
रुभे. २
कु.खं.४
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भस्मसात् ॥ गुशेषकंठं सहसाजगामाङ्किष्टवारिणी ॥२७॥ ततः कमारः प्रोवाच कुखुदं नागबालकम् ॥ निभयः स्वगृहं गच्छ #
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। देवता भरसन्न होकर कमारकी स्पुति करने ठगे ॥ १ ॥ देवता बोटे हे कल्याणहप ! आपको ` नमस्कार है आप विश्वके भगठहप है |
विश्वके बेधु ! हे विश्वभावन आपको प्रणाम है ॥ २॥ हे बडे कडे दानवो मारनेवारे बाणासुर परठम्बासुरके नाश करने वाठे पवितरप शंक
रसुबन आपको प्रणाम है ॥ ३ ॥ आपही कती ओर जगते भर्ता हो तुम्हीं हतां हो हे अभे भरगट॒होनेवाछे ! आप प्रतनन हूजिये, यहं
सव छोकका पच आपका विम्बस्वखूप है; हे दीनबेधो ! हे शंभुके एत्र ! आपको प्रणाम है ॥ ` ४ ॥ हे देवरक्षा करने वारे स्वामिन् ।
भमो । हमारी सदा रक्षा करो हे देवताओंकै प्राणोंकी रक्षा करने वारे, हे करुणामय, आप भसन्न हूजिये ॥ ५॥ हे विभो ! तारक दैत्य
देवा उचुः ॥ नमः कल्याणङ्पाय नमस्ते विश्वमंगल॥विश्वबेधो नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन॥२॥ नमोस्तु ते दानववर्हे
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बाणासुरप्राणदराय देव॥ प्रलंबनाशाय पतिच्ररूपिणे नमो नमश्शंकरतात तुभ्यभ्॥३॥त्वमेव कर्तां जगतां च भर्ता त्वमेव हत्ता
शचिज प्रसीद्॥ परपञ्चभूतस्तव लोकबिवः प्रसीद शम्भ्वात्मज दीनबधो॥४।देवरक्षाकर स्वामिनक्ष नस्सवेदा पभो॥देवपाणावन
कर प्रसीद कर्णाकर ॥५॥ हत्वा ते तारकं देत्य परिवारयुतं विभो॥मोचितास्सकला देवा विषद्धयःपरमेश्वर॥६।बरह्मोवाच॥
एवेस्तुतः कुमारोऽसौ देवेिष्णुसुखेः परथुः॥वरान्ददावभिनवान्सवभ्यः कमशो धने॥७॥ैखािरीक्ष्य स्तुवतस्ततस्स गिस्थिा
त्मजः ॥ सु्रसन्नतरो भत्वा प्रोवाच प्रददद्धरान् ॥८॥ स्कन्द उवाच॥ यूय सवे पर्वता हि परूजनीयास्तपस्विमिः॥कर्मिभिज्ञानि
भिन्चैव सेभ्यमाना भविष्यथ ॥९॥ शंभोर्विशिष्टहूप।णि छिगह्पाणि चैव हि॥भविष्यथ न संदेहः पवता वचनान्मम ॥१०॥
मारकर हमारी रक्षा करो हे परमेश्वर ! आपने विपत्तिसे सब देवता्ओंकी रक्षाकी है ॥ ६ ॥ बह्लाजी बोढे जव इस भकारसे विष्ण आदि देवं
ताओंने कुमारकी स्तुति की हे ने ! तश्र कुमारने सबके निमित्त नये नये वर दिये
३ ॥ ७ ॥ प्वेतराजकी स्तुति घुनकर गिरिजासुतने भसन
हो बर देते हए इस प्रकारसे कहा ॥ < ॥ स्कन्द ॒बोखे तुम सव प्त तपस्वियोति पूजित हो तुम कर्मेकाण्डके ओर ज्ञानियोकै हारा सद
सेवित रहोगे ॥ ९ ॥ शिवजीकै विशिष्ट ओर रिगरूप पवेत होगे इस भेरे वचनम सन्देह नही, है ॥ १० ॥
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जो यह पतोत्तम हिमाख्य मेरे नान मह।भाग तपसिव्योके फठ देनेवाटे होगे ॥.११ ॥ देवता बोडे असुरपति तारकको आपने मारा
ओर हिमाठयको बर दिया है, हरि - चराचर पराणि्योको दमने सुखी किया है ॥ १२॥ अव इस समय शिवा शम्भु अपने माता
पिताक साथ आप कैलास्तको चट ॥१३॥ बह्ञाजी बोठे इस भकार विष्णभादि सव देवता कहकर महौत्सव करने छग ओर कुमार कैठासको
चने छगे ॥ १४ ॥ जिस समय विभु कुमार केठासको चलने गे उस समय महा मंगलदायक जय शब्द होने र्गा ॥ १ 4॥ न परम्
ऋदिवाठे विमानप्र आरोहण किया, जो सब भकारे अटंकत प्रम मनोहर तथा सवके ऊपर विराजमान था ॥ १६ ॥ भने ओर विभ्ये
योऽयं मातामहो मेऽध्य हिमवान्परवतोत्तमः ॥ तपस्विनां महाभागः एक्दौ हि भविष्यति ध १।देवा उचुः ॥ एवं दत्वा वरा
न्हत्वा तारकं चासुराधिपम् ॥ त्वया कृताश्च सुखिनो वयं सवं चराचराः ॥ १२ ॥ खट सुप्रीत्या केलास गिरिशाल
यम् ॥ जननी जनकौ द्रष्टं शिषाशंभू त्वमसि ॥ १३ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता निखिला देवा विष्ण्वाद्याः प्राप्ुशास्नाः ॥
कृत्वा महोत्सवं भूरि सकुमारा ययुगिरिम् ॥१५॥ कुमारे गच्छति विभौ केरासे शंकरारयम्॥ महा्मगलघुत्तस्थौ जयशब्दो
बभूव ह ॥१५॥ आश्रोह कुमारोऽसौ विमानं परमद्धिमत् ॥ सर्वतोलंकृतं रभ्यं सर्वोपरि विराजितम् ॥१६॥ अहं विष्णुश्च
समुदौ तदा चामरधारिणोौ ॥ गुह मूधिनि महाप्रीत्या सुनेऽभूव ह्यतंदितौ ॥ १७ ॥ इन्द्रा्ा अमरास्सवें कुर्वतो गुहसेवनम् ॥
यथोचितं चतुरदिश्च जग्बुअ प्रषुदास्तदा ॥१८॥ शमोजंयं प्रभाषतः प्रापुस्ते शथुपवतम्॥ सानेदा विषिशयुस्तबोच्चरितो मगल |
ध्वनिः ॥ १९ ॥ दृष्ठ शिवं शिवां चेव सवे विष्ण्वादयो हुतम् ॥ प्रणस्य शंकरं भक्त्या करौ बदृध्वा विनघ्रकाः ॥ २० ॥
भरसन्न हो कुमारपर चमर धारण किया; हे शने ! इस भकार आठ रहित हो गुहकै मस्तकपर चमर धारण किंया गया ॥ १७ ॥ इन्दरादिक |
सव देवता भी शुहका सेवन करने छगे ओर यथा योग्य ब देवता उनके चारो ओर गमन करने कगे ॥ १< ॥ शिवजीकी जय
उच्चारण करते हूए बे शिवजीके पवेतमे प्व ओर आनन्दे भगरध्वनि उचारण करते _हुए सबने उमे भरवेश किया ॥ १९ ॥ सब विष्ण
आदि शिवा शिवका दशन करके बडी शीघ्रतासे शक्तिपुवेक शंकरको प्रणाम कर हाथ जोड खडे हौ गये ॥ २० ॥
| ए्रको देखकर वह दोनों देव बहृतही भन्न हुए ॥२२॥ महाभमु शकरने पुत्रको उटाकर गोदीमे बेठाया ओर जञहसे शिर रदैषकर हाथते ं
किया ॥२३॥ शिवजीने महा आनंदमे भरकर पुत्रका खख चुम्बन किया ओर उस तारकके शन महा भमु कुमारका बडा लेह किया ॥२४॥ परावती |
नेभी एत्रको उढाकर गोदीभें छया, ओर शिरफे ऊपर हाथ रखकर खख चम छिया॥ २५॥हे नारदजी ! उस समय उन दोनोंका भेम बहत बढ गया ठ
कुमारोऽपिविनीतात्मा विमानादवतीयं च ॥ प्रणनाम सदा शंभुं शिवां सिदहास्नस्थिताम् ॥२१॥ अथ द्ा कुमारं तं तनय ठ
प्राणवदछभम् ॥ तौ देपती शिवौ देवौ ुुदातेऽतिनारद्॥२२॥महाप्रभुस्सशत्थाप्य तञचुत्संगे न्यवेशयत्॥ मूध्नि जघो खुदा स्नेदात्तं ठ
पस्पशं करेण ₹।॥२३॥। महानेदभरः शंयु्कार खुखचुबनम् ॥ कुमारस्य महास्नेहात् तारकारेभहाप्रभोः॥२७॥शिवापि तं सश्र
स्थाप्य स्वोत्संगे सन्यवेशयत्॥ कृत्वा मूध्नि महास्नेदात् तन्युखाब्जं चुचुम्ब हि॥२५॥ तयोस्तदा महामोदो वबुघेऽतीव नारद॥दंप &
त्योः शिवयोस्तात भवाचारं प्रकुर्वतोः ॥२६॥ तदोत्सवो महानासीन्नानाविधिः शिवाखये॥ जयशब्दो नमश्शब्दो बभूवातीव सर्वतः ६
ट
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|| कुमार भी बडी नघ्रतासे पिमानसे उतरकर सिंहासनप्र बैठे हुए शिव पारव॑तीको ग्षसे भणाभ करते हृए ॥२१॥ हे नारद ! तब उक् प्राणभिय अपने । |
॥२७॥ ततत्सुरगणास्सवे विष्ण्वाद्या षुनयस्नथा॥सुप्रणम्य खदा शंभु ठष्टुबुस्सशिवें शुने ॥२८॥ देवा उच्ुः॥ देवदेव महादेव
भक्तानामभयप्रद्॥ नमो नमस्ते बहुशः कृपाकर महेश्वर ॥२९॥ अद्भुता ते महदेव महालीखा सुखप्रदा॥ सर्वेषां शंकर सतां
दीनबंधोमदाप्रभो॥३०॥ एवं मूटधियश्चाज्ञाः पूजायां ते सनातनम् ॥ आवाहनं न जानीमो गतिं नैव परभोद्धताम् ॥ ३१ ॥
हे तात ! इस भरकारसे दोनों शी परुपोँने रौ किक आचार किया ॥२६॥ शिवमन्दिरे उस समय अनेकं भकतारका उत्सव होने खगा सब ओरसे जय
कार ओर नमस्कारका शब्द होने टगा ॥ २७ ॥ तब विष्णआदि सब देवता ओर खनि भरसन्नतास्षे शिवको प्रणाम कर स्तुतिसे भसन करने रुगे
६ ॥२८॥ देवता बोढे हे देवदेव ! महादेव भक्तोको अभय देनेवाङे आपको बहुत धकारसे नमस्कार है आप हमपर कपा कीजिये ॥ २९ ॥ हे
ठ॥ महादेव ! महासुखको देनेवाटी आपकी महारा सुखदायक है हे दीनवन्धु ! हे भहाभमो ] वह सबको महाकल्याणकारकं है ॥३०॥ हे प्रभो ! |
शि०्° ||| हम मूढबुदि है आपकी अदत सनातन भूजाको नहीं जानते हमारी गति नहीं है इस कारण हम आपका आवाहन नहीं जानते ॥ ३१
॥३६१॥ गंगाजठ्के धारण करनेवाे सवके आधार णोके आत्मा देवता ओके अधिपति शकरको वारवार रणाम है ॥ ३२ ॥ वृषध्वज महश. गरणोके
अधीश्वर सर्वेश्वर देव तरिठोकीके अधिपतिके निमित्त नमस्कार है ॥ ३३ ॥ हे नाथ ! अन्तमं आप सबका संहार करते हो आपको वारेवार ट
ट भणाम है हे देवेश ! सनातने आप इस जगतके भरण पोषक करने ओर रचनेवाठे हो हे भगवन् ! आप त्रियणोकिं अधिपति हो ॥ ३४ ॥ ¢
¢ तुम संगरहित परेश शिव परमात्मा हो निष्प्पंच शुद्ध प्रम अविनाशी आपको प्रणाम है ॥ ३५ ॥ दण्डधारी काटहप हाथमे पाश धारण ¢
|
गंगासङिकधाराय द्याधाराय शणात्मने॥ नमस्ते चिदशेशाय शंकराय नमोनमः॥ ३२॥वृषांकाय महेशाय गणानां पतये नमः ॥
ट
#|| सवश्वराय दैवाय मिरोकपतये नमः॥२२॥ संहर जगतां नाथ सर्वेषां ते नमो नमः॥ भत्रे क्र च देवेश बिगणेशाय शाश्वते
#/॥ ॥२४॥ िसंगाय परेशाय शिवाय परमात्मने॥ निष्प्रपंचाय श्ुद्धायपरमायान्ययाय च॥३८९॥दण्डडस्ताय काराय पाशदस्ताय
ते नमः ॥ वेदमंअप्रधानाय शतजिह्वाय ते नमः॥३६॥ भूतं भग्यं भविष्यच्च स्थावरं जगम च यत्॥तव देदात्सशुत्पन्नं सर्वथा
4
परमेश्वर ॥३७॥ पादि नस्सर्वदा स्वामिन्प्रसीद भगवन्परभो॥वयं ते शरणापत्नाः सर्वेथा परमेश्वर ॥३८॥शितिकण्डाय श्द्राय ||
स्वाहाकाराय ते नमः ॥ अङ्पाय सपाय विश्वपाय ते नमः॥३९॥ शिवाय नीरकंठाय चिताभस्मांगधारिणे ॥ नित्य नीर |
क शिखंडाय श्रीकण्ठाय नमोनमः ॥४०॥ सर्वप्रणतदेहाय सेयमप्रणताय च ॥ महादेवाय शर्वाय सवौर्चेतपदाय् च ॥ ४१ ॥ &
५ करनेवाठे वेदम १ भधान शतजिह आपको भणाम है ॥ ३६ ॥ भूत भविष्य वर्तमान स्थावर जंगम जो!कुक यह जगत है हे परमेश्वर ! यह ||
$ -ल-४ ||| सवेथा आपकी देहे उत्पन्न है ॥ ३७ ॥ हे भगवन् ! हे स्वामिन ! हे भभो ! हमारे ऊपर रसन होकर सदा हमारी रका करो हे परमेश्वर!
०१९ ||} सवेथा हम आपकी शरणमे भाप हुए है ॥ ३८ ॥ शितिकंड शद स्वाहाकारहूप आपको भणाम है, अरप स्वप िश्वप आपको भरणाम ८
२॥ हे ॥ ३९ ॥ शिब नीटकण्ठ अंगमे चिताभस्म धारण करनेवाठे नित्यही नीर शिखण्ड शरीकंड आपको प्रणाम है ॥ ४० ॥ सब आपको भणाम ॥4
| आप् संयमते दया होते, महादेव सवं आप हो, आपके चरणोको सब रणाम करते है, आपको नमस्कार है ॥४१॥ आप् सब |
ना, रुदो नीरलोहित, सव भूतोकी आत्मा है, सांरूयवाठे आपहीको परुष कहते है ॥ ४२ पवर्तो सुमेरु नक्ष्नोमे चन्द्रमा आपही हो |
ऋषिर्योमं वशिष्ठ देवतार्ओंमं इन्दर तुम हो ॥ ४३ ॥ हे महेश्वर ! वेदों ॐकार आप हो, सस्तारके रक्षक ठोकके हितके छिये सब भ्राणियोँकी ¢
रक्षा करते हो ॥ ४४ ॥ हे महाभाग महेश्वर ! हे सब प्राणिर्योको शुभाशुभ देखने वारे ! हे देवेश ! हमारी रक्षा करो, हम आपके वचनमे ठ
त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां श्द्राणां नीललोहितः॥ आत्मा च सर्वभूतानां सांख्यः पुरूष उच्यसे॥२॥पवंतानां सुमेर्स्त्वं नक्षत्राणां
च चन्द्रमा ॥ ऋषीणां च वशिष्ठस्त्वं देवानां वासवस्तथा ॥४३॥ उकारस्सर्ववेदानां आता भव महेश्वर ॥ त्वं च खोक ८
ताथाय भूतानि परिषिचसि।९॥ महेश्वर महाभाग श्युभाञ्चुभनिरीक्षक ॥ आप्यायास्मान्डि देवेश कत्रंन्वै वचनं तव्॥४५॥ ठ
ूपकोटिसदखेषु रूपकोटिशतेषु ते ॥ अतं गंत न शक्ताः स्म देवदेव नमोस्तु ते ॥४६॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति स्त॒त्वाखिला
| देवा विष्ण्वाद्याः प्रञचखस्थिताः ॥ अुहुस॑दस्सुप्रणम्य स्कंदं कृत्वा पुरस्सरम्॥४७। देवस्तुति समाकर्ण्य शिवस्सर्वेश्वरस्स्वराट्
६ ॥ सुप्रसन्नो बभूवाथ विजहास दयापरः ॥ ४८ ॥ उवाच सुप्रसत्रात्मा विष्ण्वादीन्सुरसत्तमान् ॥ शंकरः परमेशानो दीनबंधु
। स्सतां गतिः ॥४९॥ शिव उवाच॥हे हरे हे विधे देवा वाक्यं मे श्रृणतादसत्॥ सर्वथाहं सतां आता देवानां वः कृपानिषिः॥५०॥
स्थित है ॥ ४५ ॥ हे देवदेव ! आपके करोडों ओौर सहस्रो रूप है हम आपके अन्त पानेको समथ नहीं है, वारंवार आपको प्रणाम करते है ॥४६॥
ब्रह्माजी बोठे इस प्रकारमे विष्णु आदि सव देवता ओने स्तुति की ओर वारंवार भरणाभकर स्कन्दो आगे कर् स्थित हए ॥ ४७ ॥ देवताओंकी
स्तुतिको सुनकर वह सर्वेश्वर स्वराट् भसन होकर हसने कगे ॥४<॥ ओर प्रसन्न होकर विष्ण आदि देवताओं बह दीन्ब॑ध परमेशान सत्परुषोकी गति
शंकर कहने कगे ॥ ४९ । शिवजी बोठे हे हरे ! हे विधे ! हे देवताओ । आंदरसे भेरे वचन सुनो, सब भकारे भे सत्छरुषोंका रक्षक, देवताओंका ||2
१ रीलार्थकतृन्नं्तत्वान्न लोकेति निबेधात्कर्मणि न षष्ठो ।
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९ । | रक्षक, रुपाका सागर ह ॥ ५० ॥ मे दष्टोका मारमेषाा त्िठोकीका अधिपति भक्तवत्तर शंकर हं मँ सबका कत हता भती भौर ¢
॥३६२॥ त ह ॥ ५१ ॥ ह श्ेषठ देवताओ ! जव जब तुमको दुःख हो तब तव सुख पराकं निमित्त भेरा भजन करो ॥ ५२ ॥ ब्रह्माजी बौर इस भकार
है सव देवता ओर खनीश्वर भगवानके वचन सुन पार्वतीसहित शिवजी ओर कुमारको णाम कर आर्नदको प्राप्त हुए ॥ ५३ ॥ ॥ सव शिवा शिव ¢
ट ओर कुमारका यश कथन करते हए प्रम आनंदको पराप्त हो अपने २ स्थाननोको गये ॥५४॥ ह सन। अपने गण कमार ओर पार्वतीके सदित शिवजी
¢ दष्टद॑ता मिलोकेशश्शंकरो भक्तवत्सकः॥कत्ां मतां च हतां च सर्वेषा निर्िकारवाय्॥९१॥यद् यद् भवेददुःखं युष्माकं देवस
त तमाः ॥ तदा तदा मां यूयं वै भजतु सुखहेतवे ॥५२॥ ब्रह्मोवाच .॥ इत्याज्ञप्स्तदां देवा विष्ण्वाद्यास्सघुनीश्वरः ॥ शिवं
$| प्रणम्य सशिवं कुमारं च खुदान्विताः॥५२॥कथ्य॑तो यशो रम्यं शिवयोश्शाकिरे्च तत्॥ आनन्दं परमं प्राप्य स्वधामानि ययु
ट| संन॥५२॥।रिषोपिशिवया सर्द सगणःपरमेश्वरः॥ कुमारेण यतः श्रीतयोवास तस्मन् गिरौ घदा॥५५।त्येव कथितं सव कौमार
चरितं य॒ने॥ शेवं च सुखदं दिभ्य किमन्यच्छरोतुमिच्छसि॥५६॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्धसंहितायां चतु कुमारखंड
४ स्वामिकातिकचरितगारभतशिवाशिवचरितव्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥१२॥घरुत उवाच ॥ तारकारेरिति त्वा वृत्तमद्तयुत्त
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मम् ॥ नारदस्सुप्रसन्नोथ प्रच्छ भ्रीतितो विधिम् ॥१॥ ॥ नारद् उवाच ॥ देवदेव प्रजानाथ शिवज्ञाननिधे मया॥ तं काति
कसदृतमभृतादपि चोत्तमम् ॥२॥ अशना श्रोतुमिच्छामि गाणेशं वृत्तश्चुत्तमम् ॥ तजन्म चरितं दिष्य सर्वम्रगलमंगलम्॥ ३॥
ह ने ट ते न तं
४ भी प्रसन्नं होकर उस पवतम निवास करने रगे ॥ ५९५॥ हे शने ! इस प्रकार तुभे सव कुमारके चरित्रे कहे यह शिवजीके भक्तोको परम प्यारे
कुलं. है अव तुम ओर कया सुननेकी इच्छा करते हो ॥ ५६ ॥ इति भीशिवमहा्रागे भाषाटीकायां ₹० च° कु° शिवारिवचरितवर्णनं नाम ||
५०१३ ||| द्रादशोऽप्यायः ॥ १२.॥ खतजी बो कुमारके यह अद्ुत चरित्र सुनकर नारदजी भसन होकर परम प्रीतिसे फिर पूढने कगे ॥ १ ॥ नारदजी ठ
शे हे देवदेव ! हे प्रजानाथ ! हे शिव ! ज्ञानकै सागर ! मैने अमृतते भी गेष्ठ कार्विकेयका चरित्र भवण किया ॥ २॥ अव तँ गणे
चरित्र सुनता चाहता हं, उनका जन्मचरित्र बडा दिष्य ओर मंगलोंका भी मंगर करनेवाखा है ॥ ३ ॥ सतजी वोे हे महामुने | |
इस परकारसे नारदजीके वचन ' सुन हाजी भरसन्न होकर शिषजीको स्मरण करते हृए बोढे ॥ 9 ॥ बस्ाजी बोठे कल्पभेदसे गणेशजीका ||
जन्म अनेक भांति है, एकवार शनिक दृष्टि उनका शिरछेदन हआ ओर हाथीका शिर जोडा गया ॥ ५ ॥ इत समय हम श्वेतकल्प ||ह
हई गगेशकी उत्पत्ति कहते है, जिम रुपा शकरनेही उनका शिरछेदन किया था ¦ ६ ॥ हे सुने ! सृषटिकत करके विषये यह ||
सन्देह न करना, बह सबके अभिपति शंकर सुण निरण ह ॥ ७ ॥ बह ठीठासतेही स्व॒ जगदको उत्पन्न पाठन ओौर संहार करते है ट्
सूत उवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य नारदस्य महामुने ॥ प्रसन्नमानसो ब्रह्मा प्रत्युवाच शिवं स्मरन् ॥ 8 ॥ अह्नोवाच ॥ ट
करपभेददरणेशस्य जनिः प्रोक्ता विधेः परात् ॥ शनिदृष्टं शिरशिन्नं संचितं गजमाननम्॥ < ॥ इदानीं श्वेतकल्पोक्ता गणे
शोत्य्िरुच्यने ॥ यत च्छं शिरस्तस्य शिवेन च कृपाङना ॥ ६ ॥ संदेदो नाच कर्तन्यः शंकरस्शतिन्छने ॥ स हि सवां ||
धिपः शंथुनिंयंणस्सयणोऽपि दि॥ ७ ॥ तद्टीकयाखिकं विश्वं सृज्यते पारयते तथा ॥ विनाश्यते खनिगर्ठ पस्ततं शण चाद |©
रात् ॥ ८ ॥ उद्वाहिते शिवे चाज कैलासं च गत् सति ॥ कियता चेव कृलिन जातो गणपतेभेवः ॥ ९ ॥ एकस्मिन्नव काले
च जया च विजया सखी॥ पावैत्या च मित्वा वे विचारे तत्पराभवत् ॥ १० ॥ श्दस्य च गणास्सवे शिवस्याज्ञापगयुणाः॥
ते सवेप्यस्मदीयाश्च नन्द्भ्िगिषुरस्सराः॥ ११ ॥ प्रमथास्त ह्यसख्याता अस्मदीयो नं कंन ॥ द्वारि तिष्ठन्ति ते सवे शंक ९
राज्ञापरायणाः ॥ १२ ॥ ते सर्वैष्यस्मदीयांश्च तथापि न भिलेन्मनः ॥ एकश्चैवास्मदीयो हि रचनीयस्त्वयाने ॥ १३ ॥
हे खने ! आद्रसे उनके चरित्रको सुनो ॥ < ॥ शिवजीक विवाह कर कैलास पर्वतपर चरे जानेमं कितने एक समयक पीछे गणपतिका ¢
जन्म हआ ॥ ९ ॥ एक समय जया विजया नामवाटी सखी यह सन् पारवतीकै साथ भिलकर विचार करने गीं ॥ १० ॥ शिवजीकी
‡ आज्ञा उनके सम्पण गण रहते है; ययपि वे नन्दि भूंगिको आदि ठेकर जेते उनके हैँ वैसे हमारे नहीं ॥ ११ ॥ वे असंख्यात प्रमथगणः ट
ह परन्तु उनसे हमारे एक भी नहीं ह वे शंकरकी आज्ञासे सव द्वारे स्थितं रहते है ॥ १२ ॥ यथपि वे सव हमारे ही है प्र हमारा |
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ध ध । ब्रह्माजी
मन् उनते नहीं भिता हे भगवति ! हे पापराहिते ! एक कोई हमारा मी होना चाहिये, सो आप" उसकी रचना करं ॥ १३ ॥ बहा र
बोठे पर्वती देवी ससियोके यह न्दर वृचन सुनकर इस बातको हितमानकर् उत्कै करनेकी इच्छा करने ठगी ॥ १४ ॥ एक समव ||)
पावती देवी स्नान करती थी, नन्दि द्वारपर बैढे थे शिवजीने उसके निषेको न मानकर उसे बुडककर भीतर प्रवेश किया ॥ १५॥ ¢ |
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॥२६३॥
परचनको हितकारी जाना ओर सुखदायक समज्ञा ॥ १७ ॥ एक समय प्र माय परमेश्वरी पावती मनम कुछ समय विचारकर किं ॥ १८।
बह्नोवाच ॥ इत्युक्ता पारवती देवी सखीभ्यां सुन्दरं वचः ॥ हितंमेने तदा तच्च कत स्माप्यध्यवस्यति॥ १९ ॥ ततः कदाचि
न्मनत्यां पर्वया वे सदाशिवः ॥ नंदिनं परिभत्स्याय द्ाजगाम् गृहाम ॥१५॥ आयातं शंकरं दष्ठाऽसुमये जगदंबिका ॥
उत्तस्थौ मनती सा वै लनिता उन्दरी तदा ॥१६॥ तस्मिप्रवस्र श कीतुकेनातिसंता॥ तदीय तद्वचने हितं मन सला
वहम् ॥ 9१७॥ एवं जाते सदाकाछे कदाचित्पाव॑ती शिवा ॥ विचित्य मनसा चेति परमाया परेश्वरी ॥ १८ ॥ मदीयस्तेवकः
कृथि्धवेच्छभतरः कृती ॥ मदाज्ञया पर नान्येखामातरं चेदिह ॥ १९ ॥ बिचायंति च सादेवी वषो मलसंभवम् ॥ पुरषं
निभमौसातु सर्वलक्षणसंयुतम् ॥२०॥ सवांवयवनिरदोषं सवांवयव सुनद्रम् ॥ विशा सर्वशोभाटय महाबलपराक्रमम् ॥२१॥
वञ्लाणि च तदा तस्मे दत्वा सा विविधानि हि ॥ नाना्टकरणं चैव बह्वाशिषमलत्तमाम् ॥ २२ ॥ मत्पुथस्त्वं मदीयोसि
शिषजीको आता हुभा देखकर प्रम सुन्दरी जगदम्बिका ठजित हो तुरत उढ बढी ॥ १६ ॥ तव उत्त समय पावंतीने अपनी सखीके
।
नान्यः कथिदिहास्ति मे ॥ एवशुक्तस्स पुरूषो नमस्कृत्य शिवां जगौ ॥ २३॥
कोई अत्यन्त ष्ठ भेरा सेवक हो जो सब कार्यं करे जो मेरी आज्ञाके विना रेखामात्र भी: चर[यमान नहो ॥ १९ ॥ यह विचार कर
| अपन शरीर कै मेरे सव रक्षण समपन्न एक परुष निर्माण क्रिया ॥ २० ॥ जो स्त्र शररोके अवयवते निदोंष सव
अवयसि सुन्द्र विशालं ओर लव शोभापते सम्पन्न महाबरी प्राकमी था ॥२१॥ तव बह अनेक प्रकारके वन्न यथाविधि देकर तथा अनेक
भकारकै अकार ओर बहुत आशीवीद देकर ॥ २ब् ॥ तुम भेरे त्र हो द्रा कोई यहां नहं ह, इत भकार वह त प्रतीके भरति माता
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| बोढा ॥ २३ ॥ गणेशजी बोले तुम्हारा कया काये है, भ॑ तुम्हारा क्या कहं) एवके रसा केहनेप्र पावती बोटी ॥ २४ ॥ देवी | |
हे तात ! भेरे वचन सुनो तुम भरे दवारपाङ बनो तुमभेरे एच होनेके कारणमेरे हो, दूसरे किञ्षीके नहींहो ॥ २५॥ हं षर । भेरी ४
आज्ञाके विना कोई मेरे घरक भीतर न आने पावे चाहे कोई किंतनीही हेठ करे पर आने न देना ॥ २६ ॥ ब्रह्माजी बोले हे सुने पावं ¢
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तीने रेसा कहकर एक दृढ लकड़ी गणेशजीको दी ओर गणेशजीका सुन्दर रूप देखकर वह बडी भरसन्न हदं ॥ २७ ॥ ओर पेमसे खल
॥ गणेश उवाच॥किं कार्यं विद्यते तेय करवाणि तवोदितम् ॥ इत्युक्ता सा तदा तेन भरत्युवाच सुत शिव॥२७॥ शिवोषाच॥
दे तातश्ृण॒ मद्वाक्यं दवारषारो भवाद्य मे ॥ मत्पत्रस्त्वं मदीयोऽसि नान्यथा कश्चिदस्ति मे॥२५॥ विना मदाज्ञां मत्पुत्र नैवायान्म |©
द्रहान्तरम् ॥ कोऽपि कापि दटात्तात सत्यमेतन्मयोदितम् ॥ २६ ॥ बरद्मोवाच॥इत्यु ता च ददौ तस्मे यटि चातिषटटां सने (1
. तदीयं ूपमालोक्य सुन्दरं दृषेमागता॥ २७ ॥ मसुखमाजंग्य सुप्रीत्यार्ग्य तं कृपया सुत्म्॥स्वद्वारि स्थापयामास यष्टिषा
गणाधिपम् ॥२८॥ अथ देवीसुतस्तात श्दद्वारि स्थितो गणः॥यष्टिपाणिरमेदावीरः पावतीहितकाभ्यया ॥२९॥ स्वद्वारि स्थाप
यित्वा तं गणेशं स्वसुतं शिवा॥ स्वयं च मननती सा वै संस्थितासीत्सखीयुता॥ २०॥एतस्मि्नेव काठ तु शिवो दारि समागतः ॥ ठ
कौतुकी खुनिशौदुर नानाली लाविशारदः॥३१॥उब् च च शिवेशं तविज्ञाय गणाधिषः॥मातुराज्ञां विना देव गम्यतां न त्वया
धुना ॥ ३२ ॥ मलना्थ॑स्थिता माता क यासीतो बजाध्ुना ॥ इत्युक्ता यटिकां तस्य रोधनाय तदाथहीत् ॥ ३३ ॥
चूमकर एुत्रको आगन किया ओर गणाधिपको ख्कंडी छेकर द्वारेषर बाया ॥ २८ ॥ है तात ! जब वह गणेश दवारेपर स्थित हए ||
वह महावीर ठकटी टेकर पार्वतीके हितकी कामनासे जब बेढे ॥ २९ ॥ ओर शिवाने अपने ए गणेशजीको जब अपने द्वारेपर स्थापन &
किया, तब आप ससियोँ सहित सान करने ठगी ॥ ३० ॥ इसी अवसरे शिवजी भी दवारेपर आकर स्थित हूए, हे अनिभेष्ठ ! अनेक ठ
टीखा करने चतुर वे कौतुकी भगवानू शकर जब भीतर जाने रगे ॥ ३१ ॥ तव शिवजीको न जानकर वह गणेश्वर कहने खगा ह देव ! ¢
माताकी आज्ञाके विना आप्र नहीं जा सकते ॥ ३२ ॥ भाता दस समय ज्ञान कर रहीं ई, तुम कहां जाते हो यहि जाओ यह कहकर
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शि०्पु गणेशजीनि उनके रोकनके रये लकडीको उढाया ॥ ३३ ॥ यह देलकर शिवजी बोटे हे सूस ! तू किक निषेष करता है, ! ह
॥३६४ । || मे नहीं जाना मँ शिव हूं इसमे अन्यथा नहीं है ॥ २४ ॥ यह सुनतेही गणेशे महेशवरको छकडीते हार किया ओर वे बहत लीला
| करनेवाडे कोधकर अनते बटे ॥ २५ ॥ शिवजी बोठे हे बाठ्क तू मखं है यह नहीं जानता कि भं॑गिरिजापति शकर हूं, हे बाख्क ! ¶
ठ अपने षरकोही जाता हूं तु खञ्चे निषेध कैसे करता है ॥ ३६ ॥ यह कहकर जब गणेशजीक परवाह न करके शिवजी भीतर जानि लगे तब
च| तंदृष्ात् शिवः प्राह कं निषेधसि मूढधीः ॥ मां न जानास्यसद्दधे शिवोदमिति नान्यथा ॥ ३४ ॥ ताडितस्तेन यष्ट्या
¢ हि गणेशेन महेश्वरः ॥ प्रत्युवाच स तं पुत्रं बहरीलश्च कोपितः ॥ ३५ ॥ शिव उवाच ॥ शरर्खोसि त्वं न जानासि शिवोहं
गिरिजापतिः ॥ स्वगरदं यामि रे बार निषेधांसि कथं हि माष् ॥ ३६ ॥ इत्युक्ा प्रविशंतं तं महेशं गणनायकः ॥ कोषं
कृत्वा ततो विग्र दंड नाताडयत्पुनः ॥ ३७ ॥ ततश्शिव्च सं्ृद्धो गणानाज्ञापयत्रिजान् ॥ को वायं वर्तेते किंच करियते
$ पश्यतां गणाः ॥ ३८ ॥इत्युक्ता तु शिवस्तत्र स्थितः ऊढो गृहाद्हिः ॥ भवाचाररतस्स्वामी बहद्धतस्लीलकः ॥ ३९ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शद्रसंहितायां चतुथ कुमारखण्डे' गणेशोत्पत्तिवर्णनं नाम अयोदशाऽध्यायः ॥ १३ ॥ ॥
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ब्रह्मोवाच ॥ गणास्ते कोधसंपत्रास्तच गत्वा शिवाज्ञया ॥ पप्रच्छगिरिजापुं तं तदा द्रारषालकम् ॥ १ ॥
गणेशजीने फिर दंडका प्रहार किया ॥ ३७ ॥ तव शिवजीने कधं करके अपने गणोको आज्ञा दी यह कौन है यहां क्यों स्थित है तुम देखो
अव क्या करं ॥ ३८ ॥ यह कहकर शिवजी महाक्रोधकर घरक बाहर स्थित इए, इस भकार अद्रुत टीढा करनेवाछे स्वामी संसारी टीटा
दिखाने रगे ॥ ३९ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणे भाषाटीकायां ° च° कु° त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ ब्रह्माजी बोले तब वै सब गण
अ०३४ | | करोधको भ्रात होकर शिवजी की आज्ञाे वहां जाकर उस द्वारपाठ गिरिजाएत्रसे पूछने ठगे ॥ १ \॥
| १ युष्माकमिति दोषः । ् १ 1 =-= 1-77-7 =
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| गण बोट तुम कौन कहासे जये ओर तुम्हारे क्या करनेकी इच्छा है, यदि जीनेकी इच्छा है तो यहे दूर चछा जा ॥ २॥
बोडे गणेशजी शिवजीकै गर्णोके इ प्रकार वचन सुनकर निर्भय ओर दंड हाथमे छेकर उन द्वाररक्षक गणोति बोटे ॥ ३॥ गणेशजी बोठे तुम
कौन ओर कासे आपे हो तम॒ अच्छे सन्दरहो दूर हो यहां विरोध करनेके निमित्त कैसे स्थित हृए हो ॥ ४ ॥ बह्ाजी बो इस प्रकार ्
( वचन सुन वै सव महावटी शिवजीकैगण परस्पर हास्य करके वे आश्वरहित हो बोठे॥५।ब शिवके पाषद् परस्पर कुछ बोककर् करोधित =
॥ शिवगणा उचुः ॥ कोऽसि त्वं कुत आयातः कि वा त्वं च चिकीर्षसि ॥ इतोऽय गच्छ दूरं वै यदि जीवितुमिच्छसि ॥ २॥
बरह्मोवाच ॥ तदीयं तद्वचः त्वा गिरिजातनयस्स वै ॥ निर्भयो दण्डपाणिश्च द्वारपानज्रवीदिदम् ॥३॥ गणेश उवाच ॥ यूं
के कुत आयाता मरवेतस्पुन्द्रा इमे ॥ यात दूरं किमर्थ वे स्थिता अघ विरोधिनः ॥ 9 ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवं थत्वा वचस्तस्य
हास्यं कृत्वा परस्परम् ॥ उचुस्सवे शिवगणा महावीरा गतस्मयः; ॥ «५ ॥ परस्परमिति भरोच्य सवं ते शिवपार्षदाः ॥ द्वार
पारं गणेशं तं प्रत्यूचुः कदधमानसाः ॥&॥ शिवगणा उचुः ॥ श्रयतां द्वारपाला हि वय॑ शिवगणा वराः ॥ त्वां निवारयितुं
पातताश्शंकरस्याज्ञया विभोः ॥ ७ ॥ त्वामपीह गणं मत्वा न दन्यामीन्यथा इतः ॥ तिषठ दरे स्वतस्त्वं च किमर्थं त्युमी
इसे ॥ ८ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तोऽपि गणेशश्च गिरिजातनयोऽभयः ॥ निर्भत्स्यं शंकर गणान्न द्वारं शक्तवांस्तदा ॥ ९ ॥
ते सवैपि गणारश्शेवा स्तत्या वचनं तदा ॥ शत्व तज शिेगत्वा तदवृत्तातमथा हवन् ॥ १० ॥
मनसे दवारपा गणेशजीसे कहने ङे ॥ ६ ॥ शिवे गण बो सुनो हम स ब्रेष्ठ दारपार शिव्रजीके गण है हम विमु शंकरी आश्ञासे एमी
निवारण करनेको भाप हुए हँ ॥७॥ तुमको भी गणमानकर हमने नहीं मारा नहीं तो कवका थार ॒दिया होता, दूर हो स्वतः ही क्यों सृत्युकी
इच्छा करता है ॥८॥ बहमाजी बोडे सा कहनेप्र भी गिरिजा गणेशजी नि भय रहे, ओर शिवजीके
इच्छा करता है ॥८॥ हाजी बोठे एसा कहनेपर मौ गिरिजा गणेशजी निर्भय रहे, ओौर शि्रजीके गरणोको षुडककर द्वार नहीं छोडा ॥९॥ उन
१ सब इत्ययः 1।
१४९
चः
तम्पुणे शिवजीके गणोने भी गणेशजीके यह वचन सुनकर यह सब वृत्तान्त शिवजीमे जाकर निवेदन कर दिया ॥ 3 ° ॥ अद्भुत ढीखा | ।
शि° पुम
वाले महेश्वर गणोके यह वचन सुनकर अपने गर्णोको घुडककर ठोककी गतिसे कहने ठगे ॥ ११ ॥ महेश्वर बोले ! यह किंसका पुत्र वा
॥३६५॥
तवक है शतके स्मान उच्छखल यह कया कहता है यह असदरुद्धि कया करेगा, क्या अपनी सूत्युकी रबाछा करता है ॥ १२॥ यह को
¢ नवीन द्वारा है इसको दूर करो तम न्कके समान खडे हए उका वृत्तान्त कैसे कहते हो ॥ १२३ ॥ अद्धुत रीटा करनेवाटे स्वामी शीकरकै ४
¢ यह वचन सुनकर ब गण फिर आकर वहां दवारपाछ गणेशजीसे कहने छगे ॥ १४ ॥ शिवजीकै गण बोले अरे द्वारपाख तू कौन है ओर
|| ततश्च तद्वचः धत्ाद्धतलीलो महेश्वरः ॥ विनिर्भरस्यं गणातरचे निजांह्ोकगतिशने ॥११॥ महेश्वर उवाच ॥ कश्चायं वतंते ४
¢ कं च ब्रवीत्यरिवदुच्छ्तिः।॥ किं करिष्यत्यसदूबुदधिः स्वभूतयु वांछति धुवभ्॥१२ ॥दूरतःक्रियतां देष द्ारपालो नवीनकः॥ छी ं
बा इव स्थितास्तस्य वृत्तं वदथ मे कथम्॥ १३।स्वामिनोक्ता गणास्ते चाद्धतलीलेन शथुना॥ पुनरागत्य तत्रैव तमूचुद्रारपारकम् ¢
॥१४॥ ॥ शिवगणा उचुः ॥ २ रे द्वारष कस्त्वं हि स्थितश्च स्थापितः कतः ॥ नेवास्मान्गाणयस्येवं कथं जीवितुमिच्छसि ॥4
६| ॥ १५॥ द्वारपाला वयं सरवे स्थितः किं परिभाषसे ॥ सिहासनग्रदीतश्च शृगालः शिवमीहते॥ १६॥तावद्र्जसि मूखं त्वं यावद्रण ए
¢ पराकमः। नानुभूतस्त्वयातरैव ह्यतुूतः पतिष्यसि।॥१७॥इत्युक्तस्तेस्सुसंुद्धो दस्ताभ्यां यष्टिकां तदा ॥ गृहीत्वा ताडयामास ठ
गणांस्तान्परि भाषिणः ॥१८॥ उवाचाथ शिवाघुबः परिभत्स्यं गणेश्वरान् ॥ शंकरस्य महावीरातिरभयस्तान्गणे*वरः॥१९॥ |©
किसने तुको या स्थापित किया है, तू हमको कु नहीं गिनता इससे किंस भकार जीनेकी इच्छा करता है ॥ १५ ॥ हम सव दारपाट है तृ ||
६ अपनेको कैमेद्रारपाठ कहता है श्रगाछ सिंहासननको ्रहणकर कैसे अपना कल्याण चाहता है ॥ १६ ॥ हे मूर ! तू उ ही समयतक ग॑ता है. जब &
तक् गणोका पराक्रम नहीं देखता तुमने यह पराक्रम अनुभव नहीं किंया अलुभव करतेही पतित हो जायगा ॥ १७ ॥ ठेते उनके वचन सुनकर |
४॥ पणेशजीने कोधकर् छादी हाथमे छी ओौर उन वाचार गणोंको मारना प्रारंभ किया ॥ १८ ॥ ओौर सव गणेश्वरोंको बुडकते ` हुए शिवजीके ऽत्र
छ
रु. २ ४
कु. खं.४
अ०१४
|
| गणेश्वरके घुडकनेसे महावडी शिवकै गण चकित हए ॥ १९ ॥ गणेशजी बोरे जाओ जाओ यहि दूर चरे जाओ नहीं तो मँ |
अपना वडा उथर पराक्रम दिखाऊंगा जिससे तुम उपहासक परापत हो जाओगे ॥ २० " गिरीजपुत्र गणेशजीकै यह वचन सुनकर वह शिवजीकै
गण परस्पर कहने ठगे ॥ २१ ॥ शिवजीके गण बोढे अब कया कर कहां जांय अन जाने यह स्या न करे, हम मर्याकी रक्षा करते है, नहीं
तो यह क्या नहीं करेगा ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोडे तव् शिवजीके गण परस्पर विचारकर केठाससे एक कोश दूर स्थित हुए शिवजीके पास
जाकर वह सब कंहते हुए ॥ २३ ॥ त्रिश हाथमे स्यि उभरबुद्धि परेश शिवजी उन वीरसतम्मत अपने गणोसे कहने ठ्मे ॥ २४ ॥ अरे गों
शिवापुत् उवाच ॥ यात यात ततो दूरे नो चेद्रो द्शयामि ह ॥ स्वपराक्रममत्युभ् यास्यथात्थुपहास्यतामु ॥२०॥ इत्याकर्ण्य
9 ^ 9२4
&| वचस्तस्य गिरिजातनयस्य दि ॥ परस्प्रमथोचुस्ते शंकरस्य गणास्तदा ॥ २१ ॥ शिवगणा उचुः ॥ किं कर्तव्य क्र ग॑तभ्य
४ क्रियते स न किं पुनः ॥ मर्यादा रक्ष्यतेऽस्माभिरन्यथा किं वीति च ॥ २२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ततश्शंशगगास्सवं शिवं दूरे
व्यवस्थितम् ॥ करोशमा्ं तु केलाद्र्वा ते च तथाद्वन् ॥ २३ ॥ शिवो विहस्य तान्सर्वोक्िश्चुल्कर उथधीः ॥ उवाच
` परमेशो दि स्वगणान् वीरसमतान् ॥२७॥ शिव उवाच ॥ रेरे गणाः छ्छीवमता न वीरा वीरमानिनः ॥मदप्रे नोदितं योग्या
भत्सितः कि पुनवेदेत् ॥ २५ ॥ गम्यतां ताब्यतां चैष यः कथित्पभवेदिद ॥ बहुनोक्तेन कि चा दूरीकर्तम्य ` एव सः
| ६ ॥२द॥॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ इति सवं महेशेन जग्बुस्तज स॒नीश्वर ॥ . भत्सितास्तेन देवेन परोखश्च गणसत्तमाः ॥ २७ ॥
४ शिवगणा उचुः ॥ रेरे त्वं शरण वे बार बलात्कि परिभाषसे ॥ इतस्त्वं द्रतौ याहि नो चेन्मृत्युभविष्यति ॥ २८ ॥
तुम छीबही हौ वीरमानी वीर नहीं हो, मेरे आगे यह बात कहनेको योग्य नहीं हो बुडकनेषर कया फिर कुछ कहा जाता है ॥ २५ ॥ जाओ
कोई क्यों न हो उपर प्रहार करो. बहुत कहनेसे स्या है, वह दूर ही कर देने योग्य है ॥ २६ ॥ बह्लाजी बोके हे सनीश्वर ! जब देष
महेश्वरने उन् सब गर्णोको इत परकारसे फटकारा, तब वे सब बरहको गये, ओर जाकर बोडे ॥ २७ ॥ शिक्कै गण बोरे रे रे बालकं सुनो
तू बहुत बलत क्था कहता है, यहा तू दूर चछा जा नहीं तो तेरी पृह्यु हो जायगी ॥ २८ ॥
कु.खं.४
अ०१४
ब्रह्माजी बोरे तब शिवजीकी आज्ञा करने वारे उन गणोके यह वचन सुनकर गणेशजी यहं विचार कर दुखी हए किं अव मक्या कह
॥ २९ ॥ इसी अवसम दीने द्रम यह कलठकठ भौर केश सुनकर सीते कहा देलो तौ दारे क्या होरहा है ॥ २० ॥ सीने जाकर
इहां सब वृत्तान्त जान छिया ओर क्षणमात्रमे सव देख भरसन्न हो पारवतीके समीप गई ॥ ३१ ॥ है सने ! वह्यं जाकर उस सखीने जो
महेश्वरि ! जो हमारा गण द्वारेपर स्थित हो रहा
चान्त होरहा था वह सब पूर्वतोके आगे वर्णन किया ॥ ३२ ॥ सखी बोटी हे न
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति त्वा वचस्तेषां शिवाज्ञाकारिणां धुवम् ॥शिवामुतस्तदाभरत्स किंकरोमीति दुःखितः॥२९॥एतस्मननन्तर
देवी तेषां तस्य च वै पुनः ॥ त्वा तु कलहं द्वारि सखीं पश्येति साव्रवीत्॥३०॥ समागत्य सखी तत्र वृत्तांतं समदुध्यत् ॥
क्षणमात्रं तदा दक्षा गता इष्टा शिवांतिकम्॥३१॥ तअ गत्वा तु तत्सर्व वृत्तं तद्यदभृन्सुने॥अशेषेण तया सख्या कथितं गिरि
जायतः ॥३२॥ सख्युवाच ॥ अस्मदीयो गणो योहि स्थितो द्वारि महेश्वरि ॥ नि्भत्सयंति तं वीराश्शंकरस्य गणा ध्रुवम्
॥३३॥ शिवश्चैव गणास्सवें विना तेऽवसरं कथम्॥ प्रविशंति दटद्ेहे नैतच्छुभतरं तव॥ ३४॥ सम्यक् कृतं छ्यनेनेव न हि कोपि
प्रवेशितः ॥ दुःखं चैवानुभूया् तिरस्कारादिकं तथा ॥३५॥ अतः परन्तु वाग्बादः क्रियते च परस्परम् ॥ वाग्वाद् च कृते
नैव त्यायान्तु सुखेन वें ॥ ३६ ॥ कृत्वा वाग्वादस्तं जित्वा विजयेन. च ॥ प्रविशंतु तथा स्वे नान्यथा कर्दिचित्िये
॥ ३७ ॥ अस्मित्ेवास्मदीये वे सवे संमरिषता वयम् ॥ तस्मादेवि त्वया भदे न त्याज्यो मान उत्तमः ॥ ३८ ॥
उसको सव शिवजीके गण धृडक रहं है ॥ ३३ ॥ शिवजी ओर उनके गण विना अवसरके घरमे केसे भ्रेश कर॒ सकते ह यह हमारे
ठ्वि शुभदायक नहीं है ॥ ३५ ॥ इस वाट्कने बहुत अच्छा कियाजो किक्लीको न आनि दिया, ओर यह दुःख तथा
तिरस्कार अनुभव कर रहा है ॥ ३५ \॥ अव इनका प्रश्पर॒वाणीका विवाद होरहा है वाग्वाद॒होनेषे फिर कोई षरकै भीतर नही
आसकेगे ॥ ३६ ॥ वाग्वाद करके ओौर इसको जीतकर वे सव भ्रवेश कर सकते है अन्यथा प्रवेश नहीं कर सकते ॥ ३७ ॥ हमारे इस
९८3
|
| धुडकनेते मानो उन्होने सवहीको घुडका, इस कारण हे देवि ! तुषको भान किंस भकार छोडना चाहिये ॥ ३८ ॥ शिवजी ।
पदा आपके आधीनही ह, वे अहंकार कया करेगे तुम्हारे अचकु ही हो जांयगे ॥ ३९ ॥ बह्लाजी बोरे क्षणभा्को शिवकौ इच्छासे |
| स्थित हदं ॥ ४० ॥ ओर उस सरमय वह पावती मानिनी होकर भनही मनम कहने लगी ॥ ४१ ॥ शिवा बोटी अहो क्षणमात्रको पत्र
स्थित भी न हभ कि यह हढ करने लगे, तो अब मेँ विनय बा नप्रता क्यक् ॥ ४२॥ जो होनहार है सो होगी अन्यथा नहीं हो
पकती, एसा कहकर पावंतीने अपनी सखीको वहां भजा ॥ ४३ ॥ सखीने जाकर गणेशजीसे वह सव॒ बात कही जो भ्रियाने कही थी वह
शिवोमकंटवत्तेऽय्य वतते सर्वदा सति॥ किं करिष्यत्यहंकारमानुकूलयं भविष्यति॥३९॥ ब्रह्मोवाच ॥ अरोक्षणं स्थितातजर शिवेच्छा
वशतस्सती ॥४ ०॥मनस्युवाच सा भूत्वा मानिनीं पार्वती तदा॥४१॥ शिवोवाच॥ अहो क्षणं स्थितो नैव हठात्कारः कथं कृतः ॥
कथ चैवात्र कर्तव्ये विनयेनाथ वा पुनः ॥४२॥ भविष्यति भवत्येव कृतं नैवान्यथा पुनः॥ इत्युक्रा तु सखी तत वरेषिता भरियया
तदा ॥४२॥ समागत्याऽत्रवीत्सा च प्रियया कथितं हि यत्॥तमाचष्ठ गणेशं तं गिरिजातनयं तदा ॥७७॥ सख्युवाच ॥ सम्य
कृकरृतं त्वया भद्र बलात्ते प्रविशंतु न ॥भवदग्रे गणा द्यते किं जयतु भवादशम्॥४९॥ कृतं चेद्रा्तं चैव क्त्यं क्रियतां त्वया॥ |
जितो यस्तु पुनर्वापि न वैरमथ वा धुवम्॥७६॥ब्ह्मोवाच॥ इति त्वा वचस्तस्या मातुश्चैव गणेश्वरः॥ आनन्दं परमं भाप बलं |£
भूरि मदोत्नतिम् ॥४७॥ बद्धकक्षस्तथोष्णीषं बद्ध्वा जंघोर् संस्प्शन् ॥ उवाच तान् गणान् सर्वान् निभेयं वचनं शुदा ॥४८॥ 4
गिरिजाषत्र गणेशसे इम प्रकारे बोडी ॥ ४४ ॥ सखी बोटी हे भद्र ! तुमने बहुत अच्छा किया जो बरे पवेश न होने दिया तुम्हारे
सामने क्या यह गण तुमको जीत सकते है ॥ ४५॥ छत अछत जो कुछ भी हो तुमको अपना कर्च॑ऽ्य पठन करना चाहिये, जीतने पर ट
भी कोहं वैरकी बात तो हही नहीं ॥ ४६ ॥ ब्रह्माजी बोे गणेश्वर माताके इस भकारके वचन हुनकर महा उत्पन्न वर्को प्राप्त होकर
बडे आनन्दको प्राप्त दए ॥ ४७ ॥ कच्छ ओर प्गडी बांधकर जापर जांधियां ककर उन सव॒ गणो प्रसच्नतासे निर्भय वचन ९
ऋः
बोढे ॥ ४८ ॥ गणेशजी बोे मँ पातका एत्र ओौर तुम्. शिवजीकै गण हो वै वमवक गा त न
॥ ४९ ॥ तुमह दारपाङ हो तै द्वारपार कयो नहीं हं जैसे ठुम॒यहां स्थित हो वैरेही मै रिथुत हं ॥ ५० .॥ तृमहारी यहां स्थित जब
तुमह दवारपाठ हो में द्वारपाठ क्यों नहीं ह तो भै यहां स्थित हुभा पावेतीकी आज्ञाका पाटन करता ¢
निश्रित हो जायगी तब तुम शिषजीकी आज्ञाका पाठन करना ॥ 4१ ॥ इतत मच म ५
र हे बीर ! यह भँ सत्यही कता ह ओर ने इका निर्णय भी कर छिपा है ॥ ५२ ॥ इर कारण है शिवजीकै गणो आद्रे तुम भेर ¢
ट
् ५२५
|| वचन् नो हठ वा विनय किरती भकारे भी तुम मन्दिरमे नहीं जा सकते ॥ ५३ ॥ जब. गणेशजीने एसा कहा तो वै सव गणे ठजनित
गणेश उवाच ॥ अहं च गिरिजाधूयूथं शिवगणास्तथा ॥उभये समतां पराप्ताः कतभ्यं कियतां एुनः॥४९॥ भवतो द्वारपालाश्च
द्ारपोहं कथं न हि ॥ भवतश्च स्थितास्तताऽईं स्थितोतरेति निञ्चितम्॥५०॥भवद्धिश्च स्थितं ह्र यदा भवति निश्चितम् ॥ तदा
|| भवद्भिः कतेव्यं शिवाज्ञापरिपालनम्॥५१॥ इदानीं त॒ मया चात्र शिवाज्ञापरिषारनम् ॥ सत्यं च् कियते वीरा निर्णीतं मे यथो | ¢
|| चितम् ॥५२॥ तस्माच्छिषगणास्सद वचनं शणुतादगात् ॥. हदवा विनयाद न ग॑तभ्यं मन्द्र युनः॥९३॥ ॥ रह्मोवाच ॥ ||
¢ इत्युक्तास्ते गणनैव सवे ते कलिता गणाः॥यगुश्शिवातिकं तं बे नमस्कृत्य पुरः स्थिताः॥५७।स्थित्वा न्यवेदयन्सवे ृत्तातं च
तदद्भुतम् ॥ करौ बद्ध्वा नतस्कंाशिशवे स्तुत्वा पुरः स्थिताः॥५५९५॥ तत्सर्वं तु तदा त्वा वृत्तं तत्स्वगणोदितम्॥ लौकिकीं ए
| वृत्तिमाधित्य शंकरो वाक्यमग्रवीत्॥५६॥ शंकर उवाच ॥ श्रयतां च गणास्सवे युद्धं योग्यं भकेत्रदि॥ मय चात्ास्मदीया वै स |
च गौरीगणस्तथा ॥५७॥ विनयः क्रियते चेद्रे वश्यश्शंथुः श्रिया सदा ॥ इति ख्यातिरभवेष्ोके गहिता मे गणा धुवम् ॥९५८॥
होगये ओर शिवजीकै समीप जाय नमस्कार करके उनके आगे स्थित हए ॥ ५०४ ॥ ओर हाथजोड मस्तक नवाय स्तुतिकर आगे स्थित
हो सम्पुण अद्ुत वृत्तान्तको उन्होने निवेदन किया ॥ ५५ ॥ अपने गणो कहे हुए उस सव वृत्तान्तको सुनकर लौकिक दशाको दिखाते
हुए शिवजी वचन् बोडे ॥ ५६ ॥ शिवजी बोडे हे सम्पुणं गणोँ शुनो अब वह बाठ्क युद्धके योग्य तोहै नहीं तृष हमारे ओर ५
बह गोरीका गण् है ॥ ५७ ॥ ओर यदि नश्रता कीजाय तो रोक इस वातकी ख्याति होगी कि शिवजी सदा क्लीके वशम 8 |
| । गणो ¡ तव भी वह मुङ्ञे छनाका विषय होगा ॥ ५८ ॥ परनीतिके अनुसार इसमे काये करना चाहिये वह इकठा गण बार्क क्या |
|| कम करेगा ॥ ५९ ॥ तुम गण युदधमे बडे चतुर हो सो भरे होकर युद्ध छोडकर ल्धुताको कैसे भात होते ॥ ६० ॥ पतिक आगे विशेषकर
¢ त्री क्यों हठ करती है यदि गिरिजा एला करेगी तो इसका एर अद्श्य प्रावेगी ॥ ६१ ॥ इस कारण सव भेरे वीर आद्रे भेरा वचन घुने,
। सवथा युद्ध करं जो होना होगा सो अवश्य होगा ॥ ६२ ॥ बह्माजी बोठे हे नारदजी ! अनेकं रीढा करनेमं चतुर भगवान् शकर ठोकिकी
|
६
कृते चेता कतैभ्यमिति नीतिगैरीयसी ॥ एकाकी स गणी बाः किं करिष्यति विक्रमम् ॥५९॥ भवतश्च गणा छोके युद्धे
चाति विशारदाः ॥ मदीयाश्च कथं युद्धं हित्वा यास्यथ लाघवम् ॥ ६० ॥ निया अहः कथं कार्यो पर्युरभे विशेषतः ॥
कृत्वा सा गिरिजा तस्य चने फरमवाप्स्यति ॥६१॥ तस्मात्वं च मद्रीराः शणताद्रतो वचः॥ कन्त॑ग्यं सर्वथा युद्धं माति
यत्तद्भवत्विति ॥ ६२ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता शंकरो ब्रह्मन् नानालीलाविशारदः॥ विरराम खुनिग्रष्ठ द्र्शयंौकिकीं गतिम्
॥ ३३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शदसंहितायां चतुथं कुमारखंडे गणविवादवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१६॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता विधुना तेन निश्चये प्रमं गताः ॥ सत्रद्यास्त॒ तदा तज जग्बुश्च _ शिवमन्दिरम् ॥ 9 ॥ गणेशोऽपि
तथा इषा द्यायातान्गणसत्तमान् ॥ युद्धाऽऽटोपे विधायैव स्थि्तांशवात्रवीदिदस् ॥२॥ गणेश उवाच॥ आयातु गणपास्सवे
शिवाज्ञापरिपालकाः ॥ अदमेकश्च बाच शिवाज्ञापरिपालकः॥ ३॥ ।
गतिको दिखाते हए यह कहकर मौन हए ॥ ६३ ॥ इति श्रीशिवमहापरागे स्बसंहिता० च कृभारखण्डे भाषारीकायां चतुदंशोऽध्यायः
॥ १४ ॥ बह्माजी बोछे जब _उन विभुने इस भकार कहा तव वे सब गण प्रम निश्वयको प्राप्त होकर जकर शिवजीके मंदिरके समीप गये
॥ १ ॥ इधर गणेशजीने भी देखा कि युद्धके निमित्त शिवजीके गण आ रह है तव उनतत इस भकार गणेशजी बोट ॥ २ ॥ गणेशजी बोरे
शिवजीकी आज्ञा पाढन केरने वे सत्र गण आरव, मँ इकडाही बाठक शिवाकी आन्ञा पान करने वाला हूं ॥ ३ ॥
¢ ॥ आज भवानी ओर शिर्वजीक पक्ष
शि०पु० ह तो भी देवी पर्षतीके षत्रका बल सब कों देसे, ओर आज शिवजीके गणोंका बरभी देखा जाय ॥ ४ ॥ त
„||| वाोका कमक युद होन वाक है युं चुः आप टोगो तो पट पड क्रिया भी है ॥५॥ मने पट ५ विषा नही 1
आजही युद्ध करता हं तो भी गिरिजा ओर शिव आपकी कना रकखंगे ॥ ६ ॥ सन्ने तो इसमं कुछ है नही, हमारे विपरीत ही होगा, मेरी
ओर आपकी छन्ना गिरिजा ओर शिवकीही खना है ।॥ ७ ॥ हे गणेश्वरो ! पेता विचारकर समर करना चाहिये आप अपने स्वामीको देख
६ ¢
¢| कर ओर गँ अपनी म्ाताको देखकर किंस भकारे युद्ध करता हं ॥ ८ ॥ वह केसा युद्ध होता ह सो देखना इस युके निवारण करन त्रिक ¢
तथापि पश्यतां देवी पार्वती सूबुजं बलम् ॥ शिवश्च स्वगणानां त॒ बलं पश्यतु वे पुनः ॥ ४ ॥ बल्वद्वाटयुद्ध् च भवानीशिव
पक्षयोः ॥ भवृद्धिश्च कृतं युध प्रवं य॒दधविशारदैः ॥५॥ मया पूवं कृतं नैव बारोस्मि क्रियतेऽधुना ॥ तथापि भवतां टना
|| गिरिजारिवयोरिह ॥६॥ ममते तु भवेस वैपरीत्यं भविष्यति ॥ ममेव भवतां लना निरिजाशिवयोरि् ॥७॥ एवं ज्ञात्वा
¢ च क्तव्यः समर गणेश्वराः ॥ भवद्धिस्स्वामिनं दृष्टा मया च मातर् तदा ॥ ८ ॥ क्रियते कीदशं युद्धं भवितव्य भवति ५
ति ॥ तस्य वै वारणे कोऽपि न समर्थक्चिलोकृके ॥९॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवं भत्सि तास्ते त दंडभूषितबाहवः ॥ विविधान्य
¢ युधान्येवं धृत्वा ते च समाययुः ॥१०॥ घर्षयन्तृस्तथा दंतान् हंकरृत्य च एनः पुनः ॥ पश्य पश्य हुवंतश्च गणास्तेसमुपाग £
ताः ॥११॥ नदी प्रथममागत्य धृत्वा पादं म्यकषैयत् ॥ धावन्भृंगी द्वितीयं च पादं॑धृत्वा गणस्य च ॥ १२ ॥ यावत्पादे &
विकषनतौ तावद्स्तेन वे गणः ॥ आहत्य दस्तयोस्ताभ्यायुलिकषपतौ पादकौ स्वयम् ॥ १३ ॥
कीमे कोई समथ नहीं है ॥ ९ ॥ ब्रह्माजी बोरे जब इस प्रकारे दंडपाणि गणेशजीने उनको फटकारा तव वे अनेक भरकारके आयुध
उनकै ऊपर धावमान हुए ॥ १० ॥ दांतोको घषेण करते तथा बारंवार हकार शब्द करते ओर देखो देखो कहते हुए वे गण वहां आकर त
उपस्थित हुए ॥ ११ ॥ सबसे पहठे नंदीने आकर गणेशजीका चरण पकडकर सचा, ओौर भृगीने आकर दसरा चरण सैचा ॥ १२ ॥ जव |
तक वे दोनों गण चरण पकड तबतक गणेशजीने हाथोे उनको भ्रहार कर अपने पैर छुडा स्थि ॥ १३ ॥ ¢
् वीर देवीपुत्रने एक बडे परिष ग्रहण करके जितने द्वारपर स्थित थे उन. सवकोही प्रहार किया ॥ १४॥ किन्हीके हाथ टूट गये, |
पृष्ठ टूट गई किन्हींके शिर ओर किन्हीके मस्तक टूट गये ॥ १५॥ किन्हीकी जंघा किन्हीकं कंधे भिन्न होगये, ओर जो सन्मुख आये उन.
सबको हदयमे प्रहार किया ॥ १६ ॥ कोरे पृथिवीम गिर गये कोई विदिशा ओंम चरे गये, किन्हींके चरण छिन्न भिन्न होगये, कोई शिवजीकै
समीप चे गये ॥ १७ ॥ उनम कोई भी . संग्रामम गणेशजीके सन्मुख न ठहर सका, सिंहको देखकर मृग जिस प्रकार दशो दिशाओं भाग
जाते है ॥ १८ ॥ इसी भांति वे सैकडों सहसो गण पलायन कर गये गणेशजी छौरकर फिर अपने स्थानम आगये ॥ १९ ॥ जैसे कल्पक
अथ देवीसुतो वीरस्संगरद्य परिघं बरहत्॥द्वारस्थितो गणपतिः सर्वानापोथयत्तदा ॥१४॥ केषांचित्पाणयो भिन्नाः केर्षाचित्पृष्ठ
कानि च ॥ केषांचि् शिरास्येव केषां चिन्मस्तकानि च॥ १५॥ केषां चिनानुनी तूञ केषां चित्स्कंधकास्तथा॥ सम्बुखे चागता ये
वै ते सवे दये दताः॥ १६ केचिच पतिता धौ विदिशो गताः ॥ केषां चिच्चरणौ छिन्नौ केचिच्छर्वान्तिकं गत्]: ॥१७॥
तेषां मध्ये तु कद्र संग्रामे सम्थखो न हि ॥ सिहं दष्टा यथा यांति मृगाश्चैव दिशो दश ॥१८॥ तथा ते च गणास्सवें गताश्चैव
सदखशः ॥ पराघृत्य तथा सोपि सुद्रारि सञुपस्थितः॥१९॥ कल्पांतकरणे कारो दश्यते च भयकरः ॥ यथा तथेव दष्ठस्स स्वेषां
भ्ररुयंकरः॥२०॥ एतस्मिन्समये चैव सरमेशसरे*वराः॥ प्रेरिता नारदेनेह देवास्सवं समागमन् ॥२१॥ समश्रुवंस्तदा सवे शिव
स्य हितकाम्यया ॥ पुरः स्थित्वा शिवं नत्वा ह्याज्ञा देदि प्रभो इति॥२२॥त्वं परवह सर्वेशस्सवं च तव सेवकाः ॥ सृष्टेः कर्ता सदा
भतां संहतां परमेश्वरः ॥२२॥ रजस्सत्तवतमोरूषो रीखया निगणः स्वतः ॥ का खीखा रचिता चाद्य तामिदानीं वद प्रभो॥२४॥
अंतमे मयेकर काठ दिखाई देता है इसी भकार वह सबको उस॒ समय प्रख्य करनेकै समान दिखाई देने कगे ॥२०॥ इसी समय नारदजीकी |
रणासे विष्ण इन्द्र आदि सम्पूणं देवता उस्न युद्धम आये ॥ २१ ॥ ओर शिवजीके हितकी कामनासे वे सब कहने ठगे, ओर आगे स्थित
हो शिवको भरणामकर बोठे, हे भभो ! आज्ञा दीजिये ॥ २२ ॥ आप् सर्वेश परवह हो हम सव तुम्हारे सेवक है, तुम सृषटिके कता भता
संहतो परमेश्वर हो ॥ २२ ॥ तुम सत रज तमने अनेक भकारकी खीला करते हो वास्तवं स्वतंत्र निरयण हो, हे भभो ! इस समय यह कया
| । टीढा रची है, सो आप इसको कहँ ॥ २४ ॥ बहाजी बोठे इषपकार उनके यह वचन सुन मुनिश्रष् महेश्वर गर्णोको छिन्न भिन 8
॥३६९॥ ||| पव वात कहते हए ॥ २५॥ हे खनिराज 1 तव सवके अधिपति शिवजी महाराज गिरिजाके पति हकर बरहाजीते कहने ठे ॥ २६.।
| शिवजी बोरे हे बह्याजी । घनो हमारे म॑दिरके दवारेपर एक बाठक़ उपस्थित है, वह महाबरी ठकडी च् हये है, जो कोई घरं आता ह,
# उसका प्रवेश वह निवारण कर देता है ॥ २७ ॥ वह महाप्रहारका करनेवाढा मेरे पाषेदोको भी प्रहार करता ओर उनसे प्रहर नहीं खाता
है, उस्ने मेरे गणोंको बल पूर्वक पराजित कर दिया ॥ २८ ॥ हे बरह्मन ! तुम्हीं वहां जाकर इत्त बाखकको प्रसन्न करो, है ब्रह्माजी ! जिस
&|| ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकर्ण्य वचस्तेषां खुनिभरष्ठ महेश्वरः॥ गणान् भिन्नस्तदा दृष्टा तेभ्यस्सर्व न्यवेदयत्॥२५॥ अथ सरवश्वरस्तत्
&|| शंकरो स॒निसत्तम ॥ विहस्य गिरिजानाथो ब्रह्माणं मा्चुवाच इ।॥२६॥ शिव उवाच॥ ब्रह्मञ्खृणु मम द्वारि बाल एकस्समास्थितः॥
महाब यष्टिपाणिगेहषिशनिवारकः॥ २७ ॥ महाप्रहारकर्ताऽसौ मत्पा्षदविधातकः ॥ पराजयः कृतस्तेन मद्रणानां बलादिह्
॥२८॥ ब्रह्मन् त्वयेव गंतव्यं प्रपता्योऽयं महाबलः ॥ यथा ब्रह्मत्रयः स्याद्र तथा का त्वया विधे ॥२९॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्या
क्यं प्रभोवक्यमज्ञात्वाऽज्ञानमोहितः॥ तदीयनिकटं तात सर्वकषिवरेरयाम्॥३०॥ समायान्तं च मां दृष्टा स गणेशो महाबली ॥
क्रोधं कृत्वा समभ्येत्य मम॒शमशरण्यवाकिरत् ॥ ३१ ॥ क्षम्यतां क्षम्यतां देव न युद्धाथ् समागतः ॥ ब्राह्मणोहमनुभाह्यः
शांतिकतानुपद्रवः ॥ ३२ ॥ इत्येवं शरुवति बरह्नस्तावत्परिवमाददे ॥ स गणेशो महावीरो बालोऽबालपराक्रमः ॥ ३३ ॥
भकार केश न बटे वही आपको करना चाहिये ॥ ॥ २९ ॥ बह्लाजी बोे इस प्रकारसे शिवजीके वचन सुनकर अज्ञानसे मोहित हो विशेष बातको
न जानकर भँ उत॒ नाठकके निकट सब ऋषिरयोकै संग गया ॥ ३० ॥ ` वह महाबली गणेशजी सञ्च आया हुमा देखकर करोधकर दौडकर
मरी डाढी भूछ नोचने ठगे ॥ ३१ ॥ तव ने कहा हे देव ! क्षमा करो क्षमा करो यै युदधके षि नहीं आया हू, मँ बहा ह मेरे पर अलु
र करना चाहिये, मृ उपदरवरहित शांति करनेवाढा हूं ॥ ३२ ॥ हे नारदजी ! भ एसा कह ही रहा था कि तवबतक उस महाबली यवा
ओके समान पराकमी बाठक गणेशने परिघको ब्रहण किया ॥ ३३ ॥ ` | ५-&|
उतत महाबरी गणेशको परिष श्रहण करवा हभ देखकर भँ उसी स्षमय शीघतासे वहासे परायन कर गया ॥ ३४ ॥ प्रिषसे ताडित हो भेरे
साथी सब चरो चो कहने कगे, कोद स्वयं पतित होगये, ओर कोई उन गणेशकै ्रहारसे पतित हुए ॥ ३५ ॥ कोः उती समय शिवजीके
समीप जाकर वहं सव वृत्तान्त शिवजीसे सनाते हुए ॥ ३६ ॥ इश प्रकार उनकी गति देख ओर इस वृत्तान्त सुनकर रीरा |
शंकरको बडा करोध हभ ॥ ३७ ॥ इन्दरादिक देवता ओर षण्मुख आदि गण भूत पिशाच गण सबको ही शिवजीने आज्ञा दी ॥ ३८ ॥
वै सब यथायोग्य सब ओरसे धावमान हुए ओर शिवकी आज्ञासे आयुध उढाकर उनके मारनेकी इच्छा करने ठगे ॥ ३९ ॥ जिस जिका
गृहीतपरिषं दृष्टा तं गणशं महाबलम् ॥ पलायनपरो यातस्त्वहं दुततरं तदा ॥३४॥ यात यात छरवंतस्ते परिघेन दतास्तदा ॥
स्वय च पतिता, केचित्केचित्तेन निपातिताः ॥३५॥ केचिच्च शिवसामीप्य गत्वा ततक्षणमाजतः॥ शिवं विज्ञापयां चज्कस्तदरत्ता
तमशेषतः ॥२६॥ तथाविधश्च तान् दष्टा तद्रढत्तातं निशम्यसः॥ अपारमाद्धे कोपं हरो ीखाविशारदः ॥३७॥ इदादिकान्दे
वगणान् षण्छसप्रवरान् गणान् ॥ भूतपरतपिशा्चाश्च सर्वानादेशयत्तदा ॥३<॥ ते सवं च यथायोग्यं गतास्ते सर्वतो दिशम् ॥ तं
गणं ईताम् हिशिवाज्ञाता उदायुघाः॥३९॥ यस्य यस्यायुधं यततत विरोषतः॥ तद्रणेशोपरि बलात्समागत्य विमोचितम्
॥७०॥ हाहाकारो महानासीतरैकोक्ये सचराचरे ॥ जिरोकस्था जनास्सव संशरं परमं गताः॥४१॥ नातं बह्मणोऽप्यायुभैहनाड
क्षयमेति हि ॥ अकाले च तथा नं शिवेच्छावशतः स्वयम् ॥४२॥ ते सँ चागतास्तघ षण्डुखाद्याश्च ये एनः ॥ देवा म्यथायुधा
जाता आश्चयं परमं गताः॥ ४२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे देवी जगदम्बा विबोधना ॥ ज्ञात्वा तच्चरितं स्वमपारं कोधमादघे ॥ ७४ ॥
जो आयुष था, वह उस्ने विशेष रूपे बरुपूवेक आकर गणेशजी पर प्रहार किंथा ॥ ४० ॥ उस समय चराचर नरिोकीमें बडा हाहाकार
मच गया त्रिोकीकै सव मलुष्य परम संदेहको प्राप्त हुए ॥ ४१ ॥ बरह्ाकी आयु समाप्त नहीं ह, बहाण्ड किस भकार
्षयको भाप होता है, यह अकांटमे निभ्य शिवकी इच्छाक वशसेही होता है ॥४२॥ हे सुने ! ते षण्डुसको आदि खेकर सम्पूणं गण व्यं
॥ आयुधवाडे होगये, यह देलक सम्पूणं देवता बडे विर्मयको प्रा हुए ॥ ४३ ॥ इसी सय जगदम्बा देवी भी इस वृत्तान्तो जानकर ५
ननन
3
नकन
शि ध षु |
॥३७०॥
रुन्सृ.२.
कु.सं.9
अ०३५्
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9 न च-----
कोष करती हुईं ॥ ४४ ॥ हे नीशवर ¡ देवीने उस समय अपने गणकी सहायताके निमित दो शक्तिये निर्माण कीं ॥ ४५॥ हं महाखनं ।
एकं तो महा भ्रचण्ड रूप धारण कर वहां स्थित हू, ओर श्याम ॒पर्वैतकै_ उनका सुख बडा कष्ण ओर युफाकै समान खल विदर था
॥ ४६ ॥ ओर एक बिजटीके समान स्वरूपवाली बहुत हाथो युक्त थी, यहदेवी भी बढी भर्यकर दुर्टेको दंड देनवाटी थी ॥ ४७ ॥
सेवता ओर गणणोनि सही भकारके आयुधोपर प्रहार किया, ओर प गगेशके सन्छस चलाये ॥ ४८ ॥ परन्तु उस परिषकं चारों ओर
देवताओके आयुष दिसाई नहीं देते थे, इस प्रकार उन दोनोके आयुने प्रम अदत चरित्र किया ॥ ४९ ॥ एकह बाखकन सम्पूण
शक्तिद्वयं तदात्र तया देव्या सुनीश्वर॥ निर्मितं स्वगणस्यैव सर्वसाहाय्यरेतवे॥४५॥ एका प्रच॑डङपं च धृत्वातिष्न्महामुने ॥
श्यामपर्वतसकांशं विस्तीयं खखगहरम्॥४६॥ एका विदत्स्वरूपा च बहृदस्तसमन्विता ॥ मयकरा महदवी दृ्दंडविधायिनी
॥४७॥ आयुधानि च सर्वाणि मोचितानि सरेगणेः ॥ गृहीत्वा स्वखखे तानि ताभ्यां शी च चिक्षिपे ॥४८॥ देवायुधं न दृश्येत
परिघः परितः पुनः ॥ एवं ताभ्यां कृतं त्र चरितं परमाद्धतम्॥ ४९॥ एको बालोऽखिकं सेन्यं लोडयामास दुस्तरम् ॥ यथा
गिखिरेणेव लोडितस्सागरः पुरा ॥ ५० ॥ एकेन निहतास्सवें शकरायया निजंरास्तथा ॥ शंकरस्य गणाश्चैव व्याकुलाः
अभवंस्तदा ॥५१॥ अथ सवे मिखित्वा ते निश्वस्य च सुहुमंहुः ॥ परस्परं समृचुस्ते तत्प्रहारसमाकुलाः ॥ «२ ॥
देवगणा उचुः ॥ किं कतंग्यं क्र गंतम्यंन ज्ञायते दिशो दश ॥ परिघं श्रामयत्येष सम्यापसव्यमेव च ॥ «३ ॥
ब्रह्मोवाच ॥ एतत्कारेऽप्सरःश्रष्ठाः पुष्पचन्दनपाणयः ॥ ऋषयश्च त्वदा्या हि येऽतियुद्धेतिखालसाः ॥ ५९ ॥
| विोड्तिकर डा, जेस मंदरने पुकाठमे सथ्को विरोडडाला था ॥ ५० ॥ एकनेही इन्द्रादिक सव देवताओंको निहत. कर
दिया त उस्न समय शिवजीके गण व्थाकट होगये ॥ ५१ ॥ तब वे सव मिलकर ओर वारंवार श्वास लेकर गणेशके प्रहारसे व्यो हो
प्रस्पर कहने ठगे ॥ ५२॥ देवगण बोरे क्या करं कहां जाय दशो दिशा दिखाई नही देती केव वाये दाये परिषही धमता
दीखता है ॥ ५३ ॥ ब्रह्माजी बोढे इसी समयमे श्रेष्ठ अप्सरा दुष्प ओर चंदन हाथ च्वि ओौर वह सव ऋषि खनि जो युद्धकी छालसा
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करनेवाडे ह ॥ ५४ ॥ हे सुनिसत्तम ! वह सबही उस युद्धके दशन करनेक स्यि आगे, हे नारदजी ! उस समय युद्ध दशनवाठोे आकाश भर
गया ॥ ५५ ॥ वे इस युद्धको देखकर मह। विस्मयो प्राप्त हुए, किं इस प्रकारका युद्ध तो हमने कभी देखा नहीं ॥ ५६ ॥ उस समय ससुद्रके
सहित पृथिवी कंपने ठगी, ओर पव॑त चणं होकर सथामकी सचना करने ठे ॥ ५७ ॥ बुटोक भह तारागण सब संहत होकर व्याकुछ होने
ठगे, उस्न समय सब देवता ओर गण पलायमान होगये ॥ ५८ ॥ कैव परम विकमी कातिकेय ही उस्न स्थानपर स्थित हो रहे, ओर
पठायमान न हए ॥ ५९ ॥ उन दोनों शक्तियोने उस युद्धम सबको उयाकु कर दिया, ओर देवताओके चराये हए सब अन्न निष्फढ
ते सवं च समाजग्बुयद्संदशंनाय वे ॥ पूरितो म्योमसन्मार्गस्तैस्तदा स॒निसत्तम ॥५५॥ तास्ते दृष्टा रणं तं वै महाविस्मयमा
गताः ॥ इदृशं परम् युद्धं न दष्टं चैकदापि हि ॥५६॥ पृथिवी कंपिता तत्र सञुदरसदिता तदा ॥ पव॑ताः परतिताभैव चुः संमाम
संभवम् ॥५७॥ द्यो्रक्षगणेषुण्णां सवे व्याकुलतां गताः॥ देवाः पलायितास्सवं गणाश्च सकलास्तद्ा ॥५८॥ केवरुषण्सुखस्तत
नापलायत विक्रमी ॥ महातीरस्तदा सर्वानावायं पुरतः स्थितः ॥५९॥ शङक्तिद्रयेन तदे सवे च निष्फलीङताः ॥ सवाश्चाणि
निकृत्तानि संक्षितान्यमरेगेणेः॥६०॥ येऽपस्थिताश्च ते सवै शिवस्यांतिकमागताः ॥ देवाः परायितास्सै गणाश्च सकलास्तदा
॥६९॥ ते सवं मिदिताभ्िव सुहनत्वा शिवं तदा ॥ अद्घुवन्वचनं कषिभ्रं कोऽयं गणवरः पभो ॥६२॥ पुरा चैव अतं यदधमिदानीं
बहुधा पुनः ॥ दृश्येन अतं हृ्टमीहशं तु कदाचन ॥६३॥ किंचिद्धिचाय॑तां देव त्वन्यथा न जयो भवेत्॥ त्वमेव रक्षकस्स्वामि
न््रह्मांडस्य न संशयः॥&९।॥।ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवं तद्वचः अत्वार्द्रः परमकोपनः॥कोपं कृत्वा च तसैव जगाम स्वगणेस्सह॥ &९९॥
कर दिये काट दिे ॥ ६० ॥ जो शेष बचे पे सव शिवजीके समीप चे गे, सव देवता ओर गण परायमान हो गे ॥ ६१ ॥ वे सव
मिठकर ओर रिबजीको भणाम् क्रकै शीप्रताते बोरे हे पभो । यह कौनसा गण है ॥ ६२ ॥ पृहे बहते गुदोका वृतान्त हने
ई देखे समे > ए सुना
है इत समय बहृतते युद देसे हने है प्र इस् कारका यद्ध तो कमी न देखा न छुना ॥ ६३ ॥ हे देव ! इसे हृ पार किया जाय
नहीं तो जय न होगी, है स्वामिन् ! बह्ण्डके तो आपही रक्षक हो, इसे सन्देह नहीं है ॥ ६४ ॥ बह्ञाजी बोरे यह दचन सुनकर
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प्रमक्ोपन स्वभाव रुद्र महाकोपकर अपने गणक सहित स्वयं वहां गये ॥ ६५.॥ वह सब देवता्ओकी सेना चक्रधारी विण्णकं ताथ "0
करती शिवजीके पे चटी ॥ ६६ ॥ इी समय हे नारदजी । तुम् देवदेव महश्वरको नमस्कार कर प जोडकर कहने ठे ¢
नारदजी बोखे ह देवदेव ! ह महादेव हे विभो ! तुम मेरे वचन सुनो. हे स्वामी ! आप अनेक रीठा करनेमं चतुर सवगामी हौ ॥&< ॥ |
यह महाटीटा करके गणणोका गवं दूर कर दिया, हे. देव ! शंकर गणराजको महाब दक्र आपनं देवताओंका गवं चूण किया ॥ ६२
हे देष ! शंभो ! हं सबके गर्वं दूरकरनेवाे, हे स्वतंत्र ! आपने भुवनम अपना अद्भुत बर भत्यक्ष कर द ॥ ७० ॥ ह त
देवसैन्यं च तत्सर्व विष्णुना चक्रिणा सह ॥ सघुतसवं महत्कृत्वा शिवस्यालजगाम इ ॥ ६६ ॥ एतस्मत्नतरे भक्तया नमस्कृत्य
महेश्वरम् ॥ अत्रवीत्रारद तवं वै देवदेवं कृतांजलिः ॥ ६७ ॥ ॥ नारद उवाच ॥ देवदेव महादेव शृणु मद्वनं विभो॥ त्वमेव
सर्वगस्स्वामी नानालीलाविशारदः ॥ ६८ ॥ त्वया कृत्वा महालीलां गणगवौऽपृहारितः ॥ अस्मं दत्वा बलं भरर देवगर्वश्च
शंकर ॥६९॥ दशितं वने नाथ स्वमेव बलमद्धतम् ॥ स्वतंत्रेण त्वया शंभो सर्वगर्वप्रहारिणा ए ७० ॥ इदानीं न ङुङ्ष्वेश
तां लीलां मक्तवत्सलः ॥ स्वगणानमरां थापि ससन्मान्याभिवर्धय ॥ ७१ ॥ इमं न खेरयेदानीं जहि ब्रह्मपदप्रद ॥ इत्युक्ता
नारद् त्वं वै द्यतरदधान गतस्तदा ॥ ७२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वि° श्ढसंहितायां च कुमारखण्डे गणेशयुद्धवरणन नाम
पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति त्वा महेशानो भक्तातुमहकारकः . ॥ त्वद्वाचा युद्धकामोभृत्तेन बारेन
नारद ॥१॥ विष्णुमाहूय संमत्य बलेन महता थुतः ॥ सामरस्सम्बुखस्तस्याप्यभरदेवश्चिलोचनः ॥ २ ॥
| समय आप यह टीला न कर अपने गण ओर देवताओंको सन्भानसे बडाद्ये ॥ ७१ ॥ हे ब्रह्मपदकै देनेवारे इस समय खेट
न करके जय कीजिये, नारदजी रेता कहकर वहसे अन्तर्धान हो गये ॥ ७२ ॥ इति श्रीशिवम° भाषादीकायां ₹ु° च० कु ° गणेशयुद्ध
वणेनं नाम पंचोदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ ब्ह्लाजी बोले हे नारदजी ! भक्तोकै ऊपर अनुश्रह करने वारे शिवजीने तुम्हारे वचनोँमे उस बाठककै
साथ युद्ध करनेकी इच्छा की ॥.१॥ विष्णजीको बुढाय इस विषयमं सम्पति करके बडी मेनाकै साथ देव॒चिरोचन उनकै सन्मुख
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# श्शक्तिदत्तमहाबलः ॥ 4 ॥ सवेंऽमरगणास्तचर विङंठितिबला षने ॥ अभूवन् विष्णुना तेन हता यष्टया पराङ्श्ुखाः
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गये ॥ २ ॥ महावटी बडे उत्साही शिवजीकी दसि देखे हुए देवताओंनि शिवके चरणकमलोंका ध्यान करके उक्षसे युद्ध करना आरम्भ नि
किया ॥ ३ ॥ तब महाबटी बडे पराक्रमी विष्णजी उस बाछकते युद्ध करने कगे, इम ओर वरम शरेष्ठ साक्षात् शिब प्रवीण
महादेवीके आयुध ॥ ४ ॥ यष्टिको ठेकर गणेशजी देवताओं श्रेष्ठ देवगणोप्र परहार करने कगे ओर शक्तिके दिये हुए आयुधसे उस महावीरने
सहसा विष्ण ऊपर यष्टिका प्रहार किया ॥ ५॥ हे सने ! जिस समय उस बारकने यष्टिका परहार किया उक्ष समय विष्णकी यह ¦
देख सष देव्तोका बल हास होगया ओर वे युद्धते पराद्खख हए ॥ ६ ॥ हे शने ! शिवजी भी अपनी सेनाके सहित चिरकारु तक युद्ध
देवाश्च ययुधुस्तेन स्मृत्वा शिवपदम्बुजम् ॥ महाबला मदोत्साहाश्शिवसदृष्टिकोकिताः ॥ ३॥ युयुधेऽथ हरिस्तेन महाबरूप
राक्रमः ॥ महादेव्यायुधो वीरः प्रवणः शिवङ्पकः ॥ ४ ॥ य्या गृणांधिपर्सोथ जघानामरपुङ्गवान् ॥ हरि च सहसा वीर
॥ & ॥ शिवोपि सह सैन्येन युद्धं कृत्वा चिरं शुने ॥ विकरालं च तं दृष्टा विस्मयं प्रम गतः ॥७॥ छेनैव च हंतव्यो
नान्यथा हन्यते पनः ॥ इति इद्धि समास्थाय सैन्यमध्ये व्यवस्थितः ॥ < ॥ शिवे दृष्टे तदा देवे निगणे शुणकपिणि ॥
विष्णौ चैवाथ संमामे आयात सर्वदेवताः ॥ ९ ॥ गणाश्ैव महेशस्य महाहर्षं तदा युः ॥ सवे परस्परं भीत्या मिर्ता
चङरुरसवम् ॥ १० ॥ अथ शाक्तिसुतो वीरो वीरगत्या स्वयष्टितः ॥ प्रथम पूजयामास विष्णुं सर्वसुखावहम् ॥ ११ ॥ अहं
1 हन्यतां च त्वया विभो ॥ छलं न वध्योऽयं तामसौ 2 । १२ ॥
करकं उस बाटककी विकराल स्वरूप देखकर परम विस्म भाक्त हुए ॥ ७ ॥ यह बाठक शङमषेही तकं हो सकेता ह अनं हीं
पसे नियमे स्थित हौ शिवजी तेनाके मध्य स्थित हूए ॥ ८ ॥ तव निशैम ओर सगुण पवार देव ५ प
आया देलकर सव देवता ॥ ९ ॥ ओर शिषजीके सव गण बडी परसन्नताको भाप हए, ओर परसपर मिलकर उत्व करने रगे ॥ १०॥
तब शक्तिके ऽन गणेशजीने बीरगतिको भरा होकर अपनी यष्िते पथम् विष्डजीको पूजा ( अथात् पहार ) किया ॥ १३ ॥ तब विष्णने
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शिण्पु० शंकरसे कहा हे विभो भँ तो इस बाठ्कको मोहित करता हं ओर आप इसको नष्ट करे, यह विना कौ शठके मर नहीं सकंता 1
॥३७२॥ यह तमोयाणवाा बडा दुर्जय ड ॥ १२ ॥ इस प्रकार मति करके ओर शिवजीसे सम्मति कर शेवी आज्ञाकौ प्राप्त हौ उस समय ।व
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‡ मोहको पराप्त हए ॥ १३ ॥ विष्णजीकी यह दशा देख वै पावतीकी प्रगट की हदं दोनों शक्त्य ख्य हो ग ओर हे छने । ४
अपना सथ बढ उन्होने गणेशजीको दे दिया ॥ १४ ॥ जब इस भकारे दोनों शक्ति टीन हो गई तब जहां विष्ण॒जी थे गणेशजीने
४ उनपर प्रिषका पहार किया ॥ १५ ॥ वि्यजीने उस समय भक्तवत्सल अपने भरम महेश्वर ईशानके स्मरण कर उनकी गतिक महायत्न ४
त इति कृत्वा मतिं ततर ससंमंञ्य च श्थुना ॥ आज्ञा राप्याऽभवच्छेवीं विष्णुर्मोहपरायणः ॥१३॥ शक्तिद्वयं तथा लीनं इरि दक्षा ` टं
तथाविधम् ॥ दत्वा शक्तिबलं तस्मे गणेश्चायाभवन्धुने ॥१४॥ शक्तिद्वयेऽथ संलीने य विष्णः स्थितस्स्वयम् ॥ परिघं क्षिपत र
६ वस्तत्र गणेशो बलवत्तरः ॥ १५ ॥ कृत्वा यल्नं किमप्यञ वंचयामास् तद्गतिम् ॥ शिवं स्मरत्वा मरैशानं स्वप्रथुं भक्तवत्सलप् र
| ॥ १६॥ एकतस्तन्धुखं दषा शंकरोप्याजगाम ह ॥ स्वतरिश्चुलं समादाय सुदो युद्धकाम्यया ॥ १७ ॥ स ददर्शागतं शयं ¢
ट श्लहस्तं महेश्वरम् ॥ दंतुकामं निजं वीरश्शिवापुत्रो महाबलः ॥ १८ ॥ शं्तया जवान त हस्ते स्मृत्वा मातपदांबुजम् ॥ ट
। स॒ गणेशो महावीरश्शिवशक्तिपरवरद्धितः ॥ १९ ॥ अिश्युलं पतितं दस्ताच्छिवस्य परमात्मनः ॥ द्वा सदूतिकस्तं वे पिनाकं ए
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, २९|| धलराददे ॥ २० ॥ तमप्यपातयद्भूमौ परिघेण गणेश्वरः ॥ इताः पच तथा हस्ताः पञ्चभिश््ूकमाददे ॥ २१ ॥ ट
कु.सं.४ || करक वंचित कर दिया ॥ १६॥ इतत ओर शंकर भी एक ओरसे वारकका खख देखते हए क्रौधकर हाथमे त्रिश ठेकर उत स्थानम आये ¢
|| ॥ १७ ॥ तब हावी शिवपुत्रने हाथमे तरिशूर टिये ह्वर शिवको अपने मारनेको आते हए देखा ॥ १८ ॥ तब गणेशजीने अपनी माताकै
¢ चरणकमल्को स्मरण कर महादेवजीके हाथमे शक्तिका परहार किया, बह महावीर गणेशजी शिवजीकी शक्तित बे हए है ॥ १९ ॥ शक्तिके ||
ठगनेसे परमात्मा शिवके हाथते धचुष गिर पडा तब यह देखकर उन्होंने पिनाक धलुषको धारण किया ॥ २० ॥ गणेश्वरने परिषके ॥‰
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। उत्को भी परथिवीपर गिरा दिया, ओर शूदवारा शिवजीके पांच हाथोको गणेशने यथे कर दिया ॥ २१ ॥ तब शिवजीने रोका |||
चासते यह बात कहौ अहो कितने दुःखकी बात है जव भेरी यह दशा है तव गणोंकी क्या दशा न होगी ॥२२॥ इसी सभय शक्तिके दिये |¢
बसे युक्तं होकर गणेशजीने परिषसे सब गण ओर देवताओंको ताडित किंया ॥ २३॥ परिषसे व्याकु हो वे देवता ओर गण दूर चरे गये ह
भौर उस अदभुत प्रहार करनेवाटे सन्थख को भी न ठहर स॒का ॥ २४ ॥ तब विष्णने उस महाबली महाशूर रणप्रिय गणको देखकर ट
कहा किं इतत को धन्य है ॥ २५ ॥ हमने बहते देवता, दानव दैत्य, यक्ष, गंधव, राक्षस देखे है ॥ २६ ॥ पर इस गणेश्वरकी समताको ट
अहो दुःखतरं नूनं संजातमधुना मम॥ मवेतपुनगेणानां किं भवाचारी जगाविति ॥२२॥ एतस्मित्त॑तरे वीरः परिघेण गणेश्वरः ॥ त
जघान सगणान् देवान् शक्तिद॑त्तवरान्वितः॥२३॥ गता दशदिंशो देवास्सगणाः परिघार्हिताः॥ न तस्थुस्पमरे केपि तेनाद्धतप्रहा त
रिणा॥२९॥ विष्णुस्तं च गणं दष्क धन्योयमिति चाव्रवीत्॥महाबलो महावीरो महाश्चरोरणपियः॥२५॥ बहवो देवताभथेव मया
दष्ठारुतथा पुनः ॥ दानव। बहवो दैत्या यक्षगंधर्वराक्षसाः॥२६॥ नैतेन गणनाथेन समतां यांति केपि च ॥ तैरोयेऽप्यखिले तेजो ।
हूपशौरयगुणादिभिः॥२७॥एवं सं्ुवतेऽयुष्मे परिषरं्रामयन् स च ॥ चिक्षेप विष्णवेतच शक्तिषु गणेश्वरः॥२८॥ चक्रं शदीत्वा £
इरिणा स्मृत्वा शिवपदाम्बनम्॥ तेन चक्रेण प्रिषो दुतं खंीकृतस्तदा॥२९॥ खंडं त प्रिषस्यापि दर्ये पाक्षिपद्रणः॥ ग॒दीत्वा |©
गुडेनापि पक्षिणा विफ़रीकृतः ॥३०॥ एवं विचरितं कालं महावीराद्ुमावपि॥ विष्णुश्चापि गणश्चव युय॒धाते परस्परम् ॥३१॥ |©
तो कों भी परा नहीं हो सकता यह स्व् विलोकीमे तेजहप शूरता आदिकै यगत यक्त है ॥ २७ ॥ विष्णजी एसा कह रहे थे, कि ||
इतने परिघको धुमाते हए शक्तिुत्र गणेश्वरने उप्को विष्णजी प्र परहार किया ॥ २< ॥ तब शिवजीकै चरण कमलोका स्मरण कर चक्र ट
| गहण करक उप्त परिषके सड २ कर दिये ॥ २९ ॥ तव गणेश्वरने उस सड परिषको ही विष्णकै ऊपर हार किया तब गरुढजीने तै
॥ अपने प॑खोति उत्तको प्रहण करके विफ कर दिया ॥ ३० ॥ इस भकार पहावीर् विष्य ओर गणेश्वरको युद्ध करते करते बहत ।
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समय बीत गया ॥ ३१ ॥ फिर वीरो ष्ठ महाबटी शक्तिएतरने शिवको स्मरण कर उस अतु यष्टिक प्रहणकर उससे (७
पडे ओर फिर शीघधतासे उटकृर शिवाए्रके साथं संग्राम करन छ
किया ॥ ३२॥ विष्णजी उस भ्रहारको न सहकर परथिवीपर गिर॒ प = ।
॥ ३३ ॥ इसी अन्तरको पा होकर शिषजीने बहुत शीपरतासे जाकर त्रिशूले बाठ्कका शिर काट दिया ॥ ३४ ॥ हे नारदजी ।
जिस समय बाठकका शिर छिन्न हो गया उस समय देवता ओर गणोंकी सेना निश्वक हो गं ॥ ३५॥ हे नारदजी ! उसी समय
|
तुमने जाकर सब बात देवी कह दी हे मानिनि! नो ुम अपना मान किं्ती भकार मत त्यागन करना ॥ ३६ ॥ ह नारद् { कह
॥ई३७३॥
पनर्वीरवरश्शक्तिस॒तस्स्मृतशिवो बली ॥ गहीत्वा य्टिमत॒लां तया विष्णुं जघान ६।३२॥अविषद् परहारं तंस भ्रमौ निपपात इ ॥
द्तस्॒त्थाय् युयुधे शिवापु्ेण तेन वै ॥३३॥ एतदंतरमासा्य शूलपाणिस्तथोत्तरे ॥ आगत्य च त्िञ्चेन तच्छिरो निरकतत्
॥२४॥ छन्ने शिरसि तस्यैव गणनाथस्य नारद ॥ गणसेन्यं देवसैन्यमभवच्च सुनिश्चलम्॥३५॥ नारदेन त्वयाऽऽगत्य देये सरव
निवेदितम् ॥ मानिनि श्रूयतां मानस्त्याज्यो नेव त्वयाभुना॥३६॥ इत्युक्ताऽन्तितस्तञ नारद तवं कङप्रियः ॥ अविकारी सदा
| त खनिः ॥२७॥ इति श्रीशिवणुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थं ङुमारखण्डे गणेशयुद्धगणेशशिरछेदन
¢| वर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ 9६ ॥ नारद उवाच ॥ ब्रह्मन् वदं महाप्राज्ञ तदुत्तान्तेखिरे अते ॥ किमकार्षौन्महादेवी श्रोतु
मिच्छामि तच्त्वतः॥ 9 ॥ ब्रह्मोवाच श्रयता खुनिशाद कथयाम्यद्य तद्धुवम्॥ चरितं जगदंबाया यजातं तदनंतरम् ॥ २ ॥
¢ मद॑गान्पटहाश्निव गणाश्वावादंयंस्तथा ॥ मदोत्सवं तदा चङे तस्मिन्गगाधिपे ॥ ३ ॥ †
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भिय तुम इस भकार कहकर अन्तधौन हो गये कारण कि तुष अविकारी सदा शिदकी षनकी गतिके अनुभार करनेषाठे हो ॥ ३७ ॥
इति भीशिवमहा्राणे ९ च० क° षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ नारदजी बोे ह बहमन ! हे महाभाज्ञ ! आप यह किये
| सम्पूणं वृत्तान्तो सुनकर महादेवीने क्या किया सो ् शुननेकी इच्छा करता हूं ॥ १ ॥ बह्लाजी बोढे हे स॒निंभेष्ठ | सुनो भ उस वृत्ता
न्तको सम्पूणं पते कहता हू, इसकै उपरान्त जो जगदम्बाने चरित्र किथा उसको आप् हुनिये ॥ २ ॥ उत समय शिवजीके गग गणेशजीके
मरजानेपर् मृदंग परह बजाकर महोत्सव करने रगे ॥ ३ ॥ शिवजी गणराजका शिर छेदन करके जब तक कुछ दुःख पां हे सनीश्वर त
तबतक पावतीको बडा क्रोध आगया ॥ ४ ॥ भँ क्या करं कहां जाऊहाहासख्चे बडा दुःख धराप्त हुआ है, स्ञे जो महान् दुःख हे भेरा £
|| यह इख किस भरकार नष्ट हो सकता है ॥ ५॥ सब देवता ओर गर्णोनि मेरे एतव्रका नाश कर दियाहै, सोमे भी सबका नाश वा प्रलय ¢
¢ कर दृगी ॥६॥ इत प्रकार दुःखी होकर पारव॑तीने सहस्चोँ सौ हजार शक्तियोंकी रचना कर डटी,ओर सब टोकोंकी महेश्वरी एक षणमाजमे
$ कोधे भरगईं॥७।इस वे निर्मित हुई शक्त्य उस जगदम्बा शिवाको प्रणाम करके तेजसे भकाशित हो कहने ठगी है मातः ! क्या आज्ञा होती है! ‰
# शिबोपि तच्छिरशिछत्वा यावदुःखशुपाददे ॥ तावच्च गिरिजा देवीचुकोधाति सुनीश्वर ॥ 9 (२ कुरोमि क गच्छामि हाहा ¢
इःखघुपागतम् ॥ कथ दुःखं विनश्येता स्याऽतिदुखं ममाधुना ॥५॥ मत्सुतो नाशितश्वा्य देवेस्सवैरगणेस्तथा ॥ सर्वास्तान्ना
६| शयिष्यामि प्रख्यं वा करोम्यदम् ॥६॥ इत्येवं दुःखिता सा च शक्तीश्तसदसशः ॥ निमे तसकषणं छदधा सर्व छोकमहेश्वरी |£
॥७॥ निर्भितास्ता नमस्कृत्य जगदैबां शिवां तदा ॥ जाज्व्यमाना ह्यदन्मातरादिश्यतामिति॥ ८ ॥ तच्छ्रत्वा शंयुशक्तिस्सा ¢
कृतिः कोधतत्परा ॥ पत्युवाच तु तास्सवा महामाया सनीश्वर ॥ २ ॥ देव्युवाच ॥ हे शक्तयोऽधुना देव्यो युष्मासिर्ैत्नि ९
देशतः ॥ प्रखयु्ा कत्तम्यो ना कार्यां विचारणा ॥ १० ॥ देवाभ्रिव अषीशेव यक्षराक्षसकांस्तथा॥ अस्मदीयान्परांशेव ठ
सख्यो भक्षत वे दगात् ॥११॥ ब्रह्मोवाच ॥ तदाज्पताश्च तार्सरवाशशक्तयः कोधतत्पराः ॥ देवादीनां च सवेषां संहारं करब
यताः ॥ १२ ॥ यथा च तृणसंहारमनलः कुर्ते तथा ॥ एवं .ताश्शक्तयस्सर्वास्संदारं कतैशखु्यताः ॥ १३ ॥ ह
॥८॥ यह सुनकर करोधमं भरकर वह शिवकी शक्ति महामाया इस पकार कहने र्गी ॥९॥ देवी बोरी हे शक्तियो! त॒म सथ देवी अभौ भेरी ट
आक्ञासे इ देवनाम जाकर भरख्य कर ढाठो इसे विशेष विचारकी आवश्यकता नहीं ह॥ १ ०॥ देवता, कपि, यक्ष, रक्षस, अपने प्राये नो
4 मि, इन सबको हठे भक्षण कर जाओ ॥ ९१ ॥ ब्रह्माजी बोरे पार्वतीकी आज्ञाते षह सव शकितं कोधे तत्र ' होकर षव देगा ठ
नेमं उयत हो गई ॥१२॥ जसे अग्नि तृणोंका संहार करती है इश भकार वह सब शकितये संहार करनेको उयत हुईं ॥ ३३ । |
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गणेश, विष्ण, बहा, वा शंकर, इन्द्र, वा यक्षराज सूयं ॥१४॥ वह सबकाही संहार करनेको उयत होगई जहां देखो वहां शक्तियही दिखाई
देती थीं ॥१५॥ कराटी, कुडजका, संजा, ठम्बशीषा इत्यादि अनेक शक्तिये हाथते देवताओंको पकड़कर खखमे हाने ररगी॥ १ ६॥ हर, बहा?
६ ओर हरि, इस भक।र उ संहारको देखकर इन्द्रादि सव देवतागण ओौर कषि.॥१७॥ सब कोद जीवनसे हताश होकर कहने कगे, क्या दवी
© अकालमंही प्रलय कर देगी, इस भरकारका सबको संदेह इहो गया ॥१८॥ सब (6 परस्पर विचार करने कग १९ किया जाप ओर
| गणपो वाथ विष्ण॒वां ब्रह्मा वा शंकरस्तथा ॥ इन्द्रो वा यक्षराज वा स्कंद वा सूयं एव वा ॥१४॥ सवेषां चव संहार कुर्वतिस्म्
ठ निरंतरम् ॥ यत्रय तु दृश्येत तत्रतत्रापि शक्तयः॥१९।कराटी कन्जका खंजा खंवशीषां ह्यनेकंशः॥ इस्ते धृत्वा तु दर्वा सुखे
चैवाक्षिपंस्तदा॥१६।॥तं संहारं तदा दष्टा हरो बरह्मा तथा हरिः ॥ इन्द्राद्योऽखिखाः देवा गणाश्च ऋषयस्तथा५१७॥किं करिष्यं
ए ति सा देवी संहारं वाप्यकारूतः ॥ इति संशयमापत्ना जीवनाशा इताऽभवत् ॥ १८ ॥ सवं च मिलिताश्चेमे किं कत्तव्य
| विधित्यताम् ॥ एवं विचारयन्तस्ते तूर्णभूचुः परस्परम् ॥ १९ ॥ यदा च गिरिजा देवीं प्रसन्ना हि भवेदिह ॥तदा चैव भवे
| त्स्वास्थ्यं नान्यथा कोटियत्नतः ॥ २० ॥ शिषोपि दुःखमापत्नो लौकिकीं गतिमाश्चितः ॥ मोदयन्सकलांस्त नानालीलावि
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शारदः ॥२१॥ स्वेषां चैव देवानां कटिर्भ्रा यदा तदा ॥ शिवा कोधमयी साक्षाद्र॑तुं न पुर उत्सहेत् ॥ २२ ॥ स्वीयो
वा परकीयो वा दैवो वा दानवोपि वा ॥ गणो वापि च दिक्पाो यक्षोवा किन्नर शुनिः॥ २३॥
परस्पर सव विचारकर बोटे॥१९॥यदि गिरिजा देवी प्रसन्न होजाय तभी खवस्थता हौ सकती है. अन्यथा करोड उपाये भी न होगी॥२०॥
लोकिंकी गति दिखाते हए शिवजी भी दुःखको पाप्त हुए ओर वह अनेक टीखा करनेमं चतुर उस्न समय सवको मोहित करने लगे ॥२१॥
षव देवताओंकी उस समय कमर टूट गहं ओर कोधभयी शिवाके भीतर बंदिरमें जानेकी इच्छा नकी ॥ २२॥ अपना पराया
१ परस्मपदमाषंम् ।
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दानव, गण्, दिकूपाट, यक्ष, किंनर, खनि ॥ २३ ॥ विष्ण, बरह्मा, वा महामु शकर, हे खने ! उस्र समय पावंतीकै आगे कोड भी
ठहरनेको समथं न हआ ॥ २४ ॥ उकं महाप्रकाशित चकते हूए तेजते संतापित हो वै सब देवता भयभीत होकर दृरही स्थित हुए ॥२५॥
उसी समय वहां दिव्यदशेन नारदजी देवताओकि सुखके निमित्त प्राप्त हए ॥ २६॥ मञ्चे बहा, शिव, विष्णजीको प्रणाम कर सवके साथ
भिरकर विचार कार्यं कहने रगे ॥ २७ ॥ सब महात्मा देवता तुम्हारे सहित भिरुकर विचार करने टगे ओर वह सव यह कहने लगे किं
दुःखको शाति किस भ्रकारसे होगी ॥ २८ ॥ जबतक गिरिजा देवी कृपा नहीं करेगी) तबतक किंञ्षी भकारसे सुखकी भराप्ति नहीं होगी
विष्णुर्वापि तथा ब्रह्मा शंकरश्च तथा अथुः॥ न कथिद्विरिजामरे चस्थातु शक्तोऽभवन्धुने॥२४॥ जाज्वस्यमानं तत्तजस्सर्वतोदारि
तेऽखिलाः॥ द्वा भीततरा आसन् सवे दूरतरं स्थिताः ॥२५॥ एतस्मिन्समये त्र नारदो दिव्यदर्शनः॥ आगतस्तवं सने देवगणानां
सुखहेतवे॥२६॥्रह्नाणं मां भवं विष्णुं शंकरं च प्रणम्य साः॥ समागत्य मिरित्वोचे विचायं कार्यमेव वा ॥२७॥ सवे संमं्रयां
चङ्ुर्त्वया देवा महात्मना॥ दुःखशांतिः कथ स्यद्वे समस्त एव् ते॥२८॥यावच्च गिरिजा देवी कृपां नैव करिष्यति॥ तावत्वं
सुखं स्याद्र नाच काया विचारणा॥२ ऋषयो दित्वदाद्याशच गतास्ते वे शिवान्त्िकिम्॥ सवे परसादयामाघःकोधशान्त्यै तदा शिवाम्
॥२०॥ पुनः पुनः प्रणसुञ्च स्तुत्वा स्तोतरेरेकशः॥ सर्व प्रसादयन्प्ीत्या प्रोडुर्देवगणाज्ञया॥३१॥ सुरषय उचुः॥ जगदम्ब नमस्तु
भ्य शिवाये ते नमोस्तु ते॥ चंडकाये नमस्तुभ्यं कल्याण्ये ते नमोस्तु ते॥३२॥ आदिशक्तिस्त्वमेवांब सर्वसशिकरी सदा॥ त्वमेव
पालिनी शक्तिस्त्वमेव परल्यंकरी॥३३॥ प्रसन्ना भव देवेशि शांति कुर् नमोस्तु ते ॥ सर्वै हि विकटं देवि तधिजगत्तव कोपतः॥३९॥
इसमे विचार की आवश्यकता नहीं ॥ २९ ॥ तव तुमको आदि लेकर सवे ऋषि पावंतीके समीप गये, ओर कध शान्तिके ख्य शिवाको
सव को भ्सन्न करने रुगे ॥ २० ॥ बारंबार भणाम कर अनेक स्तो स्तुति करके सव देवता प्रसन्न करफे भगवते बोरे ॥ ३१ ॥
देवपिं बोठे हे जगतकौ माता ! हे शिवा ! तुमको प्रणाम है, हे चण्डिका ! हे कल्याणि ! तुमको प्रणाम है ॥ ३२ ॥ तुमहीं आदि भक्ति
४॥ ओर सव सध्की कएनेवी हो ठुमहीं पान ओर मख्य करनेवाटी शक्ति हो ॥ ३३ ॥ हेदेमेशि ! दुम पन्न होकर अब शांति करो
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| हे देवि ! आपके कोपे सब जगत् व्याकुल हो रहा है ॥३४॥ ब्रह्माजी बोठे जब इस. परकारसे तुमको आदि लेकर ऋषियोनि परा देवीको १५
सतुति की तब भौ कोधकी इष्टिसे उनकी ओर देखते हृए शिवाने कुछ भी न कहा ॥ २५ ॥ तब सब ऋषियोँने भगवतीकरे चरणकमर्ठोको ह
पणाम करक परमभक्तिते हाथ जोडकर स्तुति करनी आरंभ की ॥ ३६ ॥ ऋषि बोटे हे देवि ! क्षमा करो क्षमा करो इस्त समय संहार दज ठ
जाता है, है अम्बिके ! तुम्हारे स्वामी यहां स्थित है उनको तो देखो ॥ ३७ ॥ ओर हम व्हा, विष्ण, आदि देवता तुम्हारी प्रजा हाथ जडे ¢
हुए तुम्हारे सन्छख से है ॥ ३८ ॥ हे परमेश्वरि ! अश इन सवका अपराध क्षमा करो हम सबही व्याकु हो रहे है हमारी शाति करो ¢
बह्नोवाच ॥ एवं स्तुता परा देवी ऋषिभि त्वदादिभिः॥ऊुद्दृ्टया तदा तशि किंचिन्नोवाच सा शिवा॥३५॥तदा च ऋषय ¢
स्सवे नत्वा तचरणाबुजम् + पुनश्चुश्शिवां भक्तया कृतांजटिपएुटाश्शनेः ॥३६॥ ऋषय उचुः ॥ क्षम्यतां देवि संहारो जाय ¢
तेऽधुना ॥ तव स्वामी स्थितश्चा्र पश्य पश्य तमंबिके॥ ३७॥ वर्य के च इमे देवा विष्णुव्रह्मादयस्तथा॥ प्रजाश्च मवदीयाश्च कृतां
जटिपटाः स्थिताः॥३८।क्षतव्यथापराधो वै सवेषां परमेश्वरि ॥ सव हि विकराथाय शांति तेषां शिवे कुर् ॥३९॥ ब्रद्मोवा ए
च ॥ इत्युक्ता ऋषयस्सवे सुदीनतरमाकुलाः ॥सं तस्थिरे चंडिकामरे कृतां जरिपुटास्तद्ा॥४ ०॥एवं श्रुत्वा वचस्तेषां प्रसत्रा चंडि ६
काऽभवत् ॥ परत्युवाच ऋषीस्तान्वे ककशृणाविष्टमानसा॥ ४१ देव्युवाच ॥ मत्पुत्रो यदि जीवेत तदा संहरणं न दि॥ यथा दि भवतां ॥९
, मध्ये पूज्योऽययं च भविष्यति॥४२॥सवाध्यक्षो भवेदद्य यूयं कुरूत त्यदि॥तदा शांतिभवेद्टोके नान्यथा सुखमाप्स्यथ ॥४३॥
£
॥ ३९ ॥ बह्माजी बोठे देते कहकर सव देवता बडी दीनतासे व्याकुढ हो गये ओौर हाथ जोडकर चण्डिकाके आगे खंडे रह गवे ॥ ४०
¢ तब उनके यह वचन सुनकर भगवती प्रसन्न हुई ओर छपा देखती हृद मनम करुणाकर उन देवता ऋषियोते बोढी ॥ ४१ ॥ देवी बोडी
मेरा एज यदि जी जाय ओर तुम सवके मध्यमे वहे भथम पूज्य हो तो यह संहार नहीं होगा ॥ ४२ ॥ यदि तुम आजस्े इसको सवका
अध्यक्ष कर सको तो छोकमे शांति होगी अन्यथा तुमको सुख नहीं भिखेगा ॥ ४३ ॥ |
बह्लाजी बोढे तव॒ भगवतीकै रसला कहृनेपर तुमको आदि लेकर सव ऋरि उन देवताओंके समीप आकर यह सब वृत्तान्त निवेदन करते ट
हुए ॥ ४४ ॥ उन सब देवताओंने सुनकर शकरसे यह बात कही, ओर इन्द्रादि सब देवता हाथजोड दीन होकर खड रह गये ॥ ४५ ॥ ४
देवता ओके यह वचन सुन कर शिवजी बोटे वह बात करनी चाहिये जिससे सब ठोकका मंगर हो ॥ ४६ ॥ अच्छा उत्तर दिशाको चे
जाओ इसमे जो पहरे मिरे उसका शिर ठाकर इस गणेश्वरके शरीरम जोड देना चाहिये ॥ ४७॥ ब्रह्माजी बोे तब उन शिवजीकी आज्ञा |
भाननेवाठे देवाताओंने यह सव कुछ किया, कटेकवरको टेकर ओर उस्तको विधिपूरवक प्रक्षाटन करके ॥ ४८ ॥ ओौर उस्षको पूजन करके वे ४
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्तास्ते तदा सवं ऋषयो युष्मदादयः ॥ तेभ्यो देवेभ्य आगत्य सर्वे वृत्तं न्यवेदयन्॥४७॥ते च स्वे तथा ॥8
धत्वा शंकराय न्यवेदयन् ॥नत्वा परजल्यो दीनाः शक्रम्रथतयस्सुराः॥४५॥भोवाचेति सराज्छटत्वा शिवशचापि तथा पुनः ॥ ||@
कृत्य च तथा स्वलोकस्वास्थ्यं भवेदिद्॥४६॥उत्तरस्यां पुनयात प्रथम यो मिलेदिद॥तच्छिरश्च समास्य योजनीयं केवर ॥ ठ
॥४७॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ततस्तेस्तत्कृतं सवं शिवाज्ञाप्रतिषालकेः ॥कटेवरं समानीय प्रक्षाल्य विधिवच तत् ॥४८॥ पूजयिता ¢
पुनस्ते वे गताोदङ्खुखास्तदा ॥ प्रथमे मिलितस्तञ हस्ती चाप्येकद॑तकः ॥४९ ॥ तच्छिरश्च तदा नीत्वा त तेऽयोजयच् £
धुवम् ॥ सथोज्य देवतास्सर्वाः शिवं विष्णुं विपि तदा॥५०॥पणम्य वचनं ोुभवदुक्तं कृतं च नः॥ अन॑तरं च तत्कार्य ट
भवताद्भवेषित्म् ॥५१॥ ब्रह्मोवाच ॥ ततस्ते त॒ विरे पाषदाशच सुराः सखम् ॥ अथु तद्वचनं थत्वा शिवोक्तपर्थ्यपारयय् ||&
॥ ५२ ॥ उचुस्ते च तदा तञ ब्रह्मविष्णुसुरास्तथा ॥ प्रणम्येशं शिवं देवं स्वप्र यणवजितप् ॥ ५३ ॥
उत्तर दिशाको गे, प्रथम उनको एक दातवाठा हाथी मिला ॥ ४९ ॥ उन्होने उसका शिर कारकर छाय गणेशके कंधरपर संयुक्त कर दिया
पीछे वे सब देवता बरहा, विष्ण, ओर शकरकै पास जाकर ॥ ५० ॥ प्रणाम कर बोरे हे देवं ! हमने अपना छल सम्पूणं कर छया, अब जो त
आपको कव्य है सो आप अपना काम करं ॥ ५१ ॥बलाजी बोटे रेता कहकर वह॒ सब पाद वहा स्थित हए ओर शिवजीके कहे सब ठै
वचना पाढन किया ॥ ५२ ॥ तव वे ब्रह्मा, विष्ण, आदि सब देवता अपने भु नि्ेण बह शकरको प्रणामं कर कहने रुगे ॥ ५३ ॥ ६
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शिण्बुर । जिस कारण कि हुम महात्माके तेजते हम सव भगट दए है, सो वेदमंवोके योगसे बह तेज इसमे आकर पराप्त हो ॥५४॥ इस भकारके मनसे
॥२७६॥ ||4 जलको अभिर्म्ण कर शिवको स्मरण कर उन देवताओंने गणेशके शरीरपर जठ छिडका ॥*५५ ॥ उस जके स्पश वात्रसह। वह वाख ¢
| || शिवजीकी इच्छते सोते हके मान उट वेढा ॥ ५६ ॥ बहत सुन्दर यह बाङक _ गजखल रक्तवण भतन पदन बद कातिषाठा बडी ||ह
|| इन्दर आङतिवाखा हुआ ॥ ५७ ॥ हे खनीश्वर ! उस समय शिवाणत्र उस बाटकको जीता हृभा देखकर सव कोड भन्न होगये, ओर सवका £
¢ दुःख क्षय होगया ॥ ५८ ॥ ओर सबने प्रसन्न होकर देवीको दर्शन कराया) पुत्रको जीवित देखकर देवी बहुत भसन ह ॥ ५९ ॥ इति
यस्मात्वत्तेजसस्सवें वथ जाता महात्मनः॥त्वत्तेजस्तत्समायातु वेदमंजाभियोगत :॥५8॥इत्येवमभिमंतेण मंितं जलघुत्तमम्॥ ४
| स्मृत्वा शिवं समेतास्ते विक्षिपुस्तत्कृखेवरे ॥५५॥ तनलस्पर्शमात्रेण चिदयुतो जीवितो दतम् ॥ तदोत्तस्थौ सुप्त इव स॒ बालश्च
& शिवेच्छया ॥९६॥ सखभगस्सन्द्रतरो गजुवक्रस्ुरक्तकः ॥ पसन्नवदनश्चातिसुप्रभौ कलिताङ्कतिः ॥५९७॥ तं दष्टा जीवितं बाल ठ
& शिवापुतर भरनीश्वर ॥ सवं अुश्वदिरे तत्र सव दुःखं क्षयं गतम् ॥ ५८ ॥ देव्ये संदशयामासुः सवे हर्षसमन्विताः ॥ जीवितं तनय ¢
४ शृष्टदेवी ष्टतराभवत् ॥५९॥ इति श्रीशिवमहाण्राणे द्वितीयायां श्दषंहितायां चतुर्थं मारखंड गणेशजीवनवर्णन नाम सप्त ||
| दशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ नारद उवाच ॥ जीविते गिरिजापुे देभ्या दष्टे भेश्वर ॥ ततः कमभवत कृपया तद्दाधुना #
¢ ॥ १ ॥ अह्मोवाच् ॥ जीविते गिरिजापुत देव्या दष सुनीश्वर ॥ यृनातं तच्छृणुष्वाय वृच्पि ते महदु्सवम् ॥२॥ 12
१ | शिवापुतर नि्वयभरो विकृतो शुने ॥ अभिषिक्तस्तदा देवैगैणाध्यकषगंजाननः ॥ ३ ॥
कु.सं.४ | भीरिवमृहाष्राणे रुदरसंहितान्तगत च ° कुमारखण्डे भाषाटीकायां गणेशजौवनवरणनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ नारदजी बोे हे देवेश्वर !
४ ४ जब गिरिजाका एत्र जीवित होगया तव क्या हुआ सो आप् छुपाकर कहिये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले हे खनीश्वर ! जब देवीने देखा किं मेरा
| पत्र जीवित होगया उस समय जो हासो थ तुमसे कहता हूं उस समय महा उत्व हभ ॥ २ ॥ जिस सभय वह शिवाके पुत्र जीवित हुए
‰॥ ओर विकारसे रहित हूए तव देवताओनि गजाननको गणाध्यक्ष पृदपर अभिषिक्त किया ॥ ३ ॥
ट
६
शिषादेवी अपने पुत्रको देखकर बहत परहन्न हृदं ओर दोनों भुजाओं पकडकर बार्कको आङिगन् किया ॥ ४ ॥ अनेक प्रकारके अठंकार
ओर नाना भरकारकै वञ्च जगदम्बाने बडे प्रेमे अपने एत्रके निमित्त दिये ॥ ५॥ सब सिद्धियों सहित देवीने उप्त बाडकको सन्मानित किया
ओर सब दुःख हरनेवाठे हाथते उनका स्पश किया ॥ ६ ॥ इत प्रकार पूजन कर देवीने अपने वाठकका सुख चमा ओर कहा बेटा तुमको
बडा दुःख हभ रसा कह कृर देवीने बहृतसे वर दिये ॥ ७ ॥ हे एत्र ! ठुम न्थ ओर कतकत्य हो, तुम स्के पूज्य होगे सव देवताओंके
लित होकर एम् दुःखत वनित होगे ॥ < ॥ दहर खलम जो यह तिन्दूर दिलाई देवा है इस कारण सिन्द मलस्य म्हारी सदा पूजा
दृष्ठ स्वतनयं देवी शिवा इर्षसमन्विता॥गृदीत्वा बालकं दो्भया प्रषुदा परिषस्वजे॥४॥वच्राणि विविधानीह नानारुकरणानि
च्॥ ददौ प्रीत्या गणेशाय स्वपुत्राय सुदांबिका॥५॥पूनयित्वातया देव्या सिद्धिमिश्ाप्यनेकशः॥करेण स्पितस्सोथ त
हरेण ३।६॥पजयित्वा सुतं देवी ख॒लमाचम्ब्य _शांकरी॥वरान्ददौ तदा प्रीत्या जातस्त्वं दुःसितोऽधुना॥७॥ धन्योसि कृत
कृत्योसि पूर्वपूज्यो भवाधुन॥ स्वेषामम राणां वे सव॑दा दुःखवनजितः ॥८॥ आनने तवं सिन्द्ररं हश्यते सामतं यदि॥तस्माच्वं
पूजनीयोसि सिन्द्रेण सदा नरैः॥९॥पुष्पेवा चन्दनेर्वापि गन्धेनैव शुभेन च ॥ नैवेये सुरम्येण नीराजन विधानतः ॥१०॥
ताम्बूलेरथ दानैश्च तथा प्रकरमणेरपि॥नमस्कारविधानेन पूजां यस्ते विधास्यति ॥११॥ तस्य वै सकला सिदि्तिःयति न
संशयः ॥ विघ्ान्यनेकहपाणि क्षयं यास्वंत्यसंशयम्॥१२॥ब्रहनोवाच ॥इत्युक्ता च तदा देवी स्वषु तमहेश्वरो॥नानावस्तभि
सृष्ट एनरप्यचयत्तथा ॥१३॥ततस्स्वास्थ्य् च देवानां गणानां च विशेषतः॥गिरिजाकृषया विष जातं ततक्षणमाजतः॥१४॥
करेगे ॥ ९ ॥ पुष्प) चन्दन, सुन्दर गन्ध मनोहर नेवेय ओौर नीराजनके विधानसे ॥ १० ॥ तान्बरूढकै दान ओर परिकरमणते तथा नमस्कार
कै विधानत जो तुम्हारी पूजा करेगा ॥.११ ॥ इसमे सन्देह नहीं उसको सब सिद्धि धा लेगी ओर तुम्हारे पृजनसे निःसन्देहं सव विध
दूर हो जायगे ॥ १२ ॥ बह्ाजी बौठे एता कहने पर तन देवी मह्वरीने अपने छ्रको नाना धकारके अलंकारो अकत किया, ओर फिर
उत्छषटतासे अचना की ॥ १३ ॥ हे नारदजी ! उस समयं देवता ओर गणोको भिरिजाकी छपाते शांति भाप हुई ॥ १४ ॥
१५३
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ति || उती कषणम इन््ादि सम्पण देवता शिवजीको स्ुतिते भन्न कर भक्तिर पर्वती समीप गये॥ १५ गौर हब देवतानि उस महेशानीके बाठकको तीन ¢
॥३७७॥ || || जगतक सके निमित्त शिवजीकी गोदी गाया ॥१६॥ शिवजीने भी अपना करक बालकके शिरपर धरा ओर यह मेरा दूरा एत है देता स |©
& देवताओं कहा॥ १७॥ भौर गणेशजीनि भी उठकर शिवजीको भणामकर तथा पावती सक ओर विष्णको नमस्कार कर ॥१८॥ तथा नारद आदि सव |©
त ऋषियोंको भरसन्न कर कहा नेरा अपराध क्षमा करो मलु्योम मान पताही होता है ॥१९॥ तब मँ शंकर ओर विष्ण यह तीनोंही देवता एक साथही है|
ट एतस्मि क्षणे देवा वासवायाः शिवं खदा॥स्तत्वा रसाय तं देवं भक्ता निन्युः शिवांतिकम्॥१५॥ संसाद्य गिरिश पशचादुत्संग ४
ठ सन्न्यवेशयन्॥ बालकं तं महेशान्याश्चिजगत्सुखहेतवे॥१६॥ शिवोपि तस्य शिरसि दत्तवा स्वकरपंकजम्॥उवाच वचनं देवान्
४ पुत्रोऽयमिति मेऽपरः॥१७॥गणेशोषि तदोत्थाय नमस्कृत्य शिवाय वे॥ पारवत्य च नमस्कृत्य महयं वं विष्णवे तथा ॥१८॥ 9
¢ नारादाबयादृषीन्सवान्सत्वास्थाय पुरोऽत्रवीत्॥कषतव्यश्चापराधोमे मानशचवेशो वृणाम् १९अद॑च शंकरशव् विष्णुशचते यर्सुराः॥ £
$ यो वयेसुरवरा यथा पूज्या जगच्रये॥ तथायं गणनाथश्च सकठेः प्रतिपूज्यताम्॥२१॥ #
र्यूचर्यंगपत्प्रीत्य ददतौ वश्ुत्तमम्॥२०॥ब
वथ च भ्राकृताभायं रातः पूज्य एव च॥ गणेशो विघ्नहत्त हि सरवकामफल्रदः॥२२॥एतत्ूां एरा कृत्वा पश्चातपूज्या वयं
नरैः॥ वयं च पूजितास्सषे नाय चापूजितो यदा ॥२३॥ अस्मित्रपूजिते देवाः प्रपूजाकृता यदि।॥तंदा तत्फलहानिः स्यान्नात्र कार्या
{ ४
रस. २ ¢ विचारणा ॥२४॥ ब्रह्मोवाच ।: इत्युच्छा सं गणेशानो नानावस्तुभिरादरात्॥शिवेन पूजितः पर्व विष्णनाबु ्रपूितः ॥२५॥ तै
व वर देते हए रमते बोठे ॥२०॥ हम तीनों देवता जित भकारतेतरिजगदम पूजनीय है तेही यह गणनाथ भी सवके पूजनीय होगे ॥ २१ ॥ हम ओर ह
अ०१८ | || यह सत्र मुष्योके पूज्य होगे ओर यह गणेश विशेष कर विरह ओर सव कामना तथा फलक देनेवाढे होंगे ॥ २२. ॥ पहठे मनुष्य इनक पूजा ¢
|| करगे पवात् हमारी, ओर जो हमारी सबकी पुजा करेगा इनकी न करेगा ॥ २३ ॥ तो इनकी पूजा न करने दृतरोकी पूजा करनेप्र उस ||©
ह|| पूजाका को फल भी न होगा, इपमे सन्देह नहीं ॥ २४ ॥ ब्रह्माजी बोरे इस प्रकारे कहकर गणेशजीको अनेक कारकौ वस्तुओति ए
ल
=)
सव्व
१8८ शिवजीने पूजा पीठे िष्णजीने पूजा ॥ २५॥ फिर भने ओर पार्वतीने भी उनकी पूजा की, पीछे सब देवताओनि परम् आद्रे
उनका पूजन किया ॥ २६ ॥ फिर ब्रह्मा, विष्ण, हर॒ आदि सबने भिखकर पार्वतीकी भ्रसन्नताके निमिन गगेशजीको सवीध्यक्ष कहकर
उरण किया ॥ २७ ॥ किर ॒शिवजीने बडे प्रसन्न चित्ते ठोकोंको अनेक भकारे सुख ॒देनेवाे अनेकं वर दिये ॥ २८ ॥ शिबजी
बोठे हे पार्वती एव्र । इमं सन्देह नहीं किं भ तुम्हारे ऊपर प्रसन्न है ओर जव मँ सन्न हो जाऊँ तव कोई अप्रसन्न या विरुद नहीं हो
सकता ॥ २९ ॥ जिस कारण किं बाठकके पसे भी तुम महा पशक्रमी हुए, इस कारण तुम तेजस्वी शक्तिएत्र सदा सुखी होंगे ॥३ ०॥ वित्र
बरह्मणा च मय] तन् पावैत्या च प्रपूजितः॥ स्ैदवगणेशयैव पूजितः. परया खदा ॥ २६ ॥ सतैमिंरित्वा तज्व अक्षविष्णुहरा
दिभिः॥ सगणेशश्शिवातष्टय स्ाध्यक्षो निवेदितः ॥ २७॥ एुनश्चैव शिवेनास्मै सुप्रसप्नेन चेतसा ॥ सवदा सुखदा लोके
वरा दत्ता द्ये कशः ॥ २८ ॥ शिव उवाच ॥ हे गिरीन्द्रसुताणएु् संतु्टोदं न संशयः ॥ मयि तुष्टे जगत विरः कोपि नो
भवेत् ॥ २९ ॥ बार रूपोपि यस्माच्च महाविक्रमकारकः ॥ शक्तिपुघरस्सुतेजस्वी तस्माद्वष सद् सुखी ॥ ३० ॥ त्वन्नाम
विघदततव श्रषठं चैव भवत्विति ॥ मम सर्वगणाध्यक्षः संपूज्यस्त्वं भवाधुना ॥ ३१ ॥ एवशुक्ता शंकरेण पूजा विधिरनेकशः ॥
आशिषश्चाप्यनेका हि कृतास्तर्मि स्तुतत्क्षणात् ॥ ३२॥ ततो देवगणाश्ैव गीत वाद्यं च तृत्यकम् ॥ शुदा ते कारयामास
स्तथेवप्सरसां गणाः॥ ३२ ॥ पुनश्चैव वरो दततरसुपसतेन शंधूना ॥ तस्मे च गणनाथाय शिवेनैव महात्मना ॥ २९ ॥
चतुय तवं समुत्पतन भद्रे मासि गणेश्वर ॥ असिते च तथा पक्ष चंद्रस्थोदयने शुभे ॥ ३९ ॥
हरनेमं तुम्हारा नाम सदा श्रेष्ठ होगा । तुम मेरे सवर गणेोते अध्यश्च ओर पूजनीय होगे ॥ ३१ ॥ इत भकार शिवजीने कहकर अनेकं परकारकी
पूजाविधि बताकर बाठकको उस्न समय अनेक प्रकारके आशीवाद दिये ॥ ३२ ॥ तव देवताओनि गीत गाये ओर प्रसन्न होकर अनेकं प्रकारके
बाजे बजाये, भोर अप्सरा नृत्य करने ठगी ॥ ३३ ॥ तव फिर भी न्न हौकर कल्याणकारी महात्मा शिवजीने उक्ष बाठकको षर दिथा
॥ ३४ ॥ हे गणेश्वर ¡ ठुम भादोके महीनेकी चौथको उत्पन्न हए हो, ओर ङष्णपक्षमे चन्द्रोदये समय तुम भगर हए ॥ ३५ ॥
|
<
व
इस भकार राजनिके प्रथम प्रहरमे गिरिजाके मनसे महारा आविमाव हुआ है इस कारण उतत दिन तुम्हारा उत्तम बत होगा ॥ २९. ।
५ उस दिनते ठेकर भरसन्नताते इसी तिथिको सव सिद्धिके ठ्यि प्राणियोको तुम्हारा सुन्दर ब्रत् करना चाहिये ॥ ३७ ॥ जन फिर वषकं
भीतरकी चौथ आवि, मेरी आज्ञा वषं दिनतक यह बत करना चाहिये ॥ ३८ ॥ जो संसारम अतु घुल पानेकी इच्छा करते ६, व
चतुर्थीके दिन विधिपूर्वक तुम्हारी पूजा करे ॥ ३९ ॥ मार्गशीषं ( अगहन ) के महीनेमं रमा चतुथी करकै यहं वत बाह्णको निवेदन
परथमे च तथा यामे गिरिजायास्स॒चेतसः॥ आविर्ैधृव ते हपं यस्मात्ते ब्रतसुत्तमम्॥२६।॥तस्मात्तदिनमारभ्य तस्यामेव तिथौ
सुदा ॥ वतं कायं विशेषेण सर्वसिद्धय खशोभनम्॥२७॥ यावतपुनस्सभायाति वर्षान्ते च चतुथंका॥तावृद्तं च कर्तव्यं तव चैव
ममाज्ञया॥३८॥ संसारे सुखमिच्छन्ति येऽत॒लं चाप्यनेकशः ॥ त्वां प्ूजयन्तु ते भक्तया चतुर्थ्या विधिपूर्वकम् ॥३९॥ मागेशीषे
तथा मासे रमा या वै चतुथिका ॥ प्रातः स्नानं तदा कृत्वा वतं विप्रात्निवेदयेत् ॥४०॥ दृ वांभिः पूजनं कायंश्ुपवासस्तथाविधः॥
रात्रेश्च प्रहरे जाते स्नात्वा संपूजयेन्नरः ॥४१॥ मूर्तिं धातुमयीं कृत्वा पवालसंभवां तथा ॥ शवेताकंसंभवां चापि मादिंकां निमितं
तथा॥४२॥ प्रतिष्ठाप्य तदा तञ पूजयेत्प्रयतः पुमान् ॥ गंधैनानाविधैदिव्यैश्चन्दनैः पुष्पकैरिह ॥४३॥ वितस्तिमाचा दूवां च
व्यंगा वै मूवजिता ॥ ईदृशानां तद्भलानां शतेनैकोत्तरेण इ ॥ ४४ ॥ एकर्विंशतिकेनैव प्रजयेत्प्रतिमां स्थिताम् ॥ ृषै्दपिंश्च
नेवेधेविंविधेरगणनाथकम् ॥९५॥ ताम्बूलाघर्घसद्रग्येः प्रणिषत्य स्तवैस्तथा॥ त्वां तञ प्ूजयित्वेत्थं बाखचंद्रं च पूजयेत्॥४६॥
कर दे ॥ ४० ॥ दुर्वास पूजन करके उपवास करे एक पहर रातकै बीत जानेषर ज्ञान करके पूजन करे ॥ ४१ ॥ धातुकी ूगेकी
श्वेत अकंकी वा मृत्तिकाकी ˆ गणेशजीकी भूति बनावे ॥ ४२ ॥ ओर उसको प्रतिष्ठा करे यत्नपुवंक उसकी पुजा करे, अनेक भकारकी
दिव्य गन्ध ओर चन्दन एूढ दे ॥ ४३ ॥ दृव तीन काण्डवाटी मूकरहित एक विठस्तकी हो, इस भरकारकी एकसौ एक दृव दे ॥ ४४ ॥
अथवा इद्कीस सेही भ्रतिमाको पूजे धूप दीप अनेक प्रकारके नेवेय देकर गणेशजीका पूजन करे ॥ ४५ ॥ ताम्बूक आदि अच्छे द्रव्य निवेदन
4
य+ > 4
लि । । गवव ॥ 4
करके स्तुति करे इत भकार तुम्हारी पूजाकर बाठ चन्दमाकी पूजा कर अरं दे ॥ ४६ ॥ पीछे बाह्मणोंको पूजन कर सीढा भोजन करावे ५
पीठे आप भी मधुर भोजन करे, नमक न खाय ॥ ४७ ॥ पीछे इस अपने नियभको विसजन करे ओर गणेशको स्मरण करे तब यह वत
सफठ होता है ॥ ४८ ॥ इस प्रकार जब ब्रत करते मयुष्यको एक वषे बीत जाय तब वतकी पूतिके निभित्त उबापन करे ॥ ४९ ॥ मेरी ह
आन्नासे बारह बाह्मण जिमाने चाहिये, ओौर एक वडा स्थापन कर तुम्हारी मूतिकी पुजा करनी चाहिये ॥ ५० ॥ अथवा वैदकी विधिसे ठ
भूमिम अष्टदढ कमठ निर्माण करके वित्तकी शठताको छोडकर होम करना चाहिये ॥ ५१ ॥ उत्त समय दो शची ओर दो ब्रह्मचारी इनको ठ
पञ्चाविश्च सपूज्य भोजयेन्मधुरेषदा॥ स्वयं चैव ततो थंज्यान्मधुरं रवणं.विना॥४७॥विसज॑येत्ततः पश्चा्नियमं सर्वमात्मनः ॥ त
गणेशस्भरणं क््यात्संपूणं स्याद्रतं शुभम्॥४८॥एवं रतेन संपूण वषे जाते नरस्तदा॥उदापनविधि कर्याद्रतसम्पीत्िेते॥४९॥ ¢
दवादशब्राह्नणास्तच भोजनीया मदाज्ञया॥कुभमेकं च संस्थाप्य पूज्या ूतिस्त्वदीयिका॥५.०॥स्थण्डिलेष्टपलं कृत्वा तदा वेदि $
धानतः ॥ होमश्चैवाकतेन्यो वित्तशाठ्यविवजितेः॥५१॥ घीदयं च तथा चार बटुकद्वयमादरत्॥ मोजयेत्पूजयित्वावैभूत्यमे ९
विधिपूरवकम्॥ ५२ ॥ निशि जागरणं कायै पुनः प्रातः ्रपूजयेत्॥ विसर्जनं ततश्चैव पुनरागभनाय च॥५३॥ बारुकाचाशिषोया ट
(जरर यर कयउ ज र
हयास्स्वस्तिवाचनमेव च ॥ पुष्पांजरि षदद्याचव्रतसं पूणं हैते ॥५७॥ नमस्कारांस्ततः कृत्वा नानाकार्य॑प्रकल्पयेत् ॥ एवं बतं कृतं ट
येन तस्येप्सितफलं भवेत ॥५५॥ यो नित्यं श्रद्धया सा पूजां चैव स्व शक्तितः ॥ ड्यात्तव गणेशान सर्वकामफलाप्तये ॥५६॥ |©
तिके आगे पूजन करके जिमाना चाहिये ॥ ५२ ॥ रातमे जागरण करके सवेरे फिर पूजन करे पीछे फिर आनेके निमि गणेशजीको ||@'
वित्तजंन करे ॥ ५३ ॥ बाठकोमि आशीवाद भ्रहण करावे उनते स्वस्तिवाचन करावे फिर वेतपूरतिकै निभित्त ्ष्पांजकि दे ॥ ५४ ॥ किर ||
ट
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(> 22 2 2.
नमस्कार करके दरे कायं करे इस भ्रकारते जो बत करते है उनफ़े सव नोरथ पुरे होते है ॥ ५५ ॥ जो नित्य भाक सहित अपनी
शक्तित ¶जन करते है हे गणेश ! जो सब काभ ओर फक भ्राणतिके निभित् बुम्हारा पूजन करते है ॥ ५६ ॥
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शि ७यु
सिन्दूर चन्दन कैतकीके शूठ चावङ तथा अनेक सामग्रियोति तुम्हारा पुजन करे ॥ ५७ ॥ इस भकारसे जो भक्तिमूवैक अनेक सामश्रियोि
॥ ३७९॥
।
¢ तुम्हारा पूजन करते हँ उनके स विन्न नाश होकर निश्वय अनेक परकारकी सिद _ हती है ॥ ५८ ॥ यह पूजन स् वर्णोको ओर
ठ विशेषकर श्ियोको यह बत करना चाहिये, तथा उदयकी इच्छावाठे राजाको विष् कर यह बत करना चाहिये ॥ ५९ ॥ दसषकै करनंसं
& जो जो कामना हो बह बह सब प्राप होती है इसे कामनावाठे सदा आपकी पूजा करगे ॥ ६० ॥ बह्याजी बोटे जव _ इस प्रकारसे महात्मा
सिन्द्रेश्चन्दनैश्चैव तंडलेः केतकैस्तथा ॥ उपचारेरनेकैश्च प्रूजयेत््वां गणेश्वरम् ॥ «७ ॥ एवं त्वां पूजयेुय भक्त्या नानोष
चारतः ॥ तेषां सिदधि्भवेभनित्यं विष्ननाशो भवेदिह ॥ ५८ ॥ सर्ववर्णैः प्रकर्तव्या ्वीभिश्चैव विशेषतः ॥ उदयामिशचखेश्चव
राजभिश्च विशेषतः ॥९९॥ य यं कामयते यो वै तंतमाप्नोति निशितम् ॥ अतः कामयमानेन तेन सेभ्यस्सदा भवान् ॥ &° ॥
| ॥ ब्रह्मोवाच ॥ शिवेनेवं तदा प्रोक्तं गणेशाय महात्मने ॥ तदानीं दैवतैश्चैव सर्वै. ऋषिसत्तमैः ॥ ६१॥ तथेत्युक्ता तु तेस्सव
् गणेरशंधुषियेशने ॥ पूजितो हि गणाधीशो विधिना परमेण सः॥ ६२ ॥ ततश्चैव गणास्सवे प्रणेषुस्ते गणेश्वरम् ॥ समानद
|| किरेषेण नानावस्त॒भिरादरात् ॥ ६३॥ गिरिजायास्सणत्पन्नो यश्च इषों शनीश्वर ॥ चतभि्दनवं तमवण्यै च कथं हे
¢ ॥ &४ ॥ देवडुडुभयो नेदुनतृतुश्वाप्सरोगणाः ॥ जगुर्गधरवयुख्याश्च पुष्ववर्षं पपात इ ॥ ६५ ॥
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प्यारे सव गणोनि देसाही होगा, यह कहकर परम विधानते गणेशजीका पूजन किया ॥ ६२ ॥ तब सब गर्णोने गणेशजीको प्रणाम किया
ओर आद्रते अनेक वल्ुओति उनकी विशेष पूजा की ॥ ६३ ॥ हे अनीश्वर ! उस समय जो भरसन्नता पार्वतीको भाप हु बह म चार सुलसे
कित प्रकार कह सकता हूं ॥ ६४ ॥ देवताओं दंदुभी जने गी, अप्सरागण वध्य कने ठगी गेवे स॒ख्य गाने ठगे, ओर आकाशते
१ पूजेति शंषः । । -____-_-______्~-~-~्-~-]-~_ =-=] बब ब्] --~-~_{~{]{् -ब-्-~--_-~-~{्]{]{ब्{्{्~~~~
गणेशजीके निमित्त शिवजीने दसा कहा तव सव देवता ओर भे ऋषियोने कहा रेता ही होगा ॥ ६१ ॥ हे शने ! इसी भकारसे |
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लोकी वरषा हृदं ॥ ६५ ॥ गणेशजीके भतिष्ठित होने जगतुभ स्वस्थता भात हदं भहामहोत्सव हुआ ओर रब दुः क्षय होगे ॥ ६६ ॥
है नारदजी | विशेष कर शिवा शिवको बढी भ्रस्नता हदं ओर स्वको सुखदायक महामैगल हुआ ॥ ६७ ॥ उस समय देवता ओर ऋषियों
गण जो आये थे वह सब रिवजीकै आज्ञासे अपने २ स्थानोको गये ॥६८॥ पावती ओर गणेशजीकी वारंवार भरशंसा करते तथा शिवजीकी
बडाई करते हुए किं किस प्रकारका युद्ध हुआ यह कहते हुए गये ॥ ६९ ।॥' जिर सभय देवी पार्वती कोपहीन होगई तब शिवजीभी पवत्
पावंतीके समीप पराप्त होकर ॥ ७० ॥ लोकोके हितकी इच्छसे अनेक भकारके सुख करने रे, स्वात्माराम होकरभी यह सदा भक्तोके कार्थ
जगत्स्वास्थ्यं तदा प्राप गणाधीश प्रतिष्ठिते॥ महोत्सवो महानासीत्सरव दुःखं क्षयं गणम्॥६६॥शिवाशिवौ च मोदेतां विशेषरेणाति
नारद्॥आसीत्सुमगटं भरि सर्वच सुखदाय॒कम्॥६७॥ततो देवगणाः स्वे ऋषीणां च गणास्तथा॥ समागताश्च ये त जग्भुस्ते
तु रिवाज्ञया॥६८॥ परशंसंतश्शवां त् गणेशं च युनः पुनः॥ शिवं चैव तथा स्तुत्वा कीदशं युद्धमेव ख॥६९॥यदा सा गिरिजा
रामोऽपि परमो भक्तकार्योदयतः सदा॥७१॥ विष्णुश्च शिवमाप्रच्छय अह्ाहं तं तयेव रि॥आगच्छाव स्वधां च शिवौ संसेव्य
भक्तितः ॥ ७ ॥ नारद् त्वं च भगवन्संगीय शिषयोथंशः॥आगमो भवनं स्वं च शिवौ पृष्टा खुनीश्वर ॥७३॥ एतत्ते सर्वमा
ख्यातं मया वै शिवयोर्यशः॥भवत्पष्ेन विभेशयशस्संमिश्रमादरात्॥७४॥ हदं सुमंगलाख्यानं यः शृणोति स॒संयतः॥सरवमेगलं
संयुक्तस्स भवेन्मंगलालयः॥७९॥ अपुरो लभते पुतं निधनो रुगते धनम्॥भायथीं खमते भार्या पार्थी कमते प्रजाम् ॥७६॥
तत्पर रहते है ॥ ७१ ॥ भँ ओर विष्णुनीभी शिवजीते पूकर शिवा शिवकरो भक्तिते सेवन करके अपने स्थानभे आये ॥७२॥ हे नारदजी !
तुमभी शिवा शिवका यश वणन करते २ उने पुंकर अपने स्थानको गये ॥ ७३ ॥ है नारदजी | जो आपने विचेश्वरका चरित्र पंडा था,
बह ने पेमते शिवा शवक यशके सहित सव वणेन किया ॥ ७४ ॥ षह पंग्दायक आस्थान जो नियमे सुनते हँ वह सव भगो युक्त
मगलका स्थान होते है ॥ ७५ ॥ पत्रहीनके एत्र, धनहीनके धन, श्ञीकी इच्छावाठेको ल्ली, ओर भजावेको प्रजा भप्त होती ह ॥ ७६ ॥
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६ देवी कोपरीना बभव इ॥ शिवोऽपि गिरिजां तञ पूर॑वत्संभपदयताम् ॥७०॥चकार विमिधं सौस्यं रोकानां हितकाम्यया॥ स्वात्मा
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५९ | । रोगीको आरोग्यता, दुभेगाको सौभाग्य, नष्टएववालीको धर, नषटपनवटेको धन, ओर परदेश गये पतिबाी जीका पति परदेशे आता है ॥७७॥
॥३८० | ¢ इसमे सन्देह नहीं, शोकवाठेका शोक छट जाता है यह गणेशका आरूयान जिसके घरमे वियमान होता है ॥७८॥ वह् सदा सव मंग यक्त
होता है, इमे सदेह नहीं यात्राकाठ तथा पवित्र दिनम जो को सावधान होकर इस कथाको सुनता है वह श्रीगणेशजीकै प्रसादत अपन सब मनो
रोको भाष होता है ॥ ७९. ॥ इति श्रीशिवमहाषरागेमापादीकायां द्वितीयरुद्रसंहितान्तगेतचतुर्थं कुमारखण्डे गणेशगणाधिपपदवीवणनं नामा
¢
आसेग्यं लभते रोगी सौभाग्यं दुर्भगो कंभेत् ॥ नषटपुघं नष्टधनं प्रोषिता च पतिं लभेत् ॥ ७७ ॥ शोकाविष्टश्शोकदीनस्स
¢ भवेन्नात्र संशयः ॥ इदं गणेशमाख्यानं यस्य गेहे च तिष्ठति ॥७८॥ सदा मंगलसंगुक्तस्स भवेघ्रा् संशयः ॥ याजाकाठे च
¢ पुण्याह यश्शृणोति समाहितः ॥ _ सवभिीष्व स लभते श्रीगणेशप्रसादतः ॥ ७९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां
| रुद्रसंहितायां चतुथमारखंड .गणेशगणाधिपपद्वीवर्णनं नामाष्टाद्शोऽध्यायः ॥ १८ ॥ नारद् उवाच ॥ गणेशस्य शता
|, तात सम्यग्ज॒निरवत्तमा ॥ चरि्मपि दिव्यं वै सुपराकमभरषितम् ॥ १ ॥ ततः किमभवत्तात तत्वं वद् सुरेभवरः ॥ शिवा
ठ ' शिवयशस्स्फीतं महानन्दप्रदायकम् ॥२॥ बह्मोवाच ॥ साधु पृष्ठं ञुनिश्रष्ठ भवता करणात्मना ॥ श्रूयतां दत्तकर्णं हि वक्ष्येऽहं
|| ऋषिसत्तम ॥ ३ ॥ शिवा शिक वनद योध तयोः परम् ॥ दरीदश च तीका महत्ेम समावइत् ॥ ४ ॥
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दशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ नारद्जी बोडे हं तात ! हमने गणेशजीका भ्रष्ठ जन्म चरित सुना, बडा दिव्य ओर पराकमसे मूषित है ॥ १ ॥
ह ुरेश्वर !! फिर क्या हुआ सो तुम भलीभकारसे कहो, यहं शिवा शिवकै यशकी कथा महा आनन्दी देनेवाी है ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले &
हे खनिश्ष् ! हे करुणावाछे ! तुमने अच्छी बात पृी हे ऋषिसत्तम ! कान रुगाकर श्रुनो यँ कहता हूं ॥ ३॥ हे विपेन्दर! शिवा ओर शिव उन अपने ¢
१ परस्मेपदमाषंम्
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५५.
दोनो पवक टीटाको देखकर महा भरन होने ठगे ॥ ४ ॥ माता पिताके लान करनेसे उनका सुख दिन दिन बढने गा, ओर वै दोनो |©
सदा महा ्रीतिते सेरकूद करने छगे ॥ ५ । हे खनीश्वर ! उस सभय बह दोनों उब भी महाभक्तते युक्त हो माता पिताकी सेवा करने रगे ||
॥ £ ॥ उन माता पिताका पण्य ओौर गणेशमे शुङ्ठपक्षके चन्दरमाकै समान दिन दिन प्रेम बढने लगा ॥ ७ ॥ हे देवष ! एकं समय शिवा ठै
शिव भमपूवेक एकान्तम वेढे हृए॒विचारकर रहे थे ॥ < ॥ शिवा शिव बोरे, अब यह हमारे दोनों एच विवाहकै योग्य हूए, इन दोनों ट
तोका किंस प्रकारसे शुभ विवाह किया जाय ॥ ९ ॥ कार्तिकेय ओर गणेश दोनोंही अधिक प्यारे है, इस प्रकार चिन्ता करते टीका ठ
पि्रोलाल्यतोस्त सुखं चाति व्यवद्धेत ॥ सदा प्रीत्या दा चातिखेखन चक्रतुस्तौ ॥ ५ ॥ तावेवं तनयौ तञ माता र
पितरोुनी “वर ॥ महाभत्तया यदा युक्तौ परिचय प्रचक्रतुः ॥६॥ पषण्छुखे च गणेशे च पि्रोस्तदधिकं सद्। ॥ स्नेहो व्यवद्धत ॥©'
महाज्च्छुह्ृपक्षे यथा शशी ॥ ७ ॥ कदाचित्तौ स्थितौ तञ रहसि प्रेमसंयुतौ ॥ शिवा शिवश्च देवप सविचारपरायणौ ॥ ८॥ |©
शिवा शिवाब्रूचतुः ॥ विवाहयोग्यौ संजातौ सखताविति च ताबुभौ ॥ विवादश्च कथं कार्यः पुज्रयोक्मयोः शरुभम्॥ ९॥ ||
पण्सुखश्प्रियतमो गणेश्च तथेव च ॥ इति चिताससुद्विभौ रीरानन्दौ बभूवतुः ॥ १० ॥ स्वपित्नोमतमाज्ञाय तौ सुतावपि ६
संस्पृहौ ॥ तदिच्छया विवाहा्थ बभूवतुरथोुने ॥ ११ ॥ अहं च परिणेष्यामि ह्यहं चैव पुनः पुनः ॥ परस्परं च नित्यं वे
विवादे तत्पराघुभौ ॥१२॥ शरुत्वा तद्वचनं तौ च दंपती जगतां रभू ॥ लौकिकाचारमाधित्य विस्मयं परमं गतौ ॥ १३ ॥ \
कि कतव्य कथ कार्यो विवाहविधिरेतयोः ॥ इति निशित्यताभ्यां वै युक्तिश्च रचिताद्धुता ॥ १४ ॥ ।
आनन्द् देखने ठे ॥ १० ॥ अपने माता पिताक यह इच्छा जानकर दोनोही कुमारेन इच्छा की, है खने ! दोनोनेही एक साथ विवाहकी ए
इच्छा कौ ॥ ११ ॥ दोनों कहने छगे मे पठे व्याह करगा, म पहठे ठ्याह कग, इतत भकार कहकर दोनों परस्पर विवाद करने ठ्गे ॥&।
॥ १२ ॥ वह जगतुकै माता पिता उन दोनों बाठकोके वचन सुनकर छौ किक आचारकै अ
५ 1 थय हौ परम् विस्मयको भाप्त हए ॥ १३ ॥ अव्
क्या करं किस प्रकार इन दौनोका विवाह किया जाय) यह विचार कर उन दोनोने एक अद्भुत युक्कि रची ॥ 1४॥
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शि० | || तन एक समय दोनो माता पिता अपे दोनों नोक बाकर इत भकार कहने ठगे॥ 9५ शिवा शिव बोढेहमने तम दोनोके एुलकै निमित एक नियम्
॥३८१॥ ||| किया है, तुम परमते सुनो हम उततको यथार्थं कहते है ॥१६॥ तुम दोनों एत्र समान भाक्ते हमं प्यारे हय इसमे कोई विशेष नहीं, इस्त कारण तुम दोनों पत्रोकै
¢ निमित्त हमने एक भतिज्ञा की है ॥१७॥ जो इस समय संपूरणं पृथिवी परिकमा करक पहडे चखा आवेग, उसीका शुभ ठक्षणवाखा विवाह पृहे
किया जायगा ॥ १८ ॥ बह्लाजी बोरे, उन दोनों माता पिताके यह वचन सुन महावङी कार्तिकेय तत्काटही पृथिवीकी परिक्रमाक दिये मंदिरे
¢ कदाचित्समये स्थित्वा समाहूय स्वपु्रकौ ॥ कथयामासपुस्तत्र एजयोः पितरौ तदा ॥ १५ ॥ शिवाशिवाबूचतुः ॥ अस्माकं
¢| नियमः पर्वं कृतश्च सुखदो हि वाम् ॥ श्रयतां सुसुतौ श्रीत्या कथयावो यथा्थकमू॥ १६ ॥ समौ द्वावपि सत्पुज्ौ विशेषो नात
|| भ्यते ॥ तस्मात्पणः कृतश्शंदः पु्रयोकूमयोरपि॥ १७ ॥ यश्चैव पृथिवीं सर्वा कात्वा पूरवसुपात्रजेत् ॥ तस्येव प्रथमे कार्यो
&|| विवाहश्चुभलक्षणः॥१८॥ ब्रह्मोवाच ॥ तयोरेवं वचः श्त्वा शरजन्मा महाबलः॥ जगाम मन्दिराचूणं पृरथिवीकमणाय वै॥१९॥
गणनाथ तत्रेव संस्थितो बुद्धिसत्तमः ॥ सुबुद्धया संविचारयेंति चित्त एव पुनः पुनः ॥ २० ॥ किं कर्तव्ये क गंतय्यं
लचितुं नैव शक्यते ॥ क्रोशमात्रं गतः स्याद्र गम्यते न मथा पुनः॥ २१ ॥ किं पुनः पृथिवीमेतां कात्वा चोपार्ितं सुखम् ॥
विचायंति गणेशस्तु यज्चकार शृणुष्व तत् ॥ २२ ॥ क्नानं कृत्वा यथान्यायं समागत्य स्वयं गृहम् ॥ उवाच पितरं तञ मातरं
1 पुनरेव सः ॥२३॥ गणेश उवाच ॥ आसने स्थापिते हय पएजाथ भवतोरिई॥ भवंतौ संस्थितौ तातो पूर्यतां मे मनोरथः ॥२४॥
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चे ॥१९॥ ओर बुद्धिमान् गणेशजी इहां स्थित रहे, ओर वारंवार सुुद्धिते अपने चित्तम विचारने कगे ॥२०॥ नै क्या कर, कहां जाऊ, भँ तो
नाही नहीं सकता, मं एक क्रोशमात्र भी नहीं जा सकता ॥ २१ ॥ फिर इत पृथिवीका परिक्रमा करना तो बडी बात है यह विचारकर गणेशजीने ¢
जो किया सो सुनो॥२२॥ यथायोग्य स्नान कर ओर अपने रमे आकर अपने षाता ओर पिताते उन्होने कहा॥२३॥ म तुष दोनोंको सिंहासनपर
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¢ || भाक पजा कएना चाहता ह, भाता पिता तुम दोनों मेरे समीप आकर मेरा मनोरथ पुरा करो ॥ २.४ ॥ ब्माजी बोरे पावती परमेश्वर इस् #
भकारते उनके वचन सुनकर गणेशजीकी पूजाको ग्रहण करनेकै छिये आज्ञनपर बैे॥ २५॥गणेशजीने उन दोनोका पूजन करक वारंवार परिक्रमा |
की. इस भकारसे उन्होने सात परिक्रमा की ॥ २६ ॥ ओर बुद्धिसागर गणेशजी हाथ जोडकर मरम विहृठ माता पिताकी बडी स्ति करने ४
| गणेशजी बोरे हे मातः पिता ! तुम भेरे वचन सुनो, शीघही आप भेरा सुन्दर विवाह करदं ॥ २८ ॥ इस प्रकार । ¢
ह|| गगेशजीके वचन हुनकर ३ दोनों महाबुद्धिमान् गणेशजीसे बोडे ॥' २९ ॥ शिवा शिव॒बोठे तममी काननतित परथिवी परि इको
||| ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इति त्वा वचस्तस्य पाव॑तीपरमे्वरौ ॥ अस्थातामासने त्र तत्यूनाभ्रदणाय वे ॥२॥ तेनाथ पूजितौ तौ च ||
| भरकान्तौ च पुनः पुनः ॥ एवं च कृतवान् सप्त परणामास्तु तथेव सुः॥२६॥ बद्धाजकिरिथोवाच गणेशो बुद्धिसागरः ॥ स्तुत्वा बह ||
| तिथस्तात पितरो प्रमविहृरौ ॥२७॥ गणेश उवाच ॥ भो मातर्भो पितस्त्वं च शृणु मे परमं वचः ॥ शधं चैवाज कतब्यो विवाह ;
है| श्शोभनो मम ॥२८॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्येवं वचनं धत्वा गणेशस्य महास्मनः॥ महाबद्धिनिधि तं तौ पितराूचतुस्तदा॥२९॥ शिवा ¢
शिवाब्रूचतुः ॥ म॒करामेत भवान्सम्यक् पृथिवीं च सकाननाम् ॥ कुमारो गतवास्तञ् स्वं गच्छ पुर आवंज॥३०॥ बश्नोवाच॥ इत्येवं ¢
वचनं धत्वा पिन्नोगणपतिदरतम्॥ उवाच नियतस्तञ् वचनं कोधसंयुतः॥३१॥ गणेश उवाच ॥ भो मात पितधमंह्पौ पाज्ञो
यवां मतौ ॥ धर्मतः श्रयतां सम्यक् वचनं मम सत्तमौ॥३२॥मया तु प्रथिवी कांता सप्तवारं पुनः पुनः॥ एवं कथ वाते षै पुनश्च #
पितराविह ॥२२॥ ब्रह्मोवाच ॥ तद्वचस्तु तदा श्त्वा लौकिकंगतिमाभितौ॥ मदालीखाकरौ ततर पितराद्रचतुशचतम् ॥ ३४ ॥
{| गार ग ह इम परिमा क शी आभो ॥ २०॥ बहाजी.बोठ, गणेशजी भाता पिताक इतं भकारे वचन सुनकर कुेक कोधे वचन
|| बोडे ॥ ३१॥ गणेशजी बके हे मातः ] पिता ! तुम दोनों धूप महापंडित हो हे भे्ठो आप पर्थसहित भेरे बचनोको सुनो ॥ ३२ ॥
मने तो बार इत पृरथि्ीकौ परिक्रमा कौ है, फिर कैत कहते हो पृथिवीकौ परिमा कर आभो ॥ ३३ ॥ बरहाजी बोरे गणेशजी यह
¢ बचन घ्न ठोकिंकी गतिको आश्रय कर महाटीठा करनेवाडे दोनों बोडे ॥ ३४ ॥
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शिवाशिव बोखे हे पत्र ! यह महानु परथिवी तुमने कव परिकमा की, यह तो सात द्वीपवाी सखुदराततक महापवतोसे सयु है ॥ ३५ क
बह्ाजी बोठे शिवा ओर शंकरके यह वचन सुनकर उनके पत्र महादुदधिमान् गणेशजी इस भकारकै वचन बोटे ॥ ३६ ॥ मने आपदो
माता पिताओंका पूजन किया है, मैने तो अपनी बुद्धिस मानो समस्त प्रथिवीकी परिक्रमा करटी ॥ ३७ ॥ यहं वचन वेद शाञ्च ओर
धर्मसंचयमें खा है सो यह बात क्या सत्य है, वा असत्य सो आप कहं ॥ ३८ ॥ जौ माता पिताका पूजन करके उनकी परिक्रमा
पितराबूचतः ॥ कदा करता त्वया पु परथिवी खमहत्तरा॥ सद्वीपा सञुदराता महद्धिर्गहनेता ॥ ३५ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ तयोरेवं
वचः त्वा शिवाशंकरयोर्धैने ॥ महाबुद्धिनिधिःपुत्रो गणेशो वाकषयमत्रवीत्॥ ३६॥गणेश उवाच ॥ भवतोः पूजनं कृत्वाशिवा
शंकरयो रह् ॥ स्वबुद्धया हि सयुदवान्तप्रथ्वीकृतपरिकरमः ॥ २७ ॥ इत्येवं वचनं देवे शाघ्चे वा धर्मसञ्चये ॥ वत्तते किं च
तत्तथ्यं नहि कं तथ्यमेव वा ॥३८॥ पि्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकरंति च करोति यः॥ तस्य वे पृथिवीजन्यफलं भवति निधितम्
॥२९॥ अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमात्रनेत् ॥ तस्य पपं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा ॥ ४० ॥ पुरस्य च मत्तीथ
पि्ोशवरणपंकजम् ॥ अन्यतीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः ॥ ४१ ॥ इदं संनिहितं तीथं सभं धमैस्ाधनम् ॥ पुत्रस्य
च च्ियश्चिष तीथ गेहे खशोभनम् ॥ ४२ ॥ इति शाक्लाणि वेदाश्च भाषन्ते यत्रिरतरम् ॥ भवद्यां तत्प्कत्तम्यमसत्यं
पुनरेव च ॥ ४३ ॥ भवदीयं त्विदं रूपमसत्यं च भवेदिह ॥ तदा वेदोप्यसत्यो वे भवेदिति न संशयः ॥ ४७ ॥
् है उसको परथिवीकी परिक्रमाका निश्वय फठ होता है ॥ ३९ ॥ जो भाता पिताको घरमे छोडकर तीर्थको जाता है उसको उनके
मारनेका, पापु लगता है [ इससे पुंकर जाय ] ॥ ४० ॥ एतरका यही बडा तीर्थहै जो भाता पिताके चरणकमछ्की सेवा करे,
दसरे तीथं तो दूर जानेषेही प्राप्त होते है ॥ ४१॥ यह तीथं सदा निकट पुरम . ओर धमेका साधन है एत्रकी .स्लौको षरभ यही शोभन |
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तीथ है ॥ ४२ ॥ इत्र प्रकार वेद शाज्च निरन्तर कहते है सो यही आपको करना वाहये नहीं तो शाज् अत्य होगा ॥ ४३ ॥ एसा न
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कले तुम्हारा यह रूप भी असत्य हो जायगा, इसी भरकर वेद भी अत्य हो जार्येगे, इसमे सन्देह नहीं ॥ ४४ ॥ शीघही भेरा अब् शुम ¢
¢ विवाह कर देना चाहिये अथत्रा वेद शाच्वकी मर्थादाको निरथंक कर दीजिये ॥ ४५ ॥ इन दोनोँके बीचमे जो शरेष्ठ हो उस्तको भटी भ्रकार ट
¢ विचार कर धर्मषटप माता पिताको यत्नपूर्वक कायं करना चाहिये ॥ ४६ ॥ बह्लाजी बोरे इस भकारते बह पार्वतीके एत्र प्रसन्न होकर महा
¢ ज्ञानी बुद्धिमान शरेष्ठ मोन हुए ॥ ४७ ॥ तथ वे विश्वके माता पिता परवती परमेश्वर गणेशजीक यह वचन सुन प्रम विर्मयको प्राप्त हए त
£ ॥ ४८ ॥ तब शिवा ओर शिष् एत्रकी यह विरक्षण बुद्धि देखकर एवकी प्रशंसता कर ममे कहने ठगे कि एत्र यथार्थभाषी है ॥ ४९ ॥ ६
£ शीरं च भवितव्यो मे विवाहः क्रियतां शुभः॥ अथ वा वेदशाघ्चच व्यलीकं कथ्यतामिति॥४५॥द्रयोः भ्रष्ठतम्ं मध्ये यत्स्यात्स ४
स्थग्विचा्य तत्॥ कतेब्यं च प्रयतनेन पितरौ धर्मरूपिणो ॥४६॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्ता पार्वतीपजस्स गणेशः हृष्टधीः ॥
ट विरराम महाज्ञानी तदा बुद्धिमतां वरः ॥७७॥ तौदपती च विश्वेशौ पार्वतीशंकरौ तदा ॥इति त्वा वचस्तस्य विस्मयं परमं ट
ट| गता॥४८॥ ततः शिवा रिवश्चव पुत्रं बद्धिविचक्षणम्॥सुप्रशस्योचतुः प्रीत्या तौ यथारथप्रभाषिणस् ॥७९॥ शिवाशिवादूषतुः॥ &
पुर ते विमला बुद्धिस्ससुत्पन्ना महात्मनः त्वयोक्तं यद्वचश्ैव ततश्चैव च नान्यथा ॥५०॥ सञुत्वन्ने च इःते च यस्य बुद्धिं #
शिष्यते ॥ तस्य दुखं विनश्येत सूय दृष्टे यथा तमः ॥५१॥ बुद्धियंस्य बलं तस्थ निशद्स्त॒ कृतो रम् ॥ क्पे सिहो मदोन्मत्त
। ` श्शशकेन निपातितः ॥ ५२ ॥ वेदशाक्चपुराणेषु बालकस्य यथोदितम् ॥ त्वया कृतं तु तत्स ध्ैस्य परिपानस् ॥५३॥ |©
शिवाशिव बोरे हे एव्र ! तुम्हारी महात्माओंकीती निेठ बुद्धि उत्यनन हू है तुमने जो बचन कहे है, वह पैसे ही ३ इसमे अन्यथा नहीं है ||&
&|| ॥ ५० ॥ संकट पडनेप्र जिसकी बुद्धि विशेष रपे बनी रहती है, उत्का इूःख नष्ट हो जाता है, जे सू्यके सामने अंधकार नष्ट हो &
|| जाता है ॥ ५१ ॥ जिततको बुद्धि है उपीको वख है, निवदिको बठ कहां है, एक जु्धिमाद सरगोशने भदोन्मत्त सिंहको कए शर्कर |
नष्ट कर दिया ॥ ५२ ॥ वैद शाल एरार्णोमिं जो बाठकोंका ङतय वणेन किया है षह तुमने सव धर्भका प्राङन किया ॥ ५३ ॥ हे एत्र
1 ॥
| # वि ।
| वुमने जो छ किया उसतको कोई भी नही कर सकता, हम दोनोने वह मान श्या) उत्ते कोद अन्यथा नहीं कर सकता ॥ -*४ ॥ ब्रह्माजी
बोरे इस भकार वे दोनों बुद्धिसागर गणेशजीका आश्वासन कर इनके विवाह करनेकी इच्छा करते हृए॥५५॥ इतिश्री शिवमहाप्याण् भाषारीकाया
० च० कु° एकोनरविंशोध्यायः ॥ १९ ॥ बह्माजी बोटे इसी समय विश्वरूप भरजापतिने भरसनन हो शिवाशिवका उदयोग विचारकर
पु माना ॥ १ ॥ विश्वम भ्रजापरतिकी दिव्यहप दो कन्या थीं, यह पिदधि बुद्धि नामे विरूयात स्वागते सुन्दर थीं ॥ २॥ भगु
सम्यक्छृत् त्वया यच तत्केनापि भवेदिह ॥ आवाभ्यां मानितं तचचनान्यथा क्रियतऽ ना ॥५8॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युत तौ समा
श्वास्य गणेशं बुद्धिसाग्रम् ॥ श्रिवाहकृरणे चास्य मति चक्रतुरुत्तमाम् ॥ 4५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां सृद्रसंदि
तायां चतं कुमारखण्ड गणेशविवाहोपक्रमो नाभेकोनर्विंशोध्यायः ॥ १९ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एतस्मि्नतरे तत विश्वह्पः
प्रजापतिः ॥ तद्योगं संविचाय॑ सुखमाप प्रसन्नधीः ॥ १ ॥ विश्वपप्रनेशस्य दिव्यह्पे छते उभे ॥ सिद्धबुदधिरिति ख्याते
शभे सर्वागशोभने ॥२॥ ताभ्यां चेव गणेशस्य गिरिजा शंकरः प्रभू ॥ महोत्सवं ॑विवादं च कारयामास तुदा ॥३॥ संतुष्टा
देवतास्पर्वास्तद्विवाहे समागमन् ॥ यथा चैव शिवस्यैव गिरिजाया मनोरथः ॥ ४ ॥ तथा च विश्वकर्माऽसोविवादं तवां
स्तथा ॥ तथा च ऋष्यो देवा छेभिरे परमां खदम् ॥ ९ ॥ गणेशोपि तदा ताभ्यां सुखं चैवाप्तिवितकम् ॥ प्राता च सुने
तज्ञ वणितं नेव श्यते ॥ 8 ॥ कियता चैव कालेन गणेशस्य महात्मनः ॥ द्योः पवृल्न्यो् व्र दिग्यौतस्य पुरौ बभूवतुः
॥ ७ ॥ सिदवर्गणेशपत्यस्तु क्ेमनामा सुतोऽभवत्॥ बुदधेलभिमिधः पुत्रो द्यासीत्प्रमशोभनः॥ ८ ॥
| उन दोनोके साथ गणेशजीका तरिवाह महोत्सव कराया ॥ ३ ॥ सव देवता संतुष्ट होकर उस्र विवाहम आये नेसे शिवाशिवके
विवाहम आये थे ॥ ४ ॥ इस भ्रकारते परमते विश्वकमने यह विवाह किया ओर ऋषि तथा देवताओंने इसमे परम प्रस्ता मानी गणेशजीको ||
भी उप्त समय बडा सुख पराप्त हआ, है ने ! वह वर्णेन करनेको कौन समथं हो सकता है ॥ ५॥ ६॥ कितने समयक
उपरांत गणेशजीकी प्यारी ्रि्योमे दो सुन्दर एत्र उत्पन्न हए ॥ ७ ॥ सिद्धि नाभकं गणेशजीकी सीमे क्षेमनामक एत्र उत्पन्न हुआ ओर
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बुद्धिके परम सुन्दर ठाम नामक एत्र उत्पन्न हुआ ॥ < ॥ इस प्रकार जब गणेशजी अचिन्त्य सुख भोगने लगे तव कातिकैय् ट
भी पृथिवीकी परिक्रमा के प्राप्त हुए ॥ ९ ॥ इतती समय महात्मा नारदजी भी कुमारक घर न पहूचते पहुंचे बोठे हे कुमार ! मं यथाथ
४ कहता हू छट वा मत्सरते यह नहीं कहता ॥ १० ॥ शिवा ओर शिव तुम्हारे माता पिताने जो किया है वैसा कोई दू्तरा इस ठोकमे नही ¢
करेगा, यह भँ सत्य २ कहता हू ॥ ११ ॥ तुमको यत्न करके बहानेसे पृथिवीके कुकरमणके टियि भेज दिया, ओर इधर गगेशजीका परम ¢
# शोभायमान विवाह कर दिया ॥ १२॥ गणेशजीका विवाह होगा ओर उनकै दो ह्वी है, वे दोनों विशवहप प्रजापतिकी मनोहर कन्या है
एवं सुखमचित्यं जाने दि गणेश्वरे ॥ आजगाम द्वितीयश्च कांता प्रथ्वी सुतस्तदा॥ ९॥ तावश्चनार्देनैव पातो गेद महा ६
ट| स्मना॥ यथा वच्मि नोऽसत्यं न छलेन नमत्सरात् ॥ १० ॥ पित्रभ्यां तु कृतं यञ्च शिवया शंकरेण ते ॥ तन्न कय्यांत्परो ट
६| रोके सत्यं सत्य ब्रवीम्यहम् ॥११॥ निष्कास्य त्वां कक्रमणंमिषसुत्पाद्य यत्नतः ॥ गणेशस्य वरोकारि विवाहः परशोभनः |©
&|| ॥ १२॥ गणेश स्य कृतोद्वाहो लब्धवांस्प्ीदरयं खुदा ॥ विश्वरूपप्रनेशस्य कन्यारत्नं महोत्तमम् ॥१३॥ पुद्रयं ललाभासौ
दयोः पत्न्यो थ ॥ सिद्ध क्षमं तथा इद्ेलौभं सर्वं सखप्रदम्॥१४॥ पतन्योदैयोगैणेशोऽसौ लग्ध्वापद्यं भम् ॥
मातापिवोमतेनव सुखं धत निरंत्रम् ॥ 94॥ भवता प्रथिवी कता ससमुद्रा सकानन्॥ तच्छ्लाज्ञावशात्तात तस्य जातं फलं ठ
¢ त्विदम् ॥१६॥ पितभ्यांक्रिय् तास्मेवच्छलं तात विचार्यताम् ॥ स्वस्वामिभ्यां विशेषेण ह्यन्यः किन्न करोति तै ॥ १७॥ ¢
अक्षम्यक्च कृतं ताभ्यां त्वतिपतभ्यां हि कमं ह ॥ विचार्यतां त्वयाऽपीह मित्ते न शुभं सतम् ॥ १८ ॥ ए
# ॥ १३ ॥ उन दोनोँ सुन्द्र पतिनियोके दो पुत्र हुए है. सिद्धिके क्षेम ओर बुद्धिके छाभ नामकं प्रम सुन्दर प हज है ॥ १४ ॥ इसु भकार
गणेशजी दोनोते दो पत्र ठाभ करकै माता पिताकै मते ही निरंतर सुख भोगते ३ ॥ १५ ॥ इधर तुमने वन पर्वतकै सहित यह सारी ४
परथिवी सूदडाखी छपे जो तुमको आज्ञा हुई, उप्तका तुमको यह फठ भाप हृजा है ॥ १६ ॥ हे तात ! इन माता पिताके किये
विचार करो अपने स्वामीकै दये विरेष करके कोहं क्या नही कएता ॥१७। तुम्हारे माता पिताने भेरी समक्षे अच्छा नहीं किया \
क्र । के
हुए फटख्को
) तुषको भी
इमे विचार करना चाहिये, मेरी समके. तो यह अच्छा नहीं किया ॥१८॥ यदि माता विषदे या पिता वैच दे ओर राजाही सवसव ८
तो फिर किते कहे ॥ १९ ॥ जित कारणते कि यह अनर्थकारी कर्म किया है, हे तात ¡ शान्त्की इच्छावाा धिमान् उनका छल क
न देसे ॥ २० ॥ इस भकारे श्रुति ओर समृति शाम नीति कही है, बह ठुम समञ्च गये अब जसता बुम्हार मनम अवे वैसा करो ॥२१॥
बाजी बोरे हे नारदजी ! तम रा कहकर महेश्वरके मनकी गति समङ्ञाकर मौन हृए ॥ २२ ॥ इस ओर कुमार भी अपने माता पिताक
भरणामकर कोपाभिते भज्वछित होकर शिवा शिवके निपेध करनेप्र भी करौच पर्व॑तको चे गये ॥ २३ ॥ हम निषेध करते हँ तुम करयो जाते
द्या्दि गरं माता विक्गीणीयास्िता यदि ॥ राजा हरति सरस्व कस्मै किं च बरवीतु वे ॥१९॥ येनेवेदं कृतं स्याद्र कर्मानर्थकरं
परम् ॥ शांतिकामस्सुधीस्तात तन्धुखं न विरोकयेत्॥२०॥ इति नीतिः तौ प्रोक्ता स्परतो शाश्च स्वेतः ॥ निवेदिता च सा
तेऽ यथेच्छसि तथा रू ॥२१॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्युक्छा नारद त्वं त॒ महेन्वर्मनोगतिः ॥ तस्मे तथा इमारायवाक्यं मौन
पागतः॥२२॥ स्कन्दोऽपि पितरं नत्वा कोपाभ्रिज्वलितस्तदा ॥ जगाम पर्वतं कौचं पितृभ्यां वारितोऽपि सन् ॥२३॥ वारणे च
कृते त्वय गम्यते च कथं त्वया ॥ इत्येवं च निषिद्धोपि परोच्य नेति जगाम सः ॥ २४ ॥ न स्थातव्यं मया तातौ क्षणमप्यत्
किंचन ॥ ययेवं कपट प्रीतिमपहाय कृतं मयि ॥ २९ ॥ एवधुक्ता गतस्तजर शुने सोऽद्यापि वर्तते ॥ दशनेनैव सर्वेषां रोकानां
पापहारकः ॥ २६ ॥ तदनं हि समारभ्य कातिंकेयस्य तस्य वै ॥ शिवपु्रस्य देवष कुमारत्वं प्रतिष्ठितम् ॥ २७ ॥
| ठे्ा कहकर निषेध करनेपर भी कुमार चठनेही ठग ओर आगेकी बातके सिवाय कुछ न कहा ॥ २४ ॥ हे तात । अव भँ क्षणमाज्रभी
| स्थिति नहीं कर सकता जो ञ्चे छोडकर इस भकार सङ्गते कपट भ्रीति की है ॥ २५ ॥ हे नारदजी | इस्त भरकारसे कहकर दशेनसे ही
स छोकोके पाप हरनेवाठे कुमार वहांसे कौ च पर्व॑तको चे गये, ओर अन तक उसी पर्वतम विराजते है ॥ २६ ॥ हे नारद उसरी दिनते |£ ||
कर शिबणएत्र कातिंकेयका कुमारत्व प्रतिष्ठित हभ ॥ २७ ॥ ¢
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॥३८४॥ ||
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उनका नाम लोकमे हुलदायक ओर भसि है इह सब प्पका हरनेवाटा एण्यस्वरूप प्रम बह्नचर्थका देनेवाखा है ॥ २८ ॥ हे मुनीश्वर
कतिक तव देवता ऋषि खनि इत तीर्थे कुमारके दर्शनको जाते है ॥२९॥ जो कातकं कत्तिका नक्षत्रके योगम कार्िंकेयका दशन करते
है उनकै सव पाप दूर होकर इच्छित फठ्की भाति होती है ॥ ३० ॥ स्कन्दके विरहे पा॑तीको भी दुःख भाप हुआ, ओर दीन होकर
शिवजी बोरी हे पति ! भेर साथ वहांको चे ॥३१॥ उनके सुसके ण्य शिवजी अपने अशमे कौच पर्वतप्र गये, बहां उनका सुखदायक
ग मह्धिकाजैन नामवाठा हभ ॥ ३२ ॥ अब तक वह पाव॑तीकै सहित शिवजी दिखाई देते है, वह सत्परुषोकी तथा अपने भक्तोकी
तन्नाम समदं छोक सिद्धं ुवनजये ॥ सर्वपापहरं पुण्यं ब्रह्मचर्यं परम् ॥२८॥ कातिक्युं च सद देवा ऋषयश्च सतीर्थकाः॥
दशनाथ मारस्य गच्छति च युनीश्वराः॥२९॥कातिंक्यां कृत्तिकासंगे कर्य यः स्वाभिदशंनम्॥ तस्य पापं दहैत्र्व चित्तेष्सित्
फरलमेत् ॥३०॥ उमापि दुःखमापन्ना स्कन्दस्य विरहे सति ॥ उवाच स्वामिनं दीना तर गच्छ मय प्रभो ॥३१॥ तत्सुखार्थं
स्व॒यं शंथुगंतस्स्वांशेन पवते ॥ मद्िकाजंननामासीज्ज्योतिरशिङ्ग खावह्॥ २२॥अबापि दश्यते तञ्च शिवया सदितशशिवः ॥
सर्वषां निजभक्तानां कामपूरस्स॒तां गति ॥२३॥ तमागतं स विज्ञाय कुमारस्सशिवं शिवम्॥ स विरज्य ततोऽन्य गंत॒मासीत्स
सुतयुकः ॥ २९) देवश्च सुनिभिशचेव भ्राथितस्सोपि दरूरतः॥योजनघयशुत्सृज्य स्थितःस्थाने च कािंकः॥३८॥पुजस्नेहातुरौ तौ त
शिवौ पर्वणिपर्वणि ॥ दशंनार्थं कुमारस्य तस्य नारद् गच्छतः ॥३६॥अमावास्यादिने शंभुः स्वथं गच्छति तन इ ॥ पूर्णमासी
दिने ततर पार्वती गच्छति धुवम्॥२७॥यदत्तस्य चचृ्तातं भवत्प्ष्ठं खनीश्वर ॥ कातिंकस्य गणेशस्य परमं कथितं मया ॥३८॥
पव कामना पूणे करनेवाठे है ॥३३॥ तव कुमार वहां शिव पाव॑तीको आया देख विरक्त हो वहसे अन्यत्र जानकी इच्छा करने ठगे ॥ ३४ ॥
तव देवता सुनिर्योकौ बडी पार्थनासे उस स्थाने तीन योजन ( नारह कोष ) जाकर कुमार रहे ॥ ३५ ॥ तथापिं एकै स्नेहे आतुर होकर
शिवा शिब पवपव उस अपने पुत्रके अवरोकनके निमित जाते है ॥ ३६ ॥ अभ्वस्याके दिन स्वयं शिवजी वहां जते है, पणेमासीकै दिन
निश्वय पावती जाती है ॥३७॥ हे मुनीश्वर ! यह जो आपने कार्तिकेय ओर गगेशजीका वृत्तान्त पूछा सो मैने तुमे सब वणन किया ॥ ३८ ॥
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चक ।
इस कथाको सुनकर मलप्य सव पापोते ूट जाता है, ओर अपने इच्छित सम मेष करमोको प्राप्त होता दै ॥ ३९ ॥ जो इस् कथाकं
पढते पढाते सुनते सनाते है इमे सन्देह नहीं वह सथ कामनाओंको भाप होते है ॥ ४० ॥ बाह्ण ॒ब्रहमतेजसे युक्त भौर कषत्रिय विजयी
होवा है वैश्य धन समृद्धिषाडा ओर शद सत्समताको पराप्त होता है ॥ ४१ ॥ रोगी रोगे, भयभीत भयसे चूटता है, इसकै सुननेसे 1
भत प्ेतकी बाधाते दूट जाता है ॥ ४२॥ यह आख्यान पाप्रहित मल्योको यश ओर सुखका बदानेवाला है, बडी उम्र स्वरगमे
एतच्छरत्वा नरो धीमान् सर्वपापैः प्रषुच्यते ॥ शोभनां लभते कामानीष्ितान्सकलान्सदा ॥ ३९ ॥ यः पठेत्पाद्येद्रापि
शृणुयाच्छरावयेत्तथा ॥ सर्वान्कामानवाप्नोति ना कायां विचारणा ॥ ० ॥ ब्राह्मणो ब्रह्मवचस्वी क्षत्रियो विजयी भवेत् ॥
वैश्यो धन समृद्धस्स्याच्छरदस्सत्षमताभियात् ॥ ४१ ॥ रोगी रोगात्पशुच्येत भयान्धुच्येत भीतियुक् ॥ भूतपेतादिबा
धाभ्यः पीडितो, न भवेत्ररः ॥ ४२॥ एतदाख्यानमनधेयशस्यं सुखवद्धंनम् ॥. आयुष्यं स्वग्य॑मतुकपुतरपौजादिकारकम्
॥ ४२ ॥ अपवगभरदं चापिशिवज्ञानप्रद॑परम् ॥ शिवाशिवग्रीतिकरं शिवभक्तिविव्दैनम् ॥ ४७ ॥ अरवणीयं सदा भक्तानिःका
मेश भुखश्चभिः ॥ शिवाद्रेतप्रदं चैतत्सदाशिवमयं शिवम् ॥ ४५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्द्रसंदितायां चतुर्थे
ङमारखण्डे गणेशविवाहवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ समाप्तोयं शद्रसंहितान्तगेतः इमारखण्डशचतुर्थः ॥ ४ ॥
| षु तथा एत्र पौत्रादिका करनेवाला है ॥४३॥ यह भोक्ष ओर शिवज्ञानका देनेवाडा, शिवाशिवकी भीति. करनेवाटाः तथा शिवभक्तिका
| है ॥ ४४॥ भक्तोंको ओर सुशषुजोंको कामनारहित होकर सदा घुनना चाहिे यह शिवजीका अद्वैत ज्ञान देनेवाठा सदा
कल्याण ओर. शिवमय है ॥ ४५ ॥ इति शरीशिवहाएरागे द्वितीयशुबरसेहितान्ततचतु्ङमारखण्डे प° ज्वाठाप्रस्ादमिश्रकतभाषारीकायां
गणेशविवाहवणेन नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
` इति श्रीशिवमहापुराणभाषादीकायां द्वितीयश्ढसंहितान्तगीतवतुर्थ्मारखण्डः सभाप्तः।
शिण्पु
॥३८५॥
नारदजी बोरे हमने आनन्दक। देनेवाका उत्तम चरित्र भवण किया तथा गृहस्थ शिवजीका गण ओर स्कन्दकी सत्यकथा सुनी ॥१॥ अब्
आप कपाकरकै शिवजीके उन श्रेष्ठ चरि्ोको किये जिसमे उन्होनि दुष्ट दान्वोका वध किया है ॥ २ ॥ भगवान् शंकरने दैत्योके नगर
किस भकासमे जठाये ओर उन महाबरीने एकही बाणसे एक साथ कैसे तीनों परोको जलाया ॥ ३-॥ यह सब शंकरका चरित्र आप वणन
कीजिये, जो मायाते विहार करनेवाठे भरमुने अनेक चरित्र किये ह ॥ ४ ॥ ब्रह्लाजी बोठे एक समय कषिभरे्ठ व्यासजीने सन्कुमारजीसे यही
बात पृषी थी, जो सनत्कुमारने कहा वही भ तुमसे कहता हूं ॥ ५ ॥ सनत्कुमारजी बोठे हे महाविद्वान् व्यासषजी ! तुम शंकरकै चरित्र सुनो,
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ श्रीगोरीशंकराभ्यां नमः ॥ ॥ नारद उवाच ॥ शरुतमस्माभिरानंदपदं चरितघत्तमम् ॥ गृहस्थस्यैव
शंभोश्च गणस्कंदादिसत्कथम्॥१॥इदानीं महि सुप्रीत्या चरितं वरमुत्तमम् ॥ शंकरो हि यथा शदो जघान विहरन् खलान्॥२॥
कृथं ददाह भगवात्नगराणि सुरद्विषाम्॥बीण्येकेन च वाणेन युगपत्केन वीय॑वान्॥२॥एतत्सर्व समाचक्ष्व चरितं शशिमौखिनः ॥
देवधिसुखदं शश्वन्मायाविहरतः प्रभोः ॥ ४॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ एवमेतत्पुरा पृष्ठो ग्यासेन ऋषिसत्तमः ॥ सनत्कुमारं प्रोवाच
तदेव कथयाम्यदम् ॥५॥ सनत्कुमार उवाच॥ शृणु व्यास महाप्रज्ञ चरितं शशिमौलिनः॥ यथा ददाह ्िषुरं बाणेनैकेन विश्व
डत्॥६॥ शिवात्मजेनस्कन्देन निहते तारकासुरे॥ तत्षुास्तु अयो दैत्या पर्थतप्यन्सुनीश्र ॥७॥ तारकास्यस्तु तज्ज्यष्ठो विदय
न्माली च मध्यमः ॥ कमलाक्षः कनीयांश्च सर्वे तस्यवलास्सदा॥८॥ जितेन्दियास्ससन्नद्ास्संयतास्सत्यवादिनः॥ हटवित्ता
महावीरा देवद्रोिण एव च ॥९॥ ते तु मेशणहां गत्वा तपशचक्ृमहाद्तम् ॥अयस्सर्वान्सुभोगांशच विहाय समनोहशन् ॥१०॥
जिस प्रकार एकही वाणपते उन्होंने तरिषएुरको भस्म कर दिया ॥ ६ ॥ जब शिवषुत्र स्कन्दने तारकासुर दैत्वको भारडारा, तब है खनीश्वर !
उतकै एच तीन दैत्य ृ्वीप्र् तप करने. ठगे ॥ ७ ॥ उने तारकाक्ष ज्ये, वियुन्माली मध्यम ओर कमलाक्ष समे छोर था, यह सब
गल्यवखवारे थे ॥ ८ ॥ जितेन्द्रिय बम तत्पर सयमी ओर सत्यवादी थे, यहं सव इइचित्त महावीर देवताओक दोही थे ॥ ९ ॥ उन्होने
मेरुकी ाफामे जाकर तप करना आरंभ किया तीनोने सम्पुणं मनोहर भोगोँको त्याग दिया ॥ १० ॥
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| वे तारकके उतर वसन्त कुमे सब कामना गाने बजानेके उत्सव त्यागकर महातपस्या करने गे ॥ ११ ॥ गरमीर्े सूर्यकी कातिकौ जीतकर
चारों दिशाओंम अभि बाकर उन अभ्रियोकै बीचमे आदरले बैठकर अभिमे आहूती देने ठगे ॥ १२ ॥ महाप्रतापं पतित होकर सव
मूर्चछत हो जाते थे, ओर वर्षामि भीः ब्र रहित होकर शिरपर वर्षको सहन करने टगे ॥ १३ ॥ शरत काल्ये भी भोजन व्याग दिया
जो किं मनोहर स्षिग्ध ( चिकना ) स्थित हदयको हितकारी जो उत्तम मूठ फठ है ॥१४।१५॥ इस प्रकार वे महात्मा निराधार हो चारों
दिशाओमिं स्थित हूए, हेमन्त ऋतुमे पव॑ते आश्रयकर परमधीरतासे स्थित हो ॥ १६ ॥ तुषारको अपनी देहपर _धारण करते हए, जठ
वसंते स्व॑कामां अ गीतवादिनिस्स्वनम्॥विहाय सोत्सवं तेषुश्चयस्ते तारकात्मजाः॥११॥ ग्रीष्मे सूरग्रभां जित्वा दिष्चु प्रज्वाल्य
पावृकम्॥तन्मध्यसंस्थाः सिद्धय जहुबुहैम्यमादरात्॥१२॥ महाप्रतापपतितास्सरवेप्यासन् सुमूिताः॥ वर्षा गतसंतासावृष्ठ
रदधन्यधारयन्॥१२॥ शरत्काले भूतं तु भोजनं त॒ उुथुक्षिताः॥ रम्यं स्निग्धं स्थिरं हं फट मूलमवुत्तमम्॥ १४॥ संयमा
तषोजित्वा पानान्युञ्ावचान्यपि।॥भुक्षितेभ्यो दत्तवा त॒ बुभूवुरूपला इव॥१९५॥सस्थितास्ते महात्मानो निराधाराश्चतुदिंश् ॥
हैम॑ते गिरिमाच्रत्य धेरयेण परमेण तु ॥१६॥ तुषारेदसंच््ा जल्किघ्ेन वाससा॥ आसाद्य देह क्षौमेण शिशिरे तोयमध्यगाः
॥ १७॥ अनिर्विण्णास्ततस्सं ऊमशोऽवदधयस्तपः ॥ तेपयस्ते तत्पुत्रा विधिदिश्य सत्तमाः॥१८॥ तप उग्रं समास्थाय
नियमे प्रमे स्थिताः॥ तपसा कर्षयामासदेहान् स्वान दानवोत्तमाः॥१९॥ वर्षाणां शतकं चैव पदमेकं निधाय च ॥ भूमौ स्थित्वा
प्रं तञ तेपुस्ते बलवत्तराः ॥ २० ॥ ते सदं तु वर्षाणां वातभक्षस्पुदारणाः ॥तपस्तेष्दरात्मानः परं तापञुपागताः ॥२१॥
गीढा कपडे पहर अपनी देहको सुखाने ठे, ओर शिशिरम जलके मध्य स्थित हो तप करने ठ्गे ॥ १७ ॥ इस भ्रकारसे वे सब
स्याकुठता रहित हो तपको बढाने रगे इस्त प्रकार बह्लाजीके उदेश्यते वे तीनों तप॒ करने ठे ॥ १८ ॥ वे उग्रतप॒ करनेके खयि किन
नियममें तत्पर हए, ओर वे दानमे उत्तम अपने देहको तपस्या करके सुखने ठ्गे ॥ १९ ॥ फिर सौ वर्षतक एक पावके सहारे स्थित
होकर मूमिभे स्थित होकर वे बवान तप॒ करने छग ॥ २० ॥ सहनन वरषतक पे केव वायु भक्षण करकेही रह ग, ३ दुरात्मा,
येच ज्ज य ज न
| ष = = ~
इतत भकार तप करते. करते प्रतापो पराप्त हुए ॥ २१ ॥ एक सहस वषं तक पृथिवीम मस्तक टेककर स्थित हुए, सो बषतक ऊप्रको भुना |©
उठाकर स्थित रह गये ॥ २२ ॥ इस भकार वै दुरा्रहमे तत्पर होकर प्रम दुःखको प्राप्त हए, इस प्रकारे दिनरात वे देत आलस्य छोडकर >
तपम स्थित हुए ॥ २३ ॥ हे सने ! इस प्रकार तपस्या करते उनको बहुत स्मय बीत गया, ओौर भेरी समज्ञमं बह्यात्मा वे तारकके एत्र जब 8
पृण तपस्वी हए तब धरे जानकर ॥ २४ ॥ सुरासुरके यार महायशस्वी बरहलाजी संतुष्ट मनसे उनके वर देनेको आये ॥ २५ ॥ तव खनि
ओर देवताओंके साथ आकर सबके पितामह बह्माजी सांत्वना पूरक उन सबसे यह वचन बोरे ॥ २६ ॥ बह्लाजी बोरे, हे महादैत्यो भँ तुमत ट
वषाणां तु सदं वे मस्तकेनास्थितास्तथा॥ वषाणां तु शतेनैव उद््वबाहव आसिताः ॥२२॥एवं दुःखं परं प्राप्ता दुरा्रहपरा &
इमे ॥ दहक्ते संस्थिता दैत्या दिवारात्रमतद्रिता ॥ २३ ॥ एवं तेषां गतः कालो महान् सुतपतां शने ॥ अह्नात्मनां तारकाणां |£
धर्मेणेति मतिभम ॥२४॥ प्रादुरासीत्ततो ब्रह्मा स॒रासुरणरूमैहान् ॥ संत्टस्तपसा तेषां वरं दातं महायशाः ॥ .२५ ॥ सुनिदे ||
वासुरस्साद साप्वपर्वमिदं वचः ॥ ततस्तानव्रवीत्सान् सर्वभृतपितामहः ॥२६॥ब्रह्मोवाच ॥ प्रसप्नोऽस्मि महारैत्या यष्माकं ४
तपसासुने ॥ सं दास्यामि युष्मभ्यं वर ्रूत यदीप्सितम् ॥२७ ॥ किमर्थं सूतपस्तपतं कथयध्वं सुरद्विषां ॥ सवेषां तपसो ह
दाता सर्वकतांस्मि सवदा ॥२८॥ सनत्छृमार उवाच ॥ तस्य तद्वचनं धत्वा शनेस्ते स्वात्मनो गतम् ॥ ऊचुः प्रांजलयस्सवं ठ
प्रणिपत्य पितामहम् ॥२९॥ दैत्या उुः॥यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरस्त्वया ॥ अवध्यत्वं च सवषां सर्वभूतेषु देदिनः
॥ ३०.॥ रिथिरान् कुर् जगन्नाथ पातु नः परिपंथिनः ॥ जशरोगादयस्सवै नास्मान्भृत्युरगात् कचित् ॥ ३१ ॥ र
भसम हूं मै तुमको सव भकारते वर दगा, तुम अपनी अभिाषाका वर मागो ॥ २७ ॥ हे दैत्यो तुमने किस निमित्त तपस्या की है सो कलो,
भँ सवके तपस्य का फर देनेवाटा सवेदा सबका करता हूं ॥ २८ ॥ सनत्कुमार बोरे वे अघर बह्याजीके
विचारकर बरहमाजीको प्रणाम कर बोटे॥ २९ ॥ दत्य बोटे, हे देवेश ! यदि आप हमारे ऊपर भन्न श
४ है तो प्राणियों हमको अवध्य कर दीजिये ॥ ३० ॥ हे जगन्नाथ स्थिर करके हमारे जितने
इस भकारे वचन सुन शनेः शनैः
यदि हमको वर॒ देनेको उद्यत हए
विघ्न है, सको दूर कीजिये
= व्व
राको आदि छेकर रोग ओर दृतय किल प्रकार मी हमको प्ा्र न हो ॥ ३१ ॥ हम सब अजर अमर रहै, यही हमारा मत है, जीर
हमको एसी साम्यं हो कि हम चाहं त्रिोकीको वथ कर सके ॥ ३२ ॥ बहूतसी ठक्षमी बड बडे नगर ओर अनेक भोग स्थान् देशवयंति
क्या काम है ॥ ३३ ॥ जो यह भाणि ोडेही दिनम सृतयुका श्रा होजाय, उसका सब कृ व्यथे होजाता है, यह हमने निश्चय कर
ख्या है ॥ ६४ ॥ सनक्कुमार बे, इस भकार उन दैत्य तपस्वियोकै वचन सुनकर बरह्ञाजी अपने भभु गिरीश, महादेवजीकौ
स्मरण कर कहने लगे ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजी बोले, हे असुरो ! सवको अमरत्व नहीं हो सकता, तुम इस कामे निवृत्त हो ओौर
अजराश्ामरास्सवें भवाम इति नो मतम् ॥समृत्यवः करिष्यामस्पर्वानन्यांस्िटोकके॥३२॥ लक्ष्म्या कि तद्विएुलया किं कार्यं
हि पुरोत्तमेः ॥ अन्ये विपुलेभोगिस्स्थानेश्वयैण वा पुनः॥३३॥ यत्रैव मृत्युना भ्रस्तो नियतं पंचमिर्दिनैः ॥ व्यर्थं तस्याखिलं
ब्रह्मन् निचितं न इतीव हि ॥३७॥ सनत्कुमार उवाच॥इति थत्वा वचस्तेषां दैत्यानां च तपस्विनाम् ॥ प्रत्युवाच शिव स्मृत्वा
स्वप्र गिरिशं विधिः ॥३५॥ ब्रह्मोवाच॥ नास्ति सवामरत्वं च निवर्तष्वमतोऽसुराः॥ अन्यं वरं वृणीध्वं वे यादृशो वो हि रोचते
॥३६॥ जातो जनिष्यते नूनं जंतुः कोप्यसुराः कचित् ॥ अजरधामरो लोके न भविष्यति भूतले ॥३७॥ ऋते तु खंडपरशोः
कालकालदरेस्तथा ॥तौ धममधपरमावभ्यक्तौ ग्यक्तङूपिणौ ॥३८॥ संपीडनाय जगतो यदि स क्रियते तपः ॥सफलं तद्रतं
वेदं तस्मात्सुविहितं तपः॥३९॥तद्विचायं स्वय बुद्धया न शक्यं यत्सुरासुरैः॥ दुभ वा सुदुस्साध्यं मृत्युं व॑चयतानधाः॥४०॥
| जंत्ञा तुमको रुच मांगलो ॥ ३६ ॥ हे अघुरो ! को भी प्राणी जौ प्रगट हुभा होगा मृत्युको भाप होगा, टोकमे कोई भी अजर
अमर न होगा ॥ ३७ ॥ काठक काठ हारि ओर भगवा शेकरक सिवाय छोकमे कोई भी अमर नहीं है, यह दोनोंही र्म ओर अधर्मे
प्र है, तथा अव्यक्त ओर वयक्तहप है ॥ ३८ ॥ यदि तप जगतको पीडा देनेके लये किया जाय, तो उसकी सफठता गई जानो, इसते
ष्ट तप्का अवुषान करो ॥ ३९ ॥ सो आप स्वयं बुद्धते विचार कर जो घुर अहुरोको भी करनेकी साम्यं नहीं दुम या दुःताध्य मृत्युको
नयन व्य=2--
९ छोडकर बर मांगो ॥ ४० ॥ तुम सत्वयणके आश्रय होकर भरणमें हेतुका कोई वर मांगो, जिससे मृत्यु तुमको न आवे, उस हतुको पृथक् पृथक्
|| रा करो ॥ ४१॥ सनत्कुमार बोरे, विधाताके यह वचन सुनकर एक खुहूतंको ध्यानमे स्थित हुए, ओर थोडी देर विचार कर सब ठोककै
¢ पितामहते बोढे ॥४२॥ दैत्य बोरे, हे भगवन् ! हमारे पास कोई रेसरा स्थान नहीं है जिसमें पराक्रमवारे शन प्रवेश न कर सके ओर हम
¢ वहां सुखमे निवास कर सके ॥ ४३ ॥ आप हमको तीन अद्भूत एर निर्माण कंर दीजिये, जिनमें सब सम्पति स्थित हो धनधान्य भरे हों ¢
¢ तथा देवता जिनको धर्षण न कर सकै ॥ ४४ ॥ हे छोकेश ! हे जगदूयरो ! हम आपकी कपास इन तीनों रोमं स्थित होकर इस समस्त
¢ तत्किचिन्मरणे हेतु वृणीध्वं सतत्वमाश्चिताः॥ येन सत्यु्नैव वृतो रक्षतस्तत्पुथक् पृथक्॥४१॥ सनत्ङकमार उवाच॥ एतद्विधिवचः
त्वा श॒ते ध्यानमास्थिता॥ प्रोचुस्ते चितयित्वाथ सर्वलोकपितामदम्॥४२॥ दैत्या उचुः भगवन्नास्ति नो वेश्म पराक्गमव
£| तामपि ॥ अधृष्याः शाजवानां तु यन्न वत्स्यामहे सुखम् ॥७३॥ पुराणि चीणि नो देहि निर्मायात्यद्धतानि दि॥ सर्वसंपत्सं
| मृदधान्य भरधृष्याणि दिवौकसास्॥४७॥ वयं पुराणि ब्ीण्येवं समास्थायमरीभिमाम्॥ चरिष्यामो हि रोकेश त्वत्परसादालगह्भरो
४ ॥ ४५ ॥ तारकाक्षस्ततः प्राह यदभयं सुरेरपि ॥ करोति विश्वकमां तन्मम हेममयं पुरम् ॥४६॥ ययाचे कमरोक्षस्त॒ राजतं
सुमहत्पुरम्॥ विद्यन्माी च संङषटो वन्रायसमयं महत् ॥७७॥ पुरेष्वेतेषु भो बहमत्रकस्थानस्थितेषु च॥ सध्याहाभिजिते काले
शीतांशौ पुष्प संस्थिते ॥ ४८ ॥ उपपदेषु भ्योभ्नि लीखाभसंस्थिते ॥ वषु कारमेषेषु पुष्करावर्तनामसु ॥ ४९ ॥
पृथिवीम विचरण करेगे ॥ ४५ ॥ तारकाक्षने का भेरी यह इच्छा है, कि देवताओं भी अभेद हो देषा विम्वकरमां भेरा सुवर्णका षर निर्माण
ह| कर दे ॥ ४६ ॥ कमठाक्षने कहा मेरा चांदौका एेसाही र हो, ओर वियुन्माङीने भसन होकर कहा भेरा ोहेका इर निर्माण करा दीजिये
|| ॥ ४७ ॥ हे प्रभो ! जब कभी यह तीनों एर मध्याह्न समयमे एक स्थानप्र स्थित हों मध्याहके समय अभिजित् खुहूतंपर जब कि चन्दमौ
|| उष्य नकषतर स्थित हो ॥ ४८ ॥ ओर आकाशकै ऊपर नीठे नीके करावे नामक भेष छाये हों ॥ ४९ ॥
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सहस्र सहल वर्क उपरान्त जब हम परस्पर भि ओर यह तीनों ऽर यदि उस समय एकीमावको भाप हों ॥ ५० ॥ स्वं दवमय वव
वान् कुहेलासे असम्भव स्थठमे स्थित होकर जिसमे युदधकी सव सामभरी हों ॥ ५१ ॥ असंभावनावाटे एकही समय हमारे नगरका न्ट कर् द
तो न्ट हो नहीं तो नही हां शिवजी किते वैर नहीं करते है हमारे वह ॥ ५२ ॥ वन्दनीय पूजनीय नित्यही है वह ह कते मार
सकते है इस प्रकार मनम धारण कर देखते हँ कि, प्रथिवीमे वैसा देव दुठभ है ॥५३॥ सनत्कुमार बोट, लोकपितामह बरूह्ाजी उनके यह वचन
एुनकर शिवजीको स्मरण करते हुए बोटे, अच्छा एेस्राही होगा, शिवजीके हाथही तुम्हारी मृत्यु होगी ॥ ५४ ॥ ओौर मयकौ ब्रह्माजीने
तथा वृ्षसहसति समेष्यामः परस्परम्॥एकीमावं गमिष्यंति पुराण्येतानि नान्यथा॥4०॥ सर्वदेवमयो देवस्सषां मे डदेखया॥
असंभवे रथे तिष्ठन् सर्वोपस्करणान्विते ॥५१॥ असंभाग्यैककांडन भिन्त नगराणि नः॥ निर्वैरः कृत्तिवासास्तु योस्माकंमिति
नित्यशः ॥५२॥ वयः पृज्योभिवादयश्च सोस्माकं निर्दहेत्कथम्॥ इति चेतसि संधाय तादशो भुवि दुखेभः ॥ ५३ ॥ सनतक
मार उवाच ॥ एतच्छरत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा छोकपितामहः॥एवमस्तीति तान् प्राह स्रष्टि कर्तां स्मरञ्शिवम्॥५९॥ आज्ञा ददौ
मयस्यापि कुच त्वं नगरजयम् ॥ कांचनं राजतं चैष आयसं चेति भोमय॥५५॥ इत्यादिश्य सयं ब्रह्मा प्रत्यक्ष प्राविशदिवम् ॥
तेषां नारकपुत्राणां पश्यतां निजधाम दि॥५६॥ ततो मयश्च तपसा चक्रे धीरः पुराण्यथ ॥ कां चनं तारकाक्षस्य कमलाक्षस्य राज
तम् ॥५७॥ विद्न्माल्यायसं चैव बिविधं दुगैषुत्तमम् ॥ स्वगे व्योम्नि च भूमौ च कमाज्जञेयानितानि वे॥५८॥दत्वा तेभ्यो
सुरेभ्यश्च पुराणि त्रीणि वे मयः ॥ भरविवेश स्वर्यं तञ हितकामपरायणः ॥ ५९ ॥
आज्ञा दी किं तुम तीन पुर बनाओ एक स्रोनेका, एक चांदिका ओौर एक ठोहिका ॥ ५५ ॥ बाजी इस प्रकार भयको आज्ञा देकर
उन तारक पुत्रके देखते २ अपने धाम युरोकको चे गये ॥ ५६ ॥ तव मयने बडे परित्रमे तीनों परोको निमीण किया तारकाक्षको
पुवणेका कमलाक्षको चांदीका ॥ ५७ ॥ ओर शरयुन्भाीको छोहेका एर दिया, इस भकार तीन उत्तम दुगे निर्माण किये ॥ ५८ ॥ उनमें
एक स्वगमं एक आकाशमे ओर एक पृथिवीम विचरता था मय बह तीनोंएर उन अधषरोको देकर ओर आप भी उनकै हितकी इच्छात
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उने वेश कर गया ॥ ५९ ॥ इस भरकार वे तारकके तीनों एत्र उन तीनों पोको भरा होकर महाबल पराकृमसे महाभोगोंको भोगने गे
॥ ६० ॥वह पर कल्पदक्षोते उयाप्त, गजवाजियोति भरे रे, अनेक महलोमे संगठित, मणियोके समूहवारे ्षरोखोे व्याप्त ये॥ ६१॥ सर्यमेडलके ४
समान अनेकं विमान उनमें वियमान थे, ओौर चन्द्रमाकै समान पश्चराग मणियोरे शोभायमान थे ॥ ६२ ॥ बडे २ महट दिष्य छज्ज कैठास
पवेत शिसखरफे समान ऊंचे, गध, सिद्ध, चारण ओर दिव्य दी जिनमे निवा करती थीं ॥ ६३ ॥ भरत्येक परमं शंकरकै मंदिर थे, भत्येक
घरमे अभ्रिहोत्र था, शाद्चके जाननेवाठे भ्रष्ठ बाह्मण शिवभक्तोसे वह पुर दयापर थे ॥६४॥ वावी कुए ताराव अल्प सरोवरोते शोभायमान उदानं
एवं एनय पाप्य भरविष्टास्तारकात्मजाः ॥ बुधजस्सकलान्भोगान्महाबल्पराकमाः॥६०॥ कल्पदुमै च संकी गजवाजिसमाङ
रू ॥ नानाप्रासादसुकीण म गिनारपपाबनभ ॥६१॥ स्यमण्डकसंकाशविंमानेस्सवतोख॒सेः ॥ पद्रागमयैश्वव शोभितं चन्दर
समिभेः॥&२॥ प्रासदेर्गोपरेिव्येः कैलासशिखरोपभेः॥ दिष्य श्ीजनसंकीणेरगर्वैरिसद्ववारणेः॥ ६३॥श्द्ाख्यैः रतिशदमथिहोधेः
प्तिष्ठितेः। द्विजोत्तमेश्शाघ्चविन्ञेश्शिवभक्तिरतेस्सदा॥६४॥वापीकूपतडागै दीषिकाभमिस्मुशोभितम्॥उद्यानवनवृक्षेश्चस्वमैच्युत
ग॒णोत्तमेः॥&५॥ नदीनदसरिन्धुख्य पुष्करैः शोभितं सदा ॥ स्वकामफलयेशानेकेरवकषमनोहरम्॥६६॥ मत्तमातं गये तुरगश्च
सुशोभनः ॥ रथैश्च विविधाकोरश्शिबिकाभिरलङ्तम् ॥ ६७ ॥ समयादिशिकैशव कीडास्थानैः परथक्षथक् ॥ वेदध्यय॒न
शालाभिवििधाभिः पृथक््प्थक ॥ 8८ ॥ अदृ मनसा वाचा पापान्वितनरैस्सदा ॥ महात्मभिश््ुभाचारेः पुण्यवद्धिः
प्रवक्ष्यते ॥ ६९ ॥ पतित्रताभि सर्वर पावितं स्थलमुत्तम् ॥ पतिसेवनशीलाभिर्विषुखामिः धर्मतः ॥ ७० ॥
ओर स्वगसे आये हए मानोवनकेवृक्षोसे शोभायमानथे॥६५॥ नदिय नद सुरुय २ सरिताय जिने सदा कृरु सिरुते सन समयम फरनेवारे अनेक
क्षसे व्याप्त ओर मनोहर धे॥९६॥ मतवाठे हाथी ओर घोडोकैयुथोे शोभायमान अनेक भकारकैरथ ओर पाठकियोेअटकत॥ ६७॥ समयादिकै
करीडास्थान पृथक् पृथक् बने हुए, तथा वेदके अध्ययनकी शाखायै पृथक् पृथक् बनी हृदं थीं ॥ ६८ ॥ जिनको पापी मनुष्य मन वचन कमोसि
अवटोकन नहीं कर सकते अच्छे आचरण करनेवटे महात्मा पण्यात्मा जहां जा सकते ह ॥ ६५ ॥ जिसके सब स्थल पतिवता्धियोसे पवित्र
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है जो कुषर्भसे विष्ठल होकर पतिकाही देन करती ।॥७०॥ उनमे महाभाग्यनाठे बडे शर दैत्य अपनी ज्ञी त्र ओर नाणक सहित निवास
करते थे, तथा शरौ तस्मातके तत्व जाननेबाठे अपने धर्मम निरत निवास करते थे ॥७३॥ जिनकी चौडी द छाती वृषमकैसे ऊचे कंधे? सामयुद्धके
उपार्थोमे शठ, रेते शांत हो निवास करते, तथा समयपर कोप करते, इसी प्रकार कुबडे ओर बौनोति व्याप्त ॥७२॥ नीककमख्कैतषमान् नीट
ओर वरान वारोषाठे यह सव युदधकी छाठ्तावाठे मयने उतम रकस ॥७३॥ चारों भरते गुद्धे भरीतिवाटे, बहा ओर शिवकै पूजने विशु
वीरयवाछे, सुरथ, मर्त ओौर इन्दरके समान पराक्रमी, देवताओंके मथन करनेमे दढ पराक्रमी देत्योसे सेवित थे ॥ ७४ ॥ वेद शाक्चे छराणादिमं
देत्यशरैर्महाभगेस्सदारेस्ससुतेद्िजेः।्रोतस्मारतार्थतच्वलैरस्वधर्मनिरततेयत्म्॥७१॥ वयूढोरस्कैव्रषस्कंधेस्सामयुद्धधरस्सदा॥ प्रां
तैःकुपितेओैवकुन्जैवामनकैस्तथा॥७२॥ नीरोत्पकदलमरस्येनीलकुचितमूदधजैः ॥ मयेन रहतिस्सवश्शक्षितेयुदलारसेः ॥७२॥
वरसभररतैुंतं सम॑तादजशिव पूजनया विडुदधवीर्थैः॥ रविमरूतमरैन्द्रसनिकशिस्सुरमथनेस्सुदृदेस्सुसेवितं यत्॥७४॥शाघ्चवेदपु
राणेष येये धर्माः प्रकीतिंताः ॥ शिवभियास्सदा देवास्ते धर्मास्तत्र सर्वतः ॥७५॥ एवं लन्धवरास्ते तु देतेयास्तारकात्मजाः॥
शेवं मयश्वपाधित्य निवसंति स्म तत्र इ ॥ ७६ ॥ सर्व तरैलोक्यसुत्सारय प्रविश्य नगराणि ते ॥ ढवैति स्म मद्राज्यं शिव
मा्गरतास्सदा ॥ ७७ ॥ ततो महान् गतः कारो वसतां पुण्यकर्मणाम् ॥ यथासुखं यथाजोषं सद्राज्यं कुर्वतां शने ॥ ७८ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दसदहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे , ्रिषुरवधोपाख्याने अिपुरवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः
॥ १॥ ॥ ग्यास उवाच ॥ ब्रह्मपुत्र महाप्राज्ञ वद् मे वदतां वर् ॥ ततः किमभवदेवाः कथ च सुखिनोऽभवन् ॥ 9 ॥
जो ध्म कथन क्रि है, जो धमं सदा शिद्के श्रिय ई, पे स्व धमं उनम वियमान थे ॥ ७५ ॥ इस भकारे वे सव तारकषत्र शिवके धर्मवाले
मुके आश्रित हौ वहां निवाप करने ठगे ॥ ७६ ॥ वे तीनों नगर स्व त्रिोकौको नष्ट करते हए शिवमागेमे निरत होकर महद्राज्य करने
गे ॥ «७ ॥ इक भकार उन् दण्यकमं करनेवा्छोको बहुत स्मय बीत गया, हे सने ¡ वे वहां हुख ओर प्रीतिस्ते राज्य . करने |
७८ ॥ इति श्रीशिवमहाएराणे ₹ु° पं ° यु ° भाषाटीकायां प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ वयास्जी बोटे हे बहमएत्र ! हे महाविद्वान् ! हे बोलनेवालोमभरष् !
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आप हमसे किये तव कया हुआ) ओर देष्गण कित ्रकारसे सुखी हए ॥ १ ॥ ब्रहाजी बोे, इस भकार महाुद्धिमान् यासजीके ठ
पचन सुनकर शिवकै चरणकमखको स्मरणकर् तनकुमारजी कहने ठगे ॥ २ ॥ सनत्कुमारजी बोरे, तब उसकी प्रभासे दग्ध इनदरादिक
देवता हीनबङ होने ठे, सब परस्पर दुःखी हो बह्ाजीकी शरणमे गये ॥ ३ ॥ प्रीतिते बह्माजीको पणामकर अवतर देखकर अपना दुःख
निवेदन करने छगे ॥ ४ ॥ देवता दे हे विधाताजी त्रिषरोके अधिपति मयने तथा उन तारकके ऽत्रोने सव देवताओंको तापितकर दिया ¢
॥ 4 ॥ हे विधाता ! इस कारण हम दुःखी हए आपकी शरणमे आये है आप उसके वधका उपाय करे, जिससे हम सव सुसी हो 4
॥ ब्रह्मोवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य व्यासस्यामितधी मतः ॥ सनत्कुमारः प्रोवाच स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥२॥ सनत
मार उवाच ॥ अथ तत्प्रभया दग्धा देवा दीन्द्रादयस्तथा ॥ संम॑त्य दुःखितास्सवे बरह्माणं शरणं यथुः ॥३॥ नत्वा पितामहं ॥६'
शत्या परिकषिप्तिखिलास्सुराः॥ दःखं विज्ञापयामासर्विलोक्यावसरं ततः ॥४॥ देवा ऊचुः ॥ धातच्चिषुरनायेन सतारकसतेन ट
दि ॥ सवं प्रतापिता नूनं मयेन वरिदिवौकसः ॥ « ॥ अतस्ते शरणं याता दुःखिता हि विधे वयम् ॥ छक त्वं तद्वधोपायं ©
सुखिनस्स्याम तद्यथा ॥९॥ ॥ सनत्ङुम्ार उवाच ॥ इति विज्ञापितो देषैविदस्य भवङृद्विधिः ॥ प्रत्युवाचाथ तान्सर्वान्मयतो |©
भीतमानसान् ॥ ७ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ न भेतव्यं सुरास्तेभ्यो दानवेभ्यो विशेषतः ॥ आचक्षे तद्वपोषायं शिवं शर्वः करिष्यति ६
॥ < ॥ मतो विधितो दैत्यो वध मत्तो न चाहेति ॥ तथापिषुण्यं वद्ैत नगरे चिषे एनः ॥ ९ ॥ शिवं च पार्थयध्यं वै त
सवं देवास्सवासवाः ॥ सर्वाधीशः प्रसत्नश्चत्स वः कार्य करिष्यति ॥ १० ॥
॥ ६ ॥ सनत्कुमार गोटे; जन् देवताओने एते वचन कहे तव हकर बहाजी मयदानव से इरे हूए स्व देवताओं से बौ ॥ ७ ॥ न ४
बो, देवताओं तुम उन दानवोपि मत ॒इरो भ उनके वधका उपाय कहता हूं शिवजी उना संहार करम ॥ < ॥ वह दैत्य सुङ्े बुदधिको
भरा हए है, कारण स्पे वधक योग्य नहीं है, ओर उस समय वरिष्रनगरभे पतिदिन शण्यकी इदि होती है ॥ ९ ॥ सब देवता इनदरादिके
सहित तुम शिव्रजीकी पाथना करो पे सर्वाधीश यदि प्रसन्न होजा्ेगे तो वह तुम्हा कार्थं करेगे ॥ १० ॥ ५
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सनतकुमारजी बोट इस भकारे बह्माजीके वचन सुनकर वे सतव देवता दुःखी होकर शिवजीके समीप गये ॥ ११ ॥ वहं॑सव कोई भक्ति
देवेशको भणामकर हाथ जोडकर स्थित हुए, ओर कंधे श्चकाकर छोकके कल्याण करने वाठ शंकरकी भ्राथना करनं ठगे ॥ १२॥ दवता
बोरे हिरण्यगर्भ सव सृके विधान करनेवाठे देवको पणा है, स्थितिकरनेवाठे समथं॒सर्वव्यापकके निभित्त नमस्कार है ॥ १२ ॥ आप
भाणि्योक संहारकता मूतस्वरूप हो, आपको भणाम है, नियैण अभित तेजवाठे शिवके निमित्त नमस्कार है ॥ १४ ॥ अवस्था से रहित
सनत्कुमार उवाच ॥ इत्याकर्ण्य विधर्वाणीं सवे देवास्सवासवाः ॥ दुखितास्ते ययुस्तत्र यास्ते वृषभध्वजः ॥११॥ प्रणम्य
भक्त्या देवेशं सव भ्रांजल्यस्तदा ॥ त॒ष्टुबु्षिनतस्कंघाश्शंकरं लोकशंकरम् ॥ १२॥ ॥ देवा उचुः ॥ नमो ईिरण्यगमांय
` सर्वसष्टि विधायिने ॥ नमः स्थितिकृते तुभ्यं विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ १३ ॥ नमो दरस्वरूपाय भरतसंहारकारिणे ॥ नियणाय
नमस्तुभ्यं शिवायामित तेजसे ॥१४॥ अवस्थारहितायाथ निर्विकाराय व्चैसे॥ महाभूतात्मभूताय निरिकपताय महात्मने ॥१५॥
, नमस्ते भ्रतपतये महाभारसदिष्णवे ॥ तृष्णाहराय निर्वराकृतये भूरितेजसे ॥ १६ ॥ मदादैत्यमहारण्यनाशिने दाववह्वये ॥
दैत्यद्रुमककगराय नमस्ते श्ुलपाणये ॥ १७॥ महादुजनाशाय नमस्ते परमेश्वर ॥ अभ्बिकापतये तुभ्यं नमस्सर्वाश्नधारक
॥ १८ ॥ नमस्ते पावतीनाथ परमात्मन्महेश्वर ॥ नीरकंगयं श्दाय नमस्ते शदरहपिणे ॥ १९ ॥
निविंकार कांतिमाचु महाभूतोके आत्मा छिग ( चिह्न ) रहित निरे षहात्मा आपको प्रणाम है ॥ १५ ॥ सब भूतोंकै अधिपति
महाभारको सहनेवाटे तृष्णाके हरनेवाढे वैररहित आकतिवाठे अभित तेजस्वीको प्रणाम है ॥ १६ ॥ महादैत्यो के वम नाश करनेषाङेको दावकी
अभिरूप आपको प्रणाम है, देत्यहपी बृक्षोको कुठार शूर्पाणि भपको प्रणाभ है ॥१७॥ हे परमेश्वर ! महादैत्योके नाश करनेवारे आपको
प्रणाम है,हे सब अ्चोकेधारक! अविकापति आपको वारंवार पणायहै॥ १८॥ हे पार्दतीनाथ। परमात्मन् महेश्वर आपको प्रणाम है, नीखकंढ रुदरशूपी
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आपको भणाम है ॥१९॥ बेदान्तते जाननेयोग्य मागेतेमी प्रे आपको प्रणाम है यणस्वहप्य णी याणवजित आपको भरणाम है ॥२०॥ तिोकीकै
आनन्द् कृरनेवाठे महादेवहप आपको नमस्कार है, प्रयत्न अनिरुदढवासुदेवहूप आपको नमस्कार है ॥ २१ ॥ संकर्षण देव, कके ।
चाणुरकै मदनकरने वाठे दामोदर तथा विषके नाशक आपको रणाम है ॥२२॥ इन्दियोके अधिपति विभो सुखदायक शंकर आपको भणाम
› अधौक्षन गजकौ धकार सुनने वाठे कामश विषनाशन आपको प्रणाम है ॥२३॥ नारायणदेव, नारायणपरायण, नारायणस्वरप्, नारायणके
शरीरस भगट, बा अपने शरीरसे नारायणको भगट करने वाडे ॥ २४॥ स्वरूप, महानरकके हरनेवाठे, पापहारी, वृषवाहन आपको भरणाभं है ॥
नमो वेदान्तवेद्याय मारगातीताय ते नमः ॥ नमो य॒णस्वङपाय गुणिने युणविजिते ॥ २० ॥ महादेव नमस्तुभ्यं बिरोकीनन्दं
नाय च ॥ प्रहयम्नायानिश्ढाय वासुदेवाय ते नमः ॥ २१॥ सकषेणाय देवाय नमस्ते कंसनाशिने ॥ चाणुरमदिने तुभ्यं दामो ,
द्र विषादिने ॥ २२ ॥ हषीकेशाच्युत निभो ड शंकर ते नमः ॥ अधोक्षज गजाराते कामारे विषभक्षणं ॥ २३ ॥ नाराय
` णायदताय नारायणपराय् च ॥ नारायणस्वहूषाय नारायणतनूद्धव ॥ २४ ॥ नमस्ते सर्वहषाय महानरकहारिणे ॥ पापाप
हारिणेतुभ्य नमो वृषुभवाइन ॥ २५ ॥ क्षणादिकालङूपायु स्वभक्तबरूदायिने ॥ नानाहूपाय हपाय दैत्यचक्रविमदिने
॥ २६ ॥ नमो बरहमण्यदेवायगो्ाह्मणदिताय च ॥ सरसमर्तये तुभ्यं सदस्रावयवाय॒ च ॥ २७॥ धमैरूपाय सत्वाय नमस्स
तत्वात्मने हर ॥ वेदवेयस्वूपाय नमो वेदप्रियाय च ॥ २८ ॥ नमो वेदस्वह्पाय वेद्षक्रे नसो नमः ॥ सदाचाराध्व गम्याय `,
सदाचाराध्वगामिने ॥ २९॥ विष्टरश्रवसे तुभ्यं नमस्सत्यमयाय च ॥ सुत्यपभरियाथ सत्याय सत्थगम्थाय ते नमः ॥ ३० ॥
॥ २५॥ क्षणआदिकाठलप अपने भक्कोको बर देनेवाटे अनेकप ओौर हपवाठे दैत्यो चक्रको मदन करनेवाछे ॥ २६ ॥ नाह्मणोके देवता,
गोबाह्णके हितकारी, सहल्मूतिं ओर सहसो अवयवंवाठे आपको नमस्कार है ॥ २७ ॥ धूर्मरप स॒रवहप् स्वके आत्वा दुःखहारी आप्री
नमस्कार है, वेदसे हौ जानने योग्य, वेयस्वहप, वेदक मिय आपको नभस्कार ह ॥२८॥ वेदस्वहप) वैदल, सदाचारके भागम जानेवाखे तथा |
सदाचारकै मागसेही प्राप्त होने योग्य आपको प्रणाम है ॥ २९ ॥ विषटरकी वात हुननेवाछे सत्यम सत्याभिय सत्य ओर स॒त्थसे ही पाप्त होनेवाछे
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आपको भणाम है ॥३०॥ आप माया मायाके अधीश्वर सामगानमे प्रायण ब्रह ओर बहमेही भग हो ॥३१॥ हे दंश ! आप तपह्प तपकै फढ
| दनेवाे, सतुतिके योग्य, सके स्तुपिको भाप, सतिम भन्न चित्त होनेवाठे ॥ ३२ ॥ शतिक आचारते पसन होनेवाठ, स्तुतिके आ चास्ते भसन
ठ होनेवाठे, चार प्रकारके स्वूपवाठे, जठस्थठ्ते परगट होने वाठेको प्रणाम है ॥ ३३ ॥ हे नाथ | यह सव देवता प्रकृ ष्ठ विभूति है, भाप
ठ देवताओं इन्द्र, रोम खयं ॥३४॥ छोकोम त्यटोक, नदियोमे गंगा, णमि श्वेतवण ओौर सरोवरमे मानसरोबरहो ॥३५॥ पव॑तोमिहिमाख्य, गौ ओमि
नमस्ते मायिने तुभ्यं मायाधीशाय वे नमः ॥ब्रह्मगाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मणे ब्रह्मजाय च॥३१॥तपसे ते नमस्त्वीश तपसा फठ्दा
यिने ॥ स्तुत्याय स्त॒तये नित्यं स्तुतिसंप्रीतचेतसे ॥३२॥ धत्याचारग्रसन्नाय स्तुत्याचारप्रियाय च॥ चतुर्विधस्वद्पाय जलस्थ
लजङूपिणे॥३३।सरवे देवादयो नाथ श्रेष्ठत्वेन विभूतयः ॥ देवानामिन्द्रहूपोऽसि अ्रहाणां त्वं रविमेतः ॥३९॥ सत्यलोकोऽसि
लोकानां सरितां छसरिद्वान्॥ श्वेतवर्गोऽसि वर्णानां सरसां मानसे सरः॥३५॥ शैलानां गिरिजातातः कामधुक्त्वं च गोषु ह ॥
षीरोदधिस्तु सिन्धूनां धातूनां हाटको भवान्॥३६॥ वर्णानां ब्राह्मणोऽसि त्वं वणां राजासि शंकर॥ शुक्तिकष्ेषु काशी त्वं तीर्थानां
तीर्थराड् भवान् ॥३७॥ उपलेषु समस्तेषु स्फटिकस्त्वं महेश्वर॥कमलस्त्वं प्रसनेषु शैलेषु हिमवांस्तथा॥३८॥ भवान्वाग्भ्यवहा
रेषु भागवस्त्वं कविष्वपि॥ पक्षिष्वेवासि शरभः सिहो हिसेषु संमतः॥३९॥शाल्गामशिला च त्वं शिलासु वृषभध्वज ॥ पूज्य
रूपेषु सवेषु नमंदाछिगमेष हि ॥४०॥ नन्दीश्वरोऽसि षञजुषु वृषभः परमेश्वर ॥ वेदेषूषनिषद्रपी यज्वनां शीतमात॒मान् ॥४१॥
कामधे, सोमं क्षीरसागर) तथा धाठुओमि हुवणं हो ॥३६॥ हे शंकर ! आप वर्णम बाह्णग, ओर मलप्योमे राजाहो, सकते काशी, ओर
तीर्थां भया हो ॥ ३७ ॥ पाषा्ोषे आप स्फटिकमणि हो, हे महेश्वर | सन रोम तुष कषर, ओर पर्वतो हिमाकयहो ॥ ३८ वाणीके
व्यवहारो आप्ही, ओर कवियोमि भागेव, पक्षि्योमें शरम ओर दिको सिंह हो ॥ ३९॥ हे शंकर ! शिा्ओमि आप शाछिगराम शिाहो,
ओर सबके पूज्य रूपे आप नमेदारिगहप हो ॥ ४० ॥ पशुओं वृषभ परमेश्वर नन्दीश्वर हो, वेदम उपनिषद्रूप ओर यज्ञकरनेवाटोमे
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ह्पोमं आप ओंकार, ओर दारुण वस्तुओं आप विष हो,
इन्द्रियम तुम मन, दानो अभय,
चन्रूप हो ॥ ४१ ॥ भतापियोभरं ठम पष्क, शैवो अच्युत ( विष् ), इरा आप् भारत, ओर अक्षरो भकार हो ॥ ४२ ॥ बीज
व्यापक वस्तुओंमे आकाश, ओर सव॒ आत्माओंके परमात्मा हो ॥ ४३
पवित्रकरनेवा्ोमे जर, ओर् जीवन दनेवारोभि सुम अगत हो ॥ ४४ ॥ ठाभोंम पतरहपलाभ, देगवानोमे
वायु ओर सुब नित्यकं आप सन्ध्योपासन हो ॥ ४५ ॥ यज्ञम आप अश्वभेषयज्ञ, ओर युरो सतयुग, सव धिष्णों ( नक्षत ) म आप
पष्य है, ओर तिथियों अमावास्या हो ॥ ४६ ॥ सव ऋुओमिं तुम वसन्त ऋतु, सव पर्वों संक्रान्ति हो, तृणम ङश, भौर स्थठ वृक्षों
भृतापिनां पावकस््वं शौवानामच्युतो भवान् ॥ भारतं त्वं पुराणानां मकारोऽस्यक्षरेषु च ॥ ४२ ॥ प्रणवो बीजमेप्राणां दार्णानां
विषं भवान् ॥ व्योमव्यप्निमतां तवं वै परमात्मासि चात्मनामू्॥ ४२ ॥ इन्द्रियाणां मनश्च त्वं ानानामभयं भवान् ॥ पावनानां
जं चासि जीवनानां तथामृतम् ॥ ४४॥ लाभानां पुत्रकाभोऽपि वाघुेगवतामसि॥ नित्यकं सवेष सष्योपास्तिर्भवान्मता
॥ ४८ ॥ कृतूनामश्नमेषोऽसि युगानां प्रथमो युगः ॥ पुष्यस्त्वं सर्वधिष्ण्यानाममावास्या तिथिष्वसि ॥४६॥ सर्वतुषु वसंतस्त्वं
सवपचेसु सरमः ॥ इशोऽसि तृणजातीनां स्थूलृक्षेषठ वे वटः ॥ ४७॥ योगेषु च म्यतीपातस्सोमवद्धी लताघच ॥ बुद्धीनां
धमदधिरुत्वं कं सुखदां भवान् ॥ १८ ॥ साधकानां शुचीनां त्वं प्राणायामो महेश्वर ॥ ज्योतिरिगेष्ठ सवषु भवान्
विश्वेश्वरो मतः ॥ ४९ ॥ धर्मस्त्वं सर्ववभूनामाश्रमाणां परो भवान् ॥ मोक्षस्त्व सर्ववर्गेषु श्द्राणां नीललोहितः ॥ «० ॥
आदित्यानां वासुदेवो हनूमान्वानरेषु च ॥ यज्ञानां जपयज्ञोऽसि रामः शन्चभृतां भवान् ॥ ५१ ॥
भाप वर हौ ॥ ४७ ॥ योगो ठयतीपात्, ठताओमं सोमी, ओौर पुददोभे कलब्रहप हो ॥ ४८ ॥ हे महेश्वर, पवित्र साधनम आप
भराणायाम हो, सव ज्योति्टिगोमि आप विभ्नाथ हो ॥ ४९ ॥ सव बन्धु आप पर्प हो, आशम आपृ सन्यास आशम हो, सब
वगम आप मोक्ष ओर सोमं भाप नी्छोदित हो ॥ ५० ॥ आदित्यम वादेव, वानरो नमान्, यज्ञम जपज्ञ ओौर शच्चधारियोमे |
आप राहो ॥ ५१॥
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गवो चित्ररथ, वुओंमे पावक, महीनों अधिकमास, ओर वरतोमे चतुर्दशी हो ॥ ५२ ॥ गजेन्रोमे रावत, सिम श ग
अनन्त ओर पितरो अर्यमा आप हो ॥ ५३ ॥ कठनकरनेवारोभे काट, दैत्योमे बि आप हौ, बहुत कटने क्या है; आप इस पन्
| जगत्को आक्रमण करके ॥ ५४ ॥ एकांशमे बाहर भीतर स्थित हो रह हो ॥५५॥ इस् भकारत सव दवता महादव वृपमध्वजकौ सतति करकं
नाना प्रकारके स्तो्रपाठसे परमेश्वर शकधारीको सन्न करते हए ॥ ५६ ॥ अपने स्वाथेम् चतुर वे देवता दीन हो अपने स्वाथको कहनेके चि
इनको आदिठे सब देवता शिर काय हाथ जोड बोटे ॥ ५७ ॥ देवता बो, हे महादेव ! तारकके पर्ने हम इन्द्रादिकं सव देवताओंको
गंधर्वाणां चित्ररथो वसूनां पावको धुवम् ॥ मासानामधिमासस्त्वं बरतानां त्वं चतुद शी॥५२॥देरावतो गजेन्द्राणां सिद्धानां कषिटौ
मतः ॥ अन॑तस्तवं हि नागानां पितृणामर्यमा भवान् ॥५२॥ कालः कल्यतां च त्वं दैत्यानां बख्रिव च ॥ कं महूक्तेन देवेश सर्व
विष्टभ्य वै जगत् ॥४॥ एकांरोनं स्थितस्त्वं हि बहिस्थोऽन्वित एव च ॥५९॥ सनत्छुमार् उवाच् ॥ इति स्तुत्वा सुरा स्सवें
महादेवं वृषध्वजम्॥ स्तोषेनांनाविधैदिभ्येःश्चलिनं परमे वरम् ॥५६। पत्यूः भ्रस्तुतं दीनार्स्वाथस्वार्थविचक्षणाः॥ वासवाय्या नत
स्कंधाः कृताज्ञलि पुटा सुने॥५७॥ देवा उच ॥ पराजिता महादेव भ्रातृभ्यां सहितेन त॒ ॥ भगवंस्तारको त्पतरैः सवे देवास्सवासुवाः
॥ ९८ ॥ वेलोकयं स्ववशं नीतं तथा च षुनिसत्तमाः ॥ विध्वस्तास्स्वसंसिद्धास्सर्वघुत्सादितं जगत्॥५९॥यज्ञभागान्समर्भोस्तु `
स्वयं गरहति दारुणः ॥भ्रवतितो ह्यधभस्तेषीणां च निवारितः॥६०॥अवध्यास्स्वधूतानां नियतं तारकात्मजाः ॥ तदिच्छया
भ्रकु्न्ति सवं कर्माणि शंकर॥&१॥ यावन्न क्षीयते दैत्यघेरिश्चिपुरवासिभिः॥ तावद्विषीयतां नीतिर्यया संरक्ष्यते जगत् ॥६२॥
पराजित कर दिया है ॥ ५८ ॥ उस्ने सव खनिगरष्ठ ओर त्रिटोकी अपने वशम कर सष सिद्धोको विध्वस्त कर दिया है, ओर सबही जगत्
उत्साहित कर दिया है ॥ ५९ ॥ वह दारुण सब यज्ञके भागोको स्वयं ह शरहण करता है, ऋषियोके निवारण करनेसे मी उन्होने अधर्ममे
रृत्ति की है ॥ & ध ॥ हे शंकर । वह तारकके पत्र सवही भाणियोति अवध्य है, दुस्तरे जब उन्हीकी इच्छासे करम करते है ॥ ६१ ॥
जबतक जिषरवाियोंते यह भम्युणं जगत् विध्वंस नही होता है, जबदक कोई मीतिका विधान किया जाय जिसे जगत की रक्षा हो ॥६२॥
गन्गा
सनत्कुमारजी बौ इर भकारते उन इदादि देवताओकि वचन सुन शिवजी उन भाषण करनेवारोपि कहने रुगे ॥ ६३ ॥ इति श्रीशिवमहा
पराणे ₹° प° यु° भाषाटीकायां देवस्तुतिर्नाम दितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ शिवजी बोटे यह तरिषुर अध्यक्ष इस समय ॒पएण्यात्मा है जहां एण्य
वता है कोई बुद्धिमान् उसका वध नहीं करता है ॥ १ ॥ हे देवताओ !तुमको जो महाकष्ट आकर पराप्त हआ है, वह सब भै सब जानता हू
दैत्य ब प्रवर है. को$ देवता दैत्य उनके मारने समथ नहीं ॥ २ ॥ वे तारकात्मज इत समय स्व पण्य कर रहे है, उन सब एर
बायका वध ॒दुस्साध्य ` है ॥ ३ ॥ जानवृङ्ञकर रणकी कर्कशताते कैसे मित्रदोह किया जाय ! बरह्माजीने स्वयं मिचरद्रोह करनेमं |
॥ सनत्कुमार उवाच्॥ इत्याकृण्यं वचस्तेषामिन्द्रादीनां दिवौकसाम् ॥ शिवः संभाषमाणानां प्रतिवाक्यसुवाच सः॥६३॥ इति
श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां द्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखंड देवस्त॒तिनीम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ िवउवाच ॥ अर्य ‡ त्रिषु
ध्यक्षः पुण्यवान्वतेतेऽधुना ॥ यञ पुण्यं रवतत न् हंतम्यो बुधैः कचित्॥१॥ जानामि देवक च विशचधास्सकलरं महत्॥दैत्यास्ते
प्रर इत॒मशक्यास्तु सुरारेः ॥२॥ पुण्यवंतस्तु ते सें समयास्तारकातमजाः॥ दुस्साध्यस्तु वधस्तेषां सैषां पुरवासिनाम् ॥३॥
मिहं कथं जानन्करोमि रणककश: ॥ सुदद्रोदे महत्पापं पूरव स्वयथुवा॥.४ ॥ बह्त्े च सुरापे च स्तेये भवते तथा ॥
निष्कृतिविदिता सद्भिः कृतप्रे नास्ति निष्कृतिः ॥ ५ ॥ मम भक्तास्तु ते दैत्या मथा वध्याः कथं सुराः ॥ विचाय॑तां
भवद्धिश्च धमेक्ञेरेव धमतः ॥ ६ ॥ तावत्ते नैव ई॑तम्या यावद्धक्तिकृतश्च मे ॥ तथापि विष्णवे देवा निवेधं कारणं त्विदम्
॥ ७॥ सनत्कुमार उवाच ॥ इत्येवं तद्वचः त्वा देवाश्शकषुरोगमाः ॥ न्यवेदयन् दधतं स्र ब्रह्मणे प्रथमं घने ॥ ८ ॥
पाप वणेन किया है ॥ ४ ॥ शाम बलहत्यरेकी, सुरापीनिवाछेकी सुवणे चुरानेवारेकी, बत [ परतिज्ञा ] तोडनेवाटेकी निष्ति सतछरुपोनि
कही है, प्र कत्नफी निष्ठि नहीं है ॥ ५॥ हे देवताओं ! जब कि वे दत्य मेरे भक्त है तव मँ उनको कैप मार सकता हू, तुम धमेज्ञहो
इस बातको धके साथ विचारो ॥ ६ ॥ जवतक मेरी भक्ति वे करते है तबतक ओँ उनको नहीं मार सकता, तो भी हे देवताभो इष १
ठम विष्णजीते नितेदन करो ॥ ७ ॥ सनत्कुमार बोढे ह इन्द्रको आदि छेकर सव देवता इस पक्र शिवजीके वचन श्वणकर् हे सने! पले
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तो यह बात बह्माजीसे कहते हए ॥८॥ तव इन्दरादिक षव देवता ब्रह्माजीको आगे करक महा शोभाकी खान वैकुण्ठको गये ॥९ (0
नारायणको देख सभम भरणाम करने गे, ओर सब देवता हाथ जोड महाभक्तिसे प्रसन्न करने कगे॥१ ०॥तब उन समथ विष्य॒जीपे सव दवता
ओंने अपने दुःसखका कारण पूर्वके समान निवेदन किया॥११॥ इतत भकार विषरके दिये हए देवताओं दुःखको सुनकर ओर उनका व्रत जानकर
विष्णजीने उनसे कहा ॥१ २॥विष्यजी बोटे, यह सत्यही बात जहां सनातन धर्महै, वहां कभी दुःख नहीं होता, जैसे ख्यक दशनसे अन्धकार
ततो विधि पुरस्कृत्य सवे देवास्सवासवाः॥ वेट प्रययुश्शीभरे स्वँ शोभासमन्वितम्॥९॥ त गत्वा दरिदृष्वा प्रणेशुर्जातसंभ्रमाः॥
तष्ट्बु-च महाभक्त्या कृतांजिपटास्सराः ॥१०॥ स्वदुःखकारणं सरव परववत्तदनंतरम् ॥ न्यवेदयन्द्रतं तस्मे विष्णवे प्रभविष्णवे
॥ ११ ॥ दैवदुःखं ततः त्वा दत्तं च तरिपुरालये ॥ ज्ञात्वा बतं च तेषां तद्िष्णुवंचनमब्रवीत्॥१२॥ विष्णुश्वाच ॥ इदं सत्यं
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वचश्चैव यत्र धर्मस्सनातनः ॥ तच दुःखं न जायेत सूयं दृष्टे यथा तमः ॥१३॥॥ सनत्कुमार उवाच॥ इत्येतद्वचनं त्वा देवा ४
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॥२९३॥
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दुःख॒पागताः ॥ पुनहचुस्तथा विष्णुं परिम्लानश्खाम्बुजाः॥ १४ ॥ देवा उचुः ॥ कथं चैव प्रकत्त॑ब्यं कथं दुःखं निरस्यते॥ कथ
भवेम सखिनः कर्थं स्थास्यामहे वयम् ॥ १९ ॥ कथ धर्मा भविष्यंति ्िपुरे जीविते सति ॥ देवदुःखप्रदा नूनं सवे भिषुरवा
सिनः ॥ १६ ॥ किं वा ते ज्िषुरस्येह वधश्चैव विधीयताम् ॥ नोचेदकाल्िकी देवसंहतिः करियतां धुवम् ॥ १७ ॥ ॥ सनतु
मार उवाच ॥ इत्युक्त्वा ते तदा देवा दुःखं कृत्वा पुनः पुनः ॥ स्थितिं नैव गति ते वै चजुदैववरादिह ॥ १८ ॥
| रहता ॥ १ ३॥ सनक्ुमारजी बो, यह विष्णजीकै कचन सुनकर देवताओंको बडा दुःख हुभा, ओर उनकै खख मछिन होगे, पे विष्ण जी
फिर कहने छगे ॥१४॥ देवता बोठे फिर कया क्रिया जाय, ओर किह ्रकारसे दुःख दर हो, कैसे हम सुखी हों, ओर किम प्रकारसे स्थिति
कर ॥ १५॥ किर विषै जीवित रहनेशे दूसरे रमं किक प्रकार होगे, वे सबही निषरवासी निश्चय देवता ओका दुःख देनेवाटे है ॥ १६॥
| त्रिषरोका कंस प्रकारसे वध चिन्तन किया जाय, नहीं तो अकामे ही देव्ताओंका नाश हो जायगा ॥ १७ ॥ सनक्छुमारजी बोटे,
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हीन ओर विनय संयुक्त देखकर श्रीमान् नारायण मनम चिन्ता कृरने ठे ॥ १९॥ देवताओंकी सहायताके निभित्त मुञ्चे श्या करना |
वे तारकके समस्त एत्र तो शिवजीके बडे भक्तं है ॥ २० ॥ समथ विष्णजीके इस भरकारसे उस समय विचारकर देवताओंके कार्थं करके
निभित्त यज्ञोका स्मरण करते हुए । २१ ॥ विष्णजीके स्मरण करतेही वे सब यज्ञ बडी शीघ्रतासे जहां श्रीपति परुषो त्तम थे वहां आये ॥२२॥
तब यज्ञपति एराण एरुष हरिको हाथ जोड शिर छ्काय वे यज्ञ विज्ञमि करने ठगे ॥ २३ ॥ भगवान् उन सनातन यज्ञोको आया देखकर
६| तान्वै तथाविधान्डद्का रीनान्विनयसंयुतान् ॥ सोपि नारायणः श्रीमांश्ितयेचेतसा तथा॥१९॥ किं कार्थं देवकार्येषु मया देव
(| सदायिना ॥ शिवभक्तास्त॒ ते देत्यास्तारकस्य सुता इति ॥ २० ॥ इति संचिन्त्य तत्काले विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ततो यज्ञा
| स्स्मृतास्तेन देवकार्या्थमक्षयाः 1 २१ ॥ तद्विष्णस्मृतिमतरेण यज्ञस्ते तत्क्षणं इतम् ॥ आगतास्तज यस्तं श्रीपतिः पुरूषो
||| त्तमः ॥२२॥ ततो विष्णुं यज्ञपति पुराणं पुर्षे य, ॥ प्रणम्य तुष्टबुस्ते वें कृतांज्र्षिास्तदा ॥२३॥ मगवानपि तान्दष्टा
१ यज्ञान्ध्राद सनातनम् ॥ सनातनस्तदा सेंदरान्देवानाखोकष्य चाच्युतः ॥ २४ ॥ विष्णु्वाच ॥ अनेनैव सदा दैवा यजध्वं
त
|| वह देवता इत भकारते कहकर ओर वारंवार दुःख करके कहीं अपनी गति ओर स्थितिको न भराप्त हुए ॥ १८ ॥ इस भकारसे उन देवताओंको
परमेश्वरम् ॥ पुरतय् विनाशाय जग्यविभूतये ॥२५॥ सनत््ुमार उवाच॥ अच्युतस्य वचः त्वा देवदेवस्य धीमतः। ।पेम्णा
त रणति कृत्वा यज्ञेशं तऽस्तुवन्सुराः ॥ २६ ॥ एवं स्तुत्वा ततो देवा अजयन्यज्ञरषम् ॥ यज्ञो्तेन विधानेन संपू्णविधयो
सुन ॥ २७ ॥ ततस्तस्मायज्ञङडात्सय॒त्पतुस्सदस्रशः ॥ भूतसंघा महाकायाः श्ुकशक्तिगदाथुधाः ॥ २८ ॥
उनसे इन्द्रादि सषब देवताओंको दिखाकर अच्युतनें कहा ॥२४। विष्णजी बो,
तीनों जगत्का कल्याण ओर तीनों रोका विनाश होगा ॥ २५ ॥ सनत्कुमारजी गोले देवदेव अवच्युतके यह वचन पुनकर मेमपुदक वे सव
देवता यज्ञेशकी स्तुति करने ठगे ॥ २६ ॥ अन॑तर वे देवता यज्ञक्षका यजन करने लगे, हे शने ! वह सपिधानसे यज्ञ परुषा विधान
कने लगे ॥ २७ ॥ तब उत यज्ञण्डले महाकायावारे शकशक्ति ओर गदा हाथमे छथि सहलो भूत भगट हए ॥ २८ ॥
ह देवताओ 1 इन यज्ञो तृम सदा प्रमे्वरका यजन कृरो, इनसे
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तव देमताोनि उन सहसरं मूतोंको अवटोकन किया, जो शक शक्ति गदा हाथमे चयि दण्ड चाप पारण कि थे ॥ ५० ॥। अः पकार ||
प्रहारो युक्तं नाना वेष धारण किये, कालाभनि रुद्रके समान तथा काठखयके समान थे ॥ २० ॥ जब उन सबने गट हौकर् विष्णुजीर 8 ट
भणाम किया, तब रुदकी आज्ञाके पाठन करनेवाठे श्रीमान् विष्णजी उनसे कहने ठगे ॥ ३१ ॥ विष्णजी बोठे हे । | देवता ओके कायक ट
निमित्त उयत हए तुम मेरे श्चन सुनो, तुम बड वख्वान् सब त्रिके स्थानको जाओ ॥ २२ ॥ वहा जाकर उत्तके पोको तोडकर् जाकर, ठ
विदीणैकर, फिर अपने कल्याणक निमित्त तुम जहां इच्छा हो -चछे जाना ॥ ३३ ॥ सनत्कुमारजी बोटे भगवानूक इस भरकारके वचन सुन वे ्
ददृशुस्ते सरास्तान् वे भरतसंघान् सदस्रशः ॥ शल शक्तिगदाहस्तान्दण्डचापशिटायुधान् ॥ २९ ॥ नानाप्रहरणोपेतान् नानावे |+
षधसंस्तथा ॥ काला्िरूसदशान्कालसूर्योपमांस्तदा ॥ ३० ॥ दृष्टा तानव्रवीद्विष्णुः प्रणिपत्य पुरःस्थितान् ॥ भ्रूतान्य ¢
॥३९४॥
ज्ञपतिः श्रीमा्घद्ाज्ञापरतिपारकः ॥ ३१ ॥ विष्णुरूषाच ॥ भूताः शृणुत मद्वाक्यं देवकार्याथसु्यताः ॥ गच्छन्तु धिषुरं सद्य
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स्स्व हि बलवत्तराः ॥३२॥ गत्वा दग्ध्वा च भित्वा च भङ्त्वा दैत्य पुख यम् ॥ पुनय॑थू[गता भूतागतुमरहथ भूतये॥३३॥ ८
सनत्कुमार उवाच ॥ तच्छत्वा भगवद्वाक्यं ततो भूतगणा ते ॥ प्रणम्य देवदेवं तं ययुदैत्य॒पुर्रयम् ॥ ३७ ॥ गत्वा तत्प्र ||
विशंतश्च िपुराधिपतेजसि ॥ भस्मसादभवन्सद्यश्शलभा इव पावके ॥ ३५॥ अवशिष्टा येकेचित्पलायनपरायणाः॥ निस्घ
त्यारं समायाता दरेनिकटमाङ्कलाः॥ ३६ ॥ तान्दृष्टा स हरिः थत्वा तच वृत्तमशेषतः ॥ चितयामास भगवान्मनसा पुरषो
तमः॥ ३७॥ किं कृत्यमधुना कार्यमिति संतप्तमानसः ॥ संतप्तानमरान्सवानाज्ञाय च सवासवान् ॥ ३८ ॥ £
भूतगण देव देवको प्रणामकर जहां विपुर थे वहां गये ॥ ३४ ॥ जिस सषमय वे उसमे प्रवेश करने रगे तो वहु त्रिषुरकै तेजसे इसन भकार भस्म ट
होगये, जेते अभर शकम भस्म होजाते है ॥ ३५ ॥ जो शेष चे थे वे भी सव भाग गये, ओर वासे निकठकर बडी व्याकुकतासे हरक ५
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निकट आगये ॥ ३६ ॥ परुषोत्तम भगवानू हरिने उनको देखकर ओर सन वृत्तान्तं सुनकर मने विचार किया ॥ ३७ ॥ इस समय .क्या
करना चाहिये, रस्ता विचारकर सव इन्द्रादि देवताओंको सन्तप्त जानकर ॥ ३८ ॥
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तिचारनेकगे, कि किम॒भरकार उन देत्योकि तीनों एर नाश करके देवताओंका कार्यं कहं, जव चिन्तासे व्याकुक हुए तो यहभी सोचा किं ॥३ ्
धरमात्माओंका अभिचारसे भी नाश नहीं होता, इसमे संदेह नहीं, शरुतिके भचार भरमाणकरनेवारे विष्णजीने यह कहा ॥ ० ॥ वह तरिषरके
रहनेवारे सव देत्य बडे धमष है, हे देवताओ ! इतसीपभकारसे वह अवध्य है, इसमे अन्यथा नहीं है ॥४१॥ महत्पाप करे भी वह शंकरकी ¢
¶जा करते ई, इसे कह सब परातकोसे सक्तं है, जिस भक।र जठसे पञ्मपच पृथक् रहता है ॥४२॥ हेदेवताओ ! रुढके पुजन करनेसे सब कामना ५
पणं होती है ओर पृथिवीते बह अनेक भोग ओर् सम्पक्निको वशीभुत करते है ॥ ४३ ॥ इस्त कारण दिगार्चनपरायण होकर दैत्य आनंद भोगते है
कथं तेषां चदेत्यानां बलादवत्वा पुरयम् ॥ देवकार्यं करिष्यामीत्यासीचितासमाकुलः ॥ ३९ ॥ नाशोऽभिचारतो नास्तिधभं
छठानां न संशयः ॥ इति प्राह स्वयं चेशः अत्याचारपरमाणङ्कृत् ॥ ४० ॥ दैत्याश्च ते रि धर्भिष्ठास्सते िएुरवासिनः ॥ तस्मा
द्वध्यतां प्ता नान्यथासुरपगवाः ॥४१॥ कृत्वा तु खमहत्पापंरुदरमभ्यचंयंति ते ॥ शुच्यते पातकैः सर्वैः प्द्प्रमिवांभसा
॥ ४२ ॥ सदाभ्यचनतो देवाः सवं कामा भ्वति दि ॥ नानोषभोगसंपत्तिवैश्यतां याति वै भुवि ॥ ४३ ॥ तस्मात्तदधोगिनो
दया छिगाचन परायणाः ॥ अनेकेविधसंपततेरमोक्षस्थापि प्रपर च ॥४४॥ ततः कृत्वा धर्मविष्नं तेषामेवात्मभायया ॥ दैत्या
नदिवकायाथ रिष्ये जिपुर क्षणात् ॥४९॥ विचूरयेत्थं ततस्तेषां भगवान्पुर्षोत्तमः॥ कृष व्यवस्थितः पश्वाद्धम॑विष्नं सुरारि
णाम् ॥७६॥ यावच वेद घमास्त् यावद, शंकराच॑नम् ॥ यावच जुचिकृत्यादि तावत्नाशो भवेन्न हि ॥७७॥ तस्मादेवं प्रक्षय
वेद्धमस्ततो ब्रजेत् ॥ त्यक्त छिगाचना दैत्या भविष्यति न सशयः ॥ ४८ ॥
उनको अनेक प्रकारकी सम्पत्ति प्राप्त है, ओर अन्तमं मोक्षमी पर्वेगे ॥ ४४ ॥तोमीरैअ
पनी मायाक्षे उनमे वि उत्पन्न कर देवकार्यक्ती
सिद्िकै निमित क्षणमानम तरिषरका संहार करूगा ॥ ४५॥ इस धकारे विचार कर भगवान् उरुषोचतम उन शत्योके धमे विघर करनेके निभित्त
इच्छा करने ठगे ॥ ४६ ॥ जबतक वेदक धरम है! ओर जगते जबतक शंकरका पूजन् है, जवतकं उने पवित्र ङत्य है तवतक उनका नाश
न होगा ॥ ४७॥ इत कारण एता करना चाहिये जो उन्म वेदध जाता रहे, यह दैत्य िगाचेन त्याग दंगे, इसे सन्देह नही ३ ॥ ४८ ॥
१५९
ू इस भकारे विष्डजीने चार कर उन देतव धम॑मे विन्न करके चिवि शरुतिलेडनरप् उपाय सोया ॥ ४९ ॥ वब त्रिरोकीके रक्षणक
॥३९५॥ । निमित्त शिबजीकी ही आज्ञको भात होकर देवताओंकी सहायताके निमित सब देवताओं विष्णजीने कहा ॥ ५० ॥ विष्णजी नो, ह
¢ देवताओं ! तुम षब अपने घरोको जाओ, इसमें संदेह नहीं मँ यथामति देवताओंका काय क्गा ॥ ५१ ॥ म यत्न करकं उनको रुदत
विख अवश्यमेव कर दंगा, ओर अपनी भक्तिसे रहित जानकर शिवजी उनको अवश्य भस्म करेगे ॥ ५२ ॥ सनत्कुभारजी बोे हे यने !
वे देवता विष्णकी आज्ञाको शिरपर धारण करके कुछ निधिन्त हृषए, ओर बहे अलुमोदनसे भसन्न हो अपने अपने स्थानोको गये ॥५३॥
. इति निधित्य वै दिष्णविघ्राथमकरोत्तद् ॥ तेषां धमस्य दैत्यानाषुपायं अति खण्डनम् ॥४९॥ तदेवोवाच देवान्स विष्णुं
रिष्यति भस्मसात् ॥५२॥ ॥ सन्मार उवाच ॥ तदाज्ञां शिरसाधायश्वासिता स्तेऽमरा शुने ॥ स्वस्वधामानि विश्वस्ता
ययुशरह्नपिमोदिताः ॥ ५३ ॥ ततशवैवाकरोद्विषणुदेवा हितयुत्तमम् ॥ तदेव श्रयतां सम्यक्सरवैपापध्रणाशनम् ॥ ५8 ॥इति
श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्ढसंदितायां पञ्चमे थुद्धखण्डे बिषुरवधोपाख्याने भूतत्रिपुरधमेवणैनं नाम् तृतीयोऽध्यायः
॥ २ ॥ सनत्छुमार उपाच ॥ अघजन्च महातेजाः पुषं स्वात्मक्षभवम्॥ एकं मायामयं तेषां ध्मविघ्नार्थमच्छुतः ॥ १ ॥
युडिन स्लानवच्लं च युफिपा्रसमन्वितम् ॥ दधानं पुंजिकां स्ते चाटखयंतं पदेपदे ॥ २ ॥
तब विष्णभगवानूने देवता ओंका हित विचारा) वही सब पारपोके दूर करनेवाटी कथा विश्वासके साथ सुनो ॥ ५४ ॥ इति र
° प॑ यु° भाषादीकायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ सनत्कुमारजी बोरे, तब महातेजस्वी विष्यजीने एक महारुष उन दत्योके धमे विघ।|§ ||
| उपटथिति करनेकै निमित्त मायासे गट किया ॥ १ ॥ शिर शंडित ढिन वन्च पहरे थैफि ( काढ ) का पात्र हाथमे दयि) हाथमे एकं ६ |
बुहारी लिये, पद पद् पर उनको चटायमान करते ॥ २ ॥
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¢ दवाय करिष्यामि यथामति न संशयः ॥५१॥ तान्शदराद्वि्चलान्तूनं करिष्यामि यत्नतः ॥ स्वभक्तिरदिताञ्जञात्वा तान्क ४
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एक हाथ पन्न टये सभे वज्ञ ठट, ओर विकठ वाणी पम २ एेसा कहते हृए ॥ ३॥ वह खनि विष्णजीको भरणाकर उनक आगे स्थित
हुभा, ओर हाथ जोढकर हरिसे कहने ठग ॥ ४ ॥ हे हरिहन् ! अच्युत पूज्य यँ स्या कर सो आप् करिये है देव ! मेरे क्या २ नाम |
ओर मेरा स्थान मी आप किये ॥ ५ ॥ भगवान् विष्ण इतस भकारे उनके सुन्द्र वचन सुनकर भरनन्न मनसे इस प्रकारके वचन बोटे॥६॥
विष्णजी बोढे, मने जिस कारण तुमको निर्माण किया है, सो तुम सुनो, हे महाप्राज्ञ ! मेरे अंगे उत्पन्न होनेके कारण तुष मेरेही ख्प्रहो
इसमे सन्देह नहीं ॥ ७ ॥ भरे अगसे उतन्न होनेसे तुम भेरा कार्थ करनेको योग्य हो, तुम भेरेहो इस कारण सदा पूज्य होगे, इसमे
बल्यक्त तथा हस्तं क्षीयमाणं सुखे सदा ॥ धर्मेति व्यादरतं हि वाचा विष्ठवया पुनिम ॥३॥ स॒ नमर्छृत्य विष्णु तं तत्पुरस्सं
स्थिऽथ वै॥ उवाच वचनं तञ हरि सु प्रांजलिस्तदा ॥४॥ अरिद्नच्युतं पूज्यं कि करोमि तदादिश ॥ कानि नामानि मे देव
स्थानं नापि वद ममो ॥। ५ ॥ इत्येवं भगवान्वि्णः अत्मा तस्य छम वचः ॥ प्रसन्नानसो भृत्वा वचनं चेदमतरषीत् ॥६॥
॥ विष्॒रवाच ॥ यवृ निमितोऽसि त्व॑निषोध कथयामि ते ॥ मदंगज महापाज्ञ मद्रूपत्वं न संशयः ॥७॥ मर्मागाच्च समु `
तपन्नो मत्कार्यं कतुमहेसि ॥ मदीयस्त्वं सदा पूल्यो भविष्यति न संशयः ॥ ८ ॥ अरिदत्नाम ते स्याच्च ्न्यानि न श्चभानि
च ॥ स्थानं वक्ष्यामि ते पशचच्छरणु पस्तुतमादशत् ॥९॥ मायिन्मायामयं शाहं तत्षोडशसहसकम् ॥ शरौतस्मातविर्ढं च
वर्णाश्रम, विवजितम् ॥१०॥ अपभ्रंशमयं शाघ्ं कपैवादमय तथा ॥ रचयेति भयत्ेन तद्धिस्तारो भविष्यति ॥११॥ ददामि
तत निर्माणे सामथ्यं तद्भविष्यति ॥ माया च विविधा शीघं त्वदधीना भविष्यति ॥ १२ ॥
सन्देह नहीं ॥ < ॥ मुख्य तुम्हारा अरिहन् नाम होगा, ओर भी एन्द्र नाम होगे पीछे तुम्हारे स्थानोको भी
आदरते भरसतुत कायेको हनो ॥ ९ ॥ हे मायावी ! तुम एक शान्च सोह सहल श्टोकोे निर्माण करो
वणाश्मकै पर्त रहित . हो ॥ १० ॥ वह सव॒ शान्न आपर्मृश शब्दो [ धम्मलाभोडु ] से युक्त हो, केवट उसमे क्मवाद् हो उ्तकी तुम
भ्रयत्नसे रचना करो, आगे उसका विस्तार होगा ॥ ११ ॥ ओर उसके निर्माणे तै तुमको साम्यं देता
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कहूगा, अब तुम
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ह महाम
चः
शीष तुम्हारे आधीन हो जार्थेगी ॥ १२ ॥ इस प्रकार परमात्मा हरिके यहं वचन चुनकर भणाम् कर ह मायावी व न 1 |
॥ १२ ॥ संडी बोढा, है देव ! जो श्च कर्तठ्य हो, उसको शीघ्र किये, आपकी आश्ञासे शव कायं शीघ्र 1 १
सन्ृमारजी बोरे यह सुनकर भगवानूने उको मायामय शच्च पदाया, किं स्वग नरकं सव यही है, अन्यत्र उक भती ति नह
फिर विष्यनीने शिवजीके चरणकमछ्को स्मरण करके कहा इस तिके रहनेवाठे सबही दैत्यजनोको तुम अपनी मायासे मोहित कर
दो ॥ १६ ॥ तुम उन सबको दीक्षित करके हुम यत्ते यह शाज्च पाओ, हे महामते ! भेरी गाति त
तच्छत्वा वचनं तस्य हरेश्च परमात्मनः॥ नमस्कृत्य परत्युवाच स मायी तं जनाद॑नम् ॥ १ ३॥ सुण्डडवाच ॥ यत्कतन् मयाद्
दरतमादिश तत्प्रभो ॥ त्वदाज्ञयाखिलं कर्मं सफटञ्च भविष्यति ॥१५॥ सनत्कुमार् उवाच ॥ इत्युर्छा पाटयामास शाल्ल मायामय
तथा॥ इहेव स्वगीनरकभत्ययो नान्यथा पुनः ॥१५॥ त्ुवाच पुनरविंष्णुः स्मृत्वा शिव॒षदांहुजम्॥मोहनीया इमे देत्थाः स्व चिपु
रवासिनः ॥१६॥ कार्यस्ति दीक्षिता नूनं पाठनीयाः भरयत्नतः॥ मदाज्ञया न दोषस्ते भविष्यति महामते ॥ १७ ॥ धरमास्तज
भ्रकाशन्ते श्रौतस्मात्तां न संशयः ॥ अनया वि्यया सरवे स्फोटनीया धुवं यते ॥१८॥ गंतुमर्हसि नाशा ण्ड किषुरवासि
नाम् ॥ तमोधर्म संप्रकाश्य नाशयस्व पुरत्रयम् ॥१९॥ ततश्चैव पुनगैत्वा मकस्थल्यां त्वया विभो॥ स्थातव्यं च स्वधमण
किया वत्स मात्रजेत् ॥२०॥ प्रवृत्ते तु युगे तस्मिन्स्वीयो धमः प्रकाश्यताम् ।शिष्यैश्च प्रतिशिष्यैश्च वतनीयस्त्वया पुनः ।
॥ २१ ॥ मदाज्ञया भद्ध विस्तारं यास्यति धुवम् ॥ अद्नुज्ञापरो नित्य गति प्राप्स्यसि मामकीम् ॥ २२ ॥
॥ 3७ ॥ इसमे सन्देह नहीं, उनम शौतल्यां धर्मौका प्रकाश हो रहा है, हें यतिराज ! इस विद्यसे तुम उन सब धर्मोको उच्छिन्न कर
दो ॥१८॥हे खण्डी ! उन जरिषुरवाियोके नाशार्थं अब तुमं गमन करो, उनम तमो पणी धर्मका प्रकाश करके तरिषएराका नाश कर दो ॥१९॥
ते ! फिर वहांसे मरस्थलमे जाकर तुम कटियुगके आनेतक स्वधमं से निवास करना ॥ २० ॥ कियुगके-आनेप्र तुम अपने ध्म॑का
भकाश करना; ओर तुम अनेक शिष्य प्रशिष्योके साथ अपने पूर्मका प्रचार करो ॥ २१ ॥ मेरी आज्ञा तुम्हारे पर्मका विस्तार होगा; भेरी
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आज्ञाम तत्पर रहनेके कारण तुमको अवश्य भेरी गति मिेगी ॥ २२ ॥ इसन भकार देपदेव भहादेवकी आज्ञसे हदये भरित होकर हरि ४
उक्षे प्रतिं यह आदेश कर अन्तर्घन हो गये ॥ २३ ॥ तज खनिने हरिकी आज्ञापाठनके निमित्त अपनी शिष्यमंडरीकी कल्पना |
६ ओर उस चतुर पुरुषने उस मायामय शाद्चको यथायोग्य उन शि्योको पाया ॥ २४ ॥ जैसा वह पुरूष था, उषी प्रकार ष्ठ चार खण्डी
¢ भी उत्क शिष्य हए, ओर परमात्मा हरिका नमस्कार कर यहां स्थित हृए ॥ २५ ॥ भगवानूने भी शिवजीकी आज्ञा पानके निभित्त उन
¢ चार शिष्यो बढी भसन्नतासे कहा ॥ २६ ॥ भेरी आज्ञा तुम जेते तुम्हारे य रै वैसेही म होगे, ओर तुम॒धन्य हो इसमे सन्देह नही ए
¢| एषमाज्ञा तदा दतत विष्णुना प्रभविष्णना॥शासनदिवदेवस्य इदा त्व॑तदषे दरिः ॥२३॥ ततस्सघडीपरिषारुयन्दरेराज्ञां तथा ६
§ || निमिता शिष्यान् ॥ यथासखह्पं चतुरस्तदानीं मायामयशाघ्चमपाटयत्स्वयम् ॥२९॥ यथा स्वथ तथा ते च चत्वारो ६
| शडिनः भाः ॥ नमस्छ्ृत्य स्थितास्तजच हरये परमात्मने ॥२५॥ `इरिश्वापि शनेस्तञ चतुरस्तांस्तदां स्वयम् ॥ उवाच परमप्रीत (|
शिशवाज्ञापरिपालकः ॥२६॥ यथा गुरुस्तथा यूयं भविष्यथ मदाज्ञया ॥ धन्याःस्थ स॒द्रतिमिह संप्राप्स्यथ न संशयः॥२७॥ ठ
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चत्वारो सुंडिनस्तेऽथ धरम पाषंडभाश्रिताः ॥ इस्ते पात्रं दधानाश्च हडवश्स्य धारकाः ॥ २८॥ सछिनान्येव वासांसि
धारयतो द्यभाषिणः ॥ धर्मो लाभः परं तत्तवं वद॑तस्त्वतिहर्षतः ॥२९॥ माजेनीं भियमाणाश्च वल्लसंडधिनि्िताम् ॥ शनैः ¢
शनैश्चलन्तो हि जीवर्हिसाभयादरधुवम् ॥ ३० ॥ ते स्वँ च तदा देवं भगवंत शुदान्विताः ॥ नमस्कृत्य पुनस्त घुने तस्थु
स्तद््रतः ॥ ३१॥ हरिणा च तदा दृस्तेषृत्वा च शखेषिताः ॥ अभ्यधायि च सुप्रीत्या त्नामापि विशेषतः ॥ ३२ ॥
सदरतिको शाप्त होंगे ॥ २७ ॥ तव वे चारों खनि भी पाखण्ड धर्मम स्थित हुए, हाथमे पान्न छथि नासिका पर वश्च ख्पैटे ॥ २८ ॥ भीन
वज्ञ धारण किये, थोडा बोरनेवाढा धका छा ही परं तल है, इस भकार भसन्तासे कहते हुए ॥ २९ ॥ कटे वोत बनी बुहारी हाथमे
ल्य जीवहिसाकै भयसे सहज सहज पैर धरकर चछ्नेवाछे ॥ ३० ॥ तव वे सव भरसन्न हो देव भगवानूको भणाम कर उनके आगे स्थित
॥ हए ॥ ३१ ॥ तव भगवानूने उनका हाथ पकड उन्हं शुरुजीको अपण कर दिया, ओौर विशेषकर उनके ` नामकरणं पेमसे किये ॥ ३२ ॥
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शि०प० | | नेते दम हो वैतेही य ं सन्देह नहीं आदिहप तुम्हारा नाम है ओर पूज्य होनेसे तुम पूज्य भी कहाभोगे ॥ २३॥ ऋषि, ||
८ | | पति कीरः 1 ॥ ३४ ॥ ओर मेरा शुभ नाम भी तुम अरहण कर सकोगे अरिहन् इस प्पूनाशकं ट
नामको सदा ध्यान करना चाहिये ॥ ३५ ॥ तुमको भी ोकोंके सुखदायक कायंको करना चाहिये, ठोककै अलुसषार कायं करनेम उत्तम् ठ
ट| गति भप्त होगी ॥ ३६ ॥ सनत्कुमारजी बे तज वह मायावी शिष्यों्हित बड परमते भगवानूुको भरणाकर रिवकी इच्छा करनेके निमित ¢
ट| शीघरहौ निष गया ॥ ३७ ॥ विष्डकी पेरणाते वह वशी शीघ्री त्रिएरम पवेश करके महामायावी होने कारण उसने _ऋषिपले माया
४ यथात्वं च तथेवेते मदीया वै न संशयः ॥ आदिरूषे च तन्नाम पूज्यत्वात्पुज्य उच्यते ॥३३ ॥ऋषि्यतिस्तथा कृर्यडपाध्याय £
|| इति स्वयम् ॥ इमान्यपि त॒ नामानि प्रसिद्धानि भंत वः ॥ ३४॥ ममापि च भवद्भिश्च नाम ग्रां शुभं पुनः ॥ अरिहतिति ||
| तत्नामध्येयं पापप्रणाशनम् ॥२९॥ भवद्धिशैव कत्य कार्यं लोकसुखावदम् ॥रोकानुकरं चरतां भविष्यत्युत्तमागतिः ॥२६॥ ||
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| ॥ सनत्कुमार उवाच ॥ ततः णम्य तं मायी शिष्ययुतत्स्वयं तदा ॥ जगाम विषुरं सयः शिवच्छाकारिणं खुदा ॥३७॥ ||
मविश्यतत्पुरं तूर्णं विष्णना नोदितो वशी ॥ महामायाविना तेन ऋषिर्मायां तदकरोत् ॥३८॥ नगरोपवने कृत्वा शिष्यतः है
¢ स्थितितदा ॥ मायां प्रवतेयामास मायिनामपि मोदिनीम् ॥३९॥ शिवार्चनप्रभावेण तन्माया सहसा शुने॥ त्रिपुरे न चचार ४
नि्िणो तदा बतिः ॥ 8०.॥ अथ मिषं स सस्मार ताव च हदा वहु ॥ न्यसाहो विचेतस्को हदयेन विदूयता ||
¢ .॥ ४१ ॥ तत्स्मृतस्त्वरितं विष्णुस्सस्मार शंकरं इदि ॥ पराप्याज्ञां मनसा तस्य स्थृतवात्नारदं इतम् ॥ ॥ ४२ ॥ ४
फलाई ॥ ३८ ॥ नगरकै उपवनमे जाकर शिष्यो्हित स्थिति की, ओर भायावाछोको भी मोहित करनेवाठी अपनी माया कैडाईं ॥३९॥ ट
&|| हे खने ! शिवजीके अचेनकै भभावते सहसा वह माया शिषरमे न चर सकी, तव यति उ्याकुर हो गये ॥ ४० ॥ तब उत्साहके रहित हो &
|| जाने चित व्याकृढ होने हदय दुःलनेसे उतने विष्णको स्मरणकर, हदये बडी स्तुति की ॥ ४१ ॥ उसके स्मरण करनेते विष्णने इदयं &
-॥ शंकरको स्मरण किया, ओर उनकी आज्ञा भनमे भाप करके नारदजीको स्मरणं किया ॥ ४२॥ =
|
& || विष्के स्मरण भात्रसे नारदजी उस स्थाने उपस्थित हए, ओर प्रणाम कर हाथ जोड विष्जीकै आगे उपस्थित हए ॥ ४३ ॥ |
नोमिं भष विष्ण॒जीने नारदजीसे कहा, तुभ टोकके उपकारे निरत सदा देवां करते हो ॥ ४१ ॥ हे तात ! मै तुमसे शिवजीकी आज्ञासे
कहता ह, किं ठम शीघही निरे जाओ,वहां एक ऋषि शिष्योंसहित वहांके निवासि मोहित करने गवे है ॥ ४५॥ सनत्कुभारजी बोरे,
¢ भगवानूकै यह वचन सुनकर स॒निभेषठ नारदजी शीघतासे वहीं गये, जहां वह भायावियोे ब्रेष्ठ कृषि थे ॥ ४६ ॥ दस प्रकारसे भायापति भग ट
¢ वानूकी आज्ञा नारदजीभी उस रमे प्रवेश कर उस मायीसे दीक्षित हुए ॥ ४७ ॥ तब नारदजीने त्रिएरपतिके समीप जाकर क्षेमश्च करके
¢ स्मृतमात्रेण विष्णोश नारदस्सथुपस्थितः ॥ नत्वा स्तुत्वा पुरस्तस्य स्थितोभूत्सांजरिस्तदा॥४२॥अथ तं नारदं पाह विष्णुमं
तिमतां वरः ॥ छोकोपकारनिरतो देवकार्थकरस्सदा॥४४॥रिवाज्ञयोच्यते तात गच्छत्वं धिपुरं दतम् ॥ ऋषिस्तञ गतः शिष्ये
४ मोहाय तत्सुवासिनाम् ॥ ४५॥ ॥ सनत्कुमार उवाच ॥ इत्याकण्यं वचस्तस्य नारदो शुनिसत्तमः॥ गतस्तञ दतं यञ्च स ऋषि ४
¢ मायिनां वरः॥०६।नारदोऽपि तथा मायी नियोगान्मायिन प्रभोः॥ प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना संह दीक्षितः ॥ ७७ ॥ ततश्च
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नारदो गत्वा चिपराधीशसप्निधौ ॥ क्षमथशादिकं कृत्वा रज्ञे सर्व न्यमेदयत् ॥७८॥ नारद् उवाच ॥ कशित्समागतशाज् य
धमंपरायणः ॥ सर्वविदयाप्रकृष्टो हि वेदविद्यापरान्वितः ॥ ४९ ॥ दृष्ठा = धर्मा नैतेनसदशाः पुनः॥वयं पा
1 धर्म सनातनम् ॥ ५० ॥ तवेच्छा यदि वतत तदध दैत्यसत्तम ॥ तद्धभस्य महाराज गह्या दीक्षा त्वया पुनः ॥ ५१ ॥
सनत्कमार उवाच ॥ तदीयं स वचः श्रुत्वा महदर्थसुग्ितम् ॥ विस्मितो इदि दैत्येशो जगौ तत्न विमोहितः ॥ ५२ ॥
राजातसे यह सब वृत्तान्त निवेदन किया ॥ ४८ ॥ नारदजी बे, धर्मम प्रायण के यति आपके नगरमे आया ह, बह सब पिद मय |
तथा परावद वरयाम तत्र है ॥ ४९ ॥ हमने बहुत धमे देखे परन्तु इतके स्मान धर्म नहीं देखा है, हम इसके सनातन धर्मक देखकर इस
दीक्षित हए ह ॥ ५० ॥ हे दत्यसत्तम् ! यदि उक र्मम तुम्हारी इच्छा हो तो हे महाराज ! आप भी उसके धमकी दीक्षा अ्रहण करो
॥ ५१ ॥ सनत्कुमार बोले, वह देत्यपति नारदजीके महाच् असे गित वचन सुनकर बडा विमित हुआ, ओर भोहित होकर वहां गया॥५२॥ र
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जब किं नारदजीने दीक्षा टी है तन हमभ वहां जारयगे एसा विचारकर त्रिएराधीश स्वयं ही वहां गया ॥५३ ॥ उन महात्माको देखकर उनकी माया
मोहित होकर उन महात्मा नमस्कार कर कहा॥५४॥ तिषएराधिपने कहा, हे निमंङ आशयवाटठे कृषि आप खक्ञे दीक्षा दीजिये, मे आपका शिष्य
हंग, यह बात सत्य है इसमे संदेह नहीं है ॥*५५॥ दैत्यराजके इस भकार वचन सुनकर वहसनातन ऋषि बोटे॥५६॥ हेदेत्यसत्तम ! यदि तुम मेरी
शिर |
6 आज्ञाका स्व॑था प्रमाण करोगे तो मँ तुमको दीक्षा दूंगा, अन्यथा कोटियत्नके भी दीक्षा नहीं होस्तकती ॥*५७॥ यह वचन सुनकर् राजा तौ मायामय
॥३९८॥
नारदो दीक्षितो यस्माद्वयं दीक्षामवाप्लुमः ॥ इत्येव च विदित्वा वै जगाम स्वयमेव इ ॥ ५३ ॥ तदरूपं च तदा दष्टा मोहितो
मायया तथा ॥ उवाच वचनं तस्म नमस्कृत्य महात्मने ॥ ५४ ॥ त्िपुराधिप उवाच ॥ दीक्षा देया त्वया मह्यं निमैलाशय
भो ऋषे ॥ अहं शिष्यो मतिष्यामि सत्यं सत्यं न संशयः ॥ 4९ ॥ इत्येवं तु वचः रत्वा दैत्यराजस्य निमंलम् ॥ प्रत्यु
| वाच सुयत्नेन छषिस्स च सनातनः ॥ ५६ ॥ मदीया करणी या स्या्वाज्ञा दैत्यसत्तम ॥ तदा देया मया दीक्षा नान्यथा
कोटियत्नतः ॥ ५७ ॥ इत्येवं तु वचः त्वा राजा मायामयोऽमवत् ॥ उवाच वचनं शीं यतिं तं हि कृतांजछिः ॥ ५८॥
¢ देत्य उवाच ॥ यथाज्ञां दास्यसि त्वं च तत्तथैव न चान्यथा ॥ त्वदाज्ञा नोटवयिष्ये सत्यं सत्यं न संशयः ॥५९॥ सनत्कु
र ॥ मार उवाच ॥ इत्या कण्यं वचस्तस्य तिपुराधीशितुस्तदा ॥ दूरीकृत्य शुखाद्रल्च्चुवाच ऋषिसत्तमः ॥ ६० ॥ दीक्षां गृहीष्व
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९०६.२ || +| दैत्येन सर्वधमोत्तमोत्तमाम् ॥ ददौ दीक्षाविधानेन प्राप्स्यसि त्वं कृतार्थताम् ॥ ६१ ॥ ्
यु.सं.५ ४
म होगया; हाथ जोडकर् शीधतासे उन यतिराज कहने ठगा ॥५८॥ दैत्यराज बोढा हे भगवन् ! तत्वविचारकै साथ आप जो आज्ञा दैगे,उक्त आज्ञाको
मँ कभी उषटंवन नहीं कहंगाः यह बात सत्य है इसमे संदेह नहीं ॥५९॥ सनत्कुमार बोरे; इस भकारसे उस त्रिषराधीश्वरके वचन सुनकर सुखे
`“ वल दूएकर वहं ऋषि शष्ठ कहने ठगे ॥ ६० ॥ हे दैत्येन ! सव धर्मम प्रम उत्तम॒दीक्षाको आप रहण करे, जिस दीक्षाके विधाने
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८ ८.
सनत्कुमार उवाच ॥ इत्युक्ता स तु मायावी दैत्यराजाय सत्वरम्॥ददौ दीक्षां स्वधमोक्तांतस्मे विधिविधानतः॥६२॥ दैत्यराज
दीक्षिते च तस्मिन्ससहजे घुने ॥ स्वे च दीक्षिता जातास्त बिपुरवासिनः ॥६३॥ घुनेः शिष्यः प्रशिष्येश्चग्यात्तमासीहते तदा
महामायातरिनस्ततु तरिपुरं सकलं सुने॥६९॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शद्रसहितायां पश्चमे युद्वलण्डे सनत्मारपाराश्ं
संवादे धिपुरदीक्षाविधानं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥७॥ग्यास उवाच ॥ दैत्यराजे दीक्षिते च मायिना तेन मोहिते ॥ किष्ुवाचतदा
मायी किं चकार स दत्यपः॥१ ॥ सनत्कुमार उवाच ॥ दीक्षां दत्वा यतिस्तस्मा अरिहत्नारदादिभिः॥ शिष्येस्सेवितषादान्नोदैत्य
राजानमन्रवीत्॥ २॥ अरिदन्डवाच॥ श्ण दैत्यपते वाक्य मम सज्ज्ञानगभितम् ॥ वेदान्तसारसर्वस्वं रहस्यं परमोत्तमम् ॥२॥
अनादिसिद्धस्ससारः कतृकम विवजितः॥ स्वयं प्रादु भवत्येवस्वयमेव विरीयते॥४॥ बह्मादिस्तंबपर्यन्तंयावदेदनिवंधनम्॥ आत्येव
कश्वरस्तवनद्वितीयस्तदीरिता॥५॥यद्रघ्विष्णुरुद्ाख्यास्तदाख्यादेहिनामिमाः॥ आख्यायथास्मदादीनामरिदतनादिङ्च्यते॥ ६॥
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ओर देत्यराजने क्या किया ॥ १॥ सनत्कुमार नोटे, दस प्रकारसे जव राजादीक्षित होगया ओर नारदको आदिर उनके शिष्यगण सुनिराजकै चरणकमठ
तवन करने गे, तब अरिहनुन देत्यराजपे कहा! २॥ अरिहन् बोेहेदेत्यराज! हमारे ज्ञानस्पचन वचनोंको तुम सुनो जो वेदा
|| मोम रहस्य है॥ ३॥ यह संसार अनादिकाठ्े चटा आता है कती ओौर कर्मभे यह रहित है यह आपही प्रगर होकर
॥ है॥४॥ बहयाजीसे टेकर स्तम्बपर्यन्त यह जितना देहका बंधन है, आत्मा ही एक दैश्वर है इत को
न्तस्षारका सवेस्व ओौर प्र
् तुम कताथ हो जाओगे ॥ ६१ ॥ सनत्कुमारजी बोरे, उस्त मायावीने इ प्रकार कहकर विधिविधानमे अपने धर्मके अनुसार उस राजाको दीक्षा
|| दी ॥६२॥ हे छने ! जिस समय सहजे देत्यराजको दीक्षा प्राप्त होगई तब सब ॒जिषुरवासी भी उसी धर्मभे दीक्षित होगये ॥६३॥ हे यने !
उस समय वहं त्रिपुर उस्न महामायावीके शिष्यो प्रशिष्योते क्षणमात्रमे भर गया॥६४।इति शीशिवमहापएराणे द्वि° रु° पं° यु ° भाषारीकायां चतु
थोध्यायः ॥४॥ उ्यासजी बोठे जिस प्रमय उत्त मायावीपरुषने दैत्यराजको दीक्षा देदी, दैत्यराज मोहित होगया, तब उस मायावी परुषने कया कहा
ओर आपहौ छीन होजाता ||£
दूसरा समथ नहीं है ॥५॥ ओर जो यह बह्मा |
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विष्ण ओर रुद नाम ह यह देहधारिोके नाम ह जैसे हमारे नाम है, आनादि तो एक अरिहन् कहाते है, ॥ ६ । । जते हम सरीखोके देह
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समयपर छीन हो जाते ह पते ही ब्हमसे छेकर मशक पर्यन्त सव्र अपना समय आनेपर विरीन हौ जाते है ।। ७ ॥ यदि इस दहका
विचार किया जाय तो कहीं भी कठ अधिक नहीं है, आहार मैथुन निद्रा यह सर्वत्र स्मान है, ॥८॥ सबही देहधारी निराहार परिमाणको
भाप होकर समानही तृषिको भाष होते है, इसमे कुठ न्यूनाधिक नहीं है ॥। ९ ॥ जसे हम प्यास होकर जठ पीकर प्रसन्न होते है, वैसे
ही दर्रे प्यास होते ई, इसमे थोडा विशेष भी अन्तर नहीं है ॥ १० ।! रप यौवनतम्पन्न चाहे सहतं ्ञी क्यों न हो परन्तु रतिकै समय
देहो यथास्मदादीना स्वकालेन विलीयते ॥ बन्नादि मशकांतानां स्वकालाह्ीयते तथा ॥ ७॥ विचार्यमाणे देहेऽस्मिन्न किंचि
दधिकं क्वचित् ॥ आहारो मैथुनं निद्रा मयं सर्व॑ यत्समम् ॥ ८॥ निराहारपरीमाणं प्राप्य सर्वो हि देहभृत् ॥ सदशीमेव
सृतिं ्ाप्ठयात्नाधिकेतराम् ॥९॥ यथा वितषिताः स्याम पीत्वा वेयं शरदा वयम् ॥ तषितास्तु तथान्येपि न विशेषोऽल्प
कोधिकः ॥ १० ॥ संतु नायः सहस्राणि हषलावण्य्रमयः ॥ प्रं निधुवने काले द्यकेवेहोषयुञ्यते ॥ ११ ॥ अश्वाः प्रश्श
तास्सं (१ ॥ अधिरोह तथाप्येको न द्वितीयस्तथात्मनः ॥ १२ ॥ पथैकशायिनां स्वपि सुखं यदुपजायते॥
तदेवसौख्वंनिद्रामिभ्॑तशशायिनामपि॥ १३ ॥ यथेव मरणाद्भीतिरस्मदादिवपएष्मतामू ॥ ब्रहमादिकीरटकातानां तथा मरणतो
भयम्॥ १8 ॥ सवं तनुभतस्तुल्या यदि बुद्धया विचार्यते ॥ इदं नित्य केनापि नो रिस्यः कोऽपि कुचित्॥ १५ ॥ धमं
जीवदयातुल्यो न कापि जगतीतरे ॥ तस्मात्सर्वभयत्नेन कार्यां जीवदयातृभिः ॥ १६ ॥
| भोगी जाती ह ॥ ११ ॥ चाहे घोडे भी असरूय शको हो, प्र अधिरोहणमे एक ही होता है इस धकार एक ही आत्मा
॥ १२ ॥ पठगपर सौनेवाछोको परंगपर सोने जो हुल होता है, बोही हुल प्रथिवीपर सोनिवारोको भी धराप् होता है ॥ १२ ॥ जेते हम
1 1 ह, नासे छेकृर कीट पर्न्तको भी मरणे वैताही भय है ॥ १४ ॥ यदि बुद्िसे विचार किया जाय तो सव
रकर कभी कितीकौ कितसीको हित्ञा न करनी चाहिये ॥१५॥ जीवोपर दया कटनेके स्मान पृथिवीम कोई धर्म
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नही है, इस कारण सब प्रयत्नोते अदुष्योको जीवोपर दथा करनी चाहिये ॥ १६ ॥ एक जीवकी भी रक्षा करनेसे भानोँ त्रिरोकीकी रक्षा
होती है, एकके मारनेसे घातका दोष ठगता हे, इससे रक्षा करं मारं नहीं ॥ १७ ॥ अर्हिस्ा ही परम धर्म है ओौर आत्माको पीडा देना परष
पाप है, पराये आधीन न होना ही शक्ति है, अभिरषित भोजनकी प्रापि ही स्वर्गं है ॥ १८ ॥ सत॒की ्रमाणतासे पराने विद्वानोने रेका कहा
हे, इस॒ कारण नरके इरनेवारछोको कभी हिंसा न करनी चाहिये ॥ १९ ॥ चराचर तिटोकी्म हिंसाके समान दूसरा दान कोई नहीं
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६ ओर अर्हिस॒क स्वगको जाता हे ॥ २० ॥ दान बहत है एरन्तु उन तुच्छ फट्वालोसि क्या हे, अभयदानकै समान दूसरा दान कोहं नहीं
| एकस्मिव्रक्षिते जीवं जेरोक्ये रक्षित भवेत् ॥ घातिते घातितं तद्रत्तस्माद्रकषत्रघातयेत्॥१७॥ असा परमो धर्मःपाषमात्मप्रपी
|| डनम् ॥ अपराधीनता शुक्तिसस्वर्गोऽभिलषिताशनम् ॥१८॥ पू (विमित सत्प्रमाणतया वस् ॥ तस्मान्न हिंसा कततम्यो
४ नरेनैरकभीरुभिः ॥ १९ ॥ न हिसासदृशंपापं चैरोक्ये सचराचरे ॥ रिसको नरकं गच्छेरस्वगे गच्छेद्िसकः ॥ २० ॥ संति
दान् न्यनेकानि फ तेस्तुच्छफलप्रदेः ॥ अभीतिसदशं दानं प्रमेकमपीह न ॥ २१ ॥ इह चत्वारि दानानि पोक्तानि परम
पिभिः ॥ विचायं नानाशाल्ञाणि शर्मणेऽत्र परतर च ॥ २२ ॥ भीतेभ्यश्चाभयं देयं व्याधितेभ्यस्तथोषधम् ॥ देया विद्यार्थं
८॥ राध त्रे ॥ २३॥ यानि. यानीड दानानि बहुषुन्युदितानि च ॥ जीवाभयथदानस्य कलां नाति षोडशीष्
॥ २७ ॥ अविचित्य प्रभावं दिमणिरमत्रौष्ं बरम् ॥ तद्भ्यस्यं प्रयत्नेन नामाथोषाजंनाय तै ॥ २९ ॥ अथादपाज्यं बहशो
ठ 1 1 ६ (1 श ॥ ९ 1 ^
म चार प्रकारके दान बह अनेकं शा छर दोनों लोकमे कल्याणके देनेवाे.
डरे हुओंको अभयदान, रोगीको ओषधि, विया्थीको विशा ओौर भूखेको अन्न देना चाहिये ॥ २३ ॥ जो र 0 गतौ
६ युनि्ोने कहे है बे जीवको अभयदानकी सोरुहवीं कलके सयान भी नहीं है ॥ २४ ॥ भणि मन्त्र ओषधिके प्रभावको 4
‰४॥ बिना विचारे नाम ओर अर्थके उपाजैनके स्यि उसको प्रयतते अश्वास करे ॥ २५ ॥ बहुता घन उपाजन कर सब ओरके बारह स्थान
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पूजने चाहिये ओर
| प्राणियोंको स्वगे र॒ दूसरे पुजनोषि
| विहं नरक यही है भौ क्या है ॥ २६ ॥
नहो जाय, तक र कहीं २६ ॥ पाच कर्मेन्द्रि
¢ नकान , ततव चिन्तकोने हीं नहीं, सुखक {च कर्मेन्द्रिय पां नेनि ।
हि श हो जाय तत्वका बि इसीका नाम 1 ही नाम स्वग ओ पांच ज्ञानेन्द्रिय मन ओर
‰ ॥ 1 न करनी चाहिये, कि चार करनेवालोनि परम मोक्च कहा है र दुःखका नाम नर् ओर बुद्धि यही । |
छ लकनमााः (१ टल राशि नाम मोक्ष को ह ॥ जिस ध. ४ २८ ॥ व है ॥ २७ ॥ ध
। न्यतः कचित् ॥ सुसं बद्धीद्विया हो ॥ ३१ ॥ ॥ ३० ॥ वेदवादं कै सहित सव च ¢
| | र | नि सवो र पशु ५ व उव् कि हो ज्व श
@ मीयमिति प्रामाणिकी त ॥ २९॥ तनो नरकमेव हि॥ श भम् ॥ वह भ्रमी बात है म किंस प्राणिकी ट
१ रषिरकद या भामिका यं प्रोच्यते वे सविते ऊशससुच्छे ८॥ सुखेषु भुज्य २७ ॥ इदेव स ह अरतोका कथन ट
कर्दमम् ॥ दग्ध्वा त ॥ न दवादिभिः॥ न ह दे सति मम ॥ मानेषु यत्स्थाहेहवि स्वगैनरकौ प्राणिनां ट
हौ तिखाज्यादि न ्ञातृणां ५ ९ क्षो विङ्ञमरः ॥ व
स्पर्गोऽभिलष्यते 11 ॥ 6 भरवर्तिका ॥ १ ट
। इत्येवं स्वमतं ९ ष अशिष्ठ
बति
ति
रुन्ते.प ट यित्वाखिलान् पौ
४ परास्ततः राठुवाच
यु.त.५ ¢ है तः ॥ ३९ । > पुनरादरा
, बह ज्ञानीपुरुषोको ,॥ आनंद ९८ ४ ॥
८ | व > ५ प शत (1 य ६
॥ सिददानत ४ स्वगकी की नहीं है ॥ ॥ ॥ तत्तथेवेह व ॥ बौद्धा ट
कर सव ऽर ना बडी वि ॥ वृक्षोको व्यं मिथ्या गमवि
वासि विरि कोको केदनकर् प्शुओंको नानात्वकं निर्दिष्टान्पर्मान्वे ठ
श लीक कि है ॥ २३ ॥ ॥ ५ १ ॥ दे& ॥ ५ ९
र आदरसे कहा ^ उत्त अशुर अ १ 6 ४
॥ प्रत्यक्च अ ६ कंक निमि ठ
मेही वि त्त यतिराजने ठ
श्वास होना जन जप्ना ट
एक |©
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पैाही भाननाचाहिये नानोत्वकल्पना मिथ्या है ॥। ३६ ॥ जबतकं यह शरीर स्वस्थ है जबतक इन्द्रिय निर्बर नहीं है, जबतक वृद्धावस्था दूर है ४
तबतक सुखका साधन करे. ॥।३७॥ जिस समय इन्दि अस्वस्थ होकर प्यक हू ओर बुढापा आगथा फिर सुखकी प्राति कहां हो सकती ट
› इससे सुखकी इच्छावा्खोको तो अर्थीकै निमित्त अपना शरीर भी देदेना चाहिये ।॥३८॥ याचना करते हृएको देदेकर जिसका मन उसकी
पीडते दुखी नहीं होता, उसीकै बोक्षसे पृथिवी दवती है ब्रक्ष पर्वत ओर सजुद्रका उसको भार नहीं है ।। १९॥ यह देह शीघही जानेवाराहै, ह
सचय क्षय होने वाछे है, ज्ञानी एसा जानकर अपने देहका सुख साधे ॥ ४० ॥ यह शरीर कृत्ते कौए कीरोका प्रभात समयका भोजन होगा. ‡
यावृत्स्वस्थमिदं वष्मं यावत्रन्द्रियविड्वः ॥ यावृनरा च ॒दरेऽस्ति तावत्सौख्यं प्रसाधयेत् ॥३७॥ अस्वार्थ्येन्दियवैकल्ये
भूर्भार वत्येषा समुदरागदमेनं हि ॥ ३९ ॥ सत्वरं गत्वरो देहः संचयास्सपरिक्षयाः ॥ इति विज्ञाय विज्ञाता देहसौख्यं प्रसा
धयेत्॥ 8० ॥ श्ववाय सङृमीणां च प्रात्भोज्यमिदे वपुः ॥ मस्मातं तच्छरीरं च वेदे सत्यं पपठयते ॥७१॥ मुधा जाति
विकपोयं लोकेष परिकरप्यते ॥ मानुष्ये सति सामान्ये कोऽधभैः कोऽथ चोत्तमः ॥ ४२ ॥ बरहमादिसृषटिरेषेति भौच्यते वृद्ध
परुषैः ॥ तस्य जातौ सुतौ दक्षमरीची चेति वितो ॥ ४३ ॥ मारीचेन कश्यपेन दक्षकन्यारमुरोचनाः ॥ धर्येण किल ¢
मागेण परिणीता्लयोदश ॥ ७४ ॥ अपीदानींतनेमंत्यैरर्पबुद्धिपराकरमेः ॥ अपि गभ्यस्त्वगभ्योऽयं विचारः कियते खुधा
॥ < ॥मुखबाद्ुर्सज्ञातं चातुर्वण्यं सहोदितम् ॥ कल्पनेये कृता पूर्वन घटेत विचारतः ॥ ७६ ॥ |
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वाद्धके तु कतस्स॒खम्॥ शरीरमपि दातग्यमर्थभ्योऽतस्सुलेप्स॒मिः ॥३८॥ याचमानमनोव्रत्तिप्रीणने यस्य नो जनिः ॥ तेन \
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वदभ ठीक पढ जाता है, किं शरीर अन्मे भस्म होने वाढा है ॥ ४१ ॥ छोकोमे यह जातिकी कल्पना व्यर्थं है, सामान्यरूपसे सव मलुष्योभे |©,
कोन अधम ओर कोन उत्तम है ॥४२॥ वृद्धषरुष कहते है बहयसे आदि ठेकर यह शष्ट है, उनके दश ओर मरीची त जन्भे ॥४३॥ मरीचिके
पत्र कश्यपने दक्षकी सुलोचनी तेरह कन्या पर्भमारगते विवाही ॥४४॥ इस समय अल्प बुद्धि ओर प्राक्रमवाछे लुष्य यह गम्या यह अगम्या है
एता व्यथं विचार करते ह ॥ ४५॥ प्रजापतिके
छल बाहू जंघा चरणे चार वणे उच्च हए है, यहं पु्ैषरुषोकी कल्पना है विचारसे क्षंगडित
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नहीं होती ॥४६॥ यदि कोर एकह ऽरपके शरीरे उतपन हभ हो तो उत्के चारो ऽ भिन्न बणंवाटे कैत होरकते है।४७॥ इ श
यह वरणे अवर्णा विभाग भटी प्रकारका विदित नहीं होता, इससे मदष्यको कभी किसी कारका भेद नही मानना चाहिये ॥ ४८ ॥ सनतकुमारस्जी
बोठे हे सुते 1 इस परकारसे वह यति परवासती ओर राजासे इस भ्रकार भाषण करके शिष्यो सहित वेदमागेको नष्ट करता हुआ ॥ ४९ ॥
परम पतिवत श्ीधरमको भी उसने खंडन किया इती भकार परुषोका जितेन्द्ियत्व धमे भी उन्होने सेडन किया ॥ ५० ॥ विशेष करक
एकस्यां च तनौ जाता एकस्माद्यदि वा कचित् ॥ चत्वारस्तनयास्तर्कि भिन्रवणंत्वमाप्वुयुः ॥ ९७ ॥ वणावर्णविभागोऽयं
तस्मान्न प्रतिभासते ॥ अतो मेदो न मंतभ्यो माबुष्ये केनचित्क्वचित् ॥ ४८ ॥ सनत्कुमार उवाच ॥ इत्थमाभाष्य देत्येशं
पौरांश्च स यतिषने ॥ सशिष्यो वेदधर्माश्च नाशयामास चादरात् ॥४९॥ श्लीधर्म खंडयामास पातित्रत्यपरं मदत् ॥ जिते
न्द्ियत्वं सर्वेषां पुरषाणां तथेव सः ॥ ५० ॥ देवधर्मान्विशेषेण श्राद्धधर्मास्तिथेव च ॥ मखधर्मान््तादी्च तीर्थश्राद्धं विशे
षतः ॥ 4१ ॥ शिवपरा विशेषेण छिगाराधनपू्विकाम्॥ विष्णुसूर्यगणेशादि पूजनं विधिपूर्वकम् ॥ ५२ ॥ स्ञानदानादिकंसर्व
प्वकाटं विशेषतः ॥ खंडयामासं स यतिर्मायी मायाविनां वरः ॥ 4३ ॥ फं बहूक्तेन विपरनद्र धिपुरे तेन मायिना ॥ वेदध
मांश ये केचित्ते सवे दूरतः कृताः ॥48॥ पतिधर्माश्रयाः सवां मोहिताश्च पुरांगनाः ॥ मरत॑शुश्रषणवतीं विजहुम॑तिखत्तमाम्
॥ ९&& ॥ अभ्यस्याकषेणीं विद्यां वशीकृत्यमयीमपि ॥ ए्षास्सफलीचजः परदारेषु मोहिताः ॥ «६ ॥
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व देवताओके धर्मशाश्के धमयजञ ध्मवत तीथं श्राद्ध इन सवका संडन किया ॥ ५१ ॥ विशेषकर छिगाराधनपूर्वक शिवकी पूजाका संडन किया,
५ ५ िभिपूक विष्ण सूय गणेशादिका पूजन ॥५२॥ सब ज्ञान दानादि विशेषकर पर्वकाठ, उत मायावी यतिने इन सबका संन किया ॥५३॥ हे
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वि ! बहुत कहनेते क्या ह उस त्रिषुरने यतिराजके कथने अपने यहासे सव वेदधर्म दूर कर दिये ॥ ५४ ॥ यति धर्मक आश्रय होकर
|| वहांकी हव लिये मोहित होगई, ओर पतिशुश्रषाी मति उन्होने त्याग दौ ॥ ५५ ॥ वशीकरण करनेवाटी कर्षणी वियाका अभ्यास करके
परुष परदाराओंभं मोहित हो अपना मनोरथ सफठ करते दए ॥ ५६ ॥ अतःएरकी लियं राजकुमार, एरवासी परकी श्ये उनसे सबही मोहित
होगये ॥ ५७ ॥ इस प्रकारसे निष्के रहनेवाठे सबही जब अपने धर्मे पराङ्मुख होगये ओर अधर्मं केठने रगा ॥ ५८ ॥ उसी समय देव
देव भगवान् विष्णकी आज्ञासे जब सव मायाप्े मोहित होगये, तब उनकी आज्ञासे अलक्ष्मी तरिषरके स्थानम गई ॥५९॥ जो रक्ष्मी उन्होने
बडी तपस्या परम आद्रे देवेश्वरसे ग्रहण की थी, वह लक्ष्मी प्रमु बह्ाजीकी आज्ञासे उनको त्याग कर चटी गई ॥६०॥ ओौर विष्णजीके
अत्ःपुरचरा नार्यस्तथा राजङुमारकाः ॥ पौराः पुरांगनाश्वापि संव तैश्च विमोहिताः ॥ ५७॥ एवं पौरेषु सवेष निजधमेष
सर्वथा॥ पराङ्खखेषु जतेषु प्रोटखास वृषेतरः ॥५८॥ माया च देवदेवस्य विष्णोस्तस्याज्ञया प्रभो ॥ अलक्ष्मीश्च स्वय तस्य
नियोगाश्रिपुरं गता ॥५९॥ य] लक्ष्मीस्तपसा तेषां लब्धा देवेश्वरादरात् ॥ बदिगता परित्यज्य नियोगाद्रह्मणः प्रभोः ॥६०॥
इद्धिमोद तथाभूतं विष्णोर्मायातिनिमिंतम् ॥ तेषां दत्त्वा क्षणादेव कृतार्थोऽभूत्स नारदः ॥ ६१ ॥ नारदोपि तथाहपोयथा
मायी तथेव सः ॥ तथापि विकृतो नाभूत्परमेशावनुयहात ॥६२॥ आसीत्छैटितसाम्यो दैत्यराजोऽपि भो घुने ॥ भाभ्यां
सहितस्तत्र मयेन च शिवेच्छया ॥ ६३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां शुढरसंदितायां प॑चमे युद्धं त्रिषुरमोहनं नाम
पश्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ व्यास उवाच ॥ तस्मिन् दैत्याधिपे पोरे सभ्रातरि विमोहिते ॥ सनत्मार किं वासीत्तदाचक्ष्वाखिलं
विभो ॥१॥ ॥सनत्कमार् उवाच।तरिषुरे च तथाभूते दैत्ये व्यक्तशिवाचने॥ श्लीध् निखिले नष्टे दुराचारे व्यवस्थिते ॥ २॥
निमौण किये उस्न बुद्धि मोहको इस प्रकार क्षणमाजमे देकर नारदजी कताथ होगये ॥ ६१॥ नारदजीने भी उस मायावी ससा खूप धारण कर
ठ्या था, तो भी परमे्ररक अयुगे उनके मनम विकार नहीं आया ॥ ६२ ॥ हे खन ! उप्त समय दैत्यराजकी सामथ्यं कुठित होगई ओौर
शिवजीकी इच्छसे मयनामक अपने मकै सहित स्ामरधयहीन होगया ॥ ६३ ॥ इति शरौशिवमहाषराणे द्वि ₹ु० पर यु° भाषारीकायां
पंचमोऽध्यायः ॥ "4 ॥ व्यापतजी बोठे जब एरवाियोसिहित दैत्यराज मोहित होगया, है सनक्कुभारजी ! तब क्या हुआ सो आप् सब चस्ति
किये ॥ १ ॥ सनत्कुमारजी बोटे जव इस भकारसे कहनेपर दैत्यराजने शिवाैन त्वागदिया, सम्पूणं ब्लीधभं नष्ट होगया तथा दुराचार प्रवृत्त
^
| होगया ॥ २ ॥ तब भगवान् विष्ट कता्के समान होकर यह बात निषेदन करनेको कैठासको गये ॥ ३ ॥ रमापति, देवताओं (५
समीप स्थित हए, उसती समय समाधि स्थित बह्माजीने यह बात जानली ॥ ४ ॥ वह सर्ज्ञ॒ हरि ब्रह्माजीको मनसे आह्वान करने कगे
उक्ती समय ब्रह्माजी आये ओर इष्ट वाणीके परुषोत्तम शंकरकी स्तुति करने ठगे ॥ ५ ॥ विष्णुजी बोढठे, महेश्वर देव परमात्माको नमस्कार
है, नारायण, रुदर, बह्मा, ब्रहमरूपको नमस्कार है ॥६॥ इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति कर तथा कर दंडवत्मणाम कर दक्षिणमूर्तिसे भ्रगर रुद्रका
¢ कृतार्थं इव लक्ष्ीशो देवैससादैख॒मापतिम् ॥ निवेदितं तरि केटासमगमद्धरिः॥२॥ तस्योपकंः स्थित्वाऽसौ देवस्सह रमाप ||
¢ तिः॥ ततो शरारे स च ब्रह्मा परमेण समाधिना॥४॥ मनस् पराप्य सर्वज्ञं बरह्मणा स इरिस्तव्॥ तष्टाव वाग्भिरिष्टाभिरश्शंकरं पुरु ठ
; पोत्तमः ॥ ९ ॥ ॥ विष्णुरुषाच॥ महेश्वराय देवाय नमस्ते परमात्मने॥ नारायणाय शदराय ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे ॥६॥ एवं त्वा
¢| प्रणिपत्य ह॥ जजाप शुदर्मजं च दक्षिणामूतिंसं भवम् ॥७॥ जले स्थित्वा सार्धकोरिग्रमितं तन्मनाः प्रथुः॥ संस्म ६
रन् मनसा शं स्वभयं परमेश्वरम् ॥८॥ तावहेवास्तदा सर्वे तन्मनस्का महेश्वरम् ॥९॥ देवा उचुः ॥ नमस्सर्वात्मने तुभ्यं ६
| शकरायाति हारिणे ॥ इद्राय नीलकंठाय चिद्रूपाय प्रवेतसे॥१०॥ गतिनैस्सर्वदा त्वं हि सवापद्विनिवारकः ॥ त्वमेव स्वदास्मा |©
¢ मिवधो देवारिसूदन ॥११॥ त्वमादिस्त्वमनादि शच स्वानद्श्वाक्षयः प्रथुः ॥ प्रकृतेः पुरूषस्यापि साक्षात्सष्टा जगत्प्रभुः ॥१२॥
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गे ॥ < ॥. उसी समय सब देवता भी मन ठगाकर परभेश्वरका जप करने लगे ॥ ९ ॥ देवता बोरे, स्वात्मा शकर दुःखके हरनेवाछे
अ०६ आपको भणाम है, रुद नीककंठ बिषू भचेतारूप आपको प्रणाम है ॥ १० ॥ स्व आपक्तिके दूर करनेवाठे आप हमारी सबकी गति हो, है
¢ देव ! अरिखूदन ! आप सदा हम सवके नमर्छत हो ॥ ११ ॥ तुम आदि अनादि आनंद ओर अक्षयषूप प्रमु हो, आप जगत्कै भ्रु
साक्षात् प्रकति परुषके भी क्ञष्टा हो ॥ १२ ॥ +> ¦
जयजय ये ^येः+
यर्कयसयस्जउ ज
जगत्के कर्ती, भर्ता, हर्ती, आपही हो, रज, सत्, तम इन यणो आपी बहा, विष्ण,) मेश होतेहो ॥ १३ ॥ आप इस जगतुके तारने ||
वारे सवके अधिपति अविनाशी हो, आप बरदाता वाणीहप वाच्यवाचकतासे रहित हो ॥ १४ ॥ आपको योगीजन योगसे सुक्तिके निमित ||
याचना करते हँ, योगियोक हृदयकमले आपही स्थित हो ॥ १५॥ वेद ओर सन्त आपहीको प्रक्हरूप कहते है, आपहीका त्च तेजोराशीके £
परे है ॥ +६॥ हे विभो ! इ जगते आपहीको परमात्मा कहते द, हे संसारूप ! हे श्वं ! [ संहारक ] आपही सर्वात्मा ओर त्रिोकके ठ
अधिपति हो ॥ १७॥ हे विभो ! जो कुछ यह देखा सुना स्तुति किया जाता, तथा जाना जाता है हे जगतके शरू | यह सब आपही है ठ
सरवतो व्यापिन् सवेश्वरमनाव्रृतम्॥ विश्वरूपं विरूपाक्षत्वां नमामि चसर्वतः॥२०॥ सवैर भवाध्यक्ष सत्यं शिवमलुत्तमम्॥कोरि
त्वमेव जगतां कतां भर्ता हरता त्वमेव दि॥ब्रहना विष्णुर्यो भूत्वा रजस्सत््तमोगुणेः॥१२॥तारकोसि जगत्यस्मिन् सवैषामधिपोऽ ५
ग्ययः॥ प्रदो वाङ्मयो वाच्यो वाच्यवाचकवाजंतः॥१४॥याच्यो सुत्तयर्थमीशानो योगिभिर्योगवित्तमेः। हत्पुडरीकविवरे योगिनां त
भास्करसंकाशं त्वां नमामि च स्वतः॥२१॥ विश्वदेवमनादयतं षटरिात्कमनीश्वरम्॥ परवतैकं च सवेषां त्वां नमामि च स्वतः॥२२॥
आपको अते अण॒ ओर महानूते महानू कहते है ॥ १८ ॥ आपके हाथ, चरण, नेन शिर, खल, कान, नासिका सब ओर ह आपको भणामं ४
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त्वं हि संस्थितः ॥१५॥ वदंति वेदास्त्वां संतः परबरह्स्वहूपिणम्॥ भवतं तत्वमित्यय् तेजोराशि परात्परम्॥ १६॥परमात्मानमि
त्याहुरस्मिन् जगति यद्विभो॥त्वमेव शवं सवात्मन् तरिरोकाधिषते भय॥ १७ तं स्तुतं सर्वज्ञायमाने जगद्गरो॥अणोरल्पतरं
्रहमंदतोपि महत्तरम् ॥१८॥ सर्वतः पाणिपादातं सर्वतोक्षिशिरोष॒खम्॥सर्वतशश्वणताणं तवां नमामि च सर्वतः ॥१९॥ सवज
है ॥१९॥ आप सर्वज्ञ, सव ओरते व्याप्त पवक दैश्वर कहीं भी आवृत्त न होनेवाठे, विश्वहप, विहपाक्ष हो, सव ओर आपको नमस्कारकरता
ह ॥ २० ^ सवके ईश्वर, संसारके अध्यक्ष सत्यहप, भष, शंकर, कोटिदयंके समान पकाशमान, आपको ज्व ओरसे प्रणाम करता हं ॥२१॥
विश्वके देवता आदि अन्त रहित छनीसञ यण सम्पन्न जिनके उपर को$ नही, आप स्षवके ह प्रवृत्त करने वाठ ही षब ओरसे आपको
मक
णाम करता हूं ॥ २२ ॥ भरति भी वृत्त करने वाड, सबके भपितामह, सवके विग्रहोके अधिपति हो, ठुमको सव॒ ओरते व
॥ २३ ॥ भरुतिये आपको सबका निवासस्थान, स्वयंभू, शरुतिर्योका सार जानने वारे श्रुतिस्ारवित् कहती है ॥ २४ ॥ जो कुछ आपनं
किया है, बह सर्वथा हमको अदृश्य है, देवता असुर बराह्ण ओर स्थावर जंगम आपहीको कहते हैँ ॥ २५ ॥ ह देवताओकि प्रिय ! हम
त्रिषरके द्रा नष्ट हुए जाते ह, उन अघुरोको मार कर आप हमारी रक्षा करं ॥२६॥ हे परमेश्वर ! वह अब आपको मायासे मोहित हैहे प्रभो!
पपतंकं च प्रकृतेस्सवस्य भ्रपितामहम् ॥ सर्वविग्रहमीशं दि त्वां नमामि च सर्वतः॥२३॥एं वदंति वरदं सर्वावासं स्वयम्भुषम्॥ ४
तयः शतिसारज्ञं धतिसारविद श्च ये ॥ २४ ॥ अदृश्यमस्माभिरनेकभतं त्वया कृतं यद्भवताथ कोके ॥त्वामेव देवासुरभूसुराश्च
अन्ये च वै स्थावरजंगमाअ ॥२९॥पाह्यनन्यगतीज्शंभो सुरान देववहम ॥ नष्टप्रायांल्चिषुरतो विनिहत्यासुरान्क्षणात् ॥२६॥
मायया मोहितास्तेऽ्य भवतः परमेश्वर॥ विष्णुना प्रोक्तयुक्तया त उज्ज्िता धर्मतः प्रभो॥२७॥ संत्यक्तसर्वधर्माश्च बौद्धागमसमा ४
धिताः॥ अस्मद्धाग्यवशानाता दैत्यास्ते भक्तवतस॥२८॥सदा त्वं कार्यकर्ताहि देवानां शरणप्रद्॥वयं ते शरणापत्रा यथेच्छ ४
सषि तथा ङुङ् ॥ २९ ॥ सनत्कुमार उवाच् ॥ इति स्तुत्वा महेशानं देवास्तु पुरतः स्थिताः ॥ कृतांजलिपुटा दीना आसन् £
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॥४०३॥
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संनतमूतंयः ॥ ॥ ३० ॥ स्तुतश्ववं सुरेन्दरायेविष्णोर्जाप्येन चेश्वरः ॥ अगच्छन्त सर्वशो वृषमाश्ह्य हर्षितः ॥ ३१ ॥
उक्तिसे अव उन्होंने धमं त्याग कर दिये है ॥ २७ ॥ उन्होने स्रव वेदधर्मोका त्याग करके बौडशाघ्का आश्य ल्या है हे भक्तवत्सठ !
यह वात हमारे ही भागयकर वशत र है ॥ २८ ॥ हे शरणकै देनवाडे आप सदाही देवताओंका कार्य करने वाटे ई हम आपकी शरण ह, अव आकी
जो इच्छा हौ सो करो ॥ २९॥ सनकुमारजी बोठे इस भकार महेशकी स्तुति करके देवता आगे स्थित हुए, ओर हाथ जोड दीनतासे शिर ञ्ुकाये
रह गये ॥ ३०॥ जब इत प्रकार इन्द्रादि देवताओंने स्तुति की ओर विष्णजीनि जप् किया तव प्रसन्नहोः
रुन्सं.र२
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भगवानु शंकर वृषभपर आहढ हए वहां
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आये ॥ ३१॥ ओर परसल्नमन हौ नेदीशसे उतर कर विष्णको आगन किया, ओर नन्दीको हस्तसे स्पशं किये हए सब देवातओंको
देखा ॥ ३२॥ तब शिवजीने कपाृ्ते देवता ओर विष्णजीको देखा ओर प्रसन्न हो पर्वतीपतिने उनसे गंभीर वचनोसे कहा ॥ ३३ ॥
शिवजी बोढे हे देवेश्वर ! मने देवताओंका कार्यं जान छिया है, तथा विष्णजी ओर नारदजीका मायाबलठ भी जान ख्या है ॥ ३४ ॥
है देवताओं श्र ! उन दैत्योकी अधर्मे निष्ठाकोभी मँ भी प्रकारकी जान गया ह अव भै त्रिका विनाश कर दुगा इशे कोई सन्देह नही
विष्णुमाखिग्य नंदिशादवरुद्य प्रसन्नधीः ॥ ददं सुदृशा त्र नन्दीदत्तकरोऽखिलान्॥ ३२॥ अथ देवान् समाटोक्य कषाया
हार हरः॥ प्राह गंभीरया वाचा प्रसन्नः पार्वतीपतिः ॥२३॥ शिव उवाच ॥ । ज्ञातं मयेदमधुना देवकार्यं घुरेश्वर ॥ विष्णोमां
याबलं चेव नारदस्य च धीमतः ॥२४॥॥ तेषामधर्मनिष्ठानां दैत्यानां देवसत्तम॥ पुर्यविनाशं च करिष्येऽहं न संशयः॥३५॥
परन्तु ते महदित्या मद्क्ता दृढमानसाः॥ अथ वध्या मयेव स्यु्याजत्यक्तवृषोत्तमाः॥३६॥ विष्णैन्यात्परो वाथ यच्याजि
तव्रृषाः कृताः ॥ दैत्या मद्धक्तिरदितास्सवें जिपुरवासिनः ॥ ३७ ॥ इति शंभोस्तु वचनं शुत्वा सें दिवौकसः ॥ विभनस्का
बभूवुस्ते हरिश्रापि मुनीश्वर ॥३८॥ देवान् विष्णुमुदासीनान् दक्वा च भवङ्कद्विधिः॥ कृतांजटिपुररशंथुं ब्रह्मा बचनमन्रवीत्
॥ ३९ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ न किंविद्वियते पापं यस्मात्त्वं योगवित्तमः ॥ परमेशः परत्रह् सदा देषषिरक्षकः ॥ ७० ॥
है ॥ ३५ ॥ परन्तु षे महादैत्य मनसे भेर ट भक्त ६, हे देवताभो 1 मायासे उ्तभ॒ धपे त्यागनेके कारण मेँ उनका वष ॒करंगा ॥ ३६ ॥
जिन्होनि- धमं त्यागे है, उन दपुरोको विष्णजी भारग, वे त्रिषरमे रहने वाछे सबही भेरी भक्तिसे रहित होगये ह ॥ ३७ ॥ हे सुनि ! सब
देवता इस भकार शिवजीकै वचन सुनकर अनमने होगये ओर विष्यजी अनभने
विष्णजीको उदास्त देखा तव हाथजोढकर बरहमाजी शिवजीसे बचन कहने कगे ॥३९॥ बह्ाजी बोरे
सकता कारण किं आप् योग जाननेवाोमर भ्रष्ठ हो, आप परमेश्वर बह्म सदा देवता ओौर ऋषियों
हए ॥ ३८ ॥ तब संसारके करनेवाठे बरह्माजीने देवत)
हे देव ! आपको कोई पाप स्पश नहीं कर
कै रक्षकहो॥ ४० ॥
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आपहीके शासन ओ प्रणते वे सव मोहित होगये हे जव उन्होने अपना धमे ओर आपका पूजन त्याग दिया तौ भी बह शत वध्य नह ||@
है ॥ ४१॥ हे महादेव हे देवारषथोके भाण रक्षक 1 इस कारण आप साधुओंकी रक्षा करनेक निभित्त इन म्डेच्छ जातियोका वध करो ॥ ¢
॥ ४२ ॥ धर्मे निग्रह करने राजोंको कुछ पाप नहीं ठगता है, इस कारणसे बाह्मण साधुओंकी रक्षा करनेके निमित्त कंटकोंको शोधन
करना चाहिये ॥ ४२ ॥ इत भकारसे राजा यदि दोनों ठोकोम अपने राज्यकी रक्षा करे तो महाफठ होता है राज्यम सब लो्कोको ¢
तवैव शासनात्ते वै मोहिताः प्रेरको भवान्॥ त्यक्तस्वधमंत्पत्पूजाः परवध्यास्तथापि न ॥४१।अतस्त्वया महादेव सुरषप्राणर
क्क ॥ साधूनां रक्षणार्थाय हंतव्या म्लेच्छजातयः ॥ ७२ ॥ राज्ञस्तस्य न तत्पापं विदयते धमेतस्तव ॥ तस्माद्रक्षेदिजान् ¢
साधून्कंटकादेविशोधयेत्॥४ २॥एवमिच्छेदिहान्यर राजा वेद्राज्यमात्मनः ॥ प्रभुत्वं सर्वरोकानां तस्माद्रक्षस्व माचिरम्।४४॥
ुनीन्दरेशास्तथा यज्ञा वेदाश्शाघ्चादयोखिकाः॥परनासते देवदेवेश ह्यय िष्णरपि धुवम्॥४५। देवता सार्वभौमत्वं सम्राट् सर्वेश्वरः |£
भ्रभो ॥ परिवारस्तवैवैष हर्यादि सकट जगत्॥४६॥ युधराजो इरिस्तेज ब्रह्माहं ते पुरोहितः ॥ राजकाकरः शकस्त्वदाज्ञापरि ४
|
पालकः ॥ ७ ॥ देवा अन्येपि सवेश तव शासनयन्विताः ॥ स्वस्वका्यकरा नित्यं सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ८ ॥
सनत्कुमार उवाच ॥ एतच्छरत्वा वचस्तस्य ब्रह्मणः परमेश्वरः ॥ प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा शंकरस्सुरपो विधिम् ॥ ४९ ॥
| है, इतत कारण आप हमारी शीघ रक्षा करं ॥ ४४ ॥ हे देवदेवेशं ! स॒नि्योमिं रेष्ठ यन्न सम्पूण वेद तथा म ओर विष्ण यह सव
| है ॥ ४५॥ आप देवृताओंके सावभौम सप्राट् सर्र हो, यह ॒हरिको ` आदिेकर सव जगत् आपका परिवार है ॥ ४६ ॥ हरि
आपके युराज, हे अज ! मेँ ब्रहम तुम्हारा रोहित, भौर आपकी आज्ञा पाटन करनेवाढा इन्द्र आपका राजकाज करनेवाढा ह ॥ ४७ ॥
ह सर्वेश ! दूरे देवता भी आपकी आज्ञाकै वरवरती है, वे नित्य अपने २ कायं करते है इसमे सन्देह नहीं है ॥ ४८ ॥ सनक्कुमारजी बोठे
स प्रकारके ब्रस्लाजीकै वचन सुनकर सुरपति शंकर परमेश्वर प्रसन्न हो बह्याजीसे कहने खगे ॥ ४९ ॥
शिवजी बो, हे बह्लाजी ! जो किं तुमने भुङे देवराज ओर भ॒घ्राज कहकर कीर्वन किया है, मेरे पास कोद रेसा भकार नही जो तै इस
पदको अह्ण करु ॥ ५० ॥ महादिव्य हमारे परस रथ नहीं है वैशाही सारथी नही है, जिसको छेकर चटे, संभ्ामभे जयका |
धनुषबाण भी चाहिये ॥५१॥ कि जिस रथपर बैढकर धलुषवाण प्रहणकर मन ठगाकर म प्रबल दैत्योको भी संग्राममे वध कर सक् ॥ ५२ ॥
सनत्कुमार बोले
हे महेश्वर ! हम
शिब उवाच
भमुकै यह वचन सुनकर नहा इन्दर उपेनद्रादि सव देवता प्रसन्न हए ओर परणामकर महेश्वरे कहने कगे ॥५३॥ देवता बोढे
उप् भकारकै आपके रथादिरूपमें हो जांयगे, हे स्वामिन् ! युद्धके ल्ि हम तयार है ॥५४॥ यह कहकर सव कोई इकटे हो
॥ ३ ब्रह्मन् यद्यहं देवराजस्सग्राट् प्रकीर्तितः ॥ तत्प्रकारो न मे कशिद््ीयां यमिह प्रभुः ॥५०॥ रथो नास्ति
महादिव्यस्तादक् सारथिना सद॥ धनुर्बाणादिकं चापि सं्ामे जयकारकम् ॥५१॥ यमास्थाय धठुर्गाणान् गृदीत्वा योज्य वैं
मनः ॥ निहनिष्याम्यहं
न
द्यान् प्रबलानपि संगरे ॥५२॥ सनत्कुमार उवाच॥ अद्य सबह्मका देवास्सेन्दरोपेन्द्राः परहविताः ॥
धृत्वा प्रभोस्तदा वाक्य नत्वा परोचुमेदेश्वरम् ॥५२३॥ देवा उचुः ॥ वयं भवाम देवेश तत्पकारा मरेश्वर॥ रथादिका तव स्वा
मिन्संनद्धास्संगराय दि॥५१॥ इत्युक्ता संतास्सवें शिवेच्छामधिगभ्य ह ॥ पृथगूचुः परसन्नास्ते कृताजञकिपुरास्सुराः॥५५॥ इति
शीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुरसंदितायां पञ्चमे युद्खण्डे शिवस्तुतिवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥ सनत्छमार उवाच॥ एतच्छ
त्वातु स्वेषां देवादीनां बचो हरः ॥ अंगीचकार सुप्रीत्या शरण्यो भक्तवत्सलः॥ १॥एतस्मिन्नतरे देवी पाभ्यां संयुता शिवा॥ आज
गाम सुने तज यञ देवान्धितो दरः॥२॥ अथागतां शिवां दष्ट स विष्ण्वादयो दतम् ॥ प्रणेभुरतिनग्रास्ते विस्मिता गतभ्रमाः ॥३॥
शिवकौ इच्छा जानकर प्रसन्न हो हाथ जोड़कर खंडे रहे ॥ ५५ ॥ इति शरीशिवमहाषराणे द्वि° ° पं यु° भाषारीकायां षष्ठोऽध्यायः
॥ & ॥ सनत्कुमारजी बोटे सम्पूणं देवताओं इ प्रकारके वचन सुन शरणागतवत्ठ भक्तोके ऊपर पा करनेवाठे शंकरने इ बातको ||
स्वीकार किया ॥ १ ॥ हे सुन ] उक्तौ समथ शिव्।देवी अपने परवोको ठेकर उप स्थानम आई जहां देवताओकि सहित भगवानु शंकर थे ॥ २॥
परावतीको आती हई देख स॑ देवता विष्ण आदिक नम्र हो प्रणाम करने मे, ओर संभ्रम तथा विस्मयको परप् हए ॥ ३ ॥
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हे सने ! सवने घुरक्षणपरवक जयके वचन कहे, ओर प्वतीफे आगमन कारणको न जानकर सव मौन हो गये ॥ ४ ॥ जव सब द्व०।
॥ 9० ||
। ओंने स्तुति की तब अदधत कुतूहढ्वाटी दैवीने अनेक रीला करनेमं चतुर अपने स्वामीसै कहा ॥ ५ ॥ देवी बोली हे एववालोमं भ्रष्ठ
ट र्यके समान प्रकाशमान अपने षण्खख एत्रको सेकते हुए देखिये, जो अनेक भूषणोति भूषित हो रहे हँ ॥ ६ ॥ जव छोकम्।ताने इस भकारक
¢ वाणियोते शंकरकोः सम्बोधन किया, तव स्कन्दका खलागृतपान् करते हृए शंकर तृिको न भप्त इए ॥ ७ ॥ ओर् अपने तेजते निपीडित्
हए देवताओको स्मरण न किया, स्कन्दको आगन क ओर सधकर महैश्र बडे भसन हुए ॥ ८ ॥ अनेक लीढामे चतुर जगदम्बा भी
मोचर्जयेति सद्वाक्यं खे सवे स॒लक्षणम्॥ तूष्णीमासत्रजानंतस्तदागमनकारणम्॥॥ अथ सर्वः स्तुता देवैदैनयद्धतकुतूदला॥
उवाच स्वामि प्रीत्या नानालीलाविशारदम्॥५॥ देव्युवाच ॥ कीडमानं विभो पश्य षण्मुखं रविसंनिभम् ॥ पुतं एुजरवतां श्रेष्ठ
भूषितं भूषणेरवरेः ॥६॥ इत्येवं छोकमाता च वाभ्भिस्संबोधितश््शिवः॥ न ययौ _तप्तिमीशानः पिबन् स्कंदाननामृतम् ॥७॥
न सस्मारागतान्दैत्यात्रिजतेजोनिपीडितान्॥ स्कंदमाछिग्य चाघ्राय घुमोदाति मदैश्वरः॥८॥ जगदम्बा तैव संत्य प्रभुणा
| च सा॥ स्थित्वा किञचित्सयुत्तस्थौ नानाटीलाविशारदा॥९॥ ततस्सनंदी सह षण्पुखेन तया च सारद गिरिराजपुत्या॥ विवेश
| शम्भं खलील: सुरस्समस्तेरमिवंयमानः॥१०॥ दारस्य पार्श्वतः तस्थुदृवदेवस्य धीमतः॥ तेऽथ देवा महाव्युथ्ा विमनस्का
स॒नेऽखिलः ॥ 9१ ॥ किं कर्तन्यं क गंतव्यं कः स्यादस्मत्सुखप्रदः ॥ किं तु किंत्विति संजातं हा इताः स्मेति वादिनम्
^ ७२
रश्च
॥ १२ ॥ अन्योन्य ्र्ष्यं शक्राय बभूवुश्चातिविहखाः ॥ प्रोचर्विकल्वाक्यं ते धिक्कुरवन्तो निजं विधिम् ॥ १३॥
युं
| मन्नणा कर कुछ काठतक वहीं स्थित रहीं ॥९॥ तव् नन्दी कार्तिकेय ओर गिरिराज कन्यके साथ सम्पूण देवताओं
सतुतिको प्राप होते हुए शंकरने अपने मंदिरमे प्रवेश क्रिया ॥ १० ॥ हे सने ! उस्न समयवेस
१० ||| कर उस महाघुद्धि सम्पन्न देवदेवकै दवारे ही स्थित हो रहे ॥ ११॥ अव क्या करं कहां जा
गया, हा ! हम तो मारे गये इस प्रकार कहते हुए ॥१२॥ इन्द्रादिकदेवता परस्पर एकं दूसरेको
पूणं देवता महा उयाकुल ओर व्यप्रमन हो
य कौन हमको सुख देनेवाला है, यह क्या हो
देख बडे व्याकुल हो गपे ओर अपने प्रारज्धको
गय
उण ०० ०
धिकार देते पे सथ इत प्रकार कहने ठगे ॥ १३ ॥ कोई बोढे हम डे पापी है, कोई बोरे हम अभागी है कोई देवता बोडे व असुर् |
भाग्यवान् है ॥ १४ ॥ उसी समय उन देवताओंके अनेक प्रकारके कलकलशञद् सुनकर महातेजस्वी कुम्भोद्रनामक गणपति देवताओंको
ठकडीसे ताडन करने र्गा ॥१५॥ तब सब देवता हाहाकार शग्द करके वहांसे भाग निकठे, कोई सनि गिर पडे, देवस्षमाजमं बडी व्याकु्ता
छागं ॥ १६ ॥ इन्द्र तो बडे व्याकुक हो जंषाको रेककर पृथिवीमे तरै गये, दरे देवपिं भी व्याकुढ हो पृथिवीपर गिर पडे ॥ १७ ॥ तब
प्रन खनि ओर देवता परस्पर मिखकंर बडी व्याकुकतासे ब्रह्मा ओर विष्णजीके समीपम गये ॥ १८॥ उस स्मय कश्यपादि ऋषि इस प्रकारसे
पापा वयमित्यन्ये छ्यभाग्याश्चेति चापरे ॥ ते भाग्यवंतो दैत्येन्द्रा इति चान्येऽ्रवन् सुराः॥१७॥ तस्मित्नेवांतरे तेषां धुत्वा
शब्दाननेकशः ॥कुभोद्रो महातेजा दंडनाताडयल्घुरान् ॥१५॥ दुरुस्त भयाविष्ठा देवा हाहेति वादिनः ॥ अपतन्शुनयश्वान्ये
विहरुत्वं बभव इ ॥ १६ ॥ इन्द्रस्तु विकलोतीव जानुभ्यामवनीं गतः॥ अन्ये देवर्षयोतीव विकलाः पतिता भुवि ॥ १७ ॥
सव मिखित्वा सुनयस्स॒राश्च सममाकुलाः ॥ संगता विधिदर्यस्त॒ समीपं मि्चेतसोः ॥ १८ ॥ अहो विधिबलं चेतन्धुनयः
कश्यपादयः ॥ वदति स्म तदा सं हरि छोकभयापदम् ॥१९॥ अभाग्यान्न समाप्तं तु कार्यमित्यपरे द्विजाः॥ कस्माद्वि्मिदं
जातमित्यन्ये ह्यति विस्मिताः ॥२०॥ इत्येवं वचनं श्त्वा कश्यपाद्दितं घुने ॥ आश्वासयन्घुनीन्देवान् इरिवाकषयञ्चपारदे
॥ २१ ॥ विष्णुरुवाच ॥ दे देवा अुनयस्सवैं मद्वचः शृणुतादशत् ॥ किम ःखमापन्ना दुखं तु त्यजताखिलम् ॥ २२ ॥
कहने ठगे अहो परारधका वरु बडा विचित्र है यह बात उन्होने सव ठोकोके भय हरमे वाठ हरिते कही ॥ १९ ॥ कोई कहने कगे ह
मह्ियो ! हमारे अभाग्यको तो देसो कि हमारा कारय तो पूरा हुआही नहीं ओर वि उपस्थित होगया इ भकार सव कोई बडे
विस्मित हए ॥ २० ॥ हे सुने ! इस प्रकार कश्यपादि ऋषिंयोे वचन सुनकर सनि ओर देवताओंको आश्वासन करते हए ॒दिष्णजी
कहने ठगे ॥ २१ ॥ विष्णजी बोले हे देवता नियो ! तुम आदरे हमारे वचन सुनो, तुम किंत निमित दुःखको भाप हो, सब दुःखको
व 2 य गतय
त्यागन कर दो ॥ २२ ॥ हे देवताओं ! महतरुषोका आ
राधन सहज नहीं होता है, इस प्रकार तुम बिचारकर देखो, हमने रपा इना है
पहठे महत्परुषोकि आराधनमे दुःख होता है, हे देवताओं ! वह -इढताको जानकर पीछे भसन होते ह ॥ २३ ॥ शिव सब गणो
गीर परमेश्वर है, अपने मनोम विचार देखो वह सहसा केसे वशम हो सकते ई। । २४ ॥ हे देवताओ ! पहटे ` ॐ पीछे ५ (2
“ शिवाय › पीछे “ शुभम् › ॥ २५ ॥ पवात् कुरु कुरु पीछे शिवाय नमः ॐ अथात् ॐ नमः शिवाय शुभं कुरु २ शिवाय् नमः ' ञम्
हे देवताओ ! यदि इस मंत्रको तुम निरन्तर ॥ २६ ॥ शिवजीके निमित्त एककोटि जपोगे तो शिवजी तुम्हारा काय करेगे ॥ २७ ॥ हे
महदाराधनं देवा न साध्य विचाय्य॑ताम् ॥ महदाराधने पूर भवेददुःखमिति शतम् ॥ विज्ञाय दृढतां देवाः प्रसन्नो भवति
धुवम् ॥२३॥ शिवस्सव॑गणाध्यकषस्सहसा परमेश्वरः ॥ विचार्यतां हृदा सवैः कथ वश्यो भवेदिति ॥२४॥ प्रणवं पूवमु
नमः प्चदुदाहरेत् ॥ शिवायेति ततः पश्चाच्छुभद्वयुमतः परम् ॥२९॥ इरुद्रय् ततः परोक्तं शिवाय च ततः पुनः ॥ नमश्च
परणवश्चैव मंजमेवं सदा बुधाः ॥२६॥ अवर्तध्वं पुन्यं यदि शंयुकृते तदा॥ कोटिमेकं तथा जप्त्वा शिवः कार्य करिष्यति
॥ २७ ॥ इत्युक्ते च तदा तेन हरिणा प्रभूविष्णना ॥ तथा देवाः पुनश्चकदैरस्याराधनं सुने ॥२८॥ संजजाप हरिश्चापि सवि
धिश्शिवमानसः ॥ देवानां कार्यसिद्धयथ सनीनां च विशेषतः॥२९॥सहुः शिवेति भाषतो देवा धेर्यसमन्विताः ॥ कोटिसंख्य
तदा कृत्वा स्थितास्ते खनिसत्तम ॥३०॥ एतस्मि्नतरे साक्षाच्छिवः प्राडुरभूत्स्वयम् ॥ यथोक्तेन स्वरूपेण वचनं चेदमब्रवीत्
॥ ३१ ॥ श्रीशिव् उवाच ॥ हे हरे ह विधे देवा छुनयश्च शभव्रताः ॥ प्रसन्नोऽस्मि वरं बरूत जयेनानेन चेप्सितम् ॥ ३२ ॥
| 1 जब ॒परमस्षमथ विष्णजीने इस्त भरकारकै वचन कहे तब फिर देवता शकरकी आराधना करने ठ्गे ॥ २८ ॥ उस्त॒ समय
विष्ण॒जीभी शिवम मन ठगाकर देवता ओर शनियोके कार्यं सिद्ध करनेके निमित्त शिवत्रका जप करने ठगे ॥ २९ ॥ धेये धारण कर
| वारंवार शिषशिव रेता कहने गे, है खनिसत्तम ! इस भ्रकार एक कोरि मं जपकर वे सब स्थित हुए ॥ ३० ॥ ` उक्ती समय साक्षात्
शंकरने फिर दशन दिया, यथोकतस्वहूपसे आकर इस प्रकारके वचन कहने ठगे ॥ ३१ ॥ श्रीशिवजी बोठे हे विष्णजी ! हे विधाता 1 हे शष्ठ
^ यय (०999
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|| वतवाठे ऋषियो ! मँ प्रपन्न हूं मत्क प्रभाषसे जो तुम्हारी अभिकाषा हो सो कहो ॥ ३२ ॥ देवता बे हे जगदीश ! हे शंकर ! यदि
आप हमारे ऊपर प्रसन हो तो देवताओंको प्याकु जानकर त्रिष्रोंका संहार कीजिये ॥ ३३ ॥ हे परमेशान ! दीनबधो ! छपा करनेवाटे
भाप हमारी रक्षा करो आपनेही सब आपत्तियोपति वारंवार देवता्ओंकी रक्षा की है ॥ ३४ ॥ सनत्कुमारजी बोले हे सने ! बह्मा ओर हरिके
तथा देवताओके इस भरकारसे वचन सुनकर हैसकर शिवजी उन देवताओं बोडे ॥२५॥ महेश्वर बोरे हे विधाता ! हे विष्जी ! हे सब ,
खनियो! तुम त्िष्रको नष्ट हआ जान आद्रसे मेरे वचन सुनो ॥ ३६ ॥ जो तुमने रथ, सारथि, दिभ्य धष, बाण देना पहठे अङ्गीकार
॥ देवा उचुः॥ यदि प्रसन्नो देवेश जगदीश्वर शंकर॥ सुरान् विज्ञाय विकलान् इन्थेतां बिषुराणि च ॥३३॥ रक्षास्मान्परमेशान
दीन्ब॑धो कृपाकर ॥ त्वयेव रक्षिता देवास्सदाप्यो हुः ॥२४॥॥ सनत्कुमार उवाच ॥ इत्युक्तं वचनं तेषां थत्वा सहसि
धसाम् ॥ विदस्यांतस्तदा ब्रह्मन्महेशः पुनरत्रवीत् ॥३५॥ ॥ महेश उवाच ॥ हे हरे हे विे देवा भुनयश्चाखिला वचः॥ मदीये
धणतादृत्य् न्च मत्वा पुरत्रयम् ॥२६॥ रथं च सारथि दिव्यं काशकं शश्युत्तमम् ॥ पूर्वम गीकृतं सर्व॑षुपपादयताचिरम् ॥३७॥
हे विष्णो ह विधे त्वं हि बिरोकाधिपतिधुंवम्॥ सर्वप्राट प्रकारं मे कतैमरहसि यत्नतः ॥३८॥ नघ धुर्यं मत्वा देवसाहाय्य
मित्युत ॥ करिष्यथः प्रयत्नेनाधिकृतौ सगपालने॥३९॥ अर्थ मंब महापुण्यो मल्पीतिजनकशभः॥ शुक्तिषक्तिमदस्सर्वकाम
द्श्शुवकावदः ॥४७०॥ धन्यो यशस्य आयुष्यः स्वर्गकामार्थिनां नृणाम्॥ अपवर्गो श्चकामानां क्तानां युक्तिसुक्तिदः ॥ ४१ ॥
किया है उत्चको शीघ उपस्थित करो ॥ ३७ ॥ हे विष्य ! हे विधाता ! तुम बिरोकके अधिपति हौ बहुत शीघ यत्नसे हमारे सघ्राट पदका
भकार उपस्थित करो ॥ २८ ॥ ज्रिरको नष हुआ हौ जानकर प्रयत्ने सव देवता सृष्टि पाडनके अधिकारी इसमे सहायता करो ॥ ३९ ॥
¢| जो हमने यह महाण्यदायक भेरा मन्व जपा है, इसे मँ भन्न होता हं, यह महाशुभ भन्व भकिसक्तिका देनेवाटा तथा सम॒ कामनाका
देनवाडा सब शीवोफो एल कएनेवाडा टै ॥ ४० ॥ यह पन्य यश ओर आगुका देनेवाला है सव्की इच्छा करनेवाटोको सव ओर कामना
१६३
ओ
| रहितोको सक्ति ओर संसारे खक्तिको भाप हृओंको भोग ओर मोक्ष देनेवाखा है ॥४१॥ जो मनुष्य सदा पवर होकर इत मन््रका ।
ह|| करता है जो सुनता सुनाता है षह सव कामनाओंको भाप होता है ॥ ४२ ॥ सनत्कुमारजी बोठे! परमात्मा शिवकै इतत भकारक वचन सुनकर
क ¢ हरि ओर बह्मा आदि सब देवता प्रसन्न इए ॥ ४२ ॥ तब विश्वक्मानि संसारके हितके निमित्त विष्णजीकी आज्ञासे परम सुन्द्र सब दवमय
रथ निर्माण किया ॥ ४४ ॥ इति भरीशिवमहापराणे द्वि° रु° पं यु° भाषारीकायां सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ व्याप्तजी बे हे सनत्कुमार 1
£ हे सव॑ज्ञ ! शिवके भक्ते शष्ठ ! हे महाबुद्धिमानू हे तात ¡ आपने यह शंकरकी अद्भुत कथा सुनाई ॥१॥ इस समय आप उस्न देवमय रथका
¢ य इमं कीतयेन्म॑त्र शुचिरत्वा सदा नरः ॥ शृणयच्छवयेद्वापि सर्वान्कामानवाप्वुयात् ॥ ४२ ॥ सनत्कुमार उवाच् ॥ इति
त्वा वचस्तस्य शिवस्य परमात्मनः॥ सवं देवा सुदं प्रापरिद्माधिकं तथा ॥४३॥ सवदेवमयं दिव्यं रथं परमृशोभनम्॥
रचयामास विश्वां विश्वकर्मां तदाज्ञया ॥४७॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां श्दरसंहितायां पञ्चमे युद्धसंड देवस्तुति
र्णं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ ॥ व्यास उवाच ॥ सनत्छमार् सर्वज्ञ शेवप्रवर सन्मते ॥ अद्धतेय कथा तात भाविता
&|| परमेशितुः ॥१॥ इदानीं रथनि्मांणं ब्रूहि देवमयं प्रम् ॥ शिवार्थयत्कृतं दिष्यं धीमता विश्वकमणा ॥२॥ ॥ सूत उवाच॥
ट
४
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इत्यकण्यं वचस्तस्य् भ्यासस्य स घुनीश्वरः॥ सनत्कुमारः प्रोवाच स्पृत्वा शिवपदांुजम् ॥३॥ ॥ सनत्कुमार उवाच॥ ॥ शृणु
ग्यास महाप्रज्ञ रथादोनिर्मेति यने ॥ यथामति प्रवक््येऽहं स्मृत्वा शिक्पदाम्बुजम् ॥४॥ अथ देवस्य द्रस्य निमितो विश्व
कर्मणा ॥ सर्वलोकमयो दिभ्यो रथो यत्नेन सादरम् ॥ ५ ॥ ।
निर्माण किये जो बुद्धिमान् विश्वकर्माने शिषजीके निभित्त निर्माण किया था ॥ २ ॥ सूतजी बोठे वह सुनीष्वर उ्यासजीके इत भकार वचन
सुनकर शिषजीकै चरण कमखको स्मरण कर सनत्कुमारजी कहने ठगे ॥ ३ ॥ सनक्कुमारजी बोटे हे व्याजी ! मे बुद्धिके अकरा शिवजी
चरण कमलके स्मरण करक कहता हूं भवण करो ॥ ४ ॥ विश्वकर्माने जो रुद् देवक निमित्त रथ निर्माण किया था, वह दिभ्य रथ | |
लोकम परम दिव्य यत्नपुेक बनाया गया था ॥ ५॥
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बह सतव भूतमय सुवणेका सरवसम्मत था, उसके दक्षिण पहियेमे सर्य बाम पहियेमे चन्द्रमा ॥ ६ ॥ दक्षिणके पिये वारहमहीनेरूप बारह
आरे, ओर बाई ओरक पिमे कटारूप सोठह आरे थे, हे विबेनर ! उन बारह आरभं बारह आदित्य खगे धे ॥ ७ ॥ हे सुवत ! |
ओर् चन््माकी बारह कृटा ठगी हृद थी, ओर बाई ओरही २८ नक्षत्र ठगे हूए थे ॥ ८ ॥ छहोँ ऋतु उत्त रथकी नेमि पृ पुष्कर उसका
थकी नीड मंद्रपवेत था ॥ ९ ॥ उदयाचछ अस्ताच उस्तका जुआ, मेरु उसका अपिष्ठान, ओौर दर पर्वत उसके केशर
ए ॥ ° ॥ सम्वत्सर उसका वेग उत्तरायण दक्षिणायन चक्रक संगम, खतं उप रथका वंधुर [ बंधन वने ] ओर कठा उसकी शम्पा
अन्तरिक्ष, ओर र
सवभूतमयश्चैव सौवरणस्र्वसंमतः॥ रथांगं दक्षिणे सूर्यस्तदवामे सोम एव च ॥६॥ दक्षिणं दवादशारं हि षोडशारं तथोत्तरम् ॥
अरेषु तेषु विन्द्र आदित्या द्वादशेव तु ॥७॥ शशिनः षोडशारास्तु कला वामस्य सुब्रत
॥ ऋक्षाणि तु तथा तस्य वाम
स्थेव विभूषणम् ॥८<॥ ऋतवो नेमयः षट् च तयोव विप्रपुगव ॥ पुष्करं चातरिक्ष वे रथनीडश्च मंदरः ॥९॥ अस्ताद्विद्द्रया
` द्विस्व॒ ताङ्भौ कूबरौ स्मृतौ॥ अधिष्ठानं महामेर्राश्रयाः केशराचलाः॥१०॥ वेगस्संवत्सरास्तर
वंधुरास्तस्य शम्याश्चेव कलाः स्मृताः॥ ११॥ तस्य काष्ठाः स्मरता वोणाशाक्षदं
य अयने चक्रसंगमौ ॥ सुहूतां
डाः क्षणा वै ॥ निमेषाश्चावुकर्ष् ईषाथा
उलवाः स्मरताः ॥ १२॥ द्यौर्वहूथ रथस्यास्य स्वगमोक्षाबुमौ ध्वजौ ॥ युगान्तकोरितौ तस्थं भमकामदुघौ स्मृतौ ॥१३॥
ईषादंडस्तथा व्यक्तं वृद्ध्तस्यैव नदूवलः ॥ कोणास्तस्याप्यहंकारो भूतानि च बलं स्मृतम् ।
भूषणानि समततः ॥ श्रद्धाच गतिरस्येव रथस्य भुनिसत्तम ॥ १५ ॥
[ दोनों कीट ] बनीं ॥ ११॥ कलाओंका तीसवां भाग काष्ठा उक्षका घोण (
हए निमेष उस रथका अनकषं [ नीचेका काष्ठ ] हभ ओर ख्व उततका श्वा [ ज
ठोहेका पदा सृलोक बना, स्वगं ओर मोक्ष इसकी दोनों ष्वा हुई, ओर जुप्के दोनों सिर उसके भ्र
व्यक्त उसका दंषादंड, ओर वृद्धि उत्का नड बना अहंकार उसका कोना भौर पंचमहाभूत उसके बरु
। १४ ॥ इन्द्रियाणि च तस्यैव
| जुएका भभरनासिकारप ) ओर क्षण उसके अक्षदंड
नुएकै बीचका काष्ठदंड ] बना ॥ १२ ॥ ट्स रथका
म_ ओर कामा बने॥ १३॥
वनं ॥ १४ ॥ समस्त इन्द्रिय उसके
|
¢
भूषण ओर हे खनिसत्तम ! शरदा इस रथकी गति दईं ॥ १५ ॥ हे सनिभेष्ठ ! षठंग उस समय भूषण बने, एराण, न्याय, मीम भर्मशाज् ||
यह उपभूषण हए ॥ १६ ॥ सब लक्षणो संयुक्त वर॒ वल्के स्थान बने, उनका टा मं हए, वणाश्रम चरण बने ॥ १७ ॥ सहलफणोति ४
भूषित अनन्त सपं उसका बंधन बने दिशा ओर उपदिशा इत रथके पाद हए ॥ १८ ॥ सुवणके समान भकाशमान रत्नोति भूषित ुष्करादि
इस रथकी पताका बनी ओर चारों सागर इस रथक्े केका व्च बने ॥ १९ ॥ सब गहनोको धारण क्य गंगादि चष्ट. नदिय सव ©
तदानीं शूषणान्येत षडगान्युपभूषणम् ॥ पुराणन्यायमीमांसाधर्मशाच्लाणि सुव्रताः ॥ 98 ॥ बलाया वरा्चव सवलक्षणसं ||
युताः ॥ मेरा घटाः स्मृतास्तेषां वर्णपादास्तदाश्रमाः ॥१७॥ अथो बन्धो छ्यनन्तस्तु सहस्रफणभ्रुषितः ॥ दिशः पादा रथस्या र
स्य तथा चोप दिशश्च ह ॥ १८ ॥ पृष्कराद्याः पताकाश्च सौवणौ रत्नभूषिताः ॥ सुदरास्तस्य चत्वारो रथकंबलिनर्स्मृताः ¢
॥ १९ ॥ गंगाद्यास्सरित श्रेष्ठाः सवांभरणभूषिताः ॥ चामरापक्तदस्ताम्रास्सव्वीङ्षशोभिताः ॥२०॥ त ततर कृतस्थानाः त
शोभयांचक्रिरे रथम् ॥ आवहादयस्तथा सप्त सोपानं दैमघुत्तमम् ॥ २१॥ रोकालोकाचलस्तस्योपसोपानस्समंततः ॥ विष ¢
मश्च तथा बाह्यो मानसादिस्तु शोभनः ॥ २२ ॥ पाशास्सम॑ततस्तस्य सवं वषांचलार्स्मृताः ॥ तलास्तस्य रथस्याऽथ सवे
तलनिवासिनः॥ २३॥ सारथिर्भगवान्ब्न्ना देवा रश्मिधशः स्मरताः ॥ प्रतोदो ब्रह्मणस्तस्य प्रणवो बरह्नदेवतम् ॥ २४॥ ट
अकार महच्छं मद्रः पाश्वदंडभाक् ॥ शेलेन्द्रः काकं तस्य ज्या भुजंगांधिषस्स्वयम् ॥ २५ ॥ ट
ह्ली रूप धारे चमर हाथमे टये उपस्थित इई ॥ २० ॥ यह उन स्थानों स्थिति कर रथको शोभायमान करती हू, आवह आदि स्तात ४
| उ रथको उत्तम ॒सुवणेकी सदी बनी ॥ २१ ॥ छोकाटोक पर्वत उस रथकै इधर उधरकी उपसोपान बने विषम ओर बाद्यस्थान
शोभायमान मानस्ञ आदि इए ॥ २२ ॥ सब वर्षाचल उसके पाश बने, तरुोकके रहनेवाठे प्राणी उस रथका तठभाग बने ॥ २३ ॥ ||©
भगवान ब्रह्मा सारथि, ओर स्त्र देवता रश्मिधारण कएनेवाठे बने बरह्मदेवतावाख ओंकार कोडा ॥ २४ ॥ अकारही उसका महाछत ||
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¢ ओर मंद्र पाश्वस्थानका दंड धारण करने बाा बना शेराज भेर उका धलुष ओर सर्पराज शेषजी उत्तका रोदा बने ॥ २५ ॥ वेदहपा
सरस्वती देवी उस्न धटुषका घंटास्वहप हुं महातेजस्वी विष्णजी उस्षका बाण अभि उस्न बाणका शल्य बना ॥ २६॥ हे ने ! चार वेद उसके चार
८; बोडे बने सब ज्योतियें उनक भूषण हुए, ओर भी जो कु है वे उपमूषण बने ॥ २७ ॥ विषसम्भूत उसकी अनीक हुई, सम्पूण वायु उसके ह
|| बाजा बृजाने बा हए, ऋषि ओर व्यासको आदि ठेकर सख्य ऋषि उत्क वहन करने वाे बने ॥ २८ ॥ है सुने ! बहत कहनेसे क्या है ट
¢ म थोडेते अक्षरोभं कहता ह बह्माण्डमें जो कुछ वस्तु है बह सब उस रथमे वियमान थीं ॥ २९ ॥ दस प्रकार उस्र विश्वकर्माने भटीर्भाति स्थ ठ
¢ घंटा सरस्वती द्वी धनुषः शृतिरूपिणी॥इषुरिष्णुमहातेजास्त्वश्चिश्शल्यं प्रकीतिंतम्॥२६॥ हयास्तस्य तथा परोक्ताशचत्वायो नि &
¢| गमा सुने ॥ ज्योतीषि भूषणं तेषामवशिष्टान्यतः परम्॥२७॥अनीकं विषसंभं वायवो वाजकास्थृताः॥ ऋषृयोग्यासञ॒ख्याश्च ठ
|| वाइवाहास्तथाभवन्॥२८॥ स्वर्पाक्षरेस्संवीमि किं बहूक्त्या भुनीवर ॥ ब्रह्मांडे चैव यत्किबिद्रस्तुतद्धे रथे स्मृतम् ॥२९॥ ठ
एवं सम्यकङृतस्तेन धीमता विश्वकर्मणा सरथादिग्रकारो हि बरहमविष्ण्वज्ञया शुभः ॥३०॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्विती श
यायां र्रसंदितायां पञ्चमे युद्धलण्डे रथादियुद्धपरकारवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥ सनत्कुमार उवाच॥ईहग्विधं महादिव्यं &
$| नाना्चयैमयं रथम् ॥ संनह्य निगमान-वांस्त बह्मा पार्पयच्छिविम् ॥१॥ शंभवेऽसौ निवेद्याधिरोपयामास श्ुणिनम्॥ बहुशः ६
{ राध्यं देवेशं विष्ण्वादिषुरसंमतम् ॥ २ ॥ ततस्तस्मित्रथे दिव्ये रथप्राकारसंुते॥ सर्वमयः शंधुरार्रोई महाप्रधुः॥ ३॥ ||
¢| निमाण कर बरह्मा ओर विष्णी आज्ञा बह रथका सब प्रकार परसतुत किया ॥ ३० ॥ इति शीशिवमहाप्राणे द्वि° रु° प॑ यु भाषाीकाया ||
¢ || रथादियुद्धभकारवणनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ सनक्कुमाजी बोे इस भकारका बहादिव्य, अनेक आर्य सस्पन्न रथ निर्माण होगया तब ब्रक्ञाजीने ट
|| वेदरूपी घोडे उस्म जोतकर शिषजीको वह निवेदन फिया ॥ १ ॥ शिवजीको इश भकार वह रथ निवेदन कर विष्ण आदि देवताओंने बडी ||
#५॥| प्राना कर उस रथप्र उनको चाया ॥२॥ तब अनेकं सामभियोति सम्पन्न उस दिठथरथ ह
।
थे अहाभु सव देवमय भगवान् शंकर आ हए ॥३॥
शि० | | देव, गष, किन्नर, ओर ऋषियोे स्तुतिको भाप हो तथा विष्ण ब्रह्मा ओर ठोकपाछोसे स्तुतिको प्राप्त हो ॥ ४ ॥ गीत गानमें म ठ
ग: ठ ओर अप्सराओंषे आत्त होकर शिवजी अपने स्ारथीको अवलोकन करते हुए बडी बडी शोभाकौ भाष हुए ॥५॥ जिस समय उ 4 &
|| पारण करनेवाछे रथप्र भगवानु शंकर चटे उस समय वेद्मव चारों अश्व शरक बर भूमिम गिर पडे ॥६॥ पृथिवी ओर सम्पूणे पवेत चला £
यमान होगये उस्षके भार सहनेमे असमर्थं होकर शेषजी कंपितं होगये ॥ ७ ॥ तब पृथिवीकै धारण करने वाछे वृषरूपी भगवानु धमन स्थिर ©
४ होकर नीते क्षणमात्रको रथ उढाया ॥८॥ क्षणमात्रे दृषेनर भी जंघाओंके बरुन भूमिमे बेट गये रथपर चे हुए महेश्वरका तेज सहने समथं ¢
ट| ऋषिभिः स्तूयमानश्च देवगंधवप्रगेः॥ विष्णा ब्रह्मणा चापि कोकपालेवभव इ॥४।उपाघृतशाप्सरसांगणेर्गी विशारदैः शु £
६| म वरदश्शम्धुस्स तं पर्य च सारथिम्॥&॥तस्मिन्नारो ऽहतिरथं कलिपतं रोकसंभृतम्॥ शिरोभिः पतिता भूमौ तुरंगा वेदसंभवाः
(| ॥९६॥ चचाल वुधा चेट॒स्सकलाश्च महीधशः॥ चकंपे सहसा शेषोऽसोढा तद्धारमातुरः॥७॥ अथाधः स रथस्यास्य भगवान्ध ||
| रणीधरः॥बरषेनदह्पी चोत्थाय स्थापयामास वै क्षणम्+८॥ क्षणांतरे बृषेन्द्रोऽपि जातुभ्यामगमद्धराम् ॥ रथाशूढमहेशस्यसुते |
जस्सोढुमक्षमः ॥९॥ अभीषुहस्तो भगवावुद्यम्य च हर्यास्तदा॥ स्थापयामास देवस्य पचनाद् रथं वरम्॥१०॥ ततोऽसौ नोदया ¢ ।
मास॒ मनोमाश्तरंहसः ॥ ब्रह्मा हयन्वेदमयात्रद्धा्थवरे स्थितः॥११॥पुराण्युदिश्य वै जीणि तेषां खस्थानि तानि दि॥अधिष्ठिते
| महशेतु दानवानां तरस्विनाम्॥१२॥अथाह् भगवाडदरोदेवानालोक्य शंकरः॥पञ्युनामापिपत्य मे धदध्वं हन्मि ततोऽसुरान्॥१३॥ ट
ट| न हुए ॥ ९ ॥ तव कोडा हाथमे खमे बरह्माजीने उन धो्ोको उढाकर देवके वचनोसि उस्न भ्ठ रथम नियुक्त किया ॥ १० ॥ तब बह्लाजीने ह
|| शमं जते हष मन ओर पवनकै स्मान वैगवाठे इन वेदमय धोडोको चाया ॥ ११ ॥ ओर आकाशम स्थित उन तीन रोके सन्मुख &
¢ किया, जब महेश्वर उस रथम बेढचुके, ओर वेगगामी दानवोंकी ओर बह रथ चला ॥ १२ ॥ उस समय भगवानु शंकर देवताओंको देखकर ¢
| कहने रगे, आप से पशुभोका अधिपति करो रो यँ इन अुरोको नष्ट कर दं ॥ १३ ॥ ॥#
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॥ १४ ॥ सनत्कुमारजी बोढे इस प्रकार बुद्धि सम्पन्न उन देवदेवके वचन सुनकर पशुपनकी शका करके सब देवता परम विषादको प्राप्त
दए ॥ १५ ॥ देवदेव अभ्बिकापति देवताओंके भावको जानकर हैते हृए कपाकरके उन देवताओं कहने ठे ॥ १६ ॥ शिवजी बोरे
हं देवताओ ! पृशुभाव होनेपर॒भी तुम्हारा पात नहीं होगा, सुनो प्शुभावका मेोक्ष.जिस प्रकार होगा ॥ १७ ॥ जो दिभ्य पशुपतवतको
करेगा उसका मोक्ष होजायगा, पशु होनेेही यह वात होगी यह तुम सरावधानताको प्राप्त हुओि सत्य बात कही है ॥ १८ ॥ ओर भी जो
पृथक पञ््वंदेवानां तथान्येषां स॒रोत्तमाः॥ कटपयित्वैववध्यास्ते नान्यथा देत्यसत्तमाः ॥ १४ ॥ सनत्मार उवाच ॥ इति
तवा वचस्तस्य देवदेवस्य धीमतः॥विषादमगमन्सवेपञत्वं प्रतिशंकिताः॥१५॥तेषांभावमथ ज्ञात्वा देवदेवोऽम्बिकापतिः॥
हस्य कपया देवाञ्छधुस्तानिदमव्रवीत्॥ १६॥शधुरव।च ॥ मा वोऽस्तु प्ुभवेऽपि पातो विद्खधसत्तमाः॥ श्रयतां पभा
चस्य विमक्षक्रियतां च सः ॥ ७ ॥ यौ वे पाडुपतं दिव्यं चरिष्यति स मो्ष्यति॥पशत्वादिति सत्यं वःबतिज्ञातं समा `
दिताः ॥१८॥ ये चाप्यन्ये करिष्यंति बतं पाञ्ुपते मम॥ मो््यतिते न संदेहः पशुत्वात्सुरसत्तमाः ॥१९॥ नैष्ठिकं द्वादशाब्दे
1 वषकचयम्॥ शुश्चषां कारयेदस्तु स पशुत्वाद्विश्ुच्यते ॥२०॥ तस्मात्परमिदं दिष्यं चरिष्यथ सुरोत्तमाः ॥ पश्चुत्वा
न्म
ह्यथ तदा यूयमच्र न संशयः ॥२१॥ सनत्कुमार उवाच॥हत्याकण्यं वचस्तस्य महेशस्य परात्मनः॥ तथेति चाञचुवन्देवा
हरिव्ह्मादयस्तथा ॥ २२.॥ तस्माद्वै पशवस्सवें देवासुरवराः प्रभोः ॥ शद्रः पञुपतिशैव पशुपाशविमोचकः ॥ २३ ॥
कोड भरे पाशुपतव्रतको करगे हे श्र देवताओ ! वह प्शुतते एूटजांयगे, इसमे सन्देह नहीं है ॥ १९ ॥ जो निष्ापुषेक बारह वषं छःवर्ष वा
हे देवताओं ¡ देवता ओर दूसरे जनका पशत प्रथक् प्रथक् कल्पना करे दिया जाय तो बे बली दैत्य षर सकते है ओर भकारे नहीं
तीन वषं मेरी शुश्रूषा करेगा, वह पशुपाशसे छट जायगा ॥ २० ॥ हे शष्ठ देवताओं ! इस् कारण
॥ व ( त॒म दसत वतको करो इसमे सन्देह नहीं तुम
पशुपन्ते दटजाओगे ॥ २१ ॥ सनतकुमाजी बोटे महेश प्रमात्माकै इस् भकारे वचन सुनकर ह
रिजहयादि देवताओंने कहा रे्ाही होगा ॥ |
॥ २२॥ इस कारणते यह देवता अषुर सव कदं उन प्मुके पशु है, ओर पथओंकी पाश सक्तं करनेवारे शिवजी पशुपति है ॥ २३ ॥ |
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इस कारण महेश्रका एक नाम पपति भी है यह नाम सव ठो भिद कल्याणका देनेवाडा है ॥ २४ ॥ तव सव देवता ओर ऋषि ||ह
मसन्नतासे जयजयकार करने ठगे तव बह्मा पिष्ण॒ ओर महेश्वर यह बडे प्रसन्न हुए तथा दूसरे भी भसन्न हुए ॥ २५ ॥ उस समय जपा उस ट
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परमात्माको अद्ुत रूप हआ वंह सौवरषमे भी नहीं हो सकता ॥ २६ ॥ उस स्मय सव जगते पति शंकर ओर महेशान पार्वतीसहित सबके ८
॥४१०॥
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सुख देनके निमित्त तिषुर मारनेको चरे ॥२७॥ जिन्त समय वह देवदेव त्रिषुरके मारनेके निमित्त चे. सम्पूण देवता हाथी, घोडे) सिंह, रथ ट
तदा पडुपतीत्येत्तस्य नाम महेशितः॥परसिद्धमभवद्वध्वा सर्वोकेषु शमेदम् ॥२४॥ दा जयेति भाषतस्सवे देवर्षयस्तदा ॥
अभमुद॑श्चाति देवेशो बह्मा विष्णुः परेऽपि च॥२५॥ तरिमश्च समये यच्च रूपं तस्य महात्मनः॥ जातं तद्रणितुं शक्यं न हि वषशते
रपि ॥२६॥एवं षिधो महेशानो महेशान्यखिरेश्वरः ॥ जगाम भिपुरं दंत सवेषां सुखदायकः ॥२७॥ तं देवदेवं बिपरं निहतं
तदाल सवेत रविप्रकाशाः॥गनेर्हयस्सिदवरे रथे वरषेरययुस्तेऽमरराजयुख्याः॥२८॥ के शलेधशलेधशचण्डेरीन्द्रकस्पैमिरिसं
निभा॥नानायुषैस्सय॒तबाहवस्ते ततो च इष्टाः परययुस्सुरेशाः॥२९॥ नानायुधाद्याः परमप्रकाशा महोत्सवश्शंथुजयं वदंतः॥
ययुः पुरस्तस्य महेश्वरस्य तदेन्द्रपद्योद्धवविष्णुुख्याः॥३०॥जडषुुनयस्सवे दंडदस्ता जटाधराः॥ ववृषुः पुष्पवषांणि खेचरा
स्सिद्धचारणाः ॥ ३१ ॥ पुञ्यं -च विप्रेन्द्रा वजन्सवे गणेश्वराः॥तेषां सख्यां च कः कर्तु समर्थो वच्मि कांञन ॥ ३२ ॥
ओर वृषभप्र चढकर देवताओं स॒ख्य इन्द्रादिके स्ताथ चठे ॥२८॥ हर, मशुण्डी, शाल, शठ, जो महापाषाणके समान इह ओर पव॑तोकेही
समान थे उन आयुरधोको प्रहणकर उत्षस्तमय बरहमादिकभी अपने २ बाहनोपर चठकर चे ॥ २९ ॥ अनेक भरकारके आयुध हाथमे उटाये प्रम
६ महोत्सवसे शिवजीकी जय उच्चारणकरते हुए उस समय इन्दर बह्मा ओर विष्णजी महेश्वरके आगे आगे चठे॥ ३ ०॥ दंड हाथमे स्मि जराधारे
सव खनि भरसनता भग करने लगे ओर आकाशे सिद्ध चारण शूर्छोकी वर्षां करने छगे॥३१॥हे बाह्णणभरष्ठ!उस समय जो शिवजीके गण उन तीनो
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धरम वेश करने ठगे उनकी संख्या कौन कर सकता है परन्तु थोडते भँ कहता हूं ॥ ३२ ॥ गणेश्वर ओर देवतागणोके साथ सब देवगणो ह
भ्रष्ठ शंकरका भंगी नामक गणेश्वर विमान चकर यहेन्दरके समान शोभायमान हो त्रिषुरनाश.करनेको चा ॥ ३२ ॥ केश. विगतवास,
महाकेश, महाज्वर, सोमवही, सवण, सोमप, सनक ॥ ३४ ॥ सोमधक्, स्यं वर्चा, सर्यमरेषणक, सर्याक्ष, सय, सुरसुन्दर ॥ ३५ ॥ भर्कन्द, ४
इन्दर्, चण्ड, कम्पन) अतिकम्पनः इन्द्र, इन्दरजव) यंता, हिमकर ॥ ३६ ॥ शताक्ष, प॑ंचाक्ष, सहसरक्ष, महोदर, ( शतजित् ) वा सतीजुह,
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४ गणेश्वरेदवगणेश्च भृद्धी समात्रृतस्सर्वगणेनद्रव्ं ॥जगाम योगांशिपुरं निहतं विमानमारुह्य यथा महेन्द्रः ॥३३॥ केशो विगतवा #
¢ सश्च महाकेशो महाज्वरः ॥ सोमवह्टीसवणश् सोमदस्सनकस्तथा ॥३९॥ सोमधृक् सूर्य॑वर्चा सूर्यप्रषणकस्तथा॥सूर्याक्षस्ूरि $
नामा च सुरस्सुन्द्र एव च॥२५॥परस्कंद्ः